सोमवार, 11 सितंबर 2023

 सूत्र :

तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ।।

पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः।।

कथादिष्विति वर्गः।।

आत्मरत्यविरोधेनेति शांडिल्यः।।

नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता

तद्धिस्मरणे परमव्याकुलतेति

यथा वज्रगोपिकानाम्।।

तद्धिहीनं जाराणामिव।।

नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम्।।


विराट का अनुभव--मुश्किल! पर अनुभव से भी ज्यादा मुश्किल है अभिव्यक्ति। जान लेना बहुत मुश्किल--बता देना और भी ज्यादा मुश्किल! क्योंकि व्यक्ति मिट सकता है...बूंद खो सकती है सागर में, और अनुभव कर ले सकती है सागर का; लेकिन दूसरी बूंदों को कैसे कहें, जिन्होंने मिटना नहीं जाना, जो अभी अपनी पुरानी सीमाओं में आबद्ध हैं...उनको कैसे कहें!

एक पक्षी उड़ सकता है खुले आकाश में अपने पिंजरे में बंद हैं, गहरे में उसकी अनुभूति होती है--लेकिन शब्दों में कैसे उसे कोई बांधे!

शब्द में बंधते ही आकाश आकाश नहीं रह जाता। शब्दों में बंधते ही विराट नहीं रह जाता। इधर शब्द में बांधा कि उधर अनुभव झूठा हुआ।

इसलिए बहुत हैं जो जानकर चुप रह गये हैं। बहुत हैं जो जानकर गूंगे हो गये हैं। गूंगे थे नहीं; जानने ने गूंगा बना दिया। बहुत थोड़े-से लोगों ने हिम्मत की है--दूर की खबर तुम तक पहुंचाने की। वह हिम्मत दाद देने के योग्य हैं। क्योंकि असंभव है चेष्टा। माध्यम इतने अलग हैं...।

समझें जैसे देखा सौंदर्य आंख से, और फिर किसी को बताना हो और वह अंधा हो, तो क्या करियेगा, फिर कोई और माध्यम चुनना पड़ेगा; आंख का माध्यम तो काम न देगा। तुमने तो आंख से देखा था सौंदर्य सुबह का, या रात का तारों से भरे आकाश का, अंधे को समझाना है, आंख का माध्यम तो काम नहीं देगा, तो सितार पर गीत बजाओ! धुन बजाओ! नाचो! पैरों में घूंघर बांधो! लेकिन माध्यम अलग हो गया: जो देखा था, वह सुनाना पड़ रहा है।

तो जो देखा था, वह कैसे सुनाया जा सकता है? जो आंख ने जाना, वह कानों कैसे जानेगा? इससे भी ज्यादा कठिन है बात सत्य के अनुभव की। क्योंकि अनुभव होता है निर्विचार में और अभिव्यक्ति देनी पड़ती है विचार में। विचार सब झूठा कर देते हैं।

फिर भी हिम्मतवर लोगों ने चेष्टा की है: करुणा के कारण, शायद किसी के मन में थोड़ी भनक पड़ जाए; न सही पूरी बात, न सही पूरा आकाश, थोड़ी-सी मुक्ति की सुगबुगाहट आ जाए, थोड़ी-सी पुलक पैदा हो जाए; न सही पूरा दृश्य स्पष्ट हो, प्यास ही जग जाए; सत्य न बताया जा सके न सही, लेकिन सत्य की तरफ जाने के लिए इशारा, इंगित किया जा सके--उतना भी क्या कम है!

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।'

हजारों साल तक नर्गिस रोती है, कोई उसकी रोशनी को देखने और दिखानेवाला नहीं। फिर कहीं कोई दीदावर पैदा होता है, कहीं कोई एक आंखवाला पैदा होता है।

नर्गिस को तो शायद एक आंखवाला भी, उसकी रोशनी के लिए बोध दिला देता होगा कि मत रो, तू सुंदर है; लेकिन सत्य के लिए तो और भी कठिनाई है। हजारों साल में कभी कोई दीदावर वहां भी पैदा होता है। फिर वह जो कहता है, वह कोई गीत जैसा नहीं है, हकलाने जैसा है; वह नाच जैसा नहीं है, लंगड़ाने जैसा है। और नाच में और लंगड़े की गति में जितना अंतर है, किसी के मधुर गीत में और किसी के हकलाने में जितना अंतर है, उतना ही अंतर सत्य को देखने में और सत्य को कहने में है।

बहुत तो चुप रह गये। उन्होंने यह झंझट न ली। लोगों ने पूछा भी ऐसे चुप रह जानेवालों से। वे तो ढोंग कर गये के दीवाने हैं। वे तो पागल बन गये। उन्होंने तो अपने चारों तरफ एक पागलपन का अभिनय कर लिया। धीरे-धीरे लोग समझ गये के पागल हो गये हैं, छोडो भी!

"चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी

वर्ना हम जमाने-भर को समझाने कहां जाते।'

बहुत हैं जिन्होंने सत्य को जानकर अपने को पागल घोषित कर दिया है। सूफी उनको मस्त कहते हैं। दुनिया उनको पागल समझ लेती है। झंझट मिटी! अब कोई पूछने भी नहीं आता कि क्या जाना। पागल से कौन पूछता है!

लेकिन कुछ थोड़े-से लोग इतना आसान रास्ता नहीं लेते। वे लाख तरह की चेष्टा करते हैं कि तुम्हें किसी तरह जतला दें। तुम्हारा हाथ पकड़कर चलाने की कोशिश करते हैं। तुम्हारे भीतर तुम्हारे प्रेम की आग को जलाने की कोशिश करते हैं। ईंधन बन जाते हैं तुम्हारे हृदय में कि लपटें लगें। हजार तरह के झूठ भी बोलेते हैं, सिर्फ इसीलिए कि सत्य की तरफ थोड़ा इशारा हो जाए। तो, यह पाप करने जैसा है।

लाओत्सु ने कहा है: "सत्य बोला नहीं कि झूठ हुआ नहीं। जो भी बोला जाएगा वह झूठ हो जाएगा।'

इसका यह अर्थ हुआ कि बुद्धपुरुष झूठ बोलते रहे, बोले तो झूठ ही बोले; क्योंकि बोलने में सच तो आता नहीं, बोलने में ही झूठ हो जाता है।

जैसे तुमने कभी देखा, लकड़ी सीधी, पानी में डाली, तिरछी दिखायी पड़ने लगती है। झूठ हो गया। बाहर खींची, सीधी-की-सीधी है। पानी में डालो, फिर तिरछी दिखायी पड़ने लगती है। क्या हो जाता है? पानी का माध्यम हवा के माध्यम से भिन्न है। तो हवा के माध्यम में लकेड़ी का जो रुप है, रंग है, वह पानी में नहीं रह जाता। जानते हो तुम भलीभांति कि लकड़ी सीधी है; तुमने ही डाली है, लेकिन तुम्हीं को तिरछी दिखायी पड़ने लगती है।

 उनकी तो बात ही छोड़ दो--सुननेवालों की--जब सत्य को जाननेवाला सत्य को बोलने की कोशिश करता है, उसको खुद ही तिरछा दिखायी पड़ने लगता है। भाषा का माध्यम, अभिव्यक्ति का माध्यम...!

नारद ने इन सूत्रों में, भक्ति की कितने-कितने ढंगों से व्याख्या की गयी है, उनके थोड़े-से उदाहरण दिये हैं।

अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।'

भक्ति तो एक है, मत नाना हैं। क्योंकि जिसको जैसा सूझा, वैसी उसने अभिव्यक्ति दी है। जिसको जैसी समझ आयी, जिसका जैसा ढंग था, उसने वैसे रंग भरे। ये लक्षण भक्ति के नहीं हैं; अगर गौर से समझो तो ये लक्षण, जिस भक्त ने भक्ति का गीत गाया, उसके हैं:। ये देखने के ढंग के संबंध में खबर देते हैं; जो देखा गया उस संबंध में कुछ भी खबर नहीं देते।

बहुत मत हैं। बहुत मत होंगे ही, क्योंकि भक्ति अनंत है। उसके बहुत किनारे हैं। और कहीं से भी घाट बनाकर तुम अपनी नौका को छोड़ दे सकते हो सागर में। फिर जब तुम सागर की गहराइयों में पहुंचोगे, मध्य में पहुंचोगे, उस पार पहुंचोगे, तो स्वभावतः: तुम उसी घाट की बात करोगे जिससे तुमने नाव छोड़ी थी। और तुम कहोगे कि जिसको अभी नाव छोड़नी हो, वही घाट है। तुम्हें और घाटों का पता भी नहीं है। एक घाट काफी है। तुम अपने ही घाट का वर्णन करोगे।-- दूसरा किसी और घाट से उतरा था सागर में। सागर के घाटों का कोई हिसाब है! कोई हिंदू की तरह उतरा था; कोई मुसलमान की तरह उतरा था, कोई ईसाई की तरह उतरा था। से सब घाट हैं, तीर्थ। फिर जो जहां से उतरा था, उसी की बात करेगा। दूसरे किनारे पर पहुंचकर भी, तुम ने जिस किनारे से नाव छोड़ी थी, तुम्हारे दूसरे किनारे की अभिव्यक्ति में उस किनारे का हाथ रहेगा।

और निश्चित ही, सभी घाटों से नाव छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है, एक ही घाट पर्याप्त है। सभी से छोड़ना भी चाहोगे तो कैसे छोड़ोगे? जब भी छोड़ोगे, एक ही घाट से छोड़ोगे।

किसी घाट पर पत्थर जड़े हैं। किसी घाट पर हीरे जड़े होंगे। किसी घाट पर आकाश को छूते वृक्ष खड़े हैं। किसी घाट पर मरुस्थल होगा, रेत का विस्तार होगा। किसी घाट पर आदमी ने कुछ व्यवस्था कर ली होगी, सीढ़ियां लगा ली होंगी। किसी घाट पर कोई व्यवस्था न होगी, अराजक होगा। पर इससे क्या फर्क पड़ता है! नाव छूट जाती हा सभी घाटों से।

"शोरे-नाकूसे-बरहमन हो कि बागे-हरम

छुपके हर आवाज में तुझको सदा देता हूं मैं।'

जो जानते हैं, वो कहते हैं: यह मंदिर के पुजारी के घंटों की आवाज हो कि मस्जिद के मुल्ला की, सुबह की बांग हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

"छुपके हर आवाज में तुझको सदा देता हूं मैं।'

हर आवाज में, हर ढंग में, हर व्यवस्था में, खोजनेवाला तो वही चैतन्य है; वही प्राण है--प्यासे, प्रेम के लिए आतुर!

"अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।'

"पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार

 भगवान की पूजा आदि में अनुराग होना भक्ति है। पूजा का अर्थ होता है: परमात्मा को प्रतिस्थापित करना; एक पत्थर की मूर्ति है या मिट्टी की मूर्ति है, परमात्मा को उसमें आमंत्रित करना; परमात्मा को कहना कि "इसमें आओ और विराजो--क्योंकि तुम हो निराकार: कहां तुम्हारी आरती उतारुं? हाथ मेरे छोटे हैं, तुम छोटे बनो! तुम हो विराट: कहां धूप-दीप जलाऊं? मैं छोटा हूं, सीमित हूं, तुम मेरी सीमा के भीतर आओ! तुम्हारा ओर-छोर नहीं: कहां नाचूं? किसके सामने गीत गाऊं? तुम इस मूर्ति में बैठो!'

पूजा का अर्थ है: परमात्मा की प्रतिस्थापना सीमा में, आमंत्रण--इसलिए पूजा का प्रारंभ उसके बुलाने से है।

अंगरेजी में शब्द है "गाड' भगवान के लिए। वह शब्द बड़ा अनूठा है। उसका मूल अर्थ है--जिस मूल धातू से वह पैदा हूुआ है, भाषाशास्त्री कहते हैं, उस मूल धातु का अर्थ है--"जिसको बुलाया जाता है।' बस इतना ही अर्थ है जिसको बुलाया जाता है, जिसको पुकारा जाता है--वही भगवान।

दूसरा, जिसने कभी पूजा का रहस्य नहीं जाना, देखेगा तुम्हें बैठे पत्थर की मूर्ति के सामने, समझेगा: "नासमझ हो! क्या कर रहे हो?' उसे पता नहीं कि पत्थर की मूर्ति अब पत्थर की नहीं--मृण्मय चिन्मय हो गया है! क्योंकि भक्त ने पुकारा है! भक्त ने अपनी विवशता जाहिर कर दी है। उसने कह दिया है कि "मैं मजबूर हूं। तुम जैसा विराट मैं न हो सकूंगा, तुम कृपा करो, तुम तो हो सकते हो मेरे जैसे छोटे! मेरी अड़चनें हैं। मेरी शक्ति नहीं इतनी बड़ी के तुम जैसा विराट हो सकूं। दया करो! तुम ही मुझ जैसे छोटे हो जाओ ताकि थोड़ा संवाद हो सके, थोड़ी गुफ्तगू हो सके, दो बातें हो सकें। मैं फूल चढ़ा सकूं, आरती उतार सकूं, नाच लूं: तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा। सभी रूप तुम्हारे हैं, यह एक और रूप तुम्हारा सही! मुझे बहुत कुछ मिल जाएगा, तुम्हारा कुछ खोएगा नहीं।'

भक्त की आंख से देखना मूर्ति को, नहीं तो तुम मूर्ति को न देख पाओगे; तुम्हें पत्थर दिखायी पड़ेगा; मिट्टी दिखायी पड़ेगी। भक्त ने वहां भगवान को आरोपित कर लिया है। और जब परिपूर्ण हृदय से पुकारा जाता है, तो मिट्टी भी उसी की है। मिट्टी उससे खाली तो नहीं। पत्थर उसके बाहर तो नहीं। वह वहां छिपा ही पड़ा है। जब कोई हृदय से पुकारता है तो उसका आविर्भाव हो जाता है।

इसलिए भक्त जो देखता है मूर्ति में, तुम जल्दी मत करना, तुम नहीं देख सकते। देखने के लिए भक्त की आंखें चाहिए।

"बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

इजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।'

पत्थर रोते हैं हजारों साल, तब कहीं कोई पत्थर में परमात्मा को देखनेवाला पैदा होता है। आंख चाहिए।

पूजा का प्रारंभ है आमंत्रण में कि आओ, विराजो, प्रतिस्थापना में!

मूर्ति तो झरोखा है, वहां से हम विराट में झांकते हैं।

तुम अपने घर में ,देखते हो, झरोखे से आकाश में झांकते हो। तुम चांदत्तारों की बात करो, दूर फैले नीले-गगन की बात करो, और कोई दूसरा हो जिसको सिर्फ चौखटा ही दिखायी पड़ता हो खिड़की का, वच कहे, कहां की बातें कर रहे हो? पागल हो गये हो? लकड़ी का चौखटा लगा है, और तो कुछ भी नहीं। कहां के चांदत्तारे?'...

तो, जब तुम्हें मूर्ति में कुछ भी न दिखायी पड़े तो जल्दी मत करना; तुम्हें चौखटा ही दिखायी पड़ रहा है।

भक्त जब हृदयपूर्वक बुलाता है तो मूर्ति खुल जाती है, उसके पट बंद नहीं रहते। भक्त को उस मूर्ति के माध्यम से कुछ दिखायी पड़ने लगता है। उसके देखने के लिए भक्त की ही आंखें चाहिए।

कहते हैं कि मजनूं जब बिलकुल पागल हो गया लैला के लिए, तो उस देश के सम्राट ने उसे बुलवाया। उसे भी दया आने लगी; द्वार-द्वार, गली-गली, कूचे-कूचे वह पागल "लैला-लैला' चिल्लाता फिरता है! गांवभार के हृदय पसीज गये। लोग उसके आसुओं के साथ रोने लगे। सम्राट नेउसु बुलाया और कहा, "तू मत रो।' उसने अपने महल से बारह सुदरियां बुलवाईं और उसने कहा, "इस पूरे देश में भी तू खोजेगा, तो ऐसी सुंदर स्त्रियां तुझे न मिलेंगी। कोई भी तू चुन ले।'

मजनूं ने आंख खोली। आंसू थमे। एक-एक स्त्री को गौर से देखा, फिर आंसू बहने लगे और उसने कहा कि लैला तो नहीं है। सम्राट ने कहा, "पागल! तेरी लैला मैंने देखी है, साधारण-सी स्त्री है। तू नाहक ही बावला हुआ जा रहा है।'

कहते हैं, मजनूं हंसने लगा। उसने कहा, "आप ठीक कहते होंगे; लेकिन लैला को देखना हो तो मजनूं की आंख चाहिए। आपने देखी नहीं। आप देख ही नहीं सकते, क्योंकि देखने का एक ही ढंग है लैला को--वह मजनूं की आंख है। वह आपके पास नहीं है।'

भगवान को देखने का एक ही ढंग है, वह भक्त की आंख है।'तो कोई अगर मंदिर में पूजा करता हो तो नाहक हंसना मत। मूर्ति-भंजक होना बहुत आसन है, क्योंकि उसके लिए कोई संवेदनशीलता  नहीं चाहिए। मूर्तियों को तोड़ देन बहुत आसान है। क्योंकि उसके लिए कोई हृदय की गहराई  नहीं चाहिए।

मूर्ति में अमूर्त को देखना बड़ा कठिन है! वह इस जगत की सबसे बड़ी कला है। आकार में निराकार को झांक लेना, शब्द में शून्य को सुन लेना, दृश्य में अदृश्य की पकड़ लेना--उससे बड़ी और कोई कला नहीं है।

इसलिए प्रेम कलाओं की बला है, सरताज है! उसके पार फिर कुछ भी नहीं है।

पूजा का अर्थ है: आकार में आमंत्रण निराकार को।

और अगर तुमने कभी पूजा की है तो तुम जानोगे, तुम्हारे बुलाने के पहले मूर्ति साधारण पत्थर का टुकड़ा है।

रामकृष्ण पूजा करते थे। अनेक दिन बीत गये। वे रोज रोते, घंटों पूजा करते, फिर एक दिन गुस्से में आ गये। तलवार टंगी थी काली के मंदिर में मूर्ति के सामने, तलवार उतार ली, और कहा, बहुत हो गया! इतने दिन से बुलाता हूं! अगर तू प्रगट नहीं होती तो मैं अप्रगट हुआ जाता हूं। या तो तू दिखायी दे, तू हो, या मैं मिटता हूं। तलवार खींच ली। एक क्षण और, और गर्दन पर मारे लेते थे, कि सब कुछ बदल गया। मूर्ति जीवंत हो उठी! वहां काली न थी। मातृत्व साकार हो उठा! ओंठ जो बंद थे, पत्थर के थे, मुस्कराये! आंक्षें जो पत्थर की थीं, और जिनसे कुछ दिखायी न पड़ता था, उन्होंने रामकृष्ण में झांका। तलवार झनकार के साथ फर्श पर गिर गयी।

रामकृष्ण छह दिन बेहोश रहे। भक्त घबड़ा गये। मित्र परेशान हुए। डर तो पहले ही था कि यह आदमी थोड़ा पागल-सा है, यह अब और क्या हो गया! छह दिन की बेहोशी के बाद जब बेहोशी में भेजती है? इतने दिन होश में रखा छह दिन--अब क्ाो बेहोशयी में भेजती है? फिर से बुला ले! जा मत! रुक!'

इतना विराट था, इतना प्रगाढ़ था अनुभव कि अपने को संभाल न सके। डगमगा गये! बूंद में जब सागर उतरे तो ऐसा होगा ही। तुम्हारे आंगन में जब पूरा आकाश उतर आये तो तुम्हारे आंगन की दीवारलें कहां तक संभली रहेंगी, गिर जाएंगी

उन छी दिनों रामकृष्ण ने चिन्मय का जलवा देखा। वे छी दिन सतत परमात्मा के साक्षसत्कार के दिन थे। वह उनकी पहली समाधि थी।

लेकिन पूजा का अर्थ यही है: पहले परमात्मा को आमंत्रित करो, फिर अपने को उसके चरणों में चढ़ा दो , कि कह दो कि तू ही है, अब मैं नहीं!

तुम जितनी दूर तक परमात्मा को बुलाते हो, जितनी गहराई तक बुलाते हो, उतनी दूर तक, उतनी गहराई तक वह आता है। तुम जब अपने को मिटाने को भी तत्पर हो जाते हो तो तुम्हारे अंतरतम को छू लेता है। तुम्हारी बिना आज्ञा के वह तुम में प्रवेश न करेगा। वह तुम्हारा सम्मान करता है। वह कभी भी किसी की सीमा में आक्रमण नहीं करता। बिन कुलाया मेहमान परमात्मा कभी नहीं होता। तुम बुलाते हो, मनाते हो, समझाते-बुझाते हो, तो मुश्किल से आता है।

भक्ति खो गयी है जगत से, क्योंकि भक्ति की कला बड़ी कठिन है--सब कुछ दांव पर लगाने की कला है, जुआ है। बड़ी हिम्मत चाहिए। आंख के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए।

"पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार भगवान की पूजा में अनुराग होना भक्ति है।'

पूजा तो बहुत लोग करते हैं, अनुराग होना चाहिए। संस्कार वश है तो फिर भक्ति नहीं है। चूंकि पीढ़ी दर पीढ़ी तुम्हारे घर के लोग मंदिर में जाते रहे तो तुम मंदिर जाते हो; मस्जिद जाते रहे तो मस्जिद जाते हो; आकार को पूजा तो आकार को पूजते हो; निराकार को पूजा तो निराकार को पूजते हो--औपचारिक, परपंरागत, लकीर के फकीर, दूसरों के पदचिह्नों पर चलनेवाले! नहीं, ऐसे न होगा।

उधार कोई परमात्मा तक कभी नहीं पहुंचता। तुम्हारी प्यास चाहिए, परंपरा नहीं। तुम्हारी आंख चाहिए, लकीर की फकीर और उसका अंधापन नहीं।

तो शर्त है: पूजा में अनुराग! प्रेम चाहिए! वैसा ही प्रेम चाहिए जैसे जब तुम किसी के प्रेम में पड़ जाते हो, तो सब औपचारिकता खो जाती है। सब शिष्टाचार खो जाता है। पहली दफा तुम किसी और ही गहराई से बोलना शुरू करते हो। इसके पहले भी बोलते रहे थे, लेकिन वह ओठों की बात थी। अब हृदय बोलता है! पहली दफा तुम किसी और ही हवा में और किसी और ही माहौल में जीते हो। क्या हो जाता है।

साधारण प्रेम में क्या होता है? दूसरे में तुम्हें कुछ दिखायी पड़ने लगता है जो अब तक तुम्हें कभी किसी में दिखायी न पड़ा था; तुम्हारी आंख खुलती है!

तुमने कभी खयाल किया, प्रेमी दूसरों को पागल मालूम पड़ते हैं! अगर कोई दूसरा किसी के प्रेम में पड़ जाए और दीवाना हो जाए, तो तुम हंसोगे, तुम कहोगे, "पागल है, नासमझ है। समझ में आ! होश में आ! क्या कर रहा है?'

"हम खुदा के भी कभी काइल न थे

उनको देखा तो खुदा याद आया।'

प्रेमी पहली दफा किसी साधारण व्यक्ति में परमात्मा के दर्शन कर लेता है, कोई झलक पाता है। तुम जिसके प्रेम में पड़ जाते हो, वहीं तुम्हें परमात्मा की थोड़ी-सी झलक पहली दफा मिलती है; तुम्हारा आस्तिक होना शुरु हुआ।

प्रेम: आस्तिकता की पहली गंध, पहली लहर। प्रेम: आस्तिकता की तरफ पहला कदम! क्योंकि कम-से-कम चलो एक में ही सही, परमात्मा दिखा तो! और एक में दिखा तो सब में दिख सकता है; न भी दिखे तो भी इतना तो तुम समझ ही सकते हो कि एक में दिखा तो सब में भी होगा।

लेकिन जल्दी ही तुम्हारी प्रेम की आंख धुधली हो जाती है: जिसमें तुम्हें परमात्मा दिखा था, वह भी एक ख्वाब, एक सपना हो जाता है; जल्दी ही तुम भूल जाते हो, धूल जम जाती है।

जब प्रेम की घटना घटे तो जल्दी करना उसे पूजा बनाने की। अन्यथा समय ढांक देगा।

इसलिए मैं कहता हूं, जवानी पूजा के दिन हैं। लेकिन लोग कहते हैं, पूजा बुढ़ापे में करेंगे। वे कहते हैं, जवानी में प्रेम करेंगे। बुढ़ापे में पूजा करेंगे। इतना फासला प्रेम में और पूजा में होगा तो प्रेम तो मर ही जाएगा, पूजा आ न पाएगी। लोग यही कह रहे हैं कि प्रेम तो जवानी में करेंगे; जब प्रेम मरने लगेगा, मर ही जाएगा, तब फिर पूजा कर लेंगे।

और असलियत यह है  प्रेम ही पूजा बनता है। प्रेम के मरने से पूजा नहीं आती; प्रेम के पूरे निखरने से पूजा बन जाती है। एक में जो दिखायी पड़ा है, अब इस सूत्र को पकड़ लेना और इसको औरों में भी देखने की कोशिश करना। जब आंख ताजी हो, लहर नयी हो, उमंग अभी जोश-भरी हो, उत्साह युवा हो, तो जल्दी कर लेना। जो तुम्हें अपनी प्रेयसी में, प्रेमी में दिखा हो, बच्चे में दिखा हो, अपने बेटे में दिखा हो, मित्र में दिखा हो, जल्दी करना क्योंकि उस वक्त तुम्हारे पास आंख है, उस वक्त सारे जगत को गौर से देख लेना; तुम अचानक पाओगे; वह सभी के भीतर छिपा है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है।

"पूजा में अनुराग'...।

पूजा करते तुम बहुत लोगों को देखोगे, लेकिन अनुराग नहीं है, प्रेम नहीं है, पूजा तो है, विधिविधान है। सात दफा आरती उतारनी है तो तुम सात दफा आरती उतारते हो; गिनती से उतारते हो, कहीं आठ न हो जाए। वहां भी कंजूसी है।

रामकृष्ण पूजा करते तो कभी-कभी, दिन-भर-दिन खाना-पीना भूल जाते। उनकी पत्नी शारदा द्वार पर खड़ी है, वह कहती है कि परमहंस देव, समय निकला जा रहा है, सूर्यास्त हुआ जा रहा है, दिन-भर से आप भूखे हैं। मगर वहां कोई परमहंस देव हैं कि सुनें। वे नाच रहे हैं! भूख की खबर किसको लगे! भूख की याद किसको आये! जो भगवान का भोग लगा रहा हो, संसार के भोजन उसे क्या याद आए! गिर पड़ते; तभी उठाकर लाये जाते, अपने से न आते। बहुत दफे उन्हें कहा गया, "ऐसा न करें! पूजा ठीक है, घड़ी-दो घड़ी की ठीक है।' पर रामकृष्ण कहते कि घड़ी-दो घड़ी की याद रह जाए तो पूजा होती ही नहीं।

तुमने कभी अपने को पूजा करते देखा, बीच-बीच में तुम घड़ी देख लेते हो। घड़ी को बाहर रख आया करें जहां जूते छोड़ आते हो। जूते भी आ जाएं, मंदिर खराब न होगा, घड़ी नहीं आनी चाहिए।जूतों में ऐसा कुछ भी नहीं है, घड़ी नहीं आनी चाहिए। क्यों? क्योंकि परमात्मा है शाश्वत्तता। समय को अपने साथ लिये तुम उसे न छू सकोगे। वह है अनंत, तुम क्षणों को साथ लिये बैठे हो। और तुम्हारा मन बार-बार देख रहा है कि कब दुकान जाएं, कब दफ्तर जाएं! तो अच्छा है जाना ही मत। ऐसा समय जो तुमने मंदिर में बिताया, और बाजार के सोच में बिताया, बिल्कुल व्यर्थ गया, इसका उपयोग बाजार में ही कर लेना, कुछ भी तो लाभ होगा। यह तो कुछ भी न लाभ न हुआ।

मैंने देखा है लोगों को पूजा करते, नमाज पढ़ते।

मैं राजस्थान जाता था अकसर, तो चित्तोढ़गढ़ पर गाड़ी बदलती है। सांझ की नमाज का समय होता, कोई घंटे-भर गाड़ी रुकती, तोजितने भी मुसलमान होते तो ट्रेन में, वे उतरकर नमाज करने लगते, बिछा लेते अपनी चादर, बैठ जाते नमाज करने, मगर हर मिनट दो मिनट में पीछे लौटकर देखते रहते कि कहीं गाड़ी छूट तो नहीं गयी। यह मैंने बहुत बार देखा।

एक मुसलमान मित्र मेरे साथ यात्रा कर रहे थे। वे भी पूजा के लिए गये। नल के पास प्लेटफार्म पर उन्होंने अपनी चादर बिछा ली, पूजा करने बैठ गये, मैं उनके पीछे खड़ा हो गया। जब उन्होंने गर्दन पीछे मोड़ी तो मैंने उनकी गर्दन वापस पकड़कर उस तरफ मोड़ दी। बहुत नाराज हुए। उस वक्त तोकुछबोल न सके। जल्दी-जल्दी उन्होंने नमाज पूरी की। कहा, "यह क्या मामला है? आपने क्यों मेरी गर्दन इस तरफ मोड़ी?'

इस तरफ अगर गर्दन रखनी हो तो इसी तरफ रखो, उस तरफ रखनी हो तो उसी तरफ रखो। यह कैसी नमाज हुई? यह कैसी पूजा हुई कि बीच-बीच में खयाल है कि गाड़ी छूट न जाए? गाड़ी छूट न जाए, इसमें परमात्मा छूटा जा रहा है, ' मैंने उनसे कहा, "तुम या तो गाड़ी पकड़ लो या परमात्मा को पकड़ लो। कोई जरूरत नहीं है, मत करोनमाज--झूठी तो मत करो।कम-से-कम इतने सच्चे तो रहो कि नहीं है हृदय में तो न करेंगे।

रामक्रष्ण बहुत दिन तक मंदिर न जाते। वे कहते, "जब भीतर ही नहीं है तो कैसे जाऊं, कैसे धोखा दूं--परमात्मा को कैसेधोखा दूं? किस मुंह से भीतर जाऊं?' द्वार के बाहर से ही, बाहर-बाहर, क्षमा मांगकर लोट आते, मंदिर में भीतर न जाते, सीढ़ियों पर से क्षमा मां लेते: "माफ कर, भावच नहीं है। करूंगा तो धोखा होगा, झूठ होगा।'

लेकिन तुम्हारा सब झूठ हो गया है। जिससे तुम्हें प्रेम नहीं है, उसे तुम कहते हो, प्रेम है। जिसे देखकर तुम्हारे भीतर कोई मुस्कराहट नहीं आती, तुम मुस्कुराते हो। जिसे देखकर तुम्हारे भीतर अभिशाप देने का भाव उठता है, उसको आर्शिवाद देते हुए अपने को दिखलाते हो। इन झूठों से घिरे तुम अगर परमात्मा के पास भी जाओगे तो तुम इन्हीं झूठों का प्रयोग वहां भी करोगे। फिर पूजा वैसी ही हो जाएगी जैसी सारी दुनिया की हो रही है।

कितने ही लोग हैं, अनगिनित, पूजा कर रहे हैं, और पूजा की गंध कहीं भी नहीं अनुभव में आती! कितने ही लोग प्रार्थनाएं कर रहे हैं! अगर सच में ही इतनी प्रार्थनाएं हों तो जैसे आकाश में भाप उठ-उठ कर बादल बन जाते हैं, ऐसे प्रार्थनाओं के बादल बन जाएं। सब प्रार्थना बरसने लगे। मेघ घने हो जाएं आकाश में । जल ही न बरसे, प्रार्थना भी बरसे। नदी-नाले प्रार्थना से भर जाएं!

जितने लोग प्रार्थना करते हैं, अगर ये सच में ही प्रार्थना करते हों...।

ठीक है व्यास की भी परिभाषा। ठीक है:

"भगवान की पूजा में अनुराग भक्ति है।'

फिर गर्गाचार्य के मत से भगवान की कथा में अनुराग भक्ति है।'

पूजा में कुछ करना होता है। निश्चित ही व्यास सक्रिय वृत्ति के रहे होंगे। कुछ करना पड़ता है: आरती उतारनी पड़ती है, फूल चढ़ाने पड़ते हैं, घंटी बजानी पड़ती है--कुछ करना पड़ता है।

इसे समझ लें। व्यास निश्चित ही सक्रिय प्रकृति के रहे होंगे। गर्गाचार्य निष्क्रिय प्रकृति के रहे होंगे। क्योंकि व्यास जहां कहते हैं, "पूजा आदि मग अनुराग' , वहां गर्गाचार्य कहते हैं,  "भगवान की कथा में..., कोई सुनाये हम सुनें , रस से सुनें, डूबकर सुनें, मिटकर सुनें--पर कोई सुनाए, हम सुनें!'

"भगवान की कथा में अनुराग...!'

तुमने कभी खयाल किया: कथाओं में तो तुम्हें भी अनुराग है, भगवान की कथा में नहीं है! पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ भाग गई, इस कथा को तुम कितने रस से सुनते हो! खोद-खोद कर बातें निकलवा लेते हो। हजार काम हों, रोक देते हो।

छोटे गांव में एकाध स्त्री भाग जाए तो पूरे गांव में काम-धंधा बंद हो जाता है उस दिन, पूरा गांव उसी चर्चा में लग जाता है।

किसी के घर चोरी हो जाए...कुछ भी हो जाए...!

अखबार तुम पढ़ते हो, वह कथा का रस है। लेकिन भगवान की कथा में अब कोई रस नहीं है। और अगर कभी तुम भगवान की कथा में  रस लेते हो तो वह रस भगवान की कथा का नहीं होता। उसमें भी कारण वहीं होंगे, जिन कारणों से तुम और कथाओं में रस लेते थे। कोई की स्त्री किसी के साथ भाग गई, राम की स्त्री को रावण भगा ले गया, तो तुम उसमें भी रस लेते हो। लेकिन तुम खयाल करना, रस तुम्हारा रावण सीता को भगा ले गया है, इसमें है, राम की कथा में नहीं है।

गर्गाचार्य कहते हैं, "भगवान की कथा में अनुराग...'। ऐसे सुनना जैसे प्यासा जल पीता है। ऐसे सुनना जैसे तुम बिलकुल खाली हो--कान ही हो गए, तुम्हारा सारा अस्तित्व बस कान पर ठहर गया। हृदयपूर्वक सुनना! तो परमात्मा का स्मरण अनेक-अनेक रूपों में तुम्हें भर देगा। कुछ करने की जरूरत नहीं है; तुम अगर शांत बैठकर सुन भी सको...।

तुम यहां मुझे सुन रहे हो...यह भगवान की कथा है। यहां तुम ऐसे भी सुन सकते हो, जैसे और साधारण बातें सुनते हो। तुम ऐसे भी सुन सकते हो, जैसे तुम्हारा पूरा जीवन दाव पर लगा है, जीवन और मृत्यु का सवाल है।

मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी पत्नी को कहा था कि आज मैं आराम चाहता हूं, किसी को मिलाना मत; कोई आ भी जाए तो कह देना घर पर नहीं है। लेकिन वह बैठा ही था आराम करने कुर्सीं पर, कि पत्नी आई, उसने कहा, "सुनो, एक आदमी दरवाजे पर खड़ा है।'

मुल्ला ने कहा, "अभी मैंने कहा, अभी देर भी नहीं हुई कि आज दिनभर विश्राम करना है। अभी शुरुआत भी नहीं हुई,मैं कुर्सी पर ठीक से बैठ भी नहीं पाया।'

तो उसकी पत्नी ने कहा, "लेकिन वह आदमी कहता है, जीवन-मरण का सवाल है।'

तब तो मुल्ला भी उठ आया, जब जीवन-मरण का सवाल हो तो कैसा विश्राम! बाहर गया तो पाया कि वह इन्श्यारेंस कंपनी का एजेंट है। जीवन-मरण का सवाल...!

जीवन-मरण का सवाल हो, तभी तुम उठोगे, तभी तुम जागोगे।

भगवान तुम्हारे लिए जीवन-मरण का सवाल है या नहीं? अगर नहीं है, तो फिर बिलकुल मत सुनो, क्योंकि वह समय व्यर्थ ही गया। तुम जो सुनोगे वह किसी सार का नहीं होगा। क्योंकि सार तो तुम्हारे सुनने में छिपा है। सार कहने में नहीं छिपा है, सार तुम्हारे सुनने में छिपा है।

अगर तुम सुनने के लिए ही परिपूर्ण तैयार होकर नहीं आ गये हो, अगर यह सवाल तुम्हारे जीवन-मरण का नहीं है, अगर तुम अभी भी परमात्मा को किनारे पर टालकर अपने संसार में लगे रह सकते हो, अच्छा है तुम संसार में ही लगे रहो। कभी-न-कभी ऊबोगे। कभी-न-कभी लौटोगे। कभी तो वह घड़ी आएगी, जब तुम्हारी अंधेरी रात तुम्हें दिखाई पड़ेगी और सुबह की पुकार तुम्हारे मन में उठेगी। कभी तो वह घड़ी आएगी, जब तुम्हारी अंधेरी रात तुम्हें दिखाई पड़ेगी और सुबह की पुकार तुम्हारे पन में उठेगी। कभी तो वह घड़ी आएगी, तुम अपने कूड़ा-करकट से घिरे-घिरे किसी दिन तो दुर्गंध को अनुभव करोगे; फूलों की गंध की तलाध शुरू होगी।

लेकिन जल्दी मत करो, अगर दुर्गंध से अभी लगाव बाकी है, तो भोग ही जो दुर्गंध को अनुभव करोगे; फूलों की गंध की तलाश शुरू होगी।

लेकिन जल्दी मत करो, अगर दुर्गंध से अभी लगाव बाकी है, तो भोग ही लो दुर्गंध को। चुक ही जाओ। रिक्त ही हो जाने दो उस अनुभव से अपने को। नहीं तो तुम सुन न पाओगे।

मैं एक पंजाबियों की सभा में बोलने गया। उस सभा के बाद फिर मेरा किसी सभा में जाने का मन न रहा। कृष्णाष्टमी थी। और पंजाबी हिंदुओं का मोहल्ला था। मैं तो चकित हुआ, वहां व्याख्यान देने वाले व्याख्यान दे रहे थे, और ऐसी भी स्त्रियां थीं उस सभा में--स्त्रियां ही ज्यादा थीं--जो बोलने वालों की तरफ पीठ किए आपस में गपशप कर रही थीं। वहां झुंड-के-झुंड बने थे। बड़ी भीड़ थी। मुझसे भी उन्होंने प्रार्थना की। मैंने कहा, "तुम पागल हो! यहां कोई सुननेवाला ही नहीं है। यहां लोग अपनी बातचीत में लगे हैं और बोलने वाले बोले जा रहे हैं।'

मैंने कहा, "मुझे जाने दो। इनकी कोई तैयारी सुनने की नहीं है। सुनने कोई इनमें आया भी नहीं है। कृष्ण से इन्हें कुछ लेना-देना नहीं है।'

तुम मंदिरों में जाओ, स्त्रियां जो चर्चा मंदिरों में कर रही हैं, पुरुष जो बातचीत मंदिरों में कर रहे हैं, उसका मंदिर से कुछ लेना-देना नहीं है; वही राजनीति, वही उपद्रव बाहर के, वहां भी ले आते हैं; वे ही घर के, बाहर के झगड़े वहां भी ले आते हैं।

परमात्मा की कथा तो तुम तभी सुन सकते हो जब तुम पूरे रिक्त होकर सुनो।

ठीक कहते हैं गर्गाचार्य, "भगवान की कथा में अनुराग...।' और जिस दिन इस कथा में अनुराग आता है उसी दिन संसार की कथा में अनुराग खो जाता है।


तुम व्यर्थ की बातें मत सुनो, क्योंकि यह सिर्फ सुनना ही नहीं, जो तुम सुनते हो वह तुम्हारे भीतर इकट्ठा हो रहा है।

थोड़ा सोचो, अगर पड़ोसी तुम्हारे घर में कूड़ा फेंक दे तो तुम झगड़ा करने को तैयार हो जाते हो। और पड़ोसी तुम्हारे मन में हजार कूड़ा फेंकता रहे तो तुम झगड़ा तो करते नहीं, तुम रोज प्रतीक्षा करते हो कि कब आओ, कब थोड़ी चर्चा हो! तुम्हें घर में कूड़ा-करकट से भी इतनी समझ है, उतनी समझ तुम्हें भीतर के कूड़ा-करकट की नहीं है।

रोको अपने को व्यर्थ की बात सुनने से, नहीं तो सार्थक को सुनने की क्षमता खो जाएगी। अकारण, आवश्यक न हो, ऐसा सब सुनना त्याग दो, ताकि तुम्हारी संवेदनशीलता तुम्हें फिर से उपलब्ध हो जाए, और भगवान का नाम तुम्हारे कान में पड़े, तो वह बहुत से विचारों की भीड़ में न पड़े, अकेला पड़े। वह चोट अकेली हो तो तुम्हारे हृदय के झरने फिर से खुल सकते हैं।

"शांडिल्य के मत से आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग होना ही भक्ति है।'

व्यास सक्रिय घाट से उतने होंगे। गर्गाचार्य निष्क्रिय घाट से उतरे होंग। पर दोनों सरल व्यक्ति रहे होंगे, बड़े विचारक नहीं, सीधे-सादे, इनीसेंट, निर्दोष, भोले-भाले! शांडिल्य विचारक मालूम होते हैं। उनकी परिभाषा दार्शनिक की परिभाषा है। वे कहते हैं, "आत्मरति के अविरोध विषय में अनुराग होना ही भक्ति है।' दार्शनिक व्याख्या है।

अपने में साधारणतः आदमी को रस होता है। साधारणतः! उसे तुम स्वार्थ कहते हो। स्वार्थ अपने में रस है, लेकिन बिना समझ का। चाहते हो तुम हो कि सुख मिले, मिलता नहीं! चाह तो ठीक है; जो तुम करते हो उस चाह के लिए, उसमें कहीं कोई गलती है।

स्वार्थ और आत्मरति में  फर्क है। स्वार्थ भी अपने सुख की खोज करता है, लेकिन गलत ढंग से, परिणाम हाथ में दुख आता है। आत्मरति भी अपने सुख की खोज करती है, लेकिन ठीक ढंग से, परिणाम सुख आता है। तुम भी अपने ही सुख के लिए जी रहे हो, लेकिन अभी तुमने अपने को जो समझा है वह अहंकार है, आत्मा नहीं। अभी तुम्हारा "स्व' अहंकार है, झूठा है। जिस दिन तुम्हारा "स्व' वास्तविक होगा, आत्मा होगी, उस दिन तुम पाओगे: स्वार्थ ही परमार्थ है। उस दिन अपने आनंद की खोज कर लेने में ही तुमने सारी दुनिया के लिए आनंद के द्वार खोले। उस दिन तुम सुखी हुए तो दूसरों को भी सुखी होने की संभावना बतायी। उस दिन तुम्हारा दिया जला तो दूसरों के बुझे दीये भी जल सकते हैं, इसका भरोसा उनमें तुमने पैदा किया। और फिर तुम्हारे जले दीये से न मालूम कितने बुझे दिये भी जल सकते हैं।

आत्मरति का अर्थ है: वस्तुतः सच्चा स्वार्थ। उसमें परमार्थ अपने-आप आ जाता है। जिसे तुम स्वार्थ समझते हो वह परमार्थ के विपरीत है। और जिसको आत्मज्ञानियों ने आत्मरति कहा है, परम स्वार्थ कहा है, वह परमार्थ के विपरीत नहीं है, परमार्थ उसमें समाहित है, समाविष्ट है।

"आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग होना भक्ति है।'

अब इसे समझो।

तुम अपने को प्रेम करते हो--ठीक, स्वाभाविक है। इस प्रेम के कारण तुम ऐसी चीजों को प्रेम करते हो जो तुम्हारे स्वभाव के विपरीत हैं उनसे तुम दुख पाते हो। चाहते सुख हो, मिलता दुख है। आकांक्षा में भूल नहीं है। आकांक्षा को प्रयोग में लाने में तुम ठीक-ठीक समझदारी का प्रयोग नहीं कर रहे हो।

बुद्ध भी स्वार्थी हैं, कबीर भी, कृष्ण भी--लेकिन वे परम स्वार्थी हैं। वे भी अपना साध रहे हैं आनंद, लेकिन इस ढंग से साध रहे हैं कि मिलता है। तुम इस ढंग से साध रहे हो कि मिलता कभी नहीं; साधते सदा हो, मिलता कभी नहीं।

तुम कुछ ऐसी चीजों से  अनुराग करने लगते हो जो कि तुम्हारे स्वभाव के विपरीत है; जैसे समझो, तुम धन को प्रेम करने लगे, तो तुम अपने स्वभाव के विपरीत जा रहे हो। क्योंकि धन है जड़, तुम हो चैतन्य। चैतन्य को प्रेम करो, जड़ को मत करो, अन्यथा जड़ता बढ़ेगी। और चैतन्य अगर जड़ता में फंसने लगे तो कैसे सुखी होगी? धन का उपयोग करो, प्रेम मत करो। प्रेम तो चैतन्य से करो।

तुम पद की पूजा करते हो। पद तो बाहर है। तुम पद के आकांक्षी हो। लेकिन पद तो बाहर है, तुम भीतर हो, तो तुम में और तुम्हारे पद में कभी तालमेल न हो पाएगा; तुम भीतर रहोगे। पद बाहर रहेगा। कोई उपाय नहीं है, भीतर तो तुम दीनहीन ही बने रहोगे। कितना ही धन इकट्ठा कर लो अपने चारों तरफ, कितने ही बड़े पद पर बैठ जाओ, कितना ही बड़ा सिंहासन बना लो--तुम्हारे भीतर सिंहासन न जा सकेगा; न धन जा सकेगा, न पद जा सकेगा। वहां तो तुम जैसे पहले थे वैसे ही अब भी रहोगे।

भिखारी को राजसिंहासन पर बिठा दो, क्या फर्क पड़ेगा! बाहर धन होगा, शायद भूल भी जाए बाहर के धन में कि भीतर अभी भी निर्धन हूं, तो यह तो और आत्मघाती हुआ। यह स्वार्थ न हुआ, यह तो मूढ़ता हुई।

असली धन खोजो--असली धन भीतर है।

असली पद खोजो--असली पद चैतन्य का है।

चैतन्य की सीढ़ियों पर ऊपर उठो।

उठने दो चैतन्य की उड़ान।

उठने दो ऊर्जा चैतन्य की--परमात्मा तक ले जाना है उसे।

मनुष्य परमात्मा होने की अभीप्सा है। इससे पहले कोई पड़ाव नहीं है, कोई मुकाम नहीं। पहुंचना है उस आखिरी मंजिल तक। लेकिन तुम बीच में बहुत से पड़ाव बना लेते हो; पड़ाव ही नहीं, उनको मुकाम बना लेते हो, मंजिल समझ लेते हो। कोई धन को ही इकट्ठा करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है।

शांडिल्य की परिभाषा दार्शनिक है, बहुमूल्य है:

"आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग'...।

तुमने अब तक आत्मरति के विरोधी विषय में अनुराग किया है। आत्मरति के अविरोध विषय में अनुराग करोगे, तो परमात्मा शब्द को बीच में लाने की जरूरत भी नहीं है, तुम धीरे-धीरे परमात्म-स्वरूप होने लगोगे।

जब भी तुम्हारे सामने चुनाव हो तो सदा ध्यान रखना: जड़ को मत चुनना, चैतन्य को चुनना। जब भी दो चीजों में से एक चुननी हो तो उसमें देख लेना, कौन ज्यादा चैतन्य है। जैसे प्रेम और धन में चुनना हो तो प्रेम चुनना। फिर प्रेम और भक्ति में चुनना हो तो भक्ति चुनना। संसार और परमात्मा में चुनना हो तो परमात्मा चुनना।

इसे अगर तुम समझ लो तो शांडिल्य की परिभाषा में ईश्वर का नाम की  जरूरत नहीं है उसको कहने की, वह छिपा है। इस सूत्र को मानकर अगर तुम चले तो उसे पा लोगे। अब तुम फर्क देख सकते हो। यह तीनों व्यक्तित्वों का फर्क है। शांडिल्य बुद्ध जैसा व्यक्ति रहा होगा: "परमात्मा की कोई जरूरत नहीं है।'

बुद्ध ने कहा: ध्यान खोज लो। शांडिल्य कह रहा है:चैतन्य खोज लो, क्योंकि वही अविरोधी है। उससे तुम्हारा तालमेल बैठेगा।

"देवर्षि के मत से' ...फिर नारद अपना मत देते है।

"नारद के मत से अपने सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना भक्ति है।'

संस्कृत में, जहां-जहां हिंदी में अनुवाद किया है लोगों ने, चूक हुई है। सभी ने अनुवाद किया है, क्योंकि ऐसा लगता है ठीक नहीं कहना, नारद खुद ही शास्त्र लिख रहे हैं, तो हिंदी में अनुवादों में अनुवादकों ने लिखा है, "देवर्षि के मत से'। लेकिन संस्कृत में "नारदस्तु' - "नारद के मत से' ...। नारद अपने ही नाम का उपयोग कर रहे हैं। इसमें बडी बात छिपी है। नारद अपने व्यक्तित्व को भी अपने से उतना ही दूर रख रहे हैं जितना शांडिल्य, जितना गर्गाचार्य, जितना व्यास। ऐसा नहीं कहते कि "मेरे मत से'। उसमें तो मत के प्रति जरा मोह हो जाएगा: "मेरा मत' । "यह नारद का मत है' - नारद भी ऐसा ही कहते हैं।

स्वामी राम अपने को हमेशा इसी तरह बोलते थे: "राम' को भूख लगी है, "राम' को प्यास लगी है। एसा न कहते थे: मुझे प्यास लगी है, मुझे भूख लगी है। अपरीका गये तो लोग वहां बड़े हैरान होते थे। पहले ही दिन जब वे एक बगीचे से शाम को घूमकर लौटे, तब तो गेरुआ वस्त्र बड़ी अनूठीा चीज थी, बड़ी भीड़ लग गई वहां। अब तो न लगेगी, कम-से-कम पंद्रह हजार मेरे संन्यासी हैं सारी दुनिया में...गेरुआ वस्त्र...! जल्दी ही उनको लाखों तक पहुंचा देना है। लेकिन उस समय बड़ी नयी बात थी, तो भीड़ लग गई। लोग कंकड़-पत्थर फेंकने लगे कि कोई दिवाना आ गया। राम हंसते रहे। भीड़ में से किसी को दया आई कि यह आदमी हो सकता है, पागल हो, लेकिन दया-योग्य है। उसने भीड़ को हटाया, उनको बचाया, उनको ले चला। रास्ते में उसने पूछा कि तुम हंसते क्यों थे, तो उन्होंने कहा, "राम की इतनी पीटाई हो रही थी और मैं न हंसू!' तो उसने कहा, "क्या मतलब?' क्योंकि उसे पता नहीं था उनकी आदत का। वे कहने लगे, "राम की इतनी हंसाई हो रही थी! लोग पत्थर मार रहे थे, गालियां दे रहे थे और मैं न हंसू! मैं खड़ा दूर देख रहा था।'

अपने ही नाम को इस तरह अगर तुम दूर कर लो तो बड़ी मुक्ति अनुभव होती है; तब तुम अपने व्यक्तित्व से अलग हो गए; तब तुम साक्षी-भाव में प्रविष्ट हो गए।

ठीक किया, नारद ने कहा: "नारदस्तु'।

और नारद का मत है: "सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना, और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना भक्ति है'।

शांडिल्य दार्शनिक हैं, नारद भक्त हैं। शांडिल्य विचारक हैं, नारद प्रेमी हैं।

"सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना...!'

 प्रेमी की यही तो खूबी है कि वह कुछ भी बचाना नहीं चाहता, सब अर्पण करना चाहता है। जितना अर्पण करता है उतना ही उसे लगता है, कम ही तो किया, और करूं! आखिर में वह अपने को भी अर्पण कर देता है।

सब अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होने से परम व्याकुल होना परम व्याकुलता पकड़ ले, व्याकुलता ही व्याकुलता रह जाए।

ऐसा समझो कि तुम रेगिस्तान में भटक गए, जल चूक गया, दूर-दूर तक कहीं कोई मरूधान नहीं है, हरियाली का कोई पता नहीं है, सागर है सूखी रेत का। प्यास तो तम्हें पहले भी लगी थी, लेकिन आज तुम पहली दफे जानोगे कि परम प्यास क्या है। प्यास तो बहुत दफे लगी थी, लेकिन पानी सदा उपलब्ध था, जरा लगी थी आर पी लिया था। आज तुम्हारा रोआं-रोआं रोएगा। आज तुम्हारा रोआं-रोआं तड़फेगा। एक-एक रोएं में तुम प्यास अनुभव करोगे, कण्ठ में नहीं। तुम्हारा सारा व्यक्तित्व, तुम्हारा सारा होना प्यासमें रूपांतरित हो जाएगा।...तब परम व्याकुलता! जब ऐसे ही नहीं कि तुम ऐसे ही बुलाते हो परमात्मा को कि आ जाओ तो ठीक, न आए तो भी कोई बात नहीं...नहीं, ऐसे बुलाते हो जैसे रेगिस्तान में कोई पानी को खोजता है, तड़पता है। मछली को डाल दो रेत पर पानी से निकालकर,जैसे तड़पती है, वैसी परम प्यास!

"सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होन से परम व्याकुल होना...'।

अभी तो हमने जिसे प्यास समझा वह प्यास नहीं है। अभी तो जिसे धन समझा, धन नहीं है। अभी तो हमारी सारी समझ ही गलत है।

"हम भूल को अपनी इल्मोफन समझे हैं

गुरबत के मुकाम को वतन समझे हैं

मंजिल पे पहुंच के झाड़ देंगे इसको

ये गर्देसफर है जिसको तन समझे हैं।'

अभी तो हमारी सारी समझ उलटी है। अभी तो हम नासमझी को समझदारी समझते हैं। अभी तो हम अहंकार को आत्मा समझे हैं। अभी तो हमने शरीर को अपना होना समझा है।

"हम भूल को अपनी इल्माफन समझे हैं

गुरबत  के मुकाम का वतन समझे हैं।'

रात-भर का पड़ाव है, ठहर जाने के लिए सराय है कि धर्मशाला है, उसको हम घर समझे हैं।

"मंजिल पे पंहुच के झाड़ देंगे इसको'...

मंजिल पर पहुंचोगे तब पता चलेगा कि जैसे यात्री राह की धूल झाड़ देता है, ऐसे ही यह सब जिसे तुम धन समझे हो, जिसे तुम अपना समझे हो, यह सब झड़ जाएगा।

"ये गर्देसफर है जिसको तन समझे हैं'।

यह राह की धूल है, इससे ज्यादा नहीं। यह तुम नहीं हो। तुम तो साक्षी हो। शरीर के पीछे जो शरीर को देखने वाला है, मन के पीछे जो मन को भी देखने वाला है--तुम तो वही परम साक्षी हो।

सब छोड़ दो परमात्मा पर। इनमें से कुछ भी अपना मत समझो। शरीर भी उसका है--उसी पर छोड़ दो। मन भी उसका है--उसी पर छोड़ दो। कर्म भी उसी के हैं--उसी पर छोड़ दो। तुम कर्ता न रह जाओ, साक्षी हो जाओ।

तो नारद के हिसाब से, सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना...जरा हटे परमात्मा से तो वही हालत हो जाए जो मछली की हो जाती है सागर से हटकर; जरा भूले उसे तो तड़प हो जाए!

"ठीक ऐसा ही है'।

नारद कहते हैं, "ये सब जो परिभाषाएं हैं--ठीक ऐसा ही है'। ये सब परिभाषाएं ठीक हैं। इनमें कोई परिभाषा गलत नहीं है। सभी अधूरी हैं, पूरी कोई भी नहीं । सभी ठीक हैं, गलत कोई भी नहीं। भाषा का स्वरूप ऐसा है कि अधूरा ही रहेगा।

सत्य के इतने पहलू हैं कि तुम चुका न पाओगे, और एक आदमी एक ही पहलू की बात कर पाता है।

 एक महाकवि की मृत्यु हुई, तो उसके मित्रों ने उसके मरने के पहले पूछा कि तुम्हारी कब्र पर क्या लिखेंगे, तो उसने कहा, "लिख देना सिर्फ एक शब्द--"अनफिनिश्ड' , अधूरा।'

वे पूछने लगे, "क्यों? क्या तुम सोचते हो, तुम अधूरे मर रहे हो? क्योंकि तुम्हारे गीत पूरे हैं। तुम्हारा यश पूरा, सम्मान पूरा। तुम एक सफल जिंदगी जीए। तुमने खूब आदर पाया। क्या तुम भी अधूरे मर रहे हो?'

तो उस कवि ने कहा, "इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि कितना हमने किया, कितना गाया; कुछ भी करो, जीवन का स्वभाव अधूरा है। हारे हुए तो यहां हारे हुए जाते ही हैं,जीते हुए भी हारे हुए ही जाते हैं। गरीब तो गरीब मरते हैं, अमीर भी गरीब मरते हैं। जिनके पास नहीं है, वे तो अधूरे रहते ही हैं, जिनके पास है वे भी अधूरे रहते हैं। क्योंकि यह जीवन का स्वभाव अधूरा है।

ऐसे ही मैं तुमसे कहूंगा, भाषा का स्वभाव अधूरा है। कुछ भी कहोगे, वह पूरा चुकता न हो पाएगा। बड़ी बातें छोड़ो, एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में भी पूरी बातें नहीं कही जा सकतीं। अगर एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में तुम पूरी-पूरी बात कहना चाहो तो तुम्हें पूरे ब्राह्माण्ड के संबंध में जो भी है, सब कुछ वह कहना पड़ेगा, तभी उस गुलाब के संबंध में पूरी बात होगी, क्योंकि उसकी जड़ें जमीन से जुड़ी हैं, उसकी पंखुड़ियां सूरज से जुड़ी हैं, उसकी श्वास हवाओं से जुड़ी है, उसके भीतर बहती रसधर बादलों से जुड़ी है, सागरों से जुड़ी है।

तुम अगर एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में सब कहना चाहो तो तुम बड़ी अड़चन में पड़ जाओगे--तुम पाओगे कि यह तो धीरे-धीरे पूरे ब्रह्माण्ड के संबंध में सब कहना हो जाएगा।

नहीं, पूरा कहना असंभव है। सत्य बहुत बड़ा है, कथनी बड़ी छोटी है।

जीवन में परमात्मा को छोड़कर सब मिल जाये--तो तुम अधूरे रहोगे, उदास रहोगे, दुखी रहोगे, पीड़ित रहोगे। और कुछ भी न मिले, परमात्मा मिल जाए तो पूरा मिल जाता है। क्योंकि परमात्मा खंड-खंड नहीं हो सकता; मिलता है तो पूरा, नहीं मिलता है तो नहीं मिलता।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, "मेरे पास सब है, लेकिन बड़ी उदासी है। अब क्या करें? जब नहीं थी इतनी व्यवस्था तब तो एक आसरा भी था कि कभी जब सब होगा तो सब ठीक हो जाएगा, वह आसरा भी छिन गया'।

"मयकदों के भी आसपास रही

गुलरुखों से भी रूसनास रही

जाने क्या बात थी इस पर भी

जिंदगी उम्र-भर उदास रही'।

मधुशालाएं पास थीं, दूर नहीं। सुंदर मुखड़ों वाले लोग निकट थे, परिचय था उनसे...।

"मयकदों के भी आसपास रही...'

फूल के जैसे सुंदर चेहरे वाले व्यक्त्विो से भी परिचय रहा, मुलाकात रही; मधुशाला में भी विस्मरण किया; प्रेम में भी डूबे--

"जाने क्या बात थी इस पर भी...'

फिर भी कुछ बात--

"जाने क्या बात थी इस पर भी

जिंदगी उम्र भर उदास रही'।

रहेगी ही! उदासी तो उसी की मिटती है जो भक्ति को उपलब्ध हुआ; उसी की मिटती है जो भगवान को उपलब्ध हुआ; उसी की मिटती है जिसने जाना कि मैं अलग नहीं हूं, जो अनन्यता को उपलब्ध हुआ!

अन्यथा, तुम जो भी करोगे...। करते लोग बहुत कुछ हैं, अथक श्रम करते हैं, सब व्यर्थ जाता है। इतने श्रम से तो परमात्मा मिल सकता है जिससे तुम कंकड़-पत्थर इकट्ठे कर पाते हो। तुम्हें देखकर रोना भी आता है, हंसी भी आती है। हंसी आती है कि कैसा पागलपन है! इतने श्रम से तो मंदिर बन जाता, इसे तुमने धर्मशाला बनाने में गंवाया। इतने श्रम से परमात्मा उतर आता; भिक्षा पात्र ले कर तुम कंकड़-पत्थर इकट्ठे करते रहे! इतने श्रम से तो अमृत्व को उपलब्ध हो जाता, इससे तुम गंदे-नालों का पानी ही इकट्ठा करते रहे।

मौत जब आती है तब तुम्हें पता चलेगा, लेकिन तब बहुत देर हो जाती है।

 जागो अभी!

मौत तो जगाती है, पर तब समय नहीं बचता--परमात्मा का स्मरण करने का भी समय नहीं बचता! मौत आती है तब पता चलता है: "अरे! यह तो गंवाना हो गया!'

यह सब पड़ा रह जाएगा जो इकट्ठा किया, चले तुम अकेले। अकेले आये: अकेले चले! पानी पर खींची लकीरें हो गई सारी जिंदगी।

"वाए नादानी कि वक्ते-मर्ग से साबित हुआ'।

ख्वाब था जो कुछ भी देखा, जो सुना अफसाना था।'

मरते वक्त...!

"वाए नादानी कि वक्ते-मर्ग ये साबित हुआ।'

यह मूढ़ता सिद्ध हुई मरते वक्त, यह नादानी पता चली मरते वक्त, यह नासमझी खयाल में आई मरते वक्त--

"ख्वाब था जो कुछ कि देखा'...

जो देखा, वह सपना था...

..."जो सुना अफसाना था।'

और जो बात सुनते रहे, वह सिर्फ कहानी थी। हाथ खाली रह गए!

अकसर तो ऐसा है कि लेकर तो तुम कुछ न जाओगे, जो लेकर आये थे, शायद उसे भी गंवा कर जाओ।

बच्चे पैदा होते हैं, मुट्ठी बंधी होती है; मरते वक्त मुट्ठी खाली होती है, खुली होती है। बच्चा कुछ लेकर आता है--कोई ताजगी, कोई कमल के फूलों जैसा निर्दोष भाव, कुछ भोलापन--वह भी गंदा हो जाता है। बच्चा आता है दर्पण की तरह ताजा-नया, धूल जम जाती है जिंदगी की, वह भी खो जाता है।

 हम जिंदगी में कमाते नहीं, गंवाते हैं--बड़ा अजीब सौदा करते हैं!

जो मौत के पहले जग जाए वही धार्मिक हो जाता है। जो मौत तुम्हें दिखाएगी, वह तुम अपनी समझदारी में देख लो, अपने होश में देख लो, मौत को दिखाने की जरूरत न पड़े, तो तुम्हारी जिंदगी में एक क्रांति घटित हो जाती है।

"ठीक ऐसा ही है, जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति!'

"इस अवस्था में भी गोपियों में माहात्म्यज्ञान की विस्मृति का अपवाद नहीं।'

इसे समझना।

"उसके बिना, भगवान को भगवान जाने बिना किया जाने वाला ऐसा प्रेम जारों के प्रेम के समान है।'

"उसमें, जार के प्रेम में, प्रियतम के सुख से सुखी होना नहीं है।'

..."जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति।'

कृष्ण के प्रेम में, कथा है, सोलह हजार गोपियों की। संख्या तो सिर्फ असंख्य का प्रतीक है। लेकिन गोपियों के प्रेम को समझना जरूरी है, क्योंकि भक्त वैसी ही दशा में फिर पहुंच जाता है। कृष्ण का होना शरीर में आवश्यक नहीं है। यह तो भक्त का भाव है जो कृष्ण को मौजूद कर लेता है। कृष्ण के होने का सवान नहीं है; ये तो हजारों गोपियों की प्रार्थनाएं हैं, जो कृष्ण को शरीर में बांध लेती हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

राधा कृष्ण के साथ ही नाची; मीरा को जरा भी तकलीफ न हुई, कृष्ण के बिना भी वैसा ही नाच नाची, और कृष्ण के साथ ही नाची। और अगर गौर करो, तो मीरा की गहराई राधा से भी ज्यादा मालूम पड़ती है, क्योंकि राधा के लिए तो कृष्ण सहारे के लिए मौजूद थे, मीरा के लिए तो कोई भी मौजूद न था। मीरा के भगवान तो उसके भाव का ही साकार रूप थे। मीरा के भगवान तो मीरा ने अपने को ही ढालकर बनाए थे, अपने को ही निछावर करके निर्मित किए थे।

कृष्ण मौजूद हो और तुम राधा बन जाओ, तुम्हारी कोई खूबी नहीं, कृष्ण की खूबी होगी। कृष्ण मौजूद न हों और तुम मीरा बन जाओ, तो तुम्हारी खूबी है, कृष्ण को आना पड़ेगा।

भक्त खींचता है भगवान को रूप में। भक्त भगवान को गुणों के जगत में, पृथ्वी पर ले आता है।

कैसी थी ब्रजगोपियों की भक्ति?

एक क्षण को भी विस्मरण हो जाए तो रोती हैं। एक क्षण को भी कृष्ण न दिखाई पड़े तो तड़फती हैं। लेकिन ऐसा तो साधारण प्रेम में भी कभी हो जाता है: प्रेमी न हो, प्रेयसी तड़फती है;प्रेयसी न हो तो प्रमी तड़पता है।

फर्क क्या है ब्रज की गोपियों की भक्ति में और साधारण प्रेमियों की भक्ति में? फर्क इतना है कि ब्रजगोपियां कृष्ण के प्रेम में हैं, लेकिन परिपूर्ण होशपूर्वक कि कृष्ण भगवान हैं। वह प्रेम किसी व्यक्ति को प्रेम नहीं, भगवत्ता का प्रेम है। अन्यथा फिर साधारण प्रेम हो जाएगा।

कृष्ण को भी तुम ऐसे प्रेम कर सकते हो जैसे वे शरीर हैं, तुम्हारे जैसे ही एक व्यक्ति हैं। तब कृष्ण मौजूद भी हों तो भी तुम चूक गए।

रुक्मणी कृष्ण की पत्नी है, लेकिन रुक्मणी का नाम कृष्ण के साथ अकसर लिया नहीं जाता--लिया ही नहीं जाता। सीता का नाम राम के साथ लिया जाता है। पार्वती का नाम शिव के साथ लिया जाता है। कृष्ण का नाम रुक्मणी के साथ और रुक्मणी का नाम कृष्ण के साथ नहीं लिया जाता। और राधा उनकी पत्नी नहीं है, याद रखना। राधा का नाम लेना बिलकुल गैरकानूनी है, कृष्ण-राधा कहना, राधा-कृष्ण कहना बिलकुल गैरकानूनी है, नाजायज है, नियम के बाहर है। वह उनकी पत्नी नहीं है। पर क्या बात है, रुक्मणी कैसे विस्मृत हो गई? रुक्मणी कैसे अलग-थलग पड़ गई?

रुक्मणी पत्नी थी और कृष्ण में भगवान को न देख पायी, पुरुष को ही देखती रही--बस ही चूक हो गई। वहीं राधा करीब आ गई जहां रुक्मणी चूक गई।

रुक्मणी दूर पड़ती गई। वह कृष्ण को पुरुष ही मानती रही, पुरुषोत्तम न देख पाई, पुरुष ही दिखाई पड़ता रहा, पति ही दिखाई पड़ता रहा। गहरी ईष्या में जली रुक्मणी, जैसा पत्नियां अकसर जलती है। पत्नी वहां दूर बैठी है और देख रही है। राधा और गोपियां और कृष्ण के पास प्रेमियों का और प्रेयसियों का इतना बड़ा जाल: रुक्मणी जली! बड़े दुख में पड़ी। कृष्ण की भगवत्ता न देख पाई। तो प्रेम साधारण हो गया--प्रेम रह गया, भक्ति न बन पाई।

प्रेम कब भक्ति बनता है?

जैसे ही प्रेमी में भगवान दिखाई पड़ता है, वैसे ही प्रेम भक्ति बन जाता है। कृष्ण का होना जरूरी थोड़े ही है! क्योंकि कृष्ण के होने में अगर यह बात होती तो रुक्मणी को भी भक्ति उपलब्ध हो गई होती।

तो, मैं तुमसे कहता हूं, इससे उलटा भी हो सकता है। तुम अपने प्रेमी में, अपने पति में, अपनी पत्नी में, अपने बेटे में, अपने मित्र में, कहीं वही भूल तो नहीं कर रहे हो जो रुक्मणी ने की? सोचना। कहीं वही भूल तो नहीं हो रही है?

मैं तुमसे कहता हूं, वही भूल हो रही है, क्योंकि उसके सिवाय कोई भी नहीं है। "वही' सब में छिपा है। जरा खोदो, जरा गहरे उतरो। जरा दूसरे में डुबकी लो। जरा अनन्यता के भाव को जगने दो। और तुम अचानक पाओगे: वही भूल, रुक्मणी की भूल, सारे संसार से हो रही है। सभी के पास कृष्ण खड़ा है--सभी के पास भगवान खड़ा है। भीतर भी वही है, बाहर भी वही है। लेकिन बाहर तुम्हारी आंखें देखने की आदी हैं, कम से कम बाहर तो उसे देखो। एक दफा पुरुष खो जाए और परमात्मा दिखाई पड़े; पुरुष खो जाए, पुरुषोत्तम दिखाई पड़े...!

तो नारद कहते हैं, "जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति 

हालांकि वे दीवानी थीं, पागल थीं प्रेम में, लेकिन एक क्षण को भी भूलीं नहीं कि कृष्ण भगवान हैं; उतनी बेहोशी में भी होश रहा, अपवाद नहीं है; यह बात तो कभी न भूलीं कि कृष्ण भगवान हैं; यह बात तो याद ही रही; लड़ीं भी, झगड़ी भी, रूठीं भी, लेकिन यह बात तो याद रही कि कृष्ण भगवान हैं।

उतनी ही बात प्रेम को भक्ति की ऊंचाई पर उठा देती है।

प्रेम जब तक भक्ति न बन जाए तब तक जानना "अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं,' अभी और भी परिक्षाएं पार करनी हैं प्रेम की। प्रेम पर मत रुक जाना।

प्रेम कली है, भक्ति फूल है। प्रेम पर मत रुक जाना।

"अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं

सितारों के आगे जहां और भी हैं।'

जब तक प्रेम तुम्हारा भक्ति न बन जाए, जब तक प्रेमी में तुम्हें भगवान न दिखाई पड़ जाए--तब तक रुकना मत; तब तक मस्जिद-मंदिरों में ठहर मत जाना।

मंदिर-मस्जिद से पार जाना है! सीमा से पार जाना है! संप्रदाय से पार जाना है! मत-मतांतर से पार जाना है!

प्रासंगिक दिखाई पड़ती है बात कि हम कहीं मंदिर-मस्जिदों में, आकारों में, सीमाओं में, गुणों में उलझे हैं-- और इसलिए वह जो उनके भीतर छिपा है, हमारे हाथ से चूका जा रहा है, पकड़ में नहीं आता। खोल ही दिखाई पड़ती है। ऊपर का सांयोगिक असार ही दिखाई पड़ता है, भीतर का सार, स्वभाव, स्वरूप दिखाई नहीं पड़ता।

जब तुम प्रेम करते हो--साधारण प्रेम, जिसे हम प्रेम कहते हैं--तो तुम अपने सुख की फिक्र कर रहे हो; तुम प्रेमी का उपयोग कर रहे हो। भक्ति प्रेमी के सुख की चिंता करती है, अपने को समर्पित करती है। प्रेम में तुम प्रेमी का उपयोग करते हो साधन की तरह, अपने सुख के लिए। भक्ति में तुम साधन बन जाते हो प्रेमी के, उसके सुख के लिए।

भक्ति समर्पण है। भक्त फिर भगवान के लिए जीता है।

कबीर ने कहा है, जैसे बांस की पोली पोंगरी खुद गीत नहीं गाती, फिर परमात्मा के ही गीत उससे बहते हैं। बांस की पोंगरी तो सिर्फ पोली है, राह देती है, जगह देती है, स्थान देती है, रुकावट नहीं देती।

तो कबीर ने कहा है, "अगर गीत में कहीं कोई अड़चन आती हो तो मेरी बांस की पोंगरी की भूल समझना, कहीं कोई गड़बड़ होगी। तुम तो गीत ठीक ही ठीक गाते हो; अड़चन आती होगी, बाधा पड़ती होगी, मेरे कारण पड़ जाती है। कसूर हो तो मेरा, भूल-चूक हो तो मेरी; जो भी ठीक हो, तेरा! दुखी होता हूं तो मैं अपने कारण, सुखी होता हूं तो तेरे कारण। बंधता हूं तो अपने कारण, मुक्त होता हूं तो तेरे कारण। नरक बनता हूं तो मैं, स्वर्ग तो सब तेरा प्रसाद है!'

प्रेम अपने सुख की तलाश है इसलिए प्रेम दुख में ले जाता है। जो अपने सुख की तलाश कर रहा है, वह "मैं' को पकड़े हुए है। और "मैं' सारे दुखों का निचोड़ है। वही तो कांटा है, चुभता है। जिसने प्रेमी के सुख को सब कुछ माना, जिसने सब प्रेमी के सुख पर निछावर किया, उसके जीवन में कोई दुख नहीं।

तुम जब तक अपना सुख खोजोगे, दुख पाओगे। जिस दिन तुम परमात्मा का सुख खोजने लगे कि वह जिसमें सुखी हो, वही मेरा सुख...।

 अपने सुख को खोजने का अर्थ है: अहंकार अभी भी खोज रहा है। उसके सुख को खोजना जब शुरू हो जाए, भक्त तब ऐसे जीने लगता है जैसे बांस की पोंगरी; बांसुरी बन जाता है: सब स्वर "उसी' के हैं। फिर कोई दुख नहीं है। फिर कोई नरक नहीं है। फिर अंधेरा भी रोशन है। फिर मौत भी और नये जीवन की शुरूआत है। फिर कांटों में भी फूल दिखाई पड़ने लगते हैं, कांटे भी फूल हो जाते हैं। फिर दुख अनुभव में आता ही नहीं। फिर हैरानी होती है यह देखकर कि लोग दुखी क्यों हो रहे हैं!

सब उपलब्ध है। महोत्सव की तैयारियां हैं और लोग दुखी हो रहे हैं। परमात्मा गीत गाने को तैयार है। उसके ओंठ फड़क रहे हैं। तुम्हारी बांसुरी तैयार नहीं है। तुम खाली नहीं हो, तुम भरे हो!

अहंकार से खाली होते ही "उसका' प्रवेश हो जाता है।

ओशो रजनीश 








रविवार, 10 सितंबर 2023


सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।।

निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः।।

तस्मिन्नन्यता तद्धिरोधिषूदासीनता च।।

अन्याश्रयाणां त्यागो५नन्यता।।

लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्धिरोधिषूदासीनता।।

भवतु निश्चयदाढर्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्।।

अन्यथा पातित्याशङ्कया।।

लोको५पि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीधारणावधि।।


जीवन की व्यर्थता जब तक प्रगाढ़ अनुभव न बन जाए तब तक परमात्मा की खोज शुरू नहीं होती। जीवन की व्यर्थता का बोध ही उसकी तरफ पहला कदम है। जब तक ऐसी भ्रांति बनी है कि यहां कुछ खोज लेंगे, पा लेंगे, यहां कुछ मिल जायेगा सपनों की दुनिया में--तब तक परमात्मा भी एक सपना ही है; तब तक तुम उसे खोजने नहीं निकलते; तब तक तुम स्वयं को दांव पर भी नहीं लगाते।

परमात्मा मुफ्त मिलनेवाला नहीं है। जो भी तुम हो, तुम्हारी परिपूर्ण सत्ता जब तक दांव पर न लग जाए, तब तक परमात्मा से कोई मिलन नहीं। क्योंकि प्रेम इससे कम पर नहीं मिल सकता। और प्रार्थना इससे कम पर शुरू नहीं होती। यह काम जुआरियों का है, दुकानदारों का नहीं। यहां पूरी खोने की हिम्मत चाहिए। दीवानगी चाहिए! मस्ती चाहिए!

लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब जो तुम्हारे पास है, वह व्यर्थ दिखायी पड़ता है; वह कूड़ा-करकट हो जाता है, तब तुम उसे पकड़ते नहीं।

करोड़ों लोग परमात्मा के शब्द का उच्चार करते हैं, प्रार्थना करते हैं, पूजा करते हैं; लेकिन उसकी कोई झलक नहीं मिलती। क्या पूजा व्यर्थ है? नहीं, करनेवालों ने की ही नहीं। क्या प्रार्थना शून्य आकाश में खो जाती है,  कोई प्रत्युत्तर नहीं आता? प्रार्थना थी ही नहीं; अन्यथा प्रत्युत्तर तत्क्षण आता है। इधर तुमने पुकारा भी नहीं कि उधर प्रत्युत्तर मिला नहीं! पर तुमने पुकारा ही नहीं। तुम सोचते हो कि तुमने पुकारा, तुम सोचते हो कि तुमने प्रार्थना की; लेकिन कभी तुमने हृदय को दांव पर लगाया नहीं।

आधे-आधे मन से न होगा।: पूरे-पूरे की मांग है।

तो, जब तक तुम्हें लगता है कि संसार में अभी कुछ मिल सकता है, रस कायम है, जब तक तुम जागे नहीं, सपने में थोड़े उलझे हो, जब तक तुम्हें सपने में भरोसा है कि यह सच है--तब तक परमात्मा की तरफ आशाओं का प्रवाह, आकांक्षाओं का प्रवाह शुरू नहीं होता; तब तक प्रार्थना तुम्हारी अभीप्सा नहीं होती, तुम्हारे हृदय की भाव-दशा नहीं होती; तब तुम्हारी प्रार्थना भी तुम्हारी चालाकी, तुम्हारे गणित, तुम्हारी होशियारी का हिसाब होती है। तुम सोचते हो: "चलो, हो-न-हो कहीं परमात्मा हो ही न, प्रार्थना भी कर लो, पूजा भी कर लो, बिगड़ता क्या है! हानि क्या है! अगर लाभ हुआ तो हो जाएगा, न हुआ तो हानि तो कुछ भी नहीं।'

बस तुम्हारी प्रार्थना ऐसी ही है कि अगर लाभ न हुआ, कोई हर्जा नहीं, "हानि क्या होगी!' सभी नास्तिक आस्तिक होने लगते हैं, क्योंकि जैसे-जैसे मौत करीब आती है और पैर लड़खड़ाते हैं और अंधेरा घना होने लगता है और आकाश के तारे छुपने लगते हैं, सब आशाओं के दिये बुझने लगते हैं और लगता है कि अब सिर्फ कब्र के अतिरिक्त और कोई जगह न रही, तो नास्तिक भी परमात्मा का स्मरण करने लगता है: कौन जाने, शायद हो!

लेकिन "शायद' से प्रार्थना नहीं बनती। "शायद' से समझदारी तो समझ में आती है, प्रेम समझ में नहीं आता।

समझदारी से कोई कभी समझदार नहीं हुआ। समझदारी के कारण ही तो तुम नासमझ बने हो। तुम्हारी समझदारी ही महंगी पड़ रही है।

तो, परमात्मा की तरफ अगर तुम होशियारी से जा रहे हो, बही-खाते का हिसाब वहां भी फैला रहे हो, सोचते हो कि ठीक है, संसार को भी संभाल लें, परमात्मा को भी संभाल लें, दोनों नावों पर सवार हो जाएं--तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। तुम मुश्किल में पड़े हो, क्योंकि मैं देखता हूं, तुम दोनों नावों में आधे-आधे खड़े हो।

नाव पर तो एक ही चढ़ा जाता है...एक ही नाव पर चढ़ा जाता है, अन्यथा दुविधा पैदा हो जाती है। दो दिशाओं में चलोगे तो टूट जाओगे, खंड-खंड हो जाओगे, बिखर जाओगे। और जब तुम ही खंड-खंड हो गये, बिखर गये, जब तुम्हारे भीतर ही एकतानता न रही, तो प्रार्थना कौन करेगा, पूजा कौन करेगा? भीड़ थोड़े ही पूजा करती है; भीतर की एकता से पूजा उठती है; भीतर की अखंडता से सुगंध उठती है प्रार्थना की।

तो इस बात को पहले खयाल में ले लेना चाहिए तो ही भक्ति-सूत्र समझ में आ सकेंगे।

यह जिंदगी अगर तुम्हें अभी भी रसपूर्ण मालूम पड़ती है तो थोड़ा और जी लो। आज नहीं कल, रस टूट जायेगा।

जितना आदमी सजग हो उतने जल्दी रस टूट जाता है। जितना आदमी बेहोश हो, उतनी देर तक रस टिकता है। बेहोशी रस का सहारा है। जितनी तुम्हारे भीतर बुद्धिमानी हो--होशियारी नहीं कह रहा हूं, चालाकी नहीं कह रहा हूं; बुद्धिमत्ता हो--उतनी जल्दी तुम जीवन के रस से चुक जाओगे। और जब जीवन का रस चुकता है तभी तुम्हारी रसधार जो जीवन में नियोजित थी, मुक्त होती है: अब संसार में जाने को कोई जगह न बची; अब वह रास्ता न रहा; अब चीजों की तरफ दौड़ने की बात न रही; अब संग्रह को बड़ा करना है, मकान बड़ा बनाना है धन इकट्ठा करना है, पद-प्रतिष्ठा पानी है--यह सब व्यर्थ हुआ;अब तुम अपने घर की तरफ लौटते हो।

"घर बयाबां में बनाया नहीं हमने लेकिन

जिसको घर समझे हुए थे वह बयाबां निकला।'

कोई रेगिस्तान में घर नहीं बनाया था, लेकिन जिसको घर समझे हुए थे वही रेगिस्तान निकला, वही वीरान निकला।

जिस दिन तुम्हें अपना घर बयाबां मालूम पड़े, वीरान मालूम पड़े...वीरान है; सिर्फ तुम अपने सपनों के कारण उसे सजाये हो। जरा चौंककर देखो: जिसे तुम घर कह रहे हो, वह घर नहीं है, ज्यादा-से-ज्यादा सराय है; आज टिके हो, कल विदा हो जाना पड़ेगा। जो छिन ही जाना है, उसको अपना कहना किस मुंह से संभव है? जहां से उखड़ ही जाना पड़ेगा, जहां क्षण-भर को ठहरने का अवसर मिला है,, पड़ाव हो सकता है, मंजिल नहीं है, और मंजिल के पहले घर कहां! घर तो वहीं हो सकता है जहां पहुंचे तो पहुंचे, जिसके आगे जाने को कुछ और न रहे।

परमात्मा के अतिरिक्त कोई घर नहीं हो सकता।

मुझसे लोग पूछते हैं, "संन्यास की परिभाषा क्या?' तो मैं कहता हूं, "दो तरह के घर बनानेवाले हैं, दो तरह के गृहस्थ हैं: एक जो संसार में घर बनाते हैं, उनको हम गृहस्थ कहते हैं; एक जो परमात्मा में घर बनाते हैं, वे भी गृहस्थ हैं, उनको हम संन्यासी कहते हैं--सिर्फ भेद करने को। घर अलग-अलग जगह बनाते हैं। एक हैं जो पानी पर जीवन को लिखते हैं, लिख भी नहीं पाते और मिट जाता है; और एक हैं जो जीवन की शाश्वतता पर लिखते हैं। एक हैं जो रेत पर घर बनाते हैं, जिनकी बुनियाद ही डगमगा रही है; और एक है जो जीवन की शाश्वतता को आधार की तरह स्वीकार करते हैं।'

पहला सूत्र है: 

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोध-स्वरूपा है।'

संसार यानी कामना। संसार का ठीक अर्थ समझ लो, क्योंकि तुम्हें संसार का भी अर्थ गलत ही बताया गया है। कोई घर छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता है, संसार छोड़ दिया। कोई पत्नी को छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता है, संसार छोड़ दिया। काश, संसार इतना स्थूल होता! काश, तुम्हारी पत्नी के छोड़ जाने से संसार छूट जाता! काश, बात इतनी सस्ती होती! तो संन्यास बहुत बहुमूल्य नहीं होता।

संसार न तो पत्नी में है, न घर में है, न धन में है, न बाजार में है, न दुकान में है--संसार तुम्हारी कामना में है। जब तक तुम मांगते हो कि मुझे कुछ चाहिए, जब तक तुम सोचते हो कि मेरा संतोष, मेरा सुख, मुझे मिल जाए, उसमें है, तब तक तुम संसार में हो।

जब तक मांग है तब तक संसार है।

संसार का अर्थ है: तुम्हारा हृदय एक भिक्षापात्र है, जिसको लिये तुम मांगते फिरते हो--कभी इस द्वार, कभी उस द्वार। कितने ठुकराये जाते हो! लेकिन फिर-फिर संभलकर मांगने लगते हो। क्योंकि एक ही तुम्हारे मन में धारणा है कि और ज्यादा, और ज्यादा मिल जाए, तो शायद सुख हो!

"और' की दौड़ संसार है।

तो तुम मंदिर में भी बैठ जाओ और वहां भी अगर तुम मांग रहे हो तो तुम संसार में ही हो। तुम हिमालय पर चले जाओ, वहां भी आंख बंद करे अगर तुम मांग ही रहे हो, परमात्मा से कह रहे हो, "और दे, स्वर्ग दे, मोक्ष दे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या मांगते हो। संसार का कोई संबंध इससे नहीं है कि तुम क्या मांगते हो; अन्यथा संसार छोड़ने का ढोंग भी हो जाता है और संसार छूटता भी नहीं।

संसार तुम्हारे भीतर है, बाहर नहीं। संसार तुम्हारी इस मांग में है कि "मैं जैसा हूं वैसा काफी नहीं हूं, कुछ चाहिए जो मुझे पूरा करे; मैं अधूरा हूं, अतृप्त हूं, कुछ मिल जाए जो मुझे पूरा करे, तृप्त करे, संतुष्ट करे!'

स्वयं को अधूरा मानने में और आशा रखने में कि कुछ मिलेगा जो पूरा कर देगा, बस वहां संसार है।

मांग छूटी: संसार छूटा! तब कोई घर छोड़ने की जरूरत नहीं है, न पत्नी को छोड़ने की जरूरत, न पति को, न बच्चों को--उनको कोई कसूर नहीं है!... घर में रहते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो।... पत्नी के पास बैठे तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। बच्चों को सजाते-संभालते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। क्योंकि संसार से मुक्त होने को केवल इतना ही अर्थ है कि अब तुम तृप्त हो, जैसे हो, जो हो; तुम्हारे होने में अब कोई मांग नहीं है; तुम्हारे होने में अब कोई आकांक्षा नहीं है; तुम्हारा होना कामनातुर नहीं है; तुम अब कामनाओं का फैलाव नहीं हो, विस्तार नहीं हो--तुम बस हो: तृप्त, यही क्षण, और जैसे तुम हो, पर्याप्त है, पर्याप्त से भी ज्यादा है।

जब तुम्हारी प्रार्थना धन्यवाद बन जाती है, मांग नहीं। जब तुम मंदिर कुछ मांगने नहीं जाते; तुम उसे धन्यवाद देने जाते हो कि "तूने इतना दिया, अपेक्षा से ज्यादा दिया, जो कभी मांगा नहीं था वह दिया। तेरे देने का कोई अंत नहीं! हमारा पात्र ही छोटा पड़ता जाता है और तू भरे जा रहा है!'

...तब भी तुम रोते हो जाकर मंदिर में, लेकिन तब तुम्हारे आंसुओं का सौंदर्य और!

जब तुम मांग से रोते हो, तब तुम्हारे आंसू गंदे हैं, दीन हैं, दरिद्र हैं। जब तुम अहोभाव से रोते हो, तुम्हारे आंसुओं का मूल्य कोई मोती नहीं चुका सकते। तब तुम्हारा एक-एक आंसू बहुमूल्य है, हीरा है। आंसू वही है, लेकिन अहोभाव से भरे हुए हृदय से जब आता है, तो रूपांतरित हो जाता है।

तुम जरा फर्क करके देखना। तुम दुख में भी रोये हो, पीड़ा में रोये हो, असंतोष में रोये हो, शिकायत में रोये हो; कभी अहोभाव में भी रोकर देखना; कभी आनंद में भी रोकर देखना--और तुम पाओगे: तुम्हारे बदलते ही आंसुओं का ढंग भी बदल जाता है। तब आंसू फूलों की तरह आते हैं। तब आंसुओं में एक सुगंध होती है जो इस लोक की नहीं है।

मीरा भी रोती है, पर मीरा के आंसू भिखारी के आंसू नहीं है। चैतन्य भी रोते हैं, लेकिन चैतन्य के आंसू दीन-दरिद्र नहीं हैं, कुछ मांग से नहीं निकल रहे हैं, किसी अभाव से पैदा नहीं हुए हैं--किसी बड़ी गहन भाव-दशा से जन्मे हैं! गंगा का जल भी उतना पवित्र नहीं है।

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।

'निरोधस्वरूपा!

साधारणतः भक्ति-सूत्र पर व्याख्या करनेवालों ने निरोधस्वरूपा का अर्थ किया है कि जिन्होंने सब त्याग दिया, छोड़ दिया। नहीं, मेरा वैसा अर्थ नहीं है। जरा सा फर्क करता हूं, लेकिन फर्क बहुत बड़ा है। समझोगे तो उससे बड़ा फर्क नहीं हो सकता।

निरोधस्वरूपा का अर्थ यह नहीं है कि जिन्होंने छोड़ दिया--निरोधस्वरूपा का अर्थ है कि जिनसे छूट गया। निरोध और त्याग का वही फर्क है। त्याग का अर्थ होता है: छोड़ा निरोध का अर्थ होता है: छूटा, व्यर्थ हुआ। जो चीज व्यर्थ हो जाती है उसे छोड़ना थोड़े ही पड़ता है, छूट जाती है।

सुबह तुम रोज घर का कूड़ा-करकट इकट्ठा करके बाहर फेंक आते हो तो तुम कोई जाकर अखबारों के दफ्तर में खबर नहीं देते कि आज फिर त्याग कर दिया कूड़े-करकट का, ढेर-का-ढेर त्याग कर दिया! तुम जाओगे तो लोग तुम्हें पागल समझेंगे। अगर कूड़ा-करकट है तो फिर छोड़ा, इसकी बात ही क्यों उठाते दो हो?

तो जो आदमी कहता है, "मैंने त्याग किया, "वह आदमी अभी भी निरोध को उपलब्ध नहीं हुआ। क्योंकि त्याग करने का अर्थ ही यह होता है कि अभी भी सार्थकता शेष थी।

अगर कोई कहता है कि मैंने बड़ा स्वर्ण छोड़ा बड़े महल छोड़े गौर से देखना: स्वर्ण अभी भी स्वर्ण था, महल अभी भी महल थे। "छोड़ा'!  छोड़ना बड़ी चेष्टा से हुआ। चेष्टा का अर्थ ही यह होता है कि रस अभी कायम था; फल पका न था, कच्चा था, तोड़ना पड़ा।पका फल गिरता है; कच्चा फल तोड़ना पड़ता है।

तो त्यागी तो सभी कच्चे हैं। निरोध को उपलब्ध व्यक्ति पका हुआ व्यक्ति है। त्याग और निरोध का यही फर्क है। नारद कह सकते थे, "त्यागस्वरूपा है', पर उन्होंने नहीं कहा। "निरोधस्वरूपा'! व्यर्थ हो गयी जो चीज, वह गिर जाती है, उसका निरोध हो जाता है।

सुबह तुम जागते हो तो सपनों का त्याग थोड़े ही करते हो, कि जागकर तुम कहते हो, "बस रात-भर के सपने छोड़ता हूं।' जागे कि निरोध हुआ। जागते ही तुमने पाया कि सपने टूट गये; सपने व्यर्थ हो गये; सपने सिद्ध हो गये कि सपने थे, बात समाप्त हुई; अब उनकी चर्चा क्या करनी है!

जो त्याग का हिसाब रखते हैं, समझना, भोगी ही हैं--शीर्षासन करते हुए, उलटे खड़े हो गये हैं, भोगी ही हैं।

एक संन्यासी को मैं जानता हूं जो भूलते ही नहीं...। कोई चालीस साल पहले उन्होंने छोड़ा था संसार--छोड़ा था, निरोध नहीं हुआ था--चालीस साल बीत गये, अभी भी छूटा नहीं। छोड़ा हुआ कभी छूटता ही नहीं। वे अभी भी कहते रहते हैं कि मैंने लाखों रुपये पर लात मार दी। मैंने उनसे एक दिन कहा कि लात लग नयी पायी; तुमने मारी होगी; चूक गयी! उन्होंने कहा, क्या मतलब?'

चालीस साल हो गये...छूट गया, छूट गया। इसकी चर्चा क्यों खींचते हो, इसे रोज-रोज याद क्यों करते हो? रस कायम है। लाखों में अभी भी मूल्य है। अभी भी तुम दूसरों को भूलते नहीं बताना कि मैंने लाखों पर लात मारी। तुमने बैंक-बैलेंस कायम रखा है। गिनती जारी है। नहीं, यह त्याग तो है, निरोध नहीं।'

त्याग झूठा सिक्का है निरोध का। निरोध बड़ी अदभुत घटना है!

रामकृष्ण के पास एक आदमी आया, हजार सोने की अशर्फियां लाया था, दान करने, उनको देने। उन्होंने कहा, "मुझे जरूरत नहीं। तू एक काम कर, गंगा में फेंक आ।' वह गया, लेकिन घंटा-भर हो गया, लौटा नहीं, तो रामकृष्ण ने आदमी भेजे कि देखो, क्या हुआ, कहीं दुख में डूब तो नहीं मरा! गये तो वह एक अशर्फी को बजा-बजाकर फेंक रहा था, भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, लोग चमत्कृत हो रहे थे। तो उन्होंने आकर कहा कि वह एक-एक अशर्फी गिन-गिनकर फेंक रहा है।

तो रामकृष्ण गये और उससे कहा,"नासमझ! जब कोई इकट्ठा करता है तब तो गिनना समझ में आता है। लेकिन जब फेंकना ही है तो क्या गिनकर फेंकना! नौ सौ निन्यानबे थीं कि हजार थीं, क्या फर्क पड़ता है! कोई हिसाब रखना है पीछे कि कितनी फेंकी, कि कितनी दान कीं? अगर हिसाब रखना है तो फेंक ही मत, अपने घर ले जा। जब हिसाब ही नहीं छूटता है तो अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना है; असली चीज अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना है; असली चीज अशर्फियों का छूटना नहीं है।'

जीसस ने कहा है: "तुम्हारा एक हाथ जो दान करे, दूसरे हाथ को पता न पड़े।'

सूफी फकीर कहते हैं: "नेकी कर, कुएं में डाल। हिसाब मत रख। किया भूल, कुएं में डाल दे। बात खत्म हो गयी, जैसे कभी हुई ही न थी।'

लेकिन तुम जाओ अपने त्यागियों के पास, महात्माओं के पास, तुम उनके पास पूरा हिसाब पाओगे। हिसाब ठीक भी नहीं पाओगे, बहुत बढ़ा-चढ़ाया हुआ है। हजार छोड़े होंगे तो लाख हो गये हैं। अब पूछता कौन है? और त्याग की परीक्षा भी क्या है, कसौटी भी क्या है? तुम्हारे पास लाख रुपये हैं तो तुम रुपये दिखा सकते हो; लेकिन जिसने लाख छोड़े हैं उसके पास प्रमाण क्या है कि उसने लाख छोड़े कि दस लाख छोड़े? न केवल महात्याग ऐसा करते हैं, महात्माओं के शिष्य उसको बढ़ाते चले जाते हैं।

महावीर ने महल छोड़ा, धन-संपत्ति छोड़ी, जैनियों ने जो शास्त्र लिखे हैं, उनमें इतना बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है, वह सरासर झूठ है। क्योंकि महावीर का साम्राज्य बड़ा छोटा-सा था कोई बड़ा नहीं था। महावीर के समय भारत में दो हजार राज्य थे। कोई बहुत बड़ा नहीं था, एक छोटी डिस्ट्रिक्ट से ज्यादा नहीं, एक छोटे जिले से ज्यादा नहीं था। इतने हाथी-घोड़े जितने जैनियों ने लिखे हैं, अगर होते तो आदमियों के रहने की जगह न रह जाती। लेकिन बढ़-चढ़ जाता है।

कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध हुआ। हिंदू उसकी जो कहानी बताते हैं, उसको अगर सुनो तो ऐसा लगता है कि उस युद्ध के लिए पूरी पृथ्वी कम पड़ेगी। कुरुक्षेत्र का छोटा-सा मैदान उसमें अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाएं बन नहीं सकतीं; लड़ना तो दूर, अगर वे प्रेम भी करना चाहें, शांत खड़े होकर, तो भी संभव नहीं है। लड़ने के लिए थोड़ी जगह चाहिए, स्थान चाहिए! लेकिन बढ़ता जाता है...।

बुद्ध के भक्तों ने जो लिखा है वह सच नहीं है, क्योंकि बुद्ध की भी जगह बड़ी छोटी थी, वह कोई बहुत बड़ा साम्राज्य नहीं था। लेकिन जिस तरह की कहानियां हैं... और कहानियां बढ़ती चली गयी हैं।

क्यों? इन कहानियों को बढ़ाने का कारण क्या है? कारण साफ है कि हम त्याग को भी धन की मात्रा से ही समझ पाते हैं, और कोई उपाय नहीं है।

समझो, अगर महावीर फकीर के घर पैदा होते और पास धन न होता, तो तुम कैसे जानते कि उन्होंने त्याग किया? वे घर छोड़ देते, लेकिन त्यागी तो नहीं हो सकते थे। महात्यागी तुम कैसे कहते? था ही नहीं कुछ तो छोड़ा क्या?

तुम्हें भीतर के रहस्य तो दिखायी नहीं पड़ते, बस बाहर की चीजें दिखायी पड़ती हैं। तब तो इसका यह अर्थ हुआ कि केवल धनी ही त्यागी हो सकते हैं। तब तो इसका अर्थ हुआ कि त्यागी होने के पहले बहुत धनी हो जाना जरूरी है। तब तो इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा के जगत में भी अंततः धन का ही मूल्य है, उसी से हिसाब लगेगा।

एक फकीर ने सब छोड़ दिया, उसके पास दो पैसे थे। महावीर ने भी सब छोड़ दिया, उनके पास करोड़ रुपये थे, परमात्मा के सामने हिसाब में महावीर जीत जाएंगे, गरीब हार जाएगा। दो पैसे छोड़े! इन्होंने करोड़ छोड़े!

नहीं, परमात्मा के राज्य में तुमने क्या छोड़ा, इसका सवाल नहीं है; छोड़ा या नहीं छोड़ा, बस इसका ही सवाल है; छोड़ा या छूटा, इसका ही सवाल है।

निरोध का अर्थ है: छूट जाता है।

जिन्होंने संसार के सत्य को देखा, उनके जीवन में निरोध आ जाता है। उस निरोध को नारद ने भक्ति का स्वभाव कहा।

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, और निरोधस्वरूपा है।' उसका स्वरूप है निरोध।

जैसे ही संसार से कामना हटती है, वही कामना परमात्मा की दिशा में प्रार्थना बन जाती हैं, वही ऊर्जा है! कोई अलग ऊर्जा नहीं है। वे ही हाथ जो भिक्षापात्र बने थे, प्रार्थना में जुड़ जाते हैं। वही हृदय जो धन-संपत्ति को मांगता फिरता था, परम अहोभाव में झुक जाता है। वही जीवन-ऊर्जा जो नीचे की तरफ भागती थी, खाई-खड्ड खोजती थी, आकाश की तरफ उठने लगती है।

"तेरी राह किसने बतायी न पूछ, दिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'

तेरी राह किसने  बतायी, यह मत पूछ--प्यासा दिल सदगुरु हो गया; व्याकुल हृदय मार्गदर्शक बन गया!

"तेरी राह किसने बतायी न पूछ दिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'

जिस दिन संसार से तुम्हारा रस टूटता है, व्याकुलता जगती है परमात्मा की। वही मार्गदर्शक हो जाता है। वही तुम्हें ले चलता है। उसी के सहारे लोग पहुंचते है।

संसार की मांग करता हुआ व्यक्ति उन हजार चीजों में चाहे तो परमात्मा की मांग का भी जोड़ ले सकता है, लेकिन वह फेहरिश्त में एक नाम होगा--लंबी फहेरिश्त में! और मेरे खयाल से आखिरी होगा। अगर तुम्हारी फेहरिश्त में हजार नाम हैं तो वह एक हजार एक होगा।

 "हम प्रार्थना करना चाहते हैं समय कहां!'  जब प्रार्थना का सवाल उठता है तो कहते हैं, "समय कहां!'

वे क्या कह रहे हैं? वे यह कह रहे हैं कि और बड़ी चीजें हैं परमात्मा से, समय पहले उनको दें, फिर बच जाए तो परमात्मा को दें। वे यह नहीं कह रहे हैं कि समय नहीं हैं; वे यह कह रहे हैं, समय तो है--समय तो सभी के पास बराबर है--लेकिन और चीजें ज्यादा जरूरी हैं। परमात्मा क्यू में बिलकुल अंतिम खड़ा है। पहले धन इकट्ठा कर लें, मकान बना लें, इज्जत-प्रतिष्ठा संभाल लें, फिर...। ऐसे परमात्मा प्रतीक्षा ही करता रहता है, फिर' कभी आता नहीं--आयेगा ही नहीं, क्योंकि इस संसार की दौड़ कभी पूरी नहीं होती।

यहां कुछ भी पूरा होनेवाला नहीं है। यहां तो जितना पीयो उतनी प्यास बढ़ती जाती है। यहां तो जितना भोजन करो उतनी भूख बढ़ती जाती है। यहां तो जितनी तिजोड़ी भरती जाए, उतना ही आदमी भीतर कृपण होता चला जाता है। दुनिया बड़ी अदभुत है! यहां गरीब के पास तो अमीर का दिल मिल भी जाए, अमीर के पास बिलकुल गरीब का दिल होता है।

इन हजार उपद्रवों में अगर तुम सोचते हो कि परमात्मा को भी एक आकांक्षा बना लेंगे, तो संभव नहीं है। परमात्मा तो अभीप्सा बने, तो ही तुम अधिकारी होते हो। अभीप्सा का अर्थ होता है: सारी इच्छाएं उसी की इच्छा में परिणत हो जाएं, सारे नदी-नाले उसी के सागर में गिर जाएं; उसके अतिरिक्त कुछ भी न सूझे; उसके अतिरिक्त हृदय में कोई आवाज न रहे; उसके अतिरिक्त श्वासों में कोई स्वर न बजे; उसका ही इकतारा बजने लगे!

फकीरों के पास तुमने इकतारा देखा है। कभी सोचा न होगा, इकतारा प्रतीक है: परमात्मा के लिए एक ही तार काफी है। सितार में और बहुत तार होते हैं, वीणा में बहुत तार होते हैं और सारंगी में बहुत तार होते हैं--वे संसार के प्रतीक हैं; इकतारा, परमात्मा का।

बस इकतारा! एक ही अभीप्सा का स्वर बजने लगे, दूसरी कोई ध्वनि भी न रह जाए, तो ही

"रग रग में नेशे इश्क है, ऐ चारागर मेरे!

यह दर्द वह नहीं, के कहीं हो, कहीं न हो।'

रगरग में नेशे इश्क है, ऐ चारागर मेरे!

यह दर्द वह नहीं, कि कहीं हो, कहीं न हो।'

जब परमात्मा का दर्द तुम्हारे रग-रग में समा जाता है; जब तुम्हारा रोआं-रोआं उसी को पुकारता है; सोते और जागते अहर्निश उसका ही स्मरण बना रहता है; करो कुछ भी, याद उसकी ही; जाओ कहीं, याद उसकी ही; बैठो कि उठो कि सोओ, याद उसकी ही-- जब रग-रग में ऐसा समा जाता है, तभी तुमने पात्रता पायी, तभी तुम अधिकारी हुए।

और ध्यान रखना, आज नहीं कल, इस महाक्रांति में उतरना ही पड़ेगा। लाख तुम कोशिश करो इस संसार को घर बना लेने की, सफलता मिलनेवाली नहीं है। कोई कभी सफल नहीं हो पाया। सपने को सच कितना ही मानो, सपना एक दिन टूटता ही है। सपने का स्वभाव ही टूट जाना है। तुम उसे सच मान कर थोड़ी-बहुत देर नींद ले सकते हो, लेकिन सदा के लिए यह नींद नहीं हो सकती। सपने का स्वभाव ही शुरू होना, समाप्त होना है। इस संसार को, तुम लाख कोशिश करो...हम सब कोशिश कर रहे हैं...हम, हमारी सारी कोशिश यही है कि बुद्ध, नारद, मीरा इन सबको हम गलत सिद्ध कर दें।

हम सबकी कोशिश क्या है? हमारी कोशिश यही है कि हम सिद्ध कर देंगे कि, संसार में सुख है; हम सिद्ध कर देंगे कि परमात्मा आवश्यक नहीं है; हम सिद्ध कर देंगे कि जीवन परमात्मा के दिन पर्याप्त है; हम सिद्ध कर देंगे कि धन में है कुछ, कि यह सपना नहीं है, माया नहीं है, सत्य है।

छोड़ो इस मूढ़ता को, कभी कोई कर नहीं पाया! लेकिन इस करने की कोशिश में लोग अपने जीवन को गंवा देते हैं।

"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदली

कफस कफस ही रहा, फिर भी आशियां न हुआ।'

नहीं, यह घर न बन पाएगा। यह जगह कारागृह है, यह घर न बन पाएगी। यहां तुम अजनबी हो। यहां तुम लाख उपाय करो, और कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलें, हजार तरह से कल्पनाएं, सपने को संजोएं, लेकिन यह जाल कल्पना का ही रहेगा।

कल्पना तुम्हारी है; सत्य परमात्मा का है। जब तक तुम सोचोगे-विचारोगे, तब तक तुम सपने में रहोगे। जब तुम सोच-विचार छोड़ोगे और जागोगे, तब तुम जानोगे, सत्य क्या है।

सत्य मुक्तिदायी है। और जो मुक्त करे वही घर है। जहां स्वतंत्रता हो वही घर है।

कारागृह में और घर में फर्क क्या है? दीवालें तो उन्हीं ईंटों की बनी हैं, दरवाजे उन्हीं लकड़ियों के बने हैं।

कारागृह और घर में फर्क क्या है? घर में तुम मुक्त हो; कारागृह में तुम मुक्त नहीं हो--बस इतना ही फर्क है।

घर स्वतंत्रता है; कारागृह गुलामी है।

"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदलीं

कफस कफस ही रहा, फिर भी आशियां न हुआ।'

कारागृह में तुम बदलते रहो कल्पनाएं अपनी, सोचते रहो, जाले बुनते रहो सपनों के, सजाते रहो भीतर से कारागृह को-- नहीं, घर न हो पाएगा।

जो जितनी जल्दी जाग जाए इस संबंध में उतना ही सौभाग्यशाली है; जितनी देर लगती है उतना ही समय व्यर्थ जाता है; जितनी देर लगती है उतनी ही गलत आदतें मजबूत होती चली जाती है; जितनी देर लगती है उतने ही बंधन और भी सख्त होते चले जाते हैं और तुम्हारी शक्ति क्षीण होती चली जाती है उन्हें तोड़ने की। इसलिए बुढ़ापे की प्रतीक्षा मत करना। अगर समझ आए तो जब समझ आ जाए, क्षण-भर भी स्थगित मत करना उस समझ को।

"लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।'

संस्कृत का मूल बहुत अदभुत है! हिंदी में अनुवाद जो लोग करते हैं, उन्हें त्याग और निरोध का कोई भेद साफ नहीं है।

संस्कृत का मूल कहता है:

लोक, वेद, व्यापार, इस सबका निरोध हो जाए, न्यास हो जाए, वही भक्ति है। इसे समझें हम।

इस लोक और परलोक के व्यापार का निरोध हो जाए...।'

इस लोक का व्यापार है: धन की दौड़ है, पद की दौड़ है। परलोक का भी व्यापार है: सुख, आनंद, मोक्ष, वे भी यात्रा ही हैं, वे भी दौड़ हैं। किसी तरह इस संसार से तुम ऊबते हो, ऊब नहीं पाए कि तुम दूसरे संसार के सपने देखते शुरू कर देते हो। इसी तरह सपने देखनेवालों ने स्वर्ग बनाये, स्वर्ग में हजार कल्पनाओं को जगह दी, जो-जो यहां पूरा नहीं हो पाया है, वह-वह वहां रख लिया है। और कभी-कभी तो कल्पनाएं बड़ी मूढ़तापूर्ण मालूम होती हैं कि विचारों तो बड़ी हैरानी होती है।

मुसलमान कहते हैं, उनके स्वर्ग में बहिश्त में, शराब के चश्मे बह रहे हैं। यहां पीने नहीं देते। यहां कहते हैं पाप और वहां चश्मे बहाते हैं। तुम सोच सकते हो, बात बिलकुल सीधी है, यह चश्मों की कल्पना किसने की होगी। यह उन्होंने की है जिनको यहां पीने में रस था और त्याग कर दिया। यह सीधी-सी बात है, सीधा मनोविज्ञान है। यहां पीना चाहते थे, लेकिन डर की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थे, लेकिन धार्मिक शिक्षण की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थे लेकिन हिम्मत न जुटा पाये, तो अब स्वर्ग में चश्मे बहा रहे हैं। यहां चुल्लू-चुल्लू मिलती है, वहां डुबकी लगाएंगे।

"जाहिद के कस्रे-जुहूद की बुनियाद है यही

मस्जिद बहुत करीब थी, मैखाना दूर था।'

वह जिनको तुम त्यागी समझते हो, उनके त्याग में अधिकतर तो कारण यही है कि मस्जिद करीब थी और मधुशाला दूर थी...इतना ही। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म का शिक्षण देनेवाले लोग तो पास थे, शराब का विज्ञापन करनेवाले लोग दूर थे। मां-बाप, समाज, परिवार, मंदिर-मस्जिद, स्कूल-विद्यालय, वे सब शराब के खिलाफ हैं, वे सब मस्जिद और मंदिर के पक्ष में हैं। इसलिए बैठ तो गये मंदिर में, बैठ तो गये मस्जिद में, लेकिन मन का राग, मन की कामना, कोई शिक्षण से थोड़े ही मिटती है; अनुभव से मिटती है। सोचते तो शराब की ही हैं; यहां नहीं मिली, तो अब कल्पना में फैलाव करते हैं; स्वर्ग में मिलेगी!

हिंदुओं का स्वर्ग है...।

और बड़े मजे की बात है, अगर तुम किसी भी जाति का स्वर्ग ठीक से पहचान लो तो तुम यह भी समझ जाओगे: उस जाति ने किन-किन चीजों की वर्जना की है। उस जाति के शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, उसका स्वर्ग समझ लो, फौरन पता चल जाएगा कि इस जाति ने किन-किन चीजों को जबरदस्ती त्याग है।

...हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष है, जहां सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं, बैठ जाओ उसके नीचे बस! ऐसा भी नहीं कि कुछ समय का फासला पड़ता हो; समय लगता ही नहीं है। तुमने यहां कामना की कि यहां पूरी हुई! तुमने कहा, "भोजन आ जाए', थाल आ गये! बस तुम यहां कह भी नहीं पाये थे और थाल मौजूद हो गये।

हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष है--क्यों? क्योंकि हिंदुओं ने सभी इच्छाओं के त्याग का आग्रह किया है। सभी इच्छाओं का त्याग! स्वभावतः: जो किसी तरह अपने को समझा-बुझाकर त्यागी हो जाएगा, वह इसी आशा में जी रहा है कि कभी तो मरेंगे, यह देह तो कोई ज्यादा दिन चलनेवाली नहीं है, और कुछ साल बीत जाएं, फिर कल्पवृक्ष है! फिर उसके नीचे बैठ जाएंगे!

तुमने कभी देखा, दिन में कभी उपवास कर लो तो तुम रात-भर भोजन के सपने देखते हो! ब्रह्मचर्य का व्रत ले लो तो सपने में स्त्रियां ही स्त्रियां दिखायी पड़ती हैं।

ये सपने हैं: कल्पवृक्ष! शराब के चश्मे! ये इस बात की खबर दे रहे हैं कि तुमने किस-किस चीज को जबरदस्ती छोड़ दिया है--अनुभव से नहीं, पक कर नहीं। संस्कार, शिक्षण,दबाव...!

"मस्जिद बहुत करीब थी, मैखाना दूर था!' उतने दूर जाने की तुम हिम्मत न जुटा पाये। जाते तो प्रतिष्ठा दांव पर लगती थी। तो तुमने एक तरकीब निकाली कि यहां मस्जिद में रहो, स्वर्ग में मयखाने में रह लेंगे। ऐसे तुमने अपने को समझाया। ऐसे तुमने समझौता किया।

तुम्हारे स्वर्ग तुम्हारी कल्पनाओं के जाल हैं, और तुम्हारे नरक...? स्वर्ग तुमने अपने लिए बनाये हैं और नरक दूसरों के लिए--वे भी बड़े विचारणीय हैं।

हिंदुओं का नरक है, तो भयंकर आग जल रही है, सतत अग्नि जलती है, बुझती नहीं। उसमें जलाये जा रहे हैं लोग। भारत गरमी से पीड़ित देश है। यहां सूर्य तपता है। तो शीतलता स्वर्ग में...शीतल मंद बयार बहती है! सुबह ही बनी रहती है स्वर्ग में, दोपहर नहीं आती। बस सुबह की ही ताजगी बनी रहती है। फूल खिलते हैं, मुरझाते नहीं। और शीतल हवा कहती रहती है। नरक में भयंकर लपटें हैं। वह गरम देश की धारणा है।

तिब्बती, वे नहीं बनाते, वे नहीं कहते कि नरक में लपटें हैं। उनका स्वर्ग गरम और ऊष्ण है, क्योंकि ठंडे मुल्क के लोग मरे जा रहे हैं ठंड से; नरक में बर्फ-ही-बर्फ जमी है; उसमें लोग गल रहे हैं बर्फ में!

न तो कहीं कोई स्वर्ग है, न कहीं कोई नरक है। स्वर्ग तुम बनाते हो अपने लिए। जो-जो कामनाएं तुम पूरी करना चाहते थे और नहीं कर पाये, तो तुम स्वर्ग में कर लेते हो। स्वर्ग हिंदुओं का बिलकुल एयरकंडीशंड है, वातानुकूलित है। वहां कोई ताप नहीं लगती। पसीना नहीं आता स्वर्ग में--पसीना आता ही नहीं।

और जो तुम छोड़ दिये हो, अपने लिए कल्पना कर रहे हो, और दूसरों ने नहीं छोड़ा... समझो कि तुम शराब पीना चाहते थे और नहीं पी पाये, तो तुमने अपने लिए तो स्वर्ग में इंतजाम कर और जी रहे हैं, उनके लिए क्या करोगे? उनको भी दंड तो मिलना ही चाहिए, क्योंकि तुमने त्याग किया, उन्होंने त्याग नहीं किया, तो उनको नरक की लपटों में जलाया जाएगा। और वहां शराब तो दूर, पानी भी पीने को न मिलेगा। आग की लपटें होंगी, कंठ आग से भरा होगा, और पानी नहीं मिलेगा! पानी की बूंद नहीं मिलेगी!

इससे पता चलता है तुम्हारे मन का, तुम्हारी खुद की परेशानी का, तुम्हारी हिंसा का, तुम्हारी वासना का। न किसी स्वर्ग का इससे पता चलता है, न किसी नरक का इससे पता चलता है।

भक्ति तो उसे उपलब्ध होती है जिसको न इस संसार की कोई कामना रही न उस संसार की। जिसकी कामना का व्यापार निरुद्ध हो गया; जिसने कहा, "अब हमें कुछ मांगना ही नहीं है, न यहां न वहां', मांग ही छोड़ दी--उसे सब मिल जाता है "यही'

"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'

बिलकुल ठीक।"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता'...! जैसे हम उसके साथ एक हो गये, अनन्य! जरा भी भेद न रह जाए! रत्ती भर भी फासला न रह जाए! मैं और तू का फासला न रह जाए!

"उस प्रियतम में अनन्यता अपने आप ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता बन जाती है।'

"उदासीनता' शब्द को समझ लेना जरूरी है। उदासीनता निरोध का मार्ग है।

जिसको तुम त्यागी कहते हो, वह उदासीन नहीं होता। जो आदमी शराब का त्याग करता है, वह शराब के प्रति उदासीन नहीं होता; शराब के प्रति बड़े विरोध में होता है--उदासीन कैसे होगा? विरोध में होता है।

उदासीन का अर्थ है: हमें कोई प्रयोजन नहीं। विरोध का अर्थ है: शराब जहर है।

जो आदमी कामवासना में उदासीन होता है, वह कामवासना के विरोध में नहीं होता। अगर कोई दूसरा कामवासना में जा रहा है तो इससे उसके मन में निंदा पैदा नहीं होती--"यह उसकी मर्जी है! यह उसकी समझ है! उसका समय न आया होगा, कभी आयेगा।' उस पर करुणा आ सकती है, क्रोध नहीं आता।

जो आदमी धन में उदासीन है, उसके मन में धन की कोई निंदा नहीं होती। वह धन का पाप नहीं कहता। वह इतना ही कहता है कि धन की उपयोगिता है, लेकिन वह उपयोगिता बड़ी क्षणिक है। वह इतना ही कहता है कि धन सब कुछ नहीं है। वह यह नहीं कहता कि धन कुछ भी नहीं है। वह इतना ही कहता है, संसार में उपयोगी होगा; लेकिन संसार सब कुछ नहीं है। वह धन के विरोध में नहीं है।

ऐसे त्यागी हैं कि अगर उनके सामने तुम रुपये ले जाओ तो वे आंख बंद कर लेते हैं। अब वह उदासीनता न हुई। ऐसे त्यागी हैं जो धन को हाथ से नहीं छूते। यह उदासीनता न हुई।

उदासीनता का अर्थ है: हो तो हो ठीक, न हो तो ठीक। उदासीनता में को पक्षपात नहीं है। उदासीनता बड़ी अदभुत बात है। वह वैराग्य का परम लक्षण है।

इसलिए अगर तुम किसी वैरागी में पाओ उदासीनता की जगह विरोध, तो समझना कि चूक हो गयी। अगर वह घबड़ाये तो समझना कि रस कायम है, जिस चीज से घबड़ाता है उसी का रस कायम है। अगर धन छूने से डरे तो समझना कि धन का लोभ भीतर मौजूद है। अगर स्त्री को देखने से डरे तो समझना कि कामवासना भीतर मौजूद है। क्योंकि हम उसी से डरते हैं जिसमें गिरने की हमें संभावना मालूम होती है, शंका मालूम होती है।

उदासीनता का अर्थ है: कोई फर्क नहीं पड़ता।

ऐसा हुआ कि बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे, पूर्णिमा की रात थी, और पास के नगर से कुछ युवक, धनपतियों के लड़के, एक वेश्या को लेकर जंगल में आ गये थे-- मौज-रंग करने! वे तो शराब पीकर मस्त हो गये, वेश्या ने मौका देखा कि वे तो शराब पीकर होश खो दिये हैं, वह भाग खड़ी हुई।

जब सुबह होने के करीब आयी और उनको ठंड लगी और होश आया और देखा कि वह 'वेश्या तो भाग गयी है, तो वे उसकी खोज में निकले। उसी रास्ते पर बुद्ध ध्यान करते थे, उनके पास आये और उन्होंने कहा कि "यहां से कोई स्त्री तो नहीं निकली?'

बुद्ध ने कहा, "कोई निकला जरूर, लेकिन स्त्री थी या पुरुष, यह जरा कहना मुश्किल है--क्योंकि मेरा रस ही न रहा। कोई निकला जरूर, लेकिन स्त्री थी या पुरुष, इसमें मेरा रस न रहा।'

यह उदासीनता है।

बुद्ध ने कहा कि जब तक मेरा रस था, तब तक गौर से देखता भी था: कौन कौन है! अब मेरा कोई रस नहीं है।

जब रस खो जाता है तो सिर्फ एक उदासीनता होती है, एक शांति तुम्हें घेर लेती है। उसमें कोई पक्षपात नहीं होता।

उस प्रियतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।' "पीना-न-पीना एक है जाहिद! खता मुआफ

नीयत जब एतबार के काबिल नहीं रही।'

जब तक नीयत पर एतबार न हो, जब तक अपने भीतर की स्थिति पर भरोसा न हो तब तक तुम कसमें भी ले लो, तो कुछ फर्क नहीं पड़ता; व्रत धारण कर लो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि असली बात तो नीयत है। तुम पियो न पियो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; घर में रहो कि बाहर रहो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; पूजा करो कि न करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता--असली सवाल तुम्हारे भीतर की नीयत का है। अगर नीयत साफ है तो तुम कहीं भी रहो, मंदिर ही पाओगे। अगर नीयत साफ नहीं है, तो तुम मंदिर में रहो, तुम वेश्यागृह में ही रहोगे। क्योंकि आदमी अपनी नीयत में रहता है, अपने भीतर की मनोदशा में रहता है।

"उस प्रियतम में अनन्यता...।'

"कैसी तलब, कहां की तलब, किसलिए तलब

हम हैं तो वह नहीं है, वह है तो हम नहीं।'

एक ही बच सकता है प्रेम में, दो नहीं। या तो परमात्मा बचेगा तो तुम न बचोगे, या तुम बचोगे तो परमात्मा न बचेगा।

"कैसी तलब, कहां की तलब, किसलिए तलब

हम हैं तो वह नहीं है, वह है तो हम नहीं।'

अनन्यता का अर्थ है: एक ही बचेगा।

प्रेम गली अति सांकरी तामे दो न समाय'--उसमें दो नहीं समा सकते।

तो भक्त धीरे-धीरे भगवान हो जाता है, भगवान धीरे-धीरे भक्त हो जाता है।

रामकृष्ण पूजा करते हैं तो भोग लगाने के पहले खुद चख लेते हैं। मंदिर के ट्रस्टियों ने बुलाया कि "यह तो पूजा न हुई। किस शास्त्र में लिखा है? भगवान को भोग पहले लगाओ, फिर तो बचे, वह तुम भोजन करो। लेकिन यह तो बात तो गलत हो रही है। यह उलटा हो रहा है। तुम भगवान को झूठा भोग लगा रहे हो! तुम पहले चखते हो।'

रामकृष्ण ने कहा, "संभाल लो फिर अपनी नौकरी, मैं चला। क्योंकि मेरी मां जब भी भोजन बनाती थी तो पहले खुद चखती थी, फिर मुझे देती थी। जब मां का प्रेम इतनी फिक्र करता था तो यह प्रेम तो उससे भी बड़ा है। मैं बिना चखे भोग नहीं लगा सकता भगवान को, पता नहीं लगाने योग्य है भी या नहीं!'

ऐसी अनन्यता, ऐसी निकटता, इतनी समीपता, कि धीरे-धीरे सीमाएं खो जाएं! तो कभी ऐसा होता है कि रामकृष्ण दिन-भर नाचते रहते और कभी ऐसा होता कि पखवाड़ा बीत जाता और मंदिर में न जाते। फिर बुलाये गये के यह क्या मामला है, मंदिर खाली पड़ा रहता है, पूजा नहीं होती। रामकृष्ण कहते, "जब होती है तब होती है, जब नहीं होती तब नहीं होती। जब "वह' बुलाता है और जब अनन्यता का भाव जगता है तभी...। जब दूरी रहती है, तब क्या सार? जब मैं रहता हूं तब पूजा किसकी? जब वही बचता है तभी होती है। जब यह मेरे हाथ में नहीं है कि वही बचे। जब होता है तब होता है। सहजस्फूर्त है!'

रामकृष्ण जैसा पुजारी फिर किसी मंदिर को न मिलेगा। दक्षिणेश्वर के भगवान धन्यभागी हैं कि रामकृष्ण जैसा पुजारी मिला।

अनन्य-भाव का अर्थ है: "मैं' और "तू' दो नहीं, एक ही बचता है। वस्तुतः दोनों तरफ से प्रेमी-प्रेयसी या भक्त और भगवान, दोनों खोते हैं और दोनों के बीच में एक नये का आविर्भाव होता है: एक नये ज्योतिर्मय चैतन्य का आविर्भाव होता है, जिसमें भक्त भी खो गया होता है एक कोने से, दूसरे कोने से भगवान भी खो गया होता है।

भक्त और भगवान तो द्वैत की भाषा है; भक्ति तो अद्वैत है।

"उस प्रीतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'

और जिसने भी उसके साथ ऐसी एकतानता साध ली, वह संसार के प्रति उदासीन हो जाता हैं; छोड़ना नहीं पड़ता संसार, त्यागना नहीं पड़ता संसार, सब छूट जाता है, व्यर्थ हो जाता है; सार्थकता ही नहीं रह जाती; छोड़ने को क्या बचता है।

"अपने प्रीतम को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।'

परमात्मा तुम्हें ऐसा भर दे के तुम्हारे भीतर कोई रत्ती-भर जगह न बचे तो उससे भरी हुई नहीं है, तुम लबालब उससे भर जाओ, तुम ऊपर से बहने लगो ऐसे भर जाओ, कोई दूसरा आश्रय न बचे, किसी दूसरे की तरफ कोई लगाव न रह जाए, सभी लगाव उस एक के प्रति ही समर्पित हो जाएं...।

"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

और उन्हीं में तू निहां था, मुझे मालूम न था।'

"आंखों से खोजता था तुझे सब जगह और यह मुझे पता नहीं था कि मेरी आंखों में ही बैठा हुआ है! तू खोजनेवाले में ही छिपा है। तू मेरे देखने में ही छिपा है। और मैं निगाहों से खोजता था हर एक जा तुझको, और यह पता न था...!

तुम जब तक परमात्मा को बाहर खोज रहे हो, खोज न पाओगे। वह उन निगाहो में ही छिपा है, उस दृष्टि में ही, उस देखने की क्षमता में ही! वह तुम्हारे होश में छिपा है। वह तुम्हारे होने में छिपा है।

"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

और उन्हीं में तू निहां था, मुझे मालूम न था।'

तुम मंदिर हो।

परमात्मा को खोजने किसी और मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। अपने ही भीतर डूब कर पाया है, जिन्होंने भी पाया है।

अगर तुम सारे आसरे छोड़ दो, सारे सहारे छोड़ दो, तो तुम अपने ही डूब जाओगे। जो भी तुम पकड़े हो आसरे की तरह, वही तुम्हें अपने से बाहर अटकाये हुए है। धन का आसरा है, पद का आसरा है, मित्र का आसरा है, संगी-साथियों का, परिवार का आसरा है, पति-पत्नी का आसरा है! जिन-जिन आसरों को तुम सोच रहे हो कि ये सहारे हैं, सुरक्षा हैं, वही तुम्हें बाहर अटकाये हैं।

छोड़ दो सब आसरे!

बे-आसरे हो जाओ!

बे-सहारा हो जाओ!

असहाय हो जाओ!

और अचानक तुम पाओगे: तुम्हें अपने ही भीतर वह भूमि मिल गयी जिसे जन्मों-जन्मों खोजते थे और न पाते थे; अपने ही भीतर वह हाथ मिल गया जो शाश्वत है। अब किसी और आसरे की कोई जरूरत न रही।

"लौकिक और वैदिक कर्मों में भगवान के अनुकूल कर्म करन ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता है।'

और फिर ऐसा व्यक्ति जिसकी अनन्यता सध गयी परमात्मा से, जिसका तार मिल गया, तन्मयता बंध गयी, एक सामंजस्य आ गया, हाथ परमात्मा के हाथ में हो गया जिसका--ऐसा व्यक्ति फिर उसके ही अनुकूल कर्म करता है, ""वह' जो करवाता है वही करता है। फिर उसका अपना कर्ता-भाव चला जाता है। फिर वह कहता है, "जो वह करवाये! जो उसकी मर्जी! जो नाच नचाये, वही मेरा जीवन है।' फिर अपनी तरफ से निर्णय लेना, अपनी तरफ से विचार करना, संभव नहीं है।

"विधि-निषेध से अतीत अलौकिक प्रेम प्राप्ति का मन में दृढ़ निश्चय हो जाने के बाद भी शास्त्र की रक्षा करनी चाहिए, अन्यथा गिर जाने की संभावना है

यह सूत्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसा घटता है। जब तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम परमात्मा के अनुसार चलने लगे, जब तुम्हें ऐसा लगता है कि अब तो तुम एक हो गये, तो सारी विधि-निषेध के पार हो गये, अब समाज का कोई नियम तुम पर लागू नहीं होता।

सच है, कोई नियम लागू नहीं होता; लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि तुम नियम छोड़कर चलने लगो। तुम पर नियम नहीं लागू होता, समाज तो अब भी नियम में जीता है। तुम जिस समाज में हो, उस समाज के लिए तुम अड़चन मत बनो, सहारा बनो; उस समाज के लिए तुम उपद्रव का कारण न बनो, मार्ग बनो।

इसलिए नारद कहते हैं, "विधि-निषेध से अतीत...।' कोई नियम लागू नहीं होता प्रेम पर, भक्त पर। वह पहुंच गया वहां, सब नियमों के पार, परम नियम उसे मिल गया प्रेम का, अब उस पर कोई नियम लागू नहीं होता। लेकिन फिर भी, अगर वह रास्ते पर चले तो उसे बाएं ही चलना चाहिए, क्योंकि सारा ट्रैफिक बाएं ही चल रहा है। अगर वह दाएं चलने लगे, वह कहे कि हम तो भक्ति को उपलब्ध हो गये, तो खतरा है--खतरा है पतन का। असल में इस तरह का आग्रह वही आदमी करेगा जो अभी उपलब्ध ही नहीं हुआ है; वस्तुतः उपलब्ध नहीं हुआ है। क्योंकि उपलब्ध होकर तो कोई नहीं गिरता, असंभव है गिरना।

इसे थोड़ा गौर से समझ लेना।

जो उपलब्ध नहीं हुआ है परमात्मा को, वही इस तरह का आग्रह करेगा के मुझ पर तो कोई नियम लागू नहीं होता। यह अहंकार की नयी उदघोषणा है। यह अहंकार का नया खेल शुरू हुआ। एक नया संसार चला अब। वह कहेगा, मुझ पर कोई नियम लागू नहीं होता। मैं तो अब उसके ही सहारे जीता हूं। इसलिए जो "वह' करवाता है वही करता हूं।

इसकी आड़ में कहीं तुम अपने अहंकार को मत छिपा लेना। कहीं ऐसा न हो कि यह भी धोखा हो तुम्हारा।

इसलिए सूत्र कहता है: सजग रहना। ऐसी स्थिति भी आ जाये कि तुम विधि-निषेध के पार हो जाओ, तो भी शास्त्र की रक्षा जारी रखना। उस रक्षा में तुम्हारी रक्षा है। उस रक्षा में दूसरों की रक्षा तो है ही, तुम्हारी भी रक्षा है। क्यों? तुम अपने अहंकार को सजाने-संवारने का नया उपाय न पा सकोगे।

और स्मरण रखना, जो विधि-निषेध के पार हो गया, वह विधि-निषेध को तोड़ने की चिंता में नहीं पड़ता। जो पार ही हो गया, वह चिंता क्या करेगा तोड़ने की! वह कमल जैसा पार हो जाता है पानी के। जो पार हो गया है वह जीवन को चुपचाप स्वीकार कर लेता है जैसा है; लोग जैसे जी रहे हैं, ठीक है।

छोटे बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैं, तुम वहां जाते हो, तुम जानते हो, वे खिलौने हैं; तुम जानते हो, खेल के नियम सब बनाये हुए हैं। लेकिन बाप भी छोटे बच्चों के साथ जब खेलता है तो खेल के नियम मानता है। वह यह नहीं कह सकता कि मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूं, मैं नियम के बाहर हूं। छोटे बच्चों के साथ छोटे बच्चों की तरह ही व्यवहार करेगा--यही प्रौढ़ का लक्षण है।

तो जो व्यक्ति वस्तुतः भक्ति के परम सूत्र को उपलब्ध होता है, वह तोड़ नहीं देता जीवन की व्यवस्था को। वह कोई अराजकता नहीं ले आता।

जीसस ने कहा है कि मैं शास्त्र को खंडित करने नहीं, पूर्ण करने आया हूं।

वह शास्त्र के मूल स्वभाव का पुनः पुनः उदघाटन करता है। वह शास्त्र के खो गये सूत्रों को पुनः पुनरुज्जीवित करता है। वह शास्त्र पर जम गयी धूल को हटाता है। वह शास्त्र के दर्पण को निखारता है ताकि फिर तुम शास्त्र के दर्पण में अपने चेहरे को देख सको, फिर तुम अपने को पहचान सको। सदियों में शास्त्र पर जो धूल जम जाती है, सदियों में स्त्री पर जो व्याख्या की परतें जम जाती हैं, उनको फिर वह अलग कर देता है, लेकिन शास्त्र की रक्षा करता है। क्योंकि शास्त्र तो उनके वचन हैं जिन्होंने जाना। वे बुद्धपुरुषों के वचन हैं। व्याख्याएं कितनी ही गलत हो गयी हों, लोगों ने कितना ही गलत अर्थ लिया हो, लेकिन मूल तो बुद्धपुरुषों से आता है,मूल तो गलत नहीं हो सकता।

मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं क्यों शास्त्रों की व्याख्या कर रहा हूं। इसीलिए कि जो धूल जमी हो वह अलग हो जाए, ताकि मैं तुम्हें उनका खालिस सोना जाहिर कर सकूं। अगर मैं तुम्हें कभी शास्त्र के विपरीत भी मालूम पड़ूं, तो समझना कि तुम्हारे समझने में कहीं भूल हो गयी है; तो समझना कि तुमने शास्त्र का जो अर्थ समझा था वह अर्थ शास्त्र का न था, इसलिए मैं विपरीत मालूम पड़ रहा हूं। अन्यथा मैं भी तुमसे कहता हूं कि शास्त्र का खंडन करने नहीं, शास्त्र का शुद्धतम स्वरूप आविष्कृत करने की सारी चेष्टा है।

"लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्म ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य, जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।

जो बाह्य कर्म हैं, उन्हें साधारणतः जैसी विधि हो, जैसी समाज की धारणा हो, वैसे ही करते जाना चाहिए--बाह्य ज्ञान रहने तक! क्योंकि भक्ति में ऐसी घड़ियां भी आती हैं जब बाह्य ज्ञान बिलकुल खो जाता है, तब सूत्र लागू नहीं होता। क्योंकि ऐसी भी घड़ियां आती हैं जब मस्ती ऐसे शिखर छूती है कि बाह्य ज्ञान ही नहीं रह जाता। रामकृष्ण छह-छह दिन के लिए बेहोश हो जाते थे। जब फिर अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तब वे अपने में इतने लीन हो जाते थे, इतने दूर निकल जाते थे कि उनके शरीर को ही संभालकर रखना पड़ता था।

लेकिन भोजनादि कार्य तब तक होते रहेंगे जब तक शरीर है।'

इस सूत्र से यह समझ लो कि जीवन में वासना तो हटनी चाहिए, जरूरतें हटाने का सवाल नहीं है। भोजन तो जरूरी है। वस्त्र जरूरी हैं। छप्पर जरूरी है, उसका कोई निषेध नहीं है; निषेध है गैर जरूरी का, जो कि केवल मन की आकांक्षा से पैदा होता है, जिसके बिना तुम रह सकते थे, मजे से रह सकते थे, जिसके बिना कोई अड़चन न पड़ती थी, शायद और भी मजे से रह सकते।

एक बहुत बड़ा विचारक हुआ: अल्डुअस हक्सले। कैलिफोर्निया में उसका मकान था, और जीवन-भर उसने बड़ी बहुमूल्य चीजें इकट्ठी की थीं--पुराने शास्त्र, बहुमूल्य अनूठी किताबें, चित्र, पेंटिंग, मूर्तियां, शिल्प। बड़ा संवेदनशील व्यक्ति था। उसके पास बहुमूल्य भंडार था अनूठी चीजों का। सारे संसार से उसने इकट्ठा किया था। उसकी कीमत कूतनी आसान नहीं। अचानक एक दिन आग लग गयी और सब जलकर राख हो गया।

अल्डुअस हक्सले ने कहा कि मैंने तो सोचा था कि मैं मर जाऊंगा इसके दुख से, लेकिन अचानक, जिसकी कभी अपेक्षा भी न की थी, ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे एक बोझ हलका हो गया। एक बोझ! वह खुद भी चौंका यह अनुभव देखकर। सामने ही जल रहा है उसका विशाल संग्रहालय और वह सामने खड़ा है लपटों के, और उसने कहा कि मुझे लगा कि मैं एकदम हलका हो गया हूं और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वच्छ हो गया हूं।' आई फैल्ट क्लीन"। एक ताजगी!

तुम्हें पता नहीं है कि बहुत-सी गैरजरूरी चीजों ने तुम्हें जीवन तो नहीं दिया है, बोझ दिया है। उनके बिना तुम ज्यादा स्वस्थ हो सकते थे। उनके बिना तुम ज्यादा प्रसन्न हो सकते थे। उन्होंने सिर्फ तनाव दिया है, चिंता दी है।

जरूरत को छोड़ने का कोई सवाल नहीं है। भक्ति कोई जबरदस्ती त्याग नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।

तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओ, तुम उपवास करो, तुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।

तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओ, तुम उपवास करो, तुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता, ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती।

भक्ति कहती है: यह जो परमात्मा का मंदिर है तुम्हारा घर, इसकी साज-संभाल जरूरी है। यह उसका घर है। इसे तुम्हें "उसके' योग्य स्वच्छ और ताजा सुंदर रखना चाहिए। लेकिन जरूरत और वासना में फर्क समझना आवश्यक है।

मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री के प्रेम में था, शादी करना चाहता था। तो उस स्त्री ने कहा, "नसरुद्दीन, और तो सब ठीक है, एक बात मैं पूछना चाहती हूं, कि तुम उन पुरुषों में तो नहीं हो जो शादी के बाद पत्नी को दफ्तरों में काम करवाते हैं या नौकरी करवाते हैं?

नसरुद्दीन ने कहा,"भूलकर भी इस तरह का मत सोच। कभी भी मेरी पत्नी काम पर जाने वाली नहीं है। हां, एक बात और, अगर कपड़ा, रोटी, मकान जैसी विलास की चीजों की तूने मांग की तो फिर मैं नहीं जानता...। लेकिन रोटी, कपड़ा, मकान, ऐसी विलास की चीजें मत मांगना।'

विलास और जरूरत में फर्क करना जरूरी है।

भक्ति स्वस्थ सहज मार्ग है। स्वाभाविक, अस्वाभाविक नहीं। भक्ति तुम जैसे हो, तुम्हारी जरूरतों को स्वीकार करती है। कहीं कोई अकारण अपने को कष्ट देना, पीड़ा देना, व्यर्थ के तनाव खड़े करने, उनसे आदमी परमात्मा के प्रेम को उपलब्ध नहीं होता, उनसे तो और सघन अहंकार को उपलब्ध होता है।

भक्ति त्याग नहीं है, निरोध है। जो अपने से छूट जाए। जो व्यर्थ है छूट जाएगा। जो सार्थक है, जरूरी है, शेष रहेगा।

इसलिए आखिरी सूत्र है: लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्य ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।

भक्ति की यह स्वाभाविकता ही उसके प्रभाव का कारण है।

भक्ति बड़ी संवेदनशील है। वह जीवन को कुरूप करने के लिए उत्सुक नहीं है, जीवन का सौंदर्य स्वीकार है। क्योंकि जीवन अन्यथा परमात्मा का ही है, अंततः वही छिपा है! उसको ध्यान में रखकर ही चलना उचित है।

जो व्यर्थ है वह छूट जाए। जो सार्थक है वह संभल जाए। जो कूड़ा-करकट है वह अपने आप गिर जाए, जो बहुमूल्य है वह बचा रहे।

भक्ति को अगर तुम ठीक से समझो तो तुम पाओगे धर्म की उतनी सहज, स्वाभाविक और कोई व्यवस्था नहीं है।


आज इतना ही।






 


 "सुबह फूटी तो आसमां पे तेरे

रंगे रूख्सार की फुहार गिरी।'

रात छायी तो रू-ए आलम पर

तेरी जुल्फों की आवशार गिरी।'

उसी की जुल्फें है रात, ढांक लेती है गहरे अंधेरे में तुम्हें। उसी का रंग-रूप है। उसी की बहार है। उसी के गीत हैं! उसी की हरियाली है! उसी का जन्म है, उसकी मृत्यु है। तुमने व्यर्थ ही अपने को बीच में खड़ा कर लिया है।

अपने को बीच में खड़ा करने के कारण परमात्मा खो गया है। और परमात्मा को तुम जब तक न जान लो, तब तक तुम अपनी ही ऊंचाई और गहराई से वंचित रहोगे।

परमात्मा यानी तुम्हारी आखिरी ऊंचाई! परमात्मा यानी तुम्हारी आखिरी गहराई! जब तक तुम उसे न जान लो, तब तक तुम अपनी ही ऊंचाई और गहराई से वंचित रहोगे।

उस मनुष्य से ज्यादा दरिद्र और कोई भी नहीं जिस मनुष्य के जीवन से परमात्मा का भाव खो गया; जिसके जीवन में परमात्मा की तरफ उठने की आकांक्षा खो गयी है। जो आदमी होने से तृप्त हो गया, उस आदमी से दरिद्र और कोई भी नहीं।

"ख्याल जिसमें है, पर तब जमाल का तेरे

उस एक खयाल की रफअत का एक छोटा-सा खयाल भी है, परमात्मा के अनंत सौंदर्य का थोड़ा-सा खयाल भी है...।

"खयाल जिसमें है पर तब जमाल का तेरे

उस एक छोटे-से विचार की रफअत किसी को क्या मालूम!'

उस एक छोटे-से विचार की गहराई किसी को क्या मालूम!

परमात्मा के खयाल की गहराई और ऊंचाई--वही तुम्हारा विस्तार है, विकास है।

इस सदी की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि उसके सौंदर्य का बोध खो गया है। और हम लाख उपाय करते हैं कि सिद्ध करने के कि वह नहीं है। और हमें पता नहीं कि जितना हम सिद्ध कर लेते हैं की वह नहीं है, उतना ही हम अपनी ही ऊंचाइयों और गहराइयों से वंचित हुए जा रहे है।

परमात्मा को भुलाने का अर्थ अपने को भुलाना है। परमात्मा को भूल जाने का अर्थ अपने को भटका लेना है। फिर दिशा खो जाती है। फिर तुम कहीं पहुंचते मालूम नहीं पड़ते। फिर तुम कोल्हू के बैल हो जाते हो, चक्कर लगाते रहते हो।

आंखें खोलो! थोड़ा हृदय को अपने से ऊपर जाने की सुविधा दो। काम को प्रेम बनाओ। प्रेम को भक्ति बनने दो।

परमात्मा से पहले तृप्त होना ही मत।

पीड़ा होगी बहुत। विरह होगा बहुत। बहुत आंसू पड़ेंगे मार्ग से। पर घबड़ाना मत। क्योंकि जो मिलनेवाला है उसका कोई भी मूल्य नहीं है। हम कुछ भी करें, जिस दिन मिलेगा उस दिन हम जानेंगे, जो हमने किया था वह ना-कुछ था।

तुम्हारे एक-एक आंसू पर हजार-हजार फूल खिलेंगे। और तुम्हारी एक-एक पीड़ा हजार-हजार मंदिरों का द्वार बन जाएगी। घबड़ाना मत। जहां भक्तों के पैर पड़ें, वहां काबा बन जाता हैं।

ओशो रजनीश 

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

मनुष्यजाति के पूरे इतिहास में हजारों तरह के "रिचुअल', हजारों तरह के क्रियात्मक खेल विकसित हुए हैं। ये सारे-के-सारे खेल अगर गंभीरता से ले लिए जाएं, तो बीमारी बन जाते हैं। अगर ये सारे खेल की तरह लिए जाएं, तो उत्सव बन जाते हैं। जैसे, जब पहली बार अग्नि का आविष्कार हुआ--और सबसे बड़े आविष्कारों में अग्नि का आविष्कार है।

आज हमें पता नहीं किस आदमी ने सबसे पहले अग्नि पैदा की है, लेकिन जिसने भी पैदा की होगी, उससे बड़ी क्रांति अभी तक नहीं हो सकती है। बहुत कुछ आदमी ने फिर खोजा है। और फिर न्यूटन है, और गेलेलियो है और कोपरनिकस है और केपलर है और आइंस्टीन है और मेक्सब्लांट और हजारों खोजी हैं, लेकिन अब तक भी, हमारी अणु की खोज भी, हमारा चांद पर पहुंच जाना भी उतना बड़ा आविष्कार नहीं है जितना बड़ा आविष्कार उस दिन हुआ था जिस दिन पहले आदमी ने अग्नि पैदा कर ली थी।

आज हमें बहुत कठिनाई होगी यह सोचकर, क्योंकि अग्नि आज बिलकुल सहज बात है। माचिस में बंद है। लेकिन सदा ऐसा नहीं था। फिर हमारा जो भी विकास हुआ है मनुष्य का, जैसा मनुष्य आज है, उसमें नब्बे प्रतिशत अग्नि का हाथ है। फिर हमारे जो भी आविष्कार हुए हैं, वे सब बिना अग्नि के हो नहीं सकते। उन सब की बुनियाद में वह अग्नि का आविष्कर्ता खड़ा है।

स्वभावतः जब पहली बार अग्नि किसी ने खोजी होगी, तो हमने अग्नि का भी स्वागत किया था उसके चारों ओर नाचकर। यह जिंदगी की बिलकुल सहज घटना थी। अग्नि को और किसी तरह धन्यवाद दिया भी नहीं जा सकता था। और अग्नि ने एक केंद्रीय अर्थ मनुष्य की जिंदगी में उस दिन बना लिया था। मनुष्य के सारे पुराने धर्म, किसी-न-किसी रूप में अग्नि या सूरज के आसपास विकसित हुए हैं। रात थी अंधकारपूर्ण, खतरनाक, पशुओं का डर था। दिन था उजाले से भरा, निर्भय; हमला कोई कर सके, इसके पहले पता चल जाता था। तो सूर्य बड़ा मित्र मालूम हुआ। अंधकार बड़ा शत्रु बन गया। अंधकार में खतरे थे, भय था, उपद्रव था। सूर्य के साथ सब खतरे तिरोहित हो जाते थे, सब भय मिट जाते थे। तो सूर्य परमात्मा की तरह खयाल में आया था। और जब अग्नि का आविष्कार कर लिया, तो स्वभावतः, रात के अंधकार पर भी हमारी विजय हो गई थी। सूर्य से भी ज्यादा अग्नि प्रीतिकर हो गई थी। इस अग्नि के आसपास नाच का, गान का, नृत्य का, प्रेम का, उत्सव का विकसित हो जाना बिलकुल स्वाभाविक था। वह विकसित हुआ।

मनुष्य का मन उस सबके प्रति उत्सव से भर जाता है जो नया है, जिससे नए का आगमन होता है। नए बच्चे के जन्म पर ही हम बैंडबाजा नहीं बजाते और उत्सव से भर जाते, जब भी इस जगत में नया कुछ पैदा होता है, तो हमारा चित्त उत्सव से उसका स्वागत करता है और उचित है कि ऐसा हो। क्योंकि जिस दिन आदमी नए के स्वागत में भी उत्सवपूर्ण नहीं रहेगा, उस दिन समझना चाहिए कि आदमी के भीतर कुछ महत्वपूर्ण मर गया है।

 यह उन लोगों का आविष्कार था, जिनकी जिंदगी में अग्नि पहली बार आयी थी और इस अग्नि के लिए वे उत्सव मना रहे थे। वे इसके चारों ओर नाच रहे थे। और जो कुछ श्रेष्ठ उनके पास था, उन्होंने अग्नि को दिया। क्या दे सकते थे? उनके पास गेहूं था, उन्होंने गेहूं दिया। उनके पास सोमरस था--उस दिन की सुरा थी--वह उन्होंने दी; उनके पास जो श्रेष्ठतम गाय होती, वह उन्होंने अग्नि को दी; उनके पास जो भी था, वह उन्होंने अग्नि को भेंट किया। एक देवता अवतरित हुआ था, जिसने जिंदगी को सब बदल दिया था। उसके उत्सव में उन्होंने सब यह किया। यह बहुत सहज था। लेकिन, यह बहुत "सोफिस्टिकेटेड' नहीं था। यह बिलकुल ग्रामीण-चित्त से उठी हुई बात थी, और ग्राम ही थे जगत में, ग्रामीण-चित्त ही था।

गीता के समय तक ऐसा यज्ञ बेमानी हो गया था। क्योंकि गीता के समय तक अग्नि घर-घर की चीज हो गई थी। उसके आसपास नाचना व्यर्थ मालूम होने लगा था। उसमें गेहूं फेंकना, मंत्र पढ़ना सार्थक नहीं रह गया था। और हजारों लोग इसका विरोध कर चुके थे इस बीच की प्रक्रिया में। क्योंकि उनको कुछ भी पता नहीं था कि अग्नि का पहला आगमन जिनकी जिंदगी में हुआ था, वे उसे भगवान की तरह ही स्वीकार कर सकते थे। उनके लिए उतना बड़ा वरदान था। इसलिए गीता ने फिर शब्दों पर नई कलमें लगाईं और कृष्ण ने नए शब्द ईजाद किए, ज्ञानयज्ञ। यज्ञ था शब्द पुराना, ज्ञान से उसे जोड़ा। 

कृष्ण के समय तक जीवन काफी "सोफिस्टिकेटेड', काफी विकसित हुआ था। और जब अग्नि के आसपास नाचना अपने-आप में अर्थपूर्ण न था। अब तो ज्ञान की अग्नि जलाने की बात कृष्ण ने उठाई। लेकिन स्वभावतः पुराने शब्दों का उपयोग करना पड़ता है। अब अगर नाचना ही था तो ज्ञान की ज्योति के आसपास नाचना था। और अब कुछ भेंट भी करना था तो गेहूं के दानों से क्या भेंट होगी, अब अपने को ही दान कर देना था। ज्ञानयज्ञ का अर्थ है, ज्ञान की अग्नि में स्वयं को जो समर्पित कर देता है। ज्ञानयज्ञ का अर्थ है, कि अब साधारण अग्नि से नहीं, ज्ञान की अग्नि से, जिसमें व्यक्ति जलता है और समाप्त हो जाता है। यह अग्नि का प्रतीक लेकिन जारी रहा। इसके जारी रहने के पीछे बहुत गहरे कारण थे।

सबसे बड़ा गहरा कारण जो था वह यह था कि अतीत के मनुष्य की जिंदगी में सदा ऊपर की तरफ जाने वाली चीज सिवाय अग्नि के और कोई भी न थी। पानी नीचे की तरफ जाता है। उसे कहीं से भी डालो, वह नीचे की जगह खोज लेता है। अग्नि के साथ कुछ भी उपाय करो, उसकी लपटें सदा ऊपर की तरफ भागती हैं। पुराने मनुष्य के समक्ष अग्नि भर एक ऐसी चीज थी जो सदा ऊपर की तरफ भागती है; ऊपर की तरफ भागना, ऊर्ध्वगमन ही जिसका स्वभाव है; जिसे हम नीचे की तरफ बहा ही नहीं सकते। अगर हम उलटी भी कर दें जलती हुई लकड़ी को, तो लकड़ी ही उलटी होती है, अग्नि ऊपर की तरफ ही भागती रहती है। ऊर्ध्वगमन का प्रतीक बन गई अग्नि। उसकी लपटें आकाश की यात्रा की, अज्ञात की यात्रा की सूचक हो गईं। जमीन के "ग्रेविटेशन', को तोड़ने वाली वह पहली चीज मालूम पड़ी। पृथ्वी की जो कोशिश है, उसको तोड़ देती है, उसको उससे कोई फिक्र नहीं है। अग्नि पर उसका कोई प्रभाव नहीं है। एक कारण तो यह था कि ऊर्ध्वगमन का प्रतीक अग्नि बन गई, इसलिए जिन्होंने अग्नि की लपटों के आसपास नृत्य किया था, नाचे थे, गीत गाए थे, खुशी प्रगट की थी, उन्होंने एक प्रतीक के अर्थ में भी वह खुशी प्रगट की थी कि किस दिन वह दिन होगा जिस दिन हम भी अग्नि की लपटों की तरह ऊपर की यात्रा करेंगे।

अभी आदमी का मन जैसा है वह सदा नीचे की तरफ यात्रा करता है, पानी की तरह है। आदमी का मन जैसा है, वह सदा नीचे की तरफ यात्रा करता है, उसके नियम पानी के नियम हैं, वह नीचे गङ्ढे खोजता है। उसे पर्वत-शिखर पर भी ले जाकर छोड़ दो तो बहुत जल्दी खाई में नीचे आकर झील में विश्राम करने लगता है। उसे कितनी ही ऊंचाई पर ले जाओ, वह तत्काल नीचे की तरफ जाने को आतुर है। जैसा मनुष्य का मन अभी है, वह नीचे जाने की आतुरता है। अग्नि के आसपास नाचने वाले ऋषियों ने घोषणा की कि हम ऊपर की तरफ की यात्रा के सूत्र को नमस्कार करते हैं। और हम अपने भीतर के प्राणों को अग्नि जैसा बनाना चाहते हैं कि वे ऊपर की तरफ भागें। हम उन्हें नीचे खाई में भी छोड़ दें, खंदक में भी छोड़ दें, घाटी में भी छोड़ दें, तो भी वे शिखर पर चले जाएं। यह बड़ा "सिंबालिक', बड़ा प्रतीकात्मक था।

दूसरी बात अग्नि में और बड़ी खूबी की थी और वह और भी गहरी थी, और वह थी कि अग्नि पहले तो ईंधन को जलाती और फिर खुद ही जल जाती। पहले ईंधन राख होता है, फिर अग्नि खुद राख हो जाती है। ज्ञान के लिए यह प्रतीक बड़ा गहरा बन गया। ज्ञान पहले तो अज्ञान को जलाता है। पहले तो ज्ञान अज्ञान को मिटाता है और फिर ज्ञान ज्ञान को भी मिटा देता है। इसलिए उपनिषद कहते हैं, अज्ञानी तो भटकते ही हैं अंधकार में, ज्ञानी महा अंधकार में भटक जाते हैं। निश्चित ही यह व्यंग्य में कही गई बात है उन ज्ञानियों के लिए जिनके पास उधार ज्ञान है। क्योंकि जिनके पास अपना ज्ञान है वे तो बचते ही नहीं, उनके भटकने का तो उपाय नहीं है। ज्ञान पहले तो अज्ञान को जलाता है; फिर ज्ञान को भी जला देता है, ज्ञानी को भी जला देता है, पीछे कुछ भी बचता नहीं। अग्नि पहले ईंधन को जलाती है, फिर ईंधन जल जाता है, फिर अग्नि भी बुझ जाती है, फिर अंगारे भी बुझ जाते हैं, फिर राख ही रह जाती है, फिर सब समाप्त हो जाता है।

तो ज्ञान की घटना जिनके जीवन में घटी, उनको दिखाई पड़ा कि ज्ञान की घटना अग्नि जैसी है। पहले अज्ञान जलेगा, फिर ज्ञान भी जलेगा, फिर ज्ञानी भी जलेगा और पीछे तो सिवाय राख के कुछ बचेगा नहीं। सब तिरोहित हो जाएगा। इतना शून्य होने को जो तैयार है, वह ज्ञान की यात्रा पर निकल सकता है।

तीसरी बात। अग्नि की लपटें हमने उठते देखी हैं, थोड़ी दूर तक ही दिखाई पड़ती हैं, फिर खो जाती हैं। अग्नि बहुत थोड़े दूर तक दृश्य है, इसके बाद अदृश्य हो जाती है। ज्ञान भी बहुत थोड़े दूर तक दिखाई पड़ता है, या ऐसा कहें कि थोड़े दूर तक ज्ञान का संबंध दिखाई पड़ने वाले से रहता है, दृश्य से रहता है, और इसके बाद उसका संबंध अदृश्य से हो जाता है। फिर दृश्य खो जाता है और अदृश्य ही रह जाता है। इन सारे कारणों से अग्नि बड़ा ही समर्थ प्रतीक ज्ञान का बन गया और कृष्ण ज्ञानयज्ञ शब्द का उपयोग कर सके।

ये प्रतीक अगर हमारे खयाल में हों, तो ज्ञानयज्ञ सदा जारी रहेगा। अग्नि के आसपास निर्मित हुए दूसरे "रिचुअल' और यज्ञ तो खो जाएंगे, क्योंकि वे परिस्थिति से पैदा होते हैं, लेकिन ज्ञानयज्ञ सदा जारी रहेगा। इसलिए कृष्ण ने यज्ञ को पहली दफा परिस्थिति से मुक्त करके शाश्वत अर्थ दे दिया। वेद जिस यज्ञ की बात करते थे वह परिस्थिति से बंधा था, एक घटना से जुड़ा था। कृष्ण ने उसे उस घटना से मुक्त कर दिया और एक शाश्वत अर्थ दे दिया। अब कृष्ण के अर्थ में ही यज्ञ का प्रयोजन होगा आगे। उसका अर्थ कृष्ण के द्वारा ही निकल सकता है। और कृष्ण के पहले के अध्याय बंद हो गए हैं। अब भी जो कृष्ण के पहले के यज्ञ की बात करता है, वह असामयिक, "आउट आफ डेट', व्यर्थ की बात करता है; अब उसमें कोई अर्थ नहीं रह गया है, वह बात समाप्त हो चुकी है। अब अग्नि के आसपास आनंद से नहीं कूदा जा सकता, क्योंकि अग्नि अब हमारे जीवन में कोई ऐसी घटना नहीं है।

वह जपयज्ञ की भी बात करते हैं। कृष्ण जपयज्ञ की भी बात करते हैं। जप के साथ भी वही राज है, जो ज्ञान के साथ है। जप पहले तो दूसरे विचारों को जलाएगा, फिर जब दूसरे विचार जल जाएंगे, तो जप का विचार भी जल जाएगा। जो शेष रह जाएगा, वह अजपा स्थिति होती है। इसलिए उसको भी अग्नि से प्रतीक बनाया जा सकता है। वह भी यज्ञ बनाया जा सकता है।

आपके मन में बहुत विचार हैं। आप एक शब्द का जप की भांति प्रयोग करते हैं। सारे विचारों को हटा देते हैं, एक ही विचार पर आप अपने मन को डोलाते हैं। एक घड़ी ऐसी आती है कि यह विचार भी बेमानी हो जाता है कि इसको क्यों दोहराए चले जाना। जब सब विचार ही छूट गए, तो इस एक को भी क्यों पकड़े चले जाना! फिर यह भी छूट जाता है। फिर आप जिस स्थिति में होते हैं, वह अजपा स्थिति है, वहां जप भी नहीं है। अग्नि ने पहले ईंधन जलाया, फिर खुद भी जल गई।

लेकिन, खतरा है जप के साथ, जैसा कि ज्ञान के साथ खतरा है। खतरे सब चीजों के साथ हैं। ऐसा कोई भी रास्ता नहीं है जिस पर न भटका जा सके। ऐसा रास्ता हो भी कैसे सकता है! जो भी रास्ता पहुंचा सकता है, उस पर यात्री चाहे तो भटक भी सकता है। सब रास्ते इस अर्थों में भटकाने वाले की तरह प्रयोग किए जा सकते हैं, और आदमी ऐसा है कि वह सब रास्तों को पहुंचने के लिए काम में कम लाता है, भटकने के लिए ज्यादा काम में लाता है। मैंने कहा कि ज्ञान यज्ञ है, जैसे कृष्ण कहते हैं। लेकिन आदमी ज्ञान का अर्थ ले सकता है पांडित्य, "इनफॅर्मेशन', सूचनाएं, शास्त्र, सिद्धांत, शब्द और इनको इकट्ठा कर ले सकता है। तब वह भटक गया। वैसा आदमी ज्ञान को उपलब्ध ही नहीं हुआ। ज्ञान के नाम से उसने कुछ और ही अपने ऊपर थोप लिया है। और ध्यान रहे, अज्ञान से इतना नुकसान नहीं है जितना मिथ्या ज्ञान से है। अज्ञान से इतना नुकसान नहीं है, जितना झूठे, उधार, बासे ज्ञान से है। क्योंकि बासे ज्ञान में कोई अग्नि नहीं होती। बासा ज्ञान समझना चाहिए कि बुझ गए अंगारों के बुझे कोयलों की तरह है। उसे कितना ही इकट्ठा कर लो, उससे कोई जीवन रूपांतरण नहीं होता है। लेकिन अगर कोई ज्ञान का यह अर्थ ले ले, तो भटकेगा।

ऐसे ही जप के साथ भी कठिनाई है। जप का अगर कोई यह अर्थ ले ले कि जप करते-करते ही पहुंच जाऊंगा, तो गलती में है। जप करते-करते कोई कभी नहीं पहुंचा है। जप का उपयोग ऐसा ही किया जाता है जैसे पैर में एक कांटा लग गया हो और उस कांटे को हम दूसरे कांटे से निकाल देते हैं। लेकिन फिर दूसरे कांटे को पहले वाले कांटे के घाव में रख नहीं लेते सुरक्षित। पहला कांटा निकला कि दूसरा बिलकुल वैसे ही बेकार है, जैसा पहला है, और दोनों को एक-साथ फेंक देते हैं। लेकिन हो सकता है कोई नासमझ! वह कहे कि जिस कांटे ने मेरा कांटा निकाला, उसको मैं कैसे फेंक सकता हूं। वह कहे कि शिष्टता भी तो कम-से-कम इतना कहती है कि जिस कांटे ने मेरा कांटा निकाला उसको मैं सम्हाल कर रखूं। तब यह आदमी पागल है।

बुद्ध निरंतर कहते हैं, बार-बार एक कहानी वह कहते हैं कि एक गांव में कुछ लोग एक नाव से उतरे, फिर जब वे नाव से नदी के किनारे उतर गए तो उन आठों लोगों ने तय किया--वे बड़े बुद्धिमान थे--उन्होंने तय किया कि जिस नाव ने हमें नदी पार कराई, उस नाव को हम छोड़ कैसे सकते हैं! और उन्होंने सोचा कि जिस नाव से हम नदी पार किए और जिस पर हम बैठकर सवार हुए, अब उचित है कि हम उसको अपने ऊपर सवार करें। तो उन्होंने नाव को आठों आदमियों ने अपने सिरों पर उठा लिया और बाजार की तरफ चले। गांव में लोग उनसे पूछने लगे कि पागलो, हमने नाव पर तो बहुत बार लोगों को देखा, लेकिन नाव लोगों पर नहीं देखी, यह बात क्या है? वे सब कहने लगे कि तुम हो अकृतज्ञ। तुम्हें "ग्रेटीच्यूड' का कुछ पता नहीं है। हम जानते हैं अनुग्रह का भाव। इस नाव ने हमें नदी पार करवाई है, अब इस नाव को संसार पार करवा के रहेंगे। अब तो सदा यह हमारे सिर पर रहेगी।

तो बुद्ध यह मजाक में कहते हैं कि बहुत लोग हैं, जो फिर साधना को इस बुरी तरह पकड़ लेते हैं कि वही साध्य हो जाता है। नदी पार करने को नाव है, सिर पर ढोने को नाव नहीं है।

जप का उपयोग किया जा सकता है, इस होश के साथ कि वह भी एक कांटा है। और अगर आपने उसको कांटा नहीं समझा और प्रेम में पड़ गए उसके, तो जो दूसरे विचार आपको भरे थे वे तो हट जाएंगे, जप आपको भर देगा। अब एक आदमी चौबीस घंटे राम-राम, राम-राम कर रहा है, उसकी बजाय हो सकता है जो व्यर्थ विचारों से भरा है उसके जीवन में भी कुछ सार्थकता फलित हो जाए, क्योंकि उसके व्यर्थ विचारों में भी कुछ आ सकता है। इसके पास सिवाय राम-राम के कुछ आने को नहीं है। और जब यह राम-राम को छोड़ने को राजी नहीं होगा, यह कहेगा सब विचारों से छुटकारा दिलाया राम-राम ने, तो अब मैं कैसे छोड़ सकता हूं, अब तो मैं नाव को सिर पर रखूंगा।

जप को यज्ञ कहना बड़ी "सीक्रेट' बात है। कृष्ण जब जप को यज्ञ कहते हैं तो वह कहते हैं, ध्यान रखना, जप भी अग्नि की भांति है। पहले दूसरे को जलाएगा, फिर खुद को जलाएगा, और जब खुद को जला ले तभी समझना कि सार्थक हुआ है।

तो हम शब्द का उपयोग कर सकते हैं दूसरे शब्दों को बाहर करने में, लेकिन फिर उस शब्द को भी बाहर करना पड़ेगा। और अगर मोहग्रस्त हुए और उस शब्द को सम्हालकर रखा तो जप यज्ञ न रहेगा, जप सम्मोहन हो जाएगा। फिर हम जप शब्द से ही "आब्सेस्ड' हो गए, फिर हम उसी से पीड़ित होकर रहने लगेंगे, और वही हमारा पागलपन बन जाएगा। इसलिए जो लोग जप करते वक्त जप में लीन हो जाते हैं, वे लोग जप को फिर कभी न छोड़ सकेंगे, क्योंकि लीनता में एक गहरा संबंध स्थिर हो जाता है। जो लोग जप करते समय साक्षी बने रहते हैं, जो ऐसा अनुभव नहीं करते कि मैं जप कर रहा हूं, बल्कि ऐसा अनुभव करते हैं कि जप मन से हो रहा है और मैं देख रहा हूं, वे एक दिन जप के बाहर जा सकते हैं। तब जप यज्ञ हो जाता है, क्योंकि तब जप अग्नि की भांति हो जाता है। पहले वह दूसरे विचारों को जला देता है, फिर खुद जलकर राख हो जाता है। आप जब खाली रह जाते हैं, शून्य, तब आप ध्यान को, समाधि को उपलब्ध होते हैं।

इसलिए कृष्ण ने ज्ञान और जप, दोनों के साथ यज्ञ का प्रयोग किया। यज्ञ का प्रयोग अग्नि के केंद्र पर है। और अग्नि के प्रतीक को हम समझ लें तो ये दोनों बातें भी साफ समझ में आ सकती हैं। असल में जो जलने को तैयार है, वह यज्ञ के लिए तैयार है, जो मिटने को तैयार है, वह यज्ञ के लिए तैयार है। जो होम होने को तैयार है, वह यज्ञ के लिए तैयार है। और तब सब यज्ञ छोटे पड़ जाते हैं और जीवनयज्ञ ही शेष रह जाता है।


"भगवान श्री, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ज्ञानीजन कर्मफल त्याग कर जन्मरूप बंधन से छूट जाते हैं और परमपद को प्राप्त करते हैं। तो क्या कृष्ण जन्म को बंधन मानते हैं? आप तो जन्म को, संसार को निर्वाण ही है, ऐसा कहते हैं।'


कृष्ण कहते हैं, ज्ञानीजन कर्मफल की आसक्ति को छोड़कर, फलासक्ति को छोड़कर जन्मरूपी बंधन से मुक्त हो जाते हैं। ये सब बातें समझने जैसी हैं।

पहली बात, फलासक्ति से मुक्त होकर। कर्म से मुक्त होकर नहीं, फलासक्ति से मुक्त होकर। कर्म से मुक्त होने को नहीं कहा जा रहा है कि काम से मुक्त हो जाने का जोर ही इसलिए है कि कर्म पीछे बचाया गया है। कर्म तो रहेगा, फलासक्ति नहीं रहेगी।

फलासक्ति से मुक्त होकर कोई कैसे कर्म को उपलब्ध होगा, यह थोड़ा सोचने जैसा है। हम तो अगर फल से मुक्त हो जाएं तो कर्म से ही मुक्त हो जाएंगे। अगर कोई आपसे कहे कि फल की कामना न करें, और कर्म करें, तो आप कहेंगे, मैं पागल हूं! अगर फल की कामना नहीं है तो कर्म क्यों होगा? फल की कामना से ही तो कर्म होता है। एक कदम भी उठाते हैं तो किसी फल की कामना से उठाते हैं। अगर फल की कामना ही नहीं होगी, तो कदम ही क्यों उठेगा? हम उठाएंगे ही क्यों?

इस "फलासक्ति से मुक्त होकर', इस शब्द ने, जिन लोगों ने कृष्ण को सोचा है उन्हें बड़ी कठिनाई में डाला है। और सबसे बड़ी कठिनाई उन्होंने यह पैदा की है कि तब उन्होंने एक बहुत ही रहस्यपूर्ण ढंग से फल की पुनर्प्रतिष्ठा कर दी है। फिर उन्होंने यह कहा कि जो फलासक्ति से मुक्त होते हैं, वे मोक्ष को या मुक्ति को उपलब्ध हो जाते हैं। और मुक्ति और मोक्ष को फल की तरह उपयोग में लाना शुरू किया है, कि तुम ऐसा करोगे, तो ऐसा मिलेगा। तुम ऐसा करोगे तो ऐसा नहीं मिलेगा। यही तो फल की आकांक्षा है। मोक्ष को भी फल बना लिया। तभी वे लोगों को समझा पाए कि तुम सब और फलों को छोड़ दो। तो मोक्ष को अगर पाना चाहते हो, तो सब फलों को छोड़कर ही तुम मोक्ष को पा सकते हो। लेकिन यह तो कृष्ण के साथ बड़ी ज्यादती हो गई। अगर कृष्ण ऐसा भी कहते हैं कि जो सब फलासक्ति से मुक्त हो जाते हैं, वे ज्ञानीजन जन्मरूपी बंधन से मुक्त होते हैं, तो उनकी मुक्त होने की जो बात है वह सिर्फ परिणाम की सूचक है। "कांसीक्वेंस' की खबर है। वह फल नहीं है। ऐसा नहीं है कि जिन्हें जन्मरूपी बंधन से मुक्त होना है, वे फल की आकांक्षा छोड़ दें, तब तो यह फिर फल की ही आकांक्षा हो गई। यह सिर्फ खबर है कि ऐसा होता है। फल की आकांक्षा छोड़ने से मुक्ति फलित होती है, ऐसा होता है। लेकिन मुक्ति की आकांक्षा जो करता है उसे तो मुक्ति कभी फलित नहीं हो सकती, क्योंकि वह फल की आकांक्षा करता है। लेकिन हम बिना फल-आकांक्षा के कर्म कैसे करेंगे?

इसे समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि हमारी जिंदगी में दो तरह के कर्म हैं। एक कर्म तो वह है जो हम अभी करते हैं, कल कुछ कुछ पाने की आशा में। ऐसा कर्म भविष्य की तरफ से "पुल' है, खींचना है। भविष्य खींच रहा है लगाम की तरह। जैसे एक गाय को कोई गले में रस्सी बांध खींचे लिए जा रहा है, ऐसा भविष्य हमारे गले में रस्सियां डालकर हमें खींचे लिए जा रहा है। यह मिलेगा, इसलिए हम यह कर रहे हैं। वह मिलेगा, इसलिए हम वह कर रहे हैं। मिलेगा भविष्य में, कर अभी रहे हैं। रस्सी अभी गले में पड़ी है; हाथ में जो फंदा है रस्सी का, वह भविष्य के लिए है। मिलेगा, नहीं मिलेगा, यह पक्का नहीं है। क्योंकि भविष्य का अर्थ ही यह है कि जो पक्का नहीं है। भविष्य का अर्थ ही यह है, जो अभी नहीं हुआ है, होगा। लेकिन उस आशा में हम रस्सी में बंधे हुए पशु की तरह भागे चले जा रहे हैं।

यह बड़े मजे की बात है, यह शब्द पशु बड़ा बढ़िया है। कभी आपने शायद खयाल न किया होगा कि पशु का मतलब होता है, जो पाश में बंधा हुआ खिंचा जा रहा है। पशु शब्द का ही मतलब होता है, जो पाश में बंधा हुआ खिंचा जा रहा है। तब तो हम सब पशु हैं, अगर हम भविष्य के पाश में बंधे हुए खिंचे जा रहे हैं। पशु का मतलब ही इतना है कि जो भविष्य से बंधा है और जिसकी लगाम भविष्य के हाथों में है और जो खिंचा जा रहा है। जो रोज आज इसलिए जीता है कि कल कुछ होगा, कल भी इसीलिए जियेगा कि परसों कुछ होगा। जो हर दिन आज कल के लिए जियेगा और कभी नहीं जी पाएगा--क्योंकि जब आएगा तब आज आएगा, और जीना उसका सदा कल होगा। कल भी यही होगा, परसों भी यही होगा, क्योंकि जब भी समय आएगा वह आज की तरह आएगा और यह आदमी पाश में बंधा हुआ पशु की तरह भविष्य से खिंचा हुआ कल में जियेगा। यह कभी नहीं जी पाएगा। इसकी पूरी जिंदगी अनजियी, "अनलिव्ड' बीत जाएगी। मरते वक्त यह कह सकेगा कि मैंने सिर्फ जीने की कामना की, मैं जी नहीं पाया हूं। और मरते वक्त उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यही होगी कि अब आगे कोई फल नहीं दिखाई पड़ता। और कोई पीड़ा नहीं है। अगर आगे कोई फल दिखाई पड़ जाए इसे, तो यह मौत को भी झेलने को राजी हो जाएगा। इसलिए मरता हुआ आदमी पूछता है, पुनर्जन्म है? मैं मरूंगा तो नहीं? वह असल में यह पूछ रहा है, कल है अभी बाकी? अगर कल हो तो चल सकता है, क्योंकि मेरे जीने का ढंग कल पर निर्भर है। अगर कल नहीं है अब, तो बड़ा मुश्किल हो गया। मैं तो रोज-रोज कल के लिए जिया और आज अचानक पाता हूं कि आज के साथ ही सब समाप्त होता है और कल नहीं है। "फ्यूचर ओरियेंटेड लिविंग' जो है, वह फलासक्ति का अर्थ है। भविष्य-केंद्रित जीवन।

एक ऐसा कर्म भी है, जो भविष्य से खिंचाव की तरह नहीं निकलता, बल्कि "स्पांटेनियस' है और झरने की तरह हमारे भीतर से फूटता है। जो हम हैं, उससे निकलता है। जो हम होंगे, उससे नहीं। रास्ते पर आप जा रहे हैं, किसी आदमी का--आपके सामने चल रहा है, उसका छाता गिर गया है, आपने उठाया और छाता दे दिया। न तो छाता देते वक्त यह खयाल आया कि कोई "प्रेसरिपोर्टर' आसपास है या नहीं; न छाता देते वक्त यह खयाल आया कि कोई "फोटोग्राफर' आसपास है या नहीं; न छाता देते वक्त यह खयाल आया कि कोई देख रहा है कि नहीं देख रहा है; न छाता देते वक्त यह खयाल आया कि यह आदमी धन्यवाद देगा कि नहीं; तो यह कर्म फलासक्तिरहित हुआ। यह आपसे निकला सहज। लेकिन समझें कि उस आदमी ने आपको धन्यवाद नहीं दिया, दबाया छाता और चल दिया। और अगर मन में विषाद की जरा-सी भी रेखा आई, तो आपको फलाकांक्षा का पता नहीं था लेकिन अचेतन में फलाकांक्षा प्रतीक्षा कर रही थी। आप सचेतन नहीं थे कि इसके धन्यवाद देने के लिए मैं छाता उठाकर दे रहा हूं, लेकिन अचेतन मन मांग ही रहा था कि धन्यवाद दो। उसने धन्यवाद नहीं दिया, उसने छाता दबाया और चल दिया, तो आपके मन में विषाद की एक रेखा छूट गई और आपने कहा कि यह कैसा कृतघ्न, कैसा अकृतज्ञ आदमी है! मैंने छाता उठाकर दिया और धन्यवाद भी नहीं! तो भी फलाकांक्षा हो गई। अगर कृत्य अपने में पूरा है, "टोटल', अपने से बाहर उसकी कोई मांग ही नहीं है, तो फलाकांक्षारहित हो जाता है।

कोई भी कृत्य जो अपने में पूरा है, "सर्किल' की तरह है; वृत्त की तरह अपने को घेरता है और पूर्ण हो जाता है और अपने से बाहर की कोई अपेक्षा ही उसमें नहीं है। बल्कि छाता देकर आपने उसे धन्यवाद दिया कि तूने मुझे एक पूर्ण कृत्य करने का मौका दिया, जिसमें कि कोई आकांक्षा न थी वह अवसर मेरे लिए दे दिया! फलाकांक्षा से भरा हुआ व्यक्ति किसी-न-किसी तरह की आकांक्षा, अपेक्षा से भरा होगा। लेकिन जब पूर्ण कृत्य होता है तो वह इतना आनंद दे जाता है कि उसके पार कोई मांग नहीं है। फलाकांक्षारहित कृत्य का मेरी दृष्टि में जो अर्थ है वह यह है कि कृत्य पूर्ण हो, उसके बाहर कोई सवाल ही नहीं है। वह खुद ही इतना आनंद दे जाता है, वह खुद ही अपना फल है, कृत्य ही अपना फल है, आज ही अपना फल है, यही क्षण अपना फल है।

जीसस एक गांव से गुजर रहे हैं और उस गांव के आसपास लिली के फूलों के बड़े खेत हैं और वह अपने शिष्यों से कहते हैं कि देखते हो इन लिली के फूलों को? शिष्य बड़ी देर से देख रहे थे, लेकिन नहीं देख रहे थे, क्योंकि सिर्फ आंखों से तो नहीं देखा जाता, प्राणों से देखा जाता है। जीसस ने कहा, देखते हो इन लिली के फूलों को? उन्होंने कहा, देखते हैं, इसमें देखने जैसा क्या है? जैसे लिली के फूल होते हैं, वैसे हैं। जीसस ने कहा, नहीं, मैं तुमसे कहता हूं कि सोलोमन भी--सम्राट सोलोमन भी अपनी पूरी प्रतिष्ठा और गौरव में इतना सुंदर न था जितना ये गरीब लिली के फूल इस गांव के किनारे हैं। जीसस से पूछा कि सोलोमन से इनकी आप क्या तुलना करते हैं? कहां सोलोमन! यहूदी विचार में कुबेर का तुलनात्मक प्रतीक है सोलोमन। कहां सोलोमन, कहां ये गरीब लिली के फूल, इस अनजाने गांव के रास्तों पर खिले! जीसस ने कहा कि नहीं, लेकिन देखो गौर से। सोलोमन भी अपनी पूरी "ग्लोरी' में, जब वह पूरा अपने वैभव पर था तब भी इस एक साधारण से लिली के फूल के बराबर सुंदर न था।

कोई पूछता है कि क्या कारण है? तो जीसस कहते हैं, फूल अभी और यहीं खिलते हैं, सोलोमन सदा भविष्य में रहता है। और भविष्य का तनाव कुरूप कर जाता है। फूल अभी और यहीं खिलते हैं। फूलों को कल कोई पता नहीं। यही हवा का झोंका सब कुछ है, यही सूरज की किरण सब कुछ है, यही पृथ्वी का टुकड़ा सब कुछ है; यही राह, यही होना, बस यही सब कुछ है, इसके बाहर कुछ होना नहीं। ऐसा नहीं कि सांझ नहीं आएगी। सांझ अपने से आएगी। आपकी अपेक्षाओं से आती है? आपकी आकांक्षाओं से आती है? ऐसा नहीं है कि इन फूलों में बीज नहीं लगेंगे और फल नहीं बनेंगे, वे अपने से लगते हैं। आपकी अपेक्षाओं से लगते हैं? लेकिन हम उस पागल औरत की तरह हैं, जिसके बाबत हम सबको पता होगा ही, क्योंकि हम सब उसकी तरह हैं।

एक पागल औरत एक दिन सुबह अपने गांव से नाराज होकर चली गई। गांव भर के लोगों ने कहा कि यह क्या कर रही हो? कहां जा रही हो? उसने कहा कि अब मैं जा रही हूं, तुमने मुझे बहुत सताया, अब कल से तुम्हें पता चलेगा! पर उन लोगों ने कहा कि बात क्या है? उसने कहा, मैं वह मुर्गा अपने साथ लिए जा रही हूं जिसकी बांग देने पर इस गांव में सूरज ऊगा करता था। अब यह सूरज दूसरे गांव में ऊगेगा। वह दूसरे गांव पहुंच गई। सुबह सूरज ऊगा--मुर्गे ने बांग दी, सूरज ऊगा, उसने कहा, अब रोते होंगे नासमझ, क्योंकि अब सूरज इस गांव में ऊग रहा है।

उस बूढ़ी औरत के तर्क में कोई खामी है? जरा भी नहीं। उसके मुर्गे की बांग देने से सूरज ऊगता था। और फिर जब दूसरे गांव में भी बांग देने से सूरज ऊगा, तब तो बिलकुल पक्का ही हो गया न, कि अब उस गांव का क्या होगा! मुर्गे ऐसी भ्रांति में नहीं पड़ते, लेकिन मुर्गों के मालिक पड़ जाते हैं। मुर्गे तो सूरज ऊगता है, इसलिए बांग देते हैं, मुर्गों के मालिक समझते हैं कि अपना मुर्गा बांग दे रहा है, इसलिए सूरज ऊग रहा है।

हम सबका चित्त ऐसा है। भविष्य तो आता है अपने से। वह आ ही रहा है, वह हमारे रोके न रुकेगा। कल आते हैं अपने से, वे हमारे रोके न रुकेंगे। हम अपने कृत्य को पूरा कर लें, इतना काफी है, उसके बाहर हमें होने की जरूरत नहीं है। कृष्ण इतना ही कहते हैं कि तुम्हारा कृत्य पूरा हो--"द एक्ट मस्ट बी टोटल'। "टोटल' का मतलब है कि उसके बाहर करने को कुछ तुम्हें कुछ भी न बचे, तुम पूरा उसे कर लिए और बात खत्म हो गई। इसलिए वे कहते हैं कि तुम परमात्मा पर छोड़ दो फल। परमात्मा पर छोड़ने का मतलब यह नहीं है कि कोई नियंता, कहीं "कंट्रोलर' कोई बैठा है, उस पर तुम छोड़ दो, वह तुम्हारा हिसाब-किताब रखेगा। परमात्मा पर छोड़ने का कुल इतना ही मतलब है कि तुम कृपा करो, तुम सिर्फ करो और समष्टि से उस करने की प्रतिध्वनि आती ही है। वह आ ही जाएगी। जैसे कि मैं इन पहाड़ों में जोर से चिल्लाऊं और कोई मुझसे कहे कि तुम चिल्लाओ भर, प्रतिध्वनि की चिंता मत करो, पहाड़ प्रतिध्वनि करते ही हैं। तुम पहाड़ों पर छोड़ दो प्रतिध्वनि की बात। तुम नाहक चिंतित मत होओ, क्योंकि तुम्हारी चिंता तुम्हें ठीक से ध्वनि भी न करने देगी और फिर हो सकता है प्रतिध्वनि भी न हो पाए, क्योंकि प्रतिध्वनि होने के लिए ध्वनि तो होनी चाहिए। फलाकांक्षा कर्म को ही नहीं करने देती। फलाकांक्षा में उलझे हुए लोग कर्म करने से चूक ही जाते हैं, क्योंकि कर्म का क्षण है वर्तमान और फल का क्षण है भविष्य। जिनकी आंखें भविष्य पर गड़ी हैं भविष्य पर, कल पर, फल पर, तो काम तो बेमानी हो जाता है। किसी तरह हम करते हैं। नजर लगी होती है आगे, ध्यान लगा होता है आगे--और जहां ध्यान है, वहीं हम हैं। और अगर ध्यान वर्तमान क्षण पर नहीं है, तो गैर-ध्यान में, "इनअटेंटिविली' जो होता है, उस होने में बहुत गहराई नहीं होती, उस होने में पूर्णता नहीं होती, उस होने में आनंद नहीं होता है।

कृष्ण की फलाकांक्षारहित कर्म की जो दृष्टि है, उसका कुल मतलब इतना है कि तुम इतना भी अपना हिस्सा भविष्य के लिए मत तोड़ो कि इस काम में बाधा पड़ जाए, तुम इस काम को पूरा ही कर लो। भविष्य जब आए तब भविष्य में पूरे हो लेना, कृपा करके अभी तुम पूरे हो लो। अभी तुम इसी में पूरे हो लो, भविष्य आएगा। और तुम्हारे पूरे होने से फल निकलेगा। उसकी तुम चिंता ही मत करो, उसे तुम निश्चिंत हो परमात्मा पर छोड़ सकते हो। इसका मतलब यह हुआ कि हम जो कर रहे हैं वह हमारा आनंद हो जाए, तभी हम भविष्य से और फल से बच सकते हैं। जो हम कर रहे हैं वह हमारे आनंद से सृजित हो, वह हमारे आनंद से निकले, उसका आविर्भाव हमारे आनंद से हो, वह हमारे भीतर से झरने की तरह फूटे--किसी भविष्य के लिए नहीं; पशु की तरह नहीं, झरने की तरह। झरना किसी भविष्य के लिए नहीं फूट रहा है।

भला आप सोचते होंगे कि नदियां सागर के लिए बह रही हैं, गलती में हैं आप। सागर तक पहुंच जाती हैं, यह दूसरी बात है। नदियां बहती हैं अपने वेग से, नदियां बहती हैं अपने "ओरिजनल सोर्स' की क्षमता से। गंगोत्री की क्षमता से गंगा बहती है। सागर तक पहुंचती है, यह बिलकुल दूसरी बात है। इस पूरी लंबी यात्रा में गंगा को सागर से कुछ लेना-देना नहीं है। सागर मिलेगा कि नहीं मिलेगा, इससे कोई संबंध ही नहीं है। गंगा की भीतरी ऊर्जा इतनी है कि वह बहाए लिए जाती है, बहाए लिए जाती है, और हर तट पर गंगा नाच रही है। कोई सागर के तट पर ही नाचती है, ऐसा नहीं, हर तट पर नाच रही है। पत्थरों में, पहाड़ों में, गङ्ढों में, ऊंचाइयों पर, नीचाइयों में, सुख में, दुख में, निर्जन में, रेगिस्तान में, वृक्षों में, हरियाली में, मनुष्यों में, न-मनुष्यों में, वह हर जगह नाच रही है। जहां है जिस तट पर पहुंचने के लिए वह किसी तट से जल्दी में नहीं है। फिर एक दिन वह सागर तक पहुंच जाती है। सागर तक पहुंच जाना उसके जीवन की फलश्रुति है। वह फल है, लेकिन उस फल के लिए कहीं कोई आकांक्षा नहीं है। एक झरना फूट रहा है, अपनी भीतरी ऊर्जा से उसका कृत्य फूटता है। कृष्ण यह कह रहे हैं कि आदमी ऐसा जिये कि अपनी भीतरी ऊर्जा से फूटता रहे। मेरी दृष्टि में संन्यासी में और गृहस्थ में यही फर्क है। गृहस्थ रोज कल के लिए जीता है, संन्यासी आज की ऊर्जा से फूटता है और जीता है। आज पर्याप्त है। कल आएगा, वह भी आज की तरह आएगा, उसमें भी हम आज की तरह जी लेंगे।

मुहम्मद के जीवन में एक छोटी-सी घटना है। मुहम्मद उन थोड़े-से संन्यासियों में हैं जैसे संन्यासी मैं दुनिया में देखना चाहूंगा। मुहम्मद को रोज लोग भेंट कर जाते हैं। कोई मिठाइयां दे जाता है, कोई रुपये दे जाता है, कोई कुछ कर जाता है। सांझ तक जो लोग आते हैं, खाते हैं, पीते हैं, सांझ को मुहम्मद अपनी पत्नी को कहते हैं कि अब सब बांट दो, क्योंकि सांझ हो गई। तो जो भी होता है, सब बांट दिया जाता है। सांझ मुहम्मद फिर फकीर हो जाते हैं। उनकी पत्नी उनसे पूछती भी है कि यह ठीक नहीं है, कल के लिए कुछ बचाना उचित है, तो मुहम्मद कहते हैं कि जो आज आया था, कल उसकी फिर प्रतीक्षा करेंगे। और जब आज बीत गया, तो कल भी बीत जाएगा। और फिर वह अपनी पत्नी से कहते हैं कि क्या तू मुझे नास्तिक समझती है कि मैं कल का इंतजाम करूं? कल का इंतजाम नास्तिकता है। कल का इंतजाम इस बात की सूचना है कि जिस समष्टि ने मुझे आज दिया, कल पता नहीं देगी, नहीं देगी! कल का इंतजाम अश्रद्धा है। कल का इंतजाम अश्रद्धा है जागतिक ऊर्जा पर, विश्व-प्राण पर। जिसने मुझे आज दिया, वह कल मुझे देगा या नहीं देगा, इसलिए मैं इंतजाम कर लूं। लेकिन मैं कितना इंतजाम कर पाऊंगा, क्या इंतजाम कर पाऊंगा और मेरे इंतजाम कहां तक काम पड़ेंगे। मुहम्मद कहते हैं, बांट दे, कल सुबह फिर श्रद्धा से प्रतीक्षा करेंगे। मुहम्मद कहते हैं, मैं आस्तिक हूं। तो कल के लिए बचाकर नहीं रख सकता, नहीं तो परमात्मा क्या कहेगा कि ऐ मुहम्मद, तेरा इतना भी भरोसा नहीं! तो रोज सांझ सब बंट जाता है।

फिर मुहम्मद की मौत आती है। मरने की रात, चिकित्सकों ने कहा है कि आज वह बच न सकेंगे। तो उनकी पत्नी ने सोचा कि आज तो कुछ बचा लेना चाहिए, रात दवा-दारू की जरूरत हो सकती है! खैर, कल सुबह कोई लाएगा, वह तो ठीक है, लेकिन आधीरात कौन लाएगा? तो उसने पांच दीनार, पांच रुपये तकिये के नीचे छिपा दिए। सांझ को जब सब बांटा है, पांच रुपये छिपा दिए। रात को बारह बजे मुहम्मद बड़ी तड़फन में हैं, बड़ी पीड़ा में हैं। आखिर उन्होंने अपनी चादर उघाड़ी और अपनी पत्नी से पूछा कि मैं सोचता हूं, समझता हूं कि मालूम होता है आज गरीब मुहम्मद गरीब नहीं है। कुछ घर में बचा है। उसकी पत्नी तो बहुत घबड़ा गई। उसने कहा आपको कैसे पता चला? तो मुहम्मद ने कहा कि तेरे चेहरे को देखकर पता चलता है, क्योंकि आज तू वैसी निश्चिंत नहीं है जैसी सदा निश्चिंत है। घर में तूने जरूर कुछ बचाया है। जो चिंतित हैं वे भी बचा लेते हैं, जो बचा लेते हैं वे भी चिंतित हो जाते हज, वह "विसियस सर्किल' है। तो मुहम्मद कहते हैं, उसे निकाल और बांट दे अभी। मुझे शांति से मरने दे। आखिरी रात, कहीं ऐसा न हो कि परमात्मा कहे कि आखिरी रात मुहम्मद, तू चूक गया! और जब मैं उसके सामने जाऊं तो अपराधी की तरह खड़ा होना पड़े। निकाल कहां है? उसकी पत्नी ने घबड़ाहट में वे पांच रुपये जो छिपा रखे थे कि रात दवा-दारू की जरूरत पड़े, निकाले। मुहम्मद ने कहा, किसी को भी पुकार दे सड़क से। तब उसने कहा, आधी रात कौन होगा? उन्होंने कहा, तू पुकार दे। पुकार दी गई है, कोई बाहर सड़क पर भिखारी था वह भीतर आ गया। मुहम्मद ने कहा, देख, आधी रात को लेने वाला आ सकता है तो देने वाला भी आ सकता है। तू उसको दे दे। ये पांच रुपये दे दे। वे पांच रुपये उसे दे दिए गए, फिर मुहम्मद ने चादर ओढ़ ली और वह उनका आखिरी कृत्य था उनका चादर ओढ़ना। मुहम्मद डूब गए उसी वक्त। जैसे वे पांच रुपये अटकाव थे। जैसे वे पांच रुपये बाधा थे। जैसे वे पांच रुपये पीड़ा थे। जैसे वह पांच रुपये की गांठ उस संन्यासी को भारी पड़ रही थी, रोके हुए थी।

प्रत्येक कृत्य और प्रत्येक क्षण और प्रत्येक दिन अपने में पूरा होता जाए, तो भी कल आता है। कल सदा आता रहा है, लेकिन तब कल रोज नया होता है। बासा नहीं होता। और तब कल जैसा अभी आता है, वह "फ्रस्ट्रेट' नहीं करता। कल हमें विषाद से भर देगा अगर आज की हमारी अपेक्षाओं के विपरीत पड़ा। और किन अपेक्षाओं के अनुकूल भविष्य पड़ता है! कभी नहीं पड़ता। क्योंकि भविष्य इतने विराट पर निर्भर है और हमारी अपेक्षाएं इतने क्षुद्र पर निर्भर हैं कि इस क्षुद्र की अपेक्षाएं इस विराट में कैसे पूरी होंगी! उनका कोई पता ही नहीं चलेगा। यह ऐसा ही है जैसे कि नदी की बहती धार में एक बूंद तय करती हो कि अगर पश्चिम को कल बहें तो बड़ा अच्छा। नदी की पूरी धार में एक बूंद कहां निर्णायक होगी कि पश्चिम को बहें। नदी को जहां बहना है, बहेगी। एक बूंद उसके साथ ही होगी, लेकिन कल दुखी होगी। क्योंकि उसने तय किया था पश्चिम बहने का और नदी पूरब बही जा रही है और तब विषाद और पीड़ा भर जाएगी। अपेक्षाएं, फलाकांक्षाएं, विषाद, दुख, "फ्रस्ट्रेशन' और पीड़ा से भर जाती हैं, असफलताओं से भर जाती हैं। जो आदमी प्रतिपल पूरा जी रहा है, उसके जीवन में विषाद नहीं है।

इसलिए जो कर रहे हैं, उस करने में पूरे हो जाएं और फल परमात्मा पर छोड़ दें। ऐसा जो करेगा, तो कृष्ण कहते हैं, वह जन्म के, जन्मरूपी बंधन से छूट जाता है। और वह बड़े मजे की बात कह रहे हैं। वह यह कह रहे हैं, जन्मरूपी बंधन से। जन्म बंधन है, ऐसा वह नहीं कह रहे हैं। असल में जो आदमी फलाकांक्षा से भरा है, वह आदमी जन्म लेने की आतुरता से भरा होता है। क्योंकि फल को पूरा करने के लिए कल तो होना चाहिए न! जो आदमी फलों में जीता है, वह आदमी जन्म लेने की आतुरता में जीता है। उसे जन्म लेना ही पड़ेगा। और जो आदमी फलों में जीता है उसके लिए जन्म बंधन बन जाता है। वह उसकी मुक्ति नहीं रहती। रहेगी नहीं मुक्ति। क्योंकि जन्म का भी आनंद उसे नहीं है। आनंद तो उसे कुछ फल मिलने का है। जन्म भी उसके लिए आनंद नहीं है। जन्म भी एक अवसर है, जिसमें वह कुछ फलों को पाकर आनंदित होना चाहता है। मृत्यु उसके लिए दुख होगी, क्योंकि मृत्यु उसे उन सब मार्गों को तोड़ देगी जिन मार्गों से भविष्य में जिआ जा सकता था। और जन्म उसके लिए बंधन मालूम पड़ेगा। जन्म उसके लिए इसलिए बंधन मालूम पड़ेगा कि वह जीवन को जानता ही नहीं है, जो मुक्ति है। और एक बार कोई जीवन को जान ले, तो जन्म भी नहीं रह जाता और मृत्यु भी नहीं रह जाती है। कृष्ण ने उसमें जो बात कही है वह अधूरी है, उसे पूरा किया जाना चाहिए। वह कह रहे हैं, जन्मरूपी बंधन से मुक्त हो जाता है। मैं आपको कहता हूं, वह मृत्युरूपी बंधन से भी मुक्त हो जाता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि जन्म और मृत्यु बंधन हैं। इसका मतलब यह है कि जन्म और मृत्यु बंधन प्रतीत होते हैं अज्ञान में। ज्ञानी के लिए तो जन्म और मृत्यु रह ही नहीं जाते। यह जो बंधन की प्रतीति है, वह अज्ञानी चित्त की प्रतीति है। और जो मुक्ति की प्रतीति है, वह ज्ञानी चित्त की प्रतीति है। जन्म बुरा है, ऐसा वह नहीं कह रहे। लेकिन जैसे हम हैं, उनको जन्म बंधन मालूम होगा। हम जैसे आदमी प्रेम तक को बंधन बना लेते हैं। मेरे पास न-मालूम कितने मित्रों की लड़कियों के, लड़कों के विवाह के निमंत्रण आते हैं, उसमें लिखा रहता है कि मेरी पुत्री प्रेम के बंधन में बंधने जा रही है; मेरा बेटा विवाह के बंधन में बंध रहा है। हम प्रेम को भी बंधन बना लेते हैं; जबकि प्रेम मुक्ति है। कहना तो यही उचित होगा कि मेरी बेटी प्रेम में मुक्त होने जा रही है। हम कहते हैं, बेटी प्रेम में बंधने जा रही है। हम प्रेम को भी बंधन बना लेते हैं। इसमें प्रेम बंधन है ऐसा नहीं, हम जैसे हैं, हम मृत्यु को भी बंधन बना लेते हैं। हम जैसे हैं, हम पूरे जीवन को ही बंधन बना लेते हैं। हम जैसे हैं हम प्रेम को भी बंधन बना लेते हैं। हम जैसे हैं, हम पूरे जीवन को ही बंधनों की एक शृंखला बना लेते हैं। जो व्यक्ति क्षण में जीता है, वर्तमान में जीता, फलाकांक्षा से मुक्त जीता, अनासक्त जीता, जो व्यक्ति जीवन को अभिनय की तरह जीता, जो करता हुआ न करता है, न करता हुआ करता है, ऐसा व्यक्ति जिंदगी में जो भी है उस सबको मुक्ति बना लेता है। उसके लिए बंधन भी मुक्ति हो जाते हैं, हमारे लिए मुक्ति भी बंधन है। यह हमारे होने के ढंग पर निर्भर करता है। इसलिए कृष्ण की बात में कोई जन्म बंधन है, ऐसा जन्म की निंदा नहीं है, हम जैसे हैं, हमने जन्म को बंधन बनाया है। और अगर हम फलाकांक्षारहित होकर जीना शुरू करें, तो जन्म हमारे लिए बंधन नहीं रह जाएगा। ऐसा व्यक्ति जीवनमुक्ति को उपलब्ध होता है। यही जीवन मुक्ति। यहीं है वह जीवन, अभी है वह जीवन। हमारे देखने पर निर्भर करता है।

मैंने सुना है कि एक विद्रोही को--एक विद्रोही फकीर को, एक सूफी को किसी खलीफा ने कारागृह में डाल दिया। उसके हाथों पर जंजीरें डाल दीं, उसके पैरों में बेड़ियां डाल दीं और वह सूफी, वह फकीर जो निरंतर स्वतंत्रता के गीत गाता था, जेल के सींखचों में डाल दिया गया। सम्राट--वह खलीफा उससे मिलने गया। और उसने पूछा कि कोई तकलीफ तो नहीं है? तो उस फकीर ने कहा, तकलीफ कैसी! शाही मेहमान को तकलीफ कैसे हो सकती है! आप मेजबान, आप "होस्ट', तकलीफ कैसे हो सकती है! हम बड़े आनंद में हैं। झोपड़े से महल में ले आए। उस सम्राट ने कहा, मजाक तो नहीं करते हो? उस फकीर ने कहा, जिंदगी को मजाक समझा, इसीलिए ऐसा कह पाते हैं। तो उसने कहा कि जंजीरें बहुत बोझिल तो नहीं हैं? ये जंजीरें कोई पीड़ा तो नहीं देतीं? तो उस फकीर ने जंजीरों को गौर से देखा और उसने कहा कि मुझसे बहुत दूर हैं। मेरे और इन जंजीरों के बीच बड़ा फासला है। सो तुम इस भ्रम में होओगे कि तुमने मुझे कारागृह में डाला, लेकिन मेरी मुक्ति को तुम कारागृह नहीं बना सकते, क्योंकि मैं कारागृह को भी मुक्ति बना सकता हूं।

इस पर ही सब निर्भर करता है कि हम कैसे देखते हैं। उस फकीर ने कहा, बड़ा फासला है इन जंजीरों में और मुझमें। तुम कैसे मुझ पर जंजीरें डालोगे? मंसूर को सूली दी गई और मंसूर के हाथ-पैर काटे गए और लाखों लोग देखने इकट्ठे थे, लेकिन मंसूर हंसता ही रहा, और उसकी हंसी बढ़ती ही गई। जब उसके पैर काटे, तब वह जितना हंस रहा था, जब हाथ काटे तब और जोर से हंसने लगा। लोगों ने पूछा कि पागल मंसूर, यह कोई हंसने की घड़ी है? मंसूर ने कहा कि मैं इसलिए हंस रहा हूं कि तुम समझ रहे हो कि मुझे मार रहे हो, और तुम किसी और को काटे जा रहे हो! याद रखना, मंसूर ने कहा, कि मंसूर को जब तुम काट रहे थे तब वह हंस रहा था। ध्यान रखना कि तुम मंसूर को छू भी नहीं सकते हो, काटना तो बहुत दूर की बात है। और तुम जिसे काट रहे हो, वह मंसूर नहीं है। मंसूर तो वही है जो हंस रहा है। तब तो जो जल्लाद उसको काट रहे थे, जो उसके दुश्मन उसे काट रहे थे उन्होंने कहा कि कैसे हंसता है हम देखें, उन्होंने जीभ काट दी मंसूर की, लेकिन तब मंसूर की आंखें हंस रही थीं। इन लाखों लोगों ने कहा, जीभ तो तुमने काट दी, लेकिन मंसूर हंस रहा है, उसकी आंखें हंस रही हैं। उन जल्लादों ने उसकी आंखें फोड़ दीं। लेकिन मंसूर का चेहरा हंसता रहा। उसका रोआं-रोआं हंस रहा था। लोगों ने का तुम इसको न रुला सकोगे। अब इस आदमी के पास काटने को भी कुछ नहीं बचा, लेकिन उसका पूरा अस्तित्व हंस रहा है।

जीवन वैसा ही हो जाता है, जैसे हम हैं। जन्म वैसा ही हो जाता है, जैसे हम हैं। मृत्यु वैसी ही हो जाती है, जैसे हम हैं। यदि हम मुक्ति हैं, तो जन्म मुक्ति है, जीवन मुक्ति है, मृत्यु मुक्ति है। यदि हम बंधे हैं, पाश में पशु हैं, तो जन्म बंधन है, जीवन बंधन है, प्रेम बंधन है, मृत्यु बंधन है, सब बंधन है। परमात्मा भी तब एक बंधन की तरह ही दिखाई पड़ता है।


"पहले एक चर्चा में आपने कहा था कि पुरुष में साठ प्रतिशत पुरुष और चालीस प्रतिशत स्त्री, तथा स्त्री में साठ प्रतिशत स्त्री और चालीस प्रतिशत पुरुष होता है। यदि दोनों शक्तियों का पचास-पचास प्रतिशत अनुपात हो जाए, तो क्या वह शक्ति नपुंसक होगी? और परमात्मा को अर्द्धनारीश्वर क्यों कहा है?'


मैंने ऐसा नहीं कहा था कि साठ और चालीस का अनुपात होता है, उदाहरण के लिए कहा। अनुपात बहुत हो सकते हैं। सत्तरत्तीस भी हो सकता है, अस्सी-बीस भी हो सकता है, नब्बे-दस भी हो सकता है, इक्यावन-उनचास भी हो सकता है। और पचास-पचास भी हो सकता है। और जब पचास-पचास होता है, तभी "एसेक्सुअलिटी' पैदा हो जाती है। तभी वह व्यक्ति यौन की दृष्टि से द्वंद्व के बाहर हो जाता है, जिसको हम नपुंसक या "इम्पोटेंट' कह रहे हैं।

यह बड़े मजे की बात है कि इस मुल्क ने ब्रह्म शब्द को नपुंसकलिंग में रखा है। ब्रह्म पुरुष है कि स्त्री? नहीं, ब्रह्म "इम्पोटेंट' है। वह जो कि "ऑमनीपोटेंट' है, वह जो कि सर्वशक्तिमान है, उसको हमने जो लिंग रखा है वह नपुंसकलिंग में रखा है। क्योंकि वह कैसे स्त्री हो सकता है, वह पक्ष हो जाएगा। वह कैसे पुरुष हो सकता है, वह पक्ष हो जाएगा। वह निष्पक्ष है। निष्पक्ष है, तो वह पचास-पचास दोनों पूरा है, तभी निष्पक्ष हो  सकता है। अर्द्धनारीश्वर की कल्पना ब्रह्म की कल्पना है। उसमें नारीत्व और पुरुषत्व आधा-आधा है। वह दोनों है एकसाथ। क्योंकि वह दोनों नहीं है। अगर पुरुष है तो स्त्रीत्तत्व का इस जगत में कहां से आविर्भाव होगा? अगर वह स्त्री है, तो पुरुषत्तत्व कहां से आएगा, कहां से शुरू होगा, कहां से पैदा होगा? वह दोनों ही है। एकसाथ दोनों है। इसलिए दोनों को पैदा कर पाता है।

और हम जब तक स्त्री-पुरुष हैं, तब तक हम परमात्मा के टूटे हुए दो हिस्से हैं। इसलिए स्त्री-पुरुष का आपसी आकर्षण एक होने का आकर्षण है। स्त्री-पुरुष का आकर्षण पूरा होने का आकर्षण है। वह आधे-आधे हैं। अर्द्धनारीश्वर की हमारी कल्पना और हमारी प्रतिमा बड़ी अनूठी है। दुनिया ने बहुत प्रतिमायें बनाई हैं, लेकिन अर्द्धनारीश्वर में जो बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य है, उसका कोई मुकाबला नहीं है। अर्द्धनारीश्वर में हम इतना ही कह रहे हैं कि परमात्मा दोनों हैं, एक-साथ, और पूरा है। एक पहलू उसका स्त्रैण है, एक पहलू उसका पुरुष है। या ऐसा कहें कि वह दोनों का सम्मिलन है, दोनों का मध्य है; दोनों का "बियांड' है, दोनों का पार है।

यह जो मैंने कहा कि परमात्मा को, ब्रह्म को, यह जो मध्य की स्थिति है, जीसस ने एक बहुत अच्छा शब्द उपयोग किया है, "यूनचेज़ ऑफ गॉड'। जीसस ने कहा है कि जिसे प्रभु को पाना है, उसे प्रभु के लिए नपुंसक हो जाना पड़ेगा। बड़ी अजीब बात कही है। पर कही बिलकुल ठीक है। जिसे प्रभु को पाना है, उसे प्रभु जैसा होना ही पड़ेगा। इसलिए बुद्ध अपनी पूरी गरिमा में, या कृष्ण अपनी पूरी गरिमा में न स्त्री हैं, न पुरुष हैं। अपनी पूरी गरिमा में वे दोनों हैं। अपनी पूरी गरिमा में वे मिश्रित हैं। अपनी पूरी गरिमा में एक अर्थ में वे "ट्रांसेंडेंटल सेक्स' हैं, वे पार हो गए दोनों द्वंद्वों के और दोनों के बाहर हो गए। लेकिन हमारे बीच द्वंद्व है। मात्राओं का द्वंद्व है।

और जो उन्होंने पूछा कि जो हमारे बीच "थर्ड सेक्स' पैदा होता है कभी, उसका क्या कारण है? उसका वही कारण है। अगर उसके भीतर "फिजियोलाज़िकली', शारीरिक तल पर दोनों तत्व समान रह गए, तो उसका लिंग विकसित नहीं हो पाता किसी भी दिशा में। उसकी जाति ठीक से विकसित नहीं हो पाती। दोनों बराबर समतुल शक्तियां एक-दूसरे को काट जाती हैं। यह भी संभव हो गया है, पहले तो कभी-कभी आकस्मिक होता था कि कोई स्त्री बाद के जीवन में पुरुष हो गई, या कोई पुरुष बाद में स्त्री हो गया।

लंदन में पीछे एक बड़ा मुकदमा चला। और सनसनीखेज मुकदमा था। और मुकदमा यह था कि एक लड़की और एक लड़के का विवाह हुआ, लेकिन विवाह के बाद वह लड़की जो थी वह लड़का हो गई। और अदालत में जो मुकदमा था वह यह था कि उस लड़की ने धोखा दिया, वह लड़का थी ही। बड़ी कठिनाई हुई इस मुकदमे में। उस लड़की का तो कहना था, वह लड़की थी, और वह विकास उसमें बाद में हुआ है। लेकिन तब तक विज्ञान इस संबंध में बहुत साफ नहीं था। लेकिन अभी इधर बीस-पच्चीस वर्षों में विज्ञान बहुत साफ हुआ। और घटनाएं बहुत तरह की घटी हैं, जिनमें "सेक्स'-रूपांतरण हुआ, जिनमें कोई पुरुष स्त्री हो गया, कोई स्त्री पुरुष हो गई। अगर यह "मार्जिनल केसेज' हैं, अगर उन्चास और इक्यावन का "मार्जिन' है, तो बदलाहट कभी भी हो सकती है। थोड़े-से "केमिकल' फर्कों से बदलाहट हो सकती है। और अब, अब तो बहुत सुविधापूर्ण हो गई है बात और भविष्य में बहुत ज्यादा दिन नहीं हैं कि कोई आदमी जिंदगी भर पुरुष रहने का ही कष्ट भोगे, या कोई स्त्री जिंदगी भर स्त्री रहने के ही चक्कर में रहे। इसमें बदलाहट कभी भी की जा सकती है। यह "सेक्स' जो है, यह रूपांतरित हो सकेगा, क्योंकि उसके "केमिकल' सूत्र सारे खयाल में आ गए हैं कि अगर एक "केमिकल' की मात्रा बढ़ा दी जाए व्यक्तित्व के शरीर में, "हारमोन्स' बदल दिए जाएं, तो उस व्यक्तित्व में स्त्री प्रगट हो सकती है--फिर पुरुष स्त्री हो सकता है, स्त्री पुरुष हो सकती है।

स्त्री और पुरुष एक ही तरह के व्यक्ति हैं, सिर्फ मात्राओं के फर्क हैं उनमें कुछ। उन मात्राओं के कारण सारी-की-सारी बात है।

अर्द्धनारीश्वर इस बात की सूचना है कि विश्व का मूलस्रोत न तो स्त्री है न तो पुरुष है। वह दोनों एकसाथ हैं। लेकिन क्या मैं आपसे यह कहूं कि वह जो "इम्पोटेंट' हैं, नपुंसक है, वह परमात्मा के ज्यादा निकट पहुंच जाएगा? यह मैं नहीं कह रहा हूं। परमात्मा दोनों हैं और नपुंसक दोनों नहीं हैं।

इस फर्क को आप खयाल में ले लेना।

परमात्मा दोनों हैं एकसाथ, और जिसे हम नपुंसक कहें, वह दोनों नहीं है। नपुंसक हमारा सिर्फ अभाव है, "एब्सेंस' है। और परमात्मा भाव है, "प्रेजेंस' है। परमात्मा में स्त्री और पुरुष दोनों हैं। इसलिए अर्द्धनारीश्वर की प्रतिमा है, उसमें आधी स्त्री है, आधा पुरुष है। हम परमात्मा को नपुंसक जैसा भी बना सकते थे, जिसमें न स्त्री होती, न पुरुष होता; लेकिन वह अभाव होता। परमात्मा दोनों का भाव है, दोनों की "पाज़िटिविटी' है। और जिसे हम नपुंसक कहते हैं, वह बेचारा दोनों का अभाव है। उसके पास कोई व्यक्तित्व नहीं है, इसलिए उसकी पीड़ा का कोई अंत नहीं है। इसलिए जब जीसस कहते हैं, "यूनचेज़ ऑफ गॉड, तब वह बिलकुल कह रहे हैं कि परमात्मा में, परमात्मा के लिए वे न स्त्री रह जाएं, न पुरुष हो जाएं; और तब वे दोनों रह जाएंगे, दोनों हो जाएंगे।


"जैन-शास्त्रों में क्यों कहा है कि स्त्रियों के लिए मोक्ष नहीं है?'


बात जरा बदल जाएगी। एक सवाल छोटा-सा पूछा है। बात बदल जाएगी, इसलिए थोड़े में करें, फिर हम ध्यान के लिए बैठेंगे। पूछा है कि जैन-शास्त्रों में क्यों कहा है कि स्त्रियों के लिए मोक्ष नहीं है। उसका कारण है कि जैन-शास्त्र पुरुष-चित्त के द्वारा निर्मित शास्त्र हैं। जैन-साधना पुरुष-साधना है। जैन-साधना की पूरी प्रक्रिया "एग्रेसिव' है, आक्रामक है। और इसलिए जैन-शास्त्र सोच नहीं सकता कि स्त्री को कैसे मोक्ष हो सकता है? अगर कृष्ण के भक्त से हम पूछें तो वह बहुत मुश्किल में पड़ेगा! वह कहेगा, स्त्री के सिवाय और किसी का मोक्ष हो ही कैसे सकता है! पुरुष का मोक्ष होगा कैसे! क्योंकि कृष्णभक्त अगर पुरुष भी हैं, तो अपने को स्त्री बनाकर कृष्ण के प्रेम में पड़ता है। मीरा जब गई वृंदावन और वहां के मंदिर में प्रवेश पर उस पर रोक लगाई गई, क्योंकि प्रवेश में, उस मंदिर में जो पुजारी था वह स्त्रियों को नहीं देखता था। और जब मीरा को रोका तो मीरा ने कहा, एक सवाल उन पुजारी से पूछ लो कि क्या कृष्ण के अलावा और कोई पुरुष भी है? और कृष्ण के पुजारी होकर अभी तक पुरुष बने हुए हो? तो उस पुजारी ने कहा, उसको आने दो। मेरी भूल मुझे पता चल गई, मैं गलती में था। तो कृष्ण के आसपास तो "पैसिव', समर्पण, "सरेंडर', वह जो स्त्री का चित्त है वह।

महावीर के आसपास पुरुष-चित्त की गति है। महावीर स्वयं पुरुष-चित्त के साधक हैं। उनकी सारी साधना पुरुष-चित्त की साधना है, इसलिए महावीर सोच भी नहीं सकते, मान भी नहीं सकते कि स्त्री मोक्ष जा सकती है। तो महावीर की परंपरा में स्त्री को थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़े, उसे एक पर्याय और लेनी पड़े, एक बार पुरुष होना पड़े, फिर ही वह जा सकती है। और मैं मानता हूं कि इसमें गलती नहीं है। अगर महावीर की ही साधना करनी हो तो दुनिया में कोई स्त्री नहीं कर सकती। स्त्रैण-चित्त ही महावीर की साधना नहीं कर सकता। सिर्फ पुरुष-चित्त ही कर सकता है। और अगर पुरुष चित्त की साधना करनी हो, तो कृष्ण के साथ बहुत कठिनाई है। हो नहीं सकती। पुरुष-चित्त का कृष्ण से तालमेल नहीं बैठेगा।

ये हमारे जो दो चित्त हैं, इन दो चित्तों पर सब कुछ निर्भर करता है।

फिर कल सुबह बात करेंगे।





“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...