मंगलवार, 3 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 10 भाग 2

 रूपांतरण का आधार—निष्‍कंप चित्‍त और जागरूकता


बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह क्षमा सत्यं दम: शम:।

सुखं——दुखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।। 4।।

अहिंसा समता तुष्टिस्तयो दानं यशोउयश।

भवन्ति भावा भूतानां मल एव पृथग्विधा।। 5।।

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।

मद्रभावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा:।। 6।।


और हे अर्जुन निश्चय करने की शक्ति एवं तत्वज्ञान और अमूढूता क्षमा सत्य तथा इंद्रियों का वश में करना और मन का निग्रह तथा सुख—दुख, उत्पत्ति और प्रलय एवं भय और अभय भी तथा अहिंसा समता संतोष तप दान कीर्ति और अपकीर्ति ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मेरे से ही होते हैं।

और हे अर्जुन सात महर्षिजन और चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायंभुव आदि चौदह मनु ये मेरे में भाव वाले सब के सब मेरे संकल्प से उत्पन्‍न हुए हैं कि जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।


जैसे आकाश ने सबको घेरा हुआ है, जैसे जीवन की ऊर्जा सभी में परिव्याप्त है, वैसे ही कण—कण, चाहे पदार्थ का हो, चाहे चेतना का, परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। कृष्ण इस सूत्र में अर्जुन से कह रहे हैं कि मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। पहले इस मौलिक धारणा को समझ लें, फिर हम सूत्र को समझें।

जैसा हम देखते हैं, तो सभी चीजें अलग—अलग मालूम पड़ती हैं। कोई एक ऐसा तत्व दिखाई नहीं पड़ता, जो सभी को जोड़ता हो। जब हम देखते हैं, तो माला के गुरिए ही दिखाई पड़ते हैं। वह माला के भीतर जो पिरोया हुआ सूत का धागा है, जो उन सबकी एकता है, वह हमारी आंखों से ओझल रह जाता है। जब भी हम देखते हैं, तो हमें खंड दिखाई पड़ते हैं, लेकिन अखंड का कोई अनुभव नहीं होता। यह अखंड का जब तक अनुभव न हो, तब तक परमात्मा की कोई प्रतीति भी नहीं है। इसीलिए हम कहते हैं कि परमात्मा को मानते हैं, मंदिर में श्रद्धा के फूल भी चढ़ाते हैं, मस्जिद में उसका स्मरण भी करते हैं, गिरजाघर में उसकी स्तुति भी गाते हैं। लेकिन फिर भी वह परमात्मा, जिसके चरणों में हम सिर झुकाते हैं, हमारे हृदय के भीतर प्रवेश नहीं कर पाता है।

आश्चर्य की बात कि हम जिस अखंड की खोज में मंदिर और मस्जिद और गुरुद्वारे में जाते हैं, हमारा मंदिर, हमारा मस्जिद, हमारा गुरुद्वारा भी हमें खंड—खंड करने में सहयोगी होते हैं। हम मंदिर और मस्जिद के बीच भी एक को नहीं देख पाते हैं। हिंदू और मुसलमान और ईसाई के पूजागृहों में भी हमें फासले की दीवालें और शत्रुता की आड़े दिखाई पड़ती हैं। मंदिर भी अलग—अलग हैं, तो यह पूरा जीवन तो कैसे एक होगा?

मंदिर अलग नहीं हैं, लेकिन हमारे देखने का ढंग केवल खंड को ही देख पाता है, अखंड को नहीं देख पाता है। तो हम जहां भी अपनी दृष्टि ले जाते हैं, वहां ही हमें टुकड़े दिखाई पड़ते हैं। वह समग्र, जो सभी को घेरे हुए है, हमें दिखाई नहीं पड़ता है।

अर्जुन की भी तकलीफ वही है। उसे भी अखंड का कोई अनुभव नहीं हो रहा है। उसे दिखाई पड़ता है, मैं हूं। उसे दिखाई पड़ता है, मेरे मित्र हैं, प्रियजन हैं, शत्रु हैं। उसे दिखाई पड़ता है कि सुख क्या है, उसे दिखाई पड़ता है कि दुख क्या है। उसे दिखाई पड़ता है कि पाप क्या है, पुण्य क्या है। उसे सब दिखाई पड़ता है, सिर्फ एक, जो सभी के भीतर छिपा हुआ है, वह भर दिखाई नहीं पड़ता है। और इसलिए कृष्ण और अर्जुन के बीच जो चर्चा है, वह दो दृष्टियों के बीच है।

अर्जुन खंडित दृष्टि का प्रतीक है और कृष्ण अखंडित दृष्टि के। कृष्‍ण समग्र की, दि होल, वह जो पूरा है, उसकी बात कर रहे हैं और अर्जुन टुकड़ों की बात कर रहा है। शायद इसीलिए दोनों के बीच बात तो हो रही है, लेकिन कोई हल नहीं हो पा रहा है। उन दोनों का जीवन को देखने का ढंग ही भिन्न है।

इस सूत्र में कृष्ण अर्जुन को एक—एक बात गिना रहे हैं कि मैं कहां—कहां हूं। इतना ही कहना काफी होता कि मैं सब जगह हूं। इतना ही कहना काफी होता कि सभी कुछ मैं ही हूं। लेकिन यह बात अर्जुन को स्पष्ट न हो पाएगी। अर्जुन को खंड—खंड में ही गिनाना पड़ेगा कि कहां—कहां मैं हूं। शायद उसे खंड—खंड में यह एक की झलक मिल जाए, तो खंड खो जाएं और अखंड की प्रतीति हो सके। इसलिए कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, निश्चय करने की शक्ति एवं तत्वज्ञान और अमूढ़ता।

ये तीन शब्द बहुत कीमती हैं। निश्चय करने की शक्ति!

जैसा हमारे पास मन है, अगर हम ठीक से समझें, तो हम कह सकते हैं, मन है अनिश्चय करने की शक्ति। मन का सारा काम ही भीतर यह है कि वह हमें निश्चित न होने दे। मन जो भी करता है, अनिश्चय में ही करता है। कोई भी कदम उठाता है, तो भी पूरा मन कभी कोई कदम नहीं उठाता। एक हिस्सा मन का विरोध करता ही रहता है।

अगर आप किसी को प्रेम करते हैं, तो भी मन पूरा प्रेम नहीं करता; मन का एक हिस्सा, जिसे आप प्रेम करते हैं, उसी के प्रति घृणा से भी भरा रहता है। और इसीलिए किसी भी दिन प्रेम घृणा बन सकता है। मन में घृणा तो मौजूद ही है। जिसे आप प्रेम करते हैं, किसी भी क्षण उसी के प्रति क्रोध से भर सकते हैं। एक क्षण में प्रेम की शीतलता क्रोध की अग्नि बन सकती है, क्योंकि मन तो क्रोध से भरा ही है।

और पूरे मन से न हम प्रेम करते हैं, और न पूरे मन से हम शांत होते हैं, और न पूरे मन से हम सच्चे होते हैं। पूरा मन जैसी कोई चीज ही नहीं होती। यह समझने में थोड़ी कठिनाई पड़ेगी।

जहां पूरा हो जाता है मन, वहां मन समाप्त हो जाता है। जब तक अधूरा होता है, तभी तक मन होता है। इसे हम ऐसा समझें कि अधूरा होना, मन का स्वभाव है। अपने ही भीतर बंटा होना, मन का स्वभाव है। अपने ही भीतर लड़ते रहना, मन का स्वभाव है। द्वंद्व, कलह, खंडित होना, मन की नियति और प्रकृति है।

आपने जीवन में बहुत बार निर्णय लिए होंगे, रोज लेने पड़ते हैं, लेकिन मन से कभी कोई निर्णय पूरा नहीं लिया जाता। पूरा मन कभी तैयार होता ही नहीं। और जब कोई व्यक्ति पूरा तैयार होता है, तो मन शून्य हो जाता है; मन तत्‍क्षण विदा हो जाता है। अधूरे आदमी के पास मन होता है, पूरे आदमी के पास मन नहीं होता। बुद्ध, या राम, या कृष्‍ण जैसे व्यक्तियों के पास मन नहीं होता। और जहां मन नहीं होता, वहीं आत्मा के दर्शन, वहीं परमात्मा की झलक मिलनी शुरू होती है। 




साधारण—सी बात में भी मन झिझकता है! बाएं रास्ते से जाऊं या दाएं से, तो भी मन सोचता है। तो भी आधा मन कहता है बाएं से, आधा मन कहता है दाएं से। मन का ज्‍यादा हिस्सा जहां कहता है, वहां हम चले जाते हैं। साठ प्रतिशत मन जो कहता है, वही हम हो जाते हैं। चालीस प्रतिशत जो मन कहता है, उसे हम नहीं करते। बहुमत मन का जो कहता है, हम उसके पीछे चले जाते हैं। लेकिन जो अभी बहुमत है, वह कल सुबह तक बहुमत रहेगा, यह पक्का नहीं है। 

तो कृष्ण पहला सूत्र का हिस्सा कहते हैं, निश्चय करने की शक्ति मैं हूं।

तो जिस दिन भी अर्जुन, तू पूर्ण निश्चय कर पाएगा, उस दिन तू मुझे समझ लेगा कि मैं कौन हूं मैं किसकी बात कर रहा हूं। लेकिन जब तक तू उस पूरे निश्चय को नहीं कर पाएगा, तब तक मुझे नहीं समझ पाएगा।

पूर्ण निश्चय हमने कभी भी नहीं किया है। छोटे—मोटे निश्चय भी हमने पूर्ण नहीं किए हैं। अगर आप पांच मिनट के लिए भी तय करें कि मैं आंख को नहीं झपकूंगा, तो भी आपको परमात्मा की झलक मिल जाए। लेकिन पांच मिनट में आंख पच्चीस बार शाक जाएगी। ' अगर आप तय करें कि मैं पांच मिनट बिना हिले खड़ा रहूंगा, तो भी परमात्मा की झलक मिल जाए। लेकिन पांच मिनट में पच्चीस बार आप हिल जाएंगे। जिस मन से आप तय कर रहे हैं, उस मन का स्वभाव कंपन है। तो पूर्ण निश्चय तभी होता है, जब कोई व्यक्ति मन के पार उठ पाए।

समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं मन के पार उठने के उपाय हैं। मन का अर्थ है, विचलित चेतना। और ध्यान का अर्थ है, अविचलित चेतना। ध्यान का अर्थ है, मन की मृत्यु।

 ध्यान का अर्थ है, जहां मन न रह जाए, जहां मन न बचे, जहां कोई विकल्प न हो, जहां कोई द्वंद्व न हो।

अगर एक क्षण को भी मैं इस आंतरिक समता को पा जाऊं, जहां मन में कोई द्वंद्व न हो, जहां कोई विपरीत भाव न हो, जहां कोई कलह न हो, कोई कांफ्लिक्ट न हो—एक क्षण को भी अगर यह समरसता भीतर आ जाए, तो मैं निश्चय को उपलब्ध हुआ।

उसी क्षण मुझे परमात्मा उपलब्ध हो जाए; उसी क्षण उसकी मुझे झलक मिल जाए; धागे की झलक मिल जाए, मनकों के भीतर जो छिपा है।

निश्चय का अर्थ है, ऐसी अवस्था, जहां मन का कोई कंपन न हो।

तो कृष्‍ण कहते हैं, निश्चय में मैं हूं तत्वज्ञान में मैं हूं।

तत्वज्ञान का अर्थ फिलॉसफी नहीं होता। तत्वज्ञान का अर्थ विचारशास्त्र, दर्शनशास्त्र नहीं होता। बड़ी भूल हुई है। पश्चिम में एक चिंतना की धारा विकसित हुई है, जिसे फिलासफी कहते हैं। उस अर्थ में भारत में फिलासफी जैसी कोई भी चीज कभी विकसित नहीं हुई। भारत में जो विकसित हुआ, वह तत्वज्ञान है।

 फिलॉसफी का अर्थ होता है, चिंतन, मनन, विचार। तत्वज्ञान का अर्थ होता है, दर्शन, साक्षात्कार, अनुभूति। एक अंधा आदमी प्रकाश के संबंध में सोचता रहे, तो वह फिलासफी है, और अंधे आदमी की आंख खुल जाए और वह प्रकाश को देख ले, तो वह तत्वज्ञान है।

तत्वज्ञान का अर्थ है, अनुभूति। फिलॉसफी का अर्थ है, मानसिक। तत्वज्ञान का अर्थ है, वास्तविक। फिलॉसफी का अर्थ है, सोचा हुआ। तत्वज्ञान का अर्थ है, जाना हुआ। सोचना तो बहुत आसान है, जानना बहुत कठिन है। क्योंकि सोचने के लिए बदलने की कोई भी जरूरत नहीं, जानने के लिए तो स्वयं को बदलना अनिवार्य है।

तो भारत का जोर तत्वज्ञान पर है, चिंतना पर नहीं, विचारणा पर नहीं। कोई कितना ही सोचे, सोचकर कहीं कोई पहुंचता नहीं। कोई कितना ही सोचे, हाथ में विचार की राख के सिवाय कुछ भी लगता नहीं। कोई कितना ही सोचे, खाली शब्द का संग्रह बढ़ जाता है। लेकिन प्रतीति, प्रत्यभिज्ञा नहीं होती, उसकी पहचान नहीं होती। उसे तो जानना पड़े आमने—सामने। उससे तो पहचान करनी पड़े, मुलाकात करनी पड़े। सोचने से नहीं होगा।

कोई आदमी प्रेम के संबंध में बहुत सोचे, तो भी प्रेम का उसे पता नहीं चलता, जब तक वह प्रेम में डूब ही न जाए। प्रेम में डूबना बिलकुल दूसरी बात है। और ऐसा भी हो सकता है कि जो प्रेम में डूब जाए, वह प्रेम के संबंध में कुछ भी न सोचा हो। और यह भी हो सकता है, और अक्सर होता है, कि जिन्होंने प्रेम के संबंध में बहुत सोचा है, वे प्रेम करने में असमर्थ ही हो जाएं। सोचने से ही उनको परितृप्ति मिल जाए, या सोचने को ही वे परिपूरक  समझ लें।

बहुत—से लोग ईश्वर के संबंध में सोचते रहते हैं। उस सोचने को ही वे समझते हैं कि अनुभव हो रहा है! सोचना अनुभव नहीं है। सोचना सहयोगी हो सकता है, सोचना उपयोगी हो सकता है, लेकिन सोचना अनुभव नहीं है। और सोच—सोचकर कोई कहीं भी नहीं पहुंचता है, कभी नहीं पहुंचा है। जानना पड़े। तो तत्वज्ञान से अर्थ है, जानना।

कृष्‍ण कहते हैं, जानना मैं हूं। विचारणा नहीं, थिंकिंग नहीं, नोइंग। विचार का अर्थ है कि जिसका मुझे पता नहीं है, उसके संबंध में, जो मुझे पता है, उसके आधार पर कुछ धारणा बनानी है। जिसका मुझे पता नहीं है, उस संबंध में, जिन चीजों का मुझे पता है, उनके आधार पर कोई धारणा निर्मित करनी है, बौद्धिक कोई खयाल निर्मित करना है। कोई इमेज, कोई प्रतिमा निर्मित करनी है। लेकिन विचारों की। और विचार क्या हैं? शब्दों के संग्रह हैं। शब्दों से— न तो शब्द की आग से कोई जल सकता है, और न शब्द के फूल से कोई सुगंध मिलती है। शब्द के परमात्मा से भी कोई अनुभव नहीं मिलता।

शब्द परमात्मा परमात्मा नहीं है। तो कोई कितना ही शब्द को रटता रहे और परमात्मा— परमात्मा दोहराता रहे, शब्द को ही दोहराता रहे, तो कहीं पहुंचेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि दोहराते—दोहराते इस भ्रम में पड़ जाए कि मैं जानता हूं। बहुत लोग पड जाते हैं। पंडित की यही भूल है।

और इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि पंडित अज्ञानियों से भी ज्यादा भटक जाते हैं। पंडित की यही भूल है। शब्द का धनी होता है। शास्त्र का ज्ञाता होता है। सिद्धांत उसे स्मरण होते हैं। उसके पास धनी स्मृति होती है। उसी स्मृति को दोहराते—दोहराते वह इस भ्रांति में पड़ जाता है कि जो मैं दूसरों को कहता हूं वह मैं भी जानता हूं। अपने ही शब्द सुनते—सुनते आत्म—सम्मोहित हो जाता है। अपने ही शब्दों को दोहराते—दोहराते एक गहरी तंद्रा में खो जाता है और लगता है कि मैं जानता हूं।

जानना बड़ी दूसरी बात है। जानने का संबंध बुद्धि से कम, जानने का संबंध पूरे अस्तित्व से है। जानने का संबंध सोचने से कम, मौन हो जाने से ज्यादा है। जानने का संबंध शब्द से कम, निःशब्द, शून्य, शांत से ज्यादा है।

जब कोई शांत हो जाता है शब्दों से, तो दर्पण बन जाता है। और उस दर्पण में जो झलक मिलती है, वह जानना है। और जब कोई शब्दों के धुएं से भरा रहता है, तो कोई झलक नहीं मिलती। कोई झलक नहीं मिलती।

पंडित अपने ही शब्दों में भटकता है, अपने ही शब्दों में उलझता रहता है, अपने ही शब्दों को हल करता रहता है। अपने ही सवाल, अपने ही जवाब देता रहता है। दर्शनशास्त्र—फिलॉसफी के अर्थों में— अपना ही सवाल है, अपना ही जवाब है।

तत्वज्ञान सवाल अपना है, जवाब उसका है। सवाल पूछकर साधक चुप हो जाता है, शून्य हो जाता है। जैसे झील शांत हो जाए और सारी लहरें बंद हो जाएं और आकाश का चांद झील में झलकने लगे। और झील में लहरें हों, तो भी आकाश का चांद तो झलकता है, लेकिन लहरें उसे हजार खंडों में तोड़ देती हैं।

देखें, पूर्णिमा के दिन कभी झील पर जाकर देखें। चांद तो एक है ऊपर, लेकिन झील में हजार टुकड़ों में बिखरा होता है। हजार खंडों में बंटा हुआ झील की लहरों पर बहता होता है। चांद नहीं टूट गया है, लेकिन झील का दर्पण टूटा हुआ है, इसलिए हजार चांद दिखाई पड़ते हैं। झील शांत हो जाए, ऐसी शांत कि दर्पण बन जाए, तो चांद जो ऊपर है, वही एक चांद नीचे दिखाई पड़ने लगता है। फिर झील जब बिलकुल शांत होती है, तो पता ही नहीं चलता कि झील है भी। सिर्फ दर्पण ही रह जाता है।

ठीक ऐसे ही मन पर जब विचार होते हैं, तो तरंगें होती हैं। उन्हीं तरंगों से जो व्यक्ति सोच—सोचकर तय करता है कि चांद कैसा है, उसका चांद खंडों में बंटा हुआ होगा।

कृष्ण कहते हैं, तत्वज्ञान मैं हूं।

जब कोई पूर्ण शांत हो जाता है, तब उसे तत्व का पता चलता है। वह जो है,  उसका पता चलता है। जो है, उसका नाम तत्व है। उसका कोई और नाम नहीं है। जो भी है, शांत हो गए व्यक्ति के भीतर झलकता है। और तब जो अनुभूति होती है, जो ज्ञान होता है, वह मैं हूं। और उस क्षण में अखंड का अनुभव होता है। जब तक मन है खंडित, तब तक हम जो भी जानेंगे, वह खंडित होगा। जब मन होगा अखंडित, तब जो हम जानेंगे, वह अखंड होगा।

तीसरा शब्द कृष्ण ने कहा है, अछूता मैं हूं असम्मोह।

यह शब्द साधकों के लिए बहुत उपयोगी है। मूढ़ता का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जो जागा हुआ मालूम पड़ता है, लेकिन जागा हुआ नहीं है। सोया—सोया व्यक्ति, जैसे नींद में चल रहा हो।

कभी रास्ते के किनारे खड़े हो जाएं, और रास्ते से गुजरते हुए लोगों को देखें। गौर से देखें, आंख गड़ाकर देखें कि लोग कैसे चल रहे हैं! तो थोड़ी ही देर में आपको लगेगा कि लोग सोए—सोए चल रहे हैं। कोई आदमी चलते—चलते बात करता जा रहा है। कोई उसके साथ नहीं है, अकेला है। अपने हाथ से इशारा कर रहा है। उसके ओंठ चल रहे हैं। वह किसी से बात कर रहा है। उसके चेहरे के भाव बदल रहे हैं।

यह आदमी होश में है या नींद में है? यह कोई सपना देख रहा है। यह इस सड़क पर बिलकुल नहीं है। यह किसी और सड़क पर होगा, यह किसी और के साथ होगा। यह किससे बातें कर रहा है? यह किसकी तरफ हाथ के इशारे कर रहा है? यह किसी के साथ है, सपने में।

हम सब सपने में चल रहे हैं। हम सबके भीतर सपने चल रहे हैं। हम कुछ भी कर रहे हों, हमारे भीतर एक सपनों का जाल चल रहा है। और ध्यान रहे, सपना तभी चल सकता है, जब भीतर निद्रा हो। बिना नींद के सपना नहीं चल सकता। और सपने हम सबके भीतर चौबीस घंटे चलते हैं। जरा आंख बंद करो, सपना दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा। आंख जब आप बंद नहीं करते, तब आप यह मत सोचना कि भीतर सपना नहीं चलता है। भीतर तो सपना चलता है, लेकिन बाहर की जरूरत के कारण आपको उस सपने का पता नहीं चलता। आंख बंद करो, सपने का पता चलना शुरू हो जाएगा।

हमारे भीतर रात सपने चलते हैं, ऐसा मत सोचना, दिनभर सपने चलते हैं, चौबीस घंटे सपने चलते हैं। दिन की जरूरत में, दिन की रोशनी में, उलझन में, दूसरे काम में, बाहर उलझे होने की वजह से भीतर के सपने दिखाई नहीं पड़ते। इसलिए आरामकुर्सी पर जरा लेट जाएं, बाहर की दुनिया से आंख बंद कर लें, और दिवास्वप्न, डे—ड्रीमिंग शुरू हो जाती है। वह चल ही रही थी, आपने आंख बंद की, तो दिखाई पड़ने लगती है। आप आंख खोलकर बाहर लग जाते हैं, तो भूल जाते हैं। लेकिन भीतर चौबीस घंटे, भीतर के छबिगृह में सपने चल रहे हैं। वे सपने इस बात की खबर हैं कि हम सोए हुए हैं।

मूढ़ता का अर्थ है, एक तरह की निद्रा। मूढ़ता का अर्थ मूर्खता नहीं है।  तथाकथित ज्ञानी भी मूढ़ हो सकता है। अज्ञानी भी मूढ़ हो सकता है। मूढ़ होना अलग ही बात है।

मूढ़ का अर्थ है, निद्रित चलना, सोए—सोए जीना। भीतर सपने चलते रहते हैं और हम बाहर चलते रहते हैं। हम जागे हुए नहीं हैं। हम ठीक से जागे हुए नहीं हैं। इसकी आप कोशिश करें, तो आपको पता चलेगा कि कितनी गहरी नींद है। अपनी हाथ की घड़ी पर आंख गड़ाकर बैठ जाएं और तय कर लें कि पूरा एक मिनट, जो सेकेंड का कांटा है, उसको आप देखते रहेंगे स्मृतिपूर्वक, और बीच में कोई दूसरा विचार और सपना नहीं आने देंगे—एक मिनट सिर्फ।

आप पाएंगे कि दस दफा बीच में सपने आ गए, दस दफे झोंक आ गई, दस दफे निद्रा लग गई, दस दफे आप चूक गए। कांटे को भूल गए; मन कहीं और चला गया। कोई और खयाल बीच में आ गया और आपको ले गया। एक मिनट में दस बार आपके मन में सपना आपको झकझोर डालेगा। तब आपको पता चलेगा कि मैं कैसा सोया हुआ आदमी हूं!

रास्तों पर कोई रात तीन बजे और चार बजे के बीच अधिक एक्सिडेंट होते हैं। तो ड्राइवर्स के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक वक्त रात के तीन और चार के बीच में है। मनोवैज्ञानिक बहुत दिन से इस खोज में थे कि बात क्या होगी? यह तीन और चार के बीच में जो इतनी दुर्घटनाएं होती हैं, अधिकतम दुर्घटनाएं, इसका कारण क्या होगा?

अब वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि तीन और चार के बीच में सपने इतने प्रगाढ़ हो जाते हैं। सोया आदमी हो, तब तो पता नहीं चलता। जागा हुआ आदमी हो, तो आंख खुली भी रहे, तो भी ड्राइवर सपनों में खो जाता है। सपने में कुछ भी हो सकता है फिर। और इसलिए बहुत—से ड्राइवर कहते हैं कि मैं बिलकुल जागा हुआ था। आंख मेरी खुली थी। और मेरी समझ के बाहर है कि यह दुर्घटना कैसे हो गई! एक क्षण को भी अगर सपने ने खींच लिया हो, तो दुर्घटना होने में देर नहीं लगती। और आंख खुली हो, तो भ्रम पैदा हो सकता है कि आंख खुली थी, इसलिए मैं जागा हुआ था।

इस भूल में कोई भी न रहे। आंख का खुला होना और जागे होने का कोई भी संबंध नहीं है। बुद्ध की आंख भी बंद हो, कृष्ण की आंख भी बंद हो, तो भी वे जागे हुए होते हैं। हमारी आंख भी खुली हो, तो हम सोए हुए होते हैं। सोना और जागना आंतरिक घटनाएं हैं, आंख से इसका कोई संबंध नहीं है।। तो सोने का अर्थ हुआ कि हमारे भीतर विचारों की, सपनों की, चित्रों की एक भीड़ है, वह चल रही है। उस भीड़ के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं पडता, कुछ भी सूझता नहीं। हम अंधे की तरह जी रहे हैं; टटोल—टटोल कर जी रहे हैं। किसी तरह रास्ते से गुजर जाते हैं, घर आ जाते हैं, काम कर लेते हैं, तो सोचते हैं कि हम जागे हुए हैं। लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में यह जागरण नहीं है, इसे मूढ़ता..।

कृष्ण कहते हैं, अमूढ़ता मैं हूं।

अमूढ़ता का अर्थ है, जागरण, बुद्धत्व।


और जब कोई व्यक्ति नींद में भी जाग जाए, तो योग को उपलब्ध हुआ। कृष्ण ने कहा है कि जो नींद में भी जागा हुआ है, वही योगी है। इससे उलटा सूत्र भी हम बना सकते हैं कि जो जागकर भी सोया हुआ है, वही भोगी है।

इस जागरण का क्या अर्थ हुआ? कभी आपने जागरण का कोई क्षण अनुभव किया है?

थोड़ा मुश्किल है। कभी—कभी अचानक भी हो जाता है। अगर अचानक दो आदमी एकांत रास्ते पर आपको पकड़ लें और एक आदमी छुरा आपकी छाती पर रख दे, तो उस क्षण में आपके भीतर कोई विचार होंगे? अचानक! उस क्षण आपके भीतर कोई विचार नहीं होंगे। उस क्षण आपके भीतर सब सपने छूट जाएंगे। उस क्षण एक क्षण को आप पूरे जागे होंगे। लेकिन यह बाहर की परिस्थिति पर होगा। छुरा हट जाए, या चेहरा पहचान में आ जाए कि मित्र ही है, मजाक कर रहा है, सपने वापस दौड़ पड़ेंगे। या छुरा न भी हटे, तो एक क्षण को आकस्मिक था, इसलिए आपके भीतर की बंधी हुई धारा को तोड्ने में सफल हुआ। अगर न हटे, तो आप तत्काल सोचने में लग जाएंगे कि अब मैं क्या करूं, कैसे बचूं कैसे भागू क्या जवाब दूं!

खतरे के क्षण में हमें कभी—कभी नैसर्गिक रूप से जागरूकता उपलब्ध होती है, खतरे के क्षण में। और हमने अब जिंदगी ऐसी बना ली है कि उसमें खतरे का कोई ज्यादा क्षण नहीं है। सब तरफ से हमने व्यवस्था कर ली है कि कोई खतरा न हो। इसलिए जागरण का क्षण और भी कम होता जाता है।

अमूढ़ता मैं हूं कृष्‍ण कहते हैं। उसका अर्थ है, जागरूकता मैं हूं। जब भी कोई जागता है भीतर, तभी मैं उपलब्ध हो जाता हूं। जब भी कोई जागता है भीतर, तब वह जागा हुआ व्यक्ति मेरा ही भाग हो जाता है।

ये तीन शब्द खयाल में ले लें, निश्चय करने की शक्ति, तत्वज्ञान, अमूढ़ता मैं हूं।

क्षमा, सत्य, इंद्रियों को वश में करना—दम, और मन का निग्रह— शम, तथा सुख—दुख, उत्पत्ति—प्रलय एवं भय और अभय भी मैं हूं।

इन सूत्रों को भी थोड़ा—सा समझ लें।

क्षमा। थोड़ा कठिन है। कठिन इसलिए कि हम क्षमा से जो अर्थ लेते हैं, वह कृष्ण का अर्थ नहीं है। हो भी नहीं सकता। असल में हमारी और कृष्ण की भाषा एक नहीं हो सकती। और जब भी हम कृष्ण को अपनी भाषा में अनुवादित करते हैं—संस्कृत से हिंदी में नहीं— कृष्ण की भाषा को अपनी भाषा में जब हम अनुवादित करते हैं, तब बुनियादी भूलें हो जाती हैं। जैसे क्षमा, अगर हम पूछें अपने से कि क्षमा का क्या अर्थ है? तो साफ है अर्थ कि अगर किसी पर क्रोध आ जाए तो उसे क्षमा कर देना।

लेकिन कृष्‍ण की भाषा में क्षमा का यह अर्थ नहीं होता। कृष्ण की भाषा में क्षमा का अर्थ होता है, क्रोध का न आना। हमारी भाषा में अर्थ होता है, क्रोध का आना और क्षमा करना। कृष्ण की भाषा में अर्थ होता है, क्रोध का न आना, क्रोध का अभाव। हमारा अर्थ है, क्रोध को लीपना—पोतना।

मुझे आप पर क्रोध आ गया। पीछे पछतावा आता है, फिर मैं क्षमा मांग लेता हूं। तो क्रोध से जो भूल हुई थी, उसे मैं पोंछ देता हूं। एक लकीर गलत पड़ गई थी, उसे काट देता हूं। लेकिन क्रोध हो गया। और यह जो क्षमा है, यह केवल क्रोध को पोंछने का उपाय करती है, नकारात्मक है, निगेटिव है। इस क्षमा का बहुत उपयोग नहीं है। यह तो हम करते रहते हैं। चलता रहता है। अगर इसी क्षमा में अनुभव होता हो परमात्मा का, तो हम सबको हो गया होता। कृष्‍ण का क्षमा से अर्थ है, जहां क्रोध पैदा नहीं होता। जहां क्रोध जन्मता नहीं, जहां क्रोध की घड़ी मौजूद होती है और भीतर क्रोध का कोई रिएक्शन, कोई प्रतिक्रिया पैदा नहीं होती, कोई प्रतिकर्म पैदा नहीं होता।

क्षमा का अर्थ है, वैसी चित्त की दशा, जहां क्रोध व्यर्थ हो जाता है। क्षमा का अर्थ है, चित्त की वैसी भाव—दशा, जहां क्रोध जन्मता ही नहीं।

यह बहुत मजे की बात है कि क्रोध हमें इसलिए जन्मता है— इसलिए नहीं कि लोग क्रोध जन्मा देते हैं— क्रोध हमें इसलिए जन्मता है कि क्रोध हमारे भीतर सदा है। जब कोई आपको गाली देता है, तो आप इस भ्रान्ति में मत पड़ना कि उसने आपमें क्रोध पैदा करवा दिया। क्रोध तो आपके भीतर मौजूद था। उसकी गाली तो केवल उसे बाहर लाने का काम करती है।

जैसे कोई एक बाल्टी को रस्सी में बांधकर कुएं में डाल दे और खींचे और पानी भरकर बाहर आ जाए, तो क्या आप यह कहेंगे कि इस आदमी ने कुएं में पानी भर दिया? यह सिर्फ बाल्टी डालता है, कुएं में जो पानी भरा ही था, वह बाहर निकल आता है। अगर यह आदमी खाली कुएं में, सूखे कुएं में बाल्टी डाले, तो बाल्टी भड़भड़ाएगी, परेशान होगी; खाली वापस लौट आएगी।

आप सबको पता होगा, अगर दो—चार—आठ दिन क्रोध करने का कोई मौका न दे, तो जैसी बेचैनी होती है, वैसी बेचैनी क्रोध करने से भी नहीं होती। मनस्विद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आदमी को क्रोध करने का मौका न मिले, तो वह मौका खोज लेता है। वह ऐसी बात में से मौका निकाल लेता है, जहां कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि यहां क्रोध की कोई जरूरत है। वह चारों तरफ तलाश में रहता है। वह चारों तरफ अपने आस—पास अज्ञात फीलर्स छोड़ देता है; खोजते रहते हैं कि कहीं जरा मौका मिल जाए और वह क्रोध से भर जाए।

अगर इस आदमी को बंद कर दें तीन महीने एकांत में, तो यह दीवालों से लड़ेगा। यह दीवालों से सिर फोड़ेगा। यह खाली आकाश में गालियां देगा। यह अपने को भी चोट पहुंचा सकता है, अपने को भी मार सकता है। क्रोध अपने पर भी प्रकट कर सकता है।

क्रोध आपकी एक अवस्था है। ध्यान रखें, अगर क्रोध सिर्फ एक प्रतिक्रिया है किसी के द्वारा पैदा की गई, तब तो क्षमा असंभव है। क्रोध आपकी एक अवस्था है, और अगर आप अपने को बदल लें, तो क्षमा भी आपकी अवस्था हो सकती है। और तब कोई आपके भीतर बाल्टी डाले, तो क्षमा भरकर बाहर निकले।

 हम प्रशंसकों को पास रखना पसंद करते हैं। क्योंकि जो हमारे भीतर नहीं है, वह वे बताते रहते हैं। जो हमारे भीतर नहीं है वह! और जो हमारे भीतर है, उसे छिपाते रहते हैं। हम मित्र उनको कहते हैं—नासमझी हमारी हद्द की है—हम मित्र उनको कहते हैं, जो हमारे भीतर नहीं है, उसका हमें दर्शन कराते रहते हैं। और हम शत्रु उनको कहते हैं—नासमझी हमारी हद्द की है— कि जो हमारे भीतर है, उसका दर्शन कराएं, तो हम उन्हें शत्रु मान लेते हैं!

अगर कोई गाली दे और भीतर क्रोध आए, तो उसे धन्यवाद देना कि उसने एक अवसर दिया, एक मौका जुटाया, एक परिस्थिति बनाई, जिसमें आपका क्रोध आपको दिखाई पड़ा। और अगर कोई व्यक्ति गाली देने वाले को भी धन्यवाद दे पाए, तो एक दिन उसके भीतर क्षमा की शक्ति पैदा होगी। वह क्षमा पाजिटिव है। वह क्षमा किसी किए गए क्रोध का पछतावा नहीं है, किसी क्रोध के लिए मांगी गई माफी नहीं है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप क्रोध करना, तो माफी मत मांगना। यह मैं नहीं कह रहा हूं। लेकिन उस माफी को कृष्‍ण की क्षमा मत समझना। वह हमारे बाजार की क्षमा है। हमारी दुनिया की क्षमा है। वह कारगर है, लुब्रिकेटिंग है, उसका बड़ा उपयोग है।

लेकिन कृष्‍ण की क्षमा कोई और बात है। इस क्षमा में उस अखंड का दर्शन नहीं होगा। अगर क्षमा आपका स्वभाव बन जाए, क्रोध संभव ही न हो, अक्रोध सहज हो जाए। कोई नींद में भी आपको डाल दे आपके भीतर कुछ, तो क्षमा ही बाहर आए। आपके रोएं— रोएं से आशीष ही बहने लगें, आपका कण कण शुभकामना और मंगल से भर जाए, तो क्षमा है।

कृष्ण कहते हैं, क्षमा मैं हूं सत्य मैं हूं इंद्रियों का वश में करना मैं हूं मन का निग्रह मैं हूं।

मन का निग्रह, इंद्रियों को वश में करना— इस संबंध में थोड़ी— सी बात खयाल में ले लें।

एक, व्यापक रूप से गलत धारणा हमारे भीतर है। जब भी हम सोचते हैं, इंद्रियों को वश में करना, तो कोई संघर्ष, कोई युद्ध, कोई लड़ाई, कोई भीतरी कलह का खयाल आता है। जब भी हम सोचते हैं, मन का निग्रह करना, तो कोई जबरदस्ती, कोई दमन, कोई रिप्रेशन करने का खयाल मन में आता है।

वे बड़े गलत खयाल हैं। और जो व्यक्ति भी अपनी इंद्रियों को दुश्मन की तरह वश में करने जाएगा, वह मुसीबत में पड़ेगा। वह मालिक तो कभी न हो पाएगा, विक्षिप्त हो सकता है। और जो व्यक्ति जबरदस्ती अपने मन को ठोक पीट कर वश में करने की चेष्टा में लगेगा, उसका मन विद्रोही हो जाएगा, मन बगावती हो जाएगा; और मन उसे ऐसी जगह ले जाने लगेगा, जहां—जहां वह चाहता है कि मन न जाए। जहां—जहां चाहेगा कि न जाए मन, वहां— वहां जाने लगेगा। जहां—जहां रोकेगा मन, मन वहां—वहां और भी बहने लगेगा। इंद्रियों पर जितनी जबरदस्ती करेगा, उतना ही पाएगा कि ऐंद्रिक और सेंसुअल होता चला जा रहा है।

इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि अगर कोई जबरदस्ती ब्रह्मचर्य को थोपने बैठ जाए, तो उसके चित्त में कामवासना जितनी भयंकर हो जाती है, तूफान ले लेती है, उतना किसी गहरे से गहरे कामी के मन में भी नहीं होती।

आपको पता होगा, अगर किसी दिन उपवास करें, तब आपको पता चलेगा कि भोजन की याद उपवास के दिन ही आती है। ऐसे भोजन की कोई याद आती है! आदमी भोजन कर लेता है और भूल जाता है। आप सड़क पर निकलते हैं, आपको कभी खयाल आया कि आप कपड़े पहने हुए हैं! एक दिन नग्न निकलकर सड़क पर देखें, तब आपको कपड़े ही कपड़े याद आएंगे।

जबरदस्ती किसी चीज को रोका जाए, तो वह स्मृति में गहन हो जाती है। जोर से आती है, प्रगाढ़ हो जाती है। उसका बल, उसकी ताकत बढ़ जाती है।

इंद्रिय—निग्रह या मन—निग्रह जबरदस्तिया नहीं हैं, वैज्ञानिक विधियां हैं। इसे खयाल में ले लें। वैज्ञानिक विधियां हैं। लड़ाई का सवाल नहीं है, समझ का सवाल है। और जो व्यक्ति मन से लड़ेगा, वह कभी मन का मालिक न होगा। जो व्यक्ति मन को समझेगा, वह मन का मालिक तत्काल हो जाएगा। समझ सूत्र है, दमन नहीं।

लेकिन हम लड़ते रहते हैं। एक आदमी को क्रोध आता है, तो वह क्रोध को दबाता है कि क्रोध करना अच्छा नहीं है। शास्त्र में पढ़ा है, गुरुओं से सुना है, क्रोध करना बुरा है। क्रोध आता है; अब वह क्या करे? उसे दबा लेता है। दबाया हुआ और भीतर पहुंच जाता है। दबाया हुआ और रग—रग, रोएं—रोएं में फैल जाता है। दबाया हुआ नये रास्तों से निकलना शुरू हो जाता है। दबाया हुआ धीरे— धीरे स्वभाव में जहर की तरह फैल जाता है।

इसलिए देखें आप, जो आदमी को यह वहम हो कि मैंने क्रोध पर काबू पा लिया है, उसके आप रोएं—रोएं में क्रोध को झलकता हुआ देखेंगे। जिस आदमी को खयाल हो कि मेरा अहंकार बिलकुल समाप्त हो गया है, मैं तो बिलकुल विनम्र हो गया हूं उसकी आंख की झलक में, उसके चेहरे के भाव में, जगह—जगह आप अहंकार की छाप पाएंगे।

जिस आदमी को खयाल हो कि मैंने संसार को लात मार दी है, संसार को छोड़ दिया है, त्याग कर दिया है, उसको अगर आप थोड़ा भी गौर से देखेंगे, तो उसे संसार में इस बुरी तरह फंसा हुआ पाएंगे, जिसका हिसाब नहीं। संसार नहीं होगा उसके चारों तरफ, तो भी फंसा हुआ पाएंगे। क्योंकि एक छोटी—सी लंगोटी भी पूरा साम्राज्य बन सकती है।

जो दबाया जाता है, वह विषाक्त कर देता है।

नहीं; कृष्ण का अर्थ दमन से नहीं है। इसलिए जो दमित करेगा अपने को, वह तो और भी परमात्मा की झलक से दूर हो जाएगा। कृष्‍ण का प्रयोजन है रूपांतरण से, ट्रांसफामेंशन से, एक क्रांति से, जो ज्ञान से संभव होती है।

जिस व्यक्ति को क्रोध के बाहर जाना हो, उसे क्रोध को समझना चाहिए, उसे क्रोध को पहचानना चाहिए। क्रोध ताकत है। जैसे आकाश में बिजली कौंधती है। एक दिन हम उससे डरते थे और घबड़ाते थे। आज वही बिजली प्रकाश देती है। एक दिन आकाश में कौंधती थी, तो हम घुटने टेककर जमीन पर, प्रार्थना करते थे, कि जरूर परमात्मा नाराज है, देवता रुष्ट हैं। आज उस बिजली को हमने बांध दिया। आज कोई आकाश में चमकती बिजली को देखकर घबड़ाता नहीं है, क्योंकि अब हम जानते हैं उस बिजली के विज्ञान को।

क्रोध भी आपके भीतर कौंधती हुई बिजली है। और मजा तो यह है कि आकाश की बिजली को बांधने में हम समर्थ हो गए, आदमी के भीतर की बिजलियां अभी भी गैर—सम्हली पड़ी हैं।

क्रोध शक्ति है। अगर एक बच्चा ऐसा पैदा हो, जिसमें क्रोध हो ही नहीं, तो वह बच्चा जिंदा नहीं रह सकेगा, मर जाएगा। नपुंसक होगा, उसमें बल ही नहीं होगा। क्रोध शक्ति है। लेकिन शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है, सदुपयोग हो सकता है। जब कोई उस शक्ति का दुरुपयोग करता है, तो जीवन नर्क हो जाता है। क्रोधी का जीवन शक्ति का दुरुपयोग है। और जब कोई उसी शक्ति का सदुपयोग करता है, तो वही शक्ति क्षमा बन जाती है। और क्षमाशील का जीवन स्वर्ग हो जाता है।

कृष्ण जब कहते हैं, इंद्रियों के निग्रह में मैं हूं मनोनिग्रह में मैं हूं तो उनका अर्थ है कि जो व्यक्ति इंद्रियों को जानकर, इंद्रियों को समझकर, ज्ञान से उनके पार हो जाता है; जो व्यक्ति मन को पहचानकर, मन के प्रति जागरूक होकर, मन के ऊपर उठ जाता है, उसे मेरी झलक मिलनी शुरू।

दमन से नहीं, रूपांतरण से। लड़कर नहीं, जानकर।

यह सूत्र थोड़ा बारीक है। क्योंकि जानने का क्या अर्थ? कभी आपने सोचा है कि आपने क्रोध को जाना? आप कहेंगे, बहुत जाना। रोज जानते हैं! लेकिन फिर भी मैं आपसे कहूंगा, आपने कभी नहीं जाना। क्योंकि जब क्रोध होता है, तब आपका जानना बिलकुल ही नहीं होता है। आपका जानना खो गया होता है। तब आप बिलकुल पागल होते हैं।

क्रोध जो है, वह अस्थायी पागलपन है। उस वक्त होश वगैरह आपके भीतर बिलकुल नहीं होता। उस वक्त आप जो करते हैं, वह आप करते हैं, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। आप से होता है, ऐसा ही कहना ठीक है। क्योंकि क्रोध के बाद आप ही पछताते हैं और कहते हैं कि मेरे बावजूद, इंस्पाइट ऑफ मी, मुझसे हो गया। यह मैं सोचता तो नहीं था कि इस बच्चे को उठाकर खिड़की के बाहर फेंक दूंगा और यह मर जाएगा। यह मैंने सोचा ही नहीं था, लेकिन यह हो गया। यह मैंने किया नहीं है, यह हो गया है। लेकिन फिर किसने किया? क्रोध इतना हावी हो गया था कि आपकी चेतना बिलकुल खो गई थी और आप बिलकुल मूढ़ हो गए थे, सो गए थे, बेहोश थे।

तो आपने क्रोध को कभी जाना नहीं। क्योंकि जब क्रोध होता है, तब आप नहीं होते। और जब आप लौटते हैं, तब तक क्रोध जा चुका होता है। आपकी मुलाकात नहीं हुई है क्रोध से अभी। क्रोध को जानने का, या और वासनाओं को जानने का एक ही उपाय है कि जब क्रोध मौजूद हो, तब आप आंख बंद करें और क्रोध पर। ध्यान करें कि यह क्या है? कैसे उठ रहा है? कहां से आया है? कहां जा रहा है? क्या प्रयोजन है? यह क्या है शक्ति? इसका क्या है रूप? यह क्या करना चाहता है?

लेकिन जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी नजर दूसरे पर होती है, जिसने क्रोध करवाया। उसी में आप चूक जाते हैं। जब आप क्रोध में हों, तो नजर अपने पर रखें। दूसरे को भूल जाएं, जिसने गाली दी। उससे तो घडीभर बाद भी मुलाकात हो सकती है। लेकिन यह क्रोध जो आपके भीतर है, यह घडीभर बाद नहीं होगा, यह बह गया होगा। फिर इससे मुलाकात नहीं होगी। इस मौके को मत चूके।

मगर हम बड़े होशियार लोग हैं। अगर कोई भला काम करना हो, तो हम कहते हैं, जरा सोचेंगे। बुरा काम करना हो, तो हम बड़े तत्काल! फिर हम कभी नहीं कहते कि सोचेंगे। अगर कोई कहे कि एक दो पैसे दान कर दो, तो हम कहेंगे, सोचेंगे। और कोई एक गाली दे, तो हम कभी नहीं कहते कि जरा सोचेंगे। फिर सोचने का कोई सवाल नहीं है। फिर हम तत्काल! फिर हमसे ज्यादा त्वरा और तीव्रता में और जल्दी में कोई नहीं होता।

यह जल्दी क्या है, आपको पता नहीं। यह जल्दी केमिकल है, यह जल्दी रासायनिक है। वह जहर जो आपके खून में छूटा है, वह कहता है, जल्दी करो! क्योंकि अगर दो क्षण भी चूक गए, तो वह जहर तब तक खून में विलीन हो जाएगा। वह जहर जो आपकी नसों में फैलकर अकड़ गया है, वह कहता है, उठाओ घूंसा और मारो! क्योंकि अगर नहीं मारा, तो यह जहर तो बेकार चला जाएगा।

क्रोध जब हो, तब ध्यान का क्षण समझें। आंख बंद कर लें। बीच सड़क पर भी हों, तो वहीं आंख बंद कर, एक किनारे पर बैठकर ध्यान कर लें कि भीतर क्या हो रहा है! लोग शायद आपको पागल समझें, लेकिन आप पागल नहीं हैं। क्योंकि क्रोध को जो जान लेगा, वह सब पागलपन के ऊपर उठ जाता है। जब कामवासना आपको पकड़े, तब रुक जाएं। ध्यान करें उस पर। उस वासना को पहचानें भीतर से, क्या है? कौन—सी ऊर्जा भीतर उठकर इतना धक्का दे रही है कि आप पागल हुए जा रहे हैं?

तो आप बहुत शीघ्र उस ज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगे, जिस जान में ये इंद्रिय—निग्रह, मनो—निग्रह सरलता से फलित हो जाते हैं। कृष्‍ण कहते हैं, वह भी मैं ही हूं।

वे कहते हैं, सुख और दुख, उत्पत्ति और प्रलय, भय और अभय भी मैं ही हूं।

इन तीन द्वंद्वों को एक साथ उपयोग करने का प्रयोजन है। हम सब सोचते हैं, हम सबने सोचा है बहुत बार कि परमात्मा आनंद है। लेकिन कभी सोचा है कि परमात्मा दुख भी है? यह सूत्र बहुत खतरनाक है।

कृष्‍ण कहते हैं, सुख भी मैं और दुख भी मैं।

हम सब सोचते हे कि परमात्मा सुख का धाम। परम सुख अगर चाहिए, तो परमात्मा की तरफ जाओ। लेकिन कृष्‍ण कह रहे हैं कि सुख भी मैं और दुख भी मैं! तो क्या वे वेदों की, उपनिषदों की जो परम उक्ति है, सच्चिदानंद की, उसके खिलाफ बोल रहे हैं?

नहीं, उसके खिलाफ नहीं बोल रहे हैं। लेकिन अगर उस तक जाना हो, तो इस सूत्र को मानकर चलने वाला ही उस तक पहुंचता है, जहां परमात्मा मात्र आनंद रह जाता है। इस सूत्र को मानने वाला— सुख और दुख, दोनों में जो परमात्मा को देखता है, वह एक दिन परम आनंद को उपलब्ध होता है।

हम सुख में तो परमात्मा को देख सकते हैं, लेकिन दुख में! दुख में नहीं देख सकते। और जो दुख में नहीं देख सकता, वह समता को उपलब्ध नहीं होगा, शांति को उपलब्ध नहीं होगा। लेकिन जो दुख में भी देख सकता है, वह समता को उपलब्ध हो जाएगा। अगर आपको दुख में भी परमात्मा दिखाई पड़े, तो आप दुख से भागना न चाहेंगे। परमात्मा से कोई भागना चाहता है? अगर दुख में परमात्मा दिखाई पड़े, तो आप प्रार्थना न करेंगे कि दुख से मुझे छुडाओ! क्योंकि परमात्मा से कोई छूटना चाहता है?

और जिसको दुख में भी परमात्मा दिखाई पड़ जाए, उसके लिए फिर कोई दुख जगत में नहीं रह जाएगा। क्योंकि दुख का मतलब ही तभी तक है, जब तक हम उससे बचना चाहते हैं, भागना चाहते हैं। जिस दिन कोई दुख को भी आलिंगन करके गले लगा ले; और जिस दिन दुख को भी कोई कहे कि प्रभु आए द्वार मेरे, स्वागत है; उस दिन फिर कोई दुख नहीं बचेगा। और जिसके जीवन में कोई दुख नहीं बचता, उसके जीवन में सभी कुछ सुख हो जाता है।

हमारे जीवन में दुख से बचने की और सुख को पकड़ने की आकांक्षा होती है। लेकिन परिणाम क्या है? परिणाम इतना है कि दुख ही दुख हो जाता है; सुख तो कहीं मिलता नहीं।

कृष्‍ण कहते हैं, सुख भी मैं, दुख भी मैं; उत्पत्ति भी मैं, प्रलय भी मैं; जन्म भी मैं, मृत्यु भी मैं। सारे द्वंद्व मैं हूं। भय भी मैं, अभय भी मैं। जहां—जहां द्वंद्व दिखाई पड़े, दोनों में मैं ही हूं। ऐसा जो मुझे देखेगा, वह आगे के सूत्रों को समझना और आसान हो जाएगा।

तथा अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति, अपकीर्ति, ऐसे ये जो नाना प्रकार के भाव प्राणियों में होते हैं, वे मेरे से ही होते हैं। और हे अर्जुन, सात महर्षिजन, और चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायंभुव आदि चौदह मनु, ये मेरे भाव वाले सब के सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।

इस सूत्र का अर्थ है कि जितने भी जानने वाले हुए है अब तक जिन्होंने भी जाना है इस सत्य को, इस जीवन को, वे भी मेरे ही संकल्प थे, मेरे ही भाव थे, वे भी मुझसे अलग नहीं हैं। जिन्होंने भी कभी उस परम अनुभव को पाया है, चाहे वे पहले हुए ऋषि—महर्षि हों, चाहे मनु आदि हों, वे सब भी मेरे ही भाव की अवस्थाएं हैं। कृष्‍ण यह कह रहे हैं कि इस जगत में जो भी श्रेष्ठतम फूल खिलते हैं अनुभव के, वे सब मेरी ही सुगंध से परिव्याप्त हैं। और जब भी कोई अपनी परम दशा में पहुंचता है, तो मुझको ही उपलब्ध हो जाता है।

लेकिन उस परम दशा में वे ही लोग पहुंच पाते हैं, जो द्वंद्व के बीच अपने को समता में ठहरा लेते हैं। जो दो के बीच चुनाव नहीं करते, जो यह नहीं कहते कि हमें सुख चाहिए, दुख नहीं चाहिए। जो कहते हैं, दुख में भी तू है, और सुख में भी तू है। जो यह नहीं कहते कि जन्म तो प्यारा है, जीवन तो प्यारा है, मृत्यु नहीं चाहिए, हमें तो अमर जीवन चाहिए। जो ऐसा नहीं कहते हैं। जो कहते हैं, मृत्यु भी तेरी, जन्म भी तेरा। दोनों हमें प्रीतिकर हैं, क्योंकि दोनों ही तेरे हैं।

इस जगत में जो चुनाव नहीं करते हैं, इस जगत में जो च्चाइसलेस, चुनावरहित जीने के उपक्रम में प्रवेश करते हैं, वे सभी, चाहे किसी काल में हुए हों, वे सभी महर्षिगण, मुझको ही, मेरे ही संकल्प को, मेरे ही भाव को उपलब्ध होते हैं। कहें कि वे मेरे ही भाव के अंश हैं, वे मेरी ही लहरें हैं। लेकिन वे ऐसी लहरें हैं, जो मेरे सागर होने को भी अनुभव कर लेती हैं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 10 भाग 1

 अज्ञेय जीवन—रहस्‍य


 श्रीभगवानुवाच:

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वच:।

यतेउहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।। 1।।

न मे बिंदु:— सुरगणा: प्रभवं न महर्षयः।

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।। 2।।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।

असंमूढ़ स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्‍यते।। 3।।


भगवान श्रीकृष्ण बोले हे महाबाहो फिर भी मेरे परम वचन श्रवण कर जो कि मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूंगा।

हे अर्जुन मेरी उत्पति को अर्थात विभूतिसहित लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदि कारण हूं।

और जो मेरे को अजन्मा अनादि तथा लोकों का महान र्ड़श्वर तत्व से जानता है वह मनुष्यों में ज्ञानवान पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।


 जीवन है एक रहस्य। गणित की पहेली जैसा नहीं कि श्रम से उसे हल किया जा सके। रहस्य जीवन का कोई सांयोगिक गुण नहीं है; रहस्य जीवन का स्वभाव है। जीवन है रहस्य ही।

अज्ञात है बहुत कुछ,  लेकिन वह ज्ञात हो जाएगा। आज नहीं कल, हम उसे जान लेंगे। जो आज नहीं जाना है, वह भी कल जाना जा सकेगा। जो कभी भी जाना जा सकता है, उसका नाम रहस्य नहीं है।

रहस्य से अर्थ है, जो कभी भी जाना नहीं जा सकेगा, जो अज्ञेय है। जानने की आकांक्षा प्रगाढ़ है जिसके लिए, जिस तक पहुंचने के लिए जीवन दौड़ता है, जिससे मिलने की प्यास है और फिर भी समस्त श्रम और समस्त इच्छाएं और सारी अभीप्सा और सारी प्यासे व्यर्थ रह जाती हैं और हम उसके निकट ही पहुंच पाते हैं, उसका स्पर्श होता है, लेकिन उसे जान नहीं पाते।

अज्ञेय से अर्थ है, जिसे हम किसी भांति पहचान भी लेते हैं, फिर भी नहीं कह सकते कि हमने उसे जान लिया। ऐसे अज्ञात, ऐसे अज्ञेय के संबंध में जो वचन हैं, कृष्‍ण उन्हें परम वचन कहते हैं। इस सूत्र में जो बहुत कीमती शब्द है, वह है परम वचन। उसे हम थोड़ा समझें।

कृष्‍ण ने कहा, हे महाबाहो, फिर भी मेरे परम वचन श्रवण कर, जो कि मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूंगा।

साधारणत:, परम वचन शब्द को पढ़ते समय कोई विशेष खयाल मन में नहीं आता है। और इसीलिए उसके विशेष अर्थ भी चूक जाते हैं। एक वचन तो होता है, जिसे हम कहते हैं, सत्य वचन। एक वचन होता है, जिसे हम कहते हैं, असत्य वचन। परम वचन क्या है? अगर भाषाकोश में खोजने जाएंगे, तो भाषाकोश कहेगा, सत्य वचन ही परम वचन है। लेकिन वह ठीक नहीं है बात। सत्य वचन का अर्थ ही होता है, जिसके विपरीत भी असत्य वचन हो सकता है।


 परम वचन का अर्थ होता है, जिसके विपरीत कोई वचन नहीं हो सकता, जिसके विपरीत किसी वक्तव्य की कोई संभावना नहीं है। पहली बात।

सत्य, जो आज सत्य मालूम पड़ता है, कल असत्य हो सकता है। जो आज असत्य मालूम पड़ता है, कल खोज से पता चले कि सत्य है। इसलिए विज्ञान जिसे सत्य कहता है, कल उसे असत्य कहने को मजबूर हो जाता है। न्यूटन का जो सत्य था, वह आइंस्टीन का सत्य नहीं है। और आइंस्टीन का जो सत्य है, वह आने वाली सदी का सत्य नहीं होगा। और आज कोई भी वैज्ञानिक यह नहीं कह सकता कि हम जो सत्य उदघोषित कर रहे हैं, वह सदा ही सत्य रहेगा।

सत्य असत्य हो सकते हैं। असत्य भी कल खोजे जाएं और पता चले, तो सत्य बन सकते हैं।

परम वचन का अर्थ है, जिसे हम न सत्य कह सकते हैं और न असत्य कह सकते हैं। क्योंकि हम जिसे सत्य कह सकते हैं, वह हमारे कारण कल असत्य भी हो सकता है। परम वचन का अर्थ है कि हमारे सत्य और असत्य दोनों के जो पार है; हम जिसके संबंध में कभी भी निर्णायक न हो सकेंगे।

 जिनको न तो हम सत्य सिद्ध कर सकें, और न असत्य। जिनके पक्ष में भी कोई प्रमाण न दिया जा सके और जिनके विपक्ष में भी कोई प्रमाण न दिया जा सके। जैसे कोई आदमी कहता है कि ईश्वर है।  यह वचन अर्थहीन है। क्योंकि ईश्वर है, यह भी अब तक सिद्ध नहीं किया जा सका, और नहीं है, यह भी सिद्ध नहीं किया जा सका। और आदमी के पास कोई भी उपाय नहीं है इस वचन की सत्यता या असत्यता को परखने के लिए। 

तो जिस वक्तव्य की जांच का कोई उपाय ही न हो, उस वक्तव्य को न तो सत्य कहा जा सकता है, और न असत्य। क्योंकि असत्य का अर्थ हुआ कि जांचा और पाया कि गलत है। सत्य का अर्थ हुआ कि जांचा और पाया कि सत्य है।

लेकिन ईश्वर है, इस वक्तव्य के पक्ष या विपक्ष में कोई भी प्रमाण आज तक इकट्ठे नहीं किए जा सके। आस्तिक कहे चले जाते हैं, ईश्वर है; नास्तिक कहे चले जाते हैं, ईश्वर नहीं है। आस्तिकों की दलीलों का नास्तिकों पर कोई प्रभाव नहीं है, और नास्तिकों की दलीलों का आस्तिकों पर कोई प्रभाव नहीं है। और कभी—कभी ऐसा भी होता है कि आस्तिक नास्तिक हो जाते हैं, नास्तिक आस्तिक हो जाते हैं। लेकिन वक्तव्य वैसे के वैसे ही खड़े रहते हैं।

खलील जिब्रान ने एक छोटी—सी कहानी लिखी है। लिखा है, एक गांव में एक महाआस्तिक और एक महानास्तिक था। सारा गांव परेशान था उनके कारण। क्योंकि आस्तिक लोगों को समझाता था कि ईश्वर है, नास्तिक समझाता था कि नहीं है। आखिर गांव ने उन दोनों से कहा कि तुम निर्णय पर पहुंच जाओ कुछ, ताकि हमारी परेशानी कम हो।

पूर्णिमा की एक रात, गांव ने विवाद का आयोजन किया और नास्तिक और आस्तिक ने प्रबल प्रमाण दिए। आस्तिक ने ऐसे प्रमाण दिए, जिनका खंडन मुश्किल था। नास्तिक ने ऐसा खंडन किया कि आस्तिकता के पैर डगमगा जाएं। रातभर विवाद चला और विवाद बड़ा परिणामकारी रहा। आस्तिक के प्रमाण इतने प्रभावशाली सिद्ध हुए कि सुबह होते—होते नास्तिक आस्तिक हो गया, और नास्तिक के तर्क इतने प्रभावशाली सिद्ध हुए कि सुबह होते — होते आस्तिक नास्तिक हो गया। गांव की मुसीबत जारी रही! गांव में एक महाआस्तिक और एक महानास्तिक बना रहा।

अब तक जितने भी वक्तव्य आस्तिकों और नास्तिकों ने दिए हैं, उनसे कुछ भी सिद्ध नहीं होता। न तो यह सिद्ध होता है कि ईश्वर है, और न यह सिद्ध होता है कि ईश्वर नहीं है। और ऐसी कोई कसौटी नहीं है, जिस पर जांचा जा सके कि कौन सही है।

कृष्‍ण इसी वचन को परम वचन कहते हैं। तो थोड़ा समझना पड़ेगा कि कृष्‍ण का प्रयोजन क्या है?  अर्जुन से वे कहते हैं कि मैं तुझे तेरे प्रेम के कारण और तेरे हित की दृष्टि से कुछ परम वचन कहूंगा, तू उन्हें सुन।

इसे हम ऐसा बांट लें। सत्य वचन उसे कहते हैं, जिसके लिए यथार्थ से प्रमाण उपलब्ध हो जाएं। अगर मैं कहूं, आग हाथ को जलाती है, तो यह सत्य वचन है। क्योंकि आप आग में हाथ डालकर देख सकते हैं और प्रमाण मिल जाएगा कि आग जलाती है या नहीं जलाती है। अगर मैं कहूं आग शीतल है, तो आप हाथ डालकर देख सकते हैं कि यह वचन असत्य है। क्योंकि आग शीतल नहीं है, इसका प्रमाण मिल जाता है, वचन के अतिरिक्त प्रमाण उपलब्ध हो जाता है।

 कृष्‍ण के हिसाब से वे वचन परम हैं, क्योंकि उनका इस जगत के अनुभव में तो कोई प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन अगर दूसरे जगत में कोई प्रवेश करने को तैयार हो, तो उनका प्रमाण मिलता है। अप्रमाणित वे नहीं हैं। एक अंधे आदमी के लिए, प्रकाश है, यह अप्रमाणित वचन होगा। क्योंकि अंधे के सामने कोई भी प्रमाण नहीं जुटाया जा सकता कि प्रकाश है या नहीं है। अंधा कहेगा कि यह वचन व्यर्थ है, क्योंकि न तो इसके पक्ष में तुम कोई प्रमाण दे सकते हो, और न विपक्ष में। क्योंकि अंधा तैयार है, अगर प्रकाश हो तो मैं उसे हाथ से छूकर देख लूं; कान से सुनकर देख लूं; या जीभ से चखकर देख लूं। अंधा राजी है। उसके पास जो भी इंद्रिया हैं, उन इद्रियों के माध्यम से प्रमाण मिल सकता हो, तो अंधा प्रमाण खोजने के लिए राजी है।

लेकिन हाथ प्रकाश को छू नहीं सकते, फिर भी प्रकाश है। और कान प्रकाश को सुन नहीं सकते, फिर भी प्रकाश है। और जीभ प्रकाश का स्वाद नहीं ले पाएगी, फिर भी प्रकाश है। और नासारंध्र प्रकाश की गंध नहीं पा सकेंगे, फिर भी प्रकाश है। और अंधे की चार इंद्रियां, जिसको कहें कि कोई प्रमाण नहीं है, अंधा कैसे मानने को राजी हो कि जो वक्तव्य है, वह व्यर्थ नहीं है! अंधे की सीमा के भीतर प्रमाण नहीं जुटाए जा सकते, इससे कोई चीज गलत नहीं हो जाती। इससे यह भी हो सकता है कि अंधे की सीमा बहुत सीमित है। अंधे की सीमा भी बड़ी की जा सकती है। अंधे की आंखें ठीक की जा सकती हैं। आंखों के ठीक होते ही प्रकाश का प्रमाण मिल जाएगा।

लेकिन हमारी कठिनाई यह है कि स्वभावत: हम सभी अंधे हैं। जिस आंख से जीवन के परम सत्य का अनुभव हो सके, वह आंख सबके पास है, लेकिन बंद है। इसलिए कभी अगर एक व्यक्ति की आंख भी खुल जाए, तो वह प्रमाण उसके लिए ही प्रमाण होता है, शेष के लिए प्रमाण नहीं होता है।

हमने मीरा को नाचते देखा है, लेकिन मीरा हमें पागल मालूम पड़ती है। क्योंकि हमें मीरा का नाच ही दिखाई पड़ता है; वह नहीं दिखाई पड़ता है, जिसको देखकर मीरा नाच रही है। हमने कबीर को गीत गाते देखा है। लेकिन हमें कबीर के गीत ही सुनाई पड़ते हैं, कबीर के भीतर गीत का जन्म हुआ है जिसके स्पर्श से, उसका हमें कोई पता नहीं चलता। हमने बुद्ध को मौन होते देखा है, हमने बुद्ध को शांत होते देखा है, ऐसी शांति जैसी कि पृथ्वी पर कभी—कभार उभरती है, कभी—कभार उतरती है। लेकिन क्या देखकर बुद्ध शांत हो गए हैं, क्या देखकर उनका मन ठगा रहकर चुप हो गया है, उसका हमें कोई भी पता नहीं।

तो हमारे भीतर जिसकी आंख भी खुलती है, वह हम अंधों के बीच अंधा मालूम पड़ने लगता है, क्योंकि हमने अपने अंधेपन को आंख समझा हुआ है। हमसे जो भिन्न होता है, वह हमें अंधा मालूम पड़ता है।

परम वचन कृष्‍ण की दृष्टि में वे वचन हैं, जो हमारी मौजूद हालत में तो प्रमाण नहीं बन सकते, लेकिन अगर हम अपनी हालत बदलने को राजी हों, तो उनके हमें प्रमाण मिल सकते हैं। परम वचन का अर्थ हुआ, हम जैसे हैं, वैसे ही रहकर अगर हम उनका प्रमाण चाहें, तो प्रमाण नहीं मिलेंगे। अगर हम अपने को बदलने को राजी हों, तो प्रमाण मिल जाएंगे।

यहां दो बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।

विज्ञान आदमी को बदलने की कोई जरूरत नहीं मानता। विज्ञान मानता है कि आदमी जैसा है, सत्य वैसे ही पाया जा सकता है। विज्ञान चीजों को बदलता है, चीजों को तोड़ता है, चीजों का विश्लेषण करता है। अगर अणु की खोज करनी पड़ी है, तो दो हजार वर्ष लग गए हैं। हेराक्लतु से लेकर आइंस्टीन तक दो हजार वर्षों तक अणु का चिंतन चला है, अणु की शोध चली है, अणु का खंडन चला है, और तब जाकर हमें अणु के सत्य का पता चला है। दो हजार साल हमें अणु के साथ मेहनत करनी पड़ी है।

विज्ञान वस्तु के साथ मेहनत करता है, धर्म व्यक्ति के साथ मेहनत करता है। विज्ञान कहता है, वस्तु को हम ऐसी स्थिति में ले आएं, जहां सत्य का उदघाटन हो जाए। धर्म कहता है, व्यक्ति को हम ऐसी स्थिति में ले आएं, जहां वह सत्य को देखने में समर्थ हो जाए।

विज्ञान की सारी चेष्टा वस्तु के साथ है, धर्म की सारी चेष्टा व्यक्ति के साथ है। व्यक्ति बदले, तो सत्य का पता चलेगा। विज्ञान कहता है, वस्तु को हम समझ लें, तो सत्य का पता चल जाएगा। स्वभावत:, विज्ञान की खोज पदार्थ की खोज है, धर्म की खोज चेतना की खोज है।

कृष्‍ण कहते हैं, ये परम वचन हैं। परम वचन का अर्थ है, अर्जुन, अगर तू बदले, तो इनके प्रमाण को जान सकेगा। पहली बात। अर्जुन की बदलाहट पर ही तय होगा कि ये वचन सत्य हैं या असत्य। अर्जुन जैसा है, वैसा रहते हुए इन वचनों के संबंध में कुछ भी नहीं बोल सकता है।

इसलिए धर्म ने श्रद्धा को आधारभूत बनाया है। क्योंकि इन परम वचनों को मानकर चले बिना कोई उपाय नहीं है।

एक सूफी बोध—कथा मुझे स्मरण आती है। एक छोटी—सी नदी सागर से मिलने को चली है। नदी छोटी हो या बड़ी, सागर से मिलने की प्यास तो बराबर ही होती है, छोटी नदी में भी और बड़ी नदी में भी। छोटा—सा झरना भी सागर से मिलने को उतना ही आतुर होता है, जितनी कोई बड़ी गंगा हो। नदी के अस्तित्व का अर्थ ही सागर से मिलन है।

नदी भाग रही है सागर से मिलने को, लेकिन एक रेगिस्तान में भटक गई, एक मरुस्थल में भटक गई। सागर तक पहुंचने की कोशिश व्यर्थ मालूम होने लगी, और नदी के प्राण संकट में पड़ गए। रेत नदी को पीने लगी। दो—चार कदम चलती है, और नदी खोती है, और सिर्फ गीली रेत ही रह जाती है।

नदी बहुत घबड़ा गई। सागर तक पहुंचने के सपने का क्या होगा? नदी ने रोकर, चीखकर रेगिस्तान की रेत से पूछा कि क्या मैं सागर तक कभी भी नहीं पहुंच पाऊंगी? क्योंकि रेगिस्तान मालूम पड़ता है अनंत, और चार कदम मैं चलती नहीं हूं और रेत में मेरा पानी खो जाता है, मेरा जीवन सूख जाता है! मैं सागर तक पहुंच पाऊंगी या नहीं?

रेत ने कहा कि सागर तक पहुंचने का एक उपाय है। ऊपर देख, हवाओं के बवंडर जोर से उड़े चले जा रहे हैं। रेत ने कहा कि अगर तू भी हवाओं की तरह हो जा, तो सागर तक पहुंच जाएगी। लेकिन अगर नदी की तरह ही तूने सागर तक पहुंचने की कोशिश की, तो रेगिस्तान बहुत बड़ा है, यह तुझे पी जाएगा। और हजारों—हजारों साल की कोशिश के बाद भी तू एक दलदल से ज्यादा नहीं हो पाएगी, सागर तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। तू हवा की यात्रा पर निकल।

उस नदी ने कहा कि रेत, तू पागल तो नहीं है? मैं नदी हूं मैं आकाश में उड़ नहीं सकती! रेत ने कहा कि तू अगर मिटने को राजी हो, तो आकाश में भी उड़ने का उपाय है। अगर तू तप जाए, वाष्पीभूत हो जाए, तो तू हवाओं पर सवार हो सकती है, हवाएं तेरे वाहन बन जाएंगी और तुझे सागर तक पहुंचा देंगी।

उस नदी ने कहा, मिटने को! मैं स्वयं रहते ही सागर से मिलने की आकांक्षा रखती हूं, मिटकर नहीं। मिटकर मिलने का मजा ही क्या? अगर मैं मिट गई और सागर से मिलना भी हो गया, तो उसका सार क्या है? मैं बचते हुए, रहते हुए सागर से मिलना चाहती हूं।

नदी की बात को सुनकर रेत ने कहा, तब फिर कोई उपाय नहीं है। आज तक सागर से मिलने जो भी चला है, मिटे बिना नहीं मिल पाया है। और जिसने अपने को बचाने की कोशिश की है, वह मरुस्थल में खो गया है। मैंने और नदियों को भी मरुस्थल में खोते देखा है, और मैंने कुछ नदियों को आकाश पर चढ़कर सागर तक पहुंचते भी देखा है। तू मिटने को राजी हो जा। तुझे अभी पता नहीं कि मिटकर ही तू वस्तुत: सागर हो पाएगी।

लेकिन नदी को भरोसा कैसे आए! नदी ने कहा, यह मेरा अनुभव नही है। मिटने की हिम्मत नहीं जुटती। और फिर अगर मैं सागर से मिल भी गई मिटकर, तो सागर में मेरा होना रहेगा! मैं बचूंगी! क्या भरोसा? कैसे श्रद्धा करूं? जो मेरा अनुभव नहीं है, उसे कैसे मानूं?

तो उस मरुस्थल की रेत ने कहा, दो ही उपाय हैं। या तो अनुभव हो, तो मानना आ जाता है; और या मानना हो, तो अनुभव की यात्रा शुरू होती है। अनुभव तुझे नहीं है, और बिना यह माने कि मिटकर भी तू बचेगी, तुझे अनुभव भी कभी नहीं होगा। इसे तू श्रद्धा से स्वीकार कर ले।

परम वचन का अर्थ है, जो हमारा अनुभव नहीं है, लेकिन जिसकी हमें प्यास है। जिससे हमारा परिचय नहीं है, लेकिन जिसकी हमारे हृदय में आकांक्षा है। जिसे हमने जाना नहीं है, लेकिन जिसे खोजना है। ऐसी जिसकी अभीप्सा है, उसे कहीं न कहीं किसी न किसी क्षण में ऐसा कदम भी उठाना पड़ेगा, जो अज्ञात में है, अननोन में है।

अर्जुन सरिता की भांति है। उसे कुछ भी पता नहीं है। वह जिस अज्ञात सत्य को जानने की प्रेरणा से भर गया है, उसका उसे कोई भी अनुभव नहीं है। वह जिस परम गुह्य की तलाश कर रहा है, प्रश्न पूछ रहा है, जिज्ञासा कर रहा है, उसकी उसे कोई भी प्रतीति नहीं है। इसलिए कृष्ण उससे कहते हैं कि मैं परम वचन तुझसे कहता हूं।

परम वचन का दूसरा अर्थ हुआ कि अर्जुन, अभी तुझे श्रद्धा से ही मान लेना पड़ेगा। जैसा तू है, ऐसी स्थिति में तेरी दो आंखें काम नहीं पड़ेगी। अगर तू श्रद्धा से मान ले और यात्रा पर निकल जाए रूपांतरण की, तो तू भी जान सकेगा। जो मैं कह रहा हूं, वह सत्य है। लेकिन वह सत्य तेरे रूपांतरित चित्त को ही अनुभव में आएगा। तू जैसा है, वैसा ही उस सत्य से तेरा कोई संबंध नहीं हो सकता। परम वचन का यह भी अर्थ है कि उसे श्रद्धा से ही स्वीकार कर लेना पड़ेगा।

और तीसरा अर्थ भी खयाल में ले लें, तो फिर यह सूत्र हमारी समझ में आसान हो जाएगा।

परम वचन का अर्थ तीसरा, आत्यंतिक अर्थ है, ऐसा वचन, जो समय और काल से रूपांतरित नहीं होता, परिवर्तित नहीं होता। हमारे सारे सत्य सामयिक हैं। समय बदल जाए, सत्य को बदलना पड़ता है। हमारे सभी सत्य समय की शर्तों से बंधे हुए हैं। लेकिन क्या कोई ऐसा सत्य भी है, जो समय की शर्त से बंधा हुआ नहीं है? कितना ही समय बदले और जीवन का कितना ही रूपांतरण हो जाए, उस सत्य में कोई अंतर नहीं पड़ेगा।

आपने रास्ते पर बैलगाड़ी को चलते हुए देखा है। चाक चलता है, चलता चला जाता है। प्रतिपल चलना ही उसका काम है। लेकिन उस चाक के बीच में एक कील है, जो खड़ी रहती है, जो चलती नहीं। मीलों चल जाए चाक, कील अपनी जगह ही बनी रहती है। कील ठहरी हुई है। और मजा यह है कि ठहरी हुई कील के आधार पर ही चाक का घूमना होता है। अगर कील भी घूम जाए, तो चाक इसी वक्त गिर जाए और रुक जाए। चाक चलता है इसलिए, क्योंकि कील ठहरी है। इस कील और चाक के बीच गहरा समझौता है। कील के ठहरे होने पर चाक की गति है।

जीवन तो पूरा ही बदलता रहता है चाक की तरह, इसलिए हमने उसे संसार कहा है। संसार का अर्थ होता है, दि व्हील, उसका अर्थ होता है, चाक, घूमता हुआ। चाक की तरह है संसार तो। लेकिन क्या कुछ कील भी है इस संसार में?

क्योंकि भारतीय मनीषा का ऐसा अनुभव है कि जहां भी परिवर्तन हो, उसके आधार में कुछ जरूर होगा, जो अपरिवर्तित है। जहां गति हो, वहां केंद्र में कुछ होगा, जो ठहरा हुआ है। जहां तूफान हो, वहां बिंदु होगा बीच में कोई एक, जहां परम शांति है। क्योंकि जीवन विपरीत के बिना असंभव है। जन्म होगा, तो मृत्यु होगी। गति होगी, तो कोई ठहरा हुआ होगा। चाक होगा, तो कील होगी।

विपरीत अनिवार्य है। दिखाई पड़े, न दिखाई पड़े; समझ में आए, न समझ में आए; विपरीत अनिवार्य है। विपरीत के बिना जीवन के खेल का कोई उपाय नहीं है।

परम वचन का अर्थ है, जब सारे सत्य बदल जाते हैं, सारे दर्शन और धर्म बदल जाते हैं, सिद्धांत बदल जाते हैं, चिंतन की धाराएं बदल जाती हैं, तब भी जो ठहरा ही रहता है, जिसमें कोई अंतर नहीं पड़ता। ऐसे कुछ वचन कृष्ण अर्जुन से कहना चाहते हैं।

एक और कीमती बात इस सूत्र में उन्होंने कही है। और वह कहा है कि तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए, तेरे हित की इच्छा से कहूंगा।

एक तो परम सत्य केवल उनसे ही कहे जा सकते हैं, जो अतिशय प्रेम से भरे हों। एक सिम्पैथी, एक गहरी सहानुभूति चाहिए। क्षुद्र बातें कहने के लिए सहानुभूति की कोई भी जरूरत नहीं है। जितनी गहरी कहनी हो बात, उतना गहरा संबंध चाहिए। दो व्यक्तियों के बीच जितना गहरा हो संबंध, उतने ही गहरे सत्य संवादित किए जा सकते हैं। तो सत्य कह देना, सिर्फ कह देने वाले पर निर्भर नहीं है। सत्य कहना, सुनने वाले पर भी उतना ही निर्भर है, जितना कहने वाले पर।

कृष्‍ण अर्जुन से ये सत्य कह सके, क्योंकि एक बहुत गहरी मैत्री और गहरे प्रेम का संबंध था। ठीक यही सत्य हर किसी से नहीं कहे जा सकते। जब सत्य कहा जाता है, तो कहने वाला और सुनने वाला, दोनों एक ऐसी समरसता में होने चाहिए, जहां सत्य कहा जा सके, और सुना भी जा सके। प्रेम वैसा द्वार है, जहां से गहरी बातें की जा सकती हैं।

सिर्फ पूरब ही इस राज को समझ पाया। पश्चिम में शिक्षक होते हैं, लेकिन गुरु केवल पूरब की उत्पत्ति है। गुरु मात्र शिक्षक नहीं है। गुरु और शिक्षक में यही फर्क है। शिक्षक को प्रयोजन नहीं है कि विद्यार्थी का कोई संबंध भी है उससे या नहीं। उसे जो कहना है, वह कह देगा; वह एकतरफा है, वन वे ट्रैफिक है।

शिक्षक स्कूल में पढ़ा रहा है, यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहा है। विद्यार्थी सहानुभूति से सुन रहा है, श्रद्धा से सुन रहा है, सुन भी रहा है, नहीं सुन रहा है, ये बातें प्रयोजनीय नहीं हैं। शिक्षक जैसे दीवाल से बोल रहा हो। यह प्रोफेशनल, व्यावसायिक वक्तव्य है। दूसरे से कोई प्रयोजन नहीं है, शिक्षक को बोलने से प्रयोजन है। उसे जो कहना है, वह कह देगा।

गुरु और शिक्षक में यही अंतर है। गुरु जो कहना है, वह तभी कह सकेगा, जब सुनने वाला तैयार हो। जब सुनने वाला खुला हो, उम्मुक्त हो, उसके हृदय के द्वार बंद न हों। और जब सुनने वाला सिर्फ सुनने वाला ही न हो, बल्कि अपने को रूपांतरित करने की आकांक्षा से भी, अभीप्सा से भी भरा हो। और जब कि सुनने वाला केवल सत्य की खोज में ही न आया हो, बल्कि उस व्यक्ति के प्रेम का आकर्षण भी उसे खींचा हो।

ध्यान रहे कि जहां प्रेम नहीं है, जहां एक आंतरिक संबंध, एक इंटिमेसी नहीं है, वहां सत्य नहीं कहे जा सकते।

महावीर के पास एक युवक आया है। और वह जानना चाहता है कि सत्य क्या है। तो महावीर कहते हैं कि कुछ दिन मेरे पास रह। और इसके पहले कि मैं तुझे कहूं, तेरा मुझसे जुड़ जाना जरूरी है।

एक वर्ष बीत गया है और उस युवक ने फिर पुन: पूछा है कि वह सत्य आप कब कहेंगे? महावीर ने कहा कि मैं उसे कहने की निरंतर चेष्टा कर रहा हूं लेकिन मेरे और तेरे बीच कोई सेतु नहीं है, कोई ब्रिज नहीं है। तू अपने प्रश्न को भी भूल और अपने को भी भूल। तू मुझसे जुड्ने की कोशिश कर। और ध्यान रख, जिस दिन तू जुड़ जाएगा, उस दिन तुझे पूछना नहीं पड़ेगा कि सत्य क्या है? मैं तुझसे कह दूंगा।

फिर अनेक वर्ष बीत गए। वह युवक रूपांतरित हो गया। उसके जीवन में और ही जगत की सुगंध आ गई। कोई और ही फूल उसकी आत्मा में खिल गए। एक दिन महावीर ने उससे पूछा कि तूने सत्य के संबंध में पूछना अनेक वर्षों से छोड़ दिया? उस युवक ने कहा, पूछने की जरूरत न रही। जब मैं जुड़ गया, तो मैंने सुन लिया। तो महावीर ने अपने और शिष्यों से कहा कि एक वक्त था, यह पूछता था, और मैं न कह पाया। और अब एक ऐसा वक्त आया कि मैंने इससे कहा नहीं है और इसने सुन लिया!

महावीर की परंपरा कहती है कि महावीर ने अपने गहनतम सत्य वाणी से उदघोषित नहीं किए, उन्होंने वाणी से नहीं कहे। जो सुन सकते थे, उन्होंने सुने; महावीर ने कहे नहीं।

यह बहुत मजेदार बात है। इससे उलटी बात भी सही है, कि जो नहीं सुन सकते हैं, उनसे महावीर कितना ही कहें, तो भी नहीं सुन सकते। सुनना एक बहुत बड़ी कला है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं कि तुझसे कहूंगा, क्योंकि तू अतिशय प्रेम से भरा है। अतिशय प्रेम! साधारण प्रेम भी कृष्‍ण ने नहीं कहा। कहा, अतिशय प्रेम। इतने प्रेम से भरा है, जहां आदमी प्रेम में पागल हो जाता है।

पागल होने से कम में वह घटना नहीं घटती, जिसे हम आंतरिक संबंध कहें। अगर प्रेम भी बुद्धिमान हो, तो होता ही नहीं। अगर प्रेम भी गणित की तरह हिसाब—किताब से हो, तो होता ही नहीं। प्रेम तो जब होता है, तब अतिशय ही होता है।

एक मजे की बात है, प्रेम में कोई मध्य स्थिति नहीं होती; अतियां होती हैं, एक्सट्रीम्स होती हैं। या तो प्रेम होता ही नहीं, एक अति। और या प्रेम होता है, तो बिलकुल पागल होता है; दूसरी अति। प्रेम में मध्य नहीं होता। इसलिए प्रेम में बुद्धिमान आदमी खोजने बहुत मुश्किल हैं। कोई मध्य बिंदु नहीं होता।

कनफ्यूशियस ने कहा है कि बुद्धिमान आदमी मैं उसको कहता हूं जो मध्य में ठहर जाए। कनफ्यूशियस  एक गांव में गया। गांव के रास्ते पर ही था कि एक गांव के निवासी से मिलना हुआ। तो कनफ्यूशियस  ने पूछा कि तुम्हारे गांव में सबसे ज्यादा बुद्धिमान आदमी कौन है? तो उस आदमी ने उस आदमी का नाम लिया, जो गांव मे सबसे ज्यादा बुद्धिमान था। कनफ्यूशियस  ने पूछा कि उसे बुद्धिमान मानने का कारण क्या है? तो उस ग्रामीण ने कहा, कारण है कि वह अगर एक कदम भी उठाए, तो तीन बार सोचता है। इसलिए गांव उसे बुद्धिमान कहता है। कनफ्यूशियस  ने कहा कि मैं उसे बुद्धिमान न कहूंगा। क्योंकि जो एक ही बार सोचता है, वह कम बुद्धिमान है। और जो तीन बार सोचता है, वह दूसरी अति पर चला गया। दो बार सोचना काफी है। मध्य में रुक जाना चाहिए।

बुद्धिमान आदमी को मध्य में रुक जाना चाहिए। लेकिन प्रेम में कोई मध्य नहीं होता, इसलिए तथाकथित बुद्धिमान आदमी प्रेम से वंचित रह जाते हैं। प्रेम में होती है अति। कनफ्यूशियस खुद भी प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम में मध्य होता ही नहीं। या तो इस पार, या उस पार।

तो कृष्‍ण कहते हैं, तेरा अतिशय प्रेम है मेरे प्रति, इसलिए तुझसे कहूंगा। अतिशय, टु दि एक्सट्रीम, आखिरी सीमा तक, जहां अति हो जाती है।

जब प्रेम अतिशय होता है, तो सोच—विचार बंद हो जाता है। और जहां सोच—विचार बंद होता है, वहीं आंतरिक संवाद हो सकते हैं। जहां तक सोच—विचार जारी रहता है, वहां तक संदेह काम करता है, वहां तक डाउट काम करता है।

अगर कृष्ण को परम वचन कहने हैं, तो ऐसी अवस्था चाहिए अर्जुन की, जहां सोच—विचार बंद हो। जहां अर्जुन सुने तो जरूर, सोचे नहीं। जहां अर्जुन खुला तो हो, लेकिन उसके भीतर विचारों की बदलिया न हों। जहां अर्जुन आतुर तो हो, लेकिन अपनी कोई धारणाएं न हों। जहां अर्जुन के पास अपने कोई सिद्धात न हों, अपनी कोई समझ न रह जाए।

शिष्य बनता ही कोई तभी है, जब उसे पता चलता है कि अपनी कोई समझ काम नहीं पड़ेगी। तभी समर्पण है, उसी अतिशय क्षण में समर्पण है।

कृष्‍ण कहते हैं, तेरे अतिशय प्रेम के कारण मैं तुझसे परम वचन कहूंगा। और एक बात कहते हैं कि तेरे हित के लिए। इसे थोड़ा समझ लें।

ऐसे सत्य भी कहे जा सकते हैं, जिनसे किसी का हित न होता हो। ऐसे सत्य भी कहे जा सकते हैं, जिनसे किसी का अहित होता हो। ऐसे सत्य भी खोजे जा सकते हैं, जिनसे अकल्याण हो। विज्ञान ऐसे बहुत—से सत्यों को खोज रहा है, जिनसे अहित होगा, अहित हो रहा है। अभी पश्चिम के अनेक विचारशील वैज्ञानिक यह सोचने लगे हैं कि सभी सत्य हितकारी नहीं हैं। इसलिए किसी बात का सत्य होना काफी नहीं है।

और फ्रेड्रिक नीत्शे ने तो एक बहुत अनूठी बात कही है। उसने कहा है कि बहुत बार तो असत्य भी हितकारी होते हैं। अगर सभी सत्य हितकारी नहीं होते, तो दूसरी बात भी सही हो सकती है कि असत्य भी हितकारी हो सकते हैं। और नीत्शे ने यह भी कहा है कि यह जो आज के मनुष्य के चित्त की इतनी विकृत दशा है, इसका एक मात्र कारण यह है कि हम बिना समझे—जूझे कि क्या हितकर है और क्या अहितकर है, निपट सत्य की खोज में लगे हुए हैं। सत्य अपने आप में मूल्यवान नहीं है। सत्य भी एक डिवाइस, एक उपाय है। सत्य भी कहीं पहुंचने का साधन है।

मनुष्य का परम मंगल, जिस सत्य से फलित हो, कृष्‍ण कहते हैं, वह मैं तुझसे कहूंगा, तेरे हित के लिए।

अब यह बहुत सोचने जैसी बात है। हम आमतौर से सोचते हैं कि सत्य तो अपने आप में हितकारी है। और हममें से बहुत—से लोग सत्य का इस तरह उपयोग करते हैं, जिससे दूसरे को नुकसान पहुंचे। इतना काफी नहीं है। मंगल ध्यान में रखना जरूरी है। और इसलिए कृष्‍ण उसी सत्य की बात करेंगे, जो अर्जुन के लिए मंगलकारी है, जो उसके जीवन को रूपांतरित करे।

सत्य की भी अंतिम कसौटी आनंद ही होगी। इसे थोड़ा ठीक से समझ लें। सत्य की एक कसौटी तो तर्क है, कि जो तर्क से सिद्ध हो वह सत्य है। सत्य की परम कसौटी आनंद है, कि जिससे आनंद फलित हो, वह सत्य है।


 तर्क अपने आप में व्यर्थ है— निष्पत्ति! और सत्य अपने आप में अर्थपूर्ण नहीं है— आनंद!

कृष्‍ण कहते हैं, तेरे हित की कामना से, तेरे हित की इच्छा से कहूंगा। यहां कोई सत्य को कहना ही मेरा प्रयोजन नहीं है। और न ही सत्य को सिद्ध करना प्रयोजन है। तेरा हित, तेरा कल्याण, तेरा आनंद फलित हो सके, इस दृष्टि से कहूंगा।

यहां धर्म और साधारण विचार में फासले पड़ जाते हैं। एक आदमी कहता है, ईश्वर है, क्या यह सत्य है? एक आदमी कहता है, मुक्ति है, क्या यह सत्य है? सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि जिन्होंने मुक्ति की बात कही, उनके चेहरों में देखें और उनकी आंखों में झांकें। और जिन्होंने ईश्वर को कहा कि है, उनके जीवन की सुगंध और उनके जीवन के प्रकाश को देखें। और जिन्होंने कहा, ईश्वर नहीं है, उनके जीवन के आस—पास जो अंधेरा घिर गया है, उसे देखें।

ईश्वर का होना सत्य है या नहीं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। जो, ईश्वर है, इस आधार पर जीता है, उसके होने में एक और तरह की सुगंध है, एक और तरह के जगत का आविर्भाव हो जाता है, पंख लग जाते हैं, वह किसी और आकाश में उड़ने लगता है।

यह सवाल नहीं है कि बुद्ध ने जो कहा है, वह सही है या गलत। बुद्ध का होना ही काफी प्रमाण है। यह भी सवाल नहीं है कि नीत्शे ने जो कहा, वह सही है या गलत। नीत्शे का होना ही काफी प्रमाण है। नीत्शे ने बहुत तर्कयुक्त बातें कहीं, लेकिन जीवन का अंत पागलखाने में हुआ। नीत्शे ने बहुत तर्कयुक्त बातें कही हैं। संभवत: मनुष्य—जाति के इतिहास में नीत्शे के मुकाबले दूसरा आदमी खोजना कठिन है, जो इतना तर्कयुक्त हो, और जिसने सत्य के संबंध में ऐसी तार्किक खोज की हो। लेकिन नीत्शे का अंत एक पागलखाना है। और नीत्शे का पूरा जीवन दुख की एक लंबी कथा है, जहां सिवाय उदासी के और पीड़ा के और संताप के कुछ भी नहीं है। नीत्शे का तर्क हम देखें या नीत्शे को देखें?

कृष्‍ण ने जो कहा, वह तर्कयुक्त है या नहीं, उसे हम देखें, या कृष्‍ण को और कृष्‍ण की बांसुरी को देखें? नीत्शे को और कृष्‍ण को देखने चलें, तो ही पता चलेगा कि सत्य भी सप्रयोजन है। समस्त सिद्धांत सप्रयोजन हैं। उनसे मनुष्य का हित, उनसे मनुष्य का मंगल सधता है या नहीं सधता है?

तो कृष्‍ण ने कहा है कि मैं तेरे हित की दृष्टि से यह परम वचन कहूंगा।

हे अर्जुन, मेरी उत्पत्ति को अर्थात विभूतिसहित लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि कारण हूं।

मेरी उत्पत्ति को, मेरी विभूति को, मेरे सत्य को न देवता जानते हैं और न महर्षि!

बहुत आश्चर्यजनक वचन है। और परम श्रद्धा हो, तो ही समझ में आ सकता है। देवता भी नहीं जानते, और जिन्हें हम जानने वाले कहते हैं, वे महर्षि भी नहीं जानते मेरी उत्पत्ति को। क्यों नहीं जानते? तीन बातें।

एक तो, इस जगत का जो भी मूल आधार है, उस मूल: आधार को कोई भी नहीं जान सकेगा, क्योंकि वह मूल आधार सभी के होने के पहले है। देवता नहीं थे, तब भी वह था; और महर्षि जब नहीं थे, तब भी वह था।

मैं अपनी आंखों से सबको देख सकता हूं अपनी आंखों भर को नहीं देख सकता। मैं अपनी आंखों से आंखों के बाहर सब कुछ देख सकता हूं आंखों के पीछे नहीं देख सकता। मैं अपनी इस मुट्ठी से सब कुछ पकड़ सकता हूं लेकिन इस मुट्ठी को ही नहीं पकड़ सकता। जो मौलिक है, जो मूल है, जिससे देवता भी पैदा होते और महर्षि भी, जिससे सब पैदा होते हैं और जिसमें सब लीन हो जाते हैं, उसके जन्म को, उसके होने को, उसके अस्तित्व के मूल कारण को कोई भी नहीं देख पाएगा। कोई उपाय नहीं है। उसका स्वयं का वक्तव्य ही केवल एकमात्र वक्तव्य है। और उस वक्तव्य को श्रद्धा के अतिरिक्त स्वीकार करने का और कोई उपाय नहीं है।

महर्षि तो हम कहते ही उसे हैं, जो जानता है। लेकिन कृष्‍ण के इस सूत्र का अर्थ हुआ कि जो जानते हैं, वे भी नहीं जानते। तब महर्षि का एक और भी परम गुह्य अर्थ प्रकट होगा। तब जो सोचते हैं कि महर्षि हैं, वे महर्षि नहीं हैं। तब तो केवल वे ही जानते हैं, जो इस अनुभव पर आ जाते हैं कि उन्हें कुछ भी पता नहीं है। कोई सुकरात, कोई उपनिषद का ऋषि, जो कहता है कि मुझे कुछ भी पता नहीं, वही, शायद उसे ही थोड़ा पता लगा है।

नहीं जान सकेगा कोई भी, क्योंकि हम सब उसके हिस्से हैं। सागर तो बूंद को जान सकता है, बूंद सागर को जानेगी भी तो कैसे! और वृक्ष की पत्तियां जड़ों से बंधी हैं, लेकिन जड़ों को जानेगी तो कैसे! और वृक्ष की पत्तियां अगर उस बीज को जानना चाहें, जिससे वृक्ष हुआ, तो उस बीज को कैसे जानेगी! जिससे सब हुआ है, वह अज्ञात ही रहेगा, अज्ञेय ही रहेगा।

मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते, न महर्षि, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदि कारण हूं।

समस्त दिव्यता मेरा ही रूप है, और समस्त ज्ञान मेरा ही ज्ञान है। मेरा ही ज्ञान लौटकर मुझे नहीं जान पाएगा, जैसे मेरी ही आंख लौटकर मुझे नहीं जान पाएगी। लेकिन आख एक काम कर सकती है। दर्पण में अपने को देख सकती है। यद्यपि दर्पण में जो दिखाई पड़ता है, वह आंख नहीं है; केवल प्रतिबिंब है, केवल छाया है। ऋषियों ने भी जिसे जाना है, वह भी परमात्मा की छाया है, परमात्मा नहीं। और देवता भी जिसकी अर्चना करते हैं, वह परमात्मा का प्रतिबिंब है, परमात्मा नहीं।

जिस दिन प्रतिबिंब भी छूट जाते हैं, जिस दिन जानने वाला भी अपने को भूल जाता है, जिस दिन जानने वाला भी शेष नहीं रहता, उस दिन! लेकिन उस दिन ऋषि ऋषि नहीं होता; देवता देवता नहीं होता; उस दिन तो लहर खो जाती है सागर में और सागर ही हो जाती है।'

कृष्‍ण महर्षि नहीं हैं, और उन्हें महर्षि न कहने का यही कारण है। वे कोई ज्ञाता नहीं हैं, और न कृष्‍ण कोई देवता हैं। कृष्ण अपने को छोड़ दिए हैं उस परम के साथ। कृष्‍ण अब नहीं हैं, अब वह परम ही अपनी अभिव्यक्ति उनके द्वारा कर रहा है।


तो कृष्‍ण कहते हैं, न मुझे ऋषि जानते हैं, न मुझे देवता जानते हैं, क्योंकि मैं उनका भी आदि कारण हूं, मैं उनसे भी पहले हूं। और जो मेरे को अजन्मा, अनादि तथा लोकों का महान ईश्वर तत्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।

तब फिर क्या किया जाए? महर्षि नहीं जानते, ज्ञानी नहीं जानते, दिव्य पुरुष नहीं जानते, फिर क्या किया जाए? फिर इस परम तत्व को जानने के लिए क्या है उपाय?

तो कृष्‍ण कहते हैं, जो मेरे को अजन्मा।

अब यह बड़ी कठिन बात शुरू हुई। और मनुष्य की श्रद्धा की कसौटी वहां है, जहां कठिन बात शुरू होती है। अति कठिन, बल्कि कहें असंभव।


और जब बुद्धि किसी असंभव को मानती है, तो बुद्धि टूट जाती है और शून्य हो जाती है। असंभव से टकराकर नष्ट होती है बुद्धि। असंभव से टकराकर विचार खो जाते हैं। असंभव की स्वीकृति के साथ ही अहंकार को खड़े होने की जगह नहीं मिलती। यह असंभव की बात शुरू होती है। यह आपने बहुत बार गीता में पढ़ी होगी और आपको कभी खयाल में न आया होगा कि असंभव है।

और जो मेरे को अजन्मा, कृष्ण कहते हैं, जो मुझे मानते हैं अजन्मा,  जो कभी पैदा नहीं हुआ। अनादि, जिसका कोई प्रारंभ नहीं है। ऐसा जो मुझे तत्व से मानते हैं, ऐसा ईश्वर, वे मनुष्यों में ज्ञानवान पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं।

यह अत्यंत कठिन बात है। इसे हम थोड़ा समझें। हम सभी जानते हैं, तथाकथित धार्मिक लोग लोगों को समझाते हैं कि ईश्वर है। क्योंकि अगर ईश्वर न होगा, तो जगत को बनाया किसने? आस्तिक सोचते हैं, बडी गहरी दलील दे रहे हैं। बहुत बचकानी है दलील। आस्तिक सोचते हैं कि बड़ी गहरी दलील दे रहे हैं कि अगर ईश्वर न होगा, तो जगत को बनाया किसने? आस्तिक कहते हैं कि एक छोटा—सा घड़ा भी बनाना हो, तो कुम्हार की जरूरत होती है। अगर घड़ा है, तो कुम्हार भी रहा होगा। होगा। बिना बनाए घड़ा भी नहीं बन सकता। और इतना विराट, इतना व्यवस्थित जगत बिना ईश्वर के बनाए नहीं बन सकता।

आस्‍तिक यह दलील शायद इसलिए देते हैं कि उनकी बुद्धि भी, जगत बिना बनाया है, ऐसा मानने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन उन्‍हें पता नहीं है कि एक ही कदम आगे बढ़कर मुसीबत शुरू हो जाएगी। और नास्तिक पूछते हैं कि अगर जगत बिना बनाया नहीं बन सकता, तो तुम्हारे ईश्वर को किसने बनाया है? और तब आस्तिक के पैर के नीचे से जमीन खिसक जाती है। तब अक्सर आस्तिक क्रोध में आ जाएगा, क्योंकि आस्तिक बड़े कमजोर हैं। वह कहेगा, ईश्वर को बनाने वाला कोई भी नहीं है।

लेकिन तब उसके अपने ही तर्क के प्राण निकल गए। और नास्तिक उससे कहता है कि अगर ईश्वर को बनाने वाले की कोई जरूरत नहीं है, तो तुम स्वीकार करते हो कि बिना बनाए भी कुछ हो सकता है। तो फिर जगत के ही बिना बनाए होने में कौन—सी तकलीफ है! तत्वत: यह स्वीकार करते हो कि कुछ हो सकता है जो बिना बनाया है, तो इस जगत को क्या अड़चन है! और जब यह मानना ही है, तो जगत पर ही रुक जाना बेहतर है, और एक ईश्वर को बीच में लाने की क्या जरूरत है? यहां आपको तकलीफ होगी।

कृष्‍ण कहते हैं कि वही मुक्त होगा अज्ञान से, जो मुझे अजन्मा जानता है। जो मुझे मानता है कि मेरा कोई जन्म नहीं, और मैं हूं; और मेरा कोई प्रारंभ नहीं, और मैं हूं।

इसलिए जो छोटा—मोटा आस्तिक है, वह तो दिक्कत में पड़ेगा, क्योंकि उसकी तो सारी तर्क की व्यवस्था ही यही है कि अगर कुछ है, तो उसका बनाने वाला चाहिए। इसलिए हमने ईश्वर को भी स्रष्टा, दि क्रिएटर, बनाने वाला, इस तरह के शब्द खोज लिए हैं, जो कि गलत हैं।

ईश्वर बनाने वाला नहीं है, ईश्वर अस्तित्व है। वही है। उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो हमें दिखाई पड़ रहा है, वह कोई ईश्वर से भिन्न और अलग नहीं है। उसकी ही अभिव्यक्ति है, उसका ही एक अंश है, उसका ही एक हिस्सा है। सागर का ही एक हिस्सा लहर बन गया है। अभी थोड़ी देर बाद फिर सागर हो जाएगा। फिर लहर बन जाएगा। लहर सागर से अलग नहीं है।

यह जो सृष्टि है...। हमारे शब्द में ही कठिनाई घुस गई है, हमने सोचते—सोचते इसको सृष्टि ही, क्रिएशन ही कहना शुरू कर दिया है। यह जो दिखाई पड़ रहा है हमें चारों तरफ, यह जो प्रकृति है, यह प्रकृति परमात्मा का ही हिस्सा है। यह उतनी ही अजन्मी है, जैसा परमात्मा अजन्मा है।

लेकिन तब बिना बनाए कोई चीज हो सकती है? बिना प्रारंभ के कोई चीज हो सकती है? हमारा प्रारंभ है, हमारा जन्म होता है; हमारी मृत्यु होती है। हम जगत में ऐसी किसी चीज को नहीं जानते, जिसका प्रारंभ न होता हो और अंत न होता हो। सभी चीजें शुरू होती हैं, और सभी चीजें समाप्त हो जाती हैं। आप किसी ऐसे अनुभव को जानते हैं जिसका प्रारंभ न हो, अंत न हो? हमारे अनुभव में ऐसा कोई भी अनुभव नहीं है। इसीलिए इस सूत्र को स्वीकार करने में बुद्धि को अड़चन है, भारी अड़चन है।

अजन्मा, अनादि, ऐसा जो मुझे मानता है, ऐसा जो मुझे जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान है और संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान कुछ दूसरे ही प्रकार का ज्ञान है। जितना हम सोचेंगे, जितना हम विचार करेंगे, उतना ही हमें मालूम पड़ेगा कि सब चीजों का प्रारंभ है और सब चीजों का अंत है। कहीं चीज शुरू होती है और कहीं समाप्त होती है। जन्म होता है कहीं, मृत्यु होती है कहीं। हम खुद अपने ही भीतर खोज करें, तो कुछ पता नहीं चलता कि जन्म के पहले भी हम थे, कि मृत्यु के बाद भी हम होंगे!


नहीं, इस अस्तित्व का न कोई प्रारंभ है, और न कोई अंत है। हो भी नहीं सकता। वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि हम रेत के एक छोटे—से कण को भी नष्ट नहीं कर सकते। तोड़ सकते हैं, बदल सकते हैं, रूप दूसरा हो सकता है, लेकिन विनाश असंभव है। और वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि हम रेत के एक छोटे—से नये कण को निर्मित भी नहीं कर सकते।

इस जगत की जो भी गुणात्मक, परिमाणात्मक स्थिति है, वह उतनी की उतनी ही है, उसमें रत्तीभर न कभी बढ़ता है और न कभी घटता है। क्योंकि घटने या बढ़ने का अर्थ होगा, या तो शून्य से कोई चीज पैदा हो और जगत में बढ जाए; घटने का अर्थ होगा, कोई चीज खो जाए और शून्य में लीन हो जाए। लेकिन इस जगत के बाहर न कोई स्थिति है, न कोई स्थान है, न कोई उपाय है।

ईश्वर का अर्थ है, दि टोटेलिटी। इस संपूर्ण अस्तित्व का धार्मिक नाम ईश्वर है। विज्ञान जिसे एक्सिस्टेंस कहता है, अस्तित्व कहता है, प्रकृति कहता है, धर्म उसे ही परमात्मा कहता है।

कृष्ण कहते हैं, जो मुझे अजन्मा, अनादि, ऐसा जानने में समर्थ हो जाए, वह सब पापों के पार हो जाता है।

लेकिन क्यों? अगर आप जान भी लें कि ईश्वर का कोई प्रारंभ नहीं, कोई अंत नहीं, तो आप पाप के पार कैसे हो जाएंगे? यह बहुत अजीब—सी बात है। मैं चोर हूं मैं बेईमान हूं मैं हत्यारा हूं। अगर मैं यह जान भी लूं कि ईश्वर का कोई जन्म नहीं और ईश्वर का कोई अंत नहीं, तो मैं पाप के क्यों पार हो जाऊंगा? मेरे इस जान लेने से मेरे पाप के विसर्जन का क्या संबंध है? यह और भी जटिल बात है। लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है।

जैसे ही मैं यह जान लूं कि ईश्वर का कोई प्रारंभ नहीं है और ईश्वर का कोई अंत नहीं है, वैसे ही मुझे यह भी पता चल जाता है कि मेरा भी कोई प्रारंभ नहीं है और मेरा भी कोई अंत नहीं है। वैसे ही मुझे यह भी पता चल जाता है कि आपका भी कोई प्रारंभ नहीं है, आपका भी कोई अंत नहीं है। तो मैंने जो हत्याएं की हों या मेरी हत्या की गई हो, मैंने जो पाप किए हों या मेरे साथ पाप किए हों, वे सब मूल्यहीन हो जाते हैं। एक शाश्वत जगत में खेल से ज्यादा उनकी स्थिति नहीं रह जाती। एक अभिनय और एक नाटक से ज्यादा उनका मूल्य रह जाता।

अगर मैं मृत्यु के बाद भी शेष रहता हूं और जन्म के पहले भी मैं था, तो जीवन में जिन बातों का हम बहुत मूल्य मान रहे हैं, वे मूल्यहीन हो जाती हैं। तब स्थिति केवल यह हो जाती है कि जैसे एक मंच पर एक नाटक चलता हो, रामलीला चलती हो, और मंच के पात्र पर्दे के पीछे जाकर गपशप करते हों। यहां राम की सीता खो जाती हो और राम छाती पीटते हों और वृक्षों से पूछते हों कि सीता कहां है! और पीछे, पर्दे के पीछे बैठकर भूल जाते हों सीता को, सीता के खो जाने को, आंसुओ को। क्यों?

अगर यह मंच ही सब कुछ है और मंच के पहले राम का कोई अस्तित्व नहीं है और मंच के बाद भी राम का कोई अस्तित्व नहीं है, तो फिर बहुत कठिनाई है, फिर जिंदगी बहुत वास्तविक हो जाएगी।

लेकिन मंच पर आने के पहले भी राम हैं, मंच से उतर जाने के बाद भी राम हैं, तो राम होना एक पात्र, एक लीला का हिस्सा रह गया; और राम की जो सातत्यता है, जो कंटिन्युटी है, जो भीतर का अस्तित्व है, वह अंतहीन, अनादि हो गया। उसमें न मालूम कितनी लीलाएं होंगी, न मालूम कितनी लीलाएं होंगी और न मालूम कितने युद्ध होंगे, लेकिन अब उन युद्धों का मूल्य एक नाटक से ज्यादा नहीं रहा।

इसलिए हमने राम के इस पूरे खेल को रामलीला कहा है। उसको हमने बहुत सोचकर लीला कहा है। कृष्‍ण के जीवन को हमने कृष्णलीला कहा है, बहुत सोचकर। लीला का अर्थ है कि इसका मूल्य अब खेल से ज्यादा नहीं है।

एक लहर उठी है सागर में, हवाओं में, थपेड़ों में। उछलेगी, कूदेगी, नाचेगी, सूरज से मिलने की होड़ करेगी, फिर गिर जाएगी, खो जाएगी। अनेक बार उठी है यह लहर पहले भी, अनेक बार बाद में भी उठेगी। अगर यह लहर यह जान जाए कि जब मैं नहीं उठी। थी, तब भी थी, और जब गिर जाऊंगी, तब भी रहूंगी, तो फिर इस  लहर का होना एक खेल हो गया। तब इसमें से भार, गंभीरता, बोझ विलीन हो गया। तब मिटना भी एक आनंद है, होना भी एक आनंद है, न हो जाना भी एक आनंद है। क्योंकि न होकर भी हम मिटते नहीं हैं, और होकर भी हम नये नहीं होते हैं। एक सातत्य है, एक कंटीनम है।

यह शब्द वैज्ञानिक है। आइंस्टीन ने इस शब्द का उपयोग किया है, कंटीनम, एक सातत्य। चीजें सदा हैं। इसलिए चीजों का जो रूप आज दिखाई पड़ता है, वह बहुत मूल्यवान नहीं रह जाता। तब पाप भी मूल्यवान नहीं है और पुण्य भी मूल्यवान नहीं है। तब मैंने जो किया, वह मूल्यवान नहीं है, वरन मैं जो हूं वही मूल्यवान है। तब मेरे साथ जो किया गया, वह भी मूल्यवान नहीं है; तब होना, बीइंग कीमत की चीज है। डूइंग, करना गैर—कीमती चीज है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, जो जान लेगा इस सातत्य को—जो मेरे अजन्मा होने को, अनादि, अनंत होने को जान लेगा—वह सब पापों के पार हो जाएगा।

लेकिन कोई चाहे कि पापों के पार होना है, इसलिए मान लो कि कृष्‍ण अनादि हैं, अजन्मा हैं, भगवान का होना सदा से है— इस भूल में आप मत पड़ना। इससे पाप नष्ट नहीं होंगे। यह आप जान लेंगे, तो पाप नष्ट हो जाएंगे। लेकिन आप पाप नष्ट करने के लिए ही अगर इसको मान लेंगे, तो पाप नष्ट नहीं होंगे।

पाप तो हम सभी नष्ट करना चाहते हैं, लेकिन बिना ज्ञान की उस ज्योति को उपलब्ध हुए, जहां पाप का अंधेरा गिर जाता है। पाप हम नष्ट करना चाहते हैं, लेकिन ज्ञान की ज्योति को जन्माने की चेष्टा नहीं करना चाहते। तो फिर हम मानकर बैठ जाते हैं कि ठीक है, हम मानते हैं कि जान की ज्योति है, मानते हैं कि ईश्वर अजन्मा है। लेकिन जो भी हम करते हैं, उससे सिद्ध होता है कि न हमें ईश्वर का पता है, न उसके अजन्मा होने का पता है।

कृष्‍ण के सामने अर्जुन की तकलीफ यही है। अर्जुन कह यह रहा है कि मेरे मित्र हैं, प्रियजन हैं, सगे—संबंधी हैं, युद्ध में इनको काटू, यह बड़ा पाप है। इनसे लडूं, यह बड़ा पाप है। इससे तो अच्छा है, मैं संन्यास ले लूं। मैं यह सब छोड़ दूं। मैं भाग जाऊं, मैं विरत हो जाऊं।

कृष्‍ण उससे कह रहे हैं कि जब तक तू देख नहीं पा रहा है कि इन सारी लहरों के भीतर एक ही सागर है। जब ये लहरें नहीं थीं, तब भी वह सागर था; और जब कल ये लहरें सब गिर जाएंगी, तब भी सागर रहेगा। अगर तू इस अनादि, अजन्मा को देख ले, तो फिर तुझे यह जो पाप की और पुण्य की धारणा पैदा होती है, यह तत्काल विसर्जित हो जाए।

परम ज्ञानी के लिए न कोई पाप है और न कोई पुण्य। इसका यह अर्थ नहीं कि वह पाप करता है। वह पाप कर ही नहीं सकता। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह पुण्य नहीं करता। वह पुण्य ही कर सकता है। पुण्य और पाप की परिभाषा ज्ञानी के जीवन में दूसरी ही हो जाती है।

अभी हम उसे पाप कहते हैं, जो नहीं करना चाहिए, यद्यपि करते हैं। और उसे पुण्य कहते हैं, जो करना चाहिए और नहीं करते हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति ईश्वर के इस सातत्य को अनुभव करता है, वैसे ही पाप और पुण्य की परिभाषा बदल जाती है। तब वह व्यक्ति जो करता है, वह पुण्य कहलाता है। और वह जो नहीं करता है, वह पाप कहलाता है। और जो नहीं करता है, वह करना भी चाहे, तो नहीं कर सकता है। और वह जो करता है, अगर चाहे भी कि न करूं, तो बच नहीं सकता है।

पुण्य अनिवार्यता है ज्ञान में। और पाप अनिवार्यता है अज्ञान में। लाख उपाय करो, अज्ञान में पाप से बचा नहीं जा सकता, पाप होगा ही। और लाख उपाय करो, ज्ञान में पुण्य से बचा नहीं जा सकता; पुण्य होगा ही। ज्ञान में जो होता है, उसका नाम पुण्य है; और अज्ञान में जो होता है, उसका नाम पाप है। इसलिए अज्ञान में जिन्हें हम पुण्य समझकर करते हैं, वह हम समझते ही होंगे कि पुण्य हैं, वे पुण्य होते नहीं।

अज्ञान में एक आदमी मंदिर बनाता है भगवान का, तो सोचता है, पुण्य कर रहा है। लेकिन मंदिर जिस ढंग से बनाता है, जहां से पैसा खींचकर लाता है, उसे उसका कोई हिसाब नहीं है। मंदिर बनाता है शोषण से, सोचता है, पुण्य कर रहा हूं! और जिस पुण्य को करने के लिए भी पाप करना पड़ता हो, वह कितना पुण्य होता होगा!

और मंदिर बनाता है भगवान के नाम से, लेकिन तख्ती अपनी लगाता है। वह भगवान तो गौण है, वह जो मंदिर पर पत्थर लगता है अपने नाम का, वही असली बात है। मंदिर उसी के लिए बनाया जाता है। भगवान की प्रतिमा भी उसी पत्थर के लिए भीतर रखी जाती है। अहंकार जिस मंदिर में प्रतिष्ठित हो रहा हो, वह कितना पुण्य है?

इसलिए अज्ञानी कुछ भी करे, कितने ही मंदिर बनाए और कितनी ही तीर्थयात्राए करे—मक्का जाए, और जेरूसलम जाए, और काशी जाए, और जो भी करना चाहे करे— अज्ञानी कुछ भी करे, अज्ञान के कारण वह जो भी करेगा, वह पाप ही होगा। पुण्य के कितने ही मुलम्मे चढ़ाए और पुण्य के कितने ही वस्त्र ढांके, भीतर जब भी खोदकर जाएंगे, तो पाप ही मिलेगा।

इससे उलटी बात और भी कठिन है समझनी, कि ज्ञानी कुछ भी करे, पुण्य ही होगा। इसलिए तो कृष्ण उससे कह रहे हैं कि तू लड़ने की फिक्र छोड़, ज्ञान की फिक्र कर। और अगर तुझे ज्ञान मिल जाए, तो मैं तुझसे कहता हूं तू काट डाल इन सारे लोगों को, जो तेरे सामने खड़े हैं, और पाप नहीं होगा। और अगर ज्ञान न हो, तो तू भाग जा जंगल, चींटी को भी मत मार, फूंक—फूंककर पैर रख, और मैं तुझसे कहता हूं कि पाप ही होगा।

यह परम ज्ञान उस सातत्य के साथ अपना एकत्व अनुभव होने से होता है।

यह कठिन सूत्र है। फिर इस सूत्र को समझाने के लिए ही पूरा अध्याय है। इस सूत्र को खयाल में ले लें। इसमें परम वचन, ऐसा वचन कृष्‍ण कहने जाने की घोषणा कर रहे हैं, जिसे बुद्धि से नहीं समझा जा सकता, तर्क से जिस तक पहुंचने का उपाय नहीं है। हां, प्रेम और श्रद्धा का संबंध हो, तो संवाद हो सकता है। अर्जुन के हित की दृष्टि से कह रहे हैं। कहने का कोई मजा नहीं है।

एक तो आदमी होते हैं, जिन्हें कहने का मजा होता है। जिन्हें इससे प्रयोजन नहीं होता कि आपका कोई हित होगा, इसलिए कह रहे हैं। जिन्हें कहना है, जैसे कि खुजली खुजलानी है। उन्हें कुछ कहना है, वे कह रहे हैं। दिनभर हम जानते हैं चारों तरफ लोगों को, जो सुबह अखबार पढ़ लिए और फिर निकले किसी से कहने!

उनको कहना है। कहना उनके लिए बीमारी है। बिना कहे उनसे नहीं चलेगा। अगर उनको चार दिन अकेले बंद कर दो, तो वे दीवालों से बातचीत शुरू कर देंगे। जाना गया है ऐसा।

कारागृह में कैदी बंद होते हैं, तो थोड़े दिन के बाद दीवालों से बातचीत शुरू कर देते हैं। मकड़ी हो ऊपर, तो उससे बातचीत करने लगते हैं; छिपकली हो, तो उससे बातचीत करने लगते हैं। कोई न हो, तो अपने को ही दो हिस्सों में बांट लेते हैं। एक तरफ से प्रश्न उठाते हैं, दूसरी तरफ से जवाब देते हैं।

हम सभी करते रहते हैं। कोई न मिले, जरूरी भी नहीं। हमेशा श्रोता मिलना आसान नहीं। और जैसे दिन खराब आते जा रहे हैं, श्रोता बिलकुल नाराज है; सुनने को कोई राजी नहीं है। पति कुछ कहना चाहता है, पत्नी सुनने को राजी नहीं है। मां कुछ कहना चाहती है, बेटा सुनने को राजी नहीं है। बाप कुछ कहना चाहता है, कोई सुनने को राजी नहीं है! श्रोता मुश्किल होता जा रहा है। और बोलना है, कहना है! एक बीमारी है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं तेरे हित के लिए कहूंगा। कुछ कहने का सवाल नहीं है। लेकिन तेरे सुनने की घड़ी आ गई, तेरे सुनने का क्षण आ गया, वह परिपक्क मौका आ गया, जब तेरा हृदय राजी है, तो मैं तुझसे परम सत्य कहूंगा। और यह परम सत्य, इस सूत्र की व्याख्या होगी अंतत:, कि जीवन अजन्मा है, अनादि है। अस्तित्व का न कोई प्रारंभ है, न कोई अंत। और हम इस अस्तित्व में छोटी लहरों से ज्यादा नहीं। हमारे कृत्य इस परम विस्तार को ध्यान में रखकर सोचे जाएं, तो लीला मात्र, खेल मात्र रह जाते हैं।

अगर इस परम विस्तार को छोड़ दिया जाए, तो हमारे कृत्य बड़ी महिमा ले लेते हैं, बड़ी गरिमा ले लेते हैं, बड़े महत्वपूर्ण हो जाते हैं। और हम सबकी नजर इतनी छोटी है कि इस विस्तार को हम नहीं देख पाते।

विराट आकाश! और जितना आकाश आपको दिखता है, उतना ही नहीं है, यह तो आपकी आंख की कमजोरी की वजह से इतना दिखता है। यह आकाश और भी विराट है। तो एक बड़े दूरदर्शी यंत्र से देखिए। तब आपको दिखाई पड़ेगा कि जितने तारे आपको दिखाई पड़ते हैं, ये तो कुछ भी नहीं हैं। आपने हालांकि सोचा होगा, क्योंकि हमारी गणना कितनी है! आप रात में तारे देखते हैं? तो कहते हैं, असंख्य! गलती में मत पड़ना।

आम आंख से आदमी चार हजार तारों से ज्यादा तारे नहीं देखता। अच्छी से अच्छी आंख चार हजार तारे देखती है, बस। चूंकि आप गिन नहीं पाते, इसलिए सोचते हैं, असंख्य। लेकिन दूरदर्शक यंत्र से देखिए, तो तीन अरब तारे अब तक देखे जा चुके हैं। लेकिन वे तीन अरब तारे जगत की सीमा नहीं हैं। जगत उनके भी पार, उनके भी पार, उनके भी पार है। अब वैज्ञानिक कहते हैं, हम कहीं भी तय न कर पाएंगे कि जगत की सीमा है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

हरिओम सिगंल


सोमवार, 2 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 9 भाग 13

 क्षणभंगुरता का बोध



मां हि पार्थ व्यपाश्त्यि येऽपि स्युः पापयोनय:।

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रस्तिऽपि यान्ति परां गतिम्।। 32।।

किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। 33।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू।

मामेवैष्यीसि युज्ज्वैवमात्मानं मत्यरायण:।। 34।।




क्योंकि हे अर्जुन, स्त्री, वैश्य, शुद्रादिक तथा पाप योनि वाले भी जो कोई हों? वे भी मेरे शरण होकर परम गीत को ही प्राप्त होते हैं।

फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्रह्यणजन तथा राजऋषि भक्तजन परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस लोक की प्राप्‍त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।

केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो? और मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजने वाला हो? तथा मेरी श्रद्धा, भक्‍ति और प्रेम से विह्लतापूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ परमात्मा को ही प्रणाम कर।

इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त होवेगा।




 इस सूत्र को सुनकर आधुनिक मन को बहुत धक्का लगेगा। चाह होगी कि यह सूत्र न होता तो अच्छा था। आज का विचार इस सूत्र को बड़ी कठिनाई पाएगा समझने में।


कृष्ण ने कहा है, क्योंकि हे अर्जुन, स्त्री, वैश्य, शूद्र आदि तथा पाप योनि वाले भी जो कोई भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

बहुत अजीब मालूम पड़ेगा। बहुत कड़वाहट भी मालूम पड़ेगी। स्त्री को, वैश्य को, शूद्र को, पाप योनि को समझने में हमें कई तरह की कठिनाइयां हैं।  पहली कठिनाई कि हमने इन शब्दों से जो कुछ समझा है, वह इन शब्दों से अभिप्रेत नहीं है। और इन शब्दों का हमारे मन में जो अर्थ है, वह कृष्ण का अर्थ नहीं है। तो इन शब्दों की ठीक से व्याख्या में प्रवेश करना जरूरी है, तभी इस सूत्र को समझा जा सके।

मनुष्य की आत्मा तो एक है, लेकिन उसके मन अनेक हैं। और मनुष्य की परम स्थिति तो एक है, लेकिन उसकी बीच की स्थितियां भिन्न—भिन्न हैं। मनुष्य आत्यंतिक रूप से तो समान है, लेकिन ! अलग— अलग स्थितियों में बहुत असमान है।

मनुष्य का विभाजन जो भारतीय बुद्धि ने किया है, वह पहला विभाजन है स्त्री और पुरुष में। लेकिन ध्यान रहे, स्त्री से अर्थ है स्त्रैण। स्त्री से अर्थ स्त्री ही हो, तो यह वचन बहुत बेहूदा है। स्त्री से अर्थ है स्त्रैण। और जब मैं कहता हूं स्त्री से अर्थ है स्त्रैण, तो उसका अर्थ यह है कि पुरुषों में भी ऐसे व्यक्ति हैं, जो स्त्री जैसे हैं, स्त्रैण हैं; स्त्रियों में भी ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो पुरुष जैसे हैं, पौरुषेय हैं। पुरुष और स्त्री प्रतीक हैं, सिंबालिक हैं। उनके अर्थ को हम ठीक से समझ लें।

गुह्य विज्ञान में, आत्मा की खोज में जो चल रहे हैं, उनके लिए स्त्रैण से अर्थ है ऐसा व्यक्तित्व, जो कुछ भी करने में समर्थ नहीं है; जो प्रतीक्षा कर सकता है, लेकिन यात्रा नहीं कर सकता, जो राह देख सकता है, लेकिन खोज नहीं कर सकता। इसे स्त्रैण कहने का कारण है।

स्त्री और पुरुष का जो संबंध है, उसमें खोज पुरुष करता है, स्त्री केवल प्रतीक्षा करती है। पहल भी पुरुष करता है, स्त्री केवल बाट जोहती है। प्रेम में भी स्त्री प्रतीक्षा करती है, राह देखती है। और अगर कभी कोई स्त्री प्रेम में पहल करे, इनिशिएटिव ले, तो आक्रामक मालूम होगी, बेशर्म मालूम होगी। और अगर पुरुष प्रतीक्षा करे, पहल न कर सके, तो स्त्रैण मालूम होगा।

लेकिन विगत पांच हजार वर्षों में, गीता के बाद, सिर्फ आधुनिक युग में कार्ल गुस्ताव कं ने स्त्री और पुरुष के इस मानसिक भेद को समझने की गहरी चेष्टा की है। कं ने इधर इन  पिछले कुछ वर्षों में एक अभूतपूर्व बात सिद्ध की है, और वह यह कि कोई भी पुरुष पूरा पुरुष नहीं है और कोई भी स्त्री पूरी स्त्री नहीं है। और हमारा अब तक जो खयाल रहा है कि हर व्यक्ति एक सेक्स से संबंधित है, वह गलत है। प्रत्येक व्यक्ति बाइ—सेक्यूअल है, दोनों यौन प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद हैं। जिसे हम पुरुष कहते हैं, उसमें पुरुष यौन की मात्रा अधिक है, स्त्री यौन की मात्रा कम है। ऐसा समझें कि वह साठ प्रतिशत पुरुष है और चालीस प्रतिशत स्त्री है। जिसे हम स्त्री कहते हैं, वह साठ प्रतिशत स्त्री है और चालीस प्रतिशत पुरुष है।

लेकिन ऐसा कोई भी पुरुष खोजना संभव नहीं है, जो सौ प्रतिशत पुरुष हो; और ऐसी कोई स्त्री खोजनी संभव नहीं है, जो सौ प्रतिशत स्त्री हो। यह है भी उचित। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का जन्म स्त्री और पुरुष से मिलकर होता है। इसलिए दोनों ही उसके भीतर प्रवेश कर जाते हैं। चाहे स्त्री का जन्म हो, चाहे पुरुष का जन्म हो, दोनों के जन्म के लिए स्त्री और पुरुष का मिलन अनिवार्य है! और स्त्री—पुरुष दोनों के ही कणों से मिलकर, जीवाणुओं से मिलकर व्यक्ति का जन्म होता है। दोनों प्रवेश कर जाते हैं। जो फर्क है, वह मात्रा का होता है। जो फर्क है, वह निरपेक्ष नहीं है, सापेक्ष है।

इसका अर्थ यह हुआ कि जो व्यक्ति ऊपर से पुरुष दिखाई पड़ता है, उसके भीतर भी कुछ प्रतिशत मात्रा स्त्री की छिपी होती है; जो स्त्री दिखाई पड़ती है, उसके भीतर भी कुछ मात्रा पुरुष की छिपी होती है। और इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि किन्हीं क्षणों में स्त्री पुरुष जैसा व्यवहार करे और किन्हीं क्षणों में पुरुष स्त्री जैसा व्यवहार करे। ऐसा भी हो सकता है कि किन्हीं क्षणों में जो भीतर है, वह ऊपर आ जाए; और जो ऊपर है, नीचे चला जाए।

आप पर एकदम से हमला हो जाए घर में आग लग जाए, तो आप कितने ही बहादुर व्यक्ति हों, एक क्षण में अचानक आप पाएंगे, आप स्त्री जैसा व्यवहार कर रहे हैं। रो रहे हैं, बाल नोंच रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, घबड़ा रहे हैं! अगर एक मां के बच्चे पर हमला हो जाए, तो मां भी खूंख्वार हो जाएगी, और ऐसा व्यवहार करेगी, इतना कठोर, इतना हिंसात्मक, जैसा कि पुरुष भी न कर पाए। यह संभावना है, क्योंकि भीतर एक मात्रा निरंतर छिपी हुई है। वह किसी भी क्षण प्रकट हो सकती है।

कं ने स्त्री और पुरुष के नए अर्थ को फिर से प्रकट किया है। कृष्ण का भी अर्थ वही है। जब वे कहते हैं, स्त्रियां भी मुझे उपलब्ध हो जाती हैं, तो उनका अर्थ यह है ,कि वे, जो एक कदम भी नहीं चलते हैं, मात्र प्रतीक्षा करते हैं, वे भी मुझे पा लेते हैं अर्जुन! जिनके मन में आक्रमण ही नहीं है, परमात्मा की खोज में भी जो आक्रामक, एग्रेसिव नहीं हो सकते, वे भी मुझे पा लेते हैं। जो इंचभर भी नहीं चलते, सिर्फ मेरा स्मरण ही करते हैं, सिर्फ अनन्य भाव से मुझे पुकारते ही हैं, जो बदले में कुछ भी चुकाने को तैयार नहीं होते, जो मुकाबले में कुछ भी दाव पर नहीं लगाते, अगर मैं उनके दरवाजे पर भी खड़ा हूं, तो वे दरवाजे तक उठकर भी नहीं आते, मुझे ही उन तक जाना पड़ता है, वे भी मुझे पा लेते हैं।

स्त्रैण से अर्थ है, ऐसा मन, जो कुछ भी करने में समर्थ नहीं है; ज्यादा से ज्यादा समर्पण कर सकता है, ग्राहक मन, रिसेप्टिविटी, द्वार खोलकर प्रतीक्षा कर सकता है।

अगर हम स्त्री के मन को ठीक से समझें, तो वह किसी ऐसे प्रतीक में प्रकट होगा, द्वार खोलकर दरवाजे पर बैठी हुई, किसी की प्रतीक्षा में रत; खोज में चली गई नहीं, प्रतीक्षा में। और पुरुष अगर दरवाजा खोलकर और किसी की प्रतीक्षा करते दीवाल से टिककर बैठा हो, तो हमें शक होगा कि वह पुरुष कम है। उसे खोज पर जाना चाहिए।

जिसकी प्रतीक्षा है, उसे खोजना पड़ेगा, यह पुरुष चित्त का लक्षण है। जिसकी खोज है, उसकी प्रतीक्षा करनी होगी, यह स्त्री चित्त का लक्षण है। स्त्री और पुरुष से इसका कोई संबंध नहीं है। कृष्ण कहते हैं, जो स्त्रैण हैं, वे भी अर्जुन, मुझे पाने में समर्थ हो जाते हैं।


फिर कहते हैं, वैश्य और शूद्र भी। ये दो शब्द भी समझ लेने जैसे हैं।

मैंने कहा, हमारे मन अलग—अलग हैं, हमारी आत्माएं एक हैं। और मन के अलग—अलग होने के कारण हमारे शरीर भी अलग— अलग हैं। क्योंकि शरीर मन के द्वारा ही निर्मित होता है, शरीर को हम पाते हैं मन के द्वारा ही।

चार प्रकार के व्यक्तित्व भारत ने विभाजित किए हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन चारों का भी कोई संबंध आपके जन्म से नहीं है। इन चारों का भी गहरा संबंध आपके व्यक्तित्व के ढांचे से है। हमने यह भी कोशिश की थी कि व्यक्तित्व का ढांचा और जन्म की व्यवस्था में ताल—मेल हो जाए। हमने अकेले ही इस जमीन पर यह प्रयोग किया था कि जन्म में और व्यक्तित्व के ढांचे में कोई एक इनर हार्मनी, एक आंतरिक संबंध खोज लिया जाए। हम थोड़ी दूर तक सफल भी हुए थे। लेकिन वह प्रयोग पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाया। वह टूट गया। टूट जाने के कारण थे, उनकी मैं आपसे पीछे बात करूं। पहले आपको यह कह दूं कि ये चार शब्द व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। चार तरह के व्यक्तित्व होते हैं।

शूद्र हम उस व्यक्ति को कहते हैं, जो शरीर के इर्द—गिर्द जीता है। शरीर से ज्यादा जिसे अस्तित्व में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। शरीर ही जिसका परमात्मा है। शरीर सुख में रहे, तो वह प्रसन्न है; शरीर दुख में हो जाए, तो वह दुखी है। शरीर की मांग पूरी हो जाए, तो सब मागें समाप्त हो गईं, शरीर की मांग पूरी न हो, तो उसके जीवन में व्यथा और संताप है। उसके व्यक्तित्व का केंद्र शरीर है।

बहुत अनूठी बात भारतीय शास्त्रों ने कही है कि सभी व्यक्ति जन्म से शूद्र होते हैं! एक अर्थ में सही है। सभी व्यक्ति जन्म से शरीर के इर्द—गिर्द होते हैं, बाकी ऊंचाइयां तो क्रमश: पानी पड़ती हैं। ध्यान रहे, सभी व्यक्ति शरीर से शूद्र जैसे पैदा होते हैं, यह दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य तो यह है कि अधिक लोग शूद्र ही मरते हैं, अधिक लोग मरते क्षण में भी शरीर के पास ही होते हैं।

ध्यान रहे, अगर आपके भीतर से शूद्र विलीन हो गया हो, तो मृत्यु की आपको पीड़ा नहीं होगी, क्योंकि मृत्यु की पीड़ा शरीर के मरने की पीड़ा है। और जिसके भीतर से शूद्र विलीन हो गया है, उसका शरीर का दृष्टिकोण ही बदल गया! अब वह भलीभांति जानता है कि शरीर मैं नहीं हूं।

संक्षिप्त मेँ कहें, तो जो ऐसा मानता है कि मैं शरीर ही हूं वह शूद्र है। मैं शरीर ही हूं? सब कुछ शरीर है, शरीर पर मैं समाप्त हो जाता हूं। शरीर ही मेरा जन्म है, शरीर ही मेरा जीवन, शरीर ही मेरी मृत्यु है। शरीर के पार मैं नहीं हूं शरीर से भिन्न मैं नहीं हूँ। शरीर में मैं समाप्त हूं, शरीर मेरी सीमा है, यह शूद्र का अर्थ है।

शूद्र को इसलिए निम्नतम कहा है। निम्नतम कहने का कारण? कारण इतना ही कि शूद्र होना सिर्फ जीवन की बुनियाद है, और भवन उठाया जा सकता है। और भवन न उठे, तो बुनियाद बेकार है। शरीर पर ही कोई समाप्त हो जाए, तो उसका जीवन व्यर्थ गया। लेकिन हमारी दृष्टि ही शरीर पर है।

तो कृष्ण कहते हैं कि शूद्र भी, जो केवल अपने को शरीर में ही जिलाए रखते हैं, शरीर के आस—पास ही घूमते रहते हैं; वे भी अगर अनन्य भाव से मेरा स्मरण कर लें, तो अर्जुन, वे भी मुक्त हो जाते हैं।

कृष्ण, बिलकुल निम्नतम जो चित्त की दशा हो सकती है, उसके लिए भी कह रहे हैं कि उस दशा में भी, उस अंधकार में पडा हुआ भी अगर मेरा स्मरण करे, तो प्रकाश की किरण उस तक भी पहुंच जाती है। खाई में पड़ा है, गहन अंधकार में पड़ा है कोई, चारों ओर अंधकार है, लेकिन अगर मुझे स्मरण करे, तो मेरी किरण वहां भी पहुंच जाती है। स्मरण ही मेरी उपस्थिति बन जाती है। शूद्र को भी, वे कहते हैं, यह हो जाएगा।

वैश्य दूसरी कोटि है। शूद्र उसे कहते हैं, जो शरीर के आस—पास जीता है। वैश्य उसे कहते हैं, जो मन के आस—पास जीता है। इसलिए शूद्र की जो भी वासनाएं हैं, आकांक्षाएं हैं, बहुत सालिड, बहुत स्थूल होंगी। वैश्य की जो कामनाएं और वासनाएं और आकांक्षाए हैं, वे मानसिक होंगी, सूक्ष्म होंगी।

वैश्य धन के लिए जीएगा। धन सूक्ष्म बात है; और धन से मिलने वाला रस मन को मिलने वाला रस है। वैश्य यश के लिए जीएगा, पद के लिए जीएगा। उनसे मिलने वाला रस, मन के लिए मिलने वाला रस है। और वैश्य धन के लिए, पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए शरीर को भी गंवाने को तैयार हो जाएगा। शूद्र पद के लिए, धन के लिए, प्रतिष्ठा के लिए शरीर को गंवाने को तैयार नहीं होगा। शरीर उसके लिए मौलिक मूल्य है। शरीर के लिए वह सब कुछ कर सकता है। लेकिन वैश्य शरीर को गंवाने को तैयार हो जाएगा।

एक लिहाज से शूद्र शरीर से स्वस्थ होगा, वैश्य अस्वस्थ होने  लगेगा। एक लिहाज से शूद्र के पास प्रकृति के संपर्क का द्वार बहुत स्पष्ट होगा, संवेदनशील होगा, वैश्य प्रकृति के साथ संवेदना खोने लगेगा। लेकिन प्रकृति से संवेदना उसकी कम होगी, लेकिन परमात्मा की तरफ वह एक कदम ऊपर उठ जाएगा। क्योंकि शरीर से आत्मा तक जाने में बीच में मन के पड़ाव को पार करना जरूरी ही है। मन से गुजरना ही पड़ेगा। शूद्र को आत्मा की यात्रा में किसी न किसी क्षण वैश्य होना ही पड़ेगा।

सभी शूद्र की तरह जन्मते हैं; कुछ लोग वैश्य तक पहुंच जाते हैं और समाप्त हो जाते हैं। वह भी पड़ाव है, मंजिल नहीं है। मन मूल्यवान हो जाएगा शरीर से ज्यादा, और मन के रस शरीर के रस से ज्यादा कीमती मालूम पड़ने लगेंगे। भोजन उतना मूल्यवान नहीं रहेगा अब, कामवासना उतनी मूल्यवान नहीं रहेगी, जितना मन के रस मूल्यवान हो जाएंगे। पद है, प्रतिष्ठा है, यश है, गौरव है,  गरिमा है, ये ज्यादा मूल्यवान होने लगेंगे।


कृष्ण कहते हैं, वैश्य भी अगर मुझे स्मरण करें, तो वे भी मुझे उपलब्ध हो जाते हैं, अर्जुन! वे जो अभी मन में ही घिरे हैं और आत्मा तक जिनका कोई कदम नहीं उठा है, वे भी अगर मुझे स्मरण करें, तो उन तक भी मेरी किरण पहुंच जाती है।

तीसरी कोटि है क्षत्रिय की। क्षत्रिय का अर्थ है, जो शरीर और मन दोनों के पार उठकर आत्मा में जीना शुरू करे। शूद्र और वैश्य की कोटि को भारत ने नीचा माना है। वह एक पलड़ा है, दो वर्गों का। क्षत्रिय और ब्राह्मण को श्रेष्ठतर माना है, वह दूसरा पलड़ा है। जो आत्मा में जीने की चेष्टा करे। शरीर का भी मूल्य नहीं है, मन का भी मूल्य नहीं है, सिर्फ आत्मगौरव का ही मूल्य है।

इसलिए क्षत्रिय धन पर भी लात मार देगा, शरीर पर भी लात मार देगा, मन की भी चिंता छोड़ देगा, लेकिन आत्मगौरव उसके लिए सबसे ज्यादा कीमती हो जाएगा। वह उसके आस—पास ही जीएगा। आत्मगौरव के लिए वह सब कुछ गंवा सकता है, लेकिन आत्मगौरव नहीं गंवा सकता है।

चौथी कोटि है ब्राह्मण की। ब्राह्मण से अर्थ है, जो आत्मा से भी पार हट जाए और ब्रह्म में जीए। उसके लिए अब न शरीर का कोई मूल्य है, न मन का कोई मूल्य है, न आत्मा का कोई मूल्य है, उसके लिए सिर्फ परमात्मा ही मूल्यवान रह गया।

ये चार टाइप हैं, इनका जाति से फिलहाल कोई संबंध न जोडे। ये चार मनस—प्रकार हैं।

कृष्ण कहते हैं कि पहले दो प्रकार वाले लोग भी मुझे उपलब्ध हो जाते हैं, तो बाद के दो प्रकार वाले लोगों का क्या कहना! अगर वे मेरा स्मरण करें, तो वे मुझे उपलब्ध हैं ही।

अगर मन के प्रकार की तरह समझें, तो इस सूत्र में कोई कठिनाई न रह जाएगी। लेकिन भारत ने यह प्रयोग भी किया था। कि ये जो मन के प्रकार हैं, इनको जन्म से जोड्ने की एक अभूतपूर्व चेष्टा की थी। असफल गया वह प्रयोग, लेकिन बड़ा प्रयोग था। और इतना बड़ा था कि सफल होना संभव नहीं मालूम पड़ता था। जितनी बड़ी बात हो, उतनी असफलता की संभावना ज्यादा हो जाती है। और जब कोई बहुत बड़ी बात असफल होती है, तो बड़े गट्टे में गिरा जाती है। 

हमने एक अनूठा प्रयोग किया था। वह प्रयोग यह था कि न केवल व्यक्ति का मन अलग— अलग है, न केवल उसकी चेतना के ढांचे अलग— अलग हैं, क्या यह नहीं हो सकता कि प्रत्येक चेतना के ढांचे के व्यक्ति को जन्म भी इस भांति मिले कि वह जन्म से ही अपने ढांचे के अनुकूल पैदा हो सके?

एक व्यक्ति मरता है, तो उसकी आत्मा भटकती है नए जीवन की तलाश में। हर कहीं आकस्मिक जन्म नहीं होता। आत्मा खोजती है अपने अनुकूल, अपने अनुकूल गर्भ को खोजती है। और जब अपने अनुकूल गर्भ मिलता है, तो जन्म लेती है।

तो जन्म की घटना में दो घटनाएं घटती हैं, मां और पिता का गर्भ निर्माण करना और उस निर्मित गर्भ में एक चेतना का प्रवेश। वह चेतना का प्रवेश उस चेतना के अपने समस्त कर्मों का फल है। उसके अनुकूल वह खोजती है। यह खोज बहुत सचेतन नहीं है, कांशस नहीं है, अनकांशस है।

अनकाशस खोज का मतलब यह है कि जैसे हम पानी को बहाते हैं, तो वह गड्डे को खोज लेता है। भाषा में हम कहेंगे, पानी गड्डे को खोज लेता है। लेकिन पानी कोई सचेतन रूप से खोजता नहीं, सिर्फ स्वभाव अनुसार वह गड्डे की तरफ बहता है, जहां नीचाई है, वहां बहता है। पानी ऊपर की तरफ नहीं बह सकता, गड्डे की तरफ बह सकता है। इसलिए जो सबसे बड़ा गड्डा है, वहां पहुंच जाता है। कमरे में जहां गड्डा है, पानी पहुंच जाता है। यह खोज अचेतन है। पानी के स्वभाव से हो जाती है।

ठीक ऐसे ही, प्रत्येक आत्मा अचेतन खोज करती है। जहां उसके अनुकूल गर्भ होता है, वहीं गड्डा बन जाता है, वहीं आत्मा प्रवेश कर जाती है। भारत ने यह कोशिश की कि क्या यह नहीं हो सकता कि शूद्र आत्माओं के लिए हम एक वर्ग ही नियत कर दें, जहां शूद्र आत्माएं पैदा हो जाएं! क्या यह नहीं हो सकता कि ब्राह्मण आत्माओं के लिए हम ब्राह्मण का एक वर्ग ही नियत कर दें, जहां ब्राह्मण आत्माएं पैदा हो जाएं!

यह बड़ा कठिन प्रयोग था, बहुत मुश्किल प्रयोग था। शायद भविष्य में बायोलाजी कुछ इस तरह के प्रयोग करना शुरू करे। लेकिन वे किसी दूसरे ढांचे पर होंगे। क्योंकि विज्ञान अब यह कह रहा है कि हम इस बात की कोशिश जरूर करेंगे आज नहीं कल, कि ज्यादा सुंदर लोग पैदा किए जा सकें, और निर्णायक बना जा सके कि ज्यादा सुंदर व्यक्ति पैदा हों। विज्ञान यह भी कह रहा है कि अब यह कठिनाई नहीं रही कि हम अगर पुरुष पैदा करना चाहें, तो पुरुष पैदा करें; और स्त्री पैदा करना चाहें, तो स्त्री पैदा करें। विज्ञान अब यह भी कह रहा है कि हम यह भी तय कर लेंगे कि जो बच्चा पैदा हो, उसका बुद्धि अंक, उसका आई क्यू. कितना हो, यह हम पहले तय कर लेंगे। हम यह भी तय कर लेंगे कि उसके शरीर का रंग कैसा हो, उसकी उम्र कितनी हो। हम ये सारी बात तय करेंगे।

यह तय करेंगे, तो हमें ब्रीडिंग को नियत करना पडेगा। फिर हर कोई, हर किसी से संबंध नहीं बना सकेगा। तब संबंध हमें सीमित करने पड़ेंगे, ताकि वे ही लोग संबंधित हों, जो नियमानुसार एक व्यक्ति को जन्म दे सकें।

ठीक वैसे ही प्रयोग भारत ने किसी और दिशा से किए थे, और समाज को चार हिस्सों में बांट दिया था। इन चार हिस्सों में बांटने का प्रयोजन यह था कि शूद्र शूद्र से ही विवाह करे, और यह पीढ़ी दर पीढ़ी ब्राह्मण ब्राह्मण से ही विवाह करे। तो पचास पीढ़ियों के गुजरने के बाद, यह दो ब्राह्मणों का जो विवाह होगा और इन ब्राह्मणों से जो गर्भ निर्मित होगा, वह निर्मित गर्भ किसी ब्राह्मण आत्मा को आकर्षित करने में ज्यादा संभव होगा, बजाय किसी और गर्भ के। यह बिलकुल वैज्ञानिक है और तर्कयुक्त है। अगर यह हो सकता है, तो यह बिलकुल तर्कयुक्त है।

यह प्रयोग एक महत प्रयोग किया गया। हर प्रयोग के खतरे भी होते हैं। खतरा हुआ। यह प्रयोग तो संभव नहीं हो सका; समाज चार हिस्सों में बंट गया। यह प्रयोग तो टूटा; लेकिन समाज चार शत्रुओं के हिस्सों में टूट गया। और धीरे— धीरे शूद्र व्यक्तित्व का विचार न रहा, जाति का लक्षण हो गया। और तब कोई आदमी ब्राह्मण पैदा हो गया, तो चाहे वह बिलकुल शूद्र के व्यक्तित्व का हो, तो भी सिर पर बैठ गया। और तब कोई अगर शूद्र घर में पैदा हुआ और अगर वह ब्राह्मण की योग्यता का था, तो भी उसे किसी मंदिर में पूजा की जगह न मिली! यह खतरा हुआ।

हर प्रयोग का खतरा है। वैज्ञानिकों ने अणु बम की खोज की, तब सोचा नहीं था कि अणु बम का परिणाम हिरोशिमा और नागासाकी होगा। तब उन्होंने सोचा था कि अणु की ऊर्जा हमारे हाथ में लग जाएगी, तो हम सारी जमीन को खुशहाल कर देंगे; कोई भूखा नहीं होगा, कोई गरीब नहीं होगा। इतनी बड़ी शक्ति हमारे हाथ में लगेगी कि हम सारे जीवन को रूपांतरित कर डालेंगे, पृथ्वी स्वर्ग हो जाएगी।

लेकिन यह नहीं हुआ। यह हो सकता था, लेकिन यह नहीं हुआ। हुआ—हिरोशिमा और नागासाकी कब्रगाह बन गए! एक लाख आदमी एक क्षण में जलकर राख हो गए। और अभी सारी दुनिया के पास अणु बम और हाइड्रोजन बम इकट्ठे हैं। किसी भी दिन पूरी दुनिया राख की जा सकती है!

आइंस्टीन मरते वक्त कहकर मरा है कि हमने सोचा भी नहीं था कि इतनी महान ऊर्जा का ऐसा महान दुरुपयोग हो सकेगा। लीनियस पालिंग ने, जो कि अणु की खोज में बड़े वैज्ञानिकों में एक था, आखिरी वक्त सारी दुनिया के वैज्ञानिकों से अपील की कि अब दुबारा कोई बड़ी शक्ति आदमी के हाथ में खोजकर मत देना! क्योंकि हम खोजते हैं पता नहीं किसलिए और आदमी उसका क्या उपयोग करता है!

इस मुल्क में इस मुल्क के मनीषियों ने भी एक बहुत अदभुत सूत्र खोजा था। और वह सूत्र यह था कि प्रत्येक आत्मा को हम उसके जीवन के चुनाव में भी मार्ग—निर्देश कर सकें। आत्मा ऐसे ही भटककर कहीं भी, किसी भी तरह पैदा न हो। हम उसे सुनिश्चित मार्ग दे सकें, व्यवस्थित मार्ग दे सकें, ताकि ज्यादा से ज्यादा उपयोग थोड़े से थोड़े जीवन का किया जा सके।

और अगर एक व्यक्ति पिछले जन्म में ब्राह्मण था, समझें, और उसने ब्राह्मण की एक ऊंचाई पाई। लेकिन इस बार जन्म की खोज करते वक्त उसे एक शूद्र के घर में ही योग्य मौका मिला, वह शूद्र के घर पैदा हो जाता है। तो उसे ब्राह्मण की पूरी शिक्षा नहीं मिल सकेगी, उसे ब्राह्मण का पूरा वातावरण नहीं मिल सकेगा। हो सकता है, वह पचास वर्ष का हो जाए, तब इस योग्य हो, जिस योग्यता के साथ वह ब्राह्मण के घर में पैदा होकर पांच वर्ष में हो जाता! ये पैंतालीस वर्ष उसके व्यर्थ खो जाएंगे।

भारत ने एक जीवन की गहरी इकॉनामिक्स की चिंता की थी, समय कम से कम उपयोग में लाया जा सके और अधिक से अधिक परिणाम हो सकें, और व्यक्ति में जो गहनतम छिपा है, वह प्रकट हो सके। उसे मां—बाप भी, परिवार भी, वातावरण भी, सब कुछ ब्राह्मण का मिल सके। शूद्र को शूद्र का मिल सके, वैश्य को वैश्य का मिल सके। इसलिए जातिया विभाजित हुईं।

लेकिन यह महान प्रयोग सफल नहीं हो सका। जिन्होंने किया था, वे खो गए। और जिनके हाथ में यह महान प्रयोग दे गए, उन्होंने केवल समाज को विभाजित करके शोषण का एक उपाय किया।

तब शूद्र शोषित हो गया। तब ब्राह्मण छाती पर बैठ गया। तब क्षत्रिय ने तलवार हाथ में ले ली और लोगों के ऊपर प्रभुसत्ता कायम कर ली। और तब वैश्य धन इकट्ठा करके बैठ गया। और इन चारों वर्गों ने एक—दूसरे के साथ गहरी शत्रुता ठान ली। जो फायदा होता, वह तो नहीं हुआ, नुकसान यह हुआ कि शूद्र के घर अगर कोई पैदा हो गया, तो उसके विकास का उपाय ही न रहा।

पांच हजार साल में, अगर डा अंबेदकर को छोड़ दें, तो शूद्रों में एक भी बुद्धिमान आदमी पैदा नहीं हो सका। और ये डाक्टर अंबेदकर भी हमारी वजह से पैदा नहीं हुए। यह एक आदमी है, जिसको ब्राह्मण की हैसियत का कहा जा सके। इसलिए ब्राह्मणों से नाराज भी थे वे। ब्राह्मणों से नाराज होना बिलकुल स्वाभाविक था, क्रोध स्वाभाविक था।

पांच हजार वर्षों में शूद्रों की कितनी प्रतिभाएं खो गईं, इसका हमें कोई पता नहीं है! प्रयोग गलत निकल गया, गलत आदमियों के हाथों में पड़ गया। और कितने शूद्र जैसे ब्राह्मण हमारे मुल्क की छाती पर छाए चले गए और कितना गहन नुकसान पहुंचा गए, उसका भी अब हिसाब लगाना मुश्किल है।

यह मैंने इसलिए कहा, ताकि आपको कृष्ण का अर्थ साफ हो सके। कृष्ण के समय में यह महान प्रयोग गतिमान था, यह प्रयोग चल रहा था, इस प्रयोग की आधारशिलाए रखी जा रही थीं। कृष्ण को पता भी नहीं है कि इस प्रयोग का क्या परिणाम आज हो गया!

जो लोग हिरोशिमा के पहले मर गए अणु बम बनाकर, उनको पता भी नहीं है। वे इसी खुशी में मरे हैं कि वे मनुष्य—जाति को एक, महान शक्ति देकर विदा हो गए हैं। अभागे तो वे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपने हाथ से अपने सामने आदमीयत को जलते हुए देखा—अपनी ही खोज का यह परिणाम!

कृष्ण ने जब यह सूत्र कहा था, तब मनुष्य के प्रकार का यह महान प्रयोग गतिमान था, स्वस्थ था, विकसित हो रहा था, अंकुरित हो रहा था, सड़ नहीं गया था।

कृष्ण कहते हैं, शूद्र हो, कि वैश्य हो, कि स्त्री हो, कोई भी हो, वे भी मेरी शरण को पाकर परम गति को उपलब्ध हो जाते हैं।

यहां कोई निंदा का स्वर नहीं है, यहां केवल तथ्य की सूचना है। सिर्फ इस तथ्य की कि जो शरीर के पास जी रहे हैं, वे भी, जो मन के पास जी रहे हैं, वे भी, वे भी शरण आकर मुझे पा लेते हैं।

शरण आने का मूल्य समझाया जा रहा है। आप क्या हैं, यह मूल्यवान नहीं है; आप कौन हैं, यह मूल्यवान नहीं है; अच्छे हैं, बुरे हैं, यह मूल्यवान नहीं है। शरण जाने की क्षमता आपकी है, तो आप परमात्मा को उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसी शर्त कृष्ण कहते हैं, शरण, सरेंडर की, उसके सामने समर्पण कर देने की, अपने अहंकार को उसके सामने छोड़ देने की।

पुण्यशील ब्राह्मणजन और राजऋषि भक्तजनों का तो परमगति को प्राप्त होना सुनिश्चित है। अगर वे भी अपने को शरण में लगा पाएं। इसलिए तू सुखरहित ओर क्षणभंगुर इस लोक को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।

केवल मुझ परमात्मा में अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो, और मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजने वाला हो। और मेरा श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से विह्वलतापूर्वक पूजन करने वाला हो, मुझ परमात्मा को प्रणाम कर। इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मुझ को ही प्राप्त हो सकेगा।

यहां तीन—चार बातें खयाल में लेने जैसी हैं।

पहली बात, कृष्‍ण कहते हैं, सुखरहित और क्षणभंगुर लोक में, जहां हम जी रहे हैं, वहां सुख का आभास बहुत होता है, सुख मिलता नहीं। मिलता है दुख, आभास होता है सुख का। हाथ में आता है दुख, आशा बनती है सुख की। दूर से दिखाई पड़ता है सुख, पास पहुंचकर उघड जाता है और पता चलता है, दुख ही है। दूर से सुख दिखाई पड़ता था। दूरी की भूल है। दूर से जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा पास पाया नहीं जाता।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, सुखरहित संसार में!

ध्यान रहे, कृष्ण यह भी कह सकते थे, इस दुख से भरे संसार में। यह नहीं कहा। ज्यादा उचित होता, ज्यादा जोर वाला होता, कहते कि इस दुख भरे संसार में। लेकिन कृष्ण ने यह नहीं कहा कि इस दुख भरे संसार में। बुद्ध ने कहा है, यह संसार दुख है। कृष्ण ने कुछ दूसरा शब्द उपयोग किया है, और ज्यादा विचारपूर्वक है। कृष्ण ने कहा है, इस सुखरहित संसार में!

 क्योंकि दुख तो पैदा ही इसलिए होता है कि हम इस जगत में सुख मान लेते हैं। इसलिए यह कहना कि जगत दुख है, ठीक नहीं है। हम सुख मानते हैं, इसलिए दुख पाते हैं। जगत दुख है, यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि अगर हम सुख न मांगें, तो जगत बिलकुल दुख नहीं देता। हम सुख मागंते हैं, इसलिए दुख मिलता है। जगत दुख नहीं देता।

मैं आपसे आशा करता हूं कि मेरा सम्मान करेंगे, मेरा आदर करेंगे। फिर आप मेरा आदर न करें, सम्मान न करें, तो मुझे दुख हो। दुख आपने मुझे दिया नहीं। आपका कोई हाथ ही नहीं है। आप बिना नमस्कार किए निकल गए। आपको पता भी नहीं होगा कि आपने मुझे दुख दिया। लेकिन मुझे दुख मिला, बिना आपके दिए! यह दुख कहां से पैदा हुआ? यह दुख मेरी अपेक्षा से जन्मा। मैंने चाहा था नमस्कार हो, प्रणाम करें मुझे, आदर दें मुझे। नहीं दिया, मेरी अपेक्षा टूटी। टूटी हुई अपेक्षा दुख बन जाती है। बिखरा हुआ सुख, दुख बन जाता है। न मिला सुख, दुख बन जाता है।

तो जगत दुख है, यह कहना ठीक नहीं है। बुद्ध से कृष्ण का वचन ज्यादा गहन है। बुद्ध सीधा कहते हैं, जगत दुख है। ठीक नहीं है। कृष्ण कहते हैं, जगत सुखरहित है। वे यह कहते हैं कि जगत में कोई सुख नहीं है। और अगर कोई मनुष्य ऐसा जान ले कि जगत सुखरहित है, तो फिर उसे इस जगत में दुख नहीं हो सकता। उसे इस जगत में कोई दुख नहीं दे सकता।

मुझे आप दुख देने में उसी सीमा तक समर्थ हैं, जिस सीमा तक मैं आपसे सुख मांगने में आतुर हूं। मेरे सुख मांगने की मात्रा ही आपकी क्षमता है मुझे दुख देने की। अगर मैं कुछ भी मांग नहीं रहा हूं? तो आप मुझे दुख नहीं दे सकते।

तो दुख स्वअर्जित है; जगत सुखरहित है और दुख स्वअर्जित है। इसलिए शब्द पर खयाल करें! कृष्ण कहते हैं, सुखरहित है जगत। दूसरी बात कहते हैं, क्षणभंगुर। एक—एक क्षण में नष्ट हो जाने वाला है।

हमें खयाल नहीं आता। हमें ऐसा लगता है कि जगत बहुत थिर है। हम सबको यही खयाल होता है कि हम एक थिर जगत में जी रहे हैं। लेकिन जगत प्रतिपल बदलता चला जाता है—प्रतिपल! लेकिन बदलाहट इतनी तीव्र है कि दिखाई नहीं पड़ती।

नदी के किनारे खड़े हैं, नदी बही जा रही है, हम सोचते हैं वही नदी है। फिर भी नदी में तो दिखाई पड़ता है। पहाड़ के किनारे खड़े हैं, तब तो बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता कि पहाड़ बहा जा रहा है। पहाड़ भी बह रहे हैं! उनके बहने का समय जरा लंबा है। नदी के बहने का समय जरा तीव्र है; इसलिए नदी दिखाई पड़ रही है। पहाड़ भी बह रहे हैं। क्योंकि कल जो पहाड़ थे, आज नहीं हैं, और आज जो पहाड़ हैं, कल नहीं थे। कल जो पहाड़ होंगे, उनका हमें अभी कोई पता नहीं है।

पहाड़ बह रहे हैं। वे भी बदल रहे हैं। उनका काल—माप बड़ा है। करोड़ों वर्ष में बदलते हैं। नदी घड़ी में बदल जाती है। बस काल—माप, टाइम पीरियड का फर्क है, बाकी पहाड़ भी बह रहे हैं।। और अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रत्येक चीज बह रही है।। प्रत्येक चीज चलायमान है, गतिमान है। प्रत्येक चीज दौड़ रही है।

 प्रत्येक चीज एक बहाव है। और यहां हर क्षण सब बदला जा रहा। है। यहां कुछ भी एक क्षण से ज्यादा नहीं टिकता। बाहर भी कुछ नहीं टिकता, भीतर भी कुछ नहीं टिकता आपने कभी खयाल किया है कि आपका मन एक क्षण भी वही नहीं रहता, जो एक क्षण पहले था। एक क्षण पहले सुख मालूम हो रहा था, और जरा भीतर झांककर देखें, सुख तिरोहित हो गया है! एक क्षण पहले दुख मालूम हो रहा था, दुख खो गया है! एक क्षण पहले चिंता मालूम हो रही थी, चिंता चली गई! एक क्षण पहले बड़े शांत थे, अशांत हो गए हैं! एक क्षण भी मन दोहराता नहीं, वही नहीं होता। दो क्षण भी मन एक जैसा नहीं रहता।

भीतर मन बदल रहा है, बाहर संसार बदल रहा है। कोई चीज ठहरी हुई नहीं है। और जहां कोई भी चीज ठहरी हुई नहीं है, वहा हमारी ठहराने की आकांक्षा से दुख पैदा होता है। हम ठहराना चाहते हैं, हम हर चीज को ठहराना चाहते हैं। हम जगत के, जीवन के नियम के विपरीत कोशिश में लगते हैं। फिर हार जाते हैं। फिर दुखी  होते हैं।

एक आदमी जवान रहना चाहता है, तो जवान ही रहना चाहता है। उसे पता नहीं है कि उसके रहने की कोशिश भी उसको बूढ़ा कर रही है, रहने की कोशिश में भी जो समय और ताकत लगा रहा है, वह भी बुजुर्ग, वह भी बूढ़ा होता जा रहा है! एक आदमी मरना ही नहीं चाहता है। वह जो कोशिश कर रहा है, उसमें ही मर जाएगा। जीवन के प्रवाह के विपरीत हम थिर को खोजना चाहते हैं। हम चाहते हैं, कुछ ठहर जाए।


मैं किसी को प्रेम करता हूं, तो सोचता हूं, यह प्रेम बह न जाए, बचे, सदा बचे। सिर्फ कवियों की कविताओं में बचता है। और अक्सर उन कवियों की, जिनको प्रेम का कोई अनुभव नहीं है। सच तो यह है कि जिनको प्रेम का अनुभव है, वे कविता लिखने की झंझट में नहीं पड़ते। जिनको कोई अनुभव नहीं है, वे कविता से तृप्ति खोजते रहते हैं।

सिर्फ कविताओं में प्रेम अमर है। जीवन में कहीं भी अमर नहीं है। हो नहीं सकता। ऐसा नहीं कि प्रेमी का कोई कसूर है। नहीं, जीवन का नियम नहीं है। क्षणभंगुर है।

इसीलिए प्रेमी बड़ी मुश्किल में पड़ते हैं। जब प्रेम के बहाव में होते हैं और प्रेम अपनी ऊंचाई पर होता है, तो उनको लगता है कि शाश्वत है, इटरनल है। अब तो इसका कोई अंत नहीं होगा। उन्हें पता नहीं है कि शाश्वत तो बहुत दूर की बात है, कल का, सुबह का भी कोई भरोसा नहीं है।

और फिर कल सुबह जब गंगा बह जाती है, और हाथ से पानी की धाराएं गिर जाती हैं बाहर, और हाथ में कुछ नहीं रह जाता, तब बड़ी कठिनाई शुरू होती है। फिर अपने ही किए हुए वचन—कि चाहे मर जाऊं, लेकिन प्रेम करूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए, प्रेम करूंगा। लेकिन प्रेम बह गया। क्योंकि प्रेम आपके वचनों को नहीं मानता। प्रेम जगत के नियमों को मानता है। उसके अपने नियम हैं। मैं कितना ही कहूं मेरे कहने का कोई सवाल नहीं है। जीवन के नियम अपवाद नहीं करते।

प्रेम बह जाएगा, तब फिर मुझे प्रेम का धोखा सम्हालना पड़ेगा। फिर मैं एक डिसेप्शन को पालकर रखूंगा। फिर मैं कहता रहूंगा कि   प्रेम करता हूं और भीतर प्रेम नहीं पाऊंगा। और जारी रखूंगा। अपने को भी धोखा दूंगा, दूसरे को भी धोखा दूंगा। और तब प्रेम से पीड़ा निकलेगी, कष्ट आएगा, ऊब मालूम पड़ेगी, घबड़ाहट मालूम होगी, धोखा मालूम पड़ेगा। लेकिन अब मैं क्या कर सकता हूं! वचन जो मैंने दिया था, उसे खींचना पड़ता है।

प्रेम थिर नहीं हो सकता। कोई चीज थिर नहीं हो सकती। सिर्फ एक चीज थिर है, वह है परिवर्तन। सिर्फ एक चीज नहीं बदलती है, वह है बदलाहट। और सब बदल जाता है।

      तो कृष्ण कहते हैं, क्षणभंगुर है यह।

और इस क्षणभंगुर में हम कोशिश करते हैं बचाव की, ठहराव की। उस लड़ने में ही हम मिट जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं।

ज्ञान का अर्थ होता है, जीवन के नियम को जानकर जीना। अज्ञान का अर्थ होता है, जीवन के नियम के विपरीत चेष्टा में लगे रहना। एक आदमी को पता ही नहीं है कि जमीन में गुरुत्वाकर्षण है, वह छलांग लगा—लगाकर आकाश छूने की कोशिश करते हैं, गिर—गिरकर हाथ—पैर तोड़ लेते हैं। नियम का उन्हें पता नहीं है कि जमीन खींच रही है, और जितने जोर से तुम उछाल मारोगे, उतने ही जोर से खींचे जाओगे। हाथ—पैर तोड़ लेंगे, तो शायद वह कहेंगे कि जीवन ने उनके साथ धोखा किया! जमीन को कितना कहा कि धरती माता है तू और यह व्यवहार किया मां होकर!

नहीं, धरती माता का कोई लेना—देना नहीं है इसमें। आपको नियम का पता नहीं है। नियम के विपरीत आदमी दुख पैदा कर लेता है। तो कृष्ण कहते हैं कि क्षणभंगुर इस लोक में तू निरंतर मेरा ही भजन कर। क्योंकि तभी तू उसे पा सकेगा, जो कभी नहीं खोता है। बाकी तू कुछ भी पा लेगा, तो खो जाएगा। चाहे यश, चाहे कीर्ति, चाहे धन, चाहे राज्य—कुछ भी—इस संसार में तू कुछ भी पा लेगा, तो तू ध्यान रखना कि पा भी नहीं पाएगा कि खोना शुरू हो जाएगा।

यहां हम जीत भी नहीं पाते हैं कि हार शुरू हो जाती है। पहुंच भी नहीं पाते हैं कि भटकना शुरू हो जाता है। मंजिल हाथ में आती नहीं कि छीनने वाले मौजूद हो जाते हैं। उसका कारण, जीवन क्षणभंगुर है।

इसमें कुछ निराशा नहीं है। पश्चिम के लोगों ने पूरब के संबंध में निरंतर ऐसा सोचा है कि पूरब के लोग बिलकुल निराश हो गए हैं। इन्होंने जीवन की आशा छोड़ दी है। तभी तो ये कहते हैं, कोई सुख नहीं है, दुख ही दुख है। कोई आशा नहीं, कोई अपेक्षा नहीं है। कुछ नहीं होगा।

लेकिन पश्चिम के लोगों को ठीक खयाल नहीं है। पूरब के लोग निराशावादी नहीं हैं। लेकिन पूरब के लोग नासमझ भी नहीं हैं। अगर एक आदमी जमीन पर कूद—कूदकर हाथ—पैर तोड़ रहा है और मैं उससे कहूं कि पागल, तुझे पता नहीं कि जमीन का स्वभाव खींच लेना है! तो खींचने के खिलाफ तू जो भी कर रहा है, सोच—समझ के कर! अन्यथा हाथ—पैर टूट जाएंगे। और हाथ—पैर से, तो जमीन को दोष मत देना, अपनी नासमझी को दोष देना।

तो मैं निराशावादी नहीं हूं। मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं कि जीवन से व्यर्थ लड़ने की कोशिश में मत पड़! उसमें तू टूट जाएगा। तब मैं यह भी कह रहा हूं कि यह शक्ति, जो तू जीवन से लड़कर नष्ट कर रहा है, यह शक्ति एक और दिशा में भी लगाई जा सकती है। और जो तू पाना चाहता है, वह पाया जा सकता है।

एक ऐसा प्रेम भी है, जो शाश्वत है; लेकिन वह परमात्मा का प्रेम है। वह पाया जा सकता है। आदमी— आदमी के प्रेम को शाश्वत करने की कोशिश मत कर! वह नहीं हो सकता। इसका कोई उपाय ही नहीं है। इसका कभी कोई उपाय नहीं हो सकेगा। लेकिन एक प्रेम है, जो शाश्वत भी है। आदमी—आदमी के बीच के प्रेम की परेशानी में मत पड़! और अगर आदमी— आदमी के बीच भी प्रेम करना है, तो आदमी के भीतर से भी परमात्मा को खोज। प्रेम उसको ही कर। आदमी को भी बीच का द्वार बना, जस्ट ए पैसेज, एक मार्ग। लेकिन उसके भीतर भी परमात्मा को देख।

इसलिए हमने चाहा था कि पति में परमात्मा देखा जा सके। क्योंकि अगर पति ही देखा जा सके, तो जिस प्रेम की आशा है, वह कभी संभव नहीं हो सकता। पश्चिम में प्रेम टूटेगा, विवाह भी टूटेगा, परिवार भी बिखरेगा। बिखरना ही पड़ेगा। वह एक ही आधार पर बन सकता था और थिर हो सकता था, कि किसी दिन पति में परमात्मा की झलक मिल जाए या पत्नी में कभी उस दिव्यता का बोध हो जाए। तो ही। जिस दिन किसी दिन पत्नी में मां दिखाई पड़ जाए गहरे में कहीं, पति में प्रभु दिखाई पड़ जाए गहरे में कहीं, उस दिन हम शाश्वत के नियम में प्रवेश कर गए।

ऐसा समझें, आज हमने जमीन के पार जाने के उपाय कर लिए अब हम चांद पर जा सकते हैं। अब तक नहीं जा सकते थे। न जा सकने का कारण जमीन का ग्रेविटेशन था। दो सौ मील तक जमीन का गुरुत्वाकर्षण पकड़े हुए है। दो सौ मील के भीतर कोई भी चीज फेंको, जमीन उसे खींच लेगी। और या फिर उसको इतनी तीव्र गति में रखना पड़ेगा, जैसे हवाई जहाज को रखना पड़ता है। इतनी तीव्र गति में रखना पड़ेगा कि यहां की जमीन खींच पाए, इसके पहले वह यहां की जमीन से आगे हट जाए। वहा की जमीन खींच पाए उसके पहले आगे हट जाए।

तो या उसे तीव्र गति में रखना पड़ेगा, तो जमीन उसे नहीं खींच पाएगी। क्योंकि जमीन के खींचने में समय लगेगा। मेरा हाथ यहां है, जमीन के खिंचाव का असर पड़ा, तब तक हाथ आगे हट गया। यह खिंचाव बेकार चला गया। तब तक उस पर असर पड़ा, आगे हाथ हट गया। तो या तो हवाई जहाज की गति से घूमते रहो वर्तुलाकार, तो जमीन से बच जाओगे। लेकिन जमीन का आकर्षण खींचता ही रहेगा।


हां, दो सौ मील के पार अगर हम किसी भी चीज को फेंक दें, तो फिर जमीन खींचने में असमर्थ हो जाती है। दूसरा नियम शुरू हो गया। जमीन के घेरे के बाहर दो सौ मील की जमीन का फील्ड है, एनर्जी फील्ड है। उसके बाहर फिर जमीन नहीं खींचेगी। फिर एक छोटा—सा कंकड़ भी छोड़ दो, तो जमीन की ताकत उसे खींचने की नहीं है। फिर वह कंकड़ अनंत में घूम सकता है।

ठीक ऐसे ही, जीवन के आंतरिक नियम भी हैं। जब तक हम क्षणभंगुर के घेरे में ही सब कुछ खोजेंगे, शाश्वत को खोजेंगे, तब तक हम क्षणभंगुर से खिंचते रहेंगे, टूटते रहेंगे, परेशान होते रहेंगे। वह स्थिर हमें उपलब्ध नहीं होगा, शाश्वत की प्रतीति नहीं होगी। एक और दिशा भी है, आदमी के पार। जैसे जमीन के पार दो सौ मील के पार उठने की, ठीक ऐसे ही, आदमी के प्रेम, वस्तुओं के आकर्षण के पार, परमात्मा के प्रेम की तरफ उठने की भी एक आंतरिक दिशा है। उस दिशा में उठते ही सारे नियम दूसरे हो जाते हैं। यहां सब क्षणभंगुर है, वहा कुछ भी क्षणभंगुर नहीं है। यहां सब सुखरहित है, वहां सब दुखरहित है।

मैं नहीं कहूंगा कि वहां सुख है। क्योंकि आप नहीं समझ पाएंगे। क्योंकि सुख तो आपने जाना नहीं कभी। अगर मैं कहूं, वहां सुख है, तो आपकी समझ में कुछ भी न आएगा। और अगर आएगा भी, तो वही सुख समझ में आएंगे, जो आप यहां जानना चाह रहे थे। नहीं। मैं कहूंगा, यह संसार सुखरहित है, और वह संसार, परमात्मा का, दुखरहित है। दुखरहित इसलिए कि आप दुख को भलीभांति जानते हैं। आपका दुख वहां कोई भी नहीं होगा। स्वभावत:, आपका कोई भी सुख वहां नहीं होगा। क्योंकि आपके सब दुख इन्हीं सुखों से पैदा हुए हैं।

यह क्षणभंगुर है, वह शाश्वत है। यहां हर चीज क्षण में बदल जाती है, वहां कुछ भी कभी नहीं बदला है।

निश्चित ही, जहां बदलाहट बिलकुल नहीं है, वहा समय नहीं हो सकता, वहां टाइम नहीं हो सकता। क्योंकि समय तो बदलाहट का माध्यम है। जहां भी समय होगा, वहां बदलाहट होगी। जहां बदलाहट नहीं होगी, वहा समय नहीं होगा।

यहां, जहां हम जीते हैं, वहां हम समय में जीते हैं। समय की प्रक्रिया को हम समझ लें, तो क्षणभंगुर का दूसरा अर्थ समझ में आ जाए।

समय में, कभी आपने खयाल किया कि आपको वर्ष, माह, जीवन इकट्ठा नहीं मिलता, एक—एक क्षण एक—एक बार मिलता है! कभी आपने खयाल किया कि दो क्षण इकट्ठे आपके हाथ में कभी नहीं होते! एक क्षण, और जब वह छिन जाता है, तभी दूसरा आपके हाथ में उतरता है।

एक क्षण से ज्यादा आपके हाथ में कभी नहीं होता। कोई आदमी कितनी ही कोशिश करे कि दो क्षण मेरे हाथ में हो जाएं, तो नहीं हो सकते। एक ही क्षण हाथ में होता है। जब वह खिसक जाता है हाथ से, तब दूसरा आता है। अगर आपने रेत से चलती हुई घड़ी देखी है, तो एक—एक दाना रेत का गिरता रहता है। बस, एक दाना ही गुजरता है छेद से। जब एक गुजर जाता है, तब दूसरा दाना गुजरता है। दो दाने साथ नहीं गुजरते।

समय का भी एक दाना हमें मिलता है, एक क्षण। क्षण समय का एटम है, आखिरी कण है। उसके आगे विभाजन नहीं हो सकता। एक क्षण हमें मिलता है। वह खोता है, तो दूसरा हाथ में आता है।

इसका अर्थ हुआ कि हमारे पास एक क्षण से ज्यादा जिंदगी कभी नहीं होती! चाहे बच्चा हो, चाहे जवान हो, चाहे बुजुर्ग हो, चाहे गरीब हो, चाहे अमीर हो, चाहे ज्ञानी हो, चाहे अज्ञानी हो—एक क्षण से ज्यादा जिंदगी किसी के पास नहीं होती।

क्षणभंगुर का यह भी अर्थ है कि पूरा जीवन क्षण से ज्यादा हमारे पास नहीं होता।

और क्षण कितनी छोटी चीज है आपको पता है गुर आपको पता नहीं होगा। जिसे हम सेकेंड कहते हैं घड़ी में, वह बहुत बड़ा है। बहुत बड़ा है। अब तक समय की ठीक—ठीक जांच—पड़ताल नहीं हो सकी; क्योंकि बड़ा सूक्ष्म मामला है समय का।

लेकिन क्षण, आप ऐसा ही समझें, डेमोक्रीट्स या वैशेषिक भारत के आज से तीन—चार हजार साल पहले परमाणु की जो कल्पना करते थे, परमाणु का जो खयाल करते थे, तो उनका खयाल था कि परमाणु आखिरी टुकड़ा है, उससे ज्यादा नहीं टूट सकता। लेकिन फिर परमाणु भी टूट गया और अब इलेक्ट्रान हमारे हाथ में है। अब इलेक्ट्रान जो है, वस्तु का आखिरी टुकड़ा है। वह कितना बड़ा है, यह कहना मुश्किल है, वह कितना छोटा है, यह कहना मुश्किल है। और जो भी बातें कही जाती हैं, वे सब अंदाज हैं, अनुमान हैं।


इसे ऐसा समझें कि एक पानी की बूंद—स्याही का ड्रापर होता  वह दिखाई पड़ जाएगा। आप स्याही के ड्रापर से एक पानी की या स्याही की बूंद गिरा दो, तो वैज्ञानिक कहते हैं, एक बूंद में जितने इलेक्ट्रौस हैं,  पूरी पृथ्वी के लोग—तीन अरब लोग हैं अभी—तीन अरब लोग उन इलेक्ट्रांस की गिनती करने लग जाएं, तो छ: करोड़ वर्ष लगेंगे! एक पानी की बूंद में, जमीन पर जितने लोग हैं, तीन अरब लोग हैं अभी, अगर ये गिनती करने लग जाएं—खाएं न, पानी न पीए, उठें न, सोए न, बैठें न—कुछ भी न करें, चौबीस घंटे गिनती ही करें, तो छ: करोड़ वर्ष! एक पानी की बूंद में उतने इलेक्ट्रांस हैं! कहना मुश्किल है कि एक सेकेंड में कितने क्षण हैं, कहना मुश्किल है। इलेक्ट्रौस से तो छोटे किसी हालत में नहीं होंगे। बहुत बारीक है मामला। उतना बारीक हमारे पास होता है! हमें पता भी नहीं चल पाता। बारीक इतना है कि जब आपको पता चलता है, तब तक क्षण आपके हाथ से जा चुका होता है। पता चलने में जितना वक्त लगता है, उतने में वह जा चुका होता है। आपको पता लगता है कि आपको लगा, बारह बजकर एक मिनट, जब आपको पता लगता है, तो बारह बजकर एक मिनट अब नहीं रहा। क्षण सरक गए।


इसका मतलब यह हुआ कि क्षण भी हमारे हाथ में है, यह भी हमें पता नहीं चल पाता। इतना छोटा है क्षण और इतना क्षणभंगुर है जीवन कि हमारे हाथ से कब गुजर जाता है, हमें इसका भी पता नहीं चलता। इस बदलती हुई, भागती हुई समय की धारा में जो जीवन के शाश्वत भवन बनाने की कोशिश करते हैं, वे अगर दुख में पड़ जाते हैं, तो कसूर किसका है?

तो कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, इस क्षणभंगुर और सुखरहित संसार में तू मुझ को स्मरण कर। और स्मरण के लिए कुछ बातें कहते हैं।

अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो, मुझ परमेश्वर को निरंतर भज। श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से विह्वलतापूर्वक पूजन कर। मुझ परमात्मा को प्रणाम कर। मेरे शरण हुआ, मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त हो जाएगा।

इन सब बातों का सार तीन शब्दों में आपसे कहना चाहूं।

एक, दृष्टि संसार पर मत रखो। वहां कुछ भी हाथ में आएगा नहीं। निराश होने का कोई कारण नहीं; क्योंकि जहां कुछ हाथ में आ सकता है, वह बिलकुल किनारे ही है। संसार से बहुत दूर नहीं, बस जस्ट बाई दि कार्नर। एकदम किनारे, नुक्कड़ पर ही है। जरा जिसमें संसार लीन हो जाएगा। उसकी थोड़ी फिक्र करो। आदमी से आंख थोडी ऊपर उठाओ; आदमी के थोड़े पार देखो।

नीत्शे ने कहा है, अभागा होगा वह दिन, जिस दिन आदमी अपने से तृप्त हो जाएगा। और लगता है कि वह अभागा दिन हमारे आस—पास है कहीं। आदमी अपने से तृप्त मालूम पड़ता है।

धर्म का अर्थ है, आदमी का अपने से अतृप्त हो जाना, ए बेसिक डिसकटेंट, एक आधारभूत प्राणों में असंतुष्टि, कि आदमी होना काफी नहीं है, और संसार पा लेना पर्याप्त नहीं है—कोई और खोज! वही खोज परमात्मा की तरफ उठाती है।

तो पहली बात, संसार से तृप्त मत हो जाना, संसार में खो मत जाना, डूब मत जाना, स्मरण रखना कि पार भी कोई है।

उस पार का हमें कोई पता ही नहीं है, तो हम उसका स्मरण कैसे करें?

बच्चा पैदा होता है। आपने कभी खयाल किया है, बच्चा पैदा होकर पहला काम क्या करता है? रोता है। इस बच्चे को रोने का भी कोई पता नहीं था। रोता क्यों है? शायद आपको खयाल में भी न हो! रोता इसलिए है, ताकि सांस ले सके, क्योंकि मां के पेट में उसे सांस नहीं लेनी पड़ती। मां की सांस से ही काम चलता है। मां के पेट में नौ महीने बच्चे के फेफड़े काम नहीं करते। पैदा होते से ही फेफड़ों को काम करना पड़ता है। पता कुछ भी नहीं है बच्चे को कि फेफड़े कैसे काम करें? कैसे श्वास लें? लेकिन एक बेचैनी है। उसका जो पता नहीं है, उसकी भी एक बेचैनी तो है। पूरा यंत्र मांग करता है, तो एक विह्वलता पैदा होती है।

कृष्ण ने उसी विह्वलता की बात्त कही है। रो उठता है, चीख उठता है। उसी चीखने में सांस भीतर—बाहर हो जाती है, हृदय की धड़कन शुरू हो जाती है। इसलिए अगर बच्चा न रोए, तो डाक्टर चिंतित हो जाते हैं, नर्सें घबड़ा जाती हैं, किसी तरह रुलाओ बच्चे को। अगर बच्चा नहीं रोया, तो गया! अगर बच्चा न रोए, तो उसका मतलब है कि वह बचेगा नहीं, मर जाएगा। मरा ही हुआ होगा। रो भी नहीं सकता, तो मरा ही हुआ है।

तो दूसरी बात आपसे कहता हूं परमात्मा का तो आपको पता नहीं है, लेकिन एक बात तो आपको पता चल सकती है कि जिस जगत में आप जी रहे हैं, वहां कुछ भी नहीं है। तो फिर रो तो सकते हैं। जहां खोज रहे हैं, वहां कुछ भी नहीं मिल रहा है। उसका कोई पता नहीं है, माना मैंने। उसका कोई पता नहीं है, जो मिले। लेकिन जहां हैं, वहां कुछ भी नहीं मिल रहा है, तो छाती पीटकर रो तो सकते हैं! हृदयपूर्वक चीख तो सकते हैं! आंसू तो बह सकते हैं! कृष्ण ने उसे ही विह्वलता कहा है। वह विह्वलता इस बात का ही सबूत है कि जो सामने है, उसमें कुछ मिलता नहीं; और तुम, जिनमें मुझे मिल सकता है, तुम दिखाई नहीं पड़ते! इस क्षण में जो पीड़ा पैदा होती है, उसका नाम विह्वलता है। जो है, वह पाने योग्य नहीं मालूम पड़ता; जो पाने योग्य है, उसका कोई पता नहीं है! तो मैं क्या करूं? लेकिन मैं रो तो सकता हूं।

भक्तों ने रोने का अभूतपूर्व उपयोग किया है। भक्तों ने रोने को योग बना लिया है। रोने का उन्होंने वही उपयोग किया है, जो बच्चा मां से पैदा होकर करता है अनजान जगत में प्रवेश करने के लिए। भक्तों ने रोकर परमात्मा में प्रवेश करने के लिए वही उपयोग किया है। और जो व्यक्ति उस अनजान के लिए रुदन से भर जाता है और उसके प्राणों में आंसू भर जाते हैं, अचानक वह पाता है कि उसके हृदय ने नई श्वास लेनी शुरू कर दी है। वह किसी दूसरे लोक में प्रवेश कर गया है। कोई दूसरा जगत सामने खड़ा हो गया है। द्वार खुल गए हैं।

मत करो स्मरण! लेकिन जिसे तुम जानते हो, उससे पूरी तरह असंतुष्ट तो हो जाओ। जहां तुम खड़े हो, उस जमीन को तो व्यर्थ समझ लो। तो तुम्हारे पैर आतुर हो जाएंगे उस जमीन को खोजने के लिए, जहां खड़ा हुआ जा सके। जिस नाव पर तुम बैठे हो, उसे तो देख लो कि वह कागज की है। कोई फिक्र नहीं कि दूसरी नाव का हमें कोई पता नहीं है। और हमें कोई पता नहीं है कि कोई किनारा भी मिलने वाला है। हमें कोई पता ही नहीं है कि कोई और खिवैया भी हो सकता है। लेकिन यह नाव, जिस पर तुम बैठे हो, कागज की है या सपने की है, जरा नीचे इसकी तलाश कर लो।

और जिस आदमी को पता चल जाए कि मैं कागज की नाव में बैठा हूं पता है वह क्या करेगा? कम से कम चीखकर रोकर, चिल्लाएगा तो! पता है कि कोई सुनने वाला नहीं है, तो भी मैं कहता हूं वह चिल्लाएगा और रोएगा। कोई किनारा हो या न हो, और कोई निकट हो या न हो, उस स्वात निर्जन में भी उसका रुदन तो सुनाई ही पड़ेगा, उसके प्राण तो चिल्लाने ही लगेंगे, कि मैं कागज की नाव में बैठा हूं, अब क्या होगा? इस घटना से ही, इस विह्वलता से ही अचानक हृदय का एक नया यंत्र शुरू हो जाता है। हृदय में दो यंत्र हैं। वैज्ञानिक से पूछने जाएंगे, तो वह कहेगा, फेफड़े के अतिरिक्त हृदय में और कुछ भी नहीं है, फुफफुस है। पंपिंग सेट के सिवाय वहा कुछ भी नहीं है। वह सिर्फ श्वास को फेंकने और खून को शुद्ध करने का काम करता है। एक पंपिंग की व्यवस्था है। वैज्ञानिक से पूछने जाएंगे, तो हृदय जैसी कोई भी चीज नहीं है, फेफडा है, फुफफुस है, लेकिन शब्द हम सदा हृदय का उपयोग करते हैं, हालाकि हमारे पास भी फुफफुस है अभी, अभी हृदय नहीं है।

हृदय उस फेफड़े का नाम है, जो दूसरे संसार में श्वास लेना शुरू करता है। यह फेफड़ा तो इसी संसार में श्वास लेता है, यही आक्सीजन और कार्बन डायआक्साइड के बीच चलता है। एक और भी आक्सीजन है, एक और प्राणवायु है, एक और प्राणवान जीवन है, जब वह शुरू होता है, तो इसी फुफफुस के भीतर एक और हृदय है, जिसमें नई श्वास और नई धड़कन शुरू हो जाती है। वह धड़कन अमृत की धड़कन है। तो दूसरी बात है, विह्वलता। और तीसरी बात है, समर्पण।

पहली बात है, यह जो चारों तरफ है, यह व्यर्थ हो जाए, तो ही आंख उठेगी। आंख उठे, कुछ दिखाई न पड़े; जो था, वह छूट जाए; जो मिलने को है, वह मिले नहीं; बीच में आदमी अटक जाए तो विह्वलता पैदा होगी; घबड़ाहट पैदा होगी; एक बेचैनी पैदा होगी।  एक कंपन पैदा होगा। एक चिंता पैदा होगी कि अब क्या होगा? जो नाव थी वह छूट गई, नई नाव पर पाव नहीं पड़े, अब तो लहर पर ही खड़े हैं, अब क्या होगा?



इस विह्वलता में घटना घटेगी।

और तीसरी बात है, समर्पण। समर्पण का अर्थ है, जब उस नए हृदय की धड़कन शुरू हो जाए, तो समग्र भाव से, अत्यंत श्रद्धापूर्वक, पूरे ट्रस्ट से, भरोसे से उस नए जीवन में प्रवेश कर जाना। उस नए जीवन को सौंप देना अपनी बागडोर। कहना कि तू मुझे खींच ले।

दो तरह से एक आदमी नाव में जाता है। एक तो नाव होती है, जिसमें हाथ से खेना पड़ता है। एक नाव होती है, जिसमें पाल लगा होता है। हवा बहती है पूरब की तरफ और पाल खोल देते हैं, तो हवा ही नाव को खींचकर ले जाती है।

ध्यान रहे, संसार का जो जगत है, वहा जिस नाव से हमें चलना पड़ता है, वहां खेना होता है, वहां प्रत्येक आदमी को मेहनत उठानी पड़ती है, पतवार चलानी पड़ती है। तब भी चलता नहीं कुछ, कहीं पहुंचते नहीं। पतवार चलती है बहुत, परेशान बहुत होते हैं, दौड़— धूप, पूरी जिंदगी डूब जाती है, किनारा—विनारा कभी मिलता नहीं। वही सागर की लहरें ही कब सिद्ध होती हैं। लेकिन मेहनत करनी पड़ती है। यहां इंचभर अगर आप रुके, तो डूब जाएंगे। कारण, पूरे वक्त लगे रहना पड़ता है बचने में। यहां क्षणभंगुर है सब। यहां पूरे वक्त लगे रहेंगे, तब भी डूबेंगे! लेकिन जितनी देर बचे रहे, उतनी देर बचे रहेंगे।

एक दूसरा लोक है, जिसकी मैं बात कर रहा हूं, जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं। उस लोक में आपको पतवार नहीं चलानी पड़ती। वहा पतवार लेकर पहुंच गए, तो आप मुश्किल में पड़ेंगे। वहा तो उस परमात्मा की हवाएं ही आपकी नाव को ले जाने लगती हैं। आपको सिर्फ छोड़ देना पड़ता है।

लेकिन जिसको पतवार चलाने की आदत है और कभी उस पाल वाली नाव में नहीं बैठा है, वह पाल वाली नाव में बैठकर बहुत घबडाएगा कि पता नहीं कहां जाऊंगा? क्या होगा, क्या नहीं? उतर जाऊं? क्या करूं? या पतवार भी चलाऊ?

समर्पण का अर्थ है, तुम अपनी पतवार मत चलाना। वह तुम्हें जहां ले जाए, तुम वहीं चले जाना। छोड़ देना अपने को।

तो कृष्ण कहते हैं, ऐसा जो छोड़ देता है सब, वह मुझे उपलब्ध हो जाता है।

इन दिनों में जौ कुछ आपसे कहा है, मेरा कोई प्रयोजन नहीं है कि कोई सिद्धात आपको साफ हो जाएं। सिद्धांतों के साफ होने से कुछ होता नहीं। कोई मार्ग साफ हो जाए, तो कुछ होता है। मार्ग भी साफ हो जाए, तो भी बहुत कुछ नहीं होता, जब तक कि चलने की उमंग और लहर न आ जाए। चलने की उमंग और लहर भी आ जाए, तो भी बहुत कुछ नहीं होता, जब तक कि उस अज्ञात पर भरोसा न आ जाए। तो फिर वह चलाता है और खे लेता है।



(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल


“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...