मंगलवार, 12 सितंबर 2023

सूत्र :

सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा।

फलरूपत्वात्।

ईश्वरस्या६यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च।

तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके।

अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये।

स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः।

राजगृह भोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्।

न तेन राजपरितोषः क्षुधाशांतिर्वा।

तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः।



भक्ति का सार सूत्र है: प्रसाद

ज्ञान, कर्म, योग, उन सबका सार-सूत्र है प्रयास।

ज्ञान, कर्म, योग मनुष्य की चेष्टा पर निर्भर हैं; भक्ति परमात्मा के प्रसाद पर। स्वभावतः भक्ति अतुलनीय है। न कर्म छू सकता है उस ऊंचाई को, न ज्ञान, न योग।

मनुष्य का प्रयास ऊंचा भी जाए तो कितना? मनुष्य करेगा भी तो कितना? मनुष्य का किया हुआ मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता। मनुष्य जो भी करेगा, उस पर मनुष्य की छाप रहेगी। मनुष्य जो भी करेगा उस पर मनुष्य की सीमा का बंधन रहेगा।

भक्ति मनुष्य में भरोसा नहीं करती; भक्ति परमात्मा में भरोसा करती है। क्योंकि खोजेंगे तो हम--अंधे, अंधकार में डूबे, पापग्रस्त, सीमा में बंधे! भूल-चूकों का ढेर हैं हम। हम ही तो खोजेंगे उसे! रोशनी कहां है हमारे पास उसे खोजने को? हमारे पास हाथ कहां जो उसे टटोलें? कहां से लाएं हम वह दिल जो उसे पहचाने?

जब तक परमात्मा ने ही तुम्हें खोजना शुरू न कर दिया हो, तुम्हारे मन में उसे खोजने की बात ही न उठेगी। यह बात बड़ी विरोधाभासी लगेगी, लेकिन बड़ा गहन सत्य है।

परमात्मा को केवल वे ही लोग खोजने निकलते हैं जिनको परमात्मा ने खोजना शुरू कर दिया। जो उसके द्वारा चुन ही लिए गए हैं, वे ही केवल उसे चुनते हैं। जो किसी भांति उनके हृदय में आ ही गया है, वे ही उसकी प्रार्थना में तत्पर होते हैं।

तुम्हारे भीतर से वही उसको खोजता है। सारा खेल उसका है। तुम जहां भी इस खेल में कर्ता बन जाते हो, वहीं बाधा खड़ी हो जाती है, वहीं दरवाजे बंद हो जाते हैं।

तुम खाली रहो, उसे ही खोजने दो तुम्हारे भीतर से, तो तत्क्षण इस क्षण भी उस महाक्रांति का आविर्भाव हो सकता है।

भक्ति को समझने में, इस बात को जितना गहराई से समझ लो, उतना उपयोगी होगा: भक्ति परमात्मा की खोज नहीं है; भक्ति परमात्मा के द्वारा मनुष्य की खोज है।

मनुष्य हारकर समर्पण कर देता है, थककर समर्पण कर देता है, पराजित होकर झुक जाता है--कहता है, "अब तू ही उठा तो उठा! अब तू ही सम्हाल तो सम्हाल! अब अपने से सम्हाला नहीं जाता! जो मैं कर सकता था, किया; जो मैं हो सकता था, हुआ--लेकिन मेरे किए कुछ भी नहीं हो पाता! मेरा किया सब अनकिया हो जाता है। जितना सम्हालता हूं उतना ही गिरता हूं। जितनी कोशिश करता हूं कि ठीक राह पर आ जाऊं, उतना ही भटकता हूं। अब तू ही चला! जन्म तेरा है, जीवन तेरा है, मौत तेरी है--प्रार्थना मेरी कैसे होगी?

आज का सूत्र है : "वह भक्ति, वह प्रेमरूपा भक्ति, कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।'

श्रेष्ठता यही है कि वह अनंत के द्वारा तुम्हारी खोज है।

गंगा सागर की तरफ जाती है, तो ज्ञान, तो योग, तो कर्म। 

जब सागर गंगा की तरफ आता है, तो भक्ति।

भक्ति ऐसे है जैसे छोटा बच्चा पुकारता है, रोता है, मां दौड़ी चली आती है। भक्ति बस तुम्हारा रुदन है! तुम्हारे हृदय से उठी आह है!

भक्ति तुम्हारे जीवन की सारी खोज की व्यर्थता का निवेदन है। भक्ति तुम्हारे आंसुओं की अभिव्यक्ति है। तुम कहीं जाते नहीं, तुम जहां हो वहीं ठिठककर रह जाते हो। एक सत्य तुम्हारी समझ में आ जाता है कि तुम ही बस गलत हो; तुम गलत करते हो, ऐसा नहीं।

कर्मयोग कहता है: तुम गलत करते हो, ठीक करो तो पहुंच जाओगे।

ज्ञानयोग कहता है: तुम गलत जानते हो, ठीक जान लो, पहुंच जाओगे।

योगशास्त्र कहता है: तुम्हें विधियां पता नहीं हैं, मार्ग पता नहीं है। विधियां सीख लो, मार्ग सीख लो, तकनीक की बात है, पहुंच जाओगे।

भक्ति कहती है: तुम ही गलत हो। न ज्ञान से पहुंचोगे, न कर्म से पहुंचोगे, न योग से पहुंचोगे। तुम तुमसे छूट जाओ, तो पहुंचना हो जाएगा। तुम न बचो तो पहुंचना हो जाएगा।

प्रयास से मिलता ही नहीं। प्रयास से मिल जाए, वह भी कोई परमात्मा है? क्योंकि तुम्हारे प्रयास से जो मिलेगा, वह तुम्हारे प्रयास से छोटा होगा। प्रसाद से मिलता है!

इसलिए नारद अनूठी बात कहते हैं, बड़ी गहरी बात कहते हैं: "कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है वह प्रेमरूपा भक्ति।'

कोई भक्ति का मुकाबला नहीं है। भक्ति कोई करने की बात नहीं है। शब्द से भ्रांति होती है, "भक्ति' से भी लगता है कि कुछ करना पड़ेगा, भक्ति में क्रिया है, कुछ करना; जैसे योग में कुछ करना, कर्म में कुछ करना, ज्ञान में कुछ करना, भक्ति में भी कुछ करना पड़ेगा। वहीं भूल हो जाती है।

भक्ति तो इस बात का अनुभव है कि मेरे किए कुछ होता ही नहीं। भक्ति तो अपने कृत्य की व्यर्थता का बोध है, पश्चात्ताप है। उस पश्चात्ताप में ही तुम गिर जाते हो, झुक जाते हो। ध्यान रखना, मैं नहीं कहता हूं कि तुम झुकते हो--झुक जाते हो!

क्या करोगे? कैसे खड़े रहोगे? जब सब किया अनकिया सिद्ध होता है, जब अपने पैर जहां भी ले जाते हैं, वहीं संसार मिलता है, और जब अपनी आंख जो भी दिखाती है वही पदार्थ सिद्ध होता है, और जिसकी भी तुम प्रार्थना करते हो वही प्रार्थना आखिर में कामना सिद्ध होती है, वासना सिद्ध होती है, तो फिर क्या करोगे? ठहर जाते हो! खड़े होने की भी जगह नहीं रह जाती। खड़े होने का बल भी नहीं रह जाता। गिर जाते हो!

अगर अपनी तरफ से गिरे, तो यह भी योग हुआ। अगर पाया कि गिर रहे हो, जैसे गिरना घट रहा है, झुकना घट रहा है, तो भक्ति हुई।

भाषा के साथ अड़चन है, भक्ति भी कर्म बन जाती है।

भक्ति कर्म नहीं है। इसलिए भक्ति की परम श्रेष्ठता है।

"क्योंकि भक्ति फलरूपा है।'

इसे समझें। यह बड़ा वैज्ञानिक सूत्र है।

पानी को भाप बनाना हो तो आंच पर रखो। कारण मौजूद कर दो, कार्य घटेगा। जब सौ डिग्री गरमी हो जाएगी, पानी भाप बनने लगेगा। पानी यह नहीं कह सकता कि आज भाप बनने की मंशा नहीं है, कि आज थोड़ी सर्दी ज्यादा है आज नहीं बनते, या आज मन उदास है या कुछ...। पानी कुछ कर नहीं सकता।

कारण उपस्थित हो गया तो कार्य होगा।

बीज बो दो, अंकुर निकलेंगे।

ज्ञान, कर्म और योग की मान्यता यह है कि परमात्मा भी ऐसे ही मिलता है; कारण मौजूद कर दो, कार्य होकर रहेगा।

योगी कहता है, इतने नियम पालन कर लो, यह अष्टांग योग है, ये आठ अंग हैं, ये पूरे कर लो--परमात्मा को मिलना ही पड़ेगा; जैसे सौ डिग्री पर पानी गरम होता है, ऐसे अष्टांग योग पूरा होने पर परमात्मा मिलता है।

कर्मयोगी कहता है, इतने-इतने पुण्य कर लो; पांच महाव्रत हैं, इनका पालन कर लो: अहिंसा है अचौर्य है, अस्तेय है, अपरिग्रह है, सत्य है, इनका पालन कर लो! अगर पालन पूरा हो गया तो परमात्मा वैसे ही आ जाएगा जैसे बीज बोया, पानी डाला, धूप-रोशनी दी, अंकुर निकल आया। तो परमात्मा फल है और तुम्हारा कृत्य--ज्ञान, कर्म, योग--बीज है। तुम जो करते हो वह कारण है और परमात्मा कार्य है।

भक्त ऐसा नहीं देखते। भक्त कहते हैं, तुम कुछ भी करो, परमात्मा परम स्वतंत्रता है, तुम्हारे कृत्य से बंधा हुआ नहीं है। तुम्हारे अष्टांग योग के पूरे हो जाने से नहीं आ जाएगा। और अगर तुमने अष्टांग योग पर ही भरोसा किया तो तुम अकड़े बैठे रह जाओगे, परमात्मा से कोई संबंध न हो पाएगा।

परमात्मा कार्य-कारण जगत का हिस्सा नहीं है।

परमात्मा का अर्थ है: "समग्र'। और सब चीजों के कारण हैं, "समग्र' का कोई कारण नहीं हो सकता। और सब चीजों के आधार हैं, समग्र का कोई आधार नहीं है, समग्र निराधार है।

बीज से वृक्ष होता है। वृक्ष में फिर बीज लग जाते हैं। फिर बीजों में वृक्ष आ जाते हैं। सारा जगत शृंखला है--कार्य-कारण, कारण-कार्य--बंधा हुआ चलता जाता है। इस सारी शृंखला का कोई कारण नहीं है। इस सारी शृंखला के समस्त रूप का नाम परमात्मा है।

तुम पृथ्वी पर टिके हो, पृथ्वी सूरज के आकर्षण पर टिकी है, सूरज किसी और महासूर्य के आकर्षण पर टिका होगा--लेकिन सारा अस्तित्व कहां टिका है? सारा अस्तित्व कहीं भी नहीं टिक सकता, क्योंकि इसके बाहर कुछ भी नहीं है जिस पर टिक जाए। तो सारा अस्तित्व तो निराधार है।

तुम एक मां और पिता के बीजों के मिलने से पैदा हुए। वे भी किन्हीं के बीजों के मिलने से पैदा हुए। और उनके माता-पिता भी इसी तरह...। लेकिन परमात्मा का कोई पिता नहीं है। "समग्र' के बाहर कुछ भी नहीं है; सब कुछ उसके भीतर है।

तो भक्त कहते हैं, परमात्मा को पाने की यह बात ठीक नहीं। यह तुम संसार को पाने के ढंग का ही उपाय तुम परमात्मा को पाने के लिए कर रहे हो।

तो भक्ति बीजरूपा नहीं है, फलरूपा है। भक्ति कोई कारण नहीं है, कार्य है। भक्ति प्रारंभ नहीं है, अंत है--फलरूपा है। तुम्हें कुछ करना नहीं--फल तुम्हें मिलता है। तुम्हारे करने से फल पैदा नहीं होता--प्रसादरूप होता है। तुम जब तैयार होते हो, अभीप्सा से भरे होते हो, धैर्य से तुम्हारे प्राण आकाश की तरफ देखते होते हैं, और तुम्हारी असहाय अवस्था पूर्ण हो गई होती है, तुम बिलकुल खाली होते हो--तुम्हारे खालीपन में भक्ति उतरती है, भगवान उतरता है।

ध्यान रखना: भक्त यह कहता है कि यह तुम्हारे किसी कारण से नहीं उतरता है; वह अपनी अनुकंपा से उतरता है; वह अपने प्रसाद से उतरता है; वह उतरना चाहता था, इसलिए उतरता है। इसलिए भक्त शिकायत नहीं कर सकता। न उतरे तो भक्त यह नहीं कह सकता कि मैंने सारी व्यवस्था पूरी कर दी है, तुम आए क्यों नहीं--दावा नहीं कर सकता। कभी ऐसी घड़ी भक्त के जीवन में नहीं आती जब वह यह कह दे कि मेरी कोई शिकायत है। शिकायत का तो अर्थ यह हुआ कि मैंने सौ डिग्री पानी गरम कर दिया है, पानी भाप क्यों नहीं बन रहा है? मैंने अपनी तरफ से सब पूरा कर दिया, अब अन्याय हो रहा है!

इसे थोड़ा खयाल में लेना--

जिन लोगों ने कर्म, ज्ञान और योग पर बहुत जोर दिया, धीरे-धीरे उन्होंने परमात्मा की बात ही छोड़ दी, क्योंकि कोई जरूरत ही नहीं रह जाती।  सौ डिग्री पर जब पानी गरम होता है तो पानी भाप बनता है, इसमें किसी परमात्मा को बीच में लेने की जरूरत क्या है? प्रसाद का सवाल कहां है? तुम कार्य पूरा कर दो, परिणाम आ जाएगा। तुम बीज बो दो, फल लग जाएंगे। परमात्मा को बीच में लेने की जगह कहां है? किसी परमात्मा की कोई जरूरत नहीं है।

ज्ञानियों ने, योगियों ने, पुण्यकर्ताओं ने परमात्मा को छोड़ ही दिया, जरूरत ही न मालूम पड़ी। वह परिकल्पना व्यर्थ है। उसके बिना ही हो जाता है। हम से ही हो जाता है, उसकी कोई जरूरत नहीं है। भक्ति का शास्त्र कहता है: हम से कुछ भी नहीं होता; "हम' ही बाधा हैं। जहां हम खो जाते हैं, वहीं होना शुरू होता है।

"वह भक्ति फलरूपा है।'

बीज नहीं है उसका कोई जो तुम बो दो। कोई कारण नहीं है जो तुम तैयार कर लो, प्रयास कर लो, प्रयत्न कर लो। नहीं, तुम्हारे हाथ में कोई उपाय नहीं है कि तुम उसे खींच लो। तुम्हारा निरुपाय हो जाना ही, तुम्हारा असहाय हो जाना ही, तुम्हारा पछताना, तुम्हारा छाती पीटकर रोना, तुम्हारा आंसुओं में जार-जार बह जाना, तुम्हें एक प्रतीति हो जाए कि मैं ही अब तक उपद्रव का कारण था, मेरे प्रयास ही अब तक उपद्रव के कारण थे--फिर फल ही फल ही उपलब्ध होता है।

ज्ञान साधन है; भक्ति साध्य है।

ज्ञान मार्ग है; भक्ति मंजिल है।

ज्ञानी को चलना पड़ता है; योगी को चलना पड़ता है; भक्त सिर्फ पहुंचता है, चलता नहीं। भक्त सबसे बड़ा चमत्कार है। मीरा बेबूझ है। चैतन्य को पकड़ पाना संभव नहीं है। भक्त की कोई कथा साफ नहीं हो पाती।

तुम योगी से पूछ सकते हो, "तुमने क्या किया? कैसे परमात्मा पाया?' तो वह अपनी कथा बता सकता है, "यह-यह मैंने किया। इतने उपवास किए। इतना प्राणायाम किया। इस तरह अष्टांग योग साधे। इस तरह समाधि तक पहुंचा।' एक-एक कदम साफ है। सीढ़ी दर सीढ़ी उसकी यात्रा है। उसके रास्ते पर मील के पत्थर लगे हैं। रास्ता है। वह कुछ कह सकता है।

मीरा से पूछो, "कैसे पाया?' मीरा ठिठकी खड़ी रह जाएगी। वह कहेगी, "मैंने पाया, यह बात ही ठीक नहीं है--मिला।'

पानेवाले की कोई कथा नहीं है। पानेवाला शून्य है। सारी कथा परमात्मा की है। सब कथा भगवतकथा है। भक्त की कोई कथा नहीं है।

भक्त बेबूझ है।

...अचानक पुच्छल तारे की तरह प्रकट होती है! अनायास! अकारण! फलरूपा है। एक दिन तक पता नहीं था, एक दिन अचानक उसका नृत्य शुरू हो जाता है, उसके घूंघर बज उठते हैं। एक क्षण पहले तक किसी को खबर न थी, घर के लोगों को भी खबर न थी, पति को भी खबर न थी।इसलिए भक्त पागल लगता है, क्योंकि गणित में बैठता नहीं।

...अनायास है, अकारण है! एक दिन अचानक मीरा नाच उठी! किसी ने न जाना, कैसे यह नाच पैदा हुआ! इस नाच के पीछे कोई कार्य-कारण की शृंखला नहीं है। यह पुच्छल तारे की तरह प्रकट होती है। इसकी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती और अतीत में लौटकर इसका कोई निर्वचन नहीं हो सकता--समय की धारा में, समय के बाहर से कोई उतरता है! फलरूपा है!

तुम वृक्ष के नीचे विश्राम करते थे और फल गिर गया तुम्हारे ऊपर; न तुमने बीज बोए थे, न तुमने वृक्ष संभाला था, न तुम्हें पता है कि वृक्ष है--तुम्हें बस फल मिल गया!

एक दिन मीरा नाच उठती है! इस नाच के आगे-पीछे कोई हिसाब नहीं है। इसलिए मीरा को समझना बिलकुल ही कठिन हो जाता है। समझ के लिए कार्य-कारण की शृंखला का पता होना चाहिए।

महावीर ने बारह वर्ष तपश्चर्या की। बुद्ध ने छह वर्ष तपश्चर्या की और जन्मों-जन्मों तक खोज की। मीरा ने क्या किया?

नारद का यह सूत्र बड़ा अदभुत है: "भक्ति फलरूपा है।'

साधन नहीं है भक्ति, साध्य है। यहां मार्ग है ही नहीं, बस मंजिल है। आंख खुलने की बात है।

"लाई हयात आए, कजा ले चली चले

अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले।'

जिसको यह समझ में आ गया कि लाया परमात्मा, आए; ले चला, चले; श्वास चलाईं, चलीं श्वास रोकीं, रुक गईं।

"न अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले!'

जिसने ऐसा अनुभव कर लिया...और तुम जरा गौर से देखो तो अनुभव करने में देर न लगेगी। किसी ने पूछा था तुमसे जन्म के पहले कि जन्म लेना चाहते हो?

"लाई हयात आए...!'

किसी ने पूछा था, कहां जन्म लेना चाहते हो? स्त्री होना चाहते हो, कि पुरुष? गोरे होना चाहते हो, काले? हिंदू होना चाहते हो, ईसाई?, किसी ने तो न पूछा था। अकारण हो तुम। तुम्हारे होने के पीछे तुम्हारी मंशा तो नहीं है, तुम्हारी आकांक्षा तो नहीं है। श्वास चलती है जब तक चलती है; जिस दिन नहीं चलेगी, क्या करोगे तुम? गई श्वास बाहर और न लौटी तो क्या करोगे तुम? गई तो गई!

"लाई हयात आए, कजा ले चली चले

अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले।'

ऐसा जिस दिन तुम्हें जीवन का सार दिखाई पड़ जाएगा, उस दिन भक्ति की शुरुआत हुई; उस दिन तुम करीब आने लगे प्रसाद के। और जिस दिन ऐसा अनुभव तुम्हें हो जाएगा कि तुम नहीं हो, कोई और हाथ तुम्हें लाया, कोई और हाथ ने तुम्हें चलाया, कोई और ही सारी कथा को सम्हाले हुए है--उस दिन क्या बोझ, कैसी चिंता!

"मुझे सहल हो गईं मंजिलें वो हवा के रुख भी बदल गए

तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए।'

तुम जब तक हो तब तक अंधेरा है; तुम मिटे कि चिराग जले! तुमने जिस दिन यह भ्रांति छोड़ी कि मैं चल रहा हूं, उसी दिन तुम पाओगे: उसका हाथ सदा से तुम्हें चला रहा है, उसका हाथ तुम्हारे हाथ में है।

परमात्मा को हमने कभी खोया थोड़े ही है; खो देते तो फिर मिलने का कोई उपाय नहीं था। जो खो जाए वह परमात्मा नहीं है। जिसे हम खो सकें वह हमारा स्वभाव नहीं है। उसे हमने कभी खोया नहीं है, विस्मरण किया है, भूल गए हैं घड़ी भर को, झपकी लग गई है, याद उतर गई है। हाथ तो अब भी उसका हमारे हाथ में है। कुछ करना नहीं है उस हाथ को पाने को, सिर्फ अपनी भ्रांति छोड़नी है।

भक्ति फलरूपा है।

ज्ञान कहता है: कुछ करना है, अज्ञान को मिटाना है, ज्ञान को लाना है। बड़ा उपक्रम है। इसलिए ज्ञानी में अकड़ होती है उसने किया इतना, अकड़ स्वाभाविक है। वह कहता: "तुमने क्या किया? हम वर्षों ज्ञान इकट्ठा किए।'

योगी वर्षों तक साधता है, इसलिए योगी की अकड़ स्वाभाविक है। पुण्यात्मा महात्मा हो जाता है। कितना करता है! कितनी सेवा! कितने पुण्यकर्म! अकड़ स्वाभाविक है। भक्त में अकड़ नहीं हो सकती, क्योंकि भक्त की बुनियाद ही यही है कि हमने किया ही नहीं कुछ; तूने जो करवाया वही हुआ!

भक्त की बड़ी अनूठी दुनिया है! अलग ही उसका लोक है--गणित का नहीं, विज्ञान का नहीं, तर्क का नहीं--प्रेम का, प्रार्थना का, परमात्मा का। वहां सभी कुछ उलटा है। वहां बीज के पहले फल है। वहां मार्ग के पहले मंजिल है। वहां तुम्हारे करने से कुछ भी नहीं होता--तुम्हारे न करने से सब हो जाता है।

इसलिए जिनको भी अकड़ना हो, भक्ति उनके लिए नहीं है; जिनको पिघलना हो, उनके लिए है। अकड़ना हो, योग खोजो, त्याग खोजो, व्रत-नियम खोजो। अकड़ना हो और दिखाना हो दुनिया को कि मैं कुछ हूं तो भक्ति की राह को भूल ही जाओ, वह तुम्हारे लिए नहीं है। अभी देर है तुम्हें उस पर आने को। लेकिन अगर यह समझ में आना शुरू हो गया हो कि अपने किए कुछ भी न हुआ; चले बहुत, पहुंचे कहीं न; दौड़े बहुत, जब आंख खोली तो पाया वहीं खड़े हैं--जब तुम्हें ऐसी अनुभूति होने लगे, तब तुम भक्ति के लिए परिपक्व हुए।

"क्योंकि ईश्वर को भी अभिमान से द्वेष है और दैन्य से प्रियभाव है।'

यह सूत्र बड़ा कठिन है। इसे तुम अपनी तरह सोचोगे तो मुश्किल में पड़ जाओगे; ईश्वर को भी अभिमान से द्वेषभाव है!  "ऐसा ईश्वर ही नहीं; यह ईश्वर कैसा जिसको द्वेषभाव है? यह तो हो ही नहीं सकता: ईश्वर और द्वेषभाव!' जब द्वेष मिट जाता है, तभी कोई ईश्वरत्व को उपलब्ध होता है।

"और दैन्य से प्रियभाव है।'

तो इसका तो अर्थ हुआ कि उसके भी पक्षपात हैं।

नहीं, अगर ऐसा देखा तो सूत्र से तुम चूक गए। सूत्र का मतलब कुछ और है। सूत्र का संबंध ईश्वर से नहीं है--सूत्र का संबंध तुमसे है।

ऐसा समझो कि कोई कहे कि जब वर्षा होती है तो वर्षा को गङ्ढों से लगाव है, पहाड़ों और शिखरों से द्वेषभाव है, तो मतलब क्या होगा? मतलब इतना ही होगा कि जब वर्षा होती है तो गङ्ढों में भरती है, पहाड़ खाली रह जाते हैं; क्योंकि पहाड़ पहले से ही भरे हैं, वहां जगह ही नहीं है। और जगह चाहिए। गङ्ढे भर जाते हैं, झीलें बन जाती हैं। गिरती है वर्षा पहाड़ों पर उतर आता है पानी गङ्ढों में, झीलों में।

इस सूत्र का इतना ही अर्थ है कि अगर तुम अभिमान से भरे हो, तो परमात्मा तुम में न उतर सकेगा, चाहे लाख चेष्टा करे उतरने की। लाख चेष्टा कर रहा है, लेकिन तुम पहले से ही भरे हो, जगह नहीं है। रिक्त स्थान चाहिए थोड़ा। तुम्हारे अहंकार के कारण तुम्हारे सिंहासन पर जगह नहीं है, तुम ही बैठे हो। तुम उतरो, सिंहासन से, तो परमात्मा बैठ सके।

"और दैन्य से प्रियभाव है'--इसका कुल अर्थ इतना ही है कि तुम झील, गङ्ढे की तरह हो जाओ, ताकि परमात्मा तुम्हें भर दे; तुम खाली हो जाओ ताकि तुम भर दिए जाओ।

"अब तू भी करम की इंतिहा कर देना

भक्त कहता है कि मैंने भी पाप करने में कोई कमी न की थी, मैंने भी भूल करने में कोई कमी न की थी; "अब तू भी करम की इंतिहा कर देना'--अब तू भी करुणा करने में कुछ कंजूसी मत करना, जैसे मैंने पाप करने में कोई कंजूसी न की थी।

"अब तू भी करम की इंतिहा कर देना

मैंने भी खता की इंतिहा कर दी थी।'

वह यह कहता है कि मैंने पाप ही पाप किए हैं, और पूरी तरह किए हैं; कोई कंजूसी नहीं की; आखिरी तक किए हैं; इंतिहा कर दी थी; पूर्णता कर दी थी--अब ध्यान रखना, अब तू भी अपनी अनुकंपा की, अपने प्रसाद की पूर्णता कर देना! तेरी करुणा में अब तू कमी मत करना, जैसे हमने पाप में कमी न की थी, जैसे हमने अहंकार को भरने में सारी चेष्टाएं की थीं!

मगर जो यह कह रहा है, वह गङ्ढा हो गया। क्योंकि पाप की घोषणा तुम्हें गङ्ढा बना देगी। पुण्य की घोषणा तुम्हें अहंकार से भरती है।

भक्त कहता है, "मैं पापी हूं! मैं पात्र नहीं हूं!'

ज्ञानी कहता है, "मैं पात्र हूं, तैयार हूं; देर क्यों हो रही है?'

योगी कहता है, "मैं शुद्ध हूं, बिलकुल तैयार हूं; अब तेरी तरफ से देर हो रही है।'

भक्त कहता है, "मैं बिलकुल तैयार नहीं हूं। इसलिए मेरी तरफ से तो कोई मांग हो नहीं सकती। इतना ही कह सकता हूं कि पाप करने में मैंने कोई कमी न की थी! मुझसे बुरा आदमी खोजे न मिलेगा। जैसे मैंने पाप करने में कमी न की--क्योंकि पाप ही मैं कर सकता था, और मैं कर क्या सकता था--अब तू करुणा में कमी मत करना, क्योंकि तू करुणा ही कर सकता है, और तू कर क्या सकेगा!'

भक्त अपने को अपात्र घोषित करता है--यही उसकी पात्रता है; असफल घोषित करता है--यही उसकी सफलता है; हारा हुआ घोषित करता है--यही उसकी विजय है।

भक्त कहे, ऐसा भी जरूरी नहीं है।

"लबे-इज़हार की जरूरत क्या

आप हूं अपने दर्द की फरियाद।'

जरूरी नहीं है कि भक्त प्रार्थना करे। भक्त की तो एक भावदशा है: "आप हूं अपनी फरियाद।' उसके तो होने में ही उसकी दीनता समाई है।

नारद अनूठी बात कहते हैं: "ईश्वर को अभिमान से द्वेष और दैन्य से प्रियभाव है।'

नहीं, ईश्वर को क्या द्वेष होगा और क्या प्रियभाव होगा! लेकिन भक्त की तरफ जब तक अहंकार है तब तक परमात्मा प्रवेश नहीं कर सकता। भक्त की तरफ जब दैन्यभाव आ जाता है--"आप हूं अपनी फरियाद'--जब सब तरफ हारा हुआ भक्त खड़ा हो जाता है; जब उसके पूरे जीवन की एक ही भावदशा रह जाती है कि मैं पराजित हूं, दीन हूं, पतित हूं, अपात्र हूं, पापी हूं; मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण तेरी मांग करूं; मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण तेरे लिए दावेदार बनूं; मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि तेरे लिए शिकायत करूं--उसी क्षण, इस दैन्यभाव में परमात्मा उतर आता है।

जीसस का वचन है कि जो आत्मा से दरिद्र हैं, "पुअर इन स्पिरिट', उन्हीं को परमात्मा का मिलन होता है।

सोचें, ध्यान करें इस पर: आत्मा से दरिद्र, "पुअर इन स्पिरिट!' शरीर से दरिद्र होना बहुत आसान है। तुम घर छोड़ दो, मकान छोड़ दो, परिवार छोड़ दो, वस्त्र त्याग दो, नग्न खड़े हो जाओ; लेकिन जितना तुम बाहर छोड़ते जाओगे, उतनी ही भीतर अकड़ बड़ी होती जाएगी। तो बाहर से तो तुम दरिद्र हो जाओगे, भीतर बड़ी अकड़ हो जाएगी।

...तो यह तो बाहर का धन छोड़कर भीतर का धन पकड़ लिया; यह तो बाहर का अहंकार छोड़कर भीतर का अहंकार पकड़ लिया; यह तो पाना न हुआ, खोना हो गया उलटा; यह तो पहुंचना न हुआ, मंजिल से और दूरी हो गई।

ध्यान रखना, पहले तुम बाहर की दुनिया में धनी होने की कोशिश करते हो; जब वहां हार जाते हो तो तुम भीतर की दुनिया में धनी होने की कोशिश करने लगते हो। तुम्हारा योग, तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा कर्म, फिर तुम्हें भीतर धनी बनाने लगते हैं। तो तुम चूकते ही चले जाते हो।

बाहर का धन इतना खतरनाक है तो भीतर का धन तो और भी खतरनाक होगा। बाहर की अकड़ इतनी बुरी है तो भीतर की अकड़ तो और भी बुरी होगी।

परमात्मा तुम्हारे परम दैन्यभाव में उतरता है।

इस सूत्र को गलत मत समझ लेना। परमात्मा को तुम्हारे दैन्यभाव से प्रेम नहीं है; लेकिन तुम्हारे दैन्यभाव में ही उतरना हो सकता है। जब तुम भरे ही हुए हो तो उतरने का कोई सवाल नहीं है। जब तुम ही अकड़े हुए हो और तुम सोचते हो, तुम ही सम्हाले हुए हो सब, तुम ही कर रहे हो सब और तुमने उसे इनकार ही कर दिया--तुमने उसके लिए द्वार ही बंद कर लिए।

"जोश विसाते-शौक में मर्ग है अस्ल जिंदगी

बाजिए इश्क जीत ले बाजिए उम्र हारकर।'

एक ऐसा भी पड़ाव आता है, एक ऐसा दौर है, जहां मौत जिंदगी है और जहां हार जीतना है, जहां हमारे पुराने विचार के ढांचे बिलकुल ही उलटे हो जाते हैं!

"बाजिए इश्क जीत ले'--अगर प्रेम को जीतना हो, "बाजिए उम्र हारकर'--उम्र की, जीवन की, जिंदगी की बाजी को हार कर प्रेम की बाजी जीती जाती है।

"दिल है तो उसी का है, जिगर है, तो उसी का

अपने को राह-ए-इश्क में बरबाद जो कर दे।'

वह जो प्रेम की राह है, वहां जो अपने को बरबाद कर दे, बस उसी के पास दिल है, उसी के पास जिगर है। उसी के पास आत्मा है, जो अपने को बरबाद कर दे।

तो तुम कहीं संन्यस्त मत हो जाना गणित के हिसाब से। तुम कहीं लोभ के ही हिसाब में त्याग मत कर देना। कहीं तुम्हारा संन्यास, तुम्हारा धर्म तुम्हारी होशियारी ही न हो; अगर होशियारी हुई तो तुम चूक जाओगे। क्योंकि तब तुम पात्र बनने लगोगे। और जिसके मन में यह खयाल उठा कि मैं पात्र हूं, वह दीन न रहा, उसने आत्मा की दरिद्रता खो दी।

दीन बनो!

मिटो!

हारे हुए जीओ!

यह जीतने का वहम बहुत दिन पाल लिया--छोड़ो यह बीमारी!

इधर तुम मिटे उधर परमात्मा तुम्हारी तरफ चला! जैसे-जैसे तुम मिटे, वैसे-वैसे वह तुम्हारी तरफ आता है। जिस दिन तुम पूरे मिट जाते हो, अचानक पाते हो, वह सदा से वहां था; तुम्हारी मौजूदगी के कारण दिखाई नहीं पड़ता था।

तुम्हीं हो परदा तुम्हारी आंख पर।

आंख तो देखने में समर्थ है; तुम्हारे कारण देख नहीं पाती।

दृष्टि धुंधली है--तुम्हारे कारण; अंधी है--तुम्हारे कारण!

तुम जरा आंख से हट जाओ!

निर्मल होने दो आंख को!

खाली होने दो आंख को!

शून्य होने दो आंख को!

तब परमात्मा के सिवाय और कोई भी दिखाई नहीं पड़ता है।

"भक्ति का साधन ज्ञान है, ऐसा किन्हीं आचार्यों का मत है।'

गलत है मत। आचार्यों का होगा; जिन्होंने सोचा-विचारा है उनका होगा--जिन्होंने जाना है उनका नहीं है।

"भक्ति का साधन ज्ञान है...।' नहीं, ज्ञान से कभी कोई भक्त हुआ? जितना जानोगे उतने अभक्त होते जाओगे। ज्ञानी तो धीरे-धीरे परमात्मा को इनकार करने लगता है, हजार ढंगों से इनकार करता है।

ज्ञान साधन नहीं है भक्ति का, बाधा है।

"और किन्हीं दूसरे आचार्यों का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक-दूसरे के आश्रित हैं।'

वह भी गलत है।

भक्ति बात ही और है! उसका जानने से कोई संबंध नहीं है, अनुभव से संबंध है।

"सनतकुमार और नारद के मत से भक्ति स्वयं फलरूपा है।'

लेकिन नारद कहते हैं, ये दोनों बातें ठीक नहीं हैं। न तो ज्ञान भक्ति का साधन है, और न भक्ति और ज्ञान एक-दूसरे पर आश्रित हैं। भक्ति स्वयं फलरूपा है, ज्ञान की कोई भी जरूरत नहीं है।

"राजगृह और भोजनादि में भी ऐसा ही देखा जाता है।'

"न उससे (जान लेने मात्र से) राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।'

उदाहरण के लिए कहते हैं कि अगर कोई भोजन की चर्चा करे और भोजन के संबंध में बहुत जान ले, तो भी भूख तो न मिटेगी। पाकशास्त्र को जान लेने से कोई भूख तो नहीं मिटती। तुम पाकशास्त्र के ढेर लगा ले सकते हो। तुम पाकशास्त्रों का अध्ययन करते-करते उनमें लीन हो जा सकते हो। जितने प्रकार के भोजन दुनिया में बन सकते हैं, कभी बने हैं, या बनेंगे, उन सबकी जानकारी तुम्हें हो सकती है। लेकिन उससे तुम्हारे पेट की भूख न मिटेगी। पेट की भूख तो भोजन से मिटती है।

भक्ति भोजन है, ज्ञान नहीं।

भक्ति स्वाद है--जीवंत!

भक्ति परमात्मा के संबंध में कुछ जानना नहीं है--परमात्मा का भोजन है। बड़ा ठीक उदाहरण लिया है।

जीसस जब विदा होने लगे अपने शिष्यों से, मरने की घड़ी करीब आई, सूली लगने को हुई, तो उन्होंने रोटी के टुकड़े तोड़े और अपने शिष्यों को दिए, और कहा कि यह रोटी मैं हूं; तुम रोटी नहीं खा रहे हो, मेरा भोजन कर रहे हो!

भक्ति परमात्मा का भोजन है, परमात्मा का भोग है।

भूख तो भोग से मिटेगी। प्यास तो जल को पीओगे तो मिटेगी; जल के संबंध में कितना ही जान लो, उससे न मिटेगी।

परमात्मा के संबंध में जानना परमात्मा को जानना नहीं है। परमात्मा को तो वे ही जानते हैं जो उसका भोग कर लेते हैं, जो उसे पचा लेते हैं; जिनके खून और जिनकी हड्डी में परमात्मा घूमने लगता है; जिनके रोएं-रोएं और श्वास में समा जाता है; जिनके होने में परमात्मा की गंध हो जाती है; जिनका होना और परमात्मा का होना भिन्न नहीं रह जाता।

"उसके जान लेने मात्र से न तो प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।'

इसलिए ज्ञान से तो भक्ति का कोई भी संबंध नहीं है। ज्ञान तो है परमात्मा के संबंध में जानना; और भक्ति है परमात्मा का सीधा साक्षात।

"अतएव संसार के बंधनों से मुक्त होने की इच्छा रखनेवालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिए।'

जो वस्तुतः "मुमुक्षु' हैं...। इस शब्द को थोड़ा समझ लें।

कुछ लोग हैं जो केवल कुतूहली हैं, जो परमात्मा के संबंध में ऐसे ही पूछते हैं जैसे छोटे बच्चे पूछते हैं कि दुनिया को किसने बनाया। तुम कह दो, परमात्मा ने; तुम कह दो, कुछ भी, अ ब स...वे फिक्र नहीं करते; वे अपने भूल गए, बात खतम हुई, खेल में लग गए। उन्होंने वस्तुतः जानने के लिए पूछा ही न था--एक खुजलाहट थी; एक कुतूहल उठा था, "किसने बनाया!' न भी जवाब देते तो भी कुछ परेशान होनेवाले न थे वे। उन्हें जवाब से कुछ लेना-देना भी न था। एक क्यूरिआसिटी थी, एक कुतूहल था।

सौ में से नब्बे लोग तो जो ईश्वर की बात करते हैं, कुतूहली होते हैं। वे कुछ जीवन दांव पर लगाना नहीं चाहते--ऐसे ही अगर मुफ्त में कुछ जानकारी मिल जाए तो ठीक; कुछ बदलना न पड़े; कुछ करना न पड़े; कुछ होना न पड़े--ऐसे ही कुछ जानकारी मिलती हो तो क्या हर्ज है!

कुतूहल से कोई धार्मिक नहीं होता।

कुतूहल के बाद एक दूसरा वर्ग है जिज्ञासु का, वह जानना चाहता है, वस्तुतः जानना चाहता है--लेकिन बस जानना चाहता है।

कुतूहली तो जानने में भी बहुत उत्सुक नहीं हैं, ऐसे ही पूछ लिया था; सतह की बात थी; एक खयाल आ गया था। खयाल की कोई जड़ें नहीं हैं उसके भीतर।

जिज्ञासु के भीतर खयाल की जड़ें हैं--ऐसे ही खयाल नहीं आ गया; खयाल कई बार आता है। ऐसे आया-गया नहीं है; स्थायी निवास तो हो गया है! पूछता है, प्रयोजन है, जानना चाहता है--लेकिन बस जानना चाहता है। उससे आगे नहीं जाना चाहता।

उसके आगे मुमुक्षु है। मुमुक्षु का अर्थ है: जानना ही नहीं चाहता, जीना चाहता है। जानने से क्या होगा? अगर ईश्वर है तो अपने को बदलना चाहता है। अगर परलोक है तो अपने जीवन में क्रांति लाना चाहता है। अपने को दांव पर लगाने को तत्पर है।

नारद कहते हैं, "अतएव संसार के बंधनों से मुक्त होने की इच्छा रखनेवालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिए'--क्योंकि भक्ति भोजन है।

संस्कृत का सूत्र जब भी अनुवादित किया जाता है तो कुछ न कुछ चूक होती है। हिंदी में अनुवाद है: "अतएव संसार के बंधनों से मुक्त होने की इच्छा रखनेवालों को...।' संस्कृत का सूत्र केवल इतना ही कहता है: "बंधनों से मुक्त होने की इच्छा रखनेवालों को...।' संसार की कोई बात नहीं है--बंधनों से मुक्त होने की है।

इसे थोड़ा समझें।

बंधन संसार है। स्मरण रखें: बंधन-मात्र संसार है। मोक्ष का भी बंधन हो तो संसार हो गया। पुण्य का भी बंधन हो तो संसार हो गया। कोई भी आकांक्षा हो तो बंधन पैदा होगा। अगर परमात्मा को भी पाने की आकांक्षा हो तो बंधन बनाएगी। क्योंकि जहां भी आकांक्षा होगी, वहीं स्वतंत्रता क्षीण हो जाएगी। जब कोई आकांक्षा नहीं रह जाती तो बंधन समाप्त होते हैं। और ऐसी घड़ी तो तभी आती है जब परमात्मा से मिलन हो जाए। इसके पहले ऐसी कोई घड़ी नहीं आती।

तो जिन्हें सच में ही बंधनों के पार जाना है; जो ऊब गए हैं जीवन की जंजीरों से; जो इस जीवन के कारागृह से पीड़ित हो गए हैं; जिनकी समझ में आ गया है कि, ये बड़ी दीवालें जीवन की घर की दीवालें नहीं हैं, ये कारागृह हैं, और जिसको हम जिंदगी कहते हैं वह सिवाय बंधनों के और कुछ भी नहीं--उनके लिए भक्ति ही एकमात्र उपाय है।

"ऐ ताइरे-लाहूति! उस रिज्क से मौत अच्छी

जिस रिज्क से आती हो परवाज़ में कोताही।'

उस जिंदगी से मौत अच्छी है...किस जिंदगी से?--जिस जिंदगी से उड़ान में बाधा पड़ती हो, आकाश छोटा होता हो, "जिस रिज्क से आती हो परवाज़ में कोताही'--उड़ने में रुकावट आती हो।

जहां-जहां रुकावट है, वहां-वहां गौर से देखना: तुम अपनी ही किसी वासना को खड़ा हुआ पाओगे। जहां भी तुम्हारे पंख अड़ते हैं, अटकते हैं, गौर से देखना: वहीं-वहीं तुम पाओगे, कोई आकांक्षा, कोई अपेक्षा, कोई वासना, कोई मांग पंखों पर बंधन बन गई है।

तुम्हारी जंजीरें तुम्हारी ही वासनाओं की जंजीरें हैं, किसी और ने ढाली नहीं, किसी और ने तुम्हें पहनाई नहीं हैं। और जिस दिन तुम्हें यह दिखाई पड़ जाए, उस दिन तुम्हारी जंजीरें ऐसे ही पिघल जाती हैं जैसे तेज धूप में बर्फ पिघल जाए, सुबह के सूरज में ओस की बूंदें उड़ जाएं--ऐसे ही तुम्हारी जंजीरें उड़ जाती हैं। परमात्मा को, बिना कुछ और मांगे, बिना कुछ और चाहे अपने को समर्पित कर देना। यह मत कहना कि मैं परमात्मा को भी चाहता हूं। उतनी चाह भी तुम्हारे परवाज़ में कोताही ले आएगी। तुम इतना ही कहना कि मैं अपने को परमात्मा में छोड़ने को तत्पर हूं। मांग कुछ भी नहीं है। मिटाना है।

क्योंकि सब मांग अहंकार की मांग है, हर मांग अहंकार की मांग है। तुम यह भी मत कहना कि मैं परमात्मा को चाहता हूं। क्योंकि उतनी चाह में भी तुम अपने को परमात्मा से ऊपर रख रहे हो, तो परमात्मा विषय-वस्तु हो गया। कभी तुम धन चाहते थे अब परमात्मा को चाहते हो--लेकिन चाहनेवाला खड़ा रह जाएगा। तुम इतना ही कहना कि अब बहुत चाहत करके देख ली--अब अपने को छोड़ना है, मिटाना है। इस मिटाने में ही भक्त एक अपरिसीम आनंद से भर जाता है, क्योंकि उसके परवाज में फिर कोई कोताही नहीं रह जाती, उसका पूरा आकाश उपलब्ध हो जाता है; पंख परिपूर्ण स्वतंत्रता से उड़ने लगते हैं! और इस मिटाने में ही एक ऐसी बेहोशी उसे घेर लेती है, जिसे बेहोशी कहना भी ठीक नहीं--जिसमें बड़ा गहरा होश है और एक ऐसा होश उस पर आ जाता है, जिसे होश कहना भी ठीक नहीं--क्योंकि उसकी आंखों में बड़ी गहरी बेहोशी है, जैसे वह शराब पीए हो, जैसे अभी-अभी मधुशाला से लौटा हो!

और जब तक तुम्हारे लिए मंदिर मधुशाला नहीं बन जाता और जब तक प्रार्थना तुम्हारे लिए इतना गहन आत्मविस्मरण नहीं बन जाती कि तुम उसमें डूब ही जाओ, तब तक तुम जो भी कर रहे हो, वह कुछ और होगा, भक्ति नहीं।

"मैं मयकदे की राह से हो कर निकल गया,

वर्ना सफर हयात का काफी तबील था।'

जिंदगी का रास्ता बहुत कठिन है! अगर मयकदे की राह से होकर निकल गए, तब बात और। अगर जीवन की मधुशाला से गुजर गए तो बात और! वही परमात्मा है। अगर उस मस्ती को थोड़ा चख लिया, अगर थोड़ा स्वाद पा लिया परमात्मा का, डगमगाने लगे पैर उसके आंगन में, नाच छा गया--तो ही; अन्यथा जिंदगी का रास्ता बहुत कठिन है, कांटे ही कांटे हैं। फूल तो तभी खिलते हैं जब तुम मिटना शुरू होते हो; अन्यथा दुर्गंध ही दुर्गंध है। सुगंध तो तभी आती है जब तुम कपूर की तरह शून्य में खो जाते हो।

"मस्जिद में बुलाते हैं हमें जाहिदे-नाफह्म

होता अगर कुछ होश तो मयखाने न जाते।'

--विरक्त हमें मंदिर में बुला रहे हैं, मस्जिद में बुला रहे हैं; अगर कुछ थोड़ा होश होता तो मयखाने ही चले जाते।

भक्त को न कोई मंदिर बचता, न कोई मस्जिद बचती। वह जहां है वहीं उसकी मधुशाला है। वह जहां है, वहीं उसका परमात्मा है।

तुम्हारे मिट जाने में, तुम्हारी लीनता में, तुम्हारी तल्लीनता में--परमात्मा का आविर्भाव है।

इसलिए भक्त में तुम एक बेहोशी भी पाओगे और एक होश भी।

ज्ञानी में तुम्हें होश मिलेगा, बेहोशी न मिलेगी।

शराबी में, पापी में, तुम्हें बेहोशी मिलेगी, होश न मिलेगा।

योगी में तुम्हें होश मिलेगा, भोगी में तुम्हें बेहोशी मिलेगी--भक्त में तुम्हें दोनों मिलेंगे। भोगी भी उससे ईष्या करेगा और योगी भी उससे ईष्या करेगा। क्योंकि योगी देखेगा, ऐसी अपरिसीम होश की संभावना उसके भीतर नहीं है। और भोगी देखेगा, इतना भोगकर भी ऐसी मस्ती उसके पास नहीं आई।

सब भोग तिक्त स्वाद छोड़ जाता है।

ठीक कहते हैं नारद कि ज्ञान, कर्म, योग, भक्ति की ऊंचाई को नहीं पहुंचते।

भक्ति में, परमात्मा उसकी समग्रता में स्वीकार है, उसका संसार भी समाहित है उस स्वीकार में। तो भक्त भागता नहीं संसार से; भोग से भी नहीं भागता--वह उसे भी परमात्मा का ही अनुग्रह मानकर स्वीकार कर लेता है।

त्याग भक्त की भाषा नहीं है; जो "उसने' दिया है, उसे स्वीकार कर लेता है--अहोभाव से, धन्यभाग से!

तो भक्त के जीवन में एक अनूठा संवाद है: उसकी बेहोशी में होश है, उसके होश में बेहोशी है; उसके ध्यान में तल्लीनता है, उसकी तल्लीनता में ध्यान है।

भक्त आखिरी समन्वय है, आखिरी सिंथीसिस!

"मस्जिद में बुलाते हैं हमें जाहिदे-नाफह्म

होता अगर कुछ होश तो मयखाने न जाते।'

...डूबता जाता है--परमात्मा के रस में! खोता जाता है अपनी बूंद को उसके रस के सागर में! और जब बूंद सागर हो जाती है, तो उसकी मस्ती का क्या कहना! जब बूंद आकाश को छूती है तो उसकी मस्ती का क्या कहना!

भक्त में तुम रस पाओगे; योगी को सूखा पाओगे।

भोगी में रस मिलता है, लेकिन दुर्गंधयुक्त!

भक्त में तुम रस पाओगे--और सुगंधयुक्त!

भोगी संसार को परमात्मा समझ लेता है, और परमात्मा को त्याग देता है। योगी परमात्मा को संसार के विपरीत समझता है, इसलिए संसार को त्याग देता है। भक्त परमात्मा और संसार को एक ही मानता है; स्रष्टा और सृष्टि एक है--इसलिए न कुछ त्यागता, न कहीं भागता। इस परम बोध में कि स्रष्टा अपनी सृष्टि के रोएं-रोएं में समाया है, भक्त में योग और भोग का मिलन हो जाता है। वह परम संगीत है। उससे ऊपर कोई संगीत नहीं।


सोमवार, 11 सितंबर 2023

 सूत्र :

तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ।।

पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः।।

कथादिष्विति वर्गः।।

आत्मरत्यविरोधेनेति शांडिल्यः।।

नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता

तद्धिस्मरणे परमव्याकुलतेति

यथा वज्रगोपिकानाम्।।

तद्धिहीनं जाराणामिव।।

नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम्।।


विराट का अनुभव--मुश्किल! पर अनुभव से भी ज्यादा मुश्किल है अभिव्यक्ति। जान लेना बहुत मुश्किल--बता देना और भी ज्यादा मुश्किल! क्योंकि व्यक्ति मिट सकता है...बूंद खो सकती है सागर में, और अनुभव कर ले सकती है सागर का; लेकिन दूसरी बूंदों को कैसे कहें, जिन्होंने मिटना नहीं जाना, जो अभी अपनी पुरानी सीमाओं में आबद्ध हैं...उनको कैसे कहें!

एक पक्षी उड़ सकता है खुले आकाश में अपने पिंजरे में बंद हैं, गहरे में उसकी अनुभूति होती है--लेकिन शब्दों में कैसे उसे कोई बांधे!

शब्द में बंधते ही आकाश आकाश नहीं रह जाता। शब्दों में बंधते ही विराट नहीं रह जाता। इधर शब्द में बांधा कि उधर अनुभव झूठा हुआ।

इसलिए बहुत हैं जो जानकर चुप रह गये हैं। बहुत हैं जो जानकर गूंगे हो गये हैं। गूंगे थे नहीं; जानने ने गूंगा बना दिया। बहुत थोड़े-से लोगों ने हिम्मत की है--दूर की खबर तुम तक पहुंचाने की। वह हिम्मत दाद देने के योग्य हैं। क्योंकि असंभव है चेष्टा। माध्यम इतने अलग हैं...।

समझें जैसे देखा सौंदर्य आंख से, और फिर किसी को बताना हो और वह अंधा हो, तो क्या करियेगा, फिर कोई और माध्यम चुनना पड़ेगा; आंख का माध्यम तो काम न देगा। तुमने तो आंख से देखा था सौंदर्य सुबह का, या रात का तारों से भरे आकाश का, अंधे को समझाना है, आंख का माध्यम तो काम नहीं देगा, तो सितार पर गीत बजाओ! धुन बजाओ! नाचो! पैरों में घूंघर बांधो! लेकिन माध्यम अलग हो गया: जो देखा था, वह सुनाना पड़ रहा है।

तो जो देखा था, वह कैसे सुनाया जा सकता है? जो आंख ने जाना, वह कानों कैसे जानेगा? इससे भी ज्यादा कठिन है बात सत्य के अनुभव की। क्योंकि अनुभव होता है निर्विचार में और अभिव्यक्ति देनी पड़ती है विचार में। विचार सब झूठा कर देते हैं।

फिर भी हिम्मतवर लोगों ने चेष्टा की है: करुणा के कारण, शायद किसी के मन में थोड़ी भनक पड़ जाए; न सही पूरी बात, न सही पूरा आकाश, थोड़ी-सी मुक्ति की सुगबुगाहट आ जाए, थोड़ी-सी पुलक पैदा हो जाए; न सही पूरा दृश्य स्पष्ट हो, प्यास ही जग जाए; सत्य न बताया जा सके न सही, लेकिन सत्य की तरफ जाने के लिए इशारा, इंगित किया जा सके--उतना भी क्या कम है!

हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।'

हजारों साल तक नर्गिस रोती है, कोई उसकी रोशनी को देखने और दिखानेवाला नहीं। फिर कहीं कोई दीदावर पैदा होता है, कहीं कोई एक आंखवाला पैदा होता है।

नर्गिस को तो शायद एक आंखवाला भी, उसकी रोशनी के लिए बोध दिला देता होगा कि मत रो, तू सुंदर है; लेकिन सत्य के लिए तो और भी कठिनाई है। हजारों साल में कभी कोई दीदावर वहां भी पैदा होता है। फिर वह जो कहता है, वह कोई गीत जैसा नहीं है, हकलाने जैसा है; वह नाच जैसा नहीं है, लंगड़ाने जैसा है। और नाच में और लंगड़े की गति में जितना अंतर है, किसी के मधुर गीत में और किसी के हकलाने में जितना अंतर है, उतना ही अंतर सत्य को देखने में और सत्य को कहने में है।

बहुत तो चुप रह गये। उन्होंने यह झंझट न ली। लोगों ने पूछा भी ऐसे चुप रह जानेवालों से। वे तो ढोंग कर गये के दीवाने हैं। वे तो पागल बन गये। उन्होंने तो अपने चारों तरफ एक पागलपन का अभिनय कर लिया। धीरे-धीरे लोग समझ गये के पागल हो गये हैं, छोडो भी!

"चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी

वर्ना हम जमाने-भर को समझाने कहां जाते।'

बहुत हैं जिन्होंने सत्य को जानकर अपने को पागल घोषित कर दिया है। सूफी उनको मस्त कहते हैं। दुनिया उनको पागल समझ लेती है। झंझट मिटी! अब कोई पूछने भी नहीं आता कि क्या जाना। पागल से कौन पूछता है!

लेकिन कुछ थोड़े-से लोग इतना आसान रास्ता नहीं लेते। वे लाख तरह की चेष्टा करते हैं कि तुम्हें किसी तरह जतला दें। तुम्हारा हाथ पकड़कर चलाने की कोशिश करते हैं। तुम्हारे भीतर तुम्हारे प्रेम की आग को जलाने की कोशिश करते हैं। ईंधन बन जाते हैं तुम्हारे हृदय में कि लपटें लगें। हजार तरह के झूठ भी बोलेते हैं, सिर्फ इसीलिए कि सत्य की तरफ थोड़ा इशारा हो जाए। तो, यह पाप करने जैसा है।

लाओत्सु ने कहा है: "सत्य बोला नहीं कि झूठ हुआ नहीं। जो भी बोला जाएगा वह झूठ हो जाएगा।'

इसका यह अर्थ हुआ कि बुद्धपुरुष झूठ बोलते रहे, बोले तो झूठ ही बोले; क्योंकि बोलने में सच तो आता नहीं, बोलने में ही झूठ हो जाता है।

जैसे तुमने कभी देखा, लकड़ी सीधी, पानी में डाली, तिरछी दिखायी पड़ने लगती है। झूठ हो गया। बाहर खींची, सीधी-की-सीधी है। पानी में डालो, फिर तिरछी दिखायी पड़ने लगती है। क्या हो जाता है? पानी का माध्यम हवा के माध्यम से भिन्न है। तो हवा के माध्यम में लकेड़ी का जो रुप है, रंग है, वह पानी में नहीं रह जाता। जानते हो तुम भलीभांति कि लकड़ी सीधी है; तुमने ही डाली है, लेकिन तुम्हीं को तिरछी दिखायी पड़ने लगती है।

 उनकी तो बात ही छोड़ दो--सुननेवालों की--जब सत्य को जाननेवाला सत्य को बोलने की कोशिश करता है, उसको खुद ही तिरछा दिखायी पड़ने लगता है। भाषा का माध्यम, अभिव्यक्ति का माध्यम...!

नारद ने इन सूत्रों में, भक्ति की कितने-कितने ढंगों से व्याख्या की गयी है, उनके थोड़े-से उदाहरण दिये हैं।

अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।'

भक्ति तो एक है, मत नाना हैं। क्योंकि जिसको जैसा सूझा, वैसी उसने अभिव्यक्ति दी है। जिसको जैसी समझ आयी, जिसका जैसा ढंग था, उसने वैसे रंग भरे। ये लक्षण भक्ति के नहीं हैं; अगर गौर से समझो तो ये लक्षण, जिस भक्त ने भक्ति का गीत गाया, उसके हैं:। ये देखने के ढंग के संबंध में खबर देते हैं; जो देखा गया उस संबंध में कुछ भी खबर नहीं देते।

बहुत मत हैं। बहुत मत होंगे ही, क्योंकि भक्ति अनंत है। उसके बहुत किनारे हैं। और कहीं से भी घाट बनाकर तुम अपनी नौका को छोड़ दे सकते हो सागर में। फिर जब तुम सागर की गहराइयों में पहुंचोगे, मध्य में पहुंचोगे, उस पार पहुंचोगे, तो स्वभावतः: तुम उसी घाट की बात करोगे जिससे तुमने नाव छोड़ी थी। और तुम कहोगे कि जिसको अभी नाव छोड़नी हो, वही घाट है। तुम्हें और घाटों का पता भी नहीं है। एक घाट काफी है। तुम अपने ही घाट का वर्णन करोगे।-- दूसरा किसी और घाट से उतरा था सागर में। सागर के घाटों का कोई हिसाब है! कोई हिंदू की तरह उतरा था; कोई मुसलमान की तरह उतरा था, कोई ईसाई की तरह उतरा था। से सब घाट हैं, तीर्थ। फिर जो जहां से उतरा था, उसी की बात करेगा। दूसरे किनारे पर पहुंचकर भी, तुम ने जिस किनारे से नाव छोड़ी थी, तुम्हारे दूसरे किनारे की अभिव्यक्ति में उस किनारे का हाथ रहेगा।

और निश्चित ही, सभी घाटों से नाव छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है, एक ही घाट पर्याप्त है। सभी से छोड़ना भी चाहोगे तो कैसे छोड़ोगे? जब भी छोड़ोगे, एक ही घाट से छोड़ोगे।

किसी घाट पर पत्थर जड़े हैं। किसी घाट पर हीरे जड़े होंगे। किसी घाट पर आकाश को छूते वृक्ष खड़े हैं। किसी घाट पर मरुस्थल होगा, रेत का विस्तार होगा। किसी घाट पर आदमी ने कुछ व्यवस्था कर ली होगी, सीढ़ियां लगा ली होंगी। किसी घाट पर कोई व्यवस्था न होगी, अराजक होगा। पर इससे क्या फर्क पड़ता है! नाव छूट जाती हा सभी घाटों से।

"शोरे-नाकूसे-बरहमन हो कि बागे-हरम

छुपके हर आवाज में तुझको सदा देता हूं मैं।'

जो जानते हैं, वो कहते हैं: यह मंदिर के पुजारी के घंटों की आवाज हो कि मस्जिद के मुल्ला की, सुबह की बांग हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

"छुपके हर आवाज में तुझको सदा देता हूं मैं।'

हर आवाज में, हर ढंग में, हर व्यवस्था में, खोजनेवाला तो वही चैतन्य है; वही प्राण है--प्यासे, प्रेम के लिए आतुर!

"अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।'

"पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार

 भगवान की पूजा आदि में अनुराग होना भक्ति है। पूजा का अर्थ होता है: परमात्मा को प्रतिस्थापित करना; एक पत्थर की मूर्ति है या मिट्टी की मूर्ति है, परमात्मा को उसमें आमंत्रित करना; परमात्मा को कहना कि "इसमें आओ और विराजो--क्योंकि तुम हो निराकार: कहां तुम्हारी आरती उतारुं? हाथ मेरे छोटे हैं, तुम छोटे बनो! तुम हो विराट: कहां धूप-दीप जलाऊं? मैं छोटा हूं, सीमित हूं, तुम मेरी सीमा के भीतर आओ! तुम्हारा ओर-छोर नहीं: कहां नाचूं? किसके सामने गीत गाऊं? तुम इस मूर्ति में बैठो!'

पूजा का अर्थ है: परमात्मा की प्रतिस्थापना सीमा में, आमंत्रण--इसलिए पूजा का प्रारंभ उसके बुलाने से है।

अंगरेजी में शब्द है "गाड' भगवान के लिए। वह शब्द बड़ा अनूठा है। उसका मूल अर्थ है--जिस मूल धातू से वह पैदा हूुआ है, भाषाशास्त्री कहते हैं, उस मूल धातु का अर्थ है--"जिसको बुलाया जाता है।' बस इतना ही अर्थ है जिसको बुलाया जाता है, जिसको पुकारा जाता है--वही भगवान।

दूसरा, जिसने कभी पूजा का रहस्य नहीं जाना, देखेगा तुम्हें बैठे पत्थर की मूर्ति के सामने, समझेगा: "नासमझ हो! क्या कर रहे हो?' उसे पता नहीं कि पत्थर की मूर्ति अब पत्थर की नहीं--मृण्मय चिन्मय हो गया है! क्योंकि भक्त ने पुकारा है! भक्त ने अपनी विवशता जाहिर कर दी है। उसने कह दिया है कि "मैं मजबूर हूं। तुम जैसा विराट मैं न हो सकूंगा, तुम कृपा करो, तुम तो हो सकते हो मेरे जैसे छोटे! मेरी अड़चनें हैं। मेरी शक्ति नहीं इतनी बड़ी के तुम जैसा विराट हो सकूं। दया करो! तुम ही मुझ जैसे छोटे हो जाओ ताकि थोड़ा संवाद हो सके, थोड़ी गुफ्तगू हो सके, दो बातें हो सकें। मैं फूल चढ़ा सकूं, आरती उतार सकूं, नाच लूं: तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा। सभी रूप तुम्हारे हैं, यह एक और रूप तुम्हारा सही! मुझे बहुत कुछ मिल जाएगा, तुम्हारा कुछ खोएगा नहीं।'

भक्त की आंख से देखना मूर्ति को, नहीं तो तुम मूर्ति को न देख पाओगे; तुम्हें पत्थर दिखायी पड़ेगा; मिट्टी दिखायी पड़ेगी। भक्त ने वहां भगवान को आरोपित कर लिया है। और जब परिपूर्ण हृदय से पुकारा जाता है, तो मिट्टी भी उसी की है। मिट्टी उससे खाली तो नहीं। पत्थर उसके बाहर तो नहीं। वह वहां छिपा ही पड़ा है। जब कोई हृदय से पुकारता है तो उसका आविर्भाव हो जाता है।

इसलिए भक्त जो देखता है मूर्ति में, तुम जल्दी मत करना, तुम नहीं देख सकते। देखने के लिए भक्त की आंखें चाहिए।

"बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

इजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।'

पत्थर रोते हैं हजारों साल, तब कहीं कोई पत्थर में परमात्मा को देखनेवाला पैदा होता है। आंख चाहिए।

पूजा का प्रारंभ है आमंत्रण में कि आओ, विराजो, प्रतिस्थापना में!

मूर्ति तो झरोखा है, वहां से हम विराट में झांकते हैं।

तुम अपने घर में ,देखते हो, झरोखे से आकाश में झांकते हो। तुम चांदत्तारों की बात करो, दूर फैले नीले-गगन की बात करो, और कोई दूसरा हो जिसको सिर्फ चौखटा ही दिखायी पड़ता हो खिड़की का, वच कहे, कहां की बातें कर रहे हो? पागल हो गये हो? लकड़ी का चौखटा लगा है, और तो कुछ भी नहीं। कहां के चांदत्तारे?'...

तो, जब तुम्हें मूर्ति में कुछ भी न दिखायी पड़े तो जल्दी मत करना; तुम्हें चौखटा ही दिखायी पड़ रहा है।

भक्त जब हृदयपूर्वक बुलाता है तो मूर्ति खुल जाती है, उसके पट बंद नहीं रहते। भक्त को उस मूर्ति के माध्यम से कुछ दिखायी पड़ने लगता है। उसके देखने के लिए भक्त की ही आंखें चाहिए।

कहते हैं कि मजनूं जब बिलकुल पागल हो गया लैला के लिए, तो उस देश के सम्राट ने उसे बुलवाया। उसे भी दया आने लगी; द्वार-द्वार, गली-गली, कूचे-कूचे वह पागल "लैला-लैला' चिल्लाता फिरता है! गांवभार के हृदय पसीज गये। लोग उसके आसुओं के साथ रोने लगे। सम्राट नेउसु बुलाया और कहा, "तू मत रो।' उसने अपने महल से बारह सुदरियां बुलवाईं और उसने कहा, "इस पूरे देश में भी तू खोजेगा, तो ऐसी सुंदर स्त्रियां तुझे न मिलेंगी। कोई भी तू चुन ले।'

मजनूं ने आंख खोली। आंसू थमे। एक-एक स्त्री को गौर से देखा, फिर आंसू बहने लगे और उसने कहा कि लैला तो नहीं है। सम्राट ने कहा, "पागल! तेरी लैला मैंने देखी है, साधारण-सी स्त्री है। तू नाहक ही बावला हुआ जा रहा है।'

कहते हैं, मजनूं हंसने लगा। उसने कहा, "आप ठीक कहते होंगे; लेकिन लैला को देखना हो तो मजनूं की आंख चाहिए। आपने देखी नहीं। आप देख ही नहीं सकते, क्योंकि देखने का एक ही ढंग है लैला को--वह मजनूं की आंख है। वह आपके पास नहीं है।'

भगवान को देखने का एक ही ढंग है, वह भक्त की आंख है।'तो कोई अगर मंदिर में पूजा करता हो तो नाहक हंसना मत। मूर्ति-भंजक होना बहुत आसन है, क्योंकि उसके लिए कोई संवेदनशीलता  नहीं चाहिए। मूर्तियों को तोड़ देन बहुत आसान है। क्योंकि उसके लिए कोई हृदय की गहराई  नहीं चाहिए।

मूर्ति में अमूर्त को देखना बड़ा कठिन है! वह इस जगत की सबसे बड़ी कला है। आकार में निराकार को झांक लेना, शब्द में शून्य को सुन लेना, दृश्य में अदृश्य की पकड़ लेना--उससे बड़ी और कोई कला नहीं है।

इसलिए प्रेम कलाओं की बला है, सरताज है! उसके पार फिर कुछ भी नहीं है।

पूजा का अर्थ है: आकार में आमंत्रण निराकार को।

और अगर तुमने कभी पूजा की है तो तुम जानोगे, तुम्हारे बुलाने के पहले मूर्ति साधारण पत्थर का टुकड़ा है।

रामकृष्ण पूजा करते थे। अनेक दिन बीत गये। वे रोज रोते, घंटों पूजा करते, फिर एक दिन गुस्से में आ गये। तलवार टंगी थी काली के मंदिर में मूर्ति के सामने, तलवार उतार ली, और कहा, बहुत हो गया! इतने दिन से बुलाता हूं! अगर तू प्रगट नहीं होती तो मैं अप्रगट हुआ जाता हूं। या तो तू दिखायी दे, तू हो, या मैं मिटता हूं। तलवार खींच ली। एक क्षण और, और गर्दन पर मारे लेते थे, कि सब कुछ बदल गया। मूर्ति जीवंत हो उठी! वहां काली न थी। मातृत्व साकार हो उठा! ओंठ जो बंद थे, पत्थर के थे, मुस्कराये! आंक्षें जो पत्थर की थीं, और जिनसे कुछ दिखायी न पड़ता था, उन्होंने रामकृष्ण में झांका। तलवार झनकार के साथ फर्श पर गिर गयी।

रामकृष्ण छह दिन बेहोश रहे। भक्त घबड़ा गये। मित्र परेशान हुए। डर तो पहले ही था कि यह आदमी थोड़ा पागल-सा है, यह अब और क्या हो गया! छह दिन की बेहोशी के बाद जब बेहोशी में भेजती है? इतने दिन होश में रखा छह दिन--अब क्ाो बेहोशयी में भेजती है? फिर से बुला ले! जा मत! रुक!'

इतना विराट था, इतना प्रगाढ़ था अनुभव कि अपने को संभाल न सके। डगमगा गये! बूंद में जब सागर उतरे तो ऐसा होगा ही। तुम्हारे आंगन में जब पूरा आकाश उतर आये तो तुम्हारे आंगन की दीवारलें कहां तक संभली रहेंगी, गिर जाएंगी

उन छी दिनों रामकृष्ण ने चिन्मय का जलवा देखा। वे छी दिन सतत परमात्मा के साक्षसत्कार के दिन थे। वह उनकी पहली समाधि थी।

लेकिन पूजा का अर्थ यही है: पहले परमात्मा को आमंत्रित करो, फिर अपने को उसके चरणों में चढ़ा दो , कि कह दो कि तू ही है, अब मैं नहीं!

तुम जितनी दूर तक परमात्मा को बुलाते हो, जितनी गहराई तक बुलाते हो, उतनी दूर तक, उतनी गहराई तक वह आता है। तुम जब अपने को मिटाने को भी तत्पर हो जाते हो तो तुम्हारे अंतरतम को छू लेता है। तुम्हारी बिना आज्ञा के वह तुम में प्रवेश न करेगा। वह तुम्हारा सम्मान करता है। वह कभी भी किसी की सीमा में आक्रमण नहीं करता। बिन कुलाया मेहमान परमात्मा कभी नहीं होता। तुम बुलाते हो, मनाते हो, समझाते-बुझाते हो, तो मुश्किल से आता है।

भक्ति खो गयी है जगत से, क्योंकि भक्ति की कला बड़ी कठिन है--सब कुछ दांव पर लगाने की कला है, जुआ है। बड़ी हिम्मत चाहिए। आंख के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए।

"पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार भगवान की पूजा में अनुराग होना भक्ति है।'

पूजा तो बहुत लोग करते हैं, अनुराग होना चाहिए। संस्कार वश है तो फिर भक्ति नहीं है। चूंकि पीढ़ी दर पीढ़ी तुम्हारे घर के लोग मंदिर में जाते रहे तो तुम मंदिर जाते हो; मस्जिद जाते रहे तो मस्जिद जाते हो; आकार को पूजा तो आकार को पूजते हो; निराकार को पूजा तो निराकार को पूजते हो--औपचारिक, परपंरागत, लकीर के फकीर, दूसरों के पदचिह्नों पर चलनेवाले! नहीं, ऐसे न होगा।

उधार कोई परमात्मा तक कभी नहीं पहुंचता। तुम्हारी प्यास चाहिए, परंपरा नहीं। तुम्हारी आंख चाहिए, लकीर की फकीर और उसका अंधापन नहीं।

तो शर्त है: पूजा में अनुराग! प्रेम चाहिए! वैसा ही प्रेम चाहिए जैसे जब तुम किसी के प्रेम में पड़ जाते हो, तो सब औपचारिकता खो जाती है। सब शिष्टाचार खो जाता है। पहली दफा तुम किसी और ही गहराई से बोलना शुरू करते हो। इसके पहले भी बोलते रहे थे, लेकिन वह ओठों की बात थी। अब हृदय बोलता है! पहली दफा तुम किसी और ही हवा में और किसी और ही माहौल में जीते हो। क्या हो जाता है।

साधारण प्रेम में क्या होता है? दूसरे में तुम्हें कुछ दिखायी पड़ने लगता है जो अब तक तुम्हें कभी किसी में दिखायी न पड़ा था; तुम्हारी आंख खुलती है!

तुमने कभी खयाल किया, प्रेमी दूसरों को पागल मालूम पड़ते हैं! अगर कोई दूसरा किसी के प्रेम में पड़ जाए और दीवाना हो जाए, तो तुम हंसोगे, तुम कहोगे, "पागल है, नासमझ है। समझ में आ! होश में आ! क्या कर रहा है?'

"हम खुदा के भी कभी काइल न थे

उनको देखा तो खुदा याद आया।'

प्रेमी पहली दफा किसी साधारण व्यक्ति में परमात्मा के दर्शन कर लेता है, कोई झलक पाता है। तुम जिसके प्रेम में पड़ जाते हो, वहीं तुम्हें परमात्मा की थोड़ी-सी झलक पहली दफा मिलती है; तुम्हारा आस्तिक होना शुरु हुआ।

प्रेम: आस्तिकता की पहली गंध, पहली लहर। प्रेम: आस्तिकता की तरफ पहला कदम! क्योंकि कम-से-कम चलो एक में ही सही, परमात्मा दिखा तो! और एक में दिखा तो सब में दिख सकता है; न भी दिखे तो भी इतना तो तुम समझ ही सकते हो कि एक में दिखा तो सब में भी होगा।

लेकिन जल्दी ही तुम्हारी प्रेम की आंख धुधली हो जाती है: जिसमें तुम्हें परमात्मा दिखा था, वह भी एक ख्वाब, एक सपना हो जाता है; जल्दी ही तुम भूल जाते हो, धूल जम जाती है।

जब प्रेम की घटना घटे तो जल्दी करना उसे पूजा बनाने की। अन्यथा समय ढांक देगा।

इसलिए मैं कहता हूं, जवानी पूजा के दिन हैं। लेकिन लोग कहते हैं, पूजा बुढ़ापे में करेंगे। वे कहते हैं, जवानी में प्रेम करेंगे। बुढ़ापे में पूजा करेंगे। इतना फासला प्रेम में और पूजा में होगा तो प्रेम तो मर ही जाएगा, पूजा आ न पाएगी। लोग यही कह रहे हैं कि प्रेम तो जवानी में करेंगे; जब प्रेम मरने लगेगा, मर ही जाएगा, तब फिर पूजा कर लेंगे।

और असलियत यह है  प्रेम ही पूजा बनता है। प्रेम के मरने से पूजा नहीं आती; प्रेम के पूरे निखरने से पूजा बन जाती है। एक में जो दिखायी पड़ा है, अब इस सूत्र को पकड़ लेना और इसको औरों में भी देखने की कोशिश करना। जब आंख ताजी हो, लहर नयी हो, उमंग अभी जोश-भरी हो, उत्साह युवा हो, तो जल्दी कर लेना। जो तुम्हें अपनी प्रेयसी में, प्रेमी में दिखा हो, बच्चे में दिखा हो, अपने बेटे में दिखा हो, मित्र में दिखा हो, जल्दी करना क्योंकि उस वक्त तुम्हारे पास आंख है, उस वक्त सारे जगत को गौर से देख लेना; तुम अचानक पाओगे; वह सभी के भीतर छिपा है, क्योंकि उसके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है।

"पूजा में अनुराग'...।

पूजा करते तुम बहुत लोगों को देखोगे, लेकिन अनुराग नहीं है, प्रेम नहीं है, पूजा तो है, विधिविधान है। सात दफा आरती उतारनी है तो तुम सात दफा आरती उतारते हो; गिनती से उतारते हो, कहीं आठ न हो जाए। वहां भी कंजूसी है।

रामकृष्ण पूजा करते तो कभी-कभी, दिन-भर-दिन खाना-पीना भूल जाते। उनकी पत्नी शारदा द्वार पर खड़ी है, वह कहती है कि परमहंस देव, समय निकला जा रहा है, सूर्यास्त हुआ जा रहा है, दिन-भर से आप भूखे हैं। मगर वहां कोई परमहंस देव हैं कि सुनें। वे नाच रहे हैं! भूख की खबर किसको लगे! भूख की याद किसको आये! जो भगवान का भोग लगा रहा हो, संसार के भोजन उसे क्या याद आए! गिर पड़ते; तभी उठाकर लाये जाते, अपने से न आते। बहुत दफे उन्हें कहा गया, "ऐसा न करें! पूजा ठीक है, घड़ी-दो घड़ी की ठीक है।' पर रामकृष्ण कहते कि घड़ी-दो घड़ी की याद रह जाए तो पूजा होती ही नहीं।

तुमने कभी अपने को पूजा करते देखा, बीच-बीच में तुम घड़ी देख लेते हो। घड़ी को बाहर रख आया करें जहां जूते छोड़ आते हो। जूते भी आ जाएं, मंदिर खराब न होगा, घड़ी नहीं आनी चाहिए।जूतों में ऐसा कुछ भी नहीं है, घड़ी नहीं आनी चाहिए। क्यों? क्योंकि परमात्मा है शाश्वत्तता। समय को अपने साथ लिये तुम उसे न छू सकोगे। वह है अनंत, तुम क्षणों को साथ लिये बैठे हो। और तुम्हारा मन बार-बार देख रहा है कि कब दुकान जाएं, कब दफ्तर जाएं! तो अच्छा है जाना ही मत। ऐसा समय जो तुमने मंदिर में बिताया, और बाजार के सोच में बिताया, बिल्कुल व्यर्थ गया, इसका उपयोग बाजार में ही कर लेना, कुछ भी तो लाभ होगा। यह तो कुछ भी न लाभ न हुआ।

मैंने देखा है लोगों को पूजा करते, नमाज पढ़ते।

मैं राजस्थान जाता था अकसर, तो चित्तोढ़गढ़ पर गाड़ी बदलती है। सांझ की नमाज का समय होता, कोई घंटे-भर गाड़ी रुकती, तोजितने भी मुसलमान होते तो ट्रेन में, वे उतरकर नमाज करने लगते, बिछा लेते अपनी चादर, बैठ जाते नमाज करने, मगर हर मिनट दो मिनट में पीछे लौटकर देखते रहते कि कहीं गाड़ी छूट तो नहीं गयी। यह मैंने बहुत बार देखा।

एक मुसलमान मित्र मेरे साथ यात्रा कर रहे थे। वे भी पूजा के लिए गये। नल के पास प्लेटफार्म पर उन्होंने अपनी चादर बिछा ली, पूजा करने बैठ गये, मैं उनके पीछे खड़ा हो गया। जब उन्होंने गर्दन पीछे मोड़ी तो मैंने उनकी गर्दन वापस पकड़कर उस तरफ मोड़ दी। बहुत नाराज हुए। उस वक्त तोकुछबोल न सके। जल्दी-जल्दी उन्होंने नमाज पूरी की। कहा, "यह क्या मामला है? आपने क्यों मेरी गर्दन इस तरफ मोड़ी?'

इस तरफ अगर गर्दन रखनी हो तो इसी तरफ रखो, उस तरफ रखनी हो तो उसी तरफ रखो। यह कैसी नमाज हुई? यह कैसी पूजा हुई कि बीच-बीच में खयाल है कि गाड़ी छूट न जाए? गाड़ी छूट न जाए, इसमें परमात्मा छूटा जा रहा है, ' मैंने उनसे कहा, "तुम या तो गाड़ी पकड़ लो या परमात्मा को पकड़ लो। कोई जरूरत नहीं है, मत करोनमाज--झूठी तो मत करो।कम-से-कम इतने सच्चे तो रहो कि नहीं है हृदय में तो न करेंगे।

रामक्रष्ण बहुत दिन तक मंदिर न जाते। वे कहते, "जब भीतर ही नहीं है तो कैसे जाऊं, कैसे धोखा दूं--परमात्मा को कैसेधोखा दूं? किस मुंह से भीतर जाऊं?' द्वार के बाहर से ही, बाहर-बाहर, क्षमा मांगकर लोट आते, मंदिर में भीतर न जाते, सीढ़ियों पर से क्षमा मां लेते: "माफ कर, भावच नहीं है। करूंगा तो धोखा होगा, झूठ होगा।'

लेकिन तुम्हारा सब झूठ हो गया है। जिससे तुम्हें प्रेम नहीं है, उसे तुम कहते हो, प्रेम है। जिसे देखकर तुम्हारे भीतर कोई मुस्कराहट नहीं आती, तुम मुस्कुराते हो। जिसे देखकर तुम्हारे भीतर अभिशाप देने का भाव उठता है, उसको आर्शिवाद देते हुए अपने को दिखलाते हो। इन झूठों से घिरे तुम अगर परमात्मा के पास भी जाओगे तो तुम इन्हीं झूठों का प्रयोग वहां भी करोगे। फिर पूजा वैसी ही हो जाएगी जैसी सारी दुनिया की हो रही है।

कितने ही लोग हैं, अनगिनित, पूजा कर रहे हैं, और पूजा की गंध कहीं भी नहीं अनुभव में आती! कितने ही लोग प्रार्थनाएं कर रहे हैं! अगर सच में ही इतनी प्रार्थनाएं हों तो जैसे आकाश में भाप उठ-उठ कर बादल बन जाते हैं, ऐसे प्रार्थनाओं के बादल बन जाएं। सब प्रार्थना बरसने लगे। मेघ घने हो जाएं आकाश में । जल ही न बरसे, प्रार्थना भी बरसे। नदी-नाले प्रार्थना से भर जाएं!

जितने लोग प्रार्थना करते हैं, अगर ये सच में ही प्रार्थना करते हों...।

ठीक है व्यास की भी परिभाषा। ठीक है:

"भगवान की पूजा में अनुराग भक्ति है।'

फिर गर्गाचार्य के मत से भगवान की कथा में अनुराग भक्ति है।'

पूजा में कुछ करना होता है। निश्चित ही व्यास सक्रिय वृत्ति के रहे होंगे। कुछ करना पड़ता है: आरती उतारनी पड़ती है, फूल चढ़ाने पड़ते हैं, घंटी बजानी पड़ती है--कुछ करना पड़ता है।

इसे समझ लें। व्यास निश्चित ही सक्रिय प्रकृति के रहे होंगे। गर्गाचार्य निष्क्रिय प्रकृति के रहे होंगे। क्योंकि व्यास जहां कहते हैं, "पूजा आदि मग अनुराग' , वहां गर्गाचार्य कहते हैं,  "भगवान की कथा में..., कोई सुनाये हम सुनें , रस से सुनें, डूबकर सुनें, मिटकर सुनें--पर कोई सुनाए, हम सुनें!'

"भगवान की कथा में अनुराग...!'

तुमने कभी खयाल किया: कथाओं में तो तुम्हें भी अनुराग है, भगवान की कथा में नहीं है! पड़ोसी की पत्नी किसी के साथ भाग गई, इस कथा को तुम कितने रस से सुनते हो! खोद-खोद कर बातें निकलवा लेते हो। हजार काम हों, रोक देते हो।

छोटे गांव में एकाध स्त्री भाग जाए तो पूरे गांव में काम-धंधा बंद हो जाता है उस दिन, पूरा गांव उसी चर्चा में लग जाता है।

किसी के घर चोरी हो जाए...कुछ भी हो जाए...!

अखबार तुम पढ़ते हो, वह कथा का रस है। लेकिन भगवान की कथा में अब कोई रस नहीं है। और अगर कभी तुम भगवान की कथा में  रस लेते हो तो वह रस भगवान की कथा का नहीं होता। उसमें भी कारण वहीं होंगे, जिन कारणों से तुम और कथाओं में रस लेते थे। कोई की स्त्री किसी के साथ भाग गई, राम की स्त्री को रावण भगा ले गया, तो तुम उसमें भी रस लेते हो। लेकिन तुम खयाल करना, रस तुम्हारा रावण सीता को भगा ले गया है, इसमें है, राम की कथा में नहीं है।

गर्गाचार्य कहते हैं, "भगवान की कथा में अनुराग...'। ऐसे सुनना जैसे प्यासा जल पीता है। ऐसे सुनना जैसे तुम बिलकुल खाली हो--कान ही हो गए, तुम्हारा सारा अस्तित्व बस कान पर ठहर गया। हृदयपूर्वक सुनना! तो परमात्मा का स्मरण अनेक-अनेक रूपों में तुम्हें भर देगा। कुछ करने की जरूरत नहीं है; तुम अगर शांत बैठकर सुन भी सको...।

तुम यहां मुझे सुन रहे हो...यह भगवान की कथा है। यहां तुम ऐसे भी सुन सकते हो, जैसे और साधारण बातें सुनते हो। तुम ऐसे भी सुन सकते हो, जैसे तुम्हारा पूरा जीवन दाव पर लगा है, जीवन और मृत्यु का सवाल है।

मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी पत्नी को कहा था कि आज मैं आराम चाहता हूं, किसी को मिलाना मत; कोई आ भी जाए तो कह देना घर पर नहीं है। लेकिन वह बैठा ही था आराम करने कुर्सीं पर, कि पत्नी आई, उसने कहा, "सुनो, एक आदमी दरवाजे पर खड़ा है।'

मुल्ला ने कहा, "अभी मैंने कहा, अभी देर भी नहीं हुई कि आज दिनभर विश्राम करना है। अभी शुरुआत भी नहीं हुई,मैं कुर्सी पर ठीक से बैठ भी नहीं पाया।'

तो उसकी पत्नी ने कहा, "लेकिन वह आदमी कहता है, जीवन-मरण का सवाल है।'

तब तो मुल्ला भी उठ आया, जब जीवन-मरण का सवाल हो तो कैसा विश्राम! बाहर गया तो पाया कि वह इन्श्यारेंस कंपनी का एजेंट है। जीवन-मरण का सवाल...!

जीवन-मरण का सवाल हो, तभी तुम उठोगे, तभी तुम जागोगे।

भगवान तुम्हारे लिए जीवन-मरण का सवाल है या नहीं? अगर नहीं है, तो फिर बिलकुल मत सुनो, क्योंकि वह समय व्यर्थ ही गया। तुम जो सुनोगे वह किसी सार का नहीं होगा। क्योंकि सार तो तुम्हारे सुनने में छिपा है। सार कहने में नहीं छिपा है, सार तुम्हारे सुनने में छिपा है।

अगर तुम सुनने के लिए ही परिपूर्ण तैयार होकर नहीं आ गये हो, अगर यह सवाल तुम्हारे जीवन-मरण का नहीं है, अगर तुम अभी भी परमात्मा को किनारे पर टालकर अपने संसार में लगे रह सकते हो, अच्छा है तुम संसार में ही लगे रहो। कभी-न-कभी ऊबोगे। कभी-न-कभी लौटोगे। कभी तो वह घड़ी आएगी, जब तुम्हारी अंधेरी रात तुम्हें दिखाई पड़ेगी और सुबह की पुकार तुम्हारे मन में उठेगी। कभी तो वह घड़ी आएगी, जब तुम्हारी अंधेरी रात तुम्हें दिखाई पड़ेगी और सुबह की पुकार तुम्हारे पन में उठेगी। कभी तो वह घड़ी आएगी, तुम अपने कूड़ा-करकट से घिरे-घिरे किसी दिन तो दुर्गंध को अनुभव करोगे; फूलों की गंध की तलाध शुरू होगी।

लेकिन जल्दी मत करो, अगर दुर्गंध से अभी लगाव बाकी है, तो भोग ही जो दुर्गंध को अनुभव करोगे; फूलों की गंध की तलाश शुरू होगी।

लेकिन जल्दी मत करो, अगर दुर्गंध से अभी लगाव बाकी है, तो भोग ही लो दुर्गंध को। चुक ही जाओ। रिक्त ही हो जाने दो उस अनुभव से अपने को। नहीं तो तुम सुन न पाओगे।

मैं एक पंजाबियों की सभा में बोलने गया। उस सभा के बाद फिर मेरा किसी सभा में जाने का मन न रहा। कृष्णाष्टमी थी। और पंजाबी हिंदुओं का मोहल्ला था। मैं तो चकित हुआ, वहां व्याख्यान देने वाले व्याख्यान दे रहे थे, और ऐसी भी स्त्रियां थीं उस सभा में--स्त्रियां ही ज्यादा थीं--जो बोलने वालों की तरफ पीठ किए आपस में गपशप कर रही थीं। वहां झुंड-के-झुंड बने थे। बड़ी भीड़ थी। मुझसे भी उन्होंने प्रार्थना की। मैंने कहा, "तुम पागल हो! यहां कोई सुननेवाला ही नहीं है। यहां लोग अपनी बातचीत में लगे हैं और बोलने वाले बोले जा रहे हैं।'

मैंने कहा, "मुझे जाने दो। इनकी कोई तैयारी सुनने की नहीं है। सुनने कोई इनमें आया भी नहीं है। कृष्ण से इन्हें कुछ लेना-देना नहीं है।'

तुम मंदिरों में जाओ, स्त्रियां जो चर्चा मंदिरों में कर रही हैं, पुरुष जो बातचीत मंदिरों में कर रहे हैं, उसका मंदिर से कुछ लेना-देना नहीं है; वही राजनीति, वही उपद्रव बाहर के, वहां भी ले आते हैं; वे ही घर के, बाहर के झगड़े वहां भी ले आते हैं।

परमात्मा की कथा तो तुम तभी सुन सकते हो जब तुम पूरे रिक्त होकर सुनो।

ठीक कहते हैं गर्गाचार्य, "भगवान की कथा में अनुराग...।' और जिस दिन इस कथा में अनुराग आता है उसी दिन संसार की कथा में अनुराग खो जाता है।


तुम व्यर्थ की बातें मत सुनो, क्योंकि यह सिर्फ सुनना ही नहीं, जो तुम सुनते हो वह तुम्हारे भीतर इकट्ठा हो रहा है।

थोड़ा सोचो, अगर पड़ोसी तुम्हारे घर में कूड़ा फेंक दे तो तुम झगड़ा करने को तैयार हो जाते हो। और पड़ोसी तुम्हारे मन में हजार कूड़ा फेंकता रहे तो तुम झगड़ा तो करते नहीं, तुम रोज प्रतीक्षा करते हो कि कब आओ, कब थोड़ी चर्चा हो! तुम्हें घर में कूड़ा-करकट से भी इतनी समझ है, उतनी समझ तुम्हें भीतर के कूड़ा-करकट की नहीं है।

रोको अपने को व्यर्थ की बात सुनने से, नहीं तो सार्थक को सुनने की क्षमता खो जाएगी। अकारण, आवश्यक न हो, ऐसा सब सुनना त्याग दो, ताकि तुम्हारी संवेदनशीलता तुम्हें फिर से उपलब्ध हो जाए, और भगवान का नाम तुम्हारे कान में पड़े, तो वह बहुत से विचारों की भीड़ में न पड़े, अकेला पड़े। वह चोट अकेली हो तो तुम्हारे हृदय के झरने फिर से खुल सकते हैं।

"शांडिल्य के मत से आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग होना ही भक्ति है।'

व्यास सक्रिय घाट से उतने होंगे। गर्गाचार्य निष्क्रिय घाट से उतरे होंग। पर दोनों सरल व्यक्ति रहे होंगे, बड़े विचारक नहीं, सीधे-सादे, इनीसेंट, निर्दोष, भोले-भाले! शांडिल्य विचारक मालूम होते हैं। उनकी परिभाषा दार्शनिक की परिभाषा है। वे कहते हैं, "आत्मरति के अविरोध विषय में अनुराग होना ही भक्ति है।' दार्शनिक व्याख्या है।

अपने में साधारणतः आदमी को रस होता है। साधारणतः! उसे तुम स्वार्थ कहते हो। स्वार्थ अपने में रस है, लेकिन बिना समझ का। चाहते हो तुम हो कि सुख मिले, मिलता नहीं! चाह तो ठीक है; जो तुम करते हो उस चाह के लिए, उसमें कहीं कोई गलती है।

स्वार्थ और आत्मरति में  फर्क है। स्वार्थ भी अपने सुख की खोज करता है, लेकिन गलत ढंग से, परिणाम हाथ में दुख आता है। आत्मरति भी अपने सुख की खोज करती है, लेकिन ठीक ढंग से, परिणाम सुख आता है। तुम भी अपने ही सुख के लिए जी रहे हो, लेकिन अभी तुमने अपने को जो समझा है वह अहंकार है, आत्मा नहीं। अभी तुम्हारा "स्व' अहंकार है, झूठा है। जिस दिन तुम्हारा "स्व' वास्तविक होगा, आत्मा होगी, उस दिन तुम पाओगे: स्वार्थ ही परमार्थ है। उस दिन अपने आनंद की खोज कर लेने में ही तुमने सारी दुनिया के लिए आनंद के द्वार खोले। उस दिन तुम सुखी हुए तो दूसरों को भी सुखी होने की संभावना बतायी। उस दिन तुम्हारा दिया जला तो दूसरों के बुझे दीये भी जल सकते हैं, इसका भरोसा उनमें तुमने पैदा किया। और फिर तुम्हारे जले दीये से न मालूम कितने बुझे दिये भी जल सकते हैं।

आत्मरति का अर्थ है: वस्तुतः सच्चा स्वार्थ। उसमें परमार्थ अपने-आप आ जाता है। जिसे तुम स्वार्थ समझते हो वह परमार्थ के विपरीत है। और जिसको आत्मज्ञानियों ने आत्मरति कहा है, परम स्वार्थ कहा है, वह परमार्थ के विपरीत नहीं है, परमार्थ उसमें समाहित है, समाविष्ट है।

"आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग होना भक्ति है।'

अब इसे समझो।

तुम अपने को प्रेम करते हो--ठीक, स्वाभाविक है। इस प्रेम के कारण तुम ऐसी चीजों को प्रेम करते हो जो तुम्हारे स्वभाव के विपरीत हैं उनसे तुम दुख पाते हो। चाहते सुख हो, मिलता दुख है। आकांक्षा में भूल नहीं है। आकांक्षा को प्रयोग में लाने में तुम ठीक-ठीक समझदारी का प्रयोग नहीं कर रहे हो।

बुद्ध भी स्वार्थी हैं, कबीर भी, कृष्ण भी--लेकिन वे परम स्वार्थी हैं। वे भी अपना साध रहे हैं आनंद, लेकिन इस ढंग से साध रहे हैं कि मिलता है। तुम इस ढंग से साध रहे हो कि मिलता कभी नहीं; साधते सदा हो, मिलता कभी नहीं।

तुम कुछ ऐसी चीजों से  अनुराग करने लगते हो जो कि तुम्हारे स्वभाव के विपरीत है; जैसे समझो, तुम धन को प्रेम करने लगे, तो तुम अपने स्वभाव के विपरीत जा रहे हो। क्योंकि धन है जड़, तुम हो चैतन्य। चैतन्य को प्रेम करो, जड़ को मत करो, अन्यथा जड़ता बढ़ेगी। और चैतन्य अगर जड़ता में फंसने लगे तो कैसे सुखी होगी? धन का उपयोग करो, प्रेम मत करो। प्रेम तो चैतन्य से करो।

तुम पद की पूजा करते हो। पद तो बाहर है। तुम पद के आकांक्षी हो। लेकिन पद तो बाहर है, तुम भीतर हो, तो तुम में और तुम्हारे पद में कभी तालमेल न हो पाएगा; तुम भीतर रहोगे। पद बाहर रहेगा। कोई उपाय नहीं है, भीतर तो तुम दीनहीन ही बने रहोगे। कितना ही धन इकट्ठा कर लो अपने चारों तरफ, कितने ही बड़े पद पर बैठ जाओ, कितना ही बड़ा सिंहासन बना लो--तुम्हारे भीतर सिंहासन न जा सकेगा; न धन जा सकेगा, न पद जा सकेगा। वहां तो तुम जैसे पहले थे वैसे ही अब भी रहोगे।

भिखारी को राजसिंहासन पर बिठा दो, क्या फर्क पड़ेगा! बाहर धन होगा, शायद भूल भी जाए बाहर के धन में कि भीतर अभी भी निर्धन हूं, तो यह तो और आत्मघाती हुआ। यह स्वार्थ न हुआ, यह तो मूढ़ता हुई।

असली धन खोजो--असली धन भीतर है।

असली पद खोजो--असली पद चैतन्य का है।

चैतन्य की सीढ़ियों पर ऊपर उठो।

उठने दो चैतन्य की उड़ान।

उठने दो ऊर्जा चैतन्य की--परमात्मा तक ले जाना है उसे।

मनुष्य परमात्मा होने की अभीप्सा है। इससे पहले कोई पड़ाव नहीं है, कोई मुकाम नहीं। पहुंचना है उस आखिरी मंजिल तक। लेकिन तुम बीच में बहुत से पड़ाव बना लेते हो; पड़ाव ही नहीं, उनको मुकाम बना लेते हो, मंजिल समझ लेते हो। कोई धन को ही इकट्ठा करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है।

शांडिल्य की परिभाषा दार्शनिक है, बहुमूल्य है:

"आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग'...।

तुमने अब तक आत्मरति के विरोधी विषय में अनुराग किया है। आत्मरति के अविरोध विषय में अनुराग करोगे, तो परमात्मा शब्द को बीच में लाने की जरूरत भी नहीं है, तुम धीरे-धीरे परमात्म-स्वरूप होने लगोगे।

जब भी तुम्हारे सामने चुनाव हो तो सदा ध्यान रखना: जड़ को मत चुनना, चैतन्य को चुनना। जब भी दो चीजों में से एक चुननी हो तो उसमें देख लेना, कौन ज्यादा चैतन्य है। जैसे प्रेम और धन में चुनना हो तो प्रेम चुनना। फिर प्रेम और भक्ति में चुनना हो तो भक्ति चुनना। संसार और परमात्मा में चुनना हो तो परमात्मा चुनना।

इसे अगर तुम समझ लो तो शांडिल्य की परिभाषा में ईश्वर का नाम की  जरूरत नहीं है उसको कहने की, वह छिपा है। इस सूत्र को मानकर अगर तुम चले तो उसे पा लोगे। अब तुम फर्क देख सकते हो। यह तीनों व्यक्तित्वों का फर्क है। शांडिल्य बुद्ध जैसा व्यक्ति रहा होगा: "परमात्मा की कोई जरूरत नहीं है।'

बुद्ध ने कहा: ध्यान खोज लो। शांडिल्य कह रहा है:चैतन्य खोज लो, क्योंकि वही अविरोधी है। उससे तुम्हारा तालमेल बैठेगा।

"देवर्षि के मत से' ...फिर नारद अपना मत देते है।

"नारद के मत से अपने सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना भक्ति है।'

संस्कृत में, जहां-जहां हिंदी में अनुवाद किया है लोगों ने, चूक हुई है। सभी ने अनुवाद किया है, क्योंकि ऐसा लगता है ठीक नहीं कहना, नारद खुद ही शास्त्र लिख रहे हैं, तो हिंदी में अनुवादों में अनुवादकों ने लिखा है, "देवर्षि के मत से'। लेकिन संस्कृत में "नारदस्तु' - "नारद के मत से' ...। नारद अपने ही नाम का उपयोग कर रहे हैं। इसमें बडी बात छिपी है। नारद अपने व्यक्तित्व को भी अपने से उतना ही दूर रख रहे हैं जितना शांडिल्य, जितना गर्गाचार्य, जितना व्यास। ऐसा नहीं कहते कि "मेरे मत से'। उसमें तो मत के प्रति जरा मोह हो जाएगा: "मेरा मत' । "यह नारद का मत है' - नारद भी ऐसा ही कहते हैं।

स्वामी राम अपने को हमेशा इसी तरह बोलते थे: "राम' को भूख लगी है, "राम' को प्यास लगी है। एसा न कहते थे: मुझे प्यास लगी है, मुझे भूख लगी है। अपरीका गये तो लोग वहां बड़े हैरान होते थे। पहले ही दिन जब वे एक बगीचे से शाम को घूमकर लौटे, तब तो गेरुआ वस्त्र बड़ी अनूठीा चीज थी, बड़ी भीड़ लग गई वहां। अब तो न लगेगी, कम-से-कम पंद्रह हजार मेरे संन्यासी हैं सारी दुनिया में...गेरुआ वस्त्र...! जल्दी ही उनको लाखों तक पहुंचा देना है। लेकिन उस समय बड़ी नयी बात थी, तो भीड़ लग गई। लोग कंकड़-पत्थर फेंकने लगे कि कोई दिवाना आ गया। राम हंसते रहे। भीड़ में से किसी को दया आई कि यह आदमी हो सकता है, पागल हो, लेकिन दया-योग्य है। उसने भीड़ को हटाया, उनको बचाया, उनको ले चला। रास्ते में उसने पूछा कि तुम हंसते क्यों थे, तो उन्होंने कहा, "राम की इतनी पीटाई हो रही थी और मैं न हंसू!' तो उसने कहा, "क्या मतलब?' क्योंकि उसे पता नहीं था उनकी आदत का। वे कहने लगे, "राम की इतनी हंसाई हो रही थी! लोग पत्थर मार रहे थे, गालियां दे रहे थे और मैं न हंसू! मैं खड़ा दूर देख रहा था।'

अपने ही नाम को इस तरह अगर तुम दूर कर लो तो बड़ी मुक्ति अनुभव होती है; तब तुम अपने व्यक्तित्व से अलग हो गए; तब तुम साक्षी-भाव में प्रविष्ट हो गए।

ठीक किया, नारद ने कहा: "नारदस्तु'।

और नारद का मत है: "सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना, और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना भक्ति है'।

शांडिल्य दार्शनिक हैं, नारद भक्त हैं। शांडिल्य विचारक हैं, नारद प्रेमी हैं।

"सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना...!'

 प्रेमी की यही तो खूबी है कि वह कुछ भी बचाना नहीं चाहता, सब अर्पण करना चाहता है। जितना अर्पण करता है उतना ही उसे लगता है, कम ही तो किया, और करूं! आखिर में वह अपने को भी अर्पण कर देता है।

सब अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होने से परम व्याकुल होना परम व्याकुलता पकड़ ले, व्याकुलता ही व्याकुलता रह जाए।

ऐसा समझो कि तुम रेगिस्तान में भटक गए, जल चूक गया, दूर-दूर तक कहीं कोई मरूधान नहीं है, हरियाली का कोई पता नहीं है, सागर है सूखी रेत का। प्यास तो तम्हें पहले भी लगी थी, लेकिन आज तुम पहली दफे जानोगे कि परम प्यास क्या है। प्यास तो बहुत दफे लगी थी, लेकिन पानी सदा उपलब्ध था, जरा लगी थी आर पी लिया था। आज तुम्हारा रोआं-रोआं रोएगा। आज तुम्हारा रोआं-रोआं तड़फेगा। एक-एक रोएं में तुम प्यास अनुभव करोगे, कण्ठ में नहीं। तुम्हारा सारा व्यक्तित्व, तुम्हारा सारा होना प्यासमें रूपांतरित हो जाएगा।...तब परम व्याकुलता! जब ऐसे ही नहीं कि तुम ऐसे ही बुलाते हो परमात्मा को कि आ जाओ तो ठीक, न आए तो भी कोई बात नहीं...नहीं, ऐसे बुलाते हो जैसे रेगिस्तान में कोई पानी को खोजता है, तड़पता है। मछली को डाल दो रेत पर पानी से निकालकर,जैसे तड़पती है, वैसी परम प्यास!

"सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा भी विस्मरण होन से परम व्याकुल होना...'।

अभी तो हमने जिसे प्यास समझा वह प्यास नहीं है। अभी तो जिसे धन समझा, धन नहीं है। अभी तो हमारी सारी समझ ही गलत है।

"हम भूल को अपनी इल्मोफन समझे हैं

गुरबत के मुकाम को वतन समझे हैं

मंजिल पे पहुंच के झाड़ देंगे इसको

ये गर्देसफर है जिसको तन समझे हैं।'

अभी तो हमारी सारी समझ उलटी है। अभी तो हम नासमझी को समझदारी समझते हैं। अभी तो हम अहंकार को आत्मा समझे हैं। अभी तो हमने शरीर को अपना होना समझा है।

"हम भूल को अपनी इल्माफन समझे हैं

गुरबत  के मुकाम का वतन समझे हैं।'

रात-भर का पड़ाव है, ठहर जाने के लिए सराय है कि धर्मशाला है, उसको हम घर समझे हैं।

"मंजिल पे पंहुच के झाड़ देंगे इसको'...

मंजिल पर पहुंचोगे तब पता चलेगा कि जैसे यात्री राह की धूल झाड़ देता है, ऐसे ही यह सब जिसे तुम धन समझे हो, जिसे तुम अपना समझे हो, यह सब झड़ जाएगा।

"ये गर्देसफर है जिसको तन समझे हैं'।

यह राह की धूल है, इससे ज्यादा नहीं। यह तुम नहीं हो। तुम तो साक्षी हो। शरीर के पीछे जो शरीर को देखने वाला है, मन के पीछे जो मन को भी देखने वाला है--तुम तो वही परम साक्षी हो।

सब छोड़ दो परमात्मा पर। इनमें से कुछ भी अपना मत समझो। शरीर भी उसका है--उसी पर छोड़ दो। मन भी उसका है--उसी पर छोड़ दो। कर्म भी उसी के हैं--उसी पर छोड़ दो। तुम कर्ता न रह जाओ, साक्षी हो जाओ।

तो नारद के हिसाब से, सब कर्मों को भगवान के अर्पण करना और भगवान का थोड़ा-सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना...जरा हटे परमात्मा से तो वही हालत हो जाए जो मछली की हो जाती है सागर से हटकर; जरा भूले उसे तो तड़प हो जाए!

"ठीक ऐसा ही है'।

नारद कहते हैं, "ये सब जो परिभाषाएं हैं--ठीक ऐसा ही है'। ये सब परिभाषाएं ठीक हैं। इनमें कोई परिभाषा गलत नहीं है। सभी अधूरी हैं, पूरी कोई भी नहीं । सभी ठीक हैं, गलत कोई भी नहीं। भाषा का स्वरूप ऐसा है कि अधूरा ही रहेगा।

सत्य के इतने पहलू हैं कि तुम चुका न पाओगे, और एक आदमी एक ही पहलू की बात कर पाता है।

 एक महाकवि की मृत्यु हुई, तो उसके मित्रों ने उसके मरने के पहले पूछा कि तुम्हारी कब्र पर क्या लिखेंगे, तो उसने कहा, "लिख देना सिर्फ एक शब्द--"अनफिनिश्ड' , अधूरा।'

वे पूछने लगे, "क्यों? क्या तुम सोचते हो, तुम अधूरे मर रहे हो? क्योंकि तुम्हारे गीत पूरे हैं। तुम्हारा यश पूरा, सम्मान पूरा। तुम एक सफल जिंदगी जीए। तुमने खूब आदर पाया। क्या तुम भी अधूरे मर रहे हो?'

तो उस कवि ने कहा, "इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि कितना हमने किया, कितना गाया; कुछ भी करो, जीवन का स्वभाव अधूरा है। हारे हुए तो यहां हारे हुए जाते ही हैं,जीते हुए भी हारे हुए ही जाते हैं। गरीब तो गरीब मरते हैं, अमीर भी गरीब मरते हैं। जिनके पास नहीं है, वे तो अधूरे रहते ही हैं, जिनके पास है वे भी अधूरे रहते हैं। क्योंकि यह जीवन का स्वभाव अधूरा है।

ऐसे ही मैं तुमसे कहूंगा, भाषा का स्वभाव अधूरा है। कुछ भी कहोगे, वह पूरा चुकता न हो पाएगा। बड़ी बातें छोड़ो, एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में भी पूरी बातें नहीं कही जा सकतीं। अगर एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में तुम पूरी-पूरी बात कहना चाहो तो तुम्हें पूरे ब्राह्माण्ड के संबंध में जो भी है, सब कुछ वह कहना पड़ेगा, तभी उस गुलाब के संबंध में पूरी बात होगी, क्योंकि उसकी जड़ें जमीन से जुड़ी हैं, उसकी पंखुड़ियां सूरज से जुड़ी हैं, उसकी श्वास हवाओं से जुड़ी है, उसके भीतर बहती रसधर बादलों से जुड़ी है, सागरों से जुड़ी है।

तुम अगर एक छोटे-से गुलाब के फूल के संबंध में सब कहना चाहो तो तुम बड़ी अड़चन में पड़ जाओगे--तुम पाओगे कि यह तो धीरे-धीरे पूरे ब्रह्माण्ड के संबंध में सब कहना हो जाएगा।

नहीं, पूरा कहना असंभव है। सत्य बहुत बड़ा है, कथनी बड़ी छोटी है।

जीवन में परमात्मा को छोड़कर सब मिल जाये--तो तुम अधूरे रहोगे, उदास रहोगे, दुखी रहोगे, पीड़ित रहोगे। और कुछ भी न मिले, परमात्मा मिल जाए तो पूरा मिल जाता है। क्योंकि परमात्मा खंड-खंड नहीं हो सकता; मिलता है तो पूरा, नहीं मिलता है तो नहीं मिलता।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, "मेरे पास सब है, लेकिन बड़ी उदासी है। अब क्या करें? जब नहीं थी इतनी व्यवस्था तब तो एक आसरा भी था कि कभी जब सब होगा तो सब ठीक हो जाएगा, वह आसरा भी छिन गया'।

"मयकदों के भी आसपास रही

गुलरुखों से भी रूसनास रही

जाने क्या बात थी इस पर भी

जिंदगी उम्र-भर उदास रही'।

मधुशालाएं पास थीं, दूर नहीं। सुंदर मुखड़ों वाले लोग निकट थे, परिचय था उनसे...।

"मयकदों के भी आसपास रही...'

फूल के जैसे सुंदर चेहरे वाले व्यक्त्विो से भी परिचय रहा, मुलाकात रही; मधुशाला में भी विस्मरण किया; प्रेम में भी डूबे--

"जाने क्या बात थी इस पर भी...'

फिर भी कुछ बात--

"जाने क्या बात थी इस पर भी

जिंदगी उम्र भर उदास रही'।

रहेगी ही! उदासी तो उसी की मिटती है जो भक्ति को उपलब्ध हुआ; उसी की मिटती है जो भगवान को उपलब्ध हुआ; उसी की मिटती है जिसने जाना कि मैं अलग नहीं हूं, जो अनन्यता को उपलब्ध हुआ!

अन्यथा, तुम जो भी करोगे...। करते लोग बहुत कुछ हैं, अथक श्रम करते हैं, सब व्यर्थ जाता है। इतने श्रम से तो परमात्मा मिल सकता है जिससे तुम कंकड़-पत्थर इकट्ठे कर पाते हो। तुम्हें देखकर रोना भी आता है, हंसी भी आती है। हंसी आती है कि कैसा पागलपन है! इतने श्रम से तो मंदिर बन जाता, इसे तुमने धर्मशाला बनाने में गंवाया। इतने श्रम से परमात्मा उतर आता; भिक्षा पात्र ले कर तुम कंकड़-पत्थर इकट्ठे करते रहे! इतने श्रम से तो अमृत्व को उपलब्ध हो जाता, इससे तुम गंदे-नालों का पानी ही इकट्ठा करते रहे।

मौत जब आती है तब तुम्हें पता चलेगा, लेकिन तब बहुत देर हो जाती है।

 जागो अभी!

मौत तो जगाती है, पर तब समय नहीं बचता--परमात्मा का स्मरण करने का भी समय नहीं बचता! मौत आती है तब पता चलता है: "अरे! यह तो गंवाना हो गया!'

यह सब पड़ा रह जाएगा जो इकट्ठा किया, चले तुम अकेले। अकेले आये: अकेले चले! पानी पर खींची लकीरें हो गई सारी जिंदगी।

"वाए नादानी कि वक्ते-मर्ग से साबित हुआ'।

ख्वाब था जो कुछ भी देखा, जो सुना अफसाना था।'

मरते वक्त...!

"वाए नादानी कि वक्ते-मर्ग ये साबित हुआ।'

यह मूढ़ता सिद्ध हुई मरते वक्त, यह नादानी पता चली मरते वक्त, यह नासमझी खयाल में आई मरते वक्त--

"ख्वाब था जो कुछ कि देखा'...

जो देखा, वह सपना था...

..."जो सुना अफसाना था।'

और जो बात सुनते रहे, वह सिर्फ कहानी थी। हाथ खाली रह गए!

अकसर तो ऐसा है कि लेकर तो तुम कुछ न जाओगे, जो लेकर आये थे, शायद उसे भी गंवा कर जाओ।

बच्चे पैदा होते हैं, मुट्ठी बंधी होती है; मरते वक्त मुट्ठी खाली होती है, खुली होती है। बच्चा कुछ लेकर आता है--कोई ताजगी, कोई कमल के फूलों जैसा निर्दोष भाव, कुछ भोलापन--वह भी गंदा हो जाता है। बच्चा आता है दर्पण की तरह ताजा-नया, धूल जम जाती है जिंदगी की, वह भी खो जाता है।

 हम जिंदगी में कमाते नहीं, गंवाते हैं--बड़ा अजीब सौदा करते हैं!

जो मौत के पहले जग जाए वही धार्मिक हो जाता है। जो मौत तुम्हें दिखाएगी, वह तुम अपनी समझदारी में देख लो, अपने होश में देख लो, मौत को दिखाने की जरूरत न पड़े, तो तुम्हारी जिंदगी में एक क्रांति घटित हो जाती है।

"ठीक ऐसा ही है, जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति!'

"इस अवस्था में भी गोपियों में माहात्म्यज्ञान की विस्मृति का अपवाद नहीं।'

इसे समझना।

"उसके बिना, भगवान को भगवान जाने बिना किया जाने वाला ऐसा प्रेम जारों के प्रेम के समान है।'

"उसमें, जार के प्रेम में, प्रियतम के सुख से सुखी होना नहीं है।'

..."जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति।'

कृष्ण के प्रेम में, कथा है, सोलह हजार गोपियों की। संख्या तो सिर्फ असंख्य का प्रतीक है। लेकिन गोपियों के प्रेम को समझना जरूरी है, क्योंकि भक्त वैसी ही दशा में फिर पहुंच जाता है। कृष्ण का होना शरीर में आवश्यक नहीं है। यह तो भक्त का भाव है जो कृष्ण को मौजूद कर लेता है। कृष्ण के होने का सवान नहीं है; ये तो हजारों गोपियों की प्रार्थनाएं हैं, जो कृष्ण को शरीर में बांध लेती हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

राधा कृष्ण के साथ ही नाची; मीरा को जरा भी तकलीफ न हुई, कृष्ण के बिना भी वैसा ही नाच नाची, और कृष्ण के साथ ही नाची। और अगर गौर करो, तो मीरा की गहराई राधा से भी ज्यादा मालूम पड़ती है, क्योंकि राधा के लिए तो कृष्ण सहारे के लिए मौजूद थे, मीरा के लिए तो कोई भी मौजूद न था। मीरा के भगवान तो उसके भाव का ही साकार रूप थे। मीरा के भगवान तो मीरा ने अपने को ही ढालकर बनाए थे, अपने को ही निछावर करके निर्मित किए थे।

कृष्ण मौजूद हो और तुम राधा बन जाओ, तुम्हारी कोई खूबी नहीं, कृष्ण की खूबी होगी। कृष्ण मौजूद न हों और तुम मीरा बन जाओ, तो तुम्हारी खूबी है, कृष्ण को आना पड़ेगा।

भक्त खींचता है भगवान को रूप में। भक्त भगवान को गुणों के जगत में, पृथ्वी पर ले आता है।

कैसी थी ब्रजगोपियों की भक्ति?

एक क्षण को भी विस्मरण हो जाए तो रोती हैं। एक क्षण को भी कृष्ण न दिखाई पड़े तो तड़फती हैं। लेकिन ऐसा तो साधारण प्रेम में भी कभी हो जाता है: प्रेमी न हो, प्रेयसी तड़फती है;प्रेयसी न हो तो प्रमी तड़पता है।

फर्क क्या है ब्रज की गोपियों की भक्ति में और साधारण प्रेमियों की भक्ति में? फर्क इतना है कि ब्रजगोपियां कृष्ण के प्रेम में हैं, लेकिन परिपूर्ण होशपूर्वक कि कृष्ण भगवान हैं। वह प्रेम किसी व्यक्ति को प्रेम नहीं, भगवत्ता का प्रेम है। अन्यथा फिर साधारण प्रेम हो जाएगा।

कृष्ण को भी तुम ऐसे प्रेम कर सकते हो जैसे वे शरीर हैं, तुम्हारे जैसे ही एक व्यक्ति हैं। तब कृष्ण मौजूद भी हों तो भी तुम चूक गए।

रुक्मणी कृष्ण की पत्नी है, लेकिन रुक्मणी का नाम कृष्ण के साथ अकसर लिया नहीं जाता--लिया ही नहीं जाता। सीता का नाम राम के साथ लिया जाता है। पार्वती का नाम शिव के साथ लिया जाता है। कृष्ण का नाम रुक्मणी के साथ और रुक्मणी का नाम कृष्ण के साथ नहीं लिया जाता। और राधा उनकी पत्नी नहीं है, याद रखना। राधा का नाम लेना बिलकुल गैरकानूनी है, कृष्ण-राधा कहना, राधा-कृष्ण कहना बिलकुल गैरकानूनी है, नाजायज है, नियम के बाहर है। वह उनकी पत्नी नहीं है। पर क्या बात है, रुक्मणी कैसे विस्मृत हो गई? रुक्मणी कैसे अलग-थलग पड़ गई?

रुक्मणी पत्नी थी और कृष्ण में भगवान को न देख पायी, पुरुष को ही देखती रही--बस ही चूक हो गई। वहीं राधा करीब आ गई जहां रुक्मणी चूक गई।

रुक्मणी दूर पड़ती गई। वह कृष्ण को पुरुष ही मानती रही, पुरुषोत्तम न देख पाई, पुरुष ही दिखाई पड़ता रहा, पति ही दिखाई पड़ता रहा। गहरी ईष्या में जली रुक्मणी, जैसा पत्नियां अकसर जलती है। पत्नी वहां दूर बैठी है और देख रही है। राधा और गोपियां और कृष्ण के पास प्रेमियों का और प्रेयसियों का इतना बड़ा जाल: रुक्मणी जली! बड़े दुख में पड़ी। कृष्ण की भगवत्ता न देख पाई। तो प्रेम साधारण हो गया--प्रेम रह गया, भक्ति न बन पाई।

प्रेम कब भक्ति बनता है?

जैसे ही प्रेमी में भगवान दिखाई पड़ता है, वैसे ही प्रेम भक्ति बन जाता है। कृष्ण का होना जरूरी थोड़े ही है! क्योंकि कृष्ण के होने में अगर यह बात होती तो रुक्मणी को भी भक्ति उपलब्ध हो गई होती।

तो, मैं तुमसे कहता हूं, इससे उलटा भी हो सकता है। तुम अपने प्रेमी में, अपने पति में, अपनी पत्नी में, अपने बेटे में, अपने मित्र में, कहीं वही भूल तो नहीं कर रहे हो जो रुक्मणी ने की? सोचना। कहीं वही भूल तो नहीं हो रही है?

मैं तुमसे कहता हूं, वही भूल हो रही है, क्योंकि उसके सिवाय कोई भी नहीं है। "वही' सब में छिपा है। जरा खोदो, जरा गहरे उतरो। जरा दूसरे में डुबकी लो। जरा अनन्यता के भाव को जगने दो। और तुम अचानक पाओगे: वही भूल, रुक्मणी की भूल, सारे संसार से हो रही है। सभी के पास कृष्ण खड़ा है--सभी के पास भगवान खड़ा है। भीतर भी वही है, बाहर भी वही है। लेकिन बाहर तुम्हारी आंखें देखने की आदी हैं, कम से कम बाहर तो उसे देखो। एक दफा पुरुष खो जाए और परमात्मा दिखाई पड़े; पुरुष खो जाए, पुरुषोत्तम दिखाई पड़े...!

तो नारद कहते हैं, "जैसे ब्रजगोपियों की भक्ति 

हालांकि वे दीवानी थीं, पागल थीं प्रेम में, लेकिन एक क्षण को भी भूलीं नहीं कि कृष्ण भगवान हैं; उतनी बेहोशी में भी होश रहा, अपवाद नहीं है; यह बात तो कभी न भूलीं कि कृष्ण भगवान हैं; यह बात तो याद ही रही; लड़ीं भी, झगड़ी भी, रूठीं भी, लेकिन यह बात तो याद रही कि कृष्ण भगवान हैं।

उतनी ही बात प्रेम को भक्ति की ऊंचाई पर उठा देती है।

प्रेम जब तक भक्ति न बन जाए तब तक जानना "अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं,' अभी और भी परिक्षाएं पार करनी हैं प्रेम की। प्रेम पर मत रुक जाना।

प्रेम कली है, भक्ति फूल है। प्रेम पर मत रुक जाना।

"अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं

सितारों के आगे जहां और भी हैं।'

जब तक प्रेम तुम्हारा भक्ति न बन जाए, जब तक प्रेमी में तुम्हें भगवान न दिखाई पड़ जाए--तब तक रुकना मत; तब तक मस्जिद-मंदिरों में ठहर मत जाना।

मंदिर-मस्जिद से पार जाना है! सीमा से पार जाना है! संप्रदाय से पार जाना है! मत-मतांतर से पार जाना है!

प्रासंगिक दिखाई पड़ती है बात कि हम कहीं मंदिर-मस्जिदों में, आकारों में, सीमाओं में, गुणों में उलझे हैं-- और इसलिए वह जो उनके भीतर छिपा है, हमारे हाथ से चूका जा रहा है, पकड़ में नहीं आता। खोल ही दिखाई पड़ती है। ऊपर का सांयोगिक असार ही दिखाई पड़ता है, भीतर का सार, स्वभाव, स्वरूप दिखाई नहीं पड़ता।

जब तुम प्रेम करते हो--साधारण प्रेम, जिसे हम प्रेम कहते हैं--तो तुम अपने सुख की फिक्र कर रहे हो; तुम प्रेमी का उपयोग कर रहे हो। भक्ति प्रेमी के सुख की चिंता करती है, अपने को समर्पित करती है। प्रेम में तुम प्रेमी का उपयोग करते हो साधन की तरह, अपने सुख के लिए। भक्ति में तुम साधन बन जाते हो प्रेमी के, उसके सुख के लिए।

भक्ति समर्पण है। भक्त फिर भगवान के लिए जीता है।

कबीर ने कहा है, जैसे बांस की पोली पोंगरी खुद गीत नहीं गाती, फिर परमात्मा के ही गीत उससे बहते हैं। बांस की पोंगरी तो सिर्फ पोली है, राह देती है, जगह देती है, स्थान देती है, रुकावट नहीं देती।

तो कबीर ने कहा है, "अगर गीत में कहीं कोई अड़चन आती हो तो मेरी बांस की पोंगरी की भूल समझना, कहीं कोई गड़बड़ होगी। तुम तो गीत ठीक ही ठीक गाते हो; अड़चन आती होगी, बाधा पड़ती होगी, मेरे कारण पड़ जाती है। कसूर हो तो मेरा, भूल-चूक हो तो मेरी; जो भी ठीक हो, तेरा! दुखी होता हूं तो मैं अपने कारण, सुखी होता हूं तो तेरे कारण। बंधता हूं तो अपने कारण, मुक्त होता हूं तो तेरे कारण। नरक बनता हूं तो मैं, स्वर्ग तो सब तेरा प्रसाद है!'

प्रेम अपने सुख की तलाश है इसलिए प्रेम दुख में ले जाता है। जो अपने सुख की तलाश कर रहा है, वह "मैं' को पकड़े हुए है। और "मैं' सारे दुखों का निचोड़ है। वही तो कांटा है, चुभता है। जिसने प्रेमी के सुख को सब कुछ माना, जिसने सब प्रेमी के सुख पर निछावर किया, उसके जीवन में कोई दुख नहीं।

तुम जब तक अपना सुख खोजोगे, दुख पाओगे। जिस दिन तुम परमात्मा का सुख खोजने लगे कि वह जिसमें सुखी हो, वही मेरा सुख...।

 अपने सुख को खोजने का अर्थ है: अहंकार अभी भी खोज रहा है। उसके सुख को खोजना जब शुरू हो जाए, भक्त तब ऐसे जीने लगता है जैसे बांस की पोंगरी; बांसुरी बन जाता है: सब स्वर "उसी' के हैं। फिर कोई दुख नहीं है। फिर कोई नरक नहीं है। फिर अंधेरा भी रोशन है। फिर मौत भी और नये जीवन की शुरूआत है। फिर कांटों में भी फूल दिखाई पड़ने लगते हैं, कांटे भी फूल हो जाते हैं। फिर दुख अनुभव में आता ही नहीं। फिर हैरानी होती है यह देखकर कि लोग दुखी क्यों हो रहे हैं!

सब उपलब्ध है। महोत्सव की तैयारियां हैं और लोग दुखी हो रहे हैं। परमात्मा गीत गाने को तैयार है। उसके ओंठ फड़क रहे हैं। तुम्हारी बांसुरी तैयार नहीं है। तुम खाली नहीं हो, तुम भरे हो!

अहंकार से खाली होते ही "उसका' प्रवेश हो जाता है।

ओशो रजनीश 








रविवार, 10 सितंबर 2023


सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।।

निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः।।

तस्मिन्नन्यता तद्धिरोधिषूदासीनता च।।

अन्याश्रयाणां त्यागो५नन्यता।।

लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्धिरोधिषूदासीनता।।

भवतु निश्चयदाढर्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्।।

अन्यथा पातित्याशङ्कया।।

लोको५पि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीधारणावधि।।


जीवन की व्यर्थता जब तक प्रगाढ़ अनुभव न बन जाए तब तक परमात्मा की खोज शुरू नहीं होती। जीवन की व्यर्थता का बोध ही उसकी तरफ पहला कदम है। जब तक ऐसी भ्रांति बनी है कि यहां कुछ खोज लेंगे, पा लेंगे, यहां कुछ मिल जायेगा सपनों की दुनिया में--तब तक परमात्मा भी एक सपना ही है; तब तक तुम उसे खोजने नहीं निकलते; तब तक तुम स्वयं को दांव पर भी नहीं लगाते।

परमात्मा मुफ्त मिलनेवाला नहीं है। जो भी तुम हो, तुम्हारी परिपूर्ण सत्ता जब तक दांव पर न लग जाए, तब तक परमात्मा से कोई मिलन नहीं। क्योंकि प्रेम इससे कम पर नहीं मिल सकता। और प्रार्थना इससे कम पर शुरू नहीं होती। यह काम जुआरियों का है, दुकानदारों का नहीं। यहां पूरी खोने की हिम्मत चाहिए। दीवानगी चाहिए! मस्ती चाहिए!

लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब जो तुम्हारे पास है, वह व्यर्थ दिखायी पड़ता है; वह कूड़ा-करकट हो जाता है, तब तुम उसे पकड़ते नहीं।

करोड़ों लोग परमात्मा के शब्द का उच्चार करते हैं, प्रार्थना करते हैं, पूजा करते हैं; लेकिन उसकी कोई झलक नहीं मिलती। क्या पूजा व्यर्थ है? नहीं, करनेवालों ने की ही नहीं। क्या प्रार्थना शून्य आकाश में खो जाती है,  कोई प्रत्युत्तर नहीं आता? प्रार्थना थी ही नहीं; अन्यथा प्रत्युत्तर तत्क्षण आता है। इधर तुमने पुकारा भी नहीं कि उधर प्रत्युत्तर मिला नहीं! पर तुमने पुकारा ही नहीं। तुम सोचते हो कि तुमने पुकारा, तुम सोचते हो कि तुमने प्रार्थना की; लेकिन कभी तुमने हृदय को दांव पर लगाया नहीं।

आधे-आधे मन से न होगा।: पूरे-पूरे की मांग है।

तो, जब तक तुम्हें लगता है कि संसार में अभी कुछ मिल सकता है, रस कायम है, जब तक तुम जागे नहीं, सपने में थोड़े उलझे हो, जब तक तुम्हें सपने में भरोसा है कि यह सच है--तब तक परमात्मा की तरफ आशाओं का प्रवाह, आकांक्षाओं का प्रवाह शुरू नहीं होता; तब तक प्रार्थना तुम्हारी अभीप्सा नहीं होती, तुम्हारे हृदय की भाव-दशा नहीं होती; तब तुम्हारी प्रार्थना भी तुम्हारी चालाकी, तुम्हारे गणित, तुम्हारी होशियारी का हिसाब होती है। तुम सोचते हो: "चलो, हो-न-हो कहीं परमात्मा हो ही न, प्रार्थना भी कर लो, पूजा भी कर लो, बिगड़ता क्या है! हानि क्या है! अगर लाभ हुआ तो हो जाएगा, न हुआ तो हानि तो कुछ भी नहीं।'

बस तुम्हारी प्रार्थना ऐसी ही है कि अगर लाभ न हुआ, कोई हर्जा नहीं, "हानि क्या होगी!' सभी नास्तिक आस्तिक होने लगते हैं, क्योंकि जैसे-जैसे मौत करीब आती है और पैर लड़खड़ाते हैं और अंधेरा घना होने लगता है और आकाश के तारे छुपने लगते हैं, सब आशाओं के दिये बुझने लगते हैं और लगता है कि अब सिर्फ कब्र के अतिरिक्त और कोई जगह न रही, तो नास्तिक भी परमात्मा का स्मरण करने लगता है: कौन जाने, शायद हो!

लेकिन "शायद' से प्रार्थना नहीं बनती। "शायद' से समझदारी तो समझ में आती है, प्रेम समझ में नहीं आता।

समझदारी से कोई कभी समझदार नहीं हुआ। समझदारी के कारण ही तो तुम नासमझ बने हो। तुम्हारी समझदारी ही महंगी पड़ रही है।

तो, परमात्मा की तरफ अगर तुम होशियारी से जा रहे हो, बही-खाते का हिसाब वहां भी फैला रहे हो, सोचते हो कि ठीक है, संसार को भी संभाल लें, परमात्मा को भी संभाल लें, दोनों नावों पर सवार हो जाएं--तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। तुम मुश्किल में पड़े हो, क्योंकि मैं देखता हूं, तुम दोनों नावों में आधे-आधे खड़े हो।

नाव पर तो एक ही चढ़ा जाता है...एक ही नाव पर चढ़ा जाता है, अन्यथा दुविधा पैदा हो जाती है। दो दिशाओं में चलोगे तो टूट जाओगे, खंड-खंड हो जाओगे, बिखर जाओगे। और जब तुम ही खंड-खंड हो गये, बिखर गये, जब तुम्हारे भीतर ही एकतानता न रही, तो प्रार्थना कौन करेगा, पूजा कौन करेगा? भीड़ थोड़े ही पूजा करती है; भीतर की एकता से पूजा उठती है; भीतर की अखंडता से सुगंध उठती है प्रार्थना की।

तो इस बात को पहले खयाल में ले लेना चाहिए तो ही भक्ति-सूत्र समझ में आ सकेंगे।

यह जिंदगी अगर तुम्हें अभी भी रसपूर्ण मालूम पड़ती है तो थोड़ा और जी लो। आज नहीं कल, रस टूट जायेगा।

जितना आदमी सजग हो उतने जल्दी रस टूट जाता है। जितना आदमी बेहोश हो, उतनी देर तक रस टिकता है। बेहोशी रस का सहारा है। जितनी तुम्हारे भीतर बुद्धिमानी हो--होशियारी नहीं कह रहा हूं, चालाकी नहीं कह रहा हूं; बुद्धिमत्ता हो--उतनी जल्दी तुम जीवन के रस से चुक जाओगे। और जब जीवन का रस चुकता है तभी तुम्हारी रसधार जो जीवन में नियोजित थी, मुक्त होती है: अब संसार में जाने को कोई जगह न बची; अब वह रास्ता न रहा; अब चीजों की तरफ दौड़ने की बात न रही; अब संग्रह को बड़ा करना है, मकान बड़ा बनाना है धन इकट्ठा करना है, पद-प्रतिष्ठा पानी है--यह सब व्यर्थ हुआ;अब तुम अपने घर की तरफ लौटते हो।

"घर बयाबां में बनाया नहीं हमने लेकिन

जिसको घर समझे हुए थे वह बयाबां निकला।'

कोई रेगिस्तान में घर नहीं बनाया था, लेकिन जिसको घर समझे हुए थे वही रेगिस्तान निकला, वही वीरान निकला।

जिस दिन तुम्हें अपना घर बयाबां मालूम पड़े, वीरान मालूम पड़े...वीरान है; सिर्फ तुम अपने सपनों के कारण उसे सजाये हो। जरा चौंककर देखो: जिसे तुम घर कह रहे हो, वह घर नहीं है, ज्यादा-से-ज्यादा सराय है; आज टिके हो, कल विदा हो जाना पड़ेगा। जो छिन ही जाना है, उसको अपना कहना किस मुंह से संभव है? जहां से उखड़ ही जाना पड़ेगा, जहां क्षण-भर को ठहरने का अवसर मिला है,, पड़ाव हो सकता है, मंजिल नहीं है, और मंजिल के पहले घर कहां! घर तो वहीं हो सकता है जहां पहुंचे तो पहुंचे, जिसके आगे जाने को कुछ और न रहे।

परमात्मा के अतिरिक्त कोई घर नहीं हो सकता।

मुझसे लोग पूछते हैं, "संन्यास की परिभाषा क्या?' तो मैं कहता हूं, "दो तरह के घर बनानेवाले हैं, दो तरह के गृहस्थ हैं: एक जो संसार में घर बनाते हैं, उनको हम गृहस्थ कहते हैं; एक जो परमात्मा में घर बनाते हैं, वे भी गृहस्थ हैं, उनको हम संन्यासी कहते हैं--सिर्फ भेद करने को। घर अलग-अलग जगह बनाते हैं। एक हैं जो पानी पर जीवन को लिखते हैं, लिख भी नहीं पाते और मिट जाता है; और एक हैं जो जीवन की शाश्वतता पर लिखते हैं। एक हैं जो रेत पर घर बनाते हैं, जिनकी बुनियाद ही डगमगा रही है; और एक है जो जीवन की शाश्वतता को आधार की तरह स्वीकार करते हैं।'

पहला सूत्र है: 

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोध-स्वरूपा है।'

संसार यानी कामना। संसार का ठीक अर्थ समझ लो, क्योंकि तुम्हें संसार का भी अर्थ गलत ही बताया गया है। कोई घर छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता है, संसार छोड़ दिया। कोई पत्नी को छोड़कर भाग जाता है तो वह कहता है, संसार छोड़ दिया। काश, संसार इतना स्थूल होता! काश, तुम्हारी पत्नी के छोड़ जाने से संसार छूट जाता! काश, बात इतनी सस्ती होती! तो संन्यास बहुत बहुमूल्य नहीं होता।

संसार न तो पत्नी में है, न घर में है, न धन में है, न बाजार में है, न दुकान में है--संसार तुम्हारी कामना में है। जब तक तुम मांगते हो कि मुझे कुछ चाहिए, जब तक तुम सोचते हो कि मेरा संतोष, मेरा सुख, मुझे मिल जाए, उसमें है, तब तक तुम संसार में हो।

जब तक मांग है तब तक संसार है।

संसार का अर्थ है: तुम्हारा हृदय एक भिक्षापात्र है, जिसको लिये तुम मांगते फिरते हो--कभी इस द्वार, कभी उस द्वार। कितने ठुकराये जाते हो! लेकिन फिर-फिर संभलकर मांगने लगते हो। क्योंकि एक ही तुम्हारे मन में धारणा है कि और ज्यादा, और ज्यादा मिल जाए, तो शायद सुख हो!

"और' की दौड़ संसार है।

तो तुम मंदिर में भी बैठ जाओ और वहां भी अगर तुम मांग रहे हो तो तुम संसार में ही हो। तुम हिमालय पर चले जाओ, वहां भी आंख बंद करे अगर तुम मांग ही रहे हो, परमात्मा से कह रहे हो, "और दे, स्वर्ग दे, मोक्ष दे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या मांगते हो। संसार का कोई संबंध इससे नहीं है कि तुम क्या मांगते हो; अन्यथा संसार छोड़ने का ढोंग भी हो जाता है और संसार छूटता भी नहीं।

संसार तुम्हारे भीतर है, बाहर नहीं। संसार तुम्हारी इस मांग में है कि "मैं जैसा हूं वैसा काफी नहीं हूं, कुछ चाहिए जो मुझे पूरा करे; मैं अधूरा हूं, अतृप्त हूं, कुछ मिल जाए जो मुझे पूरा करे, तृप्त करे, संतुष्ट करे!'

स्वयं को अधूरा मानने में और आशा रखने में कि कुछ मिलेगा जो पूरा कर देगा, बस वहां संसार है।

मांग छूटी: संसार छूटा! तब कोई घर छोड़ने की जरूरत नहीं है, न पत्नी को छोड़ने की जरूरत, न पति को, न बच्चों को--उनको कोई कसूर नहीं है!... घर में रहते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो।... पत्नी के पास बैठे तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। बच्चों को सजाते-संभालते तुम संसार से मुक्त हो जाते हो। क्योंकि संसार से मुक्त होने को केवल इतना ही अर्थ है कि अब तुम तृप्त हो, जैसे हो, जो हो; तुम्हारे होने में अब कोई मांग नहीं है; तुम्हारे होने में अब कोई आकांक्षा नहीं है; तुम्हारा होना कामनातुर नहीं है; तुम अब कामनाओं का फैलाव नहीं हो, विस्तार नहीं हो--तुम बस हो: तृप्त, यही क्षण, और जैसे तुम हो, पर्याप्त है, पर्याप्त से भी ज्यादा है।

जब तुम्हारी प्रार्थना धन्यवाद बन जाती है, मांग नहीं। जब तुम मंदिर कुछ मांगने नहीं जाते; तुम उसे धन्यवाद देने जाते हो कि "तूने इतना दिया, अपेक्षा से ज्यादा दिया, जो कभी मांगा नहीं था वह दिया। तेरे देने का कोई अंत नहीं! हमारा पात्र ही छोटा पड़ता जाता है और तू भरे जा रहा है!'

...तब भी तुम रोते हो जाकर मंदिर में, लेकिन तब तुम्हारे आंसुओं का सौंदर्य और!

जब तुम मांग से रोते हो, तब तुम्हारे आंसू गंदे हैं, दीन हैं, दरिद्र हैं। जब तुम अहोभाव से रोते हो, तुम्हारे आंसुओं का मूल्य कोई मोती नहीं चुका सकते। तब तुम्हारा एक-एक आंसू बहुमूल्य है, हीरा है। आंसू वही है, लेकिन अहोभाव से भरे हुए हृदय से जब आता है, तो रूपांतरित हो जाता है।

तुम जरा फर्क करके देखना। तुम दुख में भी रोये हो, पीड़ा में रोये हो, असंतोष में रोये हो, शिकायत में रोये हो; कभी अहोभाव में भी रोकर देखना; कभी आनंद में भी रोकर देखना--और तुम पाओगे: तुम्हारे बदलते ही आंसुओं का ढंग भी बदल जाता है। तब आंसू फूलों की तरह आते हैं। तब आंसुओं में एक सुगंध होती है जो इस लोक की नहीं है।

मीरा भी रोती है, पर मीरा के आंसू भिखारी के आंसू नहीं है। चैतन्य भी रोते हैं, लेकिन चैतन्य के आंसू दीन-दरिद्र नहीं हैं, कुछ मांग से नहीं निकल रहे हैं, किसी अभाव से पैदा नहीं हुए हैं--किसी बड़ी गहन भाव-दशा से जन्मे हैं! गंगा का जल भी उतना पवित्र नहीं है।

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है।

'निरोधस्वरूपा!

साधारणतः भक्ति-सूत्र पर व्याख्या करनेवालों ने निरोधस्वरूपा का अर्थ किया है कि जिन्होंने सब त्याग दिया, छोड़ दिया। नहीं, मेरा वैसा अर्थ नहीं है। जरा सा फर्क करता हूं, लेकिन फर्क बहुत बड़ा है। समझोगे तो उससे बड़ा फर्क नहीं हो सकता।

निरोधस्वरूपा का अर्थ यह नहीं है कि जिन्होंने छोड़ दिया--निरोधस्वरूपा का अर्थ है कि जिनसे छूट गया। निरोध और त्याग का वही फर्क है। त्याग का अर्थ होता है: छोड़ा निरोध का अर्थ होता है: छूटा, व्यर्थ हुआ। जो चीज व्यर्थ हो जाती है उसे छोड़ना थोड़े ही पड़ता है, छूट जाती है।

सुबह तुम रोज घर का कूड़ा-करकट इकट्ठा करके बाहर फेंक आते हो तो तुम कोई जाकर अखबारों के दफ्तर में खबर नहीं देते कि आज फिर त्याग कर दिया कूड़े-करकट का, ढेर-का-ढेर त्याग कर दिया! तुम जाओगे तो लोग तुम्हें पागल समझेंगे। अगर कूड़ा-करकट है तो फिर छोड़ा, इसकी बात ही क्यों उठाते दो हो?

तो जो आदमी कहता है, "मैंने त्याग किया, "वह आदमी अभी भी निरोध को उपलब्ध नहीं हुआ। क्योंकि त्याग करने का अर्थ ही यह होता है कि अभी भी सार्थकता शेष थी।

अगर कोई कहता है कि मैंने बड़ा स्वर्ण छोड़ा बड़े महल छोड़े गौर से देखना: स्वर्ण अभी भी स्वर्ण था, महल अभी भी महल थे। "छोड़ा'!  छोड़ना बड़ी चेष्टा से हुआ। चेष्टा का अर्थ ही यह होता है कि रस अभी कायम था; फल पका न था, कच्चा था, तोड़ना पड़ा।पका फल गिरता है; कच्चा फल तोड़ना पड़ता है।

तो त्यागी तो सभी कच्चे हैं। निरोध को उपलब्ध व्यक्ति पका हुआ व्यक्ति है। त्याग और निरोध का यही फर्क है। नारद कह सकते थे, "त्यागस्वरूपा है', पर उन्होंने नहीं कहा। "निरोधस्वरूपा'! व्यर्थ हो गयी जो चीज, वह गिर जाती है, उसका निरोध हो जाता है।

सुबह तुम जागते हो तो सपनों का त्याग थोड़े ही करते हो, कि जागकर तुम कहते हो, "बस रात-भर के सपने छोड़ता हूं।' जागे कि निरोध हुआ। जागते ही तुमने पाया कि सपने टूट गये; सपने व्यर्थ हो गये; सपने सिद्ध हो गये कि सपने थे, बात समाप्त हुई; अब उनकी चर्चा क्या करनी है!

जो त्याग का हिसाब रखते हैं, समझना, भोगी ही हैं--शीर्षासन करते हुए, उलटे खड़े हो गये हैं, भोगी ही हैं।

एक संन्यासी को मैं जानता हूं जो भूलते ही नहीं...। कोई चालीस साल पहले उन्होंने छोड़ा था संसार--छोड़ा था, निरोध नहीं हुआ था--चालीस साल बीत गये, अभी भी छूटा नहीं। छोड़ा हुआ कभी छूटता ही नहीं। वे अभी भी कहते रहते हैं कि मैंने लाखों रुपये पर लात मार दी। मैंने उनसे एक दिन कहा कि लात लग नयी पायी; तुमने मारी होगी; चूक गयी! उन्होंने कहा, क्या मतलब?'

चालीस साल हो गये...छूट गया, छूट गया। इसकी चर्चा क्यों खींचते हो, इसे रोज-रोज याद क्यों करते हो? रस कायम है। लाखों में अभी भी मूल्य है। अभी भी तुम दूसरों को भूलते नहीं बताना कि मैंने लाखों पर लात मारी। तुमने बैंक-बैलेंस कायम रखा है। गिनती जारी है। नहीं, यह त्याग तो है, निरोध नहीं।'

त्याग झूठा सिक्का है निरोध का। निरोध बड़ी अदभुत घटना है!

रामकृष्ण के पास एक आदमी आया, हजार सोने की अशर्फियां लाया था, दान करने, उनको देने। उन्होंने कहा, "मुझे जरूरत नहीं। तू एक काम कर, गंगा में फेंक आ।' वह गया, लेकिन घंटा-भर हो गया, लौटा नहीं, तो रामकृष्ण ने आदमी भेजे कि देखो, क्या हुआ, कहीं दुख में डूब तो नहीं मरा! गये तो वह एक अशर्फी को बजा-बजाकर फेंक रहा था, भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, लोग चमत्कृत हो रहे थे। तो उन्होंने आकर कहा कि वह एक-एक अशर्फी गिन-गिनकर फेंक रहा है।

तो रामकृष्ण गये और उससे कहा,"नासमझ! जब कोई इकट्ठा करता है तब तो गिनना समझ में आता है। लेकिन जब फेंकना ही है तो क्या गिनकर फेंकना! नौ सौ निन्यानबे थीं कि हजार थीं, क्या फर्क पड़ता है! कोई हिसाब रखना है पीछे कि कितनी फेंकी, कि कितनी दान कीं? अगर हिसाब रखना है तो फेंक ही मत, अपने घर ले जा। जब हिसाब ही नहीं छूटता है तो अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना है; असली चीज अशर्फियां छोड़ने से कुछ भी न होगा। असली चीज हिसाब का छूटना है; असली चीज अशर्फियों का छूटना नहीं है।'

जीसस ने कहा है: "तुम्हारा एक हाथ जो दान करे, दूसरे हाथ को पता न पड़े।'

सूफी फकीर कहते हैं: "नेकी कर, कुएं में डाल। हिसाब मत रख। किया भूल, कुएं में डाल दे। बात खत्म हो गयी, जैसे कभी हुई ही न थी।'

लेकिन तुम जाओ अपने त्यागियों के पास, महात्माओं के पास, तुम उनके पास पूरा हिसाब पाओगे। हिसाब ठीक भी नहीं पाओगे, बहुत बढ़ा-चढ़ाया हुआ है। हजार छोड़े होंगे तो लाख हो गये हैं। अब पूछता कौन है? और त्याग की परीक्षा भी क्या है, कसौटी भी क्या है? तुम्हारे पास लाख रुपये हैं तो तुम रुपये दिखा सकते हो; लेकिन जिसने लाख छोड़े हैं उसके पास प्रमाण क्या है कि उसने लाख छोड़े कि दस लाख छोड़े? न केवल महात्याग ऐसा करते हैं, महात्माओं के शिष्य उसको बढ़ाते चले जाते हैं।

महावीर ने महल छोड़ा, धन-संपत्ति छोड़ी, जैनियों ने जो शास्त्र लिखे हैं, उनमें इतना बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है, वह सरासर झूठ है। क्योंकि महावीर का साम्राज्य बड़ा छोटा-सा था कोई बड़ा नहीं था। महावीर के समय भारत में दो हजार राज्य थे। कोई बहुत बड़ा नहीं था, एक छोटी डिस्ट्रिक्ट से ज्यादा नहीं, एक छोटे जिले से ज्यादा नहीं था। इतने हाथी-घोड़े जितने जैनियों ने लिखे हैं, अगर होते तो आदमियों के रहने की जगह न रह जाती। लेकिन बढ़-चढ़ जाता है।

कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध हुआ। हिंदू उसकी जो कहानी बताते हैं, उसको अगर सुनो तो ऐसा लगता है कि उस युद्ध के लिए पूरी पृथ्वी कम पड़ेगी। कुरुक्षेत्र का छोटा-सा मैदान उसमें अट्ठारह अक्षौहिणी सेनाएं बन नहीं सकतीं; लड़ना तो दूर, अगर वे प्रेम भी करना चाहें, शांत खड़े होकर, तो भी संभव नहीं है। लड़ने के लिए थोड़ी जगह चाहिए, स्थान चाहिए! लेकिन बढ़ता जाता है...।

बुद्ध के भक्तों ने जो लिखा है वह सच नहीं है, क्योंकि बुद्ध की भी जगह बड़ी छोटी थी, वह कोई बहुत बड़ा साम्राज्य नहीं था। लेकिन जिस तरह की कहानियां हैं... और कहानियां बढ़ती चली गयी हैं।

क्यों? इन कहानियों को बढ़ाने का कारण क्या है? कारण साफ है कि हम त्याग को भी धन की मात्रा से ही समझ पाते हैं, और कोई उपाय नहीं है।

समझो, अगर महावीर फकीर के घर पैदा होते और पास धन न होता, तो तुम कैसे जानते कि उन्होंने त्याग किया? वे घर छोड़ देते, लेकिन त्यागी तो नहीं हो सकते थे। महात्यागी तुम कैसे कहते? था ही नहीं कुछ तो छोड़ा क्या?

तुम्हें भीतर के रहस्य तो दिखायी नहीं पड़ते, बस बाहर की चीजें दिखायी पड़ती हैं। तब तो इसका यह अर्थ हुआ कि केवल धनी ही त्यागी हो सकते हैं। तब तो इसका अर्थ हुआ कि त्यागी होने के पहले बहुत धनी हो जाना जरूरी है। तब तो इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा के जगत में भी अंततः धन का ही मूल्य है, उसी से हिसाब लगेगा।

एक फकीर ने सब छोड़ दिया, उसके पास दो पैसे थे। महावीर ने भी सब छोड़ दिया, उनके पास करोड़ रुपये थे, परमात्मा के सामने हिसाब में महावीर जीत जाएंगे, गरीब हार जाएगा। दो पैसे छोड़े! इन्होंने करोड़ छोड़े!

नहीं, परमात्मा के राज्य में तुमने क्या छोड़ा, इसका सवाल नहीं है; छोड़ा या नहीं छोड़ा, बस इसका ही सवाल है; छोड़ा या छूटा, इसका ही सवाल है।

निरोध का अर्थ है: छूट जाता है।

जिन्होंने संसार के सत्य को देखा, उनके जीवन में निरोध आ जाता है। उस निरोध को नारद ने भक्ति का स्वभाव कहा।

"वह भक्ति कामना युक्त नहीं है, और निरोधस्वरूपा है।' उसका स्वरूप है निरोध।

जैसे ही संसार से कामना हटती है, वही कामना परमात्मा की दिशा में प्रार्थना बन जाती हैं, वही ऊर्जा है! कोई अलग ऊर्जा नहीं है। वे ही हाथ जो भिक्षापात्र बने थे, प्रार्थना में जुड़ जाते हैं। वही हृदय जो धन-संपत्ति को मांगता फिरता था, परम अहोभाव में झुक जाता है। वही जीवन-ऊर्जा जो नीचे की तरफ भागती थी, खाई-खड्ड खोजती थी, आकाश की तरफ उठने लगती है।

"तेरी राह किसने बतायी न पूछ, दिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'

तेरी राह किसने  बतायी, यह मत पूछ--प्यासा दिल सदगुरु हो गया; व्याकुल हृदय मार्गदर्शक बन गया!

"तेरी राह किसने बतायी न पूछ दिले मुज्त्तरब राहबर हो गया।'

जिस दिन संसार से तुम्हारा रस टूटता है, व्याकुलता जगती है परमात्मा की। वही मार्गदर्शक हो जाता है। वही तुम्हें ले चलता है। उसी के सहारे लोग पहुंचते है।

संसार की मांग करता हुआ व्यक्ति उन हजार चीजों में चाहे तो परमात्मा की मांग का भी जोड़ ले सकता है, लेकिन वह फेहरिश्त में एक नाम होगा--लंबी फहेरिश्त में! और मेरे खयाल से आखिरी होगा। अगर तुम्हारी फेहरिश्त में हजार नाम हैं तो वह एक हजार एक होगा।

 "हम प्रार्थना करना चाहते हैं समय कहां!'  जब प्रार्थना का सवाल उठता है तो कहते हैं, "समय कहां!'

वे क्या कह रहे हैं? वे यह कह रहे हैं कि और बड़ी चीजें हैं परमात्मा से, समय पहले उनको दें, फिर बच जाए तो परमात्मा को दें। वे यह नहीं कह रहे हैं कि समय नहीं हैं; वे यह कह रहे हैं, समय तो है--समय तो सभी के पास बराबर है--लेकिन और चीजें ज्यादा जरूरी हैं। परमात्मा क्यू में बिलकुल अंतिम खड़ा है। पहले धन इकट्ठा कर लें, मकान बना लें, इज्जत-प्रतिष्ठा संभाल लें, फिर...। ऐसे परमात्मा प्रतीक्षा ही करता रहता है, फिर' कभी आता नहीं--आयेगा ही नहीं, क्योंकि इस संसार की दौड़ कभी पूरी नहीं होती।

यहां कुछ भी पूरा होनेवाला नहीं है। यहां तो जितना पीयो उतनी प्यास बढ़ती जाती है। यहां तो जितना भोजन करो उतनी भूख बढ़ती जाती है। यहां तो जितनी तिजोड़ी भरती जाए, उतना ही आदमी भीतर कृपण होता चला जाता है। दुनिया बड़ी अदभुत है! यहां गरीब के पास तो अमीर का दिल मिल भी जाए, अमीर के पास बिलकुल गरीब का दिल होता है।

इन हजार उपद्रवों में अगर तुम सोचते हो कि परमात्मा को भी एक आकांक्षा बना लेंगे, तो संभव नहीं है। परमात्मा तो अभीप्सा बने, तो ही तुम अधिकारी होते हो। अभीप्सा का अर्थ होता है: सारी इच्छाएं उसी की इच्छा में परिणत हो जाएं, सारे नदी-नाले उसी के सागर में गिर जाएं; उसके अतिरिक्त कुछ भी न सूझे; उसके अतिरिक्त हृदय में कोई आवाज न रहे; उसके अतिरिक्त श्वासों में कोई स्वर न बजे; उसका ही इकतारा बजने लगे!

फकीरों के पास तुमने इकतारा देखा है। कभी सोचा न होगा, इकतारा प्रतीक है: परमात्मा के लिए एक ही तार काफी है। सितार में और बहुत तार होते हैं, वीणा में बहुत तार होते हैं और सारंगी में बहुत तार होते हैं--वे संसार के प्रतीक हैं; इकतारा, परमात्मा का।

बस इकतारा! एक ही अभीप्सा का स्वर बजने लगे, दूसरी कोई ध्वनि भी न रह जाए, तो ही

"रग रग में नेशे इश्क है, ऐ चारागर मेरे!

यह दर्द वह नहीं, के कहीं हो, कहीं न हो।'

रगरग में नेशे इश्क है, ऐ चारागर मेरे!

यह दर्द वह नहीं, कि कहीं हो, कहीं न हो।'

जब परमात्मा का दर्द तुम्हारे रग-रग में समा जाता है; जब तुम्हारा रोआं-रोआं उसी को पुकारता है; सोते और जागते अहर्निश उसका ही स्मरण बना रहता है; करो कुछ भी, याद उसकी ही; जाओ कहीं, याद उसकी ही; बैठो कि उठो कि सोओ, याद उसकी ही-- जब रग-रग में ऐसा समा जाता है, तभी तुमने पात्रता पायी, तभी तुम अधिकारी हुए।

और ध्यान रखना, आज नहीं कल, इस महाक्रांति में उतरना ही पड़ेगा। लाख तुम कोशिश करो इस संसार को घर बना लेने की, सफलता मिलनेवाली नहीं है। कोई कभी सफल नहीं हो पाया। सपने को सच कितना ही मानो, सपना एक दिन टूटता ही है। सपने का स्वभाव ही टूट जाना है। तुम उसे सच मान कर थोड़ी-बहुत देर नींद ले सकते हो, लेकिन सदा के लिए यह नींद नहीं हो सकती। सपने का स्वभाव ही शुरू होना, समाप्त होना है। इस संसार को, तुम लाख कोशिश करो...हम सब कोशिश कर रहे हैं...हम, हमारी सारी कोशिश यही है कि बुद्ध, नारद, मीरा इन सबको हम गलत सिद्ध कर दें।

हम सबकी कोशिश क्या है? हमारी कोशिश यही है कि हम सिद्ध कर देंगे कि, संसार में सुख है; हम सिद्ध कर देंगे कि परमात्मा आवश्यक नहीं है; हम सिद्ध कर देंगे कि जीवन परमात्मा के दिन पर्याप्त है; हम सिद्ध कर देंगे कि धन में है कुछ, कि यह सपना नहीं है, माया नहीं है, सत्य है।

छोड़ो इस मूढ़ता को, कभी कोई कर नहीं पाया! लेकिन इस करने की कोशिश में लोग अपने जीवन को गंवा देते हैं।

"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदली

कफस कफस ही रहा, फिर भी आशियां न हुआ।'

नहीं, यह घर न बन पाएगा। यह जगह कारागृह है, यह घर न बन पाएगी। यहां तुम अजनबी हो। यहां तुम लाख उपाय करो, और कल्पनाएं कितनी ही करवटें बदलें, हजार तरह से कल्पनाएं, सपने को संजोएं, लेकिन यह जाल कल्पना का ही रहेगा।

कल्पना तुम्हारी है; सत्य परमात्मा का है। जब तक तुम सोचोगे-विचारोगे, तब तक तुम सपने में रहोगे। जब तुम सोच-विचार छोड़ोगे और जागोगे, तब तुम जानोगे, सत्य क्या है।

सत्य मुक्तिदायी है। और जो मुक्त करे वही घर है। जहां स्वतंत्रता हो वही घर है।

कारागृह में और घर में फर्क क्या है? दीवालें तो उन्हीं ईंटों की बनी हैं, दरवाजे उन्हीं लकड़ियों के बने हैं।

कारागृह और घर में फर्क क्या है? घर में तुम मुक्त हो; कारागृह में तुम मुक्त नहीं हो--बस इतना ही फर्क है।

घर स्वतंत्रता है; कारागृह गुलामी है।

"हजार तरह तखय्युल ने करवटें बदलीं

कफस कफस ही रहा, फिर भी आशियां न हुआ।'

कारागृह में तुम बदलते रहो कल्पनाएं अपनी, सोचते रहो, जाले बुनते रहो सपनों के, सजाते रहो भीतर से कारागृह को-- नहीं, घर न हो पाएगा।

जो जितनी जल्दी जाग जाए इस संबंध में उतना ही सौभाग्यशाली है; जितनी देर लगती है उतना ही समय व्यर्थ जाता है; जितनी देर लगती है उतनी ही गलत आदतें मजबूत होती चली जाती है; जितनी देर लगती है उतने ही बंधन और भी सख्त होते चले जाते हैं और तुम्हारी शक्ति क्षीण होती चली जाती है उन्हें तोड़ने की। इसलिए बुढ़ापे की प्रतीक्षा मत करना। अगर समझ आए तो जब समझ आ जाए, क्षण-भर भी स्थगित मत करना उस समझ को।

"लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।'

संस्कृत का मूल बहुत अदभुत है! हिंदी में अनुवाद जो लोग करते हैं, उन्हें त्याग और निरोध का कोई भेद साफ नहीं है।

संस्कृत का मूल कहता है:

लोक, वेद, व्यापार, इस सबका निरोध हो जाए, न्यास हो जाए, वही भक्ति है। इसे समझें हम।

इस लोक और परलोक के व्यापार का निरोध हो जाए...।'

इस लोक का व्यापार है: धन की दौड़ है, पद की दौड़ है। परलोक का भी व्यापार है: सुख, आनंद, मोक्ष, वे भी यात्रा ही हैं, वे भी दौड़ हैं। किसी तरह इस संसार से तुम ऊबते हो, ऊब नहीं पाए कि तुम दूसरे संसार के सपने देखते शुरू कर देते हो। इसी तरह सपने देखनेवालों ने स्वर्ग बनाये, स्वर्ग में हजार कल्पनाओं को जगह दी, जो-जो यहां पूरा नहीं हो पाया है, वह-वह वहां रख लिया है। और कभी-कभी तो कल्पनाएं बड़ी मूढ़तापूर्ण मालूम होती हैं कि विचारों तो बड़ी हैरानी होती है।

मुसलमान कहते हैं, उनके स्वर्ग में बहिश्त में, शराब के चश्मे बह रहे हैं। यहां पीने नहीं देते। यहां कहते हैं पाप और वहां चश्मे बहाते हैं। तुम सोच सकते हो, बात बिलकुल सीधी है, यह चश्मों की कल्पना किसने की होगी। यह उन्होंने की है जिनको यहां पीने में रस था और त्याग कर दिया। यह सीधी-सी बात है, सीधा मनोविज्ञान है। यहां पीना चाहते थे, लेकिन डर की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थे, लेकिन धार्मिक शिक्षण की वजह से पी न पाये। यहां पीना चाहते थे लेकिन हिम्मत न जुटा पाये, तो अब स्वर्ग में चश्मे बहा रहे हैं। यहां चुल्लू-चुल्लू मिलती है, वहां डुबकी लगाएंगे।

"जाहिद के कस्रे-जुहूद की बुनियाद है यही

मस्जिद बहुत करीब थी, मैखाना दूर था।'

वह जिनको तुम त्यागी समझते हो, उनके त्याग में अधिकतर तो कारण यही है कि मस्जिद करीब थी और मधुशाला दूर थी...इतना ही। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म का शिक्षण देनेवाले लोग तो पास थे, शराब का विज्ञापन करनेवाले लोग दूर थे। मां-बाप, समाज, परिवार, मंदिर-मस्जिद, स्कूल-विद्यालय, वे सब शराब के खिलाफ हैं, वे सब मस्जिद और मंदिर के पक्ष में हैं। इसलिए बैठ तो गये मंदिर में, बैठ तो गये मस्जिद में, लेकिन मन का राग, मन की कामना, कोई शिक्षण से थोड़े ही मिटती है; अनुभव से मिटती है। सोचते तो शराब की ही हैं; यहां नहीं मिली, तो अब कल्पना में फैलाव करते हैं; स्वर्ग में मिलेगी!

हिंदुओं का स्वर्ग है...।

और बड़े मजे की बात है, अगर तुम किसी भी जाति का स्वर्ग ठीक से पहचान लो तो तुम यह भी समझ जाओगे: उस जाति ने किन-किन चीजों की वर्जना की है। उस जाति के शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, उसका स्वर्ग समझ लो, फौरन पता चल जाएगा कि इस जाति ने किन-किन चीजों को जबरदस्ती त्याग है।

...हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष है, जहां सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं, बैठ जाओ उसके नीचे बस! ऐसा भी नहीं कि कुछ समय का फासला पड़ता हो; समय लगता ही नहीं है। तुमने यहां कामना की कि यहां पूरी हुई! तुमने कहा, "भोजन आ जाए', थाल आ गये! बस तुम यहां कह भी नहीं पाये थे और थाल मौजूद हो गये।

हिंदुओं के स्वर्ग में कल्पवृक्ष है--क्यों? क्योंकि हिंदुओं ने सभी इच्छाओं के त्याग का आग्रह किया है। सभी इच्छाओं का त्याग! स्वभावतः: जो किसी तरह अपने को समझा-बुझाकर त्यागी हो जाएगा, वह इसी आशा में जी रहा है कि कभी तो मरेंगे, यह देह तो कोई ज्यादा दिन चलनेवाली नहीं है, और कुछ साल बीत जाएं, फिर कल्पवृक्ष है! फिर उसके नीचे बैठ जाएंगे!

तुमने कभी देखा, दिन में कभी उपवास कर लो तो तुम रात-भर भोजन के सपने देखते हो! ब्रह्मचर्य का व्रत ले लो तो सपने में स्त्रियां ही स्त्रियां दिखायी पड़ती हैं।

ये सपने हैं: कल्पवृक्ष! शराब के चश्मे! ये इस बात की खबर दे रहे हैं कि तुमने किस-किस चीज को जबरदस्ती छोड़ दिया है--अनुभव से नहीं, पक कर नहीं। संस्कार, शिक्षण,दबाव...!

"मस्जिद बहुत करीब थी, मैखाना दूर था!' उतने दूर जाने की तुम हिम्मत न जुटा पाये। जाते तो प्रतिष्ठा दांव पर लगती थी। तो तुमने एक तरकीब निकाली कि यहां मस्जिद में रहो, स्वर्ग में मयखाने में रह लेंगे। ऐसे तुमने अपने को समझाया। ऐसे तुमने समझौता किया।

तुम्हारे स्वर्ग तुम्हारी कल्पनाओं के जाल हैं, और तुम्हारे नरक...? स्वर्ग तुमने अपने लिए बनाये हैं और नरक दूसरों के लिए--वे भी बड़े विचारणीय हैं।

हिंदुओं का नरक है, तो भयंकर आग जल रही है, सतत अग्नि जलती है, बुझती नहीं। उसमें जलाये जा रहे हैं लोग। भारत गरमी से पीड़ित देश है। यहां सूर्य तपता है। तो शीतलता स्वर्ग में...शीतल मंद बयार बहती है! सुबह ही बनी रहती है स्वर्ग में, दोपहर नहीं आती। बस सुबह की ही ताजगी बनी रहती है। फूल खिलते हैं, मुरझाते नहीं। और शीतल हवा कहती रहती है। नरक में भयंकर लपटें हैं। वह गरम देश की धारणा है।

तिब्बती, वे नहीं बनाते, वे नहीं कहते कि नरक में लपटें हैं। उनका स्वर्ग गरम और ऊष्ण है, क्योंकि ठंडे मुल्क के लोग मरे जा रहे हैं ठंड से; नरक में बर्फ-ही-बर्फ जमी है; उसमें लोग गल रहे हैं बर्फ में!

न तो कहीं कोई स्वर्ग है, न कहीं कोई नरक है। स्वर्ग तुम बनाते हो अपने लिए। जो-जो कामनाएं तुम पूरी करना चाहते थे और नहीं कर पाये, तो तुम स्वर्ग में कर लेते हो। स्वर्ग हिंदुओं का बिलकुल एयरकंडीशंड है, वातानुकूलित है। वहां कोई ताप नहीं लगती। पसीना नहीं आता स्वर्ग में--पसीना आता ही नहीं।

और जो तुम छोड़ दिये हो, अपने लिए कल्पना कर रहे हो, और दूसरों ने नहीं छोड़ा... समझो कि तुम शराब पीना चाहते थे और नहीं पी पाये, तो तुमने अपने लिए तो स्वर्ग में इंतजाम कर और जी रहे हैं, उनके लिए क्या करोगे? उनको भी दंड तो मिलना ही चाहिए, क्योंकि तुमने त्याग किया, उन्होंने त्याग नहीं किया, तो उनको नरक की लपटों में जलाया जाएगा। और वहां शराब तो दूर, पानी भी पीने को न मिलेगा। आग की लपटें होंगी, कंठ आग से भरा होगा, और पानी नहीं मिलेगा! पानी की बूंद नहीं मिलेगी!

इससे पता चलता है तुम्हारे मन का, तुम्हारी खुद की परेशानी का, तुम्हारी हिंसा का, तुम्हारी वासना का। न किसी स्वर्ग का इससे पता चलता है, न किसी नरक का इससे पता चलता है।

भक्ति तो उसे उपलब्ध होती है जिसको न इस संसार की कोई कामना रही न उस संसार की। जिसकी कामना का व्यापार निरुद्ध हो गया; जिसने कहा, "अब हमें कुछ मांगना ही नहीं है, न यहां न वहां', मांग ही छोड़ दी--उसे सब मिल जाता है "यही'

"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'

बिलकुल ठीक।"उस प्रियतम भगवान में अनन्यता'...! जैसे हम उसके साथ एक हो गये, अनन्य! जरा भी भेद न रह जाए! रत्ती भर भी फासला न रह जाए! मैं और तू का फासला न रह जाए!

"उस प्रियतम में अनन्यता अपने आप ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता बन जाती है।'

"उदासीनता' शब्द को समझ लेना जरूरी है। उदासीनता निरोध का मार्ग है।

जिसको तुम त्यागी कहते हो, वह उदासीन नहीं होता। जो आदमी शराब का त्याग करता है, वह शराब के प्रति उदासीन नहीं होता; शराब के प्रति बड़े विरोध में होता है--उदासीन कैसे होगा? विरोध में होता है।

उदासीन का अर्थ है: हमें कोई प्रयोजन नहीं। विरोध का अर्थ है: शराब जहर है।

जो आदमी कामवासना में उदासीन होता है, वह कामवासना के विरोध में नहीं होता। अगर कोई दूसरा कामवासना में जा रहा है तो इससे उसके मन में निंदा पैदा नहीं होती--"यह उसकी मर्जी है! यह उसकी समझ है! उसका समय न आया होगा, कभी आयेगा।' उस पर करुणा आ सकती है, क्रोध नहीं आता।

जो आदमी धन में उदासीन है, उसके मन में धन की कोई निंदा नहीं होती। वह धन का पाप नहीं कहता। वह इतना ही कहता है कि धन की उपयोगिता है, लेकिन वह उपयोगिता बड़ी क्षणिक है। वह इतना ही कहता है कि धन सब कुछ नहीं है। वह यह नहीं कहता कि धन कुछ भी नहीं है। वह इतना ही कहता है, संसार में उपयोगी होगा; लेकिन संसार सब कुछ नहीं है। वह धन के विरोध में नहीं है।

ऐसे त्यागी हैं कि अगर उनके सामने तुम रुपये ले जाओ तो वे आंख बंद कर लेते हैं। अब वह उदासीनता न हुई। ऐसे त्यागी हैं जो धन को हाथ से नहीं छूते। यह उदासीनता न हुई।

उदासीनता का अर्थ है: हो तो हो ठीक, न हो तो ठीक। उदासीनता में को पक्षपात नहीं है। उदासीनता बड़ी अदभुत बात है। वह वैराग्य का परम लक्षण है।

इसलिए अगर तुम किसी वैरागी में पाओ उदासीनता की जगह विरोध, तो समझना कि चूक हो गयी। अगर वह घबड़ाये तो समझना कि रस कायम है, जिस चीज से घबड़ाता है उसी का रस कायम है। अगर धन छूने से डरे तो समझना कि धन का लोभ भीतर मौजूद है। अगर स्त्री को देखने से डरे तो समझना कि कामवासना भीतर मौजूद है। क्योंकि हम उसी से डरते हैं जिसमें गिरने की हमें संभावना मालूम होती है, शंका मालूम होती है।

उदासीनता का अर्थ है: कोई फर्क नहीं पड़ता।

ऐसा हुआ कि बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे, पूर्णिमा की रात थी, और पास के नगर से कुछ युवक, धनपतियों के लड़के, एक वेश्या को लेकर जंगल में आ गये थे-- मौज-रंग करने! वे तो शराब पीकर मस्त हो गये, वेश्या ने मौका देखा कि वे तो शराब पीकर होश खो दिये हैं, वह भाग खड़ी हुई।

जब सुबह होने के करीब आयी और उनको ठंड लगी और होश आया और देखा कि वह 'वेश्या तो भाग गयी है, तो वे उसकी खोज में निकले। उसी रास्ते पर बुद्ध ध्यान करते थे, उनके पास आये और उन्होंने कहा कि "यहां से कोई स्त्री तो नहीं निकली?'

बुद्ध ने कहा, "कोई निकला जरूर, लेकिन स्त्री थी या पुरुष, यह जरा कहना मुश्किल है--क्योंकि मेरा रस ही न रहा। कोई निकला जरूर, लेकिन स्त्री थी या पुरुष, इसमें मेरा रस न रहा।'

यह उदासीनता है।

बुद्ध ने कहा कि जब तक मेरा रस था, तब तक गौर से देखता भी था: कौन कौन है! अब मेरा कोई रस नहीं है।

जब रस खो जाता है तो सिर्फ एक उदासीनता होती है, एक शांति तुम्हें घेर लेती है। उसमें कोई पक्षपात नहीं होता।

उस प्रियतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।' "पीना-न-पीना एक है जाहिद! खता मुआफ

नीयत जब एतबार के काबिल नहीं रही।'

जब तक नीयत पर एतबार न हो, जब तक अपने भीतर की स्थिति पर भरोसा न हो तब तक तुम कसमें भी ले लो, तो कुछ फर्क नहीं पड़ता; व्रत धारण कर लो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि असली बात तो नीयत है। तुम पियो न पियो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; घर में रहो कि बाहर रहो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; पूजा करो कि न करो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता--असली सवाल तुम्हारे भीतर की नीयत का है। अगर नीयत साफ है तो तुम कहीं भी रहो, मंदिर ही पाओगे। अगर नीयत साफ नहीं है, तो तुम मंदिर में रहो, तुम वेश्यागृह में ही रहोगे। क्योंकि आदमी अपनी नीयत में रहता है, अपने भीतर की मनोदशा में रहता है।

"उस प्रियतम में अनन्यता...।'

"कैसी तलब, कहां की तलब, किसलिए तलब

हम हैं तो वह नहीं है, वह है तो हम नहीं।'

एक ही बच सकता है प्रेम में, दो नहीं। या तो परमात्मा बचेगा तो तुम न बचोगे, या तुम बचोगे तो परमात्मा न बचेगा।

"कैसी तलब, कहां की तलब, किसलिए तलब

हम हैं तो वह नहीं है, वह है तो हम नहीं।'

अनन्यता का अर्थ है: एक ही बचेगा।

प्रेम गली अति सांकरी तामे दो न समाय'--उसमें दो नहीं समा सकते।

तो भक्त धीरे-धीरे भगवान हो जाता है, भगवान धीरे-धीरे भक्त हो जाता है।

रामकृष्ण पूजा करते हैं तो भोग लगाने के पहले खुद चख लेते हैं। मंदिर के ट्रस्टियों ने बुलाया कि "यह तो पूजा न हुई। किस शास्त्र में लिखा है? भगवान को भोग पहले लगाओ, फिर तो बचे, वह तुम भोजन करो। लेकिन यह तो बात तो गलत हो रही है। यह उलटा हो रहा है। तुम भगवान को झूठा भोग लगा रहे हो! तुम पहले चखते हो।'

रामकृष्ण ने कहा, "संभाल लो फिर अपनी नौकरी, मैं चला। क्योंकि मेरी मां जब भी भोजन बनाती थी तो पहले खुद चखती थी, फिर मुझे देती थी। जब मां का प्रेम इतनी फिक्र करता था तो यह प्रेम तो उससे भी बड़ा है। मैं बिना चखे भोग नहीं लगा सकता भगवान को, पता नहीं लगाने योग्य है भी या नहीं!'

ऐसी अनन्यता, ऐसी निकटता, इतनी समीपता, कि धीरे-धीरे सीमाएं खो जाएं! तो कभी ऐसा होता है कि रामकृष्ण दिन-भर नाचते रहते और कभी ऐसा होता कि पखवाड़ा बीत जाता और मंदिर में न जाते। फिर बुलाये गये के यह क्या मामला है, मंदिर खाली पड़ा रहता है, पूजा नहीं होती। रामकृष्ण कहते, "जब होती है तब होती है, जब नहीं होती तब नहीं होती। जब "वह' बुलाता है और जब अनन्यता का भाव जगता है तभी...। जब दूरी रहती है, तब क्या सार? जब मैं रहता हूं तब पूजा किसकी? जब वही बचता है तभी होती है। जब यह मेरे हाथ में नहीं है कि वही बचे। जब होता है तब होता है। सहजस्फूर्त है!'

रामकृष्ण जैसा पुजारी फिर किसी मंदिर को न मिलेगा। दक्षिणेश्वर के भगवान धन्यभागी हैं कि रामकृष्ण जैसा पुजारी मिला।

अनन्य-भाव का अर्थ है: "मैं' और "तू' दो नहीं, एक ही बचता है। वस्तुतः दोनों तरफ से प्रेमी-प्रेयसी या भक्त और भगवान, दोनों खोते हैं और दोनों के बीच में एक नये का आविर्भाव होता है: एक नये ज्योतिर्मय चैतन्य का आविर्भाव होता है, जिसमें भक्त भी खो गया होता है एक कोने से, दूसरे कोने से भगवान भी खो गया होता है।

भक्त और भगवान तो द्वैत की भाषा है; भक्ति तो अद्वैत है।

"उस प्रीतम में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।'

और जिसने भी उसके साथ ऐसी एकतानता साध ली, वह संसार के प्रति उदासीन हो जाता हैं; छोड़ना नहीं पड़ता संसार, त्यागना नहीं पड़ता संसार, सब छूट जाता है, व्यर्थ हो जाता है; सार्थकता ही नहीं रह जाती; छोड़ने को क्या बचता है।

"अपने प्रीतम को छोड़कर दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।'

परमात्मा तुम्हें ऐसा भर दे के तुम्हारे भीतर कोई रत्ती-भर जगह न बचे तो उससे भरी हुई नहीं है, तुम लबालब उससे भर जाओ, तुम ऊपर से बहने लगो ऐसे भर जाओ, कोई दूसरा आश्रय न बचे, किसी दूसरे की तरफ कोई लगाव न रह जाए, सभी लगाव उस एक के प्रति ही समर्पित हो जाएं...।

"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

और उन्हीं में तू निहां था, मुझे मालूम न था।'

"आंखों से खोजता था तुझे सब जगह और यह मुझे पता नहीं था कि मेरी आंखों में ही बैठा हुआ है! तू खोजनेवाले में ही छिपा है। तू मेरे देखने में ही छिपा है। और मैं निगाहों से खोजता था हर एक जा तुझको, और यह पता न था...!

तुम जब तक परमात्मा को बाहर खोज रहे हो, खोज न पाओगे। वह उन निगाहो में ही छिपा है, उस दृष्टि में ही, उस देखने की क्षमता में ही! वह तुम्हारे होश में छिपा है। वह तुम्हारे होने में छिपा है।

"देखता था मैं निगाहों से हर एक जा तुझको

और उन्हीं में तू निहां था, मुझे मालूम न था।'

तुम मंदिर हो।

परमात्मा को खोजने किसी और मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। अपने ही भीतर डूब कर पाया है, जिन्होंने भी पाया है।

अगर तुम सारे आसरे छोड़ दो, सारे सहारे छोड़ दो, तो तुम अपने ही डूब जाओगे। जो भी तुम पकड़े हो आसरे की तरह, वही तुम्हें अपने से बाहर अटकाये हुए है। धन का आसरा है, पद का आसरा है, मित्र का आसरा है, संगी-साथियों का, परिवार का आसरा है, पति-पत्नी का आसरा है! जिन-जिन आसरों को तुम सोच रहे हो कि ये सहारे हैं, सुरक्षा हैं, वही तुम्हें बाहर अटकाये हैं।

छोड़ दो सब आसरे!

बे-आसरे हो जाओ!

बे-सहारा हो जाओ!

असहाय हो जाओ!

और अचानक तुम पाओगे: तुम्हें अपने ही भीतर वह भूमि मिल गयी जिसे जन्मों-जन्मों खोजते थे और न पाते थे; अपने ही भीतर वह हाथ मिल गया जो शाश्वत है। अब किसी और आसरे की कोई जरूरत न रही।

"लौकिक और वैदिक कर्मों में भगवान के अनुकूल कर्म करन ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता है।'

और फिर ऐसा व्यक्ति जिसकी अनन्यता सध गयी परमात्मा से, जिसका तार मिल गया, तन्मयता बंध गयी, एक सामंजस्य आ गया, हाथ परमात्मा के हाथ में हो गया जिसका--ऐसा व्यक्ति फिर उसके ही अनुकूल कर्म करता है, ""वह' जो करवाता है वही करता है। फिर उसका अपना कर्ता-भाव चला जाता है। फिर वह कहता है, "जो वह करवाये! जो उसकी मर्जी! जो नाच नचाये, वही मेरा जीवन है।' फिर अपनी तरफ से निर्णय लेना, अपनी तरफ से विचार करना, संभव नहीं है।

"विधि-निषेध से अतीत अलौकिक प्रेम प्राप्ति का मन में दृढ़ निश्चय हो जाने के बाद भी शास्त्र की रक्षा करनी चाहिए, अन्यथा गिर जाने की संभावना है

यह सूत्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसा घटता है। जब तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम परमात्मा के अनुसार चलने लगे, जब तुम्हें ऐसा लगता है कि अब तो तुम एक हो गये, तो सारी विधि-निषेध के पार हो गये, अब समाज का कोई नियम तुम पर लागू नहीं होता।

सच है, कोई नियम लागू नहीं होता; लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि तुम नियम छोड़कर चलने लगो। तुम पर नियम नहीं लागू होता, समाज तो अब भी नियम में जीता है। तुम जिस समाज में हो, उस समाज के लिए तुम अड़चन मत बनो, सहारा बनो; उस समाज के लिए तुम उपद्रव का कारण न बनो, मार्ग बनो।

इसलिए नारद कहते हैं, "विधि-निषेध से अतीत...।' कोई नियम लागू नहीं होता प्रेम पर, भक्त पर। वह पहुंच गया वहां, सब नियमों के पार, परम नियम उसे मिल गया प्रेम का, अब उस पर कोई नियम लागू नहीं होता। लेकिन फिर भी, अगर वह रास्ते पर चले तो उसे बाएं ही चलना चाहिए, क्योंकि सारा ट्रैफिक बाएं ही चल रहा है। अगर वह दाएं चलने लगे, वह कहे कि हम तो भक्ति को उपलब्ध हो गये, तो खतरा है--खतरा है पतन का। असल में इस तरह का आग्रह वही आदमी करेगा जो अभी उपलब्ध ही नहीं हुआ है; वस्तुतः उपलब्ध नहीं हुआ है। क्योंकि उपलब्ध होकर तो कोई नहीं गिरता, असंभव है गिरना।

इसे थोड़ा गौर से समझ लेना।

जो उपलब्ध नहीं हुआ है परमात्मा को, वही इस तरह का आग्रह करेगा के मुझ पर तो कोई नियम लागू नहीं होता। यह अहंकार की नयी उदघोषणा है। यह अहंकार का नया खेल शुरू हुआ। एक नया संसार चला अब। वह कहेगा, मुझ पर कोई नियम लागू नहीं होता। मैं तो अब उसके ही सहारे जीता हूं। इसलिए जो "वह' करवाता है वही करता हूं।

इसकी आड़ में कहीं तुम अपने अहंकार को मत छिपा लेना। कहीं ऐसा न हो कि यह भी धोखा हो तुम्हारा।

इसलिए सूत्र कहता है: सजग रहना। ऐसी स्थिति भी आ जाये कि तुम विधि-निषेध के पार हो जाओ, तो भी शास्त्र की रक्षा जारी रखना। उस रक्षा में तुम्हारी रक्षा है। उस रक्षा में दूसरों की रक्षा तो है ही, तुम्हारी भी रक्षा है। क्यों? तुम अपने अहंकार को सजाने-संवारने का नया उपाय न पा सकोगे।

और स्मरण रखना, जो विधि-निषेध के पार हो गया, वह विधि-निषेध को तोड़ने की चिंता में नहीं पड़ता। जो पार ही हो गया, वह चिंता क्या करेगा तोड़ने की! वह कमल जैसा पार हो जाता है पानी के। जो पार हो गया है वह जीवन को चुपचाप स्वीकार कर लेता है जैसा है; लोग जैसे जी रहे हैं, ठीक है।

छोटे बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैं, तुम वहां जाते हो, तुम जानते हो, वे खिलौने हैं; तुम जानते हो, खेल के नियम सब बनाये हुए हैं। लेकिन बाप भी छोटे बच्चों के साथ जब खेलता है तो खेल के नियम मानता है। वह यह नहीं कह सकता कि मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूं, मैं नियम के बाहर हूं। छोटे बच्चों के साथ छोटे बच्चों की तरह ही व्यवहार करेगा--यही प्रौढ़ का लक्षण है।

तो जो व्यक्ति वस्तुतः भक्ति के परम सूत्र को उपलब्ध होता है, वह तोड़ नहीं देता जीवन की व्यवस्था को। वह कोई अराजकता नहीं ले आता।

जीसस ने कहा है कि मैं शास्त्र को खंडित करने नहीं, पूर्ण करने आया हूं।

वह शास्त्र के मूल स्वभाव का पुनः पुनः उदघाटन करता है। वह शास्त्र के खो गये सूत्रों को पुनः पुनरुज्जीवित करता है। वह शास्त्र पर जम गयी धूल को हटाता है। वह शास्त्र के दर्पण को निखारता है ताकि फिर तुम शास्त्र के दर्पण में अपने चेहरे को देख सको, फिर तुम अपने को पहचान सको। सदियों में शास्त्र पर जो धूल जम जाती है, सदियों में स्त्री पर जो व्याख्या की परतें जम जाती हैं, उनको फिर वह अलग कर देता है, लेकिन शास्त्र की रक्षा करता है। क्योंकि शास्त्र तो उनके वचन हैं जिन्होंने जाना। वे बुद्धपुरुषों के वचन हैं। व्याख्याएं कितनी ही गलत हो गयी हों, लोगों ने कितना ही गलत अर्थ लिया हो, लेकिन मूल तो बुद्धपुरुषों से आता है,मूल तो गलत नहीं हो सकता।

मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं क्यों शास्त्रों की व्याख्या कर रहा हूं। इसीलिए कि जो धूल जमी हो वह अलग हो जाए, ताकि मैं तुम्हें उनका खालिस सोना जाहिर कर सकूं। अगर मैं तुम्हें कभी शास्त्र के विपरीत भी मालूम पड़ूं, तो समझना कि तुम्हारे समझने में कहीं भूल हो गयी है; तो समझना कि तुमने शास्त्र का जो अर्थ समझा था वह अर्थ शास्त्र का न था, इसलिए मैं विपरीत मालूम पड़ रहा हूं। अन्यथा मैं भी तुमसे कहता हूं कि शास्त्र का खंडन करने नहीं, शास्त्र का शुद्धतम स्वरूप आविष्कृत करने की सारी चेष्टा है।

"लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्म ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य, जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।

जो बाह्य कर्म हैं, उन्हें साधारणतः जैसी विधि हो, जैसी समाज की धारणा हो, वैसे ही करते जाना चाहिए--बाह्य ज्ञान रहने तक! क्योंकि भक्ति में ऐसी घड़ियां भी आती हैं जब बाह्य ज्ञान बिलकुल खो जाता है, तब सूत्र लागू नहीं होता। क्योंकि ऐसी भी घड़ियां आती हैं जब मस्ती ऐसे शिखर छूती है कि बाह्य ज्ञान ही नहीं रह जाता। रामकृष्ण छह-छह दिन के लिए बेहोश हो जाते थे। जब फिर अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तब वे अपने में इतने लीन हो जाते थे, इतने दूर निकल जाते थे कि उनके शरीर को ही संभालकर रखना पड़ता था।

लेकिन भोजनादि कार्य तब तक होते रहेंगे जब तक शरीर है।'

इस सूत्र से यह समझ लो कि जीवन में वासना तो हटनी चाहिए, जरूरतें हटाने का सवाल नहीं है। भोजन तो जरूरी है। वस्त्र जरूरी हैं। छप्पर जरूरी है, उसका कोई निषेध नहीं है; निषेध है गैर जरूरी का, जो कि केवल मन की आकांक्षा से पैदा होता है, जिसके बिना तुम रह सकते थे, मजे से रह सकते थे, जिसके बिना कोई अड़चन न पड़ती थी, शायद और भी मजे से रह सकते।

एक बहुत बड़ा विचारक हुआ: अल्डुअस हक्सले। कैलिफोर्निया में उसका मकान था, और जीवन-भर उसने बड़ी बहुमूल्य चीजें इकट्ठी की थीं--पुराने शास्त्र, बहुमूल्य अनूठी किताबें, चित्र, पेंटिंग, मूर्तियां, शिल्प। बड़ा संवेदनशील व्यक्ति था। उसके पास बहुमूल्य भंडार था अनूठी चीजों का। सारे संसार से उसने इकट्ठा किया था। उसकी कीमत कूतनी आसान नहीं। अचानक एक दिन आग लग गयी और सब जलकर राख हो गया।

अल्डुअस हक्सले ने कहा कि मैंने तो सोचा था कि मैं मर जाऊंगा इसके दुख से, लेकिन अचानक, जिसकी कभी अपेक्षा भी न की थी, ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे एक बोझ हलका हो गया। एक बोझ! वह खुद भी चौंका यह अनुभव देखकर। सामने ही जल रहा है उसका विशाल संग्रहालय और वह सामने खड़ा है लपटों के, और उसने कहा कि मुझे लगा कि मैं एकदम हलका हो गया हूं और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वच्छ हो गया हूं।' आई फैल्ट क्लीन"। एक ताजगी!

तुम्हें पता नहीं है कि बहुत-सी गैरजरूरी चीजों ने तुम्हें जीवन तो नहीं दिया है, बोझ दिया है। उनके बिना तुम ज्यादा स्वस्थ हो सकते थे। उनके बिना तुम ज्यादा प्रसन्न हो सकते थे। उन्होंने सिर्फ तनाव दिया है, चिंता दी है।

जरूरत को छोड़ने का कोई सवाल नहीं है। भक्ति कोई जबरदस्ती त्याग नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।

तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओ, तुम उपवास करो, तुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती। यह भक्ति की खूबी है और उसकी स्वाभाविकता है। जीवन की सामान्य जरूरतें पूरी होनी ही चाहिए।

तो भक्ति कोई जबरदस्ती नहीं करती कि तुम नग्न खड़े हो जाओ, तुम उपवास करो, तुम शरीर को तपाओ व्यर्थ--ऐसी दुष्टता, ऐसी हिंसा भक्ति नहीं सिखाती।

भक्ति कहती है: यह जो परमात्मा का मंदिर है तुम्हारा घर, इसकी साज-संभाल जरूरी है। यह उसका घर है। इसे तुम्हें "उसके' योग्य स्वच्छ और ताजा सुंदर रखना चाहिए। लेकिन जरूरत और वासना में फर्क समझना आवश्यक है।

मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री के प्रेम में था, शादी करना चाहता था। तो उस स्त्री ने कहा, "नसरुद्दीन, और तो सब ठीक है, एक बात मैं पूछना चाहती हूं, कि तुम उन पुरुषों में तो नहीं हो जो शादी के बाद पत्नी को दफ्तरों में काम करवाते हैं या नौकरी करवाते हैं?

नसरुद्दीन ने कहा,"भूलकर भी इस तरह का मत सोच। कभी भी मेरी पत्नी काम पर जाने वाली नहीं है। हां, एक बात और, अगर कपड़ा, रोटी, मकान जैसी विलास की चीजों की तूने मांग की तो फिर मैं नहीं जानता...। लेकिन रोटी, कपड़ा, मकान, ऐसी विलास की चीजें मत मांगना।'

विलास और जरूरत में फर्क करना जरूरी है।

भक्ति स्वस्थ सहज मार्ग है। स्वाभाविक, अस्वाभाविक नहीं। भक्ति तुम जैसे हो, तुम्हारी जरूरतों को स्वीकार करती है। कहीं कोई अकारण अपने को कष्ट देना, पीड़ा देना, व्यर्थ के तनाव खड़े करने, उनसे आदमी परमात्मा के प्रेम को उपलब्ध नहीं होता, उनसे तो और सघन अहंकार को उपलब्ध होता है।

भक्ति त्याग नहीं है, निरोध है। जो अपने से छूट जाए। जो व्यर्थ है छूट जाएगा। जो सार्थक है, जरूरी है, शेष रहेगा।

इसलिए आखिरी सूत्र है: लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्य ज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।

भक्ति की यह स्वाभाविकता ही उसके प्रभाव का कारण है।

भक्ति बड़ी संवेदनशील है। वह जीवन को कुरूप करने के लिए उत्सुक नहीं है, जीवन का सौंदर्य स्वीकार है। क्योंकि जीवन अन्यथा परमात्मा का ही है, अंततः वही छिपा है! उसको ध्यान में रखकर ही चलना उचित है।

जो व्यर्थ है वह छूट जाए। जो सार्थक है वह संभल जाए। जो कूड़ा-करकट है वह अपने आप गिर जाए, जो बहुमूल्य है वह बचा रहे।

भक्ति को अगर तुम ठीक से समझो तो तुम पाओगे धर्म की उतनी सहज, स्वाभाविक और कोई व्यवस्था नहीं है।


आज इतना ही।






 


 "सुबह फूटी तो आसमां पे तेरे

रंगे रूख्सार की फुहार गिरी।'

रात छायी तो रू-ए आलम पर

तेरी जुल्फों की आवशार गिरी।'

उसी की जुल्फें है रात, ढांक लेती है गहरे अंधेरे में तुम्हें। उसी का रंग-रूप है। उसी की बहार है। उसी के गीत हैं! उसी की हरियाली है! उसी का जन्म है, उसकी मृत्यु है। तुमने व्यर्थ ही अपने को बीच में खड़ा कर लिया है।

अपने को बीच में खड़ा करने के कारण परमात्मा खो गया है। और परमात्मा को तुम जब तक न जान लो, तब तक तुम अपनी ही ऊंचाई और गहराई से वंचित रहोगे।

परमात्मा यानी तुम्हारी आखिरी ऊंचाई! परमात्मा यानी तुम्हारी आखिरी गहराई! जब तक तुम उसे न जान लो, तब तक तुम अपनी ही ऊंचाई और गहराई से वंचित रहोगे।

उस मनुष्य से ज्यादा दरिद्र और कोई भी नहीं जिस मनुष्य के जीवन से परमात्मा का भाव खो गया; जिसके जीवन में परमात्मा की तरफ उठने की आकांक्षा खो गयी है। जो आदमी होने से तृप्त हो गया, उस आदमी से दरिद्र और कोई भी नहीं।

"ख्याल जिसमें है, पर तब जमाल का तेरे

उस एक खयाल की रफअत का एक छोटा-सा खयाल भी है, परमात्मा के अनंत सौंदर्य का थोड़ा-सा खयाल भी है...।

"खयाल जिसमें है पर तब जमाल का तेरे

उस एक छोटे-से विचार की रफअत किसी को क्या मालूम!'

उस एक छोटे-से विचार की गहराई किसी को क्या मालूम!

परमात्मा के खयाल की गहराई और ऊंचाई--वही तुम्हारा विस्तार है, विकास है।

इस सदी की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि उसके सौंदर्य का बोध खो गया है। और हम लाख उपाय करते हैं कि सिद्ध करने के कि वह नहीं है। और हमें पता नहीं कि जितना हम सिद्ध कर लेते हैं की वह नहीं है, उतना ही हम अपनी ही ऊंचाइयों और गहराइयों से वंचित हुए जा रहे है।

परमात्मा को भुलाने का अर्थ अपने को भुलाना है। परमात्मा को भूल जाने का अर्थ अपने को भटका लेना है। फिर दिशा खो जाती है। फिर तुम कहीं पहुंचते मालूम नहीं पड़ते। फिर तुम कोल्हू के बैल हो जाते हो, चक्कर लगाते रहते हो।

आंखें खोलो! थोड़ा हृदय को अपने से ऊपर जाने की सुविधा दो। काम को प्रेम बनाओ। प्रेम को भक्ति बनने दो।

परमात्मा से पहले तृप्त होना ही मत।

पीड़ा होगी बहुत। विरह होगा बहुत। बहुत आंसू पड़ेंगे मार्ग से। पर घबड़ाना मत। क्योंकि जो मिलनेवाला है उसका कोई भी मूल्य नहीं है। हम कुछ भी करें, जिस दिन मिलेगा उस दिन हम जानेंगे, जो हमने किया था वह ना-कुछ था।

तुम्हारे एक-एक आंसू पर हजार-हजार फूल खिलेंगे। और तुम्हारी एक-एक पीड़ा हजार-हजार मंदिरों का द्वार बन जाएगी। घबड़ाना मत। जहां भक्तों के पैर पड़ें, वहां काबा बन जाता हैं।

ओशो रजनीश 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...