गुरुवार, 3 जून 2021

कृष्ण का संन्यास, उत्सवपूर्ण संन्यास

 श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।। 1।।


श्रीकृष्ण भगवान बोले, हे अर्जुन, जो पुरुष कर्म के फल को न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है और केवल अग्नि को त्यागने वाला संन्यासी, योगी नहीं है; तथा केवल क्रियाओं को त्यागने वाला भी संन्यासी, योगी नहीं है।



कृष्ण के साथ इस पृथ्वी पर एक नए संन्यास की धारणा का जन्म हुआ। संन्यास सदा से संसार-विमुख धारा थी--संसार के विरोध में, शत्रुता में। जीवन का निषेध, कृष्ण के पहले तक संन्यास की व्याख्या थी; लाइफ निगेटिव था। जो छोड़ दे सब--कर्म को, गृह को, जीवन के सारे रूप को--निष्क्रिय हो जाए, पलायन में चला जाए, हट जाए जीवन से, वैसा ही व्यक्ति संन्यासी था। कृष्ण ने संन्यास को बहुत नया आयाम, एक न्यू डायमेंशन दिया। वह नया आयाम इस सूत्र में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं।

अर्जुन के मन में भी यही खयाल था संन्यास का। अर्जुन भी यही सोचता था कि सब छोड़कर चला जाऊं, तो जीवन संन्यास को उपलब्ध हो जाएगा। अर्जुन भी सोचता था, कर्तव्य छोड़ दूं, करने योग्य है वह छोड़ दूं, कुछ भी न करूं, अक्रिय हो जाऊं, निष्क्रिय हो जाऊं, अकर्म में चला जाऊं, तो संन्यास को उपलब्ध हो जाऊंगा। लेकिन कृष्ण ने उससे इस सूत्र में कहा है, फल की आकांक्षा न करते हुए जो कर्म को करता है, उसे ही मैं संन्यासी कहता हूं। उसे नहीं, जो मात्र कर्म को छोड़ देता है , लेकिन फल की आकांक्षा जिसकी शेष रहती है। जो बाह्य रूपों को छोड़ देता है, लेकिन अंदर जिसका पुराना का पुराना ही बना रह जाता है, उसे मैं संन्यासी नहीं कहता हूं।

तो संन्यास की इस धारणा में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो संन्यास का बहिर रूप है; लेकिन एक संन्यास की अंतरात्मा भी है। पुराना संन्यास बहिर रूप पर बहुत जोर देता था। कृष्ण का संन्यास अंतरात्मा के रूपांतरण पर, इनर ट्रांसफार्मेशन पर जोर देता है।

कर्म को छोड़ना बहुत कठिन नहीं है। आलसी भी कर्म को छोड़कर बैठ जाते हैं। और इसलिए, अगर पुराने संन्यास की धारणा ने आलसियों को आकर्षित किया हो, तो बहुत आश्चर्य नहीं है। और इसलिए, अगर पुराने संन्यास की धारणा को मानने वाले समाज धीरे-धीरे आलसी हो गए हों, तो भी आश्चर्य नहीं है। जो कुछ भी नहीं करना चाहते हैं, उनके लिए पुराने संन्यास में बड़ा रस मालूम होता है। कुछ न करना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।

इस जगत में कोई भी कुछ नहीं करना चाहता है। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जो कुछ करना चाहता है। लेकिन सारे लोग करते हुए दिखाई पड़ते हैं, इसलिए नहीं कि कर्म में बहुत रस है, बल्कि इसलिए कि फल बिना कर्म के नहीं मिलते हैं। हम कुछ चाहते हैं, जो बिना कर्म के नहीं मिलेगा। अगर यह तय हो कि हमें बिना कर्म किए, जो हम चाहते हैं, वह मिल सकता है, तो हम सभी कर्म छोड़ दें, हम सभी संन्यासी हो जाएं! लेकिन चाह पूरी करनी है, तो कर्म करना पड़ता है। यह मजबूरी है, इसलिए हम कर्म करते हैं।

कृष्ण इससे उल्टी बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं, कर्म तो तुम करो और फल की आशा छोड़ दो। हम कर सकते हैं आसानी से, कर्म न करें और फल की आशा करें। जो आसान है, वह यह मालूम पड़ता है कि हम कर्म तो न करें और फल की आशा करें। और अगर कोई फल पूरा कर दे, तो हम कर्म छोड़ने को सदा ही तैयार हैं। कृष्ण इससे ठीक उलटी ही बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि कर्म तो तुम करो ही, फल की आशा छोड़ दो। यह फल की आशा छूट जाए, तो कृष्ण के अर्थों में संन्यास फलित होगा।

फल की आशा के बिना कर्म कौन कर पाएगा? कर्म करेगा ही कोई क्यों? दौड़ते हैं, इसलिए कि कहीं पहुंच जाएं। चलते हैं, इसलिए कि कोई मंजिल मिल जाए। आकांक्षाएं हैं, इसलिए श्रम करते हैं; सपने हैं, इसलिए संघर्ष करते हैं। कुछ पाने को दूर कोई तारा है, इसलिए जन्मों-जन्मों तक यात्रा करते हैं।

वह तारा तोड़ दो। कृष्ण कहते हैं, वह तारा तोड़ दो। नाव तो खेओ जरूर, लेकिन उस तरफ कोई किनारा है, उसका खयाल छोड़ दो। पहुंचना है कहीं, यह बात छोड़ दो; पहुंचने की चेष्टा जारी रखो।

असंभव मालूम पड़ेगा। अति कठिन मालूम पड़ेगा। फिर नाव किसलिए चलानी है, जब कोई तट पर पहुंचना नहीं!

पर कृष्ण बहुत अदभुत बात कहते हैं। वे यह कहते हैं कि नाव चलाने से कोई तट पर नहीं पहुंचता, जन्मों-जन्मों तक चलकर भी कोई मंजिल पर नहीं पहुंचता, आकांक्षाएं करने से कोई आकांक्षाएं पूरी होती नहीं हैं। लेकिन जो आदमी नाव चलाए और किनारे पर पहुंचने का खयाल छोड़ दे, उसे बीच मझधार भी किनारा बन जाती है। और जो आदमी कल की आशा छोड़ दे और आज कर्म करे, कर्म ही उसका फल बन जाता है, कर्म ही उसका रस बन जाता है। फिर कर्म और फल में समय का व्यवधान नहीं होता। फिर अभी कर्म और अभी फल।

संन्यास जीवन का त्याग नहीं है कृष्ण के अर्थों में, जीवन का परम भोग है।

जीवन का रहस्य ही यही है कि हम जिसे पाना चाहते हैं, उसे हम नहीं पा पाते हैं। जिसके पीछे हम दौड़ते हैं, वह हमसे दूर हटता चला जाता है। जिसके लिए हम प्रार्थनाएं करते हैं, वह हमारे हाथ के बाहर हो जाता है। जीवन करीब-करीब ऐसा है, जैसे मैं मुट्ठी में हवा को बांधूं। जितने जोर से कसता हूं मुट्ठी को, हवा उतनी मुट्ठी के बाहर हो जाती है। खुली मुट्ठी में हवा होती है, बंद मुट्ठी में हवा नहीं होती। हालांकि जिसने मुट्ठी बांधी है, उसने हवा बांधने को बांधी है।

जीवन को जो लोग जितनी वासनाओं-आकांक्षाओं में बांधना चाहते हैं, जीवन उतना ही हाथ के बाहर हो जाता है। अंत में सिवाय रिक्तता, फ्रस्टे्रशन, विषाद के कुछ भी हाथ नहीं पड़ता है।

कृष्ण कहते हैं, खुली रखो मुट्ठी; आकांक्षा से बांधो मत, इच्छा से बांधो मत। जीओ, लेकिन किसी आगे भविष्य में कोई फल मिलेगा, इसलिए नहीं। फिर किसलिए? हम पूछना चाहेंगे कि फिर किसलिए जीओ?

कृष्ण कहते हैं, जीना अपने में ही आनंद है।

जीने के लिए कल की इच्छा से बांधना नासमझी है। जीना अपने में ही आनंद है। यह पल भी काफी आनंदपूर्ण है। और तब श्रम ही अपने में आनंद हो जाए, कर्म ही अपने में आनंद हो जाए, तो कुछ आश्चर्य नहीं है।

लेकिन कृष्ण के समय तक सारा संन्यास भगोड़ा, एस्केपिस्ट था, पलायनवादी था। हट जाओ। जहां-जहां दुख है, वहां-वहां से हट जाओ। जहां-जहां पीड़ा है, वहां-वहां से हट जाओ। लेकिन कृष्ण कहते हैं, पीड़ा स्थान की वजह से नहीं है; पीड़ा वासना के कारण है। वही उनकी बुनियादी खोज है।

पीड़ा इसलिए नहीं है कि आप बाजार में बैठे हो; और जंगल में बैठोगे, तो सुख हो जाएगा। अगर आप जिस भांति दुकान पर बैठे हो, उसी भांति मंदिर में बैठ गए, तो कोई सुख न होगा। आप ही तो मंदिर में बैठ जाओगे! आप बाजार में थे; आप ही जंगल में बैठ जाओगे। आपमें कोई फर्क न हुआ, तो जंगल में उतनी ही पीड़ा है, जितनी बाजार में दुकान पर थी।

सवाल यह नहीं है कि जगह बदल ली जाए। जगह का कोई भी संबंध नहीं है। जहां आज आपकी दुकान है, कल कभी वहां जंगल रहा था। और कल कभी कोई संन्यास लेकर उस जंगल में आकर बैठ गया होगा। जगह वही है; अब वहां दुकान है। जहां आज जंगल है, कल दुकान हो जाएगी। जहां आज दुकान है, कल जंगल हो जाएगा। जगहों में कोई अंतर नहीं है। जमीन ने तय नहीं कर रखा है कि कहां जंगल हो और कहां दुकान हो। दुकान तय होती है मन से, स्थान से नहीं। दुकान तय होती है मनःस्थिति से, परिस्थिति से नहीं।

कृष्ण कहते हैं, अगर तुम तुम ही रहे, तो तुम कहीं भी भाग जाओ, दुख तुम्हारे साथ पहुंच जाएगा। वह तुम्हारे भीतर है, वह तुममें है, वह तुम्हारी वासना में है, वह तुम्हारी इच्छा में है। जहां इच्छा है, वहां दुख छाया की तरह पीछा करेगा। इसलिए भागो जंगल में, गुफाओं में, हिमालय पर, कैलाश पर। दुख को तुम पाओगे कि वह तुम्हारे साथ मौजूद है। खोलोगे आंख, पाओगे, सामने खड़ा है। बंद करोगे आंख, पाओगे, भीतर बैठा है।

दुख उस चित्त में निवास करता है, जो वासना में जीता है।

फिर यह भी मजे की बात है कि जो आदमी संसार छोड़कर भागता है, वह भी वासनाएं छोड़कर नहीं भागता। वह भी किसी वासना के लिए संसार छोड़कर भागता है। इस बात को भी थोड़ा ठीक से समझ लेना जरूरी है। वह पाना चाहता होगा मोक्ष, पाना चाहता होगा परमात्मा, पाना चाहता होगा स्वर्ग, पाना चाहता होगा शांति, पाना चाहता होगा आनंद। लेकिन पाना जरूर चाहता है।

नीत्शे ने कहीं बहुत व्यंग्य किया है उन सारे लोगों पर, जो जीवन को छोड़कर भागते हैं। उसने कहा है कि तुम अजीब हो पागल! तुम कहते हो, हम इच्छाओं को छोड़कर भागते हैं, लेकिन मैंने एक भी ऐसा आदमी नहीं देखा जो किसी इच्छा के लिए न भाग रहा हो। यहां इच्छाएं छोड़ता है, वहां इच्छाएं पाने के लिए भागता है! और अगर किसी इच्छा के लिए ही इच्छा छोड़ी गई, तो इच्छा कहां छोड़ी गई है? ऐसे तो कोई भी छोड़ देता है।

एक आदमी को सिनेमा जाना होता है, तो दुकान छोड़कर जाता है। एक आदमी को वेश्या को खरीदना होता है, तो कुछ छोड़कर खरीदना होता है। जीवन की इकॉनामी है। एक ही चीज से आप सब चीजें नहीं खरीद सकते। एक चीज छोड़नी पड़ती है, तो दूसरी चीज खरीद सकते हैं। जीवन का अपना अर्थशास्त्र है।

आपके खीसे में एक रुपया पड़ा हुआ है। रुपया बहुत चीजें खरीद सकता है। जब तक नहीं खरीदा है, तब तक रुपया बहुत चीजें खरीद सकता है। लेकिन जब खरीदने जाएंगे, तो एक ही चीज खरीद सकता है। जब आप एक चीज खरीदेंगे, तो बाकी जो चीजें रुपया खरीद सकता था, उनका त्याग हो गया। अगर आपने एक रुपए से टिकट खरीद ली और रात जाकर सिनेमा में बैठ गए, तो आप एक रुपए से और जो खरीद सकते थे, उस सबका आपने त्याग कर दिया। आप भी त्याग करके वहां गए हैं। हो सकता है, बच्चे को दवा की जरूरत हो, आपने उसका त्याग कर दिया। हो सकता है, पत्नी के तन पर कपड़ा न हो, उसको कपड़े की जरूरत हो, आपने उसका त्याग कर दिया। हो सकता है, आपका खुद का पेट भूखा हो, लेकिन आपने अपनी भूख का त्याग कर दिया।

जगत में जीवन की एक इकॉनामी है, अर्थशास्त्र है। यहां एक इच्छा पूरी करनी हो, तो दूसरी इच्छाएं छोड़नी पड़ती हैं। तो जो आदमी संसार की इच्छाएं छोड़कर जंगल चला जाता है, पूछना जरूरी है, वह क्या पाने वहां जा रहा है? कहेगा, परमात्मा को पाने जा रहा हूं, आत्मा को पाने जा रहा हूं, आनंद को पाने जा रहा हूं। लेकिन इच्छाओं को छोड़कर अगर किसी इच्छा को पाने ही जा रहे हैं, तो आप संन्यासी नहीं हैं।

कृष्ण कहते हैं संन्यासी उसे, जो किसी इच्छा के लिए और इच्छाओं को नहीं छोड़ता, जो इच्छाओं को ही छोड़ देता है। इस फर्क को ठीक से समझ लें। किसी इच्छा के लिए छोड़ना, तो सभी से हो जाता है। नहीं, इच्छाओं को ही छोड़ देता है।

हम कहेंगे कि इच्छा छूटी कि कर्म छूट जाएगा! हम कहेंगे कि इच्छा अगर छूट जाए, तो फिर हम कर्म क्यों करेंगे? यह भी हमारा इच्छा से भरा हुआ मन सवाल उठाता है। क्योंकि हमने बिना इच्छा के कभी कोई कर्म नहीं किया है। लेकिन कृष्ण गहरा जानते हैं। वे जानते हैं कि इच्छा छूट जाए, तो भी कर्म नहीं छूटेगा, सिर्फ गलत कर्म छूट जाएगा। यह दूसरा सूत्र इस सूत्र में समझ लेने जैसा है।

इसलिए वे कहते हैं, जो करने योग्य है, वही कर्म। जैसे ही इच्छा छूटी कि गलत कर्म छूट जाएगा, ठीक कर्म नहीं छूटेगा। क्योंकि ठीक कर्म जीवन से वैसे ही निकलता है, जैसे झरने सागर की तरफ बहते हैं। ठीक कर्म जीवन में वैसे ही खिलता है, जैसे वृक्षों में फूल खिलते हैं। ठीक कर्म जीवन का स्वभाव है।

गलत कर्म जीवन का स्वभाव नहीं है। इच्छाओं के कारण गलत कर्म जीवन करने को मजबूर होता है। जो आदमी चोरी करता है, वह भी ऐसा अनुभव नहीं करता कि मैं चोर हूं। बड़े से बड़ा चोर भी ऐसा ही अनुभव करता है कि मजबूरी में मैंने चोरी की है; मैं चोर नहीं हूं। बड़े से बड़ा चोर भी ऐसा ही अनुभव करता है कि ऐसा दबाव था परिस्थिति का कि मुझे चोरी करनी पड़ी है, वैसे मैं चोर नहीं हूं। बुरे से बुरा कर्म करने वाला भी ऐसा नहीं मानता कि मैं बुरा हूं। वह ऐसा ही मानता है, एक्सिडेंट है बुरा कर्म।

आज तक पृथ्वी पर ऐसा एक भी आदमी नहीं हुआ, जिसने कहा हो कि मैं बुरा आदमी हूं। वह इतना ही कहता है, आदमी तो मैं अच्छा हूं, लेकिन दुर्भाग्य कि परिस्थितियों ने मुझे बुरा करने को मजबूर कर दिया।

लेकिन परिस्थितियां! उसी परिस्थिति में बुद्ध भी पैदा हो जाते हैं; उसी परिस्थिति में एक डाकू भी पैदा हो जाता है; उसी परिस्थिति में एक हत्यारा भी पैदा हो जाता है। एक ही घर में भी तीन लोग तीन तरह के पैदा हो जाते हैं। बिलकुल एक-सी परिस्थिति भी एक-से आदमी पैदा नहीं कर पाती।

परिस्थिति भेद कम डालती है; इच्छाएं भेद ज्यादा डालती हैं।

इच्छाएं इतनी मजबूत हों, तो हम सोचते हैं कि एक इच्छा पूरी होती है, थोड़ा-सा बुरा भी करना हो, तो कर लो। इच्छा की गहरी पकड़ बुरा करने के लिए राजी करवा लेती है। बुरा काम भी कोई आदमी किसी अच्छी इच्छा को पूरा करने के लिए करता है। बुरा काम भी किसी अच्छी इच्छा को पूरा करने के लिए अपने मन को समझा लेता है कि इच्छा इतनी अच्छी है, साध्य इतना अच्छा है, इसलिए अगर थोड़े गलत मार्ग भी पकड़े गए, तो बुरा नहीं है। और ऐसा नहीं है कि छोटे-छोटे साधारणजन ऐसा सोचते हैं, बड़े बुद्धिमान कहे जाने वाले लोग भी ऐसा ही सोचते हैं। माक्र्स या लेनिन जैसे लोग भी ऐसा ही सोचते हैं कि अगर अच्छे अंत के लिए बुरा साधन उपयोग में लाया जाए, तो कोई हर्जा नहीं है; ठीक है। लेकिन हम जो करना चाहते हैं, वह तो अच्छा ही करना चाहते हैं।

बुरे से बुरे आदमी की भी तर्क-शैली यही है कि जो मैं करना चाहता हूं, वह तो अच्छा ही है। अगर मैं एक मकान बना लेना चाहता हूं और उसकी छाया में दोपहर विश्राम करना चाहता हूं, तो बुरा क्या है! सहज, स्वाभाविक, मानवीय है। फिर इसके लिए थोड़ी कालाबाजारी करनी पड़ती है, थोड़ी चोरी करनी पड़ती है, थोड़ी रिश्वत देनी पड़ती है, वह मैं दे लेता हूं। क्योंकि उसके बिना यह नहीं हो सकेगा।

कृष्ण कहते हैं कि जिस आदमी की इच्छाएं छूट जाएं, उस आदमी के बुरे कर्म तत्काल छूट जाते हैं। लेकिन अच्छे कर्म नहीं छूटते।

अच्छा कर्म वही है--उसकी परिभाषा अगर मैं देना चाहूं, तो ऐसी देना पसंद करूंगा--अच्छा कर्म वही है, जो बिना इच्छा के भी चल सके। और बुरा कर्म वही है, जो इच्छा के पैरों के बिना न चल सके। जिस कर्म को चलाने के लिए इच्छा जरूरी हो, वह बुरा है; और जिस कर्म को चलाने के लिए इच्छा बिलकुल भी गैर-जरूरी हो, वह कर्म अच्छा है। अच्छे का एक ही अर्थ है, जीवन के स्वभाव से निकले, जीवन से निकले।

कृष्ण कहते हैं, अगर इच्छाएं छोड़ दे कोई और सिर्फ कर्म करे, तो उसे मैं संन्यासी कहता हूं।

यह बड़ी इसोटेरिक, बड़ी गुह्य व्याख्या है। साधारणतः यही दिखाई पड़ता है संन्यासी और गृहस्थ का फर्क कि गृहस्थ वह है जो घर में रहे, संन्यासी वह है जो घर छोड़ दे। कृष्ण की परिभाषा में उलटा भी हो सकता है। घर में रहने वाला भी संन्यासी हो सकता है, घर छोड़ने वाला भी गृहस्थ हो सकता है।

कृष्ण की परिभाषा थोड़ी गहन है। अगर कोई आदमी घर छोड़ दे, किसी इच्छा के लिए, तो वह गृहस्थ है। और अगर कोई आदमी घर में चुपचाप रहा आए बिना किसी इच्छा के, तो वह संन्यासी है। अगर कोई आदमी अपने घर में बिना इच्छाओं के जीने लगे, तो घर आश्रम हो गया। और अगर कोई आदमी आश्रम में जाकर नई इच्छाओं के आस-पास जाल बुनने लगे, तो वह घर हो गया।

ऐसा संन्यासी आपने देखा है, जिसकी इच्छा न हो? अगर ऐसा संन्यासी नहीं देखा जिसकी इच्छा न हो, तो समझना कि आपने संन्यासी ही नहीं देखा है।

आदमी का मन, बहुत रूपों में अपने को बचाने में कुशल है। सब तरफ से अपने को बचाने में कुशल है। विपरीत स्थितियों में भी अपने को बचा लेता है। जंगल में भी बैठ जाएं, तो वहां भी इच्छा के जाल बुनता रहता है। मंदिर में, तीर्थ में भी बैठकर इच्छाओं के जाल बुनता रहता है। मन का काम ही इच्छाओं के जाल निर्मित करना है।

अगर हम ऐसा कहें कि मन ऐसा वृक्ष है, जिस पर इच्छाओं के पत्ते लगते हैं, लगते ही चले जाते हैं। एक पत्ता कुम्हलाया, गिरा नहीं कि नए पत्ते के पीके निकलने शुरू हो गए, अंकुरित होने लगे। अगर और गहरे में देखें, तो पुराना पत्ता गिरता तभी है, जब उसके नीचे से नया पत्ता उसे गिराने के लिए धक्के देने लगता है। एक इच्छा छूटती तभी है, जब दूसरी इच्छा जगह बनाने के लिए मांग करती है कि मुझे जगह खाली करो। एक इच्छा हटती तभी है, जब उससे भी प्रबल इच्छा धक्के देकर जगह बनाती है। मन में इच्छाएं निर्मित होती चली जाती हैं।

कृष्ण कहते हैं, इच्छाएं न हों, तो संन्यासी हो जाएगा। मैं आपसे कहता हूं, जिसमें इच्छाएं न रहीं, उसमें मन भी न रहा। क्योंकि मन और इच्छाएं एक ही चीज का नाम है। मन समस्त इच्छाओं का जोड़ है, समस्त कामनाओं का जोड़, समस्त तृष्णाओं का जोड़। अगर इच्छाएं न रही, तो मन न रहा।

कृष्ण कहते हैं, जिसके पास मन न रहा, वह संन्यासी है। कर्म न रहा, नहीं; मन न रहा, वह संन्यासी है।

बुरे कर्म तो गिर जाएंगे, क्योंकि बुरे कर्म बिना इच्छाओं के कोई भी नहीं कर सकता।

इसमें एक बहुत गहन आस्था भी प्रकट की गई है।

कृष्ण की मनुष्य पर निष्ठा अपरिसीम है। इतनी निष्ठा शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति की पृथ्वी पर कभी रही हो। जो आदमी भी मानता है कि तुम्हें अच्छा होना पड़ेगा, उस आदमी की आदमी पर बहुत निष्ठा नहीं है। कृष्ण की निष्ठा है कि आदमी तो अच्छा है, सिर्फ मन मौजूद न हो, तो आदमी की अच्छाई में कोई कमी ही नहीं है। वह अच्छा है ही। वह स्वभावतः अच्छा है। वह शुभ है। इतनी ही शर्त काफी है कि वह इच्छाएं छोड़ दे और उसके भीतर शुभ का जन्म हो जाएगा। वह बिलकुल शुद्ध, पवित्रतम, निर्दोष, निष्कलंक प्रकट हो जाएगा। उसकी इनोसेंस, उसका निर्दोषपन जाहिर हो जाएगा।

जैसे दर्पण पर धूल जम गई हो और धूल को किसी ने पोंछ दिया हो और दर्पण शुद्ध हो जाए। लेकिन क्या आप कहेंगे कि जब दर्पण पर धूल थी, तब दर्पण अशुद्ध हो गया था? आपको तस्वीर नहीं दिखाई पड़ती थी, यह बात दूसरी है। लेकिन दर्पण तब भी अशुद्ध नहीं हो गया था। दर्पण तब भी पूरा ही दर्पण था। सिर्फ धूल की एक पर्त थी कि तस्वीर दिखाई नहीं पड़ती थी। दर्पण में धूल कहीं घुस नहीं गई थी, प्रवेश नहीं कर गई थी, बाहर ही बाहर थी। फूंक मार दी, झाड़ दी। धूल हट गई, दर्पण साफ हो गया।

कृष्ण की दृष्टि में आदमी दर्पण की तरह शुद्ध है। इच्छाएं करता है, तो धूल इकट्ठी कर लेता है चारों तरफ, इच्छाओं के कण इकट्ठे कर लेता है।

अभी पश्चिम में इस बात पर काफी चिंतन-मनन चलता है कि जब आदमी इच्छाएं करता है, तो क्या उसके मन में कोई अंतर पड़ता है इच्छाओं के करने से? जब एक आदमी क्रोध से भरता है, तब उसके पास वही मन रहता है, जो क्रोध करने के पहले था? जब एक आदमी क्षमा से भरता है, तब उसके पास वही मन रहता है, जो क्रोध के वक्त था?

तो अब मनोविज्ञान कहता है कि मन तो वही रहता है, लेकिन मन के आस-पास की चीजें बदल जाती हैं। जब आदमी क्रोध से भरता है, तो शरीर की ग्रंथियां ऐसे जहर को छोड़ देती हैं, जो मन को चारों तरफ से घेर लेता है, पायजनस कर देता है, जैसे दर्पण को धूल घेर ले। और जब आदमी प्रेम से भरता है, तो उसकी रस-ग्रंथियां उसके सारे शरीर से उस अमृत को छोड़ देती हैं; तब भी मन वही रहता है, लेकिन उसके चारों तरफ रस की धार बहने लगती है--उसी आदमी के पास।

कृष्ण और भी गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि आदमी की चेतना तो निर्दोष है ही। बस, तुमने चाहा कि दोष इकट्ठे होने शुरू हुए। वे भी बाहर ही इकट्ठे होते हैं, भीतर प्रवेश नहीं करते। एक क्षण को भी कोई इच्छाएं छोड़ दे, तो वे सारे दोष गिर जाते हैं। और तब बुरा कर्म असंभव हो जाता है। लेकिन शुभ कर्म जारी रहता है। सच तो यह है कि जो शक्ति हमारे बुरे कर्म में लगती है, वह सारी शक्ति बच जाती है और शुभ कर्म में समायोजित हो जाती है।

कृष्ण के लिए, कर्म इच्छाओं के कारण से नहीं होते; कर्म जीवन के स्वभाव की स्फुरणा है; जीवन की एनर्जी से होते हैं। जहां शक्ति है, वहां कर्म आएगा। क्योंकि शक्ति कर्म में प्रकट होना चाहती है।

यह परमात्मा इतने बड़े विराट जगत में प्रकट होता है, यह उसकी ऊर्जा है, शक्ति है, जो प्रकट होना चाहती है। जमीन से एक पत्थर हटा लिया और एक फव्वारा फूटने लगा। यह फव्वारा कहीं जाने को नहीं फूट रहा है। इसके भीतर ऊर्जा है, वह प्रकट होना चाहती है।

आदमी की अगर इच्छाएं गिर जाएं, तो उसके जीवन की पूरी ऊर्जा शुभ में प्रकट होना चाहती है। इच्छाओं रहित चेतना शुभ की ऊर्जा को प्रकट करने लगती है।

तो कृष्ण कहते हैं, बुरे कर्म गिर जाएंगे। जो करने योग्य है, वही किया जा सकेगा। इसको ही मैं संन्यास कहता हूं। उसको नहीं कि जिसने अग्नि छोड़ दी।

उन दिनों अग्नि को छोड़ना बहुत बड़ी घटना थी। इसको थोड़ा खयाल में ले लें। यह सूत्र जब कहा गया, तब अग्नि को छोड़ना बहुत बड़ी घटना थी। आज हमारे मन में खयाल आएगा कि यह क्या बात कहते हैं कृष्ण कि जिसने अग्नि छोड़ दी! आज हमारे लिए अग्नि उतनी बड़ी घटना नहीं है। लेकिन जिस दिन यह बात कही गई थी, उस दिन अग्नि उतनी ही बड़ी घटना थी, जितनी अगर हम आज सोचना चाहें, तो सिर्फ एक ही बात खयाल में आ सकती है। जैसे आज अगर हम कहें कि जिस व्यक्ति ने यंत्रों का उपयोग छोड़ दिया! आज अगर पैरेलल, समानांतर कोई बात कहना चाहें; अगर आज हम कहें कि जिस व्यक्ति ने यंत्रों का उपयोग छोड़ दिया!

तो आप सोचें कि यंत्र के उपयोग छोड़ने में करीब-करीब जीवन का सब कुछ छूट जाएगा। क्योंकि आज जीवन को यंत्र ने सब तरफ से घेर लिया है। वह आदमी ट्रेन में नहीं बैठ सकेगा। वह आदमी माइक से नहीं बोल सकेगा। वह आदमी चश्मा नहीं लगा सकेगा। वह आदमी कपड़ा नहीं पहन सकेगा। सब यंत्र पर निर्भर है। वह आदमी फाउंटेनपेन से नहीं लिख सकेगा। वह आदमी जाकर नाई से बाल नहीं बनवा सकेगा। थोड़ा सोचें कि जिस आदमी ने यंत्र का उपयोग छोड़ दिया, उसके जीवन में क्या बच रहेगा? कुछ नहीं बच रहेगा।

उस दिन अग्नि इतनी ही बड़ी घटना थी। तो उस दिन कृष्ण कहते हैं कि जिसने अग्नि छोड़ दी। उस दिन सब कुछ अग्नि पर निर्भर था: भोजन, जीवन की सुरक्षा, जीवन की व्यवस्था। अग्नि बहुत बड़ी घटना थी। जब तक अग्नि नहीं थी आदमी के पास, तब तक आदमी इतना असुरक्षित था, कहना चाहिए, सभ्य नहीं था। आदमी सभ्य हुआ अग्नि के साथ।

अग्नि नहीं थी, तो मांसाहार भोजन के अतिरिक्त और कोई उपाय न था। या कच्चे फल खा लेता, या मांस खा लेता। अग्नि थी, तो भोजन पकाकर उसने खाना शुरू किया। अग्नि नहीं थी, तो दिनभर ही घूम-फिर सकता था। रात होते ही खतरे में पड़ जाता था। चारों तरफ जंगली जानवर थे, उनका भय था। रातभर आधे लोगों को पहरा देना पड़ता, आधे लोग सोते। तब भी खतरा हमेशा मौजूद रहता। सभ्य होने का मौका नहीं था। खाना और रात सो लेना, दो काम जीवन की सारी ऊर्जा ले लेते थे। अग्नि ने आकर बड़ा उपाय कर दिया। अग्नि ने सुरक्षा दे दी। जंगल का आदमी चारों तरफ अग्नि जलाकर बीच में आराम से सोने लगा। अग्नि पहला देवता था, आदमी को सभ्य करने वाला। सभ्यता आई अग्नि के साथ।

तो जिस दिन यह सूत्र कहा गया, उस दिन अग्नि ने जीवन को चारों तरफ से इसी तरह सिविलाइज किया था, सभ्य किया था, जैसे आज यंत्रों ने किया हुआ है।

अग्नि छोड़ दे जो उस दिन, उसका सब छूट जाता था। सब! उसके हाथ में कुछ बचता नहीं था। वह सभ्य जीवन से हट जाता था। वह असभ्य जीवन की ओर, वन की ओर, अरण्य की ओर हट जाता था। वह उसी दुनिया में लौट जाता, जहां अग्नि के पहले आदमी रहता था, गुफाओं में। हाथ से खाना नहीं पकाता था। आग जलाकर ठंड से अपने को नहीं बचाता था। वह वहां लौट जाता था। अग्नि छोड़ने का अर्थ यह है, गुफा-मानव की ओर वापस लौट जाए कोई।

तो भी कृष्ण कहते हैं, वह संन्यासी नहीं है। क्योंकि अगर यह कृत्य भी किसी वासना से प्रेरित होकर हो रहा है, तो संन्यास नहीं है।

कृष्ण कहते हैं, वासनाशून्य कृत्य। कोई भी कृत्य वासना से शून्य हो जाए, फिर चाहे वह कृत्य कितना ही बड़ा हो। अर्जुन युद्ध में जाने को खड़ा है। कृष्ण कहते हैं, तू युद्ध में जा। अगर फल की आकांक्षा छोड़कर जा सके, तो यह युद्ध भी संन्यास है। फिर कोई हर्ज नहीं है।

अजीब बात कहते हैं! जो आदमी सब कुछ छोड़कर जंगल की गुफा में चला जाए, उसे कहते हैं, वह भी संन्यास नहीं। अर्जुन जो युद्ध में खड़ा है, युद्ध में लड़े, उससे कहते हैं, यह भी संन्यास है!

कृष्ण का यह वक्तव्य बहुत सोचने जैसा है। सैद्धांतिक अर्थों में उतना मूल्यवान नहीं, जितना व्यावहारिक अर्थों में मूल्यवान है। अगर भविष्य में इस पृथ्वी पर कोई भी संन्यास बचेगा, तो वह कृष्ण का संन्यास बच सकता है, और कोई संन्यास बच नहीं सकता है। क्योंकि अगर आज कोई मान ले पुराने संन्यास की धारणा को; पृथ्वी पर साढ़े तीन अरब लोग हैं, अगर ये छोड़कर जंगल में चले जाएं, तो जंगल में सिर्फ मेला भर जाएगा, और कुछ भी नहीं होगा! ये जहां जाएंगे, वहीं जंगल नहीं रहेगा। ये कहीं भी चले जाएं, ये जहां जाएंगे, वहीं जंगल सपाट हो जाएगा।

यह आठ अरब लोगों की पृथ्वी, जो रोज बढ़ती जा रही है। इस सदी के पूरे होते-होते और एक अरब संख्या बढ़ जाएगी। और वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर सौ वर्ष इसी तरह संख्या बढ़ती रही, तो आदमी को कोहनी हिलाने की जगह नहीं बचेगी। सब जगह, जहां भी जाएगा, कोई हाथ चारों तरफ लगा रहेगा। अब भागकर आप नहीं जा सकेंगे।

तो फिर क्या होगा संन्यास का? पुराना गुहा वाला संन्यास तो फिर नहीं हो सकेगा। तो फिर इस पृथ्वी पर संन्यास ही नहीं होगा? तब जो जीवन का एक बहुत अमृत-फूल नष्ट हो जाएगा। तब तो जीवन की एक बहुत अदभुत सुगंध--क्योंकि जिसने संन्यास नहीं जाना, उसने जीवन नहीं जाना--वह नष्ट हो जाएगा, वह खो जाएगा। कृष्ण का संन्यास बच सकता है।

इसलिए मुझे कई बार लगता है कि गीता भविष्य के लिए बहुत सार्थक होती चली जाएगी। उसकी दृष्टि भविष्य के लिए रोज अनुकूल पड़ती चली जाएगी। कृष्ण रोज करीब आते चले जाएंगे। क्योंकि वे गहरी बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं, कहीं कोई जाने की जरूरत नहीं है। जहां हो वहीं, सिर्फ एक शर्त पूरी करो और तुम गृहस्थ न रह जाओगे। एक शर्त पूरी करो, और तुम संन्यासी हो जाओगे। और वह शर्त है कि तुम वासना मत करो, फल की आकांक्षा मत करो।

कठिन होगा समझना कि फल की आकांक्षा कैसे न करें! चौबीस घंटे के लिए प्रयोग करके देखें, तो खयाल में आ जाएगा, अन्यथा शायद जीवनभर समझने से खयाल में न आ सके।

कुछ चीजें हैं इस जीवन में, जो प्रयोग करने से तत्काल समझ में आ जाती हैं। मुंह पर कोई शक्कर का एक टुकड़ा रख दे, और तत्काल समझ में आता है कि स्वाद क्या है। एक जरा-सा टुकड़ा, एक क्षण की भी देर नहीं लगती, पूरा शरीर खबर देता है कि क्या है। और जिस आदमी ने नहीं स्वाद लिया हो, उसे हम पूरे के पूरे जीवनभर समझाते रहें कि स्वाद क्या है; वह कहेगा, आप कहते हैं, सब ठीक है। लेकिन फिर भी स्वाद क्या है, अभी समझ में नहीं आया। उसमें समझ की कोई गलती नहीं है। समझ का काम ही नहीं है; अनुभव का काम है। कुछ बातें हैं, जो समझ से समझ में आती हैं। बेकार बातें समझने से समझ में आ जाती हैं। गहरी और काम की बातें सिर्फ अनुभव से समझ में आती हैं, समझने से समझ में नहीं आतीं।

कृष्ण कहते हैं, फल की आकांक्षा छोड़ दो।

हजारों साल से हम सुन रहे हैं। गीता इतनी परिचित है, जितनी और कोई किताब परिचित नहीं है।  गीता के संबंध में बड़ा भ्रम हो गया है कि परिचित है। पढ़ ली, तो हम सोचते हैं, परिचित है। गीता से ज्यादा अपरिचित किताब मुश्किल है। एक अर्थ में ठीक है कि परिचित है। सभी लोगों के घरों में रखी  है। सभी लोगों को पता है कि गीता में क्या लिखा है।

काश, सभी लोगों को पता होता, तो यह दुनिया बिलकुल दूसरी हो सकती थी! नहीं, पता नहीं है। शब्द पता हैं। शायद अर्थ भी पता है, क्योंकि अर्थ शब्दकोश में मिल जाता है। अभिप्राय पता नहीं है, क्या प्रयोजन है!

ये कृष्ण कहते हैं कि तू फल कि आकांक्षा छोड़ दे और कर्म कर।

 एक चौबीस घंटे के लिए--दुनिया नष्ट नहीं हो जाएगी--एक दिन प्रयोग कर लें। सुबह छः बजे से दूसरे दिन सुबह छः बजे तक फल की आकांक्षा छोड़ दें और कर्म करें। और आपकी जीभ पर स्वाद आ जाएगा। और आपको पता चलेगा कि कर्म हो सकता है, फल की आकांक्षा के बिना भी। और पहली दफे आपके जीवन में ऐसा कर्म होगा, जिसको हम टोटल एक्ट, पूर्ण कर्म कह सकते हैं। क्योंकि मन कहीं नहीं दौड़ेगा; फल की कोई आकांक्षा नहीं है। और एक बार आपको स्वाद आ जाए, तो मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि वे चौबीस घंटे फिर कभी खतम नहीं होंगे। छः बजे शुरू जरूर होगी यात्रा, लेकिन दूसरे छः फिर कभी नहीं बजेंगे।

एक बार स्वाद आ जाए, तो आपको पता चले कि इतने निकट जीवन के, इतना बड़ा सागर था आनंद का, हमने कभी नजर न की; हम चूकते ही चले गए। हमारी गर्दन ही तिरछी हो गई है। हम भागते ही चले जाते हैं। बस, चूकते चले जाते हैं। देख ही नहीं पाते कि किनारे कोई एक और स्वाद भी है जीवन का। कभी-कभी उसकी झलक मिलती है किन्हीं कृत्यों में।

कभी आप अपने बच्चे के साथ खेल रहे हैं, कोई फल की आकांक्षा नहीं होती। कभी आपने खयाल किया है कि बच्चे के साथ खेलने में कैसा आह्लाद! हां, अगर बड़े के साथ खेल रहे हैं, तो उतना आह्लाद नहीं होगा, क्योंकि बड़े के साथ खेल भी काम बन जाता है। बाजी! हार-जीत शुरू हो जाती है। फल की आकांक्षा आ जाती है। बाप अपने छोटे-से बेटे के साथ खेल रहा है। कभी आपने किसी बाप को अपने छोटे बेटे के साथ खेलते देखा? वैसे यह घटना दुर्लभ होती जा रही है।

बाप अपने छोटे बेटे के साथ खेल रहा है। हराने का कोई सवाल नहीं उठता। हराने का खयाल भी नहीं उठता। हां, खेल में हार जाने का मजा जरूर वह लेता है। जमीन पर लेट गया है, बेटे को छाती पर बिठा लिया है। बेटा नाच रहा है खुश होकर; बाप को उसने हरा दिया है!

सभी बेटे बाप को हराना चाहते हैं। और जो बाप जिद्द करते हैं, वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। और जो बाप होशियार हैं, वे खुद जमीन पर लेट जाते हैं और हार जाते हैं। और उनके बच्चे बाद में पछताते हैं कि बाप ने बहुत गहरी मजाक कर दी। लेकिन तब कोई आकांक्षा नहीं है, सिर्फ उस छोटे-से खेल में सब समा गया है।

मेरे एक मित्र जापान के एक घर में मेहमान थे। सुबह घर के बच्चों ने उनको आकर खबर दी कि हमारे घर में विवाह हो रहा है, आप शाम सम्मिलित हों। उन्हें थोड़ी हैरानी हुई, क्योंकि बहुत छोटे बच्चे थे। तो उन्होंने सोचा कि कुछ गुड्डा-गुड्डी का विवाह करते होंगे। उन्होंने कहा, मैं जरूर सम्मिलित होऊंगा। लेकिन सांझ के पहले घर के बड़े-बूढ़ों ने भी आकर निमंत्रण दिया कि घर में विवाह है, आप सम्मिलित हों। तब वे समझे कि मुझसे भूल हो गई।

लेकिन जब सांझ को घर के हाल में गए, जहां कि सब बैंड-बाजा सजा था, तो देखा कि वहां दूल्हा तो नहीं है। वहां तो गुड्डा ही रखा है और बारात तैयार हो रही है! गांव के आस-पास के बूढ़े भी इकट्ठे हुए हैं; बारात बाहर निकल आई है। तब उन्होंने एक बूढ़े से पूछा कि यह क्या मामला है? मैं तो सोचता था कि बच्चों के खेल बच्चों के लिए शोभा देते हैं, आप लोग इसमें सब सम्मिलित हैं!

तो उस बूढ़े ने हंसकर कहा कि अब हमें बड़ों के खेल भी बच्चों के खेल ही मालूम पड़ते हैं। बड़ों के खेल भी! अब तो जब असली दूल्हा भी बारात लेकर चलता है, तब भी हम जानते हैं कि खेल ही है। तो इस खेल में गंभीरता से सम्मिलित होने में हमें कोई हर्ज नहीं है। दोनों बराबर हैं।

गांव के बूढ़े भी सम्मिलित हुए हैं। मेरे मित्र तो परेशान ही रहे। सोचा कि सांझ खराब हो गई। मैंने उनसे पूछा कि आप करते क्या सांझ को, अगर खराब न होती तो? रेडियो खोलकर सुनते, सिनेमा देखते, राजनीति की चर्चा करते? सुबह जो अखबार में पढ़ा था, उसकी जुगाली करते? क्या करते? करते क्या? कहा, नहीं, करता तो कुछ नहीं। तो फिर मैंने कहा कि बेकार चली गई, यह खयाल कैसे पैदा हो रहा है? बेकार जरूर चली गई, क्योंकि उस घंटेभर में आपको एक मौका मिला था, जब कि आकांक्षा फल की कोई भी न थी, तब आपको एक खेल में सम्मिलित होने का मौका मिला था, वह आप चूक गए। मैंने कहा, दोबारा जाना। कोई निमंत्रण न भी दे, तो भी सम्मिलित हो जाना। और उस घंटेभर इस बारात को आनंद से जीना, तो शायद एक क्षण में वह दिखाई पड़े, जो कि फलहीन कर्म है।

खेल में कभी फलहीन कर्म की थोड़ी-सी झलक मिलती है। लेकिन नहीं मिलती है, हमने खेलों को नष्ट कर दिया है। हमने खेलों को भी काम बना दिया है। उनमें भी हम तनाव से भर जाते हैं। जीतने की आकांक्षा इतनी प्रबल हो जाती है कि खेल का सब मजा ही नष्ट हो जाता है।

नहीं, कभी चौबीस घंटे एक प्रयोग करके देखें, और वह प्रयोग आपकी जिंदगी के लिए कीमती होगा। उस प्रयोग को करने के पहले इस सूत्र को पढ़ें, फिर प्रयोग को करने के बाद इस सूत्र को पढ़ें, तब आपको पता चलेगा कि कृष्ण क्या कह रहे हैं। और एक काम भी अगर आप फल के बिना करने में समर्थ हो जाएं, तो आपकी पूरी जिंदगी पर फलाकांक्षाहीन कर्मों का विस्तार हो जाएगा। वही विस्तार संन्यास है।

होगा क्या? अगर आप फल की आकांक्षा न करें, तो क्या बनेगा, क्या मिट जाएगा?

नहीं, प्रत्येक को ऐसा लगता है कि सारी पृथ्वी उसी पर ठहरी हुई है! अगर उसने कहीं फल की आकांक्षा न की, तो कहीं ऐसा न हो कि सारा आकाश गिर जाए। छिपकली भी घर में ऐसा ही सोचती है मकान पर टंगी हुई कि सारा मकान उस पर सम्हला हुआ है। अगर वह कहीं जरा हट गई, तो कहीं पूरा मकान न गिर जाए!

हम भी वैसा ही सोचते हैं। हमसे पहले भी इस जमीन पर अरबों लोग रह चुके और इसी तरह सोच-सोचकर मर गए। न उनके कर्मों का कोई पता है, न उनके फलों का आज कोई पता है। न उनकी हार का कोई अर्थ है, न उनकी जीत का कोई प्रयोजन है। सब मिट्टी में खो जाते हैं। लेकिन थोड़ी देर मिट्टी बहुत पागलपन कर लेती है। थोड़ी देर बहुत उछल-कूद; जैसे लहर उठती है सागर में, थोड़ी देर बहुत उछल-कूद; उछल-कूद हो भी नहीं पाती कि गिर जाती है वापस। ऐसे ही हम हैं।

कृष्ण कहते हैं कि जानो तुम कि जिस परमात्मा ने तुम्हें पैदा किया या जिस परमात्मा की तुम एक लहर हो, जिसने तुम्हें जीवन की ऊर्जा दी, वही तुमसे कर्म करवाता रहा है, वही तुमसे कर्म करवाता रहेगा। तुम जल्दी मत करो। तुम अपने सिर पर व्यर्थ का बोझ मत लो। तुम उसी पर छोड़ दो। तुम इसकी भी फिक्र छोड़ दो कि कल क्या होगा! जो होगा कल, वह कल देख लेंगे। जो आज हो रहा है, तुम उसमें राजी रहो। तुम अपने को पूरा छोड़ दो। जैसे कोई पानी में अपने को छोड़ दे और बह जाए। तैरे नहीं, बह जाए; जस्ट फ्लोटिंग। तैरने का भी श्रम मत करो। बस, बह जाओ। जीवन तुम्हें जो दे, उसमें चुपचाप बह जाओ। कोई आकांक्षा कल की मत बांधो, कोई फल निश्चित मत करो, कोई कर्म की नियति मत बांधो, वह प्रभु पर छोड़ दो। वह उस पर छोड़ दो, जो समग्र को जी रहा है। और ऐसा करते ही व्यक्ति संन्यासी हो जाता है।

संन्यासी वह है, जिसने कहा कि कर्म मैं करूंगा, फल तेरे हाथ। संन्यासी वह है, जिसने कहा कि शक्ति तूने मुझे दी है, तो काम करवा ले। न मुझे कल का पता है, न मुझे बीते कल का कोई पता है। न मुझे यह भी पता है कि क्या मेरे हित में है और क्या मेरे अहित में है। मुझे कुछ भी पता नहीं है। बाकी तू सम्हाल। जिसने जीवन की परम सत्ता को कहा कि सब तू सम्हाल; मुझमें जो ऊर्जा है, उससे जो काम लेना है, वह काम ले ले। काम मैं करूंगा, फल की बातचीत मुझसे मत कर। ऐसा व्यक्ति संन्यासी है। सच, ऐसा ही व्यक्ति संन्यासी है।

संन्यास का अर्थ ही यही है कि जिसने अपनी अस्मिता का बोझ अलग कर दिया, जिसने अपने अहंकार का बोझ अलग रख दिया, जिसने कहा कि अब समर्पित हूं। समर्पण संन्यास है।

समर्पित व्यक्ति फल की आकांक्षा नहीं करता। क्योंकि हम जानते ही नहीं कि क्या ठीक है और क्या गलत है। क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए, यह भी हमें पता नहीं है।

एक अरेबिक कहावत है कि अगर परमात्मा सबकी आकांक्षाएं पूरी कर दे, तो लोग इतने दुख में पड़ जाएं, जिसका कोई हिसाब नहीं। उस कहावत के पीछे फिर बाद में एक सूफी कहानी वहां प्रचलित हुई, वह मैं आपसे कहूं, फिर हम दूसरे सूत्र पर बात करें।

सुना है मैंने, एक आदमी ने यह कहावत पढ़ ली कि परमात्मा आकांक्षाएं पूरी कर दे आदमियों की, तो आदमी बड़ी मुसीबत में पड़ जाएं। उसकी बड़ी कृपा है कि वह आपकी आकांक्षाएं पूरी नहीं करता। क्योंकि अज्ञान में की गई आकांक्षाएं खतरे में ही ले जा सकती हैं। उस आदमी ने कहा, यह मैं नहीं मान सकता हूं। उसने परमात्मा की बड़ी पूजा, बड़ी प्रार्थना की। और जब परमात्मा ने आवाज दी कि तू इतनी पूजा-प्रार्थना किसलिए कर रहा है? तो उसने कहा कि मैं इस कहावत की परीक्षा करना चाहता हूं। तो आप मुझे वरदान दें और मैं आकांक्षाएं पूरी करवाऊंगा; और मैं सिद्ध करना चाहता हूं, यह कहावत गलत है।

परमात्मा ने कहा कि तू कोई भी तीन इच्छाएं मांग ले, मैं पूरी कर देता हूं। उस आदमी ने कहा कि ठीक। पहले मैं घर जाऊं, अपनी पत्नी से सलाह कर लूं।

अभी तक उसने सोचा नहीं था कि क्या मांगेगा, क्योंकि उसे भरोसा ही नहीं था कि यह होने वाला है कि परमात्मा आकर कहेगा। आप भी होते, तो भरोसा नहीं होता कि परमात्मा आकर कहेगा। जितने लोग मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं, किसी को भरोसा नहीं होता। कर लेते हैं। शायद! परहेप्स! लेकिन शायद मौजूद रहता है।

तय नहीं किया था; बहुत घबड़ा गया। भागा हुआ पत्नी के पास आया। पत्नी से बोल कि कुछ चाहिए हो तो बोल। एक इच्छा तेरी पूरी करवा देता हूं। जिंदगीभर तेरा मैं कुछ पूरा नहीं करवा पाया। पत्नी ने कहा कि घर में कोई कड़ाही नहीं है। उसे कुछ पता नहीं था कि क्या मामला है। घर में कड़ाही नहीं है; कितने दिन से कह रही हूं। एक कड़ाही हाजिर हो गई। वह आदमी घबड़ाया। उसने सिर पीट लिया कि मूर्ख, एक वरदान खराब कर दिया! इतने क्रोध में आ गया कि कहा कि तू तो इसी वक्त मर जाए तो बेहतर है। वह मर गई। तब तो वह बहुत घबड़ाया। उसने कहा कि यह तो बड़ी मुसीबत हो गई। तो उसने कहा, हे भगवान, वह एक और जो इच्छा बची है; कृपा करके मेरी स्त्री को जिंदा कर दें।

ये उनकी तीन इच्छाएं पूरी हुईं। उस आदमी ने दरवाजे पर लिख छोड़ा है कि वह कहावत ठीक है।

हम जो मांग रहे हैं, हमें भी पता नहीं कि हम क्या मांग रहे हैं। वह तो पूरा नहीं होता, इसलिए हम मांगे चले जाते हैं। वह पूरा हो जाए, तो हमें पता चले। नहीं पूरा होता, तो कभी पता नहीं चलता है।

कृष्ण कहते हैं, मांगो ही मत। क्योंकि जिसने तुम्हें जीवन दिया, वह तुमसे ज्यादा समझदार है। तुम अपनी समझदारी मत बताओ। डोंट बी टू वाइज। बहुत बुद्धिमानी मत करो। जिसने तुम्हें जीवन दिया और जिसके हाथ से चांदत्तारे चलते हैं और अनंत जीवन जिससे फैलता है और जिसमें लीन हो जाता है, निश्चित, इतना तो तय ही है कि वह हमसे ज्यादा समझदार है। और अगर वह भी नासमझ है, तो फिर हमें समझदार होने की चेष्टा करनी बिलकुल बेकार है।

कृष्ण कहते हैं, उस पर छोड़ दो। तुम किए चले जाओ; सब उस पर छोड़ दो।

और बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जो छोड़ देता है, वह सब पा लेता है जो मिलने जैसा है। और जो नहीं छोड़ता--इस अरेबियन कहावत में उस आदमी के हाथ में कड़ाही तो कम से कम हाथ लग गई--लेकिन जो नहीं छोड़ता है, उसके हाथ में कड़ाही भी लगती होगी, इसका कोई भरोसा नहीं।

संन्यासी वह है, जिसने फल का खयाल ही छोड़ दिया, जो आज जी रहा है, यहीं।

क्या आप सोच सकते हैं कि बिना फल के आप कुछ गलत काम कर सकेंगे? अगर चोर को भरोसा न हो कि रुपए मिल सकेंगे; तिजोरी लूट ही लूंगा, फल पा ही लूंगा; चोर चोरी करने जा सकेगा? असंभव है। आपके जीवन से बुरा कर्म तत्क्षण गिर जाएगा, अगर आकांक्षा और फल की कामना गिर गई। फिर भी जीवन की ऊर्जा काम करेगी। लेकिन तब प्रभु का हाथ बन जाती है जीवन की ऊर्जा, और वैसा प्रभु के हाथ बने हुए आदमी को कृष्ण संन्यासी कहते हैं।

ओशो रजनीश



शनिवार, 29 मई 2021

नियमित आहार

 अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।। ३०।।


और दूसरे नियमित आहार करने वाले योगीजन प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा नाश हो गया है पाप जिनका, ऐसे ये सब ही पुरुष यज्ञों को जानने वाले हैं।



इसमें भी योग की दूसरी और प्रक्रिया का उल्लेख कृष्ण ने किया। वे प्रत्येक प्रक्रिया का उल्लेख करते जा रहे हैं। अर्जुन को जो भा जाए, जो प्रीतिकर लगे, जो रुचिकर बने। अर्जुन के टाइप को जो अनुकूल पड़ जाए।

इसमें वे कहते हैं, नियमित, संयमित आहार करने वाले पुरुष प्राण को प्राण में ही होम करते हैं। नियमित, संयमित आहार!

अब यह आहार बड़ा शब्द है और बड़ी घटना है। साधारणतः हम सोचते हैं कि भोजन आहार है। साधारणतः ठीक सोचते हैं। लेकिन आहार के और व्यापक अर्थ हैं।

आहार का मूल अर्थ होता है, जो भी बाहर से भीतर लिया जाए। आहार का अर्थ होता है, जो भी बाहर से भीतर लिया जाए। भोजन एक आहार है; आहार ही नहीं, सिर्फ एक आहार। क्योंकि भोजन को हम बाहर से भीतर लेते हैं। लेकिन आंख से भी हम चीजों को भीतर लेते हैं; वह भी आहार है। कान से भी हम चीजों को भीतर लेते हैं; वह भी आहार है। स्पर्श से भी हम चीजों को भीतर लेते हैं; वह भी आहार है।

शरीर के भीतर जो भी हम बाहर से लेते हैं, वह सब आहार है। जो भी हम रिसीव करते हैं बाहर से, जिसके हम ग्राहक हैं, जिसे भी हम बाहर से भीतर ले जाते हैं, वह सब आहार है।

संयमित, नियमित आहार का मतलब हुआ, जो व्यक्ति अपने इंद्रियों के द्वार से उसे ही भीतर ले जाता--उसे ही भीतर ले जाता--जो प्राणों को प्राणों में समर्पित होने में सहयोगी है। हम इस तरह की चीजें भी भीतर ले जा सकते हैं, जो प्राणों को प्राणों में समाहित न होने दें, बल्कि प्राणों को उद्वेलित करें, उत्तेजित करें, विक्षिप्त करें।

दो तरह के आहार हो सकते हैं। ऐसा आहार, जो प्राणों को उत्तेजित करे--शांत नहीं, मौन नहीं, निस्पंद नहीं--आंदोलित करे, पागल बनाए, दौड़ाए। और जब प्राण दौड़ते हैं, तो फिर बाहर की तरफ, विषयों की तरफ दौड़ जाते हैं। और जब प्राण नहीं दौड़ते, ठहरते हैं, विश्राम करते हैं, विराम करते हैं, तो फिर प्राण महाप्राण में लीन हो जाते हैं। जैसे लहर जब दौड़ती है, तो सागर में लीन नहीं होती; वायुमंडल की तरफ छलांगें भरती है; आकाश की तरफ हवाओं में टक्कर लेती है, उछलती है, चट्टानों से किनारे की टकराती है, टूटती है। लेकिन जब लहर शांत होती है, तो लहर सागर में लीन हो जाती है।

आहार दो तरह के हो सकते हैं। प्राणों को उत्तेजित करें। हम ऐसे ही आहार लेते हैं, जो उत्तेजित करें। एक आदमी शराब पी लेता है, तो फिर प्राण प्राण में लीन नहीं हो पाएंगे। फिर तो प्राण पागल होकर पदार्थ के लिए दौड़ने लगेंगे--किसी और के लिए, बाहर, हवाओं में कूदने लगेंगे, तो किनारों की चट्टानों से टकराने लगेंगे।

शराब उत्तेजक है। लेकिन शराब अकेली उत्तेजक नहीं है। जब कोई आंख से गलत चीज देखता है, तो भी उतनी ही उत्तेजना आ जाती है।

अब एक आदमी बैठा हुआ है तीन घंटे तक, नाटक देख रहा है, फिल्म देख रहा है। और इस तरह का आहार कर रहा है जो उत्तेजना ले आएगा भीतर; जो चित्त को चंचल करेगा, भगाएगा, दौड़ाएगा; रातभर सो नहीं सकेगा; सपने में भी मन वहीं नाटय-गृह में घूमता रहेगा। आंख बंद करेगा और वे ही दृश्य दिखाई पड़ने लगेंगे, वे ही छवियां पकड़ लेंगी। अब वह दौड़ा। अब वह बेचैन हुआ। अब वह परेशान हुआ।

अभी अमेरिका के मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अब जब तक अमेरिका में फिल्म-टेलीविजन हैं, तब तक कोई पुरुष किसी स्त्री से तृप्त नहीं होगा और कोई स्त्री किसी पुरुष से तृप्त नहीं होगी। क्यों? क्योंकि टेलीविजन ने और सिनेमा के पर्दे ने स्त्रियों और पुरुषों की ऐसी प्रतिमाएं लोगों को दिखा दीं, जैसी प्रतिमाएं यथार्थ में कहीं भी मिल नहीं सकतीं; झूठी हैं, बनावटी हैं। फिर यथार्थ में जो पुरुष और स्त्री मिलेंगे, वे बहुत फीके-फीके मालूम पड़ते हैं। कहां तस्वीर फिल्म के पर्दे पर, कहां अभिनेत्री फिल्म के पर्दे पर और कहां पत्नी घर की! घर की पत्नी एकदम फीकी-फीकी, एकदम व्यर्थ-व्यर्थ, जिसमें नमक बिलकुल नहीं, बेरौनक, साल्टलेस मालूम पड़ने लगती है। स्वाद ही नहीं मालूम पड़ता। पुरुष में भी नहीं मालूम पड़ता।

फिर दौड़ शुरू होती है। अब उस स्त्री की तलाश शुरू होती है, जो पर्दे पर दिखाई पड़ी। वह कहीं नहीं है। वह पर्दे वाली स्त्री भी जिसकी पत्नी है, वह भी इसी परेशानी में पड़ा है। इसलिए वह कहीं नहीं है। क्योंकि घर पर वह स्त्री साधारण स्त्री है। पर्दे पर जो स्त्री दिखाई पड़ रही है, वह मैन्यूवर्ड है, वह तरकीब से प्रस्तुत की गई है, वह प्रेजेंटेड है ढंग से। सारी टेक्नीक, टेक्नोलाजी से, सारी आधुनिक व्यवस्था से--कैमरे, फोटोग्राफी, रंग, सज्जा, सजावट, मेकअप--सारी व्यवस्था से वह पेश की गई है। उस पेश स्त्री को कहीं भी खोजना मुश्किल है। वह कहीं भी नहीं है। वह धोखा है।

लेकिन वह धोखा मन को आंदोलित कर गया। आहार हो गया। उस स्त्री का आहार हो गया भीतर। अब उस स्त्री की तलाश शुरू हो गई; अब वह कहीं मिलती नहीं। और जो भी स्त्री मिलती है, वह सदा उसकी तुलना में फीकी और गलत साबित होती है। अब यह चित्त कहीं भी ठहरेगा नहीं। अब इस चित्त की कठिनाई हुई। यह सारी की सारी कठिनाई बहुत गहरे में गलत आहार से पैदा हो रही है।

रास्ते पर आप निकलते हैं, कुछ भी पढ़ते चले जाते हैं, बिना इसकी फिक्र किए कि आंखें भोजन ले रही हैं। कुछ भी पढ़ रहे हैं! रास्ते भर के पोस्टर लोग पढ़ते चले जाते हैं। किसने आपको इसके लिए पैसा दिया है! काहे मेहनत कर रहे हैं? रास्ते भर के दीवाल-दरवाजे रंगे-पुते हैं; सब पढ़ते चले जा रहे हैं। यह कचरा भीतर चला जा रहा है। अब यह कचरा भीतर से उपद्रव खड़े करेगा।

अखबार उठाया, तो एक कोने से लेकर ठीक आखिरी कोने तक, कि किसने संपादित किया और किसने प्रकाशित किया, वहां तक पढ़ते चले जाते हैं! और एक दफे में भी मन नहीं भरता। फिर दुबारा देख रहे हैं, बड़ी छानबीन कर रहे हैं। बड़ा शास्त्रीय अध्ययन कर रहे हैं अखबार का! कचरा दिमाग में भर रहे हैं। फिर वह कचरा भीतर बेचैनी करेगा। घास खाकर देखें, कंकड़-पत्थर खाकर देखें, तब पता चलेगा कि पेट में कैसी तकलीफ होती है। वैसी खोपड़ी में भी तकलीफ हो जाती है। लेकिन वह, हम सोचते हैं, आहार नहीं है; वह तो हम पढ़ रहे हैं; ऐसी ही, खाली बैठे हैं। खाली बैठे हैं, तब कंकड़-पत्थर नहीं खाते!

नहीं; हमें खयाल नहीं है कि वह भी आहार है। बहुत सूक्ष्म आहार है। कान कुछ भी सुन रहे हैं। बैठे हैं, तो रेडिओ खोला हुआ है! कुछ भी सुन रहे हैं! वह चला जा रहा है दिमाग के भीतर। दिमाग पूरे वक्त तरंगों को आत्मसात कर रहा है। वे तरंगें दिमाग के सेल्स में बैठती जा रही हैं। आहार हो रहा है।

और एक बार भोजन इतना नुकसान न पहुंचाए, क्योंकि भोजन के लिए परगेटिव्स उपलब्ध हैं। अभी तक मस्तिष्क के लिए परगेटिव्स उपलब्ध नहीं हैं। अभी तक मस्तिष्क में जब कब्ज पैदा हो जाए, और अधिक मस्तिष्क में कब्ज है--कांस्टिपेशन दिमागी--और उसके परगेटिव्स हैं नहीं कहीं। तो बस, खोपड़ी में कब्ज पकड़ता जाता है। सड़ जाता है सब भीतर। और किसी को होश नहीं है।

संयमी या नियमी आहार वाले व्यक्ति से कृष्ण का मतलब है, ऐसा व्यक्ति, जो अपने भीतर एक-एक चीज जांच-पड़ताल से ले जाता है; जिसने अपने हर इंद्रिय के द्वार पर पहरेदार बिठा रखा है विवेक का, कि क्या भीतर जाए। उसी को भीतर ले जाऊंगा, जो उत्तेजक नहीं है। उसी को भीतर ले जाऊंगा, जो शामक है। उसी को भीतर ले जाऊंगा, जो भीतर चित्त को मौन में, गहन सन्नाटे में, शांति में, विराम में, विश्राम में डुबाता है; जो भीतर चित्त को स्वस्थ करता है, जो भीतर चित्त को संगीतबद्ध करता है, जो भीतर चित्त को प्रफुल्लित करता है।

ऐसा व्यक्ति भी, अगर कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से संयमी हो आहार की दृष्टि से, समस्त आहार की दृष्टि से--छुए भी वही, क्योंकि छूना भी भीतर जा रहा है; देखे भी वही, सुने भी वही, चखे भी वही, गंध भी उसकी ले--सब इंद्रियों से उसे ही भीतर ले जाए, जो आत्मा के लिए शांति का मार्ग है, तो ऐसा व्यक्ति भी उस परम सत्य को उपलब्ध हो जाता है। इस योग से भी, कृष्ण कहते हैं, अर्जुन! वहां पहुंचा जा सकता है।

ऐसा वह एक-एक कदम, एक-एक विधि की अर्जुन से बात कर रहे हैं।किसी को कोई विधि जम जाए, किसी को कोई विधि खयाल में आ जाए, कहीं चोट हो जाए, किसी को कुछ ठीक पड़ जाए, और उसकी जिंदगी में रूपांतरण हो जाए!

तो किसी भी विधि से, किसी भी बहाने से और किसी भी निमित्त से व्यक्ति परमात्मा तक पहुंच सकता है। सिर्फ वे ही नहीं पहुंचते, जो कभी पहुंचने की कोशिश ही नहीं करते किसी भी विधि से। गलत विधि से भी कोई चले उसकी तरफ, तो भी पहुंच सकता है; क्योंकि गलत विधि से चलने वाला थोड़ी देर में गलत को ठीक कर लेता है। गलत पर ज्यादा देर तक नहीं चला जा सकता।

लेकिन न चलने वाले के तो पहुंचने का कोई उपाय ही नहीं होता। वह गलत पर भी नहीं चलता। वह बैठा ही रह जाता है। वह बैठा देखता रहता है। जिंदगी सामने से बहती चली जाती है, वह बैठा देखता रहता है।


कृष्ण एक-एक बात कर रहे हैं कि कोई बात मेल खा जाए अर्जुन को और वह छलांग के लिए तैयार हो जाए।

जो खोज पर निकलता है, वह जरूर एक दिन पहुंच जाता है। गलत भी कूदे, तो भी पहुंच जाता है। क्योंकि गलत कूदने वाले की आकांक्षा तो कम से कम सही होती ही है, पहुंचने की। गलत विधि का उपयोग करे, तो भी पहुंच जाता है। क्योंकि गलत विधि वाले की भी प्यास तो होती है, पाने की ही।

और जो प्रभु को पाने को प्यासा है, वह गलत से भी पा लेता है। और जो प्रभु को पाने का प्यासा नहीं है, उसके सामने ठीक विधि भी पड़ी रहे, तो वह कुछ भी नहीं पाता है।

ओशो रजनीश



रविवार, 16 मई 2021

सांख्य

 एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।

बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।। ३९।।

हे पार्थ, यह सब तेरे लिए सांख्य (ज्ञानयोग) के विषय में कहा गया और इसी को अब (निष्काम कर्म) योग के विषय में सुन कि जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू, कर्मों के बंधन को अच्छी तरह से नाश करेगा।

अनंत हैं सत्य तक पहुंचने के मार्ग। अनंत हैं प्रभु के मंदिर के द्वार। होंगे ही अनंत, क्योंकि अनंत तक पहुंचने के लिए अनंत ही मार्ग हो सकते हैं। जो भी एक मार्ग को पकड़ लेते हैं--जो भी सोचते हैं, एक ही द्वार है, एक ही मार्ग है--वे भी पहुंच जाते हैं। लेकिन जो भी पहुंच जाते हैं, वे कभी नहीं कह पाते कि एक ही मार्ग है, एक ही द्वार है। एक का आग्रह सिर्फ उनका ही है, जो नहीं पहुंचे हैं; जो पहुंच गए हैं, वे अनाग्रही हैं।

कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, अब तक जो मैंने तुझसे कहा, वह सांख्य की दृष्टि थी।

सांख्य की दृष्टि गहरी से गहरी ज्ञान की दृष्टि है। सांख्य का जो मार्ग है, वह परम ज्ञान का मार्ग है। इसे थोड़ा समझ लें, तो फिर आगे दूसरे मार्ग समझना आसान हो जाएगा।

पर कृष्ण ने क्यों सांख्य की ही पहले बात कर ली! सांख्य की इसलिए पहले बात कर ली कि अगर सांख्य काम में आ जाए, तो फिर और कोई आवश्यकता नहीं है। सांख्य काम में न आ सके, तो ही फिर कोई और आवश्यकता है।

जापान में झेन साधना की एक पद्धति है। आज पश्चिम में झेन का बहुत प्रभाव है। आज का जो भी विचारशील वर्ग है जगत का, पूरे जगत की इंटेलिजेंसिया, वह झेन में उत्सुक है। और झेन सांख्य का ही एक रूप है।

सांख्य का कहना यही है कि जानना ही काफी है, करना कुछ भी नहीं है; नालेज इज़ इनफ, जानना पर्याप्त है। इस जगत की जो पीड़ा है और बंधन है, वह न जानने से ज्यादा नहीं है। अज्ञान के अतिरिक्त और कोई वास्तविक बंधन नहीं है। कोई जंजीर नहीं है, जिसे तोड़नी है। न ही कोई कारागृह है, जिसे मिटाना है। न ही कोई जगह है, जिससे मुक्त होना है। सिर्फ जानना है। जानना है कि मैं कौन हूं? जानना है कि जो चारों तरफ फैला है, वह क्या है? सिर्फ अंडरस्टैंडिंग, सिर्फ जानना।

जैसे एक आदमी दुख में पड़ा है, हम उससे कहें कि केवल जान लेना है कि दुख क्या है और तू बाहर हो जाएगा। वह आदमी कहेगा, जानता तो मैं भलीभांति हूं कि दुख है। जानने से कुछ नहीं होता; मुझे इलाज चाहिए, औषधि चाहिए। कुछ करो कि मेरा दुख चला जाए।

एक आदमी, जो वस्तुतः चिंतित और परेशान है, विक्षिप्त है, पागल है, उससे हम कहें कि सिर्फ जानना काफी है और तू पागलपन के बाहर आ जाएगा। वह आदमी कहेगा, जानता तो मैं काफी हूं; जानने को अब और क्या बचा है! लेकिन जानने से पागलपन नहीं मिटता। कुछ और करो! जानने के अलावा भी कुछ और जरूरी है।

कृष्ण ने अर्जुन को सबसे पहले सांख्य की दृष्टि कही, क्योंकि यदि सांख्य काम में आ जाए तो किसी और बात के कहने की कोई जरूरत नहीं है। न काम में आए, तो फिर किसी और बात के कहने की जरूरत पड़ सकती है।

सुकरात का बहुत ही कीमती वचन है, जिसमें उसने कहा है, नालेज इज़ वर्च्यू, ज्ञान ही सदगुण है। वह कहता था, जान लेना ही ठीक हो जाना है। उससे लोग पूछते थे कि हम भलीभांति जानते हैं कि चोरी बुरी है, लेकिन चोरी छूटती नहीं! तो सुकरात कहता, तुम जानते ही नहीं कि चोरी क्या है। अगर तुम जान लो कि चोरी क्या है, तो छोड़ने के लिए कुछ भी न करना होगा।

हम जानते हैं, क्रोध बुरा है; हम जानते हैं, भय बुरा है; हम जानते हैं, काम बुरा है, वासना बुरी है, लोभ बुरा है, मद-मत्सर सब बुरा है; सब जानते हैं। सांख्य या सुकरात या कृष्णमूर्ति, वे सब कहेंगे: नहीं, जानते नहीं हो। सुना है कि क्रोध बुरा है, जाना नहीं है। किसी और ने कहा है कि क्रोध बुरा है, स्वयं जाना नहीं है। और जानना कभी भी उधार और बारोड नहीं होता। जानना सदा स्वयं का होता है। फर्क है दोनों बातों में।

एक बच्चे ने सुना है कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है, और एक बच्चे ने आग में हाथ डालकर देखा है कि हाथ जल जाता है। इन दोनों बातों में जमीन-आसमान का फर्क है। दोनों के वाक्य एक से हैं। जिसने सिर्फ सुना है, वह भी कहता है, मैं जानता हूं कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है। और जिसने आग में हाथ डालकर जाना है, वह भी कहता है, मैं जानता हूं कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है।

इन दोनों के वचन एक-से हैं, लेकिन इन दोनों की मनःस्थिति एक-सी नहीं है। और जिसने सिर्फ सुना है, वह कभी हाथ डाल सकता है। और जिसने जाना है, वह कभी हाथ नहीं डाल सकता है। और जिसने सिर्फ सुना है, वह कभी हाथ डालकर कहेगा कि जानता तो मैं था कि हाथ डालने से हाथ जल जाता है, फिर मैंने हाथ क्यों डाला? वह जानने में भूल कर रहा है। दूसरे से मिला हुआ जानना, जानना नहीं हो सकता।


तो कृष्ण ने कहा कि अभी जो मैंने तुझसे कहा अर्जुन, वह सांख्य की दृष्टि थी। इस पूरे वक्त कृष्ण ने सिर्फ स्मरण दिलाने की कोशिश की, कि आत्मा अमर है; न उसका जन्म है, न उसकी मृत्यु है। स्मरण दिलाया कि अव्यक्त था, अव्यक्त होगा, बीच में व्यक्त का थोड़ा-सा खेल है। स्मरण दिलाया कि जो तुझे दिखाई पड़ते हैं, वे पहले भी थे, आगे भी होंगे। स्मरण दिलाया कि जिन्हें तू मारने के भय से भयभीत हो रहा है, उन्हें मारा नहीं जा सकता है।

इस पूरे समय कृष्ण क्या कर रहे हैं? कृष्ण अर्जुन को, जैसे उस सिपाही को घुमाया जा रहा है इंग्लैंड में, ऐसे उसे किसी विचार के लोक में घुमा रहे हैं कि शायद कोई विचार-कण, कोई स्मृति चोट कर जाए और वह कहे कि ठीक, यही है। ऐसा ही है। लेकिन ऐसा वह नहीं कह पाता।

वह शिथिल गात, अपने गांडीव को रखे, उदास मन, वैसा ही हताश, विषाद से घिरा बैठा है। वह कृष्ण की बातें सुनता है। वह बैठा है। वह रीढ़ भी नहीं उठाता; वह सीधा भी नहीं बैठता। उसे कुछ भी स्मरण नहीं आ रहा है।

इसलिए कृष्ण उससे कहते हैं कि अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात कहता हूं। सांख्ययोग श्रेष्ठतम योग है। अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात करता हूं। वे जो जानने से ही नहीं जान सकते, जिन्हें कुछ करना ही पड़ेगा, जो बिना कुछ किए स्मरण ला ही नहीं सकते-- अब मैं तुझसे कर्मयोग की बात कहता हूं।

ओशो रजनीश



शनिवार, 15 मई 2021

प्रेत और देव

 साधारण व्यक्ति, सामान्यजन, जो न बहुत बुरा है, न बहुत अच्छा है...। चार तरह के लोग हैं। साधारणजन, जो अच्छाई और बुराई के मिश्रण हैं। असाधारणजन, जो या तो शुद्ध बुराई हैं अधिकतम या शुद्ध अच्छाई हैं अधिकतम। तीसरे वे लोग, जो न बुराई हैं, न अच्छाई हैं--दोनों नहीं हैं। इनके लिए क्या नाम दें, कहना कठिन है। चौथे वे लोग, जो बुराई और अच्छाई में बिलकुल समतुल हैं, बैलेंस्ड हैं। ये तीसरे और चौथे लोग ऐसे हैं, जिनकी जन्म की यात्रा बंद हो जाएगी।  पहले और दूसरे लोग ऐसे हैं, जिनकी जन्म की यात्रा जारी रहेगी।

जो पहली तरह के लोग हैं--मिश्रण; अच्छे भी, बुरे भी, दोनों ही एक साथ; कभी बुरे, कभी अच्छे; अच्छे में भी बुरे, बुरे में भी अच्छे; सबका जोड़ हैं; निर्णायक नहीं, इनडिसीसिव; इधर से उधर डोलते रहते हैं--इनके लिए साधारणतया मरने के बाद तत्काल गर्भ मिल जाता है। क्योंकि इनके लिए बहुत गर्भ उपलब्ध हैं। सारी पृथ्वी इन्हीं के लिए मैन्युफैक्चर कर रही है। इनके लिए फैक्टरी जगह-जगह है। इनकी मांग बहुत असाधारण नहीं है। ये जो चाहते हैं, वह बहुत साधारण व्यक्तित्व है, जो कहीं भी मिल सकता है। ऐसे आदमी प्रेत नहीं होते। ऐसे आदमी तत्काल नया शरीर ले लेते हैं।

लेकिन बहुत अच्छे लोग और बहुत बुरे लोग, दोनों ही बहुत समय तक अटक जाते हैं। उनके लिए उनके योग्य गर्भ मिलना मुश्किल हो जाता है।  हिटलर के लिए या चंगेज के लिए या स्टैलिन के लिए या गांधी के लिए या अलबर्ट शवित्जर के लिए, इस तरह के लोगों के लिए जन्म एक मृत्यु के बाद काफी समय ले लेता है--जब तक योग्य गर्भ उपलब्ध न हो। तो बुरी आत्माएं और अच्छी आत्माएं, एक्सट्रीमिस्ट; जिन्होंने बुरे होने का ठेका ही ले रखा था जीवन में, ऐसी आत्माएं; जिन्होंने भले होने का ठेका ले रखा था, ऐसी आत्माएं--इनको रुक जाना पड़ता है।

जो इनमें बुरी आत्माएं हैं, उनको ही हम भूत-प्रेत कहते हैं। और इनमें जो अच्छी आत्माएं हैं, उनको ही हम देवता कहते रहे हैं। ये काफी समय तक रुक जाती हैं, कई बार तो बहुत समय तक रुक जाती हैं। हमारी पृथ्वी पर हजारों साल बीत जाते हैं, तब तक रुक जाती हैं।

 क्या ये दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकती हैं?

कर सकती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में जितनी संकल्पवान आत्मा हो, उतनी ही रिक्त जगह नहीं होती। जितनी विल पावर की आत्मा हो, उतनी ही उसके शरीर में रिक्त जगह नहीं होती, जिसमें कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सके। जितनी संकल्पहीन आत्मा हो, उतनी ही रिक्त जगह होती है।

इसे थोड़ा समझना जरूरी है। जब आप संकल्प से भरते हैं, तब आप फैलते हैं। संकल्प एक्सपैंडिंग चीज है। और जब आपका संकल्प निर्बल होता है, तब आप सिकुड़ते हैं। जब आप हीन-भाव से भरते हैं, तो सिकुड़ जाते हैं। यह बिलकुल सिकुड़ने और फैलने की घटना घटती है भीतर।

तो जब आप कमजोर होते हैं, भयभीत होते हैं, डरे हुए होते हैं, आत्मग्लानि से भरे होते हैं, आत्म-अविश्वास से भरे होते हैं, स्वयं के प्रति अश्रद्धा से भरे होते हैं, स्वयं के प्रति निराशा से भरे होते हैं, तब आपके भीतर का जो सूक्ष्म शरीर है, वह सिकुड़ जाता है। और आपके इस शरीर में इतनी जगह होती है फिर कि कोई भी आत्मा प्रवेश कर सकती है। आप दरवाजा दे सकते हैं।

आमतौर से भली आत्माएं प्रवेश नहीं करती हैं। नहीं करने का कारण है। क्योंकि भली आत्मा जिंदगीभर एंद्रिक सुखों से मुक्त होने की चेष्टा में लगी रहती है। एक अर्थ में, भली आत्मा शरीर से ही मुक्त होने की चेष्टा में लगी रहती है। लेकिन बुरी आत्मा के जीवन के सारे अनुभव शरीर के सुख के अनुभव होते हैं। और बुरी आत्मा, शरीर से बाहर होने पर जब उसे नया जन्म नहीं मिलता, तो उसकी तड़फन भारी हो जाती है; उसकी पीड़ा भारी हो जाती है। उसको अपना शरीर तो मिल नहीं रहा है, गर्भ उपलब्ध नहीं है, लेकिन वह किसी के शरीर पर सवार होकर इंद्रिय के सुखों को चखने की चेष्टा करती है। तो अगर कहीं भी कमजोर संकल्प का आदमी हो...।

इसीलिए पुरुषों की बजाय स्त्रियों में प्रेतात्माओं का प्रवेश मात्रा में ज्यादा होता है। क्योंकि स्त्रियों को हम अब तक संकल्पवान नहीं बना पाए हैं। जिम्मा पुरुष का है, क्योंकि पुरुष ने स्त्रियों का संकल्प तोड़ने की निरंतर कोशिश की है। क्योंकि जिसे भी गुलाम बनाना हो, उसे संकल्पवान नहीं बनाया जा सकता। जिसे गुलाम बनाना हो, उसके संकल्प को हीन करना पड़ता है, इसलिए स्त्री के संकल्प को हीन करने की निरंतर चेष्टा की गई है हजारों साल में। जो आध्यात्मिक संस्कृतियां हैं, उन्होंने भी भयंकर चेष्टा की है कि स्त्री के संकल्प को हीन करें, उसे डराएं, उसे भयभीत करें। क्योंकि पुरुष की प्रतिष्ठा उसके भय पर ही निर्भर करेगी।

तो स्त्री में जल्दी प्रवेश...। और मात्रा बहुत ज्यादा है। दस प्रतिशत पुरुष ही प्रेतात्माओं से पीड़ित होते हैं, नब्बे प्रतिशत स्त्रियां पीड़ित होती हैं। संकल्प नहीं है; जगह खाली है; प्रवेश आसान है।

संकल्प जितना मजबूत हो, स्वयं पर श्रद्धा जितनी गहरी हो, तो हमारी आत्मा हमारे शरीर को पूरी तरह घेरे रहती है। अगर संकल्प और बड़ा हो जाए, तो हमारा सूक्ष्म शरीर हमारे इस शरीर के बाहर भी घेराव बनाता है--बाहर भी। इसलिए कभी किन्हीं व्यक्तियों के पास जाकर, जिनका संकल्प बहुत बड़ा है, आप तत्काल अपने संकल्प में परिवर्तन पाएंगे। क्योंकि उनका संकल्प उनके शरीर के बाहर भी वर्तुल बनाता है। उस वर्तुल के भीतर अगर आप गए, तो आपका संकल्प परिवर्तित होता हुआ मालूम पड़ेगा। बहुत बुरे आदमी के पास भी।

अगर एक वेश्या के पास जाते हैं, तो भी फर्क पड़ेगा। एक संत के पास जाते हैं, तो भी फर्क पड़ेगा। क्योंकि उसके संकल्प का वर्तुल, उसके सूक्ष्म शरीर का वर्तुल, उसके स्थूल शरीर के भी बाहर फैला होता है। यह फैलाव बहुत बड़ा भी हो सकता है। इस फैलाव के भीतर आप अचानक पाएंगे कि आपके भीतर कुछ होने लगा, जो आपका नहीं मालूम पड़ता। आप कुछ और तरह के आदमी थे, लेकिन कुछ और हो रहा है भीतर।

तो हमारा संकल्प इतना छोटा भी हो सकता है कि इस शरीर के भीतर भी सिकुड़ जाए, इतना बड़ा भी हो सकता है कि इस शरीर के बाहर भी फैल जाए। वह इतना बड़ा भी हो सकता है कि पूरे ब्रह्मांड को घेर ले। जिन लोगों ने कहा, अहं ब्रह्मास्मि, वह संकल्प के उस क्षण में उन्हें अनुभव हुआ है, जब सारा संकल्प सारे ब्रह्मांड को घेर लेता है। तब चांदत्तारे बाहर नहीं, भीतर चलते हुए मालूम पड़ते हैं। तब सारा अस्तित्व अपने ही भीतर समाया हुआ मालूम पड़ता है। संकल्प इतना भी सिकुड़ जाता है कि आदमी को यह भी पक्का पता नहीं चलता कि मैं जिंदा हूं कि मर गया। इतना भी सिकुड़ जाता है।

इस संकल्प के अति सिकुड़े होने की हालत में ही नास्तिकता का गहरा हमला होता है। संकल्प के फैलाव की स्थिति में ही आस्तिकता का गहरा हमला होता है। संकल्प जितना फैलता है, उतना ही आदमी आस्तिक अनुभव करता है अपने को। क्योंकि अस्तित्व इतना बड़ा हो जाता है कि नास्तिक होने का कोई कारण नहीं रह जाता। संकल्प जब बहुत सिकुड़ जाता है, तो नास्तिक अनुभव करता है। अपने ही पैर डांवाडोल हों, अपना ही अस्तित्व न होने जैसा हो, उस क्षण आस्तिकता नहीं उभर सकती; उस वक्त जीवन के प्रति नहीं का भाव, न का भाव पैदा होता है। नास्तिकता और आस्तिकता मनोवैज्ञानिक सत्य हैं--मनोवैज्ञानिक।

सिमन वेल ने लिखा है कि तीस साल की उम्र तक मेरे सिर में भारी दर्द था। चौबीस घंटे होता था। तो मैं कभी सोच ही नहीं पाई कि परमात्मा हो सकता है। जिसके सिर में चौबीस घंटे दर्द है, उसको बहुत मुश्किल है मानना कि परमात्मा हो सकता है।

अब यह बड़े मजे की बात है कि सिरदर्द जैसी छोटी चीज भी परमात्मा को दरवाजे के बाहर कर सकती है। वह ईश्वर के न होने की बात करती रही। उसे कभी खयाल भी न आया कि ईश्वर के न होने का बहुत गहरा कारण मेडिकल है। उसे खयाल भी नहीं आया कि ईश्वर के न होने का कारण सिरदर्द है। तर्क और दलीलें और नहीं। जिसके सिर में दर्द है, उसके मन से नहीं का भाव उठता है। उसके मन से हां का भाव नहीं उठता। हां के भाव के लिए भीतर बड़ी प्रफुल्लता चाहिए, तब हां का भाव उठता है।

फिर सिरदर्द ठीक हो गया। तब उसे एहसास हुआ कि उसके भीतर से इनकार का भाव कम हो गया है। तब उसे एहसास हुआ कि वह न मालूम किस अनजाने क्षण में नास्तिक से आस्तिक होने लगी।

संकल्प अगर क्षीण है, तो प्रेतात्माएं प्रवेश कर सकती हैं; बुरी प्रेतात्माएं, जिन्हें हम भूत कहें, प्रवेश कर सकती हैं, क्योंकि वे आतुर हैं। पूरे समय आतुर हैं कि अपना शरीर नहीं है, तो आपके शरीर से ही थोड़ा-सा रस ले लें। और शरीर के रस शरीर के बिना नहीं लिए जा सकते हैं, यह तकलीफ है। शरीर के रस शरीर से ही लिए जा सकते हैं।

अगर एक कामुक आत्मा है, सेक्सुअल आत्मा है और उसके पास अपना शरीर नहीं है, तो सेक्सुअलिटी तो पूरी होती है, शरीर नहीं होता, इंद्रियां नहीं होतीं। अब उसकी पीड़ा आप समझ सकते हैं। उसकी पीड़ा बड़ी मुश्किल की हो गई। चित्त कामुक है, और उपाय बिलकुल नहीं है, शरीर नहीं है पास में। वह किसी के भी शरीर में प्रवेश करके कामवासना को तृप्त करने की चेष्टा कर सकती है।

शुभ आत्माएं आमतौर से प्रवेश नहीं करतीं, जब तक कि आमंत्रित न की जाएं। अनइनवाइटेड उनका प्रवेश नहीं होता। क्योंकि उनके लिए शरीर की कोई आकांक्षा नहीं है। लेकिन इनविटेशन पर, आमंत्रण पर, उनका प्रवेश हो सकता है। आमंत्रण का मतलब इतना ही हुआ कि अगर कोई ऐसी घड़ी हो, जहां उनका उपयोग किया जा सके, जहां वे सहयोगी हों और सेवा दे सकें, तो वे तत्काल उपलब्ध हो जाती हैं। बुरी आत्मा हमेशा अनइनवाइटेड प्रवेश करती है, घर के पीछे के दरवाजे से; भली आत्मा आमंत्रित होकर प्रवेश कर सकती है।

लेकिन भली आत्माओं का प्रवेश निरंतर कम होता चला गया है, क्योंकि आमंत्रण की विधि खो गई है। और बुरी आत्माओं का प्रवेश बढ़ता चला गया है। क्यों? क्योंकि संकल्प दीन-हीन और नकारात्मक, निगेटिव हो गया है। इसलिए आज पृथ्वी पर देवता की बात करना झूठ है; भूत की बात करना झूठ नहीं है। प्रेत अभी भी अस्तित्ववान हैं; देवता कल्पना हो गए हैं।

लेकिन देवताओं को बुलाने की, निमंत्रण की विधियां थीं। सारा वेद उन्हीं विधियों से भरा हुआ है। उसके अपने सीक्रेट मैथड्स हैं कि उन्हें कैसे बुलाया जाए, उनसे कैसे तारतम्य, उनसे कैसे कम्युनिकेशन, उनसे कैसे संबंध स्थापित किया जाए, उनसे चेतना कैसे जुड़े। और निश्चित ही, बहुत कुछ है जो उनके द्वारा ही जाना गया है। और इसीलिए उसके लिए आदमी के पास कोई प्रमाण नहीं है।

अब यह जानकर आपको हैरानी होगी कि सात सौ साल पुराना एक पृथ्वी का नक्शा बेरूत में मिला है। सात सौ साल पुराना, पृथ्वी का नक्शा, बेरूत में मिला है। वह नक्शा ऐसा है, जो बिना हवाई जहाज के नहीं बनाया जा सकता। जिसके लिए हवाई जहाज की ऊंचाई पर उड़कर पृथ्वी देखी जाए, तो ही बनाया जा सकता है। लेकिन सात सौ साल पहले हवाई जहाज ही नहीं था। इसलिए बड़ी मुश्किल में वैज्ञानिक पड़ गए हैं उस नक्शे को पाकर। बहुत कोशिश की गई कि सिद्ध हो जाए कि वह नक्शा सात सौ साल पुराना नहीं है, लेकिन सिद्ध करना मुश्किल हुआ है। वह कागज सात सौ साल पुराना है। वह स्याही सात सौ साल पुरानी है। वह भाषा सात सौ साल पुरानी है। जिन दीमकों ने उस कागज को खा लिया है, वे छेद भी पांच सौ साल पुराने हैं। लेकिन वह नक्शा बिना हवाई जहाज के नहीं बन सकता।

तो एक तो रास्ता यह है कि सात सौ साल पहले हवाई जहाज रहा हो, जो कि ठीक नहीं है। सात हजार साल पहले रहा हो, इसकी संभावना है; सात सौ साल पहले रहा हो, इसकी संभावना नहीं है। क्योंकि सात सौ साल बहुत लंबा फासला नहीं है। सात सौ साल पहले हवाई जहाज रहा हो और बाइसिकल न रही हो, यह नहीं हो सकता। क्योंकि हवाई जहाज एकदम से आसमान से नहीं बनते। उनकी यात्रा है--बाइसिकल है, कार है, रेल है, तब हवाई जहाज बन पाता है। ऐसा एकदम से टपक नहीं जाता आसमान से। तो एक तो रास्ता यह है कि हवाई जहाज रहा हो, जो कि सात सौ साल पहले नहीं था।

दूसरा रास्ता यह है कि अंतरिक्ष के यात्री आए हों--जैसा कि एक रूसी वैज्ञानिक ने सिद्ध करने की कोशिश की है--कि किसी दूसरे प्लेनेट से कोई यात्री आए हों और उन्होंने यह नक्शा दिया हो। लेकिन दूसरे प्लेनेट से यात्री सात सौ साल पहले आए हों, यह भी संभव नहीं है। सात हजार साल पहले आए हों, यह संभव है। क्योंकि सात सौ साल बहुत लंबी बात नहीं है। इतिहास के घेरे की बात है। हमारे पास कम से कम दो हजार साल का तो सुनिश्चित इतिहास है। उसके पहले का इतिहास नहीं है। इसलिए इतनी बड़ी घटना सात सौ साल पहले घटी हो कि अंतरिक्ष से यात्री आए हों और उसका एक भी उल्लेख न हो, जब कि सात सौ साल पहले की किताबें पूरी तरह उपलब्ध हैं, संभव नहीं है।

मैं तीसरा सुझाव देता हूं, जो अब तक नहीं दिया गया। और वह सुझाव मेरा यह है कि यह जो नक्शे की खबर है, यह किसी आत्मा के द्वारा दी गई खबर है, जो किसी व्यक्ति में इनवाइटेड हुई। जो किसी व्यक्ति के द्वारा बोली।

पृथ्वी गोल है, यह तो पश्चिम में अभी पता चला। ज्यादा समय नहीं हुआ, अभी कोई तीन सौ साल। लेकिन हमारे पास भूगोल शब्द हजारों साल पुराना है। तब भूगोल जिन्होंने शब्द गढ़ा होगा, उनको पृथ्वी गोल नहीं है, ऐसा पता रहा हो, नहीं कहा जा सकता। नहीं तो भूगोल शब्द कैसे गढ़ेंगे! लेकिन आदमी के पास--जमीन गोल है--इसको जानने के साधन बहुत मुश्किल मालूम पड़ते हैं। सिवाय इसके कि यह संदेश कहीं से उपलब्ध हुआ हो।

आदमी के ज्ञान में बहुत-सी बातें हैं, जिनकी कि प्रयोगशालाएं नहीं थीं, जिनका कि कोई उपाय नहीं था। जैसे कि लुकमान के संबंध में कथा है। और अब तो वैज्ञानिक को भी संदेह होने लगा है कि कथा ठीक होनी चाहिए।

लुकमान के संबंध में कथा है कि उसने पौधों से जाकर पूछा कि बता दो, तुम किस बीमारी में काम आ सकते हो? पौधे बताते हुए मालूम नहीं पड़ते। लेकिन दूसरी बात भी मुश्किल मालूम पड़ती है कि लाखों पौधों के संबंध में लुकमान ने जो खबर दी है, वह इतनी सही है, कि या तो लुकमान की उम्र लाखों साल रही हो और लुकमान के पास आज से भी ज्यादा विकसित फार्मेसी की प्रयोगशालाएं रही हों, तब वह जांच कर पाए कि कौन-सा पौधा किस बीमारी में काम आता है। लेकिन लुकमान की उम्र लाखों साल नहीं है। और लुकमान के पास कोई प्रयोगशाला की खबर नहीं है। लुकमान तो अपना झोला लिए जंगलों में घूम रहा है और पौधों से पूछ रहा है। पौधे बता सकेंगे?

मेरी अपनी समझ और है। पौधे तो नहीं बता सकते, लेकिन शुभ आत्माएं पौधों के संबंध में खबर दे सकती हैं। बीच में मीडिएटर कोई आत्मा काम कर रही है, जो पौधों की बाबत खबर दे सकती है कि यह पौधा इस काम में आ जाएगा।

अब यह बड़े मजे की बात है, जैसे कि हमारे मुल्क में आयुर्वेद की सारी खोज बहुत गहरे में प्रयोगात्मक नहीं है, बहुत गहरे में देवताओं के द्वारा दी गई सूचनाओं पर निर्भर है। इसलिए आयुर्वेद की कोई दवा आज भी प्रयोगशाला में सिद्ध होती है कि ठीक है। लेकिन हमारे पास कभी कोई बड़ी प्रयोगशाला नहीं थी, जिसमें हमने उसको सिद्ध किया हो।

जैसे सर्पगंधा है। अब आज हमको पता चला कि वह सच में ही, सुश्रुत से लेकर अब तक सर्पगंधा के लिए जो खयाल था, वह ठीक साबित हुआ। लेकिन अब पश्चिम में सर्पेंटीना--सर्पगंधा का रूप है वह--अब वह भारी उपयोग की चीज हो गई है। पागलों के इलाज के लिए अनिवार्य चीज हो गई है। लेकिन यह सर्पगंधा का पता कैसे चला होगा? क्योंकि आज तो पश्चिम के पास प्रयोगशाला है, जिसमें सर्पगंधा की केमिकल एनालिसिस हो सकती है। लेकिन हमारे पास ऐसी कोई प्रयोगशाला थी, इसकी खबर नहीं मिलती। यह सर्पगंधा की खबर, आमंत्रित आत्माओं से मिली हुई खबर है। और बहुत देर नहीं है कि हमें आमंत्रित आत्माओं के उपयोग फिर खोजने पड़ेंगे।

इसलिए आज जब आप वेद को पढ़ें, तो कपोल-कल्पना हो जाती है, झूठ मालूम पड़ता है कि क्या बातचीत कर रहे हैं ये--इंद्र आओ, वरुण आओ, फलां आओ, ढिकां आओ। और इस तरह बात कर रहे हैं कि जैसे सच में आ रहे हों। और फिर इंद्र को भेंट भी कर रहे हैं, इंद्र से प्रार्थना भी कर रहे हैं। और इतने बड़े वेद में कहीं भी एक जगह कोई ऐसी बात नहीं मालूम पड़ती कि कोई एक भी आदमी शक कर रहा हो कि क्या पागलपन की बात कर रहे हो! किससे बात कर रहे हो! देवता, वेद के समय में बिलकुल जमीन पर चलते हुए मालूम पड़ते हैं।

निमंत्रण की विधि थी। सब हवन, यज्ञ बहुत गहरे में निमंत्रण की विधियां हैं, इनविटेशंस हैं, इनवोकेशंस हैं। उसकी बात तो कहीं आगे होगी, तो बात कर लेंगे।

लेकिन यह जो आपने पूछा, तो सूक्ष्म शरीर ही स्थूल शरीर से मुक्त रहकर प्रेत और देव दिखाई पड़ता है।

ओशो रजनीश








शुक्रवार, 14 मई 2021

Corona

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⚠️ IMPORTANT NOTE

These medicines are to be taken after consultation with a certified doctor. 

🚫 Do Not Self-Medicate Yourself.


❦ Tab Dolo 650 mg (Paracetamol) 

         As and when required ⚫ x 14 Days


❦ Zinconia 50 mg (Zinc Supplement)  

        1 tablet 2 times a day for 5 days ⚫ ⚫  x 5 Days


❦ Tab. Azithral 500 mg (Azithromycin) 

         1 tablet 1 time a day for 5 days ⚫ x 5 Days


❦ Tab Limcee 500 (Vitamin-C Supplement)  

        1 tablet 1 time a day for 30 days ⚫ x 30 Days


❦ Tab Bicasule (Vitamin-B Supplement) 

        1 tablet 1 time a day for 15 days ⚫ x 15 Days


❦ Tab Ivermectol 12 mg (Ivermectin) 

         1 tablet 1 time a day for 3 days ⚫ x 3 Days


❦ Tab Montair LC (Levocetirizine + Montelukast ) 

         1 tablet 1 time a day for 5 days ⚫ x 5 Days


❦ Tab Omnacortil 40mg (Prednisolone) 

        1 tablet 1 time a day for 5 days after breakfast     ⚫ x 5 Days

        (To be started on the 8th day calculated from the first day of fever) 


❦ Tab Omnacortil 20mg (Prednisolone) 

         1 tablet 1 time a day for 5 days after breakfast.  ⚫ x 5 Days

          (To be started after completing 5 days of Omnacortil 40mg)


❦ Cap Ocid 20 mg 

        1 tablet 1 time a day for 17 days before breakfast.  ⚫ x 17 Days

         (To be taken with Tab Omnacortil)








मंगलवार, 11 मई 2021

अध्यात्म

  ऐसा नहीं है कि जो लोग मन से पीड़ित और परेशान हैं, वे ही लोग ध्यान, योग और अध्यात्म की ओर झुकते हैं; यह तो ठीक है। लेकिन जो अपने को सोचते हैं कि मानसिक रूप से पीड़ित नहीं हैं, वे भी उतने ही पीडित हैं और उन्हें भी झुक जाना चाहिए।

मनुष्य का होना ही संत्रस्त है। मनुष्य जिस ढंग का है, उसमें ही पीड़ा है। मनुष्य का अस्तित्व ही दुखपूर्ण है। इसलिए असली तो नासमझ वह है, जो सोचता है कि बिना अध्यात्म की ओर झुके हुए आनंद को उपलब्ध हो जाएगा। आनंद पाने का कोई उपाय और है ही नहीं। और जो जितनी जल्दी झुक जाए, उतना हितकर है।

यह बात सच है कि जो लोग अध्यात्म की ओर झुकते हैं, वे मानसिक रूप से पीड़ित और परेशान हैं। लेकिन दूसरी बात भी खयाल में ले लेना, झुकते ही उनकी मानसिक पीड़ा समाप्त होनी शुरू हो जाती है। झुकते ही मानसिक उन्माद समाप्त हो जाता है। और अध्यात्म की प्रक्रिया से गुजरकर वे स्वस्थ, शांत और आनंदित हो जाते हैं।

देखें बुद्ध की तरफ, देखें महावीर की तरफ, देखें कृष्ण की तरफ। उस आग से गुजरकर सोना निखर आता है। लेकिन जो झुकते ही नहीं, वे पागल ही बने रह जाते हैं।

आप ऐसा मत सोचना कि अध्यात्म की तरफ नहीं झुक रहे हैं, तो आप स्वस्थ हैं। अध्यात्म से गुजरे बिना तो कोई स्वस्थ हो ही नहीं सकता। स्वास्थ्य का अर्थ ही होता है, स्वयं में हो जाना। स्वयं में स्थित हुए बिना तो कोई स्वस्थ हो ही नहीं सकता। तब तक तो दौड़ और परेशानी और चिंता और तनाव बना ही रहेगा।

तो जो झुकते हैं, वे तो पागल हैं। जो नहीं झुकते हैं, वे और भी ज्यादा पागल हैं। क्योंकि झुके बिना पागलपन से छूटने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए यह मत सोचना कि आप बहुत समझदार हैं। क्योंकि आपकी समझदारी का कोई मूल्य नहीं है। अगर भीतर चिंता है, पीड़ा है, दुख है, तो आप कितना ही जानते हों, कितनी ही समझदारी हो, वह कुछ काम न आएगी। आपके भीतर पागलपन तो इकट्ठा हो ही रहा है।

और मैंने कहा कि आदमी का होना ही पागलपन है। उसके कारण हैं। क्योंकि आदमी सिर्फ बीज है, सिर्फ एक संभावना है कुछ होने की। और जब तक वह हो न जाए तब तक परेशानी रहेगी। जब तक उसके भीतर का फूल पूरा खिल न जाए, तब तक बीज के प्राण तनाव से भरे रहेंगे। बीज टूटे, अंकुरित हो और फूल बन जाए, तो ही आनंद होगा।

दुख का एक ही अर्थ है आध्यात्मिक भाषा में, कि आप जो हैं, वह नहीं हो पा रहे हैं। और आनंद का एक ही अर्थ है कि आप जो हो सकते हैं, वह हो गए हैं। आनंद का अर्थ है कि अब आपके भीतर कोई संभावना नहीं बची आप सत्य हो गए हैं। आप जो भी हो सकते थे, वह आपने आखिरी शिखर छू लिया है। आप अपनी पूर्णता पर पहुंच गए हैं। और जब तक पूर्णता उपलब्ध नहीं होती, तब तक बेचैनी रहेगी।

जैसे नदी दौड़ती है सागर की तरफ, बेचैन, परेशान, तलाश में, वैसा आदमी दौड़ता है। सागर से मिलकर शांति हो जाती है। लेकिन कोई नदी ऐसा भी सोच सकती है कि ये पागल नदियां हैं, जो सागर की तरफ दौड़ रही हैं। और जो नदी सागर की तरफ दौड़ना बंद कर देगी, वह सरोवर बन जाएगी। नदी तो सागर में दौड़कर मिल जाती है, विराट हो जाती है। लेकिन सरोवर सडता है केवल, कहीं पहुंचता नहीं।

अध्यात्म गति है, मनुष्य के पार, मनुष्य के ऊपर, वह जो आत्यंतिक है, अंतिम है, उस दिशा में। लेकिन आप अपने को यह मत समझा लेना कि सिर्फ पागल इस ओर झुकते हैं। मैं तो बुद्धिमान आदमी हूं। मैं क्यों झुकूं!

आपकी बुद्धिमानी का सवाल नहीं है। अगर आप आनंद को उपलब्ध हो गए हैं, तब कोई सवाल नहीं है झुकने का। लेकिन अगर आपको आनंद की कोई खबर नहीं मिली है, और आपका हृदय नाच नहीं रहा है, और आप समाधि के, शांत होने के परम गुह्य रहस्य को उपलब्ध नहीं हुए हैं, तो इस डर से कि कहीं कोई पागल न कहे, अध्यात्म से बच मत जाना। नहीं तो जीवन की जो परम खोज है, उससे ही बच जाएंगे।

पागल झुकते हैं अध्यात्म की ओर, यह सच है। लेकिन वे पागल सौभाग्यशाली हैं, क्योंकि उन्हें कम से कम इतना होश तो है कि झुक जाएं इलाज की तरफ। उन पागलों के लिए क्या कहा जाए, जो पागल भी हैं और झुकते भी नहीं हैं, जो बीमार भी हैं और चिकित्सक की तलाश भी नहीं करते और चिकित्सा की खोज भी नहीं करते। उनकी बीमारी दोहरी है। वे अपनी बीमारी को स्वास्थ्य समझे बैठे हैं।

मेरे पास रोज ऐसे लोग आ जाते हैं, जिनके पास बड़े—बड़े सिद्धांत हैं, जिन्होंने बड़े शास्त्र अध्ययन किए हैं। और जिन्होंने बड़ी उधार बुद्धि की बातें इकट्ठी कर ली हैं। मैं उनसे कहता हूं कि मुझे इसमें कोई उत्सुकता नहीं है कि आप क्या जानते हैं। मेरी उत्सुकता इसमें है कि आप क्या हैं। अगर आपको आनंद मिल गया हो, तो आपकी बातों का कोई मूल्य है मेरे लिए, अन्यथा यह सारी की सारी बातचीत सिर्फ दुख को छिपाने का उपाय है।


 तो बुनियादी बात मुझे बता दें, आपको आनंद मिल गया है? तो फिर आप जो भी कहें, उसे मैं सही मान लूंगा। और आनंद न मिला हो, तो आप जो भी कहें, उस सबको मैं गलत मानूंगा, चाहे वह कितना ही सही दिखाई पड़ता हो। क्योंकि जिससे जीवन का फूल न खिलता हो, उसके सत्य होने का कोई आधार नहीं है। और जिससे जीवन का फूल तो बंद का बंद रह जाता हो, बल्कि और ज्ञान का कचरा उसे दबा देता हो और खुलना मुश्किल हो जाता हो, उसका सत्य से कोई भी संबंध नहीं है।

मेरे हिसाब में आनंद की तरफ जो ले जाए, वह सत्य है; और दुख की तरफ जो ले जाए, वह असत्य है। अगर आप आनंद की तरफ जा रहे हैं, तो आप जो भी कर रहे हैं, वह ठीक है। और अगर आप आनंद की तरफ नहीं जा रहे हैं, तो आप कुछ भी कर रहे हों, वह सब गलत है। क्योंकि अंतिम कसौटी तो एक ही बात की है कि आपने जीवन के परम आनंद को अनुभव किया या नहीं।

तो ये मित्र ठीक कहते हैं, विक्षिप्त लोग झुके हुए मालूम पड़ते हैं। लेकिन सभी विक्षिप्त हैं।

मनसविद से पूछें, कौन स्वस्थ है? जिसको आप नार्मल, सामान्य आदमी कहते हैं, उसे आप यह मत समझ लेना कि वह स्वस्थ है। वह केवल नार्मल ढंग से पागल है। और कोई खास बात नहीं है। और पागलों जैसा ही पागल है। पूरी भीड़ उसके जैसे ही पागल है। इसलिए वह पागल नहीं मालूम पड़ता। जरा ही ज्यादा आगे बढ़ जाता है, तो दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है।

पागल में और आप में जो अंतर है, वह मात्रा का है, गुण का नहीं है। थोड़ा डिग्रीज का फर्क है। आप निन्यानबे डिग्री पर हैं और पागल सौ डिग्री पर उबलकर पागल हो गया है। एक डिग्री आप में कभी भी जुड़ सकती है, किसी भी क्षण। जरा—सी कोई घटना, और आप पागल हो सकते हैं।

बुद्धिमान से बुद्धिमान आदमी को जरा—सी गाली दे दो और वह पागल हो जाता है। वह तैयार ही खड़ा था; एक छोटी—सी गाली ऊंट पर आखिरी तिनके का काम करती है और ऊंट बैठ जाता है। आपकी बुद्धिमानी जरा में सरकाई जा सकती है; उसका कोई मूल्य नहीं है। आप किसी तरह अपने को सम्हाले खड़े हैं।

इस सम्हाले खड़े रहने से कोई सार नहीं है। यह विक्षिप्तता से मुक्त होना जरूरी है। और योग विक्षिप्तता से मुक्ति का उपाय है। अच्छा है कि आप अपनी विक्षिप्तता को पहचान लें।

ध्यान रहे, बीमारी को पहचान लेना अच्छा है, क्योंकि पहचाने से उपाय हो सकता है, इलाज हो सकता है। बीमारी को झुठलाना — खतरनाक है। क्योंकि बीमारी झुठलाने से मिटती नहीं, भीतर बढ़ती चली जाती है।

लेकिन अनेक बीमार ऐसे हैं, जो इस डर से कि कहीं यह पता न चल जाए कि हम बीमार हैं, अपनी बीमारी को छिपाए रखते हैं। अपने घावों को ढांक लेते हैं फूलों से, सुंदर वस्त्रों से, सुंदर शब्दों से और अपने को भुलाए रखते हैं। लेकिन धोखा वे किसी और को नहीं दे रहे हैं। धोखा वे अपने को ही दे रहे हैं। घाव भीतर बढ़ते ही चले जाएंगे। पागलपन ऐसे मिटेगा नहीं, गहन हो जाएगा। और आज नहीं कल उसका विस्फोट हो जाएगा।

अध्यात्म की तरफ उत्सुकता चिकित्सा की उत्सुकता है। और उचित है कि आप पहचान लें कि अगर दुखी हैं, तो दुखी होने का कारण है। उस कारण को मिटाया जा सकता है। उस कारण को मिटाने के लिए उपाय हैं। उन उपायों का प्रयोग किया जाए, तो चित्त स्वस्थ हो जाता है।

आप अपनी फिक्र करें; दूसरे क्या कहते हैं, इसकी बहुत चिंता न करें। आप अपनी चिंता करें कि आपके भीतर बेचैनी है, संताप है, संत्रस्तता है, दुख है, विषाद है, और आप भीतर उबल रहे हैं आग से और कहीं कोई छाया नहीं जीवन में, कहीं कोई विश्राम का स्थल नहीं है! तो फिर भय न करें। अध्यात्म आपके जीवन में छाया बन सकता है, और योग आपके जीवन में शांति की वर्षा कर सकता है।

अगर प्यासे हैं, तो उस तरफ सरोवर है। और प्यासे हैं, तो सरोवर की तरफ जाएं। सिर्फ बुद्ध या कृष्ण जैसे व्यक्तियों को योग की तरफ जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि योग से वे गुजर चुके हैं। आपको तो जरूरत है ही। आपको तो जाना ही होगा। एक जन्म आप झुठला सकते हैं, दूसरे जन्म में जाना होगा। आप अनेक जन्मों तक झुठला सकते हैं, लेकिन बिना जाए कोई उपाय नहीं है। और जब तक कोई अपने भीतर के आत्यंतिक केंद्र को अनुभव न कर ले, और जीवन के परम स्रोत में न डूब जाए, तब तक विक्षिप्तता बनी ही रहती है।

दो शब्द हैं। एक है विक्षिप्तता और एक है, विमुक्तता। मन का होना ही विक्षिप्तता है। ऐसा नहीं है कि कोई—कोई मन पागल होते हैं; मन का स्वभाव ही पागलपन है। मन का अर्थ है, मैडनेस। वह पागलपन है। और जब कोई मन से मुक्त होता है, तो स्वस्थ होता है, तो विमुक्त होता है।

आमतौर से हम सोचते हैं कि किसी का मन खराब है और किसी का मन अच्छा है। यह जानकर आपको हैरानी होगी, योग की दृष्टि से मन का होना ही खराब है। कोई अच्छा मन नहीं होता। मन होता ही रोग है। कोई अच्छा रोग नहीं होता; रोग बुरा ही होता है।

जैसे हम अगर कहें, अभी तूफान था सागर में और अब तूफान शांत हो गया है। तो आप मुझसे पूछ सकते हैं कि शांत तूफान कहां है? तो मैं कहूंगा, शांत तूफान का अर्थ ही यह होता है कि अब तूफान नहीं है। शांत तूफान जैसी कोई चीज नहीं होती। शांत तूफान का अर्थ ही होता है कि तूफान अब नहीं है। तूफान तो जब भी होता है, तो अशांत ही होता है।

ठीक ऐसे ही अगर आप पूछें कि शांत मन क्या है, तो मैं आपसे कहूंगा कि शांत मन जैसी कोई चीज होती ही नहीं। मन तो जब भी होता है, तो अशांत ही होता है।

शांत मन का अर्थ है कि मन रहा ही नहीं। मन और अशांति पर्यायवाची हैं। उन दोनों का एक ही मतलब है। भाषाकोश में नहीं; भाषाकोश में तो मन का अलग अर्थ है और अशांति का अलग अर्थ है। लेकिन जीवन के कोश में मन और अशांति एक ही चीज के दो नाम हैं। और शांति और अमन एक ही चीज के दो नाम हैं। नो—माइंड, अमन।

जब तक आपके पास मन है, आप विक्षिप्त रहेंगे ही। मन भीतर पागल की तरह चलता ही रहेगा। और अगर आपको भरोसा न हो, तो एक छोटा—सा प्रयोग करना शुरू करें।

अपने परिवार को या अपने मित्रों को लेकर बैठ जाएं। एक घंटे दरवाजा बंद कर लें। अपने निकटतम दस—पांच मित्रों को लेकर बैठ जाएं, और एक छोटा—सा प्रयोग करें। आपके भीतर जो चलता हो, उसको जोर से बोलें। जो भी भीतर चलता हो, जिसको आप मन कहते हैं, उसे जोर से बोलते जाएं—ईमानदारी से, उसमें बदलाहट न करें। इसकी फिक्र न करें कि लोग सुनकर क्या कहेंगे। एक छोटा—सा खेल है। इसका उपयोग करें।

आपको बड़ा डर लगेगा कि यह जो भीतर धीमे— धीमे चल रहा है, इसको जोर से कहूं? पत्नी क्या सोचेगी! बेटा क्या सोचेगा! मित्र क्या सोचेंगे! लेकिन अगर सच में हिम्मत हो, तो यह प्रयोग करने जैसा है।

फिर एक—एक व्यक्ति करे; पंद्रह—पंद्रह मिनट एक—एक व्यक्ति बोले। जो भी उसके भीतर हो, उसको जोर से बोलता जाए। आप एक घंटेभर के प्रयोग के बाद पूरा कमरा अनुभव करेगा कि हम सब पागल हैं।

आप कोशिश करके देखें। अगर आपको डर लगता हो दूसरों का, तो किसी दिन अकेले में ही पहले करके देख लें। आपको पता चल जाएगा कि पागल कौन है। लेकिन राहत भी बहुत मिलेगी। अगर इतनी हिम्मत कर सकें मित्रों के साथ, तो यह खेल बड़े ध्यान का है; बहुत राहत मिलेगी। क्योंकि भीतर का बहुत—सा कचरा बाहर निकल जाएगा, और एक हल्कापन आ जाएगा और पहली दफा यह अनुभव होगा कि मेरी असली हालत क्या है। मैं अपने को बुद्धिमान समझ रहा हूं; बड़ा सफल समझ रहा हूं; बड़े पदों पर पहुंच गया हूं; धन कमा लिया है; बड़ा नाम है; इज्जत है; और भीतर यह पागल बैठा है! और इस पागल से छुटकारा पाने का नाम अध्यात्म है।

मेहरबाबा उन्नीस सौ छत्तीस में अमेरिका में थे। और एक व्यक्ति को उनके पास लाया गया। उस व्यक्ति को दूसरों के विचार पढ़ने की कुशलता उपलब्ध थी। उसने अनेक लोगों के विचार पढे थे। वह किसी भी व्यक्ति के सामने आंख बंद करके बैठ जाता था; और वह व्यक्ति जो भीतर सोच रहा होता, उसे बोलना शुरू कर देता। मेहरबाबा वर्षों से मौन थे। तो उनके भक्तों को, मित्रों को जिज्ञासा और कुतूहल हुआ कि वह जो आदमी वर्षों से मौन है, वह भी भीतर तो कुछ सोचता होगा! तो इस आदमी को लाया जाए क्योंकि वे तो कुछ बोलते नहीं।

तो उस आदमी को लाया गया। वह मेहरबाबा के सामने आंख बंद करके, बड़ी उसने मेहनत की। पसीना—पसीना हो गया। फिर उसने कहा कि लेकिन बड़ी मुसीबत है। यह आदमी कुछ सोचता ही नहीं। मैं बताऊं भी तो क्या बताऊं! मैं बोलूं तो भी क्या बोलूं! मैं आंख बंद करता हूं और जैसे मैं एक दीवाल के सामने हूं जहां कोई विचार नहीं है।

इस निर्विचार अवस्था का नाम विमुक्तता है। जब तक भीतर विचार चल रहा है, वह पागल है, वह पागलपन है। यह ऐसा ही समझिए कि आप बैठे—बैठे दोनों टल चलाते रहें यहां। तो आपको पड़ोसी आदमी कहेगा, बंद करिए टांग चलाना! आपका दिमाग ठीक है? आप टांगें क्यों चला रहे हैं? टांग को चलाने की जरूरत है, जब कोई चल रहा हो रास्ते पर। बैठकर टांग क्यों चला रहे हैं?

मन की भी तब जरूरत है, जब कोई सवाल सामने हो, उसको हल करना हो, तो मन चलाएं। लेकिन न कोई सवाल है, न कोई बात सामने है। बैठे हैं, और मन की टांगें चल रही हैं। यह विक्षिप्तता है, यह पागलपन है।

आपका मन चलता ही रहता है। आप चाहें भी रोकना, तो रुकता नहीं। कोशिश करके देखें। रोकना चाहेंगे, तो और भी नहीं रुकेगा। और जोर से चलेगा। और सिद्ध करके बता देगा कि तुम मालिक नहीं हो, मालिक मैं हूं। छोटी—सी कोई बात रोकने की कोशिश करें। और वही—वही बात बार—बार मन में आनी शुरू हो जाएगी। लोग बैठकर राम का स्मरण करते हैं। राम का स्मरण करते हैं, नहीं आता। कुछ और—और आता है, कुछ दूसरी बातें आती हैं। एक महिला मेरे पास आई, वह कहने लगी कि मैं राम की भक्त हूं। बहुत स्मरण करती हूं लेकिन वह नाम छूट—छूट जाता है और दूसरी चीजें आ जाती हैं!

मैंने कहा कि तू एक काम कर। कसम खा ले कि राम का नाम कभी न लूंगी। फिर देख। उसने कहा, आप क्या कह रहे हैं! मैंने कहा, तू कसम खाकर देख। और हर तरह से कोशिश करना कि राम का नाम भर भीतर न आने पाए।

वह तीसरे दिन मेरे पास आई। उसने कहा कि आप मेरा दिमाग खराब करवा दोगे। चौबीस घंटे सिवाय राम के और कुछ आ ही नहीं रहा है। और मैं कोशिश में लगी हूं कि राम का नाम न आए, और राम का नाम आ रहा है!

मन सिद्ध करता है हमेशा कि आप मालिक नहीं हैं, वह मालिक है। और जब तक मन मालिक है, आप पागल हैं। जिस दिन आप मालिक हों, उस दिन स्वस्थ हुए स्वयं में स्थित हुए।

अध्यात्म से गुजरे बिना कोई भी स्वस्थ नहीं होता है।

ओशो रजनीश






सोमवार, 10 मई 2021

इनहेलर

 

जानिए अस्थमा का आम इनहेलर कोविड-19 के इलाज में कैसे करता है मदद?

 अस्थमा के इलाज में काम आनेवाली आम दवा कोविड-19 के इलाज में असरदार साबित हुई है. अस्थमा के इन्हेलर ने कोविड-19 मरीजों को अस्पताल भेजने की 90 फीसद जरूरत को कम करती है और रिकवरी के समय को घटाती है.

आमतौर पर अस्थमा के लिए इस्तेमाल किया जानेवाला इलाज कोविड-19 मरीजों के अस्पताल में ठहरने का समय कम करने और ठीक होने की रफ्तार बढ़ाने में मदद कर सकता है.  दवा को लक्षण जाहिर होने के सात दिनों में देने से फायदा पहुंच सकता है.
बुडेसोनाइड का इस्तेमाल धूम्रपान से प्रभावित फेफड़े का इलाज करने में किया जाता है. एस्ट्राजेनेका दवा कंपनी उसे पल्मीकोर्ट के ब्रांड नाम से बेचती है. उसके इस्तेमाल से कोविड-19 के इलाज में मरीजों को लगनेवाला समय कम हो गया.  एक दिन में दो बार बुडेसोनाइड का 800 माइक्रोग्राम दिया गया .
  सांस के जरिए ली जानेवाली बुडेसोनाइड ने फौरी चिकित्सा की जरूरत या अस्पताल में भर्ती होने का खतरा 90 फीसद कम कर दिया.   सांस का स्टेरॉयड महामारी के दौरान सामने आ रहे दबावों पर प्रभाव डाल सकती है.


 स्टेरॉयड बुडेसोनाइड से इलाज के 14 और 28 दिनों के बाद कोरोना वायरस के लगातार लक्षणों में भी कई आ गई.  कोरोना वायरस महामारी के शुरुआती दिनों में पुरानी सांस की बीमारी से पीड़ित जिनको अक्सर सांस का स्टेरॉयड लिखा जाता है, उनकी बहुत कम तादाद कोविड-19 का शिकार होकर अस्पताल में दाखिल हुई थी. पल्मीकोर्ट एस्ट्राजेनेका की बहुत ज्यादा बिकनेवाली दवा है. 

डेक्सामेथासोन (Dexamethasone) नामक स्टेराइड के इस्तेमाल से गंभीर रूप से बीमार मरीजों की मृत्यु दर एक तिहाई तक कम किया जा सकता है। डेक्सामेथासोन दवा को मरीजों को केवल 10 दिनों तक दिया जाता है। 





“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...