मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है।

होता वहीं है जो मैं चाहता हूं।

इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं।

फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।”

मनुष्य की इच्छा और भगवान की इच्छा जब एक हो जाती है, तभी जीवन में सच्ची शांति मिलती है।


मनुष्य अपनी इच्छा से कर्म करता है।

इंसान को लगता है कि वह अपनी मर्जी से सब कुछ कर रहा है — निर्णय ले रहा है, कर्म कर रहा है।

परन्तु परिणाम भगवान की इच्छा से होता है।

हमारे कर्म का फल अंततः भगवान की व्यवस्था (ईश्वरीय नियम) से तय होता है।

इसलिए भगवान की इच्छा के अनुसार कर्म करो।

यानी धर्म, सत्य, करुणा और कर्तव्य के अनुसार जीवन जियो।

तब तुम्हारी इच्छाएँ भी पूरी होंगी।

जब मनुष्य अपने कर्म को ईश्वर की इच्छा से जोड़ देता है, तो उसके जीवन में शांति और सफलता दोनों आती हैं।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...