शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 3

 जगत एक परिवार है

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् ।

कल्पक्षये युनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।। 7।।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य धिसृजामि पुन: पुन:।

भूतग्राममिमं कृल्लमवशं क्कृतैर्वशात्।। 8।।

न च मां तानि कमगॅण निबश्वन्ति धनंजय।

उदासीनवदासीनमसक्त तेषु कर्मसु।। 9।।


और हे अर्जुन कल्प के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति की प्राप्त होते हैं अर्थात मेरी प्रकृति में लय होते हैं। और कल्प के आदि में उन्‍हें मैं फिर रचता हूं।

अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के वश से परतंत्र हुए हम संपूर्ण भूत समुदाय को बारंबार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूं।

हे अर्जुन उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित हुए मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बांधते हैं।


इस  सूत्र के निकट पहुंचने के लिए हम दो—चार मार्गों से यात्रा करें, तो आसान होगा। यह सूत्र, मनुष्य के चिंतन में जो मूलभूत प्रश्न है, उससे संबंधित है। आदमी ने निरंतर जानना चाहा है, कैसे यह सृष्टि निर्मित होती है? कैसे विलीन होती है? कौन इसे बनाता? कौन इसे सम्हालता? किस में यह विलीन होती है? कोई है इसे बनाने वाला या नहीं है? इस प्रकृति का कोई प्रारंभ है, कोई अंत है? या कोई प्रारभ नहीं, कोई अंत नहीं? इस प्रकृति में कोई प्रयोजन है, कोई लक्ष्य है, जिसे पाने के लिए सारा अस्तित्व आतुर है, या यह लक्ष्यहीन एक अराजकता है? यह जगत एक व्यवस्था है या एक अराजक संयोग है? और इस प्रश्न के उत्तर पर जीवन का बहुत कुछ निर्भर करता है, क्योंकि जैसा उत्तर हम स्वीकार कर लेंगे, हमारे जीवन की दशा भी वही हो जायगी।

ऐसे विचारक रहे हैं, जो मानते हैं कि जीवन एक संयोग, एक एक्सिडेंट मात्र है। कोई व्यवस्था नहीं है, कोई लक्ष्य नहीं है, कहीं पहुंचना नहीं है, कोई कारण भी नहीं है, सिर्फ जीवन एक दुर्घटना है। ऐसी दृष्टि को जो मानेगा, वह जो कह रहा है, वह सच हो या न हो, उसका जीवन जरूर एक दुर्घटना हो जाएगा। वह जो कह रहा है, वह सारे जगत को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन उसके अपने जीवन को निश्चित ही प्रभावित करेगा।





 यदि मुझे ऐसा लगता हो कि यह सारा विस्तार, यह पूरा ब्रह्माड एक संयोग मात्र है, तो मेरे अपने जीवन का केंद्र भी बिखर जाएगा। तब मेरे जीवन की सारी घटनाएं भी संयोग मात्र हो जाएंगी। फिर मैं बुरा करूं या भला, मैं जीऊं या मरूं, मैं किसी की हत्या करूं या किसी पर दया करूं, इन सब बातों के पीछे कोई भी प्रयोजन, कोई सूत्रबद्धता नहीं रह जाएगी। ऐसा जिन्होंने कहा है, उन्होंने जगत को अराजक बनाने में सुविधा दी है।

और कठिनाई यह है कि चाहे कोई विचारक कितना ही कहे कि जगत अराजक है, खुद उसकी चेतना इस बात को स्वीकार नहीं कर पाती। क्योंकि ऐसे विचारक जब अपना प्रस्ताव करते हैं कि जगत अराजक है, तो इसे भी बहुत तर्कयुक्त ढंग से सिद्ध करते हैं। ऐसे विचारक भी जब यह कहते हैं कि जगत अराजक है, तो इसकी भी सुसंगत व्यवस्था निर्मित करते हैं। वे एक सिस्टम बनाते हैं। अगर आप उनका विरोध करेंगे, तो वे आपके विपरीत तर्क उपस्थित करेंगे। वे आपके तर्कों का खंडन करेंगे। वे अपने तर्कों का समर्थन करेंगे। लेकिन उन्हें शायद खयाल नहीं आता कि अगर जगत एक अराजकता है, तो किसी को भी समझाने का कोई प्रयोजन नहीं है, और फिर न कोई सही है और न कोई गलत।

अगर जगत एक अराजकता है, एक अनार्की है, एक केआस है, तो फिर मैं आपको समझाऊं कि सही क्या है, तो मैं मूढ़ हूं। क्योंकि अराजकता में सही कुछ भी नहीं हो सकता है। सही और गलत व्यवस्था में होते हैं।

फिर अगर मैं कहूं कि मैं ही सही हूं और आप गलत हैं, तो मैं अपनी ही बात का खंडन कर रहा हूं। क्योंकि सही और गलत किसी प्रयोजन से होते हैं। अगर मैं कहूं कि यह रास्‍ता गलत है, और साथ ही यह भी कहूं कि यह रास्ता कहीं पहुंचता नहीं है। क्योंकि अगर रास्ता कहीं भी नहीं पहुंचता है तो रास्‍ता गलत और सही हो हीं नहीं सकता। क्योंकि रास्‍ते का सही और गलता होना इस पर निर्भर होता है कि मंजिल मिलेगी या नहीं, अगर मंजिल है ही नहीं, तो सभी रास्‍ते समान है, न वह गलत है और न सही हैं। क्योंकि कोई रास्ता कहीं भी पहुंचाता नहीं है, इसलिए जांचिएगा कैसे, मापिएगा कैसे कौन सही है कौन गलत है?

जो कहते हैं कि जगत अराजक है वह भी सिद्ध करना चाहते हैं कि हम जो कह रहे हैं, वह सत्‍य है, अराजकता में कोई सत्‍य असत्य नहीं हो सकता। सत्य और असत्‍य व्‍यवस्‍था की बातें है।  इसलिए मैं कहता हूं जिन्होंने ऐसा कहां है कि वह भी व्‍यवस्‍था को स्वीकार करते हैं। उनकी चेतना भी गहन रूप में व्यवस्था को अस्वीकार नहीं कर पाती। अव्यवस्था से वे भी राजी नहीं हो पाते हैं। अब तक ऐसा कोई भी जगत में व्यक्ति नहीं हुआ है, जो अव्यवस्था के लिए अंतर्मन से राजी हो। अगर आप ऐसे व्यक्ति को भी जाकर छुरा उसके हाथ में भोंक दें, तो वह भी पूछेगा, क्यों? तुमने छुरा मुझे क्यों मार दिया है?

लेकिन अगर जगत अराजक है, तो क्यों का प्रश्न अनुचित है। यहां घटनाएं घटती हैं, बिना किसी कारण के। तो मैं कह सकता हूं कि यह संयोग है कि मेरे हाथ में छुरा है, तुम्हारा हाथ करीब है। और यह संयोग है कि मेरा हाथ तुम्हारे हाथ में छुरे को भोंकता है। इसमें कोई कारण नहीं है। लेकिन अराजक आदमी भी पूछेगा कि छुरा मुझे क्यों मारा गया है? वह भी जानना चाहता है कारण।

मैं आप से यह कह रहा हूं कि मनुष्य की चेतना ही ऐसी है कि वह व्यवस्था को अस्वीकार नहीं कर सकती है। विचार में भी अस्वीकार करे, तो भी अव्यवस्था के लिए भी व्यवस्था निर्मित करेगी। अगर कोई आदमी यह भी कहे कि जगत नहीं है, तो इसे भी वह सिद्ध करने में लग जाता है। अगर वह यह कहे कि यह सब झूठ है, जो है, तो भी वह इसे सिद्ध और सत्य करने में लग जाता है। इससे एक भीतरी बात की खबर मिलती है।

वह कहता भला हो जगत मेरा विचार है लेकिन उसकी चेतना स्‍वयं भी इसे नहीं मान पाती है।

आप क्‍या कहते है ये बहुत महत्‍वपूर्ण नहीं है, आपका अंतर्चित्त क्या स्‍वीकार करता है वह महत्‍वपूर्ण है।

तो एक द्वार आपको कहूं और वह पहला द्वार यह है कि मनुष्य की चेतना स्‍वभावत व्‍यवस्‍था को स्वीकार करती है। इस जगत में अगर कोई व्‍यवस्‍था है। तो ही हम तृप्त हो सकते हैं। अगर इस जगत में कोई व्‍यवस्‍था नहीं है, तो हम तृप्त नहीं हो सकते हैं; क्योंकि हमारे प्राणों की गहराई से व्यवस्था की मांग है। इस मांग का ही परिणाम ईश्वर की धारणा है।

ईश्वर की धारणा का अर्थ है कि जगत एक व्यवस्था है, एक कास्मास है, केआस नहीं। यहां जो भी हो रहा है, वह प्रयोजनपूर्वक है। और यहां जो भी हो रहा है, उसका कोई गंतव्य है। और यहां जो भी हो रहा है, उसके पीछे कोई सुनियोजित हाथ हैं। यहां जो भी दिखाई पड़ रहा है, वह कितना ही सांयोगिक हो, सांयोगिक नहीं है, कार्य और कारण से आबद्ध है।

ईश्वर की धारणा का जो मौलिक आधार है, वह पहला आधार यही है कि मुनुष्य कुछ भी करे, विचार कुछ भी करे, विचार व्यवस्था के पार नहीं जा सकता है। विचार स्वयं ही व्यवस्था का आधार है। विचार व्यवस्था की मांग है। सोचने का अर्थ ही है कि प्रयोजन है, अन्यथा सोचने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। समझाने का अर्थ है, क्योंकि कोई प्रयोजन है।

और हम जहां भी देखें, वहां जीवन में व्यवस्था के चरण सब जगह दिखाई पड़ते हैं। छोटे—से परमाणु से लेकर आकाश में घूमते हुए विराट महाकाय ताराओं की तरफ हम आंख उठाएं, चाहे क्षुद्रतम में और चाहे विराटतम में, एक गहन, निबिड़ योजना परिलक्षित होती है।

'यह मेरा हाथ है। ये मेरे हाथ की पांच अंगुलियां हैं। यह मेरा पैर है। यह मेरा सिर है। यह मेरा शरीर है। अगर ये सब वस्तुएं हैं, तो इनके भीतर कोई ऐक्य नहीं हो सकता। लेकिन मेरे मन में विचार  उठता है, और मेरा हाथ उस विचार को पूरा करने के लिए उठ जाता है। मेरे मन में कामना उठती है, और मेरे पैर चलने को तत्पर हो जाते हैं। मेरी आंख देखती है, और मेरे कान, जो मेरी आंख देखती है, उसे सुनने को उत्सुक हो जाते हैं। मेरे पैर और मेरी आंख में, और मेरे कान में, और मेरे हाथ में, और मेरे मन में एक अंतर्व्यवस्था है, एक इनर सिस्टम है। ये सिर्फ जोड़ नहीं हैं। ये सिर्फ जोड़ नहीं हैं कि हाथ मेरे पैर से जुड़ा है, पैर मेरे शरीर से जुड़े हैं। ये सिर्फ जोड़ नहीं हैं। इन सबके भीतर बहती हुई कोई एकता है। उस एकता का नाम आर्गेनिक यूनिटी है।

ईश्वर की धारणा इस बात की घोषणा है कि यह जगत भी वस्तुओं का समूह नहीं, एक अंतर—ऐक्य है। एक इनर यूनिटी इस सारे जगत के भीतर दौड़ रही है। अगर वृक्ष उग रहा है और आकाश में तारे चल रहे हैं, वर्षा हो रही है और नदिया सागर की तरफ भाग रही हैं, सूरज सुबह उग रहा है और चांद रात को आकाश में यात्रा करता है—यह सब का सब अलग— अलग घटनाओं का जोड़ नहीं है। इन सारी घटनाओं के बीच जैसे मेरे शरीर में मेरी एकता व्याप्त है, इन सबके बीच कोई अंतर्व्यवस्था व्याप्त है। उस अंतर्व्यवस्था का नाम ईश्वर है।

ईश्वर व्यक्ति नहीं है, ईश्वर अंतर्व्यवस्था है। समस्त व्यक्तियों के बीच जो अंतर्व्यवस्था है, उसका नाम ईश्वर है, समस्त वस्तुओं के बीच जो जोड्ने वाली कड़ी है।

अब यह मजे की बात है कि अगर मेरे हाथ को काट दें, तो मेरा हाथ कटकर गिर जाएगा, मेरा शरीर अलग हो जाएगा, लेकिन दोनों के बीच की जोड्ने वाली कड़ी दिखाई नहीं पड़ेगी। पकड़—में भी नहीं आएगी। अब तक तो नहीं आ सकी है। और जितना गहरे जो जानते हैं, वे कहते हैं, कभी पकड़ में नहीं आ सकेगी। वह अंतर्व्यवस्था अदृश्य है।

यह तो निश्चित है कि मेरे हाथ और मेरे बीच कोई अंतर—कड़ी है, तभी मेरे मन में विचार कंपता है और मेरा हाथ सक्रिय हो जाता है। विचार और मेरे हाथ में भी कोई जोड़ है। लेकिन हाथ को काटते हैं, तो हाथ में और मेरे शरीर में जो जोड़ है, वह तो दिखाई पड़ता है—नसे दिखाई पड़ती हैं, मसल्स दिखाई पडते हैं, स्नायु, हड्डियां दिखाई पड़ती हैं—लेकिन मेरे हाथ और मेरे विचार में जो जोड़ है, वह कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता! वह जोड़ है जरूर। क्योंकि इधर। मैं सोचता हूं उधर मेरा हाथ सक्रिय हो जाता है।

जब कभी वह जोड़ खो जाता है, तो हम कहते हैं, आदमी को लकवा लग गया, पक्षाघात हो गया। अब वह सोचता है कि मेरा हाथ उठे और हाथ नहीं उठता। तो वह आदमी कहता है, मैं पैरालाइज्‍ड हो गया।

लेकिन इस जगत में जो लोग व्यवस्था को नहीं देखते, वे एक पैरालाइज्‍ड जगत देख रहे हैं; एक पक्षाघात, एक लकवे से लगा हुआ जगत है उनका। इसलिए नास्तिक जिस जगत को देखता है, वह पैरालाइज्‍ड है। उसमें अंतर्व्यवस्था उसे दिखाई नहीं पड़ रही है। और ध्यान रहे, जिसका जगत पैरालाइज्‍ड है, वह खुद भी उसके साथ पैरालाइज्ज हो जाएगा। जिसका जगत एक मुर्दा जोड़ है, वह आदमी भी अपने भीतर एक मुर्दा जोड़ हो जाएगा। उसकी आत्मा बिखर जाएगी। जिसे इस जगत में आत्मा नहीं दिखाई पडती, उसे अपने भीतर भी आत्मा दिखाई नहीं पड़ेगी; क्योंकि तब वह भी एक वस्तुओं का जोड़ है।  अगर हम आदमी को काटें, तो यह बात सच है। अगर आदमी को तोड़े, तो यह बात सच है। हमें कहीं भी वह अंतर्व्यवस्था दिखाई नहीं पडेगी। वह अंतर्व्यवस्था अदृश्य है और इसलिए परमात्मा अदृश्य है।

पहली बात, परमात्मा से प्रयोजन है, इस सारे जगत के भीतर एक जीवंत जोड़ है। यहां एक पत्ता भी नहीं हिलता, जब तक कि पूरे जगत का उसे साथ न हो। यहां अगर मैं एक शब्द बोलता हूं, तो यह शब्द मैं ही नहीं बोलता, बोल नहीं सकता हूं; अलग, अकेला, अलग— थलग जगत से मैं नहीं हूं। एक शब्द भी यहां बोला जाएगा, बोला जा सकता है तभी, जब पूरे जगत का उसे सहयोग हो, जब पूरी अंतर्व्यवस्था साथ हो।आपकी आंख खुलेगी भी नहीं, अगर सूरज ढल जाए, समाप्त हो जाए। आपकी सांस चलेगी भी नहीं। अकर सूरज मर जाए। दस करोड़ मील दूर जो सूरज है, उसके साथ आपकी सांस जुड़ी है। जिस दिन सूरज समाप्त हो जाएगा, उस दिन हम समाप्‍त जायेंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा कि सूरज समाप्‍त हो गया। क्‍योंकि पता चलने के लिए भी हम बचेंगे नहीं। हमें कभी पता नहीं चलेगा कि सूरज समाप्त हो गया। क्‍योंकि सूरज समाप्‍त हुआ तत्क्षण हम समाप्त हो जाएंगे।

सारा जगत एक अंतर—संयोंग, एक अंतर—संबंध है। कहें कि जगत एक परिवार है।ईश्वर की मान्यता का अर्थ है जगत को एक परिवार के रूप में देखना। ईश्वर को इनकार करने का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति एटामिक हो गया, आणविक हो गया अब जगत एक परिवार नही है, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं है; और कहीं कोई संबंध नहीं है।

ध्यान रहे, मनुष्य की चेतना इसे स्वीकार नहीं करती है। परम नास्तिक भी अपने जीवन में व्यवस्था को खोजता है। और परम नास्तिक भी व्यवस्था की मांग करता है।

इसे हम दूसरे दरवाजे से भी चलें।

ऐसा अगर हो, मनुष्यता नष्ट हो जाए। कल कोई युद्ध हो—और अगर राजनीतिज्ञों की कृपा रही, तो होगा ही—मनुष्यता कल नष्ट हो जाए, आदमी समाप्त हो जाए, और फिर किसी अनजाने ग्रह से मनुष्यता के इस मरघट पर कोई यात्री उतरें। अगर उन्हें माइकलएंजलो के हाथ की बनी हुई कोई तस्वीर मिल जाए, तो वे क्या करें?

दो ही उपाय हैं। या तो वे सोचें कि किसी ने इसे बनाया होगा। क्योंकि इतने अनुपात में, इतने सुसंयोजन में, इतनी लयबद्ध, रंगों के साथ इतनी व्यवस्था, रूप का अवतरण, रंगों में निराकार की पकड—यह आकस्मिक नहीं हो सकती, कोइसिडेंटल नहीं हो सकती। ऐसा नहीं है कि रंग पड़ गए होंगे केनवस पर और यह चित्र बन गया होगा।

एक तो रास्ता यह है कि वे इस चित्र की व्यवस्था को देखकर सोचें कि किसी ने इसे निर्मित किया होगा। और दूसरा रास्ता यह है कि वे सोचें कि यह बन गई होगी।

लेकिन अगर एक चित्र हाथ में लगे, तो संयोग की बात भी हो सकती है। लेकिन फिर उन्हें मूर्तियां मिलें, खजुराहो के मंदिर मिलें, कि कोणार्क की मूर्तियां मिलें। और वे जमीन के कोने—कोने पर घूमते रहें और उन्हें अनेक यंत्र मिलें, और अनेक व्यवस्थाएं मिलें, तब भी अगर वे यही कहे चले जाएं कि यह संयोग की बात है! यह संयोग की बात है कि यह जो रेडियो का यंत्र पड़ा है, संयोग की बात है कि अनंत—अनंत काल में अनेक— अनेक चीजों के मिलने से निर्मित हो गया होगा।

लेकिन अगर एक रेडियो हो, तब भी यह संभव हो सकता है। जमीन पर बहुत रेडियो मिलें, रेल के इंजन मिलें, उजडे हुए कारखाने मिलें, जगह—जगह व्यवस्था के लक्षण मिलें, जगह—जगह बनाने वाले की खबर मिले, तब भी अगर वे यात्री जिद्द किए जाएं, तो वह जिद्द उनकी नासमझी होगी।

जमीन के इंच—इंच पर और प्रकृति के इंच—इंच पर और विश्व के इंच—इंच पर बनाने वाले की छाप है। यहां एक भी चीज निष्प्रयोजन नहीं मालूम पड़ती। और प्रत्येक चीज के भीतर एक गहन अनुपात है। अगर हम इनकार करे चले जाएं, तो हम अपने ही हाथ अपने को अंधा बनाते हैं।

देखें, चारों तरफ आंखें खोलकर देखें। बीज को बोते हैं जमीन में। बीज को तोड़कर देखें, तो वृक्ष का कोई नक्‍श दिखाई नहीं पड़ता, कोई बल्यू—प्रिंट दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन अब वैज्ञानिक मानते हैं कि बीज में ब्ल्यू—प्रिंट है ,— नहीं तो यह वृक्ष निकलेगा कैसे? एक छोटे—से बीज में तोड़कर देखने पर कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। लेकिन इस बीज को जमीन में बो देते हैं और वृक्ष अंकुरित होता है; हर कोई वृक्ष नहीं, एक विशिष्ट वृक्ष अंकुरित होता है। इस वृक्ष की शाखाएं हर वृक्ष जैसी नहीं होतीं। इसकी अपने ही ढंग की शाखाएं होंगी, अपने ही ढंग के पत्ते होंगे, अपने ही ढंग के फूल खिलेंगे। और आश्चर्य की बात यह है कि जब यह वृक्ष संपूर्ण होगा, तो जिस बीज को हमने बोया था, वही बीज करोड़ों होकर वापस निकल आएगा। हर कोई बीज नहीं, वही बीज करोड़ों होकर फिर प्रकट हो जाएगा!

एक बीज के भीतर भी ब्‍लू—प्रिंट है। एक बीज के भीतर भी व्यवस्था है। एक बीज के भीतर भी भविष्य की पूरी रूप—रेखा है। एक मां के पेट में बच्चे ने गर्भ लिया है। वह जो पहला अणु है बच्चे का, उसके भीतर पूरा का पूरा ब्‍लू—प्रिंट है। उस व्यक्ति का पूरा का पूरा जीवन विकसित होगा; उस सब की कहानी छिपी है।  उस सब के मूल निर्देश सूत्र छिपे हैं, सारे सुझाव छिपे हैं। और शरीर उन सारे सुझावों को मानकर चलेगा। उस व्यक्ति की आँख का रंग क्या होगा, यह उस छोटे—से अणु में छिपा है, जो खाली आंख से देखा नहीं जा सकता। उस व्यक्ति की कितनी बुद्धि होगी, कितनी मेधा होगी, कितना आई क्यू होगा, वह उस छोटे—से अणु में छिपा है। जिसको बुद्धि लाख उपाय करे, तो भी पता नहीं लगा पा सकती। वह व्यक्ति कितनी उम्र का हो सकेगा, कितनी उम्र का होकर मरेगा, उस व्यक्ति को कौन—सी खास बीमारियां हो सकती हैं, वह सब उस छोटे—से बीज में छिपा है।

अगर इतने छोटे—से बीज में यह वृक्ष का सारा बल्यू—प्रिंट छिपा होता है; अगर छोटे—से मनुष्य के अणु में, सेल में, उसके पूरे जीवन की कथा छिपी होती है। तो क्या यह सोचना गलत है कि इस पूरे जगत का भी कोई बल्यू—प्रिंट होना चाहिए? क्या यह सोचना गलत है कि इस सारे जगत की भी मूल व्यवस्था किसी अणु में छिपी हो गुड उस अणु का नाम ही परमात्मा है। यह जो इतना बड़ा विराट जगत है, इस सारे जगत के फैलाव की भी मूल व्यवस्था कहीं होनी चाहिए।

कृष्ण कहते हैं, मैं ही इसे सृजन करता और मैं ही फिर इसे अपने में लीन कर लेता हूं।

इसे समझें। एक बीज से वृक्ष निर्मित होता है और फिर वृक्ष पुन: बीजों में लीन हो जाता है। प्रथम और अंतिम क्षण सदा एक होते हैं। जहां से यात्रा शुरू होती है, वहीं यात्रा पूर्ण हो जाती है। बीज से शुरू होती है यात्रा, बीज पर समाप्त हो जाती है।

इस सारे विराट अस्तित्व को अगर हम एक इकाई मान लें, तो इस इकाई का भी मूल कहीं छिपा होना चाहिए। लेकिन हम बीज को तोड़ते हैं, तो वृक्ष नहीं मिलता। और अगर हम आदमी के अणु को तोड़े, उसके सेल को, कोष्ठ को तोड़े, तो भी उसमें आदमी नहीं मिलता। तो एक बात साफ होती है कि बीज में वृक्ष छिपा है, लेकिन किसी अदृश्य ढंग से; किसी ऐसे ढंग से कि जब तक प्रकट न हो जाए तब तक उसका पता ही नहीं चलता।

ईश्वर का भी पता हमें तभी चलना शुरू होता है, जब किन्हीं अर्थों में वह हमारे लिए प्रकट होने लगता है। तब तक पता नहीं चलता। इसलिए सैद्धांतिक रूप से अगर भी ले कि जगत में ईश्वर है, तब भी उसका कोई प्रयोजन नहीं जब तक कि वह प्रकट न होने लगे; वह अदृश्य हमें दिखाई न पड़ने लगे। उस बीज में से वृक्ष निकलने न लगे, फूल न खिलने लगें, तब तक हमें उसका पूरा एहसास, उसकी पूरी प्रतीति नहीं होती।

लेकिन यह धारणा उपयोगी है, क्योंकि यह धारणा हो, तो उस प्रतीति की तरफ चलने में आसानी हो जाती है। और हम उसी तरफ यात्रा कर पाते हैं, जिस दिशा को हम अपने संकल्प में उन्मूक्त कर लेते हैं। जिस दिशा को हम बंद कर देते हैं, उस तरफ यात्रा कठिन हो जाती है।

 मनुष्य का पूरा जीवन एक गहन तीव्र इच्छा है। तो जिस दिशा में मनुष्य अपनी गहन तीव्र इच्छा को लगा देता है, वही दिशा खुल जाती है, और जिस दिशा से अपनी इच्छा को खींच लेता है, वही बंद हो जाती है।

तो अगर एक चित्रकार चित्रकार होना चाहता है, तो अपने समस्त प्राणों की ऊर्जा को उस दिशा में संलग्न कर देता है। एक मूर्तिकार मूर्तिकार होना चाहता है, एक वैज्ञानिक वैज्ञानिक होना चाहता है। लेकिन अगर आप कुछ भी नहीं होना चाहते, तो आप ध्यान रखिए, आप कुछ भी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि आप किसी भी यात्रा पर अपनी चेतना को संगृहीत करके गतिमान नहीं कर पाते। आपके भीतर इनटेशनलिटी, आपके भीतर संकल्प का आविर्भाव ही नहीं हो पाता। तो आप एक लोच—पोच व्यक्ति होते हैं, जिसके भीतर कोई केंद्र नहीं होता। बिना रीढ़ की, जैसे कोई शरीर हो बिना रीढ़ की हड्डी का, वैसी आपकी आत्मा होती है बिना रीढ़ की।

यह जगत भी अपने समस्त रूपों में एक गहन इच्छा की सूचना देता है। यहां कोई भी चीज अकारण होती मालूम नहीं हो रही है। यहां प्रत्येक चीज विकासमान होती मालूम पड़ती है।

असल में विकास के कारण ही पता चलता है कि जगत में परमात्मा है। विकास के कारण ही पता चलता है कि जगत किसी गहन इच्छा से प्रभावित होकर गतिमान हो रहा है। जगत ठहरा हुआ नहीं है, स्‍टैटिक नहीं है डायनैमिक है। यहां प्रत्येक चीज बढ़ रही है, और प्रत्येक चीज ऊपर उठ रही है। चीजें ठहरी हुई नहीं हैं, चीजों के तल रूपांतरित हो रहे हैं। और यह जो विकास है, इररिवर्सिबल है, यह पीछे गिर नहीं जाता। एक बच्चे को हम दुबारा बच्चा कभी नहीं बना सकते। कोई उपाय नहीं है। क्योंकि विकास सुनिश्चित रूप से उसकी आत्मा का हिस्सा हो जाता है।

आप जो भी जान लेते हैं, उसे फिर भुलाया नहीं जा सकता। आपने जो भी जान लिया, उसे फिर मिटाया नहीं जा सकता। क्योंकि वह आपकी आत्मा का सुनिश्चित हिस्सा हो गया। वह आपकी आत्मा बन गई। इसलिए इस जगत में जो भी हम हो जाते हैं, उससे नीचे नहीं गिर सकते।

अगर यह संयोग मात्र है, तो ठीक है। एक का किसी दिन सुबह उठकर पाए कि बच्चा हो गया! एक इतनी सुबह उठे और पाए कि सब अंधकार हो गया; अज्ञान ही अज्ञान छा गया! एक मूर्तिकार सुबह उठकर पाए कि उसकी छेनी—हथौड़ी को हाथ पकड़ नहीं रहे, हाथ छूट गए हैं! उसे कुछ खयाल ही नहीं आता कि कल वह क्या था!

नहीं, हमारा आज हमारे समस्त कल और अतीत के ज्ञान और अनुभव को अपने में समा लेता है, निविष्ट कर लेता है। न केवल अतीत को निविष्ट कर लेता है, बल्कि भविष्य की तरफ पंखों को भी फैला देता है।

जगत एक सुनिश्चित विकास है। अगर जगत विकास है, तो उसका अर्थ है कि वह कहीं पहुंचना चाह रहा है। विकास का अर्थ होता है, कहीं पहुंचना। जीवन कहीं पहुंचना चाह रहा है। जीवन किसी यात्रा पर है। कोई गंतव्य है, कोई मंजिल है, जिसकी तलाश है। हम यूं ही नहीं भटक रहे हैं। हम कहीं जा रहे हैं। जाने— अनजाने, पहचानते हों, न पहचानते हों, हमारा प्रत्येक कृत्य हमें विकसित करने की दिशा में संलग्न है।

और ध्यान रहे, हमारे जीवन में जब भी आनंद के क्षण होते हैं, तो वे वे ही क्षण होते हैं, जब हम कोई विकास का कदम लेते हैं। जब भी हमारी चेतना किसी नए चरण को उठाती है, तभी आनंद से भर जाती है। और जब भी हमारी चेतना ठहर जाती है, अवरुद्ध हो जाती है, उसकी गति खो जाती है और कहीं चलने को मार्ग नहीं मिलता, तभी दुख, तभी पीड़ा, तभी परतंत्रता, तभी बंधन का अनुभव होता है। मुक्ति का अनुभव होता है विकास के चरण में।

जब बच्चा पहली दफा जमीन पर चलना शुरू करता है, तब आपने उसकी प्रफुल्लता देखी है? जब वह पहली दफा पैर रखता है जमीन पर, और पहली दफा डुलता हुआ, कंपता हुआ, घबड़ाया हुआ, भयभीत, झिझकता हुआ, पहला कदम उठाता है, और जब पाता है कि कदम सम्हल गया और जमीन पर वह खड़े होने में समर्थ है, तो आपको पता होना चाहिए विकास का एक बहुत बड़ा कदम उठ गया है। यह सिर्फ पैर चलना हीं नहीं है, आत्मा को एक नया भरोसा मिला, आत्मा को एक नई श्रद्धा मिली; आत्मा ने पहली दफा अपनी शक्ति को पहचाना। अब यह बच्चा दुबारा वही नहीं हो सकेगा, जो यह घुटने के बल चलकर होता था। अब यह दुबारा वही नहीं हो सकेगा। अब यह सारी दुनिया भी इसको घुटने के बल झुकाने में असमर्थ हो जाएगी। एक बड़ी ऊर्जा का जन्म हो गया।

इसलिए जब कोई हार जाता है, तो हम कहते हैं, उसने घुटने टेक दिए। घुटने टेकना हारने का प्रतीक हो जाता है। लेकिन कल तक यह बच्चा घुटने टेककर चल रहा था। इसे पता ही नहीं था कि मैं क्या हो सकता हूं मैं भी खड़ा हो सकता हूं, अपने ही बल मैं भी चल सकता हूं। यह दुनिया की पूरी की पूरी ताकत, सारी दुनिया की शक्ति भी चेष्टा करे, तो मुझे गिरा नहीं पाएगी।

इस बच्चे के भीतर इनटेशनलिटी, एक तीव्र इच्छा का जन्म हो गया। जिस दिन यह बच्चा पहली बार बोलता है और पहला शब्द निकलता है इसका—तुतलाता हुआ, डांवाडोल, डरा हुआ—उस दिन इसके भीतर एक नया कदम हो गया। जिस दिन बच्चा पहली बार बोलता है, उसकी प्रफुल्लता का अंत नहीं है। अपने को अभिव्यक्त करने की आत्मा ने सामर्थ्य जुटा ली।

इसलिए बच्चे अक्सर एक ही शब्द को—जब वे बोलना शुरू करते है—तो दिनभर दोहराते हैं। हम समझते हैं कि सिर खा रहे हैं, परेशान कर रहे हैं, वे केवल अभ्यास कर रहे हैं अपनी स्वतंत्रता का। वह जो उन्हें अभिव्यक्ति मिली है, वे बार—बार उसको छूकर देख रहे हैं कि ही मैं बोल सकता हूं! अब मैं वही नहीं हूं—मौन, बंद। अब मेरी आत्मा मुझसे बाहर जा सकती है।  अब मैं दूसरे आदमी से कुछ कह सकता हूं। अब मैं अपने में बंद कारागृह नहीं हूं। मेरे द्वार खुल गए!

वह बच्चा सिर्फ अभ्यास कर रहा है। अभ्यास ही नहीं कर रहा है, वह बार—बार मजा ले रहा है। वह जिस शब्द को बोल सकता है, उसे बोलकर वह बार—बार मजा ले रहा है। वह कह रहा है कि ठीक! अब यह बच्चा दुबारा वही नहीं हो सकता, जो यह एक शब्द बोलने के पहले था। एक नई दुनिया में यात्रा शुरू हो गई। विकास का एक चरण हुआ।

न केवल हम ठहरे हुए ही नहीं हैं, हम प्रतिपल विकासमान हैं। और एक—एक व्यक्ति ही नहीं, पूरा जगत विकासमान है। यह जो विकास की अनंत धारा है, अगर है, तो ही जगत में ईश्वर है। क्योंकि ईश्वर का अर्थ है ,वह अंतिम बिंदु है विकास का। विकास की अंतिम संभावना, विकास का जो अंतिम रूप है, विकास की जो हम कल्पना कर सकते हैं, वह ईश्वर है।

ईश्वर का अर्थ है कि यह जगत किसी एक सुनिश्चित बिंदु की तरफ यात्रा कर रहा है। कितना ही हम भटकते हों, और कितना ही मार्ग से च्युत हो जाते हों, और कितने ही गिरते हों, कितने ही खाई—खड्ड हों, लेकिन इन सारे खाई—खड्डों, इन सारी गिर जाने की संभावनाओं के बावजूद भी हम उठते हैं, बढ़ते हैं; और कोई दिशा है, जहां हम खिंचे चले जा रहे हैं। आदमी की चेतना विकसित होती चली जा रही है।

इसे हम ऐसा समझें। अस्तित्व, जो है हमारे चारों तरफ, उसका नाम है। अस्तित्व से भी महत्वपूर्ण और कीमती, और अस्तित्व में जो केंद्रीय है, वह है जीवन। लाइफ इज सेंट्रल इन एक्सिस्टेंस। क्यों?

एक पत्थर पड़ा है, पत्थर कितना ही खूबसूरत हो; और पास में एक फूल खिल रहा है, और फूल कितना ही बदसूरत हो, तो भी फूल पत्थर से कीमती है। क्यों? फूल विकासमान है, फूल जीवंत है, पत्थर मुर्दा है। फूल बढ़ रहा है। पत्थर की कोई संभावना नहीं है, फूल की संभावना है। पत्थर कल भी पत्थर रहेगा; फूल आज कली है, कल खिलेगा। फूल विकासमान है, डायनैमिक है।

अस्तित्व का जो केंद्र है, वह जीवन है। कहें हम ऐसा कि अस्तित्व जीवन के लिए है। एक्सिस्टेंस इज फार लाइफ। अस्तित्व का अंत है जीवन। अस्तित्व का लक्ष्य है जीवन। लेकिन जीवन भी किसी के लिए है। जीवन में अगर हम खोजें कि क्या है केंद्रीय, तो हम पाएंगे, चिंतन, मनन, विचार, मन।

जैसे अस्तित्व का केंद्र है जीवन, ऐसे जीवन का केंद्र है विचार। इसलिए एक फूल खिल रहा है, कितना ही खूबसूरत हो; और एक मोर नाच रहा है, कितना ही सुन्दर उसका नृत्य हो; लेकिन एक छोटा—सा मूढ़ बच्चा भी उसके पास बैठा है तो यह बच्चा ज्यादा मूल्यवान है। यह बच्चा कुरूप हो, तो भी फूल से ज्यादा मूल्यवान है। और यह बच्चा बिलकुल मूढ़ हो, तो भी मोर से ज्यादा मूल्यवान है! क्यों? क्योंकि इस बच्चे के पास एक भीतरी संभावना है, जो फूल के पास और मोर के पास नहीं है। इस बच्चे के पास भीतर एक मन की संभावना है, कितनी ही छोटी, लेकिन एक और नई संभावना का द्वार खुल गया है। यह विकास के  ऊपर के एक तल पर खड़ा हो गया है।

पत्थर पड़ा है। पत्थर से फूल एक कदम ऊपर है; विकासमान है। फूल से यह बच्चा एक कदम ऊपर है, क्योंकि यह विकासमान ही नहीं है, यह मनन की क्षमता से भी भरा है; यह सोच भी सकता है।  मन जीवन का केंद्र है। लेकिन मन कितना ही विकसित हो, एक आइंस्टीन बैठा हो, जिसके पास विकसित से विकसित मन है, जिसने जगत को कीमती सिद्धात दिए, शक्ति दी, विज्ञान दिया। लेकिन पास में ही एक साधारण—सा मनुष्य बैठा हो ध्यान में लीन, तो आइंस्टीन से ज्यादा कीमती है। एक साधारण—सा व्यक्ति ध्यान में लीन बैठा हो, तो आइंस्टीन से ज्यादा कीमती है।

क्यों? क्योंकि उसने और एक नया चरण पूरा किया। अब वह मन में ही नहीं जीता, मन को भी शांत करने पर, विचार के भी खो जाने पर जो चेतना शेष रह जाती है, उसमें जीता है।

मन का भी केंद्र चैतन्य है। चैतन्य शिखर है। अस्तित्व आधार है, चैतन्य शिखर है। लेकिन चैतन्य का भी प्रयोजन क्या? एक आदमी बैठा है शांत, मन के विचार खो गए, अशांति खो गई, सब खो गया। शांत है बिलकुल। चेतना से भरा है। लेकिन उसके पास ही एक दूसरा आदमी बैठा है, जो सिर्फ शांत ही नहीं है—मात्र शांति निषेध है, नकार है, अभाव है—जो केवल शांत ही नहीं है, जो परमात्मा के अनुभव से नाच उठा है।

गॉड इज सेंट्रल टु कांशसनेस। अकेले शांत हो जाना निषेध है। मन तो खो गया, लेकिन नया कुछ अवतरित नहीं हुआ है। लेकिन चेतना जब परमात्मा से भर जाए और चेतना जब दिव्यता से भर जाए तो अब एक नया रंग, एक नया आनंद, एक एक्सटैसी, एक वर्षा अमृत की हो गई है। यह शिखरों में भी शिखर है।

ये पांच—अस्तित्व, जीवन, मन, ध्यान, परमात्मा। और समझ में आने की बात होगी, आसान हो जाएगा—अगर परमात्मा पीक है, शिखर है हमारा सबका, हमारे अस्तित्व का, तो जो अंत में प्रकट होता है, वह पहले ही मौजूद होना चाहिए, अन्यथा प्रकट नहीं हो सकता। इसे थोड़ा समझना कठिन होगा।

लेकिन अंत में वही प्रकट होता है, जो प्रथम में मौजूद होता है, यह जीवन के शाश्वत नियमों में एक है। अगर फूल में से अंत में बीज निकलते हैं, बीज से अंत में बीज निकलते हैं, वृक्ष से अंत में बीज निकलते हैं, तो वे बीज खबर देते हैं कि प्रथम में भी बीज ही रहा होगा।

आपने या माली ने एक पौधा लगाया। यह माली मर जाएगा। इसके बेटे इस वृक्ष में आए हुए बीजों को बटोरेंगे। फिर भी वे कह सकते हैं कि बीज चूंकि अंतिम है, इसलिए बीज प्रथम में भी रहे होंगे। क्योंकि अंतिम वही होता है, जो प्रथम में मौजूद था। अंत में वही तो प्रकट होता है, जो पहले से छिपा था। अंत प्रथम की अभिव्यक्ति है।

वह जो पहला है, वही अंतिम है। तो अगर ईश्वर जीवन की परम शिखर अनुभूति है, तो निश्चित ही वह प्रथम भी मौजूद होगी। इसलिए कृष्ण के इस सूत्र को अब हम समझें, तो आसानी हो जाएगी।

कहते हैं, कल्प के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। वे यह कह रहे हैं कि कल्प के अंत में सभी कुछ अंतत: ईश्वरीय हो जाता है। अंत में—अंत का अर्थ है, यह परम जो स्थिति होगी विकास होते—होते, यात्रा चलते—चलते, जो आखिरी मंदिर आएगा, उसमें पत्थर भी, प्राण भी, सभी कुछ मुझ में लीन हो जाता है। क्योंकि मैं ही प्रथम और मैं ही अंतिम हूं। कल्प के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात मेरी प्रकृति में लय हो जाते हैं। मेरा जो स्वभाव है, मेरा जो होना है, मेरा जो अस्तित्व है, अंत में सभी कुछ उसमें लीन हो जाता है।

इसलिए कल्प को दो तरह से देखें। उसको सिर्फ अंत ही न समझें, उसे लक्ष्य भी समझें। वह दोहरे अर्थों में अंत है। वह समाप्ति भी है, वह पूर्णता भी। और हर पूर्णता समाप्ति होती है। हर समाप्ति पूर्णता नहीं होती, लेकिन हर पूर्णता समाप्ति होती है।

जब सारा जीवन विकसित होकर प्रभु के पास पहुंच जाता है, तो जगत तिरोहित हो जाता है, सिर्फ परमात्मा—चेतना शेष रह जाती है। यह एक कल्प का अंत है।

कृष्ण कहते हैं, और कल्प के प्रारंभ में मैं उनको फिर रचता हूं; फिर उनका निर्माण करता हूं।

ध्यान रहे, यह निर्माण भी विकास की यात्रा है। यह निर्माण भी फिर पुराने जैसा नहीं होता। यह निर्माण भी और एक अगला कदम है। यह फिर से निर्माण, फिर एक अगला कदम है।

अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को अंगीकार करके, स्वभाव के वश से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूत समुदाय को बारंबार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूं।

और जो भी रचना घटित होती है, कृष्ण कह रहे हैं, वह रचना प्रत्येक के कर्मानुसार घटित होती है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जो करता है, वैसा ही हो जाता है। और प्रत्येक भूत समुदाय जो—जो करके गुजरता है, वही करना उसकी आत्मा बनती चली जाती है। और वही आत्मा उसके नए जन्म का रूप देती है। वही आत्मा, वही कर्मों का समुच्चित रूप उसके नए जन्म का ब्‍लू—प्रिंट है। न केवल व्यक्ति के लिए, वरन समस्त जगत के लिए भी।

यह समस्त जगत जब पुन: निर्मित होगा, तो इस जगत ने जो भी किया, जो भी पाया, जो भी अनुभव, जो भी यात्रा का फल, वह सब का सब पुन: बीज बन जाता है।

जब एक वृक्ष में बीज लगते हैं, तो क्या होता है? वृक्ष का सारा अनुभव, वृक्ष की सारी यात्रा, वृक्ष का सारा जीवन बीज में पुन: प्रविष्ट हो जाता है। सार में, इसेंस में सब बीज में छिप जाता है। फिर बीज जमीन में पड़ता है। फिर वृक्ष का जन्म होता है।

इस संबंध में एक बात और समझ लेनी जरूरी है कि भारतीय, हिंदू चिंतन जगत को एक वर्तुलाकार यात्रा मानता है। 

अब यह आश्चर्य की बात है कि हिंदू चिंतन की जो धारणा है, वही वैज्ञानिक है; क्योंकि इस जगत में कोई भी गति सीधी नहीं होती। तो समय की भी होने का कोई कारण नहीं है। इस जगत में समस्त गतियां सर्कुलर हैं। चाहे जमीन सूरज का चक्कर लगाती हो, और चाहे सूरज महासूर्यों का चक्कर लगाता हो, चाहे यह आकाश के इतने अनंत—अनंत तारे चक्कर लगाते हैं किसी धुरी का, चाहे एक परमाणु को हम तोड़े, तो परमाणु के जो इलेक्ट्रान और न्‍यूट्रान हैं, वे चक्कर लगाते हैं। जहां भी गति है, गति सर्कुलर है।

और अब तक जगत में ऐसी कोई गति नहीं मिली है, जो लीनियर हो, जो रेखाबद्ध हो। समय की गति तो देखी नहीं जा सकती, समय को पकड़ा नहीं जा सकता। अगर समय की गति पकड़कर हम नाप—जोख करते, तो तय हो जाता कि ईसाई जैसा सोचते हैं, वह सही है; या हिंदू जैसा सोचते हैं, वह सही है! लेकिन समय को तो पकड़ा नहीं जा सकता, समय को देखा नहीं जा सकता, फिर कैसे तय करें?

तो हिंदू का चिंतन गहरा मालूम पड़ता है। वह कहता है, तुम मुझे कोई एकाध भी ऐसी गति बता दो, जो पकड़ी जा सकती हो, जो सीधी हो, रेखाबद्ध हो। जितनी गतिया मनुष्य को पता हैं, सभी वर्तुल हैं। तो हिंदू कहता है, फिर जो गति हमें दिखाई नहीं पड़ती, ज्यादा उचित है कि हम मानें, वह भी वर्तुल होगी। कोई कारण नहीं है उसके रेखाबद्ध होने का। हिंदू मानता है कि गति मात्र वर्तुलाकार है।

बच्चा है, यह वर्तुल का पहला बिंदु है। इसलिए अक्सर बुजुर्ग जो हैं, फिर बच्चों जैसे हो जाते हैं—जैसे। बच्चे नहीं हो जाते, बच्चों जैसे हो जाते हैं—निरीह, असहाय—पुन:। एक वर्तुल पूरा हुआ। हिंदू कहता है कि बच्चे और बुजुर्ग के बीच सीधी रेखा नहीं है, वर्तुलाकार है। इसलिए पैंतीस साल के करीब आदमी वर्तुल के शिखर पर होता है, फिर गिरना शुरू हो जाता है। फिर वापस आने लगा। कब्र में पहुंचते—पहुंचते वह वहीं पहुंच जाता है, जहां अपने घर के झूले में था—वापस। और अगर हम गौर से देखें, तो दिखाई पड़ेगा कि का धीरे— धीरे, धीरे— धीरे बच्चे जैसा निरीह होता चला जाता है; बच्चे से भी ज्यादा निरीह। क्योंकि बच्चे पर तो कोई दया भी करता था। अब उस पर कोई दया करने वाला भी नहीं मिलता। क्योंकि लोग समझते हैं, वह बुजुर्ग है, उस पर क्या दया करनी! इसलिए भारत ने जो खयाल दुनिया को दिया था कि बच्चे से भी ज्यादा चिंता वृद्ध की करना, उसके पीछे कारण था। उसके पीछे कारण था कि वृद्ध दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन वह बच्चे जैसा हो गया है। बच्चे को हम माफ कर देते हैं, अगर वह नाराज हो। बुजुर्ग को हम माफ नहीं कर पाते, अगर वह नाराज हो।

लेकिन भारत की बहुत गहरी समझ थी, और वह यह थी कि बच्चे को तुम चाहे माफ मत भी करना, क्योंकि अभी बच्चे को कुछ पता भी नहीं है कि माफ किया जाता है कि नहीं किया जाता है, लेकिन बुजुर्ग को तो बिलकुल माफ कर देना। माफ ही मत कर देना, मान लेना कि वही ठीक है, तुम गलत हो। क्‍योंकि उसे भी खयाल है कि वह बुजुर्ग है, लेकिन उसकी प्रकृति उसे बिलकुल बच्चे जैसी हो गई है। वर्तुल पूरा हो गया है। वह बच्चे ही जैसी नासमझिया करेगा, लेकिन समझदारी के खयाल के साथ करेगा।

इसलिए बुजुर्ग कठिन हो जाता है। बच्चे जैसी ही नासमझिया करेगा। बच्चे जैसी ही जिद्द के आदमी में वापस लौट आती है। वैसा ही हठधर्मीपन आ जाता है। और एक और खतरा साथ हो गया होता है, क्योंकि उसे खयाल होता है कि वह बच्चा नहीं है। तो बुजुर्ग निरंतर कहते हैं कि मैं कोई बच्चा नहीं हूं। उसे खयाल यह होता है कि वह बुजुर्ग है; उसे सारे जीवन का अनुभव है। और उसे पता नहीं कि प्रकृति उसे वापस वर्तुल की पूर्णता की स्थिति पर ले आई है। क्योंकि मृत्यु वहीं होती है, जहां जन्म होता है। वह बिंदु बिलकुल एक है। इसलिए वापस प्रकृति उसको ला रही है। मगर अनुभव, मन, स्मृति, उसे कहती है, वह सब जानता है, और व्यवहार वह ऐसा करता है, जैसे कुछ न जानता हो।

तो उसका व्यवहार उसके ही बच्चों को अखरने लगता है। उसके बच्चों को लगता है कि काम तो ऐसे करते हो, जैसे कुछ न जानते हो। और बातें ऐसी करते हो, जैसे सब जानते हो! इसलिए बच्चों को भी सहना मुश्किल हो जाता है।

लेकिन भारत की समझ थी कि बूढ़े के साथ ऐसे ही व्यवहार करना जैसे वह बच्चा है। उसकी हठधर्मी सही है। वह गलत हो, इससे कोई चिंता मत करना। वह ठीक हो कि गलत हो, हमेशा उसे ठीक मान लेना। वह गलत भी करे, तो भी उसके चरणों में सिर रख देना। वह वापस लौटता हुआ वर्तुल है। बच्चे से ज्यादा दयनीय है। बच्चे में तो अभी शक्ति जगेगी। अभी तो बच्चा शक्ति का स्रोत है। बुजुर्ग तो चुक गया। उसकी शक्ति खो गई। इसलिए पूरब ने बूढ़े को जो आदर दिया है, उसके पीछे बड़ी सूझ है, खयाल है, कारण है। सारी गतियां वहीं शुरू होती हैं, वहीं अंत होती हैं।

कृष्ण कहते हैं, सब मुझमें लीन हो जाता है और फिर मुझसे पुन: रचा जाता है। यह रचना जगत के कर्मानुसार, भूतों के कर्मानुसार घटित होती है।

इस संबंध में भी पूर्वीय चिंतन अति वैज्ञानिक है। क्योंकि पूरब मानता है, अकारण कुछ भी घटित नहीं होता। जो भी होगा, वह कारण से बंधा होगा। अगर इस पूरे जगत को हम एक व्यक्ति मान लें, तो इस पूरे जगत के एक कल्प का जो कर्म होगा, वही कर्म इसके नए कल्प की शुरुआत होगी। यह विशाल है बात, और मस्तिष्क पकड़ नहीं पाएगा। लेकिन बूंद को भी समझ लें, तो सागर समझ में आ जाता है।

आप आज जो भी हैं, वह आपके समस्त कालों का जोड़ है। और कल आप जो होंगे, उसमें आज और जुड़ जाएगा। आप जो बोलेंगे, जो सोचेंगे, जो होंगे, जो व्यवहार करेंगे, जो करेंगे और जो नहीं करेंगे, वह भी—वह आपके समस्त सार से निकलेगा। आपके पूरे जीवन के कर्मों के सार से निकलेगा। एक अर्थ में यह  स्वचालित व्यवस्था है। इससे अन्यथा होने का कोई उपाय नहीं है। अगर हम इस सारी बात को, पूरे जगत को एक व्यक्ति मान ले, तो पूरे जगत में भी ऐसा ही घटित होगा।

हे अर्जुन, उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित रहते हुए वे कर्म मुझे नहीं बांधते हैं।

यह अंतिम सूत्र खयाल में ले लेने जैसा है। क्योंकि यह सवाल उठ सकता है कि अगर व्यक्ति कर्म करता है, तो अपने कर्मों से बंध जाता है, और अगर परमात्मा भी जगत को रचता है, बनाता है, मिटाता है, सम्हालता है, तो क्या ये कर्म उसे नहीं बांधते होंगे? क्या ये कर्म उसका बंधन न बन जाते होंगे? क्या ये कर्म फिर उसके लिए भी कारागृह निर्माण न करते होंगे? अगर व्यक्ति बंध जाता है, तो होगा वह महाव्यक्ति, लेकिन उसके महाकर्म भी तो उसे बांधने वाले सिद्ध होंगे।

इसलिए कृष्ण ने कहा है कि यह सब करता हूं, अनासक्त। किस कर्म में व्यक्ति अनासक्त रह सकता है? सिर्फ व्यक्ति खेल में अनासक्त रह सकता है, बाकी सभी कर्मों में आसक्त हो जाता है। सिर्फ खेल में अनासक्त रह सकता है। हम तो खेल में भी नहीं रह सकते हैं। क्योंकि हमारे लिए खेल भी कर्म बन जाता है। अगर दो आदमियों को ताश खेलते देखें, तो उनके माथे पर ऐसी सिकुड़ने पड़ी होती हैं, जैसे जीवन—मरण का सवाल है। दो आदमियों को शतरंज खेलते देखें, तो जैसे इसी खेल पर सब कुछ निर्भर है। इस जगत का पूरा भविष्य, इनके इस खेल पर निर्भर है! यह जो शतरंज के सिपाहियों को यहा से वहा उठाकर रख रहे हैं, सारे प्राण उनके खिंचे हैं! उनका ब्लड प्रेशर नापे, बढ़ जाएगा। उनकी छाती की धड़कन बढ़ जाएगी। उनका एक घोड़ा मरेगा, कि एक हाथी मरेगा, तो न मालूम कितनी पीड़ा और कितना क्या हो जाएगा!

इस शतरंज के खेल पर बैठा हुआ आदमी भी खेल में नहीं है। यह भी कर्म हो गया! और अगर हार जाएगा, तो रातभर सो नहीं सकेगा। रातभर शतरंज चलती रहेगी। फिर रखता रहेगा, सोचता रहेगा। शतरंज के जो बड़े खिलाड़ी हैं, वे कहते हैं कि शतरंज में वही जीत सकता है, जो पांचवीं चाल तक को पहले से सोच ले—पांचवीं चाल! अभी मैं यह चलूंगा, यह उत्तर आएगा; तब मैं यह चलूंगा, तब यह उत्तर आएगा। ऐसे पांच को जो पहले से सोच ले, वही शतरंज में कुशल हो सकता है।

निश्चित ही है, कुशल शतरंज में होगा कि नहीं होगा, एक बात पक्की है, पागल हो जाएगा।

शतरंज भी आदमी खेलता है, तो भारी तनाव! और अगर तनाव न हो, दो आदमी ताश खेलते हों, तनाव ज्यादा न रहा हो, तो खीसे से कुछ निकालकर दाव पर लगा लेते हैं। क्योंकि ये रुपए जो हैं, ये तत्काल किसी भी खेल को काम में परिवर्तित कर देते हैं। तो थोड़ा आदमी दाव लगा लेता है। थोड़ा ही सही, तो फिर खेल में रस आ जाता है।

रस क्यों आ जाता है खेल में? खेल में रस ही नहीं है आपको, जब तक कि कर्म न बन जाए। जब तक आसक्ति न बने, तब तक रस नहीं है। रुपए के साथ जुड़ते ही आसक्ति जुड़ जाती है। रुपया सेतु का काम कर जाता है। अनासक्त कर्म तो एक ही हो सकता है, जैसे छोटे बच्चे खेलते हैं।

बुद्ध ने कहा है कि गुजरता था एक नदी के किनारे से। बच्चों को रेत के घर बनाते देखा, रुककर खड़ा हो गया। इसलिए खड़ा हो गया कि बच्चे भी रेत के घर बनाते हैं और बुजुर्ग भी। थोड़ा इनके खेल को देख लूं। रेत के ही घर थे। हवा का झोंका आता, कोई घर खिसक जाता। किसी बच्चे का धक्का लग जाता, किसी का घर गिर जाता। किसी का पैर पड़ जाता, किसी का बना—बनाया महल जमीन पर हो जाता। बच्चे लड़ते, गाली देते, एक—दूसरे को मारते। किसी ने किसी का घर गिरा दिया हो, तो झगड़ा तो सुनिश्चित है। सारे झगड़े ही घरों के हैं। किसी का धक्का लग गया, किसी का घर गिर गया। किसी ने बड़ी मुश्किल से तो आकाश तक पहुंचाने की कोशिश की थी; और किसी ने चोट मार दी, और सब जमीन पर गिर गया!

तो बुद्ध खड़े होकर देखते रहे। बच्चे एक—दूसरे से लड़ते रहे। झगड़ा होता रहा। फिर सांझ होने लगी। फिर सूरज ढलने लगा। फिर किसी ने नदी के किनारे आकर जोर से आवाज लगाई कि तुम्हारी माताएं तुम्हारी घर राह देख रही हैं; अब घर जाओ! जैसे ही बच्चों ने यह सुना, अपने ही बनाए हुए घरों पर कूद—फांद करके, उनको गिराकर, वे घर की तरफ चल पड़े।

बुद्ध खड़े थे, देखते रहे। उन्होंने कहा, जिस दिन हम अपने सारे जीवन को रेत के खेल जैसा समझ लें, और जिस दिन खयाल हमें आ जाए कि अब यह खेल समाप्त हुआ, पुकार आ गई वहां से असली घर की, अब उस तरफ चलें, तो उस दिन हम भी इनको गिराकर इसी तरह चले जाएंगे। अभी लड़ रहे थे कि मेरे घर को गिरा दिया, अब खुद ही गिराकर भाग गए हैं!

बच्चे जैसे रेत के घर बनाकर खेल खेल रहे हों, वैसे ही जब कोई व्यक्ति जीवन को खेल बना ले, तो अनासक्त हो जाता है। परमात्मा के लिए जीवन एक खेल है।

ध्यान रहे, इसलिए हमने जो शब्द प्रयोग किया है, वह है, लीला। 

पृथ्वी पर किसी दूसरे धर्म ने जगत के निर्माण को लीला नहीं कहा है। ईसाई ईश्वर अति गंभीर है। इसलिए छ: दिन में उसने इतना कठिन काम किया कि सातवें दिन विश्राम किया। ईसाई ईश्वर की धारणा है कि संडे जो है, वह विश्राम का दिन है। इसलिए हाली—डे है, इसलिए छुट्टी है। क्योंकि छ: दिन में ईश्वर ने दुनिया बनाई, फिर वह इतना थक गया, इतना परेशान हो गया कि सातवें दिन उसने विश्राम किया। वह सातवें दिन इसीलिए ईसाई अभी भी काम करना पसंद नहीं करता। कि जब भगवान तक सातवें दिन काम नहीं करता, तो हमें तो करना ही नहीं चाहिए!

लेकिन ईसाई जो धारणा है ईश्वर की, वह बहुत सीरियस है, गंभीर है। तभी तो थक गया। और ये कृष्ण कभी नहीं कहेंगे कि मैं थकता हूं। ये कहते हैं, कल्पों के बाद भी मैं हूं। फिर सब मुझ में लीन हो जाते हैं, मैं फिर रचता हूं। ये फिर मुझ में लीन हो जाते हैं, मैं फिर रचता हूं। इसका कोई हिसाब नहीं है। ये थकते ही नहीं। इन्होंने कोई हाली—डे नहीं मनाया। इसका कुछ कारण होगा। ये बहुत गंभीर नहीं मालूम पड़ते, नहीं तो थक जाते।

हिंदू धारणा ईश्वर की, गंभीर धारणा नहीं है। बहुत प्रफुल्लित, बहुत खेल जैसी धारणा है। इसलिए हमने जगत को लीला कहा है। लीला अनूठा शब्द है। दुनिया की किसी भाषा में इसका अनुवाद नहीं किया जा सकता। क्योंकि अगर हम कहें प्ले, तो वह खेल का अनुवाद है। लीला परमात्मा के खेल का नाम है। और दुनिया में किसी धर्म ने चूंकि परमात्मा को कभी खेल के रूप में देखा नहीं, इसलिए लीला जैसा किसी भाषा में कोई शब्द नहीं है। लीला अनूठे रूप से भारतीय शब्द है। इसका कोई उपाय नहीं है। अगर हमें करना भी हो कोशिश, तो उसको डिवाइन प्ले। लेकिन वह शब्द नहीं बनते।

लीला काफी है। उसमें ईश्वर को जोड़ना नहीं पड़ता। लीला शब्द पर्याप्त है। उसका मतलब यह है कि यह सारा का सारा जो सृजन है, यह कोई गंभीर कृत्य नहीं है। यह एक आनंद की अभिव्यक्ति है। यह सारा जो विकास है, यह कोई सिर—माथे पर सलवटें पड़ी हों ईश्वर के, ऐसा नहीं है। यह एक नाचता हुआ, यह एक मौज से चलता हुआ प्रवाह है। यह भारी चिंता नहीं है, यह मौज है।

इसे थोड़ा खयाल में ले लें, क्योंकि यह बहुत उपयोग का है। और जिस दिन कोई व्यक्ति अपने जीवन को भी लीला बना लेता है, उसी दिन मुक्त हो जाता है, उसी दिन वह ईश्वरीय हो जाता है, उसी दिन वह ईश्वर हो जाता है।

जब तक आपका जीवन काम है, तब तक आप एक गुलाम हैं, अपनी ही चिंताओं के, अपनी ही गंभीरता के। अपनी ही गंभीरता के पत्थरों के नीचे दबे जा रहे हैं। ये पहाड़ जो आपके सिर पर हैं, आपकी ही गंभीरता के हैं। उतार दें इन पहाड़ों को। जीवन को एक खेल समझें, एक आनंद, तो फिर सिर पर कोई बोझ नहीं है। फिर आप जीवन से नाचते हुए गुजर सकते हैं। फिर आपके होंठ पर भी बांसुरी हो सकती है। फिर आपके प्राण में भी गीत हो सकता है। और जिस दिन आपके प्राण में भी यह लीला का भाव उदय होगा, उस दिन आप इस सूत्र को समझ पाएंगे कि यह पूरा का पूरा जगत उस परमात्मा के लिए भी लीला है।

और ध्यान रहे यह जगत इतना सुंदर इसीलिए है कि उस परमात्मा के लिए लीला है। यह इतना सुंदर नहीं हो सकता, अगर यह उसके लिए काम हो। सभी काम कुरूप हो जाते हैं। 

एक नर्स एक बच्चे की सेवा करती है, तब वह काम होता है, और एक मां जब अपने बच्चे को खिलाती है, तब वह खेल होता है, वह लीला होती है, काम नहीं होता। वह उसका आनंद है। इसलिए जब एक मां अपने बच्चे के साथ खेल रही होती है, तब एक अनूठा सौंदर्य प्रकट होता है। और जब एक नर्स भी उस बच्चे के साथ खेल रही होती है, तब एक कुरूपता प्रकट होती है। उस कुरूपता का कारण नर्स नहीं है, बच्चा नहीं है, उस कुरूपता का कारण काम है। जिस जगह भी काम आ जाएगा, वहीं चित्त उदास हो जाता है। और जहां खेल आ जाता है, वहीं चित्त नृत्य से भर जाता है।

लेकिन अगर हम अपने महात्माओं की तरफ देखें, तो हमें शक होगा। इनको देखें अगर हम, तो हमें लगेगा, ये तो भारी उदास हैं! अगर इन्हीं महात्माओं की तरफ से परमात्मा की तरफ जाना हो, तो हमें मानना चाहिए, परमात्मा तो सतत रो ही रहा होगा! महात्मा ही अगर उसका दरवाजा हैं, तो ये महात्मा तो ऐसे मरे हुए बैठे हैं कि जीवन की कोई पुलक इनमें मालूम नहीं होती। ये तो अपने भीतर जैसे मरघट लिए हुए हैं, ताबूत हैं, कब्रें हैं।

जीसस ने इस शब्द का उपयोग किया है। जीसस ने कहा है कि ये धर्मगुरु! तुम सफेद ताबूत हो। तुम पुती—पुताई सफेद कब्रें हो। तुममें जो स्वच्छता दिखाई पड़ रही है, वह केवल ऊपर की पुताई है, भीतर तुम सड़ी हुई लाशें हो।

महात्मा का उदास होना जरूरी है। महात्मा हंसता हुआ मिले, तो भक्त चले जाएंगे। क्योंकि महात्मा में हम प्रफुल्लता देखने को राजी नहीं हैं। हमने धर्म को एक गंभीर कृत्य बना लिया है। हमने धर्म को इतना गंभीर कृत्य बना लिया है कि उसमें ईश्वरीय तत्व तो विलीन ही हो जाएगा।

इसलिए आज अगर कृष्ण जैसा आदमी हमारे बीच हो, तो आप यह मत सोचना कि आप कृष्ण के पैर छू सकोगे। आप नहीं छू सकोगे। क्योंकि अगर यह कृष्ण चौरस्ते पर खड़े होकर चौपाटी पर बांसुरी बजाता मिल जाए, तो आप पुलिस में खबर करोगे! आप कहोगे, यह हमारा कृष्ण नहीं है। यह क्या बात है! कृष्ण और बांसुरी बजा रहे हैं? वह तो आप किताब में पढ़ लेते हो, तो टाल जाते हो। । अगर चौपाटी पर बजाए, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी।

क्योंकि हम सबकी आदत मुर्दा महात्माओं को देखने की हो गई है। जितना मरा हुआ आदमी हो, उतना बड़ा महात्मा मालूम होता है। जीवन की जरा—सी पुलक दिखाई न पड़े। और क्षुद्रतम बातों को भी वह गंभीरता दे देता है। और कृष्ण जैसे व्यक्ति विराटतम बातों को भी गैर—गंभीर आनंद दे देते हैं। क्षुद्रतम बातों को! वह पूछेगा कि यह खाना कितनी देर का बना है? यह ब्राह्मण ने बनाया है कि नहीं बनाया? इसको किसी स्त्री ने तो नहीं छू दिया?

यह महात्मा है! यह खाने तक को प्रफुल्लता से नहीं ले सकता। यह खाने में भी गणित रखता है! यह पूछता है कि घी कितने पहर का है? इतने पहर से ज्यादा हो गया, तो फिर घी नहीं ले सकता! यह दूध गाय का है कि नहीं?

यह जो बुद्धि है, यह जीवन को लीला नहीं बना सकती। यह जीवन को अति गंभीर बना देती है। अगर एक स्त्री बैठी हो, उठ जाए, तो यह महात्मा पूछेगा, स्त्री को उठे हुए इस जमीन से कितनी देर हुई? क्योंकि उसके हिसाब हैं, गणित हैं, कि स्त्री जब यहां से उठ जाए, तब इतनी देर तक भी उसका प्रभाव उस जमीन के टुकड़े पर रहता है। तो तब तक महात्मा वहा नहीं बैठेगा। अगर आप रुपया महात्मा को देंगे, तो वह अपने हाथ में नहीं लेगा; छोड़ भी नहीं सकता। वह एक शिष्य को साथ में रखेगा, उसको दिलवाएगा! क्योंकि रुपया लेना पाप है। लेकिन बिना रुपए लिए भी नहीं चल सकता, तो यह पाप दूसरे से करवाता रहेगा!

ये जो गुरु—गंभीर लोग हैं, हिंदू धर्म के प्राण इन्होंने ले डाले। हिंदू धर्म जमीन पर अकेला हंसता हुआ धर्म था और जिसमें हंसने की प्रगाढ़ क्षमता थी। उदासी जिसका लक्ष्य न था, आनंद जिसका गंतव्य था। लेकिन मूल सूत्र खो जाते हैं। और अक्सर ऐसा होता है कि हम वही करने लगते हैं, जो हम करना चाहते हैं।

जीवन को लीला की दृष्टि से देखा जा सके, तो कृष्ण का यह सूत्र आपको स्पष्ट हो जाएगा कि कैसे कोई जीवन—शक्ति इतने विराट जाल को रचते हुए दूर खड़े रहकर देख सकती है, अनासक्त!

इसलिए कृष्ण कहते हैं, यह मुझे बांधता नहीं है। क्योंकि बांधती है आसक्ति, कर्म नहीं। और अगर कर्म अनासक्त हो, तो बंधन नहीं होता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 2

 अतर्क्‍य रहस्‍य में प्रवेश


मया ततमिदं सर्व जगदस्थ्यमूर्तिना।

मत्‍स्‍थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्यवीस्थ्य:।। 4।।

न च मत्‍स्‍थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।

भूतभृन्‍न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।। 5।।

यथाकाशीस्थ्योनित्यं वायु: सर्वन्‍नगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्‍स्‍थानीत्युयधारय ।। 6।।


और हे अर्जुन मेरे अव्‍यक्‍त स्वरूप से यह सब जगत परिपूर्ण है और सब भूत मेरे में स्थित हैं। इसलिए वास्तव में मैं उनमें स्थित नही हूं।

और वे सब भूत मेरे में स्थित नहीं है, मेरे योग—सामथ्‍र्य को देख कि भूतों को धारण—पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्‍मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।


क्योंकि जैसे अकाश से उत्पन्न हुआ सर्वत्र विचरने वाला महान वायु सदा ही आकाश में स्थित है, वैसे ही संपूर्ण भूत मेरे में स्थित है, ऐसे जान।


श्रद्धा की बात कहकर कृष्ण ऐसी ही कुछ बात शुरू करेंगे, यह सोचा जा सकता था, जिसे कि तर्क मानने को राजी न हो। यह सूत्र अतर्क्य  है। इस सूत्र को कोई गणित से समझने चलेगा, तो या तो सूत्र गलत होगा या गणित की व्यवस्था गलत होगी। यह सूत्र तर्क की संगति में नहीं बैठेगा। यह सूत्र रहस्यपूर्ण है और पहेली जैसा है।

एक तो पहेली ऐसी होती है, जिसका हल छिपा होता है, लेकिन खोजा जा सकता है। एक पहेली ऐसी भी होती है, जिसका कोई हल होता ही नहीं, खोजने से भी नहीं खोजा जा सकता है।

यह सूत्र दूसरी पहेली जैसा है। जापान में झेन फकीर जिसे कोआन कहते हैं। ऐसी पहेली, जो हल न हो सके। ऐसा रहस्य, जिसे हम जितना ही खोजें, उतना ही रहस्यपूर्ण होता चला जाए। ऐसा सत्य, जिसे हम जितना जानें, उतना ही पता चले कि हम नहीं जानते हैं। जितना हो परिचय प्रगाढ़, उतना ही रहस्य की और गहराई बढ़ जाए। जितना लें उसे पास, उतना ही पता चले कि वह बहुत दूर है। छलांग तो लग सकती है ऐसे रहस्य में, लेकिन ऐसे रहस्य का कोई पार नहीं मिलता है। सागर में जैसे कोई कूद तो जाए, लेकिन फिर सागर के पार होने का उपाय न हो।

तो द्वार तो है प्रभु में प्रवेश का, लेकिन वापस निकलने के लिए कोई द्वार नहीं है। इसलिए अगम है पहेली। और कृष्ण ने इसीलिए श्रद्धा की बात अर्जुन से पहले कही कि अब तू श्रद्धायुक्त है, तो मैं तुझे उन गोपनीय रहस्यों की बात कहूंगा, जो कि श्रद्धायुक्त मन न हो, तो कहे नहीं जा सकते। इस सूत्र को समझने के पहले श्रद्धा के संबंध में थोड़ी बात और समझ लेनी जरूरी है, तभी यह सूत्र स्पष्ट हो सकेगा। 

अस्तित्व में चार प्रकार के आकर्षण हैं। या तो कहें चार प्रकार के आकर्षण या कहें कि एक ही प्रकार का आकर्षण है, चार उसकी अभिव्यक्तियां हैं। या कहें कि एक ही है राज, लेकिन चार उसकी सीढ़ियां हैं। या कहें कि एक ही है सत्य, चार उसके आयाम हैं! अगर बहुत स्थूल से शुरू करें, तो समझना आसान होगा।

वैज्ञानिक कहते हैं, इस जगत के संगठन में, आर्गनाइजेशन में जो तत्व काम कर रहा है, उस तत्व को हम मैग्नेटिज्म कहें, उस तत्व को हम कहें एक चुंबकीय ऊर्जा, एक चुंबकीय शक्ति, जिससे पदार्थ एक—दूसरे से सटा है और एक—दूसरे से आकर्षित है। अगर विद्युत की भाषा में कहें, तो वह निगेटिव और पाजिटिव, ऋण और धन विद्युत है, जो जगत के अस्तित्व को बांधे हुए है। पदार्थ भी संगठित नहीं हो सकता, अगर कोई ऊर्जा आकर्षण की न हो। एक पत्थर का टुकड़ा आप देखते हैं, अरबों अणुओं का जाल है। वे अणु बिखर नहीं जाते, भाग नहीं जाते, छिटक नहीं जाते, किसी केंद्र पर, किसी आकर्षण पर बंधे हैं। वैज्ञानिक खोज करता है, आकर्षण दिखाई पड़ने वाला नहीं है। लेकिन बंधे हैं, तो खबर मिलती है कि आकर्षण है।

हम एक पत्थर को आकाश की तरफ फेंके तो वापस जमीन पर गिर जाता। हजारों —हजारों साल तक आदमी के पास कोई उत्‍तर नहीं था कि क्यों गिर जाता है। लेकिन न्‍यूटन को सुझा कि जरूर जमीन खींच लेती होगी। वह जो खिंचाव है न्‍यूटन को भी नहीं पड़ा है। वह खिंचाव किसी ने कभी नहीं देखा है, केवल पत्‍थरों को हमने नीचे गिरते देखा है; परिणाम देखा है, वृक्ष से पत्‍ता गिरता है और नीचे आ जाता है। आप छलांग लगाये पहाड़ से और जमीन पर आ जाएंगे। हर चीज जमीन की तरफ गिर जाती है, खिंच जाती है। कोई प्रबल आकर्षण, कोई कशिश है, कोई ग्रिविटेशन जरूर पीछे काम कर रहा है। जो दिखाई नहीं पड़ता।

न्‍यूटन की खोज कीमती सिद्ध हुई, क्‍योंकि जीवन का बहुत सा उलझाव उसकी खोज के कारण साफ हो गया जमीन में कशिश है, कोई मैग्नेटिज्य है, कोई आकर्षण है, कोई खिंचाव है। पदार्थ के तल पर खिंचाव को विज्ञान स्वीकार करता है, यद्यपि खिंचाव को कभी किसी ने देखा नहीं है। हमने केवल खिंचाव का परिणाम देखा है। हमने देखा है कि एक मैग्नेट को रख दें, तो लोहे के टुकड़े खिंचे चले आते हैं। खिंचाव नहीं दिखाई पड़ता, लोहे के टुकड़े खिंचते हुए दिखाई पड़ते हैं। चुंबक दिखाई पड़ता है, लोहे के टुकड़े दिखाई पड़ते हैं, वह जो शक्ति खींचती है, वह दिखाई नहीं पड़ती है, वह अदृश्य है। शक्ति मात्र अदृश्य है।

लेकिन जब चुंबक खींच लेता है, तो वैज्ञानिक कहता है, खिंचाव का काम जारी है। जब जमीन खींच लेती है, तो वैज्ञानिक कहता है, खिंचाव का काम जारी है। जब एक पत्थर के अणु बिखर नहीं जाते, तो उसका अर्थ है, वे कहीं न कहीं सेंटर्ड हैं, कोई न कोई केंद्र उन्हें बांधे हुए है। वह केंद्र दिखाई नहीं पड़ता। वह केंद्र अनुमानित है। लेकिन एक बात विज्ञान को साफ हो गई है कि उस केंद्र के दो बिंदु हैं; एक जिसे धन बिंदु कहें, एक जिसे ऋण बिंदु कहें, पाजिटिव और निगेटिव कहें। उन दोनों के बीच आकर्षण है।

अगर पदार्थ के तल पर हम मनुष्य की भाषा का उपयोग करें, तो कहें कि पदार्थ में भी स्त्रैण और पुरुष जैसे बिंदु हैं। पदार्थ भी स्त्री और पुरुष में विभाजित है, और उन दोनों के आकर्षण से ही सारे अस्तित्व का खेल है।

पदार्थ से ऊपर उठें, तो इसी आकर्षण की दूसरी अभिव्यक्ति हमें स्त्री और पुरुष में दिखाई पड़ती है। पदार्थ से ऊपर उठें, तो जीवन भी इसी ऊर्जा से बंधा हुआ चलता हुआ मालूम पड़ता है। स्त्री और पुरुष के भीतर भी जीवन की ऊर्जा एक—दूसरे को आकर्षित करती है। वही आकर्षण जीवन प्रवाह है।

अगर पदार्थ बंधा है किसी आकर्षण से, तो जीवन भी किसी से बंधा है जगत में वह आकर्षण सेक्स या यौन के नाम से प्रकट होता है। यौन, विद्युत—आकर्षण का ही दूसरा रूप है जीवन। जब चुंबकिय उर्जा जीवन को उपलब्ध हो जाती है, तो यौन निर्मित होता है।

उससे और उपर चले। तो मनुष्‍य यौन से ही प्रभावित नहीं होता, कुछ ऐसे प्रभाव भी है जिनसे यौन का कोई भी संबंध नहीं है। उन प्रभाव को हम प्रेम कहते है।

पदार्थ के बीच जो आकर्षण है वह है विद्युत। दो शरीरों के बीच जो आकर्षण है वह यौन दो मनों के बीच जो आकर्षण है, वह है प्रेम। यौन से भी मनसविद राजी हैं। और प्रेम के संबंध में भी

वैज्ञानिक न राजी हों, मनसविद न राजी हों, लेकिंन कवि, साहित्यकार, कलाकार, चित्रकार—वे सब, जिनका सौंदर्य से संबंध है—वे राजी हैं। वे मानते हैं कि प्रेम भी एक प्रगाढ़ ऊर्जा है और उसके परिणाम भी प्रत्यक्ष होते हैं।

लेकिन न तो हम जमीन के आकर्षण को देख सकते हैं, और न हम यौन के आकर्षण को देख सकते हैं; अनुभव कर सकते हैं। वैसे ही हम प्रेम के आकर्षण को भी नहीं देख सकते हैं। उसे भी अनुभव ही कर सकते हैं।

ये तीन सामान्य आकर्षण हैं, एक और चौथा आकर्षण है। मैंने कहा, दो पदार्थों के बीच, निर्जीव पदार्थों के बीच जो आकर्षण है, वह विद्युत है; या चुंबकीय ऊर्जा है। दो शरीरों के बीच जो जैविक, बायोलाजिकल ग्रेविटेशन है, वह यौन है। दो मनों के बीच जो आकर्षण है, वह प्रेम है। लेकिन दो आत्माओं के बीच जो आकर्षण है, उसका नाम श्रद्धा है। वह चौथा आकर्षण है, और परम आकर्षण है।

जब दो मन एक—दूसरे में आकर्षित होते हैं, तो प्रेम बनता है। जब दो शरीर एक—दूसरे में आकर्षित होते हैं, तो यौन निर्मित होता है। जब दो पदार्थ एक—दूसरे में आकर्षित होते हैं, तो भौतिक कशिश निर्मित होती है। लेकिन जब दो आत्माएं एक—दूसरे में आकर्षित होती हैं, तो श्रद्धा निर्मित होती है।

श्रद्धा इस जगत में श्रेष्ठतम आकर्षण है, और चुंबकीय आकर्षण। इस जगत में निम्नतम आकर्षण है। लेकिन न तो चुंबकीय आकर्षण देखा जा सकता है और न दो आत्माओं के बीच का आकर्षण देखा जा सकता है। जब चुंबकीय आकर्षण जैसी स्थूल बात भी नहीं देखी जा सकती, तो श्रद्धा जैसी बात तो कतई नहीं देखी जा सकती। लेकिन श्रद्धा के भी परिणाम देखे जा सकते हैं।

श्रद्धा के परिणाम देखे जा सकते हैं। जीवन में शक्तियां दिखाई नहीं पड़ती हैं, केवल उनके परिणाम दिखाई पड़ते हैं। इसलिए आपसे मैं कहता हूं आप अगर सोचते हों कि श्रद्धालु हैं, तो इतना काफी नहीं है। आपकी श्रद्धा का एक ही प्रमाण है कि आपका जीवन रूपांतरित होता हो। तो जो आस्तिक कहता है, मैं श्रद्धालु हूं और नास्तिक और उसकी जिंदगी में कोई फर्क नहीं है, तो वह अपने को धोखा दे रहा है। क्योंकि श्रद्धा तो कशिश है, श्रद्धा तो क्रांति है।

तो जो कहता है, मैं श्रद्धालु हूं उसका सबूत एक ही है कि उसका जीवन गवाही दे, उसका अस्तित्व गवाही दे, वह एक विटनेस हो जाए, वह एक साक्षी बन जाए परमात्मा के होने का। लेकिन अगर वह कहता है कि नहीं, मैं श्रद्धा तो करता हूं लेकिन मुझ में और नास्तिक में कोई ऐसे फर्क नहीं है, तो जानना कि श्रद्धा झूठी है। और झूठी श्रद्धा से सच्चा संदेह भी बेहतर है। क्योंकि सच्चा संदेह कभी श्रद्धा तक पहुंच सकता है, लेकिन झूठी श्रद्धा कभी श्रद्धा तक नहीं पहुंच सकती है।

यह जो श्रद्धा है, जैसा मैंने कहा, दो पदार्थों के बीच जो कशिश है, आकर्षण है भौतिक, दो शरीरों के जीवन यौन बन जाता है, दो मनों के बीच सचेतन प्रेम बन जाता है, दो आत्‍माओं के बीच श्रद्धा हो जाती है। अगर दो पदार्थ आपस में न मिले तो अस्तित्व बिखर जाए। और अगर दो शरीर आपस में न मिले तो जगत से जीवन बिखर जायेगा। अगर दो मन आपस में न मिले तो जीवन से सब सौंदर्य बिखर जायेगा।

पदार्थ एक दूसरे को खिंचते है, इसलिए आस्‍तित्‍व संगठित है। चाहे चाँद तारे घूमते हो और सूरज के आस—पास पृथ्वी चक्कर मारती  हो और चाहे परमाणु घूमते हों, जहां भी पदार्थ है, उसका कारण पदार्थ को आपस में बांधने वाली ऊर्जा है।

  श्रद्धा न हो, तो ईश्वर न होने जैसा हो जाएगा। ईश्वर के प्रकट होने के लिए जिस आकर्षण की जरूरत है, वह श्रद्धा है।

और हर आकर्षण सृजनात्मक है। पदार्थ खिंचता है, तो जगत निर्मित हो जाता है। अभी तक वैज्ञानिक नहीं समझा पाए कि पृथ्वी कैसे बन गई! अब तक वे नहीं समझा पाए कि चांद—तारे कैसे बन गए! अनुमान हैं बहुत, लेकिन सारे अनुमानों के बीच एक आधार है, और वह आधार यह है कि जरूर किसी ऊर्जा के कारण यह सारा संगठन फलित हुआ है, किसी शक्ति के कारण। उसके नाम कुछ भी दिए जा सकते हैं।

अगर दो शरीर संयुक्त न हों, तो जीवन की धारा बिखर जाती है। इसलिए यौन का, सेक्स का प्रबल आकर्षण है। लेकिन आदमी आदमी होकर भी पहले आकर्षण से भी ऊपर नहीं उठ पाता, तो आखिरी आकर्षण तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। हममें से अधिक लोग यौन से भी नीचे जीते हैं। यह सुनकर आपको कठिनाई होगी। हममें से बहुत—से लोग हैं, जिनको यौन का आकर्षण भी ऊपर है अभी। जो पदार्थ के आकर्षण पर जीते हैं।

अब एक आदमी रुपए इकट्ठे करने के लिए जी रहा है, वह अभी यौन के आकर्षण तक भी ऊपर नहीं उठा है। अभी वह पदार्थ के आकर्षण से बंधा है। अभी जब वह रुपए हाथ में रखता है, तो जो आनंद उसे अनुभव होता है, वह दो पदार्थों के बीच जो आकर्षण है, उसका ही आनंद है।

इसलिए धन के पीछे जो पागल है, वह पहले आकर्षण में जी रहा है। इस लिए लोभी काम से संभोग से भी नीची अवस्था है। लोभ, ग्रीड सेक्स से भी नीचे की अवस्‍था है', ध्यान रखना। और बहुत—से लोग हैं ऐसे जो धन के लिए सेक्‍स को कुर्बान कर सकते हैं। और शायद मन में सोचते हो वो काम कर रहे है। काम की तरफ जा रहे हैं। वे यौन से भी नीचे गिर रहे है। यौन की बलि चढा देते हैं। वो बिलकुल ही स्‍थूल आकर्षण में पड़े है।

एक आदमी है जिसको कुर्सी का मोह है, पद का मोह है, सिंहसान का मोह है, वह कुर्सी के आकर्षण पर जी रहा है। इसलिए राजनीतिज्ञ अकसर अपनी पत्नी की फिक्र छोड़ सकता है। इसलिए नहीं कि वह भी बुद्ध जैसा हो गया है कि पत्नी को छोड़ सकता है,

इसलिए कि पत्‍नी से भी नीचे गिरा; कुर्सी ज्‍यादा मूल्‍यवान है। पत्‍नी कुर्सी पर चढ़ाई जा सकती है। बच्‍चे कुर्सी पर चढ़ाये जा सकती है। वह पहला स्‍थूल आकर्षण है। वह पहला स्थूल आकर्षण है।

धन, पद, बहुत स्थूल आकर्षण हैं। वे आकर्षण वैसे ही हैं, जैसे चुंबक के पास लोहा खिंचता है। ऐसे ही हम खिंचे चले जाते हैं। ध्यान रखना, आप चुंबक नहीं हैं। जब आप धन की तरफ खिंचते हैं, तो ध्यान रखना, धन आपकी तरफ कभी नहीं खिंचता है। आप ही धन की तरफ खिंचते हैं। धन चुंबक होता है। ध्यान रखना, धन पुरुष हो जाता है, आप स्त्रैण हो जाते हैं।

इसलिए धन को प्रेम करने वाला रुपए को ऐसे देखता है, जैसे अपने प्रेमी को। वह उसका परमात्मा है। रुपए को छूता है ऐसे, जैसे किसी जीवित चीज को भी उसने कभी नहीं छुआ है। रुपए को उलट—पलटकर देखता है!

और हम सबको पता है। स्त्रियों को पता है। इसलिए स्त्रियां अपने शरीर की उतनी फिक्र नहीं करती हैं, जितनी अपने गहनों की फिक्र करती हैं। क्योंकि आस—पास जो लोग हैं, वे पदार्थ से आकर्षित होते हैं। अभी शरीर का भी आकर्षण दूर है।

इसलिए स्त्री अपने शरीर को गंवा सकती है, लेकिन अपने हीरे को नहीं खो सकती। उसके हाथ में उतना आकर्षण नहीं मालूम पड़ता उसे, जितना हीरे की अंगूठी में मालूम पड़ता है। और उसकी समझ एक लिहाज से सही है। क्योंकि जब भी कोई उसके हाथ को देखता है, तो सौ में से नब्बे मौके पर हाथ को देखने वाले बहुत कम लोग हैं, हीरे की अंगूठी को देखने वाले ज्यादा लोग हैं। इसलिए अगर कुरूप हाथ भी हो और हीरे की अंगूठी हो, तो आपको हाथ का कुरूप होना दिखाई नहीं पड़ता। हीरे की अंगूठी का सौंदर्य हाथ पर छा जाता है। इसलिए कुरूप व्यक्ति आभूषणों से अपने को लादता चला जाता है। असल में कुरूपता ही केवल आभूषण के प्रति आकर्षित होती है, क्योंकि वह और नीचे के तल का आकर्षण है।

पुरुष भी भलीभांति जानते हैं कि उनका बड़ा मकान एक स्त्री को आकर्षित कर सकता है। उनका बैंक बैलेंस एक स्त्री को आकर्षित कर सकता है। उनकी बड़ी कार एक स्त्री को आकर्षित कर सकती है। इसलिए पुरुषों को भी अपने शरीर की भी उतनी चिंता नहीं है, जितनी अपनी कार की है, जितनी अपने मकान की है, जितनी अपनी तिजोड़ी की है। क्योंकि आदमी के जिस समाज में हम जी रहे हैं, वह पदार्थ के तल पर आकर्षित हो रहा है, और श्रद्धा बहुत लंबी यात्रा है फिर।

पदार्थ से ऊपर उठें, बड़ी कृपा होगी, लोभ से ऊपर उठें। कम से कम जीवित व्यक्ति में आकर्षित हों, मृत पदार्थों में नहीं। यह भी बड़ी क्रांति है। कुछ लोग जीवित व्यक्तियों में आकर्षित होते हैं, लेकिन यौन के बाहर उनका आकर्षण नहीं जाता। एक—दूसरे के शरीर तो मिलते हैं, लेकिन एक—दूसरे के मन कभी भी नहीं मिल पाते हैं।

इसलिए जिन मुल्कों में तलाक की सुविधा हो गई है, उन मुल्कों में विवाह अब बच नहीं सकता। क्योंकि मन तो कहीं मिलते ही नहीं, तन ही मिलते हैं। और तन जल्दी ही बासे, और जल्दी ही उबाने वाले हो जाते हैं।

एक ही शरीर कितनी बार भोगा जा सकता है? और एक ही शरीर कितनी देर तक आकर्षक हो सकता है? और एक ही शरीर कितनी देर तक खींचेगा? फिर वह खिंचाव भी एक ऊब और बोर्डम हो जाती है। और मन तो मिलते नहीं।

इसलिए पश्चिम में, जहां तलाक सुविधापूर्ण होता चला जा रहा है, विवाह बिखरता चला जा रहा है। उन्नीस सौ में अमेरिका में चार शादियों में एक तलाक होते थे, अब चार शादियों में तीन तलाक की नौबत है। सिर्फ कुछ सालो में! और कुछ सालो, मैं आपको भरोसा दिलाता हूं तलाक समाप्त हो जाएंगे, क्योंकि विवाह समाप्त हो जाएगा। तलाक बच नहीं सकते ज्यादा दिन तक, क्योंकि तलाक को बचाने के लिए विवाह जरूरी है। और विवाह ही बचने वाला नहीं है। क्या कारण है  शरीर का आकर्षण यौन है, और मन का तो आकर्षण पैदा ही नहीं हो पाता।

हमारे पास मन जैसी कोई चीज भी है, और हम कभी किसी के मन से भी आकर्षित होते हैं, तो ही हमें प्रेम का अनुभव शुरू होगा। प्रेम, शरीर—मुक्त दो मन के बीच आकर्षण है। प्रेम मैत्री है।

लेकिन हमें प्रेम का अनुभव नहीं है। मित्रता दुर्लभ होती चली गई है। और प्रेम का ही पता न हो, तो श्रद्धा बहुत कठिन हो जाएगी। मन का प्रेम मित्रता को जन्म देता है।

चौथा जो आकर्षण है, श्रद्धा, वह गुरु और शिष्य के बीच का सम्बन्ध है। किसी की आत्मा इतनी आकर्षक हो जाती—उसका मन भी मूल्य का नहीं, उसका शरीर भी मूल्य का नहीं, उसके पास जो पदार्थगत कुछ भी हो, वह भी किसी मूल्य का नहीं—बस उस व्यक्ति का अस्तित्व, उसका होना ही मूल्यवान हो जाता है। इस मूल्य का भी एक जोड़ और एक संबंध है।

पदार्थ के तल पर निगेटिव और पाजिटिव मिलते हैं, वे भी स्त्री—पुरुष हैं। शरीर के तल पर यौन संयुक्त होता है, वे भी स्त्री—पुरुष हैं। यह आपको जानकर कठिनाई होगी कि जब दो मनों का भी मेल होता है, तो उसमें एक मन स्त्रैण और एक मन पुरुष जैसा होता है। असल में जहां भी मेल घटित होता है, जहां भी मिलन होता है, वह। स्त्री और पुरुष का अंश मौजूद होता है। और जब श्रद्धा जन्मती है, तब भी—आत्मा के तल पर भी—स्त्री और पुरुष का अंश मौजूद रहता है।

स्त्री और पुरुष का विभाजन शारीरिक ही नहीं है, जैविक ही नहीं है, सारा अस्तित्व बंटा हुआ है। इसलिए कृष्ण को प्रेम करने वाले भक्तों ने अगर कहा है कि एक ही पुरुष है जगत में, कृष्ण, तो उसका कारण है।

अगर मीरा ने वृंदावन के मंदिर में पुजारी को कहा है, क्योंकि उस पुजारी ने नियम ले रखा था कि किसी स्त्री को मंदिर में प्रवेश नहीं करने देगा। और मीरा जब नाचती हुई उस मंदिर के द्वार पर पहुंच गई, तो द्वार बंद कर दिए गए। और लोगों ने खबर दी कि मंदिर के पुजारी जो हैं, गोस्वामी जो हैं, वे स्त्री को भीतर प्रवेश नहीं करने देते हैं, आप लौट जाएं। मीरा ने कहा, इतनी खबर पुजारी तक पहुंचा दो, मैं तो सोचती थी कि जगत में केवल एक ही पुरुष है, कृष्ण। गोस्वामी भी पुरुष हैं? उनसे इतना पूछ आएं।

द्वार खुल गए। गोस्वामी मीरा के चरणों में गिर पड़ा। क्योंकि गोस्वामी को संदेश मिल गया। गोस्वामी को खयाल आ गया कि भक्त होकर कृष्ण का, वह पुरुष कैसे हो सकता है? एक आत्मिक तल पर कृष्ण पुरुष हो गए और गोस्वामी उनका भक्त है, तो स्त्रैण हो गया।

स्त्रैण और पुरुष शब्द का मैं प्रयोग कर रहा हूं। पुरुष वह है, जो खींचता है; स्त्री वह है जो समर्पित होती है। गुरु और शिष्‍य के बीच समर्पण का यहीं संबंध है। इस समर्पण के बाद वैसी बातें हो सकती है, जो अन्‍यथा नहीं हो सकती।

तो कृष्ण अब एक बहुत गुरु गंभीर बात अर्जुन से कह रहे है। सुनकर सिर चकराता मालूम पडे इस बात को कृष्‍ण भी इसके पहले नहीं कह सकते थे। जब पक्‍की हो गई बात और अर्जुन श्रृद्धा  से भर गया है, समर्पित है; उसके ह्रदय के द्वार खुले है, संदेह की दीवालें गिर गई हैं; शंकाएं —कुशंकाए निषेद हो गई है। अब आतुर है।  ठीक वैसे ही, जैसे कभी कोई स्‍त्री प्रेम के किसी क्षण में पुरूष को अपने भीतर लेने को आतुर होती है। प्रेम के किसी क्षण में जैसे स्त्री पुरुष को अपने द्वारा पुन: जन्माने को आतुर होती है। प्रेम के किसी क्षण में जैसे स्त्री अपने भीतर नए जीवन के लिए, नए जीवन को जन्म देने के लिए, गर्भाधान के लिए, पुरुष के प्रति समग्ररूपेण समर्पित होती है। ऐसे ही श्रद्धा से भरा हुआ चित्त गुरु के प्रति अपने सब द्वार खोल देता है, ताकि गुरु की ऊर्जा उसमें प्रविष्ट हो जाए और जीवन रूपांतरित हो, और एक नए जीवन का जन्म हो सके।

मैंने कहा कि जब दो पदार्थ मिलते हैं, तब भी नई चीज निर्मित हो जाती है। अगर आक्सीजन और हाइड्रोजन मिल जाते हैं, तो पानी निर्मित हो जाता है। जब एक 'स्त्री और पुरुष का मिलन होता है, तो एक तीसरे जीवन का जन्म हो जाता है। जब दो प्रेम से भरे हुए मन मिलते हैं, तो इस जगत में सौंदर्य के, आनंद के बड़े फूल खिलते हैं। और जब प्रेम से दो व्यक्तियों का मिलन होता है, तब भी वे दो व्यक्ति भी रूपांतरित हो जाते हैं। अगर आपने कभी प्रेम की पुलक अनुभव की है, तो आपने तत्काल पाया होगा, आप दूसरे आदमी हो गए हैं।

विनसेंट वानगाग के संबंध में मैंने पढ़ा है। वह एक बड़ा डच चित्रकार था। उसे किसी स्त्री ने कभी कोई प्रेम नहीं किया। कुरूप था। और मन को प्रेम करने वाले तो खोजने कठिन हैं। गरीब था। और धन को प्रेम करने वाले तो चारों तरफ हैं। उसे किसी ने कोई प्रेम् नहीं दिया। वह जवान हो गया, उसकी जवानी भी उतरने के करीब आने लगी। उसे कभी किसी ने प्रेम की नजर से नहीं देखा। वह चलता था तो ऐसे, जैसे मुर्दा चल रहा हो, अपना बोझ खुद खींचता हो। अपने ही पैर उठाने पड़ते, तो लगता कि किसी और के पैर उठा रहा है। आँख उठाकर देखता तो ऐसे, जैसे आंखों की पलकों पर पत्‍थर बंधे हो।

वह जहां नौकरी करता था वह मालिक भी परेशान हो गया था उसके आलस्‍य को देखकर उसक़े तमस को देखकर। मालिक सोचता था इतने तमस की क्‍या जरूरत है? इतने आलस्य की, इतने प्रमाद की। बैठा तो बैठा ही रह जाता। उठने की भी कोई प्रेरणा नहीं थी। सोता तो सोया रह जाता। सुबह किसलिए उठूं? इसका भी कोई कारण नहीं था।

लेकिन एक दिन मालिक देखकर चकित हुआ कि वानगाग न मालूम कितने वर्षो के बाद स्‍नान करके, मालूम कितने महीनों के बाद कपड़े बदलकर शायद जीवन में पहली दफा गीत गुनगुनाता हुआ दुकान में प्रविष्‍ट हुआ। उसने पूछा, आज क्‍या हो गया है तुम्हें? कोई चमत्कार! तुम और गीत गुनगुनाओगे! और तुमने क्या स्नान भी किया है? और क्या तुमने ताजे कपड़े भी पहन लिए हैं?

वानगाग ने कहा कि हां, किसी ने मुझे आज प्रेम से देख लिया है! किसी के प्रेम का मैं पात्र हो गया हूं!

अब यह आदमी दूसरा है। प्रेम से गुजरकर दोनों व्यक्तियों का पुनर्जन्म हो जाता है।

श्रद्धा से गुजरकर जो होता है, वह आत्यंतिक क्रांति है। श्रद्धा से गुजरकर पुराना तो मर ही जाता है, नए का ही आविर्भाव हो जाता है। प्रेम में तो पुराना बदलता है, श्रद्धा में पुराना मरता है और नया आता है। प्रेम में एक कंटिन्यूटी है, सातत्य है। श्रद्धा में डिसकंटिन्यूटी है; सातत्य टूट जाता है। श्रद्धा के बाद आप वही नहीं होते, जो पहले थे। आप दूसरे ही होते हैं। दोनों के बीच कोई संबंध भी नहीं होता; दोनों के बीच कोई रेखा भी नहीं होती। पुराना बस समाप्त हो जाता है, और नया आविर्भूत हो जाता है।

श्रद्धा इस जगत में सबसे बड़ी छलांग है। छलांग का मतलब होता है, पुराने से कोई संबंध न रह जाए। इसलिए श्रद्धा जब भी किसी जीवन में घटित होती है, तो इस जगत में सबसे बड़ी क्रांति घटित होती है। और सब क्रांतिया बचकानी हैं, सिर्फ आत्मक्रांति ही आधारभूत क्रांति है।

इस क्रांति के द्वार पर खड़ा देखकर कृष्ण ने अर्जुन से कहा, हे अर्जुन, मेरे अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत परिपूर्ण है।


तो बड़ी अनहोनी बात कृष्ण कहते हैं। वे कहते हैं, मेरे अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत परिपूर्ण है।

अब यह जगत है व्यक्त। और कृष्ण कहते हैं, यह जो प्रकट है जगत, यह जो व्यक्त है, यह जो दिखाई पड़ रहा है, यह जो न साकार है, यह जो सगुण है, यह जो रूप से भरा है, इसके भीतर मेरा अरूप, मेरा निर्गुण, मेरा निराकार, मेरा अव्यक्त, मेरा अदृश्य प्रकट हो रहा है।

अब ये दोनों बातें सही नहीं हो सकती हैं हमारे गणित से। हमारी बुद्धि से ये दोनों बातें सही नहीं हो सकती हैं। सीधी बात कहनी चाहिए। अव्यक्त का अर्थ है, जो प्रकट नहीं होता, जो प्रकट हुआ ही नहीं कभी। तो जगत से प्रकट कैसे होगा? और अगर जगत से प्रकट हो रहा है, तो उसे अव्यक्त कहने की क्या जरूरत है? दो में से कुछ एक करो। तर्क अगर होगा, तो कहेगा, दो में से कुछ एक करो। या तो कहो कि यह जो प्रकट हुआ है, यही मैं हूं प्रकट हुआ; और या कहो, यह जो प्रकट हुआ है, यह मैं नहीं हूं; अप्रकट हूं मैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं, यह जो प्रकट हुआ है, इसमें मैं ही व्याप्त हूं; मैं ही इसमें भरा हूं; मैं ही इसमें परिपूर्ण हूं। रूप के भीतर मेरा ही अरूप है। आकार के भीतर मेरा ही निराकार है। दृश्य के भीतर मैं ही अदृश्य हूं।

यह हमें कठिनाई में डालता है। लेकिन इसे समझना पड़े। श्रद्धा हो, तब तो यह तत्काल समझ में आ जाता है, समझना नहीं पड़ता। श्रद्धा न हो, तो इसे थोड़ा समझना पड़े। इसे थोड़ी चेष्टा करनी पड़े कि क्या प्रयोजन होगा ऐसी उलटी बात कहने का? और फिर यह उलटी बात आगे बढ़ती ही चली जाती है। वे इसे और उलटाते चले जाते हैं।

हमारी बुद्धि की सोचने की जो व्यवस्था है, हमारी बुद्धि की जो कैटेगरीज हैं, हमारे सोचने के जो नियम हैं, उन नियमों में ही बुनियादी भूल है। उन नियमों के कारण, जो जीवन में हो रहा है, वह हमें दिखाई नहीं पड़ता।

जैसे अगर मैं यह कहूं कि जन्म भी मैं हूं और मृत्यु भी मैं, तो गणित और तर्क के लिहाज से गलत है। क्योंकि अगर मैं जन्म हूं तो मृत्यु कैसे हो सकता हूं? जन्म और मृत्यु तो विपरीत हैं।

हमारे सोचने में विपरीत हैं, वस्तुत: विपरीत नहीं हैं। अस्तित्व में जन्म और मृत्यु जुड़े हैं, एक हैं। जन्म, मृत्यु का ही पहला छोर है; और मृत्यु, जन्म का ही दूसरा। जन्म लेकर हम करते क्या हैं सिवाय मृत्यु तक पहुंचने के! जन्म और मृत्यु दो चीजें नहीं हैं। विपरीत तो हैं ही नहीं, दो भी नहीं हैं। दो तो हैं ही नहीं; भिन्न भी नहीं हैं। एक ही चीज के दो छोर हैं। जन्म एक छोर है, मृत्यु दूसरा छोर है—उसका, जिसे हम जीवन कहते हैं।

लेकिन सोचने में मृत्यु दुश्मन और जन्म मित्र मालूम पड़ता है। तो जन्म के समय हम बैंड—बाजे बजाकर स्वागत कर लेते हैं; और मृत्यु के समय रो— धोकर विदा कर देते हैं।

शायद हमें खयाल हो कि हंसना और रोना भी विपरीत चीजें हैं, तो फिर हम गलती में हैं। हमारी भाषा और सोचने के नियम की भूल है। अगर आप रोते ही चले जाएं, तो थोड़ी ही देर में रोना हंसने में बदल जाएगा। प्रयोग करके देखें। यह तो कोई बहुत कठिन प्रयोग नहीं है। रोते ही चले जाएं, रुके ही मत, एक क्षण आएगा कि आप पाएंगे, रोना समाप्त हो गया और हंसने का जन्म हो गया है! हंसते चले जाएं, रुके ही मत, तो आप पाएंगे कि हंसना विलीन हो गया और रोना शुरू हो गया।

इसलिए ग्रामीण स्त्रियां भी जानती हैं कि बच्चों को ज्यादा हंसने नहीं देतीं। कहती हैं, अगर ज्यादा हंसेगा, तो फिर रोएगा। इसलिए हंसने में ही रोक लेना उचित है। लेकिन हमारी भाषा में हंसना और रोना विपरीत है; जन्म और मृत्यु विपरीत है; अंधेरा और प्रकाश विपरीत है, बचपन और बुढ़ापा विपरीत है, सर्दी और गर्मी विपरीत है।

यह भाषा की भूल है। यह तर्क की भूल है। ये विपरीत हैं नहीं! ऐसा कहीं प्रकाश देखा है आपने, जो अंधेरे से न जुड़ा हो? ऐसा कहीं कोई अंधेरा देखा है आपने, जो प्रकाश से न जुड़ा हो? सगे—साथी हैं, संगी हैं, ऐसा भी कहना ठीक नहीं है। एक ही चीज के दो छोर हैं। अगर यह खयाल में आ जाए, तो कृष्‍ण का सूत्र इतना बेबूझ नहीं मालूम होगा।

लेकिन इस सूत्र ने बड़ी कठिनाईयां दी है। इस बात ने बड़ी कठिनाइयां दी हैं कि परमात्मा सगुण है या निर्गुण। कितना उपद्रव, कितने विवाद, नामसझी का कोई अंत नहीं पड़ता। और जिन्हें हम सोचते हों कि समझदार है वह भी बैठे कर  विवाद करते रहते हैं, कि परमात्मा निर्गुण है या सगुण।

 सगुण के उपासक हैं वे कहते कि निर्गुण की बात ही मत करो, निर्गुण के उपासक हैं, वे कहते हैं, कि सगुण की सब बकवास। आकार को मानने वाले हैं, तो मूर्ति बनाकर बेठे है। निराकार को मानने वाले हैं, तो मूर्तियां तोड्ने में लगे है।

मुसलमान हैं, वे निराकार को मानने वाले है। उन्‍होने कितनी मूर्तियां मिटा दीं दुनिया से! बनाने वालों ने जितनी मेहनत नहीं कि, उन बेचारों ने उससे भी ज्यादा मेहनत की मिटाने में! बनाने वाले भी इतनी फिक्र नहीं करते मूर्ति की, जितनी मिटाने वाले को करनी पड़ती है। मिटाने वाला जान की जोखिम लगा देता है, मूर्ति को मिटा देता है, क्योंकि परमात्मा निराकार है।

लेकिन कैसे मूर्तियां मिटाओगे? बनाने वाले बनाए चले जाते हैं। जिन्होंने मूर्तियां बनाईं, उनका कोई हिसाब है? भारत में हम समझते हैं कि जितने आदमी हैं, उससे कम परमात्मा नहीं हैं, उससे कम परमात्मा की मूर्तियां नहीं हैं। 

बनाने वाले बनाए चले जाते हैं, क्योंकि वे कहते हैं, सगुण है, साकार है, रूपवान है। मिटाने वाले मिटाए चले जाते हैं।

लेकिन भाषा की भूल इतनी महंगी पड़ सकती है! जिसे हम सगुण कहते हैं, वह निर्गुण का ही एक छोर है। जिसे हम निर्गुण कहते हैं, वह सगुण का ही एक छोर है। सगुण और निर्गुण दो विपरीत घटनाएं नहीं, एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। जिसे हम रूप कहते हैं, वह अरूप का ही एक हिस्सा है।

इसे ऐसा समझें कि अरूप का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है, उसे हम रूप कहते हैं। और रूप का भी जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर चला जाता है, उसे हम अरूप कहते हैं। सगुण? जिसे हम नाप लेते हैं, तौल लेते हैं, वह सगुण हो जाता है। निर्गुण? जो हमारी नाप—तौल के पार निकल जाता है, तो निर्गुण हो जाता है।

मेरे घर में आंगन है, तो मेरे आंगन का अपना आकाश है, दीवाल है आँगन की मेरा आकाश पड़ोसी के आकाश से जुदा है, भिन्न है। अगर पड़ोसी मेरे आकाश में आना चाहे, तो मैं इनकार करूंगा। मेरा आकार मेरे आँगन का आकाश!

लेकिन इससे क्‍या आकाश विभाजित होता है? कितनी ही हम दीवाल खड़ी करे इससे सिर्फ हमारी सीमा बनती है देखने की। लेकिन दीवाल के पार का आकाश और मेरे आंगन के आकाश में क्या कोई खंड हो जाता है, कोई, कोई टूट हो जाती है?


जितने भी विपरीत शब्द हैं हमारे पास, वे सभी एक ही अस्तित्व के छोर हैं। इसलिए कृष्ण कहते हैं, मेरे अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत परिपूर्ण है। मेरा निराकार इन सब आकारों में छिपा है। मेरा निर्गुण इन सब गुणों में प्रकट हुआ है। मेरा परमात्मा ही इस पदार्थ का आधार है। और सब भूत मुझमें स्थित हैं। और यह जो सारा जगत दिखाई पड़ रहा है, यह मुझमें स्थित है, मुझमें ही ठहरा हुआ है। और तब तत्काल एक विपरीत बात वे कहते हैं—विपरीत हमें दिखाई पड़ती है—और सब भूत मुझमें स्थित हैं, लेकिन मैं उनमें स्थित नहीं हूं।

सब भूत मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं हूं यह कैसे होगा? अगर सब भूत परमात्मा में स्थापित हैं और अगर परमात्मा ही सब में प्रकट हो रहा है, तो फिर यह कहना कि मैं उनमें नहीं हूं, हमारे तर्क को नई दुविधा दे देगा।

श्रद्धा को कठिनाई नहीं है, क्योंकि श्रद्धा प्रश्न नहीं उठाती। श्रद्धा आर—पार देख लेती है, ट्रासपैरेंट है। वह देख लेगी कि ठीक है; कुछ अड़चन नहीं है। बिलकुल ठीक है।

कृष्ण कहते हैं, ये सब मुझमें स्थित हैं, ये सारे भूत, लेकिन मैं उनमें स्थित नहीं हूं।

यह इंगित है, और महत्वपूर्ण है। श्रद्धा तो सीधा समझ लेगी; विचार को थोड़ा— सा चक्कर काटना पड़ेगा। जो भी विराटतर है, वह क्षुद्रतर में प्रविष्ट भी हो जाए, तो भी प्रविष्ट नहीं होता। एक छोटा—सा वर्तुल मैं खींचूं एक छोटा सर्किल, और फिर एक बड़ा सर्किल उसके चारों तरफ बनाऊं, तो यह कहना तो बिलकुल ठीक है, बड़ा सर्किल यह कह सकता है कि छोटा सर्किल मुझमें स्थित है, फिर भी मैं उसमें स्थित नहीं हूं। क्योंकि छोटा सर्किल तो पूरा ही बड़े सर्किल में उपस्थित है, लेकिन बड़ा सर्किल छोटे सर्किल के बाहर भी फैला हुआ है।

तो जीवन का एक अनिवार्य नियम है कि क्षुद्र तो विराट में स्थित होता है, लेकिन विराट क्षुद्र में नहीं। इसे ऐसा समझें, एक बुजुर्ग आदमी कह सकता है कि मैं बच्चे में मौजूद हूं बच्चा मुझमें स्थित है, फिर भी मैं बच्चे के बाहर हूं। एक बुजुर्ग आदमी में बचपन भी छिपा होता है, जवानी भी छिपी होती है। उन सबको उसने अपने में समा लिया है, फिर भी वह कुछ ज्यादा होता है, समथिंग मोर। उनसे कुछ फैला होता है। उसकी परिधि बड़ी है।

जो भी छोटा है, वह बड़े में समाया होता है, लेकिन बड़ा उस छोटे में समाया नहीं होता। छोटे से भी बड़ा प्रकट होता है, फिर भी समाया नहीं होता। सागर कह सकता है कि सभी नदियां मुझमें समाई हुई हैं, फिर भी मैं नदियों में नहीं समाया हुआ हूं।

अर्थ इतना ही है, तर्क और विचार की दृष्‍टी से जो विराट है वह क्षुद्र के पार है। क्षुद्र से प्रकट भी होता है तो भी क्षुद्र के पार है। यह जो पारगामिता है, ये जो सदा पार होना है। इसका सूत्र है यह इसका मूल्‍य है इसका अर्थ है, वह हमारे खयाल में आ सकेगा?

और वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं है। पहले कहा वे सब भूत मुझमें स्थित हैं। और अब तत्क्षण एक पंक्‍ति भी नहीं पूरी हो पाई और कृष्ण कहते हैं, और वे सब भूत मुझमें स्‍थित नहीं है।

किंतु मेरे योग को देख, मेरी माया को देख जो समस्‍त भूतों को धारण—पोषण करने वाला होकर भी मैं भूतो में स्‍थित नहीं हूं। क्योंकि जैसे आकाश से उत्पन्न हुआ सर्वत्र विचरने वाला वायु सदा ही आकाश में स्थित है, वैसे ही संपूर्ण भूत मेरे में स्थित हैं, ऐसा जान।

एक के बाद दूसरी पंक्ति पहले को खंडित करती चली जाती है। एकदम अतर्क्य वक्तव्य है। जो कहते हैं एक क्षण, दूसरे क्षण खंडित कर देते हैं। जो दूसरें क्षण कहते हैं, तीसरी पंक्ति में उसके पार निकल जाते हैं। क्या कहना चाहते हैं? क्या इशारा है? क्योंकि जो कहा है, वह अतर्क्य है। शायद यही कहना चाहते हैं कि मैं अतर्क्य हूं।

इसे समझ लें। इस वक्तव्य का सार भाव यही है कि कृष्ण यह कह रहे हैं कि तू समझने से समझ सके, ऐसा मैं नहीं हूं। तू जानने से जान सके, ऐसा मैं नहीं हूं। तू पहचानने से पहचान सके, वह मैं नहीं हूं। तू जानना छोड़, तू पहचानना छोड़, तू समझ छोड़, तू गणित छोड़, तू तर्क छोड़, तो तू मुझे जान सकता है, क्योंकि मैं अतर्क्य हूं।

अतर्क्य का अर्थ है, मैं रहस्य हूं। रहस्य का अर्थ है, कोई भी सिद्धात, कोई भी नियम मुझे नहीं घेर पाएगा। मैं पारे की तरह हूं। मुट्ठी तू बांधेगा तर्क की और मैं बिखरकर बाहर छिटक जाऊंगा। जब तक तू नहीं बांधेगा, तब तक शायद मुझे पाए भी कि मैं हूं; जैसे ही तू मुट्ठी बांधेगा, मैं छिटक जाऊंगा। बुद्धि जैसे ही जीवन के सत्य को पकड़ना चाहती है, सत्य छिटक जाता है पारे की तरह। तो तू मुझे बांधने की कोशिश मत कर।

कृष्ण ने अब तक जो अनुभव किया है, वह यही है कि अर्जुन उन्हें बांधने की कोशिश कर रहा है। अर्जुन ने सब तरह से कोशिश की है। क्योंकि अगर अर्जुन कृष्ण को बांध ले तर्क में, विचार में, तो इस युद्ध से छुटकारा हो सकता है।

क्‍योंकि कृष्‍ण कहते है कि यह सब माया है, तो अर्जुन कहना चाहता है। अगर सब माया है,  तो मुझे इसमें क्यों उलझाते हैं? कृष्ण कहते है कि ये कोई मरते नहीं मारने से; तो अर्जुन कहेगा कि जब ये मरते ही नहीं मारने से तो मारने से भी क्या सार है? कृष्ण कहते है कि तू अपने अंश के और प्रतिष्ठा के लिए लड़, तो यश और प्रतिष्‍ठा तो सब अहंकार है, और आप ही तो समझाते है कि अहंकार ही तो बाधा है! अगर कृष्ण कहते हैं कि धर्म के लिए तुझे लड़ना है तो अर्जुन कहेगा कि मुझ से क्या धर्म की स्‍थापना हो सकेगी जब आप ही मौजूद है, तो धर्म की स्‍थापना उतने से काफी है। अगर कृष्‍ण है कि यह जीवन आसार है, तो अर्जुन चाहता है कि उसे छुटकार दो। ताकि मैं एकांत में जाकर समाधि में लीन हो जाऊं।

कृष्ण कुछ भी कहें, अर्जुन उन्हें बांध लेना चाहता है। उस बांधने में ही उसे अपना छुटकारा दिखाई पड़ता है। अगर कृष्ण फंस जाएं, जो कह रहे हैं उसी में, तो अर्जुन कृष्ण से जीत जा सकता है।

एक बहुत मजे की बात है कि अगर यह चर्चा बिलकुल तर्कयुक्त ढंग से चले, तो कृष्ण की हार निश्चित है। अगर यह ठीक नियम से खेल चले तर्क के, तो कृष्ण की हार निश्चित है। अर्जुन सुनिश्चित जीतेगा।

कृष्ण ने सब तर्कों के जवाब दिए हैं। एक—एक तर्क को काटने की कोशिश की है। अर्जुन ऐसी जगह आ गया है कि अब और तर्क उठाने का उसका मन नहीं है। तो कृष्ण तत्काल अपना बेबूझपन प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि अब मैं तुझे बता दूं वह, जैसा मैं हूं। अब तक तू जो कह रहा था, तो मैं भी खेल रहा था। अब तक तू जो पूछ रहा था, तो मैं भी जवाब दे रहा था। लेकिन वह शतरंज का खेल था। मैं देख रहा था, तू किसलिए पूछ रहा है, तो क्या जवाब देना जरूरी है, वह मैं दे रहा था। अब मैं तुझे वही बताता हूं जो मैं हूं। यह जो दिखाई पड़ रहा है, इसमें मैं न दिखाई पड़ने वाले की तरह छिपा हूं। यह सारा जगत मुझमें ठहरा हुआ है, और इसमें मैं नहीं हूं; और फिर भी मैं तुझसे कहता हूं कि यह जगत भी मुझमें ठहरा हुआ नहीं है; और फिर भी मैं तुझसे कहता हूं कि मैं इस जगत में समाया हुआ हूं।

अर्जुन का सिर घूम जाता। जो भी विचार से चलेगा, उसका घूमेगा। श्रद्धा नहीं घूमती है। श्रद्धा इतनी शक्तिशाली है कि कृष्ण भी उसे डांवाडोल नहीं कर सकते। इतनी बात कृष्ण ने अगर पहले कही होती, तो अर्जुन अब तक हजार सवाल उठा दिया होता। वह चुप है। वह समझने की कोशिश कर रहा है। समझने से ज्यादा वह कृष्ण को पीने की कोशिश कर रहा है। कृष्ण क्या कह रहे हैं, यह मूल्यवान नहीं रहा अब। कृष्ण क्या हैं, उनकी प्रेजेंस, उनकी मौजूदगी, उनका होना, वह अपने द्वार खोलकर उनको अपने भीतर समा रहा है। कृष्ण क्या कह रहे हैं, यह अब सवाल नहीं है बहुत महत्वपूर्ण। क्यों कह रहे हैं! क्या कह रहे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। कौन कह रहा है!

इसलिए अर्जुन चुपचाप पी रहा है। जिन बातों में एक—एक पद पर संकट होना चाहिए, और संदेह होना चाहिए, उन्हें वह चुपचाप पीए जा रहा है। उसे कहीं कोई विरोध जैसे दिखाई भी नहीं पड़ रहा है।

ध्यान रखें, यह विरोध हों सकता है दो कारणों से दिखाई न पड़े। मैंने गीता के कई सतत पाठी देखे हैं, उन्हें भी नहीं दिखाई पड़ता। उसका कारण यह नहीं है कि उनकी श्रद्धा इतनी है कि उन्हें इसमें विरोध नहीं दिखाई पड़ता। वे इतनी बुद्धि भी नहीं लगाते कि विरोध दिखाई पड़े। पढ़ते चले जाते हैं। पढ़ते—पढ़ते आदत हो जाती है। और जो बीच में विरोध है स्पष्ट, वह भी दिखाई नहीं पड़ता। सुनते रहते हैं, विरोध दिखाई नहीं पड़ता।

विरोध न दिखाई पड़़ना दो तरह से संभव है। एक तो श्रद्धा इतनी प्रगाढ़ हो कि विरोध के बीच में वह जो आदमी खड़ा है, वही दिखाई पड़े, विरोध के पार वह जो चेतना खड़ी है, वही दिखाई पड़े; और या फिर बुद्धि इतनी कम हो कि पहले वक्तव्य में और दूसरे वक्तव्य में विरोध है, यह भी दिखाई न पड़े।

बुद्धि की कमी को श्रद्धा की गहराई मत समझ लेना। बहुत बार बुद्धि का उथलापन श्रद्धा की गहराई समझ ली जाती है। श्रद्धा की गहराई बुद्धि के उथलेपन का नाम नहीं है! श्रद्धा की गहराई बुद्धि से मुक्ति है।

इसे पढ़ना। पहले तो विरोध खोजने की कोशिश करना। सब तरह से विरोध देखने की कोशिश करना। और जब बुद्धि थक जाए जैसा कि मैं कुछ दो—तीन बातें कहूं तो खयाल में आ जाए।

इस सदी के मध्य में विज्ञान ने एक नया सिद्धात खोजा। कहें खोजा, या कहना चाहिए, खोज में आ गया अचानक। जैसे ही परमाणु की खोज हुई, तो विज्ञान को पता चला कि परमाणु के जो घटक, इलेक्ट्रांस हैं, वे बड़े अदभुत हैं, रहस्यपूर्ण हैं। रहस्यपूर्ण इसलिए हैं कि हमारे पास कोई शब्द ही नहीं कि हम उनको बताएं कि वे क्या हैं। किन्हीं वैज्ञानिकों ने खबर दी कि वे कण हैं। और किन्हीं वैज्ञानिकों ने खबर दी कि वे कण नहीं हैं, तरंग हैं। और तब किन्हीं वैज्ञानिकों ने खबर दी कि वे दोनों एक साथ हैं, कण भी और तरंग भी।

कण का मतलब होता है कि जो कभी तरंग नहीं हो सकता। तरंग का मतलब होता है कि जो कभी कण नहीं हो सकती। अगर मैं कहूं कि मैंने आपकी दीवाल पर एक बिंदु बनाया, यह बिंदु भी है और लकीर भी। तो आप कहेंगे, क्या कह रहे हैं आप! दो में से एक ही बात हो सकती है, अन्यथा युक्लिड बेचारे का क्या होगा? ज्यामेट्री का क्या होगा? आप क्या कहते हैं! अगर मैं कहूं कि यह बिंदु भी है और रेखा भी, दोनों एक साथ। तो आप कहेंगे, कृपा करें! यह दोनों एक साथ हो नहीं सकता। और अगर मैं खींचना भी चाहूं ऐसी कोई चीज तख्ते पर, तो खींच नहीं सकता, जो दोनों एक साथ हो। या तो बिंदु होगा, या रेखा होगी।

रेखा का मतलब ही है, बहुत—से बिंदु सतत, बहुत—से बिंदु श्रृंखला में। अगर यह बिंदु है, तो रेखा नहीं हो सकती। अगर यह रेखा है, तो बिंदु नहीं हो सकता। बिंदु का मतलब ही है कि जो और विभाजित न किया जा सके। रेखा तो विभाजित की जा सकती है। लेकिन वैज्ञानिक बड़ी मुश्किल में पड़ गए। युक्लिड को मानें कि इस इलेक्ट्रान को मानें? क्या करें? और यह इलेक्ट्रान है कि युक्लिड की फिक्र ही नहीं करता, ज्यामिति की फिक्र नहीं करता, गणित के नियम नहीं मानता; और दोनों तरह का व्यवहार करता है!  कोई शब्द नहीं है हमारे पास। कण—तरंग, इसको क्या नाम दें? कण—तरंग कहें! दोनों विपरीत शब्द हैं। वैज्ञानिक बड़े पेशोपस में थे कि क्या करें।

लेकिन तथ्य को तो मानना ही पड़ेगा, चाहे युक्लिड के ही खिलाफ जाता हो। अंततः यही हुआ कि युक्लिड को छोड़ देना पड़ा; तथ्य को ही मानना पड़ा।

आइंस्टीन से किसी ने पूछा है कि यह तो नियम के विपरीत है! तो आइंस्टीन ने कहा, हम क्या करें? कहना चाहिए, नियम ही तथ्य के विपरीत है। नियम बदला जा सकता है, तथ्य नहीं बदला जा सकता। नियम बदला जा सकता है, नियम हमारा बनाया हुआ है। तथ्य नहीं बदला जा सकता है; तथ्य हमारा बनाया हुआ नहीं है। युक्लिड को हारना पड़ेगा, क्योंकि तथ्य यह है।

विपरीत एक साथ मौजूद है जीवन में। उसी तथ्य को भौतिकी इस इलेक्ट्रान के व्यवहार में पाई, कि जीवन एक साथ मौजूद है।


वही, जो भौतिकविद पहुंचे पदार्थ में, मनसविद पहुंच गए मनुष्य की वासना में, तो पाया कि दोनों वासनाएं एक साथ मौजूद हैं। और अब जो और गहरे जा रहे हैं लोग, वे अनुभव करते हैं कि उन्हें दो वासनाएं कहना गलत है। आदमी के भीतर एक ही वासना है, जो जीने और मरने की दोनों है। तो जब तक अच्छा लगता है, तो आदमी उस वासना की व्याख्या करता है कि मैं जीना चाहता हूं। जब अच्छा नहीं लगता, तो उसी वासना की व्याख्या करता है कि मैं मरना चाहता हूं।

बूढ़े आदमी कहते हुए सुने जाते हैं कि भगवान, अब हमें उठा ले! तो ऐसा मत समझना कि कुछ बदलाहट हो गई है उनमें, कि कोई क्रांति हो गई है उनमें। वही चाह विफल होकर, असफल होकर, हारकर, पराजित होकर, जरा—जीर्ण होकर अब मृत्यु की भाषा बोल रही है। वही चाह है।

अभी कोई आ जाए और कहे कि एक नया यंत्र बन गया है। इस दरवाजे से घुसो, उधर से निकलो, जवान हो जाते हो! वह बुजुर्ग आदमी कहेगा, भगवान! अभी थोड़ा ठहरना। मैं इस यंत्र से जरा गुजरकर एक बार देख लूं। अगर ऐसा होता हो, तो अभी मरने की ऐसी कुछ जल्दी नहीं है!

क्या हुआ? ये चाहें दो नहीं हैं। लेकिन भाषा में बड़ी कठिनाई है। दो ही कहना पडेगी। ये एक ही हैं। मनसविद हमारे भीतर खोज कर—करके एक और तीसरे तथ्य पर पहुंचे हैं। आपको खयाल में आ जाए कि वैपरीत्य वैपरीत्य नहीं है। मनसविद कहते हैं कि हम जिस व्यक्ति को प्रेम करते हो, उसी को घृणा भी करते हैं।

यह जब पहली दफा उदघाटन हुआ, तो यह पहली दो बातों से भी ज्यादा मन को दबाने वाली बात है। क्योंकि मां को अगर कोई कहे कि तू अपने बेटे को प्रेम भी करती है और घृणा भी, साथ ही, तो कोई मां राज़ी नहीं होगी। 

अगर किसी प्रेमी को हम कहे तू जिस प्रेयसी के लिए मरा जा रहा है, उसी को कल मार भी सकता है। अभी उसके लिए अमृत की तलाश कर रहा है। कल इसी दुकान से उसी के लिए जहर भी खरीद सकता है। और कल तो बहुत दूर है, मनसविद कहते हैं, इसी क्षण में भी प्रेम और घृणा दोनों साथ ही मौजूद हैं। पर हमें कठिनाई है। क्योंकि हमारे लिए प्रेम और घृणा विपरीत बातें हैं, अलग— अलग।

ऐसा नहीं है। इसलिए प्रेम क्षणभर में घृणा बन सकता है, और घृणा क्षणभर में प्रेम बन सकती है। जो आकर्षण है, वह विकर्षण बन सकता है। जो विकर्षण है, वह आकर्षण बन सकता है। वे बदलने योग्य हैं, तरल हैं, एक—दूसरे में बह जाते हैं। सच तो यह है कि वे दो नहीं हैं, एक ही हैं।

कृष्ण यही कह रहे हैं कि मैं दोनों हूं। जहां—जहां तुझे वैपरीत्य दिखाई पड़े, वह दोनों मैं हूं।

इस संबंध में हिंदू चिंतन बहुत अनूठा है। दुनिया के किसी धर्म ने भी द्वंद्व को इतनी गहराई से आत्मसात नहीं किया। इसलिए मैं कहता हूं कि आइंस्टीन के लिए या फ्रायड के लिए हिंदू चिंतन जितनी सहजता से आत्मसात कर सकता है, उतना क्रिश्चियन चिंतन आत्मसात नहीं कर सकता है। क्योंकि क्रिश्चियनिटी या इस्लाम द्वंद्व को मानकर चलते हैं।

 भगवान है एक, शैतान है एक; दोनों दुश्मन हैं। अच्छाई है एक, बुराई है एक, दोनों में दुश्मनी है। पाप है एक, पुण्य है एक, दोनों विपरीत हैं। नर्क है एक, स्वर्ग है एक; दोनों में विरोध है। सिर्फ हिंदू चिंतना द्वंद्व को आत्मसात करती है। इसलिए हमने कुछ अदभुत चीजें बनाईं। जैसे—जैसे मनुष्य की समझ बढ़ेगी, उन चीजों की गरिमा और महत्ता भी समझ में आएगी।

हम अकेली कौम हैं इस जमीन पर, जिन्होंने परमात्मा के विपरीत एक बुराई का परमात्मा खड़ा नहीं किया। खड़ा ही नहीं किया। शैतान की, हमारी चिंतना में, कोई गुंजाइश नहीं है। मगर यह बड़ा कठिन काम है। ईसाई और मुसलमान एक लिहाज से सीधे और सरल हैं, साफ हैं। जटिलता नहीं है। क्योंकि जो—जो बुराई है, वह शैतान पर छोड़ देते हैं; और जो—जो भलाई है, वह परमात्मा पर रख लेते हैं। इसलिए उनका परमात्मा एकदम भला है। अंग्रेजी में जो शब्द गॉड है, वह गुड का ही रूपांतरण है। वह जो शुभ है, वही परमात्मा है। और जो अशुभ है, वही शैतान है।

लेकिन हम क्या करेंगे? हमारे परमात्मा को दोनों होना पड़ेगा एक साथ, परमात्मा भी और शैतान भी। इसलिए हमने एक कल्पना की है, जो बहुत गहरी है। वह यह है कि परमात्मा निर्माता भी है और विध्वंसक भी। ईसाइयत कहेगी, परमात्मा बनाता है, शैतान मिटाता है। हम कहते हैं, परमात्मा दोनों ही काम करता है; वही बनाता है, वही मिटाता है।


हमने अर्द्धनारीश्वर की प्रतिमा बनाई है। हमने शिव की प्रतिमा बनाई है, जिसमें वे आधे पुरुष हैं और आधे स्त्री। दुनिया में कोई ऐसी कल्पना नहीं कर सकता। एक ही व्यक्ति दोनों कैसे हो सकता है? या तो स्त्री हो या पुरुष हो। लेकिन दोनों हैं, दोनों एक साथ। इसलिए कृष्ण यह भी कहते हैं कि यह सारा संसार मुझमें समाया हुआ है और फिर भी मैं इसमें नहीं हूं। अगर कृष्ण से कोई पूछे कि ये जो पाप हो रहे हैं, इनके संबंध में आपका क्या खयाल है? तो कृष्ण कहेंगे, सारे पापियों में भी मैं समाया हुआ हूं और फिर भी मैं उनमें नहीं हूं। और सारे पाप मेरे ही भीतर हो रहे हैं और फिर भी मैं उनमें नहीं हूं।

यह जो द्वंद्वातीत,  दोनों को स्वीकार करके भी उनके पार होने की बात है, यही भारतीय धर्म का गुह्यतम सूत्र है। इसलिए हमारा परमात्मा, हमारी जो परमात्मा की धारणा है, वह दुनिया के दूसरे लोगों को बहुत अजीब मालूम पड़ती है। उनकी कल्पना में नहीं आती है कि यह कैसी बात है! हमारे मुल्क में भी ऐसे लोग हैं, जिनकी समझ में नहीं आती।

जैसे कृष्ण का ही व्यक्तित्व है, यह जैनों की समझ में नहीं आ सकता। क्योंकि वे कहेंगे, यह आदमी कैसा है? यह बांसुरी भी बजा सकता है, यह युद्ध के मैदान पर भी खड़ा हो सकता है! यह अहिंसा की परम बात भी कह सकता है और हिंसा के बड़े युद्ध में अर्जुन को जाने की सलाह देता है! सलाह ही नहीं देता, फुसलाता है। और इतने ढंग से फुसलाता है कि किसी सेल्समैन ने कभी किसी दूसरे को नहीं फुसलाया होगा। उसको धक्का देता है कि जा और जूझ जा, बिलकुल बेफिक्र रह! और एक अजीब सूत्र देता है; उससे कहता है, बेफिक्री से मार; क्योंकि आत्मा कभी मरती ही नहीं!

यह जो द्वंद्वातीत अतिक्रमण की क्षमता है, यह गहनतम खोज है। इस सूत्र में कृष्ण यही कह रहे हैं कि तू मेरे रूप को दो विरोधों में मत बांट। दोनों में मैं मौजूद हूं—रूप में भी, अरूप में भी, मूर्त में भी, अमूर्त में भी; पदार्थ में भी, परमात्मा में भी—मैं ही हूं। और फिर भी मैं तुझसे कहता हूं कि इन सबमें होकर भी मैं बाहर रह जाता हूं। इन सबके बीच में खड़े होकर भी मैं इनमें डूब नहीं जाता हूं। इसे आप अनुभव कर सकते हैं। यहां आप भीड़ में बैठे हुए हैं, भीड़ में बिलकुल डूबे हुए हैं। फिर भी अगर आपको थोड़ी—सी भी ध्यान की क्षमता हो, आंख बंद कर लें, अपने भीतर ध्यान में हो जाएं, तो आप कह सकते हैं कि मैं भीड़ में मौजूद हूं और फिर भी भीड़ में नहीं हूं।

आप जंगल में चले जाएं और ध्यान की बिलकुल क्षमता न हो, एक वृक्ष के नीचे बैठ जाएं; कोई वहां नहीं है, विराट सुनसान है, आंख बंद करें, भीड़ मौजूद है! तब आपको वहां कहना पड़ेगा, भीड़ यहां बिलकुल नहीं है, फिर भी मैं भीड़ में मौजूद हूं।

इस भीड़ में बैठकर भी आप भीड़ के बाहर हो सकते हैं। तब आपको एक जटिल सत्य का अनुभव होगा, भीड़ में हूं भीड़ में समाया हुं बैठा हूं चारों तरफ भीड़ है, फिर भी मैं भीड़ में नहीं हूं। तब आपको खयाल में आएगा कि यह द्वंद्वातीत अतिक्रमण क्या है! यह नान—डुअल ट्रांसेंडेंस क्या है! यह कृष्ण किस गहन पहेली की बात कर रहे हैं!

वे यह कह रहे हैं, मैं ही लड़ता हूं, मैं ही लड़ाता हूं; मैं ही भागता हूं? मैं ही भगाता हूं; और फिर भी मैं इस सब में नहीं हूं।

लेकिन यह ध्यान की या श्रद्धा की, समाधि की जो परम अवस्था है, तभी खयाल में आती है। तभी खयाल में आती है।


(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 1


 श्रीभगवानवाच

हदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसीहतं यज्ञ्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 1।।

राजविद्या राजगुह्मं यीवप्रीमदमुत्तमम्।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।। 2।।

अश्रद्दधाना: पुरूषा धर्मस्यास्य परंतप।

अप्राप्‍य मां निवर्कन्ते मृत्युसंसारवर्त्मीन।। 3।।


श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन, तुझ दोष— दृष्टि रहित भक्त के लिए हम परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित कहूंगा? कि जिसको जानकर तू दुखरूप संसार से मुक्‍त हो जाएगा। यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा तथा सब गोपनीयों का भी राजा एवं अति पवित्र उत्तम प्रत्यक्ष फल वाला और धर्मयुक्त है, साधन करने को बड़ा सुगम और अविनाशी है। और हे परंतप इस तत्व—ज्ञान— रूप धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मेरे को प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसार— चक्र में भ्रमण करते हैं।


 जीवन को देखने की एक दृष्टि नकारात्मक भी है और एक दृष्टि विधायक भी। जीवन को ऐसे भी देखा जा सकता है कि उसमें पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई न पड़े, और ऐसे भी कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई पदार्थ शेष न रहे। जो कहते हैं कि जीवन मात्र पदार्थ है, वे केवल इतना ही कहते हैं कि उनकी देखने की दृष्टि नकारात्मक, निगेटिव है। जो कहते हैं कि जीवन पदार्थ नहीं, परमात्मा है, वे भी इतना ही कहते हैं कि उनकी देखने की दृष्टि विधायक, पाजिटिव है।

इस सूत्र में उतरने के पहले इन दो दृष्टियों को ठीक से समझ लेना जरूरी है, क्योंकि जगत वैसा ही दिखाई पड़ता है, जैसी हमारी दृष्टि होती है। जो हम देखते हैं, वह हमारी आंख की खबर है। जो हम पाते हैं, वह हमारा ही रखा हुआ है। जो हमें दिखाई पड़ता है, वह हमारा ही भाव है, और हमारे ही भाव का प्रत्यक्षीकरण है। विज्ञान सोचता था कि मनुष्य तटस्थ होकर भी देख सकता है। और विज्ञान की आधारशिला यही थी कि व्यक्ति तटस्थ होकर निरीक्षण करे—कोई भाव न हो उसका, कोई दृष्टि न हो उसकी—तभी, सत्य क्या है, वह जाना जा सकेगा। लेकिन विगत तीन सौ वर्षों की वैज्ञानिक खोज ने विज्ञान की अपनी ही आधारशिला को डगमगा दिया है। और अब वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई उपाय ही नहीं है कि व्यक्ति दृष्टि को छोड्कर और तथ्य को देख सके।

 कोई भी ज्ञान व्यक्ति से मुक्त नहीं हो सकता। जानने में जानने वाला समाविष्ट हो जाता है। जो हम देखते हैं, उसमें हमारी आंख की छाप पड जाती है। जो हम छूते हैं, छूने से हमें जो अनुभव होता है, वह वस्तु का ही नहीं, अपने हाथ की क्षमता का भी है। जो मैं सुनता हूं उस सुनने में मेरे कान पर पड़ी हुई ध्वनियों की चोट ही नहीं, मेरे कान की व्याख्या भी सम्मिलित हो जाती है।

व्याख्यारहित देखना असंभव है। कोई उपाय नहीं है। हम कितनी ही चेष्टा करें, जो निरीक्षण कर रहा है, वह बाहर नहीं रह जाता, वह भीतर प्रविष्ट हो जाता है। अगर आप एक वृक्ष के पास से गुजरते हैं और वह वृक्ष आपको सुंदर दिखाई पड़ता है, तो इसमें वृक्ष का सौंदर्य तो है ही; आपकी देखने की क्षमता, आपकी व्याख्या, आपके मनोभाव, आपकी मनःस्थिति, आप भी सम्मिलित हो गए। क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि जब आप दुखी हों, तब यह वृक्ष सुंदर दिखाई न पडे। और ऐसा भी होगा कि जब आप आनंदित हों, तो यह वृक्ष भी नाचता हुआ दिखाई पड़ने लगे।

और जब एक चित्रकार वृक्ष के पास से निकलता है, तो उसे जो रंग दिखाई देते हैं, वे गैर—चित्रकार को कभी भी दिखाई नहीं दे सकते। और जब एक कवि उस वृक्ष के पास से निकलता है, तो उस वृक्ष के फूलों में जो काव्य लग जाता है—वह, जिसके पास कवि का हृदय नहीं है, उसे कभी भी अनुभव में नहीं आ सकता है। और उसी वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति दुकानदार की तरह बैठा हो, तो उसे वृक्ष में यह कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा।

तो जब हम वृक्ष को देखते हैं, तो वृक्ष को ही देखते हैं या हम भी उसमें समाविष्ट हो जाते हैं? या कि कोई ऐसा उपाय भी है कि वृक्ष को हम वैसा देख सकें, जैसा वृक्ष अपने में है—स्वयं को

उसके साथ संयुक्त किए बिना?

कुछ लोग सोचते रहे हैं कि यह संभव है। यह संभव नहीं है।

यह बस अप्राकृतिक है। देखने में, देखने वाला प्रविष्ट हो जाएगा। जैसा स्वरूप है जगत का, उसका ही यह हिस्सा है। और अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि हमने जो विज्ञान विकसित किया है, वह भी तथ्य कम है, व्याख्या ज्यादा है। जो हम देखते हैं, उसे हम शुद्ध नहीं देखते, वह हमसे सम्मिश्रित हो जाता है।

मनुष्य का कोई भी ज्ञान मनुष्य से मिश्रित हुए बिना नहीं बच सकता है। अगर यह ठीक है, अगर यह सत्य है, तो फिर हम नास्तिक के साथ भी विरोध करने का कोई कारण नहीं पाते। अगर वह कहता है, जगत में ईश्वर नहीं है, तो वह केवल इतना ही कहता है कि मेरी जो दृष्टि है, उससे जगत में ईश्वर दिखाई नहीं पड़ता है। तब आस्तिक से भी कोई कठिनाई नहीं है किसी को। अगर वह कहता है, मुझे जगत में ईश्वर दिखाई पड़ता है, तो वह असल में भाषा गलत उपयोग कर रहा है। उसे इतना ही कहना चाहिए कि जैसी मेरी दृष्टि है, उसमें मुझे जगत में ईश्वर दिखाई पड़ता है।

कृष्ण ने इस सूत्र की शुरुआत की है, अर्जुन को उन्होंने कहा है, हे अर्जुन! तुझ दोष—दृष्टि रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय ज्ञान के रहस्य को अब मैं कहूंगा।

दोष—दृष्टि रहित! भक्त की वह व्याख्या है। जब आप किसी व्यक्ति को दुश्मन की तरह देखते हैं, तब आप उसमें जो खोजते हैं, वह दोष के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता। ऐसा नहीं कि उसमें दोष ही दोष हैं क्योंकि कल वही आपका मित्र था और आपको दोष दिखाई नहीं पड़े थे। और कल आपने उसे प्रेम की आंख से देखा था, और उसमें आपको जो श्रेष्ठ है, उसका दर्शन हुआ था। और आज घृणा की आंख से उसी व्यक्ति में जो निकृष्ट है, वह दिखाई पड़ता है। कल आपको उस व्यक्ति में उज्ज्वल शिखर। दिखाई पड़े थे, आज उसी व्यक्ति में अंधेरी खाई दिखाई पड़ती है। कल आपने उसकी ऊंचाई को चुना था, आज आप उसकी नीचाई को चुन रहे हैं। और आप जो चुनना चाहते हैं, वही आपको दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है।

इसे ऐसा समझें कि मैं अगर अपने मकान की खिड़की के पास खड़ा हूं। बाहर आकाश में चांद निकला है। मैं चांद को देखूं तो खिड़की मुझे दिखाई नहीं पड़ेगी; खिडकी भूल जाएगी। चांद दिखाई पड़ेगा, आकाश में घूमते हुए बादल दिखाई पड़ेंगे; खिड़की विस्मृत हो जाएगी, खिड़की मौजूद ही नहीं होगी। मेरी दृष्टि से, मेरे दर्शन से खिड़की का विलोप हो जायेगा। लेकिन आप चाहें तो अपनी दृष्टि बदल ले सकते भूल जाएं चांद को, देखें खिड़की को।

जब आप खिडकी को देखेंगे, तो 'चांद पृष्ठभूमि में छूट जाएगा। और अगर आप ध्यानपूर्वक खिड़की को देखेंगे, तो चांद विलीन हो जाएगा; आकाश के बादल खो जाएंगे, बाहर के वृक्ष नहीं हो जाएंगे। खिड़की का चौखटा आपको दिखाई पड़ने लगेगा।

पश्चिम के मनसविद इसे गेस्टाल्ट कहते हैं। वे कहते हैं कि जब भी हम कुछ देखते हैं, तो हम जिस बात पर ध्यान देते हैं, वही हमें दिखाई पड़ता है, और जिस पर हम ध्यान नहीं देते, वह हमें दिखाई नहीं पड़ता। ध्यान ही हमारा अनुभव है।



तो जब मैं एक व्यक्ति को दुश्मन की तरह देखता हूं? तो मुझे कुछ और दिखाई पड़ता है, क्योंकि मेरा ध्यान किन्हीं और चीजों की तलाश करता है, और जब मैं मित्र की तरह देखता हूं, तब उसी व्यक्ति में मुझे कुछ और दिखाई पड़ता है, मेरा ध्यान कुछ और तलाश करता है। वह जो व्यक्ति बाहर है, उसे तो मैं जानता नहीं। जब भी मैं उस व्यक्ति के संबंध में कुछ भी निष्कर्ष निकालता हूं, तब वह मेरी ही व्याख्या है।

जगत को जो दोष—दृष्टि से देखेगा, जगत में उसे कुछ भी श्रेष्ठ दिखाई नहीं पड़ेगा; सत्य की कोई प्रतीति होती नहीं मालूम पड़ेगी, सौंदर्य का कोई अनुभव नहीं, काव्य की कोई प्रतीति नहीं, कोई पुलक नहीं; नृत्य का उसे कोई भी आभास नहीं होगा। जगत एक उत्सव है, यह उसकी प्रतीति नहीं बनेगी। जगत उसे एक उदास व्यवस्था मालूम पड़ेगी। आंसू उसे दिखाई पड़ सकते हैं, मुस्कुराहटें उसकी आंख से खो जाएंगी, ओझल हो जाएंगी। उसे कांटे दिखाई पड़ सकते हैं, फूल? फूल बस तिरोहित हो जाएंगे। और इन सबका जो जोड़ होगा, वही नास्तिक का जगत है।

दोष—दृष्टि से जगत को देखा जाए, तो नास्तिक के दर्शन का जन्म होता है। लेकिन भक्त जगत को और तरह से देखता है।

कृष्ण कहते है कि अब मैं तुझ दोष—दृष्टि रहित भक्त के लिए रहस्य की बात कहूंगा।

वह रहस्य की बात कही ही तब जा सकती है, जब दोष—दृष्टि मौजूद न हो। अन्यथा उसे कहा नहीं जा सकता, क्योंकि कहना व्यर्थ है। क्योंकि कहा भी जाए, तो सुना नहीं जा सकता। अगर अर्जुन अभी दोष देखने की मनोदशा में हो, तो कृष्ण रहस्य की परम गोपनीय बात को कहने में समर्थ नहीं हो सकते। अर्जुन सुन ही न पाएगा।

कृष्ण कहते हैं, अब मैं गोपनीय बात कह सकूंगा।

आठ लंबे अध्यायों की चर्चा के बाद कृष्ण श्रद्धा के सूत्र पर विचार करना शुरू करते हैं। अब तक वे तर्क की बात कर रहे थे। अब तक वे अर्जुन को समझाने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि अर्जुन नासमझ बने रहने की जिद्द पर अड़ा था। अब तक वे अर्जुन के संदेह काटने में लगे थे, क्योंकि अर्जुन संदेह पर संदेह खड़े किए जाता था। अब तक वे अर्जुन के नास्तिक से संघर्ष कर रहे थे। अब वे कहते हैं, तेरा नास्तिक विसर्जित हुआ। अब तेरी दोष—दृष्टि खो गई। अब तू संदेह से भरा हुआ दिखाई नहीं पड़ता। अब तेरे मन में दुविधा नहीं है। अब तू किसी जिद्द पर अडा हुआ नहीं है। अब तू विपरीत अपेक्षा से सोचेगा नहीं। अब तेरे हृदय का द्वार खुला। अब तू दोष—दृष्टि को छोड्कर देख सकेगा। तो मैं अब तुझसे परम गोपनीय रहस्य की बात कहता हूं।

जब चित्त संदेह से भरा हो, तो क्षुद्र बातें ही कही जा सकती हैं। उन्हें भी कहना मुश्किल है, क्योंकि क्षुद्र बातों पर भी संदेह खड़ा हो जाता है। जब गहन बातें कहनी हों, तो एक आत्मीयता चाहिए, एक इंटिमेसी, एक ऐसा नैकटय, एक ऐसा अपनापन, जहां संदेह भेद खडा नहीं करता है, जहां शंकाएं उठकर बीच में जो नैकटय की शांत झील बनी है, उस पर लहरें नहीं उठाती, कोई कंपन नहीं है संदेह का—तभी जो रहस्यपूर्ण है, वह कहा जा सकता है। जरा—सा भी संदेह का कंपन हो, तो रहस्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। कहना व्यर्थ है, क्योंकि सुना नहीं जा सकेगा। बताना फिजूल है, क्योंकि देखा नहीं जा सकेगा।

कृष्ण प्रसन्न होकर इस सूत्र को कहते हैं। इन आठ अध्यायों में उन्होंने निरंतर अर्जुन की बुद्धि से संघर्ष किया है, बुद्धि को काटा है। ताकि बुद्धि हट जाए, तो हृदय उभर आए। और बुद्धि जब तक काम करती है, तब तक हृदय विश्राम करता है। और जब बुद्धि विश्राम पर चली जाती है, तो हृदय सक्रिय हो जाता है। और कुछ रहस्य हैं, जो केवल हृदय से ही समझे जा सकते हैं। ऐसा समझें कि जो भी रहस्य हैं, वे हृदय से ही समझे जा सकते हैं। क्योंकि हृदय जरा—सी भी भेद की रेखा नहीं खींचता। हृदय निकट आ सकता है, बुद्धि दूर ले जाती है।

अगर दो व्यक्ति बैठे हों और उनके बीच बुद्धि का संबंध हो, तो उनके बीच इतना फासला है, जितना किन्हीं दो आकाश के तारों के बीच है। वे कितने ही निकट बैठे हों, वे एक—दूसरे के गले में हाथ डालकर बैठे हों; लेकिन अगर उनके बीच बुद्धि का आवागमन है, अगर उन दोनों के बीच विचार का लेन—देन है, अगर उनका संबंध बौद्धिक है, इंटलेक्चुअल है, तो वे इतने फासले पर हैं, जितने फासले पर दो बिंदु हो सकते हैं। लेकिन अगर दो दूर के ताराओं पर भी दो व्यक्ति बैठे हों, और उनके बीच विचार का आवागमन नहीं है, और हृदय के द्वार खुल गए हैं, तो वे इतने निकट हैं, जितने निकट कभी भी दो प्रेमी नहीं हुए।

नैकटय, निस्तरंग आत्मीयता का नाम है। जब दोनों के बीच कोई तरंग न उठती हो। जब अर्जुन अर्जुन न रहे और अपनी बुद्धि को तिलांजलि दे दे, तो ही कृष्ण जो रहस्य उसे कहना चाहते हैं, उसके कहने की भूमिका निर्मित होती है, अर्जुन पात्र बनता है।

अब तक उसने उठाए हैं सवाल। सवाल दो तरह से उठाए जाते हैं। एक तो इसलिए कि जो कहा गया है, उसे और गहरे में समझना है, तब सवाल हृदय से आते हैं। और एक इसलिए कि जो कहा गया है, उसे गलत सिद्ध करना है, तब सवाल बुद्धि से उठाए जाते हैं। एक तो तब, जब मैं जानता हूं पहले से ही कि सही क्या है, और उसके आधार पर सवाल उठाए चला जाता हूं। तब वे बुद्धि से उठाए जाते हैं। और एक तब, जब मुझे तो पता नहीं कि सही क्या है, लेकिन मैं सही को जानना चाहता हूं; तब हृदय से सवाल उठाए जाते हैं।

जो सवाल हृदय से आते हैं, वे संदेह नहीं हैं। वे प्रश्न सत्संग बन जाते हैं। और जो सवाल बुद्धि से आते हैं, वे सवाल दो के बीच खाई को और गहरा कर देते हैं।

बुद्धि और बुद्धि के बीच की खाई को पाटना असंभव है। बुद्धि और बुद्धि के बीच किसी तरह का सेतु निर्मित नहीं होता है। बुद्धि और बुद्धि के बीच सिर्फ टूट हो सकती है, मेल नहीं हो सकता। हृदय और हृदय के बीच टूट का कोई उपाय नहीं, मेल स्वाभाविक है। इसलिए कृष्ण ने पूरी कोशिश की हे कि अर्जुन की बुद्धि को काटकर गिरा दें। बुद्धि हट जाए, बुद्धि का पर्दा हट जाए, तो हृदय उन्‍मुख हो जाता है, सामने आ जाता है।

अब अर्जुन का हृदय कृष्ण को सामने मालूम पड़ रहा है। अब वे देख पा रहे हैं कि अब उसकी दोष—दृष्टि खो गई है। और जब दोष—दृष्टि खोती है, तो आंख से, चेहरे से, एक—एक भाव— भंगिमा से,  वह प्रकट होने लगती है।

जब आपके भीतर संदेह होता है, तो आपकी आंख भी संदेह से भर जाती है, आपके होंठ भी, आपकी भाव— भंगिमा भी। आपका प्राण ही संदेह से नहीं भरता, आपका रोआं—रोआं शरीर का संदेह से भर जाता है।

किसी दिन अगर विज्ञान समर्थ हो सका, तो संदेह से भरे हुए आदमी के खून में और श्रद्धा से भरे हुए आदमी के खून में अगर रासायनिक फर्क खोज ले, तो कोई आश्चर्य न होगा। अगर केमिकल फर्क मिल जाए, तो कोई आश्चर्य न होगा। क्योंकि विज्ञान यह तो अनुभव करने लगा है कि जब एक आदमी प्रेम से भरता है, तो उसके खून की केमिकल, उसके खून की रासायनिक व्यवस्था रूपांतरित हो जाती है। और जब एक आदमी क्रोध से भरता है, तब उसके खून की रासायनिक व्यवस्था रूपांतरित हो जाती है। उसके खून में जहर फैल जाता है। जब एक आदमी उदास होता है, तब उसके खून का रासायनिक रूप और होता है, और जब एक आदमी प्रफुल्लित होता है, आशा से, उमंग से भरा होता है, जब उसकी हृदय की धड़कनें आशा के गीत गाती होती हैं, तब उसके खून की रासायनिक व्यवस्था बदल जाती है।

शरीर का कण—कण भी बदल जाता है, जब भीतर का मन बदलता है; क्योंकि शरीर मन की छाया मात्र है। क्योंकि शरीर जो भी है, वह मन का ही प्रतिफलन है।

कृष्ण कहते हैं कि अब यह संभव है अर्जुन, तू दोष देखने वाली दृष्टि से मुक्त हुआ, रिक्त हुआ, खाली हुआ, तो अब मैं तुझसे रहस्य की बात कह सकूंगा।

दोष की दृष्टि क्या है? यह नकारात्मक देखने का ढंग क्या है? अगर मैं आपसे कहूं कि ईश्वर है, तो जो दोष की दृष्टि है, वह पूछेगी, कहां है? इसलिए नहीं कि उसे खोजना है; बल्कि सिर्फ इसलिए कि जो कहा गया है, वह सही नहीं है। भक्तों ने भी पूछा है कि कहां है? लेकिन इसलिए नहीं कि जो कहा गया है, वह गलत है, बल्कि इसलिए कि उसे कहां खोजें? कहां पाएं उसे? किस तरफ देखें? किस मार्ग पर चले?

भक्त ने जब भी कभी उसने पूछा है कि समझा, है। कैसे उसे पाएं? उसने जब भी प्रश्‍न उठाये है। तो वे प्रश्‍न है, कैसे? उनका रूप कुछ भी रहा हो। उसने यह पूछा है कि ठीक है, वह है। कहां है? कैसे उसे खोजें? क्या है मार्ग? क्या है विधि? कहां तक, कैसे मैं अपने को रूपांतरित करूं कि वह मुझे मिल जाए? उसने भी प्रश्न पूछे हैं, लेकिन उसके प्रश्न किसी अनुभूति की पिपासा से उठे हैं। और जब एक नकारात्मक दृष्टि पूछती है, तब वह यह पूछती है कि गलत है यह बात। कहां है? प्रत्यक्ष मेरे सामने लाकर रखो। यहां मेरे सामने हो, तो मैं मानूं। वह असल में यह कह रहा है कि अगर परमात्मा एक पदार्थ हो, तो मैं स्वीकार करूं। परमात्मा अगर एक वस्तु हो, तो मैं स्वीकार करूं। प्रयोगशाला में अगर परीक्षण हो सके, तो मैं स्वीकार करूं। मैं उसे डिसेक्ट कर सकूं? काट—पीट सकूं। जैसे कि चिकित्साशास्त्र का विद्यार्थी अपनी टेबल पर रखकर मेंढक को काट—पीट रहा है, जांच—पड़ताल कर रहा है, आदमी के अस्थिपंजर में खोज कर रहा है। ऐसा अगर तुम्हारा ईश्वर कहीं हो, तो लाओ, उसे रखो प्रयोगशाला की टेबल पर, सर्जरी की टेबल पर, हम उसे काटें—पीटें, उसे खोजें, क्या है उसके भीतर? कुछ है भी या धोखा है!

नकारात्मक दृष्टि विश्लेषण मांगती है,  तोडो, खंड—खंड करो, तभी हम स्वीकार करेंगे कि है। अगर हमने तोड़कर भी पाया कि है, तो ही हम मानेंगे कि है।

नकारात्मक दृष्टि खंड—खंड करने में भरोसा रखती है। अगर हम एक फूल दें, तो नकारात्मक दृष्टि तोडकर सौंदर्य की खोज करेगी। पंखुड़ियों को काट डालेगी। एक—एक रस को पृथक कर लेगी। एक—एक खनिज को तोड़ डालेगी। और तब अलग— अलग शीशियों में बंद करके फूल के सौंदर्य की खोज करेगी।

स्वभावत:, फूल का सौंदर्य नहीं मिलेगा; क्योंकि फूल का सौंदर्य फूल की पूर्णता में है, उसकी समग्रता में है, उसकी टोटेलिटी में है। तोड़ते ही खो जाता है। फूल का सौंदर्य उसके खंडों में नहीं, उसकी अखंडता में है। और जो भी अखंडता में है, नकारात्मक दृष्टि उसे कभी भी नहीं पा पाएगी।

परमात्मा परिपूर्ण अखंडता है। अगर फूल अपनी अखंडता में है, तो फूल की समग्रता। परमात्मा का अर्थ है, सारे अस्तित्व की समग्रता। पूरा अस्तित्व अगर एक फूल है, तो परमात्मा उसकी समग्रता का सौंदर्य है।

नकार की दृष्टि इंद्रियों पर भरोसा करती है। जो इंद्रियों को प्रतीत हो, वही सत्य है; जिसे इंद्रिया इनकार कर दें, वह सत्य नहीं है। लेकिन इस दृष्टि को भी धीरे— धीरे जैसे—जैसे गहरे उतरने का मौका मिला, उसे ऐसी बातों को स्वीकार करना पड़ा है, जिनकी इंद्रियां कोई भी खबर नहीं देतीं।

आज का सारा विज्ञान परमाणु की खोज पर खड़ा है, इंद्रियां उसकी कोई खबर नहीं देतीं। ज्यादा से ज्यादा हम परमाणु के जो परिणाम हो सकते हैं, इफेक्ट्स हो सकते हैं, उन्हें जान सकते हैं, लेकिन स्वयं परमाणु को नहीं। लेकिन इसी बुद्धि ने कल यह मानने से इनकार कर दिया था कि आदमी के भीतर प्रेम है। प्रेम के परिणाम तो दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि एक मां अपने जीवन के न मालूम कितने कीमती समय को प्रेम के लिए विलीन कर देती है! कि कोई प्रेमी अपने प्रेमी के लिए मर जाता है! जीवन को भी छोड़ देता है प्रेम के लिए!

तो प्रेम के परिणाम तो भारी हैं, लेकिन प्रेम को काटकर जानने का कोई भी उपाय नहीं है। तो फिर प्रेम एक कल्पना होगी। फिर प्रेम एक खयाल है, फिर उसकी कोई वस्तुगत सत्ता नहीं है, ऐसा जो मानते थे, वे भी परमाणु को स्वीकार करेंगे। और वे भी परमाणु के नीचे उतरेंगे, तो इलेक्ट्रांस को स्वीकार करेंगे। इंद्रियां उनकी कोई भी गवाही नहीं देतीं।

विज्ञान भी तोड़—तोड़कर इस नतीजे पर पहुंचा है कि वे जो अंतिम खंड हाथ में आते हैं, वे हाथ में आते ही नहीं। अंतिम खंड भी हाथ से चूक जाते हैं। इंद्रियों की पकड़ उन पर भी नहीं बैठ पाती। लेकिन एक और दृष्टि भी है, जिसे विधायक, पाजिटिव दृष्टि कहें। जो जीवन को तोड़कर नहीं, जोड़कर देखती है। जो पूछती है, तो इसलिए कि पहुंचें कैसे। जो सवाल भी उठाती है, तो इसलिए ताकि जवाब मिल सके। जवाब गलत है, इसलिए नहीं; ताकि जवाब किसी और का है अभी, कल मेरा भी कैसे हो जाए इसलिए।

आज जो कृष्ण कहते हैं, कल वह अर्जुन का भी हो जाए, इसलिए अगर सवाल पूछा जाए, तो उस सवाल की गरिमा और गौरव अलग है। उस सवाल की गुणवत्ता, उसकी क्वालिटी और है। कृष्ण को लगता है कि अर्जुन अब उस जगह आकर खड़ा हुआ है, जहां उसकी दोष की दृष्टि खो गई है। अब उससे परम रहस्य की बात कही जा सकती है।

वे कहते हैं, तुझ दोष—दृष्टि रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय ज्ञान के रहस्य को कहूंगा।

दोष—दृष्टि से जैसे ही कोई व्यक्ति रहित हुआ, वह भक्त हो गया। भक्त की इस परिभाषा को ठीक से हृदय में ले लें। क्योंकि भक्त से हम कुछ न मालूम क्या समझते हैं!

भक्त से हमारे मन में जो तस्वीर उठती है, वह बहुत बचकानी है। भक्त से हमारे मन में खयाल उठता है कि मंदिर में पूजा का थाल लिए जो खड़ा है! भक्त से हमारे मन में खयाल उठता है कि जो रोज नियम से, विधि से प्रार्थना कर रहा है! भक्त से हमें खयाल उठता है—जनेऊधारी, टोपी लगाए हुए, टीका लगाए हुए! भक्त से हमें कुछ खयाल उठते हैं; कुछ तस्वीरें मन में घूम जाती हैं। लेकिन भक्त का जो अर्थ है, वह है, जिसकी दोष—दृष्टि नष्ट हुई, जो अब जीवन को नकारात्मक ढंग से नहीं देखता; जिसने अब जीवन को उसकी विधायकता में देखने की तैयारी जुटा ली।

इसे हम ऐसा भी समझें, तो ठीक होगा, मैंने कहा कि नकारात्मक जो जीवन—दृष्टि है, वह चीजों को तोड़कर देखती है। तोड्ने के लिए हमारे पास एक शब्द है, विभक्त। चीजों को बांटती है, विभक्त करती है। भक्त का अर्थ इससे उलटा है, जो तोड़ता नहीं, जोड़ता है। भक्त का अर्थ है, जो जोड़ता है। विभक्त का अर्थ है, जो तोड़ता है।

अंग्रेजी में भक्त के लिए हम डिवोटी शब्द का उपयोग करते हैं। वह एकदम ही गलत है। उस डिवोटी से हमारी वही तस्वीर खयाल में आती है, मंदिर में पूजा का थाल लिए। ठीक भक्त का अगर अंग्रेजी में कोई शब्द हो सके पर्यायवाची, तो वह इंडिविजुअल है। लेकिन खयाल में नहीं आएगा। इंडिविजुअल शब्द का भी अर्थ होता है, दैट व्हिच कैन नाट बी डिवाइडेड, इनडिविजिबल। जो  तोड़ा न जा सके। जो टूटा हुआ न हो। जिसका भरोसा तोड्ने पर न हो। जोडा जा सके, जोड्ने की तैयारी हो, जुड़ा हुआ हो।

कार्ल गुस्ताव का ने अपने मनोविज्ञान को ए थियरी आफ इडिविजुएशन कहा है—एक होने का विज्ञान। भक्त का अर्थ भी वही है। भक्त का अर्थ है, जो जीवन को जोड्ने वाली दृष्टि से। देखने में समर्थ हुआ है। यह सामर्थ्य तभी आती है, जब हम तोड्ने वाली दृष्टि को छोड देते हैं, त्याग कर देते हैं। और जल्दी में कोई छलांग नहीं लगा सकता।

कृष्ण यह सूत्र गीता के प्रारंभ में भी कह सकते थे, लेकिन तब वह व्यर्थ हुआ होता। हममें से बहुत लोग ऐसे ही हैं, जो गीता के आठ अध्यायों की यात्रा न करते, सीधे इस सूत्र से शुरू करते। वे कृष्ण से भी ज्यादा समझदार अपने को सोचते होंगे!

कोई भी व्यक्ति सीधा भक्ति, में उतर कर बहुत असफलता पाएगा। क्योंकि जब तक बुद्धि अपनी दौड़—धूप को शांत न कर ले, तब तक भक्त का भाव उदय ही नहीं हो जाए तब तक बुद्धि थककर हार न जाए, पराजित होकर गिर न जाए, अपने ही हाथों अपनी आत्महत्या न कर ले—दौड़ ले, कोशिश कर ले, संघर्ष कर ले, विजय की चेष्टा कर ले, और सब विफल हो जाए—तब तक हृदय का आविर्भाव नहीं होता।

इसलिए हृदय का अर्थ, अज्ञान मत समझ लेना। इसलिए हृदय का अर्थ एक तरह का भोला— भाला बुद्धपन मत समझ लेना। इसलिए हृदय का अर्थ बुद्धि की कमजोरी मत समझ लेना। इसलिए यह मत समझ लेना कि जिनकी बुद्धि कमजोर है, वे बड़े धन्यभागी हैं। यह भी मत समझ लेना कि जो सोच—विचार नहीं सकते, उनका तो भक्ति का द्वार खुला ही हुआ है!

नहीं। भक्त तभी कोई हो पाता है, जब बुद्धि की सारी चेष्टाएं असफल हो जाएं। इसलिए भक्ति बुद्धि के पार ले जाती है, नीचे नहीं। और जो बुद्धि तक भी नहीं पहुंच पाते, ध्यान रखें, वे भक्ति तक नहीं पहुंच पाएंगे। यह मेरी बात कठोर मालूम पड़ेगी, क्योंकि भक्त ऐसा सोचते हैं कि ठीक है, बुद्धि का तो बहुत कठिन काम है। हमारे में तो बुद्धि है नहीं, तो हम तो मंदिर में घंटी बजाकर, फूल चढ़ाकर काम चला लेंगे!

इस धोखे में कोई भी न पड़े। जीवन के सत्य की प्रतीति श्रम मांगती है। और कोई भी क्षमा नहीं किया जा सकता। और जीवन के मंदिर के प्रवेश में सभी को संघर्ष के रास्ते से गुजरना ही पड़ता है। वह अनिवार्यता है। और पीछे का कोई भी दरवाजा नहीं है कि आप कोई रिश्वत देकर, कि भगवान की स्तुति करके पीछे के किसी द्वार से प्रवेश कर जाएं।

इसलिए कोई यह न सोचे कि भक्ति का मार्ग बड़ा सुगम है। कृष्ण खुद कहेंगे कि सुगम है। लेकिन ध्यान रखें कि यह आठ अध्यायों के बाद वे अर्जुन से कह रहे हैं। आठ अध्याय को मत भूल जाएं। अगर ऐसा ही सुगम था, तो कृष्ण बिलकुल पागल हैं! यह आधी गीता व्यर्थ! जब ऐसी सुगम ही बात थी, तो इसे शुरू में ही कह देना चाहिए था। इतनी देर तक अर्जुन का समय गंवाने की क्या है जरूरत? कठिन मार्ग पहले बताए, अब सुगम बताते हैं! सीधा गणित तो यही है। कि सुगम पहले बता दिया जाए। अगर सुगम हो सके तो कठिन बताया जाए।

नहीं कारण कुछ और है भक्‍ति सुगम है, अगर गीता के आठ अध्‍याय आप पार कर गये हो। तो निश्‍चित सुगम है। लेकिन अगर वे आठ आप सिर्फ उलट गये हों, छोड़ ही गए हों, तो भक्ति अति कठिन है। भक्‍ति की सुगमता बेशर्त नहीं है। उसमें एक शर्त है। और शर्त में ही सारा दांव है।

इसलिए लोग कहते सुने जाते हैं कि हमारा मार्ग तो भक्ति है। उनका मतलब यह होता है कि बुद्धि की झंझट में हम नहीं पड़ते। उनका मतलब यह होता है कि कौन उस उपद्रव में पडे! और अगर कोई बुद्धि की झंझट में पडा है, तो वे उसकी तरफ ऐसे देखते हैं, कि बेचारा।

अज्ञानी अपने अज्ञान में भी मजा लेते हैं। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, पढ़ने—लिखने से क्या होगा? उनका मतलब यह होता है कि पढ़ा—लिखा जो आदमी है, बेकार गया। ऐसे वे अपने मन में संतोष कमाते हैं।

मैं भी जानता हूं पढ़ने—लिखने से क्या होगा! लेकिन पढ़ने—लिखने से क्या होगा, यह बहुत पढ़े —लिखे आदमी की बात है। किताबें बेकार हैं, यह उसकी बात नहीं है, जिसे काला अक्षर भैंस बराबर है। यह उसकी बात है, जिसने किताबों में से गुजरकर देखा है और पाया है कि वे बेकार हैं। लेकिन किताबें बेकार हैं, यह किताबों से गुजरे बिना कभी किसी को अनुभव नहीं होता है। और बुद्धि बेकार है, यह बुद्धि के मार्ग से गुजरे बिना कभी भी पता नहीं चलता है। इतनी उपादेयता है। बुद्धि से गुजरकर फिर आदमी बुद्धि का भरोसा खो देता है।

लेकिन ध्यान रहे, इस भरोसे के खोने के लिए बुद्धि की बड़ी जरूरत है। इसलिए कृष्ण ने पूरी मेहनत की अर्जुन की बुद्धि के साथ। ऐसा नहीं कहा कि क्या जरूरत है ? तू भक्ति— भाव को ग्रहण कर ले, तू भक्त हो जा, समर्पित हो जा। मान ले मेरी, जो मैं कहता हूं।

कृष्ण भलीभांति जानते हैं कि दुनिया में कोई भी आदमी तब तक मान नहीं सकता, जब तक उसकी जानने की क्षमता पूरी तरह पराजित न हो जाए। जब तक प्रश्न गिर ही न जाएं, तब तक निष्प्रश्न चित्त पैदा नहीं होता। और जब तक संदेह अपनी पूरी चेष्टा और पूरा यत्न न कर लें, तब तक मरते नहीं हैं; दबाए जा सकते हैं। हमारे पास जो तथाकथित भक्तों का समाज है, वह दबाया हुआ समाज है। वे दबाए हुए संदेह उसके भीतर भी हैं। उसने कभी संदेहों को पार नहीं किया है। वह उनको दबाकर बैठ गया है उनके ऊपर। इसलिए उसकी भक्ति कमजोर और नपुंसक भी है। क्षणभर में डांवाडोल हो जाती है। इसलिए भक्त होकर भी वह डरता है। नास्तिक की बात सुनने में घबड़ाता है। कोई अगर ईश्वर के विपरीत बोलता हो, तो कान में हाथ डाल लेता है।

      इतनी घबड़ाहट भक्त को? इतना कमजोर भक्त? कि अगर वह राम का भक्त है—यह तो दूर की बात है कि नास्तिक की बात वह न सुने—अगर वह राम का भक्त है, तो कृष्ण की बात नहीं सुनेगा! इतनी नपुंसक भक्ति? इतनी कमजोर? इतनी दीन? भक्ति तो परम शक्ति है। जब उसका आविर्भाव होता है, तो उससे ज्यादा बलशाली कोई व्यक्ति ही नहीं होता। वह तो परम ऊर्जा का जागरण है। तो इस कमजोर भक्त और परम ऊर्जा के जागरण का क्या संबंध है?

 हम ऐसे भक्त हैं, जैसे अंगारे के ऊपर राख छा गई हो बस। थोड़ा अंगारा बुझ गया है, ऊपर—ऊपर राख हो गई है, भीतर अंगार जलती है। भीतर संदेह मौजूद हैं। इसलिए हम विपरीत बात से भयभीत होते हैं। भीतर संदेह मौजूद है, वही हमारा भय है। हम भलीभांति जानते हैं कि कोई भी राख को जरा—सी फूंक मार देगा, तो अंगारा भीतर से प्रकट हो जाएगा। ऐसी भक्ति का कोई भी मूल्य नहीं है, आत्मवचना है।

कृष्ण ऐसी भक्ति की बात नहीं कर रहे हैं। कृष्ण तो उन मनीषियों में हैं, जो पलायन में भरोसा नहीं करते, भागने में भरोसा नहीं करते, लड़ने में भरोसा करते हैं—बाहर के युद्ध में ही नहीं, भीतर के युद्ध में भी।

अर्जुन से उन्होंने पूरी टक्कर ली। अगर बुद्धि के खेल में अर्जुन को रस आ रहा है, तो कृष्ण ने भी उस रस में पूरा भाग लिया। उन्होंने यह नहीं कहा कि यह क्या तू बुद्धि की बातें करता है, बेकार! क्योंकि किसी के बेकार कहने से कुछ भी बेकार नहीं होता है। बल्कि अक्सर तो यह होता है, बेकार कहने से और भी ज्यादा रसपूर्ण हो जाता है। उन्होंने यह नहीं कहा कि बंद कर। श्रद्धा जन्मा!

श्रद्धा कोई जन्माई नहीं जाती। उन्होंने यह नहीं कहा कि भरोसा रख। क्योंकि किसी के कहने से अगर भरोसा आता होता, तो सारी दुनिया कभी की भरोसे से भर गई होती। कृष्ण भलीभांति जानते हैं कि भरोसा कहने से पैदा नहीं होता, भरोसा तो बुद्धि की असमर्थता से जन्मता है।

ध्यान रखें, जब बुद्धि असहाय हो जाती है, तभी श्रद्धा का जन्म होता है। जब बुद्धि थककर गिर जाती है, और पाती है कि अब एक इंच भी गति का उपाय नहीं है. बुद्धि के मरघट पर ही श्रद्धा का बीज अंकुरित होता है।

इसलिए कमजोर बुद्धि की नहीं, बड़ी संघर्षशील बुद्धि की जरूरत है, बड़ी जीवंत बुद्धि की जरूरत है। और भक्ति को ऐसा मत समझ लें कि वह उनका काम है, जिनके पास बुद्धि नाम मात्र नहीं है। भक्ति उनका काम है, जिनके पास बुद्धि की यात्रा के भी पार जाने का समय आ गया है; जो बुद्धि के भी ऊपर उठने के करीब पहुंच गए हैं, जो उस सीमा—रेखा पर, सीमांत पर खड़े हो गए, जहां बुद्धि समाप्त होती है, और भक्ति और हृदय की यात्रा शुरू होती है।

इसलिए कृष्ण ने कहा कि तुझ भक्त के लिए।

अब तक अर्जुन एक जिज्ञासु था। एक खोज थी उसकी। समझना चाहता था, लेकिन बुद्धि से। अब वह भक्त हुआ। अब वह समझना चाहता है, लेकिन अब खोज पिपासा बन गई है।  अब हृदय की अभीप्सा है। अब तक जो था, वह शब्दों का जाल था। अब अपने को दाव पर लगाने की भी हिम्मत उसमें आ गई है। इसलिए वे कहते हैं कि इस परम गोपनीय ज्ञान को रहस्य के सहित कहूंगा। यह ज्ञान परम गोपनीय है, गुप्त रखने योग्य है; न कहा जाने योग्य है।

बड़ी उलटी बात कृष्ण कहते हैं, कि जो गोपनीय है, उसे कहूंगा!

उसे कहूंगा, जिसे नहीं कहना चाहिए!  उसे कहूंगा, जो कहने पर भी नहीं कहा गया है! गोपनीय का यह अर्थ होता है, जो गुप्‍त है स्‍वयं है, उसको रहस्य सहित कहूंगा! उस गोपनियता का जो भी रहस्‍यमयता है। उसके आस पास जो रहस्‍य का आभा मंडल है। उसे भी उघाड़कर कहूंगा। जिसे नहीं उघाड़ना उसे निरवस्‍त्र करूंगा। जिसे छूपाये रखना ही उचित है, उसे अब नहीं छूपाऊंगा। क्‍यों?

कुछ बातें खयाल में ले लें।'

पहली बात, जब तक हृदय में भक्‍ति का भाव न हो तब तक कोई भी ज्ञान खतरनाक सिद्ध हो सकता है। विज्ञान का ज्ञान ऐसे ही खतरनाक सिद्ध हो रहा है। ज्ञान खतरनाक नहीं होता, लेकिन ज्ञान जिसके हाथ में जाएगा, अगर उसके पास भक्त का भाव न हो, तो ज्ञान का खतरा निश्चित है।

विज्ञान ने बड़े ज्ञान की खोज की और पदार्थ के गुह्यतम रहस्यों को बाहर ले आया। लेकिन उसका परिणाम हिरोशिमा और नागासाकी हुआ। और उसका परिणाम अब यह है कि खुद वैज्ञानिक चिंतित हैं कि हमने पाप किया। ओपेनहेमर ने, या आइंस्टीन ने, जिन्होंने अणु की ऊर्जा के विस्फोट में सर्वाधिक काम किया, उनके भी अंतिम क्षण बड़े दुख और पश्चात्तापपूर्ण थे, अपराधपूर्ण थे, एक भारी गिल्ट, छाती पर एक बोझ था। लीनियस पालिंग या और दूसरे वैज्ञानिक भी अपने जीवन के अंतिम क्षणों में एक ही चीज से परेशान हैं। और वह परेशानी यह है कि हमने जो ज्ञान मनुष्य को दे दिया है, कहीं वह ज्ञान ही तो मनुष्य का आत्मघात सिद्ध न होगा? कहीं उसके कारण ही तो जगत विनष्ट नहीं हो जाएगा? हमने तो सोचा था कि ज्ञान सदा ही हितकारी है, लेकिन अब ऐसा मालूम नहीं पड़ता।

ज्ञान सदा हितकारी नहीं है। कभी—कभी तो अज्ञान भी हितकारी है। गलत आदमी के हाथ में अज्ञान ही ठीक है। सही आदमी के हाथ में ज्ञान ठीक हो सकता है, क्योंकि ज्ञान शक्ति है। बेकन ने कहा है, नालेज इज पावर—ज्ञान शक्ति है। और शक्ति अगर गलत हाथों में है, तो खतरा निश्चित है।

भक्त का अर्थ है, अब जो गलत नहीं कर सकता। भक्त का अर्थ है, जिसके भीतर से गलत करने वाली बुद्धि विलीन हो गई। भक्त का अर्थ है, जिसने जीवन में अब परम को देखने की क्षमता जुटा ली। अब वह निकृष्ट के लिए प्रयासशील नहीं होगा। उसके हाथ में शक्ति भी दे दी जाए, तो अब कोई खतरा नहीं है।

विज्ञान को जो भूल आज समझ में आ रही है, भारत को पांच हजार साल पहले किसी दूसरे  संदर्भ में समझ में आ गई है। जिसे आज विज्ञान पदार्थ में गहरे उतरकर समझ रहा है, और पश्चिम के सारे वैज्ञानिक सारे सम्मेलन एक ही बात पर चिंता कर रहे है। कि क्‍या अब जो ज्ञान हमें मिल रहा है। वह सर्व समान्‍य के लिए सुलभ किया जाना चाहिए या नहीं। जो ज्ञान हमें मिल रहा है, वह राजनैतिक ताकत तक पहूंचना चाहिए या नहीं? जो हम जान लेंगे, हम कैसे समझें कि अगर हमने उसे प्रकट किया, तो वह अहितकार सिद्ध नहीं होगा? सिर्फ कौन रोके? यह जो ज्ञान हाथ में आ जाए

इसे रोके कौन? यह रुकेगा कैसे? इसे छिपाओगे कैसे?

बहुत आश्चर्य न होगा, अगर आने वाले पंद्रह वर्षों में सारी दुनिया के वैज्ञानिकों को इकट्ठा होकर यह तय करना पड़े कि सिर्फ वैज्ञानिक ही वैज्ञानिक अनुसंधान से हुई उपलब्धियों को जान सकेंगे, बाकी कोई नहीं। और शायद उन्हें ऐसी भाषा विकसित करनी पड़े—जों विकसित हो रही है—कि जिस भाषा को गैर—वैज्ञानिक समझ ही न सके। आज भी नहीं समझ सकता। आज भी वैज्ञानिक की भाषा धीरे— धीरे स्पष्ट रूप से गोपनीय होती चली जा रही है।

ठीक ऐसा ही एक अनुभव आत्मज्ञान का भारत को भी हुआ है। उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। भारत ने भी मनुष्य के अंतभेंदन में उस जगह को उपलब्ध कर लिया, जहां परम शक्ति का स्रोत था। उन सूत्रों को छिपाने का सवाल उठ गया, क्योंकि उन सूत्रों का बताया जाना खतरनाक हो सकता था।

इसलिए एक गोपनीय गुह्य—ज्ञान, एक इसोटेरिक नालेज निर्मित हुई। और उसे यहां तक गुह्य करना पड़ा कि उसे शास्त्र में भी न लिखा जाए; क्योंकि शास्त्र भी पढ़े जा सकते हैं। या इस ढंग से लिखा जाए कि पढ़ने वाला कुछ और समझे, वह नहीं, जो कहा गया है। या इस ढंग से लिखा जाए कि उसके अनेक अर्थ हो सकें, और पढ़ने वाला जब तक जानता ही न हो, तब तक अनेक अर्थों में खो जाए। या इस ढंग से लिखा जाए कि उसके दो अर्थ हो सकें। एक, जो सामान्य आदमी समझ ले, और पाए कि बिलकुल ठीक है, और एक वह आदमी समझे, जिसके हाथ में कुंजियां हैं।

फिर बहुत वर्षो तक, किताबें न लिखी जाएं, इसका आग्रह रहा। हजारों वर्षों तक हमने ज्ञान को मुखाग्र रखा, नहीं लिखने की चेष्टा की। मजबूरी में वह लिखा गया। इसलिए नहीं, जैसा कि पश्चिम के विचारक समझते हैं कि ज्ञान तब लिखा गया, जब लिखने का आविष्कार हुआ। नहीं; क्योंकि जो ज्ञान का आविष्कार कर सकते थे, वे निश्चित ही लिखने का आविष्कार कर सकते थे। लिखना बड़ी छोटी बात है। जो ज्ञान का आविष्कार कर सकते थे, वे लिखने का आविष्कार न कर सकते हों, यह बात समझ में आने जैसी नहीं है। असंगत है।

नहीं, जानने का आविष्कार रोका गया लिखने से हजारों वर्षों तक, ताकि वह जनसामान्य तक न पहुंच जाए; वह गोपनीय रखा जा सके। लिखने की मजबूरी तो तब आई, जब इतनी शाखाएं हो गईं उस ज्ञान की, और गुप्त मार्गों से यात्रा कर—करके वह इतने लोगों के हाथ में और इतने ढंगों से पहुंच गया कि अब जरूरी हो गया कि सुस्पष्ट हो सके, कि जो —जो बातें लोगों ने बीच में मिला ली होंगी, वे ठीक नहीं हैं। इसलिए स्मृति से उसे कागज तक उतारने की चेष्टा करनी पड़ी। ' फिर भी उसे सूत्रों में लिखा गया। सूत्र का मतलब होता है, उसे वही समझ सकेगा, जो सूत्र की भाषा में निष्णात है। अगर आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धात के फार्मूले को हम लिखें, तो तीन छोटे—छोटे शब्दों में पूरा हो जाता है, तीन वर्णों में पूरा हो जाता है। पूरा का पूरा उसका जीवन—दर्शन, जिस पर आधुनिक विज्ञान की सारी आधारशिला खड़ी है, आपके नाखून पर लिखा जा सकता है। बस, उतनी ही उसकी खोज है, शेष सब विस्तार है। लेकिन उस नाखून पर लिखे हुए सूत्र को आप समझ नहीं पाएंगे। वह भाषा और है।

सूत्र का मतलब होता है, संक्षिप्त, सार। इतना सार कि उसे वही जान सके, जिसे पूरे विस्तार का पता हो। सूत्र से विस्तार नहीं जाना जा सकता, विस्तार पता हो, तो सूत्र खोला जा सकता है। सूत्र जो है, वह स्मरण रखने के लिए है, ताकि पूरे विस्तार को याद न रखना पड़े। तो शास्त्र सूत्रों में लिखे गए।

फिर उन सूत्रों को भी जहां तक बन सके ओरल ट्रेडीशन से—गुरु शिष्य को कहता रहे, और शिष्य अपने शिष्यों को कहता रहे। सीधा मुंह से ही कहे, ताकि कहने में उसका जीवन भी समाविष्ट हो जाए। ताकि जब वह कहे, तो उसकी आत्मा भी उसमें प्रवेश कर जाए। जब वह कहे, तो उसका अनुभव भी उस कहे हुए को रंग और रूप दे जाए। अन्यथा खाली शब्द चली हुई कारतूस जैसे होते हैं। अनुभव से सिक्त, अनुभव से भरे, अनुभव के रस में डूबे हुए और पके हुए शब्द भरी हुई कारतूस की तरह होते हैं। तो सूत्र गुरु अपने शिष्य को कह दे। वह भी कान में कह दे।

अभी भी कान में कहे जा रहे हैं सूत्र! लेकिन बड़े अजीब सूत्र। कान में गुरु किसी से कह देता है कि राम—राम जपना, यह मंत्र दे दिया।

कान में वही बातें कही जाती थीं, जो सुनने वाले ने पहले कभी सुनी ही न हों। राम—नाम का आप सूत्र दे रहे हैं उसको, वह भलीभांति सुना हुआ है। और फिर भी उसको कह रहे हैं कि किसी को बताना मत, गुप्त रखना!

कभी—कभी चीजें बेहूदगी की सीमा को भी पार कर जाती हैं! सूत्र थे वे, जो सुनने वाले ने कभी सुने ही नहीं थे। जो उसकी चेतना में पहली दफे अवतरित किए जा रहे थे। और इसलिए गुरु ही कहे उनको, क्योंकि उसके पास उसके पूरे जीवन से निकला हुआ, अनुभव से आया हुआ सूत्र है। वह दूसरे की चेतना पर ट्रांसफर करे। वह हस्तांतरण था एक अनुभव का, सूत्रबद्ध। और साधना से फिर उस सूत्र के अर्थ को खोज लेने के उपाय थे।

कृष्ण कहते हैं, मैं उन गोपनीय बातों को तुझसे कहूंगा, और रहस्य के सहित कहूंगा।

क्योंकि सिर्फ गोपनीय बातें कह देने से कुछ भी न होगा। उनका अर्थ भी बताना होगा। उनका रहस्य भी समझाना होगा। कि जिसको जानकर तू दु:खरूप संसार से मुक्त हो जाएगा।

ज्ञान मुक्ति है। जो जान लेता है, वह दुख के बाहर हो जाता है। इसलिए नहीं कि जानना कोई नाव है और दुख कोई सागर है; कि जानने की नाव मिल गई, तो आप पार हो जाएंगे।

नहीं। बात थोड़ी और ही है। असल में अज्ञान ही दुख है। जान लिया, तो सागर विलीन हो जाता है, नाव की कोई जरूरत नहीं रह जाती।

अज्ञान और दुख पर्यायवाची हैं। अज्ञान के कारण ही दुख है। ऐसा नहीं कि दुख है, और मैं अज्ञानी हूं। मैं अज्ञानी हूं इसलिए दुख है। मेरा अज्ञान ही मेरा दुख है। तो जिस दिन मैं जान लूंगा, उस दिन दुख तिरोहित हो जाएगा। ऐसा नहीं कि जानने के बाद फिर ज्ञान की नौका बनाकर और दुख के भवसागर को पार करूंगा। दुख का कोई भवसागर नहीं है। मेरा अज्ञान ही मेरा दुख है। मेरा अज्ञान ही मेरी पीड़ाओं का जन्मदाता है। मेरे अज्ञान के कारण ही मैं उलझ गया हूं। मेरे अज्ञान के कारण ही मैं अपने ही पैरों पर अपने ही हाथों कुल्हाड़ी मारे चला जाता हूं। मैं अपने अज्ञान के कारण ही अपने को ही जहर से भर लेता हूं। और अमृत से वंचित रह जाता हूं। वह मेरी ही भूल है। सिर्फ भूल है।

इसे थोड़ा समझ ले, क्‍योंकि यह बात बहुत कीमती है।

पश्‍चिम में जो धर्म पैदा हुए, उन्‍होने आदमी के पाप पर जोर दिया है। यह बुनियादी फर्क है। इस्लाम यहुदी ओर इसाईयत। ये तीनों यहूदी परंपरा के हिस्से हैं?

और दूनिया में दो ही तरह के धर्म की परमपरा है। एक यहूदी धर्म परंपरा और एक हिंदू धर्म परंपरा। बस दो। जो भी धर्म दुनियां में पैदा हुए है या तो वह यहूदी धर्म परंपरा से जन्‍मे है, उनकी शाखाएं है; या जो धर्म पैदा हुए है—जैसे जैन, बौद्ध...वे हिंदू धर्म परंपरा की शाखाएं—परशाखाएं है। ये दो तरह की धर्म परंपराएं हैं। और इन दोनों धर्म परंपराओं की बुनियादी बात समझने  जैसी है।

पश्चिम के जो भी धर्म हैं, यहूदी धर्म से संबंधित जो भी धर्म हैं, वे सभी धर्म पाप को मनुष्य का मूल कारण मानते हैं दुख का। भारत के सभी धर्म अज्ञान को दुख का मूल कारण मानते हैं, पाप को नहीं। इसलिए क्रिश्चिएनिटी कहती है, दि ओरिजिनल सिन, वह जो मूल पाप है, वही सब दुखों का आधार है। भारत कहता है, वह जो मूल अज्ञान है, वही सब दुखों का आधार है।

और यह जरा सोचने जैसा है। क्योंकि भारत का यह कहना है कि पाप भी अगर हो सकते हैं, तो तभी, जब अज्ञान हो। इसलिए पाप मूल नहीं हो सकता, अज्ञान उससे भी पहले चाहिए। पापी होने के लिए भी अज्ञानी होना जरूरी है। आदमी अगर गलत भी करता है, तो इसीलिए कि उसके जानने में कहीं भूल है। यह बहुत मजे की बात है कि कोई आदमी जानकर गलत नहीं कर सकता है!

लेकिन आप कहते हैं कि नहीं, मुझे पता है कि सच बोलना। चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, फिर भी मैं झूठ बोलता हूं!

आपको पता नहीं है। सुन लिया होगा आपने। किसी ने कहा होगा। कहीं पढ़ा होगा। लेकिन भीतर गहरे में आप यही जानते हैं कि झूठ बोलने में ही फायदा है। भीतर आप यही जानते हैं। जानना आपका झूठ के ही पक्ष में है। आपने कितना ही सुना हो कि सच बोलना ठीक है, लेकिन आप भीतर जानते हैं कि वह दूसरों के लिए ठीक है। और इसलिए भी ठीक है दूसरों के लिए कि अगर दूसरे सच न बोलें, तो मैं झूठ कैसे बोल पाऊंगा? अगर मेरे झूठ को भी सफल होना है, तो वह तभी सफल हो सकता है, जब बाकी लोग सच बोल रहे हो।

इस लिए झूठ बोलने वाला भी लोगों को समझाता रहता है, सच बोलो क्‍योंकि अगर सारी दुनियां  झूठ बोलने लगे, तो झूठ बिलकुल व्‍यर्थ हो जायेगा। आखिर बेईमानी के सफल होने के लिए भी कुछ तो ऐसे समझदार चाहिए। जो चोरी नहीं करते है, नहीं तो बहुत मुश्किल हो जाएगो।


 अगर यहां सारे लोग बैठे है, और सभी जेबकट है; जो तो जेब नहीं कटेगी। फिर जेब किसकी काटिएगा। और क्‍या फायद? कोई मतलब नहीं; बात बेकार हो गई, जेबकट सकती है, इसलिए कि कोई जेब कट नहीं है। इसलिए जेब कट भी समझता है, जेब काटना बहुत बुरा है। समझना चाहिए।

आप जानते हैं कि सच बोलना ठीक है, दूसरों के लिए, समझाने के लिए; चेहरे बनाने के लिए; प्रदर्शन के लिए। लेकिन जब मौका आए, तो कुशलता से झूठ बोलना ही उचित है, वह आप भीतर जानते हैं। आपके भीतर झूठ ही आपका भरोसा है, सच नहीं।

आप कहते हैं, मैं जानता हूं क्रोध करना बुरा है। लेकिन यह आप तभी जानते हैं, जब कोई दूसरा क्रोध कर रहा होता है, या आप यह तब जानते हैं, जब आपका क्रोध आकर जा चुका होता है। लेकिन जब क्रोध होता है, तब आपका रोआं—रोआं जानता है कि क्रोध ही उचित है, आपका रोआं—रोआं कहता है कि क्रोध ही उचित है।

भारत कहता है, अज्ञान के अतिरिक्त न कोई पाप है और न कोई दुख; और ज्ञान के अतिरिक्त कोई मुक्ति नहीं है।

इसलिए पश्चिम के विचारक को समझ में नहीं आता कि भारतीय साधु ध्यान करके क्या करता है? सेवा करनी चाहिए! और विवेकानंद और गांधी के प्रभाव में ईसाइयत का यह भाव, नासमझी से, हिंदू मन में भी प्रविष्ट हो गया है। हिंदू मन भी डरता है। वह भी कहता है, क्या फायदा? ध्यान से क्या होगा? अस्पताल खोलो। ध्यान से क्या होगा? जाकर गरीबों के झोपड़े में सेवा करो। रवींद्रनाथ ने गाया है कि मैं तो भगवान वहीं देखता हूं, जहां मजदूर गिट्टी फोड़ रहा है। रवींद्रनाथ को पता नहीं है कि अगर मजदूर कभी ऐसा वक्त आ गया और उसने गिट्टी न फोडी, तो रवींद्रनाथ भगवान को कहां देखेंगे! वे कहते हैं, मैं तो भगवान वहीं देखता हूं, जहां भिखारी भिक्षा मांग रहा है। उसकी सेवा करो। यह ठीक है, बुरा नहीं है, बहुत अच्छा है। उचित है कि सेवा की जाए। लेकिन इसमें मौलिक भेद हैं।

भारतीय साधु ध्यान पर जोर देता रहा है, क्योंकि ध्यान से ज्ञान जन्मेगा। और ईसाइयत जोर दे रही है सेवा पर, पुण्य पर, क्योंकि पुण्य से पाप कटेगा। मौलिक आधारों का भेद है। अगर ज्ञान चाहिए, तो ध्यान मार्ग होगा। और अगर पाप काटना है, तो पुण्य उपाय है।

लेकिन भारतीय मनीषा कहती है कि अगर बिना ज्ञान के तुम पुण्य भी करने लगे, तो पुण्य भी तुम्हें बहुत गहरे नहीं ले जाएगा। क्योंकि अज्ञानी के पुण्य का मूल्य कितना है? और अज्ञानी की सेवा किसी भी क्षण खतरनाक हो सकती है। और अज्ञानी की सेवा के पीछे भी अज्ञान तो खडा ही रहेगा।

तो मूल रोग तो हटता ही नहीं है। मैं आपकी गर्दन नहीं काटता, आपके पैर दबाने लगता हूं। लेकिन मैं तो मैं ही हूं, वही का वही। मेरे भीतर जो चेतना है, वह वही की वही है। उसमें कोई भेद नहीं पड़ गया है। मेरे लोभ अपनी जगह खडे हैं; लेकिन उनका रूप बदल गया, मिट नहीं गए। मेरा क्रोध अपनी जगह खड़ा है। लेकिन उसका मार्गातीकरण हो गया, सब्लिमेशन हो गया। लेकिन वह अपनी जगह खड़ा है। और नए—नए रूपों में प्रकट होता रहेगा।

भारत कहता है, जानने के अतिरिक्त कोई मुक्ति नहीं है। और इसलिए कहता है कि जो जान लेता है, वह उससे विपरीत नहीं जा सकता। अगर मुझे पता है कि यह आग है, तो मैं हाथ नहीं डालता हूं। और अगर कभी डालता भी हूं तो भलीभांति जानकर डालता हूं कि यह आग है और मैं जलूंगा। फिर मैं जलने के लिए पछताता नहीं हूं। फिर जलने के लिए रोता नहीं फिरता हूं। फिर जलने के लिए शिकायत नहीं करता हूं। फिर बात ही शिकायत की नहीं है। मैंने जानकर जो किया है, तो फिर इस जगत में कोई शिकायत का उपाय नहीं है। मैं जिम्मेवार हूं।

लेकिन जानकर कोई आग में हाथ नहीं डालता है। डालने का कोई कारण नहीं है। अज्ञान में हाथ चला जाता है आग में, और दुख पैदा होता है। अज्ञान दुख है। हम सब तरह की आग में हाथ डालते हैं। हालांकि यह हो सकता है कि जब हम हाथ डालते हैं, तब हमको आग दिखाई ही न पड़ती हो।

अज्ञान में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता; आदमी अंधे की तरह चलता है। सोचते हैं कि यह अच्छा है, और बुरा होता है। सोचते हैं, यह भला है, और भला नहीं निकलता। सोचते हैं? यह फूल हैं, और जब मुट्ठी बांधते हैं, तो काटा छिद जाता है और लहूलुहान हो जाते हैं। लेकिन फिर भी कुछ नहीं सीखते। फिर कल एक फूल दिखाई पड़ता है, फिर जोर से मुट्ठी बांधते हैं, फिर कांटा चुभता है, फिर रोते हैं। परसों फिर एक फूल दिखाई पड़ता है, फिर हाथ मुट्ठी बांधते हैं, फिर वही दुख।

लेकिन यह खयाल नहीं आता कि जरा फूल को अब गौर से देख लें, कहीं हर फूल कांटा तो नहीं है? या मेरे यह मुट्ठी बांधने में ही तो कांटे के चुभने की पैदाइश नहीं है? यह मेरा मुट्ठी बांधने का जो आग्रह है, यही तो मेरा दुख नहीं है? और मैं यह फूल से जो आकर्षित हो जाता हूं, यह क्यों हो जाता हूं? यह मेरी जो आत्मा फूल की तरफ बहने लगती है, यह जो आसक्ति और यह जो राग पैदा हो जाता है, यह क्यों हो जाता है? इस सबके मूल को जो जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है।

तो कृष्ण कहते हैं, इस ज्ञान को जानकर तू इस दु:खरूप संसार से मुक्त हो जाएगा।

लेकिन ध्यान रखें, जानकर, सुनकर नहीं। कृष्ण को कहना चाहिए था, हे अर्जुन, इस ज्ञान को सुनकर तू मुक्त हो जाएगा! अर्जुन बहुत प्रफुल्लित हुआ होता। आप भी प्रफुल्लित होते रहे हैं। लोग सोचते हैं, शास्त्रों को सुनकर धर्म हो जाएगा। लोग सोचते हैं, गीता को सुनकर ज्ञान हो जाएगा। इतना सस्ता अगर ज्ञान होता, तो अज्ञानी किसी को होने की जरूरत ही न थी। सुनकर नहीं होगा। इसलिए इफेटिकली, जोर देकर कृष्ण कहते हैं, जिसको जानकर!

लेकिन हम सुनने को भी जानना समझ लेते हैं। जो—जो आप सुनते हैं, वह आपका ज्ञान हो जाता है। यह बड़ी मजे—की बात है। अखबार पढ़ लिया, आप ज्ञानी हो गए। गीता पढ़ लिया— आप ज्ञानी हो गए! जो भी पढ़कर आपकी स्‍मृति में चला गया, आप ज्ञानी हो गए।

स्मृति ज्ञान नहीं है। लेकिन हमारा स्‍कूल विश्‍वविद्यालय स्‍मृति को ज्ञान बताता है। सारा संसार स्‍मृति को ही ज्ञान मानकर चल रहा है। हम कहते है, एक आदमी बहुत जानता है, क्‍योकि उसकी बहुत स्‍मृति है, हम कहते है कि एक आदमी को गीता कंठस्‍थ है। उनका कंठ पागल हो गया है, और तो कोई सार नहीं है। कंठस्‍थ से क्‍या होगा? फलां आदमी को वेद कंठस्‍थ हो गये है। उसकी गरिमा है। कंठ का क्‍या कसूर है। कंठ को क्‍या परेशान कर रहे हो?

कंठ बड़ा ऊपर है, उससे कुछ हृदय बदलता नहीं। और कंठ में मैं बहुत खोजा, कोई एकाध अज्ञानी मिल जाए। वह मिलता ही नहीं। जिनके ज्ञान अटक जाता है, उनकी फांसी लग जाती है। फांसी में सब ज्ञानी हैं! और छोटे—मोटे ज्ञानी नहीं हैं, सब ब्रह्मज्ञानी हैं! होता नहीं। बोलने के लिए हो सकता है। दूसरे को बताने के लिए हो सकता है। खुद के जीवन के लिए उसका कोई संबंध नहीं होता। जानने का अर्थ स्मृति नहीं है।

जानने का अर्थ है, अनुभव। तो कृष्ण कहते हैं, जो मैं तुझे रहस्य बताऊंगा, काश! तू उसे जान ले, अनुभव कर ले, तो दुख के सागर से मुक्त हो जा सकता है।

पर जानना और जानने में फर्क है। एक जानना है, वह हम सब जानते हैं। एक आदमी कहता है, ईश्वर है। जाना उसने बिलकुल नहीं है। इससे तो बेहतर वह नास्तिक है, जो कहता है, मुझे कुछ पता नहीं चलता ईश्वर का। मैं कैसे मानूं? यह नास्तिक शायद किसी दिन आस्तिक भी हो जाए! लेकिन वह जो पहला आस्तिक है, जो कहता है, ईश्वर है। क्योंकि उसने सुना है, क्योंकि उसके घर में कहा गया है, क्योंकि परंपरा से बात चली आई है। क्योंकि उसके पितृ ने, उसके गुरु ने कहा है। क्योंकि शास्त्र में पढ़ा है। या भय की वजह से, या मौत के डर से, या सहारे के लिए, वह माने चला जा रहा है। लेकिन वह कहता है, मैं जानता हूं ईश्वर है।

जानने शब्द का प्रयोग जरा सोचकर करना, ईमानदारी से करना। और जो आदमी जानने का ईमानदार अर्थ सीख जाए, उसकी जिंदगी में क्रांति हो जाती है। लेकिन हम सब बेईमान हैं। जानने के संबंध में हम बिलकुल बेईमान हैं।

आप जरा एक बार अपनी खोपड़ी में वापस खोज—बीन करना। कितना है, जो आप जानते हैं? तब आपको पता चलेगा कि संभावना जीरो हाथ लगेती है। जीरो भी लग जाए, तो बहुत है। पाएंगे कि सब सूना हुआ है जोर से पकड़े बैठे हैं, और डरते भी हैं कि जांच--पड़ताल की अगर पता चल गया कि अपना जाना हुआ नहीं और डरते भी है जांच पड़ताल भी नहीं करते। और ऐसे लोग के पास जाते रहते है जो आपकी इस नासमझी को मजबूत करते रहते है, कहते हे, सुनते रहो। सुनते—सुनते हो जाएगा।

सुनते—सुनते बहरे हो जायेंगे, और सुनते—सुनते सुनना बंद हो जाएगा। और सुनते—सुनते आपको बहम पैदा होगा, इलूजन पैदा होगा। कि सब जान लिया।

 हमारा मुल्क ऐसे ही ज्ञान से इतने पीड़ित और परेशान है! हम इतने अज्ञान पिडित नहीं है हमारा मुल्क में अज्ञानी तो कोई है ही नहीं। मैं बहुत खोजा, कोई एकाध अज्ञानी मिल जाए। वह मिलता ही नहीं। सब ज्ञानी है। और छोटे—मोटे ज्ञानी नहीं है; ब्रह्मज्ञानी है।

 

कृष्ण कहते हैं, जान लेगा अगर तू तो दुख से मुक्त हो जाएगा। यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा और सब गोपनीयों का भी राजा एवं अति पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला और धर्मयुक्त है, साधन करने को बड़ा सुगम और अविनाशी है।

दो बातें। कृष्ण कहते हैं, श्रेष्ठतम है यह ज्ञान। इससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। यह राजविद्या है, समस्त विद्याओं में श्रेष्ठ। क्योंकि और विद्याओं से आदमी अपने अलावा कुछ भी जान ले, खुद को नहीं जान पाता। और विद्याओं से आदमी अपने को छोड्कर सब कुछ पा ले, अपने को नहीं उपलब्ध हो पाता। और जब मैं अपने को ही न जान पाऊं, सब भी जान लूं; और अपने को न उपलब्ध हो सकूं? और सब पा लूं; तो भी उस पाने और जानने का अर्थ क्या है?

इसलिए कृष्ण कहते हैं, यह परम ज्ञान है, राजविद्या है, परम विज्ञान है। इससे तू स्वयं को जान लेगा। और जो स्वयं को जान लेता है, वह सब जान लेता है।


और यह जो ज्ञान है, यह सनातन है। यह न कभी पैदा हुआ है और न कभी इसका अंत होगा। इसलिए इस ज्ञान से जो संयुक्त हो जाता, वह भी अविनाशी हो जाता है। और एक बड़ी कीमती बात कहते हैं कि साधन करने को सुगम है।

उसके लिए सुगम है, जो इसका अभ्यास करेगा। जो सुनेगा, उसे बड़ा दुर्गम है। जो सिर्फ सुनेगा, चलेगा नहीं, उसे बड़ा कठिन है। जो चलेगा भी, उसे बड़ा सरल है।

इस सरलता में दो बातें छिपी हैं। एक तो मैंने कहा, यह आठ अध्याय के बाद कही गई सुगमता है। अर्जुन तैयार है, पात्र है। अगर आप पात्र हैं, तो सुगम होगा। अगर आप पात्र नहीं हैं, तो सुगम नहीं होगा। आप पर सब कुछ निर्भर करता है। इस अध्याय को पढ़कर कई लोग समझते हैं कि बस, बात ही सुगम है। खत्म हो गया, कुछ करने को भी नहीं है।

इस अध्याय को सीधा मत पढ़ना! आपकी पात्रता निर्मित होनी चाहिए। आपकी दोष—दृष्टि खो गई है, तो यह सुगम है; यह शर्त है। यह बेशर्त नहीं है। महात्मागण समझाते रहते हैं लोगों को कि कलियुग में तो भक्ति का साधन ही एकमात्र सुगम साधन है। सतयुग में कहते, तो थोडा ठीक भी होता। क्योंकि भक्ति जितना शुद्ध हृदय चाहती है, उतना सतयुग में भी मुश्किल है।

महात्मागण समझाते हैं कि भक्ति सुगम साधन है कलियुग में। अजीब—सी और नासमझी की बात है। भक्त का हृदय जितना शुद्ध हो, उतना तो सतयुग में भी पाना मुश्किल होता है, तो कलियुग में कैसे आसान हो जाएगा? वे कहते हैं, राम—राम का नाम ले लिया, तो कलियुग में बड़ा सुगम साधन है। लेकिन नाम लेने के लिए जो पात्रता चाहिए, वह कहा से लाइएगा? नाम तो कोई भी ले लेता है। लेकिन जो शुद्ध हृदय चाहिए, जिसमें वह राम के नाम का फूल लगे, वह शुद्ध हृदय कहां है?

लेकिन लोगों को, आसान है कोई बात, ऐसा समझकर भी बड़ी राहत मिलती है। इसलिए कई बार तो यह हो जाता है कि कठिनाई से डरे हुए लोग, कोई भी बात कोई कह दे कि आसान है, तो उसके पीछे लग जाते हैं। इसलिए नहीं कि वह आसान है, बल्कि इसलिए कि वे कठिनाई से बहुत डरे हुए हैं।

और ध्यान रहे, जो कठिनाई से डरा है, वह परमात्मा से कभी भी न मिल सकेगा। क्योंकि वह परम कठिनाई है। वहा तो अपने को खोने की और मिटाने की हिम्‍मत चाहिए। वहा तो आखिरी दाव का साहस चाहिए। वह तो आखिरी एडवेंचर, दुस्साहस है। जैसे कोई छलांग लगाता हो किसी अनंत गड्ढ में, जिसके नीचे की तलहटी दिखाई ही न पड़ती हो। वह तो ऐसा है।

तो सरल का मतलब यह नहीं होता कि आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। आपकी पात्रता हो, उस पात्रता के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। जैसे मैं कह सकता हूं कि पानी तो एक क्षण में भाप बन जाता है, लेकिन इसका यह मतलब मत समझ लेना कि पानी को गरम नहीं करना पड़ता। सौ डिग्री तक पानी को गरम होना ही पड़ता है। सौ डिग्री पर एक क्षण में भाप बन जाता है। लेकिन सौ डिग्री की गर्मी एक क्षण में नहीं आती। सौ डिग्री की गर्मी के लिए वक्त लगता है। ये दोनों बातें सच हैं। अगर कोई पूछे कि पानी क्षणभर में भाप बनता है कि समय लेता है, तो क्या कहिएगा? दो तरह के चिंतन दुनिया में रहे हैं। एक जो कहते हैं,  तत्काल निर्वाण हो सकता है, उपलब्धि हो सकती है। और एक जो कहते हैं,  क्रमश:, सीढ़ी—सीढ़ी उपलब्धि होती है। उन दोनों में बड़ा संघर्ष रहा है, लेकिन एकदम नासमझी से भरा हुआ। क्योंकि उनकी बातचीत ठीक वैसी ही है, जैसे कोई पानी के संबंध में तय करे कि पानी क्षण में भाप बनता है कि समय लगता है! क्या कहिएगा?

पानी दोनों करता है। और पानी को बांटा नहीं जा सकता। सौ डिग्री तक गरम होने में उसे वक्त लगता है। और मजे की बात यह है कि निन्यानबे डिग्री से भी पानी अगर गर्म होना बंद हो जाए, तो वापस लौट जाएगा, भाप नहीं बनेगा। साढ़े निन्यानबे डिग्री से भी वापस लौट जाएगा। रत्तीभर कमी रह जाए सौ डिग्री में, तो पानी पानी ही रहेगा। और अगर गर्मी देनी बंद हो जाए, तो वापस लौट जाएगा।

सौ डिग्री पर आकर छलांग घटित होती है, और तत्काल पानी भाप हो जाता है। यह घटना तो क्षण में घटती है। कहना चाहिए, क्षण के भी हजारवें हिस्से में घटती है। कहना चाहिए, समय के बाहर घटती है। जरा भी समय नहीं लगता पानी के भाप बनने में, लेकिन पानी को सौ डिग्री तक पहुंचने में बहुत समय लगता है।

भक्त बनने में बहुत समय लगता है। भक्‍ति को उपलब्‍धि तो क्षण भर में हो जाती है। भक्त सौ डिग्री में उबलता हुआ व्‍यक्‍ति है।

 तो आप यह मत सोचना की आप उठे और भक्‍त हो गये। आप बिलकुल ठंडे पानी हैं। डर तो यह है कि आप बर्फ न जमे हो। फ्रीजन जिसको पहले पिघलाना पड़े, तब कहीं वह सौ डिग्री तक पहूंचने में पचास बार कहे कि कोई और र्साट कट नहीं है। कहां इतना समय लग रहा है।

तो सुगम है बहुत, अगर आपका हृदय भक्त होने की परिभाषा को पूरा करता हो। लेकिन दूसरी बात भी कही है कि इतने से ही सुगम हो जाएगा, ऐसा नहीं है। भक्त का भी हृदय हो। और सुन लें सिर्फ, तो कुछ भी न होगा। फिर वापस गिर जाएंगे। सौ डिग्री तक पहुंचकर भी वापस गिरने का डर है, जब तक कि भाप बन ही न जाएं। इसलिए चलना भी पड़ेगा।

कृष्ण कहते हैं, साधन करने को बड़ा सुगम है।

बड़ा सरल है, अगर साधन करना हो। अगर सुनना ही हो, तो बहुत कठिन है। लेकिन हमें उलटी बात समझ में आती है। हमें लगता है, सुनना हो, तो बड़ा सुगम है; करना हो, तो बड़ा कठिन है। सुनना हमें सरल मालूम पड़ता है। लेकिन मैं भी आपसे कहता हूं, सुनना कठिन है। क्योंकि जिसे आप जानते ही नहीं हैं, उसे सुन कैसे सकिएगा? और जिसका आपको पता ही नहीं है, वह आपकी समझ में कैसे आएगा? और जिसे आपने जाना ही नहीं है, किसी के भी शब्द—वे कृष्ण के क्यों न हों—वे शब्द आपको कुछ भी न बता पाएंगे। वह भाषा ही अनजानी, अपरिचित है।

एक आदमी अरबी में आपके पास बोल रहा हो, आपको वहम होता है कि सुन रहे हैं, क्या खाक सुन रहे हैं! एक आदमी चीनी में बोले चला जा रहा है आपको लगता है कि सुन रहे हैं, लेकिन क्या सुन रहे हैं? लेकिन चीनी और अरबी के मामले में झंझट नहीं है। आप समझते हे कि यह भाषा हमें आती ही नहीं!

आप भूल में मत पड़ना यह की भाषा आपको और भी बड़ी अरबी और भी बड़ी चीनी है। यह बिलकुल नहीं आ सकती है। अरबी में थोड़ा समझ जाए, उस आदमी की आंख, उस आदमी के होंठ की गति को समझ जाये। उसकी भाव भंगिमा कुछ कह दे। यह कृष्ण तो भाव—रहित है। इसके होठो से कुछ पता नहीं चलेगा। इसकी आँख कुछ न कहेगी, क्‍योंकी ऐसे व्‍यक्‍ति ऐसे शून्‍य हो गए होते हैं, कह रहे हैं, कठिन है इनसे कुछ पता लगाना। और जो यह कह रहे है, वह भाषा समझ में आती हुई मालूम पड़ती है, समझ में बिलकुल नहीं आती। वह भाषा बिलकुल ही कठिन है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं कि सुनने में तो नहीं है सुगम, लेकिन अगर तू करे, तो सुगम है।

अगर कोई अंधा मुझसे कहे कि प्रकाश मुझे समझा दो, तो समझाना बहुत कठिन है। लेकिन अगर वह कहे कि मेरी आंख का इलाज करवा दो, या मेरी आंख का कोई अभ्यास करवाओ, जिससे मेरी आंखें खुल जाएं, तो मैं कहता हूं —वह सुगम है। अंधे की आंख खुल सकती है किसी दिन और वह प्रकाश को देख सकता है। कोई मुझसे कहे कि प्रेम समझा दो मुझे, तो कठिन है बहुत। लेकिन अगर वह तैयार हो प्रेम में कूद पड़ने को, प्रेम करने को, तो सुगम है। जीवन में अनुभव के अतिरिक्त और कोई सुगमता नहीं है। शब्द सुगम मालूम पड़ते हैं, बिलकुल दुर्बोध हैं। शब्दों से कुछ भी समझ में न कभी आया है, न आ सकता है। सिर्फ अनुभव, सिर्फ अपनी ही प्रतीति, अपना ही साक्षात्कार प्रकट करता है सत्य को।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, सुगम है, साधन करने को बड़ा सुगम है। 

और हे परंतप, इस ज्ञानरूप धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मेरे को प्राप्त न होकर मृत्युरूप चक्र में परिभ्रमण करते हैं।

जो श्रद्धारहित हैं, वे सुन लें, समझ लें, चलने की भी कोशिश करें, तो भी मुझ तक नहीं पहुंचते। मुझ तक तो वे ही पहुंचते हैं, जो श्रद्धायुक्त हैं। कारण?

कारण, परमात्मा तक पहुंचने का द्वार हृदय है। कारण, परमात्मा तक पहुंचने का भाव प्रेम है। कारण, उस तक पहुंचने की जो तैयारी है, वह केवल श्रद्धायुक्त हृदय में होती है। यह श्रद्धायुक्त हृदय का अर्थ है, ट्रस्टिंग हार्ट, भरोसा करने वाला हृदय।

छोटा बच्चा है, वह कहता है कि मुझे सूरज  देखने चलना है। या कहता है कि बगीचे में सुना है कि फूल खिले हैं, मुझे देखने चलना है। या कहता है कि सागर में बड़ी तरंगें आई हैं, मुझे देखने चलना है। या कुछ और कहता है। उसका पिता कहता है, मेरा हाथ पकड़ और चल!

बेटा कह सकता है कि तुम्हारा हाथ पकड़कर चलूं? रास्ते में तुम छोड़ तो न दोगे? तुम्हें अपने हाथ का पक्का भरोसा है कि मैं भटक तो न जाऊंगा? क्या तुम्हें पक्का खयाल है कि तुम जहां ले जा रहे हो, वह जगह है? और पहले तुम मुझे सब तर्कयुक्त रूप से समझा दो कि सूरज है, कि सागर है, कि फूल खिले हैं, कि पक्षी गीत गाते हैं। जब मैं सब समझ लूं,  तब मुझे यह भी समझाओ कि तुम धोखेबाज तो नहीं हो? तब तुम मुझे यह भी बताओ कि तुम्हारे हाथ से तुमने कभी किसी को पहुंचाया भी है कि मुझको ही पहुंचाते हो? और मैं कैसे मानूं कि तुमने किसी को पहुंचाया है? इसकी कोई गवाहियां हैं? और फिर मैं कैसे मानूं कि वे गवाहियां तैयार की हुई नहीं हैं?

यह सब वह पूछने लगे, तो असंभव है यात्रा। लेकिन बेटा उठकर खड़ा हो जाता है, और पिता का हाथ पकड़ लेता चल पड़ता है। यह पिता का हाथ पकड़ने में जो भाव बेटे का है, उसका नाम श्रद्धा है।

श्रद्धा का अर्थ है, एक गहरा अपनापन, एक भरोसा। श्रद्धा का अर्थ है, एक आत्मीयता, अज्ञात के प्रति, अनजान के प्रति भी भरोसे का भाव।

ध्यान रहे, श्रद्धा करके भूल भी हो जाए, तो हानि नहीं है; और अश्रद्धा करके लाभ भी हो जाए, तो हानि है। अश्रद्धा करके लाभ भी हो जाए, तो हानि है। क्योंकि अश्रद्धा से जो मिलेगा, वह दो कौड़ी का होगा; लेकिन अश्रद्धा मजबूत हो जाएगी, जो कि बहुत बड़ी हानि है। श्रद्धा करके हानि भी हो जाए, तो हानि नहीं है, लाभ ही है। क्योंकि श्रद्धा की, यह बड़ी घटना है।

इस जगत में जो सबसे बड़ी घटना है, वह श्रद्धा है। यह बड़ी हैरानी की बात है। खयाल में न आएगा। क्योंकि श्रद्धा एक असंभव बात है, इपासिबिलिटी। किसी पर श्रद्धा करना एक असंभव बात है। क्योंकि हमारी पूरी की पूरी बुद्धि सब तरह के अडंगे खड़े करेगी। वह कहेगी अर्जुन से कि यह कृष्ण! यह मेरे साथ खेला है और मुझसे कहता है, श्रद्धा! यह कृष्ण! इसके गले में मैं हाथ डालकर नाचा हूं कूदा हूं, यह मुझसे कहता है, श्रद्धा! यह कृष्ण! जिससे मौका पड़ा है, तो कुश्ती भी की है, यह कहता है, श्रद्धा! यह कृष्ण जो कि मेरा सारथी होकर खड़ा है इस युद्ध में, मुझसे कहता है, श्रद्धा! यह कृष्ण! इसको भी चोट लग जाती है, तो हाथ से खून निकल आता है। इसको भी भूख लगती है। रात नींद नही आती है, तो सुबह थका—मादा होता है। यह मुझ से कहता है, श्रद्धा! यह कृष्ण भी मरेगा। यह कृष्ण भी एक दिन पैदा हुआ। यह कृष्ण भी प्रेम में पड़ता है, यह गोपियों के साथ नाचता है। यह, कृष्ण भी लेन—देन करता है, राजनीति चलाता है। मुझ से कहता है, श्रद्धा! अर्जुन को हजार सवाल आने स्वाभाविक हैं। और बिलकुल प्राकृतिक हैं।

श्रद्धा बड़ी असंभव घटना है। श्रद्धा ऐसा फूल है, जो कभी—कभी करोड़ों में कभी एक बार खिलता है। लेकिन जब खिलता है, तो उससे अनंत के द्वार खुल जाते हैं।

तो कृष्ण कहते हैं, श्रद्धारहित होकर, तो फिर मुझ तक कोई नहीं पहुंच पाता है। क्योंकि मुझ तक पहुंचने का द्वार और सेतु ही श्रद्धा है। और जो मुझ तक नहीं पहुंचता, वह मृत्यु और जन्म, जन्म और मृत्यु, मृत्यु और जन्म के पहिए में घूमता रहता है, भटकता रहता है। 

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...