सोमवार, 24 जून 2024

 सच्चे प्रेम में ईष्या की कोई झलक ही नहीं होती। सच्चे प्रेम में तो श्रद्धा अनंत होती है। मगर सच्चा प्रेम सच्चे प्रीतम से ही हो सकता है।  यहां कैसे भरोसा करो किसी पर! जिस पति पर तुमने भरोसा कियाजिस पत्नी पर तुमने भरोसा कियाउसकी सांस बंद हो जाए कलजीवन खो जाए--क्या करोगेऔर मन ऐसा चंचल है--आज तुमसे लगाव हैकल किसी और से हो जाए! मन इतना चंचल है!  कल कोई और धनी मिल जाएकोई और सुंदर देह का व्यक्ति मिल जाएकल कोई और रूपवान मिल जाए--तो बात खत्म हो गई।
परमात्मा से और रूपवान तो पाया नहीं जा सकताऔर परमात्मा से और धनी भी नहीं पाया जा सकता। परमात्मा से और ऊपर तो कोई है नहीं। इसलिए परमात्मा के साथ जो प्रेम बन जाता है उसमें कोई प्रतिस्पर्धाकोई ईष्या नहीं जन्मती।
और फिर परमात्मा के साथयह भी भय नहीं है कि वह तुम्हें छोड़ दे। तुम्हें पकड़े ही हुए है। तुम चाहे उसे पकड़ो या न पकड़ो--उसका हाथ तुम्हारे हाथ में है ही। तुम जब सोचते हो तुमने परमात्मा का ध्यान भी नहीं कियाविचार भी नहीं किया--तब भी वही तुम्हें सम्हाले हुए है। अन्यथा कौन तुम्हारे भीतर श्वास लेगाकौन तुम्हारे खून को दौड़ाएगा रगों मेंकौन तुम्हारे हृदय में धड़केगातुम चाहे उसे इनकार करोपरमात्मा ने तुम्हें इनकार कभी नहीं किया है। इसलिए जिस दिन तुम भी स्वीकार कर लोगेवह तो स्वीकार किए ही है--जिस दिन ये दोनों स्वीकृतियां मिल जाएंगीउसी दिन महामिलन हो जाता है।

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