सोमवार, 2 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 12

 नीति और धर्म


      समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।

ये भजन्ति तु मां भक्त्‍या मयि ते तेषु चाप्यहम्।। 29।।

अपि चेत्सुदराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवलितो हि सः।। 30।।

क्षिपं भवति धर्मात्मा शश्वव्छान्तिं निगव्छीत।

कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।। 31।।


मैं सब भूतों में सम—भाव से व्यापक हूं; न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है। परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते है, वे मेरे में और मैं भी उनमें प्रकट हूं।

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ मेरे को निरंतर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

इसलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली शांति को प्राप्त होता है। है अर्जुनु तू निश्चयपूर्वक सत्य जान मेरा भक्त कभी भी नष्ट नहीं होता है।


 जीवन के संबंध में एक बहुत बुनियादी प्रश्न इस सूत्र में उठाया गया है। और जो जवाब है, वह आमूल रूप से क्रांतिकारी है। उस जवाब की क्रांति दिखाई नहीं पड़ती, क्योंकि गीता का हम पाठ करते हैं, समझते नहीं। हम उसे पढ़ते हैं, दोहराते हैं, लेकिन उसकी गहनता में प्रवेश नहीं हो पाता। बल्कि अक्सर ऐसा होता है, जितना ज्यादा हम उसे दोहराते हैं, और जितना हम उसके शब्दों से परिचित हो जाते हैं, उतनी ही समझने की जरूरत कम मालूम पड़ती है। शब्द समझ में आ जाते हैं, तो आदमी सोचता है कि अर्थ भी समझ में आ गया!

काश, अर्थ इतना आसान होता और शब्दों से समझ में आ सकता, तो जीवन की सारी पहेलियां हल हो जातीं। लेकिन अर्थ शब्द से बहुत गहरा है। और शब्द केवल अर्थ की ऊपरी पर्त को छूते हैं। लेकिन शब्द को हम कंठस्थ कर सकते हैं। और शब्द की ध्वनि बार—बार कान में गूंजती रहे, तो शब्द परिचित मालूम होने लगता है। और परिचय को हम ज्ञान समझ लेते हैं!  

इस सूत्र में कृष्ण ने कहा है कि आचरण महत्वपूर्ण नहीं है। कृष्ण के मुंह से ऐसी बात सुनकर हैरानी होगी। कृष्ण कहते हैं, आचरण महत्वपूर्ण नहीं है, अंतस महत्वपूर्ण है।

सब धर्म, जैसा हम सोचते हैं ऊपर से, आचरण पर जोर देते मालूम पड़ते हैं। वे कहते हैं, यह करो और यह मत करो! और अगर तुम्हारा सदाचरण होगा, तो तुम प्रभु को उपलब्ध हो जाओगे। सदाचरण की बात ठीक ही मालूम पड़ती है। और कौन होगा जो कहेगा कि सदाचरण के बिना भी परमात्मा उपलब्ध हो सकता है! कौन है जो कहेगा कि अनैतिक जीवन भी परमात्मा को उपलब्ध हो सकता है!

नीति तो आधार है, ऐसा हम सभी को लगता है। लेकिन नीति आधार नहीं है। और स्थिति बिलकुल ही विपरीत है। सदाचरण से कोई परमात्मा को उपलब्ध होता हो, ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। हां, परमात्मा को जो उपलब्ध हो जाता है, वह जरूर सदाचरण को उपलब्ध हो जाता है। वह जो परमात्मा की प्रतीति है, वह प्राथमिक और मौलिक है, आचरण गौण है, द्वितीय है।

होना भी यही चाहिए; क्योंकि आचरण बाहरी घटना है और प्रभु— अनुभूति आंतरिक। और आचरण तो अंतस से आता है; अंतस आचरण से नहीं आता। मैं जो भी करता हूं वह मुझसे निकलता है; लेकिन मेरा होना मेरे करने से नहीं निकलता। मेरा अस्तित्व मेरे करने के पहले है। मेरा होना, मेरे सब करने से ज्यादा गहरा है। मेरा सब करना मेरे ऊपर फैले हुए पत्तों की भांति है, वह मेरी जड़ नहीं है, वह मेरी आत्मा नहीं है।

इसलिए यह भी हो सकता है कि मेरा कर्म मेरे संबंध में जो कहता हो, वह मेरी आत्मा की सही गवाही न हो। कर्म धोखा दे सकता है, कर्म प्रवंचना हो सकता है, कर्म पाखंड हो सकता है, हिपोक्रेसी हो सकता है। मेरे भीतर एक दूसरी ही आत्मा हो, जिसकी कोई खबर मेरे कर्मों से न मिलती हो।

यह तो हम जानते हैं कि मैं बिलकुल साधु का आचरण कर सकता हूं पूरी तरह असाधु होते हुए। इसमें कोई बहुत अड़चन नहीं है। क्योंकि आचरण व्यवस्था की बात है। मेरे भीतर कितना ही झूठ हो, मैं सच बोल सकता हूं; अड़चन होगी, कठिनाई होगी, लेकिन ; अभ्यास से संभव हो जाएगा। मेरे भीतर कितनी ही हिंसा हो, मैं। अहिंसक हो सकता हूं। बल्कि दिखाई ऐसा पड़ता है कि जिसको भी अहिंसक होना हो इस भाति, उसके भीतर काफी हिंसा होनी चाहिए। क्योंकि स्वयं को भी अहिंसक बनाने में बड़ी हिंसा करनी पड़ती है; स्वयं को भी दबाना पड़ता है, स्वयं की भी गर्दन पकड़नी पड़ती है!

यह हो सकता है कि मेरे बाहर क्रोध प्रकट न होता हो और मेरे भीतर बहुत क्रोध हो। संभावना यही है कि मैं इतना क्रोधी आदमी हो सकता हूं कि क्रोध मेरे लिए इतना खतरा हो जाए कि या तो मैं क्रोध करूं या मैं जी सकूं। और जीना हो, तो मुझे क्रोध को दबाना पडे।

इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि छोटे —मोटे क्रोधी कभी क्रोध को नहीं दबाते। इतना महंगा नहीं है उनका क्रोध। उतने क्रोध के रहते भी जिंदगी चल सकती है। लेकिन बड़े क्रोधी को तो क्रोध दबाना ही पड़ता है, क्योंकि जिंदगी असंभव हो जाएगी; जीना ही मुश्किल हो जाएगा। वह आग इतनी ज्यादा है कि जला डालेगी सब। कोई संबंध संभव नहीं रह जाएंगे।

तो बड़े क्रोधी को क्रोध को दबाना पड़ता है। दबाने में भी क्रोध की जरूरत पड़ती है। क्योंकि दबाना क्रोध का एक कृत्य है; चाहे दूसरे को दबाना हो, चाहे स्वयं को दबाना हो। तो यह हो सकता है। यह होता है। यह कठिन नहीं है। यह बहुत ही सहज घटता है कि बाहर जो आचरण में दिखाई पड़ता है, वह भीतर नहीं होता है। हम आचरण में धोखा दे सकते हैं।

लेकिन आचरण से जो धोखा दिया जाता है, वह लोगों की। आंखों को हो सकता है, लेकिन वह धोखा स्वयं को नहीं दिया जा सकता। नीति का संबंध है दूसरे को धोखा न देने से, धर्म का संबंध है स्वयं को धोखा न देने से। नीति का संबंध है समाज की आंखों में शुभ होने से; धर्म का संबंध है परमात्मा के सामने शुभ होने से, नैतिक होना आसान है। सच तो यह है कि अनैतिक होने में इतनी कठिनाइयां होती हैं कि आदमी को नैतिक होना ही पडता है। लेकिन धार्मिक होना बड़ा कठिन है, क्योंकि धार्मिक न होने से कोई भी अड़चन नहीं होती, कोई भी कठिनाई नहीं होती। बल्कि सच तो यह है कि धार्मिक होने से ही कठिनाई शुरू होती है और अड़चन शुरू  होती है।

धार्मिक होकर जीना बड़े दुस्साहस का काम है। धार्मिक होकर जीने का अर्थ है कि अब मेरे जीवन का नियम मेरे भीतर से निकलेगा; अब इस जगत का कोई भी नियम मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं है; अब मैं ही अपना नियम हूं। और अब चाहे कुछ भी परिणाम हो, चाहे कितना ही दुख हो, और चाहे नर्क में भी पड़ना पडे, लेकिन अब मेरा नियम ही मेरा जीवन है।

धार्मिक होकर जीना अति कठिन है। धार्मिक होकर जीने का परिणाम तो भुगतना पड़ता है। किसी जीसस को सूली लगती है, किसी सुकरात को जहर पीना पड़ता है। यह बिलकुल अनिवार्य है। धार्मिक होकर जीना बहुत कठिन है।

ध्यान रहे, अनैतिक होकर भी जीना बहुत कठिन है, क्योंकि अनैतिक होते ही आप समाज के संघर्ष में पड़ जाते हैं—कानून, अदालत, पुलिस। अनैतिक होते ही आप समाज से संघर्ष में पड़ जाते हैं। अनैतिक होकर जीना बहुत मुश्किल है। धार्मिक होकर जीना भी बहुत मुश्किल है; क्योंकि धार्मिक होते ही आप स्वतंत्र जीवन शुरू कर देते हैं। अनैतिकता से इसलिए कठिनाई आती है कि जब आप दूसरों के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो आप कठिनाई में पड़ेंगे। धार्मिक होने से इसलिए कठिनाई आती है कि आप दूसरों को मानना ही बंद कर देते हैं। आप ऐसे जीने लगते हैं, जैसे पृथ्वी पर अकेले हैं, जैसे पृथ्वी पर कोई भी नहीं है। आपका समस्त नियम आपके भीतर से निकलने लगता है। तब भी कठिनाई होती है।

ध्यान रहे, अनैतिक होना कठिन है, धार्मिक होना कठिन है। नैतिक होना कनवीनिएंट है, नैतिक होना बड़ा सुविधापूर्ण है, पार्ट आफ रिस्पेक्टिबिलिटी है। वह जो हमारा चारों तरफ सम्मानपूर्ण समाज है, उसमें नैतिक होकर जीना सबसे ज्यादा सुविधापूर्ण है। इसलिए जितना चालाक आदमी होगा, उतना नैतिक होकर जीना शुरू करेगा।

नैतिकता अक्सर चालाकी का हिस्सा होती है। धर्म भोलेपन का परिणाम है, निर्दोषता का, नैतिकता चालाकी का, हिसाब का,। कैलकुलेशन का, अनैतिकता नासमझी का परिणाम है, अज्ञान का। समझ लें। अनैतिकता नासमझी का परिणाम है, अज्ञान का, नैतिकता होशियारी का, चालाकी का, गणित का, धर्म निर्दोष साहस का।

लेकिन समाज जोर देता है कि जो नैतिक नहीं है, वह धार्मिक नहीं हो सकेगा। इसलिए अगर परमात्मा तक जाना है, तो नैतिक बनो! समाज का जोर ठीक है।

समाज इस जोर को दिए बिना जी नहीं सकता। समाज को जीना हो, तो उसे नैतिकता की पूरी की पूरी व्यवस्था कायम करनी ही पड़ेगी। वह नेसेसरी ईविल है, जरूरी बुराई है। जब तक कि सारी पृथ्वी धार्मिक न हो जाए, तब तक नैतिकता की कोई न कोई व्यवस्था करनी ही पड़ेगी; क्योंकि अनैतिक होकर जीना इतना असंभव है। तो नैतिकता की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

अगर दस चोर भी चोरी में कोई संगठन कर लेते हैं, तो भी अपने भीतर एक नैतिकता की व्यवस्था उन्हें निर्मित करनी पड़ती है। दस चोरों को भी! समाज के साथ वे अनैतिक होते हैं, लेकिन अपने भीतर, उनके गिरोह के भीतर अतिनैतिक होते हैं। और यह मजे की बात है कि चोर जितने नैतिक होते हैं अपने मंडल में, उतने साधु भी अपने मंडल में नैतिक नहीं होते!

उसका कारण है। उसका कारण है कि चोर भलीभांति समझता है कि अनैतिक होकर जब समाज में जीना इतना असंभव है और मुश्किल है, तो अगर हम अनैतिक भीतर भी हो गए, तो हमारा जो आल्टरनेटिव समाज है, जो वैकल्पिक समाज है, वह भी मुश्किल हो जाएगा। हम पूरे समाज के खिलाफ तो जी ही रहे हैं, वह मुश्किल हो गया है। अब अगर हम दस लोग भी, जो खिलाफ होकर जी रहे हैं, हम भी अगर अनैतिक व्यवहार करें, और रात में हम भी एक—दूसरे की जेब काट लें, और वायदा दें और पूरा न करें, तो फिर हमारा जीना असंभव हो जाएगा।

इसलिए चोरों की अपनी नैतिक व्यवस्थाएं होती हैं। उनका अपना मारल कोड है। और ध्यान रहे, साधुओं से उनका मारल कोड हमेशा श्रेष्ठतर साबित हुआ है। उसका कारण है। उसका कारण है कि साधु तो समाज के साथ नैतिक होकर जीता है। उसे कोई अलग समाज नैतिक बनाकर जीने की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए दो साधुओं को इकट्ठा करना मुश्किल मामला है। दो साधुओं को इकट्ठा करना मुश्किल मामला है। सौ—पचास साधुओं को इकट्ठा करना उपद्रव लेना है! लेकिन सौ चोरों को इकट्ठा करें, तो एक बहुत नैतिक समाज उनके भीतर निर्मित हो जाता है।

बुरे आदमी की अपनी नैतिक व्यवस्था है, क्योंकि वह यह समझता है कि बिना उस व्यवस्था के जीना असंभव है। बाहर तो वह लड़ ही रहा है, अगर भीतर अपने गिरोह में भी लड़े, तो अति कठिनाई हो जाएगी।

समाज को नैतिकता की व्यवस्था जारी रखनी ही पडेगी, क्योंकि आदमी इतना अज्ञानी है। लेकिन समाज यह भी जोर देता है कि जब तक कोई नैतिक न होगा, तब तक वह धार्मिक नहीं हो सकता। यह वक्तव्य जरूरी है, लेकिन खतरनाक है और असत्य है। सचाई उलटी है। सचाई यह है कि जब तक कोई धार्मिक न होगा, तब तक उसकी नैतिकता आरोपित, थोपी हुई, ऊपर से लादी हुई होगी, अस्थाई होगी, आंतरिक नहीं होगी, आत्मिक नहीं होगी।

धार्मिक होकर ही व्यक्ति के जीवन में नीति का आविर्भाव होता है। उस नीति का, जो किसी भय के कारण नहीं थोपी गई होती। न किसी प्रलोभन, न किसी पुरस्कार के लिए, न स्वर्ग के लिए; न नर्क के डर से, न स्वर्ग के लोभ से, न प्रतिष्ठा के लिए, न सम्मान के लिए, न सुविधा के लिए, बल्कि इसलिए कि भीतर अब नैतिक होने में ही आनंद मिलता है और अनैतिक होने में दुख मिलता है। लेकिन ऐसी नैतिकता का जन्म धर्म के बाद होता है।

तो कृष्ण ने इस में एक सूत्र कहा है, और वह सूत्र समझने जैसा है। वह कहा है, अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ, मुझे निरंतर भजता है, वह साधु मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

यहां साधु की परिभाषा में कृष्ण ने हैरानी की बात कही है। साधु से सामान्यतया हम समझते हैं, सदाचारी। साधु का अर्थ होता है, सदाचारी; असाधु का अर्थ होता है, दुराचारी। यहां कृष्ण कहते हैं,। अतिशय दुराचारी भी यदि मेरी भक्ति में अनन्य भाव से डूबता है, तो वह साधु है।

यहां साधु की पूरी परिभाषा बदल जाती है। साधु का अर्थ ही होता है, सदाचारी। यहां कृष्ण कहते हैं, अतिशय दुराचारी भी साधु कहा जाने योग्य है! फिर साधु की क्या परिभाषा होगी?

कृष्ण कहते हैं, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है—ए फर्म डिटरमिनेशन।

एक यथार्थ निश्चय यहां साधु की परिभाषा है। और वह यथार्थ निश्चय क्या है? वह यथार्थ निश्चय है, प्रभु के स्मरण का। वह यथार्थ निश्चय है, प्रभु के प्रति समर्पण का। वह यथार्थ निश्चय है, उसकी अनन्य भक्ति का।

यहां दो—तीन बातें हम समझ लें। एक तो यथार्थ निश्चय वाले को साधु कहना बड़ी नई बात है। आपको इस सूत्र को पढ़ते वक्त खयाल में न आई होगी। क्योंकि यह तो कृष्ण यह कह रहे हैं कि असाधु भी साधु है, अगर वह यथार्थ निश्चय वाला है। असाधु का मतलब होता है, दुराचारी। असाधु को भी साधु जानना, अगर वह यथार्थ निश्चय वाला है, और उसका निश्चय मेरी तरफ गतिमान हो गया है।

तो दो बातें। यथार्थ निश्चय का क्या अर्थ है? यथार्थ निश्चय के दो अर्थ हैं। एक, समग्र हो, उसके विपरीत कोई भी भाव मन में न हो, तो ही यथार्थ होगा, अन्यथा डावाडोल होता रहेगा। पूरे मन से लिया गया हो, पूरे प्राणों ने हामी भर दी हो। अगर पूरे प्राणों ने हामी भर दी हो, तो वह निश्चय यथार्थ हो जाएगा। और अगर पूरे प्राणों ने हामी न भरी हो, तो निश्चय काल्पनिक रहेगा, वास्तविक नहीं होगा। और मन डोलता रहेगा; और हम ही बनाएंगे और हम ही मिटाते रहेंगे; एक हाथ से निश्चय की ईंटें रखेंगे, दूसरे हाथ से निश्चय की ईंटों को गिरा देंगे। दोनों तरफ से हम काम करते रहेंगे, एक तरफ निर्णय लेंगे, एक तरफ निर्णय को तोड्ने का उपाय करते रहेंगे। कहीं पहुंचेंगे नहीं। यथार्थ निश्चय का अर्थ हुआ कि पूरे चित्त से लिया गया हो। 

दृढ़ निश्चय का अर्थ है कि पूरे प्राण इतने आत्मसात हैं कि चाहे हार हो, चाहे जीत; चाहे सफलता मिले, चाहे असफलता, निर्णय नहीं बदलेगा। दृढ़ निश्चय का अर्थ है, चाहे असफलता मिले, चाहे सफलता, चाहे जन्मों—जन्मों तक भटकना पड़े, निर्णय नहीं बदलेगा। खोज जारी रहेगी। सब खो जाए बाहर, लेकिन भीतर खोजने वाला संकल्प नहीं खोएगा। वह जारी रहेगा। सब विपरीत हो जाए, सब प्रतिकूल पड़ जाए, कोई साथी न मिले, कोई संगी न मिले, कोई अनुभव की किरण भी न मिले, अंधेरा घनघोर हो, टूटने की कोई आशा न रहे, तब भी।

दृढ़ निश्चय का अर्थ है, जब सब तरह से आशा टूट जाए, बुद्धि कोई जवाब न दे कि कुछ होगा नहीं अब, रास्ता समाप्त है, आगे कोई मार्ग नहीं है, शक्ति चुक गई; श्वास लेने तक की हिम्मत नहीं है, एक कदम अब उठ नहीं सकता और मंजिल कोसों तक कोई पता नहीं है, तब भी भीतर कोई प्राण कहता चला जाए कि मंजिल है, और चलूंगा; और चलता रहूंगा। यह जो आत्यंतिक संकल्प है, इसका नाम दृढ़ निश्चय है।

और कृष्ण कहते हैं, दृढ़ निश्चय साधु का लक्षण है। दुराचरण— आचरण की चिंता छोड़ देते हैं। अब इसे थोडा हम गहरे में समझेंगे, तो हमें खयाल में आएगा कि उनके छोड़ने का कारण क्या है?

क्योंकि ध्यान रहे, दुराचरण का मौलिक कारण क्या है । सदाचरण की आकांक्षा सभी में पैदा होती है, लेकिन निश्चय ही कभी दृढ़ नहीं हो पाता, तो दुराचरण पैदा होता है। दुराचरण गहरे में निश्चय की कमी है।

ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसने न चाहा हो कि क्रोध से छुटकारा मिल जाए, जिसने न चाहा हो कि झूठ बोलना बंद करूं। क्योंकि झूठ स्वयं को भी गहरे में पीड़ा देता है, और क्रोध खुद को ही जलाता है, और निंदा अपने ही मन को गंदा कर जाती है, और अनीति जिसे हम कहते हैं, वह भीतर एक कुरूपता को, एक कोढ़ को पैदा करती है। तो कौन है जिसने न चाहा हो?

लेकिन चाह से कुछ भी नहीं होता, क्योंकि चाह संकल्प नहीं बन पाती। चाहते हैं बहुत, चाहते हैं बहुत, और समय पर सब बिखर जाता है। भीतर संकल्प नहीं होता है, तो चाह सिर्फ चाह रह जाती है, निश्चय नहीं बन पाती।

तो कृष्ण कहते हैं कि अगर कोई दुराचारी भी हो, तो चिंता नहीं है; असली सवाल यह है कि उसके पास एक दृढ़ निश्चय है या नहीं है।

और यह बडे मजे की बात है कि बुरे आदमियों के पास एक तरह का निश्चय होता है, जो भले आदमियों के पास नहीं होता। बुरे आदमी अपनी बुराई में बड़े जिद्दी होते हैं। और बुरे आदमी अपनी बुराई में बड़े पक्के होते हैं। और बुरा आदमी अपनी बुराई का इस तरह पीछा करता है, जैसा कोई भला आदमी अपनी भलाई का कभी नहीं करता। और बुरा आदमी अपनी बुराई से सब तरह के कष्ट पाता है, फिर भी बुराई में अडिग बना रहता है, और भला आदमी कष्ट नहीं भी पाता, फिर भी डांवाडोल होता रहता है!

कहीं ऐसा तो नहीं है, जिसे हम भला आदमी कहते हैं, वह सिर्फ भय के कारण भला होता है, उसके पास दृढ़ निश्चय नहीं होता? ऐसा तो नहीं है कि जो चोरी नहीं करता, वह इसलिए चोरी न करता हो, क्योंकि पकड़े जाने का डर है। ऐसा तो नहीं है कि इसलिए चोरी न करता हो कि नर्क में कौन भुगतेगा! ऐसा तो नहीं है कि इसलिए चोरी न करता हो कि बदनामी हो जाएगी। कहीं ऐसा तो नहीं है कि चोरी न करना, केवल गहरे में कायरता हो। कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह आदमी अहिंसक बनकर बैठ गया है। वह कहता है, हम किसी को मारना नहीं चाहते, क्योंकि गहरे में वह जानता है कि मारोगे तो पिटने की तैयारी होनी चाहिए। क्योंकि कोई भी आदमी मारने जाए और मार खाने की तैयारी न रखता हो, तो कैसे जाएगा? तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि सारी अहिंसा केवल भीतर की कायरता का बचाव हो, कि न मारेंगे, न मारे जाएंगे। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मार खाकर भी अपने को बचा लेने की तरकीब हो, कि तुम कितना ही मारो, हम तो अहिंसक हैं, हम जवाब न देंगे।

भला आदमी जिसे हम कहते हैं, सौ में नब्बे मौके पर कमजोरी के कारण भला होता है। इसीलिए तो भलाई इतनी कमजोर है दुनिया में ,और बुराई इतनी मजबूत है। और बुरे आदमी को दो सजाएं, और बुरे आदमी को अपराध में दंड दो, जेलखानों में रखो, फांसिया लगाओ। और बुरा आदमी है कि परसिस्ट करता है, अपनी बुराई पर मजबूत रहता है। एक बात का तो आदर करना ही पड़ेगा कि उसकी मजबूती गहरी है; उसकी बुराई बुरी है, लेकिन उसकी मजबूती बड़ी गहरी है और बड़ी अच्छी है।

तो कृष्ण कहते हैं कि अगर कोई आदमी दृढ़ निश्चय वाला है और दुराचारी भी है, तो भी उसे साधु समझना; क्योंकि अगर वह अपने दृढ़ निश्चय को मेरी ओर लगा दे, तो सब रूपांतरण हो जाएगा।  जरा—सी घटना, इतनी—सी घटना से इतनी बड़ी क्रांति कैसे होती होगी? क्योंकि आचरण जन्मों—जन्मों का बुरा हो, तो क्षणभर में सदाचरण कैसे बन जाएगा?

एक ही बात हो सकती है कि उस दुराचरण के पीछे जो दृढ़ संकल्प था, वह दृढ संकल्प अगर अब सदाचरण के पीछे लग जाए, तो क्षणभर में क्रांति हो जाएगी। क्योंकि वह दुराचरण भी उस संकल्प के कारण ही चलता था। बुरे आदमी मजबूत होते है, पागल होते हैं, जो करते हैं, उसको बिलकुल पागलपन से करते हैं।

कृष्ण कहते हैं, दुराचार असली सवाल नहीं है, असली सवाल यह है कि वह जो भीतर संकल्प की क्षमता है, दृढ़ निश्चय है। एक। और दूसरी बात, अकेला दृढ निश्चय ही हो, तो काफी नहीं है, क्योंकि दृढ़ निश्चय से आप बुरा भी कर सकते हैं, भला भी कर सकते हैं। दृढ़ निश्चय तो तटस्थ शक्ति है। इसलिए दूसरी शर्त है, अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ निरंतर मुझे भजता है, वह साधु मानने योग्य है। और शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाएगा। शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाएगा।

यह जो दृढ़ निश्चय की चेतना है, इसका क्या अर्थ है? अगर हम अपनी चेतना को समझें, तो हमारी चेतना ऐसी है, जैसे किसी कुएं में बाल्टी डालें, और छेद ही छेद वाली बाल्टी हो। फिर कुएं से खींचें पानी को, तो पानी भरेगा तो जरूर, पहुंचेगा नहीं। भरेगा तो जरूर, और जब तक बाल्टी पानी में डूबी रहेगी, पूरी भरी मालूम पड़ेगी, लबालब, और जैसे ही पानी से खींचना शुरू हुआ कि बाल्टी खाली होनी शुरू हो जाएगी। बडा शोरगुल मचेगा कुएं में, क्योंकि सब धाराओं से पानी नीचे गिरेगा। आवाज बहुत होगी, हाथ कुछ भी न आएगा। हाथ खाली बाल्टी लौट आएगी।

हमारी चेतना ऐसी है। इतने छिद्र हैं हमारे संकल्प में कि कई बार भर लेते हैं बिलकुल, और ऐसा लगता है कि सब ठीक हो गया। बस, पानी में डूबी रहे, तभी तक। पानी में डूबी रहने का अर्थ, जब तक कल्पना में डूबी रहे, तब तक। तब तक सब ठीक हो जाता है। आज साझ तय कर लेते हैं, तब लगता है कि बिलकुल साधु हो गया मैं अब, अब कुछ कारण नहीं रहा। रात बिलकुल साधु की तरह सो जाता हूं। और सुबह हाथ खाली बाल्टी! बड़ा रातभर शोरगुल होता है, बड़ी आवाजें आती हैं कि भरकर बाल्टी आ रही है।

ध्यान रहे, जब भरकर बाल्टी आती है, तो आवाज बिलकुल नहीं होती; और जब खाली बाल्टी आनी होती है, तो आवाज बहुत होती है।

हमारे मन में कितनी आवाज चलती है! रोज—रोज निर्णय करते हैं, रोज—रोज बिखर जाते हैं। और धीरे— धीरे हम भलीभांति जान जाते हैं कि हमारे निर्णय का कोई भी मूल्य नहीं है। जिस दिन हमें यह अनुभव हो जाता है कि हमारे निर्णय का कोई भी मूल्य नहीं है, हमारे संकल्प की कोई क्षमता नहीं है, उसी दिन समझना आपकी मृत्यु हो गई। शरीर कुछ दिन चलेगा, वह अलग बात है, आप मर गए, आत्मिक रूप से आप मर गए। लाशें जी सकती हैं, जीती हैं, मुर्दे चल सकते हैं, चलते हैं, लेकिन जिस दिन पता आपको चल गया कि आपके पास कोई संकल्प नहीं है, उसी दिन आप मर गए।

तो हम अपने को धोखा देते रहते हैं; यह भी पता नहीं चलने देते। रोज—रोज नए संकल्प करते रहते हैं। और क्षुद्रतम संकल्प भी कभी पूरे होते नहीं दिखाई पड़ते। बहुत क्षुद्र संकल्प करिए, और आपकी छिद्रों वाली बाल्टी उसको बहाकर रख देगी!

हमारी चेतना ऐसी है, बहुत छिद्रों वाली। जितने ज्यादा छिद्र होंगे, उतना ही संकल्प मुश्किल हो जाएगा। दृढ संकल्प का अर्थ है, जिस बाल्टी में कोई छिद्र नहीं है। उसका अर्थ हुआ कि जो चेतना अपने संकल्प से अपने को भर लेती है, तो बिखर नहीं पाती, बिखराव नहीं होता। क्या करें कि ऐसा हो जाए?

यह तो हम जानते हैं कि छिद्रों वाली हमारी चेतना है। क्या करें? क्या करें कि ये छिद्र बंद हो जाएं? इनसे हमारा छुटकारा हो जाए! पहली बात, कभी भी बडे संकल्प मत करें। बचपन से ही हम हर आदमी को बड़े संकल्प करवाने की शिक्षा देते हैं, उससे असफलता हाथ लगती है। बहुत छोटे संकल्प करें। असली सवाल संकल्प का बड़ा होना और छोटा होना नहीं है, असली सवाल संकल्प का सफल होना है। बहुत छोटे संकल्प करें, लेकिन संकल्पों को सफलता तक पहुंचाएं। बडे संकल्प मत करें। क्योंकि अगर असफलता मिलती है, तो धीरे—धीरे भीतर हीनता गहरी होती चली जाती है। हर असफलता एक छिद्र बन जाती है। हर असफलता एक छिद्र बन जाती है। हर सफलता छिद्रों का रुकना बन जाती है। बहुत छोटे संकल्प करें, बड़े संकल्प का कोई सवाल नहीं है।

तिब्बत में, जब कोई साधु प्रवेश करता है किसी आश्रम में, तो बड़े छोटे संकल्पों की शिक्षा देते हैं, बहुत छोटा संकल्प। साधु को कह देते हैं, बाहर दरवाजे पर बैठ जाओ। आंख बंद रखना, और जब तक गुरु आकर न कहे, तब तक आंख मत खोलना।

यह कोई बड़ा संकल्प नहीं है। कौन—सा बड़ा संकल्प है! आप कहेंगे, आंख बंद रख लेंगे। लेकिन बंद रखकर जब बैठेंगे दो —चार घंटे, तब पता चलेगा! कई बार बीच में धोखा देने का मन आएगा। कई बार जरा—सी आंख खोलकर देख लेने का मन होगा कि अभी तक गुरु आया कि नहीं आया , कौन गुजर रहा है? नहीं तो कम से कम घड़ी का जरा—सा खयाल आ जाएगा कि कितना बज गया? कितनी देर हो गई? और मन इतना बेईमान है कि आपको पता भी नहीं चलेगा और आप कर गुजरेंगे।

बहुत छोटा—सा संकल्प है, लेकिन बैठा हुआ है व्यक्ति, आंख बंद किए हुए बैठा है। छ: घंटे बीत गए हैं, वह आंख बंद किए हुए बैठा है। कोई बड़ा काम नहीं करवाया गया है। लेकिन छ: घंटे भी अगर उसने ईमानदारी से, आथेटिकली, प्रामाणिक रूप से आंख बंद रखी है, तो छ: घंटे के बाद उस आदमी की बाल्टी के कई छेद बंद हो गए होंगे। यह छोटा—सा प्रयोग है। कोई बहुत बड़ा प्रयोग नहीं है। बहुत छोटा—सा प्रयोग है।

सब धर्मों के पास छोटे—छोटे प्रयोग हैं। वे छोटे—छोटे प्रयोग धर्म के लिए नहीं हैं, संकल्प के लिए हैं। समझ लें, कोई धर्म कहता है कि आज उपवास कर लें। कोई धर्म कहता है, आज यह नहीं खाएंगे। कोई धर्म कहता है, आज यह नहीं पहनेंगे। कोई धर्म कहता है, आज रात सोएंगे नहीं। कोई धर्म कहता है, दिनभर खाना नहीं खाएंगे, रात खाना खाएंगे। इनका धर्म से कोई भी सीधा संबंध नहीं है। इन सबका संबंध संकल्प के, वह जो छिद्रों वाली बाल्टी है, उसको भरने से है।

लेकिन जैसा मैंने कहा कि आंख खोलकर धोखा देने का मन होगा, वह तो समझ में भी आ जाएगा, क्योंकि आंख खोलनी पड़ेगी। अगर आपने एक दिन का उपवास किया है, तो वह उपवास उसी वक्त टूट जाता है, जिस वक्त भोजन का खयाल आ जाता है और आप कल्पना में भोजन करना शुरू कर देते हैं। उसी वक्त टूट जाता है। फिर उपवास रखने का कोई मूल्य नहीं रह गया। कोई मूल्य नहीं रह गया।

और आमतौर से साधक, जो उपवास करते हैं, वे क्या करते हैं? जैसे जैनों में उपवास के संकल्प का बहुत प्रयोग किया गया है। तो जब वे उपवास करेंगे उनके पर्युषण में, तो उपवास करके मंदिर में पहुंच जाएंगे! साधु की चर्चा सुनेंगे, शास्त्र सुनेंगे, मंदिर में बैठे रहेंगे। न भोजन दिखाई पड़ेगा, न भोजन की चर्चा होगी, न उसकी याद आएगी। इसलिए बचाव करेंगे वहां जाकर।

यह धोखा है। भोजन करने या नहीं करने का मूल्य नहीं है, मूल्य तो संकल्प को जगाने का है। तो मैं आपसे कहता हूं कि जिस दिन उपवास करें, उस दिन तो चौके में ही अड्डा जमा दें; उस दिन चौका छोड़ना ही नहीं है। और जितनी अच्छी चीजें आपको पसंद हों, सब बनवाकर अपने चारों तरफ रख लें, और बीच में ध्यानस्थ होकर बैठ जाएं। एक—एक चीज पर ध्यान दें, और भीतर भी ध्यान जारी रखें कि भोजन करने का खयाल उठे.?।

और आप हैरान होंगे कि मंदिर में भोजन का खयाल आ जाएगा, चौके में नहीं आएगा! और ऐसा कोई नियम न बनाएं कि करेंगे ही नहीं। अगर खयाल आता है, तो खयाल करने की बजाय भोजन कर लेना बेहतर है। क्योंकि खयाल ज्यादा गहरे जाता है, भोजन उतना गहरा नहीं जाता। भोजन शरीर में जाता है, शरीर से निकल जाता है; खयाल संकल्प में चला जाता है, और संकल्प में छेद कर जाता है। छोटे—छोटे संकल्पों की साधना से गुजरना जरूरी है। बड़े संकल्प मत करें। जो पूरे न हो सकें, उनको छुए ही मत, जो पूरे हो सकें, उनको ही छुए।


ध्यान रहे, जो भी संकल्प लें, वह पूरा हो सके, तो ही लें; अन्यथा मत लें; न लेना बेहतर है। एक दफा उनका टूटना, खतरनाक छेद छूट जाते हैं। और हर बच्चे की जिंदगी में जो इतने छेद बन जाते हैं, उसके लिए हम जिम्मेवार हैं; शिक्षक, मां—बाप, समाज, सब जिम्मेवार हैं। न मालूम क्या—क्या उनको करवाने की कोशिश करते हैं, जो वे नहीं कर पाएंगे। उनका संकल्प टूट जाएगा। छेद—छेद आत्मा हो जाएगी। फिर दृढ़ संकल्प होना बहुत मुश्किल है।

और दूसरी बात; दृढ़ संकल्प बनाने की दिशा में बढ़े। छोटे—छोटे संकल्प करें, उन्हें पूर्ण करें। धीरे— धीरे आप पाएंगे कि आप भी कुछ कर सकते हैं। और कोई जरूरत नहीं है कि बहुत बड़े—बड़े काम में लगें, बहुत छोटे—से काम में लगें, कि एक मिनट तक मैं इस अंगुली को ऊपर ही रखूंगा, नीचे नहीं गिराऊंगा।

अब इसमें कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन आप पाएंगे, एक मिनट में पच्चीस दफे मन होगा कि क्या कर रहे हो? नीचे कर लो! क्या फायदा? कोई देख न ले कि यह अंगुली ऊंची क्यों रखे हुए हो! कोई यह न समझ जाए कि पागल हो गए हो!

कृष्ण कहते हैं, ऐसा गहरा संकल्प जिसका हो, और इस संकल्प को वह मेरे भजन में लगा दे, मेरे स्मरण में लगा दे, यह जो संकल्प की धारा है, यह मेरी तरफ बहने लगे।

एक दूसरे प्रतीक से हम समझ लें।

हम ऐसी नदी हैं, जौ कई दिशाओं में बह रही है। तो सागर तक हम नहीं पहुंचते, हर जगह रेगिस्तान आ जाता है। अगर गंगा भी कई दिशाओं में बहे, तो सागर तक नहीं पहुंचेगी; सब जगह रेगिस्तान में पहुंच जाएगी। जहां भी पहुंचेगी, वहीं रेगिस्तान होगा। सागर तक पहुंचती है, क्योंकि एक दिशा में बहती है।

दूसरा ध्यान रख लें कि आपकी चेतना अगर बहुत दिशाओं में बहती रहे, तो आपकी जिंदगी एक मरुस्थल हो जाएगी, एक रेगिस्तान। सब सूख जाएगा, और सब जगह मार्ग खो जाएगा। लेकिन अगर एक दिशा में बह सके, तो किसी दिन सागर पहुंच सकती है।

अनन्य भाव से जो मुझे स्मरण करता है, अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ...।

इसका केवल इतना ही अर्थ है कि चाहे वह कुछ भी करता हो, लेकिन उसकी चेतना की धारा मेरी ओर उन्‍मुख बनी रहती है। वह कुछ भी करता हो।

कभी आप देखें किसी घर में, मां अंदर खाना बना रही है, खाना बनाती है, बर्तन मल रही है, बुहारी लगा रही है, लेकिन उसकी चेतना की धारा उसके बच्चे की तरफ लगी रहती है। शोरगुल हो रहा हो, तूफान हो. बाहर आंधी हो, हवा चल रही हो, बैंड—बाजे बज रहे हों, बादल गरज रहे हों, बिजली कड़क रही हो, लेकिन बच्चे की जरा सी रोने की आवाज उसे सुनाई पड़ जाती है। रात मां सोई हो—मनसविद भी बहुत हैरान हुए हैं—मां सोई हो, तो। आकाश में बादल गरजते रहें, उसकी नींद नहीं टूटती! और बच्चा जरा—सा कुनमुन कर दे, और उसकी नींद टूट जाती है! बात क्या होगी? क्या होगा इसका कारण?

इसका एक ही कारण है, एक अनन्य धारा, एक प्रेम का अनन्य भाव बहा जा रहा है। दो उपाय हैं। एक तो यह है कि कहीं भगवान है, आप सब तरफ से अपने ध्यान को खींचकर भगवान पर ले जाएं। यह बहुत मुश्किल है; इसमें आप हारेंगे; इसमें जीत की संभावना न के बराबर है। कभी हजार में एक आदमी जीत पाता है सब तरफ से खींचकर भगवान की तरफ ले जाने में। कठिन है। शायद नहीं हो पाएगा।

पर एक बात हो सकती है, जहां भी ध्यान जा रहा हो, वहीं भगवान को रख लें। 

यह जो क्रांति की संभावना है, यह अनन्य भाव से उसकी भक्ति में है।

तो कृष्ण कहते हैं कि वह दुराचारी भी हो, कोई फिक्र नहीं। लेकिन मुझे देखने लगे अपने कर्मों में, चारों तरफ मुझे अनुभव करने लगे, सब ओर मेरी प्रतीति उसमें गहरी होती चली जाए, मेरे स्मरण का तीर उसमें गहरा होता चला जाए, तो शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है।

सदाचारी नहीं कहते वे। कहते हैं, धर्मात्मा। सदाचार से बड़ी ऊंची बात है। धर्मात्मा का अर्थ है, जिसकी आत्मा धर्म हो जाती है। आचरण तो अपने आप ठीक हो जाता है। आचरण तो गौण है, आदमी के पीछे छाया की तरह चलता है। चूंकि भीतर हम कुछ भी नहीं हैं, इसलिए बाहर सब अस्तव्यस्त है। जिस दिन भीतर हम कुछ हो जाते हैं, बाहर सब सुव्यवस्थित हो जाता है। भीतर के मालिक को सिंहासन पर बिठा दें, बाहर के सब नौकर—चाकर हाथ जोड़कर सेवा में रत हो जाते हैं। भीतर का मालिक बेहोश पडा है।

सिंहासन से नीचे औंधा पड़ा है। मुंह से उनके फसूकर निकल रहा है। भीतर के मालिक इस हालत में हैं, बाहर सब नौकर—चाकर गड़बड़ में हो जाते हैं।

जिसको हम अनीति कहते हैं, वह हमारी इंद्रियों के ऊपर मालिक का अभाव है, अनुपस्थिति है। वहा मालिक मौजूद ही नहीं है,। बेहोश पड़ा है। तो ठीक है, जिसको जो सूझ रहा है, वह कर रहा है। इसमें इंद्रियों की कोई गलती भी नहीं है। इंद्रियों को दोष देना मत, इंद्रियों की कोई भी गलती नहीं है। इंद्रियों को कोई देखने वाला ही नहीं है, दिशा देने वाला नहीं है, सूचना देने वाला नहीं है। और तब इंद्रियों से जो बनता है, वह करती हैं।

और सब इंद्रियां अलग—अलग हैं, उनके बीच कोई एकसूत्रता नहीं रह जाती। कैसे रहेगी? एकसूत्रता जिससे मिल सकती है, वह सोया हुआ है। तो जब सोया हुआ है सूत्र मूल, जो सबको जोड़ता। है, तो कान कुछ सुनते हैं, आंखें कुछ देखती हैं, हाथ कुछ खोजते हैं, पैर कहीं चलते हैं, मन कहीं भागता है, सब अस्तव्यस्त हो जाता है। नदी कई धाराओं में बंट जाती है। फिर एक दिशा नहीं रह जाती। धर्मात्मा हो जाता है वह व्यक्ति। उसकी आत्मा ही धर्म हो जाती है। फिर आचरण तो अपने आप बदल जाता है। सदा रहने वाली शांति को उपलब्ध होता है।

अनैतिक व्यक्ति शांति को उपलब्ध नहीं होता। कैसे होगा? बुरा करेगा दूसरों के साथ, दूसरे उसके साथ बुरा करेंगे। नैतिक व्यक्ति भी शांति को उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि बुराई को दबाता है; बुराई भीतर धक्के मारती है कि मुझे मौका दो। भीतर अशांति हो जाती है।  

अनैतिक व्यक्ति को अशांति झेलनी पड़ती है, दूसरों और स्वयं के बीच में। नैतिक व्यक्ति को झेलनी पड़ती है, अपने ही भीतर। अनैतिक डरा रहता है कि बाहर कहीं फंस न जाए। नैतिक डरा रहता है कि भीतर जिसको दबाया है, कहीं वह निकल न आए। दोनों ही अशांत होते हैं।

केवल सदा रहने वाली शांति को वही उपलब्ध होता है, जो भीतर धर्मात्मा हो जाता है। धर्मात्मा का अर्थ है, जिसकी आत्मा प्रभु में स्थापित हो जाती है। प्रभु की तरफ दौड़ते—दौड़ते बहकर नदी सागर में गिर जाती है। जिस दिन सागर और नदी का मिलन होता है, जहां सागर और नदी का संगम होता है, वहीं धर्मात्मा का जन्म होता है। जिस दिन आत्मा परमात्मा से मिलती है, वह जो संगम—स्थल है, वहीं धर्मात्मा का जन्म है। फिर कोई अशांति नहीं है, न बाहर, न भीतर।

हे अर्जुन, तू निश्चयपूर्वक जान, मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है।

नष्ट होने का कोई कारण ही न रहा। नष्ट तो वे ही होते हैं, जो अशांत हैं। बिखरते तो वे ही हैं, जो भीतर टूटे हुए हैं। जो भीतर एक हो गया, संयुक्त हो गया, उसके नष्ट होने का कोई कारण नहीं है। और अब हम पहले सूत्र को लें।

मैं सब भूतों में सम— भाव से व्यापक हूं। न कोई मेरा अप्रिय है और न कोई प्रिय। परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं उनमें प्रकट हो जाता हूं।

सब भूतों में सम— भाव से हूं।

ऐसा नहीं है कुछ, जैसा लोग कहते हैं अक्सर कि फलां व्यक्ति पर परमात्मा की बड़ी कृपा है। परमात्मा की कृपा किसी पर भी कम—ज्यादा नहीं है। भूलकर इस शब्द का उपयोग दोबारा मत करना। एक आदमी कहता है कि प्रभु की कृपा है। उसका मतलब कहीं ऐसा तो नहीं है कि कभी उसकी अकृपा भी होती है? या एक आदमी कहता है कि मुझ पर अभी प्रभु की कोई कृपा नहीं है। तो उसका अर्थ हुआ कि उसकी अकृपा होगी!

नहीं, उसकी अकृपा होती ही नहीं। इसलिए उसकी कृपा का कोई सवाल नहीं है। वह सम— भाव से सबके भीतर मौजूद है। यह कहना भी भाषा की कठिनाई है, इसलिए; अन्यथा सब में वही है, या सब वही है। जरा भी, रत्तीभर फर्क नहीं है। कृष्ण में या अर्जुन में, मुझ में या आप में, आप में या आपके पड़ोसी में, आप में या वृक्ष में, आप में या पत्थर में, जरा भी फर्क नहीं है।

लेकिन फर्क तो दिखाई पड़ता है! कोई बुद्ध है। कैसे हम मान लें कि बुद्ध में वह ज्यादा प्रकट नहीं हुआ है! कैसे हम मान लें कि बुद्ध में वह ज्यादा नहीं है, और हम में, हम में भी उतना ही है! कठिनाई है। साफ दिखाई पड़ता है। गणित कहेगा, नाप—जोख हो सकती है कि बुद्ध में वह ज्यादा है, कृष्ण में वह ज्यादा है। इसीलिए तो हम कहते हैं, कृष्ण अवतार हैं, बुद्ध अवतार हैं, महावीर तीर्थंकर हैं, जीसस भगवान के पुत्र हैं, मोहम्मद पैगंबर हैं, आदमियों से अलग करते हैं उन्हें। उनमें वह ज्यादा दिखाई पड़ता है।

लेकिन कृष्ण कहते हैं, मैं सम— भाव से व्यापक हूं। फिर भेद कहां पड़ता होगा? न मेरा कोई अप्रिय है और न मेरा कोई प्रिय।

प्रेम जब पूर्ण होता है, तो न कोई अप्रिय रह जाता, न कोई प्रिय। क्योंकि जब तक मैं कहता हूं कोई मुझे प्रिय है, तो उसका अर्थ है कि कोई मुझे अप्रिय है। और जब तक मैं कहता हूं कोई मुझे प्रिय है, उसका यह भी मतलब है कि जो मुझे प्रिय है, वह कल अप्रिय भी हो सकता है, क्योंकि आज जो अप्रिय है, वह कल प्रिय हो सकता है। जब प्रेम पूर्ण होता है, तो न कोई अप्रिय होता, न कोई प्रिय होता। और न आज प्रिय होता और न कल अप्रिय होता। ये सारे भेद गिर जाते हैं। परमात्मा पूर्ण प्रेम है, इसलिए कोई उसका प्रिय नहीं है और कोई अप्रिय नहीं है।

परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं उनमें प्रकट हूं।

यह फर्क है, यहीं भेद है। यहीं बुद्ध कहीं भिन्न, महावीर कुछ और, और हम कुछ और मालूम पड़ते हैं।

जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं, मैं उनमें प्रकट हो जाता हूं; जो मुझे नहीं भजते हैं, उनमें मैं अप्रकट बना रहता हूं।

व्यापकता में भेद नहीं है, लेकिन प्रकट होने में भेद है।

एक बीज है। बीज को माली ने बो दिया, अंकुरित हो गया। एक बीज हम अपनी तिजोड़ी में रखे हुए हैं। दोनों बीजों में जीवन समान रूप से व्यापक है! और दोनों बीजों में संभावना पूरी है। लेकिन एक बीज बो दिया गया और एक तिजोड़ी में बंद है। जो बो दिया गया, वह अंकुरित हो जाएगा। जो अंकुरित हो जाएगा, उसमें फूल लग जाएंगे। कल हम अपने तिजोड़ी के बीज को निकालें, और उस वृक्ष के पास जाकर कहें कि तुम दोनों समान हो, हमारा तिजोड़ी का बीज मानने को राजी नहीं होगा।

वह कहेगा कैसे समान? कहां यह वृक्ष, जिस पर हजारों पक्षी गीत गा रहे हैं। कहां यह वृक्ष, जिसके फूलों की सुगंध दूर—दूर तक फैल गई है। कहां यह वृक्ष, जिससे सूरज की किरणें रास रचाती हैं। कहां यह वृक्ष और कहां मैं, बंद पत्थर की तरह! कुछ भी तो मेरे पास नहीं है। मैं दीन—दरिद्र, मेरे पास कोई आत्मा नहीं है, कोई फूल, कोई सुवास नहीं है। मुझे इस वृक्ष के साथ एक कहकर क्यों मजाक उड़ाते हो? क्यों व्यंग करते हो?

लेकिन हम जानते हैं, उन दोनों में वृक्ष सम— भाव से व्यापक है। पर एक में प्रकट हुआ, क्योंकि खाद मिली, जमीन में पड़ा, पानी पड़ा, सूरज के लिए मुक्त हुआ, उठा, हिम्मत की, साहस जुटाया, संकल्प बनाया, आकाश की तरफ फैला, अज्ञात में गया, अनजान की यात्रा पर निकला, तो वृक्ष हो गया है।





कृष्ण कहते हैं, जो मुझे प्रेम से भजते हैं!

यह प्रेम से भजना ही बीज को जमीन में डालना है। प्रेम से भजने का अर्थ है कि जो आदमी दिन—रात प्रभु को सब तरफ स्मरण करता है, उसके चारों तरफ प्रभु की भूमि निर्मित हो जाती है—चारों तरफ। उठता है तो, बैठता है तो, खाता है तो, प्रभु को स्मरण करता रहता है। चारों तरफ धीरे—धीरे, उसकी चेतना के बीज के चारों तरफ प्रभु की भूमि इकट्ठी हो जाती है। उसी भूमि में बीज अंकुरित होता है। निश्चित ही, जमीन में बीज को गाड़ना पड़ता है। तो प्रकट बीज है, प्रकट जमीन है। यह जो चेतना का बीज है, अप्रकट है, अप्रकट ही इसकी जमीन होगी। उस जमीन को पैदा करना पड़ता है। चारों तरफ मिट्टी इकट्ठी करनी पड़ती है उस जमीन की। वही प्रभु की भक्ति है।

और तब वे मेरे में और मैं उनमें प्रकट होता हूं।

यह प्रकट होना भी दोहरा है। जब एक वृक्ष आकाश में खुलता है, तो दोहरी घटना घटती है। यह वृक्ष तो आकाश में प्रकट होता ही है, आकाश भी इस वृक्ष में प्रकट होता है। यह वृक्ष तो सूरज के समक्ष प्रकट होता ही है, सूरज भी इस वृक्ष के भीतर से पुन: प्रकट होता है। यह वृक्ष तो हवाओं में प्रकट होता ही है, हवाएं इस वृक्ष के भीतर श्वास लेती हैं और प्रकट होती हैं। यह वृक्ष तो प्रकट होता ही है, इस वृक्ष के साथ जमीन भी प्रकट होती है, इस वृक्ष के साथ जमीन की सुगंध भी प्रकट होती है। यह वृक्ष ही प्रकट नहीं होता, वृक्ष के साथ सारा जगत भी इसके भीतर से प्रकट होता है।

तो जब कोई एक भक्त बीज बन जाता है और अपने चारों तरफ परमात्मा के स्मरण की भूमि को निर्मित कर लेता है, तो दोहरी घटना घटती है। भक्‍त परमात्मा भक्त में प्रकट होता है। वे दोनों प्रकट हो जाते हैं। वे आमने—सामने हो जाते हैं। एनकाउंटर।

हम सब ने सदा भगवान से साक्षात्कार का मतलब ऐसा ही सोचा है कि आमने —सामने खड़े हो जाएंगे। वे मोर—मुकुट बांधे हुए खड़े होंगे, हम हाथ जोड़े, उनके घुटनों में पैर टेके खड़े होंगे!

ऐसा कहीं नहीं होने वाला है। यह तो कवि का काव्य है, और मधुर है, प्रीतिकर है, लेकिन काव्य है। वस्तुत: जो अभिव्यक्ति होगी प्रकट होने की, वह ऐसी नहीं होगी। वह तो ऐसी होगी कि जब हम अपने भीतर के बीज को तोड्ने में समर्थ हो जाएंगे, तो जो अभिव्यक्ति होगी, वह दो व्यक्ति आमने—सामने खड़े हैं ऐसी नहीं,। बल्कि दो दर्पण आमने—सामने रखे हैं।

दो दर्पण अगर आमने—सामने रखे हैं, तो पता है क्या होगा? एक दर्पण दूसरे में दिखाई पड़ेगा, दूसरा दर्पण पहले में दिखाई पड़ेगा। और फिर अनंत दर्पण, एक के भीतर, एक के भीतर, एक के भीतर दिखाई पड़ते जाएंगे। वह जो इनफिनिटी, वह जो अनंत दर्पण दिखाई पड़ेंगे, और हर दर्पण फिर उसको दिखाएगा, और फिर वह दर्पण इसको दिखाएगा। और यह अनंत होगा।

दो दर्पण एक—दूसरे के सामने हों, तो जो होगा, वही जब हमारी चेतना परमात्मा की चेतना के सामने होती है, तो होता है। अंतहीन हो जाते हैं हम। और वह तो अंतहीन है ही। अनंत हो जाते हैं हम, वह तो अनंत है ही। अनादि हो जाते हैं हम, वह तो अनादि है ही। अमृत हो जाते हैं हम, वह तो अमृत है ही। और दोनों एक—दूसरे में झांकते हैं। और यह झांकना अनंत है। इस झांकने का फिर कोई अंत नहीं होता। यह फिर कभी समाप्त नहीं होता।

तो ध्यान रखें, परमात्मा से मिलन होता है, फिर बिछुड़न नहीं होती। फिर वह मिलन अनंत है। और फिर उस मिलन की रात का कोई अंत नहीं है। उस मधुर मिलन की रात का फिर कोई अंत नहीं है। वहा से फिर कोई वापस नहीं लौटता। वहा से पुनरागमन नहीं है।

पर इसका यह अर्थ नहीं है कि परमात्मा किसी को प्रेम करता है और उसे दर्शन दे देता है, और किसी को प्रेम नहीं करता और उसको चकमा देता रहता है कि दर्शन नहीं देंगे!

नहीं, इससे कोई संबंध नहीं है। परमात्मा के प्रेम का सवाल नहीं है, आपके श्रम का सवाल है। उसकी कृपा का सवाल नहीं है, आपके संकल्प का सवाल है।

उसकी कृपा प्रतिपल बरस रही है, लेकिन आप अपने मटके को उलटा रखकर बैठे हैं। आप चिल्ला रहे हैं कि कृपा नहीं है। पास का मटका भरा जा रहा है। वह मटका सीधा रखा है, आप अपने मटके को उलटा रखे बैठे हैं। और अगर कोई आकर कोशिश भी करे आपके मटके को सीधा रखने की, तो आप बहुत नाराज होते हैं। आप कहते हैं, यह हमारा ढंग है; यह हमारी मान्यता है; यह हमारा दृष्टिकोण है; यह हमारा धर्म है, यह हमारा मत है; यह हमारे शास्त्र में लिखा है!

आप हजार दलीलें देते हैं अपने मटके को उलटा रखे रहने के लिए। और जब भी कोई अगर जोर—जबर्दस्ती आपके मटके के साथ सीधा करने की करे, तो कष्ट होता है, पीड़ा होती है, झंझट होती है; सुखद नहीं मालूम पड़ता। मटका उलटा रखा है सदा से। हमें लगता है, यही इसके रखे होने का ढंग है। फिर पास का मटका भर जाता है, तो हम चिल्लाते हैं, परमात्मा किसी पर ज्यादा कृपालु मालूम हो रहा है और हम पर कृपालु नहीं है।

परमात्मा की वर्षा निरंतर हो रही है, जो भी अपने मटके को सीधा कर लेता है, वह भर जाता है। और कोई बाधा नहीं है। आपके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। आपके अतिरिक्त और कोई आपका शत्रु नहीं है। आपके अतिरिक्त और किसी ने कभी कोई विध्‍न नहीं डाला है।

अगर आप परमात्मा से नहीं मिल पा रहे हैं, तो इसमें आपका ही हाथ है। अगर आप मिल पाएंगे, तो यह आपकी ही आपके ऊपर कृपा है। परमात्मा की कृपा का इसमें कुछ लेना—देना नहीं है। उसका प्रेम सम है। उसका अस्तित्व हमारे भीतर समान है। उसकी क्षमता, उसकी बीज— क्षमता हमारे भीतर एक—सी है। लेकिन फिर भी हम स्वतंत्र हैं। और चाहें तो उस बीज को वृक्ष बना लें, और चाहें तो उस बीज को बंद रख लें।

हम सब तिजोडियों में बंद बीज हैं। और सब अपनी—अपनी तिजोडियो पर ताले डाले हुए हैं मजबूत कि कोई खोल न दे! कहीं बीज बाहर न निकल जाए! इसके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। 

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल


गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 11

 कर्ताभाव का अर्पण


पत्रं पष्पं फलं तोर्य यो मे भक्या प्रकछीत।

तदहं भक्मुष्ठतमश्नामि प्रयतात्मन:।। 26।।

यत्करोषि यदश्नासि यज्‍जुएषि ददासि यत्।

यत्तयस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्य मदर्यणम्।। 27।।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कमंबन्धनै:।

संन्यासयोगयुक्तात्मा विख्सुाए मामुयैष्यसि।। 28।।


तथा है अर्जुन? मेरे पूजन में पत्र, पुष्य, फल, जल इत्यादि जो कुछ कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र, पुष्य,  फल आदि मैं ही ग्रहण करता है।

इसलिए हे अर्जुन तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है जो कुछ स्वधर्माचरण रूप तय करता ह्रे वह सब मेरे अर्पण कर। हम प्रकार कर्मो को मेरे अर्पण करने रूप संन्यास— योग से युक्त हुआ मन वाला तू शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त हुआ मेरे को ही प्राप्त होवेगा।


 परमात्मा की पूजा भी करनी हो, तो भी हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है उसे देने को, जिसे हम अपना कह सकें। और जो हमारा ही नहीं है, उसे देने का भी क्या अर्थ है? जो कुछ भी है, उसका ही है। तो पूजा में उसके द्वार पर भी हम जो रखेंगे, उसका ही उसे लौटा रहे हैं।

मनुष्य के पास ऐसा क्या है जो परमात्मा का दिया हुआ नहीं है? अगर उसकी ही चीजें उसे लौटा रहे हैं, तो बहुत अर्थ नहीं है। कुछ ऐसा उसे दें, जो उसका दिया हुआ न हो, तो ही पूजा में चढ़ाया, तो ही पूजा में हमने कुछ अर्पित किया।

इसे थोड़ा समझना पड़ेगा। बड़ी कठिनाई होगी खोजने में। क्योंकि क्या है जगत में जो उसका नहीं है? अगर वृक्षों से तोड़कर फूल मैं चढ़ा आता हूं उसके चरणों में, वे फूल तो उसके चरणों में चढ़े ही हुए थे! और अगर नदी का जल भरकर उसके चरणों में ढाल आता हूं तो वह नदी तो सदा से अपना सारा जल उसके चरणों में ढाल ही रही थी! मैं इसमें क्या कर रहा हूं? और इस करने से मेरे जीवन का रूपांतरण कैसे होगा?

लेकिन एक बात जरूर मनुष्य के पास ऐसी है, जो परमात्मा की दी हुई नहीं है। एक ही बात ऐसी है। कर्ता का भाव, मैं कुछ कर रहा हूं यह परमात्मा का दिया हुआ नहीं है, यह आदमी का अपना अर्जित है। यह अहंकार कि मैं कुछ कर रहा हूं आदमी की अपनी खोज है। यह आदमी का अपना आविष्कार है। और जब तक कोई आदमी इस भाव को उसके चरणों में न चढ़ा दे, तब तक वह रूपांतरण घटित नहीं होता, जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं।

इसलिए वे कहते हैं कि तू खाए तो, तू चले तो, बैठे तो, हवन करे तो, तू जो कुछ भी करे, वह सब मेरे अर्पण कर। कर्मों को मेरे अर्पण कर। कर्ता होने के भाव को मुझे अर्पण कर। और जिस क्षण तू यह कर पाएगा, उसी क्षण तू संन्यस्त हो गया।

यह बहुत अदभुत बात है। क्योंकि संन्यास का अर्थ होता है, कर्म को छोड़ देना, कर्म का त्याग। कृष्ण कर्म के त्याग को नहीं कह रहे हैं। वे कह रहे हैं, कर्म तो तू कर, लेकिन मुझे अर्पित होकर। कर्म को छोड़ नहीं जाना है, करते जाना है। लेकिन वह जो करने वाला है, उसे छोड़ देना है, वह जो भीतर मैं खड़ा हो जाता है, उसे विसर्जित कर देना है।

अहंकार अकेली चीज है आदमी के हाथ में, जो पूजा में चढ़ाई जा सकती है। वह आदमी की अपनी है, बाकी तो सब परमात्मा का है। लेकिन दो—तीन बातें और इस संबंध में समझ लेनी जरूरी होंगी। कठिन भी है उसे ही चढ़ाना। धन आदमी चढ़ा सकता है। जोश में हो, तो जीवन भी चढ़ा सकता है। गर्दन भी काटकर रख सकता है। इतना कठिन नहीं है। ऐसे भक्त हुए हैं, जिन्होंने गर्दन काटकर चढा दी, अपना जीवन समर्पित कर दिया। वह उतना कठिन नहीं है, क्योंकि जीवन भी उसी का ही है। लेकिन जिसने गर्दन चढ़ाई है, वह भी भीतर समझता रहता है कि मैं गर्दन चढ़ा रहा हूं! याद रखना, स्मरण रखना, भूल मत जाना, मैं गर्दन चढ़ा रहा हूं!

गर्दन जब कटती है, तब भी भीतर मैं खड़ा रहता है। मैं को बचाकर भी गर्दन चढ़ाई जा सकती है। और अगर मैं बच गया, तो जो हम चढ़ा सकते थे, वह बच गया, और जो चढ़ा ही हुआ था, वही वापस लौट गया। धन कोई चढ़ा दे, जीवन कोई चढ़ा दे, पद—प्रतिष्ठा कोई चढ़ा दे, सब कुछ चढ़ा दे, लेकिन पीछे मैं बच जाए, तो जो चढ़ाना था, वह बच गया और जो चढ़ा ही हुआ था, वह हमने चढ़ा दिया। और चढ़े ही हुए को चढ़ाकर हम और अपने मैं को मजबूत कर लेते हैं कि मैंने इतना चढ़ाया है। चढ़ाने वाले भी हिसाब रखते हैं!

एक आदमी कुछ दिन पहले मेरे पास आया था। उसने मुझे कहा कि मैं इतने लाख दफा राम का नाम स्मरण कर चुका हूं। वह हिसाब रखे है, कापी बनाए हुए है! सारा हिसाब है कि कितने लाख दफा उसने राम का नाम लिया। यह आदमी राम के पास भी जाएगा, तो कापी लेकर जाने वाला है। और कहेगा कि याद है? कितना मैं चिल्लाया! कितने मैंने नाम लिए! यह सब हिसाब मेरे साथ है। लोग प्रेम में भी गणित को ले आते हैं! लोग प्रार्थना में भी हिसाब, बही—खाते रख लेते हैं! सब व्यर्थ हो गया। क्योंकि यह हिसाब—किताब जो रख रहा है, वह अहंकार है। यह जो कह रहा है कि मैंने इतने नाम लिए, अब यह नाम भी संपत्ति हो गई। अब ये करोडों सिक्के हो गए मेरे पास। अब इन करोड़ों सिक्कों के साथ मैं उसके पास पहुंचूंगा।

कीर्कगार्ड ने, एक ईसाई फकीर ने और एक अदभुत विचारक ने अपनी डायरी में एक वक्तव्य लिखा है। उसने लिखा है कि मैंने सब उसके लिए चढ़ा दिया, समस्त बुरे कर्म छोड़ दिए; सब पापों से अपने को बचा लिया, सब तरह की अनीति से अपने को दूर कर लिया। एक दुर्गुण मुझ में न रहा। और तब मुझे एक दिन ऐसा पता चला कि मुझ में गुण ही गुण हैं! और मैंने पाया कि मेरे भीतर अहंकार लपट की भांति खड़ा हो गया है। और तब मुझे पता चला कि ये मेरे गुण भी मेरे अहंकार का ही भोजन बन गए हैं। यह मेरा सदाचरण भी, यह मेरा नैतिक जीवन भी, मेरे अहंकार का ही पोषण बन गया है। और उस दिन मैं रातभर रोया, उसने लिखा है, कि हे परमात्मा, इससे तो बेहतर था कि मैं पापी था, बुरा था, कम से कम यह अहंकार तो खड़ा नहीं होता था। बुराई से मैं छूट गया, अब भलाई से तू मुझे छुड़ा। यह भलाई नया कारागृह बन गई।

और ध्यान रहे, बुरे आदमी के पास जो अहंकार होता है, दीन होता है, और भले आदमी के पास जो अहंकार होता है, बड़ा सबल हो जाता है। इसलिए बुरे आदमी की बुराइयां बाहर हैं और भले आदमी की बुराई भीतर हो जाती है।

बुरा आदमी चोरी करता है, बेईमानी करता है, धोखा देता है। उसकी बुराइयां बाहर हैं। भला आदमी न चोरी करता, न बेईमानी करता। समय पर पूजा करता है, प्रार्थना करता है। नियम का पालन करता है। मर्यादा से जीता है। बाहर उसकी कोई बुराई नहीं है। लेकिन सब के मुकाबले भीतर एक बुराई खड़ी हो जाती है कि मैं भला आदमी हूं। जहां भी वह चलता है, वह भले आदमी का अहंकार साथ चलता है। इसलिए भला आदमी जब दूसरे की तरफ देखता है—तो गहरे में छान—बीन करना, तो पता चलेगा—वह ऐसे देखता है, जैसे दूसरा आदमी कीड़ा—मकोड़ा हो!

यह तो बुरे आदमी से भी बुरा होना हो गया। यह तो बुराई गहरी हो गई। और बुरे आदमी ने दूसरों के साथ बुरा किया, इस भले आदमी ने अपने साथ भी बुरा कर लिया है। और बुरे आदमी ने दूसरों को धोखा दिया था, इस भले आदमी ने अपने को भी धोखा दे लिया है।

पूजा और प्रार्थना करने वाले का भी बडा सात्विक अहंकार मजबूत हो जाता है। और ध्यान रहे, जब अहंकार सात्विक होता है, तो बहुत जहरीला हो जाता है।

कृष्ण कह रहे हैं कि तू सब छोड़ दे। बुरा— भला सब मुझ पर छोड़ दे। तू जो भी कर रहा है, उसमें तू करने वाला मत रह। तू जान कि मैं तेरे भीतर से कर रहा हूं। तू ऐसा अर्पित हो जा।

कर्म छोड़ने को वे नहीं कह रहे हैं। इसलिए कृष्ण ने जो बात कही है, वह अति क्रांतिकारी है। कर्म छुड़ा लेने में बहुत कठिनाई नहीं है। आदमी कर्म छोड़कर जंगल जा सकता है। लेकिन कर्ता छुड़ा लेना असली कठिनाई है। और आदमी जंगल भी चला जाए कर्म को छोड़कर, तो यह अकड़ साथ चली जाती है कि मैं सब कर्मों को छोड़कर चला आया हूं। कर्ता पीछे साथ चला जाता है। कर्म तो बस्ती में छूट जाएंगे, कर्ता नहीं छूटेगा। कर्ता आपके साथ जाएगा। वह आपकी भीतरी दशा है। आप मकान छोड़ देंगे, घर—दुकान छोड़ देंगे, काम— धाम छोड़ देंगे, सब तरफ से निवृत्त होकर भाग जाएंगे जंगल में, लेकिन वह जो भीतर कर्ता बैठा है, वह इस निवृत्ति के ऊपर भी सवार हो जाएगा। निवृत्ति भी उसी का वाहन बन जाएगी। और जाकर जंगल में, वह अकड़ से कहेगा कि सब छोड़ चुका हूं। यह छोड़ना कर्म हो जाएगा। यह छोड़ना कर्म हो जाएगा, यह त्यागना कर्म हो जाएगा। और अहंकार इससे भी भर लेता है।

इसलिए कृष्ण ने कहा, कर्म छोड़कर कुछ भी न होगा अर्जुन, कर्ता को छोड़ दे!

यह दुरूह है, यह अति कठिन है। क्योंकि कर्म तो बाहर हैं। और जो भी बाहर है, उसको पकड़ना भी आसान है, छोड़ना भी आसान है। जो भीतर है, उसे पकड़ने में भी जन्मों—जन्मों लग जाते हैं; उसे छोड़ना भी उतना ही कठिन है।

मेरे हाथ में कोई चीज है, उसे मैं छोड़ दूं आसान है। मेरी खोपड़ी में जब कोई चीज होती है, तो छोडनी मुश्किल हो जाती है। खोपड़ी में हो, उसे भी छोड़ा जा सकता है। लेकिन जो मेरी चेतना में प्रवेश कर जाए उसे फिर छोड़ना और भी मुश्किल हो जाता है। यह अहंकार, हमारे भीतर गया गहरे से गहरा संसार है। संसार का तीर हमारे भीतर जो गहरे से गहरे में चला गया है, उसका नाम अहंकार है; उस घाव का नाम अहंकार है। वह हमारे भीतर है। वह हमारे भीतर है। और हमारा मजा ऐसा है कि हम उस तीर को और दबाए चले जाते हैं, ताकि अहंकार और भीतर चला जाए। खाज हो जाती है न किसी को, तो खुजलाने से भी आनंद मालूम पड़ता है। अहंकार आत्मिक खाज है; उसे खुजलाने से भी आनंद मालूम पड़ता है। पीछे कितनी ही पीड़ा हो, लेकिन जब खुजाते हैं, तब लगता है, बड़ा सुख मिल रहा है! जिसको भी कभी खाज हुई हो, उसे पता होगा। लेकिन अहंकार तो सभी को हुआ है, सभी को पता होगा। उसे खुजलाने में सुख मिलता है। हालांकि सभी दुख उसी खुजलाने से पैदा होते हैं।

खाज को खुजलाने से लहूलुहान हो जाता है शरीर, पीछे पीड़ा आती है। और अहंकार को खुजलाने से आत्मा लहूलुहान हो जाती है, और जन्मों—जन्मों तक पीड़ा की सतत श्रृंखला बन जाती है। लेकिन फिर भी हम खुजलाए चले जाते हैं, और तीर को भीतर धंसाए चले जाते हैं। घाव में भी तीर लगता है, तो हमें रस आता है।

कृष्ण कहते हैं, इसको ही छोड़ दे। यह मैं कर रहा हूं इस भाव को छोड़ दे।

इस भाव को छोड़ना हो, तो दो अनिवार्य शर्तें हैं।

कहा है कृष्ण ने, उस शुद्ध बुद्धि, निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ सभी कुछ मैं ग्रहण करता हूं।

दो शब्दों का उपयोग किया है, शुद्ध बुद्धि और निष्काम प्रेमी। बुद्धि कब शुद्ध होती है? और प्रेम कब पवित्र होता है? बुद्धि तब शुद्ध होती है. .जैसा हम आमतौर से सोचते हैं, तब नहीं। हम सब सोचते हैं कि अगर बुद्धि में शुद्ध विचार हों, तो बुद्धि शुद्ध हो जाती है। इससे ज्यादा  भ्रांति की कोई दूसरी बात नहीं है। इसलिए यह समझना थोड़ा कठिन पड़ेगा। हम समझते हैं कि बुद्धि के शुद्ध होने का अर्थ है, शुद्ध विचार, अच्छे विचार, सात्विक विचार, सद विचार हों तो बुद्धि शुद्ध हो जाती है। लेकिन बुद्धि तब तक शुद्ध नहीं होती, जब तक विचार हों, चाहे वे सद विचार ही क्यों न हों। जब विचार ही नहीं रह जाते, तभी बुद्धि शुद्ध होती है।

जैसे एक आदमी के हाथ में लोहे की जंजीरें हैं। वह कारागृह में पड़ा है। कल हम उसे सोने की जंजीरें पहना दें। शायद वह खुश हो कि अब मैं स्वतंत्र हो गया, क्योंकि जंजीरें अब सोने की हो गईं।अच्छी जंजीरें, हीरे—जवाहरात जड़े हों! लेकिन वह स्वतंत्र नहीं हो गया। स्वतंत्र तो वह तभी होता है, जब जंजीरें अच्छी नहीं, जंजीरें होती ही नहीं!

ध्यान रखें, विचार की तीन अवस्थाएं हैं। एक विचार की अवस्था है, जिसको हम अशुद्ध विचार कहें। अशुद्ध विचार का अर्थ है, जो वासना के पीछे दौड़ता हो, वृत्तियों के पीछे दौड़ता हो; शरीर को मालिक मानता हो, खुद गुलाम हो जाता हो! जहां वासना मालिक है और विचार गुलाम है, वहा बुरा विचार है, असद विचार है, अशुभ विचार है।

इसे हम बदल सकते हैं। बदलने का अर्थ यह है कि विचार मालिक हो गया, वासना गुलाम हो गई। अब वासना के पीछे विचार नहीं चलता, विचार के पीछे ही वासना को चलना पड़ता है। यह शुभ विचार हुआ, सद विचार हुआ, अच्छा विचार हुआ। लेकिन विचार भी मौजूद है और वासना भी मौजूद है, सिर्फ संबंध बदल गया। कल वासना मालिक थी, विचार गुलाम था, अब विचार मालिक है, वासना गुलाम है।

लेकिन ध्यान रहे, आप गुलाम के मालिक भी हो जाएं, तो भी उससे बंधे रहते हैं। आप गुलाम की छाती पर भी बैठ जाएं, तो भी गुलाम आपको बाधें रखता है। आप छोड़कर हट नहीं सकते। गुलाम तो हट ही नहीं सकता, क्योंकि आप उसकी छाती पर चढ़े हैं। आप भी नहीं हट सकते, क्योंकि आप हटे कि छाती से उतरे। आपको गुलाम को दबाकर बैठे रहना पड़ेगा। शायद आप सोचते होंगे, गुलाम मुझसे बंधा है। गुलाम भी जानता है कि आप उससे बंधे हैं, हट नहीं सकते।




जिसे हम बांधते हैं, उससे हम बंध भी जाते हैं, जीवन का यह एक अनिवार्य नियम है। इसलिए जो मुक्त होना चाहता है, वह किसी को बांधेगा नहीं। बांधा कि आप फिर मुक्त नहीं हो सकते। अगर आपकी वासना को आपने दबा लिया और अच्छा विचार आप ऊपर ले आए, तो भी वासना नीचे कुलबुलाती रहेगी, भभकती रहेगी; लपटें उसकी उठती रहेंगी। आपको रोज—रोज दबाना पड़ेगा। जिसे एक दिन दबाया है, उसे रोज—रोज दबाना पड़ेगा। और दबाने से कोई वासना मिटती नहीं है, भभक भी सकती है और तेजी से, क्योंकि दमन से रस भी पैदा होता है। और जिसे हम दबाते हैं, उसमें आकर्षण भी बढ़ जाता है। और जिसे हम दबाते हैं, उसकी शक्ति भी इकट्ठी होती चली जाती है। फिर यह संघर्ष सतत है।

इसलिए जिसे हम बुरा आदमी कहते हैं, वह बाहर लोगों से लड़ता रहता है; जिसे हम अच्छा आदमी कहते हैं, वह भीतर अपने से लड़ता रहता है। जिसे हम बुरा आदमी कहते हैं, वह दूसरों को सताने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे हम अच्छा आदमी कहते हैं, वह खुद को सताने की कोशिश में लगा रहता है। जिसे हम बुरा आदमी कहते हैं, वह इसीलिए बुरा है कि उसको वासना के पीछे भागना पड़ता है, जिसको हम अच्छा आदमी कहते हैं, उसे इसीलिए अच्छा कहते हैं कि वह अपनी वासना की छाती पर सवार होकर बैठ जाता है। लेकिन यह बैठ जाना भी स्टैटिक है। यह बैठ जाना भी मर जाना है। यह बैठ जाना भी रुक जाना है।

एक तीसरी भी अवस्था है बुद्धि की, जब विचार और वासना दोनों नहीं होते। उस स्थिति का नाम शुद्ध बुद्धि है। शुद्ध बुद्धि का अर्थ है कि संघर्ष गया; जो लड़ने वाले थे, वे रहे ही नहीं। न बांधने वाला है अब, और न वह जिसे बांधना था। न अब कोई मालिक है और न अब कोई गुलाम है। क्योंकि जहां मालिक और गुलाम हैं, वहा एक अंतर्संघर्ष जारी रहेगा ही।

चाहे समाज हो, जब तक समाज में मालिक और गुलाम हैं, तब तक समाज में एक 'संघर्ष जारी रहेगा ही। मार्क्स उसे क्लास स्ट्रगल कहता हैं। तो वर्ग—संघर्ष जारी रहेगा।

ठीक ऐसी ही घटना भीतर भी घटती है। जब तक भीतर भी मालिक और गुलाम में बंटावट है, जब तक बंटावन है भीतर, विभाजन है, तब तक भीतर भी एक संघर्ष, एक अंतर्संघर्ष जारी रहेगा, एक इनर काफ्लिक्ट, एक अंतर्द्वंद्व भीतर भी बना रहेगा। शुद्ध नहीं है वह स्थिति।

कृष्ण कहते हैं, शुद्ध बुद्धि।

उसका अर्थ है, जिसकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो गई कि अब वहा विचार की कोई तरंग भी नहीं है। एकदम निर्मल झील की तरह हो गई। बुरा विचार तो चला ही गया, गंदी लहर तो चली ही गई, वह लहर भी अब नहीं है, जिसको हम निर्मल लहर कहें, वह भी नहीं है। लहर ही न रही। मन झील की तरह मौन हो गया, जिस पर कोई भी तरंग नहीं है।

यहां ठीक से समझ लें।

नीति का संबंध सिर्फ इतने से है कि आपकी बुद्धि इस अर्थ में शुभ हो जाए कि अशुभ दब जाए और शुभ ऊपर आ जाए। नीति की दौड़ इतनी है। इसलिए नीति धर्म नहीं है। धर्म और बड़ी बात है! एक अधार्मिक आदमी भी नैतिक हो सकता है; कोई अड़चन नहीं है। एक नास्तिक भी नैतिक हो सकता है, कोई अड़चन नहीं है।

नैतिकता का मतलब ही इतना है कि आप अपनी वासना को अपने विचार के नियंत्रण में कर लिए हैं। एक संयम उपलब्ध हुआ है। अब आपकी वासना आपको खींच नहीं पाती। अब आप उसे रोक पाते हैं। वासना की लगाम आपके हाथ में आ गई। घोड़ा जिंदा है, लगाम से आप उसे चला लेते हैं। लेकिन चौबीस घंटे उसको चलाने में ही व्यय होता है, और घोड़ा पूरे समय तलाश में होता है कि कब उसे मौका मिल जाए और वह छूटकर निकल भागे। उसके पीछे चौबीस घंटे आपको सजग चेष्टा में रत रहना पड़ता है।

और इसलिए कोई भी आदमी चौबीस घंटे तो सतत चेष्टा नहीं कर सकता, हर चेष्टा का अनिवार्य रूप विश्राम है। कोई भी आदमी चौबीस घंटे चेष्टारत नहीं हो सकता, विश्राम तो करना ही पड़ेगा। जो दिनभर जागा है, उसे रात सोना भी पड़ेगा। और जिसने दिनभर गड्डा खोदा है, उसे हाथ—पैर को आराम भी देना पड़ेगा।

इसलिए नैतिक आदमी को बीच—बीच में विश्राम भी लेना पड़ता है। उसी विश्राम में उसकी अनीति प्रकट होती है। नैतिक आदमी को भी बीच—बीच में विश्राम लेना पड़ता है। कई बहाने खोजकर विश्राम लेता है। कभी कहता है, होली का उत्सव मना रहे हैं, तब वह गालियां बक लेता है। जो बेहूदगियां उसने सालभर नहीं कीं, अब वह मजे से कर लेता है।

नैतिक आदमी को भी बहाने खोज—खोजकर अपनी अनीति को छुट्टी का अवसर देना पड़ता है। क्योंकि थक जाएगा; विश्राम जरूरी है, छुट्टी का दिन जरूरी है। और अगर जागने में नहीं दे पाता, तो नींद में छुट्टी देनी पड़ती है। तो सपनों में सब बुरे कर्म कर लेता है; जो दिनभर दबाए रखे, वह रात सपनों में प्रकट हो जाते हैं।

अगर हम अच्छे आदमी के सपने देखें, तो वे अनिवार्य रूप से बुरे होते हैं। बुरे आदमी के सपने इतने बुरे नहीं होते। कारण नहीं है। बुरा आदमी दिन में ही बुरा कर लेता है, रात मजे से सो जाता है। अक्सर तो ऐसा होता है कि बुरा आदमी रात में बड़े अच्छे सपने देखता है। काप्लिमेंट्री है। दिनभर बेचैन रहता है। कई दफा मन में उसके भी आता है कि अच्छा आदमी हो जाऊं। हो नहीं पाता, वह वासना अतृप्त रह जाती है। बुरा तो वह कर लेता है, जो करना है उसे। अच्छे की वासना अतृप्त रह जाती है, रात सपना बन जाती है।

अच्छा आदमी रात बुरे सपने देखता है। दिनभर तो अच्छा कर लेता है सम्हालकर, लेकिन भीतर बुरे का रंग और राग बजता रहता है, भीतर बुरे की ध्वनि बजती रहती है। वह मांग करती रहती है कि छुट्टी थोड़ी मुझे दो, बहुत ज्यादा लगाम मत खींचो। थोड़ा मुझे फुर्सत दो, मैं दौड़ सकूं। हवाएं अच्छी हैं, रास्ता साफ है, सुबह का वक्त है, थोड़ा मुझे दौड़ लेने दो। नहीं देता, तो रात जब सो जाता है, लगाम छूट जाती है ढीली, तब मन दौड़ना शुरू हो जाता है।

एक मजे की बात है कि आदमी ने दिन में जो दबाया हो, वही रात उसके सपनों में प्रकट होता है। जो—जो दबाया हो, वही प्रकट हो जाता है। सपने सहयोगी हैं। 

अगर अच्छा आदमी सो न सके, तो पागल हो जाएगा। अगर बुरा आदमी न सो सके, वह भी पागल हो जाएगा। क्योंकि विश्राम चाहिए। वह जो दूसरा हिस्सा मांग कर रहा है, जिसको आप दबाकर बैठ गए हैं, उसको भी मौका चाहिए। वह भी आपका हिस्सा है।

कृष्ण इस आदमी को शुद्ध बुद्धि नहीं कहेंगे। वे कहेंगे कि ये दोनों एक जैसे हैं। सिर्फ एक चीज नीचे थी, वह ऊपर आ गई; जो ऊपर था, वह नीचे आ गया। लेकिन टोटल, जोड़ वही है।। 

अच्छे और बुरे आदमी का जोड़ बराबर है। यह जरा कठिन मालूम पड़ेगा। लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं, अच्छे और बुरे आदमी का टोटल, जोड़ बराबर है, ऊपर और नीचे का फर्क है। 

इसका यह मतलब नहीं है कि मैं आपसे यह कह रहा हूं कि अगर आप अच्छे आदमी हों, तो बुरे आदमी हो जाएं। इसका यह मतलब नहीं है। इसका यह मतलब है कि आप अगर अच्छे आदमी हैं? तो अच्छे आदमी ही मत रह जाना।

क्योंकि अच्छे आदमी की उपयोगिता है। जहां तक समाज का संबंध है, समाज का काम पूरा हो गया। उसे आपके भीतर से कोई मतलब नहीं है कि जोड़ क्या है। समाज का काम पूरा हो गया। आपका अच्छा चेहरा ऊपर आ गया, बुरा चेहरा आपके भीतर चला गया। वह आपकी बात हो गई। उसका कोई सामाजिक अर्थ नहीं है। समाज जानता है कि आप अच्छे आदमी हैं। आप समाज के लिए अच्छे आदमी हो गए, समाज की बात पूरी हो गई।

समाज को इससे ज्यादा चिंता नहीं है कि अब आप और कुछ हों। अच्छे आदमी से समाज राजी है। पर्याप्त है। समाज चाहता है, बुरे आदमी आप न हों। आपका बुरा पहलू आपके भीतर हो, अच्छा पहलू बाहर हो। क्योंकि समाज का मतलब ही है कि हमारे बाहरी पहलुओं का जो मिलन है, उसका नाम समाज है।

मेरी आत्मा गंदी है, इससे आपको मतलब नहीं; मैं नहा— धोकर, साफ कपड़े पहनकर आपके पास आऊं, पर्याप्त है। क्योंकि आपका जो मिलन होने वाला है, वह मेरे शरीर से और मेरे कपड़ों से होने वाला है, मेरी आत्मा से नहीं। अगर मैं यह कहूं कि मेरी आत्मा बहुत पवित्र है, लेकिन मैं सब गंदगी ओढ़कर आपके पास आऊंगा, तो आप कहेंगे, आत्मा आप जानें, कृपा करके यह गंदगी मेरे पास न लाएं।

समाज का अर्थ है, हमारे बाहरी व्यक्तित्व के मिलन का स्थल। समाज को इससे चिंता है कि आपका बाहर का पहलू ठीक हो जाए, भीतर की आप जानें। वह आपकी निजी समस्या है।

लेकिन धर्म इतने पर नहीं रुकता। धर्म कहता है कि असली, निजी समस्या को ही हल करना है। अच्छा है कि आप अच्छे आदमी हूऐं बुरे नहीं हैं। बेहतर है। लेकिन धर्म कहता है, यह पर्याप्त नहीं है। जरूरी है, पर्याप्त नहीं है। अच्छे हैं, बहुत अच्छा है। लेकिन अच्छे पर ही रुक गए, तो धोखे में हैं। अच्छे से भी पार जाना होगा।

शुद्ध बुद्धि का अर्थ है, जहां न वासना रही, न विचार रहा; जहां दोनों खो गए। तब सिर्फ शुद्ध चेतना रह जाती है।

तो एक शर्त तो कृष्ण ने कही कि शुद्ध बुद्धि हो और दूसरी बात कही कि निष्काम प्रेमी हो। प्रेम भी उसका निष्काम हो।

बुद्धि अशुद्ध होती है विचार से; प्रेम अशुद्ध हो जाता है वासना से, कामना से। ऐसा समझें कि बुद्धि से अर्थ है आपके चिंतन की क्षमता का, और प्रेम से अर्थ है आपके हृदय के अनुभव की क्षमता का। आपका मस्तिष्क अशुद्ध होता है विचार से, और आपका हृदय अशुद्ध होता है कामना से, वासना से। और जब तक हृदय और बुद्धि दोनों शुद्ध न हों, तब तक भक्त का जन्म नहीं होता। तब तक भक्त का जन्म नहीं होता।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि भक्त को आप ऐसा मत समझना कि वह सरल बात है। ऐसा लोग अक्सर समझाते हुए सुने जाते हैं कि भक्ति बड़ी सरल चीज है; ज्ञान तो बड़ा कठिन है।

लेकिन ध्यान रहे, ज्ञान की एक ही शर्त है कि बुद्धि शुद्ध हो। और भक्ति की शर्त दोहरी है, कि बुद्धि शुद्ध हो और हृदय निष्काम हो। इसलिए जो आपको समझाते हैं कि भक्ति सरल है, मैं नहीं समझ पाता कि वे कैसे समझाते हैं? क्योंकि बुद्धि तो शुद्ध हो ही, जितनी ज्ञान मांग करता है, उतनी तो मांग भक्ति करती ही है, उससे थोड़ी ज्यादा मांग भी करती है। हृदय भी, प्रेम की क्षमता भी वासनारहित हो।

तो भक्त सरल मामला नहीं है। लेकिन सरल इसलिए दिखाई पड़ने लगा कि भक्ति से हमने जो कुछ जोड़ रखा है, वह सब ऐसा बचकाना है, ऐसा चाइल्डिश, जुवेनाइल है, कि लगता है कि सरल है! एक आदमी माला फेर रहा है, तो हम सोचते हैं, भक्त हो गया। एक आदमी जाकर मंदिर की घंटी बजा लेता है, हम सोचते हैं, भक्त हो गया। एक आदमी दीया भगवान के सामने घुमा लेता है, तो हम सोचते हैं, भक्त हो गया।

अगर भक्ति इतनी ही है, तो मैं आपसे कहता हूं, भक्ति से फिर आप कभी पहुंच ही न सकेंगे। इतना सस्ता यह रास्ता नहीं हो सकता। भक्ति अति जटिल है, अति कठिन है।

इसलिए दुनिया में अगर हम ठीक से खोजने जाएं, तो ज्ञानी जितनी बड़ी मात्रा में हुए हैं, उतनी बड़ी मात्रा में भक्त नहीं हुए हैं। यह सुनकर आपको हैरानी होगी। इसलिए ज्ञानियों के जगत में जो नाम हैं ऊंचाई पर, उतनी ऊंचाई पर भक्तों के नाम आप खोजकर न बता सकेंगे। बुद्ध हैं, कि महावीर हैं, कि शंकर हैं, कि याज्ञवल्ल हैं—इनकी कोटि में, इस ज्वलंत कोटि में भक्तों को रखना मुश्किल पड़ जाएगा। और उसका कारण यह है कि भक्त होना दुरूह है, कठिन है। दोहरी शर्त है वहां।

और बुद्धि को शुद्ध कर लेना आसान भी है, हृदय को शुद्ध करना और भी जटिल है; क्योंकि बुद्धि ऊपर है, हृदय गहरे में है। और बुद्धि तो मैनिपुलेट की जा सकती है; हाथ से उसमें कुछ किया जा सकता है। लेकिन हृदय तो इतना अपना मालूम पड़ता है कि उसमें दूरी ही नहीं होती है; उसमें कुछ करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसे ऐसा समझें। अगर मैं आपसे कहूं कि फला व्यक्ति को आप कोशिश करें प्रेम करने की, तब आपको पता चलेगा कि कितना कठिन मामला है! कैसे कोशिश करेंगे प्रेम करने की? क्या कभी भी कोई कोशिश से प्रेम कर पाया है? कौन कर पाया है कोशिश से प्रेम कभी? जितनी कोशिश करेंगे, उतना ही पाएंगे, प्रेम मुश्किल हुआ चला जाता है!

आपसे बुद्धि का कोई भी सवाल हल करवाना हो, कोशिश से हल हो सकता है। कोई भी विचार कितना ही जटिल हो, कोशिश से हल हो सकता है। किसी भी विचार को समझने में कितनी ही अड़चन हो, कोशिश से हल हो सकती है। प्रेम कोशिश से हल नहीं होता; प्रयत्न बिलकुल ही व्यर्थ है।

इसलिए प्रेमी को हम अंधा कहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि है तो है, नहीं है तो नहीं है। और कोई उपाय नहीं है। प्रेम है तो है, और नहीं है तो नहीं है, उपाय नहीं है। इसलिए प्रेमी एकदम असहाय मालूम पड़ता है, किसी विराट शक्ति के हाथों में पड़ गया; अपना कोई वश नहीं चलता मालूम पड़ता। खिंचा चला जा रहा है। भागा चला जा रहा है। खुद का नियंत्रण नहीं मालूम पड़ता। इसलिए भक्त होना दुरूह बात है। पर अगर बुद्धि शुद्ध हो और प्रेम निष्काम हो, तो वह महान घटना भी घटती है और भक्ति का फूल भी खिलता है। खिलता है, कभी किसी चैतन्य में, कभी किसी मीरा में खिलता है। लेकिन बहुत रेयर फ्लावरिंग है, बहुत कठिनाई की बात है।

इसलिए मैं कहता हूं कि बुद्ध होना या महावीर होना कितना ही कठिन हो, फिर भी बहुत कठिन नहीं है। एक ही शर्त है कि बुद्धि पूरी शुद्ध हो जाए। लेकिन मीरा का होना थोड़ा अनूठा है, चैतन्य का होना थोड़ा अनूठा है। इस अनूठे में एक तत्व और जुड़ता है, एक दिशा और जुड़ती है, कि हृदय भी निष्काम हो।

इसलिए बुद्ध शांत होंगे, शांति उनमें गहरी होगी, निर्विकार होंगे, शुद्ध होंगे, लेकिन एक अर्थ में निगेटिव, नकारात्मक मालूम पड़ेंगे। यह तो हम कह सकते हैं, उनकी अशांति मिट गई; यह भी हम कह सकते हैं, उनका दुख मिट गया; यह भी हम कह सकते हैं कि उनकी सब पीड़ा, संताप खो गया, यह भी कह सकते हैं, चिंता अब न बची—लेकिन यह सब नकार है। क्या—क्या नहीं रहा, वह हम कह सकते हैं; लेकिन यह बताना मुश्किल है कि क्या हुआ!

मीरा में हमें सिर्फ यही नहीं दिखाई पड़ता है कि उसकी अशांति मिट गई, चिंता मिट गई, संताप मिट गया, दुख मिट गया; साथ में उसमें नाचता हुआ आनंद भी दिखाई पड़ता है, विधायक, पाजिटिव। क्या हुआ है, वह भी प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। क्या खो गया है, वह तो दिखाई ही पड़ता है; लेकिन क्या हुआ है, क्या मिल गया है, उसकी भी प्रत्यक्ष झलक मालूम होती है।

बुद्ध को जो भी हुआ है, वह भीतर है; वह बाहर नहीं आ पाता। क्योंकि हृदय के बिना कोई भी चीज बाहर नहीं आ सकती। हृदय अभिव्यक्ति का द्वार है। बुद्ध को जो हुआ है, वह भीतर हुआ है; जो नहीं हो गया है, वह बाहर गिरा है। हमने देखा है उनको पहले अशांत, अब अशांति गिर गई है। हमने देखा है पहले उन्हें चिंतित, अब चिंता नहीं है। हमने देखा है उन्हें पहले, उनके माथे पर सलवटें—दुख की, पीड़ा की, संताप की। वे खो गई हैं। लेकिन यह सब निषेध है। उनके भीतर क्या हुआ है, यह वे ही जानें।

लेकिन मीरा का नृत्य बाहर भी फूट रहा है। बाहर भी बह रही है यह धारा। जो भीतर हुआ है, वह बाहर भी तोड़कर आ रहा है। उसकी तरंगें दूर तक जा रही हैं। निश्चित ही, कुछ और भी बात हुई है। वह, दूसरी शर्त पूरी हो, तब होती है।

हम सोच भी नहीं सकते बुद्ध को नाचता हुआ। जब बुद्धि पूरी तरह शुद्ध हो जाती है, तो जो अनुभूति होती है, वह आंतरिक है; अत्यंत आंतरिक है, उसको बाहर तक ले जाने का द्वार नहीं है। और जब हृदय भी कामना से मुक्त हो जाता है, तो वह द्वार भी खुल जाता है, जो बाहर ले जाता है।

इसे आप ऐसा समझें कि जब तक आपके पास हृदय नहीं होता है, तब तक आप दूसरे से संबंधित हो ही नहीं सकते। सब संबंध हार्दिक हैं। जितना बड़ा हृदय होता है, उतना संबंधों का विस्तार होता है। असल में हृदय के द्वारा ही हम दूसरे को सवांदित कर पाते हैं। दूसरे से जो हम जुड़ते हैं, कम्मुनिकेट होते हैं, वह हृदय के द्वारा होते हैं।

मीरा जब नाचती है, तो जो बुद्ध नहीं कह पाते, वह उसके घूंघर की झनकार से कहा जाता है। और जब चैतन्य कीर्तन में डूब जाते हैं, तो जो बुद्ध नहीं बता पाते, चेष्टा करते हैं, समझाते हैं पूरे जीवन, फिर भी पाते हैं कि असमर्थता है कोई, चैतन्य असमर्थ नहीं मालूम पड़ते। आंसू से भी कह देते हैं। नाचकर भी कह देते हैं। दौड़कर भी कह देते हैं। अभिव्यक्ति चैतन्य को सरल मालूम पड़ती है। लेकिन भक्ति के साथ एक वहम जुड़ गया, इसलिए कठिनाई हो गई। हमने भक्ति को बहुत सस्ती समझा। और समझा कि ज्ञान तो सबके वश की बात नहीं है, भक्ति सबके वश की बात है। इससे भांति हो गई। मैं आपसे कहता हूं ज्ञान थोडे ज्यादा लोगों के वश की बात है, भक्ति थोड़े कम लोगों के वश की बात है। क्योंकि अच्छी बुद्धि पा लेना बहुत कठिन नहीं है; अच्छा हृदय पाना बहुत कठिन है। और बुद्धि की शिक्षा के तो बहुत उपाय हैं जगत में; हृदय की शिक्षा का अब तक कोई उपाय नहीं है।

बुद्धि के लिए विश्वविद्यालय हैं, शिक्षक हैं, शिक्षा—पर्द्धातेया हैं। हृदय के लिए कोई विश्वविद्यालय नहीं है, कोई शिक्षक नहीं है, कोई शिक्षा—पद्धति नहीं है। हृदय अब तक अछूता पड़ा है। हृदय अब तक एक अंधेरा महाद्वीप है, जिसमें कभी—कभी कोई उतरता है।

लेकिन अगर यह दूसरी शर्त पूरी हो सके कि प्रेम हो, और कामनारहित हो। बड़ी कठिन शर्त है। बड़ी कठिन शर्त है। कठिन शर्त ऐसी है, जैसे मैं आपसे कहूं, नदी से तो गुजरें, लेकिन पानी में पैर न छुए; आग से तो गुजर जाएं, लेकिन जलन जरा भी न हो। आप कहेंगे, बिना आग से गुजरे जलन नहीं होती, तो मैं बिना आग से गुजर जाऊं, जलन नहीं होगी। लेकिन शर्त यह है, आग से गुजरें और जलन न हो।

ध्यान रहे, कोई अगर चाहे तो प्रेम को छोड़ दे, तो वासना छूट जाती है। यह कठिनाई है। अगर आग में न जाएं, तो जलने का कोई सवाल नहीं है। अगर पानी में न जाएं, तो भीगने का कोई सवाल नहीं है। बहुत लोग हैं, जो प्रेम से इसीलिए भयभीत हो जाते हैं कि प्रेम में गए, तो जले, भीगे, प्रेम में गए, तो वासना रहेगी ही।

इसलिए जो ज्ञान की दिशा में चलने वाले लोग रहे, उन्होंने कहा, प्रेम से सावधान रहना। प्रेम में पड़ना ही मत। सावधान करने का कारण इतना ही था कि आशा बहुत कम है कि प्रेम में पड़े और वासना में न पड़ जाएं। प्रेम और वासना के बीच इतना गहरा संबंध है कि प्रेम में गए, तो वासना में चले ही जाएंगे। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है कि वासना से तो बचना जरूरी है। प्रेम से बच जाना, तो वासना से बच जाओगे।

भक्त की शर्त बड़ी कठिन है। कृष्ण कहते हैं, प्रेम में तो जाना, वासना से बच जाना, आग में चलना, जलना मत, पानी में उतरना, भीगना मत।

इसलिए मैं कहता हूं, भक्ति थोड़ी कठिन बात है। लेकिन बड़ी क्रांति भी है।

अब इसे हम थोड़ा समझें कि प्रेम अनिवार्य रूप से वासना क्यों बन जाता है? क्या यह अनिवार्यता प्रेम में है कि प्रेम वासना बनेगा ?

अगर ऐसा अनिवार्य हो, तो फिर कृष्ण यह शर्त नहीं लगाएंगे। यह अनिवार्यता प्रेम में नहीं है। यह अनिवार्यता कहीं मनुष्य की बुनियादी समझ की भूल का हिस्सा है।

असल में जब भी हम प्रेम करते हैं, तो वासना के कारण ही करते हैं। वासना पहले आ जाती है, प्रेम पीछे आता है। वासना पहले हमारे द्वार को खटखटा जाती है और तब प्रेम प्रवेश करता है। हमने जो भी प्रेम जाना है, वह वासना के पीछे जाना है। हमने जो भी प्रेम जाना है, वह वासना की छाया की तरह जाना है। इसलिए हमारे प्रेम के अनुभव में वासना छा गई है। और हमने जन्मों—जन्मों तक जब भी प्रेम जाना है, वासना के पीछे जाना है। हमारा प्रेम जो है, वह हमारी कामवासना की छाया से ज्यादा नहीं है। इसलिए हमें डर लगता है कि जब भी हम प्रेम में पड़ेंगे, तो कामवासना पीछे आ जाएगी।

एक और भी प्रेम है, जो वासना की छाया की तरह नहीं जाना जाता, वरन एक अंतर्निहित दशा की तरह जाना जाता है।

इसे थोड़ा समझ लें।

जब भी मैं कहता हूं प्रेम, तो मेरा मतलब होता है किसी से। और जब भी मैं कहता हूं ज्ञान, तो मतलब होता है मुझमें। और जब भी मैं कहता हूं प्रेम, तब तीर किसी और की तरफ झुक जाता है, इशारा किसी और की तरफ हो जाता है। जब भी मैं कहता हूं ज्ञान, तो दूसरे की तरफ तीर नहीं जाता, ज्ञान होता है मेरा। तो जब भी मैं कहता हूं प्रेम, तब दूसरा भीतर प्रवेश कर गया, प्रेम शब्द कहते ही मैं अकेला नहीं रह जाता, दूसरा आ जाता है।

जिस प्रेम की कृष्ण बात कर रहे हैं, वह ज्ञान की तरह ही बात है, ध्यान की तरह ही बात है। दूसरे से उसका संबंध नहीं है, स्वयं का ही आविर्भाव है। इसे आप ऐसा समझें कि जैसे ध्यान की साधना होती है, ऐसे ही प्रेम की साधना होती है।

बैठे हैं कमरे में, प्रेम अनुभव करें, अपने चारों तरफ प्रेम फैलता हुआ अनुभव करें; भीतर प्रेम भरा हुआ अनुभव करें। लोक—लोकातर तक आपका प्रेम फैल जाए, लेकिन दूसरे की अपेक्षा को मौजूद न करें। एक घंटा रोज दूसरे की अपेक्षा को बीच में न लाएं।

प्रेम दूसरे से संबंध नहीं, वरन मेरे भीतर एक घटना  है, जो चारों तरफ फैलती चली जाती है, जैसे दीए से प्रकाश फैलता है। ऐसा बैठ जाएं घंटेभर। और मुझसे प्रेम फैल रहा है चारों तरफ। कमरे की दीवालों को पार करके नगर की दीवालों में भर गया है। और नगर की दीवालों को पार करके राष्ट्र, और राष्ट्र की दीवालों को पार करके पूरी पृथ्वी को उसने घेर लिया है। और दूर चांद—तारों तक फैलता जा रहा है। सारा आकाश मेरे प्रेम से भर गया है।

इसको अगर एक घंटा रोज आप फिक्र करते रहें, तो धीरे— धीरे, धीरे— धीरे, प्रेम दूसरे से संबंध है, यह आपकी धारणा टूट जाएगी। और एक घड़ी आपके भीतर आ जाएगी, जब आपको लगेगा, प्रेम मेरी अंतर—दशा है। तब आप प्रेम करेंगे नहीं, प्रेम हो जाएंगे। तब प्रेम करने के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं होगी। दूसरा हो या न हो, आप प्रेम में रहेंगे ही। तब आप चलेंगे, तो आपका प्रेम आपके साथ चलेगा; उठेंगे, तो आपका प्रेम आपके साथ उठेगा, बैठेंगे, तो आपका प्रेम आपके साथ आएगा।

कभी—कभी किसी व्यक्ति के पास जाकर आपको अचानक लगता है कि इस व्यक्ति को न आप जानते, न आप पहचानते; न इसका कुछ बुरा जाना है, न इसके किसी दुराचरण की खबर है। लेकिन पास जाकर अचानक आपको लगता है रिपल्शन, विकर्षण, हट जाओ, दूर हट जाओ। किसी व्यक्ति के पास जाकर अचानक, अजनबी के पास, लगता है कि गले मिल जाओ। न उसे जाना, न उसे पहचाना; न कोई संबंध है! आकर्षण।

जिस व्यक्ति के पास आपको जाकर लगता है कि कोई आकर्षण, कोई मैग्नेटिज्म खींच रहा है, समझना कि उस व्यक्ति के पास प्रेम की एक क्षमता, एक मात्रा है। छोटी ही है, लेकिन एक मात्रा है। जिस व्यक्ति के पास आपको विकर्षण मालूम होता है, हट जाओ, कोई शक्ति जैसे दूर हटाती है, बीच में कोई शक्ति खड़ी हो जाती है और पास नहीं आने देती, तो समझना कि उस व्यक्ति के पास प्रेम का बिलकुल अभाव है; जो खींच सकता है, उसका बिलकुल अभाव है। तो आप धकाए जा रहे हैं। और यह भी हो सकता है अभ्यास से कि प्रेम का अभाव तो हो ही, साथ में घृणा का आविर्भाव हो गया हो; घृणा एक स्थिति बन गई हो, एक दशा। बन गई हो।

अभी तो वैज्ञानिकों ने चित्त की इस दशा को नापने के लिए यंत्र भी निर्मित किए हैं। यह जानकर आप चकित होंगे। और अब तो ऐसे यंत्र हैं, जिनके सामने खड़े होकर हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति खींचता है लोगों को कि हटाता है। क्योंकि वह जो भीतर प्रेम की ऊर्जा है, मैग्नेटिक है। अगर प्रेम से भरा हुआ व्यक्ति उस यंत्र के सामने खड़ा होगा, तो यंत्र का कांटा खबर देता है कि यह आदमी लोगों को अपनी तरफ खींच लेता है। अगर यह आदमी घृणा से भरा हो, तो कांटा उलटा घूमता है और खबर देता है कि इस आदमी से जो ऊर्जा निकल रही है, वह लोगों को धकाती है और हटाती है।

अब तो इसे मापा भी जा सकता है। लेकिन धर्म सदा से जानता रहा है कि प्रेम संबंध नहीं है, अंतर—ऊर्जा है, इनर एनर्जी है।

जब मैं कहता हूं प्रेम शक्ति है, एनर्जी है, ऊर्जा है, तब उसका अर्थ यह हुआ कि दूसरे से उसका संबंध करने से वह ऊर्जा वासनाग्रस्त हो जाती है। दूसरे से संबंधित बनाने से, दूसरे से बांध लेने से अशुद्ध हो जाती है। दूसरे से बांध लेने से विकृत हो जाती है, कुरूप हो जाती है।

निष्काम प्रेम का अर्थ है, प्रेम की ऊर्जा हो और किसी से बंधी न हो, किसी कामना के लिए न हो।

तो कृष्ण कहते हैं, बुद्धि हो शुद्ध, विचार का कंपन न हो; हृदय हो प्रेम से भरा, वासना की जरा—सी भी झलक न हो, तो भक्त का जन्म होता है।

और ऐसा भक्त ही अपना सब कुछ परमात्मा के चरणों में छोड़ पाता है, अपना कर्तापन छोड़ पाता है।

अब इस सूत्र को हम पूरा देख लें।

हे अर्जुन! मेरे पूजन में पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कुछ भी कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि, निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र, पुष्प, फल आदि मैं ही ग्रहण करता हूं।

ऊपर से देखने में तो बहुत सीधा लगेगा। पत्र, पुष्प, फल, जल—हम सब जानते हैं, हम सबने चढ़ाया है। जल चढ़ाया है, फूल चढ़ाया है, पत्ते चढ़ाए हैं, हम सबको पता है। लेकिन कृष्ण जैसे लोग इस तरह की क्षुद्र बातें करते नहीं हैं। क्या मतलब है पत्र, पुष्प, फल चढ़ाने का?

एक मतलब आपको पता है, वह मतलब नहीं है। जो मतलब आपको पता नहीं है, वही मतलब है। वह मैं आपसे कहता हूं।

पत्र, पुष्प, फल व्यक्तित्व के खिलावट की तीन अवस्थाएं हैं। क्या कहते हैं कि तू जैसा भी है, अगर अभी सिर्फ पत्ता ही है, अभी फूल तक नहीं पहुंचा, तो भी कोई फिक्र नहीं, पत्ते को ही चढ़ा दे। अगर तू पत्ते से आगे निकल गया है और फूल बन गया है, तो फल की फिक्र मत कर कि जब फल बनूंगा, तब परमात्मा को चढूंगा। फूल ही चढ़ा दे। अगर तू फल हो चुका है, तो फल ही चढ़ा दे। लेकिन तब शायद उन्हें खयाल आया होगा कि ऐसे लोग भी तो हैं, जो अभी पत्ते भी नहीं हैं, अभी पानी ही हैं। तो उन्होंने कहा, अगर तू अभी जल ही है।

जल जो है, बिलकुल प्राथमिक है। उससे नीचे फिर और कुछ नहीं हो सकता। जल ही बनता है पत्ता। फिर बढ़ता है, तो पत्ता बन जाता है फूल। फिर बढ़ता है, तो फूल बन जाता है फल।

तो कृष्ण ने कहा कि तू हो चाहे पत्ता, चाहे फूल, चाहे फल, तू जो भी हो, चढ़ा दे, तू जो भी हो, वैसा ही चढ़ जा।

हममें से बहुत लोग कहते हैं—ये सब हमारी बेईमानी के हिस्से हैं—हममें से बहुत लोग कहते हैं कि अभी तो कुछ है ही नहीं मेरे पास, तो अभी परमात्मा को चढ़ाऊं भी क्या?

कभी भी नहीं होगा आपके पास जिस दिन आप अनुभव कर सकें कि परमात्मा को चढ़ाने योग्य कुछ मेरे पास है। आप पोस्टपोन करते जा सकते हैं।

ये तीन अवस्थाएं हैं, या चार। जल की अवस्था का अर्थ है कि आप में किसी तरह का विकास नहीं हुआ है। लेकिन कृष्ण कहते हैं, उसे भी मैं स्वीकार कर लूंगा। मैं तो, जो भी चढ़ाया जाता है, उसे स्वीकार कर लेता हूं। सवाल यह नहीं है कि क्या चढ़ाया, सवाल यह है कि चढ़ाया, अर्पित किया। अगर तू पत्ता है, तो पत्ते की तरह आ जा, अगर फूल हो गया है, तो फूल की तरह आ जा, अगर फल हो गया है, तो फल की तरह आ जा। जिस भी अवस्था में हो।

ये चार अवस्थाएं हैं चेतना की। पानी उस अवस्था को कहेंगे, जल उस अवस्था को कहेंगे, जिसमें चेतना आपकी बिलकुल ही प्रिमिटिव है, बिलकुल प्राथमिक है। पत्र उस अवस्था को कहेंगे, जिसमें आपकी चेतना ने थोड़ा विकास किया, रूप लिया, आकार लिया। फूल उस चेतना को कहेंगे, जिसमें आपकी चेतना ने न केवल रूप—आकार लिया, बल्कि सौंदर्य को उपलब्ध हुई। फल उस अवस्था को कहेंगे, जिसमें आपकी चेतना सौंदर्य को ही उपलब्ध नहीं हुई, और चेतनाओं को जन्म देने की सामर्थ्य को भी उपलब्ध हुई; पक गई।

कृष्ण नहीं कहेंगे यह। कृष्ण कहेंगे, पक जाना सब कुछ नहीं है, चढ़ जाना सब कुछ है।

नीत्शे ठीक कहता है, क्योंकि नीत्शे की दृष्टि में कोई ईश्वर नहीं है। तो नीत्शे कहता है, आदमी पक जाए, पूरा पक जाए। उसकी बुद्धि, उसकी प्रतिभा, उसका व्यक्तित्व एक पका हुआ फल हो जाए, तो सब है। राइपननेस इज आल। बात पूरी हो गई। सुपरमैन पैदा हो गया। महामानव पैदा हो गया। पक गया मनुष्य।

कृष्ण नहीं कहेंगे कि राइपननेस इज आल। वे कहेंगे, सरेंडर इज आल; पक जाना नहीं, समर्पित हो जाना। और तब वे यह कहते हैं कि समर्पित होने के लिए फल के तक रुकने की भी कोई जरूरत नहीं है। फल ही चढ़ेगा, ऐसा नहीं; पत्ता भी चढ़ जाएगा; पानी भी चढ़ जाएगा; फूल भी चढ़ जाएगा। जो जहां है, वहीं से अपने को अर्पित कर दे; कल की प्रतीक्षा न करे, कल के लिए बात को टाले न; स्थगित न करे। यह तो अर्थ है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप जो पत्ते—फूल चढ़ा आते हैं, वह बंद कर देना। मैं इतना ही कह रहा हूं कि जब फूल चढ़ाए, तब याद रखना कि इस फूल के चढ़ाने से संकेत भर मिलता है, हल नहीं होता। जब पता चढ़ाए, और जब पानी ढालें परमात्मा के चरणों में, जरूर ढालते चले जाना, लेकिन याद रखना, यह पानी ढालना केवल प्रतीक है, सिंबल है। ध्यान रखना कि कब तक इस पानी को ढालते रहेंगे? एक दिन अपने पानी को ढालने की तैयारी करनी है; एक दिन अपना फूल चढ़ा देना है, एक दिन अपना फल समर्पित कर देना हैं।

उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ सब कुछ मैं ही ग्रहण करता हूं!

यह तो हम देखते हैं कि फल हम चढ़ा आते हैं, पुजारी ग्रहण करता है। पक्की तरह पता है। यह भी हम देखते हैं कि फूल हम चढ़ा आते हैं, वे फिर बाजार में बिक जाते हैं।

हमें पता है कि फूल हम चढ़ा आएंगे, तो वह उसको नहीं मिल सकता। जब तक कि चेतना का फूल न चढ़ाया जाए, तब तक परमात्मा का भोजन नहीं हो सकता। जब तक हम स्वयं को ही न चढ़ा दें, तब तक हम उसके हिस्से नहीं बनते।

कृष्ण कहते हैं कि मैं उस सबको ग्रहण कर लेता हूं सबको, जो भी मुझे चढ़ाया जाता है, वह सब मेरा ही अंग हो जाता है।

इसलिए हे अर्जुन, तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, दान देता है, जो कुछ स्वधर्माचरणरूप तप करता है, वह सब मुझे अर्पण कर। इस प्रकार कर्मों को मेरे अर्पण करने रूप संन्यास—योग से युक्त हुए मन वाला तू शुभ—अशुभ फल रूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा, और उससे मुक्त हुआ मेरे को ही प्राप्त होगा।

इस सूत्र में अंतिम दो—तीन बातें और खयाल ले लेने जैसी हैं। जो व्यक्ति अपना सब समर्पित कर देगा, अपने को पीछे बचाए बिना, विद नो विदहोल्डिग, पीछे अपने को जरा भी बचाए बिना जो अपने को अशेष भाव से, सब कुछ, पूरा का पूरा, समग्रीभूत रूप से समर्पित कर देगा, वह परमात्मा का हिस्सा हो जाता है। हिस्सा कहना भी ठीक नहीं, भाषा की भूल है, वह परमात्मा ही हो जाता है। क्योंकि परमात्मा में कोई हिस्से नहीं होते, कोई विभाग नहीं होता।

जब एक नदी सागर में गिरती है, तो सागर का हिस्सा नहीं हो जाती, सागर हो जाती है। सागर का हिस्सा तो हम तब कहें, जब कि उसका कोई अलग— थलग रूप बना रहे। खोजने जाएं और मिल जाए—कि यह रही गंगा। सागर में उसकी धारा अलग बहती रहे। कहीं नहीं बचती, सागर हो जाती है, फैल जाती है; एक हो जाती है।

तो ध्यान रखना, जब कोई परमात्मा से एक होता है, तो वह उसका अंश नहीं होता, परमात्मा ही हो जाता है, पूरा सागर हो जाता है, फैल जाता है; एक हो जाता है। हम परमात्मा के हिस्से नहीं हो सकते, क्योंकि परमात्मा कोई यंत्र नहीं है, जिसके हम हिस्से हो सकें। परमात्मा सागर जैसे चैतन्य का नाम है। उसमें कोई दीवालें और विभाजन नहीं हैं। उसमें हम होते हैं, तो हम पूरे ही हो जाते हैं। हम उसके साथ पूरे एक हो जाते हैं।

इसलिए कृष्ण अगर इतनी हिम्मत से अर्जुन से कह सके कि मैं ही हूं वह, तो उसका कारण है। अगर इतनी हिम्मत से कह सके कि छोड़ अर्जुन तू सब, और मुझ पर ही समर्पित हो जा! तो यह कृष्ण उस व्यक्ति के लिए नहीं कह रहे हैं, जो अर्जुन के सामने खड़ा था; यह उस व्यक्ति के लिए कह रहे हैं कृष्ण, जो उस सागर में गिरकर हो गए हैं। यह सागर की तरफ से कही गई बात है। लेकिन अब चूंकि नदी अलग नहीं बची है, इसलिए नदी सीधी बात कहती है कि मेरे साथ एक हो जा। क्योंकि नदी अब सागर हो गई है। कृष्ण इतना भी नहीं कहते कि तू परमात्मा के साथ एक हो जा। कहते हैं, मेरे साथ एक हो जा।

अनेक लोगों को कृष्ण का यह वक्तव्य अहंकार से भरा हुआ मालूम पड़ता रहा है, सदियों—सदियों से। और जो लोग नहीं समझ पाते, उन्हें लगता है— थोड़ी अड़चन मालूम पड़ती है—कि कृष्ण भी कैसा आदमी है? थोड़ा तो संकोच खाना था! अर्जुन से सीधे ही कहे चले जाते हैं, छोड़ दे सब मुझ पर! सब धर्म—वर्म को छोड़ दे, मेरी शरण में आ!

जरूर कृष्ण किसी और चैतन्य से बोलते हैं। यह उस नदी की आवाज है, जो सागर में गिर गई। अब नदी अगर यह भी कहे कि सागर में गिर जा, तो झूठ होगा। अब तो नदी यही कहती है कि मुझ सागर में मिल जा।

और अर्जुन को कठिनाई नहीं हुई इस बात से। गीता जिन्होंने भी पढ़ी है, उनको कभी न कभी कठिनाई होती है। गीता के बड़े भक्त हैं, उनको भी भीतर थोड़ा—सा खयाल आता है कि बात क्या है? कृष्ण को ऐसा नहीं कहना था, कोई और तरकीब से कह देते। यह सीधा क्या कहने की बात थी? क्या कृष्ण को भी अहंकार है? वह क्यों बार—बार इस मैं शब्द का उपयोग करते हैं? अर्जुन को तो कहते हैं, तू सब छोड़! और खुद अपना मैं जरा भी नहीं छोड़ते हैं! संदेह उठता ही रहा है। लेकिन अर्जुन के मन में जरा भी नहीं उठा। अर्जुन ने बहुत सवाल पूछे, यह सवाल जरा भी नहीं पूछा कि यह क्या बात है? मेरे मित्र हो, मेरे सखा हो, फिलहाल तो मेरे सारथी हो, ड्राइवर हो, थोड़ा तो खयाल करो कि मैं तुमसे ऊपर बैठा हूं तुम मुझसे नीचे बैठे हो, केवल मेरे रथ को सम्हालने के लिए तुम्हें ले आया हूं और तुम कहे जाते हो कि सब छोड़ और मेरी शरण आ!

जब कृष्ण ने कहा होगा, मेरी शरण आ, तो अर्जुन भी उनकी आंखों में उस सागर को देख सका होगा। नदी उसे भी दिखाई पड़ती, तो वह भी पूछ लेता। उसे नदी नहीं दिखाई पड़ी होगी।

लेकिन यह बड़ा आत्मीय संबंध था। एक शिष्य और एक गुरु के बीच था, दो मित्रों के बीच अगर भीड़— भाड़ वहां भी खड़ी होती, तो जरूर भीड़ मैं से कोई चिल्लाता कि बंद करो! यह क्या कह रहे हो? अपने ही मुंह से कह रहे हो कि मेरी शरण आ! मैं भगवान हूं!

बड़ा आत्मीय नजदीकी का वास्ता था। यह अर्जुन और कृष्ण के बीच निजी संबंध की बात थी। अर्जुन समझा होगा। देखी होगी उसने आंख, कि भीतर कोई मैं नहीं है। मैं सिर्फ भाषा का प्रयोग है।

सब छोड़ दे, तो मेरे साथ एक हो जाएगा। और इसे ही वे कहते हैं, इस अर्पण को ही वे कहते हैं संन्यास। इतनी हिम्मत की परिभाषा संन्यास की किसी और ने नहीं की है।

अर्जुन संसारी है पक्का। इससे पक्का और संसारी क्या होता है? संसार में भेज रहे हैं उसे युद्ध में, और कहते हैं कि इसे मैं कहता हूं संन्यास से युक्त हो जाना! तू युद्ध में जा और कर्ता को मेरी तरफ छोड़ दे। लड़ तू और जान कि मैं लड़ रहा हूं। तलवार तेरे हाथ में हो, लेकिन जानना कि मेरे हाथ में है। गर्दन तू काटे, लेकिन जानना कि मैंने काटी है। और गर्दन तेरी कट जाए तो भी जानना कि मैंने काटी है। कर्म और कर्तृत्व को सब मुझ पर छोड़ देना, तो तू संन्यास से युक्त हुआ।

अर्जुन संन्यासी होना चाहता था, लेकिन पुराने ढब का संन्यासी होना चाहता था। वह भी संन्यासी होना चाहता था। वह यही कह रहा था कि बचाओ मुझे। और बड़े गलत आदमी से पूछ बैठा। उसे कोई ढंग का आदमी चुनना चाहिए था। जो कहता कि बिलकुल ठीक! यही तो ज्ञान का लक्षण है। छोड़! सब त्याग कर! चल जंगल की तरफ!

गलत आदमी से पूछ बैठा। उसे पूछने के पहले ही सोचना था कि यह आदमी जो परम ज्ञानी होकर बांसुरी बजा सकता है, इससे जरा सोचकर बोलना चाहिए! पूछ बैठा। लेकिन शायद वहा कोई और मौजूद नहीं था, और कोई उपाय नहीं था; पूछ बैठा। सोचा उसने भी होगा कि कृष्ण भी कहेंगे कि ठीक है। यह संसार सब माया—मोह है, छोड़कर तू जा! कैसा युद्ध? क्या सार है? कुछ मिलेगा नहीं। और सीधी—सी बात है कि हिंसा में पड़ने से तो पाप ही होगा। तू हट जा।

इसी आशा में उसने बड़ी सहजता से पूछा था। लेकिन कृष्ण ने उसे कुछ और ही संन्यास की बात कही; एक अनूठे संन्यास की बात कही; शायद पृथ्वी पर पहली दफा वैसे संन्यास की बात कही। उसके पहले भी वैसे संन्यासी हुए हैं, लेकिन इतनी प्रकट बात नहीं हुई थी। कहा कि तू सब कर्म कर, सिर्फ कर्ता को छोड़ दे, तो तू संन्यास से युक्त हो गया। फिर तुझे कहीं किसी वन—उपवन में जाने की जरूरत नहीं। किसी हिमालय की तलाश नहीं करनी है। तू यहीं युद्ध में खड़े—खड़े संन्यासी हो जाता है।

पहली दफा आंतरिक रूपांतरण का इतना गहरा भरोसा! बाहर से कुछ बदलने की चिंता मत कर, बाहर तू जो है, वही रहा आ। भीतर से तू बदल जा। भीतर की बदलाहट एक ही बदलाहट है!

भीतर का केंद्र या तो अहंकार हो सकता है, या परमात्मा। बस, दो ही केंद्र हो सकते हैं। भीतर दो तरह के केंद्र संभव हैं, या तो परमात्मा केंद्र हो सकता है, या मैं—अहंकार—केंद्र हो सकता है। और जिनका भी परमात्मा केंद्र नहीं होता, वे भी बिना केंद्र के तो काम नहीं कर सकते, इसलिए अहंकार को केंद्र बनाकर चलना पड़ता है।

अहंकार जो है. सूडो सेंटर है, झूठा केंद्र है। असली केंद्र नहीं है, तो उससे काम चलाना पड़ता है। वह  परिपूरक केंद्र है। जैसे ही कोई व्यक्ति परमात्मा को केंद्र बना लेता है, इस परिपूरक की कोई जरूरत नहीं रह जाती, यह विदा हो जाता है।

इसलिए कृष्ण का जोर है कि तू सारे कर्ता के भाव को मुझ पर छोड़ दे। और जो ऐसा कर पाता है, वह समस्त कर्म—फल से मुक्त हो जाता है, शुभ और अशुभ दोनों से। उसने जो बुरे कर्म किए हैं, उनसे तो मुक्त हो ही जाता है, उसने जो अच्छे कर्म किए हैं, उनसे भी मुक्त हो जाता है।

बुरे कर्म से तो हम भी मुक्त होना चाहेंगे, लेकिन अच्छे कर्म से मुक्त होने में जरा हमें कष्ट मालूम पड़ेगा। कि मैंने जो मंदिर बनाया था, और मैंने इतने रोगियों को दवा दिलवाई थी, और अकाल में मैंने इतने पैसे भेजे थे, उनसे भी मुक्त कर देंगे? वह तो मेरी कुल संपदा है!

बुरे से छोड़ दें! मैंने चोरी की थी, बेईमानी की थी। क्योंकि बेईमानी न करता, तो अकाल में पैसे कैसे भिजवा पाता? और अगर चोरी न करता, तो यह मंदिर कैसे बनता? तो चोरी की थी, बेईमानी की थी, कालाबाजारी की थी, उनसे मेरा छुटकारा करवा दो! लेकिन कालाबाजारी करके जो मंदिर बनाया था, और अकाल में जो लोगों की सेवा की थी, और रोटी बांटी थी, और दवा—दारू भेजी थी, उसको तो बचने दो!

लेकिन कृष्ण कहते हैं, दोनों से, शुभ अशुभ दोनों से!

क्योंकि कृष्ण भलीभांति जानते हैं कि शुभ करने में भी अशुभ हो जाता है। शुभ भी करना हो, तो अशुभ होता रहता है। वे संयुक्त हैं। अगर शुभ भी करना हो, तो अशुभ होता रहता है। अगर मैं दौड़कर, आप गिर पड़े हों, आपको उठाने भी आऊं, तो जितनी देर दौड़ता हूं उतनी देर में न मालूम कितने कीड़े—मकोड़ों की जान ले लेता हूं! न मालूम कितनी श्वास चलती है, कितने जीवाणु मर जाते हैं!

मैं कुछ भी करूं इस जगत में, तो शुभ और अशुभ दोनों संयुक्त हैं। दोनों संयुक्त हैं। मैं आपसे यह कह रहा हूं कि कालाबाजारी करके मंदिर बनाया है, ऐसा नहीं। कुछ भी करिएगा, तो आप पाएंगे कि अशुभ भी साथ में हो रहा है। इस जगत में शुद्ध शुभ नहीं किया जा सकता, शुद्ध अशुभ भी नहीं किया जा सकता। अशुभ करने भी कोई जाए तो शुभ होता रहता है, शुभ करने भी कोई जाए, तो अशुभ होता रहता है। वे संयुक्त हैं; वे एक ही चीज के दो छोर हैं। विभाजन मन का है; अस्तित्व में कोई विभाजन नहीं है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, शुभ—अशुभ दोनों से मुक्त हो जाता है। और उनसे मुक्त हुआ मुझको ही प्राप्त होता है। क्योंकि परमात्मा, अर्थात मुक्ति।

इसलिए जिन्होंने मुक्ति को बहुत जोर दिया, उन्होंने परमात्मा शब्द का उपयोग भी नहीं करना चाहा। महावीर ने परमात्मा शब्द का उपयोग नहीं किया। क्योंकि महावीर ने कहा, मुक्ति पर्याप्त है, मोक्ष पर्याप्त है। मोक्ष शब्द काफी है। मुक्त हो गए, सब हो गया। अब और चर्चा छेड़नी उचित नहीं है।

लेकिन महावीर के लिए मोक्ष का जो अर्थ है, वही हिंदुओं के लिए मुसलमानों के लिए ईश्वर का अर्थ है। ईश्वर का और कोई अर्थ नहीं है, परम मुक्ति, दि अल्टिमेट फ्रीडम।

क्योंकि जब तक अहंकार मौजूद है, तब तक मैं कभी मुक्त नहीं हो सकता। क्योंकि अहंकार की सीमाएं हैं, कमजोरिया हैं। अहंकार की सुविधाएं—असुविधाएं हैं। अहंकार कुछ कर सकता है, कुछ नहीं कर सकता। बंधन जारी रहेगा। सीमा बनी रहेगी।

सिर्फ परमात्मा ही जब मेरा केंद्र बनता है, मेरी सब सीमाएं गिर जाती हैं। उसके साथ ही मैं मुक्त हो जाता हूं। उसके साथ ही मुक्ति है। वही मुक्ति है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल


गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 10

 खोज की सम्‍यक दिशा

येऽम्मन्यदेक्ता भक्त? यजन्ते श्रद्धायान्त्रिता।

तेऽयि मामेव कौन्तेय यजन्‍त्यविधिपूर्वकम् ।। 23।।

अहं हि सर्वज्ञानां भोक्‍ता च प्रभुरेव च।

न तु मामीभजानन्ति तत्‍वेनातश्व्यवन्ति ते।। 24।।

यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृक्ता।

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।। 25।।


और हे अर्जुन यद्यपि श्रद्धा युक्त हुए जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते है, वे भी मेरे को ही पूजते हैं। किंतु उनका यह पूजन। अविधिपूर्वक है, अर्थात अज्ञानपूर्वक है। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूं।

परंतु वे मुझे अधियज्ञ— स्वरूप परमेश्वर को तत्‍व से नहीं जानते है। इसी से गिरते है, अर्थात पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।

कारण यह है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते है, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते है। भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते है, और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।  इसलिए मेरे भक्तों का पूनर्जन्म नही होता।


 मनुष्य की खोज चाहे हो कुछ भी, चाहे मांग हो कोई, चाह हो कोई, किसी भी दिशा में दौड़ता हो, कुछ भी पाना चाहता हो, लेकिन अंततः मनुष्य परमात्मा को ही पाना चाहता है। उसकी सब चाहो में परमात्मा की ही चाह छिपी होती है। उसकी सब वासनाओं में उस प्रभु की तरफ पहुंचने की ही आकांक्षा का बीज छिपा होता है। और जरूरी नहीं है कि यह उसे ज्ञात हो, इसका ज्ञान न भी हो। नहीं होता है। तो भी बीज परमात्मा की ही तलाश का है।

हम एक बीज को बोते हैं जमीन में, उस बीज को पता भी नहीं होगा कि वह किस लिए टूट रहा है और किस लिए अंकुरित हो रहा है। उसे यह भी पता नहीं होगा कि इस अंकुरण की प्रक्रिया का अंतिम रूप क्या होने को है। उसे यह भी पता नहीं है कि यह जो आकाश की तरफ उसकी दौड़ चल रही है, यह जो आकाश में शाखाओं को फैला देने का आयोजन चल रहा है, यह किस लिए है? वह किसे पाना चाहता है? उसे उन फूलों का तो कोई भी स्मरण न होगा, कोई भी स्वप्न भी नहीं होगा, जो फूल उसकी शाखाओं पर खिलेंगे। और उन बीजों की उसे कोई खबर नहीं हो सकती है, जो उसके ऊपर लगने वाले हैं। उस जीवन का भी उसे कोई अंदाज नहीं हो सकता, जो कि वृक्ष का जीवन होगा।

ठीक, आदमी भी बीज की तरह परमात्मा की तरफ बढ़ता है, अनजाने। उसे पता भी नहीं कि वह क्या खोज रहा है! क्यों खोज रहा है! उसकी सब खोजों में अंतर्निहित खोज क्या है! इसे हम थोड़ा आदमी की इच्छाओं को समझें, तो समझना आसान हो जाएगा।



एक आदमी है, जो धन चाहता है; धन के पीछे दौड़ रहा है। उससे अगर हम कहें कि वह भी परमात्मा को खोज रहा है, तो वह भी मानने को राजी नहीं होगा, दूसरे तो राजी होंगे ही नहीं। एक आदमी पद की तलाश कर रहा है, प्रतिष्ठा की, यश की। अगर हम कहें कि वह भी प्रभु को खोज रहा है, तो कौन तैयार होगा इस असंगत बात को स्वीकार करने को? एक आदमी प्रेम को खोज रहा है, और हम कहें परमात्मा को खोज रहा है, तो कोई तालमेल नहीं मालूम पड़ता। लेकिन अगर थोड़ा गहरे उतरें, तो सीढ़ियां दिखाई पड़नी शुरू हो जाएंगी, श्रृंखला साफ होने लगेगी।

एक आदमी धन खोजता है, किस लिए? और धन से क्या उसका प्रयोजन है ।

धन खोजता है तीन कारणों से। पहला, सुरक्षा के लिए, फार सिक्योरिटी। कल की कोई सुरक्षा नहीं है। अगर धन पास में है, तो कल की सुरक्षा हो जाएगी। अगर धन पास में है, तो कल के लिए निश्चित हो सकता है। अगर धन पास में है, तो कल की फिक्र छोड़ी जा सकती है।

इसका अर्थ हुआ कि धन खोज रहा है इसलिए कि एक ऐसा जीवन मिल जाए, जहां फिक्र न हो, चिंता न हो। एक ऐसा जीवन मिल जाए जहां सुरक्षा हो, असुरक्षा न हो, जहां भय न हो; जहां मैं असहाय अनुभव न करूं अपने को। वह एक ऐसा जीवन खोज रहा है। लेकिन धन खोज रहा है इस जीवन के लिए। धन से यह जीवन नहीं मिलेगा, लेकिन आकांक्षा यही है।

एक आदमी जब धन खोज रहा है, तो वह भी ऐसा धन खोजता है—दूसरी बात—जो छीना न जा सके। इसलिए तो इतना इंतजाम करता है तिजोडियों का, बैंकों का, सेफ्टी का, सारा इंतजाम करता है कि छीना न जा सके। आकांक्षा यह है कि धन हो तो ऐसा, जो कोई छीन न सके। हालाकि जो भी धन हम इंतजाम करते हैं, वह छीना जा सकता है। छीना जाता है। अब तक आदमी कोई उपाय नहीं कर पाया कि ऐसा धन खोज ले, जो छीना न जा सके। सब उपाय व्यर्थ हो जाते हैं।

लेकिन आदमी की आकांक्षा को खोजें, तो वह जरूर ऐसा धन खोजना चाहता है, जो फिर उसका ही हो, और फिर कभी भी ऐसा न हो कि पराया हो जाए। हर आदमी एक ऐसी संपदा खोजना चाहता है, जो सदा—सदा के लिए शाश्वत उसकी अपनी हो। परमात्मा के सिवाय ऐसी कोई संपदा हो नहीं सकती, जो छीनी न जा सके। सिर्फ वही है, जो छीना नहीं जा सकता।

आदमी जब धन खोजता है, तो—तीसरे नंबर पर—भीतर वह खालीपन अनुभव करता है, रिक्तता अनुभव करता है, उसे भर लेना चाहता है। पूरी जिंदगी दौड़कर भी, धन की राशि लग जाती है, भीतर का खालीपन नहीं भरता। लेकिन आदमी खोजता इसीलिए है कि भीतर भर जाए, एक आंतरिक फुलफिलमेंट हो, एक भीतर तृप्ति हो जाए भरापन आ जाए; ऐसी कोई कमी न मालूम पड़े, कोई अभाव न मालूम पड़े, संतुष्ट हो जाए भीतर, तृप्ति आ जाए; क्षणभर को भी ऐसा न लगे कि मुझे कुछ और चाहिए। यह तीसरी बात है।

आदमी धन इसलिए खोजता है कि ऐसी अवस्था आ जाए कि कुछ उसे मांगने को न बचे, कुछ चाहने को न बचे, ऐसा न रहे उसे कि फला चीज मेरे पास नहीं है, अभाव न खटके, खालीपन न खटके; सब मेरे पास है, ऐसी तृप्ति हो। लेकिन कितना ही धन मिल जाए, ऐसी तृप्ति होती नहीं। ऐसी तृप्ति तो केवल उसी को होती है, जिसे परमात्मा का धन मिल जाता है।

तो धन की भी खोज कितनी ही गलत हो, दिशा कितनी ही भ्रांत हो, आकांक्षा बिलकुल सही है। वह जो भीतर बीज है, वह बिलकुल सही है। मार्ग चाहे अंकुर का कितना ही विकृत हो जाए, लेकिन उसकी अनजानी खोज बिलकुल प्रामाणिक है।

एक आदमी पद चाहता है। पद चाहता है तीन कारणों से, किसी से हीन न मालूम पडुं किसी से नीचा न मालूम पडूं। लेकिन कितना ही कोई पद खोजें, सदा कोई न कोई आगे मौजूद रहता है। अब तक ऐसा एक भी आदमी किसी पद पर नहीं पहुंच पाया, जहां जाकर वह कह सके, अब मेरे आगे कोई भी नहीं है। कुछ भी हो जाए, कितनी ही बड़ी सीढ़ी चढ़ जाए, जितनी बड़ी सीढ़ी चढ़ता है, पाता है कि आगे और सीढ़ियों पर लोग पहले से चढ़े हुए हैं।

और ऐसा सभी को अनुभव होता है। अनुभव होने के कई जटिल कारण हैं। एक तो जिंदगी इकहरी सीढ़ी नहीं है, अनेक सीढ़ियों का जोड़ है। अगर आप एक सीढ़ी पर चढ़ जाते हैं, तो अनेक बार उसी में चढ़ने की वजह से दूसरी सीढ़ी पर नीचे उतर जाते हैं। अगर दो सीढ़ियों पर चढ़ जाते हैं, तो चार पर नीचे उतरना पड़ता है। वह कीमत चुकानी पड़ती है।

एक आदमी अगर एक बड़े पद पर पहुंच जाता है, तो पद पर पहुंचने के लिए जो बेचैनी और परेशानी उठानी पड़ती है, उसमें स्वास्थ्य खो देता है। तब एक दिन देखता है कि सड़क पर एक फकीर जा रहा है, जिसके पास स्वास्थ्य की अपार संपदा है, तब मन ईर्ष्या से भर जाता है। एक सीढ़ी पर कोई चढ़ा हुआ है, जहां वह नीचे पड़ गया है।

एक आदमी पद की दौड़ में प्रतिभा को खो देता है। असल में पद की दौड़ अगर पूरी करनी हो, तो प्रतिभा की जरूरत भी नहीं है।

प्रतिभा हो, तो खतरा है। उतनी दौड़ में जाना मुश्किल होगा। एक गहरी मूढ़ता चाहिए तो पद की दौड़ में आदमी अंधा होकर लग जाता है। वह योग्यता है। प्रतिभा खो देता है। इधर प्रतिभा खो जाती है, जिस दिन पद पर पहुंचता है, उस दिन पाता है कि चारों ओर प्रतिभा के दीए जल रहे हैं, और सीढ़ियों में वह पिछड़ गया है। जिंदगी अनेक सीढ़ियां हैं। अगर कोई एक सीढ़ी पर चढ़ता है, दूसरों पर नीचे उतर जाता है। और किसी भी सीढ़ी पर कितना भी चढ़ जाए, फिर भी पाता है कि उससे भी ऊपर सीढ़ियों पर लोग चढ़े हुए हैं!

लेकिन आदमी की आकांक्षा सही है। आदमी चाहता है ऐसी अवस्था, जहां वह किसी से नीचा न रह जाए।

सिवाय परमात्मा को पाए और कोई उपाय नहीं है।

लेकिन एक मजे की बात है। आदमी चाहता है कि मैं किसी से नीचे न रह जाऊं, इसलिए दूसरों को नीचा करने में लग जाता है! पर उसे पता नहीं है कि जो वह कर रहा है, वही सारे लोग भी कर रहे हैं! मैं एक आदमी हूं;  अरबो आदमी जमीन पर हैं। मैं भी इस कोशिश में लगा हूं कि किसी से नीचे न रह जाऊं। और इसके लिए दूसरों को नीचा करने में लगा हूं।  अरबो आदमी, इसी कोशिश में वे भी लगे हैं! वे भी दूसरों को नीचा करने में लगे हैं, ताकि वे ऊपर हो जाएं। एक—एक आदमी अरबों अरबो आदमियों के खिलाफ लड़ रहा है! हारेगा नहीं, तो क्या होगा? अरबो आदमी मुझे नीचा करने में लगे हैं; मैं अरबो आदमियों को नीचा करने में लगा हूं! एक पागलों की भीड़ है, जिसमें कोई कहीं पहुंच नहीं सकता।

लाओत्से ने कहा है कि मैंने तो शांति का सूत्र इसी में जाना कि उस जगह बैठ जाओ, जिससे नीची कोई जगह न हो, अन्यथा उठाए जाओगे। उस गड्डे में गिर जाओ, जिससे नीचा कोई गड्डा न हो, अन्यथा लतियाए जाओगे। लाओत्से ने कहा, मैंने तो शांति और संतुष्टि इसमें पाई, जब मैंने दूसरे को नीचा करना तो दूर, अपने को सबसे नीचा स्वीकार कर लिया। उस दिन के बाद मुझे कोई नीचा नहीं कर सका है। जो आदमी पंक्ति में सबसे अंतिम खडे होने को राजी है, वही प्रथम हो जाएगा।

लेकिन हमारा क्या होगा, जो पंक्ति में प्रथम खड़े होने के लिए आतुर हैं! हम संघर्ष करेंगे, लड़ेंगे, परेशान होंगे और आखिर में पाएंगे, आगे नहीं पहुंच पाए हैं। संभवत: पंक्ति सीधी नहीं है, सर्कुलर है; गोल घेरे में है। इसीलिए तो कोई आदमी अनुभव नहीं कर पाता कि मैं आगे आ गया। कितना ही दौड़ता है, लेकिन क्यू के आगे नहीं पहुंच पाता। क्यू गोलाकार है, अन्यथा कोई न कोई पहुंच जाता। कोई सिकंदर, कोई नेपोलियन, कोई हिटलर, कोई स्टैलिन कहीं न कहीं पहुंच जाता, और एक दिन कह देता कि ठीक है, मैं क्यू के आखिरी हिस्से में आ गया, नंबर एक हो गया! लेकिन कहीं भी कोई पहुंच जाए वह पाता है कि उसके आगे लोग मौजूद हैं।

इसका एक ही मतलब हो सकता है कि जिंदगी सीधी रेखा में नहीं चल रही है, वर्तुलाकार है, सर्कुलर है। इसलिए आप एक गोल घेरे में अगर दस—बारह लोग खड़े हैं, उनमें से कोई कितना ही दौड़े, और कितनी ही कोशिश करे, जिंदगी गंवा दे नंबर एक होने के लिए, कभी नंबर एक नहीं हो पाएगा। क्योंकि गोले में कोई नंबर एक होता ही नहीं। हमेशा कोई आगे होता है, कोई पीछे होता है। कहीं भी जाए; हमेशा कोई आगे होता है, कोई पीछे होता है। लेकिन आकांक्षा ठीक है और आकांक्षा उचित खबर देती है। वह खबर यह है कि जब तक कोई व्यक्ति अपने को परमात्मा के साथ एक न समझ ले, तब तक हीनता नहीं मिटती। और जब तक हीनता, इनफीरिआरिटी नहीं मिटती है, तब तक ईर्ष्या भी नहीं मिटती। और जब तक हीनता और ईर्ष्या नहीं मिटती है, तब तक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश भी नहीं मिटती। और इस सबका अंतिम परिणाम चिंता और संताप के सिवाय और कुछ भी नहीं होता है। लेकिन आदमी चाहता है परम पद। वह परमात्मा को चाहता है। इसका उसे बोध न हो, इसका उसे होश न हो, यह हो सकता है।

एक और तरफ से देखें। हर आदमी मृत्यु से भयभीत है, कंपित है। हर आदमी डरा हुआ है। चाहे कितना ही सुरक्षित हो, मौत कहीं किनारे पर खड़ी हुई मालूम पड़ती है, और किसी भी क्षण गर्दन को दबा ले सकती है। हर व्यक्ति डरा हुआ है मृत्यु से।

छोटा—सा बच्चा पैदा होता है, वह भी डरता है, डरता हुआ पैदा होता है। जोर की खटके की आवाज हो जाए, कांप जाता है। अंधेरा हो, भयभीत होने लगता है। कोई पास न हो, अकेला हो, चीखने—चिल्लाने लगता है। पहले दिन से ही भय में जन्मा हुआ है। पूरा जीवन एक भय से कांपता हुआ पत्ता है। हम उपाय करते हैं, हम कई तरह के उपाय करते हैं, ताकि मृत्यु से बच सकें। आकांक्षा बिलकुल ठीक है, लेकिन अब तक कोई मृत्यु से बच नहीं पाया, और बच भी नहीं पाएगा।

और अक्सर तो यह होता है, जो मृत्यु से बचने का जितना इंतजाम करते हैं, उतने ही जल्दी अपने ही इंतजाम में दबकर मर जाते हैं। ऐसी हालत हो जाती है, जैसे कोई आदमी मौत न आए, तो अपने चारों तरफ लोहे का एक बख्तर बनाकर पहन ले, लोहे के कपड़े पहन ले, कहीं से मौत न घुस जाए! तो अभी मर जाएगा। कल के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। हम सब अपनी जिंदगी को चारों तरफ से इतना सुरक्षित कर लेते हैं कि जिंदगी मर जाती है। जिंदगी असुरक्षा में है। जिंदगी तो असुरक्षा में है, अनसर्टेंटी में, अनिश्चय में। हम सब निश्चित करके, सब व्यवस्था ठीक से बिठाकर, उसके भीतर मुर्दे की तरह बैठ जाते हैं। मौत से केवल मुर्दा बच सकता है; जो मर ही चुका है, वह भर बच सकता है। जो जिंदा है वह तो मरेगा ही।

इसलिए कितना ही हम उपाय करें, उपाय करने में मौत तो नहीं रुकती, जिंदगी गंवा बैठते हैं। उपाय में ही जिंदगी खो जाती है। मौत से बचने का उपाय करते—करते, करते—करते जिंदगी का समय चुक जाता है। घड़ी का कांटा घूम जाता है और मौत आ जाती है। और हम तब घबड़ाकर कहते हैं कि अभी तो हम सिर्फ मौत से बचने का इंतजाम कर रहे थे! यह समय तो हमने मौत से बचने में गंवा दिया! अभी हम जीए कहां थे?

जीना समाप्त हो जाता है जीने के इंतजाम में। जीने का मौका ही नहीं मिलता; अवसर नही मिलता; सुविधा नहीं मिल पाती। लेकिन आकांक्षा दुरुस्त है। मौत से बचने की आकांक्षा दुरुस्त है, लेकिन दिशा गलत है।

मौत से बचने का एक ही उपाय है कि हम उसे जान लें, जो अमृत है; हम उसे पहचान लें, जो मरता ही नहीं; हम उसके साथ अपनी एकता को खोज लें, जिसकी कोई मृत्यु नहीं है। यह तो ठीक  दिशा होगी। हम इंतजाम करते हैं मौत से बचने का, और उससे जुड़े जिसमें अंतर्निहित है, मृत्यु जिसका हिस्सा है। उसका हम इंतजाम करते हैं बचाने का! इंतजाम में समय व्यतीत हो जाता है और मौत आ जाती है। उसकी खोज नहीं कर पाते, जो कि कभी मरा ही नहीं है और कभी मरेगा ही नहीं। वह भी मौजूद है।

अगर यह आकांक्षा ठीक हो, तो अमृत की खोज बनेगी, अगर यह आकांक्षा गलत हो, तो मृत्यु से बचाव बनेगी। अगर धन की खोज ठीक हो, तो उस परम धन की खोज बन जाएगी, परम संपदा की। अगर गलत हो, तो हम धातु के ठीकरे इकट्ठे करने में जिंदगी व्यतीत कर देंगे। अगर पद की खोज सही हो, तो परमात्मा के सिवाय और कोई पद नहीं है। अगर गलत हो, तो हम आदमियों को नीचे—ऊंचे बिठालने में अपनी सारी शक्ति को व्यय कर देंगे। 

कृष्ण ने कहा है इस सूत्र में कि हे अर्जुन, यद्यपि श्रद्धा से युक्त हुए जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मेरे को ही पूजते हैं।

चाहे पूजा किसी की भी हो रही हो, अंततोगत्वा पूजा मेरी ही होती है, कृष्‍ण कहते हैं। पूजने वाले को भी पता न हो कि वह किसकी पूजा कर रहा है, लेकिन पूजा मेरी ही हो सकती है। कारण? पूजा करने वाले को भी जब पता नहीं है, तो कृष्ण किस अर्थ में कह रहे होंगे कि पूजा मेरी ही होती है?

वे इसी अर्थ में कह रहे है कि तुम्हारी वासनाए कहीं भी दौड़े और तुम्हारी पूजा किन्हीं चरणों में पड़े, और तुम श्रद्धा से कहीं भी सिर रखो, तुम मेरी ही तलाश में हो। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कहां तुम्हारी आंख जा रही है। अंततः तुम्हारी आंख मुझे ही खोज रही है। तुम कहीं भी खोजो, तुम्हारी आँख की आंत्यतिक शरण मैं ही हूं। किंतु उनका वह पूजना अविधि पूर्वक है, अज्ञान पूर्वक है।

पूजते वे मुझे ही हैं, फिर भी ज्ञानपूर्वक नही। क्योंकि उन्हें स्वयं ही पता नहीं है कि वे क्या खोज रहे हैं। उन्हें स्वयं ही पता नहीं है।

सकाम पूजा का अर्थ है, धन के लिए, पद के लिए जीवन के मांग रहा है परमात्मा से कुछ, किसी भी देवता के सामने मांग रहा है, इसलिए की गई पूजा; सुख के लिए की गई पूजा। मंदिर में खड़ा कोई पूजास्थल हैं; लेकिन जब भी किसी पूजास्थल पर और किसी भी देवता की प्रतिमा के समक्ष कोई कुछ मांग रहा है, तब वह अज्ञान से भरा हुआ है। क्योंकि जिसके पास होने से ही सब मिल जाता है, अगर उससे भी मांगना पड़े, तो उसका अर्थ है कि हमें पास होना ही पता नहीं है। जिसके निकट होने से ही सब मिल जाता है, उसके पास भी जाकर मांगना पड़े, तो उसका अर्थ है, हम पास पहुंचे ही नहीं, उपासना हुई ही नहीं।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, अविधिपूर्वक है। उसे विधि का भी पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है!

अगर सूरज के सामने कोई हाथ जोड़कर खड़ा हो और कहे कि हे सूरज मुझे प्रकाश दे। तो एक बात पक्की है कि वह आदमी अंधा होगा। क्योंकि सूरज के सामने आंख खोलकर खड़े होने से प्रकाश मिलता ही है, अब इसकी मांग की कोई जरूरत न रही। लेकिन अगर कोई आदमी मांग रहा है सूरज के सामने हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ा रहा है, रो रहा है, घुटने टेके खडा है, और कह रहा है कि हे सूरज, मुझे प्रकाश दे! तो एक बात तय है कि वह आदमी अंधा है। उसे यह भी पता नहीं है कि वह सूरज के सामने खड़ा है। और सूरज के सामने होने का मतलब ही प्रकाश का मिल जाना हो जाता है। और कुछ मांगने की जरूरत नहीं।

तो जो व्यक्ति परमात्मा के सामने भी कुछ मांगता हुआ पहुंचता है, एक बात पक्की है, उसे पता नहीं है कि जहां वह मांग रहा है, वहां परमात्मा है। उसकी मांग ही बता रही है कि उसे परमात्मा के पास होने का खयाल भी नहीं है। वह अपनी मांग में ही घिरा हुआ चल रहा है। चारों तरफ मांग ही उसको घेरे हुए है। उपासना संभव नहीं है उसे। वासना में ही दबा हुआ है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, चाहे वह कितनी ही विधि करता हो। विधि बहुत करता है। सच तो यह है कि जो विधि बिलकुल नहीं जानता है, वह बहुत विधि करता है। कितनी विधियां नहीं पूजा और प्रार्थना करने वाले लोग करते हैं! सकाम विधियां हजार हैं, लाख हैं। कितना—कितना उपाय करना पड़ता है! क्या—क्या सामग्री जुटानी पड़ती है! एक—एक व्यवस्था से एक—एक कदम उठाना पड़ता है।

पूजा एक पूरा रिचुअल है, एक क्रिया—कांड है; उसमें जरा भी भूल—चूक नहीं होनी चाहिए; गणित की पूरी व्यवस्था है। जब कोई भी उपासक सकाम वासना से भरकर पूजा में लगता है, तो रत्ती—रत्ती हिसाब रखता है, पूरी विधि का पालन करता है। और कृष्ण कहते हैं, अविधिपूर्वक! हालांकि वे खुद ही कह रहे हैं कि हे अर्जुन, यद्यपि श्रद्धा से युक्त हुए जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मेरे को ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजना अविधिपूर्वक है।

विधि तो उन्हें भी पता है। विधि की कोई कठिनाई नहीं है। एक—एक चरण विधि का ज्ञात है, और चरण पूरा किया जाता है। लेकिन फिर भी कृष्ण अविधिपूर्वक कहते हैं!

अविधिपूर्वक कहने का कारण है। परमात्मा के पास, सिर्फ पास होना ही पर्याप्त विधि है, और किसी विधि का अर्थ नहीं है। बाकी सब विधियां स्वयं को दिए गए धोखे हैं। उसके पास होने की कला ही आ जाए, उसकी मौजूदगी को अनुभव करने का द्वार खुल जाए, तो पर्याप्त विधि हो गई। लेकिन विधि तो वे करते हैं!

कृष्ण कहते हैं, अज्ञानपूर्वक।

अज्ञान भी विधि कर सकता है, अक्सर करता है, करेगा ही; और उसको कुछ उपाय भी नहीं होता। हम सारे लोग अज्ञानपूर्वक न मालूम कितनी विधियों को विकसित कर लिए हैं! बडा जटिल जाल निर्मित किया है।

बुद्ध को हम चलते देखते हैं, उठते देखते हैं, बैठते देखते हैं—हम विधि का निर्माण कर लेते हैं। हम सोचते हैं, अगर ऐसे ही हम उठे, ऐसे ही हम चले, ऐसे ही हम बैठे, तो बुद्ध को जो हुआ है, वह हमें भी हो जाएगा।

हम मीरा को नाचते देखते हैं, गीत गाते देखते हैं, आनंद से विभोर देखते हैं। हम सोचते हैं, मीरा ने जैसे कपडे पहने, मीरा ने जैसा तिलक लगाया, मीरा जिस मंदिर के सामने खड़ी है, मीरा ने जो कृष्ण की मूर्ति बनाई, मीरा का जो पूजा का ढंग है, अगर वही ढंग हमने भी पूरा—पूरा पाला, तो जो मीरा को मिला है, वह हमें भी मिल जाएगा!

और यह हो सकता है कि हम मीरा की विधि का पूरा—पूरा अनुगमन कर लें, लेकिन जो मीरा को मिला है, वह हमें इससे नहीं मिल जाएगा। क्योंकि जो दिखाई पड़ रहा था, वह तो केवल ढांचा था, आत्मा नहीं थी, जो नहीं दिखाई पड़ रही है—विधि, उपासना, निकट होने की क्षमता—वह ढांचा नहीं है। वह दिखाई नहीं पड़ता। वह आंतरिक है। वह भीतरी है।

हालांकि विधि सब टूट गई। लेकिन फिर भी इसकी विधि में एक आत्मीयता है, और इसकी विधि में एक रस है, और इसकी विधि में एक हार्दिक प्रेम है, और इसकी विधि में फूल महत्वपूर्ण नहीं रहा, भोजन महत्वपूर्ण नहीं रहा, बाहरी औपचारिकता महत्वपूर्ण न रही, अंतस का निवेदन महत्वपूर्ण हो गया है। यह जब खड़ा है सामने भगवान के, तो सब मिट गया बाहर का। इसके भीतर का आंतरिक लगाव ही सब कुछ है।

पूजा की आत्यंतिकता तो तब है, जब कोई अपने को ही समर्पित कर देता और चढ़ा देता है। लेकिन विधिया औपचारिक हैं, फार्मल हैं, बाहर हैं। कृष्ण जानते हैं भलीभांति कि यह जो देवताओं की पूजा चलती है, विधिपूर्वक चलती है, लेकिन उसे वे अविधि कहते हैं। इसलिए क्योंकि अज्ञान में अविधि ही हो सकती है। ज्ञान में ही विधि का जन्म होता है। और वह विधि विधियों जैसी नहीं होती, वैयक्तिक होती है, निजी होती है, एक—एक व्यक्ति की अपनी होती है। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूं।

चढ़ाओ तुम कहीं से फूल, मुझ तक पहुंच जाते हैं, और गाओ। तुम गीत कहीं, वह मेरे पास चला आता है, और करो तुम कुछ, सभी कुछ मुझे समर्पित हो जाता है।

कृष्ण यह कह रहे हैं कि मैं केंद्र हूं अस्तित्व का। तुम कहीं भी कुछ करोगे—तुम्हारा बुरा भी, तुम्हारा भला भी, तुम्हारा ठीक भी, तुम्हारा गलत भी—सब मुझ तक पहुंच जाता है, तुम्हें पता हो या न पता हो। फर्क पड़ेगा, अगर तुम्हें पता हो। तो तुम्हारी जिंदगी में क्रांति हो जाएगी।

परंतु वे मुझ अधियज्ञ—स्वरूप परमेश्वर को तत्व से नहीं जानते

वे जो सारा जीवन मेरे आस—पास घूमते हैं, उन्हें तत्व से पता नहीं है कि वे किसकी परिक्रमा कर रहे हैं? किसका परिभ्रमण कर रहे हैं? किसके आस—पास घूम रहे हैं? घूमते रहते हैं पागल की तरह, पर उन्हें पता नहीं कि जहां वे घूम रहे हैं, वह प्रभु का मंदिर है, उसकी परिक्रमा है।

इसी से गिरते हैं, अर्थात पुनर्जन्म को उपलब्ध होते हैं।

इस संबंध में दो—तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं, जो कि भारतीय चिंतन के आधार कहे जा सकते हैं।

एक, भारतीय चिंतन सदा से विकासवादी है, एवोल्‍यूशनरी है। भारतीय चिंतन मानता है कि व्यक्ति को लौट—लौटकर उसी अवस्था में बार—बार नहीं गिरना चाहिए, क्योंकि उसका अर्थ हुआ कि उसके जीवन में कोई विकास नहीं हो रहा है। कल मैंने जो किया था, अगर वही भूल मैं आज भी करता हूं और कल भी करता हूं तो मेरी चेतना में कोई विकास नहीं हो रहा है। अगर जिंदगीभर मैं एक सर्किल में घूमता रहता हूं, बार—बार वही करता हूं बार—बार वही भोगता हूं तो मेरी जिंदगी विकासमान नहीं है, मेरी जिंदगी वर्तुलाकार है और चाक की भांति घूमती चली जाती है। विकासमान तो वह है, जो नए को उपलब्ध होता है और पुराने को पुनरुक्त नहीं करता। रिपीटीशन नहीं करता पुराने का, तो आगे जाता है।

एडीसन ने अपने एक पत्र में किसी को लिखा है कि रोज सांझ को सूरज से यह प्रार्थना करता हूं कि जहां तूने सुबह मुझे पाया था, वहां सांझ मुझे मत पाना; रात यह प्रार्थना करके सोता हूं कि सूरज, सांझ तू मुझे जहां छोड़ गया है, कुछ ऐसा हो कि सुबह तू मुझे वैसा ही न पाए कुछ बदल जाए, कुछ नया हो जाए।

लेकिन जैसा हमारा मन है, वह पुनरुक्त करता है। मन रिपिटीटिव है। मन की कुछ बातें मैंने आपसे पीछे कही हैं। यह बात भी आप खयाल में ले लें कि मन एक रिपीटीशन, एक पुनरुक्ति है। वही—वही रोज करता है। एक घेरा बना लेता है। जैसे छोटे बच्चों की रेलगाड़ी होती है, एक गोल पटरी पर चलती है। चाबी भर दी, पटरी का चक्कर लगा लेती है। चाबी चुक गई, फिर चाबी भर दी, फिर पटरी का चक्कर लगा लेती है। हमारी चाबी चुकती रहती है। रोज हम भरते रहते हैं भोजन से। चक्कर रोज पूरा होता रहता है। स्थूल डाल दिया, ईंधन डाल दिया शरीर में, वह अपना रोज का चक्कर पूरा कर लेता है।

कभी आप अपने चौबीस घंटे के वर्तुल का अध्ययन करें, तो आप बहुत चकित हो जाएंगे कि रोज—रोज आप वही करते हैं। रोज—रोज!

मेरा मतलब यह नहीं है कि रोज आप अलग—अलग दफ्तर में जाएं। यह भी मतलब नहीं है कि रोज—रोज नई दुकान खोलें। दुकान तो वही रहेगी, दफ्तर वही रहेगा। नहीं, लेकिन रोज—रोज आपके मन की जो चित्त—दशाएं हैं, वे भी वही होती हैं। चौबीस घंटे में आपको कितनी बार क्रोध करना है, उतनी बार आप रोज कर लेते हैं। कितनी बार उत्तेजित होना है, आप उतनी बार उत्तेजित हो लेते हैं। कितनी बार दुखी होना है, आप उतनी बार दुखी हो लेते हैं। कई बार आप चकित भी होते हैं कि अभी तो दुख का कोई कारण नहीं था, मैं दुखी क्यों हो रहा हूं?

वक्त आ गया! जैसे वक्त पर चाय पीनी पड़ती है, या सिगरेट पीनी पड़ती है, वैसे ही वक्त पर दुखी भी होना पड़ता है। वक्त आ गया। भीतर से दशा लौट आई।

मन चौबीस घंटे दोहराए चला जाता है यंत्रवत। इस मन के दोहराने को अगर हम लंबा फैलाएं पूरे जीवन के विस्तार पर, तो इसके कई वर्तुल हैं। रोज घूमता है, वर्ष प्रतिवर्ष घूमता है, फिर जीवन से दूसरे जीवन में घूमता चला जाता है। इसको पुनर्जन्म कहता है भारत।

भारत कहता है कि आदमी जैसा है, अगर वह अपने को रोज—रोज विकासमान न करे, तो वह फिर पूरा का पूरा जीवन वापस दोहर जाएगा। जन्म के बाद हम मृत्यु तक जहां तक पहुंचे हैं, मृत्यु हमें वापस पुरानी जगह पर खडा कर देगी; हम फिर से जन्म शुरू कर देंगे, फिर वही का वही, फिर वही का वही।

बुद्ध और महावीर ने एक अनूठा प्रयोग अपने साधकों के लिए खोजा था। वे तब तक किसी व्यक्ति को साधना में नहीं ले जाते थे, जब तक उसको पिछले जन्मों का स्मरण न करा दें।

छोड़े, पिछले जन्म का स्मरण तो थोड़ा कठिन पड़ेगा, लेकिन रोज का तो स्मरण है बीता कल तो आपको पता है। कल भी आपने जिस बात पर क्रोध किया था, और पछताए भी थे कि अब क्रोध नहीं करूंगा, आज भी उसी बात पर क्रोध किया है और आज भी पछताए हैं कि क्रोध नहीं करूंगा! और आज भी आप सोच रहे हैं कि अब कल क्रोध नहीं होगा, क्योंकि मैं पछता लिया हूं। लेकिन पछताए तो आप कल भी थे, परसों भी थे।

आप सिर्फ पुनरुक्त कर रहे हैं। क्रोध भी करते हैं, पछता भी लेते हैं। फिर क्रोध करते हैं, फिर पछता लेते हैं।

एक मित्र मेरे पास आते हैं; क्रोधी हैं। ऐसे तो कौन नहीं है; थोड़े ज्यादा हैं। कहते हैं कि किसी तरह मेरा क्रोध छूट जाए। बहुत पछताते हैं, रोते हैं, छाती पीटते है—जब क्रोध कर लेते हैं।

मैंने उनसे कहा, क्रोध की फिक्र छोड़ो, तुम पछताना बंद कर दो। एक काम करो। तुम जिंदगीभर से क्रोध छोड़ने की कोशिश कर रहे हो, वह तो नहीं छूटा; तुम मेरी मानो, क्रोध की फिक्र छोड़ो, तुम पछताना बंद कर लो। एक बात पक्की कर लो कि अब क्रोध होगा, तो पछताऊंगा नहीं।

उन्होंने कहा, आप कैसे खतरनाक आदमी हैं! मैं आया हूं क्रोध छोड़ने, आप मेरा पछतावा भी छुड़ा देना चाहते हैं! फिर तो मैं महानर्क में पड़ जाऊंगा।

मैंने उनसे कहा, कोई भी तो आदत तोड़ो। अगर क्रोध की नहीं टूटती, पछतावे की तोडो; सर्किल टूट जाएगा; पछतावा ही तोड़ो। तो दूसरे क्रोध को आने का मौका नहीं रहेगा, क्योंकि बीच की एक सीढ़ी हट गयी। अब तक की व्यवस्था यह है तुम्हारी—क्रोध, पछतावा, क्रोध, पछतावा; क्रोध। यह तुम्हारा सर्किल है। कहीं से भी सर्किट तोड़ो, कहीं से भी तार को अलग खींच लो। क्रोध से नहीं खींच सकते, पछतावे से खींच लो। अगर पछतावा नहीं कर पाए, तो मैं वचन देता हूं कि दूसरा जो क्रोध इसके पीछे आना चाहिए, उसके लिए रास्ता नहीं मिलेगा।

यह आप चकित होंगे जानकर कि आप इसलिए नहीं पछताते हैं कि आप जानते हैं कि क्रोध बुरा है। आप इसलिए पछताते हैं, ताकि क्रोध की पहली अवस्था फिर से पा ली जाए, और फिर से आप क्रोध करने में समर्थ हो जाएं।

पछतावा जो है, वह क्रोध की ट्रिक है। पछतावा जो है, पश्चात्ताप जो है, वह क्रोध की होशियारी है, वह अहंकार की उस्तादी है, चालाकी है। जब आप क्रोध कर लेते हैं, तो आपको लगता है, उतना अच्छा आदमी नहीं हूं जितना मैं अपने को समझता था। पछतावा करके आप फिर समझते हैं कि उतना ही अच्छा आदमी हूं जितना अपने को समझता था। अहंकार अपना पुराना लेबल फिर से पा लेता है; वहीं पहुंच जाता है, जहां क्रोध के पहले था।

 क्रोध के कारण एक गड्डे में पड़ गए थे, क्रोध के कारण थोड़ी दीनता आ गई थी। क्रोध के कारण मन को लगा कि उतना अच्छा आदमी नहीं हूं, जितना दावा करता था। पछतावा करके वापस अपनी जगह खड़ा हो गया, उसी जगह, जहां क्रोध के पहले था। अब आप फिर क्रोध कर सकते हैं, क्योंकि उसी जगह से आपने क्रोध किया था।

मन एक पुनरुक्ति है। और मन के आधार पर जीने वाला आदमी अपने पूरे जीवन को एक पुनरुक्ति बना लेता है, जस्ट ए रिपीटीशन, ए मैकेनिकल रिपीटीशन; यंत्रवत घूमते चले जाते हैं। इसका जो बड़े से बड़ा वर्तुल है, वह पूरा जीवन है। सिर्फ भारत को इस बात का खयाल आ पाया।

भारतीय धर्मों के अतिरिक्त दुनिया का कोई धर्म पुनर्जन्म का खयाल नहीं करता। क्योंकि भारत के अलावा दुनिया के किसी धर्म ने मनुष्य के मन की इस कीमिया को ठीक से नहीं समझा कि अगर मनुष्य का मन पुनरुक्त करता है, तो पूरा जीवन भी एक वृहदकाय वर्तुल होगा और आदमी फिर पुनरुक्त करेगा! और हमने बार—बार किया है!

हम बार—बार उसी तरह लोभ में पड़े हैं, अनेक जन्मों में। बार—बार उसी तरह वासना में गिरे हैं, अनेक जन्मों में। बार—बार मकान बनाए, धन कमाया, पद कमाया। बार—बार असफल हुए, अनेक जन्मों में। और हर बार फिर वही, हर बार फिर वही!

कृष्ण कहते हैं कि ऐसे जो देवताओं को भजते हैं, बिना मुझे जाने, अर्थात जो अपनी वासनाओं को ही उपासना बना लेते हैं, जो किसी मांग से प्रार्थना करते हैं, वे बार—बार गिरते हैं और पुनर्जन्म को उपलब्ध होते हैं। कारण यह है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं।

यह बहुत कीमती सूत्र है।

कारण यह है कि पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। कारण यह है कि भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं। कारण कि व्यक्ति जो भी पूजता है, अंततः वही हो जाता है। और व्यक्ति जो भी पूजता है, अंततः उससे ऊपर नहीं जा सकता। कोई भी व्यक्ति अपने श्रद्धेय से ऊपर नहीं जा सकता।

इसे थोड़ा हम समझ लें।

आप जिसको श्रद्धा करते हैं, वह  आपका श्रेष्ठतम, अंतिम बिंदु हो गया। श्रद्धा जरा सोचकर करना, क्योंकि श्रद्धा आपके भविष्य की लकीर हो जाएगी। जिस पर आप श्रद्धा करते हैं, उससे ऊपर आप कभी नहीं जा सकते हैं। आपकी श्रद्धा आपका अंतिम बिंदु बन जाती है। वह आपके व्यक्तित्व के विकास का लक्ष्य हो जाती है। तो आदमी जिसको पूजता है, अनजाने तय कर रहा है कि यही मैं होना चाहता हूं।

ध्यान रखें, आज अगर सड़क से एक संन्यासी जा रहा हो, तो कोई भीड नहीं लग जाती उसके आस—पास। कभी लगती थी। आज से दो हजार साल पीछे, बुद्ध अगर गांव से गुजरते, संन्यासी गाव से गुजरता, तो भीड़ लग जाती थी। सारा गांव इकट्ठा हो जाता था। क्योंकि चाहे कोई दुकान कर रहा हो, चाहे कोई खेती कर रहा हो, अंतिम श्रद्धा यही थी कि एक दिन मुझे भी संन्यासी हो जाना है। चाहे न हो पाए; तो इसकी पीड़ा रह जाएगी, दंश रह जाएगा। लेकिन आज संन्यासी को देखकर कोई भीड़ इकट्ठी नहीं होती। हां अभिनेता निकलता हो, तो भीड़ इकट्ठी हो जाती है। वह हमारी श्रद्धा है। वही हम होना चाहते हैं। भला न हो पाएं, भला न हो पाएं, होना वही चाहते हैं।

जो हम होना चाहते हैं, वह हमारा श्रद्धा—पात्र हो जाता है। श्रद्धा—पात्र का अर्थ है, वह मेरे भविष्य की तस्वीर है, यही मैं होना चाहता हूं। और जो व्यक्ति जिसको श्रद्धा करता है, धीरे— धीरे वैसा ही हो जाता है। हो ही जाएगा, क्योंकि श्रद्धा से हमारी आत्मा निर्मित होती है, और श्रद्धा हमारी आत्मा का गठन करती है, और श्रद्धा हमारी आत्मा को रूपांतरित करती है। श्रद्धा सोचकर करना! बहुत होशियारी से, बहुत बुद्धिमानी से। क्योंकि श्रद्धा ढांचा बनेगी, जिसमें अंततः आप ढल जाएंगे।

तो कृष्ण कहते हैं, जो देवताओं को पूजते हैं, वे देवताओं को प्राप्त होते हैं।

लेकिन देवता तो स्वयं ही वासनाओं से घिरे हुए जीते हैं! चाहे इंद्र हो, तो भी वासनाओं से भरा हुआ जीता है! हम सबको कथाएं पता हैं कि अगर पृथ्वी पर कोई आदमी बहुत तपश्चर्या करे, तो इंद्र का सिंहासन डोलने लगता है। इसका मतलब यह है कि ईर्ष्या से वह भर जाता है, क्योंकि उसे डर होता है कि कोई दूसरा समर्थ आदमी इंद्र होने की स्थिति में आया जा रहा है। अगर यह सफल हो गया तपश्चर्या में, तो मुझे पद से हट जाना पड़ेगा, और यह आदमी मेरे पद पर बैठ जाएगा।

तो इंद्र बेचारा चौबीस घंटे अपने सिंहासन को बचाने में ही लगा हुआ है! कहीं कोई तपश्चर्या करे, कठिनाई उसे होती है! भेजता है उर्वशियों को, अप्सराओं को कि जाकर भ्रष्ट करो! इस आदमी को डांवाडोल करो! यह थोडा डांवाडोल हो जाए, तो मेरा सिंहासन स्थिर हो जाए।

जो भी सिंहासन पर है, वह सदा डरा हुआ रहेगा ही; घबड़ाया रहेगा।

हर पद के पास, हर धन के पास, हर प्रतिष्ठा के, हर सिंहासन के पास मौत की घबड़ाहट है। इंद्र घबड़ाया हुआ है; देवता घबडाए हुए हैं। वासना से भरे हुए हैं, इच्छाओं से भरे हुए हैं। कृष्ण कहते हैं कि देवताओं को पूजकर ज्यादा से ज्यादा अगर कोई आदमी पूरी तरह सफल हो गया, तो देवता हो जाएगा, इससे ऊपर नहीं जा सकता।

लेकिन देवता कोई बहुत ऊंची अवस्था नहीं है। यह भी बहुत हैरानी की बात है कि भारत अकेला देश है, जो देवताओं की अवस्था को बहुत ऊंची अवस्था नहीं मानता! और यह भी मानता है कि देवताओं को भी अगर मुक्त होना हो, तो उन्हें पहले मनुष्य होना पड़ेगा। मनुष्य चौराहा है। देवता का एक रास्ता है, मनुष्य से जाता है आगे। मालूम पड़ता है, आगे जाते। लेकिन अगर देवता को भी मुक्त होना है, तो उसे वापस चौराहे पर लौटकर मुक्ति का रास्ता पकड़ना पड़ेगा।

मनुष्य चौराहा है, क्रास—रोड है। पशु को भी अगर मुक्त होना है, तो मनुष्य होना पड़ेगा; देवता को भी मुक्त होना है, तो मनुष्य होना पड़ेगा। एक अर्थ में देवता ऊपर मालूम पड़ सकता है, क्योंकि ज्यादा सुख में है। लेकिन एक अर्थ में नीचे है, क्योंकि देवता की स्थिति से अंतिम ट्रासफामेंशन, अंतिम क्रांति नहीं हो सकती, उसे मनुष्य तक वापस लौटना पड़ेगा।

मनुष्य से ही कोई क्राति संभव है। इस अर्थ में भी भारत ने देवताओं के पास मनुष्य से ज्यादा शक्ति है, ज्यादा उम्र है, ज्यादा इच्छाओं की पूर्ति का साधन है, ज्यादा सुख है—सब कुछ है—लेकिन आत्मक्रांति का उपाय नहीं है। उन्हें वापस लौट आना पड़ेगा।

इसलिए भारत ने मनुष्य को एक अर्थ में चरम माना है। मनुष्य की इतनी गरिमा दुनिया में कहीं भी नहीं है। इस अर्थ में चरम माना है कि सिर्फ मनुष्य की ही आत्मा में मुक्त होने की आत्यंतिक घटना घट सकती है, परम स्वतंत्रता और प्रभु का दर्शन मनुष्य के साथ ही घटित हो सकता है। पशु के साथ नहीं हो सकता, क्योंकि वे भी अज्ञान में हैं, और देवताओं के साथ भी नहीं हो सकता, क्योंकि वे भी अज्ञान में हैं। पशु दुख में होगा, देवता सुख में होंगे, लेकिन दोनों अज्ञान में हैं। मनुष्य के साथ घटना घट सकती हैं तीनों।

भारत कहता है कि मनुष्य नीचे गिरना चाहे, तो पशुओं से नीचे गिर सकता है, ऊपर उठना चाहे, तो देवताओं से पार जा सकता है, और मुक्त होना चाहे, तो समस्त घेरे के बाहर छलाग लगा सकता है।

कृष्ण कहते हैं, जो पूजा करेगा पितरों की, वह पितरों को प्राप्त हो जाएगा। जो भी पूजा होगी, अगर सफल हो गए, तो वही हो जाओगे।

और मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं है। मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं! जो मुझे भजता है, वह धीरे— धीरे, धीरे— धीरे मुझमें ही एक हो जाता है।

सिर्फ परमात्मा की पुनरुक्ति नहीं होती, बाकी सब चीजें पुनरुक्त होती हैं। सिर्फ परमात्मा का कोई रिपीटीशन नहीं होता, बाकी सब चीजें दोहरती हैं। जो शाश्वत है, वही पुनरुक्त नहीं होता।

इसे समझना कठिन पड़ेगा; पर दो—तीन बातें खयाल में लें, तो शायद समझ में आ जाए।

दुनिया में सब चीजें नई होती हैं, क्योंकि सभी चीजें पुरानी पड़ जाती हैं। जो भी नई है, वह कल पुरानी हो जाएगी। जो आज पुरानी है, ध्यान रखना, वह कल नई थी। सिर्फ परमात्मा न नया है और न पुराना। वह सिर्फ है। वह कभी पुराना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह कभी नया नहीं था।

जो चीज नई है, वही पुरानी हो सकती है। जो नई नहीं है, उसके पुराने होने का कोई उपाय न रहा। तो परमात्मा न नया है, न पुराना। इसलिए हमने एक अलग शब्द गढ़ा है, वह है सनातन, वह है शाश्वत, वह है अनादि, अनंत। इस भाषा में हमने उसे कहा है कि वह सदा है। परमात्मा पुराना नहीं होता, नया नहीं होता, बस होता है।

जो चीज नई है, वह कल पुरानी हो जाएगी। और जब पुरानी हो जाएगी, तो फिर नए होने के लिए संभावना शुरू हो जाएगी। जो चीज पुरानी है, वह कल पुरानी हो —होकर नष्ट हो जाएगी, खो जाएगी; फिर नए होने का मौका मिल जाएगा।

दुनिया में सब चीजें दोहरती रहती हैं। कई दफे बहुत हैरानी की बातें होती हैं। अगर आप दुनिया के फैशन का इतिहास देखें, तो बहुत चकित हो जाएंगे! दस—पांच साल में फैशन वापस आ जाते हैं। जिन कपड़ों को दस—पांच साल पहले पुराना समझकर छोड़ दिया, दस—पांच साल बाद वे लौट आते हैं। जिन बालों के ढंग को दस—पांच साल पहले पुराना समझकर छोड़ा था, दस—पांच साल बाद वे वापस लौट आते हैं!

दस—पांच साल काफी वक्त है। पुरानी चीजें भूल जाती हैं, फिर नई हो जाती हैं। और आदमी की स्मृति इतनी कमजोर है कि वह देख ही नहीं पाता, वह खयाल भी नहीं कर पाता कि हम क्या कर रहे हैं! फिर वही चुनकर ले आता है, फिर वही चुनकर ले आता है। आदमी के मन के साथ नए और पुराने का खेल चलता रहता है, पुनरुक्ति चलती रहती है।

कृष्ण कहते हैं, जो मुझे उपलब्ध होता है, वह पुनर्जन्म को उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि वह शाश्वतता के साथ एक हो गया।

इसका दूसरा अर्थ भी है। पुनर्जन्म तो उसका ही होता है, जो समझता हो कि मेरा जन्म होता है। और जो समझता है कि मेरा जन्म होता है, फिर उसे मृत्यु की भी पीड़ा भोगनी पडती है। परमात्मा को जो जानने लगता है, वह तो जानता है कि न मेरा जन्म होता है और न मेरी मृत्यु होती है। तो जन्म और मृत्यु साधारण घटनाएं रह जाती हैं, हवा के बबूलों की तरह। और वह तो जन्म के भी पहले होता है और मृत्यु के भी बाद होता है। अब उसका कोई जन्म और मृत्यु नहीं होती।

बुद्ध से कोई पूछता है, मरने के दिन, कि क्या आप मृत्यु के बाद कहीं होंगे या बिलकुल खो जाएंगे? तो बुद्ध कहते हैं, अगर मैं मृत्यु के पहले कहीं था, तो रहूंगा। अगर पहले ही खो गया, तो पीछे भी बचेगा क्या?

सुनने वाले की समझ में नहीं आया है, उसने फिर दूसरी तरह से पूछा। उसने पूछा कि छोड़े, यह जरा कठिन है। मैं यह पूछता हूं जन्म के पहले आप कहीं थे या जन्म के बाद ही आप हुए?

बुद्ध ने कहा, अगर जन्म के पहले मैं कहीं था, तो जन्म के बाद भी कहीं रहूंगा; और अगर जन्म के बाद भी कहीं नहीं था, तो जन्म के पहले भी कहीं नहीं था।

पर उस आदमी की समझ में नहीं आया। उसने कहा, पहेली में मत जवाब दें। मुझे सीधा—सीधा कहें। तो बुद्ध ने कहा, जिसे तुम देखते हो, वह तो जन्म के साथ पैदा हुआ है और मृत्यु के साथ मर जाएगा। लेकिन जिसे मैं देखता हूं वह कभी पैदा नहीं हुआ और कभी मरेगा भी नहीं। लेकिन वह देखना आंतरिक है, वह देखना भीतर है। वह सिर्फ मैं ही देख सकता हूं; तुम्हें वह दिखाई नहीं पड़ेगा। तुम भी देख सकते हो, अगर तुम अपने भीतर देखने में समर्थ हो जाओ।

लेकिन हम सबका देखना बाहर है। बाहर जो हमें दिखाई पड़ता है, वह तो जन्म और मृत्यु का घेरा है। भीतर कोई हमारे जरूर छिपा है, जो न जन्मता है और न मरता है। उसकी अगर पहचान हो जाए, तो फिर कोई पुनर्जन्म नहीं है, फिर कोई लौटना नहीं है।

लौटने को एक तीसरी तरह से भी समझें।

अगर कुछ बच्चे एक क्लास में पढ़ रहे हों, और हर साल उन्हें वापस परीक्षा के बाद उसी क्लास में भेज दिया जाए, तो इसका क्या मतलब होगा? इसका एक ही मतलब होगा कि पढ़ा—लिखा उन्होंने बहुत होगा, लेकिन गुना बिलकुल नहीं, पढ़ा—लिखा बहुत होगा, लेकिन समझा बिलकुल नहीं; पढ़ा—लिखा बहुत होगा, मेहनत बहुत की होगी, लेकिन कोई ग्रोथ, कोई विकास, कोई बढ़ती उनके भीतर नहीं हुई। वापस उसी क्लास में लौटा दिए गए।

जीवन तभी हमें वापस भेजता है किसी स्थिति में, जब हम उससे बिना कुछ सीखे गुजर जाते हैं। जिस स्थिति से आप बिना सीखे गुजर जाएंगे, आपको वापस लौटना पड़ेगा। सिर्फ उसी स्थिति में आप वापस नहीं लौटेंगे, जिससे आप सीखकर गुजर जाएंगे।

लेकिन हम हर चीज से बिना सीखे गुजर जाते हैं! कितनी बार क्रोध किया—सीखा क्या? कितनी बार प्रेम किया—सीखा क्या? कितनी बार कामवासना में डूबे—सीखा क्या? कितनी बार ईर्ष्या की—सीखा क्या? कितना लोभ किया—जिंदगी में बहुत कुछ किया—सीखा क्या? संपत्ति क्या है? सार क्या है? हाथ में निचोड़ क्या है?

अगर निचोड़ कुछ भी नहीं है, तो आपको लौटना पड़ेगा। जिंदगी किसी को क्षमा नहीं करती, जिंदगी फिर अवसर देगी। जिंदगी फिर कहेगी कि वापस उसी जगह लौट जाओ!

और हम ऐसे हैं कि बार—बार लौटकर हम पुख्ता होते चले जाते हैं। धीरे— धीरे हमको लगता है कि इस क्लास में वापस आना, यह तो अपना घर है! उसमें हम वापस आए चले जाते हैं। सीखना शायद और मुश्किल होता चला जाता है। हम अभ्यासी हो जाते हैं। हम अभ्यासी हो जाते हैं। और हममें जो अभ्यासी हैं, वे कभी—कभी आगे निकल जाते हैं। मैं जानता हूं।

मैं एक क्लास में नया—नया पहुंचा; बाकी सब विद्यार्थी तो एक ही उम्र के थे, एक विद्यार्थी बहुत उम्र का था। तो मैंने शिक्षक को पूछा, तो उन्होंने कहा कि यह छ: साल से इसी क्लास में हैं; लेकिन अब कैप्टन हो गए हैं। क्लास के कैप्टन हैं! और वह लड़का अकड़कर खड़ा था। निश्चित ही। छ: साल वापस उसी क्लास में लौटने का चुकता परिणाम इतना हुआ है कि वे अब कैप्टन हो गए हैं! अब वे उस क्लास से शायद जाना भी न चाहें, क्योंकि दूसरी क्लास में कैप्टन वे न हो पाएंगे।

इस जिंदगी में भी जो बहुत तरह के कैप्टन दिखाई पड़ते हैं—राजनीति में, धन में, यहां—वहां—उनमें अधिक लोग इसी तरह के हैं, जो पुख्ता हो गए हैं, मजबूत हो गए हैं, दोहर—दोहरकर जिंदगी में इतने यंत्रवत मजबूत हो गए हैं, कि जो नए बच्चे आ रहे होंगे जिंदगी में, उनके सामने, कोई राष्ट्रपति, कोई प्रधानमंत्री, कोई कुछ होकर खड़ा हो जाता है। उनसे अगर कहो भी कि जन्म—मरण से छुटकारा, वे कहेंगे कि नहीं, हम तो बार—बार किसी तरह इसी पद पर लौटते रहें, यही आकांक्षा है!

जिंदगी में जो कई बार सफल दिखाई पड़ते हैं, उनका एक ही कारण हो सकता है गहरे में कि जिंदगी के असली लक्ष्य से वे असफल हो गए हैं। मगर यह बड़ा कठिन है समझना। जो जिंदगी में तथाकथित सफलता दिखाई पड़ती है, सो—काल्ड सक्सेस, इसके पीछे जिंदगी की बड़ी गहरी असफलता कारण हो सकती है! बहुत बार लौट—लौटकर इसी जगह वे काफी ज्ञानी और अनुभवी हो गए हैं! इसी क्लास में उन्हें सब रट गया है, सब कंठस्थ हो गया है, कुशल, चालाक हो गए हैं। यद्यपि अनुभव उन्हें कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि अनुभव हो जाए तो लौटने का कोई उपाय नहीं है।

जिस चीज को हम जान लेते हैं, हम उसको ट्रासेंड कर जाते हैं; उसके पार निकल जाते हैं। लेकिन जो आदमी परमात्मा को ही जान लेगा, फिर तो उसके कहीं भी लौटने का कोई उपाय न रहा, क्योंकि जीवन की अंतिम शिक्षा पूरी हो गई।

परमात्मा का अर्थ है, जीवन का अंतिम निष्कर्ष, अस्तित्व का सार, अस्तित्व का केंद्र; अस्तित्व का आखिरी कमल खिल गया, अस्तित्व ने आखिरी गीत गा लिया, अस्तित्व ने आखिरी नृत्य देख लिया, अस्तित्व की जो गहनतम संभावना थी, वह अभिव्यक्त हो गई; अब लौटने का कोई उपाय न रहा।

तो परमात्मा जो है, वह प्‍वाइंट आफ नो रिटर्न है। वहां से आप वापस नहीं गिर सकते। और जहां से भी आप वापस गिर सकते हैं, वहां तक जानना कि परमात्मा नहीं है, वहां तक संसार है। और जहां से भी आप वापस गिर सकते हैं, तो समझ लेना कि आप छलांग लगाकर उचकने की कोशिश किए होंगे, लेकिन वह नई अवस्था आपके लिए सहज नहीं थी। आप अपनी पुरानी अवस्था में गिर गए हैं।

एक आदमी छलांग लगाए आकाश में, तो क्षणभर के लिए उचक सकता है। फिर जमीन खींच लेगी। अपनी जगह फिर खड़ा हो जाएगा। अगर आकाश में छलाग ही लगानी हो, तो फिर जमीन का गुरुत्वाकर्षण तोड्ने का कोई उपाय करना पड़ेगा। हवाई जहाज कोई उपाय करता है, तो जमीन के गुरुत्वाकर्षण के बाहर हो जाता है, या जमीन के गुरुत्वाकर्षण के रहते भी आकाश में सदा रह जाता है। हम सब ऐसे हवाई जहाज हैं, जिनको यह पता ही नहीं है कि हम जमीन के गुरुत्वाकर्षण से ऊपर उठ सकते हैं। और हमारा उपयोग लोकवाहक की तरह, पब्लिक कैरियर की तरह किया जा रहा है!


 समान ढो रहे हैं, जमीन पर ही। हवाई जहाज से हम चाहें तो ठेले का काम भी ले सकते हैं, लारी का, ट्रक का। और अगर हवाई जहाज के पायलट को खयाल ही न हो कि यह हवाई जहाज जमीन को छोड़कर भी उड़ सकता है, तो बेचारा जमीन पर ही ट्रक का काम करता रहेगा; जमीन पर ही सामान ढोता रहेगा!

ध्यान रहे, ट्रक तो आकाश में नहीं उड़ सकता, लेकिन हवाई जहाज जमीन पर चल सकता है। श्रेष्ठ में निकृष्ट तो समाया होता है, लेकिन अगर आप निकृष्ट के आदी हो जाएं, तो श्रेष्ठ का खयाल ही मिट जाता है।

परमात्मा के स्मरण का इतना ही अर्थ है, उसकी पूजा का इतना ही अर्थ है, कि तुम्हीं हो मेरे गंतव्य, कि जब तक मैं तुम्हीं न हो जाऊं, तब तक मेरे लिए कोई भी ठहराव नहीं है, तुम्हीं हो मुकाम, और जब तक तुम्हीं न मिल जाओ, तब तक मेरे लिए कोई पड़ाव पड़ाव नहीं है। रुकूंगा, रातभर ठहरूंगा, सिर्फ इसलिए कि सुबह चल सकूं! रुकूंगा, विश्राम कर लूंगा, सिर्फ इसलिए कि पैर थक गए; और पैरों की ताकत लौट आई तो फिर चल पडूगा।

लेकिन हम भी, चलते तो हम भी बहुत हैं, लेकिन हमारा चलना ऐसा है कि जिस जमीन पर हम बार—बार चल चुके हैं, हम उसी पर लौट—लौटकर चलते रहते हैं। एक ही जगह को हम कई बार पार करते रहते हैं। हमारी जिंदगी गति नहीं करती; जैसे कि मालगाड़ी के डब्बे शंटिंग करते हैं स्टेशन पर, वैसी हमारी जिंदगी है, वहीं—वहीं शंटिंग करते रहते हैं। कहीं कोई अंतिम मुकाम नहीं आता। बस, दौड़— धूप में, आखिर में यह शंटिंग होते—होते हम टूटते और चुक जाते हैं।

पुनर्जन्म का अर्थ है, शंटिंग। उसका अर्थ है कि यात्रा पर नहीं निकल पा रहे हैं आप। फिर वहीं लौट आने का अर्थ है कि आगे कोई गति नहीं सूझ रही है आपको।

कृष्ण कहते हैं, लेकिन जो मुझे भजता है, वह फिर नहीं लौटता है। क्योंकि वह भजन अंतिम है।

परमात्मा अंतिम निष्कर्ष है—आखिरी, दि अल्टिमेट, परम। उसके पार कुछ नहीं है। या हम ऐसा कहें, जिसके पार हमारी कोई समझ नहीं जाती, वही परमात्मा है। जिसके पार हम सोच भी नहीं सकते; जिसके अतीत और जिसके पार की कल्पना भी नहीं बनती, वही परमात्मा है।

इस परमात्मा के भजने, इस परमात्मा के पूजने का क्या अर्थ? कैसे कोई पूजेगा? तीन बातें अंत में आपसे कहूं।

एक, जीवन को पुनरुक्ति न बनने दें, स्मरणपूर्वक पुनरुक्ति से बचें। डोंट गो ऑन रिपीटिग, दोहराए मत चले जाएं। कहीं से भी ढांचे को तोडे। और कहीं से भी इस दोहरती हुई यांत्रिक प्रक्रिया के बाहर हो जाएं। छोटे—मोटे प्रयोग से भी आदमी बाहर होना शुरू हो जाता है, बहुत छोटे—मोटे प्रयोग से!

हमारी सबकी प्रतिक्रियाएं बंधी हुई हैं। अगर मैंने आपको गाली दी, तो प्रेडिक्टेबल है कि आप क्या करोगे! जो आपको जानते हैं, वे भलीभांति बता सकते हैं कि आप क्या करोगे! एक पत्नी बीस साल पति के साथ रहकर भलीभांति जानती है कि अगर वह यह कहेगी, तो पति यह जवाब देगा! आदमी प्रेडिक्टेबल हो जाता है। पति भलीभांति जानता है कि घर पहुंचकर पत्नी क्या पूछने वाली है! उत्तर भी रास्ते में तैयार कर लेता है कि वह यह कहेगी, यह उत्तर हो जाएगा! और यह भी जानता है कि इस उत्तर को वह मानने वाली नहीं है। पत्नी भी जानती है कि मैं यह पूछूंगी, तो क्या उत्तर मिलेगा! जानते हुए भी कि यह उत्तर मिलेगा, वह पूछेगी; उत्तर पाएगी, मानेगी नहीं। लेकिन कहीं से भी हम अपनी यंत्रवत व्यवस्था को तोड़ेंगे नहीं।

कहीं से भी तोड़े। कोशिश करें अनप्रेडिक्टेबल होने की। कोशिश करें कि आपके बाबत भविष्यवाणी न हो सके। कोई यह न कह सके कि अगर हम चांटा मारेंगे, तो वे क्या करेंगे!

जिस दिन आप अनप्रेडिक्टेबल हो जाते हैं, जिस दिन आपके बाबत कोई प्रतिक्रिया को पूर्व—घोषित नहीं किया जा सकता, आप पहली दफा मनुष्य होते हैं। उसके पहले आप यंत्रवत होते हैं।

हमको रोज लगता है कि सुबह सूरज निकलता है, वही सूरज। लेकिन जो सूर्योदय को देखते हैं, वे जानते हैं कि दुबारा एक सूर्योदय फिर नहीं होता; न तो वैसे बादल होते, न वैसे रंग होते, न वैसी सुबह होती, न वे गीत होते, न वह आकाश होता। हर रोज सुबह नया सूरज उगता है। नए सूरज का मतलब, सब नया होता है। ऐसा व्यक्ति प्रतिपल नया होता है।

तो एक बात ध्यान रखें, पुनरुक्ति को तोड़े। दूसरी बात ध्यान रखें, जो कुछ भी चाहें, गहरे खोजें, तो हर चाह में परमात्मा की चाह छिपी हुई मिलेगी। अपनी हर चाह में अंततः परमात्मा को खोजने का उपाय करें। तो धीरे— धीरे चाहें गिर जाएंगी और परमात्मा की मौलिक चाह ही शेष रह जाएगी; ऊपरी चाहें गिर जाएंगी और भीतरी चाह प्रकट हो जाएगी।

और तीसरी बात, अंतिम को ही लक्ष्य बनाएं, बीच का कोई पड़ाव मंजिल नहीं हो सकता। परमात्मा से कम को लक्ष्य मत बनाएं। क्योंकि जो लक्ष्य है, अंततः आपकी चेतना का तीर उसी लक्ष्य में बिंध जाएगा, और उसी के साथ एक हो जाएगा। इसलिए छोटे लक्ष्य मत बनाएं।

हम सबकी जिंदगी बहुत छोटी—छोटी रह जाती है, छोटे—छोटे लक्ष्यों के कारण। हम क्षुद्र रह जाते हैं, क्षुद्र लक्ष्यों के कारण।

अब एक आदमी की जिंदगी का लक्ष्य अगर रुपया ही इकट्ठा करना है, तो इस आदमी के पास जो आत्मा होगी, वह आत्मा बहुत बड़ी नहीं हो सकती। कैसे होगी? इसकी आत्मा इसकी अभीप्सा ही तो है। यह धन इकट्ठा करना ही इसकी कुल जमा दौड़ है। तो इसकी आत्मा ज्यादा से ज्यादा एक लोहे की तिजोड़ी हो सकती है। और क्या हो सकती है? इसकी आत्मा का और क्या होगा मूल्य? इसकी आत्मा रुपए से भी छोटी होगी। तभी तो रुपए के प्रति इतनी आकर्षित और आंदोलित है।

एक आदमी बड़ी कुर्सी पर पहुंचना चाहता है, तो पहुंच जाएगा एक दिन। लेकिन इसकी आत्मा एक मुर्दा कुर्सी से ज्यादा बड़ी नहीं हो सकती!

अंतिम को लक्ष्य बनाएं, क्योंकि अंतत: वही आप हो जाएंगे। उस पर श्रद्धा रखें जो आखिरी है, चाहे वह असंभव ही क्यों न मालूम पड़े। क्योंकि संभव को जो चुनता है, वह क्षुद्र हो जाता है। असंभव को चुनें।

और ईश्वर से ज्यादा असंभव कुछ भी नहीं है। अदृश्य, अरूप, निराकार असंभव मालूम पड़ता है। उसे चुनें। उसकी तरफ उपासना को बढ़ाते चलें। एक दिन पाएंगे कि वह तो मिल गया, आप खो गए। एक दिन पाएंगे, आप तो नहीं बचे, वही रह गया। एक दिन पाएंगे, आप वही हो गए हैं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...