बर्बरीक और विजय की गुप्त क्षेत्र में साधना तथा पाण्डवों से बर्बरीक की भेंट
तदनन्तर कामकटंकटा को घर पर ही छोड़कर बुद्धिमान् घटोत्कच अपने पुत्र को साथ ले आकाश मार्ग से द्वारका को गया। वहाँ यादवों की सभा में पहुँच कर उसने उग्रसेन, वसुदेव, सात्यकिः अक्रूर, बलराम तथा श्रीकृष्ण आदि प्रधान-प्रधान यदुवीरों को प्रणाम किया। पुत्र सहित घटोत्कच को अपने चरणों में पड़ा देख भगवान् श्रीकृष्ण ने उसको और उसके पुत्र को भी उठाकर छाती से लगा लिया और आशीर्वाद दे अपने समीप बिठाकर इस प्रकार पूछा- बेटा कुरुवंश को बढ़ानेवाले राक्षसश्रेष्ठ बतलाओ, तुम्हें सब ओर से कुशल तो है न? यहाँ किस लिये तुम्हारा आगमन हुआ है ?'
घटोत्कच बोला- देव ! आपके प्रसाद से मुझे सब ओर से कुशल ही है। आपकी बतायी हुई स्त्री मोर्वी के गर्भ से मेरे इस पुत्र का जन्म हुआ है, यह आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा उसे सुनिये। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ।
श्री भगवान् ने कहा- बेटा मौर्वेय तुम्हें जो-जो पूछने की इच्छा हो, सब पूछ लो।
बर्वरीक बोला- आर्यदेव माधव ! मैं मनः बुद्धि और समाधि के द्वारा आपको प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि संसार में उत्पन्न हुए जीव का कल्याण किस साधन से होता है! कोई धर्म को कल्याणकारक कहते हैं, तो कोई ऐश्वर्यदान को। कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम) को कोई तपस्या को, कोई द्रव्यको, कोई भोगोंको तथा कोई मोक्षको ही श्रेय कहते हैं। पुरुषोतम। इस प्रकार सैकड़ों श्रेयों में से किसी एक श्रेय को निश्चित करके बतलाइये, जो मेरे इस कुल के लिये कल्याणकारी हो।
श्रीभगवान् बोले- वेटा । प्रत्येक वर्णके लिये पृथक् पृथक उत्तम श्रेय बताया गया है। ब्राह्मणोंके कल्याणका मूल है-तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय। मनीषी पुरुषों ने धर्म के स्वरूप का निरूपण भी ब्राह्मणों के लिये कल्याण की बात बतायी है। क्षत्रियोंके लिये सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बतायी गयी है। दुष्टों का दमन और साधुओंका संरक्षण भी क्षत्रियोंके लिये श्रेयस्कर है। वैश्यों के श्रेय का साधन है-पशुपालन और कृषि विज्ञान। शूद्र के लिये द्विजों की सेवा ही श्रेयस्कर है। उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करने वाला शुद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँति के शिल्पकर्मो द्वारा जीविका चलाने और द्विजातियों के हित में लगा रहे। तुम क्षत्रिय कुल में उत्पन हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो। पहले तुम ऐसे बल की प्राप्ति के लिये साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बल से दुष्टों का दमन और साधु पुरुषों का पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। बेटा! देवियोंकी अत्यन्त कृपा होने से ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करने के उद्देश्य से देवी की आराधना करो ।
बर्बरीक ने पूछा- प्रभो! मैं किस क्षेत्र में, किस देवी-की, कैसे आराधना करूँ?
उसके इस प्रकार पूछने पर भगवान दामोदर ने क्षणभर ध्यान करके कहा- महीसागरसङ्गम तीर्थ में, जो गुप्त क्षेत्रके नामसे विख्यात है, वहीं नारदजी द्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएं निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो । बर्बरीक से ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण ने घटोत्कच से कहा- 'भीमनन्दन ! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदय बाला है, इसलिये मैंने इसे 'सुहृदय' यह दूसरा नाम प्रदान किया है।' यो कह कर भगवान् ने उसे छाती से लगा लिया और नाना प्रकार के धनसे उसको सन्तुष्ट करके गुप्त क्षेत्र में जाने का आदेश दिया। तब भगवान् श्रीकृष्ण को अपने पिता घटोत्कच को और यहाँ बैठे हुए सब यादवों को प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्त क्षेत्र कों चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्ण से विदा ले अपने वनको गया और पुत्रके गुणोंका स्मरण करता हुआ अपने राज्य का पालन करने लगा।
तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्त क्षेत्र में रहकर प्रतिदिन कर्म के द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकारके उपहारों से तीनों समय देवियों की पूजा करने लगा। तीन वर्षों तक अराधना करने पर देवियों उसपर बहुत सन्तुष्ट हुई और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों लोकों में किसी के पास नहीं है। तत्पश्वात् वे बोलीं- महायुते ! कुछ कालतक तुम यहीं निवास करो। फिर विजय की सङ्गति पाकर तुम अधिक कल्याण के भागी होओगे। देवियोंके ऐसा कहने पर सुहृदय वहीं ठहर गया। तदनन्तर मगधदेश के ब्राह्मण विजय वहाँ आये। उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिङ्गोंका पूजन किया और अपनी विद्या को सफल बनाने के लिये चिरकाल तक देवियों की आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर देवियोंने स्वप्नमें यह आदेश दिया- 'ब्रह्मन् ! तुम आँगनमें सिद्धमाता के आगे सम्पूर्ण विद्याओं का साधन करो। सुद्धदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।' यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियोंको प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदयसे कहा- 'तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवीके स्तोत्रका पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जबतक मैं यह विद्या साधन रूप कर्म करूँ तब तक किसी प्रकारका विघ्न न आने पावे ।'
विजयके ऐसा कहने पर महाबली बर्बरीक जब विघ्न निवारणके लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजय ने सुखपूर्वक आसन पर बैठकर 'गुं गुरुभ्यो नमः' इस मन्त्र से गुरुओं को नमस्कार किया। उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्र का अष्टोत्तरशत जाप करके पुनः गुरुजनोंको प्रणाम करने के पश्वात् गणेश्वर विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपति के उस उत्तम मन्त्र का वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होने पर भी समस्त कार्यों का साधक, महान् प्रयोजनों की प्राप्ति करानेवाला तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः' यह सात अक्षरोंका मन्त्र है। मन्त्र का विनियोग-वाक्य इस प्रकार है।ॐॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिर्विग्नेश्वरो देवता गं बीजम् शक्तिः पूजार्थे जपायें तिलकायें वा मन ईप्सितायें होमायें या विनियोगः ।'
अर्थात् इस गणपति-मन्त्रके गण नामक ऋषिः विघ्नेश्वर देवता, गं बीज और शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथ सिद्धि अथवा होम के लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्र से चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्र का जप करे। अष्टोत्तरशत, सहस्त्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवन के लिये आदि देव का आवाहन करे। आवाहन के पश्चात् 'गं गणपतये स्वाहा' इस मन्त्र से गुग्गुळ की गोलियों द्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विध्नों में इस उत्तम मन्त्र का साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोऽभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वर कल्प को जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तरशत जप करके गुग्गुल की गुटिकाओं द्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि विनायक का पूजन किया। इसके बाद सिद्धाम्बिका को नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्या का साधन सहित जप किया, जिसके स्मरणमात्र से सब दुःखों का नाश हो जाता है। विप्रवर! मैं उस विद्या का वर्णन करता हूँ, सुनो- ॐॐॐ भगवान् वासुदेव को नमस्कार है। सहत्र मस्तकों वाले भगवान् अनन्त को नमस्कार है; जो क्षीर समुद्र में शयन करते है, शेषनाग का विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्म्नय और अनिरुद्ध ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं। जिन्होंने हयग्रीव का रुप धारण किया है। उन्हीं भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नृसिंह वामन! त्रिविक्रम ! तथा वरदायक राम ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन ! महावराह! महापुरुष बैकुंठ ! नारायण! पद्मनाभ ! गोबिन्द ! दामोदर ! हृषीकेश ! समस्त असुरों का संहार करनेवाले ! सम्पूर्ण प्राणियों को अपने वश में रखनेवाले ! सब दुःखों का नाश करनेवाले! सम्पूर्ण विपत्तियों का भञ्जन करने-वाले। सब नागों का मान मर्दन करनेवाले । सर्वदेव महेश्वर ! सबका बन्धन छुदाने वाले! सब शत्रुओंका संहार करनेवाले ! समस्त ज्वरों का नाश करनेवाले ! सम्पूर्ण ग्रहों का निवारण तथा सब पापोंका शमन करनेवाले ! भक्तजन आनन्ददायक ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्य का भाग समर्पित है।
जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है, उसे वायु, अग्नि ,व्रण पत्थर, बिजली और बर्षा का भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्र से, ग्रहों से तथा चोरों से भी भय नहीं रहता है। इस प्रकार विजय ने संयमशील होकर मनः बुद्धि और समाधि के द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का साधन आरम्भ किया। जो बिना साधन के भी प्रतिदिन इस विद्या का पाठ कंरता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं।
विजय साधना में लगे थे। उस समय रात्रि के पहले प्रहर में एक राक्षसी ने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीक ने उस राक्षसी को भगा दिया। तत्पश्चात् आधी रात में दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ ।बर्बरीक ने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नाम का एक दानव विजय की ओर दौड़ा। उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखों से अग्नि की बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेगसे आगे बढ़ा। दोनों बहुत देर तक स्थिरतापूर्वक युद्ध करते रहे। फिर बर्बरीक ने उसे भूमि पर गिराकर खूब रगड़ा और तब तक नहीं छोड़ा, अबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरने पर उसे अग्नि कोण में महीसागर सङ्गम के तटपर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुनः विजय की रक्षा के लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे पहर में पश्चिम दिशा की ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी। यह बड़े जोर-जोरसे गर्जना करती और अपने पैरोंकी धमक से पृथ्वी को कँपाती हुई चलती थी। उसका नाम 'द्रुरदुहा' था ।
उसे आती देख सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेग से उसके समीप पहुँचा। उसने हंसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक्के से मारकर राक्षसी को धरती पर गिरा दिया।
उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुनः रक्षा के लिये खड़ा हो गया। तदनन्तर चौथे प्रहर में एक अद्भुत नकली संन्यासी मूंड मुड़ाये दिगम्बर वेश में वहाँ आया। उसने बड़ा भारी व्रती होने का ढोंग रच रक्खा था। उसने आते ही कहा- 'हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्ट की बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रक्खी है। आग में हवन करते समय सूक्ष्म जीवों का बढ़ा भारी वध हो रहा है।' उसकी यह बात सुनकर बर्बरीक ने हँसते हुए कहा अग्रि में आहुति देने पर सब देवताओंकी तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्ड का पात्र है।' यो कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास जाकर खड़ा हो गया और मुक्के से मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तव में वह एक दैत्य था। क्षणभर में सचेत होने पर यह बर्बरीक के भयसे भागा और एक गुफा के बिल मे समा गया। बर्बरीक ने क्रोध में भरकर बड़े बेग से उसका पीछा किया, किन्तु वह देत्य वायुके समान वेगसे दौड़ता पाताल में समा गया। साठ योजन विस्तृत 'बहुप्रभा' नामकी नगरीमें यह निवास करता था। वर्बरीक बहाँ भी उसके पीछे पीछे जा पहुंचा। उसे देखकर 'पलाशी' नामवाल दैत्योंमें 'दौड़ो, मारो काटो और फाड़ डालो' आदि के रूप में महान्, कोलाहल मच गया। कोलाहल सुनकर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक देत्य योद्धा बीर बर्बरीक पर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों देत्यो को देखकर घटोत्कच का पुत्र क्रोध से जल उठा। उसने किन्हीं को पैरं से, किन्हीं को भुजदण्डी से और किन्हीं को छाती के धक्के से मार-मार कर क्षणभर में यमलोक पहुंचा दिया।
दैत्यों के मारे जाने पर वासुकि आदि नाग यहाँ आये और नाना प्रकार के प्रिय वचनों द्वारा सुहृदयकी स्तुति करते हुए बोले- भौमिनन्दन ! आपने नागों का बढ़ा भारी उपकार किया, क्योंकि आपके द्वारा यह पलाशी नामक दैत्य अपने सेवकों सहित मारा गया। वीर। इस दुरात्माने अपने सेवकों की सहायतासे भाँति-भाँतिके उपाय करके हमलोगों को पीड़ा दी। और पाताल से भी नीचे कर दिया था। आज आप इन नागो से कोई मनोवाञ्छित वर माँगिये। हम सब आपपर प्रसन्न होकर वर देने को उत्सुक हैं।'
बर्बरीक बोला- नागगण! यदि मुझे वर देना है, तो मैं यही मांगता हूँ कि विजय सब प्रकार के विघ्नों से मुक्त होकर सिद्धि प्राप्त कर लें।
तब नागों ने प्रसन्न होकर कहा-बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। बर्बरीक नागो को वह दैत्यपूरी देकर उनके द्वारा सम्मानित हो वहाँ से लौटा। बिलके मनोहर मार्गसे लौटते समय उसने देखा, कल्पवृक्ष के नीचे एक सर्वरत्नमय लिङ्ग विराजमान है; उसका महान् प्रकाश सब ओर फैल रहा है तथा बहुत-सी नागकन्याएँ उसका पूजन कर रही हैं। यह सब देखकर बर्बरीक को बड़ा विस्मय हुआ। उसने नागकन्याओं से पूछा 'सूर्य और अग्निके सागान तेजस्वी इस शिवलिङ्गकी किसने स्थापना की है । तथा इस शिवलिङ्गसे चारों दिशाओंकी और जो ये मार्ग गये हैं, इनका भी परिचय दो।'
वीर बर्बरीक का यह वचन सुनकर नागकन्याओं ने सकुचाते हुए कहा- सम्पूर्ण नागाओं के राजा महात्मा शेष ने तपस्या करके यहाँ इस महालिङ्ग की स्थापना की है। इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजन से यह सब सिद्धियों को देने वाला है। इस लिङ्ग के पूर्व दिशा की ओर जानेवाला यह मार्ग भूलोक में 'श्री' पर्वत तक चला गया है। नागलोक सुविधा-पूर्वक वहाँ तक पहुँच सके इसके लिये 'इलापत्र' नागने इस मार्गका निर्माण किया है। दक्षिण में आने वाला यह मार्ग पृथ्वीपर 'शूर्पारक' क्षेत्रमें पहुंचता है, इसे 'कर्कोटक' नाग ने वहाँ जानेके लिये बनवाया है। पश्चिमका यह मार्ग अतिशय प्रकाशमान 'प्रभास'तीर्थको जाता है। इसे ऐरावतने नागों की यात्रा के लिये बनवाया है। इसी प्रकार उत्तरसे होकर निकला हुआ यह मार्ग पृथ्वी पर 'कुरुक्षेत्र' में जाता है, महात्मा तक्षक-ने वहाँ जाने के लिये यह मार्ग तैयार किया है। लिङ्ग के ऊपर की ओर जो मार्ग जाता है, जिससे जाने के लिये आप खड़े हैं। यह गुप्त क्षेत्र में सिद्धलिङ्गके पास गया है। यह मार्ग स्वामी स्कन्दन ने अपनी शक्ति के प्रहार से बनाया है। वीर ! ये सब बातें इमने बता दी, अब आप हमारा निवेदन सुनिये। पहले तो यह बताइये कि आप कौन हैं? अभी-अभी आप दैत्य के पीछे लगे गये थे और अब अकेले ही लौट रहे हैं। इसका क्या कारण है, हम सब आपकी दासियों हैं और पतिरूपमें आपका वरण करती हैं। आप हमारे साथ यहाँ के विविध स्थानों में क्रीडा कीजिये ।
बर्बरीक ने कहा- देवियो ! मेरा जन्म कुरुवंशमें हुआ है। मैं पाण्डु नन्दन भीमसेन का पौत्र हूँ। बर्बरीक मेरा नाम है। मैं उस दैत्यको मारनेके लिये आया था। यह पापी दैत्य मारा गया। अतः अब पृथ्वीपर लौटा जा रहा हूँ। आप लोगोंसे किसी प्रकार मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैंने सदा ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया है।
यों कहकर बर्बरीकने उस शिवलिङ्गका पूजन और साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर उन सब कन्याओं के देखते देखते ऊपर-के मार्गसे चल दिया। बिलसे बाहर आकर उसने पूर्व-दिशा के मुखको प्रकाशयुक्त देखा, फिर बड़े हर्षके साथ यह विजय से मिला। उस समय तक विजय अपना सब कार्य पूरा कर चुके थे। उन्होंने बर्बरीक से कहा धीरेन्द्र ! तुम्हारे प्रसादसे मैंने अनुपम सिद्धि प्राप्त की है। तुम दीर्घकाल तक जीओ, आनन्द करो, दान दो और विजयी बनो। इसीलिये साधु पुरुष साधुओंका ही सङ्ग करना चाहते हैं। क्योंकि सत्पुरुषों का सङ्ग सब दोषोंको दूर करने की दया है। मेरे होमकुण्डमें सिन्दूर के समान लाल रंगका सात्विक एवं अत्यन्त पवित्र भस्म है, उसे हाथ में भरकर ले लो। युद्ध भूमि में इसे पहले छोड़ देने पर शत्रुके मर्म स्थान पर मृत्यु भी हो, (साक्षात् मृत्यु ही शत्रु बन कर आ जाय) तो उसके शरीर को भी यह नष्ट कर देगा। इस प्रकार शत्रुओं पर तुम्हें सुखपूर्वक विजय प्राप्त होगी।'
बर्बरीक बोला-जो निष्काम भावसे किसी का उपकार करता है, वही साधु कहलाता है। जो किसी वस्तुकी इच्छा रखकर उपकार करता है, उसकी साधुतामें कौन गुण है। अतः यह भस्म किसी दूसरे को दे दीजिये। मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपको प्रसन्न मुख देखना चाहता हूँ। इसके सिवा और कुछ नहीं।
तदनन्तर देवियों सहित देवताओंने विजयका सम्मान करके उन्हें सिद्धेश्वर्य प्रदान किया और उनका नाम 'सिद्ध-सेन' रक्खा। इस प्रकार विजयने अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की।
तत्पश्चात् कुछ काल बीतने पर पाण्डव लोग जुए में हार गये और विभिन्न तीर्थों में घूमते हुए उस शुभ तीर्थ में भी जाने के लिये आये। वहाँ चण्डिका देवी का दर्शन करके मार्ग के थके-मांदे होने के कारण वहीं बैठ गये। पाँचों पाण्डवों के साथ द्रौपदी भी थी। उस समय चण्डिकाका गण भी वहीं विराजमान था। बर्बरीक ने वहाँ पधारे हुए पाण्डव वीरोंको देखा, परंतु वह उन्हें पहचानता नहीं था। पाण्डव भी उसे नहीं पहचानते थे क्योंकि जन्म से लेकर अबतक पाण्डवों के साथ उसकी भेंट ही नहीं हुई थी। पाण्डवों ने अपनी गठरी आदि वहीं खोल दी और प्यास से पीड़ित होकर जल की ओर देखा। तब भीमसेन कुण्ड में पानी पीने के लिये घुसे। उस समय युधिष्ठिर ने उनसे कहा-'भीमसेन ! तुम कुण्ड से पानी निकालकर बाहर ही हाथ-पैर धो लो, उसके बाद जल पीना; अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा। भीमसेन के नेत्र प्यास से व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिर की बातें बिना सुने ही जल पीने की इच्छा से कुण्ड में प्रवेश किया। जल देखकर उन्होंने यहीं पीने का निश्वय किया और शुद्धिके लिये मुख, दोनों हाथ और दोनों पैर धोये। भीमसेन जब इस प्रकार पैर धो रहे थे। उस समय सुद्धदयने ऊपर से यह सत्य वचन कहा-ओ दुर्मते! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारा विचार तो बड़ा पापपूर्ण है। अहो! तुम देवीके कुण्ड में हाथ, और और मुँह धो रहे हो। मै देवीको सदा इसी जलसे स्नान कराता हूँ। मल से दूषित जल को तो मनुष्य भी नहीं छूते, फिर देवता उसका स्पर्श कैसे कर सकते हैं? अब तुम इतने बड़े मूढ़ हो, तब तीर्थों में क्यों घूम रहे हो?'
भीमसेनने कहा- क्रूर राक्षसाधम तू क्यों ऐसी कठोर बातें कहता है। जल का दूसरा उपयोग ही क्या है! यह प्राणियों के भोग के लिये ही तो होता है? बड़े-बड़े मुनीश्वरोंने भी तीर्थों में स्नान का विधान किया है। अंगो को धोना ही तो स्नान कहा गया है। फिर तू मेरी निन्दा क्यों करता है ? यदि स्नान और अङ्ग-प्रक्षालन न किया जाय तो धर्मात्मा पुरुष किस लिये पूर्त धर्मका अनुष्ठान करते हैं। क्यों बावड़ी, कूप और तड़ाग आदि बनवाते हैं।
सुहृतय बोला- निःसन्देह तुम्हारा यह कथन सत्य है कि मुख्य मुख्य तीर्थों में स्नान करना चाहिये। ऐसी विधि है भी, परंतु जो नदी आदि चर तीर्थ हैं जिनके जल बहते रहते हैं, उन्हीं में भीतर प्रवेश करके स्नान आदि करना चाहिये। कूप-सरोबर आदि स्थावर तीर्थों में तो बाहर खड़े होकर ही स्नानादि करना उचित है। स्थावर तीर्थों में भी वहीं भीतर प्रवेश करके स्नान करने का विधान है, जहाँ भक्त पुरुष देवता को स्नान कराने के लिये जल न लेते हों तथा जो सरोवर देवस्थान से सौ हाथ से भी अधिक दूर बनाया गया हो। उसके भीतर प्रवेश करने का भी यह एक नियम है कि पहले बाहर ही दोनों पैर धोकर फिर कुण्ड में स्नान किया जाय, अन्यथा दोष बताया गया है। क्या तुमने अक्षाजीका कड़ा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है।
'जो जलमें मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, धूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्म हत्यारों के समान हैं।'
इसलिये ओ दुराचारी ! तुम शीघ्र जल से बाहर निकल जाओ। यदि तुम्हारी इन्द्रियों तुम्हारे काबू में नहीं हैं, तो तुम तीर्थों में किस लिये घूमते हो? नादान! जिसके हाथ, और और मन भलीभाँति संयम में न हों और जिसके द्वारा समस्त क्रियाएं निर्विकार भाव से की आती हो, यही तीर्थ का फल पाता है। मनुष्य पुण्यकर्म के द्वारा यदि दो घड़ी भी जीवित रहे तो यह उत्तम है। परंतु उभय लोकविरोधी पापकर्मके साथ एक कल्पकी भी आयु मिले, तो उसे न स्वीकार करे ।
भीमसेन बोले- हाथो की तरह तेरी कार्य कार्यकी कर्कश ध्वनिसे मेरे तो कान बहरे हो गये। अब तू अपनी इच्छा के अनुसार यहाँ विलाप कर या चिन्ता के मारे सूख जा मैं तो जल पीकर ही रहूँगा।
सुहृदयने कहा- मैं धर्मकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियोंके कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, अतः किसी प्रकार भी तुम्हें पाप न करने दूँगा। हमारे इस कुण्ड से तो तुम शीघ्र ही बाहर निकल आओ नहीं तो इन ईंटों के टुकड़ों से तुम्हारा मस्तक चूर-चूर कर दूँगा।
यो कहकर बर्बरीकने इंटे उठा लिये और भीम के माथे को लक्ष्य करके फेंकना आरम्भ किया। भीमसेन उसके प्रहार को बचाकर उछले और सरोवर से बाहर आ गये। फिर तो दोनों भयंकर पराक्रमी वीर एक दूसरेको घुड़कते हुए आपस में गुध गये। दोनों ही युद्धविद्या में पारङ्गत थे। अतः अपनी विशाल भुजाओं से युद्ध करने लगे। दो ही घड़ी में उस राक्षसके सामने पाण्डव भीमसेन दुर्बल पड़ने लगे। अन्त में बर्बरीक ने भीमसेन को उठा लिया और जल में फेंकने के लिये समुद्रकी ओर चल दिया।शङ्करने आकाशमें स्थित हो बर्बरीकसे कहा- 'राक्षसोंमें श्रेष्ठ महाबली बर्बरीक ! ये भरतकुलके रज और तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं। इन्हें छोड़ दो। ये तीर्थयात्रा के प्रसंगसे अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ विचरते हुए इस तीर्थ में भी स्नान करनेके लिये ही आये हैं। अतः तुम्हारे द्वारा सर्वथा सम्मान पाने के ही योग्य हैं।'
भगवान् शंकर का यह वचन सुनकर सुहृदय सहसा भीमसेन को छोड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा और बोल उठा-हाय ! मुझे धिकार है। यह बड़े कष्ट की बात है। बढ़े कष्ट की बात है। पितामह मुझे क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये।' उसे इस प्रकार शोक करते और बार-बार मोहित होते देख भीमसेन ने छाती से लगा लिया और स्नेहसे मस्तक सूंधकर कहा- 'वत्स ! जन्म कालसे ही न तो हम तुम्हें पहचानते हैं न तुम हमको। केवल घटोत्कच तथा भगवान् श्रीकृष्ण से यह सुन रक्खा है कि तुम इसी तीर्थ में निवास करते हो। किंतु यह सब बात भी हमें भूल गयी थी, क्योंकि जो लोग अनेक प्रकारके दुःखोंसे दुखी और मोहित होते हैं, उनकी सारी स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। अतः हम पर जो यह दुःख आया है, यह सब कालकी प्रेरणा से प्राप्त हुआ है। बेटा! तुम शोक न करो। तुम्हारा इसमें तनिक भी दोष नहीं है, क्योंकि कुमार्ग पर चलनेवाला कोई भी क्यों न हो, क्षत्रियके लिये दण्डनीय ही है। साधु क्षत्रिय को उचित है कि यदि कुमार्ग पर चले तो अपनी आत्मा को भी दण्ड दे। फिर पिता, माता, सुहृद्, भ्राता और पुत्र आदि के लिये तो कहना ही क्या है? मुझे आज बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ है। मैं और मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनका पुत्र ऐसा धर्मज्ञ और धर्मपालक है। तुम वर पानेके योग्य हो, मेरे तथा दूसरे सत्पुरुषोंके द्वारा प्रशंसा पाने के अधिकारी हो। अतः यह शोक छोड़कर तुम्हें स्वस्थ हो जाना चाहिये ।
बर्बरीक बोला-पितामह ! मैं पापी हूँ, ब्रह्मद्दत्यारे से भी अधिक घृणा का पात्र हूँ। प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हैं। प्रभो! न तो आप मेरी ओर देखें और न मेरा स्पर्श ही करें। ब्राह्मण लोग सभी पापोंका प्रायश्चित बतलाते हैं। परंतु जो पिता-माताका भक्त नहीं है। उसके उद्धार का कोई उपाय नहीं। अतः जिस शरीरसे मैंने पितामह को पीड़ा पहुँचायी है, उस अपने शरीर को आज मैं महीसागर सङ्गम में त्याग दूंगा; जिससे अन्य जन्मों में भी ऐसा ही पातकी न होऊँ।
यो कहकर बलवान् बर्बरीक उछल कर समुद्रके भीतर चला गया। समुद्र भी यह सोचकर काँप उठा कि मैं कैसे इसका वध करूँ'। तदनन्तर सिद्धाम्बिका तथा चारों दिशाओं-की देवियों रुद्रके साथ वहाँ आयी और उसे हृदयसे लगाकर बोली- धीरेन्द्र ! अनजानमें किये हुए पापसे दोष नहीं लगता, यह बात शास्त्रों में बतायी गयी है। अतः तुम्हें इसके विपरीत कोई बर्ताव नहीं करना चाहिये।। देखो तुम्हारे पितामह भीम पुत्र-पुत्र पुकारते हुए तुम्हारे पीछे लगे हुए चले आ रहे हैं। तुम्हारी मूत्यु हो जाने पर वे स्वयं भी प्राण त्याग देने को उत्सुक हैं। बीर! यदि इस समय तुम शरीर छोड़ोगे तो भीमसेन भी शरीर को त्याग देंगे। उस दशा में तुम्हें बड़ा भारी पातक लगेगा। अतः महामते ! तुम ऐसा जानकर अपने शरीर को धारण करो। थोड़े ही समय में देवकी नन्दन श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारे शरीर का नाश होगा, ऐसा बताया गया है। वत्स ! वे साक्षात् भगवान् विष्णु हैं और उनके हाथ से शरीर का नाश होना बहुत उत्तम (मुक्तिदायक) है।इसलिये तुम उस समयकी प्रतीक्षा करो और हमारी बात मानो ।' देवियोंके ऐसा कहने पर बर्बरीक उदास मन से
लौट आया। बर्बरीक चण्डिका के कार्यकी सिद्धिके लिये
बढ़ा भारी युद्ध करेगा, इसलिये संसारमें चण्डिल नामसे
प्रसिद्ध और समस्त विश्वके लिये पूजनीय होगा।' यो कहकर
वहाँ आयी हुई सब देवियों अन्तर्धान हो गईं। भीमसेन भी बर्बरीक को साथ लेकर आये और अन्य पाण्डवों से भी वह सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सब पाण्डवों को बड़ा आश्वर्य हुआ। सबने बार-बार उसकी प्रशंसा की और आलस्य त्यागकर विधि के अनुसार तीर्थ-स्नान किया ।