मंगलवार, 19 जुलाई 2022

स्त्रैण चेतना

 स्त्रैण चेतना अत्यधिक अंतर्मुखी होती है।


एक स्त्री स्वयं अपने तक सीमित रहती है, उसके चारों ओर अपना एक छोटा सा संसार होता है, जितना भी सम्भव हो सके, उतना कम से कम छोटा संसार।

यही कारण है कि एक स्त्री को तुम बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण चीजों में--दिलचस्पी लेते हुए नहीं देख सकते।


उसका सम्बन्ध तो अपने परिवार अपने पति, अपने बच्चों,कुत्ते, फर्नीचर, रेडियो और टी.वी.सेट से ही होता है।उसके चारों ओर एक छोटा सा सीमित संसार होता है।क्योंकि उसके चारों ओर का संसार बहुत छोटा होता है इसलिए पुरुष के लिए स्त्री से बुद्धिगत चर्चा करना बहुत कठिन है--वे दोनों अलग-अलग संसार में रहते हैं।


स्त्री केवल तभी सुन्दर लगती है, जब वह खामोश रहती है, जिस क्षण वह बात करना शुरू करती है, तो मूर्खतापूर्ण चीजें उसके बाहर निकलना शुरू हो जाती हैं। वह बुद्धिमत्तापूर्ण चर्चा-परिचर्चा कर ही नहीं सकती।


वह प्रेम कर सकती है, लेकिन बुद्धिमानी की बात नहीं कर सकती, वह कोई बड़ी दार्शनिक नहीं बन सकती। नहीं, यह सम्भव ही नहीं है। यह चीजें उसकी पहुंच के बाहर हैं, वह उनकी फिक्र करती भी नहीं। वह अपने ही संसार के एक छोटे से दायरे में रहती है, और वह स्वयं ही उसका केंद्र होती है, और जो कुछ भी अर्थपूर्ण होता है, उसमें केवल वही अर्थपूर्ण होता है, जिसका सम्बन्ध स्वयं उससे ही हो--अन्यथा वह अर्थपूर्ण होता ही नहीं है।


स्त्री एक पृथक संसार में रहती है वह आत्मकेन्द्रित और अंतर्मुखी होती है। सभी स्त्रियां, भारतीय स्त्रियों की तरह होती हैं--वे कहीं की भी हों, इससे कोई भी अंतर नहीं पड़ता। पुरुष की प्रवृत्ति अपने केंद्र से दूर जाने की होती है, उसका रस बाहर में है। जिस क्षण वह कोई बहाना खोज पाता है, वह घर से निकल भागेगा।

वह घर केवल तभी आता है, जब वह कहीं अन्यत्र नहीं जा सकता, जब सभी क्लब और होटल बंद हो जाते हैं, तब आखिर किया क्या जाए? जब कहीं भी नहीं जाना होता है, वह घर तभी वापस लौटता है।

एक स्त्री हमेशा गृह-केंन्द्रित होती है, घर ही उसका आधार होता है।वह घर के बाहर केवल तभी जाती है, जब जाना बहुत जरूरी होता है, उससे अन्यथा वह कुछ कर ही नहीं सकती। जब उसके लिए बाहर जाना एक अनिवार्यता बन जाती है, वह तभी बाहर जाती है, अन्यथा उसका आधार घर ही है।पुरुष एक आवारा घुमक्कड़ है।

पूरा पारिवारिक जीवन स्त्री द्वारा ही सृजित किया जाता है, पुरुष द्वारा नहीं। वास्तव में सभ्यता स्त्री के कारण ही अस्तित्व में है, पुरुष के द्वारा नहीं।

यदि उसे अनुमति मिले तो वह एक घुमक्कड़ ही बनना चाहेगा--न कोई घर हो और न सभ्यता के बन्धन। पुरुष की चेतना बाहर की ओर उम्मुख है, जब कि स्त्री की अन्दर की ओर, पुरुष बहिर्मुखी है और स्त्री है-- अंतर्मुखी।

पुरुष की दिलचस्पी हमेशा स्वयं अपने से हटकर किसी अन्य चीज में होती है, यही कारण है कि वह अधिक स्वस्थ दीखता है, क्योंकि जब तुम स्वयं से अधिक सम्बन्ध रखने लगते हो तुम अस्वस्थ हो जाते हो। पुरुष अधिक प्रसन्न दिखाई देता है। स्त्री को तुम हमेशा अपने ही बारे में दिलचस्पी लेते उदास पाओगे, जरा सा सिर दर्द हुआ नहीं, कि वह सिरदर्द, स्वयं में अधिक दिलचस्पी लेने और घर में ही रहने के कारण, अनुपात में कहीं अधिक बड़ा हो जाता है। लेकिन एक पुरुष अपने सिरदर्द को भूल सकता है, उसके पास बहुत से अन्य सिर दर्द भी हैं। वह अपने चारों ओर बहुत से सिर दर्द स्वयं उत्पन्न करता है, इसलिए उनसे बाहर आकर स्वयं के सिर दर्द बने रहने की कोई सम्भावना रहती ही नहीं, और वह दर्द इतना कम होता है, कि वह उसके बारे में भूल सकता है।


स्त्री हमेशा अपने ही बारे में सोचती रहती है कभी उसका पैर दुख रहा है, कभी कुछ उसके हाथ में हो रहा है, कभी उसकी पीठ में दर्द है, तो कोई गड़बड़ उसके पेट के साथ है, उसे हमेशा कुछ न कुछ होता ही रहता है, क्योंकि उसकी अपनी चेतना अपने अन्दर की ओर केन्द्रित है।

एक पुरुष की शारीरिक व्याधियां कम होती हैं, वह कहीं अधिक स्वस्थ रहता है। कहीं अधिक बाहर जाते हुए उसकी दिलचस्पी दूसरों के बारे में कहीं अधिक होती है।

यही कारण है कि सभी धर्मों में तुम यह पाओगे कि यदि वहां पांच लोग उपस्थित हैं, तो उनमें पुरुष एक ही होगा और स्त्रियां चार, और वह एक पुरुष भी केवल किसी स्त्री के कारण ही आया हो सकता है पत्नी मंदिर जा रही थी, इसलिए पति को उसके साथ जाना पड़ा, अथवा वह कोई धार्मिक प्रवचन सुनने जा रही थी, इसलिए उसे उसके साथ जाना पड़ा। सभी गिरजाघरों में भी सभी पूजाघरों और मंदिरों में भी तुम जहां कहीं भी जाओ, स्त्री-पुरुषों का तुम्हें यही अनुपात मिलेगा।

यहां तक कि बुद्ध और महावीर के पास भी जाने वालों में स्त्री-पुरुषों का यही अनुपात था। बुद्ध के पचास हजार भिक्षुओं में चालीस हजार स्त्रियां और दस हजार पुरुष थे।


शारीरिक रूप से पुरुष अधिक स्वस्थ हो सकता है, आध्यात्मिक रूप से स्त्री अधिक स्वस्थ हो सकती है, क्योंकि उनकी दिलचस्पियां भिन्न-भिन्न हैं।

जब तुम दूसरों के बारे में अधिक दिलचस्पी लेते हो, तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो, तुम शारीरिक रूप से अधिक स्वस्थ हो सकते हो लेकिन धार्मिक रूप में तुम इतनी सरलता से विकसित नहीं हो सकते। धार्मिक विकास के लिए अंतर्संबंध जोड़ना होता है। एक स्त्री धर्म में बहुत-बहुत आसानी से विकसित हो सकती है उसके लिए यह मार्ग आसान है।


और एक पुरुष के लिए धर्म में विकसित होना कठिन है। अंतर्मुखी चेतना होने के अपने लाभ हैं, और बहिर्मुखी होने के अपने फायदे हैं, और दोनों के अपने- अपने खतरे भी है।

हरिओम सिगंल 

ओशो के प्रवचन पर आधारित 










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