महीसागरसङ्गम की श्रेष्ठता तथा उसके गुप्त-क्षेत्र होने का कारण
अर्जुन ने पूछा—
नारदजी! इस तीर्थ को गुप्त-क्षेत्र क्यों कहते हैं? जिसका इतना महान् प्रभाव सुना गया है, यह गुप्त कैसे हुआ?
नारदजी बोले—
अर्जुन! इस क्षेत्र के गुप्त होने का जो कारण है, उसके विषय में एक अत्यन्त प्राचीन कथा है। उसे ध्यानपूर्वक सुनो। यह क्षेत्र पूर्वकाल में शापवश गुप्त हो गया था।
एक समय किसी निमित्त से सब तीर्थों के अधिदेवता एकत्र होकर ब्रह्माजी को प्रणाम करने के लिये उनकी सभा में गये। सब तीर्थों को आया हुआ देखकर ब्रह्माजी अपने समस्त सभासदों के साथ उठकर खड़े हो गये। उनके नेत्र आश्चर्य से खिले हुए थे।
भगवान् ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर सब तीर्थों को प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—
“तीर्थंकरों! आज आप सब लोगों के पदार्पण से पवित्र होकर हमारा स्थान सफल हो गया। हम सब देवता भी आपके दर्शन से अत्यन्त पवित्र हो गये। तीर्थों का दर्शन, स्पर्श तथा स्नान—ये सब परम कल्याणकारक हैं। बड़े-बड़े पापों से भरे हुए जो भयङ्कर एवं अत्यन्त निर्दय मनुष्य हैं, वे भी तीर्थ में पवित्र हो जाते हैं; फिर जो धर्मपरायण हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है?”
यों कहकर ब्रह्माजी ने अपने पुत्र पुलस्त्य को आज्ञा दी—
“वत्स! तुम तीर्थों के लिये शीघ्र ही अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजन कर सकूँ। जब अर्घ्य देने योग्य असंख्य पुरुष एकत्र हो जायें, तब पूजन-काल में उन सब में से श्रेष्ठ एक पुरुष को एक अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।”
पिता की यह आज्ञा पाकर पुलस्त्य जी बड़े वेग से एक उत्तम अर्घ्य-पात्र सजाकर ले आये। ब्रह्माजी ने उसे हाथ में लेकर सब तीर्थों से कहा—
“आप सब लोग मिलकर किसी एक मुख्य तीर्थ का नाम बतलाइये। मैं उसी को अर्घ्य देना चाहता हूँ। ऐसा करने से मुझे अन्याय-रूपी दोष नहीं लगेगा।”
तीर्थ बोले—
“प्रभो! हम किसी प्रकार भी आपस में श्रेष्ठता का निर्णय नहीं कर पाते। इसी कारण हम आपके पास आये हैं। आप ही हम में से जो श्रेष्ठ हो, उसे समझकर अर्घ्य प्रदान कीजिये।”
ब्रह्माजी बोले—
“मैं आप लोगों में से किसी एक की श्रेष्ठता को नहीं समझ पाता। आप सभी अपार महिमा से सम्पन्न हैं। अतः आप स्वयं ही अपने में से श्रेष्ठ पुरुष को बतलाइये।”
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर जब उनमें से कोई भी बहुत देर तक कुछ न बोला, तब तीर्थराज महीसागर-सङ्गम ने कहा—
“चतुरानन! आप शीघ्र मुझे यह अर्घ्य प्रदान करें, क्योंकि दूसरा कोई भी तीर्थ मेरी करोड़वीं कला के सामने भी पूर्ण नहीं पड़ता। पूर्वकाल में महाराज इन्द्रद्युम्न की तपस्या से तपकर यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही मही नाम वाली नदी हो गयी। यह सब तीर्थों सहित मुझसे आकर मिली है; इसलिये मैं तीनों लोकों में सर्वतीर्थमय होकर प्रसिद्ध हूँ।”
तीर्थराज महीसागर-सङ्गम के ऐसा कहने पर अन्य सब तीर्थ मौन रहे—
“देखें, ब्रह्माजी हमारे विषय में क्या कहते हैं”— यह सोचकर कोई कुछ न बोला।
तब ब्रह्माजी के ज्येष्ठ पुत्र धर्म ने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर इस प्रकार कहा—
“अहो! बड़े दुःख की बात है। इस तीर्थराज महीसागर-सङ्गम ने मोहवश बड़ी कुत्सित बात कह डाली है। साधु पुरुषों को उचित है कि वे अपने में अच्छे गुण होते हुए भी उनका अपने मुख से बखान न करें। जो भरी सभा में दूसरों पर आक्षेप करते हुए अपने गुणों का वर्णन करता है, वह रजोगुणी, अहङ्कारी तथा निन्दित होता है। इसलिये यह तीर्थ इन सब गुणों के रहते हुए भी अपने अहङ्कार के कारण विख्यात न होगा। इसका स्वरूप विध्वस्त-सा हो जायेगा।”
धर्मदेव के ऐसा कहने पर सब ओर हाहाकार मच गया। तब योगीश्वर स्कन्द और मैं— हम दोनों शीघ्रता-पूर्वक वहाँ जा पहुँचे।
कार्तिकेय ने उस देव-सभा में धर्म से इस प्रकार कहा—
“धर्म! तुमने क्रोधवश जो यह शाप दे डाला है, वह सर्वथा अनुचित है। कोई यह तो बताये कि तीनों लोकों में विद्यमान समस्त तीर्थों में से कौन-सा ऐसा तीर्थ है, जिससे यह महीसागर-सङ्गम अर्घ्य पाने का अधिकारी नहीं है? इस तीर्थराज ने अपने जिस गुण का वर्णन किया है, वह सब इसमें विद्यमान है। ऐसी दशा में इसमें दोष कहाँ है? क्योंकि अवगुण तो झूठ बोलने में है, सत्य कहने में नहीं। जो सबका पालन करने वाले हैं, उनके द्वारा ऐसा व्यवहार कदापि उचित नहीं है। यदि वे भी बिना विचार किये ऐसे कार्य करेंगे, तब प्रजा किसकी शरण में जायेगी?”
स्कन्द स्वामी के ऐसा कहने पर धर्म ने इस प्रकार उत्तर दिया- 'आपका यह कहना ठीक है कि यह महीसागर-सङ्गम सब तीर्थों में प्रधान होने और ब्रह्माजी से अर्घ्य पाने के सर्वथा योग्य है, किंतु साधु पुरुषों का यह सनातन नियम है कि अपने ही मुँह से अपने गुणों का बखान नहीं करना चाहिये। दूसरों का किया हुआ आक्षेप और अपनी प्रशंसा ये दो दोष ब्रह्माजी को भी अपने पद से विश्वलित कर सकते हैं। दूसरों पर आक्षेप करते हुए अपनी प्रशंसा करने वाले राजा ययाति क्या स्वर्ग से नीचे नहीं गिर गये थे? बुद्धिमान् ईश्वरने पूर्वकाल में जो बातें प्रमाणित कर दी हैं, उन सबका भलीभांति पालन करना चाहिये। कौन विद्वान् उनका उल्लङ्घन कर सकता है? कार्तिकेय जी! आपके पिता ने आदेश देकर जिस कार्य के लिये हमें नियुक्त किया है, हम सदा उसी का पालन करते हैं। आपको भी उसका पालन करना चाहिये ।'
यो कहकर धर्म जब अपनी मुद्रा त्याग देने को तैयार हो गये, तब मैंने उस प्रस्ताव पर विचार करके यह बात कही 'विश्वको धारण करने वाले परम महान् महात्मा धर्म को नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी प्रतिदिन पूजा करते हैं। उन पाप नाशी धर्म को नमस्कार है। धर्म। यदि कदाचित् आप मुद्रा त्याग देंगे, तो हमलोगों की सत्ता कैसे रह सकती है। प्रभो! आप इस विश्व का नाश न कीजिये। योगीश्वर कार्तिकेय को आप सम्मान देने योग्य हैं। ये साक्षात् भगवान् शङ्कर के पुत्र हैं। अतः उन्हींकी भाँति हम सबके लिये माननीय हैं। मानद आपने इस तीर्थराज को विख्यात न होने का जो शाप दे दिया है, उसका निवारण करनेके लिये अनुग्रह कीजिये ।'
मेरे ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा- धर्म! नारदने अच्छी बात कही है, तुम इनकी बात मानो। तब धर्मने कार्तिकेयजी से कहा- हम लोग जिसके सामने बहुत छोटे हैं, उन परम सिद्ध कार्तिकेय जी को नमस्कार है। स्कन्द! मेरे नाथ! मेरी यह विनय ध्यान देकर सुनिये । स्तम्भ अर्थात् गर्व के कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध होगा तथापि शनिवार की अमावास्या को महीसागर की यात्रा करने से जो फल मिलेगा, उसपर ध्यान दीजिये- प्रभास की दस बार पुष्कर की सात बार और प्रयाग की आठ बार यात्रा करने से जो फल होता है वही पल इसकी एक बार की यात्रा से प्राप्त होगा ।'
इस प्रकार वरदान देने पर कार्तिकेय जी मन-ही-मन बहुत प्रसन हुए। ब्रह्माजी ने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भ तीर्थ को अर्घ्य दिया और उसे सब तीथों में श्रेष्ठता प्रदान की। फिर सब तीर्थों और स्कन्द स्वामी को सम्मान देकर विदा किया। इस तीर्थ के गुप्त होने का यही प्राचीन वृत्तान्त है। इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण तीर्थ के महान् फल का वर्णन किया। यह सब आदि से ही सुनकर पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सूतजी कहते हैं यह सब सुनकर विस्मय में पड़े हुए अर्जुन ने उस तीर्थ की बड़ी प्रशंसा की और नारद आदि से विदा लेकर द्वारका को प्रस्थान किया ।
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