रविवार, 8 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 11भाग 4

 परमात्‍मा का विकराल रूप


त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम।

त्वमध्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्ल पुरुषो मतो मे।।। 18।।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्तं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। 19।।

द्यावायृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्त स्वयैकेन दिशश्च सर्वा:।

दृष्ट्वाइभुतं रूयमुग्रं तवेदं लोकत्रय प्रव्यथितं महात्मन्।। 20।।

अमी हि त्वां सुरसंधा विशन्ति केचिद्रभीता प्राज्जत्नयो ग्दाणन्ति।

स्वस्तीत्युक्ता महर्षिसिद्धसंधा: स्तुवन्ति ना खतिभि पुष्कलाभि।। 21।।

रुद्रादित्या वसवो ये व साध्या विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। 22।।


इसलिए हे भगवन— आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं और आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं तथा आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है।

हे परमेश्वर मैं आपको आदि अंत और मध्य से रहित तथा अनंत सामर्थ्य से युक्त और अनंत हाथों वाला तथा चंद्र— सूर्य रूप नेत्रों वाला और प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से इस जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं।


और हे महात्मन्— यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का संपूर्ण आकाश तथा सब दिशाएं एक आप से ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।

और हे गोविंद वे सब देवताओं के समूह आपमें ही प्रवेश करते हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय कल्याण होवे ऐसा कहकर उत्तम— उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।

और हे परमेश्वर जो एकादश रुद्र और द्वादश आदिल तथा आठ वसु और साध्यगण विश्वेदेव तथा अश्विनी कुमार और मरुदगण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व यक्ष राक्षस और सिद्धगणों के समुदाय हैं वे सब ही विस्मित हुए आपको देखते हैं।



इसलिए हे भगवन्, आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं। परमब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं। आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं। आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है।

अर्जुन अति विनम्र है। और जो भी जान लेते हैं, वे अति विनम्र हो जाते हैं। विनम्रता जानने की शर्त भी है और जानने का परिणाम भी। जो जानना चाहता है, उसे विनम्र होना होगा, झुका हुआ। और जो जान लेता है, वह अति विनम्र हो जाता है। शायद जान लेने के बाद उसे विनम्र होना ही नहीं पड़ता, विनम्रता उस पर छा जाती है, वह एक हो जाता है विनम्रता के साथ।

अर्जुन देख रहा है अपनी अनुभूति में सब घटित हुआ, फिर भी कहता है, ऐसा मेरा मत है।

यह थोड़ा विचारें।

अर्जुन देख रहा है। वह कह सकता है कि मैं देख रहा हूं। वह कह सकता है कि मेरा अनुभव है। लेकिन कहीं मेरा अनुभव कहने से मैं को बल न मिले। वह कहे कि मेरी प्रतीति है, तो कहीं प्रतीति गौण न हो जाए और मेरा होना महत्वपूर्ण न हो जाए!

इसलिए अर्जुन कहता है कि हे भगवन्। आप ही हैं अक्षर, अविनाशी, परम आश्रय, रक्षक, ऐसा मेरा मत है। यह सिर्फ मेरा मत है, यह गलत भी हो सकता है। यह सही भी हो सकता है। मैं कोई आग्रह नहीं करता कि यह सत्य है। इस कारण कई बार बड़ी कठिनाई खड़ी होती है। जो अहंकारी हैं, वे अपने मत को भी इस भांति कहते हैं, जैसे प्रतीति हो कि यह सत्य है। वे जो नहीं जानते, केवल सोचते हैं, उसको भी इस भांति घोषणापूर्वक कहते हैं कि लगे कि यह उनका अनुभव है। और जो जान लिए हैं, वे इस भांति कहते हैं कि ऐसा लगे कि उन्होंने भी किसी से सुना होगा।

पुराने ऋषियों की बड़ी पुरानी आदत है कि वे कहते हैं, ऐसा फलां ऋषि ने फलां ऋषि से कहा। उन्होंने फिर किसी और से कहा; फिर उन्होंने किसी और से कहा, फिर मैंने किसी से सुना। यह मात्र गहन विनम्रता का परिणाम है। मैंने देखा, इसे कहने में कोई कठिनाई नहीं है। इसे कहने में कोई अड़चन भी नहीं है। अर्जुन अभी कह सकता है कि मैंने देखा। लेकिन अर्जुन कहता है, मेरा मत। बस, मेरा ऐसा विचार है। आग्रह नहीं है कि मैं जो कह रहा हूं वह सत्य ही है। क्यों?

शायद इस आघात के क्षण में, इस गहन शक्ति का आघात हुआ है उसके ऊपर, इस क्षण में उसे मैं का कोई पता भी नहीं चल रहा होगा। इस क्षण में उसे खयाल भी नहीं आ रहा होगा कि मैं भी हूं। इसलिए कह रहा है, मेरा मत है। यह मत माना भी जाए तो ठीक, न भी माना जाए तो ठीक। यह गलत भी हो।

मत और सत्य में इतना ही फर्क होता है। जब कोई कहता है, यह सत्य है, तो उसका अर्थ यह है, यह गलत नहीं हो सकता। और जब कोई कहता है, यह मत है, तो वह यह कह रहा है कि यह गलत भी हो सकता है। यह मेरा मत है, इसलिए गलत भी हो सकता है।

हमारी स्थिति उलटी है। जिस चीज को हम कहते हैं सत्य, हम उसे सत्य ही इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह मेरा है। अगर आपसे कोई पूछे कि हिंदू धर्म सत्य क्यों है? या कोई पूछे कि मुसलमान धर्म सत्य क्यों है? या कोई पूछे कि जैन धर्म सत्य क्यों है? तो जैनी कहेगा कि जैन धर्म सत्य है। हजार कारण बताए, लेकिन मूल में कारण यह होगा कि वह मेरा धर्म है। हिंदू हजार कारण बताए, लेकिन मूल में कारण होगा कि वह मेरा धर्म है। चाहे वह कहे और चाहे न कहे। लेकिन अगर विश्लेषण करे, तो उसे पता चलेगा कि जो भी मेरा है, वह सत्य होना ही चाहिए।

यह अहंकार का आरोपण है। सत्य, मेरे होने से सत्य नहीं होता। सच तो यह है कि मेरे होने से मेरा सत्य भी असत्य हो जाता है। सत्य होता है अपने कारण। और मैं जितना कम रहूं उतना ज्यादा होता है। और मैं जितना ज्यादा हो जाऊं, उतना क्षीण हो जाता है।

इसलिए अर्जुन कहता है, मेरा मत है।

थोड़ा ध्यान रखें, जितना आग्रह हम करते हैं, आग्रह सत्य को नहीं मिलता, अहंकार को मिलता है। इसलिए धार्मिक आदमी विनम्र होगा। और अगर धार्मिक आदमी विनम्र नहीं है, तो धार्मिक नहीं है।


इसलिए हमने अपने इस मुल्क में कभी किसी आदमी के धर्म को कनवर्ट करने की चेष्टा नहीं की। कभी आग्रह नहीं किया कि हम एक आदमी को समझा—बुझा कर, जबर्दस्ती, कोई भी उपाय करके, एक धर्म से दूसरे धर्म में खींच लें। क्योंकि यह कृत्य ही अधार्मिक हो गया। यह आग्रह करना कि मैं जो कहता हूं वही ठीक है, और तुम जो कहते हो, वह गलत है, मान लो मेरे धर्म को; चाहे धन देकर, चाहे पद देकर और चाहे तर्कों से समझा—बुझाकर, किसी भी तरह आक्रमण करके किसी व्यक्ति को उसके धर्म को बदलने की कोशिश हमने इस मुल्क में नहीं की। कनवर्शन हमने कभी उचित नहीं माना।

और उसका कुल कारण इतना था कि कनवर्शन के लिए— हिंदू को ईसाई बनाने के लिए, ईसाई को हिंदू बनाने के लिए—मतांध आदमी चाहिए, आग्रहपूर्ण, जो कहें कि यही ठीक है। जो इतने पागलपन से कह सकें कि यही ठीक है, और दूसरे की सुनने को बिलकुल राजी ही न हों।

महावीर कैसे किसी को कनवर्ट करें! अगर उनके विपरीत भी आप जाकर कहें, तो महावीर कहेंगे कि आप भी ठीक हैं। इसमें भी सचाई है। आप जो कह रहे हैं, बड़ा कीमत का है। महावीर के विपरीत कहें, तो भी! तो कनवर्शन असंभव है। इसलिए महावीर जैसे बहुत विचार का आदमी भी हिंदुस्तान में बहुत जैन पैदा नहीं करवा पाया। उसका कारण था। क्योंकि कनवर्ट करने का कोई उपाय ही नहीं था।

मतांध आदमी दूसरे पर जबर्दस्ती छा जाते हैं। लेकिन जो मतांध है, वह राजनैतिक हो सकता है, धार्मिक नहीं। दूसरे को बदलने की चेष्टा ही असल में राजनीति है। स्वयं को बदलने की चेष्टा धर्म है। दूसरे पर छा जाना, अहंकार की यात्रा है। अपने को सब भांति पोंछकर मिटा देना, धर्म की।

अर्जुन कहता है, यह मेरा मत है। और अभी अनुभव हो रहा है उसे। अभी प्रत्यक्ष है, अभी क्षण भी नहीं बीता है। अभी वह अनुभव के बीच में खड़ा है। चारों तरफ घटनाएं घट रही हैं उसके। द्वार खुल गया है अनंत का। और ऐसे क्षण में भी अर्जुन कहता है, यह मेरा मत है, यह बहुत कीमती है।

आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं।

जानने योग्य! जानने योग्य क्या है? किस चीज को कहें जानने योग्य? आमतौर से जिसका कोई उपयोग हो, उसे हम जानने योग्य कहते हैं। विज्ञान जानने योग्य है, क्योंकि उसके बिना न मशीनें चलेंगी, न रेलगाड़ियां दौड़ेगी; न रास्ते बनेंगे, न कारें होगी; न यंत्र होंगे, न टेक्नालॉजी होगी। विज्ञान जानने योग्य है, क्योंकि उसके बिना जीवन की सुख—सुविधा असंभव हो जाएगी। चिकित्साशास्त्र जानने योग्य है, क्योंकि उसके बिना बीमारियों से कैसे लडेंगे? उपयोगिता! हमारे जानने योग्य का अर्थ होता है, जिसकी युइटलिटी है, जिसकी उपयोगिता है।

इसीलिए जिन चीजों की उपयोगिता है, उनकी तरफ हम ज्यादा दौड़ते हैं। अगर आज युनिवर्सिटी में जाएं, तो इंजीनियरिंग की तरफ, मेडिकल साइंस की तरफ दौड़ते हुए युवक मिलेंगे। फिलॉसफी, दर्शनशास्त्र के कमरे खाली होते जाते हैं। वहां कोई जाता नहीं। या जिनको कहीं जाने के लिए उपाय नहीं बचता, वे वहां चले जाते हैं। सब दरवाजे जिनके लिए बंद हो जाते हैं, वे सोचते हैं कि चलो, अब दर्शनशास्त्र ही पढ़ लें।

सारी दुनिया में दर्शनशास्त्र की तरफ लोगों का जाना कम होता जाता है। क्यों? क्योंकि उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। क्या करिएगा? अगर दर्शन में कोई उपाधि भी ले ली, तो करिएगा क्या? उससे न रोटी पैदा हो सकती है, न यंत्र चलता है। किसी काम का नहीं है, बेकाम हो गया, उपयोगिता गिर गई। हमारे लिए जानने योग्य वह मालूम पड़ता है, जो उपयोगी है।

लेकिन यहां अर्जुन कहता है, आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं।क्या अर्थ होगा इसका? भगवान की क्या उपयोगिता होगी? क्या करिएगा भगवान को जानकर? रोटी पकाइएगा? दवा बनाइएगा? यंत्र चलवाइएगा? क्या करिएगा? अगर उपयोगिता की दृष्टि से देखें, तो भगवान बिलकुल जानने योग्य नहीं है। जानकर करिएगा भी क्या? अगर आज पश्चिम के मस्तिष्क को हम समझाना चाहें कि भगवान, तो वह पूछेगा कि किसलिए? क्या करेंगे जानकर? क्या होगा जानने से? उपयोगिता क्या है?

और परमात्मा तो परम निरुपयोगी है। क्या उपयोग है? उपादेयता क्या है उसकी? उससे क्या कर सकते हैं? कोई प्राफिट मोटिव, कोई लाभ का विचार लागू नहीं होता। क्या करिएगा? और यह अर्जुन कह रहा है कि आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं!

जानने योग्य की हमारी परिभाषा और है। हम कहते हैं उसे जानने योग्य, जिसे जानने के बाद कुछ जानने को शेष न रह जाए। हम कहते हैं उसे जानने योग्य, जिसको जान लिया, तो फिर जानने को कुछ बाकी न रहा। तो वह जो जानने की दौड़ थी, समाप्त हो गई। वह जो अज्ञान की पीड़ा थी, तिरोहित हो गई। वह जो जिज्ञासा का उपद्रव था, विलीन हो गया।

जब तक जानने को कुछ शेष है, तब तक मन में अशांति रहेगी। जब तक जानने को कुछ भी शेष है, तब तक तनाव रहेगा। जब तक जानने को कुछ भी शेष है, चिंता पकड़े रहेगी कि कैसे जान लूं।

तो हम जानने योग्य उसे कहते हैं, जिसे जानकर फिर और कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता। जिज्ञासा शून्य हो जाती है। तनाव विलीन हो जाता है। सब जान लिया जैसे। एक को जान लिया, सबको जान लिया जैसे।

जानने योग्य, पाने योग्य, कामना करने योग्य, इन सबका भारतीय परंपरा में जो गहन अर्थ है, वह यह एक ही है। पाने योग्य वह है, जिसको पाने के बाद फिर पाने को कुछ बचे न। कामना करने योग्य वह है, जिसके साथ ही सब कामनाएं शांत हो जाएं। पहुंचने योग्य वह जगह है, जिसके बाद पहुंचने को कोई जगह न बचे। उसको हम कहते हैं, अल्टीमेट, परम। वह है परम बिंदु अभीप्सा का।

अर्जुन कहता है, अनुभव कर रहा हूं ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप ही जानने योग्य परम अक्षर हैं, परम ब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं, आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है। हे परमेश्वर! मैं आपको आदि, अंत और मध्य से रहित तथा अनंत सामर्थ्य से युक्त और अनंत हाथों वाला तथा चंद्र, सूर्य रूप नेत्रों वाला और प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से इस जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं।

अब दूसरा रूप शुरू होता है। एक रूप था सुंदर, मोहक, मनोहर, मन को भाए, लुभाए, आकर्षित करे। लेकिन यह एक पहलू था। अब दूसरा रूप भी होगा। जो जीवन को तपाए, भयंकर अग्निमुखों वाला, मृत्यु जैसा विकराल, विनाश करे।

अर्जुन कहता है कि देख रहा हूं कि आपके अनंत मुख हैं, प्रज्वलित अग्निरूप, आपके हर मुख से आग जल रही है।

आभा नहीं, प्रकाश नहीं, आग। पहले ऐश्वर्य की आभा देखी उसने, फिर सूर्यों का प्रकाश देखा उसने, अब अग्नि, अब आग्नेय अनुभव है।

मुखों से अग्नि की लपटें निकल रही हैं और आपके इस तेज से इस जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं। लोग जल जाएंगे, लोग तप रहे हैं, लोग भस्मीभूत हो जाएंगे। ऐसा अग्निरूप अर्जुन के सामने प्रकट होना शुरू हुआ।

जीवन जोड़ है विपरीत द्वंद्वों का, डायलेक्टिकल है, द्वंद्वात्मक है। यहां जन्म है, तो दूसरे छोर पर मृत्यु है। यहां प्रेम है, तो दूसरे छोर पर घृणा है। यहां सुख है, तो दूसरे छोर पर दुख है। यहां सफलता है शिखर, तो वहां खाई है असफलता की। जोड़ है। और द्वंद्व के आधार पर ही सारे जीवन की गति है।

हम सब की आकांक्षा हो गई है, इसमें जो प्रीतिकर है, वह बच रहे; जो अप्रीतिकर है, वह समाप्त हो जाए। हम चाहते हैं कि सुख बच रहे और दुख नहीं। और मजे की बात यह है कि जो ऐसा चाहता है, वह इसी चाह के कारण दुख में गिरता है। क्योंकि इस दो में से एक को बचाया नहीं जा सकता। ये दोनों जीवन के अनिवार्य हिस्से हैं।

जैसे कोई चाहे कि खाइयां तो मिट जाएं और शिखर बचें, तो वह पागल है। खाई और शिखर साथ—साथ हैं। एक ही तरंग है। जब शिखर बनता है, तो खाई बनती है। और खाई मिटती है, तो शिखर मिट जाता है। कोई चाहे कि जवानी तो बचे और बुढ़ापा मिट जाए। हम सभी चाहते हैं! लेकिन जवानी शिखर है, तो बुढ़ापा खाई है। जवान होने के साथ ही आप बुढे होने शुरू हो जाते हैं। जवानी बुढ़ापे की शुरुआत है। जिस दिन जवान हुए, उस दिन जान लेना, अब बुढ़ापा ज्यादा दूर नहीं है, अब करीब है।

हम चाहते हैं, सौंदर्य तो बचे, कुरूपता विलीन हो जाए। लेकिन हमें पता ही नहीं कि अगर कुरूपता विलीन हो जाए, तो सौंदर्य बचेगा कैसे! सौंदर्य है ही अनुभव कुरूपता के विपरीत, उसी की पृष्ठभूमि में होता है।

जब आकाश में काले बादल घिरे होते हैं, तो बिजली चमकती दिखाई पड़ती है। हम चाहते हैं, बिजली तो खूब चमके, काले बादल बिलकुल न हों। वह काले बादल में ही चमकती है। और काले बादल में चमकती है, तो ही दिखाई पड़ती है। यह जीवन की सारी चमक मृत्यु की ही पृष्ठभूमि में दिखाई पड़ती है। हम चाहते हैं, मृत्यु विदा हो जाए। मृत्यु हो ही न दुनिया में, बस जीवन ही जीवन हो। हमें खयाल ही नही है कि हम क्या कह रहे हैं! हम असंभव की मांग कर रहे हैं। और असंभव की जो मांग करता है, वह दुख में पड़ता चला जाता है। यह होने वाला नहीं। समझदार वह है, जो संभव को स्वीकार कर लेता है और असंभव को विदा कर देता है अपनी कामना से।

द्वंद्व जीवन का स्वरूप है। हर चीज दो में है। जिससे हम प्रेम करते हैं, सोचते हैं, कभी इस पर क्रोध न करें। करना ही पड़ेगा। जिससे हम प्रेम करते हैं, उससे क्रोध भी होगा, घृणा भी होगी, संघर्ष भी होगा, द्वंद्व भी होगा, झगड़ा भी होगा। प्रेम के साथ ही घृणा जुड़ी हुई है। इसलिए जितने प्रेमी हैं, लड़ते रहते हैं। और जब प्रेमी लड़ना बंद कर दें, समझ लेना कि प्रेम समाप्त हो गया। वह जुड़ा है। उसमें एक को बचाने का कोई भी उपाय नहीं है। या तो दोनों बचते हैं, या दोनों विदा हो जाते हैं।

अर्जुन ने एक रूप देखा परमात्मा का। हम भी वह रूप देखना चाहेंगे। लेकिन दूसरे रूप से भी बचने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि अगर जन्म उससे होता है, तो मृत्यु भी उसी से होती है। और अगर अच्छाई उससे पैदा होती है, तो बुराई भी उसी से पैदा होती है। और अगर जगत में सौंदर्य का जन्म उससे होता है, तो कुरूपता भी उसका ही पहलू है। वह भी देखना ही पड़ेगा। वह दूसरी तरफ यात्रा शुरू हो गई। जो लोग भी परमात्मा के अनुभव में जाते हैं, उन्हें इसकी तैयारी रखनी चाहिए।

दुनिया में दो तरह के धर्म हैं इन दो रूपों के कारण। एक तो वे धर्म हैं, जिन्होंने इस ऐश्वर्य, महिमा वाले रूप को प्रमुखता दी है। और एक वे धर्म हैं, जिन्होंने उस भयंकर रूप को प्रमुखता दी है। जैसे कि पुराना जरथुस्त्र या पुराना यहूदियों का धर्म ओल्ड टेस्टामेंट का, वहां ईश्वर विकराल है, भयंकर है। बहुत कूर और कठोर है, दुष्ट मालूम पड़ता है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

इसीलिए जीसस की बात यहूइदयों को स्वीकृत न हो सकी। उसका कारण जीसस नहीं थे। उसका कारण था ओल्ड टेस्टामेंट, पुराने यहूदी की जो ईश्वर की धारणा थी, उससे बिलकुल उलटी बात जीसस ने कही है।

पुरानी धारणा यह थी कि ईश्वर, अगर तुमने उसके खिलाफ जरा— सा भी काम किया, तो तुम्हें जलाएगा, मारेगा, सड़ायेगा, अनंत काल तक भयंकर कष्ट देगा, दंड देगा। नर्क उसने बनाए हैं। पुराने टेस्टामेंट का जो नर्क है, वह इटरनल है, अनंत है। उसमें जरा से पाप के लिए भी फेंका जाएगा आदमी, तो फिर दुबारा वापसी का कोई उपाय नहीं है। और ईश्वर एक भयंकर विकराल व्यक्तित्व है, जिसकी आंखों से लपटें निकल रही हैं। और जिसको शांत करने का एक ही उपाय है, भय, स्तुति, प्रार्थना, उसके चरणों में सिर को रख देना। और वह जो कहता है उसको मान लेना, उसकी आशा के अनुकूल। उसकी आज्ञा से जरा—सी प्रतिकूलता हुई कि वह भस्म कर देगा।

यह था यहूदी रूप ईश्वर का। यह एक पहलू है। यह गलत नहीं है। यह भी ईश्वर का एक पहलू है। और ऐसा लगता है, मोजेज को इसका अनुभव हुआ होगा। मोजेज भूल—चूक से ईश्वर के भयंकर पहलू को पहले देख लिए। और वह भयंकर पहलू मोजेज पर इस तरह आविष्ट हो गया कि उन्होंने जो बात कही, उसमें वह भयंकर पहलू केंद्र बन गया।

जीसस उलटी बात कहते हैं। वे कहते हैं, गॉड इज लव। ईश्वर प्रेम है। इसलिए यहूदी मन जीसस को स्वीकार नहीं कर पाया। कहां ईश्वर था भयंकर! और यहूदियों की सारी साधना पद्धति यह थी कि उससे भयभीत होओ, उससे डरो। उससे डरोगे, यही धार्मिक होने का लक्षण है। और जीसस ने कहा कि ईश्वर है प्रेम। तो जिससे प्रेम है, उससे डरने की क्या जरूरत है! और जिससे हमारा प्रेम है, उससे डर समाप्त हो जाता है। और जब डर समाप्त हो जाता है, तो यहूदियों ने कहा, फिर ईश्वर का वह जो रूप— उसको उन्होंने कहा, ट्रिमेंडम, वह जो भयंकर रूप है, वह जो विकराल तांडव करता रूप है—तो सारा धर्म नष्ट हो जाएगा।

इसलिए जीसस को यहूदी मन स्वीकार न कर पाया। ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट बड़ी विपरीत किताबें हैं, दो पहलू वाली। लेकिन एक अर्थ में बाइबिल पूरी किताब है। ओल्ड टेस्टामेंट, न्यू टेस्टामेंट दोनों मिलकर बाइबिल पूरी किताब है, क्योंकि उसमें परमात्मा के दोनों पहलू हैं। मोजेज ने जो देखा अग्निरूप और जीसस ने जो देखा प्रेमरूप, वे दोनों समाहित हैं, दोनों इकट्ठे हैं

अगर किसी तरह यहूदी और ईसाइयत दोनों का तालमेल हो जाए गहरा, तो वह ईश्वर की पूरी छवि हो गई। लेकिन बहुत मुश्किल है। क्योंकि जो उसके प्रेमपूर्ण रूप को प्रेम कर पाता है, वह सोच ही नहीं पाता कि वह भयंकर और विकराल भी हो सकता है।

कृष्‍ण में जरूर परमात्मा के दोनों रूप एक साथ प्रकट हुए हैं। इसलिए कई लोगों को कठिनाई होती है कि कृष्‍ण को समझें कैसे? क्योंकि कृष्‍ण का व्यक्तित्व बहुत कंट्राडिक्टरी है। एक तरफ आश्वासन देते हैं कि मैं युद्ध में अस्त्र नहीं उठाऊंगा; मौका आता है, उठा लेते हैं। वचन का कोई भरोसा नहीं उनके। बेईमान ? हम सोच भी नहीं सकते कि साधु, और वचन दे और पूरा न करे।

लेकिन कारण है कि हम ईश्वर के एक ही पहलू को पकड़ते हैं। कृष्‍ण में ईश्वर के दोनों पहलू एक साथ हैं। इसलिए कृष्ण एक तरफ गीता जैसा अदभुत ग्रंथ दे पाते हैं, दूसरी तरफ स्त्रियों के साथ नाच भी पाते हैं। और इसमें उन्हें कोई अड़चन नहीं है। इसमें कोई अड़चन नहीं है। एक तरफ प्रेम की बात भी कर पाते हैं और दूसरी तरफ अर्जुन को युद्ध में जाने के लिए सलाह भी दे पाते हैं। काटो! इसकी भी कोई चिंता नहीं है। दूसरी तरफ बांसुरी भी बजा पाते हैं। यह बांसुरी बजाने वाला कभी कहेगा कि उठाओ तलवार और काटो, क्योंकि कोई कटता ही नहीं, बेफिक्री से काटो। हमारी समझ के बाहर हो जाता है।

इसलिए कृष्ण के भक्त भी बंटे हुए हैं। पूरे कृष्‍ण को कोई स्वीकार नहीं करता। कोई बांसुरी बजाने वाले को स्वीकार करता है, तो बाकी हिस्से को छोड़ देता है, कि वह अपने काम का नहीं है! सिलेक्ट करना पड़ता है कृष्‍ण में से। कोई दूसरे हिस्से को स्वीकार करता है, तो फिर बांसुरी वाले को मानता है कि यह कवियों की कल्पना होगी, हटाओ।

लेकिन पूरे कृष्‍ण को स्वीकार करना वैसे ही मुश्किल है, जैसे पूरे जीवन को स्वीकार करना मुश्किल है। और जो पूरे जीवन को स्वीकार करता है, वही केवल कृष्‍ण को पूरा स्वीकार कर सकता है। और पूरे जीवन को स्वीकार करने का अर्थ है, परमात्मा की दोनों शक्लें एक साथ।

दो शक्लें नहीं हैं लेकिन परमात्मा की। हमने अपने मुल्क में तीन शक्लों की बात की है, दो तो छोर हैं। एक उसका जन्मदाता का छोर, मां का। एक विध्वंस का, मृत्यु का। ये दो छोर हैं, ये दो शक्लें खास हैं। पर बीच में एक शक्ल और है। क्योंकि जहां भी दो हों, वहां जोड्ने के लिए तीसरे की जरूरत पड़ जाती है। ये दो इतने विपरीत हैं कि इनको जोड्ने के लिए एक तीसरे की जरूरत है, जो दोनों के मध्य में हो।

इसलिए हमने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीन शक्लें, त्रिमूर्ति की धारणा की है। उन तीनों मूर्तियों के पीछे एक ही व्यक्ति है। एक ही शक्ति है, कहें। एक ही विराट ऊर्जा है। लेकिन एक तरफ से वह बनाती है, एक तरफ से मिटाती है, बीच में सम्हालती भी है। क्योंकि बनने और मिटने के बीच में कोई सम्हालने वाला भी चाहिए।

अगर ब्रह्मा और महादेव ही हों जगत में, तो बनना—मिटना काफी होगा, लेकिन और कुछ नहीं होगा। बीच में कुछ भी नहीं होगा। इधर ब्रह्मा बना नहीं पाएंगे, वहां महादेव मिटा डालेंगे! आपको रहने का बीच में मौका नहीं मिलेगा। संसार के लिए उपाय नहीं रहेगा। इसलिए विष्णु!

इसलिए हमने सारी जमीन पर जो मंदिर बनाए, वे विष्णु के मंदिर हैं। और सारे अवतार विष्णु के अवतार हैं। उसका कारण है। क्योंकि वे बीच में हैं। वही संसार है हमारा। विष्णु संसार हैं। दो छोर हैं, ब्रह्मा और महादेव तो। महादेव की हम पूजा करते हैं, तो भय के कारण, कि मना—बुझा लो, समझा—बुझा लो।

आपको पता है कि भय के कारण हम बहुत पूजा करते हैं। सभी लोग अपनी बही—खाता शुरू करते हैं, श्री गणेशायनम:, गणेश जी की स्तुति से। आपको पता नहीं कि क्यों? शायद आप भी करते होंगे, लेकिन पता नहीं। गणेश जी की स्तुति मकान पर बनाए रखते हैं। हर जगह पहले कुछ करना हो, तो गणेश जी की पहले पूजा— प्रार्थना करनी पड़ती है।

उसका कुल कारण इतना है कि पुराने शास्त्र कहते हैं कि गणेश जो हैं, वे पहले बहुत विध्वंसकारी थे, बहुत उपद्रवी थे। और जहां भी कुछ शुभ कार्य हो रहा हो, वहां विध्‍न खड़ा करना उनका काम था। विध्‍नेश्वर उनका पुराना नाम है। तो चूंकि उपद्रव वे न करें, इसलिए पहले उनकी स्तुति करके हम समझा—बुझा लेते हैं कि कोई गड़बड़ न करना महाराज! श्री गणेशायनम:। तो उनका हम पहले स्मरण करते हैं।

यह अक्सर हो जाता है। जिससे भय होता है, उसको पहले स्मरण करना होता है। अब तो हम भूल भी गए कि वे विध्‍नेश्वर हैं। अब तो हम समझते हैं कि वे मंगलमूर्ति हैं। उपद्रवी हैं! उपद्रव से बचने के लिए, कि आपको पहले मनाए लेते हैं, फिर किसी और की करेंगे पूजा और प्रार्थना। आप पहले राजी रहें, नहीं तो सब उपद्रव हो जाएगा।

शंकर की भी हम पूजा—प्रार्थना करते हैं भय के कारण। ब्रह्मा की हम कोई पूजा नहीं करते। शायद एक मंदिर है मुल्क में ब्रह्मा के लिए और कोई मंदिर नहीं है। क्योंकि क्या करना, वह तो बात खतम हो गई। ब्रह्मा ने जन्म दे दिया, अब कुछ और काम है नहीं उनका। शंकर का अभी थोड़ा डर है, क्योंकि मौत वे देंगे। विष्णु के सारे मंदिर हैं। और सब रूप—राम हों, कृष्‍ण हों— सब विष्णु के रूप हैं। और हम उनके मंदिर में पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं। विष्णु संसार हैं। वह मध्य है। ये दो छोर द्वंद्व हैं। और इन दोनों छोरों को जोड्ने वाली लकीर विष्णु।

दूसरा छोर अर्जुन को दिखाई पड़ना शुरू हो रहा है।

अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से इस जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं। और हे महात्मन्! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का संपूर्ण आकाश तथा दिशाएं एक आपसे ही परिपूर्ण हैं। तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर, अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर, तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।

अर्जुन को दिखाई पड़ रहा है, यह दूसरा रूप। और उसे साथ में दिखाई पड़ रहा है, इस दूसरे रूप के कारण सारा लोक व्यथित हो रहा है।

आप व्यथित हो रहे हैं किसलिए? बीमारी है, दुख है, मौत है, यह दुख है। मृत्यु गहन दुख है। और सारे दुख उसी की छायाएं हैं। हर आदमी कांप रहा है, दुखी हो रहा है, घबड़ा रहा है, मिट न जाऊं। जब कोई इस विराट को अनुभव करता है दूसरे रूप में, तो देखा होगा अर्जुन ने कि सारे लोग मृत्यु के मुंह में चले जा रहे हैं, चाहे वे कुछ भी कर रहे हों, चाहे वे दुकान जा रहे हों, मंदिर जा रहे हों, घर लौट रहे हों। कहीं भी जा रहे हों आप, आपका जाना—आना कुछ अर्थ नहीं रखता। एक बात तय है कि आप मौत के मुंह में जा रहे हैं। चाहे दुकान जा रहे हैं, चाहे घर आ रहे हैं। हर हालत में आप मौत के मुंह में जा रहे हैं।

जब अर्जुन को प्रतीत हुआ होगा यह विकराल अग्निमुख, तब उसने देखा होगा, सारा लोक, सारे प्राणी, मौत के मुंह में चले जा रहे हैं और हर एक कांप रहा है।

यह एक बहुत गहन अनुभव है। अगर आप भी आंख बंद करके लोगों के बाबत सोचें—यहां इतने लोग बैठे हैं, अगर आंख बंद करके क्षणभर को सोचें— तो यहां जो लोग बैठे हैं, वे सब मौत के मुंह में जा रहे हैं। एक घंटा व्यतीत हुआ, तो आप मौत के मुंह में सरक गए और थोड़ा ज्यादा। कोई आज मरेगा, कोई कल मरेगा, कोई परसों मरेगा, समय का ही फासला है। हम सब लाशें हैं, जिन पर तारीखें लिखी हैं कि कब घोषणा हो जाएगी। लाशें चल रही हैं, गिर रही हैं, उठ रही हैं और कांप रही हैं, क्योंकि वह तारीख..! गुरजिएफ कहा करता था कि अगर इस जमीन को अब धार्मिक बनाना हो, तो एक ही उपाय है। और वह कहता था, वैज्ञानिकों को सारी चिंता छोड्कर एक यंत्र खोज लेना चाहिए घड़ी की तरह, जो हर आदमी के हाथ पर बांध दिया जाए, जो हमेशा उसको बताता रहे कि अब मौत कितने करीब है। वह कांटा उसका घूमता रहे।

यह हो सकता है, कठिन नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक अगर बनाएंगे भी, तो हम उस वैज्ञानिक को ही मार डालेंगे, वह यंत्र भी तोड़ देंगे। यंत्र बन सकता है, क्योंकि शरीर के स्पंदन बताते हैं कि अब आपमें कितना जीवन शेष है, आज नहीं कल। क्योंकि बच्चा जब पैदा होता है, तो उसके जो क्रोमोसोम हैं, उसकी जो बनावट के बुनियादी ढांचे हैं, जिस पर खड़ा है सारा जीवन, उनकी नाप—जोख हो सकती है कि ये कितनी देर चलेंगे! जैसे आप घड़ी खरीदते हैं, तो दस साल की गारंटी हो सकती है।

तो बच्चा पैदा होता है, उसकी सारी की सारी, जिस दिन हम शरीर की व्यवस्था को पूरा समझ लेंगे, उसके जीवन—कोष्ठ की व्यवस्था को, उस दिन हम कह सकेंगे कि यह बच्चा सत्तर साल चलेगा, कि अस्सी साल चलेगा। तो फिर एक यंत्र उसके हाथ पर बिठाया जा सकता है, जो बताता रहेगा कि अब कितना कम होता जा रहा है। घडी का कांटा घूमता रहेगा और मौत की तरफ आता रहेगा। और एक दिन आकर मौत पर रुक जाएगा।

लेकिन गुरजिएफ कहता है कि अगर यह यंत्र खोज लिया जाए, तो दुनिया आज फिर से धार्मिक हो सकती है।

वह ठीक कहता है। यंत्र चाहे खोजा जाए या न खोजा जाए, जिस आदमी को भी मौत का खयाल आना शुरू हो जाता है, उसकी जिंदगी में परिवर्तन शुरू हो जाता है। क्योंकि जिसको भी यह पता चल जाए कि मैं मिट जाऊंगा, उसकी सारी वासनाओं का अर्थ खो जाता है। सब फ्यूटायल, सब व्यर्थ मालूम होने लगता है। क्या अर्थ है फिर एक मकान बनाने का? फिर क्या अर्थ है इतना धन इकट्ठे करने का? फिर क्या अर्थ है कि इतने लोग इज्जत दें, प्रतिष्ठा करें?

कुछ भी अर्थ नहीं है। मुर्दे मुर्दों से प्रतिष्ठा मांग रहे हैं! मुर्दे मुर्दों से इज्जत इकट्ठी कर रहे हैं। और कुल फर्क इतना है कि हम आते थोड़ी देर से हैं, आप जाते थोड़े जल्दी हैं। या हम जाते थोड़े जल्दी हैं, आप आते थोड़ी देर से हैं। क्यू है। वह जो बस के पास क्यू लगा रहता है! क्यू लगाकर हम मौत के पास खड़े हैं। आपके पिता जरा आगे होंगे, आपका बेटा जरा पीछे होगा, आप जरा क्यू के बीच में होंगे। बाकी क्यू लगा हुआ है और उधर मुंह है।

अर्जुन को दिखा होगा, सारा प्राणी—जगत क्यू लगाए खड़ा है, और मौत के मुंह में जा रहा है, और लपटें हर एक के ऊपर घूम रही हैं। इसलिए वह कह रहा है कि सारा जगत, आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं।

अलौकिक भी है यह रूप और भयंकर भी! अलौकिक क्यों? भयंकर कैसे अलौकिक कहा होगा अर्जुन ने?

अगर आप पूरे को देख पाएं, तो जब पतझड़ हो रही है और पत्ते गिर रहे हैं और वृक्ष नग्न हो गए हैं— अगर आपको दिखाई पड़ता हो थोड़ा गहरा, अगर आपके पास झांकने की क्षमता हो— तो ये जो पत्ते गिर गए हैं और वृक्ष नग्न हो गए हैं, यह आने वाली बहार की खबर है। ये गिरते हुए पत्ते नये आने वाले पत्तों के द्वारा धक्का दिए गए हैं। भीतर से नये पत्ते आ रहे हैं, वह जगह बना रहे हैं। वे पुराने पत्तों को धक्का देकर गिरा रहे हैं। वृक्ष थोड़ी देर को नग्न हो गया है, क्योंकि फिर दुल्हन की तरह सजने की उसकी तैयारी है। तो एक तरफ पतझड़ बहुत विकराल है, और दूसरी तरफ पतझड़ वसंत के आगमन की खबर है, वह जो आने वाला है, वह जो हो रहा है। एक तरफ मौत दुख है। लेकिन हर मौत जन्म की खबर है। जब एक बुजुर्ग आदमी मर रहा है, तो हमें सिर्फ एक मरता हुआ आदमी दिखाई पड़ता है। हमें पता नहीं कि जैसे नया पत्ता पुराने पत्ते को धक्का देकर गिरा रहा है। कोई नया बच्चा इस जगत में प्रवेश कर रहा है, एक पुराने शरीर को गिरा रहा है।

अगर हम इस पूरे को देख पाएं, तो हम देखेंगे कि एक नया बच्चा किसी गर्भ में प्रवेश कर गया है, और एक बुढा आदमी कब्र के किनारे आ गया है। वह नया बच्चा गर्भ में बढ़ने लगेगा और यह बुढा आदमी कब्र में प्रवेश करने लगेगा। वह नया बच्चा गर्भ को छलांग लगाकर बाहर आ जाएगा, यह बुजुर्ग आदमी छलांग लगाकर कब्र में प्रवेश कर जाएगा। ये जरा दूर हैं फासले पर, इसलिए हमें दिखाई नहीं पड़ते, जरा बड़ा पर्सपेक्टिव, जरा बड़ा परिप्रेक्ष्य, देखने की नजर चाहिए। तो बूढ़ा आदमी जब मर रहा है, तो नया बच्चा पैदा हो रहा है।

इसलिए अर्जुन कहता है, अलौकिक और भयंकर। इधर देखता हूं कि जन्म हो रहा है। इधर देखता हूं कि मौत हो रही है। और देखता हूं कि जन्म और मौत किसी एक ही चीज के दो पैर हैं, जिसे हम जीवन कहते हैं। तो बहुत अलौकिक है।

अलौकिक क्यों? क्योंकि लोक में ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। अलौकिक का मतलब है, जैसा लोक में दिखाई नहीं पड़ता। यहां तो हम बच्चे को बच्चा देखते हैं, बुढ़े को बूढ़ा देखते हैं। पतझड को पतझड़ और वसंत को वसंत देखते हैं। यहां हम दोनों को जोड़कर नहीं देखते।

लेकिन जो आदमी जरा ऊपर उठता है और दृष्टि उसकी खुलती है, उसे दिखाई पड़ता है, ये दोनों तो जुड़े हैं। कल तक हमने समझा था, जन्म अलग, मौत अलग। अब हम देखते हैं, वे एक ही हैं। वे एक ही लहर के दो छोर हैं। यह अलौकिक है।

इसलिए अर्जुन को लगता है, बड़ा अलौकिक! क्योंकि हम तो सोचते थे, सुंदर अलग, कुरूप अलग। हम तो सोचते थे, मित्र अलग, शत्रु अलग। हम तो सोचते थे, अपना—पराया। यहां तो दोनों एक हैं। द्वंद्व, हम सोचते थे, विपरीत हैं; यहां पता चलता है कि द्वंद्व तो मिले हैं। यह तो साजिश है। यह तो जन्म और मौत की साजिश है। ये दोनों एक साथ जुड़े हैं। अब तक हमने विपरीत समझा था। हमने सोचा था, मृत्यु जो है, वह जन्म के खिलाफ है। और हमने चाहा था कि मृत्यु को रोक दें, ताकि जगत में जन्म ही जन्म रह जाए।

लेकिन हमें पता नहीं है कि हम जो सोचते हैं, वह हो नहीं सकता, क्योंकि व्यवस्था अस्तित्व की हमारे खयाल में नहीं है। जिस दिन जन्म हुआ, मौत हो गई। जन्म के साथ ही मरना शुरू हो गया। आप कल मरेंगे, लेकिन मरने का काम आपको जीवनभर करना पड़ेगा, तब तो मरेंगे। एकदम से कैसे मरेंगे! इस जगत में कुछ भी एकदम से नहीं घटता। प्रक्रिया है, सीढ़ी—सीढ़ी चढ़ेंगे और मरेंगे।

तो जन्म पहला कदम है मौत की तरफ। अगर जन्म पहला कदम है मौत की तरफ, तो जो देखता है उसको दिखाई पड़ेगा, मौत फिर पहला कदम है नये जन्म की तरफ।

हम मरते आदमी को देखते हैं कि मर गया, क्योंकि हमें आगे कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हमें लगता है कि बस, एक खाई के किनारे जाकर एक आदमी गिर गया, खतम हो गया। क्योंकि हमें आगे दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन जहां मौत घट रही है, तत्‍क्षण उससे जुड़ा हुआ जन्म घट रहा है। क्योंकि इस जगत में कुछ भी मिट नहीं सकता। मिटने का कोई उपाय ही नहीं है।

वैज्ञानिक कहते हैं, रेत के एक छोटे—से कण को भी नष्ट नहीं किया जा सकता। इस जगत में जितना है, जो है, वह उतना ही है, उतना ही रहेगा। न हम उसमें कुछ जोड़ सकते हैं, न कुछ घटा सकते हैं।

तो फिर एक आदमी मरता है, मर कैसे सकेगा? कुछ मिटता नहीं है, तो यह आदमी कैसे मिट सकेगा? यह केवल हमारी नजर से ओझल हुआ जा रहा है। जहां तक हम देख सकते हैं, वहां तक दिखाई पड़ रहा है; उसके पार हम नहीं देख सकते। यह किसी नये डायमेंशन में, किसी नये आयाम में प्रवेश कर रहा है, जहां हमें दिखाई नहीं पड़ता।

जैसे एक जहाज जाता है पानी में। दिखाई पड़ता है, दिखाई पड़ता है, दिखाई पड़ता है। फिर फीका होता जाता है, फीका होता जाता है। फिर अचानक तिरोहित हो जाता है। क्योंकि जमीन गोल है। जैसे ही जमीन की उस गोलाई को जहाज पार कर लेता है, जिसके पार गोलाई उसको छुपाने का कारण बन जाएगी, हमारी आंख से ओझल हो जाता है!

मृत्यु भी एक वर्तुल, एक गोलाकार घटना है। जन्म और मृत्यु तक आधा वर्तुल पूरा होता है। फिर मृत्यु से जन्म तक आधा वर्तुल पूरा होता है। मृत्यु के किनारे जाकर एक चेतना उस ओझल होते जहाज की तरह आगे निकल जाती है, जहां तक हम देखते हैं उस सीमा के आगे। हम कहते हैं, आदमी मर गया। शरीर गिरकर हमारे पास रह जाता है, चेतना नये जन्म की यात्रा पर निकल जाती है। जब अर्जुन ने देखा होगा कि जन्म और मौत एक ही वर्तुल के हिस्से हैं, सुंदर—कुरूप एक ही वर्तुल के हिस्से हैं, मित्र—शत्रु एक ही बात है, तो अलौकिक लगा होगा! क्योंकि लोक में ऐसा अनुभव नहीं होता। और भयंकर भी लगा कि यह क्या है सब! घबड़ाने वाला भी लगा।

और यह देखकर कि सारा जगत इसमें फंसा हुआ है, वह कहने लगा, और हे गोविंद! वे देवताओं के समूह आप में ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम और गुणों का उच्चारण कर रहे हैं।

देवता भयभीत होकर, हाथ जोड़े हुए, आपके ही नाम और गुणों की स्तुति कर रहे हैं! यह थोड़ा विचारें।

मनस्विद, समाजशास्त्री कहते हैं कि धर्म का जन्म भय से हुआ है। उनके कारण दूसरे हैं। वे कहते हैं, आदमी डरता रहा है प्रकृति की शक्तियों से। और डर की वजह से उन्हें फुसलाने के लिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करता रहा है। आकाश में बादल गरजते हैं, अगर आप गुफा में रहते रहे होंगे कभी, तो घबड़ा गए होंगे। प्रकृति की विराट शक्तियां हैं, विध्वंस कर सकती हैं। क्षण में पहाड़ गिर जाते हैं, लोग दबकर नष्ट हो जाते हैं। भूकंप होता है, लोग विनष्ट हो जाते हैं, खो जाते हैं। गर्जना होती है बिजली की, कुछ समझ नहीं आता। तूफान आते हैं, बाढ़ आती है, और कुछ आदमी कर नहीं सकता।

तो विज्ञानविद कहते हैं कि आदमी उस भय की स्थिति में एक ही बात सोच सका, और वह यह था कि यह जो इतनी भयभीत करने वाली शक्तियां हैं, इनसे प्रार्थना की जाए, इन्हें परसुएड, फुसलाया जाए कि नाराज मत होओ। वह यही सोच सका कि नाराज हो गई है नदी, इसलिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करो। नाराज हो गए हैं बादल, इसलिए पानी नहीं गिर रहा है। हाथ जोड़कर प्रार्थना करो। कुछ पूजा करो, स्तुति करो, महिमा गाओ।

वैज्ञानिक कहते हैं, इसी भय से धर्म का जन्म हुआ है। थोड़ी दूर तक उनकी बात सच है, लेकिन बहुत ज्यादा दूर तक नहीं है। बहुत ज्यादा दूर तक नहीं है। थोड़ी दूर तक इसलिए सच है कि जरूर भय का थोड़ा हाथ है। लेकिन इतना ही भय काफी नहीं है।

असली भय न तो नदियों का है, असली भय न तो पहाड़ों के गिरने का है, असली भय न तो ज्वालामुखियों के फूटने का है, असली भय तो मौत का है। मौत के भय के कारण ही बाढ़ भी भयभीत करती है, ज्वालामुखी भी भयभीत करता है, गिरता पहाड़ भी भयभीत करता है। लेकिन अगर पहाड़ गिरे और आप न मरें और वैसे के वैसे ही वापस निकल आएं, फिर पहाड़ भयभीत नहीं करेगा। बाढ़ आए और कुछ न बिगाड़ पाए, पृथ्वी कंपे और आप अडिग बैठे रहें और आपका बाल भी बांका न हो, तो फिर भय नहीं होगा।

तो न तो पहाड़ों का भय है, न नदियों का भय है, न सूर्यों का भय है, भय तो सिर्फ एक है, मौत का। उसको अगर हम ठीक से समझें, तो एक ही भय है, मिट जाने का। मैं नहीं हो जाऊंगा। मैं नहीं बचूंगा। मेरा मिटना हो जाएगा, मैं शून्य हो जाऊंगा। ना—कुछ हो जाऊंगा। मेरी सब रेखाएं खो जाएंगी, जैसे रेत पर बनी रेखाएं, हवा का झोंका आए और मिट जाएं। ऐसा मैं नहीं हो जाऊंगा, यह नथिगनेस.......।

निश्चित ही, इस भय से धर्म का विचार पैदा हुआ होगा। और यह खयाल में आना शुरू होगा कि अगर नहीं ही हो जाना है, तो इसके पहले कि मैं नहीं हो जाऊं, मैं थोड़ा इसका भी तो पता लगा लूं कि क्या कुछ मेरे भीतर ऐसा भी है, जिसे दुनिया की कोई शक्ति मिटा नहीं सकती? क्या सारी मृत्यु भी आ जाए, तो भी मेरे भीतर कोई अमृत बचेगा? क्या मैं बचूंगा? सारे मिटने की घटना के बाद भी क्या कुछ बच रहेगा? वह कुछ क्या है? उसको ही हम आत्मा कहते हैं। वही सार है। जिसको मृत्यु नहीं मिटा पाती, उसका नाम आत्मा है।

अगर आपको ऐसा पता चलता हो कि जो भी आप अपने बाबत जानते हैं, वह मृत्यु में मिट जाएगा, तो आप पक्का समझना, आपको आत्मा का कोई पता नहीं है। अगर आपको ऐसी किसी चीज का अनुभव होता हो आपके भीतर जो मृत्यु में नहीं मिटेगा, तो ही समझना कि आपको आत्मा का कोई अनुभव शुरू हुआ है। आत्मा मानने की बात नहीं है, अनुभव की बात है। आत्मा मृत्यु के विपरीत खोज है।

तो अर्जुन देख रहा है कि आदमी की तो बिसात क्या, देवता भी कांप रहे हैं। वे भी हाथ जोड़े खड़े हैं। उनके भी घुटने टिके हैं। वे भी प्रार्थना कर रहे हैं। वे आपका नाम लेकर उच्चारण कर रहे हैं, स्तुति कर रहे हैं! क्यों? क्योंकि देवता भी मिटने से उतना ही डरा हुआ है।

बुरा आदमी ही मिटने से डरता है, ऐसा मत समझना; भला आदमी भी मिटने से डरता है। बल्कि कई दफे तो बुरे आदमी से ज्यादा भला आदमी मिटने से डरता है। क्योंकि भले को लगता है कि इतना सब भला किया और मिट गए। बुरे को लगता है, डर भी क्या है! ऐसा कुछ किया भी क्या है, जिसको बचाने की जरूरत हो। मिट गए, तो मिट गए। और बुरा तो चाहेगा कि मिट ही जाएं तो अच्छा है, क्योंकि जो किया है, कहीं उसका फल न भुगतना पड़े। भला चाहता है कि बचे, क्योंकि इतना उपद्रव किया, इतनी साधना की, इतने व्रत—उपवास किए, इतनी पूजा—प्रार्थना की, और मिट गए। तो इसका पुरस्कार? तो नाहक ही जीवन गया!

देवता भली चेतनाओं के नाम हैं, शुद्धतम चेतनाओं के नाम हैं। लेकिन देवता वासना के बाहर नहीं हैं। शुद्धतम चेतना है, लेकिन वासना के भीतर है। इसलिए हमने मनुष्य से देवता को एक अर्थ में ऊपर रखा है, कि वह मनुष्य से ज्यादा शुद्धतर स्थिति है। लेकिन एक अर्थ में नीचे भी रखा है, क्योंकि अगर उसको मुक्त होना हो, तो उसे मनुष्य में वापस लौट आना पड़ेगा।

मनुष्य चौराहा है। पशु होना हो, तो मनुष्य की तरफ से यात्रा जाती है। देवता होना हो, तो मनुष्य की तरफ से यात्रा जाती है। और अगर समस्त जीवन के पार जाना हो, तो भी मनुष्य से ही यात्रा जाती है।

तो देवता एक छोर है शुद्ध होने का। इसे हम ऐसा समझें कि अगर नैतिक आदमी सफल हो जाए पूरी तरह, तो देवता हो जाएगा। नैतिक आदमी अगर सफल हो जाए पूरी तरह, जो दस धर्मों को मानकर चलता है, अगर सफल हो जाए पूरी तरह, अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य, सब सध जाए, सारे पाप क्षीण हो जाएं और सारे पुण्य उसे उपलब्ध हो जाएं, तो जो हमारी अंतिम कल्पना है, वह यह है कि वह देवता हो जाएगा। वह शुद्धतम होगा, उसके पास शरीर नहीं होगा, सिर्फ चेतना होगी। उसके पास इंद्रियां नहीं होंगी, लेकिन वासना होगी। इंद्रियों के कारण वासना को जो बाधा पड़ती है, वह उसे नहीं पड़ेगी। उसकी वासना, उसकी इच्छा, पैदा होते ही पूर्ण हो जाएगी, उसी क्षण। वह सोचेगा, यह हो, वैसा हो जाएगा। उसकी वासना में और वासना के पूरे होने में समय का व्यवधान नहीं होगा।

आपको भूख लगती है, तो फिर रोटी बनानी पड़ती है, भोजन पकाना पड़ता है, या होटल जाना पड़ता है, आर्डर करना पड़ता है, समय लगता है। देवता को भूख लगेगी, भोजन हो जाएगा। बीच में कोई इंद्रियां नहीं हैं, जिनकी वजह से समय के लिए कोई बाधा पड़े, कोई माध्यम नहीं है। उसकी वासना उसकी तृप्ति होगी। लेकिन वासना होगी, शुद्ध वासना होगी।

लेकिन वासना जहां होती है, वहां अहंकार भी होता है। और जहां अहंकार होता है, वहां मिटने का डर भी होता है। जब तक लगता है, मैं हूं तब तक मिटने का डर भी रहेगा। तो देवता भी डर रहा है। बल्कि सच तो यह है कि देवता आपसे ज्यादा डर रहे हैं, क्योंकि उनके पास खोने को ज्यादा है।

इसलिए आपने कहानियां सुनी हैं पुरानी, लेकिन कभी इस कोण से नहीं देखा होगा। इस पूरे प्राणियों के विस्तार में इंद्र से ज्यादा भयभीत, पुरानी कहानियों में कोई भी नहीं मालूम पड़ता। हमेशा उसका सिंहासन डगमगा जाता है। जरा ही किसी ने तपस्या की कि उनको तकलीफ शुरू हुई! कोई साधु—मुनि बेचारा ब्रह्मचारी हुआ, कि वे मुश्किल में पड़े, कि उन्होंने अपनी अप्सराएं भेजीं, कि करो भ्रष्ट इसको! आखिर इंद्र को इतना डर क्यो है ? इतना क्या भय है? भय का कारण है। उसके पास है। वह शिखर पर बैठा है वासना के। देवता शुद्धतम वासना हैं। और देवताओं में श्रेष्ठतम वासना, आखिरी शिखर, एवरेस्ट, गौरीशंकर, वह इंद्र है। वहां एक ही पहुंच सकता है। वह शिखर आखिरी है, चोटी। वहां दो नहीं हो सकते।

तो जब भी नीचे से कोई ऊपर चढ़ने की कोशिश शुरू करता है, तब वह शिखर कंपने लगता है। और इंद्र घबड़ाता है। इसके पहले कि यह आदमी चढ़े, इसको उतारने की कोशिश करो। और आदमी चढ़े, इसको उतारने के लिए स्त्री से ज्यादा बेहतर और कुछ भी नहीं है। भेजो स्त्री को! वह तो स्त्रियों ने साधना नहीं की, नहीं तो आदमियों को भेजना पड़ता, वह कोई बात नहीं है! स्त्रियां इस झंझट में नहीं पड़ी कि क्यों तकलीफ दो इंद्र को, काहे को हिलाओ! किसी को क्यों तकलीफ दो!

यह जो भय है इंद्र का, यह बहुत साइकोलॉजिकल है, यह बहुत मनस के गहरे में है। जो भी शिखर पर होगा किसी चीज के, वह उतना ही ज्यादा भयभीत हो जाएगा। आप जिस मजे से सोते हैं, प्रधानमंत्री नहीं सो सकता। कोई उपाय नहीं है। क्योंकि कई ऋषि—मुनि नीचे कोशिश कर रहे हैं! वे चढ़ रहे हैं! कुछ भेजो उनके लिए। कोई अप्सरा भेजो। कोई पद भेजी। कहीं गवर्नर बनाओ। कुछ करो। नहीं तो वे ऋषि—मुनि आ रहे हैं! वे चढ़ दौड़ेंगे। आज नहीं कल उतारकर प्रधानमंत्री को, राष्ट्रपति को, नीचे करेंगे। खुद! आखिर वहां एक ही बैठ सकता है। तो वह जो एक बैठा हुआ है, दिक्कत में है।

तो इंद्र बेचैन है।

कृष्‍ण से अर्जुन कह रहा है कि देवताओं को भी मैं देख रहा हूं कि वे कांप रहे हैं, भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए हैं, आपके नाम और गुणों का उच्चारण कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धों के समुदाय, कल्याण होवे, ऐसा कहकर उत्तम—उत्तम शब्दों द्वारा आपकी प्रशंसा  कर रहे हैं।

महर्षि और सिद्धों के समुदाय भी कह रहे हैं, कल्याण, कल्याण होवे। दया हो, कृपा हो, अनुग्रह हो! महर्षि और सिद्धों के समुदाय भी क्यों घबड़ा रहे हैं?

मिटने का भय आखिरी सीमा तक है। आखिरी सीमा तक! जिसने बहुत—सी सिद्धियां पा ली हैं, उसको सिद्ध कहा है। ये सिद्ध महावीर और बुद्ध के अर्थों में नहीं हैं। सिद्ध उसको कहा है, जिसने बहुत—सी सिद्धियां पा ली हैं, ऋद्धियां—सिद्धियां पा ली हैं, चमत्कार कर सकता है। वह भी कांप रहा है। महर्षि, जो बहुत जानते हैं, ज्ञान का अंबार जिनके ऊपर है, जिनकी जानकारी का कोई अंत नहीं है, वे भी कांप रहे हैं। वे भी कह रहे हैं, कल्याण, कल्याण। दया करो, क्षमा करो। भयभीत हो रहे हैं।

हमारे भीतर जो मैं का भाव है, वह मिट सकता है। और हमारे भीतर जो मैं—शून्यता की अवस्था है, वह नहीं मिट सकती। मैं स्ट्रक्चर है, ढांचा है हमारे चारों तरफ, वह मिटेगा। जैसे शरीर का एक ढांचा है, वह मृत्यु में मिटेगा। ऐसे ही मैं का भी एक ढांचा है, वह भी मिटेगा। इस ढांचे के भीतर एक शून्य है।

ऐसा समझें कि आपने एक मकान बनाया। मकान तो मिटेगा, दीवालें तो गिरेंगी, खंडहर होगा, देर—अबेर। लेकिन मकान के भीतर जो शून्य आकाश था, वह नहीं मिटेगा। जब आपकी दीवाले नहीं थीं, तब भी था। फिर आपने दीवालें उठाई, तो आपने उस शून्य आकाश को दीवालों के भीतर घेर लिया। फिर आपकी दीवालें गिर जाएंगी, वह शून्य आकाश वहीं का वहीं रहेगा।

और ध्यान रखें, मकान है क्या? दीवालों का नाम मकान नहीं है, क्योंकि दीवालों में कौन रह सकता है! रहते तो शून्य आकाश में हैं। दीवाल में रह सकते हैं आप? रहते कमरे में हैं। अंग्रेजी का शब्द रूम बहुत अच्छा है। रूम का मतलब होता है, स्पेस। आप रहते रूम में हैं, खाली जगह में हैं, दीवालों में नहीं रहते। अगर अकेली दीवालें ही हों मकान में और खाली जगह न हो, तो उसको कौन मकान कहेगा?

आप रहते खाली जगह में हैं, वहीं जीवन है। दीवालें सिर्फ खाली जगह को घेरे हुए हैं। दीवालें नहीं थीं, तब भी यह खाली जगह थी। यह रूम था, बिना दीवाल के था। कल दीवालें गिर जाएंगी, तब भी यह रूम रहेगा, बिना दीवाल के रहेगा। अगर आपने दीवालों से समझा कि अपना मकान, तो आप घबडाए रहेंगे, कि आज मिटा, कल मिटा। अगर आपने इस खाली जगह, रूम को समझा कि मेरा मकान, फिर आपको भय की कोई भी जरूरत नहीं है। मैं दीवाल है। भीतर जो शून्य, शांत, चैतन्य है, वह आकाश है।

देवता भी कपेंगे, मुनि भी कपेंगे, सिद्ध भी कंपेंगे। वे सभी के सभी किसी न किसी तरह के मैं से अभी जुड़े हुए हैं।

और हे परमेश्वर! जो एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनी कुमार, मरुदगण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धगणों के समुदाय हैं, वे सभी विस्मित हुए आपको देख रहे हैं। उनकी किसी की समझ में नहीं आता कि यह क्या है!

जहां द्वंद्व खो जाते हैं, वहां समझ भी खो जाती है और केवल विस्मय रह जाता है। समझ चलती है तब तक, जब तक द्वंद्व को अलग—अलग करके हम रखते हैं। जहां एक हो जाती हैं दोनों बातें, वहां समझ खो जाती। और यह जो नासमझी है, समझ के खो जाने पर जो आती है, इस नासमझी को ज्ञान कहा है। यह जो नासमझी है, इसे ज्ञान कहा है।

इस ज्ञान के क्षण में सिर्फ भीतर का शून्य, बाहर का शून्य दिखाई पड़ता है, जो एक हो गए। और बाहर— भीतर भी दिखाई नहीं पड़ता कि क्या बाहर है, क्या भीतर है। दोनों एक हो गए होते हैं। इस बाहर— भीतर की एकता में, इस शून्य में ही भय तिरोहित होता है। तो अर्जुन कह रहा है कि सभी भयभीत हो रहे हैं। आपका यह रूप देखकर सभी विस्मित हो गए हैं, किसी की कुछ समझ में नहीं पड़ रहा है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11भाग 3

 धर्म है आश्‍चर्य की खोज



दिवि सूर्यसहसस्थ भवेह्यगफत्सिता।

यदि भा: सदृशी सा स्यादृभासस्तस्थ महात्मन:।। 12।।

तत्रैकस्थं जगकृत्‍स्‍नं प्रविभक्तमनेकधा।

अयश्यद्देवदेवस्थ शरीरे पाण्डवस्तदा।। 13।।

तत: छ विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजय:।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताज्जलिरभाषत।। 14।।


अर्जुन उवाच:


पश्यामि देवास्तव देव देहे सर्वास्तंथा भूतविशेषसंघान्।

ब्रह्माणमीश कमलासनस्थमृषीश्च सर्वागुरगांश्ब दिव्यान्।। 15।।

अनेकबाहूदरवक्तनेत्र यश्यामि त्वां सर्वतोउनन्तरूपम्।

नान्तं न मध्यं न गुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूय।। 16।।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्य      समन्ताद्दीप्तानलार्कह्यतिमप्रमेयम्।। 17।।


और हे राजन् आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्‍न हुआ जो प्रकाश हो वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।

ऐसे आश्चर्यमय रूप को देखते हुए पांडुपुत्र अर्जुन ने उस काल में अनेक प्रकार से विभक्त हुए अर्थात पृथक— पृथक हुए संपूर्ण जगत को उस देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के शरीर में एक जगह स्थित देखा।

और उसके अनंतर वह आश्चर्य से युक्त हुआ हर्षित रोमों वाला अर्जुन विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा— भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए बोला।

हे देव आप के शरीर में संपूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को और कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को तथा महादेव को और संपूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सुर्यों को देखता हूं।

और हे संपूर्ण विश्व के स्वामिन— आपको अनेक हाथ पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनंत रूपों वाला देखता हूं। हे विश्वरूप आपके न अंत को देखता हूं तथा न मध्य को और न आदि को ही देखता हूं।

और मैं आपका मुकुटयुक्त गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज का मुंज प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त देखने में अति गहन और अप्रमेय स्वरूप सब ओर से देखता हूं।


 


और हे राजन्! आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने उत्पन्न हुआ जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।

पहला अनुभव उसने कहा ऐश्वर्य का। संजय ने कहा कि अर्जुन ने देखा, परमात्मा का महिमाशाली ऐश्वर्य रूप। जो सुंदर है, जो श्रेष्ठ है, जो बहुमूल्य है, वह सब। जगत का जैसे सारा सौंदर्य निचोड़ लिया हो, और जगत की जैसे सारी सुगंध निचोड़ ली हो, और जगत का जैसे सारा प्रेम निचोड़ लिया हो, और तब उस सार में जो अनुभव हो, वह ऐश्वर्य है परमात्मा का। अर्जुन ने पहले परमात्मा का ऐश्वर्य रूप देखा।

दूसरी बात संजय कहता है कि परमात्मा का प्रकाश रूप देखा। यह उचित है कि ऐश्वर्य के बाद प्रकाश दिखाई पड़े। क्योंकि ऐश्वर्य भी धीमा प्रकाश है। ऐश्वर्य भी धीमा प्रकाश है। जैसे सुबह होती है। रात भी चली गई और अभी दिन भी हुआ नहीं है और बीच में वे जो भोर के क्षण होते हैं, जब धीमा प्रकाश होता है, जो आंख को परेशान नहीं करता, जो आंख पर चोट नहीं करता, जिसमें कोई चमक नहीं होती, सिर्फ आभा होती है। या सांझ को जब सूरज ढल गया, और रात अभी उतरी नहीं, और बीच का वह जो संधिकाल है, तब धीमा-सा आलोक रह जाता है। ऐश्वर्य आलोक है।

ऐश्वर्य आंखों को तैयार कर देगा अर्जुन की कि वह प्रकाश को देख सके। अन्यथा परमात्मा का प्रकाश, आंखें बंद हो जाएंगी। अन्यथा परमात्मा का प्रकाश, वह चकाचौंध में होश खो जाएगा। ऐसा बहुत बार हुआ है। ऐसा बहुत बार हुआ है कि कुछ साधना पद्धतियां हैं, जिनसे व्यक्ति सीधा परमात्मा के प्रकाश स्वरूप को देख लेता है। तो वह प्रकाश इतना ज्यादा है कि सहा नहीं जा सकता। और सदा के लिए भीतर घुप्प अंधेरा छा जाता है।

यह शायद आपने नहीं सुना होगा। आपको भी खयाल नहीं है। अगर आप सूरज की तरफ सीधा देखें और फिर कहीं और देखें, तो सब तरफ घुप्प अंधेरा मालूम पड़ेगा। अगर रात आप रास्ते से गुजर रहे हैं, अंधेरा है, अमावस की रात है, लेकिन फिर भी आपको कुछ-कुछ दिखाई पड़ रहा है। फिर पास से एक तेज प्रकाश वाली कार गुजर जाती है। वह प्रकाश आंखों को चौंधिया जाता है। फिर कार तो गुजर जाती है, रात और अंधेरी हो जाती है। अभी तक उस रास्ते पर चल रहे थे, अब अंधेरा और घना हो जाता है।

लेकिन अगर ऐश्वर्य का अनुभव पहले हो...। इसीलिए हमने भगवान को ईश्वर का नाम दिया है। हम उसके ऐश्वर्य रूप को पहले स्वीकार करते हैं, वह आभा है। और ध्यान रहे, सुबह जब आभा घेर लेती है भोर की और फिर सूरज निकलता है, तो सुबह के सूरज के साथ भी आंखों को मिलाना आसान है; वह बाल—सूर्य है। और अगर कोई सुबह से ही अभ्यास करता रहे सूर्य के साथ आंख मिलाने का, तो दोपहर के सूर्य के साथ भी आंख मिला सकता है। आभा से शुरू करे, बाल—सूर्य से बढ़ता रहे और धीरे— धीरे, धीरे— धीरे......।

बाल—सूर्य के साथ जो यात्रा शुरू करेगा, वह धीरे से जब दोपहर का प्रौढ़ सूर्य होगा, तब भी आंखें सूर्य से मिला सकेगा और आंखें अंधेरी न होंगी। ईश्वर इसीलिए हमने शब्द चुना है। ऐश्वर्य से शुरू करना, अन्यथा भयंकर अंधेरी रात भी आ सकती है भीतर, जो वर्षों चल सकती है, कभी—कभी जन्मों चल सकती है।

सीधे, बिना तैयारी के, परमात्मा के प्रकाश रूप के सामने खड़ा होना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए ऐश्वर्य के बाद अर्जुन को अनुभव हुआ अनंत—अनंत सूर्य जैसे जन्म गए हों।

एक बात समझ लेने जैसी है।

आज तो विज्ञान भी स्वीकार करता है कि पदार्थ की जो आंतरिक घटना है, वह पदार्थ नहीं है, प्रकाश ही है। जहां—जहां हम पदार्थ देखते हैं, वह प्रकाश का घनीभूत रूप है, कंडेंस्ट लाइट। या उसको विद्युत कहें, या उसको प्रकाश की किरण कहें, या शक्ति कहें। लेकिन आज विज्ञान अनुभव करता है कि पदार्थ जैसी कोई भी चीज जगत में नहीं है। सिर्फ प्रकाश है। और प्रकाश ही जब घनीभूत हो जाता है, तो हमें पदार्थ मालूम पड़ता है।

विज्ञान के विश्लेषण से पदार्थ का जो अंतिम रूप हमें उपलब्ध हुआ है, वह इलेक्ट्रान है, वह विद्युत—कण है। विद्युत—कण छोटा सूर्य है। अपने आप में पूरा, सूर्य की भांति प्रकाशोच्छल। विज्ञान भी इस नतीजे पर पहुंचा है कि सारा जगत प्रकाश का खेल है।

और धर्म तो इस नतीजे पर बहुत पहले से पहुंचा है कि परमात्मा का जो अनुभव है, वह वस्तुत: प्रकाश का अनुभव है। फिर कुरान कितनी ही भिन्न हो गीता से, और गीता कितनी ही भिन्न हो बाइबिल से, लेकिन एक मामले में जगत के सारे शास्त्र सहमत हैं, और वह है प्रकाश। सारे धर्म एक बात से सहमत हैं, और वह है, प्रकाश की परम अनुभूति।

विज्ञान और धर्म दोनों एक नतीजे पर पहुंचे हैं, अलग—अलग रास्तों से। विज्ञान पहुंचा है पदार्थ को तोड़—तोड़ कर इस नतीजे पर कि अंतिम कण, अविभाजनीय कण, प्रकाश है। और धर्म पहुंचा है स्वयं के भीतर डूबकर इस नतीजे पर कि जब कोई व्यक्ति अपनी पूरी गहराई में डूबता है, तो वहां भी प्रकाश है; और जब उस गहराई से बाहर देखता है, तो सब चीजें विलीन हो जाती हैं, सिर्फ प्रकाश रह जाता है।

अगर यह सारा जगत प्रकाश रह जाए, तो निश्चित ही हजारों सूर्य एक साथ उत्पन्न हुए हों, ऐसा अनुभव होगा। हजार भी सिर्फ संख्या है। अनंत सूर्य! अनंत से भी हमें लगता है कि गिने जा सकेंगे, कुछ सीमा बनती है। नही, कोई सीमा नहीं बनेगी। अगर पृथ्वी का एक— एक कण एक—एक सूर्य हो जाए। और है। एक—एक कण सूर्य है। पदार्थ का एक—एक कण विद्युत ऊर्जा है।

तो तब कोई गहन अनुभव में उतरता है अस्तित्व के, तो प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है।

संजय इसी तरफ धृतराष्ट्र को कह रहा है कि और हे राजन्.......।

लेकिन बेचारे धृतराष्ट्र को क्या समझ में आया होगा! उसे तो दीया भी दिखाई नहीं पड़ता। सूर्य तो सुना है। हजार सूर्य कहने से भी क्या फर्क पड़ेगा, क्योंकि सूर्य का पता हो तो हजार गुना भी कर लें। धृतराष्ट्र को क्या समझ में आया होगा!

हजार—हजार सूर्य के उत्पन्न होने से जैसा प्रकाश हो, विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश वह भी कदाचित ही हो पाए।

लेकिन धृतराष्ट्र समझ गया होगा शब्द, क्योंकि सूर्य शब्द उसने सुना है, प्रकाश शब्द भी उसने सुना है, हजार शब्द भी उसने सुना है। ये सब शब्द उसकी समझ में आ गए होंगे। लेकिन वह बात जो संजय समझाना चाहता था, वह बिलकुल समझ में नहीं आई होगी। यही हम सब की भी दुर्दशा है। सब शब्द समझ में आ जाते हैं, और उनके पीछे जो है, वह समझ के बाहर रह जाता है। शब्दों को लेकर हम चल पड़ते हैं। संगृहीत हो जाते हैं शब्द, और उनके भीतर जो कहा गया था, वह हमारे खयाल में नहीं आता।

ईश्वर! सुन लेते हैं, समझ में आ जाता है। ऐसा लगता है कि समझ गए कि ईश्वर कहा। लेकिन क्या कहा ईश्वर से? आत्मा! सुन लिया। कान में पड़ी चोट। पहले भी सुना था। शब्दकोश में अर्थ भी पढ़ा है। समझ गए कि ठीक। आत्मा कह रहे हैं। लेकिन क्या मतलब है? जब मैं कहता हूं घोड़ा, तो एक चित्र बनता है आंख में। जब मैं कहता हूं आत्मा, कुछ भी नहीं होता, सिर्फ शब्द सुनाई पड़ता है। शब्द भ्रांति पैदा कर सकते हैं, क्योंकि शब्द हमारी समझ में आ जाते हैं।

इसे ध्यान रखना जरूरी है कि शब्दों की समझ को आप अपनी समझ मत समझ लेना। उनके पार खोज करते रहना। और जो शब्द सिर्फ सुनाई पड़े और भीतर कोई अनुभव पकड़ में न आए, फौरन पूछ लेना कि यह शब्द समझ में तो आता है, लेकिन अनुभव हमारे भीतर इसके बाबत कोई भी नहीं! अनुभव से कोई हमारा अर्थ नहीं निकलता। तो ही आदमी साधक बन पाता है। और नहीं तो शास्त्रीय होकर समाप्त हो जाता है। शास्त्र सिर पर लद जाते हैं, बोझ भारी हो जाता है। आत्मा वगैरह तो कभी नहीं मिलती, शास्त्र ही इकट्ठे होते चले जाते हैं। और धीरे— धीरे आदमी उन्हीं के नीचे दब जाता है। धृतराष्ट्र ने सुना तो होगा, समझा क्या होगा!

ऐसे आश्चर्यमय रूप को देखते हुए, पांडुपुत्र अर्जुन ने उस काल में अनेक प्रकार से विभक्त हुए, पृथक—पृथक हुए संपूर्ण जगत को श्रीकृष्‍ण भगवान के शरीर में एक जगह स्थित देखा।

यह दूसरी बात। यह प्रकाश के अनुभव के बाद ही घटित होती है। यह सारी श्रृंखला खयाल में रखना— ऐश्वर्य, प्रकाश, एकता। जब तक हमें जगत में पदार्थ दिखाई पड़ रहा है, तब तक हमें अनेकता दिखाई पड़ेगी।

एक तरफ मिट्टी का ढेर लगा है, एक तरफ सोने का ढेर लगा है। लाख कोई समझाए कि सोना भी मिट्टी है, और लाख हम कहें, लेकिन फिर भी भेद दिखाई पड़ता रहेगा। और अगर चुराकर भागने की नौबत आई, तो हम मिट्टी चुराकर भागने वाले नहीं हैं। और ऐसा सामान्य आदमी की बात नहीं है, जिनको हम समझदार कहें, साधु कहें, महात्मा कहें, वे कहते रहते हैं कि मिट्टी—सोना बराबर है और एक है।


तो फिर बात एक ही है, कोई सोने को तिजोड़ी में भर रहा है, क्योंकि वह मानता है, सोना सोना है, मिट्टी मिट्टी है। कोई कह रहा है, सोने को हाथ न लगाएंगे। लेकिन दोनों को भेद है। भेद में कोई अंतर नहीं पड़ा है। कोई अंतर नहीं पड़ा है। दृष्टि बदल गई है, उलटा हो गया रुख, लेकिन भेद कायम है।

और मिट्टी सोना हो कैसे सकती है आपकी आंख में? कितनी ही नीति समझाएं, और कितना ही धर्म—शास्त्र, सोना मिट्टी हो कैसे सकती है? यह तो तभी हो सकती है, जब सोने का भी परम रूप आपको दिखाई पड़ जाए और मिट्टी का भी परम रूप आपको दिखाई पड़ जाए। सोना भी प्रकाश है परम रूप में और मिट्टी भी। जब दोनों प्रकाशित हो जाएं, सोना भी खो जाए, मिट्टी भी खो जाए, सिर्फ प्रकाश की किरणें ही रह जाएं, प्रकाश का जाल ही रह जाए; उस दिन आपको पता चलता है कि सोना, मिट्टी, दो नहीं हैं। उसके पहले पता नहीं चलता। यह कोई नैतिक सिद्धात नहीं है कि सोना, मिट्टी एक! यह एक आध्यात्मिक अनुभव है।

जगत एक है, इसका अनुभव तभी होगा, जब जगत की जो मौलिक इकाई है, उसका हमें पता चल जाए। नहीं तो एक जगत नहीं है। कैसे एक है? कैसे मानिएगा एक? सब चीजें अलग— अलग दिखाई पड़ रही हैं। पत्थर पत्थर है। सोना सोना है। मिट्टी मिट्टी है। वृक्ष वृक्ष है। आदमी आदमी है। सब अलग दिखाई पड़ रहे हैं। लेकिन अगर  सबको बनाने वाला जो घटक है भीतर— चाहे आदमी के शरीर के —कण हों, और चाहे सोने के कण हों, और चाहे मिट्टी के कण हों—वे सभी कण प्रकाश के कण हैं। अगर यह दिखाई पड़ जाए कि सभी तरफ प्रकाश ही प्रकाश है, तो भेद खो जाएगा। तब वह आदमी यह नहीं कहेगा कि मिट्टी भी सोना है, सोना भी मिट्टी है। वह पूछेगा, कहां है मिट्टी? कहां है सोना? वह पूछेगा, प्रकाश ही है, वे सारे भेद कहां? वे सब खो गए। इसलिए प्रकाश के बाद अद्वैत का अनुभव होता है, प्रकाश के पहले नहीं। जिसको परम प्रकाश का अनुभव हुआ, वही अद्वैत को अनुभव कर पाता है।

संजय ने कहा, इस महाप्रकाश के अनुभव के बाद अर्जुन ने समस्त विभक्त चीजों को, समस्त खंड—खंड, अलग—अलग बंटी हुई चीजों को उन परमात्मा में एक ही जगह एक रूप स्थित देखा।

सब एक हो गया। सारे भेद गिर गए। सारी सीमाएं, जो भिन्न करती हैं, वे तिरोहित हो गईं। और एक असीम सागर रह गया।

प्रकाश का ऐसा सागर अनुभव हो जाए, तो अद्वैत का अनुभव हुआ है। अद्वैत कोई सिद्धांत नहीं है। अद्वैत कोई फिलासफी नहीं है। अद्वैत कोई वाद नहीं है कि आप तर्क से समझ लें कि सब एक है।

बड़े मजे की बात है। लोग तर्क से समझते रहते हैं कि सब एक है। और तर्क से सिद्ध करते रहते हैं कि दो नहीं हैं, एक है। लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि जहां भी तर्क है वहां दो रहेंगे, एक नहीं हो सकता। तर्क चीजों को बांटता है, जोड़ नहीं सकता। वाद चीजों को बांटता है, एक नहीं कर सकता। विचार खंडित करता है, इकट्ठा नहीं कर सकता।

इसलिए अद्वैतवादी एक रोग है। अद्वैत का अनुभव तो एक महाअनुभव है। लेकिन अद्वैतवाद, कोई अद्वैतवादी हो जाए, वह एक तरह का रोग है। वह लड़ रहा है। वह द्वैतवादी को गलत सिद्ध कर रहा है, कि तुम गलत हो, मैं सही हूं। लेकिन अगर कोई गलत है और कोई सही है, तो कम से कम दो तो हो ही गए जगत में, कि कोई गलत है, कोई सही है।

एक का अनुभव उस द्वैतवादी में भी उसी प्रकाश को देखेगा, और उस द्वैतवादी की वाणी में भी उसी प्रकाश को देखेगा, और उस द्वैतवादी के सिद्धांत में भी वही प्रकाश को देखेगा, जो वह अद्वैतवाद में, अद्वैतवादी की वाणी में, अद्वैतवादी के शब्दों में देखता है। सभी शब्द उसी प्रकाश का रूपांतरण हैं— सभी सिद्धांत, सभी शास्त्र, सभी वाद। जिस दिन ऐसे प्रकाश का अनुभव होता है, उस दिन वाद गिर जाता है। 

उस दिन अनुभव।

संजय ने कहा, इस प्रकाश के अनुभव के बाद अर्जुन ने भगवान के शरीर में जो—जो चीजें पृथक—पृथक हो गई हैं, उनको एक जगह स्थित देखा, एक हुआ देखा। और उसके अनंतर वह आश्चर्य से युक्त हुआ, हर्षित रोमों वाला अर्जुन, विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा— भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके, हाथ जोड़े हुए बोला।

इसमें कई बातें खयाल में ले लेने की हैं।

और उसके अनंतर वह आश्चर्य से युक्त हुआ...।

आश्चर्य, हम सभी सोचते हैं, हम सबको होता है। सिर्फ धारणा है हमारी। आश्चर्य बड़ी कीमती घटना है। और तभी होता है आश्चर्य का अनुभव, जब उसके हम सामने खड़े होते हैं, जिस पर हमारी समझ कोई भी काम नहीं करती। अगर आपकी समझ काम कर सकती है, तो वह आश्चर्य नहीं है। जल्दी ही आप आश्चर्य को हल कर लेंगे। जल्दी ही आप कोई उत्तर खोज लेंगे। जल्दी ही आप कोई विचार निर्मित कर लेंगे और किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे; आश्चर्य समाप्त हो जाएगा।

आश्चर्य का अर्थ है, जिसके सामने आपकी बुद्धि गिर जाए। जिसके साथ आप बुद्धिगत रूप से कुछ भी न कर सकें। जिसके सामने आते ही आपको पता चले, मेरी बुद्धि तिरोहित हो गई। अब मेरे भीतर कोई बुद्धि नहीं है। अब मैं विचार नहीं कर सकता। अब विचार करने वाला बचा ही नहीं। जहां बुद्धि तिरोहित हो जाती है, तब जो हृदय में अनुभव होता है, उसका नाम आश्चर्य है।




और उस आश्चर्य में आपके सारे रोएं खड़े हो जाते हैं। आपने कभी—कभी रोओं को खड़ा देखा होगा, कभी किसी दुख में, कभी किसी आकस्मिक घटना में, कभी किसी बहुत अचानक आ गए भय की अवस्था में। लेकिन आश्चर्य में आपके रोएं कभी खड़े नहीं हुए। आश्चर्य में! क्योंकि आश्चर्य तो आपने कभी किया ही नहीं।

और आज की सदी में तो आश्चर्य बिलकुल मुश्किल हो गया है। सभी चीजों के उत्तर पता हो गए हैं। और सभी चीजों का विश्लेषण हमारे पास है। और ऐसी कोई भी चीज नहीं, जिसको हम न समझा सकें, इसलिए आश्चर्य का कोई सवाल नहीं है।

इसलिए आज की सदी जितनी आश्चर्य—शून्य सदी है, मनुष्य जाति के इतिहास में कभी भी नहीं रही। छोटे—छोटे बच्चे थोड़ा—बहुत आश्चर्य करते हैं, थोड़ा—बहुत। क्योंकि अब तो बच्चे भी खोजना बहुत मुश्किल है। अब तो बच्चे होते से ही हम उनको बुढा करने में लग जाते हैं। पुरानी सदियां थीं, वे कहते थे, बुढ़े फिर से बच्चे हो जाएं, तो परम अनुभव को उपलब्ध होते हैं। हमारी कोशिश यह है कि बच्चे जितने जल्दी बुजुर्ग हो जाएं, तो संसार में ठीक से यात्रा करते हैं। तो सब मिलकर— शिक्षा, समाज, संस्कार— बच्चे को बुढ़ा करने में लगते हैं कि वह जल्दी बूढ़ा हो जाए।

आपकी नाराजगी क्या है आपके बच्चे से? इसीलिए कि तू जल्दी बुढा क्यों नहीं हो रहा! आप हिसाब—किताब लगा रहे हैं अपनी बही में और वह वहीं तुरही बजा रहा है। आप उसको डांट रहे हैं कि बंद कर। वह वहीं नाच रहा है। आप उसको रोक रहे हैं कि विध्‍न—बाधा खड़ी मत कर। आप कर क्या रहे हैं? आप यह कोशिश कर रहे हैं कि तू भी मेरे जैसा बुढ़ा जल्दी हो जा। खाते—बही हाथ में ले ले, हिसाब लगा। यह तुरही बजाना और नाचना! यह क्या कर रहा है! हमारे लिए किसी को यह कह देना कि क्या बचकानी हरकत कर रहे हो, काफी निंदा का उपाय है।

बच्चा निंदित है आज। लेकिन बच्चे में थोड़ा—बहुत आश्चर्य है। वह भी हम ज्यादा देर बचने नहीं देंगे। क्योंकि जैसे—जैसे हम समझदार होते जा रहे हैं, बच्चे की उम्र स्कूल भेजने की कम होती जा रही है। पहले हम उसको सात साल में भेजते थे, फिर पांच साल में भेजते हैं, अब ढाई साल में भेजने लगे। और अब रूस में वे कहते हैं कि यह भी समय बहुत ज्यादा है, इतनी देर रुका नहीं जा सकता। ढाई साल! तब क्या करिएगा!

तो वे कहते हैं, अब बच्चे को, जब वह अपने झूले में झूल रहा है, तब भी बहुत—सी बातों में शिक्षित किया जा सकता है। और उनके विचारक तो और दूर तक गए हैं। वे कहते हैं कि मां के गर्भ में भी बच्चे में बहुत तरह की कंडीशनिंग डाली जा सकती है। और वे जो संस्कार मां के गर्भ में डाल दिए जाएंगे, वे जीवन—पर्यंत पीछा करेंगे, उनसे फिर बचा नहीं जा सकता।

तो इसका मतलब यह हुआ कि हम आज नहीं कल, बच्चे को गर्भ में भी स्कूल में डाल देंगे, सिखाना शुरू कर देंगे। हम उसको पैदा ही नहीं होने देंगे कि वह आश्चर्य करता हुआ पैदा हो। वह जानकारी लेकर ही पैदा होगा।

अभी वे कहते हैं कि आज नहीं कल, जैसे आज हृदय को ट्रांसप्लांट करने के उपाय हो गए कि एक आदमी का हृदय खराब हो गया है, तो दूसरा आदमी का हृदय डाल दिया जाए; नवीनतम जो विचार है— अब वे काम में लग गए हैं, वह इस सदी के पूरे होते—होते पूरा हो जाएगा— वे कहते हैं, जब एक बुढा आदमी मरता है, तो उसकी स्मृति को क्यों मरने दिया जाए, वह ट्रांसप्लांट कर दी जाए। एक बुजुर्ग आदमी मर रहा है, अस्सी साल का अनुभव और स्मृति, वह सब निकाल ली जाए मरते वक्त, जैसे हम हृदय को निकालते हैं। उसके पूरे मस्तिष्क के यंत्र को निकाल लिया जाए, और एक छोटे बच्चे में डाल दिया जाए।

तो उनका कहना यह है कि वह छोटा बच्चा बूढ़े की सारी स्मृतियों के साथ काम शुरू कर देगा। जो बुढे ने जाना था, वह इस बच्चे को मुफ्त उपलब्ध हो जाएगा; इसको सीखना नहीं पड़ेगा। और प्रयोग इस तरफ काफी सफल हैं। इसलिए बहुत ज्यादा देर की जरूरत नहीं है। काफी सफल हैं!

अगर हम किसी दिन स्मृति को, मेमोरी को ट्रांसप्लांट कर सके, तो फिर तो बच्चे कभी पैदा ही नहीं होंगे। इस जगत में फिर कोई बच्चा ही नहीं होगा। सिर्फ कम उम्र के बुजुर्ग, बड़े उम्र के बूढे, बस इस तरह के लोग होंगे। अभी—अभी पैदा हुए बुजुर्ग, नवजात बूढ़े, बहुत देर से टिके बूढ़े, इस तरह के लोग होंगे।

आश्चर्य के खिलाफ हम लगे हैं। हम जगत से रहस्य को नष्ट करने में लगे हैं। हमारी चेष्टा यही है कि ऐसी कोई भी चीज न रह जाए, जिसके सामने मनुष्य को हतप्रभ होना पड़े। ऐसा कोई सवाल न रहे जिसका जवाब आदमी के पास न हो। लेकिन इसका सबसे घातक परिणाम हुआ है और वह यह कि एक अनूठा अनुभव, आश्चर्य, मनुष्य के जीवन से तिरोहित हो गया है।

इसलिए धर्म है रहस्य। और धर्म है आश्चर्य की खोज।

संजय ने कहा, आश्चर्य से युक्त हुआ........।

यह अर्जुन कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, पूर्ण सुशिक्षित। उस समय का ठीक—ठीक सुसंस्कृत; उस समय जो भी संभावना हो सकती थी शिखर पर होने की, ऐसा व्यक्ति था। इसको आश्चर्य से भर देना आसान मामला नहीं है। वह तो आश्चर्य से तभी भरा होगा, जब इस विराट के उदघाटन के समक्ष उसकी क्षुद्र बुद्धि के सब तंतु टूट गए होंगे। जब उसकी कुछ भी समझ में नहीं आया होगा। और जब उसको लगा होगा कि मैं समझ के पार गया। अब मेरा अनुभव, मेरा ज्ञान, मेरी बुद्धि, कोई भी काम नहीं करती। तब उसका रोआं—रोआं खड़ा हो गया होगा।

तब वह आश्चर्य से चकित हुआ, आश्चर्य से युक्त हुआ, हर्षित रोमों वाला.......।

उसका रोआं—रोआं आनंद से नाचने लगा होगा। क्यों? क्योंकि बुद्धि दुख है। और जब तक बुद्धि का साथ है, तब तक दुख से कोई छुटकारा नहीं। बुद्धि दुख की खोज है। इसलिए बुद्धिमान आदमी वह है कि जहां दुख हो भी न, वहां भी दुख खोज ले। दुख खोजने की जितनी कुशलता आप में हो, उतने आप बुद्धिमान हैं।करते क्या हैं आप बुद्धि से? थोड़ा समझें।

कोई पशु मृत्यु से परेशान नहीं है। मृत्यु की कोई छाया पशुओं के ऊपर नहीं है। मृत्यु आती है, पशु मर जाता है। लेकिन मृत्यु के बाबत बैठकर सोचता—विचारता नहीं है। आदमी मरेगा, तब मरेगा; उसके पहले हजार दफे मरता है। जब भी सड़क पर कोई मरता है, फिर मरे। फिर किसी की अर्थी निकली, फिर अपनी अर्थी निकली। फिर किसी को मरघट की तरफ ले जाने लगे लोग राम— राम सत्य कहकर, फिर आप मरे— रोज, हर घड़ी। क्या, कारण क्या है? जीवन दिखाई नहीं पड़ता बुद्धि को, मृत्यु दिखाई पड़ती है। जीवन बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि जीवन क्या है? जी रहे हैं। अभी जिंदा हैं। सांस लेते हैं। इधर चलकर आ गए हैं। पूछ रहे हैं। और पूछते हैं, जीवन क्या है? तो अगर जीते जी आपको पता नहीं चला जीवन का, तो फिर कब पता चलेगा, मरकर? और आप जी रहे हैं, आपको पता नहीं, और मुझसे पूछने चले आए हैं! अगर जीकर पता नहीं चल रहा है, तो मेरे जवाब से पता चलेगा?

नहीं। बुद्धि जीवन को देख ही नहीं पाती, यह तकलीफ है। बुद्धि मौत को देखती है। जब आप स्वस्थ होते हैं, तब आप नाचते नहीं। लेकिन जब बीमार होते हैं, तब रोते जरूर हैं। यह बड़े मजे की बात है।

जब बीमार होते हैं, तो रोते हैं। लेकिन जब स्वस्थ होते हैं, तो कभी आपको नाचते नहीं देखा। बुद्धि सुख को देखती ही नहीं, दुख को ही देखती है। बुद्धि ऐसी ही है, जैसे आपका एक दांत गिर जाए और जीभ उसी—उसी जगह को खोजे, जहां दांत गिर गया, और जब तक था, तब तक दांत की कोई चिंता नहीं, इस जीभ ने उसकी कोई चिंता न की। तब तक मिलने के उपाय थे। अगर यही प्रेम इतना ज्यादा था इस दांत से, तो मिल लेना था। लेकिन अब जब गिर गया, तब गड्डे में जीभ उसको खोजती है! वह बुद्धि है।

बुद्धि हमेशा अभाव को खोजती है। आपकी पत्नी है। जब मरेगी, तब आपको पता चलेगा, थी। फिर आप रोयेगे के कि प्रेम कर लिए होते, तो अच्छा था। जो खो जाए, वह दिखाई पड़ता है, या जो न हो, वह दिखाई पड़ता है बुद्धि को। जो हो, जो है, वह बिलकुल नहीं दिखाई पड़ता।

अस्तित्व से बुद्धि का संबंध ही नहीं होता, अभाव से संबंध होता है। जब नहीं होती कोई चीज, तब बुद्धि को पता चलता है। और इसकी वजह से जीवन में कई वर्तुल पैदा होते हैं। एक वर्तुल तो यह पैदा होता है कि जो हमारे पास नहीं है, वह हमें दिखाई पड़ता है। जब पास आ जाता है, तब दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। तब फिर हमारे पास जो नहीं है, वह दिखाई पड़ता है।

लोग कहते हैं, यह वासना की भूल है। यह वासना की भूल नहीं है, यह बुद्धि की भूल है। लोग कहते हैं, वासना के कारण ऐसा हो रहा है। वासना के कारण ऐसा नहीं हो रहा है, बुद्धि के कारण ऐसा हो रहा है। बुद्धि देखती ही खाली जगह को है, जहां नहीं है। तो अभी जो आपके पास नहीं है, जो मकान नहीं है, उसकी वजह से दुख पा रहे हैं। जो कार नहीं है, उसकी वजह से दुख पा रहे हैं। जो पत्नी, पति, बेटा नहीं है, उसकी वजह से दुख पा रहे हैं। जिनके पास है, उनको उससे कोई सुख नहीं मिल रहा।

इसे थोड़ा समझ लें।

जो मकान आपके पास नहीं है, उससे आप दुख पा रहे हैं। जो नहीं है, उससे! और जिसके पास है, जरा उसके पास पूछें कि कितना आनंद पा रहा है उस मकान से! वह कोई आनंद नहीं पा रहा है। वह भी दुख पा रहा है। वह किसी दूसरे मकान से दुख पा रहा है, जो उसके पास नहीं है। यह उलटा दिखाई पड़ेगा। लेकिन हम उससे दुखी हैं, जो नहीं है। और हम उससे बिलकुल सुखी नहीं हैं, जो है।

बुद्धि की तलाश ही अभाव की तलाश है, अस्तित्व की तलाश नहीं है।

अर्जुन की बुद्धि गिरी होगी, तो वह आश्चर्य से भर गया। उसका रोआं—रोआं हर्ष से कंपित होने लगा। रोआं—रोआं!

ध्यान रहे, जब अनुभव घटित होता है, तो वह सिर्फ आत्मा में ही नहीं होता, वह शरीर के रोएं—रोएं तक फैल जाता है। इसलिए आत्मिक अनुभव में शरीर समाविष्ट है।

आप यह मत सोचना कि आत्मिक अनुभव कोई भूत—प्रेत जैसा अनुभव है, जिसमें शरीर का कोई समावेश नहीं होता। और आप यह भी मत सोचना कि शरीर के जो अनुभव हैं, वे सभी अनात्मिक हैं। शरीर का अनुभव भी इतना गहरा जा सकता है कि आत्मिक हो जाए। और आत्मिक अनुभव भी इतने बाहर तक आ सकता है कि शरीर का रोआं—रोआं पुलकित हो जाए। और दोनों तरफ से यात्रा हो सकती है। आप अपने शरीर के अनुभव को भी इतना गहरा कर ले सकते हैं कि शरीर की सीमा के पार आत्मा की सीमा में प्रवेश हो जाए।

योग, शरीर से शुरू करता है और भीतर की तरफ ले जाता है। भक्ति, भीतर की तरफ से शुरू करती है और बाहर की तरफ ले जाती है। बाहर और भीतर दो चीजों के नाम नहीं हैं, एक ही चीज के दो छोर हैं। इसलिए जो भी घटित होता है, वह पूरे प्राणों में स्पंदित होता है। ईश्वर का अनुभव भी रोएं—रोएं तक स्पंदित होता है।

यह संजय कह रहा है कि रोआं—रोआं हर्षित हो गया अर्जुन का। विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा— भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके, हाथ जोड़े हुए बोला।

इसमें फिर भाषा की कठिनाई है। ऐसे क्षण में हाथ जोड्ने नहीं पड़ते, जुड़ जाते हैं। यह कोई अर्जुन ने हाथ जोड़े होंगे, ऐसा नहीं जैसा आप जोड़ते हैं कि चलो, गुरुजी आ रहे हैं, हाथ जोड़ो। न जोड़ेंगे, तो बुरा मान जाएंगे। और फिर कर्तव्य भी है। और फिर संस्कार भी है। और हाथ जोड्ने से अपना बिगडेगा भी क्या! कुछ मिलता होगा, तो मिल ही जाएगा। तो जोड़ लो।

आपके हाथ जोड्ने में भी व्यवसाय है, और चेष्टा है। आप न जोड़े, तो हाथ जुडेने नहीं। आपको जोड़ना पड़ते हैं। अर्जुन को उस क्षण में जोड्ने पड़े नहीं होंगे, जुड़ गए होंगे। कुछ उपाय ही न रहा होगा। हाथ जुड़ गए होंगे। सिर झुक गया होगा।

इसलिए मैं कहता हूं कि भाषा की भूल है। संजय समझा रहा है; भाषा की तकलीफ है। उसको कहना पड़ रहा है कि अर्जुन ने हाथ जोड़े, श्रद्धा— भक्ति से भरकर सिर झुकाया।

नहीं, न तो हाथ जोड़े, न श्रद्धा— भक्ति से भरकर सिर झुकाया। श्रद्धा— भक्ति से भर गया। यह घटना है। इसमें कोई श्रम नहीं है। आप भी श्रद्धा— भक्ति से भरते हैं। भरने का मतलब होता है कि आप चेष्टा करते हैं कि श्रद्धा— भक्ति से भरो। मंदिर में जाते हैं; श्रद्धा— भक्ति से भरकर सिर झुकाते हैं। सब झूठा होता है। सब अभिनय होता है। नहीं तो कोई श्रद्धा— भक्ति से अपने को चेष्टा से कैसे भर सकता है? या तो भीतर से बहती हो, और न बहती हो, तो कैसे भरिएगा? अभिनय कर सकते हैं, एक्ट कर सकते हैं।

देखें मंदिर में खड़े आदमी को। और उसी आदमी को मंदिर के बाहर सीढ़ियों से उतरते हुए देखें। और उसी आदमी को दुकान पर बैठे हुए देखें। आप पाएंगे, ये तीन आदमी हैं। यह एक ही आदमी मालूम नहीं पड़ता। यही आदमी मंदिर में हाथ जोड़ कर सिर झुकाकर खड़ा था, कैसी श्रद्धा भक्ति से भरा हुआ! लेकिन यह श्रद्धा भक्ति को मंदिर में ही छोड़ आता है। और मंदिर में केवल वही श्रद्धा भक्ति छोड़ी जा सकती है, जो रही ही न हो। जो रही हो, तो छोड़ी नहीं जा सकती। वह साथ ही आ जाएगी। श्रद्धा भक्ति कोई जूते की तरह नहीं है, कि उतार दिया, पहन लिया! प्राण है।

अर्जुन को इस क्षण में जब इतना आश्चर्य का अनुभव हुआ और जब इतने प्रकाश से भर गया, आच्छादित हो गया, तो श्रद्धा— भक्ति करनी नहीं पड़ी, हो गई।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि गुरु वह नहीं है, जिसको आपको प्रणाम करना पडे। गुरु वह है, जिसके सान्निध्य में प्रणाम हो जाए। आपको करना पड़े, तो कोई मूल्य नहीं है, हो जाए। अचानक आप पाएं कि आप प्रणाम कर रहे हैं। अचानक आप पाएं कि आप झुक गए हैं।

 गुरु हो, और आदर न मिले, यह असंभव है। आदर न मिले, तो यह संभव है कि गुरु वहा मौजूद नहीं है। गुरु का अर्थ यह है कि जिसके पास जाकर श्रद्धा भक्ति पैदा हो। जिसके पास जाकर लगे कि झुक जाओ। जिसके पास झुकना आनंद हो जाए। जिसके पास झुककर लगे कि भर गए। जिसके पास झुककर लगे कि कुछ पा लिया। कहीं कोई हृदय के भीतर तक स्पंदित हो गई कोई लहर।

अर्जुन झुक गया। श्रद्धा भक्ति उसने अनुभव की। हाथ उसके जुड़ गए। सिर उसका झुक गया। और बोला, हे देव! आपके शरीर में संपूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को और कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को और संपूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूं। और हे संपूर्ण विश्व के स्वामिन्, आपके अनेक हाथ, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनंत रूपों वाला देखता हूं। और हे विश्वरूप, आपके न अंत को देखता हूं न मध्य को और न आदि को देखता हूं। और मैं आपका मुकुटयुक्त, गदायुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज का पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, देखने में अति गहन और अप्रमेय स्वरूप सब ओर से देखता हूं।

अर्जुन जो कह रहा है, वह बिलकुल अस्तव्यस्त हो गया है। ये जो वचन हैं उसके, जैसे होश में कहे हुए नहीं हैं। जैसे कोई बेहोश हो, जैसे कोई शराब पी ले, मदहोश हो जाए और फिर कुछ कहे। और उसकी वाणी में सब अस्तव्यस्त हो जाए। और वह जो कहना चाहे, न कह सके। और जो कहे, उससे पूरी अभिव्यक्ति न हो। उस साधारण शराब में ऐसा हो जाता है, जिससे हम परिचित हैं। और जिस शराब में अर्जुन इस क्षण में डूब गया होगा, जिस हर्षोन्माद में, जिस एक्सटैसी में, वहां होश खो गया मालूम पड़ता है। वह जो कह रहा है, वह ऐसा है, जैसे छोटा बच्चा कहता चला जाता है। और फिर अनुभव करता है कि जो मैं कह रहा हूं जो मैं देख रहा हूं उसमें संगति नहीं है, तो बदल भी देता है।

वह कहता है कि देखता हूं समस्त देवों को, समस्त भूतों को, कमल पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को..।

ये बड़ी उलटी अनुभूतियां हैं। ब्रह्मा और महादेव दो छोर हैं। ब्रह्मा का अर्थ है, जिसने किया सृजन। और महादेव का अर्थ है, जो करता है विध्वंस। अर्जुन यह कह रहा है कि साथ—साथ देखता हूं ब्रह्मा को, महादेव को! उसने जिसने जगत को बनाया, देखता हूं आपके भीतर। वह जो जगत को मिटाता है, उसको भी देखता हूं आपके भीतर। प्रारंभ सृष्टि का, अंत ओर जन्म, मृत्यु; साथ—साथ देखता हूं। सारी शक्तियां, सारी दिव्य शक्तियां दिखाई पड़ रही हैं।

हे संपूर्ण विश्व के स्वामी, कितने आपके हाथ, कितने पेट, कितने नेत्र!

अगर हम थोड़ी कल्पना करें, तो खयाल में आ जाए। अगर हम पृथ्वी के सारे मनुष्यों के हाथ जोड़ लें, सारे मनुष्यों के पेट जोड़ लें, सारे मनुष्यों की आंखें जोड़ लें, सारे मनुष्यों के सब अंग जोड़ लें, तो जो रूप बनेगा, वह भी पूरी खबर नहीं देगा। क्योंकि हमारी पृथ्वी बड़ी छोटी है। और ऐसी हजारों—हजारों पृथ्वियां हैं। और उन हजारों—हजारों पृथ्वियों पर हम जैसे हजारों—हजारों प्रकार के जीवन हैं। अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि कम से कम पचास हजार पृथ्वियों पर जीवन की संभावना है।

परमात्मा का तो अर्थ है, समस्त समष्टि का जोड़। तो हम सबको जोड़ लें। आदमियों को ही नहीं, पशु—पक्षियों को भी जोड़ लें। और सारी अनंत पृथ्वियों के सारे जीवन को जोड़ लें, तब कितने हाथ, कितने मुख, कितने पेट! वे सब अर्जुन को दिखाई पड़े होंगे। हम उसकी दुविधा समझ सकते हैं कि सब जुड़ा हुआ दिखाई पड़ा होगा। वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया होगा। उसकी कुछ समझ में नहीं आता होगा कि क्या है!

इसलिए वह फिर पूछ रहा है कि यह सब क्या है? और इतना सब देखता हूं फिर भी न तो आपका अंत दिखाई पड़ता है, न मध्य दिखाई पड़ता है, न आदि दिखाई पड़ता है। यह सब देख रहा हूं फिर भी मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं आपको पूरा देख रहा हूं क्योंकि प्रारंभ का मुझे कुछ पता नहीं चलता, अंत का भी कोई पता नहीं चलता।

इसमें थोड़ी—सी एक बड़ी कीमती बात है। अर्जुन कहता है, मध्य भी दिखाई नहीं पड़ता। इसमें हमें थोड़ा संदेह होगा। क्योंकि फिर जो दिखाई पड़ता है, वह क्या है? अर्जुन को दिखाई पड़ रहा है। इतने तक बात तर्कयुक्त है कि वह कहे, मुझे प्रारंभ नहीं दिखाई पड़ता, मुझे अंत नहीं दिखाई पड़ता।

आप एक नदी के किनारे खड़े हैं। न आपको नदी का प्रारंभ दिखाई पड़ता है, न सागर में गिरती हुई नदी का अंत दिखाई पड़ता है, लेकिन मध्य तो दिखाई पड़ता है। जहां आप खड़े हैं, वह क्या है? तो हमें लगेगा कि.. .लेकिन अर्जुन कहता है कि न मुझे प्रारंभ दिखाई पड़ता है, और न अंत दिखाई पड़ता है, और न मध्य दिखाई पड़ता है!

कारण हैं, उसके कहने का। क्योंकि जब हमें आदि न दिखाई पड़ता हो, अंत न दिखाई पड़ता हो, तो जो हमें दिखाई पड़ता है, उसे मध्य कहना गलत है। मध्य का मतलब ही यह है कि आदि और अंत के बीच में। जब हमें दोनों छोर ही नहीं दिखाई पड़ते, तो इसे हम मध्य भी कैसे कहें! दो छोर के बीच का नाम मध्य है। अगर आपको दोनों छोर दिखाई ही नहीं पड़ते, तो हम इसे भी कैसे कहें कि यह मध्य है!

इसलिए अर्जुन कहता है कि न तो मुझे मध्य दिखाई पड़ता है, न अंत दिखाई पड़ता है, न प्रारंभ दिखाई पड़ता है। सब कुछ दिखाई पड़ रहा है विराट, फिर भी मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। यह बिलकुल जैसे एक बेहोशी की घड़ी आदमी पर उतर आई हो।

उसकी बुद्धि बिलकुल चकरा गई है।

मैं आपका मुकुटयुक्त, गदायुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज का पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, देखने में अति गहन और अप्रमेय स्वरूप सब ओर देखता हूं।

बहुत गहन है जो मैं देख रहा हूं। गहन का यहां खयाल ले लेना जरूरी है। गहन का अर्थ है, जो मैं देख रहा हूं वह सतह मालूम होती है। और सतह के पीछे और सतह, सतह के पीछे और सतह, और सतह के पीछे और गहराइयां दिखाई पड़ रही हैं। यह ऐसा लगता है कि मैं आपके बाहर खड़े होकर देख रहा हूं। आपमें मुझे पहला पर्दा दिखाई पड़ रहा है। और उस पर्दे के पीछे— पर्दे ट्रांसपैरेंट मालूम पड़ते हैं। जैसे नदी के किनारे खड़े हैं, और पानी में गहराई दिखाई पड़ती है। और गहरा, और गहरा, और गहरा। और यह गहराई कहां पूरी होती है, इसका मुझे कुछ पता नहीं है। ऐसा आपको गहन देखता हूं।

अप्रमेय! और जो देखता हूं वह ऐसा है, जिसके लिए न तो कोई प्रमाण है कि मैं क्या देख रहा हूं। न मेरी बुद्धि के पास कोई तर्क है, जिससे मैं अनुमान कर सकूं कि क्या देख रहा हूं। न मेरे पास कोई निष्पत्ति है, न कोई सिद्धांत है, कि मैं क्या देख रहा हूं!

अप्रमेय का अर्थ है कि अगर अर्जुन दूसरे को कहेगा जाकर, तो वह दूसरा समझेगा, यह पागल है। जो इसने देखा, इसका दिमाग खराब हो गया।

इसलिए जिन्होंने देखा है उसे, वे कई बार तो, आप उन्हें पागल न कहें, इसलिए आपसे कहने से रुक जाते हैं। क्योंकि अगर वे कहेंगे, तो आप भरोसा तो करने वाले नहीं हैं। आपको शक होने लगेगा कि इस आदमी का इलाज करवाना चाहिए! यह क्या कह रहा है? यह जो कह रहा है, किसी भ्रम में खो गया है, किसी डिलूजन में। या तो विक्षिप्त हो गया है।

आज पश्चिम के मनस्विद कहते हैं कि जिन लोगों को हम पागल करार दे रहे हैं, उनमें सभी पागल हों, यह जरूरी नहीं है। उनमें कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन्होंने जगत को किसी और पहलू से देख लिया और मुसीबत में पड़ गए हैं।

लेकिन जब एक दफा किसी और पहलू से कोई जगत को देख ले, तो हमारे बीच फिर गैर—फिट हो जाता है, फिर हमारे बीच बैठ नहीं पाता। फिर वह जो कहता है, वह हमें मालूम पड़ता है कि किसी स्वप्न की बात कर रहा है। या वह जो बताता है, हमारी भाषा में, हमारे अनुभव में उसका कोई मेल न होने से वह व्यर्थ मालूम पड़ता है।

इस मुल्क में हमने ऐसी व्यवस्था की थी कि जब भी इस तरह की घोषणाएं, इस तरह के अनुभव कोई कहे, तो उन लोगों को कहे, जो समझ सकते हों। उनको कहे, जो शब्द में न अटक जाएंगे। उनको कहे, जिनकी खुद की भी कोई प्रतीति हो।

यह जो अर्जुन को दिखाई पड़ा विराट, अप्रमेय, जिसकी बुद्धि कभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकती थी, अनुमान भी नहीं कर सकती थी, सोच भी नहीं सकती थी, जिसकी तरफ कोई उपाय न था, वह उसे दिखाई पड़ा है।

यह अप्रमेय स्वरूप सब ओर देखता हूं। और ऐसा नहीं है कि आप ही अप्रमेय हो गए, कृष्‍ण! अर्जुन कह रहा है, सब तरफ जो कुछ भी है इस समय, सभी बुद्धि—अतीत हो गया है। कुछ भी समझ में नहीं आता। मेरी समझ बिलकुल खो गई है। मैं बिलकुल शून्य हो गया हूं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 2

 दिव्‍य चक्षु की पूर्व भूमिका


            न तु मां शक्यसे द्रष्‍टुमनेनैव स्वच्रुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम।। 8।।


संजय उवाच:


श्वमुक्ला ततो राजन्यहायोगेश्वरो हरि:।

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।। 9।।

अनेकवक्तनयनमनेकादूभुतदर्शनम्।

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतामुधम्।। 10।।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धागुलेयनम्।

सर्वाश्चर्यमय देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।। 11।।


परंतु मेरे को इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने को तू निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तेरे लिए दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूं, उससे तू मेरे प्रभाव को और योगशक्ति को देख।

संजय बोले हे राजन— महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके उपरांत अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूय दिखाया।

और उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अदभुत दर्शनों वाले एवं बहुत— से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत— से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाए हुए तथा दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का अनुलेपन किए हुए एवं सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त सीमारहित विराटस्वरूय परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।



 मनुष्य ने सदा ही जीवन के परम रहस्य को जानना चाहा है। क्या है प्रयोजन जीवन का? क्या है लक्ष्य? क्यों उत्पन्न होती है सृष्टि और क्यों विलीन? कौन छिपा है इस सबके पीछे? किसके हाथ हैं? उस मूल को, उस स्रोत को, उस परम को मनुष्य ने सदा ही जानना चाहा है।

लेकिन मनुष्य जैसा है, वैसा ही उस परम को जान नहीं सकता। इससे ही दुनिया में नास्तिक दर्शनों का जन्म हो सका। जैसे अंधा आदमी प्रकाश को जानना चाहे, न जान सके, तो अंधा आदमी भी कह सकता है कि प्रकाश एक भ्रांति है। और जिन्हें प्रकाश दिखाई देता है, वे किसी विभ्रम में पड़े हैं, किसी इलूजन में पड़े हैं। जो प्रकाश की बात करते हैं, वे अंधविश्वास में हैं। और अंधे आदमी की इन बातों में तर्कयुक्त रूप से कुछ भी गलत न होगा।

अंधे को प्रकाश दिखाई नहीं पड़ता। और प्रकाश को देखने के अतिरिक्त और कोई जानने का उपाय नहीं है। प्रकाश सुना नहीं जा सकता, अन्यथा अंधा भी प्रकाश को सुन लेता। प्रकाश छुआ नहीं जा सकता, अन्यथा अंधा भी उसे स्पर्श कर लेता। प्रकाश का कोई स्वाद नहीं, कोई गंध नहीं।

तो जिसके पास आंख नहीं हैं, उसका प्रकाश से संबंधित होने का कोई उपाय नहीं है। तो अंधा आदमी भी कह सकता है कि जो मानते हैं, वे भ्रांति में होंगे; और अगर प्रकाश है, तो मुझे दिखा दो। और उसकी बात में कुछ अर्थ है। अगर प्रकाश है, तो मेरे अनुभव में आए, तो ही मैं मानूंगा।

मनुष्य भी परमात्मा को खोजना चाहता है। बिना यह पूछे कि मेरे पास वह आंख, वह उपकरण है, जो परमात्मा को देख ले? इसलिए जो कहते हैं कि परमात्मा है, हमें लगता है कि किसी भ्रम में हैं, किसी मानसिक स्वप्न में, किसी सम्मोहन में खो गए हैं। और या फिर अंधविश्वास कर लिया है किसी भय के कारण, प्रलोभन के कारण। या केवल परंपरागत संस्कार है बचपन से डाला गया मन में, इसलिए कोई कहता है कि परमात्मा है।

परमात्मा है या नहीं, यह बड़ा सवाल नहीं है। यह सवाल भी उठाया नहीं जा सकता, जब तक कि हमारे पास वह आंख न हो, जो परमात्मा को देखने में सक्षम है। प्रकाश है या नहीं, यह सवाल ही व्यर्थ है, जब तक देखने वाली आंख न हो।

अंधे को प्रकाश तो बहुत दूर, अंधेरा भी दिखाई नहीं पड़ता है। आमतौर से हम सोचते होंगे कि अंधे को कम से कम अंधेरा तो दिखाई पड़ता ही होगा। हमारी धारणा भी हो सकती हो कि अंधा अंधेरे से घिरा होगा।

गलत है खयाल। अंधेरे को देखने के लिए भी आंख चाहिए। अंधेरे का अनुभव भी आंख का ही अनुभव है। अंधे को अंधेरे का भी कोई अनुभव नहीं होता। आप आंख बंद करते हैं, तो आपको अंधेरे का अनुभव होता है, क्योंकि आप अंधे नहीं हैं। आपको प्रकाश का अनुभव होता है, इसलिए उसके विपरीत अंधेरे का अनुभव होता है। जिसे प्रकाश का अनुभव नहीं होता, उसे अंधेरे का भी कोई अनुभव नहीं हो सकता।

अंधेरा और प्रकाश दोनों ही आंख के अनुभव हैं। प्रकाश मौजूदगी का अनुभव है, अंधेरा गैर-मौजूदगी का अनुभव है। लेकिन जिसे प्रकाश ही नहीं दिखाई पड़ा, उसे प्रकाश की अनुपस्थिति कैसे दिखाई पड़ेगी! वह असंभव है। अंधे को अंधेरा भी नहीं है।

और जिसे अंधेरा भी दिखाई न पड़ता हो, वह प्रकाश के संबंध में क्या प्रश्न उठाए! और प्रश्न उठाए भी तो उसे क्या उत्तर दिया जा सकता है! और जो भी उत्तर हम देंगे, वे अंधे के मन को जंचेंगे नहीं। क्योंकि मन हमारी इंद्रियों के अनुभव का जोड़ है। अंधे के पास आंख का अनुभव कुछ भी नहीं है मन में। तो जंचने का, मेल खाने का, तालमेल बैठने का कोई उपाय नहीं है। अंधे का पूरा मन कहेगा कि प्रकाश नहीं है। अंधा जिद्द करेगा कि प्रकाश नहीं है। सिद्ध भी करना चाहेगा कि प्रकाश नहीं है।

क्यों? क्योंकि स्वयं को अंधा मानने की बजाय, यह मान लेना ज्यादा आसान है कि प्रकाश नहीं है। अंधे के अहंकार की इसमें तृप्ति है कि प्रकाश नहीं है। अंधे के अहंकार को चोट लगती है यह मानने से कि मैं अंधा हूं इसलिए मुझे प्रकाश दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए मनुष्य में जो अति अहंकारी हैं, वे कहेंगे, परमात्मा नहीं है, बजाय यह मानने के कि मेरे पास वह देखने की आंख नहीं है, जिससे परमात्मा हो तो दिखाई पड़ सके। और ध्यान रहे, जिसको परमात्मा नहीं दिखाई पड़ता, उसको परमात्मा का न होना भी दिखाई नहीं पड़ सकता है। क्योंकि न होने का अनुभव भी उसी का अनुभव होगा, जिसके पास देखने की क्षमता है।

नास्तिक कहता है, ईश्वर नहीं है। उसके वक्तव्य का वही अर्थ है, जो अंधा कहता है कि प्रकाश नहीं है। नास्तिक की तकलीफ ईश्वर के होने न होने में नहीं है। नास्तिक की तकलीफ अपने को अधूरा मानने में, अपंग मानने में, अंधा मानने में है। इसलिए जितना अहंकारी युग होता है, उतना नास्तिक हो जाता है।

अगर आज सारी दुनिया में नास्तिकता प्रभावी है, तो उसका कारण यह नहीं है कि विज्ञान ने लोगों को नास्तिक बना दिया है।  उसका कुल मात्र कारण इतना है कि मनुष्य ने इधर पिछले तीन सौ वर्षों में जो उपलब्धियां की हैं, उन उपलब्धियों ने उसके अहंकार को भारी बल दे दिया है।

इन तीन सौ वर्षों में आदमी ने उतनी उपलब्धियां की हैं, जितनी पिछले तीन लाख वर्षों में आदमी ने नहीं की थीं। आदमी की ये उपलब्धियां उसके अहंकार को बल देती हैं। वह बीमारी से लड़ सकता है। वह उम्र को भी शायद थोड़ा लंबा सकता है। उसने बिजली को बांधकर घर में रोशनी कर ली है। उसके पूर्वज बिजली को आकाश में देखकर कंपते थे और सोचते थे कि इंद्र नाराज है। उसने बिजली को बांध लिया है। अगर पुरानी भाषा में कहें, तो इंद्र को उसने बांध लिया है। घर में इंद्र रोशनी कर रहा है, और पंखे चला रहा है!

आदमी ने इधर तीन सौ वर्षों में जो भी पाया है, उस पाने से उसे बाहर कुछ चीजें मिली हैं और भीतर अहंकार मिला है। उसे लगता है, मैं कुछ कर सकता हूं। और जितना अहंकार मजबूत होता है, उतनी ही नास्तिकता सघन हो जाती है। क्योंकि उतना ही यह मानना मुश्किल हो जाता है कि मुझमें कोई कमी है, कोई उपकरण, कोई इंद्रिय मुझमें खो रही है, अभाव है; मेरे पास कोई उपाय कम है, जिससे मैं और देख सकूं।

फिर एक और बात पैदा हो गई। हमने अपनी भौतिक इंद्रियों को विस्तीर्ण करने की बड़ी कुशलता पा ली है। आदमी आंख से कितनी दूर तक देख सकता है? लेकिन अब हमारे पास दूरदर्शक यंत्र हैं, जो अरबों—खरबों प्रकाश वर्ष दूर तारों को देख सकते हैं। आदमी अपने अकेले कान से कितना सुन सकता है? लेकिन अब हमारे पास टेलिफोन है, रेडियो है, बेतार के यंत्र हैं, कोई सीमा नहीं है। हम कितने ही दूर की बात सुन सकते हैं, और कितने ही दूर तक बात कर सकते हैं।

एक आदमी अपने हाथ से कितनी दूर तक पत्थर फेंक सकता है? लेकिन अब हमारे पास सुविधाएं हैं कि हम पूरे के पूरे यानों को पृथ्वी के घेरे के बाहर फेंककर चांद की यात्रा पर पहुंचा सकते हैं। एक आदमी कितना मार सकता है? कितनी हत्या कर सकता है? अब हमारे पास हाइड्रोजन बम हैं, कि चाहें तो दस मिनट में हम पूरी पृथ्वी को राख बना दे सकते हैं। सिर्फ दस मिनट में; खबर पहुंचेगी, इसके पहले मौत पहुंच जाएगी!

तो स्वभावत:, आदमी ने अपनी बाहर की इंद्रियों को बढ़ा लिया। यह सब इंद्रियों का विस्तार है। इंद्रियों को हमने यंत्रों से जोड़ दिया। इंद्रियां भी यंत्र हैं। हमने और नये यंत्र बनाकर उन इंद्रियों की शक्ति को बढ़ा लिया। इसलिए आदमी इंद्रियों को बढ़ाने में लग गया और उसे यह खयाल भी नहीं कि कुछ इंद्रियां ऐसी भी हैं, जो बंद ही पड़ी हैं।

अगर हम पीछे लौटें, तो आदमी की बाहर की इंद्रिय की शक्ति बहुत सीमित थी। और आदमी का बल बहुत सीमित था। आदमी की उपलब्धियां बहुत सीमित थीं। आदमी के अहंकार को सघन होने का उपाय कम था। सहज ही जीवन विनम्रता पैदा करता था।

सहज ही चारों तरफ इतनी विराट शक्तियां थीं कि हम निहत्थे, असहाय, हेल्पलेस मालूम होते थे। बाहर तो हमारे बल को बढ़ने का कोई उपाय नहीं दिखाई पड़ता था। इसलिए आदमी भीतर मुड़ने की चेष्टा करता था।

आज बाहर के यात्रा—पथ इतने सुगम हैं कि भीतर लौटने का खयाल भी नहीं आता है। आज बाहर जाने की इतनी सुविधा है कि भीतर जाने का सवाल भी नहीं उठता है। आज जब हम किसी से कहें, भीतर जाओ, तो उसकी समझ में नहीं आता। उससे कहें, चांद पर जाओ, मंगल पर जाओ, बिलकुल समझ में आता है।

चांद पर जाना आज आसान है, अपने भीतर जाना कठिन है। और आदमी निश्चित ही, जो सुगम है, सरल है, उसको चुन लेता है। जहां लीस्ट रेजिस्टेंस है, उसे चुन लेता है।

आदमी के अहंकार के अनुपात में उसकी नास्तिकता होती है। जितना अहंकार होता है, उतनी नास्तिकता होती है। क्यों? क्योंकि आस्तिकता पहली स्वीकृति से शुरू होती है कि मैं अधूरा हूं। ईश्वर है या नहीं, मुझे पता नहीं। लेकिन परम सत्य को जानने का मेरे पास कोई भी उपाय नहीं है।

बुद्धि आदमी के पास है। लेकिन बुद्धि से आदमी क्या जान पाता है? जो नापा जा सकता है, वह बुद्धि से जाना जा सकता है। क्योंकि बुद्धि नापने की एक व्यवस्था है। जो मेजरमेंट के भीतर आ सकता है, वह बुद्धि से जाना जा सकता है।

समझें। एक तराजू है। उससे हम उसी चीज को जांच सकते हैं, जो नापी जा सकती है। एक तराजू को लेकर हम एक आदमी के शरीर को नाप सकते हैं। लेकिन अगर तराजू से हम आदमी के मन को जानने चलें, तो मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि मन तराजू पर नहीं नापा जा सकता। एक आदमी के शरीर में कितनी हड्डियां, मांस—मज्जा है, यह हम नाप सकते हैं तराजू से। लेकिन एक आदमी के भीतर कितना प्रेम है, कितनी घृणा है, इसको हम तराजू से नहीं नाप सकते। इसका यह मतलब नहीं कि प्रेम है नहीं। इसका केवल इतना ही मतलब है कि जो मापने का उपकरण है, वह संगत नहीं है।

जो भी नापा जा सकता है, उसे बुद्धि समझ सकती है। जो भी गणित के भीतर आ सकता है, बुद्धि समझ सकती है। जो भी तर्क के भीतर आ जाता है, बुद्धि समझ सकती है।

विज्ञान बुद्धि का विस्तार है। इसलिए विज्ञान उसी को मानता है, जो नप सके, जांचा जा सके, परखा जा सके, छुआ जा सके, प्रयोग किया जा सके, उसको ही। जो न छुआ जा सके, न परखा जा सके, न पकड़ा जा सके, न तौला जा सके, विज्ञान कहता है, वह है ही नहीं।

वहां विज्ञान भूल करता है। विज्ञान को इतना ही कहना चाहिए कि उस दिशा में हमारे पास जाने का कोई उपाय नहीं है। हो भी सकता है, न भी हो, लेकिन बिना उपाय के कुछ भी कहा नहीं जा सकता है।

परमात्मा का अर्थ है, असीम। परमात्मा का अर्थ है, सब। परमात्मा का अर्थ है, जो भी है, उसका जोड़।

इस विराट को बुद्धि नहीं नाप पाती। क्योंकि बुद्धि भी इस विराट का एक अंग है। बुद्धि भी इस विराट का एक अंश है। अंश कभी भी पूर्ण को नहीं जांच सकता। अंश कभी भी अपने पूर्ण को नहीं पकड़ सकता। कैसे पकड़ेगा?

अगर मैं अपने हाथ से अपने पूरे शरीर को पकड़ना चाहूं तो कैसे पकडूंगा? कोई उपाय नहीं है। मेरा हाथ कई चीजें उठा सकता है। लेकिन मेरा हाथ मेरे पूरे शरीर को नहीं उठा सकता। अंश है, छोटा है, शरीर बड़ा है। बुद्धि एक अंश है इस विराट में। एक बूंद सागर में है, इस पूरे सागर को नहीं उठा पाती है।

तो बुद्धि उपाय नहीं है जानने का। और हम बुद्धि से ही जानने की कोशिश करते हैं। दार्शनिक सोचते हैं, मनन करते हैं, तर्क करते हैं। बुद्धि से सोचते हैं कि ईश्वर है या नहीं। वे जो भी दलीलें देते हैं, वे दलीलें बचकानी हैं। बड़े से बड़े दार्शनिक ने भी ईश्वर के होने के लिए जो प्रमाण दिए हैं, वह बच्चा भी तोड़ सकता है। जितने भी प्रमाण ईश्वर के होने के लिए दिए गए हैं, वे कोई भी प्रमाण नहीं हैं। क्योंकि उन सभी को खंडित किया जा सकता है। इसलिए प्रमाण से जो ईश्वर को मानता है, उसे कोई भी नास्तिक दो क्षण में मिट्टी में मिला देगा।

ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है, जो ईश्वर के होने को सिद्ध कर सके। क्योंकि अगर हमारा प्रमाण ईश्वर को सिद्ध कर सके, तो हम ईश्वर से भी बड़े हो जाते हैं। और हमारी बुद्धि अगर ईश्वर के लिए प्रमाण जुटा सके और अगर ईश्वर को हमारे प्रमाणों की जरूरत हो, तभी वह हो सके, और हमारे प्रमाण न हों तो वह न हो सके, तो हम ईश्वर से भी विराट और बड़े हो जाते हैं।

आदमी जो भी प्रमाण जुटा सकता है, वे प्रमाण सब बचकाने हैं। क्योंकि बुद्धि बचकानी है। उस विराट को नापने के लिए बुद्धि उपाय नहीं है। क्या कोई उपाय और हो सकता है बुद्धि के अतिरिक्त? बुद्धि के अतिरिक्त हमारे पास कुछ भी नहीं है। सोच सकते हैं।

थोड़ा इसे हम समझ लें कि सोचने का क्या अर्थ होता है, तो इस सूत्र में प्रवेश आसान हो जाएगा।

हम सोच सकते हैं। आप क्या सोच सकते हैं? जो आप जानते हैं, उसी को सोच सकते हैं। सोचना जुगाली है। गाय— भैंस को आपने देखा! घास चर लेती है, फिर बैठकर जुगाली करती रहती है। वह जो चर लिया है, उसको वापस चरती रहती है।

विचार जुगाली है। जो आपके भीतर डाल दिया गया, उसको आप फिर जुगाली करते रहते हैं। आप एक भी नई बात नहीं सोच सकते हैं। कोई विचार मौलिक नहीं होता। सब विचार बाहर से डाले गए होते हैं, फिर हम सोचने लगते हैं उन पर। सब विचार उधार होते हैं। तो जो हमने जाना नहीं है अब तक, उसको हम सोच भी नहीं सकते। हम सोच उसी को सकते हैं, जिसे हमने जाना है, जिसे हमने सुना है, जिसे हमने समझा है, जिसे हमने पढ़ा है, उसे हम सोच सकते हैं।

ईश्वर को न तो पढ़ा जा सकता, न ईश्वर को सुना जा सकता। ईश्वर को सोचेंगे कैसे? ईश्वर है अज्ञात, अननोन। मौजूद है यहीं, लेकिन इसी तरह अज्ञात है, जैसे अंधे के लिए प्रकाश अज्ञात है। और अंधे के चारों तरफ मौजूद है, अंधे की चमड़ी को छू रहा है।

अंधे को जो गरमी मिल रही है, वह उसी प्रकाश से मिल रही है। और अंधे को जो उसका मित्र हाथ पकड़कर रास्ते पर चला रहा है, वह भी उसी प्रकाश के कारण चला रहा है। और अंधे के भीतर जो हृदय में धड़कन हो रही है, वह भी उसी प्रकाश की किरणों के कारण हो रही है। और उसके खून में जो गति है, वह भी प्रकाश के कारण है।

अंधे का पूरा जीवन प्रकाश में लिप्त है, प्रकाश में डूबा है। अगर प्रकाश न हो, तो अंधा नहीं हो सकता। लेकिन फिर भी अंधे को प्रकाश का कोई भी पता नहीं चलता है। क्योंकि जो आंख चाहिए देखने की, वह नहीं है। अंधा जीता प्रकाश में है, होता प्रकाश में है, लेकिन अनुभव में नहीं आता।

हम भी परमात्मा में हैं। उसके बिना न खून चलेगा, न हृदय धड़केगा, न श्वासें हिलेंगी, न वाणी बोलेगी, न मन विचारेगा। उसके बिना कुछ भी नहीं होगा। वह अस्तित्व है। लेकिन उसे देखने की हमारे पास अभी कोई भी इंद्रिय नहीं है।

हाथ हैं, उनसे हम छू सकते हैं। जिसे हम छू सकते हैं, वह स्थूल है। सूक्ष्म को हम छू नहीं सकते। यहां भी सूक्ष्म—परमात्मा को अलग कर दें— पदार्थ में भी जो सूक्ष्म है, उसे भी हम हाथ से नहीं छू सकते। हमारे पास कान हैं, हम सुन सकते हैं। लेकिन कितना सुन सकते हैं? एक सीमा है। आपका कुत्ता आपसे हजार गुना ज्यादा सुनता है। उसके पास आपसे ज्यादा बड़ा कान है। अगर कान से परमात्मा का पता लगता होता, तो आपसे पहले आपके कुत्ते को पता लग जाएगा। घोड़ा आपसे दस गुना ज्यादा सूंघ सकता है। कुत्ता दस हजार गुना सूंघ सकता है। अगर सूंघने से परमात्मा का पता होता, तो कुत्तों ने अब तक उपलब्धि पा ली होती।

हमसे ज्यादा मजबूत आंखों वाले जानवर हैं। हमसे ज्यादा मजबूत हाथों वाले जानवर हैं। हमसे ज्यादा मजबूत स्वाद का अनुभव करने वाले जानवर हैं। मधुमक्खी पांच मील दूर से फूल की गंध को पकड़ लेती है। अगर आपके घर में चोर घुसा हो, तो उसके जाने के घंटेभर बाद भी कुत्ता उसकी सुगंध को पकड़ लेता है। उसके जाने के घंटेभर बाद भी! और फिर पीछा कर सकता है। और दस—बीस मील कहीं भी चोर चला गया हो, अनुगमन कर सकता है।

हमारे पास जो इंद्रियां हैं, उनसे स्थूल भी पूरा पकड़ में नहीं आता। सूक्ष्म की तो बात ही अलग है। हम जो सुनते हैं, वह एक छोटी—सी सीमा के भीतर सुनते हैं। उससे नीची आवाज भी हमें सुनाई नहीं पड़ती। उससे ऊपर की आवाज भी हमें सुनाई नहीं पड़ती। हमारी सब इंद्रियों की सीमा है, इसलिए असीम को कोई इंद्रिय पकड़ नहीं सकती। हमारी कोई भी इंद्रिय असीम नहीं है। हमारा जीवन ही सीमित है।

थोड़ा कभी आपने खयाल किया कि आपका जीवन कितना सीमित है! घर में थर्मामीटर होगा, उसमें आप ठीक से देख लेना, उसमें सीमा पता चल जाएगी! इधर बानवे नशे डिग्री के नीचे गिरे, कि बिखरे। उधर एक सौ आठ—दस डिग्री के पार जाने लगे, कि गए। बीस डिग्री थर्मामीटर में आपका जीवन है। उसके नीचे मौत, उसके उस तरफ मौत।

बारह डिग्री में जहां जीवन हो, वहां परम जीवन को जानना बड़ा मुश्किल होगा। इस सीमित जीवन से उस असीम को हम कैसे जान पाएं! जरा—सा तापमान गिर जाए पृथ्वी पर सूरज का, हम सब समाप्त हो जाएंगे। जरा—सा तापमान बढ़ जाए, हम सब वाष्पीभूत हो जाएंगे। हमारा होना कितनी छोटी—सी सीमा में, क्षुद्र सीमा में है! इस छोटे—से क्षुद्र होने से हम जीवन के विराट अस्तित्व को जानने चलते हैं, और कभी नहीं सोचते कि हमारे पास उपकरण क्या है जिससे हम नापेंगे!

तो जो कह देता है बिना समझे—बूझे कि ईश्वर है, वह भी नासमझ; जो कह देता है बिना समझे—बूझे कि ईश्वर नहीं है, वह भी नासमझ। समझदार तो वह है, जो सोचे पहले कि ईश्वर का अर्थ क्या होता है? विराट! अनंत! असीम! मेरी क्या स्थिति है? इस मेरी स्थिति में और उस विराट में क्या कोई संबंध बन सकता है? अगर नहीं बन सकता, तो विराट की फिक्र छोडूं। मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन करूं, जिससे संबंध बन सके।

धर्म और दर्शन में यही फर्क है। दर्शन सोचता है ईश्वर के संबंध में। धर्म खोजता है स्वयं को, कि मेरे भीतर क्या कोई उपाय है? क्या मेरे भीतर ऐसा कोई झरोखा है? क्या मेरे भीतर ऐसी कोई स्थिति है, जहां से मैं छलांग लगा सकूं अनंत में? जहां मेरी सीमाएं मुझे रोकें नहीं। जहां मेरे बंधन मुझे बांधें नहीं। जहां मेरा भौतिक अस्तित्व रुकावट न हो। जहां से मैं छलांग ले सकूं, और विराट में कूद जाऊं और जान सकूं कि वह क्या है।

अब हम इस सूत्र को समझने की कोशिश करें।

परंतु मेरे को इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने को तू निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तेरे लिए दिव्य—चक्षु देता हूं उससे तू मेरे प्रभाव को और योग—शक्ति को देख। कृष्‍ण ने अर्जुन को कहा कि जो आंखें तेरे पास हैं, प्राकृत नेत्र, इनसे तू मुझे देखने में समर्थ नहीं है।

निश्चित ही, अर्जुन कृष्‍ण को देख रहा था, नहीं तो बात किससे होती! यह चर्चा हो रही थी। कृष्‍ण को सुन रहा था, नहीं तो यह चर्चा किससे होती!

यहां ध्यान रखें कि एक तो वे कृष्ण हैं, जो अर्जुन को अभी दिखाई पड़ रहे हैं, इन प्राकृत आंखों से। और एक और कृष्ण का होना है, जिसके लिए कृष्ण कहते हैं, तू मुझे न देख सकेगा इन आंखों से।

तो जिन्होंने कृष्‍ण को प्राकृत आंखों से देखा है, वे इस भ्रांति में न पड़े कि उन्होंने कृष्‍ण को देख लिया। अभी तक अर्जुन ने भी नहीं देखा है। उनके साथ रहा है। दोस्ती है। मित्रता है। पुराने संबंध हैं। नाता है। अभी उसने कृष्य को नहीं देखा है। अभी उसने जिसे देखा है, वह इन आंखों, प्राकृत आंखों और अनुभव के भीतर जो देखा जा सकता है, वही। अभी उसने कृष्ण की छाया देखी है। अभी उसने कृष्ण को नहीं देखा। अभी उसने जो देखा है, वह मूल नहीं देखा, ओरिजिनल नहीं देखा, अभी प्रतिलिपि देखी है। जैसे कि दर्पण में आपकी छवि बने, और कोई उस छवि को देखे। जैसे कोई आपका चित्र देखे। या पानी में आपका प्रतिबिंब बने और कोई उस प्रतिबिंब को देखे।

पानी में प्रतिबिंब बनता है, ऐसे ही ठीक प्रकृति में भी आत्मा की प्रतिछवि बनती है। अभी अर्जुन जिसे देख रहा है, वह कृष्‍ण की प्रतिछवि है, सिर्फ छाया है। अभी उसने उसे नहीं देखा, जो कृष्‍ण हैं। और आपने भी अभी अपने को जितना देखा है, वह भी आपकी छाया है। अभी आपने उसे भी नहीं देखा, जो आप हैं।

और अगर अर्जुन कृष्ण के मूल को देखने में समर्थ हो जाए, तो अपने मूल को भी देखने में समर्थ हो जाएगा। क्योंकि मूल को देखने की आंख एक ही है, चाहे कृष्‍ण के मूल को देखना हो और चाहे अपने मूल को देखना हो। और छाया को देखने वाली आंख भी एक ही है, चाहे कृष्‍ण की छाया देखनी हो और चाहे अपनी छाया देखनी हो।

तो यहां कुछ बातें ध्यान में ले लें।

पहली, कि कृष्‍ण जो दिखाई पड़ते हैं, अर्जुन को दिखाई पड़ते थे, आपको मूर्ति में दिखाई पड़ते हैं..।

अब थोड़ा समझें कि आपकी मूर्ति तो प्रतिछवि की भी प्रतिछवि है, छाया की भी छाया है। वह तो बहुत दूर है। कृष्‍ण की जो आकृति हमने मंदिर में बना रखी है, वह तो बहुत दूर है कृष्‍ण से। क्योंकि खुद कृष्ण भी जब मौजूद थे शरीर में, तब भी वे कह रहे हैं कि मैं यह नहीं हूं, जो तुझे अभी दिखाई पड़ रहा हूं। और इन आंखों से ही अगर देखना हो तो यही दिखाई पड़ेगा, जो मैं दिखाई पड़ रहा हूं।

नई आंख चाहिए। प्राकृत नहीं, दिव्य—चक्षु चाहिए। इन आंखों को प्राकृत कहा है, क्योंकि इनसे प्रकृति दिखाई पड़ती है। इनसे दिव्यता दिखाई नहीं पड़ती। इनसे जो भी दिखाई पड़ता है, वह मैटर है, पदार्थ है। और जो भी दिव्य है, इनसे चूक जाता है। दिव्य को देखने का इनके पास कोई उपाय नहीं है।

तो कृष्‍ण कहते हैं कि मैं तुझे अब वह आंख देता हूं जिससे तुझे मैं दिखाई पड़ सकूं, जैसा मैं हूं— अपने मूल रूप में, अपनी मौलिकता में। प्रकृति में मेरी छाया नहीं, तू मुझे देख। लेकिन तब मैं तुझे एक नई आंख देता हूं।

यहां बहुत—से सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या कोई और आदमी किसी को दिव्य आंख दे सकता है? कि कृष्‍ण कहते हैं, मैं तुझे दिव्य—चक्षु देता हूं। क्या यह संभव है कि कोई आपको दिव्य— चक्षु दे सके? और अगर कोई आपको दिव्य—चक्षु दे सकता है, तब तो फिर अत्यंत कठिनाई हो जाएगी। कहां खोजिएगा कृष्‍ण को जो आपको दिव्य—चक्षु दे?

और अगर कोई आपको दिव्य—चक्षु दे सकता है, तो फिर कोई आपके दिव्य—चक्षु ले भी सकता है। और अगर कोई दूसरा आपको दिव्य—चक्षु दे सकता है, तो फिर आपके करने के लिए क्या बचता है? कोई देगा। प्रभु की अनुकंपा होगी कभी, तो हो जाएगा। फिर आपके लिए प्रतीक्षा के सिवाय कुछ भी नहीं है। फिर आपके लिए संसार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

इस पर बहुत—सी बातें सोच लेनी जरूरी हैं।

पहली बात तो यह है कि कृष्ण ने जब यह कहा कि मैं तुझे दिव्य— चक्षु देता हूं तो इसके पहले अर्जुन अपने को पूरा समर्पित कर चुका है, रत्ती—मात्र भी अपने को पीछे नहीं बचाया है। अगर कृष्ण अब मौत भी दें, तो अर्जुन उसके लिए भी राजी है। अब अर्जुन का अपना कोई आग्रह नहीं है।

आदमी जो सबसे बड़ी साधना कर सकता है, वह समर्पण है, वह सरेंडर है। और जैसे ही कोई व्यक्ति समर्पित कर देता है पूरा, तब कृष्‍ण को चक्षु देने नहीं पड़ते, यह सिर्फ भाषा की बात है कि मैं तुझे चक्षु देता हूं। जो समर्पित कर देता है, उस समर्पण की घड़ी में ही चक्षु का जन्म हो जाता है।

लेकिन शायद कृष्‍ण की मौजूदगी वहां न हो, तो अड़चनें हो सकती हैं, क्योंकि कृष्‍ण कैटेलिटिक एजेंट का काम कर रहे हैं। जो लोग विज्ञान की भाषा से परिचित हैं, वे कैटेलिटिक एजेंट का अर्थ समझते हैं। कैटेलिटिक एजेंट का अर्थ होता है, जो खुद करे न कुछ, लेकिन जिसकी मौजूदगी में कुछ हो जाए।

वैज्ञानिक कहते हैं कि हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी बनता है। अगर आप हाइड्रोजन और आक्सीजन को मिला दें, तो पानी नहीं बनेगा। लेकिन अगर आप पानी को तोड़े, तो हाइड्रोजन और आक्सीजन बन जाएगी। अगर आप पानी की एक बूंद को तोड़े, तो हाइड्रोजन और आक्सीजन आपको मिलेगी और कुछ भी नहीं मिलेगा। स्वभावत:, इसका नतीजा यह होना चाहिए कि अगर हम हाइड्रोजन और आक्सीजन को जोड़ दें, तो पानी बन जाना चाहिए।

लेकिन बड़ी मुश्किल है। तोड़े, तो सिर्फ हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलती है। जोड़े, तो पानी नहीं बनता। जोड्ने के लिए बिजली की मौजूदगी जरूरी है। और बिजली उस जोड़ में प्रवेश नहीं करती, सिर्फ मौजूद होती है, जस्ट प्रेजेंट। सिर्फ मौजूदगी चाहिए बिजली की। बिजली मौजूद हो, तो हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी बन जाता है। बिजली मौजूद न हो, तो हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी नहीं बनते।

यह कैटेलिटिक एजेंट की धारणा बड़ी कीमती है और अध्यात्म में तो बहुत कीमती है। गुरु कैटेलिटिक एजेंट है। वह कुछ देता नहीं। क्योंकि अध्यात्म कोई ऐसी चीज नहीं कि दी जा सके। वह कुछ करता भी नहीं। क्योंकि कुछ करना भी दूसरे के साथ हिंसा करना है, जबरदस्ती करनी है। वह सिर्फ होता है मौजूद। लेकिन उसकी मौजूदगी काम कर जाती है; उसकी मौजूदगी जादू बन जाती है। सिर्फ उसकी मौजूदगी, और आपके भीतर कुछ हो जाता है, जो उसके बिना शायद न हो पाता।

पहली तो बात यह है कि कृष्ण मौजूद न हों, तो समर्पण बहुत मुश्किल है। इसलिए मैं मानता हूं कि अर्जुन को समर्पण जितना आसान हुआ होगा, मीरा को उतना आसान नहीं हुआ होगा। इसलिए मीरा की कीमत अर्जुन से ज्यादा है। क्योंकि कृष्‍ण सामने मौजूद हों, तब समर्पण करना आसान है। कृष्ण बिलकुल सामने मौजूद न हों, तब दोहरी दिक्कत है। पहले तो कृष्ण को मौजूद करो, फिर समर्पण करो।

मीरा को दोहरे काम करने पड़े हैं। पहले तो कृष्‍ण को मौजूद करो; अपनी ही पुकार, अपनी ही अभीप्सा, अपनी ही प्यास से निर्मित करो, बुलाओ, निकट लाओ। ऐसी घड़ी आ जाए कि कृष्ण मालूम पड़ने लगें कि मौजूद हैं। रत्ती मात्र फर्क न रह जाए, कृष्‍ण की मौजूदगी में और इसमें। दूसरों को लगेगी कल्पना, कि मीरा कल्पना में पागल है। नाच रही है, किसके पास! जो देखते हैं, उन्हें कोई दिखाई नहीं पड़ता। और यह मीरा जो गा रही है और नाच रही है, किसके पास?

तो मीरा की आंखों में जो देखते हैं, उन्हें लगता है कि कोई न कोई मौजूद जरूर होना चाहिए! और या फिर मीरा पागल है। जो नहीं समझते, उनके लिए मीरा पागल है। क्योंकि कोई भी नहीं है और मीरा नाच रही है, तो पागल है। जो नहीं समझते, वे समझते हैं, कल्पना है।

लेकिन अगर कल्पना इतनी प्रगाढ़ है, इतनी सृजनात्मक, इतनी क्रिएटिव है कि कृष्‍ण मौजूद हो जाते हों, तो जो कल्पनाशील हैं, वे धन्यभागी हैं। जिनकी कल्पना इतनी सशक्त है कि कृष्‍ण के और अपने बीच के पांच हजार सालों को मिटा देती हो, अंतराल टूट जाता हो, और मीरा ऐसे करीब खड़ी हो जाती हो, जैसे अर्जुन खड़ा था।

तो पहली तो कठिनाई, जब मौजूद कृष्‍ण न हों, तो उनको मौजूद करने की है। और अगर कोई अपने मन में उनको मौजूद करने को राजी हो जाए, तो वे हर घड़ी मौजूद हैं। क्योंकि परम सत्ता तिरोहित नहीं होती, सिर्फ उसके प्रतिबिंब तिरोहित होते हैं। परम सत्ता का मूल, जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं कि अर्जुन तू देख सकेगा, जब मैं तुझे आंख दूंगा; वह मूल तो कभी नहीं खोता, प्रतिलिपियां खो जाती हैं।

वह मूल कभी पानी में झलकता है और राम दिखाई पड़ते हैं। वह मूल कभी पानी में झलकता है, और बुद्ध दिखाई पड़ते हैं। वह मूल कभी पानी में झलकता है, और कृष्ण दिखाई पड़ते हैं। यह भेद भी पानी की वजह से पड़ता है। अलग—अलग पानी अलग—अलग प्रतिबिंब बनाते हैं। वह मूल एक ही बना रहता है। उस मूल का तो खोना कभी नहीं होता; वह अभी आपके भी पास है। वह सदा आपके आस—पास आपको घेरे हुए है।

जिस दिन आपकी कल्पना इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि आपकी कल्पना जल बन जाए, दर्पण बन जाए, उस दिन वह मूल फिर प्रतिबिंब आपमें बना देता है। उसी प्रतिबिंब के पास मीरा नाच रही है। वह प्रतिबिंब मीरा को ही दिखाई पड़ रहा है। क्योंकि वह उसने अपनी ही कल्पना के जल में निर्मित किया है। किसी और को दिखाई नहीं पड़ रहा। लेकिन जिनमें समझ है, वे मीरा की आंख में भी उस प्रतिबिंब को पकड़ पाते हैं। वह मीरा की धुन और नाच में भी खबर मिलती है कि कोई पास है। क्योंकि मीरा जब उसके पास होने पर नाचती है, तो फर्क होता है।

मीरा के दो तरह के नाच हैं। एक तो जब कृष्‍ण को वह पकड़ नहीं पाती अपनी कल्पना में, तब वह रोती है, तब वह उदास है, तब उसके पैर भारी हैं, तब वह चीखती है, चिल्लाती है, तब उसे जैसे मृत्यु घेर लेती है। और एक वह घड़ी भी है, जब उसकी कल्पना प्रखर हो जाती है, और कल्पना का जल स्वच्छ और साफ हो जाता है, और जब उस दर्पण में वह कृष्‍ण को पकड़ लेती है, तब उसकी धुन, और तब उसके पैरों के घुंघरू की आवाज बिलकुल और है। तब उसमें जैसे महाजीवन प्रवाहित हो जाता है। तब जैसे उसके रोएं— रोएं से जो गरिमा प्रकट होने लगती है, वह सूर्यों को फीका कर दे। तब वह और है, जैसे आविष्ट, पजेस्ट, कोई और उसमें प्रवेश कर गया है।

तो जब वह रोती है विरह में, तब उसकी उदासी, तब मीरा अकेली है, उसको प्रतिबिंब पकड़ में नहीं आ रहा। और जब वह गाती है, आनंद में, अहोभाव में, कृष्‍ण से बात करने लगती है, तब कृष्ण निकट हैं। उस निकटता में समर्पण है। मीरा को कठिन पड़ा होगा, अर्जुन को सरल रहा होगा।

लेकिन उलटी बात भी हो सकती है। जिंदगी जटिल है। हो सकता है मीरा को भी सरल पड़ा हो, और अर्जुन को कठिन पड़ा हो। क्योंकि जो वास्तविक शरीर में खड़ा है, उसे परमात्मा मानना बहुत मुश्किल है। उसे भी प्यास लगती है, उसे भी भूख लगती है। वह भी रात सोता है। वह भी स्नान न करे, तो बदबू आती है। वह भी रुग्ण होगा, मृत्यु आएगी। पदार्थ में बने सब प्रतिबिंब पदार्थ के नियम को मानेंगे, चाहे वह कोई भी, किसी का भी प्रतिबिंब क्यों न हो। तो उसे परमात्मा मानना मुश्किल हो जाता है। और परमात्मा न मान सकें, तो समर्पण असंभव हो जाता है।

सवाल यह नहीं है बड़ा कि कृष्‍ण परमात्मा हैं या नहीं। सवाल बड़ा यह है कि जो उन्हें परमात्मा मान पाता है, उसके लिए समर्पण आसान हो जाता है। और जो समर्पण कर लेता है, उसे परमात्मा कहीं भी दिखाई पड़ सकता है। इसे थोड़ा समझ लें, यह जरा उलटा है।

कृष्‍ण का परमात्मा होना और न होना विचारणीय नहीं है। हों, न हों। कोई तय भी नहीं कर सकता। कोई रास्ता भी नहीं है, कोई परख की विधि भी नहीं है। लेकिन जो कृष्‍ण को परमात्मा मान पाता है, उसके लिए समर्पण आसान हो जाता है। और जिसके लिए समर्पण आसान हो जाता है, उसे पत्थर में भी परमात्मा दिखाई पड़ जाएगा। कृष्ण तो पत्थर नहीं हैं, उनमें तो दिखाई पड़ ही जाएगा।

अगर परमात्मा भी आपके सामने मौजूद हो और आप परमात्मा न मान पाएं, तो समर्पण न कर सकेंगे। समर्पण न कर सकें, तो सिर्फ पदार्थ दिखाई पड़ेगा, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ सकता। समर्पण आपका द्वार खोल देता है।

कृष्‍ण ने अर्जुन को आंख दी, यह सिर्फ उसी अर्थ में, जैसा कैटेलिटिक एजेंट का अर्थ होता है, उनकी मौजूदगी से। कृष्ण ने दे नहीं दी, नहीं तो वे पहले ही दे देते। इतनी देर, इतना उपद्रव, इतनी चर्चा करने की क्या जरूरत थी? इतना युद्ध को विलंब करवाने की क्या जरूरत थी? अगर कृष्ण ही आंख दे सकते थे बिना अर्जुन की किसी तैयारी के, तो यह आंख पहले ही दे देनी थी। इतना समय क्यों व्यर्थ खोया?

नहीं। जब तक अर्जुन समर्पित न हो, यह आंख नहीं अर्जुन को आ सकती थी। समर्पित हो, तो आ सकती है। लेकिन अगर कृष्‍ण मौजूद न हों, तो भी बहुत कठिनाई है इसके आने में।

बहुत बार ऐसा हुआ है कि निकट मौजूद न हो दिव्य व्यक्ति, तो लोग आखिरी किनारे से भी वापस लौट आए हैं। क्योंकि कैटेलिटिक एजेंट नहीं मिल पाता। अनेक बार लोग उस घड़ी तक पहुंच जाते हैं, जहां समर्पित हो सकते थे, लेकिन कहां समर्पित हों, वह कोई दिखाई नहीं पड़ता।

तो यदि उनकी कल्पना प्रखर और सृजनात्मक हो, अगर वे बड़े बलशाली चैतन्य के व्यक्ति हों और भावना गहन और प्रगाढ़ हो, तो वे उस व्यक्ति को निर्मित कर लेंगे, जिसके प्रति समर्पित हो सकें। और नहीं तो वापस लौट आएंगे। बहुत—से आध्यात्मिक साधक भी समर्पित नहीं हो पाते हैं, और तब अधूरे में लटके त्रिशंकु की भांति रह जाते हैं।

गुरु का उपयोग यही है कि वह मौका बन जाए। मूर्ति का भी उपयोग यही है कि वह मौका बन जाए। मंदिर का, तीर्थ का भी उपयोग यही है कि वहां मौका बन जाए। आपको आसानी हो जाए कि आप अपने सिर को झुका दें, लेट जाएं, खो जाएं।

अर्जुन झुक गया। उसने कहा, अब जो मर्जी; अब मैं राजी हूं। अब न मेरा कोई संदेह है, न कोई सवाल है। अब तुम जो करना चाहो। तो कृष्‍ण ने कहा, तुझे मैं अलौकिक चक्षु देता हूं दिव्य—चक्षु देता हूं।

दिव्य—चक्षु के संबंध में थोड़ी बात समझ लेनी जरूरी है। थोड़ा कठिन है, क्योंकि हमें उसका कोई अनुभव नहीं है। तो किस भाषा में, कैसे उसे पकड़े?

अभी हम देखते हैं; अभी हम आंख से देखते हैं। रात आप सपना भी देखते हैं। कभी आपने खयाल किया कि वह आप बिना आंख के देखते हैं। आंख तो बंद होती है। आप सपना देख रहे हैं, बिना आंख के देख रहे हैं। अगर आपकी आंख फूट भी जाए, आप अंधे हो जाएं, तो भी आप सपना देख सकेंगे।

जन्मांध नहीं देख सकेगा। और जन्मांध अगर देखेगा भी सपना, तो उसमें आंख का हिस्सा नहीं होगा, कान का हिस्सा होगा, हाथ का हिस्सा होगा। सुनेगा सपने में, देख नहीं सकेगा। लेकिन अगर आप अंधे हो जाएं, तो आप आंख के बिना भी सपना देख सकेंगे। सपना बिना आंख के देखते हैं; कौन देखता है!

शायद आपने कभी सोचा ही नहीं कि आंख के बिना भी देखना हो जाता है! अंधेरा होता है, आंख बंद होती है, आप भीतर सपना देखते हैं, सपना रोशन होता है। जिनके पास थोड़ी कलात्मक रुचि है, वे रंगीन सपना भी देखते हैं। जो थोड़े कलाहीन हैं, वे ब्लैक— व्हाइट देखते हैं। जो थोड़े पोएटिक हैं?ऐ कवि है जिनके पास मन में या चित्रकार जिनके भीतर छिपा है, वे रंगीन भी देखते हैं। रंग भी दिखाई पड़ते हैं बिना आंख के। कान भी बंद हों, तो सपने में आवाज सुनाई पड़ती है। और हाथ तो होते नहीं भीतर। फिर भी सपने में स्पर्श होता है, गले मिलना हो जाता है।

तो एक बात तय है कि जो आपके भीतर देखने वाला है, उसका आंख से कोई बंधन नहीं है, आंख से कोई देखने की अनिवार्यता नहीं है। आंख जरूरी नहीं है देखने के लिए। लेकिन बाहर देखने के लिए जरूरी है। भीतर देखने के लिए जरूरी नहीं है। भीतर तो आंख बंद करके भी देखा जा सकता है।

तो एक तो खयाल ले लें, जो आंखें हमारी हैं, वे हमारे दर्शन की क्षमता नहीं हैं, केवल दर्शन को बाहर ले जाने वाले द्वार, माध्यम हैं। हमारी देखने की क्षमता को बाहर तक पहुंचाने की व्यवस्था है, इंसूमेंटल है। देखने वाला भीतर है।

दिव्य—चक्षु का अर्थ होता है, सिर्फ देखने वाला ही हो, बिना किसी माध्यम के। क्यों? क्योंकि माध्यम सीमा बनाता है। जिससे आप देखते हैं, उससे आपकी सीमा बंध जाती है। जब कोई भी देखने का माध्यम न हो और देखने की शुद्ध क्षमता भीतर जाग्रत हो जाए, तो जो दिखाई पड़ता है, वह असीम है।

ऐसा ही समझें कि आप एक छोटे—से छेद से दीवाल से अपने घर के भीतर छिपे हुए बाहर के आकाश को देखते हैं। फिर आप दीवाल को तोड़कर और बाहर खुले आकाश के नीचे आकर खड़े हो  जाते हैं।

अभी तक हमने अपने भीतर छिपकर, शरीर के भीतर छिपकर जगत को आंखों के छेद से देखा है। इन आंखों का विस्मरण करके सिर्फ भीतर देखने वाला ही सजग हो जाए, सिर्फ देखने वाला ही रह जाए— जिसको हम द्रष्टा कहते हैं, साक्षी कहते हैं—सिर्फ चैतन्य भीतर रह जाए और कोई माध्यम न हो देखने का, तो खुला आकाश प्रकट हो जाता है।

वह देखने की क्षमता, शुद्ध, बिना माध्यम के, उसका नाम ही दिव्य—चक्षु है। उसे दिव्य इसलिए कह रहे हैं कि फिर हम असीम को देख सकते हैं। फिर सीमा से कोई संबंध न रहा।

ध्यान रहे, वस्तुओं में सीमा नहीं है, हमारी इंद्रियों के कारण दिखाई पड़ती है। इस जगत में कुछ भी सीमित नहीं है, सब असीम है। लेकिन हमारे पास देखने का जो उपाय है, वह सभी पर सीमा बिठा देता है। वह ऐसा ही है जैसे कि एक आदमी रंगीन चश्मा लगाकर देखना शुरू करता है। सब चीजें रंगीन हो जाती हैं। और अगर हम जन्म के साथ ही रंगीन चश्मे को लेकर पैदा हुए हों, तो हमें खयाल भी नहीं आ सकता कि चीजें रंगीन नहीं, सब हमारे चश्मे से दिए गए रंग हैं।

हम जो भी अपने चारों तरफ देख रहे हैं, वह वही नहीं है, जो है। हम वही देख रहे हैं, जो हम देख सकते हैं। हम वही सुन रहे हैं, जो हम सुन सकते हैं। हम वही अनुभव कर रहे हैं, जो हम अनुभव कर सकते हैं। चुनाव कर रहे हैं हम, सिलेक्टिव है हमारा सारा अनुभव, क्योंकि हमारी सारी इंद्रियां चुनाव कर रही हैं।

अभी वैज्ञानिक इस पर बहुत अध्ययन करते हैं, तो वे कहते हैं कि सौ में से हम केवल दो प्रतिशत देख रहे हैं। जो भी हमारे चारों तरफ घटित होता है, उसमें अट्ठानबे प्रतिशत हमें पता ही नहीं चलता। उसे हम चुनते ही नहीं हैं, वह हमसे छूट ही जाता है।

इसे हम थोड़ा ऐसा समझें कि आप एक रास्ते से भागे चले जा रहे हैं; आपके घर में आग लगी है। उसी रास्ते से आप रोज गुजरते हैं, आज भी गुजर रहे हैं, लेकिन आज आप रास्ते में वही बातें नहीं देखेंगे, जो आप रोज देखते थे। एक सुंदर स्त्री पास से निकलेगी, आपको पता ही नहीं चलेगा। ऐसा बहुत बार आपने चाहा था कि ऐसी घड़ी आ जाए चित्त की कि सुंदर स्त्री पास से निकले और पता न चले। लेकिन वह घड़ी कभी नहीं आई। आज मकान में आग लग गई है, तो घड़ी आई है। सुंदर स्त्री पास से निकलती है, आपकी स्थिति वही है, जो बुद्ध की रही होगी। अभी आपको बिलकुल दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन बुद्ध को बिना मकान में आग लगे; आपको मकान में आग लगे तब।

क्या हो गया? आंखें वही हैं, कान वही हैं। रास्ते पर कोई गीत चल रहा है, आज सुनाई नहीं पड़ता। कोई नमस्कार करता है, कितनी दफे चाहा था कि यह आदमी नमस्कार करे और इस नासमझ को, कमबख्त को, आज नमस्कार करने का मौका मिला! वह आज दिखाई नहीं पड़ता। आज मकान में आग लगी है। आपकी सारी चेतना एक तरफ दौड़ गई है। आपकी सभी इंद्रियां निस्तेज हो गई हैं। कोई भी इंद्रिय से आपकी चेतना का कोआपरेशन, सहयोग नहीं रहा, टूट गया।

आंख से देखने के लिए आंख के पीछे आपकी मौजूदगी जरूरी है। आज आपकी मौजूदगी यहां नहीं है। मकान में आग लगी है; आप वहां मौजूद हैं। आंख से अब आप भाग रहे हैं। आंख से सिर्फ आप इतना ही काम ले रहे हैं कि किस तरह उस मकान के पास पहुंच जाएं, जहां आपकी चेतना पहले ही पहुंच गई है। इस शरीर को कैसे उस मकान के पास तक पहुंचा दें, जहां आपका मन पहले ही पहुंच गया है। बस इतना इस आंख से काम लेना है, बाकी कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है।

इसे हम ऐसा समझें कि रास्ते पर अट्ठानबे—निन्यानबे प्रतिशत चीजों के लिए आप अंधे हो गए हैं। सिर्फ एक प्रतिशत आंख का काम रह गया है।

संसार से जब कोई सौ प्रतिशत अंधा हो जाता है, तो दिव्य—चक्षु उत्पन्न होता है। क्योंकि वह जो एक प्रतिशत भी है, वह भी काफी है। जोड़ तो बना ही हुआ है। और वह एक प्रतिशत के पीछे फिर वापस निन्यानबे लौट आएगा। जब कोई संसार के प्रति सौ प्रतिशत अनुपस्थित हो जाता है, इस अनुपस्थिति का पारिभाषिक नाम वैराग्य है।

वैराग्य का मतलब यह नहीं कि घर को छोड्कर कोई भाग जाए। छोड़ने में भी राग है। छोड़ने में भी घर की पकड़ है। क्योंकि जो पकड़े है, वही छोड़ता है। और छोड़ने की कोशिश करनी है, तो उसका मतलब है कि पकड़ भारी है। और छोड्कर जो भाग जाता है, उसके भागने में उतनी ही गति होती है, जितनी पकड़ मजबूत होती है। क्योंकि वह डरता है कि कहीं खींच न लिया जाऊं। जोर से भाग जाऊं। सब बीच के सेतु तोड़ दूं कि लौटने का कोई रास्ता न रहे। सब रास्ते गिरा दूं कि फिर वापस न लौट सकूं।

लेकिन यह सब भय है; वैराग्य नहीं है। वैराग्य का मतलब तो इतना ही है कि संसार जहां है, वहां है; न मैं उसे छोड़ता हूं न पकड़ता हूं। सिर्फ मैं उसके प्रति, मेरी जो चेतना सब इंद्रियों से दौड़ती थी उसके प्रति, उसे वापस लौटा रहा हूं। उसका प्रतिक्रमण, उसकी वापसी, उसका लौट आना, बस इतना ही वैराग्य का अर्थ है। अगर आंख विरागी हो जाए, तो दिव्य—चक्षु खुल जाता है।



समर्पण कोई करता ही तब है, जब संसार में रस न रह जाए। इसे थोड़ा समझ लें।

संसार में थोड़ा भी रस हो, तो हम समर्पण नहीं कर सकते। थोड़ी भी वासना हो, तो हम कहेंगे कि.. .वासना का मतलब ही यह होता है कि मैं चाहता हूं ऐसा हो। समर्पण का मतलब है कि अब मैं कहता हूं जैसा परमात्मा चाहे। अगर मेरे भीतर जरा—सी भी वासना है, तो मैं कहूंगा कि सब कर सकता हूं बस परमात्मा इतना मेरे लिए कर देना। बाकी सब समर्पण है। बाकी यह मकान मुझे मिल जाए, इतनी शर्त!

समर्पण तो वही कर पाएगा, जिसको संसार में कुछ अर्थ नहीं रहा। शायद अर्जुन इस घड़ी में आ गया है कि अब उसे कुछ अर्थ नहीं रहा है। उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ता। वह सारा युद्धस्थल, वे सारे लोग, सब खो गए, स्वप्न हो गए। वह कहता है, मैं सब छोड़ने को राजी हूं। अब मुझे, अगर आप चाहते हों, और शक्य हो और उचित मानें, तो मुझे दिखा दें।

इस समर्पण की घड़ी में कृष्‍ण ने कहा कि मैं तुझे दिव्य अलौकिक चक्षु देता हूं।

क्यों कहा, देता हूं? भाषा की मजबूरी है। भाषा में सब तरफ द्वंद्व है। इसलिए भाषा में जो भी कहा जाए, वह द्वैत हो जाता है। अगर कृष्‍ण ऐसी भाषा बोलें, जिसमें द्वैत न हो, तो अर्जुन की समझ में नहीं आएगा। अभी तो नहीं आएगा, अभी दिव्य—चक्षु तो मिला नहीं है। अभी तो भाषा लेने—देने की बोलनी पड़ेगी। हम भी भाषा में जब किसी ऐसे अनुभव को रखते हैं, जो भाषा के पार है, तो अड़चन आनी शुरू होती है।

आप किसी को कहते हैं कि मैं तुम्हें प्रेम देता हूं। पर आपने कभी खयाल किया कि प्रेम क्या दिया जाता है? या आप चाहते तो क्या देने से रोक सकते थे? प्रेम होता है, दिया नहीं जा सकता। या फिर कोशिश करके देखें किसी को प्रेम देकर! कि चलो, इसको कोशिश करें, प्रयास, अभ्यास करें; प्राणायाम साधें, और प्रेम दें। तब आप पाएंगे कि कुछ नहीं हो रहा है। कुछ हो ही नहीं रहा है। प्रेम की कोई ऊर्जा प्रकट नहीं होती। कोई किरण नहीं जगती। कोई धुन पैदा नहीं होती। कुछ नहीं होता।

आप नकल कर सकते हैं, अभिनय कर सकते हैं। लेकिन प्रेम नहीं दिया जा सकता। प्रेम होता है। लेकिन फिर भी हम भाषा में कहते हैं कि प्रेम देता हूं। वह देना गलत है। मगर भाषा में ठीक है। भाषा में कोई अड़चन नहीं है। क्योंकि सारी भाषा लेने—देने पर निर्मित है। और प्रेम दोनों के बाहर है।

इसलिए जीसस ने कहा कि प्रेम ही परमात्मा है। और किसी कारण से नहीं। इसलिए नहीं कि परमात्मा बहुत प्रेमी है। सिर्फ इसीलिए कि मनुष्य के अनुभव में प्रेम एक अद्वैत का अनुभव है।

उससे समझ में आ जाए शायद, कि जैसा प्रेमी को कठिन हो जाता है कहना कि देता हूं। होता है। जैसे श्वास चलती है, ऐसा प्रेम चलता है।

शायद श्वास को तो हम रोक भी सकते हैं थोड़ी देर, प्रेम को हम रोक भी नहीं सकते। शायद श्वास को हम बाहर भी जोर से फेंक सकते हैं, लेकिन प्रेम को हम जोर से फेंक भी नहीं सकते। हम प्रेम के साथ कुछ भी नहीं कर सकते। इसलिए प्रेमी एकदम असहाय हो जाता है, हेल्पलेस हो जाता है। उसे लगता है, मैं कुछ भी नहीं कर सकता। कुछ मुझसे बड़ी शक्ति ने मुझे पकड़ लिया।

इसलिए प्रेमी हमें पागल मालूम पड़ने लगता है। क्यों? क्योंकि वह सारा कंट्रोल, सारा नियंत्रण खो देता है। अब वह कुछ कर नहीं सकता। कुछ और उसमें हो रहा है, जिसमें उसे बहना ही पडेगा। अब किसी बड़ी धारा ने उसे पकड़ लिया, जिसमें कुछ करने का उपाय नहीं है। तैर भी नहीं सकता।

इसलिए जो समझदार हैं, तथाकथित समझदार, वे प्रेम से बचते हैं। नहीं तो कंट्रोल खो जाता है, नियंत्रण खो जाता है। समझदार पैसे की फिक्र करते हैं, प्रेम की नहीं, क्योंकि पैसे पर नियंत्रण हो सकता है, लिया-दिया जा सकता है, तिजोड़ी में रखा जा सकता है, जरूरत हो वैसा उपयोग किया जा सकता है। प्रेम आपसे बड़ा साबित होता है।

ध्यान रहे, प्रेम प्रेमी से बड़ा साबित होता है। प्रेमी छोटा पड़ जाता है और प्रेम बड़ा हो जाता है। और प्रेमी एक तूफान, एक अंधड़ में फंस जाता है। कोई बड़ी ताकत, उससे बड़ी ताकत उसे चलाने लगती है। इसलिए वह निरवश हो जाता है, अवश हो जाता है, असहाय हो जाता है।

फिर भी प्रेमी भाषा में कहता है कि मैं प्रेम देता हूं।

ठीक ऐसे ही कृष्‍ण ने कहा है कि मैं तुझे दिव्य-चक्षु देता हूं। कृष्‍ण चाहते भी, और अर्जुन का समर्पण पूरा होता, तो दिव्य-चक्षु देने से रुक नहीं सकते थे। यह खयाल में ले लें। चाहते भी, तो भी दिव्य- चक्षु देने से रोका नहीं जा सकता था। कृष्‍ण का होना पास और अर्जुन का समर्पण, दिव्य-चक्षु घटता ही। यह वैसे ही घटता, जैसे पानी नीचे की तरफ बहता है। ऐसे ही परमात्मा भी अर्जुन की तरफ बहता ही, इसमें कोई उपाय नहीं है।

लेकिन जरा अजीब—सा लगता कि कृष्‍ण कहते कि अब दिव्‍यचक्षु तुझमें घटित हो रहा है। वह अर्जुन की समझ के बाहर होता। हैपनिग! देना नहीं है वह, एक घटना है।

लेकिन भाषा हमेशा ही अद्वैत को द्वैत में तोड़ देती है। और जहां दो हो जाते हैं, वहा लेना—देना हो जाता है।

इसलिए प्रेम को दिया—लिया नहीं जा सकता, क्योंकि वहां दो नहीं रह जाते। कौन ले! कौन दे! वहां एक ही रह जाता है।

समर्पण की इस घड़ी में अर्जुन मिल गया कृष्‍ण की सत्ता के साथ! सागर बूंद की तरफ दौड़ पड़ा। आंख खुल गई। सीमाएं टूट गईं। सब ढांचे गिर गए। खुले आकाश को वह देख सका।

संजय ने कहा, हे राजन्, महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके उपरांत अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप दिखाया।

बडे मजे की कहानी है। और इसमें कई तल सत्य की खबर में विभक्त हो जाते हैं, बंट जाते हैं। घटना घटी कृष्‍ण के भीतर से अर्जुन के भीतर की तरफ। घटी, की नहीं गई। हुई; हुआ कि अर्जुन खुल गया, उसकी सब पंखुड़ियां खुल गईं चेतना की, और देख सका। यह संजय अंधे धृतराष्ट्र को सुना रहा है। संजय बहुत दूर है, जितने दूर हम हैं। कृष्ण से उतनी ही दूर, जितनी दूर हम हैं, कृष्ण से उतनी ही दूर। हमारी दूरी समय की है, उसकी दूरी स्थान की थी। बाकी दूरी में कोई फर्क नहीं पड़ता। दूरी थी। बहुत दूर।

सत्य जब भी घटता है, तो जिनको सत्य घटता है, वे हमसे समय और स्थान में बड़े दूर हो जाते हैं। पर उनकी खबर लाने वाला हमारे बीच में कोई चाहिए, अन्यथा खबर नहीं आ सकेगी। हम अंधों के पास खबर आ भी कैसे सकेगी!

संजय थोड़ी दूर तक अर्जुन जैसा है। थोड़ी दूर तक! पूरा होता, तो वह भी फिर घटना अंधे धृतराष्ट्र को नहीं सुना सकता। आधा! आधा कृष्‍ण जैसा है, आधा अर्जुन जैसा है। आधा झुका है उस तरफ। उसे चीजें दिखाई पड़ती हैं, जो बहुत दूर घट रही हैं। वह पकड़ पाता है। उसके पास दिव्य—चक्षु नहीं हैं। क्योंकि दिव्य—चक्षु तो पूरी घटना में घटता है, वह अर्जुन को घट रहा है। वह संजय के पास नहीं है।

अनेक लोगों को यह विचारणीय रहा है कि संजय इतनी दूर से कैसे देख रहा है? उसके पास टेलिपैथिक, सिर्फ दूर—दृष्टि है। दिव्य—दृष्टि नहीं, दूर—दृष्टि। जो अनुभव को उपलब्ध होता है, उसको तो दिव्य—दृष्टि होती है। जो अनुभवी और गैर—अनुभवियों के बीच में खड़ा होता है, उसके पास दूर—दृष्टि होती है। वह देख पा रहा है। दूर की घटना है, बहुत दूर घट रही है, पर उसको पकड़ पा रहा है। और पकड़ वह किसके लिए रहा है? अंधे धृतराष्ट्र के लिए! वह अंधे धृतराष्ट्र को समझा रहा है। इसलिए और कठिनाई है। ध्यान रहे, यह जो गीता की भाषा है, यह संजय की भाषा है। ये शब्द संजय के हैं। और ये शब्द भी संजय के हैं, एक अंधे की समझ में आ सकें, उस लिहाज से बोले गए।

इसलिए कई तल हैं। घटना का तल है एक तो कृष्ण। फिर एक दूसरे तल पर निकट में खड़ा हुआ अर्जुन है। फिर बहुत दूरी पर खड़ा हुआ संजय है। और फिर अनंत दूरी पर बैठा हुआ अंधा धृतराष्ट्र है। तो गीता इन चार चरणों में चलती है।

हम सब धृतराष्ट्र हैं, अंधे हैं। वहां हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। कुछ सूझ में नहीं आता। धृतराष्ट्र पूछता है संजय से। और संजय कह रहा है, उस दूर की घटना को बांध रहा है शब्दों में। स्वाभाविक है कि संजय के शब्द अधूरे होंगे। और इसलिए भी अधूरे होंगे, क्योंकि अंधे को समझाना है।

इसलिए ध्यान रहे, गीता बहुत लोकप्रिय हो सकी; उसका कारण है, हम अंधों की थोड़ी— थोड़ी समझ में आ सकी। बहुत पापुलर है। 

संजय ने कहा कि ऐसा कहने के बाद, अर्जुन के लिए कृष्‍ण ने परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप दिखाया।

जो पहली बात कही है, वह है ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप। वह भी अर्जुन की तैयारी के लिए। क्योंकि परमात्मा के सभी रूप हैं। वह जो विकराल, भयंकर और कुरूप है, वह भी परमात्मा है। और वह जो सुंदर, ऐश्वर्ययुक्त, महिमावान है, वह भी परमात्मा है। इस संबंध में भारतीय दृष्टि को ठीक से समझ लेना जरूरी है।

भारत यह नहीं कहता कि कुछ बुरा जो है, वह परमात्मा नहीं है। सारी दुनिया में दूसरे धर्म बांट देते हैं जगत को दो हिस्सों में। वे एक तरफ शैतान को खड़ा कर देते हैं, कि जो—जो बुरा है, वह शैतान की तरफ, और जो—जो अच्छा है, वह भगवान की तरफ। भगवान उनके लिए अच्छे—अच्छे का जोड़ है, और शैतान बुरे—बुरे का।

लेकिन तब वे समझा नहीं पाते कि बुरा क्यों है! और यह जो तुम्हारा अच्छा भगवान है, अब तक बुरे को नष्ट क्यों नहीं कर पाया? और अगर अब तक नहीं कर पाया, तो कब तक कर पाएगा? और जो अब तक नहीं कर पाया और अनंतकाल व्यतीत हो गया, संदेह पैदा होता है कि वह कभी भी कर पाएगा! क्योंकि अब तक कर लिया होता, अगर कर सकता होता।

भारत ने बड़ी हिम्मत की है। भारत ने स्वीकार किया है कि बुरा भी परमात्मा है, भला भी परमात्मा है। भारत यह कहता है कि सारा द्वैत परमात्मा है। उसको दो में हम बांटते ही नहीं। हम जन्म को भी परमात्मा कहते हैं, मृत्यु को भी। और हम सुख को भी परमात्मा कहते हैं, और दुख को भी। और हम सत्य को भी परमात्मा कहते हैं और संसार को भी। ये दो छोर हैं उस एक के ही। जो उस एक को जान लेता है, उसके लिए ये दो तिरोहित हो जाते हैं। जो उस एक को नहीं जानता, वह इन दो के बीच परेशान होता रहता है।

परेशानी इसलिए है कि हम एक को नहीं जानते। परेशानी बुराई के कारण नहीं है। परेशानी इसलिए है कि भलाई और बुराई दोनों के बीच जो छिपा है एक, उससे हमारी कोई पहचान नहीं है। परेशानी मौत के कारण नहीं है। परेशानी इसलिए है कि जीवन और मौत दोनों में जो छिपा है एक, उससे हमारी कोई पहचान नहीं है। इसलिए मौत से परेशानी है। पाप से परेशानी नहीं है। पाप से परेशानी इसलिए है कि पाप और पुण्य दोनों में जो छिपा है, उस एक की हमें कोई झलक नहीं मिलती। पुण्य में नहीं मिलती, तो पाप में कैसे मिले? पुण्य तक में नहीं दिखाई पड़ता वह, तो पाप में हमें कैसे दिखाई पड़ेगा? अंधापन है हमारा।

लेकिन कृष्‍ण शुरू करते हैं ऐश्वर्ययुक्त रूप से। अर्जुन राजी हो जाए। जब पहली दफा आंख खुलती है उस परम में, तो अगर पहली दफे ही विकराल दिखाई पड़ जाए, कुरूप दिखाई पड़ जाए, पहली दफे ही मृत्यु दिखाई पड़ जाए, तो शायद अर्जुन सिकुड़कर वापस सदा के लिए बंद हो जाए।

जिन लोगों ने भी कभी किन्हीं कारणों से, कुछ गलत विधियों से परमात्मा का विकराल रूप पहली दफा देख लिया है, वे अनेक जन्मों के लिए मुश्किल में पड़ जाते हैं। वह रूप है।

 गलत साधना पद्धतियों से इतना ही मतलब है कि आपको पहुंचा तो देंगी वे, लेकिन ऐसे किनारे से पहुंचा देंगी, जहां परमात्मा से भी आपका तालमेल होना मुश्किल हो जाए। ठीक साधना पद्धतियों से इतना ही मतलब है कि वे ठीक सामने के द्वार से आपको परमात्मा के पास पहुंचाएंगी। जहां मिलन सुखद और प्रीतिकर और आनंदपूर्ण हो। पीछे दूसरा छोर भी देखा जा सकता है। देखना ही पड़ेगा, क्योंकि पूरे को ही जानना होगा, तभी कोई मुक्त होता है।

इसलिए गलत और ठीक साधना पद्धति का इतना ही फर्क है कि परमात्मा के किस द्वार से...। वहां शंकर तांडव करते हुए भी मौजूद हैं, और वहां कृष्ण बांसुरी बजाते हुए भी मौजूद हैं। अच्छा हो कि कृष्‍ण की तरफ से यात्रा करें।

शंकर की तरफ से भी यात्रा होती है। और कुछ के लिए वही उचित होगी, और कुछ के लिए वही प्रीतिकर होगी। कुछ हैं, जो शंकर की बारात में ही सम्मिलित होना चाहेंगे! वहां से भी परमात्मा तक पहुंचा जाता है। लेकिन वह जो रूप है, अत्यंत विकराल, मृत्यु का, अत्यंत दुस्साहसियों के लिए है, जो मृत्यु में भी छलांग लगाने को तैयार हों।

आप तो अभी जीवन से भी डरते हैं, डर—डरकर जीते हैं, मृत्यु की तो बात अलग है। डर—डरकर तो सभी मरते हैं। डर—डरकर जीते हैं! कंपते रहते हैं, और जीते हैं। इनके लिए विकराल के निकट जाना खतरनाक हो जाए। इसलिए गीता बहुत व्यवस्था से आगे बढ़ती है। संजय ने कहा कि अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप दिखाया। और उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अदभुत दर्शनों वाले, एवं बहुत—से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत— से दिव्य शस्त्रों को हाथ में उठाए हुए, तथा दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किए हुए, और दिव्य गंध का अनुलेपन किए हुए एवं सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित, विराटस्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

ये जितनी बातें वर्णन की गई हैं, ध्यान रखना, अर्जुन के लिए यही प्रीतिकर थीं और इसीलिए यही परमात्मा का पहला चेहरा था अर्जुन के लिए। इसमें जितनी चीजें कही गई हैं, वे अर्जुन की ही प्रीति की चीजें हैं। इसे फिर से हम सुन लें, तो खयाल में आ जाएगा। परम ऐश्वर्ययुक्त! ईश्वर का अर्थ होता है, मालिक, ऐश्वर्य से भरा हुआ। क्षत्रिय के लिए ईश्वर जैसा होना, ऐश्वर्य से भर जाना, उसकी पहली वासना है। क्षत्रिय जीता उसके लिए है। गुलाम होकर क्षत्रिय मरना पसंद करेगा। मालिक होकर ही जीना पसंद करेगा। ऐश्वर्य उसकी वासना है, उसकी आकांक्षा है। वह ऐश्वर्य की भाषा ही समझ सकता है। वह दूसरी कोई भाषा नहीं समझ सकता।

इसलिए पहली जो छबि, पहला जो रूप आविष्कृत हुआ अर्जुन के सामने, वह था ऐश्वर्य से परिपूर्ण। और ऐश्वर्य में भी जो चीजें गिनाई हैं, वे कई लोगों को लगेंगी, कैसी फिजूल की बातें हैं! खासकर उनको, जो त्याग इत्यादि की भाषा सुन—सुन कर परेशान हो गए हैं। उनको बड़ी मुश्किल लगेगी कि यह भी क्या बात है! अनेक मुख, नेत्रों से युक्त, अदभुत दर्शनों वाले, बहुत—से दिव्य भूषणों से युक्त! दिव्य भूषणों से युक्त, आभूषण पहने हुए! बहुत— से दिव्य शस्त्रों को हाथ में उठाए हुए!

वे अर्जुन की प्रीति की चीजें हैं। अगर उसको इस दरवाजे से प्रवेश न मिले, तो शायद प्रवेश असंभव हो जाए, मुश्किल हो जाए, कठिन तो हो ही जाए। वह जो—जो, जिन—जिन चीजों से प्रेम करता है, अस्त्र—शस्त्र अर्जुन का प्रेम है, और जब उसने परमात्मा के अनंत—अनंत विराट हाथों में अस्त्र—शस्त्र देखे होंगे, तो उसका परमात्मा में प्रवेश धीमे— धीमे नहीं हुआ होगा; दौड़कर डूब गया होगा, जैसे नदी डूबती है सागर में दौड़कर।

दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किए हुए—वें भी अर्जुन की प्रीति की चीजें हैं— दिव्य गंध का अनुलेपन किए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित, विराटस्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

वह विमोहित हो गया होगा, स्तब्ध हो गया होगा। इस सौंदर्य को देखकर विस्मृत हो गया होगा सब कुछ। इसे देखकर उसकी श्वासें ठहर गई होंगी। इसे देखकर उसके प्राणों में हलन—चलन न रही होगी। इसे देखकर वह बिलकुल शून्यवत हो गया होगा। यही उसकी वासना थी। यही वह चाहता था। यह उसकी चाह की भाषा है।

ध्यान रखें, परमात्मा कैसा दिखाई पड़ता है, यह आप पर निर्भर करेगा कि आप कैसा उसे पहली दफा देखेंगे। यह परमात्मा पर निर्भर नहीं करेगा। यह आप पर निर्भर करेगा कि कैसा आप उसे देखेंगे। आप अपनी ही अनुभव की संपदा के द्वार से उसे देखेंगे। आप अपने ही द्वारा उसे देखेंगे। तो जो पहला रूप आपको दिखाई पड़ेगा, वह परमात्मा का रूप कम, आपकी समझ, भाषा का रूप ज्यादा है।

यह अर्जुन की भाषा, समझ का रूप है, जो उसे दिखाई पड़ा। और धन्यभागी है वह व्यक्ति, जिसको अपनी ही भाषा में परमात्मा से मिलना हो जाए। क्योंकि दूसरी भाषा में मिलना हो, तो तालमेल नहीं बैठ पाता। कठिन हो जाता, शायद द्वार भी बंद हो जाता।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...