सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

बर्बरीक और विजय की गुप्त क्षेत्र में साधना तथा पाण्डवों से बर्बरीक की भेंट

 बर्बरीक और विजय की गुप्त क्षेत्र में साधना तथा पाण्डवों से बर्बरीक की भेंट

तदनन्तर कामकटंकटा को घर पर ही छोड़कर बुद्धिमान् घटोत्कच अपने पुत्र को साथ ले आकाश मार्ग से द्वारका को गया। वहाँ यादवों की सभा में पहुँच कर उसने उग्रसेन, वसुदेव, सात्यकिः अक्रूर, बलराम तथा श्रीकृष्ण आदि प्रधान-प्रधान यदुवीरों को प्रणाम किया। पुत्र सहित घटोत्कच को अपने चरणों में पड़ा देख भगवान् श्रीकृष्ण ने उसको और उसके पुत्र को भी उठाकर छाती से लगा लिया और आशीर्वाद दे अपने समीप बिठाकर इस प्रकार पूछा- बेटा कुरुवंश को बढ़ानेवाले राक्षसश्रेष्ठ बतलाओ, तुम्हें सब ओर से कुशल तो है न? यहाँ किस लिये तुम्हारा आगमन हुआ है ?'

घटोत्कच बोला- देव ! आपके प्रसाद से मुझे सब ओर से कुशल ही है। आपकी बतायी हुई स्त्री मोर्वी के  गर्भ से मेरे इस पुत्र का जन्म हुआ है, यह आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा उसे सुनिये। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ।

श्री भगवान् ने कहा- बेटा मौर्वेय तुम्हें जो-जो पूछने की इच्छा हो, सब पूछ लो।

बर्वरीक बोला- आर्यदेव माधव ! मैं मनः बुद्धि और समाधि के द्वारा आपको प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि संसार में उत्पन्न हुए जीव का कल्याण किस साधन से होता है! कोई धर्म को कल्याणकारक कहते हैं, तो कोई ऐश्वर्यदान को। कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम) को कोई तपस्या को, कोई द्रव्यको, कोई भोगोंको तथा कोई मोक्षको ही श्रेय कहते हैं। पुरुषोतम। इस प्रकार सैकड़ों श्रेयों में से किसी एक श्रेय को निश्चित करके  बतलाइये, जो मेरे इस कुल के लिये कल्याणकारी हो।

श्रीभगवान् बोले- वेटा । प्रत्येक वर्णके लिये पृथक् पृथक उत्तम श्रेय बताया गया है। ब्राह्मणोंके कल्याणका मूल है-तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय। मनीषी पुरुषों ने धर्म के स्वरूप का निरूपण भी ब्राह्मणों के लिये कल्याण की बात बतायी है। क्षत्रियोंके लिये सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बतायी गयी है। दुष्टों का दमन और साधुओंका संरक्षण भी क्षत्रियोंके लिये श्रेयस्कर है।  वैश्यों के श्रेय का साधन है-पशुपालन और कृषि विज्ञान। शूद्र के लिये द्विजों की सेवा ही श्रेयस्कर है। उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करने वाला शुद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँति के शिल्पकर्मो द्वारा जीविका चलाने और द्विजातियों के हित में लगा रहे। तुम क्षत्रिय कुल में उत्पन हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो। पहले तुम ऐसे बल की प्राप्ति के लिये साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बल से दुष्टों का दमन और साधु पुरुषों का पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। बेटा! देवियोंकी अत्यन्त कृपा होने से ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करने के उद्देश्य से देवी की आराधना करो ।

बर्बरीक ने पूछा- प्रभो! मैं किस क्षेत्र में, किस देवी-की, कैसे आराधना करूँ?

उसके इस प्रकार पूछने पर भगवान दामोदर ने क्षणभर ध्यान करके कहा- महीसागरसङ्गम तीर्थ में, जो गुप्त क्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहीं नारदजी द्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएं निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो । बर्बरीक से ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण ने घटोत्कच से कहा- 'भीमनन्दन ! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदय बाला है, इसलिये मैंने इसे 'सुहृदय' यह दूसरा नाम प्रदान किया है।' यो कह कर भगवान्‌ ने उसे छाती से लगा लिया और नाना प्रकार के धनसे उसको सन्तुष्ट करके गुप्त क्षेत्र में जाने का आदेश दिया। तब भगवान् श्रीकृष्ण को अपने पिता घटोत्कच को और यहाँ बैठे हुए सब यादवों को प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्त क्षेत्र कों चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्ण से विदा ले अपने वनको गया और पुत्रके गुणोंका स्मरण करता हुआ अपने राज्य का पालन करने लगा।

तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्त क्षेत्र में रहकर प्रतिदिन कर्म के द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकारके उपहारों से तीनों समय देवियों की पूजा करने लगा। तीन वर्षों तक अराधना करने पर देवियों उसपर बहुत सन्तुष्ट हुई और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों लोकों में किसी के पास नहीं है। तत्पश्वात् वे बोलीं- महायुते ! कुछ कालतक तुम यहीं निवास करो। फिर विजय की सङ्गति पाकर तुम अधिक कल्याण के भागी होओगे। देवियोंके ऐसा कहने पर सुहृदय वहीं ठहर गया। तदनन्तर मगधदेश के ब्राह्मण विजय वहाँ आये। उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिङ्गोंका पूजन किया और अपनी विद्या को  सफल बनाने के लिये चिरकाल तक देवियों की आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर  देवियोंने स्वप्नमें यह आदेश दिया- 'ब्रह्मन् ! तुम आँगनमें सिद्ध‌माता के आगे सम्पूर्ण विद्याओं का साधन करो। सुद्धदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।' यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियोंको प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदयसे कहा- 'तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवीके स्तोत्रका पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जबतक मैं यह विद्या साधन रूप कर्म करूँ तब तक किसी प्रकारका विघ्न न आने पावे ।'

विजयके ऐसा कहने पर महाबली बर्बरीक जब विघ्न निवारणके लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजय ने सुखपूर्वक आसन पर बैठकर 'गुं गुरुभ्यो नमः' इस मन्त्र से गुरुओं को नमस्कार किया। उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्र का अष्टोत्तरशत जाप करके पुनः गुरुजनोंको प्रणाम करने के पश्वात् गणेश्वर विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपति के उस उत्तम मन्त्र का वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होने पर भी समस्त कार्यों का साधक, महान् प्रयोजनों की प्राप्ति करानेवाला तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः' यह सात अक्षरोंका मन्त्र है। मन्त्र का विनियोग-वाक्य इस प्रकार है।ॐॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिर्विग्नेश्वरो देवता गं बीजम् शक्तिः पूजार्थे जपायें तिलकायें वा मन ईप्सितायें होमायें या विनियोगः ।' 

अर्थात् इस गणपति-मन्त्रके गण नामक ऋषिः विघ्नेश्वर देवता, गं बीज और शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथ सिद्धि अथवा होम के लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्र से चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्र का जप करे। अष्टोत्तरशत, सहस्त्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवन के लिये आदि देव का आवाहन करे। आवाहन के पश्चात् 'गं गणपतये स्वाहा' इस मन्त्र से गुग्गुळ की गोलियों द्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विध्नों में इस उत्तम मन्त्र का साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोऽभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वर कल्प को जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तरशत जप करके गुग्गुल की गुटिकाओं द्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि विनायक का पूजन किया। इसके बाद सिद्धाम्बिका को नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्या का साधन सहित जप किया, जिसके स्मरणमात्र से सब दुःखों का नाश हो जाता है। विप्रवर! मैं उस विद्या का वर्णन करता हूँ, सुनो- ॐॐॐ भगवान् वासुदेव को नमस्कार है। सहत्र मस्तकों वाले भगवान् अनन्त को नमस्कार है; जो क्षीर समुद्र में शयन करते है, शेषनाग का विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्म्नय और अनिरुद्ध ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं। जिन्होंने हयग्रीव का रुप  धारण किया है। उन्हीं भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नृसिंह वामन! त्रिविक्रम ! तथा वरदायक राम ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन ! महावराह! महापुरुष बैकुंठ ! नारायण! पद्मनाभ ! गोबिन्द ! दामोदर ! हृषीकेश ! समस्त असुरों का संहार करनेवाले ! सम्पूर्ण प्राणियों को अपने वश में रखनेवाले ! सब दुःखों का नाश करनेवाले! सम्पूर्ण विपत्तियों का भञ्जन करने-वाले। सब नागों का मान मर्दन करनेवाले । सर्वदेव महेश्वर ! सबका बन्धन छुदाने वाले! सब शत्रुओंका संहार करनेवाले ! समस्त ज्वरों का नाश करनेवाले ! सम्पूर्ण ग्रहों का निवारण तथा सब पापोंका शमन करनेवाले ! भक्तजन आनन्ददायक ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्य का भाग समर्पित है।

जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है, उसे वायु, अग्नि ,व्रण पत्थर, बिजली और बर्षा का भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्र से, ग्रहों से तथा चोरों से भी भय नहीं रहता है। इस प्रकार विजय ने संयमशील होकर मनः बुद्धि और समाधि के द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का साधन आरम्भ किया। जो बिना साधन के भी प्रतिदिन इस विद्या का पाठ कंरता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

विजय साधना में लगे थे। उस समय रात्रि के पहले प्रहर में एक राक्षसी ने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीक ने उस राक्षसी को भगा दिया। तत्पश्चात् आधी रात में दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ ।बर्बरीक ने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नाम का एक दानव विजय की ओर दौड़ा। उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखों से अग्नि की बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेगसे आगे बढ़ा। दोनों बहुत देर तक स्थिरतापूर्वक युद्ध करते रहे। फिर बर्बरीक ने उसे भूमि पर गिराकर खूब रगड़ा और तब तक नहीं छोड़ा, अबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरने पर उसे अग्नि कोण में महीसागर सङ्गम के तटपर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुनः विजय की रक्षा के लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे  पहर में पश्चिम दिशा की ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी। यह बड़े जोर-जोरसे गर्जना करती और अपने पैरोंकी धमक से पृथ्वी को कँपाती हुई चलती थी। उसका नाम 'द्रुरदुहा' था ।

उसे आती देख सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेग से  उसके समीप पहुँचा। उसने हंसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक्के से मारकर राक्षसी को धरती पर गिरा दिया।

उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुनः रक्षा के लिये खड़ा हो गया। तदनन्तर चौथे प्रहर में एक अ‌द्भुत नकली संन्यासी मूंड मुड़ाये दिगम्बर वेश में वहाँ आया। उसने बड़ा भारी व्रती होने का ढोंग रच रक्खा था। उसने आते ही कहा- 'हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्ट की बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रक्खी है। आग में हवन करते समय सूक्ष्म जीवों का बढ़ा भारी वध हो रहा है।' उसकी यह बात सुनकर बर्बरीक ने हँसते हुए कहा अग्रि में आहुति देने पर सब देवताओंकी तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्ड का पात्र है।' यो कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास जाकर खड़ा हो गया और मुक्के से मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तव में वह एक दैत्य था। क्षणभर में सचेत होने पर यह बर्बरीक के भयसे भागा और एक गुफा के बिल मे समा गया। बर्बरीक ने क्रोध में भरकर बड़े बेग से उसका पीछा किया, किन्तु वह देत्य वायुके समान वेगसे दौड़ता पाताल में समा गया। साठ योजन विस्तृत 'बहुप्रभा' नामकी नगरीमें यह निवास करता था। वर्बरीक बहाँ भी उसके पीछे पीछे जा पहुंचा। उसे देखकर 'पलाशी' नामवाल दैत्योंमें 'दौड़ो, मारो काटो और फाड़ डालो' आदि के रूप में महान्, कोलाहल मच गया। कोलाहल सुनकर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक देत्य योद्धा बीर बर्बरीक पर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों देत्यो को देखकर घटोत्कच का पुत्र क्रोध से जल उठा। उसने किन्हीं को पैरं से, किन्हीं को भुजदण्डी से और किन्हीं को छाती के धक्के से मार-मार कर क्षणभर में यमलोक पहुंचा  दिया। 

दैत्यों के मारे जाने पर वासुकि आदि नाग यहाँ आये और नाना प्रकार के प्रिय वचनों द्वारा सुहृदयकी स्तुति करते हुए बोले- भौमिनन्दन ! आपने नागों का बढ़ा भारी उपकार किया, क्योंकि आपके द्वारा यह पलाशी नामक दैत्य अपने सेवकों सहित मारा गया। वीर। इस दुरात्माने अपने सेवकों की सहायतासे भाँति-भाँतिके उपाय करके हमलोगों को पीड़ा दी। और पाताल से भी नीचे कर दिया था। आज आप इन नागो से कोई मनोवाञ्छित वर माँगिये। हम सब आपपर प्रसन्न होकर वर देने को उत्सुक हैं।'

बर्बरीक बोला- नागगण! यदि मुझे वर देना है, तो मैं यही मांगता हूँ कि विजय सब प्रकार के विघ्नों से मुक्त होकर सिद्धि प्राप्त कर लें।

तब नागों ने प्रसन्न होकर कहा-बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। बर्बरीक नागो को वह दैत्यपूरी देकर उनके द्वारा सम्मानित हो वहाँ से लौटा। बिलके मनोहर मार्गसे लौटते समय उसने देखा, कल्पवृक्ष के नीचे एक सर्वरत्नमय लिङ्ग विराजमान है; उसका महान् प्रकाश सब ओर फैल रहा है तथा बहुत-सी नागकन्याएँ उसका पूजन कर रही हैं। यह सब देखकर बर्बरीक को बड़ा विस्मय हुआ। उसने नागकन्याओं से पूछा 'सूर्य और अग्निके सागान तेजस्वी इस शिवलिङ्गकी किसने स्थापना की है । तथा इस शिवलिङ्गसे चारों दिशाओंकी और जो ये मार्ग गये हैं, इनका भी परिचय दो।'

वीर बर्बरीक का यह वचन सुनकर नागकन्याओं ने सकुचाते हुए कहा- सम्पूर्ण नागाओं के राजा महात्मा शेष ने तपस्या करके यहाँ इस महालिङ्ग की स्थापना की है। इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजन से यह सब सिद्धियों को देने वाला है। इस लिङ्ग  के पूर्व दिशा की ओर जानेवाला यह मार्ग भूलोक में 'श्री' पर्वत तक चला गया है। नागलोक सुविधा-पूर्वक वहाँ तक पहुँच सके इसके लिये 'इलापत्र' नागने इस मार्गका निर्माण किया है। दक्षिण में आने वाला यह मार्ग पृथ्वीपर 'शूर्पारक' क्षेत्रमें पहुंचता है, इसे 'कर्कोटक' नाग ने वहाँ जानेके लिये बनवाया है। पश्चिमका यह मार्ग अतिशय प्रकाशमान 'प्रभास'तीर्थको जाता है। इसे ऐरावतने नागों की यात्रा के लिये बनवाया है। इसी प्रकार उत्तरसे होकर निकला हुआ यह मार्ग पृथ्वी पर 'कुरुक्षेत्र' में जाता है, महात्मा तक्षक-ने वहाँ जाने के लिये यह मार्ग तैयार किया है। लिङ्ग के ऊपर की ओर जो मार्ग जाता है, जिससे जाने के लिये आप खड़े हैं। यह गुप्त क्षेत्र में सिद्धलिङ्गके पास गया है। यह मार्ग स्वामी स्कन्दन ने अपनी शक्ति के प्रहार से बनाया है। वीर ! ये सब बातें इमने बता दी, अब आप हमारा निवेदन सुनिये। पहले तो यह बताइये कि आप कौन हैं? अभी-अभी आप दैत्य के पीछे लगे गये थे और अब अकेले ही लौट रहे हैं। इसका क्या कारण है, हम सब आपकी दासियों हैं और पतिरूपमें आपका वरण करती हैं। आप हमारे साथ यहाँ के विविध स्थानों में क्रीडा कीजिये ।

बर्बरीक ने कहा- देवियो ! मेरा जन्म कुरुवंशमें हुआ है। मैं पाण्डु नन्दन भीमसेन का पौत्र हूँ। बर्बरीक मेरा नाम है। मैं उस दैत्यको मारनेके लिये आया था। यह पापी दैत्य मारा गया। अतः अब पृथ्वीपर लौटा जा रहा हूँ। आप लोगोंसे किसी प्रकार मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैंने सदा ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया है। 

यों कहकर बर्बरीकने उस शिवलिङ्गका पूजन और साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर उन सब कन्याओं के देखते देखते ऊपर-के मार्गसे चल दिया। बिलसे बाहर आकर उसने पूर्व-दिशा के मुखको प्रकाशयुक्त देखा, फिर बड़े हर्षके साथ यह विजय से मिला। उस समय तक विजय अपना सब कार्य पूरा कर चुके थे। उन्होंने बर्बरीक से कहा धीरेन्द्र ! तुम्हारे प्रसादसे मैंने अनुपम सिद्धि प्राप्त की है। तुम दीर्घकाल तक जीओ, आनन्द करो, दान दो और विजयी बनो। इसीलिये साधु पुरुष साधुओंका ही सङ्ग करना चाहते हैं। क्योंकि सत्पुरुषों का सङ्ग सब दोषोंको दूर करने की दया है। मेरे होमकुण्डमें सिन्दूर के समान लाल रंगका सात्विक एवं अत्यन्त पवित्र भस्म है, उसे हाथ में भरकर ले लो। युद्ध भूमि में इसे पहले छोड़ देने पर शत्रुके मर्म स्थान पर मृत्यु  भी हो, (साक्षात् मृत्यु ही शत्रु बन कर आ जाय) तो उसके शरीर को भी यह नष्ट कर देगा। इस प्रकार शत्रुओं पर तुम्हें सुखपूर्वक विजय प्राप्त होगी।'

बर्बरीक बोला-जो निष्काम भावसे किसी का उपकार करता है, वही साधु कहलाता है। जो किसी वस्तुकी इच्छा रखकर उपकार करता है, उसकी साधुतामें कौन गुण है। अतः यह भस्म किसी दूसरे को दे दीजिये। मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपको प्रसन्न मुख देखना चाहता हूँ। इसके सिवा और कुछ नहीं।

तदनन्तर देवियों सहित देवताओंने विजयका सम्मान करके उन्हें सिद्धेश्वर्य प्रदान किया और उनका नाम 'सिद्ध-सेन' रक्खा। इस प्रकार विजयने अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि प्राप्त  की।

तत्पश्चात् कुछ काल बीतने पर पाण्डव लोग जुए में हार गये और विभिन्न तीर्थों में घूमते हुए उस शुभ तीर्थ में भी जाने के लिये आये। वहाँ चण्डिका देवी का दर्शन करके मार्ग के थके-मांदे होने के कारण वहीं बैठ गये। पाँचों पाण्डवों के साथ द्रौपदी भी थी। उस समय चण्डिकाका गण भी वहीं विराजमान था। बर्बरीक ने वहाँ पधारे हुए पाण्डव वीरोंको देखा, परंतु वह उन्हें पहचानता नहीं था। पाण्डव भी उसे नहीं पहचानते थे क्योंकि जन्म से लेकर अबतक पाण्डवों के साथ उसकी भेंट ही नहीं हुई थी। पाण्डवों ने अपनी गठरी आदि वहीं खोल दी और प्यास से पीड़ित होकर जल की ओर देखा। तब भीमसेन कुण्ड में पानी पीने के लिये घुसे। उस समय युधिष्ठिर ने उनसे कहा-'भीमसेन ! तुम कुण्ड से पानी निकालकर बाहर ही हाथ-पैर धो लो, उसके बाद जल पीना; अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा। भीमसेन के नेत्र प्यास से व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिर की बातें बिना सुने ही जल पीने की इच्छा से कुण्ड में प्रवेश किया। जल देखकर उन्होंने यहीं पीने का निश्वय किया और शुद्धिके लिये मुख, दोनों हाथ और दोनों पैर धोये। भीमसेन जब इस प्रकार पैर धो रहे थे। उस समय सुद्धदयने ऊपर से यह सत्य वचन कहा-ओ दुर्मते! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारा विचार तो बड़ा पापपूर्ण है। अहो! तुम देवीके कुण्ड में हाथ, और और मुँह धो रहे हो। मै देवीको सदा इसी जलसे स्नान कराता हूँ। मल से दूषित जल को तो मनुष्य भी नहीं छूते, फिर देवता उसका स्पर्श कैसे कर सकते हैं? अब तुम इतने बड़े मूढ़ हो, तब तीर्थों में क्यों घूम रहे हो?'

भीमसेनने कहा- क्रूर राक्षसाधम तू क्यों ऐसी कठोर बातें कहता है। जल का दूसरा उपयोग ही क्या है! यह प्राणियों के भोग के लिये ही तो होता है? बड़े-बड़े मुनीश्वरोंने भी तीर्थों में स्नान का विधान किया है। अंगो को धोना ही तो स्नान कहा गया है। फिर तू मेरी निन्दा क्यों करता है ? यदि स्नान और अङ्ग-प्रक्षालन न किया जाय तो धर्मात्मा पुरुष किस लिये पूर्त धर्मका अनुष्ठान करते हैं। क्यों बावड़ी, कूप और तड़ाग आदि बनवाते हैं।

सुहृतय बोला- निःसन्देह तुम्हारा यह कथन सत्य है कि मुख्य मुख्य तीर्थों में स्नान करना चाहिये। ऐसी विधि है भी, परंतु जो नदी आदि चर तीर्थ हैं जिनके जल बहते रहते हैं, उन्हीं में भीतर प्रवेश करके स्नान आदि करना चाहिये। कूप-सरोबर आदि स्थावर तीर्थों में तो बाहर खड़े होकर ही स्नानादि करना उचित है। स्थावर तीर्थों में भी वहीं भीतर प्रवेश करके स्नान करने का विधान है, जहाँ भक्त पुरुष देवता को स्नान कराने के लिये जल न लेते हों तथा जो सरोवर देवस्थान से सौ हाथ से भी अधिक दूर बनाया गया हो। उसके भीतर प्रवेश करने का भी यह एक नियम है कि पह‌ले बाहर ही दोनों पैर धोकर फिर कुण्ड में स्नान किया जाय, अन्यथा दोष बताया गया है। क्या तुमने अक्षाजीका कड़ा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है। 

'जो जलमें मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, धूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्म हत्यारों के समान हैं।'

इसलिये ओ दुराचारी ! तुम शीघ्र जल से बाहर निकल जाओ। यदि तुम्हारी इन्द्रियों तुम्हारे काबू में नहीं हैं, तो तुम तीर्थों में किस लिये घूमते हो? नादान! जिसके हाथ, और और मन भलीभाँति संयम में न हों और जिसके द्वारा समस्त क्रियाएं निर्विकार भाव से की आती हो, यही तीर्थ का फल पाता है। मनुष्य पुण्यकर्म के द्वारा यदि दो घड़ी भी जीवित रहे तो यह उत्तम है। परंतु उभय लोकविरोधी पापकर्मके साथ एक कल्पकी भी आयु मिले, तो उसे न स्वीकार करे ।

भीमसेन बोले- हाथो की तरह तेरी कार्य कार्यकी कर्कश ध्वनिसे मेरे तो कान बहरे हो गये। अब तू अपनी इच्छा के अनुसार यहाँ विलाप कर या चिन्ता के मारे सूख जा मैं तो जल पीकर ही रहूँगा।

सुहृदयने कहा- मैं धर्मकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियोंके कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, अतः किसी प्रकार भी तुम्हें पाप न करने दूँगा। हमारे इस कुण्ड से  तो तुम शीघ्र ही बाहर निकल आओ नहीं तो इन ईंटों के टुकड़ों से तुम्हारा मस्तक चूर-चूर कर दूँगा।

यो कह‌कर बर्बरीकने इंटे उठा लिये और भीम के माथे को लक्ष्य करके फेंकना आरम्भ किया। भीमसेन उसके प्रहार को बचाकर उछले और सरोवर से बाहर आ गये। फिर तो दोनों भयंकर पराक्रमी वीर एक दूसरेको घुड़कते हुए आपस में गुध गये। दोनों ही युद्धविद्या में पारङ्गत थे। अतः अपनी विशाल भुजाओं से युद्ध करने लगे। दो ही घड़ी में उस राक्षसके सामने पाण्डव भीमसेन दुर्बल पड़ने लगे। अन्त में बर्बरीक ने भीमसेन को उठा लिया और जल में फेंकने के लिये समुद्रकी ओर चल दिया।शङ्करने आकाशमें स्थित हो बर्बरीकसे कहा- 'राक्षसोंमें श्रेष्ठ महाबली बर्बरीक ! ये भरतकुलके रज और तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं। इन्हें छोड़ दो। ये तीर्थयात्रा के प्रसंगसे अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ विचरते हुए इस तीर्थ में भी स्नान करनेके लिये ही आये हैं। अतः तुम्हारे द्वारा सर्वथा सम्मान पाने के ही योग्य हैं।'

भगवान् शंकर का यह वचन सुनकर सुहृदय सहसा भीमसेन को छोड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा और बोल उठा-हाय ! मुझे धिकार है। यह बड़े कष्ट की बात है। बढ़े कष्ट की बात है। पितामह मुझे क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये।' उसे इस प्रकार शोक करते और बार-बार मोहित होते देख भीमसेन ने छाती से लगा लिया और स्नेहसे मस्तक सूंधकर कहा- 'वत्स ! जन्म कालसे ही न तो हम तुम्हें पहचानते हैं न तुम हमको। केवल घटोत्कच तथा भगवान् श्रीकृष्ण से यह सुन रक्खा है कि तुम इसी तीर्थ में निवास करते हो। किंतु यह सब बात भी हमें भूल गयी थी, क्योंकि जो लोग अनेक प्रकारके दुःखोंसे दुखी और मोहित होते हैं, उनकी सारी स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। अतः हम पर जो यह दुःख आया है, यह सब कालकी प्रेरणा से प्राप्त हुआ है। बेटा! तुम शोक न करो। तुम्हारा इसमें तनिक भी दोष नहीं है, क्योंकि कुमार्ग पर चलनेवाला कोई भी क्यों न हो, क्षत्रियके लिये दण्डनीय ही है। साधु क्षत्रिय को उचित है कि यदि कुमार्ग पर चले तो अपनी आत्मा को भी दण्ड दे। फिर पिता, माता, सुहृद्, भ्राता और पुत्र आदि के लिये तो कहना ही क्या है? मुझे आज बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ है। मैं और मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनका पुत्र ऐसा धर्मज्ञ और धर्मपालक है। तुम वर पानेके योग्य हो, मेरे तथा दूसरे सत्पुरुषोंके द्वारा प्रशंसा पाने के अधिकारी हो। अतः यह शोक छोड़कर तुम्हें स्वस्थ हो  जाना चाहिये ।

बर्बरीक बोला-पितामह ! मैं पापी हूँ, ब्रह्मद्दत्यारे से भी अधिक घृणा का पात्र हूँ। प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हैं। प्रभो! न तो आप मेरी ओर देखें और न मेरा स्पर्श ही करें। ब्राह्मण लोग सभी पापोंका प्रायश्चित बतलाते हैं। परंतु जो पिता-माताका भक्त नहीं है। उसके उद्धार का कोई  उपाय नहीं। अतः जिस शरीरसे मैंने पितामह को पीड़ा पहुँचायी है, उस अपने शरीर को आज मैं महीसागर सङ्गम में त्याग दूंगा; जिससे अन्य जन्मों में भी ऐसा ही पातकी न होऊँ।


यो कहकर बलवान् बर्बरीक उछल कर समुद्रके भीतर चला गया। समुद्र भी यह सोचकर काँप उठा कि मैं कैसे इसका वध करूँ'। तदनन्तर सिद्धाम्बिका तथा चारों दिशाओं-की देवियों रुद्रके साथ वहाँ आयी और उसे हृदयसे लगाकर बोली- धीरेन्द्र ! अनजानमें किये हुए पापसे दोष नहीं लगता, यह बात शास्त्रों में बतायी गयी है। अतः तुम्हें इसके विपरीत कोई बर्ताव नहीं करना चाहिये।। देखो तुम्हारे पितामह भीम पुत्र-पुत्र पुकारते हुए तुम्हारे पीछे लगे हुए चले आ रहे हैं। तुम्हारी मूत्यु हो जाने पर वे स्वयं भी प्राण त्याग देने को उत्सुक हैं। बीर! यदि इस समय तुम शरीर छोड़ोगे तो भीमसेन भी शरीर को त्याग देंगे। उस दशा में तुम्हें बड़ा भारी पातक लगेगा। अतः महामते ! तुम ऐसा जानकर अपने शरीर को धारण करो। थोड़े ही समय में देवकी नन्दन श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारे शरीर का नाश होगा, ऐसा बताया गया है। वत्स ! वे साक्षात् भगवान् विष्णु हैं और उनके हाथ से शरीर का नाश होना बहुत उत्तम (मुक्तिदायक) है।इसलिये तुम उस समयकी प्रतीक्षा करो और हमारी बात मानो ।' देवियोंके ऐसा कहने पर बर्बरीक उदास मन से 

लौट आया। बर्बरीक चण्डिका के कार्यकी सिद्धिके लिये

बढ़ा भारी युद्ध करेगा, इसलिये संसारमें चण्डिल नामसे

प्रसिद्ध और समस्त विश्वके लिये पूजनीय होगा।' यो कहकर

वहाँ आयी हुई सब देवियों अन्तर्धान हो गईं। भीमसेन भी बर्बरीक को साथ लेकर आये और अन्य पाण्डवों से भी वह सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सब पाण्डवों को बड़ा आश्वर्य हुआ। सबने बार-बार उसकी प्रशंसा की और आलस्य त्यागकर विधि के अनुसार तीर्थ-स्नान किया ।

 

घटोत्कचका विवाह और बर्बरीकका जन्म

 घटोत्कच का विवाह और बर्बरीक का जन्म

शौनक जी बोले-सूतजी आपने गुप्त क्षेत्र के इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन अनुपम तथा हर्ष वर्धक माहात्म्य का वर्णन किया। यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्ध माता की कृपासे उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की। यह सब यथार्थ रूप से कहिये ।

 (सूतजी) ने कहा- नक्षन् ! इस विषय में मैं श्रीव्यासजी के मुख से सुनी हुई कथा कहूँगा। पहले की बात है, पाण्डवों ने राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी को पाकर धृतराष्ट्र की आज्ञा से इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेव से सुरक्षित होकर रहते थे। एक समय पाण्डव अपनी राजसभा में बैठकर नाना प्रकार की बातें कर रहे थे, इतने  में भीम का पुत्र घटोत्कच यहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासन से उठे और बड़ी प्रसन्नता के साथ सब ने घटोत्कच को हृदय से लगाया। भीम नन्दन घटोत्कच ने भी अत्यन्त विनीत भाव से उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर ने उसे अपनी गोद‌ में बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूंघते हुए सभा में इस प्रकार पूछा- 'बेटा ! कहाँ से आते हो? इतने दिनों तक कहाँ विचरते रहे ? हिडिम्बा कुमार ! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओं का कोई अपराध तो नहीं करते हो? भगवान् श्री कृष्ण में और हम-लोगों में तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करने वाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न ।'

धर्मराज के इस प्रकार पूछने पर हिडिम्बाकुमार ने कहा- महाराज ! मेरे मामाके मारे जाने पर में उसी के राज्य सिंहासन पर बिठाया गया हूँ और दुष्टों का दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशल से हैं, वे इस समय दिव्य तपस्या में लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है-बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवों में भक्ति रखने वाले बनो।' माता की यह बात सुनकर मैं भक्तियुक्त चित्तसे आपको प्रणाम करनेके लिये दी मेरुगिरि के शिखरसे यहाँ आया हूँ। मेरी इच्छा है कि आप लोग मुझे किसी महान् कार्य में नियुक्त करें। क्योंकि यही इस जीवन का महान् फल है कि पुत्र सदा अपने पितृ वर्गकी आशा का पालन करे। इससे वह पुण्य लोको पर विजय पाता है और इस संसार में भी यशस्वी होता है।


घटोत्कच के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले- बेटा! तुम्हीं हमारे भक्त और सहायक हो। हिडिम्बाकुमार ! निश्चय  ही जैसी माता होती है, वैसा ही उसका पुत्र भी होता है। तुम्हारी माता हमलोगों के प्रति अविचल भक्ति रखने वाली है, तुम भी ऐसे ही हो। अहो! मेरी प्यारी पतोहू हिडिम्बादेवी बड़ा कठिन कार्य कर रही है, जो कि अपने प्यारे पति की सेवा का सुख छोड़कर तपस्या में ही संलग्न है।

इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा- पुण्डरीकाक्ष ! आप तो जानते ही हैं कि घटोत्कच का जन्म भीमसेन से हुआ है। यह उत्पन्न होते ही तरुण हो गया था। श्रीकृष्ण! मैं चाहता हूँ, मेरे इस पुत्रको योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप सर्वज्ञ है, बताइये, इसके योग्य पत्नी कौन हो सकती है! धर्मराज के ऐसा कहने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षणभर ध्यान करके उनसे कहा- 'राजन्! मैं बतलाता हूँ, घटोत्कच के योग्य एक बड़ी सुन्दरी स्त्री है, जो इस समय प्राग्ज्योनिध‌पुर में निवास करती है। अद्भुत पराक्रम करने वाळा जो मुर नामक देत्य था, उसी की वह पुत्री है। मुर दैत्य बढ़ा भयङ्कर था और पाशमय दुर्ग में रहता था। यह मेरे हाथ से मारा गया। उसके मारे जाने पर उसकी पुत्री कामकटंकटा मुझसे युद्ध करनेके लिये आयी। यह अत्यन्त पराक्रमी होने के कारण बड़ी भयानक जान पड़ती थी। तब खङ्ग और खेटक धारण करनेवाली उस देत्य-कन्या के साथ महासमर में मैंने भी युद्ध आरम्भ किया। मेरे शार्ङ्ग नामक धनुष से बड़े-बड़े बाण छूटने लगे, परंतु मुरकी पुत्री ने मेरे उन सभी बाणों को खड्ग से ही काट डाला। तब मैंने उसका वध करने के लिये अपना सुदर्शन चक्र उठाया। यह देख कामाख्या देवी मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली- 'पुरुषोत्तम ! आपको इसका वध नहीं करना चाहिये। मैंने स्वयं इसको खड्ग और खेटक प्रदान किये हैं, जो अजेय हैं।'

कामाख्या देवीकी यह बात सुनकर मैंने कहा-शुभे ! मैं ही इस युद्ध से निवृत्त होता हूं, तुम इस कन्या को मना करो। तब कामाख्या देवीने उसे हृदयसे लगाकर कहा-'भद्रे ! तुम युद्धसे लौट चलो। ये माधव श्रीकृष्ण युद्ध में दुर्जय हैं। कोई किसी प्रकार भी संग्राम में इन्हें मार नहीं सकता । संसार में ऐसा कोई वीर न तो हुआ है, न है और न होगा ही, जो इन्हें युद्ध में जीत सके। औरोंकी तो बात ही क्या है, साक्षात् भगवान् शङ्कर भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। बेटी! ये तुम्हारे भावी श्वशुर हैं। अतः तुम इन्हें प्रणाम करके युद्ध से हट जाओ। यही तुम्हारे लिये उचित होगा। तुम इनके भाई भीमसेन की पुत्रवधू होओ गी। इसलिये अपने श्वशुर के समान पूजनीय जनार्दन का तुम आदर करो। अब पिताके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। इन श्रीकृष्ण के हाथ से जो तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई है, वह सर्वथा स्पृहणीय है। क्योंकि इनके हाथ से मरने पर अब तुम्हारे पिता सब पातकों से मुक्त होकर विष्णुधाम में चले गये।' 

कामाख्या के ऐसा कहने पर कामकटंकटा ने क्रोध त्याग दिया और विनीत अङ्गों से मुझे प्रणाम किया। तब मैंने उसे आशीर्वाद देकर कहा- 'बेटी! तुम भगद‌त्त से सम्मानित होकर इसी नगर में निवास करो। यहाँ रहती हुई ही तुम धीर हिडिम्बाकुमार को पतिरूप में प्राप्त करोगी।' इस प्रकार आश्वासन देकर मैंने कामाख्या देवी तथा मौवीं (मुरपुत्री) को विदा किया। फिर वहाँ से द्वारका होता हुआ मैं यहाँ आकर आपसे मिला है। अतः वह मुरदैत्य की सुन्दरी कन्या ही घटोत्कच के लिये योग्य स्त्री है। मैं ससूर हूँ, इसलिये मेरे द्वारा उसके रूप का वर्णन करना उचित न होगा। साधु पुरुष के लिये यह कदापि उचित नहीं है कि यह स्त्रियोंके रूप-सौन्दर्य का वर्णन करे। एक बात और सुन लीजिये। उसने प्रतिज्ञा कर रक्खी है कि जो मुझे किसी प्रश्न पर निरुत्तर करके जीत ले तथा जो मेरे समान ही बलवान् हो, वही मेरा पति होगा। उसकी यह प्रतिज्ञा सुनकर बहुत से दैत्य तथा राक्षस उसे जीतने के लिये गये किंतु मौवीं ने उन सबको परास्त करके मार डाला  । यदि महापराक्रमी घटोत्कच ऐसी मौर्थी को जीतने का उत्साह रखता हो, तो यह अवश्य ही इसकी पत्नी होगी।'

युधिष्ठिर बोले- प्रभो ! उसके सब गुणोंसे क्या लाभ है, जब उसमें यह एक ही महान् अवगुण भरा हुआ है। उस दूध को लेकर क्या किया जायगा जिसमें विष मिला दिया गया हो। अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे भीमसेनकुमार को केवल साह‌स के भरोसे कैसे इस सङ्कट में डाल दें। यह बेचारा तो शुद्ध वाक्य भी बोलना नहीं जानता। जनार्दन देश-देशमें और भी तो बहुत-सी स्त्रियों हैं, उन्होंमें से किसी उत्तम स्त्री को बतलाइये ।भीमसेन बोले- भगवान् श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, यह अनेक प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाली, सत्य और उत्तम है। मेरा विश्वास है, घटोत्कच शीघ्र ही मौर्वी को प्राप्त करेगा ।

अर्जुन बोले-कामाख्या देवीने मौर्वी से कहा है 'भद्रे ! भीमसेन का पुत्र तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा।' इस कारण मेरी राय यही है कि घटोत्कच शीघ्र वहाँ जाय ।

श्रीभगवान् बोले- अर्जुन मुझको तुम्हारी और भीमकी बात पसंद है । हिडिम्बाकुमार। बोलो तुम्हारी क्या राय है ?

घटोत्कचने कहा-पूजनीय पुरुषोंके आगे अपने गुणों का वर्णन करना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणें और उत्तम गुण व्यवहार में आकर ही प्रकाशित होते हैं। मैं सर्वथा ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे मेरे निर्मल पिता पाण्डव मुझ पुत्रके कारण सत्पुरुषों की सभा में लज्जित न हों।

यो कहकर महाबाहु घटोत्कच ने उन सबको प्रणाम किया। फिर पितरों से विजयका आशीर्वाद पाकर उत्साहसम्पन्न हो उसने जाने का विचार किया। उस समय भगवान् जनार्दन ने उसकी प्रशंसा करके कहा बेटा! कथा कहते समय विजयकी प्राप्ति करानेवाले मुझ श्रीकृष्ण का स्मरण अवश्य कर लेना, जिससे मैं तुम्हारी दुर्भेय बुद्धि को अविलम्ब बढ़ा दूँगा ।' ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने उसे हृदयसे लगाया और आशीर्वाद देकर विदा किया। तदनन्तर हिडिम्बाकुमार महापराक्रमी घटोत्कच सूर्याक्ष, बालाख्य और महोदर-इन तीन सेवकों के साथ आकाशमार्ग से  चला और दिन बीतते-बीतते प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचा।

वहाँ जानेपर घटोत्कच्चने प्राग्ज्योतिषपुर से बाहर एक सोने-का सुन्दर भवन देखा, जो एक विशाल वाटिका में शोभा पा रहा था। उसकी ऊँचाई एक हजार मंजिलकी थी। मेरुपर्वत के शिखरकी भाँति सुशोभित होनेवाले उस भवनके पास पहुँचकर घटोत्कचने देखा दरवाजे पर एक लड़की खड़ी है। उसका नाम 'कर्णप्रावरणा' था। वीर हिडिम्बाकुमार ने सरस भाषा में उससे पूछा 'कल्याणी! मुरकी पुत्री कहाँ हैं। मैं दूर देशसे आया हुआ उनकी कामना करनेवाला अतिथि हूँ और उन्हें देखना चाहता हूँ।'

भीमसेनकुमार की यह बात सुनकर यह निशाचरी लड़खड़ाती हुई दौड़ी और महल की छतपर बैठी हुई मौर्वी के पास जाकर इस प्रकार बोली- देवि! कोई सुन्दर तरुण काम का अतिथि होकर तुम्हारे द्वारपर खड़ा है। उसके समान सुन्दर कान्तिवाला पुरुष कोई त्रिलोकी में भी नहीं होगा। अतः अब उसके लिये क्या कर्तव्य है, वह आज्ञा दीजिये।'

कामकटंकटा बोली-अरी! उन्हें शीघ्र ले आ, क्यों विलम्ब करती है? कदाचित् देवकी सहायता से उन्हीं के द्वारा मेरी प्रतिज्ञा की पूर्ति हो जाय।

मौर्वी के ऐसा कहने पर दासीने घटोत्कच के पास जाकर कहा-कामी पुरुष उस मृत्युरूपा नारीके समीप शीघ्र जाओ। उसके ऐसा कहने पर हँसते हुए घटोत्कच ने वहींपर अपना धनुष छोड़कर घर के भीतर प्रवेश किया और विद्युत्-की भाँति प्रकाशित होनेवाली उस दैत्य-कन्या को देखकर इस प्रकार सोचा अहो! मेरे पितृस्वरूप श्रीकृष्ण ने मेरे लिये योग्य स्त्री को ही बतलाया है।' इस प्रकार विचार करते हुए उसने मौर्वी से कहा- ओ बङ्ग के समान कठोर हृदय-बाली निष्ठुर नारी! मैं अतिथि होकर तुम्हारे घर आया हूँ। अतः सत्पुरुषोंके लिये जो उचित स्वागत सत्कार है, वह अपने हार्दिक भावके अनुसार करो।' हिडिम्बाकुमार का यह बचन सुनकर कामकटंकटा उसके रूप से विस्मित हो अपनी निन्दा करके इस प्रकार बोली- 'भद्रपुरुष ! तुम व्यर्थ ही यहाँ चले आये। जीते-जी पुनः सुखपूर्वक लौट जाओ, अथवा यदि मुझे चाहते दो तो शीघ्र कोई कथा कहो। कथा कहकर यदि मुझे सन्देह‌ में डाल दोगे तो मैं तुम्हारे वशमें हो जाऊँगी। उसके बाद मेरे द्वारा तुम्हारी सेवा होगी।'


उसके ऐसा कहने पर घटोत्कच ने यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनकी कथा है, उन भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करके कथा प्रारम्भ की। 'मान को किसी पत्नी के गर्भसे कोई बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होने पर बड़ा अजितेन्द्रिय निकला। उस युवक के एक पुत्री हुई तथा उसकी पत्नी मर गयी।

तब पिताने ही उस नन्ही-सी पुत्री की रक्षा एवं पालन-पोषण किया। यह कन्या जय जवान हुई और उसके सब अङ्ग विकसित हो गये, तब उसके पिताका मन उसके प्रति कामलोलुप हो उठा । तदनन्तर उस पापी ने अपनी ही पुत्री से कहा- प्रिये ! तुम मेरे पड़ोसी की लड़की हो। मैंने तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिये यहाँ लाकर दीर्घकाल तक पालन-पोषण किया है। अतः अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।' उसके ऐसा कहने पर उस लड़कीने ऐसा ही माना। उसने इसे प्रति रूप में स्वीकार किया और इसने उसे पत्नीरूप में। तत्पश्चात् उस कामी गदहे से एक कन्या उत्पन्न हुई। अब बताओ, वह कन्या उसकी क्या लगेगी पुत्री अथवा दौहित्री? यदि तुममें शक्ति है। तो मेरे इस प्रश्नका शीघ्र उत्तर दो।'

यह प्रश्न सुनकर मौर्वी ने अपने हृदय में अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किसी प्रकार उसे इस प्रश्नका निर्णय नहीं सूझता था। तब उस प्रश्न से परास्त होकर मौर्वी अपनी शक्तिका उपयोग किया। यह ज्यों ही झूले से सहसा उठकर हाथ में तलवार लेना चाहती थी त्यों ही घटोत्कच ने बड़े वेग से पहुँच कर बायें हाथ से उसके केश पकड़ लिये और धरती पर गिरा दिया। फिर उसके गले पर बायाँ पैर रखकर दाहिने हाथ में कतरनी है, उसकी नाक काट लेने का विचार किया। मौर्वीं ने बहुत हाथ-पैर मारे, किंतु अन्त में शिथिल होकर उसने मन्द स्वर में कहा- 'नाथ! मैं तुम्हारे प्रश्न से और शक्ति तथा बलसे परास्त हो गयी हूँ। तुम्हें नमस्कार है। अब मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हारी दासी हूँ। जो आज्ञा दो वही करूँगी।'

घटोत्कच ने कहा यदि ऐसी बात है तो लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया ।


घटोत्कच के यों कहकर छोड़ देने पर कामकटंकटा ने पुनः उसे प्रणाम किया और कहा महाबाहो में जानती हूँ, तुम बड़े वीर हो। त्रिलोकी में कहीं भी तुम्हारे पराक्रम की तुलना नहीं है। तुम इस पृथ्वी पर साठ करोड़ राक्षसोंके स्वामी हो। ये बातें मुझे कामाख्या देवीने बतलायी थीं, ये सब आज याद आ रही हैं। मैंने अपने सेवकों तथा इस शरीर के साथ यह सारा घर तुम्हारे चरणों में समर्पित कर दिया। प्राणनाथ ! आज्ञा दो, मैं तुम्हारे किस आदेश का पालन करूँ ?'

घटोत्कचने कहा-मौवीं! जिसके पिता और भाई-बन्धु मौजूद हैं। उसका विवाह छिपकर हो। यह किसी प्रकार उचित नहीं है। इसलिये अब तुम शीघ्र मुझे इन्द्रप्रस्थ ले चलो। यही हमारे कुल की परिपाटी है। इन्द्रप्रस्थ में गुरुजनों की आज्ञा लेकर मैं तुमसे विवाह करूँगा। तदनन्तर मौर्वी अनेक प्रकार की सामग्री साथ ले घटोत्कच को अपनी पीठ पर बैठाकर इन्द्रप्रस्थ में आयी। भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवों ने घटोत्कच का अभिनन्दन किया, उसके बाद शुभ लग्न में भीमकुमारने मौर्वी का पाणिग्रहण किया । कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही वधू को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। विवाह-सम्बन्ध हो जाने पर राजा युधिष्ठिरने घटोत्कचका आदर-सत्कार करके उसे पत्नी सहित अपने राज्यको जाने का आदेश दिया। महाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके हिडिम्बाकुमार अपनी राजधानी हिडम्ब-वन को चला गया। यहाँ उसने मौर्वी के साथ बहुत दिनों तक क्रीड़ा की। तदनन्तर समयानुसार उसके गर्भ से एक महातेजस्वी एवं बालसूर्य के समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त हो गया। उसने माता-पितासे कहा- मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूँ, बालकके आदिगुरु माता-पिता ही हैं। अतः आप दोनों के दिये हुए, नाम को मैं ग्रहण करना चाहता हूँ।' तय घटोत्कच ने अपने पुत्रको छाती से लगाकर कहा- 'बेटा! तुम्हारे केश बर्बराकार (घुँघराले) हैं, इसलिये तुम्हारा नाम बर्बरीक होगा। महाबाहो तुम अपने कुल का आनन्द बढ़ानेवाले होओगे। तुम्हारे लिये जो परम कल्याणमय वस्तु है, उसको हमलोग द्वारकापुरी चलकर यदुकुलनाथ भगवान् वासुदेव से पूछेंगे।'


खाटूश्यामजी 1


महीसागरसङ्गम की श्रेष्ठता तथा उसके गुप्त-क्षेत्र होने का कारण

अर्जुन ने पूछा—

नारदजी! इस तीर्थ को गुप्त-क्षेत्र क्यों कहते हैं? जिसका इतना महान् प्रभाव सुना गया है, यह गुप्त कैसे हुआ?

नारदजी बोले—

अर्जुन! इस क्षेत्र के गुप्त होने का जो कारण है, उसके विषय में एक अत्यन्त प्राचीन कथा है। उसे ध्यानपूर्वक सुनो। यह क्षेत्र पूर्वकाल में शापवश गुप्त हो गया था।

एक समय किसी निमित्त से सब तीर्थों के अधिदेवता एकत्र होकर ब्रह्माजी को प्रणाम करने के लिये उनकी सभा में गये। सब तीर्थों को आया हुआ देखकर ब्रह्माजी अपने समस्त सभासदों के साथ उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र आश्चर्य से खिले हुए थे।

भगवान् ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर सब तीर्थों को प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—

“तीर्थंकरों! आज आप सब लोगों के पदार्पण से पवित्र होकर हमारा स्थान सफल हो गया। हम सब देवता भी आपके दर्शन से अत्यन्त पवित्र हो गये। तीर्थों का दर्शन, स्पर्श तथा स्नान—ये सब परम कल्याणकारक हैं। बड़े-बड़े पापों से भरे हुए जो भयङ्कर एवं अत्यन्त निर्दय मनुष्य हैं, वे भी तीर्थ में पवित्र हो जाते हैं; फिर जो धर्मपरायण हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है?”

यों कहकर ब्रह्माजी ने अपने पुत्र पुलस्त्य को आज्ञा दी—

“वत्स! तुम तीर्थों के लिये शीघ्र ही अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजन कर सकूँ। जब अर्घ्य देने योग्य असंख्य पुरुष एकत्र हो जायें, तब पूजन-काल में उन सब में से श्रेष्ठ एक पुरुष को एक अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।”

पिता की यह आज्ञा पाकर पुलस्त्य जी बड़े वेग से एक उत्तम अर्घ्य-पात्र सजाकर ले आये। ब्रह्माजी ने उसे हाथ में लेकर सब तीर्थों से कहा—

“आप सब लोग मिलकर किसी एक मुख्य तीर्थ का नाम बतलाइये। मैं उसी को अर्घ्य देना चाहता हूँ। ऐसा करने से मुझे अन्याय-रूपी दोष नहीं लगेगा।”

तीर्थ बोले—

“प्रभो! हम किसी प्रकार भी आपस में श्रेष्ठता का निर्णय नहीं कर पाते। इसी कारण हम आपके पास आये हैं। आप ही हम में से जो श्रेष्ठ हो, उसे समझकर अर्घ्य प्रदान कीजिये।”

ब्रह्माजी बोले—

“मैं आप लोगों में से किसी एक की श्रेष्ठता को नहीं समझ पाता। आप सभी अपार महिमा से सम्पन्न हैं। अतः आप स्वयं ही अपने में से श्रेष्ठ पुरुष को बतलाइये।”

ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर जब उनमें से कोई भी बहुत देर तक कुछ न बोला, तब तीर्थराज महीसागर-सङ्गम ने कहा—

“चतुरानन! आप शीघ्र मुझे यह अर्घ्य प्रदान करें, क्योंकि दूसरा कोई भी तीर्थ मेरी करोड़वीं कला के सामने भी पूर्ण नहीं पड़ता। पूर्वकाल में महाराज इन्द्रद्युम्न की तपस्या से तपकर यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही मही नाम वाली नदी हो गयी। यह सब तीर्थों सहित मुझसे आकर मिली है; इसलिये मैं तीनों लोकों में सर्वतीर्थमय होकर प्रसिद्ध हूँ।”

तीर्थराज महीसागर-सङ्गम के ऐसा कहने पर अन्य सब तीर्थ मौन रहे—

“देखें, ब्रह्माजी हमारे विषय में क्या कहते हैं”— यह सोचकर कोई कुछ न बोला।

तब ब्रह्माजी के ज्येष्ठ पुत्र धर्म ने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर इस प्रकार कहा—

“अहो! बड़े दुःख की बात है। इस तीर्थराज महीसागर-सङ्गम ने मोहवश बड़ी कुत्सित बात कह डाली है। साधु पुरुषों को उचित है कि वे अपने में अच्छे गुण होते हुए भी उनका अपने मुख से बखान न करें। जो भरी सभा में दूसरों पर आक्षेप करते हुए अपने गुणों का वर्णन करता है, वह रजोगुणी, अहङ्कारी तथा निन्दित होता है। इसलिये यह तीर्थ इन सब गुणों के रहते हुए भी अपने अहङ्कार के कारण विख्यात न होगा। इसका स्वरूप विध्वस्त-सा हो जायेगा।”

धर्मदेव के ऐसा कहने पर सब ओर हाहाकार मच गया। तब योगीश्वर स्कन्द और मैं— हम दोनों शीघ्रता-पूर्वक वहाँ जा पहुँचे।

कार्तिकेय ने उस देव-सभा में धर्म से इस प्रकार कहा—

“धर्म! तुमने क्रोधवश जो यह शाप दे डाला है, वह सर्वथा अनुचित है। कोई यह तो बताये कि तीनों लोकों में विद्यमान समस्त तीर्थों में से कौन-सा ऐसा तीर्थ है, जिससे यह महीसागर-सङ्गम अर्घ्य पाने का अधिकारी नहीं है? इस तीर्थराज ने अपने जिस गुण का वर्णन किया है, वह सब इसमें विद्यमान है। ऐसी दशा में इसमें दोष कहाँ है? क्योंकि अवगुण तो झूठ बोलने में है, सत्य कहने में नहीं। जो सबका पालन करने वाले हैं, उनके द्वारा ऐसा व्यवहार कदापि उचित नहीं है। यदि वे भी बिना विचार किये ऐसे कार्य करेंगे, तब प्रजा किसकी शरण में जायेगी?”

स्कन्द स्वामी के ऐसा कह‌ने पर धर्म ने इस प्रकार उत्तर दिया- 'आपका यह कहना ठीक है कि यह महीसागर-सङ्गम सब तीर्थों में प्रधान होने और ब्रह्माजी से अर्घ्य पाने के सर्वथा योग्य है, किंतु साधु पुरुषों का यह सनातन नियम है कि अपने ही मुँह से अपने गुणों का बखान नहीं करना चाहिये। दूसरों का किया हुआ आक्षेप और अपनी प्रशंसा ये दो दोष ब्रह्माजी को भी अपने पद से विश्वलित कर सकते हैं। दूसरों पर आक्षेप करते हुए अपनी प्रशंसा करने वाले राजा ययाति क्या स्वर्ग से नीचे नहीं गिर गये थे? बुद्धिमान् ईश्वरने पूर्वकाल में जो बातें प्रमाणित कर दी हैं, उन सबका भलीभांति पालन करना चाहिये। कौन विद्वान् उनका उल्लङ्घन कर सकता है? कार्तिकेय जी! आपके पिता ने आदेश देकर जिस कार्य के लिये हमें नियुक्त किया है, हम सदा उसी का पालन करते हैं। आपको भी उसका पालन करना चाहिये ।'

यो कहकर धर्म जब अपनी मुद्रा त्याग देने को तैयार हो गये, तब मैंने उस प्रस्ताव पर विचार करके यह बात कही 'विश्वको धारण करने वाले परम महान् महात्मा धर्म को नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी प्रतिदिन पूजा करते हैं। उन पाप नाशी धर्म को नमस्कार है। धर्म। यदि कदाचित् आप मुद्रा त्याग देंगे, तो हमलोगों की सत्ता कैसे रह सकती है। प्रभो! आप इस विश्व का नाश न कीजिये। योगीश्वर कार्तिकेय को आप सम्मान देने योग्य हैं। ये साक्षात् भगवान् शङ्कर के पुत्र हैं। अतः उन्हींकी भाँति हम सबके लिये माननीय हैं। मानद आपने इस तीर्थराज को विख्यात न होने का जो शाप दे दिया है, उसका निवारण करनेके लिये अनुग्रह कीजिये ।'

मेरे ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा- धर्म! नारदने अच्छी बात कही है, तुम इनकी बात मानो। तब धर्मने कार्तिकेयजी से कहा- हम लोग जिसके सामने बहुत छोटे हैं, उन परम सिद्ध कार्तिकेय जी को नमस्कार है। स्कन्द! मेरे नाथ! मेरी यह विनय ध्यान देकर सुनिये । स्तम्भ अर्थात् गर्व के कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध होगा तथापि शनिवार की अमावास्या को महीसागर की यात्रा करने से जो फल मिलेगा, उसपर ध्यान दीजिये- प्रभास की दस बार पुष्कर की सात बार और प्रयाग की आठ बार यात्रा करने से जो फल होता है वही पल इसकी एक बार की यात्रा से प्राप्त होगा ।'

इस प्रकार वरदान देने पर कार्तिकेय जी मन-ही-मन बहुत प्रसन हुए। ब्रह्माजी ने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भ तीर्थ को अर्घ्य दिया और उसे सब तीथों में श्रेष्ठता प्रदान की। फिर सब तीर्थों और स्कन्द स्वामी को सम्मान देकर विदा किया। इस तीर्थ के गुप्त होने का यही प्राचीन वृत्तान्त है। इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण तीर्थ के महान् फल का वर्णन किया। यह सब आदि से ही सुनकर पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

सूतजी कहते हैं यह सब सुनकर विस्मय में पड़े हुए अर्जुन ने उस तीर्थ की बड़ी प्रशंसा की और नारद आदि से विदा लेकर द्वारका को प्रस्थान किया ।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

रेसिपी और टिप्स

सालों साल चलने वाला सत्तू बनाने का तरीका, स्टोरिंग टिप्स भी जानें

Bihari Sattu Ingredients: सत्तू आपकी सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है ये तो आप जानती ही हैं, लेकिन क्या आप ये जानती हैं कि सत्तू का पाउडर कैसे बनाया जाता है? आइए इस लेख में जानते हैं।  

What Is Sattu Powder Made Of: गर्मियों में अक्सर हम खाने-पीने की ऐसी चीजें तलाशते हैं, जिनका सेवन करने से हमें ठंडक और ताजगी महसूस हो। ऐसा इसलिए क्योंकि बढ़ते तापमान को देखते हुए खुद को अंदर से ठंडा रखना भी बहुत जरूरी है।

इसके लिए हम घर पर कई सारे समर ड्रिंक्स बनाते हैं, जिन्हें पीकर हमें एनर्जी भी मिले और गर्मी से राहत भी मिले जैसे- सत्तू की ड्रिंक्स। यही वजह है कि मार्केट में सत्तू कई वैरायटी के मिलते हैं, लेकिन देसी गांव वाले सत्तू के बात ही कुछ और होती है।

अगर आप चाहें तो घर पर सत्तू तैयार कर सकते हैं, इसके लिए आपको बस नीचे बताए गए स्टेप्स और टिप्स को फॉलो करना होगा।

गर्मियों में राहत देंगे सत्तू के ये रिफ्रेशिंग ड्रिंक्स, स्वाद ऐसा हर रोज पीने की होगी चाहत


क्या आपको पता है चने के आटे में नींबू का रस मिलाने से क्या होगा? गर्मी से राहत पाने के लिए बनाएं सत्तू की रेसिपीज

सत्तू एक तरह का सूखा पाउडर है, जिसे चने की दाल से तैयार किया जाता है। इसके साथ भुने हुए जौ और चने को पीसकर भी दरदरा पिसा जाता है। हालांकि, सत्तू को सिर्फ भुने हुए चने से भी बनाया जा सकता है। कई लोग जौ का सत्तू भी खाना पसंद करते हैं, जिसमें काली मिर्च भी मिलाई जाती है।


स्वास्थ्य के लिए लाभकारी, सत्तू एक ऐसा आहार है जो बनाने में बहुत ही सरल और सस्ता व्यंजन है। सत्तू को व्यंजनों को बनाने में भी इस्तेमाल किया जाता है। (सत्तू से बनी ये 3 रेसिपी)

सत्तू पाउडर में क्या-क्या मिलाया जाता है? (Best Sattu Kaise Banate Hain)

अगर आप घर पर सत्तू बना रहे हैं, तो आपको चने की दाल, अनाज, जौ, काजू, बादाम, बाजरा और गेहूं की जरूरत पड़गी। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्तू को इन तमाम अनाज को सूखा भूनकर तैयार किया जाता है।


हालांकि, सबका सत्तू बनने का तरीका अलग-अलग होता है जैसे- ओडिशा में सत्तू या चटुआ काजू, बादाम, बाजरा, जौ और चने को सूखा भूनकर और बारीक आटा पीसकर बनाया जाता है।

सत्तू पाउडर का तरीका

सामग्री

चना दाल- 1 किलो

गेहूं- आधा किलो

जौ- 200 ग्राम

बादाम- 100 ग्राम

काजू- 100 ग्राम

बाजरा- 50 ग्राम

विधि

सत्तू का पाउडर बनाने के लिए सबसे पहले सभी अनाज को एक बाउल में निकालकर रख दें।

फिर अनाज को साफ करें और पानी से अच्छी तरह से धो लें।

फिर सूखने के लिए छोड़ दें और जब अनाज सूख जाए, तो कड़ाही में हल्की आंच पर भुन लें।

आप इसे देसी घी या फिर मक्खन के साथ भी भून सकते हैं।

जब चने की दाल से खुशबू आने लगे, तो गैस बंद कर दें। (घर पर बनाएं चना दाल के टेस्टी चिप्स)

फिर हल्का ठंडा होने के बाद किसी भारी चीज से इन्हें दरदरा पीस लें।

इसे जरूर पढ़ें-पराठे से लेकर ड्रिंक्स तक, गर्मियों में सत्तू से बनाएं ये बेहतरीन रेसिपीज

सत्तू को सालों-साल स्टोर करने के हैक्स (How to Get Rid of Weevils)

जब भी सत्तू को स्टोर करें तो कंटेनर में लौंग डाल दें। इससे कीड़े नहीं लगेंगे और ये हमेशा फ्रेश भी रहेंगे।

सत्तू को फ्रेश रखने के लिए नीम के पत्तों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

आप कंटेनर के अंदर नीम के पत्तों को कपड़े में बांधकर भी रख सकते हैं।

इन्हें हमेशा साफ डिब्बे में स्टोर करें, जिसमें मॉइस्चर बिल्कुल भी नहीं आए।

अगर आपके पास स्टोर करने की जगह नहीं है, तो आप कम क्वालिटी में ही खरीदें।

इन्हें कभी भी प्लास्टिक या फिर जूट के बैग में स्टोर न करें। (जूट बैग को साफ करने का तरीका)

उम्मीद है कि आपको सत्तू बनाने का तरीका समझ में आ गया होगा। अगर आपको कोई और सामग्री को लेकर कंफ्यूजन है तो हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिदंगी से।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

 



मौन के उस पार

अध्याय 1 : खोया हुआ मन

सचिन को यह एहसास सबसे पहले उसकी चुप्पी से हुआ।
वह पहले भी कम बोलता था, पर अब उसकी ख़ामोशी में विचार नहीं, थकान थी।
ऐसी थकान, जो शब्दों से नहीं उतरती।

परिवार वालों ने इसे समय की मार समझा।
किसी ने उसके भीतर झाँकने की कोशिश नहीं की—
सबने बस यही चाहा कि उसकी ज़िंदगी फिर से “सामान्य” हो जाए।

यही सोच भावना को लेकर आई।

भावना पहली नज़र में किसी कहानी की नायिका नहीं लगती थी—
न असाधारण सुंदरता,
न बनावटी मुस्कान।
पर उसकी आँखों में एक ठहराव था,
जैसे उसने जीवन को देखा हो, जिया हो, और उससे कुछ सीख भी ली हो।

पहली मुलाक़ात में दोनों ने ज़्यादा बात नहीं की।
सचिन ने सवाल नहीं पूछे,
भावना ने खुद को सिद्ध करने की कोशिश नहीं की।

यह रिश्ता जल्दबाज़ी में नहीं बना।
धीरे-धीरे, बातचीत के छोटे-छोटे क्षणों में
एक सहमति पनपी—
कि दोनों एक-दूसरे से झूठ नहीं बोलेंगे।

एक शाम, जब बातचीत सामान्य थी,
भावना ने अचानक कहा—

“सचिन, एक बात है जो मुझे साफ़ करनी चाहिए।”

सचिन ने उसकी ओर देखा।
उस नज़र में जिज्ञासा नहीं थी,
सिर्फ़ तैयारी थी—
सच सुनने की।

भावना ने बताया कि उसके जीवन में पहले कोई था।
एक गहरा रिश्ता।
जो सामाजिक स्वीकृति के अभाव में टूट गया।

उसने यह भी स्वीकार किया
कि कुछ भावनाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं—
वे बस दब जाती हैं।

कमरे में एक लंबा मौन छा गया।

सचिन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
न आश्चर्य,
न निर्णय।

फिर उसने कहा—

“हर इंसान का कोई न कोई अतीत होता है।
मुद्दा यह नहीं कि वह था क्या,
मुद्दा यह है कि आज तुम कहाँ खड़ी हो।”

भावना ने राहत की साँस ली।
शायद पहली बार
किसी ने उसे उसके अतीत के कारण नहीं,
उसके वर्तमान के कारण देखा था।

यहीं से
यह कहानी शुरू होती है।

यह प्रेम की कहानी नहीं है—
यह आकर्षण, स्वीकृति और आत्मसंघर्ष की कहानी है।

यह उस मन की कहानी है
जो सब कुछ पाकर भी
कभी-कभी किसी और दिशा में खिंच जाता है।

और यह उस व्यक्ति की कहानी है
जो प्यार को अधिकार नहीं,
जिम्मेदारी मानता है।

सचिन नहीं जानता था
कि आने वाला समय
उसकी समझ,
उसके प्रेम
और उसके आत्मसम्मान—
तीनों की परीक्षा लेने वाला है।

पर एक बात वह साफ़ जानता था—

अगर वह किसी के साथ चलेगा,
तो अँधेरे में नहीं


📘 अध्याय 1 समाप्त



 



मौन के उस पार

एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास

लेखक: (काल्पनिक)


भूमिका

यह उपन्यास प्रेम की नहीं,
आकर्षण की गलतफहमी की कथा है।

यह उस सच की कहानी है जहाँ
देह की हलचल को मन प्रेम समझ लेता है,
और समझदारी के बावजूद
मन बार-बार उसी भ्रम की ओर खिंचता है।

यह किसी को दोषी ठहराने का प्रयास नहीं—
यह मानव मन को समझने की एक कोशिश है।


अध्याय 1 : खोया हुआ सचिन

सचिन भीतर से शांत था,
पर उसकी खामोशी में थकान थी।
परिवार ने उसे “सामान्य” बनाने के लिए
भावना को चुना।

भावना सरल थी,
पर उसके भीतर एक अधूरा अध्याय था।


अध्याय 2 : सच का स्वीकार

भावना ने राहुल के बारे में बताया।
सचिन ने अतीत नहीं खोदा—
उसने वर्तमान की ईमानदारी को चुना।

यहीं से यह रिश्ता
सामान्य विवाह से अलग हो गया—
यह समझदारी का समझौता था।


अध्याय 3 : विवाह — एक चेतन निर्णय

यह प्रेम-विवाह नहीं था,
यह जागरूकता-विवाह था।

दोनों जानते थे—
यह रिश्ता तभी टिकेगा
जब सच छुपाया नहीं जाएगा।


अध्याय 4 : इच्छा और स्मृति

राहुल का अचानक आना
भावना के भीतर
एक पुरानी स्मृति जगा गया।

यह प्रेम नहीं था—
यह देह की याद थी।

भावना ने सीमा चुनी,
और रात को सचिन को सब बताया।


अध्याय 5 : पुरुष की भूमिका

सचिन का निर्णय महत्वपूर्ण था।
वह नहीं चाहता था कि भावना छुपे,
क्योंकि छुपाव
स्त्री को असुरक्षित बना देता है।

यहाँ सचिन पति नहीं,
संरक्षक और साथी बनता है।


अध्याय 6 : आकर्षण बनाम प्रेम

राहुल से मिलना
भावना के भीतर उत्तेजना जगाता था,
पर हर बार उसके बाद
एक खालीपन आता।

सचिन के साथ उसे
सुरक्षा, सम्मान और पूर्णता मिलती थी।

यहीं उपन्यास का
मनोवैज्ञानिक केंद्र है:

स्त्री कभी-कभी आकर्षण को प्रेम समझ लेती है,
जबकि वह सिर्फ़ देह की प्रतिक्रिया होती है।


अध्याय 7 : समय का अंतर

राहुल का आना सीमित था,
छुपा हुआ था,
डर से भरा हुआ।

सचिन का साथ निरंतर था—
हर सुबह, हर रात, हर बीमारी, हर डर में।


अध्याय 8 : द्वंद्व

भावना स्वयं से लड़ती रही।

उसे समझ आने लगा कि
जिसे वह “चाह” समझ रही है
वह सिर्फ़ अधूरी उत्तेजना है।

और प्रेम?
वह तो स्थिर होता है।


अध्याय 9 : सचिन का प्रेम

सचिन ने कभी रोका नहीं,
पर कभी छोड़ा भी नहीं।

यह पुरुष-स्वामित्व नहीं था—
यह परिपक्व प्रेम था।


अध्याय 10 : भावना का आत्मबोध (अंतिम अध्याय)

भावना ने एक रात
अपने आप से सच कहा—

“मैं प्रेम में थी ही नहीं।
मैं केवल उस एहसास की आदी थी
जो अधूरा था, इसलिए तीव्र था।”

“सचिन के साथ मुझे जो मिला
वह शांति थी—
और शांति उत्तेजना से शांत होती है,
पर गहरी होती है।”

उसने राहुल को अंतिम बार
मन में विदा किया—
बिना नफ़रत, बिना लालसा।


उपन्यास का अंतिम वाक्य

“आकर्षण तेज़ होता है,
प्रेम गहरा।
और जो गहरा हो,
वही जीवन बनता है।”


यह ai से लिखवा हुआ है। अगर ठीक समझों तों यह उपन्यास लिख लो।

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