घटोत्कच का विवाह और बर्बरीक का जन्म
शौनक जी बोले-सूतजी आपने गुप्त क्षेत्र के इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन अनुपम तथा हर्ष वर्धक माहात्म्य का वर्णन किया। यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्ध माता की कृपासे उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की। यह सब यथार्थ रूप से कहिये ।
(सूतजी) ने कहा- नक्षन् ! इस विषय में मैं श्रीव्यासजी के मुख से सुनी हुई कथा कहूँगा। पहले की बात है, पाण्डवों ने राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी को पाकर धृतराष्ट्र की आज्ञा से इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेव से सुरक्षित होकर रहते थे। एक समय पाण्डव अपनी राजसभा में बैठकर नाना प्रकार की बातें कर रहे थे, इतने में भीम का पुत्र घटोत्कच यहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासन से उठे और बड़ी प्रसन्नता के साथ सब ने घटोत्कच को हृदय से लगाया। भीम नन्दन घटोत्कच ने भी अत्यन्त विनीत भाव से उन सबको प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर ने उसे अपनी गोद में बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूंघते हुए सभा में इस प्रकार पूछा- 'बेटा ! कहाँ से आते हो? इतने दिनों तक कहाँ विचरते रहे ? हिडिम्बा कुमार ! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओं का कोई अपराध तो नहीं करते हो? भगवान् श्री कृष्ण में और हम-लोगों में तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करने वाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न ।'
धर्मराज के इस प्रकार पूछने पर हिडिम्बाकुमार ने कहा- महाराज ! मेरे मामाके मारे जाने पर में उसी के राज्य सिंहासन पर बिठाया गया हूँ और दुष्टों का दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशल से हैं, वे इस समय दिव्य तपस्या में लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है-बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवों में भक्ति रखने वाले बनो।' माता की यह बात सुनकर मैं भक्तियुक्त चित्तसे आपको प्रणाम करनेके लिये दी मेरुगिरि के शिखरसे यहाँ आया हूँ। मेरी इच्छा है कि आप लोग मुझे किसी महान् कार्य में नियुक्त करें। क्योंकि यही इस जीवन का महान् फल है कि पुत्र सदा अपने पितृ वर्गकी आशा का पालन करे। इससे वह पुण्य लोको पर विजय पाता है और इस संसार में भी यशस्वी होता है।
घटोत्कच के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले- बेटा! तुम्हीं हमारे भक्त और सहायक हो। हिडिम्बाकुमार ! निश्चय ही जैसी माता होती है, वैसा ही उसका पुत्र भी होता है। तुम्हारी माता हमलोगों के प्रति अविचल भक्ति रखने वाली है, तुम भी ऐसे ही हो। अहो! मेरी प्यारी पतोहू हिडिम्बादेवी बड़ा कठिन कार्य कर रही है, जो कि अपने प्यारे पति की सेवा का सुख छोड़कर तपस्या में ही संलग्न है।
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा- पुण्डरीकाक्ष ! आप तो जानते ही हैं कि घटोत्कच का जन्म भीमसेन से हुआ है। यह उत्पन्न होते ही तरुण हो गया था। श्रीकृष्ण! मैं चाहता हूँ, मेरे इस पुत्रको योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप सर्वज्ञ है, बताइये, इसके योग्य पत्नी कौन हो सकती है! धर्मराज के ऐसा कहने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षणभर ध्यान करके उनसे कहा- 'राजन्! मैं बतलाता हूँ, घटोत्कच के योग्य एक बड़ी सुन्दरी स्त्री है, जो इस समय प्राग्ज्योनिधपुर में निवास करती है। अद्भुत पराक्रम करने वाळा जो मुर नामक देत्य था, उसी की वह पुत्री है। मुर दैत्य बढ़ा भयङ्कर था और पाशमय दुर्ग में रहता था। यह मेरे हाथ से मारा गया। उसके मारे जाने पर उसकी पुत्री कामकटंकटा मुझसे युद्ध करनेके लिये आयी। यह अत्यन्त पराक्रमी होने के कारण बड़ी भयानक जान पड़ती थी। तब खङ्ग और खेटक धारण करनेवाली उस देत्य-कन्या के साथ महासमर में मैंने भी युद्ध आरम्भ किया। मेरे शार्ङ्ग नामक धनुष से बड़े-बड़े बाण छूटने लगे, परंतु मुरकी पुत्री ने मेरे उन सभी बाणों को खड्ग से ही काट डाला। तब मैंने उसका वध करने के लिये अपना सुदर्शन चक्र उठाया। यह देख कामाख्या देवी मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली- 'पुरुषोत्तम ! आपको इसका वध नहीं करना चाहिये। मैंने स्वयं इसको खड्ग और खेटक प्रदान किये हैं, जो अजेय हैं।'
कामाख्या देवीकी यह बात सुनकर मैंने कहा-शुभे ! मैं ही इस युद्ध से निवृत्त होता हूं, तुम इस कन्या को मना करो। तब कामाख्या देवीने उसे हृदयसे लगाकर कहा-'भद्रे ! तुम युद्धसे लौट चलो। ये माधव श्रीकृष्ण युद्ध में दुर्जय हैं। कोई किसी प्रकार भी संग्राम में इन्हें मार नहीं सकता । संसार में ऐसा कोई वीर न तो हुआ है, न है और न होगा ही, जो इन्हें युद्ध में जीत सके। औरोंकी तो बात ही क्या है, साक्षात् भगवान् शङ्कर भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। बेटी! ये तुम्हारे भावी श्वशुर हैं। अतः तुम इन्हें प्रणाम करके युद्ध से हट जाओ। यही तुम्हारे लिये उचित होगा। तुम इनके भाई भीमसेन की पुत्रवधू होओ गी। इसलिये अपने श्वशुर के समान पूजनीय जनार्दन का तुम आदर करो। अब पिताके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। इन श्रीकृष्ण के हाथ से जो तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई है, वह सर्वथा स्पृहणीय है। क्योंकि इनके हाथ से मरने पर अब तुम्हारे पिता सब पातकों से मुक्त होकर विष्णुधाम में चले गये।'
कामाख्या के ऐसा कहने पर कामकटंकटा ने क्रोध त्याग दिया और विनीत अङ्गों से मुझे प्रणाम किया। तब मैंने उसे आशीर्वाद देकर कहा- 'बेटी! तुम भगदत्त से सम्मानित होकर इसी नगर में निवास करो। यहाँ रहती हुई ही तुम धीर हिडिम्बाकुमार को पतिरूप में प्राप्त करोगी।' इस प्रकार आश्वासन देकर मैंने कामाख्या देवी तथा मौवीं (मुरपुत्री) को विदा किया। फिर वहाँ से द्वारका होता हुआ मैं यहाँ आकर आपसे मिला है। अतः वह मुरदैत्य की सुन्दरी कन्या ही घटोत्कच के लिये योग्य स्त्री है। मैं ससूर हूँ, इसलिये मेरे द्वारा उसके रूप का वर्णन करना उचित न होगा। साधु पुरुष के लिये यह कदापि उचित नहीं है कि यह स्त्रियोंके रूप-सौन्दर्य का वर्णन करे। एक बात और सुन लीजिये। उसने प्रतिज्ञा कर रक्खी है कि जो मुझे किसी प्रश्न पर निरुत्तर करके जीत ले तथा जो मेरे समान ही बलवान् हो, वही मेरा पति होगा। उसकी यह प्रतिज्ञा सुनकर बहुत से दैत्य तथा राक्षस उसे जीतने के लिये गये किंतु मौवीं ने उन सबको परास्त करके मार डाला । यदि महापराक्रमी घटोत्कच ऐसी मौर्वी को जीतने का उत्साह रखता हो, तो यह अवश्य ही इसकी पत्नी होगी।'
युधिष्ठिर बोले- प्रभो ! उसके सब गुणोंसे क्या लाभ है, जब उसमें यह एक ही महान् अवगुण भरा हुआ है। उस दूध को लेकर क्या किया जायगा जिसमें विष मिला दिया गया हो। अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे भीमसेनकुमार को केवल साहस के भरोसे कैसे इस सङ्कट में डाल दें। यह बेचारा तो शुद्ध वाक्य भी बोलना नहीं जानता। जनार्दन देश-देशमें और भी तो बहुत-सी स्त्रियों हैं, उन्होंमें से किसी उत्तम स्त्री को बतलाइये ।भीमसेन बोले- भगवान् श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, यह अनेक प्रयोजनों को सिद्ध करनेवाली, सत्य और उत्तम है। मेरा विश्वास है, घटोत्कच शीघ्र ही मौर्वी को प्राप्त करेगा ।
अर्जुन बोले-कामाख्या देवीने मौर्वी से कहा है 'भद्रे ! भीमसेन का पुत्र तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा।' इस कारण मेरी राय यही है कि घटोत्कच शीघ्र वहाँ जाय ।
श्रीभगवान् बोले- अर्जुन मुझको तुम्हारी और भीमकी बात पसंद है । हिडिम्बाकुमार। बोलो तुम्हारी क्या राय है ?
घटोत्कचने कहा-पूजनीय पुरुषोंके आगे अपने गुणों का वर्णन करना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणें और उत्तम गुण व्यवहार में आकर ही प्रकाशित होते हैं। मैं सर्वथा ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे मेरे निर्मल पिता पाण्डव मुझ पुत्रके कारण सत्पुरुषों की सभा में लज्जित न हों।
यो कहकर महाबाहु घटोत्कच ने उन सबको प्रणाम किया। फिर पितरों से विजयका आशीर्वाद पाकर उत्साहसम्पन्न हो उसने जाने का विचार किया। उस समय भगवान् जनार्दन ने उसकी प्रशंसा करके कहा बेटा! कथा कहते समय विजयकी प्राप्ति करानेवाले मुझ श्रीकृष्ण का स्मरण अवश्य कर लेना, जिससे मैं तुम्हारी दुर्भेय बुद्धि को अविलम्ब बढ़ा दूँगा ।' ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने उसे हृदयसे लगाया और आशीर्वाद देकर विदा किया। तदनन्तर हिडिम्बाकुमार महापराक्रमी घटोत्कच सूर्याक्ष, बालाख्य और महोदर-इन तीन सेवकों के साथ आकाशमार्ग से चला और दिन बीतते-बीतते प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचा।
वहाँ जानेपर घटोत्कच्चने प्राग्ज्योतिषपुर से बाहर एक सोने-का सुन्दर भवन देखा, जो एक विशाल वाटिका में शोभा पा रहा था। उसकी ऊँचाई एक हजार मंजिलकी थी। मेरुपर्वत के शिखरकी भाँति सुशोभित होनेवाले उस भवनके पास पहुँचकर घटोत्कचने देखा दरवाजे पर एक लड़की खड़ी है। उसका नाम 'कर्णप्रावरणा' था। वीर हिडिम्बाकुमार ने सरस भाषा में उससे पूछा 'कल्याणी! मुरकी पुत्री कहाँ हैं। मैं दूर देशसे आया हुआ उनकी कामना करनेवाला अतिथि हूँ और उन्हें देखना चाहता हूँ।'
भीमसेनकुमार की यह बात सुनकर यह निशाचरी लड़खड़ाती हुई दौड़ी और महल की छतपर बैठी हुई मौर्वी के पास जाकर इस प्रकार बोली- देवि! कोई सुन्दर तरुण काम का अतिथि होकर तुम्हारे द्वारपर खड़ा है। उसके समान सुन्दर कान्तिवाला पुरुष कोई त्रिलोकी में भी नहीं होगा। अतः अब उसके लिये क्या कर्तव्य है, वह आज्ञा दीजिये।'
कामकटंकटा बोली-अरी! उन्हें शीघ्र ले आ, क्यों विलम्ब करती है? कदाचित् देवकी सहायता से उन्हीं के द्वारा मेरी प्रतिज्ञा की पूर्ति हो जाय।
मौर्वी के ऐसा कहने पर दासीने घटोत्कच के पास जाकर कहा-कामी पुरुष उस मृत्युरूपा नारीके समीप शीघ्र जाओ। उसके ऐसा कहने पर हँसते हुए घटोत्कच ने वहींपर अपना धनुष छोड़कर घर के भीतर प्रवेश किया और विद्युत्-की भाँति प्रकाशित होनेवाली उस दैत्य-कन्या को देखकर इस प्रकार सोचा अहो! मेरे पितृस्वरूप श्रीकृष्ण ने मेरे लिये योग्य स्त्री को ही बतलाया है।' इस प्रकार विचार करते हुए उसने मौर्वी से कहा- ओ बङ्ग के समान कठोर हृदय-बाली निष्ठुर नारी! मैं अतिथि होकर तुम्हारे घर आया हूँ। अतः सत्पुरुषोंके लिये जो उचित स्वागत सत्कार है, वह अपने हार्दिक भावके अनुसार करो।' हिडिम्बाकुमार का यह बचन सुनकर कामकटंकटा उसके रूप से विस्मित हो अपनी निन्दा करके इस प्रकार बोली- 'भद्रपुरुष ! तुम व्यर्थ ही यहाँ चले आये। जीते-जी पुनः सुखपूर्वक लौट जाओ, अथवा यदि मुझे चाहते दो तो शीघ्र कोई कथा कहो। कथा कहकर यदि मुझे सन्देह में डाल दोगे तो मैं तुम्हारे वशमें हो जाऊँगी। उसके बाद मेरे द्वारा तुम्हारी सेवा होगी।'
उसके ऐसा कहने पर घटोत्कच ने यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनकी कथा है, उन भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करके कथा प्रारम्भ की। 'मान को किसी पत्नी के गर्भसे कोई बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होने पर बड़ा अजितेन्द्रिय निकला। उस युवक के एक पुत्री हुई तथा उसकी पत्नी मर गयी।
तब पिताने ही उस नन्ही-सी पुत्री की रक्षा एवं पालन-पोषण किया। यह कन्या जय जवान हुई और उसके सब अङ्ग विकसित हो गये, तब उसके पिताका मन उसके प्रति कामलोलुप हो उठा । तदनन्तर उस पापी ने अपनी ही पुत्री से कहा- प्रिये ! तुम मेरे पड़ोसी की लड़की हो। मैंने तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिये यहाँ लाकर दीर्घकाल तक पालन-पोषण किया है। अतः अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।' उसके ऐसा कहने पर उस लड़कीने ऐसा ही माना। उसने इसे प्रति रूप में स्वीकार किया और इसने उसे पत्नीरूप में। तत्पश्चात् उस कामी गदहे से एक कन्या उत्पन्न हुई। अब बताओ, वह कन्या उसकी क्या लगेगी पुत्री अथवा दौहित्री? यदि तुममें शक्ति है। तो मेरे इस प्रश्नका शीघ्र उत्तर दो।'
यह प्रश्न सुनकर मौर्वी ने अपने हृदय में अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किसी प्रकार उसे इस प्रश्नका निर्णय नहीं सूझता था। तब उस प्रश्न से परास्त होकर मौर्वी अपनी शक्तिका उपयोग किया। यह ज्यों ही झूले से सहसा उठकर हाथ में तलवार लेना चाहती थी त्यों ही घटोत्कच ने बड़े वेग से पहुँच कर बायें हाथ से उसके केश पकड़ लिये और धरती पर गिरा दिया। फिर उसके गले पर बायाँ पैर रखकर दाहिने हाथ में कतरनी है, उसकी नाक काट लेने का विचार किया। मौर्वीं ने बहुत हाथ-पैर मारे, किंतु अन्त में शिथिल होकर उसने मन्द स्वर में कहा- 'नाथ! मैं तुम्हारे प्रश्न से और शक्ति तथा बलसे परास्त हो गयी हूँ। तुम्हें नमस्कार है। अब मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हारी दासी हूँ। जो आज्ञा दो वही करूँगी।'
घटोत्कच ने कहा यदि ऐसी बात है तो लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया ।
घटोत्कच के यों कहकर छोड़ देने पर कामकटंकटा ने पुनः उसे प्रणाम किया और कहा महाबाहो में जानती हूँ, तुम बड़े वीर हो। त्रिलोकी में कहीं भी तुम्हारे पराक्रम की तुलना नहीं है। तुम इस पृथ्वी पर साठ करोड़ राक्षसोंके स्वामी हो। ये बातें मुझे कामाख्या देवीने बतलायी थीं, ये सब आज याद आ रही हैं। मैंने अपने सेवकों तथा इस शरीर के साथ यह सारा घर तुम्हारे चरणों में समर्पित कर दिया। प्राणनाथ ! आज्ञा दो, मैं तुम्हारे किस आदेश का पालन करूँ ?'
घटोत्कचने कहा-मौवीं! जिसके पिता और भाई-बन्धु मौजूद हैं। उसका विवाह छिपकर हो। यह किसी प्रकार उचित नहीं है। इसलिये अब तुम शीघ्र मुझे इन्द्रप्रस्थ ले चलो। यही हमारे कुल की परिपाटी है। इन्द्रप्रस्थ में गुरुजनों की आज्ञा लेकर मैं तुमसे विवाह करूँगा। तदनन्तर मौर्वी अनेक प्रकार की सामग्री साथ ले घटोत्कच को अपनी पीठ पर बैठाकर इन्द्रप्रस्थ में आयी। भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवों ने घटोत्कच का अभिनन्दन किया, उसके बाद शुभ लग्न में भीमकुमारने मौर्वी का पाणिग्रहण किया । कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही वधू को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। विवाह-सम्बन्ध हो जाने पर राजा युधिष्ठिरने घटोत्कचका आदर-सत्कार करके उसे पत्नी सहित अपने राज्यको जाने का आदेश दिया। महाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके हिडिम्बाकुमार अपनी राजधानी हिडम्ब-वन को चला गया। यहाँ उसने मौर्वी के साथ बहुत दिनों तक क्रीड़ा की। तदनन्तर समयानुसार उसके गर्भ से एक महातेजस्वी एवं बालसूर्य के समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त हो गया। उसने माता-पितासे कहा- मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूँ, बालकके आदिगुरु माता-पिता ही हैं। अतः आप दोनों के दिये हुए, नाम को मैं ग्रहण करना चाहता हूँ।' तय घटोत्कच ने अपने पुत्रको छाती से लगाकर कहा- 'बेटा! तुम्हारे केश बर्बराकार (घुँघराले) हैं, इसलिये तुम्हारा नाम बर्बरीक होगा। महाबाहो तुम अपने कुल का आनन्द बढ़ानेवाले होओगे। तुम्हारे लिये जो परम कल्याणमय वस्तु है, उसको हमलोग द्वारकापुरी चलकर यदुकुलनाथ भगवान् वासुदेव से पूछेंगे।'
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