रविवार, 1 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 9

 वासना और उपासना


      ते तं भुक्त्‍वा स्वर्ग्लोकं विशलं क्षीणे पुण्ये मर्त्‍यलोकं विशान्‍ति।

एवं त्रयींधर्ममच्छुयन्‍ना गतरगतं काक्कामा लभन्ते।। 21।।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभिस्त्युक्‍तानां योग्स्सेमं वहाम्यहम्।। 22।।


और वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरूष बारंबार जाने-आने को प्राप्त होते हैं।

और जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से उपासते है, उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले पुरुषों का योग-क्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं।


मन बाहर तो बांटता ही है, भीतर भी बांटता है। मन से बाहर जो भी हम जानते हैं, वह तो खंड-खंड हो ही जाता है, मन के ही कारण हम भीतर भी खंड-खंड हो जाते हैं। मन के इस दूसरे पहलू को भी समझ लेना जरूरी है।

मन के साथ कभी भी कोई व्यक्ति एक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि एक भीड़ होता है। भीतर भी मन एक नहीं है, अनेक है। सदा से आदमी ऐसा समझता रहा है कि उसके भीतर एक मन है। वैसा सत्य नहीं है। आपके भीतर बहुतेरे मन हैं, बहु-मन हैं। अब मनोविज्ञान स्वीकार करता है कि मैन इज पोलीसाइकिक; बहुत मन हैं भीतर, एक मन नहीं है। ये बहुत मन भी इसीलिए हैं कि मन जहां भी चरण रखता है, वहीं खंड हो जाते हैं।

समझें, भीतर मन की इस खंड-खंड हो गई स्थिति को भी समझना जरूरी है।

आपने शायद ही कभी ऐसी कोई मन की दशा पाई हो, जिसके विपरीत स्वर आपके भीतर मौजूद न रहा हो। किसी को आपने किया हो प्रेम और साथ ही उसे घृणा न की हो, ऐसा असम्भव है। किसी को की हो श्रद्धा, और साथ ही भीतर मन का एक हिस्सा अश्रद्धा से न भरा रहा हो, असंभव है। चाहा हो किसी को, और साथ ही चाह से बचना भी न चाहा हो, ऐसा नहीं होगा।

मन जब भी कुछ तय करता है, तो द्वंद्व में ही तय करता है; उसका विपरीत स्वर भी भीतर मौजूद होता है। जिसको आप मित्र मानते हैं, कहीं किसी मन की गहराई में उसे आप शत्रु भी मानते हैं। इसीलिए तो मित्रता इतनी जल्दी शत्रुता बन जाती है! अन्यथा जिस आदमी को मैं पचास साल तक मित्र समझा हूं एक क्षण में शत्रु कैसे हो जाएगा? कोई उपाय नहीं है; कोई रासायनिक प्रक्रिया नहीं है कि पचास साल की मित्रता एक क्षण में, एक शब्द से शत्रुता बन जाए। बन जाती है लेकिन। गहरे खोजेंगे, तो पाएंगे, ऊपर मित्रता बन रही थी, भीतर शत्रुता भी पल रही थी। इसलिए एक क्षण में मित्रता नीचे चली गई, शत्रुता ऊपर आ गई। यह सिर्फ पलड़ा भारी हो गया। जब हम एक पलड़े पर तराजू के मित्रता रख रहे थे, तभी हम शत्रुता भी दूसरे पलड़े पर रखे जाते थे। यह सिर्फ समय और संयोग की बात है कि जिस दिन भी पलड़ा भारी हो जाएगा शत्रुता का, उसी दिन शत्रुता प्रकट हो जाएगी। लेकिन मन से कोई आदमी किसी को अनन्य भाव से मित्र नहीं बना सकता है।

मन, एक तरह की समझें  एक लोकतंत्र है। मन पार्लियामेंटरी है। उसमें जो भी निर्णय होते हैं, वे बहुमत से होते हैं, लेकिन अल्पमत विरोध में खड़ा ही रहता है। और भरोसा नहीं है कि जो सदस्य आज पक्ष में मत दिया है, वह कल भी देगा। मन के भीतर भी दल-बदलू सदस्य हैं। वे दल बदल लेते हैं।

तो हम जो भी निर्णय मन से लेते हैं, वह मेजर माइंड का होता है। हमारे भीतर जो मन का बहुमत होता है, वह कहता है, ठीक। लेकिन अल्पमत प्रतीक्षा करता है कि कितनी देर तक ठीक! समय आएगा, स्थिति बदलेगी, और हम तोड़ लेंगे। इसलिए हमारा मन कभी भी एक स्वर उपलब्ध नहीं कर पाता। कर भी नहीं सकता है। मन के काम करने का ढंग ही द्वंद्व है।

 मन के साथ निरंतर ही एक डायलाग है, एक वार्तालाप है, जो मन अपने को ही दो हिस्सों में तोड़कर चलाए चला जाता है।

जब आप सोचते हैं कुछ, तो आपका मन दो हिस्सों में टूट जाता है; एक पक्ष में बोलता है, एक विपक्ष में बोलता है। समस्त विचार, मन का दो हिस्सों में टूटकर वार्तालाप है। एक खेल है, जो आप भीतर खेलते हैं; इस तरफ से भी, उस तरफ से भी।

यह जो मन का भीतर भी दो हिस्सों में टूट जाना है और बाहर भी जगत दो हिस्सों में टूट जाता है, इसके परिणाम क्या होते हैं? पहला परिणाम तो यह होता है कि जगत में हमें उस एक के दर्शन नहीं हो पाते, जो कि सबके भीतर छिपा है। और जब भीतर भी द्वंद्व हो जाता है, तो भीतर भी उस एक के दर्शन नहीं हो पाते हैं, जो मौजूद है।

तो चाहे कोई बाहर उस एक को देख ले, शर्त एक ही होगी कि मन को छोड्कर देखे; और चाहे कोई भीतर उस एक को देख ले, शर्त फिर भी वही होगी कि मन को छोड्कर देखे। और जब भीतर का एक दिखाई पड़ता है, तो बाहर और भीतर का द्वंद्व भी गिर जाता है। क्योंकि वह भी दो की भाषा है। भीतर और बाहर, वह भी दो की भाषा है। जब भीतर का एक दिखाई पड़ता है, तो भीतर और बाहर दोनों खो जाते हैं, एक ही रह जाता है। जब बाहर का एक दिखाई पड़ता है, तब भी एक ही रह जाता है, भीतर और बाहर का द्वंद्व खो जाता है।

इसे अगर हम संक्षिप्त में कहें, तो ऐसे, कि समस्त धर्म की यात्रा मन को खोने की यात्रा है, और समस्त संसार की यात्रा मन को शक्तिशाली करने की यात्रा है। संसार का अर्थ है, मन को शक्तिशाली किए जाना। धर्म का अर्थ है, मन को विसर्जित किए जाना। धर्म का अर्थ है, ऐसी चेतना को पा लेना, जहां मन न हो। और संसार का अर्थ है, ऐसे मन को पा लेना, जहां चेतना न हो, मन ही मन रह जाए, आत्मा बिलकुल पता न चले।

ऐसा हो जाता है। कभी किसी नदी पर देखा हो, पत्तों की बाढ आ जाती है, काई छा जाती है। सारी नदी ढंक जाती है, कुछ दिखाई नहीं पड़ता। नीचे के जल का कण भी दिखाई नहीं पड़ता। सारी नदी की छाती पर पत्ते फैल जाते हैं, नदी भीतर छिप जाती हैं।

ठीक ऐसे ही, मन इतना फैल जाता है-फैल सकता है-कि वह जो आत्मा है, वह बिलकुल दिखाई पड़नी बंद हो जाए। नदी बिलकुल मौजूद है। एक पत्ते का जरा-सा फासला है। पत्ते की मोटाई ही कितनी है? लेकिन फिर भी दिखाई नहीं पड़ती, ओझल हो जाती है।

संसार का अर्थ है, मन ही मन रह जाए और आत्मा का बिलकुल पता न चले।

आपको अपनी आत्मा का पता चलता है?

ऐसे ही मन को समझाने के लिए मत कह लेना कि हां, पता चलता है। आत्मा का पता चलना आसान नहीं है। क्योंकि हमारी सारी चेष्टा तो मन को मजबूत करने की है। ये जो मन के पत्ते हैं, इनको ही तो हम शक्ति दिए चले जाते हैं। और फिर इन्हीं को हम फैलाए चले जाते हैं। फिर भी हम मानते हैं कि आत्मा है। वह मानना भी हमारे मन का एक विचार है। वह भी मन का एक पत्ता है।

हम मानते हैं कि आत्मा है। वह भी मन के ही कारण है। इसलिए वह मानना भी हमारा कभी पूरा नहीं हो पाता। जरा-सी असुविधा आती है और शक पैदा हो जाता है कि है भी, या नहीं है।

द्वंद्व कोई भी हो-चाहे लोभ का हो, अलोभ का हो; भय का हो, अभय का हो-द्वंद्व कोई भी हो, सत्य का हो, असत्य का हो, जीवन का हो, मृत्यु का हो, इससे कोई संबंध नहीं है। द्वंद्व की भाषा, मन की भाषा है।

कृष्ण इस सूत्र में कहते हैं कि वे लोग, जो सकाम साधना करते हैं अर्थात सुख की मांग करते हैं, वे फिर-फिर वापस लौट आते हैं। क्योंकि सुख की साधना का अर्थ है, दुख को हम अंगीकार करने को राजी नहीं है, दुख को इनकार करते हैं, सुख को अंगीकार करते हैं।

द्वंद्व शुरू हो गया। कुछ है, जिसे हम कहते हैं, यह नहीं चाहिए; और कुछ है, जिसे हम कहते हैं, यह चाहिए। हमनें विभाजन कर लिया। हमने जीवन को अविभाज्य स्वीकार नहीं किया। यह टोटल एक्सेप्टिबिलिटी नहीं है कि हम समग्र जीवन को स्वीकार करते हैं, जीवन जैसा है, हम राजी हैं। इसमें हम भेद करते हैं कि हम जीवन के इस पहलू से राजी हैं, सुख दे जीवन तो हम राजी हैं, दुख दे तो हम राजी नहीं है।

लेकिन कठिनाई यह है कि दुख जो है, वह सुख की छाया है। तो मुझसे कोई राजी है, वह कहता है, आओ मेरे घर, लेकिन अपनी छाया को अपने साथ मत लाना; निमंत्रण है, स्वागत है, लेकिन छाया को छोड्कर आना।

ज्यादा से ज्यादा मैं इतना ही कर सकता हूं कि छाया को पीछे छिपाकर आ जाऊं, छोड्कर तो कैसे आ सकता हूं! इस भांति आऊं कि छाया सामने न पड़े, पीछे छिपी रहे। और जब घर में मैं प्रवेश करूंगा, तो छाया भी प्रवेश कर जाएगी। क्योंकि छाया को कांटा नहीं जा सकता।

दुख सुख की छाया है। जो सुख को मांगता है, वह दुख को भी मांग रहा है। जानकर नहीं मांगता, क्योंकि कोई दुख को नहीं मांगता है। फिर भी उसे पता नहीं कि वह मांगे या न मांगे, सुख की मांग में ही दुख को भी निमंत्रण मिल जाता है। दुख पीछे आता है, सुख सामने दिखाई पड़ता है। जब भेंट होती है, तो थोड़ी देर में सुख बिखर जाता है और दुख की राख हाथ में आ जाती है।

बार-बार हमें यह अनुभव होता है। जहां-जहां सुख पर मुट्ठी बांधते हैं, आखिर में पाते हैं कि दुख हाथ में रह गया। और जहां-जहां सुख के सपने संजोते हैं, वहीं-वहीं पाते हैं कि सिवाय दुख के, दुखस्वप्नों के कुछ हाथ नहीं लगता है। जहां-जहां सुख का फूल खोजने जाते हैं, वहां-वहां दुख का कांटा चुभ जाता है। लेकिन फिर भी मन मांगे चला जाता है सुख को। और जितने जोर से मांगता है, उतने ही जोर से दुख आए चला जाता है।

इस मांग को हम बदल भी सकते हैं, बदल लेते हैं लोग। फिर बड़े मकान बनाने की मांग छोड़ देते हैं। फिर बड़ी दुकान सजाने की माग छोड़ देते हैं। फिर बड़ी पद-प्रतिष्ठा, धन की मांग छोड़ देते हैं। लेकिन मन नहीं बदलता। मन फिर स्वर्ग में, परलोक में इन्हीं सुखों की मांग शुरू कर देता है।

तो कृष्ण कहते हैं, और वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष बारंबार आने-जाने को प्राप्त होते हैं।

वेद भी सहायता न कर सकेंगे, कृष्ण भी सहायता न कर सकेंगे, कोई भी सहायता न कर सकेगा। अगर आपकी मांग ही गलत है, तो इस जगत में कोई भी सहायता न कर सकेगा। जगत अपने नियमों से घूमता है। अगर आपने गलत मांगा है, तो गलत आपको मिल जाएगा।

आप कहेंगे, हमने तो सुख मांगा है! लेकिन वह जो सुख की छाया है, वह किसको मिलेगी? वह भी आपको ही मिलेगी। आप पूरा देखें। मन तोड़ देता है, इसलिए सुख अलग मालूम पड़ता है, दुख अलग मालूम पड़ता है। थोड़ा समझें और मन के बिना जगत को देखें, तब आपको पता चलेगा कि वे दोनों अलग नहीं हैं। मन के कारण ही दो मालूम पड़ते हैं, वे एक ही हैं।

किस चीज में हमें सुख मिलता है? और जिस चीज में हमें सुख मिलता है, उसी में दुख मिल सकता है, फिर भी हमारी आंख नहीं खुलती। सच तो यह है, उसी में दुख मिलता है, जिसमें हमें सुख मिलता है। ऐसी किसी चीज में आपको कभी दुख मिला है, जिसमें आपको सुख पहले न मिला हो? जहां सुख मिलता है, वहीं दुख मिलता है। जिसमें सुख मिलता है, उसी में दुख मिलता है। जिससे अपेक्षा बाधते हैं, उसी से अपेक्षा टूटती है। जिससे आशा बांधते हैं, उसी से विषाद फलित होता है। एक ही बीज होता है, फिर भी हम देख नहीं पाते और जन्मों-जन्मों तक यह कथा ऐसी ही दोहरती चलती है। यह आना-जाना ऐसे ही होता रहता है।

कहां, कठिनाई कहां होगी? वही कठिनाई है मन के देखने में। मन जब किसी चीज में सुख देखता है, तो दुख दूसरा हिस्सा होता है; वह पीछे छिपा होता है, मन को पूरा दिखाई नहीं पड़ता। जब वह सुख देखता है, तो उसे सुख दिखाई पड़ता है, वह कहता है, सुख है यहां। दुख दिखाई नहीं पड़ता। वह ओझल होता है। वह विपरीत है। वह खयाल में ही नहीं आता। और जब दुख दिखाई पड़ता है, तब सुख ओझल हो गया होता है। तब सुख दिखाई नहीं पड़ता।

यह मन के देखने का जो अधूरा ढंग है, उसके कारण जो एक इकट्ठा सत्य है, वह हमें दो हिस्सों में टूटकर दिखाई पड़ता है। क्या हम मन के बिना जीवन के सत्य को पूरा देख सकते हैं?

जिन्होंने भी देखने की कोशिश की है, उन्हें मन को छोड़ देना पड़ा। मन को छोड़ने का अर्थ ही होता है, कामना को छोड़ देना। क्योंकि मन कामना का विस्तार है। मन वासना है, मन डिजायरिंग है-यह मिल जाए, यह मिल जाए, यह मिल जाए, यह मिल जाए! और कठिनाई तो यह है, अगर न मिले, तो दुख होता है, और मिल जाए तो भी सुख नहीं होता। न मिले, तो दुख होता है खोने का, और मिल जाए, तो बोर्डम, ऊब हो जाती है।

ऐसा कोई सुख आपने जाना है, जो आपको मिल जाए, फिर उबाए न? जिससे ऊब न होने लगे?

गरीब आदमी का दुख होता है अभाव का, और अमीर आदमी का दुख होता है उपलब्धि का। गरीब आदमी पीड़ित होता है, जो नहीं मिला उससे; अमीर आदमी पीड़ित होता है उससे, जो मिल गया। बुद्ध को पीड़ा क्या है? बुद्ध को पीड़ा यह है कि जो भी मिल गया है, उसमें कोई सुख नहीं है। घर छोड्कर भाग जाते हैं। उस युग की, उस इलाके की जितनी सुंदर युवतियां थीं, सभी बुद्ध को उपलब्ध थीं। उनसे घबड़ाकर भाग जाते हैं। महावीर को क्या तकलीफ है? सब मिल गया है, और सुख तो दिखाई पड़ता नहीं! तो सड़क पर भीख मांगने निकल जाते हैं। अमीर आदमी का दुख है कि वह जो चाहता था, वह मिल गया। गरीब आदमी का दुख है कि जो उसने चाहा, वह नहीं मिला है।

गरीब और अमीर के दुख अलग-अलग होते हैं, लेकिन दुख में कोई फर्क नहीं होता। एक ही चीज के दो छोर होते हैं। गरीब वहां खड़ा है, जहां कभी अमीर खड़ा था। और अमीर वहा खड़ा है, जहां गरीब अगर कोशिश करता रहा, तो कभी खड़ा हो जाएगा। लेकिन दोनों दुखी हैं।

लेकिन गरीब को दिखाई पड़ता है कि चीजें नहीं हैं, इसलिए दुखी हूं। उसे दूसरा पहलू दिखाई नहीं पड़ता। अमीर को दिखाई पड़ता है कि चीजें हैं, और दुखी हूं। उसे भी दूसरा पहलू नहीं दिखाई पड़ता। और हम दूसरे पहलू को बदलने के लिए आतुर रहते हैं। इसलिए गरीब अमीर बनने को राजी रहता है। और बहुत बार अमीर गरीब बनने को राजी हो गए हैं।

आखिर अमीर लड़कों ने, बुद्ध ने और महावीर ने, सब छोड्कर भिखारी के रूप में खड़े हो गए! यह दूसरे छोर पर जाने की इनकी तैयारी का कारण क्या है । एक ही कारण है कि जो हमारे पास होता है, उसी से दुख मिलने लगता है। जितनी हो दूरी, उतने ही सुख का आभास होता है। जितनी हो निकटता, उतना ही दुख प्रकट होने लगता है। जो भी चीज पास आ जाए, वही दुख देने लगती है। जो भी चीज दूर हो, वही सुख देती मालूम पड़ती है। क्योंकि दूर है; दे तो नहीं सकती, सिर्फ आभास हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति को, जो भी उसने चाहा है, सभी मिल जाए इसी वक्त, तो उससे ज्यादा दुखी आदमी खोजना संसार में मुश्किल होगा।

कल्पवृक्ष के बारे में हम सुनते हैं कि स्वर्ग में कल्पवृक्ष है। उसके नीचे आदमी बैठे, तो जो भी चाहे, उसे मिल जाए। शायद हम सोचते होंगे, उस वृक्ष के नीचे बैठकर लोग कैसे सुख को न उपलब्ध हो जाते होंगे! मैं आपसे एक राज की बात कहता हूं। कभी वह वृक्ष मिले, तो भूलकर उसके नीचे मत बैठना। अन्यथा आपसे बड़ा दुखी व्यक्ति फिर संसार में कोई भी नहीं होगा। क्योंकि सुख सिर्फ उसकी आशा में है, जो नहीं मिला है। और जब तक नहीं मिला है, तभी तक। और जब मिल जाता है, तभी दुख हो जाता है।

तो सुख का जो आभास है, वह वासना का आभास है। वासना जब तक अतृप्त है, तब तक सुख का आभास है। वासना जब तृप्त होती है, तब सब बिखर जाता है। आदमी लेकिन चाहे चला जाएगा! यश को चाहेगा, अपयश को नहीं। सुख को चाहेगा, दुख को नहीं।

लेकिन जो यश को चाहेगा, उसे अपयश मिलेगा ही। वह उसकी छाया है। जो लाभ चाहेगा, वह हानि में पड़ेगा ही। वह उसकी छाया है। जो जीवन के प्रति मोहित होगा, मृत्यु उसे भयभीत करेगी ही। वह उसकी छाया है। अगर मृत्यु के भय से बचना है, तो जीवन के मोह से बचना पड़ेगा। और अगर दुख में गिरने से बचना है, तो सुख के आकर्षण को छोड़ देना पड़ेगा। सुख का आकर्षण जो छोड़ देता है, उसे फिर कोई दुखी नहीं कर सकता। और यश की जिसकी आकांक्षा न रही, उसका अपमान करना असंभव है।

मेरा अपमान मैं ही करवा सकता हूं, आप नहीं कर सकते हैं। अगर मैं मान की आकांक्षा करूं, तो अपमान करवा सकता हूं। अगर मैं यश चाहूं तो अपयश मेरा किया जा सकता है। अगर मैं प्रशंसा चाहूं? तो मुझे गाली दी जा सकती है। लेकिन अगर मैं प्रशंसा ही न चाहूं, तो आपकी गाली बिलकुल ही व्यर्थ हो जाती है। उसका कोई मूल्य ही नहीं रह जाता। क्योंकि जिसे मैं चाहता ही नहीं, उसको मिटाने के प्रयोजन से आप मिटा भी क्या पाएंगे? अगर मैं आदर चाहूं तो निरादर के लिए मुझे तैयार होना चाहिए। और अगर निरादर की मेरी तैयारी न हो, तो आदर का मुझे खयाल छोड़ देना चाहिए। फिर कोई भी निरादर कर नहीं सकता। कोई उपाय नहीं है। मैं बाहर हो गया।। तो कृष्ण कहते हैं कि जो लोग सुख की कामना से धर्म की साधना में भी लगते हैं, वे अपने को कितना ही धोखा दे लें, वापस लौट आएंगे। कितने ही बड़े सुख को पा लें, लेकिन चुक जाएगा पुण्य। पाते ही चुक जाता है। कीमत वसूल हो गई। किया हुआ श्रम पूरा हो गया। फल मिल गया हाथ में, फिर स्वर्ग भी बासा हो जाता है।

सुना है मैंने कि स्वर्ग के देवी-देवता भी पृथ्वी के लिए तरसने लगते हैं। कथाएं हैं, पुराणों में कथाएं हैं कि स्वर्ग के देवता अप्सराओं से ऊब जाते हैं, बुरी तरह ऊब जाते हैं। पृथ्वी की स्त्रियों की कामना करने लगते हैं। पुरूरवा की कथा है कि स्वर्ग से आज्ञा मांगी उसने कि मुझे पृथ्वी पर जाने दें, ताकि मैं पृथ्वी की किसी स्त्री को प्रेम कर सकूं!

क्या हुआ होगा पुरूरवा को? यहां पृथ्वी पर तो अप्सराओं के लिए लोग दीवाने हैं। यहां भी कोशिश करते हैं स्त्रियों को अप्सराओं जैसी सजाने की! कोशिश असफल जाती है! लेकिन पुरूरवा को क्या हुआ? वह अप्सराओं को छोड्कर यहां पृथ्वी पर किसी स्त्री से प्रेम करने आना चाहता है! कोई स्त्री स्वर्ग में-कथाएं हैं-बूढ़ी नहीं होती! सोलह वर्ष पर ही उम्र ठहर जाती है! तो आदमी तो कितना चाहता है, कितनी कविताएं लिखता है, और स्त्रियां तो कितनी कोशिश करती हैं! सोलह साल के बाद उनकी उम्र बढ़ती ही नहीं! बहुत कोशिश करती हैं! फिर भी, यहां तो सब बढ़ ही जाती है। वहां तो बढ़ती ही नहीं! पुरूरवा क्यों ऊब गया होगा?

यह सोलह साल पर अगर सबकी उम्र ठहर जाए, तो भी उबाने वाली हो जाएगी; यह भी घबड़ाने वाला हो जाएगा। और जो फूल कुम्हलाता ही न हो, वह प्लास्टिक का मालूम पड़ने लगेगा। जो फूल कुम्हलाता ही न हो, वह प्लास्टिक का मालूम पड़ने लगेगा। तो अप्सराएं बिलकुल प्लास्टिक की मालूम पड़ी होंगी, कागजी मालूम पड़ी होंगी। न कुम्हलाती हैं; न पसीना आता है; न उम्र ढलती है, न कभी आंख से आंसू बहते हैं, होंठों की मुस्कुराहट है कि ऐसी बनी रहती है, जैसी कि नेताओं के मुंह पर चिपकी रहती है! वह चिपकी ही रहती है। वह कभी हटती ही नहीं। अप्सराएं सोती भी हैं, तो भी होंठ मुस्कुराते रहते हैं। यह मुस्कुराहट भी घबड़ाने वाली हो जाएगी, बेस्वाद हो जाएगी।

पुरूरवा घबड़ा गया। उसने कहा कि मुझे आज्ञा दो, मैं पृथ्वी पर जाऊं, किसी स्त्री को प्रेम करूं, जो बूढ़ी भी होती हो, जो रोती भी हो, जिसके शरीर पर पसीना भी आ जाता हो; जिसकी जिंदगी में सब उतार-चढाव होते हों। ताकि मुझे कुछ असलियत का अनुभव हो, यहां तो सब कागजी हो गया है।

स्वर्ग पाकर भी वासना तो क्षीण नहीं होगी, वासना नए आयाम पकड़ लेगी, नई दुनियाओं में खोज करने लगेगी, नई जगह तलाश करने लगेगी। और फिर जो स्वर्ग पा लिया है, जो सुख पा लिया है।

स्वर्ग का अर्थ है मनोवैज्ञानिक कि जो भी सुख पा लिया है, वह पाते ही क्षीण होना शुरू हो जाता है-पाते ही। जिस शिखर को भी हम पा लेते हैं, पाते से ही उतार शुरू हो जाता है, उतरना शुरू हो जाता है।

कृष्ण कहते हैं, लौट आएगा वापस वह व्यक्ति, जिसने सकाम साधना की है। परमात्मा को भी जिसने वासना के माध्यम से चाहा और मांगा है, उसे सुख तो मिल जाएगा, लेकिन वह लौट आएगा।

और ध्यान रखें, सुख को जानकर जब कोई लौटता है, तो महादुख में पड़ जाता है। कभी आपने देखा है, रास्ते से गुजर रहे हैं; अंधेरी रात, सन्नाटा है, अंधेरा है रास्ते पर। फिर एक मोटरगाड़ी पास से गुजर जाती है। तेज प्रकाश आपकी आंख में पड़ता है।

मोटर गुजर गई, पीछे आप और महाअंधकार अनुभव करते हैं, जितना कि इस गाड़ी के गुजरने के पहले नहीं था। अंधेरा तो वही है, पर आपकी आंखों की कठिनाई हो गई; आंखों ने प्रकाश जान लिया, अब अंधेरा और भी घना मालूम पड़ेगा।

तो जो भी व्यक्ति स्वर्ग में हो आता है, सुख को जान लेता है, गिरते ही महानर्क की गर्त को अनुभव करता है। सुख को जानना महंगा सौदा है, गिरना तो पड़ेगा। और जब चित्त गिरता है वापस, तो सभी कुछ दुख हो जाता है। सभी कुछ दुख हो जाता है। चित्त का अनुभव अब सुख के लिए और भारी मांग से भर जाता है। और सभी चीजें उदास कर जाती हैं, और सभी चीजें दुख दे जाती हैं। कृष्ण कहते हैं, ऐसे व्यक्ति का आना-जाना जारी रहता है। वह परिभ्रमण में भटकता रहता है। वह एक वर्तुल में पड़ जाता है। जैसे बैलगाड़ी के चाक में एक आरा ऊपर आता है, फिर नीचे जाता है, फिर ऊपर आता है, फिर नीचे जाता है।

संसार हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण शब्द रहा है। संसार का मतलब होता है, चाक, दि व्हील। संसार का मतलब होता है, चक्के की तरह जो घूमता रहता है। जो अभी ऊपर है, वह थोड़ी देर में नीचे आ जाता है, जो अभी नीचे है, वह थोड़ी देर में ऊपर आ जाता है। और यह चाक घूमता चला जाता है। और जो नीचे है, वह ऊपर आने की आशा करता रहता है। और ऊपर आ भी नहीं पाता है कि नीचे जाना शुरू हो जाता है, क्योंकि चाक घूमता रहता है। जो ऊपर है, वह ऊपर बने रहने की कितनी ही कोशिश करे, बना नहीं रह पाता, नीचे उतरना पड़ता है।

कृष्ण कहते हैं, कामना से अगर स्वर्ग भी मिल जाए, तो भी लौट आना पड़ता है। कामना की कोई भी उपलब्धि वास्तविक नहीं है। कामना की कोई भी उपलब्धि यथार्थ नहीं है। कामना की कोई भी उपलब्धि स्वप्न से ज्यादा नहीं है। स्वप्न टूटेगा ही। कितना ही लंबा कोई स्वप्न देखे, स्वप्न टूटेगा ही।

क्या कोई उपाय है कि व्यक्ति इस स्वप्न और इस चाक के परिभ्रमण से बाहर हो जाए?

तो कृष्ण कहते हैं, जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से उपासते हैं, उन नित्य एकीभाव से मुझ में स्थित पुरुषों का योग- क्षेम मैं स्वयं सम्हाल लेता हूं।

इसमें तीन बातें समझने जैसी हैं।

एक, निष्काम भाव से जो मुझे उपासते हैं। कठिन है बहुत। यही उपासना और वासना का भेद है। हमारी उपासना भी वासना ही है। हम परमात्मा के पास भी जाते हैं, तो परमात्मा के लिए नहीं, कारण कुछ और ही होता है। कोई बीमार है, इसलिए मंदिर में जाता है। कोई बेकार है, इसलिए मंदिर में जाता है। कोई निर्धन है, इसलिए मंदिर में जाता है। कोई निस्संतान है, इसलिए मंदिर में जाता है। जो किसी भी कारण से मंदिर में जाता है, वह मंदिर में पहुंच ही नहीं पाता है। शरीर भीतर प्रवेश कर जाएगा, मूर्ति सामने आ जाएगी, लेकिन उपासना संभव नहीं है। क्योंकि जहां वासना है, वहां उपासना संभव ही नहीं है।

उपासना का अर्थ होता है, परमात्मा के पास होना। और जब मैं धन मांगने के लिए उसके पास जाता हूं तो मैं धन के पास होता हूं; उसके पास कैसे होऊंगा? मेरी मांग ही मेरी निकटता है। जो मैं चाहता हूं वही मेरे निकट है, और जिससे मैं चाहता हूं, वह तो केवल साधन है। अगर परमात्मा पूरा कर दे, तो ठीक है; अगर पूरा न करे, तो फिर मैं वहा नहीं जाऊंगा। कोई और पूरा कर दे, तो उसके पास जाऊंगा। जहां मेरी वासना पूरी होगी, वहां मैं जाऊंगा। परमात्मा कर सकता है, तो वहा भी तलाश कर लेता हूं! लेकिन परमात्मा मेरी इच्छा का हिस्सा नहीं है। मेरी इच्छा कोई और है। 

वासना और उपासना का यह फर्क है। वासना सकाम होगी, कुछ मांगने के लिए होगी। तो जो हम मांगते हैं, वही श्रेष्ठ है, जिससे हम मांगते हैं, वह श्रेष्ठ नहीं है। उससे मिलता है, इसलिए हम उसको श्रेष्ठ मान लेते हैं। लेकिन जो मांगते हैं, वही श्रेष्ठ है। उपासना का तो अर्थ ही यह है कि एक नया जगत शुरू हुआ किसी के पास होने का, जिससे कुछ भी मांगना नहीं है, जिसके पास होना ही काफी आनंद है, जिससे और कोई मांग का सवाल नहीं है। उपासना का अर्थ है, परमात्मा के पास होना। और पास होने में ही सारी उपलब्धि मानना। पास होने में ही, उसकी निकटता ही सब कुछ है। उसके पास होने में ही सब मिल गया। सब स्वर्ग, सब मोक्ष। उसकी निकटता से ज्यादा और कोई चाह नहीं है।

निष्काम साधना का अर्थ है, परमात्मा को चाहना उसके ही लिए, किसी और कारण से नहीं,इस जगत में हम सभी को किसी और कारण से चाहते हैं। अगर मैं एक स्त्री को प्रेम करता हूं, तो इसलिए कि वह सुंदर है। लेकिन कल वह असुंदर हो सकती है। फिर प्रेम कैसे टिकेगा? क्योंकि जिस सौंदर्य के लिए प्रेम था, वह खो गया। फिर धोखा ही टिकेगा। फिर मुझे खींच-तानकर चलाना पड़ेगा। फिर मैं कहता रहूंगा कि ठीक है, अब भी प्रेम है। लेकिन प्रेम तिरोहित हो गया होगा। क्योंकि प्रेम का कोई कारण था।

कोई जवान है, इसलिए मेरा उससे प्रेम है। कल वह बूढ़ा हो जाएगा, फिर कैसे प्रेम टिकेगा? कोई बुद्धिमान है, इसलिए मेरा उससे प्रेम है; कारण है। कोई धनी है, कोई स्वस्थ है, कोई कलाकार है। कुछ है कारण।

इस जगत में हम जितने भी संबंध बनाते हैं, वे सभी सकारण हैं, सभी सकाम हैं। इसी वजह से, आदत के वश, हम परमात्मा से भी जो संबंध बनाते हैं, वे भी सकाम हैं। इसलिए सकाम भक्त परमात्मा के संबंध में जो बातें कहता है, जो गीत गाता है, उनको ठीक से अध्ययन करें, तो पता चलेगा कि वह क्या-क्या कह रहा है!

वह कहता है कि तुम्हारे नयन बहुत प्यारे हैं, इसलिए; कि तुम बड़े मनमोहन हो, इसलिए; कि तुमने सबको रचा, कि तुम सबके पालनहार हो, इसलिए; कि तुम जो पतित हैं, उनके सहारे हो, इसलिए; कि तुमने पापियों को उद्धारा, इसलिए। लेकिन सबके पीछे देअरफोर, इसलिए है।

लेकिन अगर वह पापियों का उद्धारक नहीं, अगर उसकी आंखें बहुत सुंदर नहीं, बड़ी कुरूप हैं, मनमोहन नहीं, फिर क्या होगा? हम जो इस जगत में संबंध बनाते हैं, उन्हीं के आधार पर हम परमात्मा से भी संबंध बनाने की कोशिश करते हैं, यही सकाम धारणा है।

कृष्ण कह रहे हैं, जो निष्काम भाव से मुझे उपासेगा!

जो किसी कारण से नहीं, अकारण। जो कहेगा, कोई कारण नहीं है, कोई वजह नहीं है, बेवजह, बिना कारण, तुम्हारे पास होना बस काफी है। तुम कैसे हो, इसकी कोई शर्त नहीं है। तुम क्या करोगे, इसकी कोई मांग नहीं है। तुमने कब क्या किया है, उसका कोई हिसाब नहीं है। तुम सुख ही दोगे, यह भी पक्का नहीं है। तुम दुख न दोगे, इसका भी पक्का नहीं है। यह सब कुछ पक्का नहीं है। लेकिन तुम्हारे पास होना, और तुम जैसे भी हो, तुम्हारे पास होना ही मेरा आनंद है। बस, तुम्हारे पास होने में ही मेरा सब समाप्त हो जाता है, मैं मंजिल पर पहुंच जाता हूं।

इसलिए निष्काम साधना बड़ी कठिन है; आदमी सोच भी नहीं पाता। कोई आदमी चाहता है, मन अशांत है, इसलिए। दुखी है, इसलिए। संताप है, चिंता है, इसलिए। अकारण? अकारण की भाषा ही हमारी समझ में नहीं आती!

लेकिन ध्यान रहे, इस जगत में जो भी महत्वपूर्ण है, सभी अकारण घटित होता है, और जो भी क्षुद्र है, वह सकारण होता है। अगर इस जगत में भी कभी प्रेम घटित होता है, तो वह उपासना जैसा होता है, वासना जैसा नहीं होता। कभी हम एक व्यक्ति को इसलिए प्रेम नहीं करते कि कोई भी कारण है। बस, उसके पास होना काफी है। वह क्या करेगा, यह नहीं। उससे कोई मांग नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। बस, वह है, इतना काफी है। उसकी उपस्थिति काफी है। उससे क्या मिलता है, इसका भी कोई हिसाब नहीं है। बिना कारण।तो जगत में भी प्रेम का फूल खिलता है कभी बिना कारण। प्रार्थना भी कभी बिना कारण हो, तो फूल बन जाती है।

मंदिर में जाएं, सब कारण बाहर रख जाएं जहां जूते उतारते हैं। एक बार जूता भी भीतर चला जाए, तो मंदिर अपवित्र नहीं होगा। लेकिन कारण भीतर मत ले जाएं। कारण भीतर ले गए, तो सब अपवित्र हो जाता है। कारणों को वहीं उतार जाएं, जहां जूते उतार देते हैं। सब कारण वहा रख जाएं। सब वासनाएं वहा रख जाएं। मंदिर में तो सिर्फ होने के आनंद के लिए जाएं। थोड़ी देर उसके पास होंगे। कुछ मत करें वहां। कुछ करना जरूरी नहीं है। बस, चुपचाप वहां बैठ जाएं। सिर्फ उसकी मौजूदगी अनुभव करें। उसमें भी अनुभव क्या करना है! शांत बैठें, तो अनुभव होने लगेगी। वह वहां है ही, सभी जगह है।

एक बार मंदिर में होने लगे, तो कोई कारण नहीं है कि मस्जिद में क्यों न हो! एक बार मस्जिद में होने लगे, तो कोई कारण नहीं है कि चर्च में क्यों न हो! और एक बार कहीं भी होने लगे, तो कोई भी कारण नहीं है कि और कहीं क्यों न हो! कहीं भी होगा। कहीं भी शांत बैठ जाएं, वह मौजूद है। चुप हो जाएं, सिर्फ उसकी मौजूदगी को अनुभव करें, तो उपासना है।

और मांग कोई भी न हो। रत्तीभर भी नहीं। रत्तीभर भी नहीं। अगर वह देने को भी राजी हो जाए, अगर वह कहे भी कि मांग लो, तो भी खोजने से मांग का भीतर पता न चले। कहना पड़े उससे कि असमर्थ हूं कोई मांग नहीं है। ऐसी स्थिति में होगी निष्काम भाव से उपासना। और जो निष्काम भाव से उपासना करता है, कृष्ण कहते हैं, उसका योग- क्षेम, दोनों ही मैं सम्हाल लेता हूं।

योग और क्षेम शब्द को समझ लेना चाहिए।

योग से अर्थ है, वह परम प्रतीति, अंतिम प्रतीति प्रभु-मिलन की, पूर्ण के साथ एक होने की। योग से अर्थ है, व्यक्ति के मिटने की घटना परमात्म में, वह मैं सम्हाल लेता हूं। और क्षेम से अर्थ है, जब तक वह घटना न घट जाए, तो जो भी जरूरी है, वह भी मैं सम्हाल लेता हूं। क्षेम से अर्थ है, योग जब तक न घटे, तब तक जो भी जरूरी हो! अगर शरीर की जरूरत हो, तो शरीर को सम्हाल लूंगा। अगर भोजन की जरूरत है, तो भोजन को सम्हाल लूंगा। अगर श्वास की जरूरत है, तो श्वास को सम्हाल लूंगा। जब तक वह परम घटना नहीं घटती है, तब तक उसके पहले जो-जो आवश्यक है, वह भी मैं सम्हाल लूंगा। उसका नाम है क्षेम। और जब क्षेम के बाद वह परम घटता घट जाएगी, आखिरी, वह भी मैं सम्हाल लूंगा।

कृष्ण यह कहते हैं कि एक बार तू अपनी मांग छोड़, तो मैं सब सम्हालने को तैयार हूं। और जब तक तू मांग किए जाता है, तब तक मैं कुछ भी नहीं सम्हाल सकता हूं। न सम्हालने का कारण है। क्योंकि जब तक तू मांग किए जाता है, तब तक तू अपने को मुझसे ज्यादा समझदार समझे चला जाता है।

मांग का मतलब ही यह होता है। एक आदमी जाता है मंदिर में और भगवान से कहता है कि यह क्या किया? यह कैसा न्याय है?

वह यह कह रहा है कि तुमसे ज्यादा अक्ल तो हममें है! हम समझते हैं कि यह न्याय नहीं है। और क्या कर रहे हो बैठे वहां? 

यह सशर्त, सकाम भावना है। भक्त, सच में निष्काम भक्त परमात्मा से कहेगा कि जो भी तूने दिया, मैं आनंदित हूं; वह फूल गिराए तो। जो भी तूने दिया, मैं आनंदित हूं। क्योंकि तू जो देगा, वह ठीक होगा ही। गलत तो वह तब होता है, जब मेरी मांग के विपरीत पड़ता है। जब मेरी कोई मांग नहीं, तो गलत होने का कोई उपाय नहीं। अन्याय तो तब मालूम पड़ता है, जब मैं सोचता था कुछ और मिलेगा, और मिलता कुछ और है। जब मैं देखता हूं कि जो भी मिलता है, वही न्याय है, तब तो कोई सवाल नहीं है।

कृष्ण कहते हैं कि जो मुझ पर सब छोड़ देता है, उसे मैं सम्हाल लेता हूं। और जो मुझ पर छोड़ता नहीं, खुद ही सम्हालता है, उसे खुद ही सम्हालना पड़ता है।

हम सब खुद सम्हाल-सम्हालकर बोझ से दबे जाते हैं। हम सोचते हैं, जीवन चले, न चले! अपना-अपना जीवन तो खींचना ही पड़ेगा। और अपना-अपना खींचने से भी जिनको बोझ काफी नहीं मालूम पड़ता, वे दूसरों का भी खींचते हैं!

हम सबका मन होता है कि मैं चला रहा हूं सब! ऐसा व्यक्ति निष्काम भावना को कैसे उपलब्ध हो सकता है? निष्काम भावना को तो वही उपलब्ध हो सकता है, जो जानता है कि वही चला रहा है, तो मैं फिर बीच-बीच में क्यों मांगें खड़ी करूं। फिर मैं बीच-बीच में क्यों कहूं कि ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए!

आस्तिक की मेरी तरफ एक ही परिभाषा है, वह आदमी नहीं, जो कहता है, ईश्वर है। वह आदमी नहीं, जो कहता है कि ईश्वर है, इसके मैं प्रमाण दे सकता हूं। वह आदमी नहीं? जो ईश्वर है, ऐसी मान्यता रखकर जीता है। आस्तिक का एक ही अर्थ है, वह आदमी, जिसकी अस्तित्व के प्रति कोई शिकायत नहीं है। ईश्वर का नाम भी न ले, तो चलेगा। चर्चा ही न उठाए, तो भी चलेगा। ईश्वर की बात भी न करे, तो भी चलेगा। लेकिन अस्तित्व के प्रति, जीवन के प्रति उसकी कोई शिकायत नहीं है।

यह सारा जीवन उसके लिए एक आनंद-उत्सव है। यह सारा जीवन उसके, लिए एक अनुग्रह है, एक ग्रेटिटयूड है। यह सारा जीवन एक अनुकंपा है, एक आभार है। उसके प्राण का एक-एक स्वर धन्यवाद से भरा है, जो भी है, उसके लिए। उसमें रत्तीभर फर्क की उसकी आकांक्षा नहीं है। '

ऐसा व्यक्ति, कृष्ण कहते हैं, निष्काम भाव से उपासता है मुझे।। उसके योग- क्षेम की मैं स्वयं ही चिंता कर लेता हूं। उसे अपने न तो योग की चिंता करनी है और न क्षेम की।

यहां एक बड़ी अदभुत बात है। और आमतौर से जब भी कोई इस सूत्र को पढ़ता है, तो उसको कठिनाई क्षेम में मालूम पड़ती है, योग में नहीं! इस सूत्र पर, जितने व्याख्याकार हैं, उनको कठिनाई क्षेम में मालूम पड़ती है। वे कहते हैं, योग तो ठीक है कि परमात्मा सम्हाल लेगा, अंतिम मिलन को, लेकिन यह जो रोज दैनंदिन का जीवन है, यह जो रोटी कमानी है, यह जो कपड़ा बनाना है, यह जो मकान बनाना है, यह जो बच्चे पालने हैं-यह सब-यह परमात्मा कैसे करेगा? हालत दूसरी होनी चाहिए। हालत तो यह होनी चाहिए कि ये छोटी-छोटी चीजें शायद परमात्मा कर भी लेगा। योग, साधना की अंतिम अवस्था, वह कैसे करेगा! लेकिन वह किसी को खयाल नहीं उठता।

हम सबको डर इन्हीं सब छोटी चीजों का है, इसीलिए। उस बड़ी चीज पर तो हमारी कोई दृष्टि भी नहीं है। योग- क्षेम मैं ही सम्हाल लेता हूं कृष्ण कहते हैं।

उतने भाव से, फिर जो भी हो, वही क्षेम है, ध्यान रखना आप! इसका यह मतलब नहीं है कि वैसे व्यक्ति को कभी मुसीबत न आएगी। इसका यह मतलब भी नहीं है कि उसे रोज सुबह चेक उसके हाथ में आ जाएगा! ऐसा कोई मतलब नहीं है। अगर इसे ठीक से समझेंगे, तो इसका मतलब यह है कि सुबह जो भी हाथ में आ जाएगा, वही उसका क्षेम है। जो भी उसे आ जाएगा हाथ में-भूख, तकलीफ, सुख, दुख-जो भी, वही परमात्मा के द्वारा दिया गया क्षेम है। वह उसे ही अपना क्षेम मानकर आगे चल पड़ेगा।

और योग और भी कठिन बात है। कृष्ण कहते हैं, वह भी मैं सम्हाल लेता हूं।

उसका मतलब? ऐसे उपासक को न साधना की जरूरत है, न साधन की जरूरत है; न तप की जरूरत है, न यश की जरूरत है, न किसी विधि की जरूरत है, न किसी व्यवस्था की जरूरत है। ऐसे व्यक्ति को परमात्मा से मिलने के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। अगर निष्काम उपासना उसका भाव है, तो मैं उसे मिल ही जाता हूं। वह मिलने का काम मैं सम्हाल लेता हूं।

ऐसी बहुत कथाएं हैं, बड़ी मीठी, और मनुष्य के अंतरतम के बड़े गहरे रहस्यों को लाने वाली, जब परमात्मा उपासक को खोजता हुआ उसके पास आया है। ये प्रतीक कथाएं हैं; और इनको समझने में भूल हो जाती है। इन प्रतीक कथाओं का अर्थ यह होता है कि वे एक इंगित करती हैं स्व तथ्य की ओर।

अगर उपासक निष्काम भाव में जीता हो, तो उसे परमात्मा को खोजने भी जाना नहीं पड़ता, परमात्मा ही उसे खोजता चला आता है। आ ही जाएगा। जैसे जब कोई गड्डा होता है, तो वर्षा का पानी भागता हुआ गड्डे में चला आता है। पहाड़ पर भी गिरता है, लेकिन पहाड़ वंचित रह जाते हैं। वे अपने से पहले से ही भरे हुए हैं। उनका अहंकार मजबूत है। गड्डा खाली है, निरहंकार है, पानी भागता हुआ आकर गड्डे में भर जाता है। ठीक ऐसे ही, जहां निष्काम भाव है उपासना का, परमात्मा भागता चला आता है, और हृदय को घेर लेता है।

लेकिन इतनी भी वासना की जरूरत नहीं है-इतनी भी-कि वह आए, कि वह मुझे मिले। यह आखिरी कठिन बात है, जो खयाल में ले लेनी चाहिए। क्योंकि भक्त अगर यह भी कहे कि तू मुझे मिल, तो भी वासना है।

भक्त तो यह कहता है कि तू है ही चारों तरफ। बस, मैं निर्वासन। हो जाऊं, तो तू यहीं है। तू मुझे यहीं दिखाई पड़ जाएगा। मेरी आंख खुल जाए, तो तू यहीं है। सिर्फ मैं आंख बंद किए बैठा हूं इसलिए तू दिखाई नहीं पड़ता है। भक्त यह नहीं कहता है कि तू आ। इतनी भी वासना नहीं है। इतना ही कि अपने को मिटा देता है। वासना के खोते ही मिट जाता है।

वासना ही हमारे अहंकार का आधार है। जब तक हम कुछ मांगते हैं, तभी तक मैं हूं। जब मैं कुछ भी नहीं मांगता, तो मेरे होने का कोई कारण नहीं रह जाता। मैं न होने के बराबर हो जाता हूं। एक खालीपन, एक शून्यता घटित हो जाती है। वही शून्यता उपासना है, वही शून्य परमात्मा की सन्निधि है।

यह जो व्यक्ति के भीतर वासना से छूटकर शून्य का निर्मित होना है, इस पर ध्यान दें। इस पर ध्यान दें, तो कोई कारण नहीं है, कोई कारण नहीं है कि जो हमारे लिए बड़े-बड़े शब्द मालूम पड़ते हैं, खाली और व्यर्थ, वे सार्थक और जीवंत न हो जाएं।

परमात्मा एक खाली शब्द है हमारे लिए। इस शब्द में हमारे लिए कुछ भी मालूम नहीं पड़ता कि क्या है। अगर कोई कहता है दरवाजा, तो दरवाजे में कोई अर्थ है, कोई कहता है पानी, तो पानी में कोई अर्थ है; कोई कहता है वृक्ष, तो वृक्ष में कोई अर्थ है, जब मैं कहता हूं परमात्मा, तब कोई भी अर्थ नहीं है।

वृक्ष कहने से वृक्ष की तस्वीर घूम जाती है।   

परमात्मा हमारा अनुभव ही नहीं है, इसलिए शब्द खाली है! घोड़ा हमारा अनुभव है, इसलिए शब्द आते से अनुभव भी सामने आ जाता है। परमात्मा हमारा अनुभव नहीं है, इसलिए परमात्मा शब्द खाली है। सुन लेते हैं, बार-बार सुनने से ऐसा वहम भी पैदा हो जाता है कि अर्थ हमें मालूम है।

अर्थ अनुभव में होता है, शब्दकोश में नहीं। शब्दकोश में लिखा हुआ है अर्थ, लेकिन अर्थ अनुभव में होता है। और जब तक अनुभव न हो, तब तक हम कितनी ही बार सुनें परमात्मा, परमात्मा, परमात्मा, कुछ होगा नहीं। अर्थ कहां से प्रकट होगा?

इसलिए परमात्मा को छोड़े, उपासना पर ध्यान दें। उपासना से अर्थ निकलेगा। उपासना असली चीज है। जैसे अंधे आदमी से हम कहें कि तू प्रकाश की फिक्र छोड़, तू आंख का इलाज करवा। प्रकाश की फिक्र ही छोड़ दे। जिस दिन आंख ठीक हो जाएगी, उस दिन प्रकाश प्रकट हो जाएगा। ऐसे मैं आपसे कहूं कि आप फिक्र छोड़ दें परमात्मा की, फिक्र कर लें उपासना की। उपासना आंख है। आंख जिस दिन खुल जाएगी, उस दिन परमात्मा प्रकट हो जाएगा। वह यहीं मौजूद है।

उपासना का अर्थ क्या है? उपासना का अर्थ है, हम उसकी उपस्थिति को प्रतिपल स्मरण करते रहें, अनुभव करते रहें। कुछ भी घटित हो, वही हमें याद आए। कुछ भी घटित हो, पहली खबर हमें उसकी ही मिले। कुछ भी हो जाए चारों तरफ, नंबर दो पर दूसरी याद आए, पहली याद उसकी आए। रास्ते पर एक सुंदर चेहरा दिखाई पड़े, तो सुंदर चेहरा नंबर दो हो, पहले उसकी खबर आए। एक फूल खिलता हुआ दिखाई पड़े, फूल नंबर दो हो, पहले उसकी खबर आए। कोई गाली दे, गाली देने वाला बाद में दिखाई पड़े, पहले उसकी खबर आए।


आपकी जिंदगी बदलनी शुरू हो जाएगी, उसकी खबर को प्राथमिक बना लें। इसको ही मैं स्मरण कहता हूं। उसकी खबर को प्राथमिक बना लें। रास्ते पर पागल की तरह अगर राम-राम, राम-राम कहते हुए गुजरते रहें, तो कुछ भी न होगा। बहुत लोग गुजर रहे हैं। राम-राम कहने का सवाल नहीं, स्मरण का है।

जो भी हो, पहले राम, फिर दूसरी बात। सारी जिंदगी बदल जाएगा। अगर किसी ने गाली दी, और पहले राम का स्‍मरण तो फिर गाली का उत्‍तर गाली से देना मुश्‍किल हो जायेगा। कैसे? राम बीच में आ गया, अब गाली देना असंभव है। मौत भी आ जाए, पहले राम का स्मरण आए। फिर मौत में भी दंश न रह जाएगा। कुछ भी हो, राम पहले खड़ा हो जाए।

इसको ही मैं उपासना कह रहा हूं। चौबीस घंटे-उठते, बैठते, सोते-राम का, प्रभु का, परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होता रहे। धीरे- धीरे यह सघन हो जाता है। यह इतना सघन हो जाता है कि सब चीजें पिघलकर बह जाती हैं, यही सघनता रह जाती है। धीरे- धीरे सब चीजें ओझल हो जाती हैं, परमात्मा की चारों तरफ उपस्थिति हो जाती है।

फिर आप चलते हैं, तो परमात्मा आपके साथ चलता है। आप उठते हैं, तो परमात्मा आपके साथ उठता है। आप हिलते हैं, तो परमात्मा आपके साथ हिलता है। आप सोते हैं, तो उसमें सोते हैं। आप जागते हैं, तो उसमें जागते हैं। फिर चारों तरफ वही है। श्वास-श्वास में वही है। हृदय की धड़कन में वही है।

यह उपासना है। और मांग कुछ भी नहीं है। उससे चाहना कुछ भी नहीं है। और मजा यह है, जो उससे कुछ भी नहीं चाहता, उसे सब कुछ मिल जाता है। और जो उससे सब कुछ चाहता रहता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता है।

वासना से भरा हुआ व्यक्ति दरिद्र ही मरता है, उपासना से भरा हुआ व्यक्ति सम्राट हो जाता है, इसी क्षण। वासना भिक्षा-पात्र है, मांगते रहो, मांगते रहो, वह कभी भरता नहीं। उपासना भिक्षा-पात्र को तोड़कर फेंक देना है। उपासना इस बात की खबर है कि वह हमारा ही है, उससे मांगना क्या है! वह मुझमें ही है, उससे मांगना क्या है! और जो भी उसने दिया है, वह सब कुछ है, अब और उसमें जोड़ना क्या है!

उपासना का अर्थ है, स्वयं के भीतर छिपी हुई परम संपदा का अनुभव। और वासना का अर्थ है, स्वयं के भीतर एक भिक्षा-पात्र की स्मृति कि मैं एक भिखारी का पात्र हूं, मांगता रहूं? मांगता रहूं! 

उपासना परमात्मा की इतनी सघन प्रतीति करा देती है! वासना धीरे- धीरे दीन बना देती है; दीन से दीनतर बना देती है। वासना में जीने वाला सिकंदर भी दीन ही मरता है। वासना में जीने वाला बड़े से बडा धनपति भी निर्धन ही मरता है। वासना आखिर में भिखारी को और बड़ा कर जाती है।

मांगें मत! यह प्रार्थना शब्द है हुमारे पास। हमने इतना मांगा है प्रार्थना के साथ कि प्रार्थना का मतलब ही लगने लगा मांगना! हम प्रार्थना के साथ सदा मांगते हैं, इसलिए प्रार्थना का मतलब ही मालूम पड़ने लगा, कुछ मांगना। प्रार्थना करो, इसका मतलब ही होता है, मांगो।

प्रार्थना का मतलब मांगना जरा भी नहीं है। प्रार्थना का मतलब है. उस तान में एक हो जाना, उस तान के साथ डोलने लगना, उस तान के साथ नाचने लगना, जो कि चारों तरफ मौजूद है। प्रार्थना एक लीनता है। उपासना उसकी उपस्थिति को अनुभव करने का नाम है।

और बिना मांगे जो उसे अनुभव करने को तैयार है, कृष्ण कहते हैं, वह फिर लौटता नहीं। वह फिर चक्कर के बाहर हो जाता है। वह चाक से छलांग लगाकर बाहर निकल जाता है। फिर यह चाक घूमता रहे, वह नहीं घूमता।

 वह कृष्ण कहते हैं, कहते होंगे! अर्जुन से कुछ नाता-रिश्ता रहा होगा। इसलिए कहा कि तेरा योग- क्षेम मैं सम्हाल लूंगा। इधर तो हमने छोड़ी अपनी लकड़ी, कि मरे! सिर के बल गिरेंगे, सब टूट-फूट जाएगा। कोई सम्हालने वाला नहीं मिलेगा। अपना पकड़े रहो जोर से!

प्रार्थना कभी-कभी करते हैं कि हे परमात्मा! लकड़ी को जरा बड़ी कर दे, ताकि ठीक से पकड़े रहें; कि मेरे हाथों को जरा मजबूत कर, कि लकड़ी छूट न जाए! ये हमारी प्रार्थनाएं हैं।

हमारी प्रार्थनाएं हमारे बंधन को और मजबूत करने वाली हैं। हमारी प्रार्थनाएं हमारे संसार को और गहरा करने वाली हैं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 8

 

तपाम्यहमहं वर्ष निग्ष्टृणान्स्पृउजामि च।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चछमर्जुन ।। 19।।

त्रैविद्या मां सोमया: पूतपापा

यज्ञैरिष्टवा स्वग्रतिं प्रार्थयन्ते।

ते पुण्यमामाद्य सुरेन्द्रलस्केम्

अश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।। 20।।


मैं ही सूर्यरूप हुआ तपता हूं तथा वर्षा को आकर्षित करता हूं और वर्षाता हूं। और हे अर्जुन? मैं ही अमृत और मृत्‍यु एवं सत और असत भी? सब कुछ मैं ही हूं।


परंतु जो तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मो को करने वाले और सोमरस को पीने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरूष मेरे को यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति को चाहते है, वे पुरुष अपने पुण्‍यों के फलरूप इंद्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगता हैं।


जीवन है एक, अस्तित्व है एक, लेकिन मन सभी कुछ तोड़कर देखता है। मन जब तक तोड़ न ले, तब तक देख ही नहीं पाता है। मन के देखने की प्रक्रिया में ही जीवन खंड-खंड हो जाता है।

इसे ऐसा समझें, प्रकाश की एक किरण है, उसे एक कांच के प्रिज्‍म से निकालें, तो सात टुकड़ों में टूट जाती है, सात रंगों में विभाजित हो जाती है। प्रकाश की किरण अविभाज्य है, अपने में अखंड है। प्रिज्म के टुकड़े से गुजरकर टूट जाती है, हिस्सों में बंट जाती है।

हमारा मन अस्तित्व की किरण को भी ऐसे ही तोड़ देता है। हमारा मन जहां भी देखता है, वहां पूरे को कभी भी नहीं देख पाता है। बड़ी चीजों की तो बात ही छोड़ दें, छोटी-सी चीज को भी मन पूरा देखने में असमर्थ है। एक छोटा-सा कंकड़ का टुकड़ा आपके हाथ में रख दूं, तो भी आपकी आखें, आपकी इंद्रियां, आपका मन उस टुकड़े को पूरा नहीं देख सकते; एक हिस्सा छिपा रह जाएगा। और जब आप दूसरा हिस्सा देखेंगे, तो पहला हिस्सा छिप जाएगा। एक छोटा-सा कंकड़!

उसे भी छोड़ दें। एक धूल का, रेत का टुकड़ा अपने हाथ पर रख लें। उसे भी आपकी इंद्रियां पूरा नहीं देख सकती हैं, उसे भी तोड़कर ही देखेंगी। एक हिस्सा दिखाई पड़ेगा, एक अनदेखा रह जाएगा। जो अनदेखा है, उसका आप अनुमान ही करेंगे कि होगा, वह दिखाई नहीं पड़ेगा। और ऐसा कभी नहीं कर सकते कि दोनों हिस्सों को आप एक साथ देख लें। एक छोटे-से रेत के टुकड़े के भी दोनों हिस्से एक साथ नहीं देखे जा सकते हैं। जब एक देखेंगे, दूसरा ओझल हो जाएगा। तो विराट की तो कठिनाई और भी बढ़ जाती है।

हमारा मन अंश को ही देख पाता है। यह पहली बात ठीक से समझ लें। यदि यह बात ठीक से समझ में आ जाए, तो बहुत-सी बातें समझ में आ सकेंगी। और अगर यह बात ठीक से समझ में न आए तो धर्म के बहुत से सूत्र बेबूझ रह जाते हैं। यह बहुत बुनियादी है।

मन की सामर्थ्य ही नहीं है किसी चीज को उसकी पूर्णता में देखने की। मन का स्वभाव ही नहीं है किसी चीज को उसकी पूर्णता में देख लेने का। वैसे ही, जैसे आंख चाहे भी, तो भी ध्वनि को सुन नहीं सकती; और कान चाहे भी, तो भी रूप को देख नहीं सकता। कान का स्वभाव नहीं है, आंख का स्वभाव नहीं है कि ध्वनि को सुन सके। आंख देख सकती है, सुन नहीं सकती।

फिर अगर कोई आंख से सुनने की कोशिश करे, और उसे कुछ भी सुनाई न पड़े, और उसे लगे कि जगत् में कोई ध्वनि नहीं है, तो कसूर किसका होगा? और अगर कोई कान से देखने की कोशिश करे, और उसे कुछ भी दिखाई न पड़े, और वह कहे कि जगत में कुछ भी नहीं है, तो कसूर किसका होगा? कान का कोई कसूर नहीं है, क्योंकि कान देख ही नहीं सकता। आंख का कसूर नहीं है, क्योंकि आंख सुन ही नहीं सकती। कसूर उस व्यक्ति का है, जो आंख और कान के स्वभाव को नहीं समझ पा रहा है।

मन के स्वभाव के संबंध में पहली बात कि मन किसी भी वस्तु को उसकी समग्रता में, टोटेलिटी में नहीं देख सकता है। जब भी देखेगा, अंश को देखेगा, पूर्ण को नहीं, पहली बात।

आज तक किसी व्यक्ति के मन ने किसी चीज की पूर्णता नहीं देखी है। इसलिए जहां भी मन होगा, वहां अपूर्ण ही अनुभव होगा, अपूर्ण ही दृष्टि होगी, अधूरा ही खयाल होगा। इसलिए जो लोग मन से पूरे का निर्माण करते हैं, उनका निर्माण काल्पनिक हो जाता है, अनुमान हो जाता है। जो उन्हें नहीं दिखाई पड़ता, उसका वे अनुमान करके पूरा कर लेते हैं। जो दिखाई पड़ता है, उसमें उसे भी जोड़ देते हैं, जिसको वे सोचते हैं कि होगा। इसलिए मन से निर्मित दुनिया में जितने भी शास्त्र हैं, वे सभी व्यर्थ हैं, पूर्ण की तरफ ले जाने वाले नहीं है।

और दुनिया में दो तरह के शास्त्र हैं। एक तो वे शास्त्र हैं, जो उन लोगों ने कहे हैं, जिन्होंने मन को मिटाकर पूर्ण को जाना। और एक वे शास्त्र हैं, जो उन लोगों ने कहे हैं, जिन्होंने मन को व्यवस्थित करके, शिक्षित करके, अध्ययन से, विचार से, मनन से, चिंतन से, तर्क से, अनुभव से मन को विकसित किया और फिर जगत के संबंध में दृष्टि को लिपिबद्ध किया। फिलासफी और रिलिजन, धर्म और दर्शन में यही फर्क है।

धर्म उन लोगों के वक्तव्य हैं, जिन्होंने मन को मिटाकर जाना, जिन्होंने मन के प्रिज्‍म को तोड़ डाला और अस्तित्व की किरण को सीधा देखा-अविभाज्य, बिना बंटा हुआ, अखंड। और दर्शन, फिलासफी उन लोगों के वक्तव्य हैं, जिन्होंने मन को खूब विकसित किया, ट्रेन किया, प्रशिक्षित किया, समझाया, सिखाया, पढ़ाया, और फिर जगत के संबंध में एक दृष्टि निर्मित की।

इसलिए सबफिलासफीज अधूरी हैं; होंगी ही। कोई और उपाय नहीं है। साक्रेटीज कितनी ही बड़ी बात कहे, वह बात मन की ही है। और साक्रेटीज के पास मन का कितना ही विकसित रूप हो, वह मन ही है। अगर साक्रेटीज यह भी कहे कि ये सातों जो रूप टूट गए हैं किरण के, इनको जोड लेने से फिर एक किरण बन सकती है, तो भी वह मन का ही अनुमान है। अरस्तु कितना ही कहे, प्लेटो कितना ही कहे, काट और हीगल कितना ही कहें, वे जो कह रहे हैं, वह उनके विचार का निष्कर्ष है, अनुभव का नहीं।  वे जो कह रहे हैं, वह उनका तर्कबद्ध आयोजन है, प्रतीति नहीं। वह उनके मन की ही दृष्टि है, मन से मुक्त उनका साक्षात्कार नहीं। मन से पैदा होती है फिलासफी। मन के पार उठ जाने से जो पैदा होता है, वही धर्म है।

मन जो भी कहेगा, वह अधूरा होगा। इसलिए मेरा मन जो कहेगा और आपका मन जो कहेगा, उसमें मेल होने का कोई भी उपाय नहीं है। मन का कहना करीब-करीब वैसा ही है, जैसा पंचतंत्र की एक पुरानी कथा में हम सब जानते हैं, पांच अंधे एक हाथी को अनुभव करते हैं। और वे जो भी कहते हैं, वह सभी सच है। जिस अंधे ने हाथी के पैर को छुआ है, उसने कहा, किसी महल के सुदृढ़ स्तंभों की भांति है हाथी। और जिसने हाथी के कानों को छुआ, उसने कहा कि जैसे स्त्रिया अनाज को साफ करती हैं सूप में, वैसे सूप की भांति है हाथी!

गलत दोनों ने नहीं कहा, गलत पांचों ने नहीं कहा; और पांच हजार अंधे भी इकट्ठे हो जाते, तो कोई भी गलत न कहता। वे सभी ठीक कहते। फिर भी उनका ठीक आंशिक था। और भूल उनके कहने में नहीं थी, भूल उनके विस्तार में थी। जब किसी अंधे ने कहा कि हाथी किसी महल के खंभों की भांति है, तब भूल इसमें नहीं थी, जो उसने जाना था। जो उसने जाना था, वह उसने पैर जाने थे; जो उसने कहा, वह हाथी के बाबत कहा। जो जाना था, वह अंश था; और जिसके संबंध में कहा, वह पूर्ण था। और जब भी कोई अंश को पूर्ण के संबंध में कहता है, तो असत्य हो जाता है।

इसलिए मन परमात्मा के संबंध में जो भी कहेगा, वह असत्य होगा।

ध्यान रहे, वे लोग जो कहते हैं, ईश्वर है-मन से, उतने ही असत्य होंगे, जितने वे लोग जो कहते हैं, ईश्वर नहीं है-मन से। मन अंश को ही जानता है, और मन की इच्छा होती है कि पूर्ण को कह दे कि यही है।

ये पांचों अंधे अगर एक-दूसरे की बात सुनकर चुप रह जाते-पर नहीं, संभव नहीं था कि चुप रह जाते! क्योंकि अंधों में कलह अनिवार्य हो गई। क्योंकि जब एक अंधे ने कहा कि हाथी खंभों की तरह है, और दूसरे अंधे ने कहा कि हाथी सूप की तरह है, और तीसरे ने कुछ और चौथे ने कुछ कहा, तो उन सबने कहा कि ये सभी सही तो नहीं हो सकते। और मेरा अनुभव सही है, तो निश्चित ही दूसरे लोग गलत हैं।

इसलिए फिलासफीज लड़ती रहती हैं, संघर्ष चलता रहता है। पांच हजार साल में मनुष्य ने बहुत तरह के दर्शनशास्त्रों को जन्म दिया, वे सब एक-दूसरे से कलह करते रहते हैं। वे कहते हैं कि तुम गलत हो, हम सही हैं। और जब वे कहते हैं, हम सही हैं, तो निश्चित ही कारण हैं, उनकी प्रतीति है।

वह जो आदमी कह रहा है कि हाथी खंभे की तरह है, वह गलत नहीं कह रहा है। और चूंकि उसे हाथी खंभे की तरह मालूम पड़ता है, वह कैसे मान ले कि हाथी सूप की तरह भी है? ये दोनों बातें एक साथ सही कैसे हो सकती हैं?

लेकिन जिनके पास आंख है, वे जानते हैं, ये दोनों बातें एक साथ सही हैं। हाथी सूप भी है, हाथी खंभा भी है, हाथी और बहुत कुछ भी है। और जितने अंधे आते चले जाएं, हाथी उतने ही रूप लेता चला जाएगा।

मन जो भी देखता है, वह सही है, लेकिन आंशिक सत्य बात। और इसलिए मन के अनुभव को कभी पूर्ण पर मत फैलाना, अन्यथा वही फाँसी, बन जाती है। और मन के अनुभव पर कभी मत कहना दूसरे को गलत, क्योंकि दूसरे का मन जो जानता है, वह भी सही हो सकता है।

धर्मों में विवाद नहीं है, हो नहीं सकता, सब विवाद दर्शनों का है। और प्रत्येक धर्म जन्मता तो उनके बीच है, जो पंडित  होते, लेकिन हाथ उनके पड़ जाता है अंततः, जो पंडित नहीं होते हैं। यह दुर्भाग्य है, लेकिन यह भी नियम है।

जब भी धर्म का जन्म होता है, तो वह उस आदमी में होता है, जिसका मन खो गया होता है, तब वह पूर्ण को जानता है। लेकिन जब लोग उससे समझते हैं, तो वे मन से ही समझेंगे, कोई और उपाय नहीं है। अगर मैं कोई ऐसी बात आपसे कहूं जो मैंने मन के पार जानी हो, तो आपसे जब कहूंगा और आप जब सुनेंगे, तो आप मन से ही सुनेंगे। और मन से सुनकर अगर आपने उसे मान लिया या न माना, आपने कोई भी नतीजा लिया, तो वह नतीजा आंशिक होगा। और उस नतीजे पर ही कल मेरी बात के आधार पर कोई निर्माण हो सकता है, कोई शास्त्र बन सकता है, कोई धर्म बन सकता है। वह धर्म अधूरा होगा और झूठा हो जाएगा।

धर्म जब जन्मते हैं, तो पूर्ण होते हैं-महावीर में, कृष्ण में, या बुद्ध में, या मोहम्मद में। और जब चलते हैं, तो अपूर्ण हो जाते हैं। चलते हैं मन के सहारे; अधूरे हो जाते हैं। और अधूरे होते ही दूसरे अधूरे वक्तव्यों से संघर्ष शुरू हो जाता है। मोहम्मद का और महावीर का कोई संघर्ष नहीं है। बुद्ध का और कृष्ण का कोई संघर्ष नहीं है। लेकिन हिंदू और मुसलमान का है, जैन और बौद्ध का है। होगा ही।जहां मन मिट गया है, वहा सभी वक्तव्यों के भीतर जो छिपा है, वह दिखाई पड़ जाता है। और जहां मन है, वहा एक वक्तव्य सही और शेष गलत मालूम पड़ते हैं। यह मन की पहली अड़चन है कि मन बांटकर देखता है।

दूसरी अड़चन, जो इससे भी कठिन है, और वह यह है कि मन विरोध में बांटकर देखता है। मन जब भी दो चीजों को तोड़ता है, तो दोनों के बीच विरोध देखता है। जैसे जीवन है। अगर जीवन को मन देखेगा, तो उसे जीवन में दो हिस्से दिखाई पड़ेंगे, जन्म और मृत्यु। और मन कैसे माने कि जन्म और मृत्यु एक ही हैं? बिलकुल उलटे हैं। एक कैसे हो सकते हैं? कहां जन्म और कहां मृत्यु? जीवन को बांटेगा मन, तो दो हिस्से दिखाई पड़ेंगे, जन्म का और मृत्यु का। और दोनों उलटे मालूम पड़ेंगे,  एक-दूसरे के विरोध में। जब भी मन बांटेगा, तो विरोध में बांटेगा ,और जीवन अविरोधी है। जीवन में कोई तकलीफ ही नहीं है। जन्म और मृत्यु, जीवन में एक ही चीज के दो नाम हैं, एक ही चीज का विस्तार है। जो जन्म की तरह शुरू होता है, वही मृत्यु की तरह पूर्ण होता है। अगर जन्म प्रारंभ है जीवन का, तो मृत्यु उसकी पूर्णता है।

जन्म और मृत्यु में अगर मन को हम बीच में न लाएं, तो कोई भी विरोध नहीं है। लेकिन मन को हम बीच में कैसे न लाएं! हमारे पास और कोई उपाय नहीं है। मन ही हमारे पास उपाय है जानने के लिए। जैसे ही मन को हम लाते हैं, मन जीवन को दो हिस्सों में तोड़ देता है, एक हिस्सा जन्म हो जाता है, एक हिस्सा मृत्यु हो जाती है। यह मन सभी जगह चीजों को दो में तोड़ देता है। यह कहता है, यह आदमी अच्छा है, वह आदमी बुरा है। सच्चाई बिलकुल उलटी है; अच्छाई और बुराई एक ही चीज का विस्तार है। तो जब हम कहते हैं, यह आदमी अच्छा है और वह आदमी बुरा है; या हम कहते हैं, यह बात अच्छी है और वह बात बुरी है, तब हमने तोड़ दिया।

बड़ी अड़चन होगी यह मानने में कि अच्छाई और बुराई एक ही चीज का विस्तार है। यह मानने में बड़ी कठिनाई होगी कि साधु और असाधु एक ही चीज के दो छोर हैं। 

ऐसा समझें कि गंगा बहती है दो किनारों के बीच। और हम मान ले कि दोनों किनारे अलग हैं। एक किनारे को हटा दें और फिर गंगा को बहाकर देखें, तब पता चलेगा कि वे दोनों किनारे अलग न थे। और हमें ऐसा भी लग सकता है कि एक किनारे से दूसरे किनारे की प्रतिद्वंद्विता है, कापिटीशन है, और एक किनारा दूसरे से मुठभेड़ ले रहा है। और हमें ऐसा भी लग सकता है कि एक किनारा गंगा को अपनी तरफ खींचने की कोशिश में लगा है। लेकिन ध्यान रहे, गंगा उन दोनों किनारों के बीच ही चलती है। वे दोनों किनारे गंगा के ही दो छोर हैं। और एक को भी हटाकर दूसरा नहीं बचेगा!

कठिन होगी यह बात; और हमारी बुद्धि को अति कठिन पड़ेगी, क्योंकि हमें सदा तोड़कर देखने में आसानी हो जाती है। 

और विपरीत जहां मिल जाते हैं, वहां अनुभव पूर्ण हो जाता है। लेकिन हमारा मन? हमारा मन ऐसा है कि राम की पूजा करेंगे और रावण को आग लगाएंगे। यह हमारा मन है! मन हमारा ऐसा है कि हम एक को पूजेंगे, दूसरे की निंदा करेंगे, एक को मित्र मानेंगे, दूसरे को शत्रु मानेंगे।

लेकिन आप उनकी तरफ मत देखें! आप ऐसे देख रहे हैं, जैसे उन्होंने बड़ी शत्रुता से पूछा है; वहीं भूल हो जाती है। आवाज जरा जोर की है, लेकिन मित्र की है, ऐसा क्या परेशान होना! उनकी तरफ मत देखें।

मन की परिभाषा; मन का अर्थ होता है, मनन, विचार, चिंतन; जो दिखाई पड़े, उसके साथ चिंतन की धारा को जोड़ना। समझें; एक फूल मुझे दिखाई पड़ता है। जहां तक दिखाई पड़ता है, वहां तक मन नहीं आता; लेकिन जैसे ही मैं कहता हूं सुंदर है, मन आ गया; जैसे ही मैं कहता हूं सुंदर नहीं है, मन आ गया; जैसे ही मैं कहता हूं बहुत प्यारा है, मन आ गया, जैसे ही मैं कहता हूं, बेकार है , मन आ गया। जब तक दर्शन है, तब तक मन नहीं है। जैसे ही दर्शन के साथ शब्द और विचार जुड़ते हैं, मन की गति शुरू हो गई। मन का अर्थ है, विचार को, शब्द को पैदा करने वाला यंत्र।

मन का अर्थ है, विचार को जन्म देने वाला स्रोत। फूल को अगर मैं देखता रहूं और सोचूं न, तो मेरी आत्मा और फूल के बीच मिलन होगा। अगर सोचूं  तो मेरी आत्मा और फूल के बीच में एक नई विचारों की श्रृंखला खड़ी हो जाएगी, शब्दों का एक जाल खड़ा हो जाएगा। तब मैं फूल को न देख पाऊंगा सीधा, तब इन शब्दों के पार से, इन शब्दों के भीतर से फूल को देखूंगा। तब फूल के संबंध में जो भी निर्णय मैं लूंगा, वह फूल के संबंध में नहीं, मेरे मन के संबंध में है। क्योंकि अगर मैं बचपन से ऐसे घर में बडा हुआ हूं, जहां गुलाब को सुंदर समझा जाता है, अगर मुझे बचपन से सिखाया गया है कि गुलाब सुंदर है, तो मेरे मन में विचारों की एक श्रृंखला है गुलाब के संबंध में, सौंदर्य की। अब अगर गुलाब का फूल मैंने देखा और मेरे मन की धारा खड़ी हुई, मेरे विचार खड़े हुए, और उन्होंने कहा, फूल सुंदर है, तो यह मेरी प्रतीति न हुई, यह मेरे मन का वक्तव्य हुआ। और मन का वक्तव्य शब्दों का वक्तव्य है। निःशब्द जब कोई होता है, तो मन खो जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि शब्दों की हमारे भीतर जो प्रक्रिया है, दि वेरी प्रोसेस आफ लैंग्वेज इज माइंड। हमारे शब्दों की जो प्रक्रिया है, हमारे शब्दों का जो संग्रह है, हमारे शब्दों का जो जाल है, वह हमारा मन है। मन हमारे समस्त शब्द, हमारी समस्त भाषा, हमारे समस्त सोचने की क्षमता का इकट्ठा जोड़ है।

आदमी गैर-मन की हालत में दो तरह से हो सकता है। बेहोश पड़ा हो, तो भी गैर-मन की हालत में हो जाता है। यह मन से नीचे की अवस्था है। आदमी समाधि में हो, तो भी मन के बाहर हो जाता है। यह मन से ऊपर की अवस्था है।

इसलिए ऋषियों ने कहा है कि प्रगाढ़ निद्रा में भी आदमी समाधि जैसी अवस्था में पहुंच जाता है। एक ही लक्षण समान है, मन नहीं होता। प्रगाढ़ निद्रा में भी मन नहीं होता, क्योंकि विचार खो जाता है। लेकिन विचार तो खो जाता है, होश भी खो जाता है। समाधि में भी प्रगाढ़ निद्रा की घटना घटती है, मन खो जाता है; लेकिन होश पूरा होता है।

मन हमारे चिंतन का यंत्र है। और इसलिए जितना ही ज्यादा हम इस चिंतन के यंत्र का उपयोग करके जगत को देखते हैं, उतना ही जगत बंट जाता है। इस बंटाव में कई कारण हैं। हमारी भाषा चीजों को तोडकर देखती है, क्योंकि मन से निर्मित है। और मन भी चीजों को तोड़कर देखता है, क्योंकि भाषा के पार मन का कोई अस्तित्व नहीं है। यही मैं कह रहा था कि हम जहां भी कुछ देखते हैं, वहा तत्काल विपरीत का अनुभव शुरू हो जाता है। अगर हम सौंदर्य देखते हैं, तो कुरूप का बोध तत्काल शुरू हो जाता है। क्या आप ऐसा कर सकते हैं कि किसी चीज को सुंदर कहें बिना किसी चीज को असुंदर कहे?

 महाकाश्यप एक दिन सुबह बुद्ध के पास पहुंचा है, उनका एक प्रमुख शिष्य है। सूरज उग रहा है, पक्षी गीत गा रहे हैं और महाकाश्यप बुद्ध से पूछता है कि यह जो चारों तरफ फैला है, क्या यह सुंदर नहीं है?

बुद्ध चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हैं, लेकिन बोलते नहीं। महाकाश्यप फिर पूछता है कि क्या मेरे प्रश्न में कोई असंगति है? आप उत्तर क्यों नहीं देते हैं?

बुद्ध फिर चारों तरफ देखते हैं, फिर महाकाश्यप की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हैं और चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप तीसरी बार पूछता है कि इतना ही कह दें कि आप जवाब न देंगे।

बुद्ध फिर चारों तरफ देखते हैं और चुप रह जाते हैं। महाकाश्यप से वे तब कहते हैं कि तू जो पूछ रहा है, उससे तू मुझे बड़ी मुश्किल में डाल रहा है। मुश्किल में इसलिए डाल रहा है कि अगर मैं कहूं, यह सब सुंदर है, तो मैं किसको कुरूप कहूं? क्योंकि जब भी सुंदर का उपयोग करें, तो कुरूप की धारणा सुनिश्चित हो जाती है।

और बुद्ध ने कहा कि अब मुझे न कुछ कुरूप रहा है और न कुछ सुंदर रहा है, जो जैसा है, वैसा ही रह गया है। यह मन के बाहर से देखा गया जगत है। कांटा कांटा है, फूल फूल है, गुलाब गुलाब है, चंपा चंपा है। न कुछ सुंदर है, न कुछ कुरूप है। जो जैसा है, वैसा है।

बुद्ध ने कहा, जो जैसा है, वह मुझे दिखाई पड़ता है। यह सुंदर है या कुरूप, यह मैं कैसे कहूं? क्योंकि जिस मन से मैं बांटता था, वह खो गया है। मन जो मेरे पास था, जिससे मैं तौलता था, वह खो गया है।

समझें, एक तराजू है हमारे पास; उससे हम तौल लेते हैं, कौन-सी चीज वजनी है, कौन-सी चीज गैर-वजनी है। तराजू खो गया। फिर कोई मुझसे पूछता है कि यह ज्यादा वजनी है या कम वजनी है? मैं अपने हाथ पर रखकर थोड़ा अंदाज कर सकता हूं; हाथ से तराजू का काम ले सकता हूं। यद्यपि उतना सुनिश्चित तो नहीं होगा, तोला-तोला, रत्ती-रत्ती नहीं बता सकूंगा; लेकिन फिर भी कह सकता हूं कि यह सेरभर है, यह तीन पाव है! साफ तो नहीं होगा उतना।

लेकिन मेरा हाथ भी टूट गया, अब मेरे पास कोई भी उपाय नहीं है, जिससे मैं इसे नाप लूं। तो अब मैं आंख से ही देखकर अंदाज लगाऊंगा कि यह थोड़ा ज्यादा मालूम पड़ता है, यह थोड़ा कम मालूम पड़ता है। मात्रा देखकर कहूंगा। भूल अब ज्यादा होगी। लेकिन मेरी आंख भी चली गईं। अब मेरे पास कोई भी उपाय नहीं है कि मैं कहूं कि कौन ज्यादा है, कौन कम है! हाथ नहीं, तराजू नहीं, आंख नहीं। अब तो मैं यही कहूंगा कि यह यह है और वह वह है। लेकिन मेरे पास वह तौलने का यंत्र नहीं है, जिससे मैं तौल लेता, बांट लेता, कौन कम है, कौन ज्यादा है।

बुद्ध ने कहा, जो है, वह है। सूरज उग रहा है। फूल खिल रहे हैं। पक्षी गीत गा रहे हैं। और मैं यहां बैठा सुन रहा हूं। लेकिन वह जो कह सकता था सुंदर और असुंदर, वह मौजूद नहीं है। वह खो गया है।

ध्यान का अर्थ है, मन का खो जाना। ध्यान का अर्थ है, भाषा का, शब्द का, विचार का भीतर से तिरोहित हो जाना।

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि जो ध्यान में प्रवेश करेगा, वह बोल न सकेगा। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि जो ध्यान में प्रवेश करेगा, वह शब्द का उपयोग न कर सकेगा। सच तो यह है कि वही उपयोग कर सकेगा। लेकिन तब उपयोग उपयोग होगा; वह मालिक होगा। बुद्ध भी बोल रहे हैं; वे कह रहे हैं कि मेरा मन खो गया। शब्द का उपयोग हो रहा है, भाषा का उपयोग हो रहा है, लेकिन बस उपयोग की तरह। जैसे आदमी जब चलता है, तो पैर का उपयोग करता है? जब बैठ जाता है, तो पैर का उपयोग बंद कर देता है।

लेकिन आपका मन पागल है; आप नहीं भी काम लेना चाहते हैं उससे, वह काम करता ही चला जाता है। आप कहते हैं, चुप हो जाओ, वह चुप होता ही नहीं! आप कहते हैं, बंद करो, मुझे सोना है, और वह बंद नहीं होत। और आप कहते हैं, ठहर जाओ, यह बात मुझे सोचनी ही नहीं है, और वह सोचे चला जाता है। और आप बिलकुल बेबस हैं।

यह आपकी विवशता, यह आपकी बेचैनी, यह आपकी मजबूरी-आपकी आत्मा की मालकियत खो गई है और मन आपका मालिक है। यह मालकियत मिटे, मन नीचे उतरे, आप मालिक हो जाएं, तो आप जगत को दूसरे ढंग से देखना शुरू करेंगे। यह मैंने क्यों कहा? यह मैंने इसलिए कहा कि कृष्ण का यह जो सूत्र है, यह आपकी तभी समझ में आ सकेगा, जब आप मन और गैर-मन, दो ढंग से जगत को देखने की व्यवस्था को समझने में समर्थ हो जाएं।

कृष्ण कहते हैं, मैं ही सूर्यरूप हुआ तपता हूं और मैं ही वर्षा को भी आकर्षित करता हूं। मैं ही बरसात। हूं मैं ही वर्षा हूं।

इसे हम ऐसा समझें, आग को और जल को हम सदा विपरीत देखते हैं। अगर आग लगी हो, तो हम पानी से उसे बुझा देते हैं। और अगर हम पानी में आग लगाना चाहें, तो कोई उपाय नहीं है। आग और पानी हमारे लिए विपरीत हैं। आग की पानी से क्या मैत्री? पानी दुश्मन है।

पर कृष्ण कहते हैं, मैं ही हूं आग और मैं ही हूं जल; मैं ही भभकता हूं मैं ही बुझाता हूं; मैं ही हूं सूर्य, जो तपता है, और मैं ही हूं वह वर्षा, जो आकर्षित होती है सूर्य से।

अगर हम मन का हिसाब छोड़ दें और जरा अस्तित्व को देखें, तो पता चलेगा, सूर्य ही तो खींचता है सागर से पानी को, सूर्य ही तो बनाता है बादलों को, सूर्य ही तो बरसाता है। तो आग और पानी में जो वैमनस्य हमें दिखाई पड़ता है, वह कहीं न कहीं हमारे मन के कारण ही होगा! वह वैमनस्य राम और रावण जैसा ही है। सूर्य के बिना पानी नहीं हो सकेगा। पानी के बिना सूर्य नहीं हौ सकेगा। वे कहीं बहुत गहरे में संयुक्त और इकट्ठे हैं।

उनके संयुक्त होने की खबर वे देते हैं और कहते हैं, हे अर्जुन, मैं ही अमृत हूं और मैं ही मृत्यु।

दुनिया में ईश्वर के संबंध में जिन लोगों ने भी सोचा है, उनमें सिर्फ हिंदू दृष्टि ईश्वर के साथ मृत्यु को भी जोड़ती है, बाकी कोई भी नहीं जोड़ता है। पृथ्वी पर जितनी चिंतनाए हैं, वे सभी कहती हैं कि ईश्वर जीवन है, लेकिन कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं करता कि ईश्वर मृत्यु भी है। उसका कारण है। वह जो हमारे मन का विभाजन है, उसमें हम कैसे दोनों कहें? कैसे? ईश्वर दोनों कैसे हो सकता है?

लेकिन ईश्वर दोनों है; क्योंकि जीवन दोनों है। हमारे तर्क में न आए, तो हमें तर्क छोड्कर देखना चाहिए। लेकिन हमारे तर्क के पीछे जीवन चलने को आबद्ध नहीं है। अगर हम पूछें किसी और से, तो वह कहेगा, ईश्वर जीवन है। लेकिन ईश्वर मृत्यु है, यह कहने में घबड़ाहट होगी उसे। क्योंकि मृत्यु को हम सोचते हैं, वह जीवन के विपरीत है। और जीवन को हम अच्छा और मृत्यु को बुरा समझते हैं।

इसलिए मित्र के लिए हम जीवन की प्रार्थना करते हैं, और शत्रु के लिए मृत्यु की प्रार्थना करते हैं। चाहते हैं मित्र जीए, और चाहते हैं शत्रु मर जाए। लेकिन हमें पता नहीं; मर तो वही सकता है, जो जीएगा। और हमें यह भी पता नहीं कि जो जीएगा, उसे मरना ही पड़ेगा। तो जब हम किसी की मृत्यु की प्रार्थना करते हैं, तब हम उसके जीवन की भी प्रार्थना कर रहे हैं। और जब हम किसी के जीवन के लिए शुभकामना करते हैं, तब हम मृत्यु की भी शुभकामना कर रहे हैं। क्योंकि जीवन बिना मृत्यु के हो नहीं सकता है, वे एक ही चीज के दो छोर हैं।

जीवन और मृत्यु बड़े विपरीत छोर हैं। हम सबको ऐसा अब तक लगता रहा होगा कि जीवन को जो समाप्त करती है, वह मृत्यु है। लेकिन वह दृष्टि गलत है। जीवन को जो पूर्ण करती है, वह मृत्यु है। जीवन मृत्यु में जाकर अपने चरम शिखर को छूता है।

इसलिए भारत ने जवानी को बहुत मूल्य नहीं दिया, वार्धक्य को मूल्य दिया। पश्चिम जवानी को मूल्य देता है, वृद्ध को कोई मूल्य नहीं देता। वृद्ध होना अवमूल्यित हो जाना है, डिवेल्युएशन हो जाता है। आदमी का हुआ पश्चिम में कि डिवेल्युएशन हुआ, उसका अवमूल्यन हो गया। उसका जो भी मूल्य था जगत से, वह खो गया।

क्यों? क्योंकि अगर जीवन और मृत्यु विपरीत हैं, तो फिर जवान ही जीवन के शिखर को छूता है; बुजुर्ग तो मौत की तरफ जाने लगा। इसे ऐसा समझें, अगर मृत्यु बुरी है, तो बुढ़ापा अच्छा कैसे हो सकता है? क्योंकि बुजुर्ग का मतलब है, जो मृत्यु में जाने लगा। वह मृत्यु का पथिक है; मृत्यु उसके करीब आने लगी। बुजुर्ग का मतलब है, जिससे मृत्यु प्रकट होने लगी। तो फिर जवान शिखर है जीवन का। अगर मृत्यु जीवन के विपरीत है, तो जवानी जीवन होगी। फिर जवानी का मूल्य होगा, बूढ़े का अवमूल्यन हो जाएगा

पश्चिम ने मृत्यु को जीवन की समाप्ति समझा है, इसलिए बूढ़ा अनादृत हो गया। इस भाव के साथ बूढ़े का कोई आदर नहीं हो सकता। पूरब ने मृत्यु को जीवन की पूर्णता समझा है, इसलिए बूढ़ा आदृत हुआ। क्योंकि वही चरम शिखर है जीवन का, जवान नहीं, वृद्ध ही चरम शिखर है जीवन का। और मृत्यु का क्षण सिर्फ अज्ञान के कारण अवसाद का क्षण है, अगर समझ हो, तो उत्सव का क्षण भी हो सकता है।

 जिसे हम विपरीत कहते हैं, वह विपरीत नहीं है। विपरीत हमारी भ्रांति है। और जहां-जहां विरोध दिखे, वहा-वहा खोजेंगे, तो नीचे एकता की धारा मिल जाएगी। कांटा है, गुलाब है। फूल खिला है, कांटा लगा है। आप फूल तोड्ने जाते हैं, कांटा हाथ में छिद जाता है, लहू की धार फूट पड़ती है। स्वभावत:, आपको लगेगा कि फूल और कांटा दुश्मन हैं। कहां फूल, कहां कांटा! गए थे फूल तोड्ने, लग गया कांटा!

अगर आप किसी को कांटा भेंट करने जाएं, तो वह भी चौंकेगा कि आपका दिमाग तो खराब नहीं हो गया है! भेंट तो फूल किए जाते हैं। कभी देखें, गुलाब के कांटे तोड़कर किसी को भेंट करने चले जाएं। फिर दुबारा वह आपको दिखाई भी नहीं पड़ेगा। आपसे बचकर निकलने लगेगा। जिस रास्ते आप गुजरते हैं, उस रास्ते नहीं गुजरेगा।

लेकिन फूल और कांटे क्या दुश्मन हैं? तो फिर जरा गुलाब की शाखा में नीचे उतरें। शाखा में बहती हुई रसधार से पूछें कि यह फूल और यह कांटा क्या अलग- अलग जगह से आते हैं?

वही रस कांटा बनता है, वही रस फूल बनता है। ये दोनों अलग- अलग हमें दिखाई पड़ते होंगे, ये अपने में अलग- अलग नहीं हैं। और गुलाब के सब कांटे तोड़ डालें, तो फूल भी उदास हो जाएंगे; क्योंकि भीतर की रसधार को चोट लगेगी। वही रसधार तो है। और जब गुलाब के फूल तोड़ लिए जाते हैं, तो कांटे भी पीडा अनुभव करते हैं। क्योंकि वे तो संयुक्त हैं, अस्तित्व इकट्ठा है। मन बांटता है, फिर फूल अच्छे हो जाते हैं, कांटे बुरे हो जाते हैं। फिर कांटे को कोई भेंट नहीं दे सकता, फूल को ही भेंट देना पड़ता है। लेकिन अस्तित्व कांटे और फूल एक साथ उगाए चला जाता है। अस्तित्व एक साथ दोनों को जीवन दिए चला जाता है।

कृष्ण कहते हैं, मैं ही हूं अमृत, मैं ही मृत्यु हूं।

जब पहली बार भारतीय चिंतन की कुछ झलक भारत के बाहर फैलनी शुरू हुई, तो जो सबसे बड़ी हैरानी अनुभव होनी स्वाभाविक थी, वह यही थी। सबसे ज्यादा हैरान करने वाला पश्चिम में जो हमारा प्रतीक है, वह महादेव का, शिव का है। कभी आपने खयाल नहीं किया होगा; क्योंकि न हम देखते, न हम सोचते, न हम खोजते!

आपने देखा है, जगह-जगह सड़क के किनारे एक वृक्ष के नीचे शंकर का शिवलिंग रखा है। कभी आपने खयाल किया कि शंकर मृत्यु के देवता हैं, विध्वंस उनके हाथ में है। ब्रह्मा बनाता है, विष्णु सम्हालता है, शंकर विध्वंस में ले जाते हैं। शिव विध्वंस के देवता हैं! लेकिन जो शिवलिंग रखा है, वह फैलिक सिंबल है, वह जननेंद्रिय का सिंबल है, वह सृजन का प्रतीक है। वह जो शिवलिंग है, वह जन्म और जीवन का प्रतीक है। और शंकर देवता हैं विध्वंस के, उनके काम जो जिम्मा है, वह है मिटाने का।

बडी हैरानी, बड़े पागल लोग थे ये हिंदू! जब पहली दफा पश्चिम में शंकर का यह प्रतीक पहुंचा, तो उन्होंने कहा, ये कैसे लोग हैं! विध्वंस का देवता है, जिसे कि दुनिया को नष्ट करना है, और यह फैलिक सिंबल है! और यह जननेंद्रिय का सिंबल है, जीवन का प्रतीक; जहां से समस्त जीवन जन्मता है और विकसित होता है! यह किस प्रकार का प्रतीक है? यह प्रतीक होना ही नहीं  चाहिए। यह प्रतीक शंकर के साथ मेल नहीं खाता।

खाता भी नहीं है। अगर हम भी सोचेंगे गणित से, तो मेल नहीं  खाता। अगर विध्वंस का देवता है, तो कुछ विध्वंस की बात होनी चाहिए थी। यह तो जीवन है। जीवन का प्रतीक चुना है और विध्वंस का देवता है। कारण वही है।

कृष्ण कहते हैं, मैं ही अमृत और मैं ही मृत्यु हूं।

ये विपरीत प्रतीक हमें मालूम पड़ते हैं, लेकिन भारत ने सदा यह कोशिश की है कि विपरीत के भीतर जो एक धारा है, वह खयाल में आए। इसलिए जानकर विध्वंस के देवता के सामने सृजन का प्रतीक रखा है, जानकर, सोचकर, बहुत खोजकर। यही प्रतीक उनका प्रतीक हो सकता है। क्योंकि जिसे विध्वंस की अंतिम सीमा छूनी है, उसे जन्म के पहले क्षण में भी उपस्थित होना चाहिए। जिसे मृत्यु का रास्ता बनना है, उसे जन्म का भी द्वार बनना चाहिए। इसलिए दोनों विपरीत-मृत्यु उनका काम, जन्म उनका प्रतीक। यहां भी इतनी ही बात होती, तो भी आसान था, और भी कठिन सूत्र है।

कृष्ण कहते हैं, एवं सत और असत भी मैं ही हूं।

सत का अर्थ है, जो है, और असत का अर्थ है, जो नहीं है। जो है, वह तो मैं हूं ही; जो नहीं है, वह भी मैं ही हूं! यह आखिरी कंट्राडिक्यान है। तर्क में, चिंतन में, विचार की पद्धति में, जो है और जो नहीं है, यह सबसे बड़ा विरोध है। होना और न होना, यह सबसे बड़ी खाई है। इससे बड़ी कोई भी खाई नहीं हो सकती।

तो कोई मान भी ले सकता है, थोड़ा कल्पना को फैलाए तो मान ले सकता है कि जन्म और मृत्यु जुड़े हैं-चलो  माना। कोई यह भी मान ले सकता है- थोड़ी हिम्मत जुटाए, थोड़ी आदतों को तोड़े-कि चलो माना कि राम और रावण की कथा भी, एक गिर जाए, तो नहीं हो सकेगी; किसी तरह दोनों जुड़े हैं, माना। यह भी माना जा सकता है कि फूल और कांटा जुड़े हैं। लेकिन यह तो बिलकुल नहीं माना जा सकता कि जो है, वह उससे जुड़ा है, जो है ही नहीं! क्योंकि जो है ही नहीं, उससे जोड़ कैसा? जोड़ का तो मतलब ही होता है कि दो चीजें हों, तो जोड़ हो सकता है। जो नहीं है, उससे कैसा जोड़?

यह आत्यंतिक खाई है, होने में और न होने में। न होने और होने के बीच तो हमारा मन बिलकुल ही इनकार कर देगा कि जोड़ बन नहीं सकता। खींच-तानकर राम और रावण के बीच बना लें, खींच-तानकर शत्रु और मित्र के बीच बना लें, खींच-तानकर जन्म और मृत्यु के बीच बना लें; सुंदर-असुंदर के बीच बना लें, प्रकाश-अंधकार के बीच बना लें, लेकिन जो है ही नहीं, दैट व्हिच इज नाट, एंड दैट व्हिच इज, इन दोनों के बीच क्या जोड़ है? और जोड बनेगा कैसे?

दो किनारों के बीच जोड़ हो सकता है, क्योंकि दोनों किनारे हैं। लेकिन एक किनारा है और दूसरा किनारा नहीं है, इनके बीच जोड़ कैसे होगा?

यह सर्वाधिक कठिन मालूम पडेगा, और मन के लिए सबसे बड़ी चोट भी है। लेकिन इसे समझें, तो समझ में आ सकेगा। इसे हम दो -तीन प्रकार से समझने की कोशिश करें। थोड़ा कठिन है, लेकिन असंभव नहीं कि खयाल में झलक न आ जाए। और खयाल में झलक ही आ सकती है, अनुभव तो खयाल में नहीं आ सकता। झलक आ जाए, तो अनुभव की तरफ कदम बढ़ाए जा सकते हैं। थोड़ी मेहनत लें।

एक वृक्ष है; कल नहीं था, आज है, कल फिर नहीं हो जाएगा। तो होना और न होना किसी न किसी तरह जुड़े होने चाहिए। वृक्ष कल नहीं था, आज है, कल फिर नहीं हो जाएगा। तो जो नहीं था, वह हो सका, जो है, वह कल नहीं हो जाएगा। आप कल नहीं थे, आज हैं, कल फिर नहीं हो जाएंगे। नहीं से आते हैं, नहीं को लौट जाते हैं। तो वह जो बीच में थोड़ी देर के लिए होना है, वह दो नहीं के बीच में है।



मेरे दो किनारे हैं, और मेरा होना बीच की धारा है। उन दो के बिना मैं नहीं हो सकूंगा। वे दोनों मेरे तरफ मुझे घेरे हुए हैं।

सुबह थी, सांझ हो गई; रात आ गई, फिर सुबह आएगी। कभी आपने देखा, हर दिन को दोनों तरफ दो रातें घेरे हुए हैं। हर रात को दोनों तरफ दो दिन घेरे हुए हैं। विपरीत किनारा बना हुआ है। जो भी है, वह दोनों ओर नहीं से घिरा है। और जो भी नहीं है, वह भी दोनों ओर है से घिरा है।

होना और न होना इतने विपरीत नहीं हैं, क्योंकि एक-दूसरे में हम बदलते हुए देखते हैं। जो आदमी था, वह अब नहीं हो गया। इसका मतलब हुआ कि जो था, वह नहीं है में प्रवेश कर जाता है, लिक्विड है, बह सकता है, ठोस विभाजन नहीं मालूम होता।

आदमी जवान है, फिर यही जवान बुजुर्ग हो जाता है। आप बता सकते हैं, कब का हो जाता है? कौन-सी तिथि में, कौन-सी तारीख में, कौन-सी समय की सीमा पर जवानी चली जाती है और बुढ़ापा आ जाता है?

नहीं बता पाएंगे। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब यह हुआ कि बुढापा और जवानी दो चीजें नहीं हैं, तरल हैं, लिक्विड हैं, एक-दूसरे में बह जाती हैं। पता ही नहीं चलता, कब जवान का हो गया। कब तक का जवान था, यह भी पता नहीं चलता। कब बच्चा जवान होता है, यह भी पता नहीं चलता!

तो जवानी या बुढ़ापा विपरीत दिखाई पड़ते हैं, लेकिन एक-दूसरे में बह जाते हैं, एक-दूसरे में डोलते रहते हैं। होना और न होना भी इसी तरह एक-दूसरे में डोलता रहता है। अभी बीज है, वृक्ष नहीं है। यह बीज अचानक कल वृक्ष के होने में प्रकट हो जाएगा। तो होना, न होना; अस्तित्व, अनस्तित्व; सत और असत-ये विपरीत हमें दिखाई पड़ते हैं, विपरीत नहीं हैं।

कृष्ण कहते हैं, सत भी मैं हूं, असत भी मैं हूं। जो है, वह भी मैं ही हू, और जो नहीं है; वह भी मैं ही हू। यह सबसे कठीन कोटि है, सबसे कठिन कैटेगरी है, क्योंकि नहीं है को हम सोच भी नहीं पाते, लेकिन प्रतिपल घटना घट रही है। जो तारा कल नहीं था, वह आज निर्मित हो गया है।

वैज्ञानिक कहते हैं, रोज नए तारे निर्मित होते हैं। और जो तारा कल था, वह आज खो गया है।

आप रात को जब आकाश में तारे देखते हैं, तो आप इस भ्रांति में न रहें कि जो तारे आप देखते हैं, सब वहां हैं। क्योंकि तारों से प्रकाश आने में करोड़ों-करोड़ों वर्ष लग जाते हैं, अरबों वर्ष भी लग जाते हैं। और यह हो सकता है कि वह तारा कभी का मिट चुका हो। लेकिन जब वह था, तब उसका प्रकाश चला था, और अब आज की रात आपको वह दिखाई पड़ता है, वह प्रकाश। हो सकता है, करोड़ वर्ष पहले वह प्रकाश चला हो, वह तारा कभी का मिट गया। लेकिन उसका प्रकाश पृथ्वी तक आने में समय लगता है। वह आज की रात आ पाया। आज की रात वह है नहीं। एक तो पक्की बात है कि उस जगह तो है ही नहीं, जहां से प्रकाश चला था। जहां आपको दिखाई पड़ेगा, वहां तो नहीं है। और दूसरी बात भी संभव है कि वह मिट ही गया हो, अब कहीं हो ही नहीं। फिर भी दिखाई पड़ रहा है।

प्रतिपल चीजें बन रही हैं और मिट रही हैं। बनना और मिटना एक साथ चल रहा है। अगर हम और गौर से देखें, तो बनना और मिटना दो अलग-अलग समय में नहीं घटते, एक ही समय में घटते हैं। जब मैं जवान हो रहा हूं तभी मैं बुजुर्ग भी हो रहा हूं। इसीलिए तो पता नहीं चलता कि किस दिन बुढ़ा हो गया। जब मैं जी रहा हूं तभी मैं मर भी रहा हूं। इसीलिए तो पता नहीं चलता कि मृत्यु कहां से आ गई। यह मृत्यु कहीं बाहर से नहीं आती। जब मैं जी रहा हूं तभी मैं मर भी रहा हूं।

जब आप एक मकान बना रहे हैं, तभी उसका गिरना भी शुरू हो गया। लेकिन यह दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि सौ साल बाद गिरेगा, हजार साल बाद गिरेगा। गिरने की प्रक्रिया हजार साल में पूरी होगी, लेकिन गिरना शुरू हो गया इसी क्षण। बच्चा पैदा हुआ और मरना शुरू हो गया। सत्तर साल बाद पूरी होगी यह प्रक्रिया। सत्तर साल बाद आपको पता लगेगा, चाहे आप बचेंगे भी नहीं तब तक। दूसरों को पता लगेगा कि यह आदमी जो सत्तर साल पहले पैदा हुआ था, आज मर गया। लेकिन सत्तर साल पहले जिस दिन जन्मा था, उसी दिन मौत शुरू हो गई, मरना शुरू हो गया।

हम रोज जी भी रहे हैं और मर भी रहे हैं। इसका मतलब कि हम रोज हो भी रहे हैं और नहीं भी हो रहे हैं, बन भी रहे हैं और मिट भी रहे हैं। यह एक साथ चल रहा है। ये हमारे दो पैर हैं, बायां और दायां। जब बायां चलता है, तो दायां रुका मालूम पड़ता है, जब दायां उठता है, तो बायां रुका मालूम पड़ता है। लेकिन बायां इसलिए रुकता है कि दायां उठ जाए, दायां इसलिए रुकता है कि बायां उठ जाए। जब आप लगते हैं कि जवान हैं, तब बुढ़ापा उठ रहा है। जब आप लगते हैं कि जी रहे हैं, तब मौत भी कदम उठा रही है। वे दोनों साथ चल रहे हैं। होना, न होना, एक ही अस्तित्व के हिस्से हैं।

कृष्ण कहते हैं, दोनों मैं हूं।

परंतु जो तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोमरस को पीने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष, मेरे को यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति को चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इंद्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।

कृष्ण कहते हैं, लेकिन।

इस लेकिन शब्द पर खयाल रखना-परंतु। यह तो उन्होंने जो बात कही, आत्यंतिक है, अल्टिमेट है, आखिरी है। लेकिन लोग, वेदों में जो कहा है, उन कर्मों को, यज्ञों को, हवनों को, क्रियाकांडों को करके, अपने को पापों से मुक्त करके स्वर्ग जाने की कामना करते हैं, सुख को पाने की कामना करते हैं।

यह परंतु बहुत महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह हुआ कि ऐसे लोग अभी भी स्वर्ग और नर्क को बांटते हैं। इसका अर्थ हुआ, ऐसे लोग अभी भी सुख और दुख को बांटते हैं। ऐसे लोग अभी भी सुख चाहते हैं, दुख से बचना चाहते हैं। ऐसे लोग अभी भी मन से ही जी रहे हैं।

सकाम का अर्थ है, मन से जीना, अभी कामना मिटी नहीं, अभी कामना बाकी है। अगर इस जगत की कामना से ऊब गए हैं, तो उस जगत की कामना शुरू है, अगर यहां मकान नहीं बनाना, तो स्वर्ग में कोई मकान बन जाए, इसकी चेष्टा करनी है, अगर यहां धन नहीं जुटाना, तो कोई पुण्यों की संपदा इकट्ठी हो जाए, इसका प्रयास करना है। लेकिन अभी उनकी भाषा नहीं बदली, अभी उनका सोचने का ढंग नहीं बदला; अभी उनकी दृष्टि नहीं बदली, अभी उनका ढाचा वही है।

फिर भी, ऐसे लोग अपने को पापों से छुड़ाते हैं; पुण्य करते हैं; बुरा नहीं करते, भला करते हैं, वेदविहित कर्म करते हैं; पूजा, यज्ञ, हवन करते हैं। इन पुण्यों के फलस्वरूप इंद्रलोक को प्राप्त होकर वे स्वर्ग में दिव्य देवताओं के सुखों को भोगते हैं, लेकिन मुझे उपलब्ध नहीं होते।

मुझे तो वही उपलब्ध होगा, जिसे स्वर्ग और नर्क में भेद न रहा। मुझे तो वही उपलब्ध होगा, जिसे पुण्य और पाप में भेद न रहा। मुझे तो वही उपलब्ध होगा, जिसे मृत्यु और जीवन एक हुए। मुझे तो वही उपलब्ध होगा, जो चुनाव ही नहीं करता। जो नहीं कहता, यह छोडूंगा, वह पाऊंगा, यह नहीं चाहिए वह चाहिए, ऐसा जो चुनाव ही नहीं करता, वन हू हैज बिकम च्चाइसलेस, जो बिलकुल चुनावरहित हो गया, जिसके मन में कोई विकल्प न रहा। जो कहता है, जो भी है, राजी हूं। दुख है, तो दुख से राजी हूं; सुख नहीं चाहिए। सुख है, तो सुख से राजी हूं; सुख के त्याग की भी चिंता नहीं करता हूं। जीवन है, तो धन्यवाद। और मृत्यु आए, तो स्वागत। और नर्क में डाल दो, तो भी तुम्हीं को देखता रहूंगा; और स्वर्ग में भेज दो, तो भी तुम्हीं मेरे सुख हो।

जो ऐसा हुआ, वह तो मुझे उपलब्ध होता है। लेकिन इसके पहले वे कहते हैं, परंतु ऐसे लोग भी हैं, जो शायद इतनी निर्द्वंद्व, इतनी द्वंद्वातीत, इतनी अद्वैत की दृष्टि को न पा सकें, वे लोग भी इंद्रलोक को तो पा ही सकते हैं, स्वर्ग को तो पा ही सकते हैं।

स्वर्ग का मतलब है, जो कम बुरा करेगा, कम पाप करेगा, कम दूसरों को दुख पहुंचाएगा, वह ज्यादा सुख पा सकता है-आनंद नहीं, ध्यान रखना! इसके भेद को ठीक से समझ लेना जरूरी होगा; आनंद नहीं, सुख पाएगा।

आनंद है सुख और दुख दोनों के पार। आनंद वह पाता है, जिसके सुख और दुख दोनों की दृष्टि खो जाती है। आनंद तीसरी बात है। आनंद सुख नहीं है। जैसा कि आमतौर से लोग समझते हैं कि आनंद सुख का ही परम रूप है। बिलकुल नहीं है। आनंद का सुख से उतना ही लेना-देना है, जितना दुख से। आनंद न दुख है, और न आनंद सुख है। इसलिए सुख दुख के विपरीत है, दुख सुख के विपरीत है। जिसको विपरीतता दिखाई पड़ रही है, वह सुख दुख में घूमेगा।

कृष्ण अगले सूत्र में कहते हैं कि यह स्वर्ग भी मिल जाए, तो फिर लौटकर आना पड़ेगा। क्योंकि फिर दुख में आना पड़ेगा। जो सुख में गया है, उसे दुख में आना ही पड़ेगा। द्वंद्व में जिसने विभाजन किया है, वह एक से दूसरे में जाएगा। जिसने जन्म को पकड़ा, उसे मरना ही पड़ेगा। जिसने सुख को पकड़ा, पकड़ते ही दुख में जाना शुरू हो गया।

कृष्ण कहते हैं, उसे तो लौट आना पडेगा। उसने अच्छे कर्म किए, उसने सदभाव रखे, उसने धार्मिक जीवन जीया, वह स्वर्ग तक पहुंच सकता है। सुख के आखिरी छोर को छू लेगा, लेकिन छूते ही लौटना शुरू हो जाएगा।

जैसे घड़ी का पेंडुलम जाता है बाएं तरफ, आखिरी छोर पर पहुंच जाता है। पहुंचते से ही वापस यात्रा शुरू हो जाती है। दाएं तरफ जाने लगता है।

ठीक ऐसे ही सुख का आखिरी बिंदु आ जाएगा। फिर यात्रा शुरू हो जाएगी वापसी। क्योंकि द्वंद्व में कोई मुक्ति नहीं है। वह वापस लौट आएगा। उसके कर्म चुक जाएंगे और वह वापस जमीन पर खड़ा हो जाएगा। मुझे नहीं पा सकेगा।

मुझे तो वही पा सकेगा, जो सत में और असत में, स्वर्ग में और नर्क में, पाप में और पुण्य में, दोनों में ही बिना किसी भेद- भाव के मुझ को ही देख लेता है। फिर कोई उपाय न रहा, फिर टूट गया पेंडुलम। फिर उसकी कोई यात्रा न रही, कोई मोमेंटम न रहा।

कृष्ण का सारा संदेश इस सूत्र में है कि द्वंद्व न दिखाई पड़े। लेकिन मन है, तो द्वंद्व दिखाई पड़ेगा ही। तो इस सूत्र का मतलब हुआ, मन न रहे; नो माइंड, अ-मन पैदा हो जाए। तो ही हम जीवन के ऐक्य को देख पा सकते हैं। ऐक्य ही मुक्ति है और ऐक्य ही आनंद।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 7

 मैं ओंकार हूं


     

पिताहमस्य जगतो माता धाता पिताम्ह:।

वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।। 17।।

गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुह्रत्।

प्रभव: प्रलय: स्थानं निधान बीजमध्ययम्।। 18।।


और हे अर्जुन! मैं ही इस संपूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला, पिता, माता और पितामह हूं, और जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेदु सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूं।

और है अर्जुन प्राप्त होने योग्य गंतव्य तथा भरण- योषण करने वाला सबका स्वामी,  सबका साक्षी, सबका वास स्थान और शरण लेने योग्य तथा हित करने वाला और उत्पत्ति और प्रलयरूय तथा सबका आधार, निधान अर्थात प्रलयकाल में सबका जिसमें लय होता ह्रै और अविनाशी, बीज कारण भी मैं ही हूं।



 जैसे मार्ग हैं अनेक और मंजिल एक है, वैसे ही प्रभु के रूप भी हैं अनेक, वह जो रूपायित हुआ है, वह एक है। ऐसा नहीं है कि उसे एक ही रूप में देखा जा सके! कोई रूप की सीमा नहीं है। जो जिस रूप में खोजना चाहे, उसे खोज ले सकता है। सभी रूप उसके हैं। जो भी है, वही है।

कृष्ण इस सूत्र में बहुत-से शब्दों का संकेत किए हैं। वे शब्द-संकेत समझने जैसे हैं, क्योंकि उन शब्द-संकेतों से ही साधना का पथ भी विस्तीर्ण होता है। कहा है, अर्जुन, मैं ही इस संपूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला हूं।

धर्म शब्द से हम परिचित हैं। धर्म शब्द का अर्थ होता है, जो धारण करे, जो धारण किए हुए है! धर्म शब्द से अर्थ रिलीजन नहीं होता। धर्म शब्द से अर्थ मजहब भी नहीं होता। मजहब का अर्थ होता है, पंथ,  संप्रदाय। रिलीजन शब्द का मौलिक अर्थ होता है, जिससे हम बंधे हैं, रिलीगेर, जिससे हम बंधे हैं। लेकिन यह बड़ी कीमती बात है कि भारत धर्म को इस भांति नहीं सोचता कि जिससे हम बंधे हैं, बल्कि इस भांति सोचता है कि जिस पर हम सधे हैं।

बंधन शब्द अप्रीतिकर भी है, कुरूप भी है। शायद पश्चिम ने धर्म को एक बांधने वाली सीमा-रेखा की तरह देखा है, इसीलिए पश्चिम ने धर्म से मुक्त होने की चेष्टा भी की है। जिससे हम बंधे हैं, उससे हम मुक्त भी होना चाहेंगे। बंधन चाहे कितना ही स्वर्ण का क्यों न हो, विद्रोह पैदा करेगा।

भारतीय मनीषा धर्म को एक बंधन नहीं मानती, धर्म को एक मुक्ति मानती है। धर्म एक ग्रंथि नहीं है, जिससे हम बंधे हैं; धर्म एक स्वतंत्रता है, जिसमें हम मुक्त हो सकते हैं। धर्म शब्द का अर्थ जिसको हम धारण किया है। उससे हम बंधे नहीं है, हम उससे ही निष्पन्न हुए हैं।

एक वृक्ष है। वृक्ष के नीचे उतरें, तो जड़ों का फैलाव है। वृक्ष ऐसा भी सोच सकता है कि जमीन वह है, जिससे मैं बंधा हूं। और इस सोचने में भी गलती न होगी। क्योंकि वृक्ष ऐसा देख सकता है कि यह जमीन ही है, जिसमें मेरी जड़ें उलझी हैं और जिससे मैं बंधा हूं। वृक्ष जड़ों और जमीन के बीच के संबंध को बंधन की भांति भी देख सकता है। और वृक्ष इस भांति भी देख सकता है कि जमीन मेरा बंधन नहीं है, यह जमीन ही है, जिस पर मैं सधा हूं। यह जड़ों और जमीन के बीच बंधन नहीं है, जड़ों और जमीन के बीच प्राणों का संबंध है।

अगर वृक्ष ऐसा देखे कि जमीन से मैं बंधा हूं, तो जमीन से मुक्त होने की कोशिश शुरू हो जाएगी। इस देखने से ही कोशिश शुरू हो जाएगी। यह दृष्टि ही छुटकारे का प्रारंभ होगी। और अभागा होगा वह वृक्ष। क्योंकि जहां तक देखने का संबंध है, वहा तक तो कोई हर्ज नहीं है कि वृक्ष समझे कि मैं जमीन से बंधा हूं क्योंकि आकाश में उड़ नहीं सकता, लेकिन जिस दिन वृक्ष इस बंधन से मुक्त होने की कोशिश करेगा, उस दिन वृक्ष अपने ही हाथों अपनी आत्महत्या कर लेगा। क्योंकि जड़ें बंधन नहीं हैं, जीवन हैं।

धर्म का अर्थ है, जिसने हमें धारण किया है। वह बंधन नहीं है, वह हमारे प्राणों का स्रोत है। जड़ें बंधन नहीं हैं, जड़ें वृक्ष के प्राण हैं। और पृथ्वी ने उसे बांधा नहीं है, जीवन दिया है। सच तो यह है कि जड़ों के कारण ही वह आकाश में फैलने में समर्थ हुआ है। जड़ों में जो रस, जड़ों में जो प्राण, जो ऊर्जा उसे उपलब्ध हो रही है, वही उसके पत्ते और फूल बनकर आकाश में खिली है। यह जो वृक्ष की यात्रा है आकाश की तरफ उठने की, यह जो महत्वाकांक्षा है कि आकाश को छू लूं , यह जड़ों के ही आधार पर है।

और ध्यान रहे, जितनी जड़ें गहरी जाएंगी जमीन में, उतना ही वृक्ष ऊपर जाएगा आकाश में। अगर जड़ें जमीन के पूरे के पूरे प्राणों में प्रविष्ट हो जाएं, तो वृक्ष आकाश को स्पर्श कर लेगा। जितनी होगी गहराई जड़ों की, उतनी ऊंचाई हो जाएगी वृक्ष की। जड़ें दुश्मन नहीं हैं, और जड़ें ऊंचे उठने में बाधा भी नहीं हैं; और जड़ें आकाश में उड़ने में सहयोगी हैं, साथी हैं। उनके बिना वृक्ष बचेगा ही नहीं, आकाश में उड़ने का तो सवाल ही नहीं है।

भारतीय मनीषा कहती है कि धर्म है वह, जो हमें धारण किए है। इसमें एक और मजे की बात है कि अगर आपको बंधन में डाला जाए, तो आपकी जानकारी के बिना नहीं डाला जा सकता। और बंधन में डालने का तो अर्थ ही यह होगा कि पहले कभी आप बंधन के बाहर भी थे, और कभी बंधन में डाल दिए गए हैं, और कभी बंधन से फिर अलग भी हो सकते हैं।

यहां एक दूसरा सूत्र आप खयाल ले लें। भारतीय मनीषा की दृष्टि ऐसी है कि धर्म वह है, जिससे हम चाहें तो भी अलग नहीं हो सकते, कोई उपाय नहीं है। हम चाहें तो भी हम धर्म से अलग नहीं हो सकते, क्योंकि धर्म हमारे प्राणों का आधार है। धर्म से अलग होकर हम हो ही नहीं सकते, हमारा अस्तित्व भी नहीं होगा। जैसे वृक्ष जमीन से अलग होकर नहीं हो सकता, और जैसे मछली सागर से अलग होकर नहीं हो सकती। क्योंकि सागर सिर्फ मछली के लिए माध्यम ही नहीं है, जिसमें वह होती है, वह उसका प्राण भी है। सागर ने उसे धारण भी किया है, जन्माया भी है, जिलाया भी है। सागर उसे लीन भी करेगा अपने में। सागर ही मछली के भीतर भी दौड़ रहा है। इसलिए सागर के बाहर आकर मछली को जीना असंभव है। थोड़ी-बहुत देर जी सकती है, जितनी देर तक, भीतर जो सागर था, वह सूख न जाए। थोड़ी-बहुत देर वृक्ष भी हरा रहेगा, जितनी देर तक जमीन से खींची गई रस- धार मौजूद रहेगी। फिर सूख जाएगा।

धर्म वह है, जिससे हम अलग नहीं हो सकते। वह हमारी आत्मा है। इसलिए धर्म की जो दूसरी बड़ी व्याख्या भारत ने की है, वह महावीर ने की है। हिंदुओं ने व्याख्या की है कि धर्म वह है, जो धारण किए है। महावीर ने व्याख्या की है कि धर्म वह है, जो हमारा स्वभाव है। बात एक ही है। क्योंकि स्वभाव ही हमें धारण किए हुए है; या जो हमें धारण किए हुए है, वही हमारा स्वभाव है,  वही हम हैं।

तो कृष्ण अपनी पहली परिभाषा देते हैं, वे कहते हैं, मैं धर्म हूं; मैं धाता हूं; मैं वह हूं, जो धारण किए है।

जो हमें धारण किए है, उसे हम भूल सकते हैं, उससे हम दूर नहीं हो सकते। जो धारण किए है, उसे हम भूल सकते हैं, उससे हम दूर नहीं हो सकते। उसका हम विस्मरण कर सकते हैं, उससे हम विच्छिन्न नहीं हो सकते। उसे हम जन्मों-जन्मों तक याद न करें, यह हो सकता है, लेकिन हम क्षणभर को भी उससे भिन्न नहीं हो सकते। इसलिए सारी दुनिया में धर्म को सीखने की भाषा में समझा गया है, धर्म भी एक लर्निग है, एक शिक्षण है। भारत ने उसे इस भाषा में नहीं समझा। भारत के लिए धर्म शिक्षण नहीं है, पुनर्स्मरण है, रिमेंबरिंग है। हम सिर्फ भूल सकते हैं, खो नहीं सकते। और जो बहुत निकट होता है, उसे भूलना आसान है।

वृक्ष अगर अपनी जड़ों को भूल जाए, तो बहुत कठिन नहीं है। कई कारण हैं। पहला तो कारण यह है कि जड़ें छिपी होती हैं जमीन के भीतर। असल में जहां भी जन्म होता है, वहां गुह्य अंधकार चाहिए। चाहे मां के पेट में बच्चे का जन्म होता हो, तो भी गुह्य अंधकार चाहिए। और चाहे जड़ों में वृक्ष का जन्म होता हो, तो भी पृथ्वी का गुह्य अंधकार चाहिए। जहां भी जन्म होता है, वहा इतनी निजता चाहिए कि प्रकाश भी बाधा न डाले। वहा इतना मौन चाहिए, इतनी शांति चाहिए कि प्रकाश की किरण भी आकर कंपन पैदा न करे।

प्रकाश के साथ हलन-चलन शुरू हो जाता है। अंधकार महाशांति है। और इसलिए हम अंधकार से डरते हैं, क्योंकि हम कोई भी शांति नहीं चाहते। जो भी शांति चाहेगा, वह अंधकार से नहीं डरेगा, अंधकार को प्रेम करने लगेगा। जो जितनी ज्यादा अशांति से भरा होगा, उतना अंधकार से डरेगा, भयभीत होगा।  यह अशांति की आखिरी सीमा है। जड़ें तो अंधकार में बड़ी होती हैं, इसलिए छिपी होती हैं। जो भी महत्वपूर्ण है, वह गुप्त होता है। जो प्रकट होता है, वह महत्वपूर्ण नहीं है।

ध्यान रहे, जो भी महत्वपूर्ण है, वह सदा गुप्त होता है। जडें गुप्त हैं, वे महत्वपूर्ण हैं; उन्हें उघाड़ा नहीं जा सकता। शाखाएं उघडी हैं, जो उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं। हम एक वृक्ष की शाखाओं को काट दें, नई शाखाएं आ जाएंगी। एक पूरा वृक्ष गिर जाए, नए अंकुर निकल आएंगे और नया वृक्ष निर्मित हो जाएगा। क्योंकि वह जो प्राण है, वह नीचे छिपा है। उस पर आघात भी नहीं पहुंचता है। लेकिन जड़ें काट दें, फिर सारा वृक्ष कुम्हला जाएगा और मर जाएगा।

तो जहां जीवन का सूत्र है, उसे छिपाकर रखा है जीवन ने। जड़ें छिपी हैं; वृक्ष भूल सकता है। बहुत स्वाभाविक है कि वृक्ष को जड़ों की कोई याद न आए। फूल दिखाई पड़े, शाखाएं दिखाई पड़ें।

रोशनी में हैं, आकाश में फैली हैं, महत्वाकांक्षा का हिस्सा हैं। पक्षी आते हैं, शाखाओं पर विश्राम करते हैं। फूल आते हैं, पक्षी गीत गाते हैं। सुबह सूरज निकलता है, हवाएं झोंके देती हैं। तूफान आते हैं, आंधिया आती हैं। वर्षा होती है, रात में चांदनी बरसती है। सब वृक्ष के ऊपर घटित होता है। वृक्ष इसमें खो जा सकता है, जड़ें भूल जा सकता है।

लेकिन जब वृक्ष को जडों की बिलकुल भी याद नहीं है, तब भी जड़ें ही उसे धारण किए हुए हैं। जब उसे बिलकुल भी स्मरण नहीं है, जब वह कभी धन्यवाद का एक शब्द भी जड़ों से नहीं कहता, जब कभी लौटकर जड़ों का कोई आभार भी नहीं मानता, तब भी जड़ें उसे धारण किए हुए हैं।

तो एक व्यक्ति नास्तिक हो, ईश्वर को इनकार कर दे, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है, ईश्वर ही उसे धारण किए हुए है। और एक व्यक्ति भूल जाए, और ईश्वर की उसे कोई सुध न रहे, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, ईश्वर ही उसे धारण किए हुए है।

कृष्ण कहते हैं, मैं हूं धाता, मैं वह हूं जो धारण किए हुए है। कोई जाने, न जाने, पहचाने, न पहचाने, स्मृति आती हो, न आती हो, चाहे तो इनकार भी कर दे, तो भी मैं धारण किए हुए हूं।

आप इनकार कर सकते हैं, लेकिन ईश्वर से बच नहीं सकते। आप भाग सकते हैं, कितने ही भागें! जैसे कोई मछली सागर में सागर से भागती हो, भागती जाए, मीलों के चक्कर लगाए और फिर भी पाए कि सागर में है। ऐसे ही हर व्यक्ति जो ईश्वर से भागता है, एक दिन पाता है कि वह जिसमें भाग रहा था, वही तो ईश्वर है। कहां भागकर जाने का उपाय है?

इसलिए हमने बहुत मौलिक और आधारभूत व्याख्या पकड़ी है धर्म की, और वह है कि जो हमें धारण किए है। और आपको ही नहीं।




सारी दुनिया में धर्मों ने मनुष्य को केंद्र बना लिया है। इसलिए बहुत धर्म हैं, जो कहेंगे कि जानवरों में तो कोई आत्मा ही नहीं है, इसलिए उनकी हिंसा की जा सकती है, वृक्षों में कोई आत्मा नहीं है, उन्हें काटा जा सकता है, सिर्फ आदमी में आत्मा है। अधिकतर धर्म एन्थोपोसेंट्रिक हैं, आदमी को केंद्र मान लिया है।

भारत ऐसा नहीं मानता। भारत यह नहीं कहता कि जो आदमी को धारण किए हुए है, वह ईश्वर है। भारत यह कहता है कि अस्तित्व ही जिसमें सम्हला हुआ है, जो अस्तित्व को ही धारण किए हुए है, वह ईश्वर है। वही नहीं है ईश्वर, जो आपको धारण किए हुए है; वह जो वृक्ष को धारण किए हुए है, वह भी ईश्वर है। वह जो नदी में बह रहा है, वह भी ईश्वर है। वह जो सूरज में पिघलकर आग बन रहा है, वह भी ईश्वर है। और वही ईश्वर नहीं है, जो आपको प्रीतिकर है, जो अप्रीतिकर है, वह भी ईश्वर है। अमृत ही ईश्वर नहीं है, जहर भी ईश्वर है। जहर के होने के लिए भी उसका ही आधार चाहिए। उसके बिना कुछ भी नहीं हो सकता है।

इसे हम ऐसा समझें, कि ईश्वर से हमारा अर्थ है, अस्तित्व का जो सार है। इसलिए ईश्वर हमारे लिए व्यक्ति नहीं है। वह कहीं आकाश में सात आसमानों के ऊपर बैठा हुआ सिंहासन पर कोई व्यक्ति नहीं है, जो राज-काज चला रहा है। इतनी बचकानी हमारी धारणा नहीं है। यह बच्चों का ईश्वर है। इससे और गहरे ईश्वर को बच्चे नहीं समझ सकते। लेकिन हमारे लिए ईश्वर का अर्थ है, जिसने सभी कुछ धारा हुआ है-सभी कुछ; जन्म भी और मृत्यु भी, और सृजन भी और प्रलय भी।

तो इसका साधक के लिए क्या अर्थ होगा?

साधक के लिए अर्थ होगा कि जब भी आप किसी चीज को देखें, तो उसकी शाखाओं पर कम, उसकी जड़ों पर ज्यादा ध्यान दें। और जब भी किसी चीज को आप देखें, तो जो प्रकट है, उस पर कम, और जो अप्रकट है, उस पर ज्यादा ध्यान दें। जो दिखाई पड़ रहा है, उस पर कम, और जिसके कारण दिखाई पड़ रहा है, उसकी खोज करें। मछली को देखें, तो सागर की याद करें। और वृक्ष को देखें, तो जड़ों का स्मरण आ जाए। सदा ही उसकी खोज करते रहें, जो नीचे छिपा है और सभी को सम्हाले हुए है।

तो कृष्ण कहते हैं, मैं धाता हूं। और अगर कोई धर्म की खोज करता रहे, तो मुझ तक पहुंच जाता है।

मैं पिता हूं माता हूं? पितामह हूं।

अजीब है बात। क्योंकि वे कह रहे हैं, मैं पिता भी हूं! पिता कहते हों, तो फिर माता नहीं कहना चाहिए; कहते हैं, मैं माता भी हूं! और यहां तक भी ठीक था, फिर बात और भी अतर्क्य हो जाती है, वे कहते हैं, पिता का पिता भी मैं ही हूं; पितामह भी मैं ही हूं? ऐसा कहकर क्या कहना चाहते हैं? ऐसा कहकर वे यह कहना चाहते हैं-इसे हम थोड़ा दो-तीन तरफ से समझने की कोशिश करें। आप पैदा हुए। तो शायद आपको खयाल होगा, जन्म की एक तिथि है और फिर मृत्यु की एक तिथि है, इन दोनों के बीच आप समाप्त हो जाएंगे। लेकिन इस जगत में कोई भी चीज आइसोलेटेड नहीं है। इस जगत में कोई चीज अलग- थलग नहीं है। जन्म के पहले भी आपको किसी न किसी रूप में होना ही चाहिए, अन्यथा आपका जन्म नहीं हो सकता। जगत एक श्रृंखला है, जगत एक कड़ियों का जोड़ है, जिसमें हर कड़ी पीछे की कड़ी से जुड़ी है, और हर कड़ी आगे की कड़ी से भी जुड़ी है। जिसे आप जन्म कहते हैं, वह सिर्फ एक कड़ी की शुरुआत है; पिछली कड़ी पीछे छिपी है। और जिसे आप मृत्यु कहते हैं, वह फिर एक कड़ी का अंत है; लेकिन अगली कड़ी आगे मौजूद है। इस जगत में कोई चीज विच्छिन्न नहीं है। जीवन एक सतत श्रृंखला है, एक प्रवाह है।

अगर ईश्वर को खोजना है, तो प्रवाह को देखना पड़ेगा; और अगर ईश्वर से बचना है, तो व्यक्ति को देखना पड़ेगा। अगर आप व्यक्ति को देखेंगे, तो ईश्वर को खोजना मुश्किल है।

मैं पैदा हुआ, मैं मर जाऊंगा, अगर यही जीवन है, तो इस जगत में ईश्वर का कोई अनुसंधान नहीं हो सकता। मेरा जन्म भी तब बेबूझ है, क्योंकि कोई कारण नहीं, एक दुर्घटना मालूम होती है कि मैं पैदा हुआ; और मेरी मृत्यु भी एक दुर्घटना होगी। इन दोनों के पार, जगत के अस्तित्व से मेरा क्या संबंध है? जब मैं नहीं था, तब भी जगत था; और जब मैं नहीं रहूंगा, तब भी जगत रहेगा। तो मैं इस जगत से अलग हो गया, मेरे संबंध टूट गए।

और जब मैं नहीं रहूंगा, तब भी फूल खिलते रहेंगे। और जब मैं नहीं रहूंगा, तब भी वसंत आएगा और पक्षी गीत गाते रहेंगे। और जब मैं नहीं रहूंगा, तब भी झरने बहेंगे और नाचेंगे और सागर की तरफ चलेंगे। तब तो इस जगत से मेरी शत्रुता भी निर्मित हो गई। क्योंकि मेरे होने न होने से इस जगत की धारा का कोई भी संबंध नहीं मालूम पड़ता। मैं अलग हो गया। मैं टुकड़ा हो गया।

पश्चिम की दृष्टि ऐसी ही है, व्यक्ति को एक टुकडे की तरह देखने की। और इसलिए पश्चिम में जीवन को देखने का ढंग संघर्ष का हो गया। अगर मैं अलग हूं तो जीवन संघर्ष है; और अगर मैं एक हूं, तो जीवन समर्पण होगा।

अगर मैं इस जगत से अलग हूं और मेरे जन्म से इस जगत को कोई प्रयोजन नहीं है; मैं जब नहीं था, तो जगत में कौन-सी कमी थी? कोई भी तो मेरे न होने से फर्क नहीं पड़ता था। और जब मैं कल नहीं हो जाऊंगा, तो जगत में कौन-सी कमी हो जाएगी? कोई भी तो फर्क नहीं पड़ेगा।

तो मेरा होना और जगत का होना, दोनों संबद्ध नहीं मालूम होते। नहीं तो जब मैं नहीं था, तो जगत में कुछ कमी होनी चाहिए। और जब मैं न रह जाऊं, तब एक खाली जगह, एक रिक्त जगह छूट जानी चाहिए, जो फिर भरी न जा सके।

लेकिन ऐसा नहीं होगा। मेरे होने न होने से इस विराट प्रवाह में कहीं भी कोई भनक भी न पड़ेगी। तो फिर मैं अलग हूं और यह जगत अलग है। और निश्चित ही इस जगत और मेरे बीच जो संबंध है, वह मैत्री और प्रेम का नहीं, संघर्ष का और शत्रुता का है। इस। जगत से मुझे जीतना है, ताकि मैं ज्यादा जी सकूं। इस जगत से मुझे बचना है, ताकि यह जगत मुझे पीस न डाले।

जगत बिलकुल बेरुखा मालूम पड़ता है। वृक्ष के नीचे खड़े हों, वृक्ष ऊपर गिर जाता है! और जरा भी खबर नहीं देता है कि मैं गिर रहा हूं? हट जाओ! .और तूफान आता है, और आप गिर जा सकते हैं। आंधी आपको मिटा दे सकती है। सागर आपको डुबा ले सकता है। पहाड़ आपको दबा दे सकता है। इस जगत में चारों तरफ अस्तित्व को आपकी कोई भी चिंता नहीं है। एक शत्रुता है, जगत आपको मिटाने पर तुला है। तो आप जगत से संघर्ष करने को तत्पर हो जाएं।

इसलिए पश्चिम ने एक भाषा खोजी है, वह भाषा युद्ध की भाषा है, संघर्ष की भाषा है। इसलिए ऐसी किताबें लिखी गई हैं पिछले पचास वर्षों में। बर्ट्रेड रसेल ने भी एक किताब लिखी है, नाम दिया है, कांक्वेस्ट आफ नेचर, प्रकृति की विजय!

विजय की भाषा ही संघर्ष और युद्ध की भाषा है। हम उसे कैसे जीत सकते हैं, जो हमारा प्राण है? हम उसे कैसे जीत सकते हैं, जो हमें धारण किए है? हमारा उससे क्या संघर्ष हो सकता है? मछली का क्या संघर्ष सागर से? वृक्ष की जड़ों का क्या संघर्ष पृथ्वी से? लेकिन दृष्टि पर निर्भर करेगा।

तो कृष्ण कहते हैं, मैं तुम में ही नहीं हूं, मैं तुम्हारी मां में भी हूं? तुम्हारे पिता में भी, पिता के पिता में भी।

श्रृंखला की खबर दे रहे हैं वे। वे यह कह रहे हैं कि तुम तुम में ही नहीं हो, तुम तुम्हारी मां में भी थे, तुम तुम्हारे पिता में भी थे, और तुम तुम्हारे पिता के पिता में भी थे। और तुम अपने बच्चों में भी रहोगे, और तुम अपने बच्चों के बच्चों में भी रहोगे। यह जगत तुमसे कभी भी खाली नहीं होगा, और यह जगत तुमसे कभी खाली नहीं था। यह जगत तुमसे सदा ही भरा रहा है; और यह जगत सदा तुमसे भरा ही रहेगा। इस जगत के तुम अनिवार्य हिस्से हो। इस जगत में और तुम्हारे बीच एक पारिवारिक नाता है। यह जगत तुम्हारा पड़ोसी ही नहीं है, इस जगत के और तुम्हारे बीच, जैसे मां और बेटे के बीच, पिता और बेटे के बीच नाता हो, वैसा नाता है। तुम इसकी ही कड़ी हो।

एक लहर उठती है सागर में, क्षणभर को नाचती है आकाश में, सूरज को छूने की कोशिश करती है, और फिर गिर जाती है। लहर सोच सकती है कि मैं सागर से अलग हूं। सोच सकती है। अलग होती भी है क्षणभर को। प्रकट ही दिखाई पड़ता है कि सागर से अलग है। छलांग भरती है आकाश की तरफ, पूरा सागर नीचे पड़ा रह जाता है, सिर्फ लहर उठती है।

तो लहर को यह खयाल अगर आ जाए, यह अहंकार अगर आ जाए कि मैं अलग हूं तो गलती तो कुछ भी नहीं है। और जब लहर को सागर नीचे खींचने लगे, तो लहर को ऐसा लगे कि सागर मुझे मिटाने को तत्पर है, और हवाएं मुझे तोड़ देने को उत्सुक हैं, और सारा जगत मेरे खिलाफ है, और सारा जगत मुझे मिटाने की चेष्टा में लगा है, तो मुझे लड़ना है! यह भी तर्कयुक्त होगा। पहले निर्णय के बाद, यह दूसरी बात स्वाभाविक है।

लेकिन लहर को सागर मिटाने को उत्सुक है? सागर लहर को मिटाने को उत्सुक हो भी कैसे सकता है! और यह सच है कि लहर सागर में ही मिटती है। फिर भी सागर लहर को मिटाने को उत्सुक नहीं है। क्योंकि लहर को यह पता ही नहीं है कि वह सागर का बढ़ा हुआ हाथ है, और कुछ भी नहीं है। वह सागर की ही छाती पर उठी एक तरंग है। वह सागर की ही छाती है। वह सागर की ही महत्वाकांक्षा है, जो छलांग लगा गई है। इससे भिन्न नहीं है। सागर उसे क्यों मिटाएगा! सागर ही है वह।

कृष्ण कहते हैं, मैं मां भी हूं पिता भी हूं? पितामह भी हूं।

वे यह कह रहे हैं कि मैं वह अनंत श्रृंखला हूं, जिसकी तुम एक कड़ी हो। मैं तुम्हारे पीछे तुम्हारे पिता की तरह छिपा हूं; तुम्हारे पीछे तुम्हारी मां की तरह छिपा हूं; उनके भी पीछे, उनके भी पीछे, मैं सदा तुम्हारे पीछे खड़ा हूं। तुम मेरे ही बढ़े हुए हाथ हो; तुम मेरी ही लहर हो; तुम मेरी ही तरंग हो। और तुम्हीं नहीं हो, तुम्हारी मां भी थी; तुम्हारे पिता भी थे, उनके पिता भी थे।

समझें। एक दृष्टि है व्यक्ति को व्यक्ति मानने की, एटामिक, अणु की तरह अलग। लीबनिज ने इसके लिए एक ठीक शब्द पश्चिम में खोजा है। उसने शब्द दिया है, मोनोड। मोनोड का मतलब होता है, एक ऐसा अणु, जिसमें कोई खिड़की-दरवाजे नहीं हैं; जो सब तरफ से बंद है।

तो हम व्यक्ति को मोनोड समझ सकते हैं, विडोलेस, डोरलेस, एटामिक, क्लोज्ड, सब तरफ से बंद एक मकान, जिसमें कोई खिड़की नहीं, कोई दरवाजा नहीं। सब तरफ से बंद। कहीं बाहर से जुड्ने का कोई सेतु नहीं। कोई चर्चा नहीं हो सकती। पड़ोसी से मिलने का कोई उपाय नहीं। हाथ फैलाकर दोस्ती नहीं बांधी जा सकती। सब तरफ से बंद। ऐसा प्रत्येक व्यक्ति एक बंद अणु है। अगर ऐसा है, तो जगत एक भयंकर संघर्ष होगा और एक भयंकर असफलता भी।

कृष्ण कहते हैं, जगत या व्यक्ति, अलग-अलग चीजें नहीं हैं, एक लंबी श्रृंखला है। जिसमें हर चीज पिछली कड़ी से और अगली कड़ी से जुड़ी है। यह जो वृक्ष की जड़ है, यह जो वृक्ष के शिखर पर फूल खिला है, इससे जुड़ी है। अगर फूल से बात कर रहे होते अर्जुन की जगह कृष्ण, तो फूल से वे कहते कि मैं तेरे भीतर तो हूं ही; तेरी जडों के भीतर भी मैं ही हूं। और तेरी जड़ें जिस बीज से पैदा हुई थीं, उसके भीतर भी मैं ही था। और वह बीज जिस वृक्ष पर लगा था, वह भी मैं हूं। और वह वृक्ष जिन जड़ों से आया था, वह भी मैं। और तू लौटता जा पीछे; मैं तेरा पूरा इतिहास हूं दि होल हिस्ट्री। मैं तेरा अनंत इतिहास हूं। सब जो हुआ है पहले, उसमें मैं था। और अभी जो हो रहा है, वह उससे जुड़ा हुआ अंग है।

व्यक्ति अपने को अस्तित्व से अलग न समझे, तो ही धर्म के अनुभव में उतरता है। अलग समझे, तो अधर्म के अनुभव में यात्रा शुरू हो जाती है। व्यक्ति अपने को जगत से एक जान पाए, तो तत्‍क्षण लहर फैलकर सागर बन जाती है।

और काश! मैं यह देख सकूं कि मैं अपने पिता में, अपनी मां में, उनके पिता में, उनकी मां में, अनंत-अनंत श्रृंखलाओं में किसी न किसी रूप में मौजूद था, तो फिर मेरा जन्म कोई अनहोनी घटना नहीं रह जाती, एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा हो जाता है। फिर मेरी मृत्यु भी मृत्यु नहीं होगी; क्योंकि जब मेरा जन्म मेरा जन्म नहीं है, तो मेरी मृत्यु भी मेरी मृत्यु नहीं हो सकती। मेरा जन्म एक लबी श्रृंखला का हिस्सा है और मेरी मृत्यु भी एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा होगी।

और तीसरी बात कहते हैं, और जानने योग्य पवित्र ओंकार मैं हूं। अतीत की बात कही कि यह मैं हूं। अतीत की सारी श्रृंखला मैं हूं; एम दि पास्ट, दि होल पास्ट। पूरा बीता हुआ सब मैं हूं। और तत्‍क्षण भविष्य की बात कहते हैं कि जानने योग्य ओंकार भी मैं हूं।

ओंकार का अनुभव इस जगत का आत्यंतिक, अंतिम अनुभव है। कहना चाहिए, दि अल्टिमेट फ्यूचर। जो हो सकती है आखिरी बात, वह है ओंकार का अनुभव।

तो कृष्ण कहते हैं, भविष्य भी मैं हूं। कहते हैं, अतीत ही मैं नहीं हूं तुम्हारा पिता ही मैं नहीं हूं? पिता का पिता ही मैं नहीं हूं, तुम्हारी जो भी संभावना है भविष्य की, वह भी मैं हूं। तुम जो हो सकते हो, वह भी मैं हूं। तुम जो थे, वह मैं हूं ही। तुम जो हो, वह मैं हूं ही। तुम जो हो सकते हो; वह फूल, जो अभी नहीं खिला, खिलेगा; वह भी मैं हूं। और वह जो बीज अभी नहीं लगा, लगेगा, वह भी मैं हूं। इस जगत का अतीत ही मैं नहीं हूं? इस जगत की संपूर्ण संभावना भी मैं हूं। जो कुछ भी हो सकेगा, वह भी मैं हूं।

क्योंकि अगर परमात्मा सिर्फ अतीत है और भविष्य नहीं, तो व्यर्थ है। क्योंकि अतीत तो हो चुका। जो हो चुका, अब उससे कुछ लेना-देना नहीं है। जो नहीं हुआ है, वही हमारी आशा है। अगर परमात्मा सिर्फ हमारा अतीत है, तो भविष्य अंधकार है। अतीत तो जा चुका, मर चुका, हो चुका। मौलिक रूप से परमात्मा को हमारा भविष्य होना चाहिए। तो ही आशा, सार्थक आशा का जन्म होता है, तो ही सार्थक अभीप्सा का, उस महत्वाकांक्षा का, जो अंतिम को अनुभव करना चाहती है।।

कृष्ण कहते हैं, मैं तुम्हारा भविष्य भी हूं। और भविष्य में अंतिम घटना घट सकती है, वह वे कहते हैं। वे कहते हैं, ओंकार भी मैं हूं।

ओंकार का अर्थ है, जिस दिन व्यक्ति अपने को विश्व के साथ एक अनुभव करता है, उस दिन जो ध्वनि बरसती है। जिस दिन व्यक्ति का आकार में बंधा हुआ आकाश निराकार आकाश में गिरता है, जिस दिन व्यक्ति की छोटी-सी सीमित लहर असीम सागर में खो जाती है, उस दिन जो संगीत बरसता है, उस दिन जो ध्वनि का अनुभव होता है, उस दिन जो मूल-मंत्र गूंजता है, उस मूल-मंत्र का नाम ओंकार है। ओंकार जगत की परम शांति में गूंजने वाले संगीत का नाम है।

संगीत दो तरह के हैं। एक संगीत जिसे पैदा करने के लिए हमें स्वर उठाने पड़ते हैं, शब्द जगाने पड़ते हैं, ध्वनि पैदा करनी पड़ती है। इसका अर्थ हुआ, क्योंकि ध्वनि पैदा करने का अर्थ होता है कि कहीं कोई चीज घर्षण करेगी, तो ध्वनि पैदा होगी। जैसे मैं अपनी दोनों ताली बजाऊं, तो आवाज पैदा होगी। यह दो तालियों के बीच जो घर्षण होगा, जो संघर्ष होगा, उससे आवाज पैदा होगी।

तो हमारा जो संगीत है, जिससे हम परिचित हैं, वह संगीत संघर्ष का संगीत है। चाहे होंठ से होंठ टकराते हों, चाहे कंठ के भीतर की मांस-पेशियां टकराती हों, चाहे मेरे मुंह से निकलती हुई वायु का धक्का आगे की वायु से टकराता हो, लेकिन टकराहट से पैदा होता है संगीत। हमारी सभी ध्वनियां टकराहट से पैदा होती हैं। हम जो भी बोलते हैं, वह एक व्याघात है, एक डिस्टरबेंस है।

ओंकार उस ध्वनि का नाम है, जब सब व्याघात खो जाते हैं, सब तालियां बंद हो जाती हैं, सब संघर्ष सो जाता है, सारा जगत विराट शांति में लीन हो जाता है, तब भी उस सन्नाटे में एक ध्वनि सुनाई पडती है। वह सन्नाटे की ध्वनि है, वॉइस आफ साइलेंस; वह शून्य का स्वर है। उस क्षण सन्नाटे में जो ध्वनि गूंजती है, उस ध्वनि का, उस संगीत का नाम ओंकार है।

अब तक हमने जो ध्वनियां जानी हैं, वे पैदा की हुई हैं। अकेली एक ध्वनि है, जो पैदा की हुई नहीं है, जो जगत का स्वभाव है, उस ध्वनि का नाम ओंकार है।

इस ओंकार को कृष्ण कहते हैं, यह अंतिम भी मैं हूं। जिस दिन सब खो जाएगा, जिस दिन कोई स्वर नहीं उठेगा, जिस दिन कोई अशांति की तरंग नहीं रहेगी, जिस दिन जरा-सा भी कंपन नहीं होगा, सब शून्य होगा, उस दिन जिसे तू सुनेगा, वह ध्वनि भी मैं ही हूं। सब के खो जाने पर भी जो शेष रहेगा, वह मैं हूं। या ऐसा कहें, जब सब खो जाता है, तब भी मैं शेष रह जाता हूं। जब कुछ भी नहीं बचता, तब भी मैं बच जाता हूं। मेरे खोने का कोई उपाय नहीं है, वे यह कह रहे हैं।

वे कह रहे हैं, मेरे खोने का कोई उपाय नहीं है। मैं मिट नहीं सकता हूं क्योंकि मैं कभी बना नहीं हूं। मुझे कभी बनाया नहीं गया है। जो बनता है, वह मिट जाता है। जो जोड़ा जाता है, वह टूट जाता है। जिसे हम संगठित करते हैं, वह बिखर जाता है। लेकिन जो सदा से है, वह सदा रहता है।

इस ओंकार का अर्थ है, दि बेसिक रियलिटी; वह जो मूलभूत सत्य है, जो सदा रहता है। उसके ऊपर रूप बनते हैं और मिटते हैं, संघात निर्मित होते हैं और बिखर जाते हैं, संगठन खडे होते हैं और टूट जाते हैं, लेकिन वह बना रहता है। वह बना ही रहता है।

यह जो सदा बना रहता है, इसकी जो ध्वनि है, इसका जो संगीत है, उसका नाम ओंकार है। यह मनुष्य के अनुभव की आत्यंतिक बात है। यह परम अनुभव है।

इसलिए आप यह मत सोचना कि आप बैठकर ओम, ओम का उच्चार करते रहें, तो आपको ओंकार का पता चल रहा है। जिस ओम का आप उच्चार कर रहे हैं, वह तो उच्चार ही है। वह तो आपके द्वारा पैदा की गई ध्वनि है।

इसलिए धीरे- धीरे होंठ को बंद करना पड़ेगा। होंठ का उपयोग नहीं करना पड़ेगा। फिर बिना होंठ के भीतर ही ओम का उच्चार करना। लेकिन वह भी असली ओंकार नहीं है। क्योंकि अभी भी भीतर मांस-पेशियां और हड्डियां काम में लाई जा रही हैं। उन्हें भी छोड़ देना पड़ेगा। भीतर मन में भी उच्चार नहीं करना होगा। तब एक उच्चार सुनाई पड़ना शुरू होगा, जो आपका किया हुआ नहीं है। जिसके आप साक्षी होते हैं, कर्ता नहीं होते हैं। जिसको आप बनाते नहीं, जो होता है, आप सिर्फ जानते हैं।

जिस दिन आप अपने भीतर ओम की उस ध्वनि को सुन लेते हैं, जो आपने पैदा नहीं की, किसी और ने पैदा नहीं की, हो रही है, आप सिर्फ जान रहे हैं, वह प्रतिपल हो रही है, वह हर घड़ी हो रही है। लेकिन हम अपने मन में इतने शोरगुल से भरे हैं कि वह सूक्ष्मतम ध्वनि सुनी नहीं जा सकती। वह प्रतिपल मौजूद है। वह जगत का आधार है।

इस संबंध में एक बात समझ लेनी जरूरी है। पश्चिमी मनोविज्ञान, पश्चिमी विज्ञान, पश्चिम की समस्त खोज इस नतीजे पर पहुंची है कि जगत का जो आत्यंतिक आधार है, वह विद्युत है, इलेक्ट्रिसिटी है। और इसलिए पश्चिम का आधुनिक चिंतन कहता है कि ध्वनि मूल नहीं है, विद्युत मूल है। और ध्वनि, साउंड भी विद्युत का एक प्रकार है। साउंड जो है, ध्वनि जो है, वह भी विद्युत का ही एक प्रकार है, ए मोड।

लेकिन पूरब की बात बिलकुल ही भिन्न है। पूरब कहता है कि साउंड, ध्वनि जो है, वह अस्तित्व का मूल उपकरण है, और विद्युत जो है, वह ध्वनि का ही एक प्रकार है, ए मोड। पश्चिम विद्युत को मूल मानता है, ध्वनि को विद्युत का ही एक रूप; पूरब ध्वनि को मूल मानता है और विद्युत को ध्वनि का ही एक रूप।

इसलिए पूरब में वे लोग हुए, जिन्होंने ध्वनि के माध्यम से दीए जला दिए। जिन्होंने एक राग गाया और बुझा दीया जला। यह बात सही हो कि न हो, पर पूरब की मान्यता यह है कि विद्युत ध्वनि का ही एक रूप है। तो अगर ध्वनि की एक खास ढंग से चोट की जाए, तो आग जल जानी चाहिए। अगर ध्वनि एक खास ढंग से की जाए, तो आकाश में बिजली कड़कने लगनी चाहिए। अगर विद्युत ध्वनि का ही एक रूप है, तो ध्वनि की तरंगों के आघात से अग्नि का जन्म हो जाना चाहिए।

 मुझे ऐसा खयाल में आता है कि विद्युत और ध्वनि के बीच ठीक वैसा ही संबंध है। इसलिए ध्वनि के बिना विद्युत नहीं हो सकती, और विद्युत के बिना ध्वनि नहीं हो सकती। लेकिन पूरब और पश्चिम में यह बुनियादी फर्क क्यों आया, उसका कारण है। उसका कारण कीमती है। वह समझ लेना चाहिए।

वह फर्क इसलिए है कि पश्चिम ने जो खोज की है, वह पदार्थ को तोड़कर की है। पदार्थ को तोड़ा, आखिरी परमाणु की खोज की, कि कौन-सी चीज से पदार्थ बना है? विद्युत मिली। पूरब ने जो खोज की है, वह पदार्थ को तोड़कर नहीं की है, वह अपने ही मन को तोड़कर की है। ध्यान रखें, मैटर हैज बीन एनालाइब्द इन दि वेस्ट एंड माइंड इन दि ईस्ट।

अगर आप पदार्थ को तोड़ेंगे, तो जो अंतिम अणु हाथ में आने वाला है, वह विद्युत का होगा। अगर आप मन को तोड़ेंगे, तो जो अंतिम अणु हाथ में आने वाला है, वह ध्वनि का होगा। किसी न किसी दिन पदार्थ का जो अंतिम अणु है वह, और मन का जो अंतिम अणु है वह, वे एक ही सिद्ध होंगे; या एक के ही दो रूप सिद्ध होंगे।

अगर मुझसे पूछें, तो मैं ऐसा कहूंगा कि वह जो पदार्थ का अणु है, वह अप्रकट मन है; और वह जो मन का अणु है, वह प्रकट हो गया पदार्थ है। परमाणु भी पदार्थ का छिपा हुआ मन है। क्षुद्रतम में भी विराट छिपा हुआ है, और विराट को भी प्रकट होना हो, तो क्षुद्र का ही सहारा है।

ओंकार कहकर कृष्ण कहते हैं कि मैं वह परम अस्तित्व हूं, जहां केवल उस ध्वनि का साम्राज्य रह जाता है, जो कभी पैदा नहीं हुई और कभी मरती नहीं है, जो अस्तित्व का मूल आधार है। उस संगीत के सागर का नाम ओंकार है।

उस तक पहुंचना हो, तो अपने मन से सब ध्वनियां समाप्त करनी चाहिए। अपने मन से एक-एक ध्वनि को छोड़ते जाना चाहिए, एक-एक शब्द को, एक-एक विचार को और मन की ऐसी अवस्था ले आनी चाहिए, जब मन निर्ध्वनि हो जाए, साउंडलेस हो जाए। और जिस दिन आप पाएंगे कि, मन हो गया ध्वनिशून्य, उसी दिन आप पाएंगे, ओंकार प्रकट हो गया! ओंकार वहां निनादित हो ही रहा था। ओंकार की धुन वहां बज ही रही थी सदा से, अनंत से, अनादि से। लेकिन आप इतने शोरगुल में व्यस्त थे, आप इतने जोर में लगे थे बाहर कि आपको वह ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती थी।

आपका यह उपद्रव शांत हो जाए, आपका यह बुखार से भरा हुआ, दौड़ता हुआ पागलपन शांत हो जाए, तो जो सदा ही भीतर बज रहा है, वह अनुभव में आने लगता है। वह मनुष्य की आत्यंतिक अवस्था है। वह उसका परम भविष्य है।

कृष्ण कहते हैं, मैं ओंकार हूं। और कृष्ण कहते हैं, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद भी मैं ही हूं।

ओंकार के बाद वेद की बात कहने का कारण है, प्रयोजन है। कृष्ण कहते हैं, वह परम ध्वनि मैं हूं और उस परम ध्वनि को पहुंचने वाले जितने भी शास्त्र हैं, वह भी मैं हूं। उस परम ध्वनि की ओर जिन-जिन शास्त्रों ने इशारा किया है, वह भी मैं हूं। वह ध्वनि तो मैं हूं ही, लेकिन जो इंगित; वह चांद तो मैं हूं ही, जिन अंगुलियों ने चांद की तरफ इशारा किया है, वे अंगुलियां भी मैं ही हूं। क्योंकि मेरे अतिरिक्त मेरे उस गुह्यतम रूप की तरफ इशारा भी कौन कर सकेगा? मेरी तरफ अंगुली भी कौन उठा सकेगा सिवाय मेरे?

तो कृष्ण कहते हैं, वेद भी मैं ही हूं।

वेद का अर्थ है, वह सब, जिसने ओंकार की ओर इशारा किया है। वेद का अर्थ है, वह सारा ज्ञान, जिसने उस परम ध्वनि की तरफ ले जाने का मार्ग खोला है। उन्होंने तीन वेद का नाम लिया है। विचारपूर्वक ही यह बात है। क्योंकि कल मैंने आपसे कहा, तीन प्रकार के मनुष्य हैं। तो तीन प्रकार के वेद होंगे। तीन प्रकार के मन हैं, तो तीन प्रकार के ज्ञान होंगे। तीन तरह के टाइप हैं, प्रकार हैं, तो तीन प्रकार के इशारे होंगे।

कृष्ण ने कहा कि वे तीनों वेद मैं हूं।

चाहे कोई कर्म से अपने कर्ता को मिटा दे, तो ओंकार में प्रवेश कर जाता है। चाहे कोई अपने प्रेम से प्रेमी को डुबा दे, तो ओंकार में प्रवेश कर जाता है। और चाहे कोई अपने ज्ञान से द्वैत के पार हो जाए, अद्वैत में प्रवेश कर जाए, तो उस ओंकार को उपलब्ध हो जाता है।

वेद का अर्थ है, वे किताबें नहीं, जो वेद के नाम से जानी जाती हैं। वेद से अर्थ है, वे समस्त इशारे, जो मनुष्य-जाति को कभी भी और कहीं भी उपलब्ध हुए हों, जो ओंकार की तरफ ले जाते हैं। ध्यान रखें, वेद शब्द बहुत अदभुत है। इसके बड़े विस्तीर्ण अर्थ हैं। वेद शब्द का अर्थ होता है, ज्ञान। इसलिए वेद को किसी किताब में बांधा नहीं जा सकता। जहां भी ज्ञान है, वहीं वेद है। जहां भी इशारा है, वहीं वेद है।

उन दिनों तक कृष्ण ने जब यह बात कही, तो वह सारा ज्ञान तीन पुस्तकों में संगृहीत था। इसलिए इन तीन पुस्तकों का नाम लिया। अगर आज कृष्ण हों, तो इन तीन का नाम नहीं लेंगे। इसमें कुरान भी सम्मिलित होगा, इसमें बाइबिल भी सम्मिलित हो जाएगी, इसमें जेंदावेस्ता भी जुड़ेगा, इसमें लाओत्से का ताओ तेह किंग भी आने ही वाला है। इन पांच हजार वर्षों में, कृष्ण के बाद, जो-जो इशारे उस ओंकार की तरफ हुए हैं, वे भी वेद का हिस्सा हो गए।

वेद एक विकासमान धारा है। वेद कोई सीमित किताब नहीं है। इसीलिए वेद का कोई लेखक नहीं है। एक-एक वेद में सैकड़ों ऋषियों के वचन हैं। उस जमाने तक जितने ऋषियों का ज्ञान था, वह सब संगृहीत हो गया। फिर वेद के दरवाजे बंद हो गए। और जिस दिन वेद के दरवाजे बंद हुए, उसी दिन हिंदू धर्म मुर्दा हो गया। वेद का दरवाजा खुला ही रहना चाहिए। उसमें नए ऋषि होते रहेंगे। उनके वचन संगृहीत होते ही चले जाने चाहिए। चाहे वे कहीं भी हों।

वेद किसी व्यक्ति की किताब नहीं है। यह बड़े मजे की बात है। वेद न मालूम कितने व्यक्तियों का संग्रह है। उस जमाने तक जितने लोगों ने जाना था, उन सबका संग्रह है। लेकिन फिर द्वार बंद हो गए। जब कोई धर्म जीवंत होता है, तो भयभीत नहीं होता, खुले दरवाजे रखकर सोता है। जब कोई धर्म कमजोर हो जाता है, मरने के करीब आता है, बूढ़ा हो जाता है, तो दरवाजे बंद कर देता है और पहरे लगा देता है। ये कमजोरी के लक्षण हैं। लेकिन जिस दिन दरवाजा बंद होता है, उसी दिन ज्ञान तो आगे बढ़ता चला जाता है, किताब रुक जाती है। किताब रुक जाती है। ठीक वैसी घटना अभी थोड़े दिन पहले फिर घटी। उससे आपको बात समझ में आ जाएगी।

सिक्खों का वेद है, गुरु-ग्रंथ। नानक के समय में, उस समय के जितने ज्ञानियों के इशारे थे, सब उसमें संगृहीत किए गए हैं। उसमें फिक्र नहीं की गई है कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान है, कौन ब्राह्मण है, कौन शूद्र है। उसमें फरीद के भी वचन हैं, उसमें और कबीर के भी, उसमें दादू के भी। उस समय जितने भी फकीर इशारे वाले थे, उन सबके वचन संगृहीत कर लिए गए हैं।

लेकिन फिर धीरे- धीरे बात मरने लगी। फिर धीरे- धीरे दरवाजे सख्त होने लगे। फिर उसमें वही सम्मिलित हो सकेगा, जो सिक्ख है। फिर दसवें गुरु ने द्वार बंद कर दिए। धर्म कमजोर हो गया। फिर दसवें गुरु ने कहा कि अब इस किताब में आगे नहीं जोड़ा जा सकेगा। उसी दिन यह किताब बूढ़ी होकर मर गई। क्योंकि अब इसमें ग्रोथ नहीं हो सकती। लेकिन दस गुरुओं तक यह किताब विकासमान होती रही, बढ़ती होती रही। इसमें जुड़ता रहा।

ज्ञान एक धारा है, जैसे गंगा एक धारा है। गंगा अगर कह दे प्रयाग में आकर कि अब नदी-नाले मुझमें नहीं जुड़ सकेंगे, अब कोई मुझमें आगे नहीं जुड़ेगा। अब मैं गंगा हूं। और एक गंदे नाले को मैं नहीं गिरने दूंगी।

क्योंकि कहां पवित्र गंगा, और एक साधारण-सा नाला आकर मुझमें गिर जाए और गंदा कर जाए!

जिस दिन गंगा यह कहती है कि एक साधारण-सा नाला मुझमें गिरकर मुझे गंदा कर देगा, उस दिन वह गंगा नहीं रही। क्योंकि गंगा का मतलब ही यह है कि जिसमें कोई भी गिरे, गिरते से पवित्र हो जाए। अब नाला गंगा को गंदा कर देगा, तो नाला ज्यादा शक्तिशाली हो गया!

जब भी कोई धर्म भयभीत हो जाता है और डरता है कि कुछ मिश्रित न हो जाए, कुछ गलत न हो जाए, इसलिए सब घेराबंदी कर लो, उस दिन किताबें बंद हो जाती हैं।

वेद की जब कृष्ण ने यह बात कही, तब ये तीनों किताबें जिंदा किताबें थीं। अब ये तीनों किताबें जिंदा किताबें नहीं हैं। एक जगह इनके द्वार बंद हो गए। अगर वे द्वार खुले होते, तो वेद ने जगत के सारे ज्ञान को संगृहीत किया होता।

जैसा कि आपने देखा होगा, वेद ठीक वैसी ही चीज थी इस मुल्क में, जैसे कि आज इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका है। हर वर्ष उसको नए एडीशन करने पड़ते हैं। क्योंकि ज्ञान विकसित होता है, उसे सम्मिलित कर लेना होता है। रोज ज्ञान बढ़ता है, तो इनसाइक्लोपीडिया को रोज ज्ञान को बढ़ाए जाना पड़ता है। उसके पुराने एडीशन बाहर होते जाएंगे। रोज यह ज्ञान बढ़ता रहेगा। किसी दिन अगर इनसाइक्लोपीडिया वाले यह सोचें कि बस, अब हम और ज्ञान को भीतर नहीं आने देंगे, उसी दिन इनसाइक्लोपीडिया आउट आफ डेट हो जाएगा, उसी दिन मर जाएगा। वेद हमारा इनसाइक्लोपीडिया था। ओंकार की तरफ जितने इशारे किए गए थे, हमने वेद में संगृहीत किए थे।

तो कृष्ण कहते हैं, वे तीनों वेद मैं ही हूं।

और हे अर्जुन, प्राप्त होने योग्य गंतव्य, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, सबका साक्षी, सबका वास स्थान, शरण लेने योग्य, हितकारी, उत्पत्ति, प्रलय सबका आधार, निधान और वह, जिसमें सबका लय होता है, अविनाशी, बीज कारण भी मैं ही हूं। इसमें तीन-चार बातें महत्वपूर्ण हैं, वह हमें खयाल में ले लेनी चाहिए।

गंतव्य, दि एंड, आखिरी मंजिल, जो पाने योग्य है, वह मैं ही हूं। और अगर मेरे अतिरिक्त कुछ भी तुझे पाने योग्य लगता है, तो थोड़ा सोच-समझ लेना, वह पाने योग्य नहीं हो सकता। परमात्मा के अतिरिक्त जो भी व्यक्ति कुछ और पाने में लगा है, सच पूछिए तो पाने में नहीं, खोने में लगा है।

परमात्मा के अतिरिक्त अगर आपने कुछ पा भी लिया, तो आखिर में आप पाएंगे कि आपने सब खो दिया, पाया कुछ भी नहीं है। क्योंकि और हम कुछ भी पा लें, वह हमारी संपदा नहीं बनती, सिर्फ विपत्ति बनती है। संपत्ति नहीं, विपत्ति। कुछ भी हम इकट्ठा कर लें, वह हमसे बाहर ही छूट जाता है। वह हमारे प्राणों का विकास नहीं होता, सिर्फ प्राणों पर बोझ बन जाता है। और एक न एक दिन मृत्यु सब छीन लेती है। मृत्यु सब छीन लेती है। सिर्फ एक संपदा है, जो मौत नहीं छीन पाती है। वह संपदा परमात्मा की है। वह संपदा प्रभु के अनुभव की है। वह संपदा उस स्वभाव की है, जो हम में ही छिपा है। वह उस ओंकार की है, जो सदा है और कभी छीना नहीं जा सकता।

कृष्ण कहते हैं, गंतव्य मैं हूं सबका स्वामी, सबका साक्षी, सबका वास स्थान! जहां सब रह रहे हैं, वह मैं हूं। जो सबको चला रहा है, वह मैं हूं। और जो सबको देख रहा है, वह भी मैं हूं। शरण लेने योग्य, जिसकी शरण तुम आओ, ऐसा भी मैं हूं। हित करने वाला; उत्पत्ति-प्रलय-रूप। जन्म मुझसे तुम्हारा हुआ, सम्हाला मैंने तुम्हें, खोओगे भी तुम मुझमें ही। सबका अंतिम बीज कारण मैं हूं। यह कृष्ण क्यों कह रहे हैं अर्जुन को? वह इसलिए कह रहे हैं कि अर्जुन तू व्यर्थ अपने को बीच में मत ला।

यह अंतिम सूत्र ठीक से समझ लें।

वे यह कह रहे हैं, तू व्यर्थ अपने को बीच में मत ला। बनाया मैंने, सम्हाला मैंने, मिटाऊंगा मैं; तू व्यर्थ अपने को बीच में मत ला।

वह अर्जुन कह रहा है कि युद्ध में मैं नहीं जाना चाहता हूं क्योंकि मुझे लगता है, यह पाप है। कृष्ण कहते हैं, मालिक मैं हूं साक्षी मैं हूं निर्माता मैं हूं और तुझे लगता है कि पाप है! गवाही मैं हूं तेरी अंतिम गवाही मैं हूं; और तू कुछ भी करेगा, मैं ही तेरे भीतर करूंगा, तू जाने या न जाने। लेकिन तू कहता है कि यह मुझे लगता है, पाप है! तू कहता है कि मेरे मन को पीड़ा होती है, कि अपने ही प्रियजनों से कैसे लडूं!

वह कृष्ण कहते हैं, सबका आधार मैं हूं सबका पिता मैं हूं सबका भविष्य मैं हूं लेकिन तू अपने को बीच में क्यों ला रहा है? मतलब यह है कि अहंकार अपने को मालिक समझता है, और अहंकार अपने को निर्णायक समझता है। और अहंकार समझता है कि मैं ही निर्णय करूंगा, वैसा ही मुझे चलना है। अहंकार समर्पण करने को तैयार नहीं है।

समर्पण तो तभी हो सकेगा, जब हमें पता चले कि न मैंने मुझे बनाया है, न मैं स्वयं को सम्हाले हुए हूं। अभी यह शब्द मेरे मुंह से निकलता है, दूसरा न निकले, उसे भी निकालने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। एक सांस आती है, और फिर न आए, तो एक सांस लेने का भी कोई उपाय नहीं है। इतना निरुपाय, इतना असहाय, इतना न होने के बराबर मैं हूं। लेकिन फिर भी मैं निर्णय करता हूं कि मैं यह करूंगा और यह नहीं करूंगा, और यह ठीक है, और यह गलत है! निर्णायक मेरा अहंकार बनना चाहता है। कृष्ण उसे यही समझा रहे हैं कि अगर तू गौर से देखेगा, तो नीचे-ऊपर सब दिशाओं में सब भांति मुझे छाया हुआ पाएगा। और अच्छा हो कि तू अपनी यह मालकियत छोड़ दे। यह मालकियत ही तेरा दुख और तेरा पाप है।

एक ही पाप है, स्वयं की अस्मिता को, अहंकार को मजबूत किए जाना। और एक ही पुण्य है, स्वयं की अस्मिता को, अहंकार को पिघलाते चले जाना। एक घड़ी आ जाए, जिस दिन मैं न रहूं, मेरा बोध न रहे, तो उस दिन मेरे भीतर जो बोलेगा, जो चलेगा, जो उठेगा, जो करेगा, वह परमात्मा है। उस दिन न मेरा कोई पाप है, न मेरा कोई पुण्य है। उस दिन न मेरा कोई कर्तव्य है और न कुछ अकर्तव्य है। उस दिन जो होगा, वह सहज होगा; जैसे श्वास चलती है, खून बहता है, हवाएं चलती हैं, सूरज निकलता है। उस दिन मेरी कोई जरूरत ही नहीं है।

कृष्ण उस दिशा में अर्जुन को इशारा कर रहे हैं कि तू थोड़ा समझ। तू यह फिक्र छोड़ कि तू इनका मारने वाला है, कि तू इनका बचाने वाला हो सकता है। तू यह भी फिक्र छोड़ कि तेरे ऊपर यह निर्णय है कि यह युद्ध शुभ है या अशुभ है। तू जरा चारों तरफ गौर से देख। तू सिर्फ एक लहर है। एक क्षण को उठा है और एक क्षण बाद खो जाएगा। मैं सागर हूं। मैं तुझसे कहता हूं कि तू मेरे से ही उठा है, मुझसे ही सम्हाला गया है। मैं ही तेरा अभी भी मालिक हूं अभी भी मैं ही तेरा साक्षी हूं। जब तू नहीं था, तब भी मैं था; जब तू नहीं होगा, तब भी मैं रहूंगा। तू मेरी तरफ देख और अपने कर्ता के भाव को मेरे ऊपर छोड़ दे। मुझे हो जाने दे कर्ता और तू बन जा केवल उपकरण, तू बन जा केवल एक बांस की पोगरी। गीत मुझे गाने दे, तू बीच में मत आ। तू बीच में आएगा, वही तेरा दुख, वही तेरी पीड़ा, वही तेरा संताप है।

यह सारी की सारी बात समझाने के पीछे अहंकार को पिघलाने का इशारा है। अहंकार बर्फ की तरह हमारे भीतर जमा हुआ है, फ्रोजन। उसे थोड़ा पिघलाना जरूरी है।

कभी आपने खयाल किया, सागर में एक बर्फ की चट्टान तैर रही हो, तो सागर से बिलकुल अलग मालूम पड़ती है। पीछे मैंने कहा, लहर सागर से अलग मालूम पड़ती है। लेकिन लहर का भ्रम ज्यादा देर नहीं चल सकता, क्योंकि लहर कितनी देर उठी रहेगी? क्षणभर बाद गिर जाएगी और खो जाएगी। लेकिन लहर अगर फ्रोजन हो जाए, जम जाए, बर्फ बन जाए, फिर लहर का भ्रम बहुत देर चल सकता है। क्योंकि जब तक बर्फ न पिघले! और अगर चारों तरफ दूसरी लहरें भी जमकर बर्फ हो गई हों, तो यह भ्रम और भी बहुत देर चल सकता है। क्योंकि गर्मी भी कहीं से नहीं मिलेगी, सब तरफ से अहंकार की ठंडक ही मिलेगी, यह और जम जाएगी। हम सब ऐसी ही लहरें हैं, फ्रोजन वेब। और चूंकि हम चारों तरफ सभी बर्फ बन गए हैं जमकर, एक-दूसरे को हम ठंडक देते रहते हैं और जमाते रहते हैं। हम सब एक-दूसरे के अहंकार को जमाने की चेष्टा में लगे रहते हैं, हमें पता हो या न पता हो।

बाप बेटे से कहता है कि शाबाश, तू पहला नंबर आ गया है स्कूल में! आएगा क्यों नहीं; आखिर मेरा ही बेटा जो है! ये एक-दूसरे को जमा रहे हैं। बेटे के अहंकार को जमाने की चेष्टा चल रही है।

बेटा आज अगर प्रथम नहीं आया है, तो घर बिलकुल उदास है। मां बेचैन है, बाप पराजित मालूम पड़ रहा है। बेटा भी चिंतित है। क्या हुआ है? जरा बर्फ पिघलने लगी। वह अहंकार, मैं-हमारे घर में कभी कोई नंबर दो आया ही नहीं, और यह बेटा नंबर दो आ गया! हम सब एक -दूसरे को जमाने की कोशिश में लगे हैं। हमारी शिक्षा, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, सब एक-दूसरे को जमा रही है; सब जम जाएं, सख्त हो जाएं भीतर।

अगर जब सारी लहरें एक-दूसरे को जमाने में लगी हों, तो फिर नीचे के सागर का खयाल आना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए जिन लोगों को समाज को छोड्कर भागना पड़ा-बुद्ध को या महावीर को या जीसस को या मोहम्मद को भी स्वात में भाग जाना पड़ा-उसका कारण अगर मौलिक आप समझना चाहें, तो सिर्फ इतना ही है कि आप सब इतने जमे हुए बर्फ की चट्टानें हैं कि आपके बीच में पिघलना बहुत मुश्किल है! पूरा टेंपरेचर नहीं है पिघलने का वहां। सब जीरो डिग्री से नीचे जमे हुए हैं। वहा अगर कोई पिघलना भी चाहे, तो पिघलना मुश्किल है। चारों तरफ जमाने वाले लोग मौजूद हैं।

इसलिए बुद्ध या महावीर को समाज छोड्कर भागना पड़ता है। समाज को छोड्कर भागने का और कोई कारण नहीं है। अकेले में जाना पड़ता है, ताकि वहा कम से कम अपनी ही ठंडक से लड़ना पड़े; दूसरों की ठंडक से तो न लड़ना पड़े। अकेले, एकांत में, जहां चारों तरफ कोई ठंडक न हो।


कृष्ण उसी अहंकार को पिघलाने के लिए कह रहे हैं, सब मैं हूं। अगर तुझे यह स्मरण आ जाए अर्जुन, तो तू जो इस खयाल से भर रहा है कि तू ही केंद्र है और तेरे ऊपर ही सब दारोमदार है, यह खयाल तेरा छूट जा सकता है। और यह खयाल न छूटे, तो आदमी की आंखें अंधी ही रह जाती हैं।

अहंकार अंधापन है। और अहंकार के छूट जाते ही प्रज्ञा की आंख खुलती है, और जीवन जैसा है वैसा पहली बार दिखाई पड़ता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...