गुरुवार, 19 अगस्त 2021

मीरा

 बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल।

मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक शोभे भाल।

अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंति माल।

छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बच्छल गोपाल।


हरि मोरे जीवन प्राण आधार।

और आसिरो नाहिं तुम बिन, तीनूं लोक मंझार।

आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरखौ सब संसार।

मीरा कहै मैं दास रावरी, दीज्यौ मति विसार।



मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।

छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।

संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई।

अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि बोई।

अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई।

भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।

दासी मीरा लाल गिरधर, तारो अब मोहि।


आओ, प्रेम की एक झील में नौका-विहार करें। और ऐसी झील मनुष्य के इतिहास में दूसरी नहीं है, जैसी झील मीरा है। मानसरोवर भी उतना स्वच्छ नहीं।

और हंसों की ही गति हो सकेगी मीरा की इस झील में। हंस बनो, तो ही उतर सकोगे इस झील में। हंस न बने तो न उतर पाओगे।

हंस बनने का अर्थ है: मोतियों की पहचान आंख में हो, मोती की आकांक्षा हृदय में हो। हंसा तो मोती चुगे!

कुछ और से राजी मत हो जाना। क्षुद्र से राजी हो गया, वह विराट को पाने में असमर्थ हो जाता है। नदी-नालों का पानी पीने से जो तृप्त हो गया, वह मानसरोवरों तक नहीं पहुंच पाता है; जरूरत ही नहीं रह जाती।

मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूं। मीरा नाव बन सकती है। मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं। उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो।

मीरा तीर्थंकर है। उसका शास्त्र प्रेम का शास्त्र है। शायद शास्त्र कहना भी ठीक नहीं।

नारद ने भक्ति-सूत्र कहे; वह शास्त्र है। वहां तर्क है, व्यवस्था है, सूत्रबद्धता है। वहां भक्ति का दर्शन है।

मीरा स्वयं भक्ति है। इसलिए तुम रेखाबद्ध तर्क न पाओगे। रेखाबद्ध तर्क वहां नहीं है। वहां तो हृदय में कौंधती हुई बिजली है। जो अपने आशियाने जलाने को तैयार होंगे, उनका ही संबंध जुड़ पाएगा।

प्रेम से संबंध उन्हीं का जुड़ता है, जो सोच-विचार खोने को तैयार हों; जो सिर गंवाने को उत्सुक हों। उस मूल्य को जो नहीं चुका सकता, वह सोचे भक्ति के संबंध में, विचारे; लेकिन भक्त नहीं हो सकता।

तो मीरा के शास्त्र को शास्त्र कहना भी ठीक नहीं। शास्त्र कम है, संगीत ज्यादा है। लेकिन संगीत ही तो केवल भक्ति का शास्त्र हो सकता है। जैसे तर्क ज्ञान का शास्त्र बनता है, वैसे संगीत भक्ति का शास्त्र बनता है। जैसे गणित आधार है ज्ञान का, वैसे काव्य आधार है भक्ति का। जैसे सत्य की खोज ज्ञानी करता है, भक्त सत्य की खोज नहीं करता, भक्त सौंदर्य की खोज करता है। भक्त के लिए सौंदर्य ही सत्य है। ज्ञानी कहता है: सत्य सुंदर है। भक्त कहता है: सौंदर्य सत्य है।

रवींद्रनाथ ने कहा है: ब्यूटी इज़ ट्रुथ। सौंदर्य सत्य है। रवींद्रनाथ के पास भी वैसा ही हृदय है जैसा मीरा के पास; लेकिन रवींद्रनाथ पुरुष हैं। गलते-गलते भी पुरुष की अड़चनें रह जाती हैं; मीरा जैसे नहीं पिघल पाते। खूब पिघले। जितना पिघल सकता है पुरुष, उतने पिघले; फिर भी मीरा जैसे नहीं पिघल पाते।

मीरा स्त्री है। स्त्री के लिए भक्ति ऐसे ही सुगम है जैसे पुरुष के लिए तर्क और विचार।

वैज्ञानिक कहते हैं: मनुष्य का मस्तिष्क दो हिस्सों में विभाजित है। बाईं तरफ जो मस्तिष्क है वह सोच-विचार करता है; गणित, तर्क, नियम, वहां सब शृंखलाबद्ध है। और दाईं तरफ जो मस्तिष्क है वहां सोच-विचार नहीं है; वहां भाव है, वहां अनुभूति है। वहां संगीत की चोट पड़ती है। वहां तर्क का कोई प्रभाव नहीं होता। वहां लयबद्धता पहुंचती है। वहां नृत्य पहुंच जाता है; सिद्धांत नहीं पहुंचते।

स्त्री दाएं तरफ के मस्तिष्क से जीती है; पुरुष बाएं तरफ के मस्तिष्क से जीता है। इसलिए स्त्री-पुरुष के बीच बात भी मुश्किल होती है; कोई मेल नहीं बैठता दिखता है। पुरुष कुछ कहता है, स्त्री कुछ कहती है। पुरुष और ढंग से सोचता है, स्त्री और ढंग से सोचती है। उनके सोचने की प्रक्रियाएं अलग हैं। स्त्री विधिवत नहीं सोचती; सीधी छलांग लगाती है, निष्कर्षों पर पहुंच जाती है। पुरुष निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, विधियों से गुजरता है। क्रमबद्ध--एक-एक कदम।

प्रेम में काई विधि नहीं होती, विधान नहीं होता। प्रेम की क्या विधि और क्या विधान! हो जाता है बिजली की कौंध की तरह। हो गया तो हो गया। नहीं हुआ तो करने का कोई उपाय नहीं है।

पुरुषों ने भी भक्ति के गीत गाए हैं लेकिन मीरा का कोई मुकाबला नहीं है; क्योंकि मीरा के लिए, स्त्री होने के कारण जो बिलकुल सहज है, वह पुरुष के लिए थोड़ा आरोपित सा मालूम पड़ता है। पुरुष भक्त हुए; जिन्होंने अपने को परमात्मा की प्रेयसी माना, पत्नी माना, मगर बात कुछ अड़चन भरी हो जाती है। संप्रदाय है ऐसे भक्तों का, बंगाल में अब भी जीवित--जो पुरुष हैं लेकिन अपने को मानते हैं कृष्ण की पत्नी। रात स्त्री जैसा शृंगार करके, कृष्ण की मूर्ति को छाती से लगा कर सो जाते हैं। मगर बात में कुछ बेहूदापन लगता है। बात कुछ जमती नहीं। ऐसा ही बेहूदापन लगता है जैसे कि तुम, जहां जो नहीं होना चाहिए, उसे जबरदस्ती बिठाने की कोशिश करो, तो लगे।

पुरुष पुरुष है; उसके लिए स्त्री होना ढोंग ही होगा। भीतर तो वह जानेगा ही कि मैं पुरुष हूं। ऊपर से तुम स्त्री के वस्त्र भी पहन लो और कृष्ण की मूर्ति को हृदय से भी लगा लो--तब भी तुम भीतर के पुरुष को इतनी आसानी से खो न सकोगे। यह सुगम नहीं होगा।

स्त्रियां भी हुई हैं जिन्होंने ज्ञान के मार्ग से यात्रा की है, मगर वहां भी बात कुछ बेहूदी हो गई। जैसे ये पुरुष बेहूदे लगते हैं और थोड़ा सा विचार पैदा होता है कि ये क्या कर रहे हैं! ये पागल तो नहीं हैं!--ऐसे ही "लल्ला' कश्मीर में हुई, वह महावीर जैसे विचार में पड़ गई होगी; उसने वस्त्र फेंक दिए, वह नग्न हो गई। लल्ला में भी थोड़ा सा कुछ अशोभन मालूम होता है। स्त्री अपने को छिपाती है। वह उसके लिए सहज है। वह उसकी गरिमा है। वह अपने को ऐसा उघाड़ती नहीं। ऐसा उघाड़ती है तो वेश्या हो जाती है।

लल्ला ने बड़ी हिम्मत की, फेंक दिए वस्त्र। असाधारण स्त्री रही होगी! लेकिन थोड़ी सी अस्वाभाविक मालूम होती है बात। महावीर के लिए नग्न खड़े हो जाना अस्वाभाविक नहीं लगता; बिलकुल स्वाभाविक लगता है। ऐसी ही बात है।

मीरा में जैसी सहज उदभावना हुई है भक्ति की, कहीं भी नहीं है। भक्त और भी हुए हैं, लेकिन सब मीरा से पीछे पड़ गए, पिछड़ गए। मीरा का तारा बहुत जगमगाता हुआ तारा है। आओ इस तारे की तरफ चलें। अगर थोड़ी सी भी बूंदें तुम्हारे जीवन में बरस जाएं, मीरा के रस की, तो भी तुम्हारे रेगिस्तान में फूल खिल जाएंगे। अगर तुम्हारे हृदय में थोड़े से भी वैसे आंसू घुमड़ आएं, जैसे मीरा को घुमड़े, और तुम्हारे हृदय में थोड़े से राग बजने लगें, जैसा मीरा को बजा, थोड़ा सा सही! एक बूंद भी तुम्हें रंग जाएगी और नया कर जाएगी।

तो मीरा को तर्क और बुद्धि से मत सुनना। मीरा का कुछ तर्क और बुद्धि से लेना-देना नहीं है। मीरा को भाव से सुनना, भक्ति से सुनना, श्रद्धा की आंख से देखना। हटा दो तर्क इत्यादि को, किनारे सरका कर रख दो। थोड़ी देर के लिए मीरा के साथ पागल हो जाओ। यह मस्तों की दुनिया है। यह प्रेमियों की दुनिया है। तो ही तुम समझ पाओगे, अन्यथा चूक जाओगे।

बहुत बार मौके आए जब मैं मीरा पर बोलता; लेकिन टालता गया। क्योंकि मीरा पर कुछ बोलना कठिन है। महावीर पर बोलना बहुत आसान है। बुद्ध पर बोलना बहुत आसान है। पतंजलि पर बोलना बहुत आसान है। मीरा पर बोलना बहुत कठिन है। क्योंकि यह बात बोलने की है ही नहीं; यह बात तो होने की है। यह भाव की है। मीरा गुनगुनाई जा सकती है, मीरा पर बोलो क्या? मीरा गाई जा सकती है, मीरा पर बोलो क्या? मीरा नाची जा सकती है, मीरा पर बोलो क्या?

इसलिए तुम से कहता हूं: आओ, इस गौरीशंकर पर चढ़ें--प्रेम के गौरीशंकर पर! इस ऊंचाई पर पंख फैलाएं! केवल वे ही उड़ पाने में समर्थ होंगे जो तर्क का बोझ एक तरफ हटा कर रख देंगे।

मीरा के पास तुम्हें देने को बहुत है। मीरा एक मेघ है, जो बरस जाए तो तुम तृप्त हो जाओ।

तरानों में मोहब्बत का तराना ले के आया हूं

फसानों में हकीकत का फसाना ले के आया हूं

तलाशे बर्के आदम सोज में निकला हूं जन्नत से

जलाने ही को आखिर आशियाना ले के आया हूं

जमाने से अलग हूं अहले सोहबत के लिए लेकिन

नया हक्को अमल का इक जमाना ले के आया हूं

उठ और तय दो जहां की मंजिलें एक गाम में कर ले

जनूने अर्शो पैमां वालहाना ले के आया हूं।

उठ! जाग!

उठ और तय दो जहां की मंजिलें एक गाम में कर ले

मीरा के साथ सारी यात्रा एक कदम में हो सकती है। तर्क बहुत कदम लेता है, क्योंकि विधि से चलता है। मीरा छलांग है।

उठ और तय दो जहां की मंजिलें एक गाम में कर ले

इसलिए तुमसे कहता हूं कि आओ, एक ही कदम में यह यात्रा हो सकती है।

जनूने अर्शो पैमां वालहाना ले के आया हूं।

मीरा मस्ती से भरी हुई एक शराब लिए खड़ी है। उसका रसास्वादन करो। मीरा शराब है--पीओ। समझो कम--पीओ ज्यादा। उसका तराना प्रेम का तराना है।

मुझे मौका दो कि मैं तुम्हारे हृदय की वीणा को थोड़ा बजा सकूं। तो ही तुम समझ पाओगे।

ये मीरा के जो वचन हम सुनेंगे, चर्चा करेंगे, गुनगुनाएंगे, डूबेंगे--इन वचनों में ऊपर से कोई तारतम्य नहीं है। ये तो भक्त की अनुभूतियां हैं। लेकिन भीतर बड़ा तारतम्य है। ऊपर-ऊपर कुछ न दिखाई पड़ेगा कि इनमें क्या संबंध है। मीरा ने कोई रामचरितमानस नहीं लिखा है कि शुरू किया बालकांड से और चले। ये तो भाव की अराजक अभिव्यक्तियां हैं। जब उठा भाव, गाया। जैसा उठा वैसा गाया। फिर यह लोगों के सामने भी गाई गई बातें नहीं हैं। ये तो उस परम प्यारे के सामने गाए गए गीत हैं। इन गीतों में सुधार भी नहीं किया गया है। कवि लिखता तो खूब सुधार-संशोधन करता है। ये तो कच्चे, कोरे, वैसे के वैसे जैसे खदान से हीरे निकलते हैं--तराशे नहीं गए--बेतराशे, अनगढ़!

मीरा को फिकर नहीं है आदमियों की कि इनमें, गीतों में भूल-चूक लगेगी, काव्य के नियम पूरे होंगे कि नहीं, मात्राएं ठीक बैठती हैं कि नहीं; इस सबका कोई हिसाब नहीं है।

तुम जब अपने प्रेमी के सामने गीत गाते हो तो यह सब थोड़े ही फिकर रखते हो! प्रेमी तुम्हारा परीक्षक थोड़े ही है! प्रेमी के सामने जब तुम गीत गाते हो, तो तुम यह थोड़े ही सोचते हो कि गीत भाषा की दृष्टि से, व्याकरण की दृष्टि से, मात्रा-छंद की दृष्टि से--पूरा है या नहीं! इतना ही देखते हो कि मेरा हृदय इस गीत में उंडल रहा है या नहीं! जब शराब से भरी हुई प्याली हो तो प्याली का आकार कौन देखता है--किस आकार की है!

तो तुम पीओगे तो समझोगे। और तारतम्य भी मिलेगा। लेकिन तारतम्य ऐसा रहेगा, ऊपर-ऊपर से दिखाई नहीं पड़ेगा! जैसे एक गुलाब की झाड़ी पर बहुत से गुलाब के फूल खिले हैं, ऊपर से तो कोई जुड़े दिखाई नहीं पड़ते। कोई छोटा है, कोई बड़ा है। और अगर माली कुशल रहा हो तो कोई सफेद है, और कोई लाल है, और कोई पीला है। सब अलग-अलग ढंग के खिले हैं। लेकिन सब एक ही जड़ से जुड़े हैं। वही जड़ तुम्हें दिखाई पड़ जाए तो तुम मीरा के साथ हो लोगे।

इसके पहले कि हम मीरा के शब्दों में उतरें, मीरा के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।

पहली बात: मीरा का कृष्ण से प्रेम मीरा की तरह शुरू नहीं हुआ! प्रेम का इतना अपूर्व भाव इस तरह शुरू हो भी नहीं सकता। यह कहानी पुरानी है। यह मीरा कृष्ण की पुरानी गोपियों में से एक है। मीरा ने खुद भी इसकी घोषणा की है, लेकिन पंडित तो मानते नहीं। क्योंकि इसके लिए इतिहास का कोई प्रमाण नहीं है। मीरा ने खुद भी कहा है कि कृष्ण के समय में मैं उनकी एक गोपी थी, ललिता मेरा नाम था। मगर पंडित तो इसको टाल जाते हैं; यह बात को ही कह देते हैं कि किंवदंती है, कथा-कहानी है। मैं ऐसा न कर सकूंगा। मैं पंडित नहीं हूं। और हजार पंडित कहते हों तो उनकी मैं दो कौड़ी की मानता हूं। मीरा खुद कहती है, उसे मैं स्वीकार करता हूं। सच-झूठ का मुझे हिसाब भी नहीं लगाना है। बात के इतिहास होने न होने से कोई प्रयोजन भी नहीं है। मीरा का वक्तव्य, मैं राजी हूं। मीरा जब खुद कहती है तो बात खतम हो गई। फिर किसी और को इसमें और प्रश्न उठाने का प्रश्न नहीं उठना चाहिए। और जो इस तरह के प्रश्न उठाते हैं वे मीरा को समझ भी न पाएंगे।

अंग्रेजी में एक शब्द है: देजावुह। उसका अर्थ होता है: पूर्वभव की स्मृति का अचानक उठ आना। कभी-कभी तुम्हें भी देजावुह होता है।

कल रात ही एक युवा संन्यासी मुझसे बात कर रहा था। उसने बार-बार मुझे पत्र लिखे, वह बड़ा परेशान था। परेशानी होगी ही। उसे कई बार ऐसा लगता है यहां इन गैरिक वस्त्रधारी संन्यासियों के साथ उठते-बैठते-चलते कि जैसे पहले भी वह कभी ऐसी ही किसी स्थिति में रहा है--पहले कभी किसी जन्म में। इससे बड़ी बेचैनी भी हो जाती है। कभी-कभी तो कोई घटना उसे ऐसी लगती है कि बिलकुल फिर से दोहर रही है। तो बेचैनी स्वाभाविक है। और पश्चिम से आया युवक है तो बेचैनी और स्वाभाविक है। उसने बहुत बार मुझे लिखा। कल वह विदा होने को आया था, अब वह जा रहा है वापस, तो मुझसे पूछने लगा: आपने कभी कुछ कहा नहीं कि मैं क्या करूं? मुझे बार-बार ऐसा लगता है। तो उसे मैंने कहा कि देजावुह, यह पूर्वभव का स्मरण एक वास्तविकता है। बेचैन तो करेगी, क्योंकि इससे तर्क का कोई संबंध नहीं जुड़ता है।

हम यहां नये नहीं हैं, हम यहां प्राचीन हैं; सनातन से हैं। ऐसा कोई समय न था जब तुम न थे। ऐसा कोई समय न था जब मैं न था। ऐसा कोई समय न था, न ऐसा कोई कभी समय होगा जब तुम नहीं हो जाओगे। रहोगे, रहोगे, रहोगे। रूप बदलेंगे, ढंग बदलेंगे, शैलियां बदलेंगी--अस्तित्व शाश्वत है। जो शाश्वत है, वही सत्य है; शेष सत्य जो बदलता जाता है, वह तो केवल आवरण है। जैसे कोई वस्त्र बदल लेता है। तो रामकृष्ण ने मरते वक्त कहा: रोओ मत, क्योंकि मैं केवल वस्त्र बदल रहा हूं। और रमण ने मरते वक्त कहा--जब किसी ने पूछा कि आप कहां चले जाएंगे? आप कहां जा रहे हैं? हमें छोड़ कर कहां जा रहे हैं? तो उन्होंने कहा: बंद करो यह बकवास! मैं कहां जाऊंगा? मैं यहां था और यहीं रहूंगा। जाना कहां है! यही तो एकमात्र अस्तित्व है।

रूप बदलते हैं। बीज वृक्ष हो जाता है; वृक्ष बीज हो जाता है। गंगा सागर बन जाती है; सागर सूरज की किरणों से चढ़ कर मेघ बन जाता है, मेघ फिर गंगा में गिर जाता है। फिर गंगा सागर में गिर जाती है। मगर एक जल की बूंद भी कभी खोई नहीं है; जल उतना ही है जितना सदा से था। और एक भी आत्मा कहीं खोई नहीं है।

तो मैंने उस युवक को कहा: बिलकुल घबड़ाओ ना। हो सकता है, मेरे पास तुम कभी अतीत में न भी बैठे हो; यह हो सकता है, क्योंकि यह अनंत है जगत। यह हो सकता है कि मेरा तुमसे मिलना कभी न हुआ हो, लेकिन फिर भी यह बात पक्की है कि मेरे जैसे किसी आदमी से तुम्हारा मिलना हुआ होगा। तुमने किसी बुद्ध की आंखों में झांका होगा। तुम किसी सदगुरु के चरणों में बैठे होओगे। फिर वह कौन था, मोहम्मद था कि कृष्ण कि क्राइस्ट इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि सदगुरुओं का स्वाद एक है और उनकी आंखों का दृश्य एक है।

तो कभी-कभी अगर तुम बुद्ध के साथ रहे हो ढाई हजार साल पहले, तो मेरे पास बैठे-बैठे एक क्षण को तुम अभिभूत हो जाओगे। एक क्षण को लगेगा: यह तो फिर वैसे ही कुछ हो रहा है, जैसे पहले हुआ है। एक क्षण को यहां से तुम विदा जाओगे और अतीत का दृश्य खुल जाएगा। कोई पर्दा जैसे पड़ा था। और अचानक तुम पाओगे: यह तो वही हो रहा है जो पहले हुआ। शायद कभी ऐसा भी हो सकता है कि मैं तुमसे जो शब्द कहूं, वे ही शब्द तुमसे बुद्ध ने भी कहे हों। और यह भी संभव है कि कभी तुम मेरे साथ भी रहे हो। सभी कुछ संभव है। इस जगत में असंभव कुछ भी नहीं है।

मीरा ने कहा है: मैं ललिता थी। कृष्ण के साथ नाची, वृंदावन में कृष्ण के साथ गाई। यह प्रेम पुराना है--मीरा यही कह रही है--यह प्रेम नया नहीं है। और इसकी शुरुआत जिस ढंग से हुई, वह शुरुआत भी करती है साफ कि पंडित गलत होंगे, मीरा सही है। और पंडित कितने ही सही लगें, फिर भी सही नहीं होते, क्योंकि उनके सोचने का ढंग ही बुनियाद से गलत होता है। वे प्रमाण मांगते हैं। अब प्रमाण क्या? किसी अदालत की सील-मोहर लगी हुई कोई फाइल मौजूद करे मीरा, कि कृष्ण के समय में थी? कहां से प्रमाणपत्र लाए? गवाह जुटाए? अंतर्भाव पर्याप्त है। और उसका अंतर्भाव प्रमाण है।

मीरा छोटी थी, चार-पांच साल की रही होगी, तब एक साधु मीरा के घर मेहमान हुआ, और जब सुबह साधु ने उठ कर अपनी मूर्ति--कृष्ण की मूर्ति छुपाए था अपनी गुदड़ी में--निकाल कर जब उसकी पूजा की तो मीरा एकदम पागल हो गई। देजावुह हुआ। पूर्वभव का स्मरण आ गया। वह मूर्ति कुछ ऐसी थी कि चित्र पर चित्र खुलने लगे। वह मूर्ति जो थी--शुरुआत हो गई फिर से कहानी की; निमित्त बन गई। उससे चोट पड़ गई। कृष्ण की मूरत फिर याद आ गई। फिर वह सांवला चेहरा, वे बड़ी आंखें, वे मोरमुकुट में बंधे, वे बांसुरी बजाते कृष्ण! मीरा लौट गई हजारों साल पीछे अपनी स्मृति में। रोने लगी। साधु से मांगने लगी मूर्ति। लेकिन साधु को भी बड़ा लगाव था अपनी मूर्ति से; उसने मूर्ति देने से इनकार कर दिया। वह चला भी गया। मीरा ने खाना-पीना बंद दिया।

पंडितों के लिए यह प्रमाण नहीं होता कि इससे कुछ प्रमाण है देजावुह का। लेकिन मेरे लिए प्रमाण है। चार-पांच साल की बच्ची! हां, बच्चे कभी-कभी खिलौनों के लिए भी तरस जाते हैं, लेकिन घड़ी-दो घड़ी में भूल जाते हैं। दिन भर बीत गया, न उसने खाना खाया, न पानी पीया। उसकी आंखों से आंसू बहते रहे। वह रोती ही रही। उसके घर के लोग भी हैरान हुए कि अब क्या करें? साधु तो गया भी, कहां उसे खोजें? और वह देगा, इसकी भी संभावना कम है।

और वह कृष्ण की मूरत जरूर ही बड़ी प्यारी थी, घर के लोगों को भी लगी थी। उन्होंने भी बहुत मूर्तियां देखी थीं, मगर उस मूर्ति में कुछ था जीवंत, कुछ था जागता हुआ, उस मूर्ति की तरंग ही और थी। जरूर किसी ने गढ़ी होगी प्रेम से; व्यवसाय के लिए नहीं। किसी ने गढ़ी होगी भाव से। किसी ने अपनी सारी प्रार्थना, अपनी सारी पूजा उसमें ढाल दी होगी। या किसी ने, जिसने कृष्ण को कभी देखा होगा, उसने गढ़ी होगी। मगर बात कुछ ऐसी थी, मूर्ति कुछ ऐसी थी कि मीरा भूल ही गई, इस जगत को भूल ही गई। वह तो उस मूर्ति को लेकर रहेगी, नहीं तो मर जाएगी। यह विरह की शुरुआत हुई चार-पांच साल की उम्र में!

रात उस साधु ने सपना देखा। दूर दूसरे गांव में जाकर सोया था। रात सपना आया: कृष्ण खड़े हैं। उन्होंने कहा कि मूर्ति जिसकी है उसको लौटा दे। तूने रख ली, बहुत दिन तक; यह अमानत थी; मगर यह तेरी नहीं है। अब तू नाहक मत ढो। तू वापस जा, मूर्ति उस लड़की को दे दे; जिसकी है उसको दे दे। उसकी थी, तेरी अमानत पूरी हो गई। तेरा काम पूरा हो गया। यहां तक तुझे पहुंचाना था, वहां तक पहुंचा दिया; अब खतम हो गई।

मूर्ति उसकी है जिसके हृदय में मूर्ति के लिए प्रेम है। और किसकी मूर्ति? साधु तो घबड़ा गया। कृष्ण तो कभी उसे दिखाई भी न पड़े थे। वर्षों से प्रार्थना-पूजा कर रहा था, वर्षों से इसी मूर्ति को लिए चलता था, फूल चढ़ाता था, घंटी बजाता था, कृष्ण कभी दिखाई न पड़े थे। वह तो बहुत घबड़ा गया। वह तो आधी रात भागा हुआ आया। आधी रात आकर जगाया और कहा: मुझे क्षमा करो, मुझसे भूल हो गई। इस छोटी सी लड़की के पैर पड़े, इसे मूर्ति देकर वापस हो गया।

यह जो चार-पांच साल की उम्र में घटना घटी, इससे फिर से दृश्य खुले; फिर प्रेम उमगा; फिर यात्रा शुरू हुई। यह मीरा के इस जीवन में कृष्ण के साथ पुनर्गठबंधन की शुरुआत है। मगर यह नाता पुराना था। नहीं तो बड़ा कठिन है। कृष्ण को देखा न हो, कृष्ण को जाना न हो, कृष्ण की सुगंध न ली हो, कृष्ण का हाथ पकड़ कर नाचे न होओ--तो लाख उपाय करो, तुम कृष्ण को कभी जीवंत अनुभव न कर सकोगे। इसलिए जीता सदगुरु ही सहयोगी होता है।

तुम भी कृष्ण की मूर्ति रख कर बैठ सकते हो, मगर तुम्हारे भीतर भाव का उद्रेक नहीं होगा। भाव के उद्रेक के लिए तुम्हारी अंतर-कथा में कोई संबंध चाहिए कृष्ण से; तुम्हारी अंतर-कथा में कोई समानांतर दशा चाहिए।

मीरा का भजन तुम भी गा सकते हो; लेकिन जब तक कृष्ण से तुम्हारा कुछ अंतर-नाता न हो, तब तक भजन ही रह जाएगा, जुड़ न पाओगे। हृदय--हृदय न मिलेगा, सेतु न बनेगा।

वह चार-पांच वर्ष की उम्र में घटी छोटी सी घटना--सांयोगिक घटना--और क्रांति हो गई। मीरा मस्त रहने लगी, जैसे एक शराब मिल गई। दो वर्ष बाद पड़ोस में किसी का विवाह हुआ, और यह सात-आठ साल की लड़की ने पूछा अपनी मां को: सबका विवाह होता है, मेरा कब होगा? और मेरा वर कौन है?

और मां ने तो ऐसे ही मजाक में कहा, क्योंकि वह उस वक्त भी कृष्ण की मूर्ति को छाती से लगाए खड़ी थी--कि तेरा वर कौन है?--यह गिरधर गोपाल! यह गिरधरलाल! यही तेरे वर हैं! और क्या चाहिए? यह तो मजाक में ही कहा था! मां को क्या पता था कि कभी-कभी मजाक में कही गई बात भी क्रांति हो जा सकती है। और क्रांति हो गई।

और कभी-कभी कितनी ही गंभीरता से तुमसे कहा जाए, कुछ भी नहीं होता, क्योंकि तुम्हारे भीतर कुछ छूता ही नहीं। हो तो छुए। बीज को पत्थर पर फेंक दोगे तो अंकुरित नहीं होता; ठीक भूमि मिल जाए तो अंकुरित हो जाता है। वह ठीक भूमि थी। मां को भी पता नहीं था; सोचती थी कि बच्चे का खिलवाड़ है; कृष्ण एक खिलौना हैं। मिल गए हैं इसको। सुंदर मूर्ति है, माना। तो नाचती-गुनगुनाती रहती है--ठीक है--अपने उलझी रहती है; कुछ हर्जा भी नहीं है। मजाक में ही कहा था कि तेरे तो और कौन पति! ये गिरिधर गोपाल हैं! ये नंदलाल हैं! मगर उसका मन उसी दिन भर गया। यह बात हो गई। कभी-कभी संयोग महारंभ बन जाते हैं--महाप्रस्थान के पथ पर। उसने तो मान ही लिया। वह छोटा सा भोला-भाला मन! उसने मान लिया कि यही उसके पति हैं। फिर क्षण भर को भी यह बात डगमगाई नहीं। फिर क्षण भर को भी यह बात भूली नहीं।

असल में बचपन में अगर कोई भाव बैठ जाए तो बड़ा दूरगामी होता है। यह बात बैठ गई। उस दिन से उसने अपना सारा प्रेम, कृष्ण पर उंडेल दिया। जितना तुम प्रेम उंडेलोगे, उतने ही कृष्ण जीवित होते चले गए। पहले अकेली बात करती थी, फिर कृष्ण भी बात करने लगे। पहले अकेली डोलती थी, फिर कृष्ण भी डोलने लगे। यह नाता भक्त का और मूर्ति का न रहा; भक्त और भगवान का हो गया।

और इसके बाद कुछ घटनाएं घटीं, जो खयाल में ले लेनी चाहिए--जो महत्वपूर्ण हैं।

मीरा पर जिन लोगों ने किताबें लिखी हैं, वे सब लिखते हैं: दुर्भाग्य से मीरा की मां मर गई, जब वह बहुत छोटी थी। फिर उसके बाबा ने उसे पाला। फिर बाबा मर गए। फिर सत्रह-अठारह साल की उम्र में उसका विवाह किया गया। फिर उसके पति मर गए। फिर ससुर ने उसकी सम्हाल की। और फिर ससुर भी मर गए। फिर पिता उसकी देखभाल किए, फिर पिता भी मर गए। ऐसी पांच मृत्युएं हुईं। जब मीरा कोई बत्तीसत्तैंतीस साल की थी, तब तक उसके जीवन में जो भी महत्वपूर्ण व्यक्ति थे, सभी मर गए। जिनको भी उसने चाहा था और प्रेम किया था, वे सब मर गए।

जो लोग मीरा पर किताबें लिखते हैं--वे सब लिखते हैं: दुर्भाग्य से। मैं ऐसा नहीं कह सकता। यह सौभाग्य से ही हुआ। वे लिखते हैं दुर्भाग्य से, क्योंकि मृत्यु को सभी लोग दुर्भाग्य मानते हैं। लेकिन यही तो मीरा के जन्म का कारण बना। जितना भी प्रेम कहीं था, वह सब सिकुड़ता गया। सारा प्रेम गोपाल पर उमड़ता गया। मां से लगाव था, मां चल बसी। उतना प्रेम जो मां से उलझा था, वह भी गोपाल के चरणों में रख दिया। फिर बाबा ने पाला, फिर बाबा चल बसे; उनसे प्रेम था, वह भी गोपाल के चरणों में रख दिया। ऐसे संसार छोटा होता गया, सिकुड़ता गया और परमात्मा बड़ा होता गया। तो मैं नहीं कह सकता दुर्भाग्य से; मैं तो कहूंगा सौभाग्य से; क्योंकि मृत्यु का मेरे लिए कोई ऐसा भाव नहीं है, मृत्यु के प्रति कि वह कोई आवश्यक रूप से अभिशाप है। सब तुम पर निर्भर है। मीरा ने उसका ठीक उपयोग कर लिया। जहां-जहां से प्रेम उखड़ता गया, एक-एक प्रेम-पात्र जाने लगा, वह अपने उस प्रेम को परमात्मा में चढ़ाने लगी।

अंतिम सूत्र था--पिता का रहना। पिता भी चल बसे। पति भी चल बसे, पिता भी चल बसे। पांच मृत्युएं हो गईं सतत। जगत से सारा संबंध टूट गया। उसने ठीक उपयोग कर लिया। जगत से टूटते हुए संबंधों को उसने जगत के प्रति वैराग्य बना लिया। और जगत से जो प्रेम मुक्त हो गया, उसको परमात्मा के चरणों में चढ़ा दिया। वह कृष्ण के राग में डूब गई।

और इन मृत्युओं ने एक और सौभाग्य का काम किया, कि इन्होंने एक बात दिखा दी कि इस जगत में सब क्षणभंगुर है; अगर प्यारा खोजना हो तो शाश्वत में खोजो। यहां कुछ अपना नहीं है। यहां भरमो मत, अपने को भरमाओ मत! यहां सब छूट जाने वाला है। यहां मृत्यु ही मृत्यु फैली है। यहां मरघट है। यहां बसने के इरादे मत करो। यहां कोई कभी बसा नहीं।

अपनी आंख से देखा सबको जाते उसने। बत्तीसत्तैंतीस साल की उम्र कोई बड़ी उम्र नहीं। जवान थी। जवानी में इतनी मौत घटीं कि मौत का कांटा उसे ठीक-ठीक साफ-साफ दिखाई पड़ गया कि जीवन क्षणभंगुर है। और तब उसका मन यहां से विरक्त हो गया। जो यहां से विरक्त है, वही परमात्मा में अनुरक्त हो सकता है।

तुम दोनों राग एक साथ नहीं पाल सकते हो। तुम दो नावों पर एक साथ सवार नहीं हो सकते हो।

तो जब मैंने तुमसे कहा, "आओ, प्रेम की झील में नौका-विहार को चलें'--तो मैं तुमसे यह कह रहा हूं: अब तुम अपनी संसार की नाव से उतरो, अब परमात्मा को नाव बनाओ। "आओ, प्रेम के गौरीशंकर पर चढ़ें'--तो मैं तुमसे यह कह रहा हूं: अपनी अंधेरी घाटियों से लगाव छोड़ो; वहां मृत्यु के सिवाय और कोई भी नहीं है।

जिन्हें तुमने घर समझा है, वह मरघट है। जिन्हें तुमने अपना समझा है, साथ हो गया है दो क्षण का राह पर--सब अजनबी हैं। आज नहीं कल सब छुट जाएंगे। तुम अकेले आए हो और अकेले जाओगे। और तुम अकेले हो। इस जगत में सिर्फ एक ही संबंध बन सकता है--और वह संबंध परमात्मा से है; शेष सारे संबंध बनते हैं और मिट जाते हैं। सुख तो कुछ ज्यादा नहीं लाते, दुख बहुत लाते हैं। सुख की तो केवल आशा रहती है; मिलता कभी नहीं है। अनुभव तो दुख ही दुख का होता है।

ये जो पांच मृत्युएं थीं, ये पांच सीढ़ियां बन गईं। और एक-एक मृत्यु मीरा को संसार से विमुख करती गई और कृष्ण के सन्मुख करती गई। इधर पीठ हो गई संसार की तरफ--कृष्ण की तरफ मुंह हो गया। धीरे-धीरे, पहले तो मीरा घर में ही नाचती थी--अपने कृष्ण की प्रतिमा पर; फिर बाढ़ की तरह उठने लगा प्रेम, फिर घर उसे नहीं समा सका। फिर गांव के मंदिरों में, साधु-सत्संगों में, वहां भी नाचने लगी। फिर प्रेम इतना बाढ़ की तरह आना शुरू हुआ कि उसे होश-हवास न रहा। वह मगन हो गई, वह तल्लीन हो गई, वह कृष्णमय हो गई। स्वभावतः राजघराने की महिला थी, प्रतिष्ठित परिवार से थी। परिवार को अड़चन आई। परिवार को अड़चन सदा आ जाती है। समाज में हजार तरह की बातें चलने लगीं, क्योंकि यह लोकलाज के बाहर थी बात।

तुम सोच सकते हो, राजस्थान पांच सौ साल पहले--जहां घूंघट के बाहर स्त्रियां नहीं आती थीं; जिनका चेहरा कभी लोग नहीं देखते थे। फिर राजघराने की तो और कठिन थी बात। और वह रास्तों पर नाचने लगी। साधारणजनों के बीच नाचने लगी। यद्यपि वह नाच परमात्मा के लिए था, फिर भी घर के लोगों को तो "नाच' नाच था; उनको तो कुछ फर्क नहीं था। फिर उसके निकटतम जो लोग थे वे जा चुके थे: उसका देवर गद्दी पर था। जहां-जहां मीरा उल्लेख करेगी कि राणा ने जहर भेजा, कि राणा ने सांप की पिटारी भेजी, कि राणा ने सेज पर कांटे बिछवा दिए--उस राणा से याद रखना, उसके देवर की तरफ इशारा है। उसके पति तो चल बसे थे।

उसके देवर थे विक्रमाजीत सिंह। वह क्रोधी किस्म का युवक था। दुष्ट प्रकृति का युवक था। और उसकी यह बरदाश्त के बाहर था। और उसे मीरा की प्रतिष्ठा भी बरदाश्त के बाहर थी। मीरा इतनी प्रतिष्ठित हो रही थी, दूर-दूर से लोग आने लगे थे। साधारणजन तो आते थे ही उसके दर्शन को; संत, साधु, ख्याति-उपलब्ध लोग दूर-दूर से मीरा की खबर सुन कर आने लगे थे। वह सुगंध उड़ने लगी थी। वह सुगंध कस्तूरी की तरह थी। जिनको भी नासापुटों में थोड़ा अनुभव था कस्तूरी की गंध का, वे चल पड़े थे।

यह बड़ी हैरानी की बात है। देश के कोने-कोने से लोग आ रहे थे, लेकिन परिवार के अंधे लोग न देख पाए। असल में इन लोगों का आना उन्हें और अड़चन का कारण हो गया, मीरा की प्रतिष्ठा उनके अहंकार को चोट करने लगी। जो राणा गद्दी पर था, वह सोचता था कि मुझसे भी ऊपर कोई मेरे परिवार में हो, यह बरदाश्त के बाहर है। फिर हजार बहाने मिल गए। और बहाने सब तर्कयुक्त थे--उनमें कभी भूल नहीं खोजी सकती--कि यह साधारणजनों में मिलने लगी है; घूंघट उघाड़ दिया है; रास्ते पर नाचती है; नाच में कभी वस्त्रों का भी ध्यान नहीं रह जाता। यह अशोभन है। यह राजघर की महिला को शुभ नहीं है।

लेकिन जो कहानियां हैं वे खयाल में लेना। जहर भेजा और मीरा उसे कृष्ण का नाम लेकर पी गई। और कहते हैं, जहर अमृत हो गया! हो ही जाना चाहिए। होना ही पड़ेगा। इतने प्रेम से, इतने स्वागत से अगर कोई जहर भी पी ले तो अमृत हो ही जाएगा। और अगर तुम क्रोध से, हिंसा से, घृणा से, वैमनस्य से अमृत भी पीओ तो जहर हो जाएगा।

खयाल रखना, ऐसा इतिहास में हुआ या नहीं, मुझे प्रयोजन नहीं है। मैं तो इसके भीतर की मनोवैज्ञानिक घटना को तुमसे कह देना चाहता हूं क्योंकि उसी का मूल्य है। अगर तुम्हारा पात्र भीतर से बिलकुल शुद्ध है, निर्मल है, निर्दोष है, तो जहर भी तुम्हारे पात्र में जाकर निर्मल और निर्दोष हो जाएगा। और अगर तुम्हारा पात्र गंदा है, कीड़े-मकोड़ों से भरा है और हजारों साल और हजारों जिंदगी की गंदगी इकट्ठी है--तो अमृत भी डालोगे तो जहर हो जाएगा। सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है। अंततः निर्णायक यह बात नहीं है कि जहर है या अमृत, अंततः निर्णायक बात यही है कि तुम्हारे भीतर स्थिति कैसी है। तुम्हारे भीतर जो है, वही अंततः निर्णायक होता है।

मीरा ने देखा ही नहीं कि जहर है। सोचा ही नहीं कि जहर है। राणा ने भेजा है, तो जो मिलता है, प्रभु ही भेजने वाला है। राणा के पीछे भी वही भेजने वाला है। उसके अतिरिक्त तो कोई भी नहीं है। तो अमृत ही होगा। वह अमृत मान कर पी गई।

यह मान्यता इतना फर्क कर सकती है? तुम सम्मोहनविद से पूछोगे तो वह कहेगा: हां। सम्मोहनविद ही जानता है कि मनुष्य के मन के काम करने की प्रक्रिया क्या है। अगर किसी व्यक्ति को सम्मोहित कर दिया जाए, और उसके हाथ में आग का अंगारा रख दिया जाए और सम्मोहित दशा में उससे कहा जाए कि एक ठंडा कंकड़ तुम्हारे हाथ में रखा है, तो आग का अंगारा भी उसे जलाता नहीं। क्योंकि उसका मन इस बात को स्वीकार करता है कि ठंडा कंकड़ है। अंगारा रखा रहता हाथ पर, और चमत्कार घटित हो जाता; हाथ जलता नहीं। इस पर हजारों प्रयोग हो गए हैं। इसी तरह तो लोग आग पर चलते हैं और जलते नहीं। वह भाव की दशा है।

और इससे उलटी बात भी हो जाती है। सम्मोहित व्यक्ति के हाथ में उठा कर एक कंकड़ रख दो--साधारण कंकड़, ठंडा कंकड़ और उससे कहो कि जलता हुआ कोयला रखा है तुम्हारे हाथ पर--वह एकदम फेंक देगा घबड़ा कर। वह बेहोश है। वह एकदम फेंक देगा घबड़ा कर। और चमत्कार तो यह है कि उसके हाथ पर फफोला आ जाएगा; जैसे कि वह जल गया। जलने के पूरे लक्षण हो जाएंगे। इन घटनाओं में, जो संतों के जीवन में भरी पड़ी हैं, मैं इसी मनोवैज्ञानिक सत्य की उदघोषणा देखता हूं। मीरा ने स्वीकार कर लिया जहर अमृत की तरह, तो अमृत हो गया।

तुम जैसा जगत को स्वीकार कर लोगे, वैसा ही हो जाता है। यह जगत तुम्हारी स्वीकृति से निर्मित है। यह जगत तुम्हारी दृष्टि का फैलाव है।

सांप एक पिटारी में रख कर भेज दिया--जहरीला सांप--उसने पिटारी खोली और उसे तो सांवले कृष्ण ही दिखाई पड़े। उसने उठा कर उन्हें गले से लगा लिया। उस सांप ने मीरा को काटा नहीं। सांप इतने अभद्र होते भी नहीं जितना मनुष्य होता है। सांप इतने जड़ होते भी नहीं जितना मनुष्य होता है। मीरा का उसे प्रेम से अपने गले से लगा लेना सांप को भी समझ में आ गया होगा कि यहां कोई शत्रु नहीं, मित्र है। सांप भी तभी हमला करता है जब कोई शत्रु हो: जो कोई चोट पहुंचाने को उत्सुक हो, तभी हमला करता है, नहीं तो हमला नहीं करता। हमला तो सुरक्षा के लिए है। आत्मरक्षा के लिए है। सांप को तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है, तुम कभी सांप पर पैर रख दो या मारने की इच्छा करो--तो। और तब तो लोग कहते हैं कि, सांप ऐसा होता है कि अगर एक दफे तुमने उससे दुश्मनी ले ली, तो जिंदगी भर तुमसे बदला लेने की कोशिश करता है; भूलता ही नहीं। उसकी स्मृति बड़ी मजबूत है। लेकिन मीरा ने जब उसे प्रेम से गले लगा लिया होगा, तो उस तरंग को उसने भी समझा होगा; उस प्रेम में वह भी डूबा होगा। इस स्त्री को काटा नहीं जा सकता।

समझ लें, फिर से दोहरा दूं, इतिहास से मुझे प्रयोजन नहीं है। इतिहास से भी ज्यादा मूल्यवान है इन घटनाओं के पीछे छिपा हुआ मनसत्तत्व। क्योंकि वही तुम समझोगे तो काम का है। और चमत्कार भी इनमें कुछ नहीं है। ये चमत्कार दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इनके पीछे का नियम हमारी समझ में नहीं आता। नियम सीधा साफ है: तुम जैसे हो, करीब-करीब यह जगत तुम्हारे लिए वैसा ही हो जाता है। तुम अगर प्रेमपूर्ण हो तो प्रेम की प्रतिध्वनि उठती है। और तुमने अगर परमात्मा को सर्वांग मन से स्वीकार कर लिया है, सर्वांगीण रूप से--तो फिर इस जगत में कोई, कोई हानि तुम्हारे लिए नहीं है।

लेकिन यह बात बहुत घटी और उसका मीरा का रहना गांव में मुश्किल हो गया, तो उसने राजस्थान छोड़ दिया। वह वृंदावन चली गई। अपने प्यारे की बस्ती में चलें--उसने सोचा। कृष्ण के गांव चली गई। लेकिन वहां भी झंझटें शुरू हो गईं। क्योंकि कृष्ण तो अब वहां नहीं थे। कृष्ण के गांव पर पंडितों का कब्जा था--ब्राह्मण, पंडित-पुरोहित।

बड़ी प्यारी घटना है। जब मीरा वृंदावन के सबसे प्रतिष्ठित मंदिर में पहुंची तो उसे दरवाजे पर रोकने की कोशिश की गई, क्योंकि उस मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध था, क्योंकि उस मंदिर का जो महंत था, वह स्त्रियां नहीं देखता था; वह कहता था: ब्रह्मचारी को स्त्री नहीं देखनी चाहिए। तो वह स्त्रियां नहीं देखता था। मीरा स्त्री थी। तो रोकने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन जो लोग रोकने द्वार पर खड़े थे, वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। जब मीरा नाचती हुई आई, अपने हाथ में अपना एकतारा लिए बजाती हुई आई, और जब उसके पीछे भक्तों का हुजूम आया और शराब छलकती चारों तरफ और सब मदमस्त--उस मस्ती में वे जो द्वारपाल खड़े थे, वे भी ठिठक कर खड़े हो गए। वे भूल ही गए कि रोकना है। तब तक तो मीरा भीतर प्रविष्ट हो गई। हवा की लहर थी एक--भीतर प्रविष्ट हो गई, पहुंच गई बीच मंदिर में। पुजारी तो घबड़ा गया। पुजारी पूजा कर रहा था कृष्ण की। उसके हाथ से थाल गिर गया। उसने वर्षों से स्त्री नहीं देखी थी। इस मंदिर में स्त्री का निषेध था। यह स्त्री यहां भीतर कैसे आ गई?

अब तुम थोड़ा सोचना। द्वार पर खड़े द्वारपाल भी डूब गए भाव में, पुजारी न डूब सका! नहीं, पुजारी इस जगत में सबसे ज्यादा अंधे लोग हैं। और पंडितों से ज्यादा जड़बुद्धि खोजने कठिन हैं। द्वार पर खड़े द्वारपाल भी डूब गए इस रस में। यह जो मदमाती, यह जो अलमस्त मीरा आई, यह जो लहर आई--इसमें वे भी भूल गए--क्षण भर को भूल ही गए कि हमारा काम क्या है। याद आई होगी, तब तक तो मीरा भीतर जा चुकी थी। वह तो बिजली की कौंध थी। तब तक तो एकतारा उसका भीतर बज रहा था, भीड़ भीतर चली गई थी। जब तक उन्हें होश आया तब तक तो बात चूक गई थी। लेकिन पंडित नहीं डूबा। कृष्ण के सामने मीरा आकर नाच रही है, लेकिन पंडित नहीं डूबा।

उसने कहा: "ऐ औरत! तुझे समझ है कि इस मंदिर में स्त्री का निषेध है?'

मीरा ने सुना। मीरा ने कहा: "मैं तो सोचती थी, कि कृष्ण के अतिरिक्त और कोई पुरुष है नहीं। तो तुम भी पुरुष हो? मैं तो कृष्ण को ही बस पुरुष मानती हूं, और तो सारा जगत उनकी गोपी है; उनके ही साथ रास चल रहा है। तो तुम भी पुरुष हो? मैंने सोचा नहीं था कि दो पुरुष हैं। तो तुम प्रतियोगी हो?'

वह तो घबड़ा गया। पंडित तो समझा नहीं कि अब क्या उत्तर दें! पंडितों के पास बंधे हुए प्रश्नों के उत्तर होते हैं। लेकिन यह प्रश्न तो कभी इस तरह उठा ही नहीं था। किसी ने पूछा ही नहीं था, यह तो कभी किसी ने मीरा के पहले कहा ही नहीं था कि दूसरा भी कोई पुरुष है, यह तो हमने सुना ही नहीं। तुम भी बड़ी अजीब बात कर रहे हो! तुमको यह वहम कहां से हो गया? एक कृष्ण ही पुरुष हैं, बाकी तो सब उसकी प्रेयसियां हैं।

लेकिन अड़चनें शुरू हो गईं। इस घटना के बाद मीरा को वृंदावन में नहीं टिकने दिया गया। संतों के साथ हमने सदा दुर्व्यवहार किया है। मर जाने पर हम पूजते हैं; जीवित हम दरुव्यवहार करते हैं। मीरा को वृंदावन भी छोड़ देना पड़ा। फिर वह द्वारिका चली गई।

वर्षों के बाद राजस्थान की राजनीति बदली, राजा बदला, राणा सांगा का सबसे छोटा बेटा राजा उदयसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। वह राणा सांगा का बेटा था और राणा प्रताप का पिता। उदयसिंह को बड़ा भाव था मीरा के प्रति। उसने अनेक संदेशवाहक भेजे कि मीरा को वापस लिवा लाओ। यह हमारा अपमान है। यह राजस्थान का अपमान है कि मीरा गांव-गांव भटके, यहां-वहां जाए। यह लांछन हम पर सदा रहेगा। उसे लिवा लाओ। वह वापस लौट आए। हम भूल-चूकों के लिए क्षमा चाहते हैं। जो अतीत में हुआ, हुआ।

गए लोग, पंडितों को भेजा, पुरोहितों को भेजा, समझाने-बुझाने; लेकिन मीरा सदा समझा कर कह देती कि अब कहां आना-जाना! अब इस प्राण-प्यारे के मंदिर को छोड़ कर कहां जाएं!

वह रणछोड़दासजी के मंदिर में द्वारिका में मस्त थी।

फिर तो उदयसिंह ने बहुत कोशिश की, एक सौ आदमियों का जत्था भेजा, और कहा कि किसी भी तरह ले आना, न आए तो धरना दे देना; कहना कि हम उपवास करेंगे। वही मंदिर पर बैठ जाना।

और उन्होंने धरना दे दिया। उन्होंने कहा कि चलना ही होगा, नहीं तो हम यहीं मर जाएंगे।

तो मीरा ने कहा: फिर ऐसा है, चलना ही होगा तो मैं जाकर अपने प्यारे को पूछ लूं। उनकी बिना आज्ञा के तो न जा सकूंगी। तो रणछोड़दासजी को पूछ लूं!

वह भीतर गई। और कथा बड़ी प्यारी है और बड़ी अदभुत और बड़ी बहुमूल्य! वह भीतर गई और कहते हैं, फिर बाहर नहीं लौटी! कृष्ण की मूर्ति में समा गई!

यह भी ऐतिहासिक तो नहीं हो सकती बात। लेकिन होनी चाहिए, क्योंकि अगर मीरा कृष्ण की मूर्ति में न समा सके तो फिर कौन समाएगा! और कृष्ण को अपने में इतना समाया, कृष्ण इतना भी न करेंगे कि उसे अपने में समा लें! तब तो फिर भक्ति का सारा गणित ही टूट जाएगा। फिर तो भक्त का भरोसा ही टूट जाएगा। मीरा ने कृष्ण को इतना अपने में समाया, अब कुछ कृष्ण का भी दायित्व है! वह आखिरी घड़ी आ गई, महासमाधि की! मीरा ने कहा होगा: या तो अपने में समा लो मुझे, या मेरे साथ चल पड़ो, क्योंकि अब ये लोग भूखे बैठे हैं, अब मुझे जाना ही पडेगा।

वह आखिरी घड़ी आ गई, जब भक्त भगवान हो जाता है। यही प्रतीक है उस कथा में कि मीरा फिर नहीं पाई गई। मीरा कृष्ण की मूर्ति में समा गई। अंततः भक्त भगवान में समा ही जाता है।

ध्यान रखना, इसे तथ्य मान कर सोचने मत बैठ जाना। यह सत्य है और सत्य तथ्यों से बहुत भिन्न होते हैं। सत्य तथ्यों से बहुत ऊपर होते हैं। तथ्यों में रखा ही क्या है? दो कौड़ी की बातें हैं। तथ्य सीमा नहीं है सत्य की। तथ्य तो आदमी की छोटी सी बुद्धि से जो समझ में आता है, उतने सत्य का टुकड़ा है; सत्य बहुत बड़ा है।

मुझसे पूछो तो मैं कहूंगा: ऐसा हुआ। होना ही चाहिए; नहीं तो भक्त का भरोसा गलत हो जाएगा। मीरा ने यही कहा होगा: अब क्या इरादे हैं? अब मैं जाऊं? और अब जाऊं कहां? या तो मेरे साथ चलो, या मुझे अपने साथ ले लो।

इकबाल का एक पद है:

तू है मुहीते बेकरां, मैं हूं जरा-सी आबजू

या मुझे हमकिनार कर या मुझे बेकिनार कर।

कहा है: तू है मुहीते बेकरां...

तू तो सागर है असीम। मुहीते बेकरां! तेरा कोई किनारा नहीं है, ऐसा सागर है तू।

तू है मुहीते बेकरां, मैं हूं जरा-सी आबजू

और मैं हूं एक छोटा सा झरना या छोटी सी नदी।

या मुझे हमकिनार कर...

या तो मुझे अपने साथ दौड़ने दे--समानांतर, गलबांही डाल कर।

या मुझे हम किनार कर या मुझे बेकिनार कर।

या मुझे अपने में समा ले और मुझे भी असीम बना दे। अगर सीमित रखना हो तो मुझे साथ-साथ दौड़ने दे; जहां तू जाए, मैं चलूं। और अगर यह असंभव हो, क्योंकि तू असीम है और मैं सीमित, कैसे तेरे साथ दौड़ पाऊंगी; तू विराट, मैं क्षुद्र, तो कैसे तेरे साथ दौड़ पाऊंगी, कहां तक दौड़ पाऊंगी!

...मैं हूं जरा सी आबजू

मैं तो एक छोटा सा झरना हूं, जल्दी सूख जाऊंगी, किसी मरुस्थल में खो जाऊंगी! तेरे साथ कैसे दौड़ पाऊंगी? तो फिर दूसरा उपाय यह है:

या मुझे हम किनार कर या मुझे बेकिनार कर।

या तो किनारे पर साथ लगा ले और या फिर मुझे अपने में डुबा ले, मुझे भी असीम बना ले।

ऐसा ही मीरा ने कहा होगा:

तू है मुहिते बेकरां मैं हूं जरा-सी आबजू

या मुझे हमकिनार कर या मुझे बेकिनार कर।

और कृष्ण ने उसे बेकिनार कर दिया। क्योंकि हमकिनार तो किया नहीं जा सकता। छोटा सा झरना कैसे सागर के साथ दौड़ेगा। कहां तक दौड़ेगा। थक जाएगा, टूट जाएगा, उखड़ जाएगा, सूख जाएगा। यह तो नहीं हो सकता। मीरा को बेकिनार कर दिया--अपने में ले लिया।

मेरे दिल को दोस्त ने लालाजार कर दिया

ये खिजाजादा चमन पुरबहार कर दिया

देखते ही देखते बर्के शोला पाश को

इक निगाहे लुत्फ से आबशार कर दिया

अब मुझे दिया दिखा मौत से परे है क्या

जिंदगी का राज सब आशकार कर दिया

होशियार को दिया इक जनूने जावदां

मस्त उसे बनाके फिर होशियार कर दिया,

आबजू जरा-सी थी ऐ मुहीते बेकरां,

तूने करके हमकिनार बेकिनार कर दिया!

मेरे दिल को दोस्त ने लालाजार कर दिया!

मीरा को ले लिया कृष्ण ने अपने में--लालाजार कर दिया। खिला दिए फूल सब।

ये खिजाजादा चमन पुरबहार कर दिया

वह जो वैराग्य में, संसार के वैराग्य में सूख गया था सब, वह जो परमात्मा के विरह में रोते-रोते, रोते-रोते आंखें मरुस्थल जैसी हो गई थीं--ये खिजाजादा चमन पुरबहार कर दिया--फिर वसंत आया।

देखते ही देखते बर्के शोला पाश को

इक निगाहे लुत्फ से आबशार कर दिया

वह प्रेम की एक निगाह काफी है। उसी निगाह में डूब गई होगी मीरा। एक क्षण भर को शाश्वत उतर आया होगा उस मूर्ति के बहाने। वे आंखें, मूर्ति की मुर्दा आंखें, क्षण भर जीवित हो उठी होंगी। एक बिजली कौंधी होगी। वे मूर्ति की पत्थर जैसी आंखें एक क्षण को पत्थर न रही होंगी--एक क्षण को सजीव झील बन गई होंगी।

इक निगाहे लुत्फ से आबशार कर दिया।

बस वह एक प्रेम की नजर उसे मुक्त कर गई होगी। देह से छुड़ा ले गई होगी। खुल गए होंगे उसके पंख अनंत आकाश में।

अब मुझे दिया दिखा मौत के परे है क्या

जिंदगी का राज सब आशकार कर दिया

होशियार को दिया इक जनूने जावदां।

जो होशियार था, उसको एक अनंत पागलपन दिया। उसको एक ऐसी बेहोशी दी जो कभी न टूटे।

मस्त उसे बनाके फिर होशियार कर दिया।

यह भी खूब गजब किया, कि पहले मस्त बना दिया। और फिर होशियार कर दिया।

यह परमात्मा की शराब ऐसी है: पहले आदमी डूबता है, फिर उबरता है। पहले बेहोश होता है, फिर होश आता है।

आबजू जरा-सी थी ऐ मुहीते बेकरां।

मैं तो एक छोटी सी नदी थी। तू सागर है।

तूने करके हमकिनार बेकिनार कर दिया।

तूने साथ क्या ले लिया, हमारे किनारे ही छूट गए!

सागर का साथ हो जाए तो अपनी सीमाएं छूट जाती हैं।

विराट से दोस्ती करो।

असीम से दोस्ती करो।

क्षुद्र से बंधोगे, क्षुद्र रह जाओगे।

जो जिससे दोस्ती करेगा वैसा ही हो जाता है।

तुमने देखा, रुपये-पैसे का दीवाना धीरे-धीरे रुपये-पैसे जैसा ही हो जाता है। उसके चेहरे पर वही घिसे-पिटे रुपये की झलक आने लगती है। कामी आदमी के चेहरे पर काम की रुग्णता छा जाती है; एक घृणित भाव समा जाता है। राम के प्रेमी को राम घेर लेता है! अंततः तुम्हारा प्रेम जिससे है वही तुम हो जाते हो।

सोच-समझ कर प्रेम करना। होशियारी से दोस्ती बनाना। क्योंकि यह दोस्ती साधारण मामला नहीं है। मीरा ने दोस्ती कृष्ण से की और अंततः अगर उनकी मूर्ति में समा गई तो मुझे यह बात बिलकुल ही ठीक-ठीक मालूम पड़ती है। ऐसा होना ही चाहिए। ऐसा होता ही है।

अब मीरा के भजन:

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मीरा कहती है: मेरी आंखों में बस जाओ नंदलाल। मेरी आंखों में तुम ही रहो। मेरी आंखें तुम्हारा घर बन जाएं। जागूं तो तुम्हें देखूं, सोऊं तो तुम्हें देखूं। आंख खोलूं तो तुम्हें देखूं। रात सपना देखूं तो तुम्हारा देखूं।

यह मतलब है आंखों में बसने का। तुम्हें छोडूं ही न। तुम मेरे भीतर रहने लगो।

बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनी मूरत सांवरी सूरत...

ध्यान करना, भक्त की खोज सौंदर्य के माध्यम से परमात्मा की खोज है।

मोहनी मूरत सांवरी सूरत...

यह भी ध्यान रखना कि इस देश में हमने कृष्ण को, राम को सांवरा कहा है। कभी-कभी पश्चिम के लोगों को हैरानी होती है, कि हमने सुंदरतम व्यक्तियों को सांवरा क्यों कहा है? गोरा क्यों नहीं कहा? कारण हैं। सांवरेपन में एक गहराई होती है जो गोरेपन में नहीं होती। गोरापन थोड़ा सा उथला-उथला होता है। गोरापन ऐसा ही होता है जैसे कि नदी बहुत छिछली-छिछली, तो पानी सफेद मालूम पड़ता है। जब नदी गहरी हो जाती है तो पानी नीला हो जाता है, सांवरा हो जाता है।

कृष्ण सांवरे थे, ऐसा नहीं है। हमने इतना ही कहा है सांवरा कह कर, कि कृष्ण के सौंदर्य में बड़ी गहराई थी; जैसे गहरी नदी में होती है, जहां जल सांवरा हो जाता है। यह सौंदर्य देह का ही सौंदर्य नहीं था--यह हमारा मतलब है। खयाल मत लेना कि कृष्ण सांवले थे। रहे हों न रहे हों, यह बात बड़ी बात नहीं है। लेकिन सांवरा हमारा प्रतीक है इस बात का कि यह सौंदर्य शरीर का ही नहीं था, यह सौंदर्य मन का था; मन का ही नहीं था; यह सौंदर्य आत्मा का था। यह सौंदर्य इतना गहरा था, उस गहराई के कारण चेहरे पर सांवरापन था। छिछला नहीं था सौंदर्य। अनंत गहराई लिए था।

मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल।

ये तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखें सदा मेरा पीछा करती रहें, ये सदा मुझे देखती रहें। मुझमें झांकती रहें।

मोर मुकुट मकराकृति कुंडल...

यह तुम्हारा मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट, यह तुम्हारा सुंदर मुकुट, जिसमें सारे रंग समाएं हैं! वही प्रतीक है। मोर के पंखों से बनाया गया मुकुट प्रतीक है इस बात का कि कृष्ण में सारे रंग समाए हैं। महावीर में एक रंग है, बुद्ध में एक रंग है, राम में एक रंग है--कृष्ण में सब रंग हैं। इसलिए कृष्ण को हमने पूर्णावतार कहा है...सब रंग हैं। इस जगत की कोई चीज कृष्ण को छोड़नी नहीं पड़ी है। सभी को आत्मसात कर लिया है। कृष्ण इंद्रधनुष हैं, जिसमें प्रकाश के सभी रंग हैं। कृष्ण त्यागी नहीं हैं। कृष्ण भोगी नहीं हैं। कृष्ण ऐसे त्यागी हैं जो भोगी हैं। कृष्ण ऐसे भोगी हैं जो त्यागी हैं। कृष्ण हिमालय नहीं भाग गए हैं, बाजार में हैं। युद्ध के मैदान पर हैं। और फिर भी कृष्ण के हृदय में हिमालय है। वही एकांत! वही शांति! अपूर्व सन्नाटा!

कृष्ण अदभुत अद्वैत हैं। चुना नहीं है कृष्ण ने कुछ। सभी रंगों को स्वीकार किया है, क्योंकि सभी रंग परमात्मा के हैं।

मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक दिए भाल।

यह तुम्हारा लाल तिलक! ये तुम्हारे मछली के आकार के कुंडल! ये तुम्हारे मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट! ये तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखें!

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

अधर सुधारस मुरली राजति...

यह तुम्हारे नीचे ओंठ पर रखी हुई मुरली, इसे इससे और कोई सुंदर जगह तो बैठने को मिल भी नहीं सकती।

अधर सुधारस मुरली राजति...

और यह मुरली कोई साधारण नहीं है। इससे तुम जब गाते हो तो सुधा बरसा देते हो, अमृत बहा देते हो।

कृष्ण रंग हैं, राग हैं। महावीर में कोई राग नहीं है। महावीर संगीत-शून्य हैं। कृष्ण जीवन के संगीत से भरे हैं। तो महावीर में वीतरागता की स्पष्टता है--स्वभावतः क्योंकि एक ही रंग है; एक स्पष्ट दिशा है। कृष्ण में मेला है सभी रंगों का। स्वभावतः महावीर के वक्तव्य बहुत तर्कयुक्त होंगे, क्योंकि एक ही रंग हैं; दूसरे रंग की बात ही नहीं है। कृष्ण के वक्तव्य विरोधाभासी होंगे, क्योंकि सभी रंग है। अनंत रंगों का मेला है। महावीर का स्वर बिलकुल स्पष्ट है। कृष्ण के स्वर बेबूझ हैं, अटपटे हैं।

अधर सुधारस मुरली राजति...

कृष्ण सेतु हैं--संसार में और परमात्मा में। कृष्ण ने दोनों को जोड़ा है। इसलिए कृष्ण के संगीत में अपूर्वता है। संगीत में बांसुरी है जो संसार की है, और संगीत है जो परमात्मा का है। ओंठों पर बांसुरी रखी है--ओंठ तो देह के हैं, लेकिन जो स्वर आ रहे हैं, वे आत्मा से आ रहे हैं। यह अपूर्व सम्मिलन है।

अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंती माल।

वह वैजंतीमाला पहने हुए हो। वैजंतीमाला पांच रंगों की बनती है। पांचों इंद्रियों ने जो दिया है, कृष्ण ने सभी को समाहित कर लिया है, समाविष्ट कर लिया है। कृष्ण ने आंख नहीं फोड़ीं, कान नहीं रौंदे, हाथ नहीं काटे। कृष्ण ने इंद्रियों को नष्ट नहीं किया। कृष्ण इंद्रियों की सारी संवेदनशीलता को पचा गए। कृष्ण इंद्रियों के शत्रु नहीं हैं। कृष्ण में जीवन का निषेध नहीं है--जीवन का परिपूर्ण स्वीकार है; अहोभाव से स्वीकार है।

कृष्ण जैसा व्यक्ति पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में खोजना कठिन है। क्योंकि कहीं न कहीं, कोई न कोई चीज कम मालूम पड़ेगी। ईसाई कहते हैं: जीसस कभी हंसे नहीं। क्यों? क्योंकि जीसस गंभीर हैं, कैसे हंस सकते हैं? तो जीसस बड़े संगत हैं। कृष्ण खिलखिला कर हंस सकते हैं। और इससे उनकी गंभीरता में बाधा नहीं पड़ती। यह हंसना उनकी गंभीरता का खंडन नहीं होता। उनमें विरोध एक-दूसरे को सम्हालते हैं, समृद्ध करते हैं।

ध्यान रखना, दुनिया का कोई भी संत कृष्ण जैसा रस से सराबोर नहीं है। कुछ है और बड़ी मात्रा में है; लेकिन कुछ बिलकुल नहीं है। इसलिए हिंदुओं ने ठीक ही किया कि किसी और अवतार को पूर्णावतार नहीं कहा। बुद्ध को भी पूर्णावतार नहीं कहा। राम को भी पूर्णावतार नहीं कहा। अवतार कहा। परमात्मा आंशिक रूप में उतरा है। एक ढंग से उतरा है। बुद्ध में ध्यान की तरह उतरा है, कि महावीर में त्याग की तरह उतरा है। तो महावीर का जो त्याग है, वह चरम है। मगर बस त्याग है। एकांगी है व्यक्तित्व। बुद्ध का जो ध्यान है, वह चरम है; लेकिन एकांगी है।

कृष्ण में संतुलन है; तराजू के सब पलड़े एक तल पर आ गए हैं। कृष्ण में कुछ कमी नहीं है। निश्चित ही खतरा भी है, क्योंकि कुछ कमी न होने की वजह से सब कुछ है; तुम जो चाहो चुन लो। इसलिए कृष्ण के भक्तों ने जो चाहा चुन लिया। किसी ने एक बात चुन ली, किसी ने दूसरी बात चुन ली। किसी ने गीता चुन ली, तो वह भागवत नहीं पढ़ता, क्योंकि भागवत में मुश्किल हो जाती है उसे। उसे कृष्ण गीता के जंचते हैं। किसी ने भागवत चुन ली तो गीता की बहुत फिकर नहीं करता। सूरदास कृष्ण के बचपन के गीत गाते हैं।

तुमने पढ़ा न कि सूरदास की कहानी है: एक सुंदर स्त्री को देख कर उन्होंने अपनी आंखें फोड़ लीं! ऐसे सूरदास कृष्ण के भक्त हैं। यह करना नहीं चाहिए। कृष्ण का भक्त और ऐसा करे तो फिर राम के भक्त को तो फांसी लगा लेनी पड़ेगी। फिर तो जीना ही मुश्किल हो जाएगा। यह बात ठीक नहीं है, लेकिन उन्होंने चुन लिया है। अब यह बात कहां जमती है कृष्ण के साथ? जो कि नदी के तट पर नहाती हुई स्त्रियों के कपड़े लेकर वृक्ष पर बैठ जा सकता है, उसके साथ यह सूरदास की दोस्ती कैसे जमेगी? एक स्त्री को देख कर इन्होंने आंखें फोड़ लीं कि कहीं इससे कामवासना न जग जाए--और इनके जो गुरु हैं, वे नहाती अपरिचित स्त्रियों के कपड़े उठा कर और झाड़ पर बैठ गए हैं। नहीं, यह बात जमती नहीं। तो इसलिए सूरदास ने कृष्ण के बचपन को चुन लिया है। वे उनके बचपन की बातें करते हैं। वे बचपन में जो पांव में पैजनियां बजती है, बस उसी की बात करते हैं। उसके बाद जो बांसुरी बजी है, और ऐसी बजी है कि दूसरे की स्त्रियां अपने पतियों को छोड़ कर कृष्ण की हो गईं--उसकी बात करने में डरते हैं कि यह जरा खतरा है।

उसकी बात करने वाले लोग भी हैं। जैसे गीतगोविंद में, जयदेव ने उसी की बात की है। मध्य-युग में, रीतिकालीन कवियों ने बस कृष्ण के उसी शृंगारिक रूप की चर्चा की है, उसी भोग-विलास को खूब बढ़ा कर बताया है।

ये दोनों बातें गलत हैं। कृष्ण को समझना हो तो पूरा ही समझना चाहिए। अंग नहीं चुनने चाहिए। पूरा ही समझोगे, तो ही कृष्ण के साथ ज्यादती करने से बचोगे; नहीं तो ज्यादती हो जाएगी। फिर मैं समझता हूं कि पूरा समझने में तुम्हें बहुत दिक्कत है, क्योंकि तब बहुत सी असंगतियां दिखाई पड़ेंगी। एक अंग चुनने में संगति मालूम पड़ती है; बहुत से अंग चुनने में असंगति हो जाती है। क्योंकि फिर तुम तालमेल नहीं बिठा पाते। तुम बिठा भी न पाओगे, जब तक कृष्णमय न हो जाओ। कृष्ण की चेतना ही तुम्हारे भीतर जन्मे, तो ही तुम तालमेल बिठा पाओगे; तभी तुम जान पाओगे कि ये सब अंग एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं। रात दिन के खिलाफ नहीं है; रात से ही दिन पैदा होता है। और दिन रात का दुश्मन नहीं है, क्योंकि दिन से ही रात पैदा होती है। जीवन और मृत्यु सब जुड़े हैं, संयुक्त हैं।

मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक दिए भाल।

अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंती माल।

छुद्र घंटिका कटितट सोभित...

कमर में करधनी बांधे हुए हैं, जिसमें छोटे-छोटे घुंघरू बंधे हैं।

छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल।

जैसे मीठा-मीठा स्वर हो रहा है।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई...

मीरा कहती है: हे प्रभु, जिनके पास तुम्हें देखने की आंखें हैं, उनके लिए तुम कितने सुखदाई हो!

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बच्छल गोपाल।

और तुम भक्तों के प्रति कितने अपूर्व प्रेम से भरे हो! वात्सल्य से!

वात्सल्य शब्द को समझ लेना। भक्त-वत्सल गोपाल! वात्सल्य का अर्थ होता है: ऐसा प्रेम जैसा मां को छोटे से बच्चे के लिए होता है। क्यों? इसमें क्या विशिष्टता है? इसमें विशिष्टता यह है कि छोटे बच्चे में कोई भी तो पात्रता नहीं है, कोई योग्यता नहीं है। न तो पैसा कमा कर लाता है घर में, न कोई यूनिवर्सिटी के सर्टिफिकेट लाया है, कि गोल्डमेडल जीते हों, कुछ भी तो नहीं है उसके पास पात्रता! लेकिन मां उसे प्रेम करती है। यह प्रेम किसी भी पात्रता के कारण नहीं है। बच्चा बिलकुल अपात्र है, अबोध है, और असहाय है। बच्चे से कुछ भी तो उत्तर में नहीं मिल सकता। इसलिए सौदा नहीं है इसमें। देना ही देना है।

तो जब मीरा कहती है "भक्त बच्छल गोपाल' तो वह यह कह रही है कि मैं अपात्र हूं, मैं असहाय हूं; मेरी कोई योग्यता नहीं है; प्रत्युत्तर में देने को मेरे पास कुछ भी नहीं है--फिर भी तुम देते हो!

यह वात्सल्य है। वात्सल्य बेशर्त प्रेम का दान है। जब एक तरफ दे दिया जाता है, और दूसरी तरफ योग्यता भी नहीं होती लेने की; और तो देने की बात अलग, बच्चे में योग्यता भी नहीं होती लेने की, कि वह इतना भी कह दे मां को कि धन्यवाद। धन्यवाद भी देने की क्षमता भी उसकी नहीं है; अभी बोल भी नहीं सकता।

भक्त की दशा ऐसी ही है। लेकिन भक्त रो सकता है, पुकार सकता है; जैसे छोटा बच्चा पुकारता और रोता है। भक्त का भरोसा रोने में और पुकारने में है। 

हम बुरे ही सही

अच्छा भी मिलेगा अब कौन

यूं नहीं करते हैं

हर बात पर झगड़ा, देखो!

भक्त कहता है: हम बुरे ही सही, अच्छा भी मिलेगा अब कौन? और तुम्हारी आंख में जो अच्छा दिखाई पड़ सके वैसा हो भी कहां सकता है! तुम्हारी आंख में जो अच्छा उतर सके, तुम्हारी कसौटी पर जो कसा जा सके--ऐसा हो भी कहां सकता है। किसकी योग्यता, किसकी क्षमता, कि परमात्मा की कसौटी पर उतर जाए और कहे सके कि मैं ठीक पात्र हूं! यह तो अहंकार की ही घोषणा होगी।

तो भक्त यह नहीं कहता। भक्त कहता है:

हम बुरे ही सही

अच्छा भी मिलेगा अब कौन

यूं नहीं करते हैं

हर बात पर झगड़ा, देखो!

हरि मोरे जीवन प्राण आधार।

और आसिरो नहीं तुम बिन, तीनूं लोक मंझार।

कहती है मीरा कि तीनों जगत को खूब मंझार कर देख लिया, छान-छान कर देख लिया, द्वार-द्वार, दरवाजे-दरवाजे खटका लिए ।

हरि मोरे जीवन प्राण आधार।

तुम्हारे बिना और कोई मेरा आसरा है नहीं।

और आसिरो नहीं तुम बिन, तीनूं लोक मंझार।

आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरखौ सब संसार।

एक-एक चीज की परख कर ली है, सब धोखा ही धोखा पाया। जिनको अपना माना, वे बीच में छोड़ कर चले गए। जिन पर भरोसा किया, धोखा दे गए। जहां फुल समझे वहां कांटे पाए। जहां प्रेम की झलक दिखी थी, खोजने पर सिर्फ घृणा का जहर मिला। दौड़े बहुत मरुस्थलों में--मरूद्यानों की तलाश में; लेकिन जब भी हाथ आई तो रूखी रेत ही हाथ आई।

आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरखौ सब संसार।

मीरा कहै मैं दास रावरी...

मीरा कहती है: मैं तो तुम्हारी दासी हूं।

...दीज्यौ मति विसार।

और तो क्या कहूं? मैं तो जितना बनता है याद रखती हूं: लेकिन मेरे याद रखने से क्या होगा? अगर तुमने याद न किया, अकेले मेरे याद करने से क्या होगा, अगर तुमने विसार दिया?

तो भक्त कहता है: मैं याद करता हूं लेकिन मेरी याद भी मेरे ही जैसी कच्ची है। मेरी याद भी मेरी अपात्रता से भरी है। मैं भूल-भूल भी जाऊं तो तुम मत भूल जाना।

भक्त भगवान से ऐसे संवाद करता रहता है निरंतर। दूसरे तो उसे इसलिए पागल समझते हैं--बैठे हैं अपनी मूर्ति के सामने और बातें कर रहे हैं! लोग पूछते हैं, किससे बातें कर रहे हो? भक्त मुस्कुराएगा। भक्त तुम्हें देख कर हैरान होता है जब तुम बैठे अपनी पत्नी से बात कर रहे कि अपने पति से बात कर रहे, तब वह हैरान होता है उस पर कि किससे बात कर रहे हो! नदी-नाव संयोग! हम उससे बात कर रहे हैं, जो सदा रहेगा; तुम उससे बात कर रहे हो जो अभी चला जाए, पता नहीं! यह सांस आई, और न आए! तुम किससे बात कर रहे हो! मरघट पर बैठे कब्रें एक-दूसरे से बात कर रही हैं!

भक्त कहता है: हम उससे बात कर रहे हैं जो है।

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।

छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।

खयाल करना इस वचन पर। जिन्हें भी जाना है परमात्मा की तलाश में उन्हें हृदय पर खोद कर रख लेना चाहिए यह वचन:

छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।

अब छोड़ दी सब प्रतिष्ठा कुल की--मान-मर्यादा, ऐसा-वैसा, नियम, व्यवस्था।

छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई।

अब तो यही भाव है कि कोई करेगा भी क्या! बहुत से लोग पागल कहेंगे, दीवानी कहेंगे। सो ठीक, स्वीकार है।

परमात्मा के प्रेम में दीवाना होना बेहतर--धन के प्रेम में होशियार होने की बजाय। पद के प्रेम में होशियारी की बजाय प्रभु के प्रेम में पागल होना बेहतर।

संतन ढिंग बैठि बैठि, लोकलाज खोई।

मीरा कहती है: संतों के पास बैठ-बैठ कर वह जो लोकलाज का व्यर्थ आडंबर था, बोझ था, वह सब उतार दिया। संत के पास बैठ कर भी अगर लोकलाज न खोई तो संत से कुछ सीखा नहीं।

इसलिए तो संतों से समाज सदा विपरीत पड़ जाता है, क्योंकि समाज की व्यवस्था संत तोड़ने लगते हैं। संत एक नई व्यवस्था लाते हैं। वे परमात्मा की किरण लाते हैं। वे एक बड़ा नियम लाते हैं--एक ऊंचा अनुशासन लाते हैं।

क्षुद्र अनुशासन समाज का व्यर्थ हो जाता है। वे जो शिष्टाचार के नियम हैं--औपचारिक, वे दो कौड़ी के हो जाते हैं, क्योंकि जब आत्मा के नियम उतरने शुरू होते हैं।

संतों के पास बैठ कर भी अगर लोकलाज बनी रही और तुम होशियार बने रहे तो तुम बैठे ही नहीं; सत्संग हुआ ही नहीं। देह से गए होओगे; आत्मा से नहीं पहुंचे।

संतन ढिंग बैठि बैठि, लोकलाज खोई।

अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि बोई।

और तो कोई रास्ता भी नहीं है। भक्ति की बेल को बोना हो तो आंसू से ही सींचना पड़ता है। आंसू भक्त के लिए वैसे ही हैं जैसे ज्ञानी के लिए ध्यान। आंसुओं का वही मूल्य है भक्ति के मार्ग पर--पुकार का, रोने का, अपनी असहाय अवस्था की उदघोषणा का! और हम कर भी क्या सकते हैं? चिल्ला सकते हैं। इस अरण्य में भटके हैं--पुकार सकते हैं। शायद कोई आ जाए, साथ दे! और जरूर साथ आता है। पुकार सच्ची हो। पुकार हार्दिक हो। पुकार पुरी हो। पुकार ऐसी न हो कि देखें शायद आ जाए। शायद से भरी पुकार में कभी नहीं आता।

इसलिए श्रद्धा अनिवार्य है भक्ति के मार्ग पर। ज्ञान के मार्ग पर प्रयोग हो सकता है। भक्ति के मार्ग पर प्रयोग नहीं है--वियोग है। भक्ति के मार्ग पर तो शुरुआत श्रद्धा से है। ज्ञान के मार्ग पर श्रद्धा अंतिम निष्पत्ति है। प्रयोग करो, करते-करते अनुभव करो, अनुभव करते-करते श्रद्धा आएगी। भक्ति के मार्ग पर श्रद्धा न करो तो वियोग ही नहीं होता। वियोग नहीं होता तो पुकार नहीं होती, प्रार्थना नहीं होती, आंसू नहीं बहते। आंसू नहीं बहते तो प्रेम की बेल सूख जाती है।

अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि बोई

अब तो बेलि बढ़ गई, आंनद फल होई।

मीरा कहती है: अब तो बेल बढ़ गई, पहले तो बड़ी मुश्किल थी, इधर आंसू भी बहे जाते थे, बेल का कुछ पता न चलता था, उधर लोग भी कहे जाते थे कि पागल हो गई; लेकिन अब कुछ अड़चन न रही। थोड़ी प्रतीक्षा तो करनी पड़ती है।

बीज बोते हो तो एकदम से तो नहीं लग जाता पौधा, एकदम से तो फल नहीं आ जाते। प्रतीक्षा करनी होती है। ऐसे ही आंसुओं से सींचते-सींचते प्रार्थना का फल एक दिन पकता है।

अब तो बेलि बढ़ गई, आनंद फल होई।

और आंसुओं के द्वारा सींची गई बेल में ही आनंद के फल लगते हैं।

भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।

मीरा कहती है: लोग मुझे पागल समझते हैं। और जब से मेरे जीवन में आनंद के फूल खिले हैं मेरी उलटी हालत हो गई है।

भगत देख राजी हुई...

जहां कहीं भगत को देख लेती हूं, वहां तो प्रफुल्लित हो जाती हूं; वहां तो आनंदित हो जाती हूं। क्योंकि वहां जीवन के दर्शन होते हैं और वहां परमात्मा की झलक मिलती है। क्योंकि भक्त यानी भगवान का मंदिर।

भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।

लेकिन जब जगत को देखती हूं तो रोना आता है। रोना आता है लोगों पर कि बेचारे, कितना तड़प रहे हैं! और किसके लिए तड़प रहे हैं? कचरे के लिए, कूड़ा-कर्कट के लिए।

तुम्हें तरस नहीं आएगा? कोई आदमी म्युनिसिपल-घर के कचरे-घर के पास बैठा हो और तड़प रहा हो और कचरे में खोज रहा हो--तुम्हें रोना नहीं आएगा? तुम कहोगे: पागल, इस कचरे में क्या मिलेगा! यह तू क्या कर रहा है? क्यों अपना जीवन गंवा रहा है?

ठीक, जिन्होंने जाना है परमात्मा को, तुम्हें देख कर उन्हें भी ऐसी ही दया आती है।

भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।

दासी मीरा लाल गिरधर, तारो अब मोहि।

और मीरा कहती है: अब तुम ले चलो उस पार। अपने से तो यह न हो सकेगा मुझसे। यह भवसागर बड़ा है। दूसरा किनारा दिखाई भी नहीं पड़ता है। हां, तुम्हारा प्रेम का हाथ आ जाए तो मैं कहीं भी जाने को तैयार हूं। दूसरा किनारा न हो तो जाने को तैयार हूं। तुम्हारा हाथ काफी है। तुम बीच मझधार में डुबा दो तो राजी हूं, क्योंकि तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो उबर गई।

दासी मीरा लाल गिरधर, तारो अब मोहि।

भक्त एक ही बात कहता है अनेक-अनेक ढंगों से; दूसरी बात वहां है भी नहीं। भक्ति का स्वर एक है। इन अलग-अलग भजनों में अलग-अलग बात नहीं कही गई है। ये भजन अलग-अलग हैं, लेकिन जो कहा गया है वह तो एक ही है।

हर लम्हा मेरे चंचल मन के अरमान बदलते रहते हैं,

किस्सा तो वही फरसूदा है उनवान बदलते रहते हैं।

--कहानी तो वही है, सिर्फ शीर्षक बदल जाते हैं।

हर लम्हा मेरे चंचल मन के अरमान बदलते रहते हैं,

किस्सा तो वही फरसूदा है...

--वही पुराना...उनवान बदलते रहते हैं। लेकिन शीर्षक बदल जाते हैं।

कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा

पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं।

--दुनिया में दो ही चीजें शाश्वत हैं भक्ति में।

कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा

--एक परमात्मा का सौंदर्य और एक परमात्मा के भक्त का सौंदर्य के प्रति प्रेम--बस ये दो चीजें पक्की हैं। फिर इन दो के बीच बहुत कुछ घटता है, बहुत संवाद होते हैं।

पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं।

--कभी फूल से पूजा और कभी धूप-दीप से, कभी खाली हाथों से, कभी आंसुओं से, कभी नाच कर, कभी रो कर, कभी गा कर--मगर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।  

कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा

पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं

जब जीस्त का अपना मकसद ही तेरी खिदमत करना ठहरा

फिर इसकी शिकायत क्या तेरे फरमान बदलते रहते हैं।

--और जब अपनी जिंदगी का लक्ष्य ही एक है--तेरी खिदमत, तेरी सेवा, तेरी पूजा, तेरी आराधना--तो क्या फर्क पड़ता है कि तू आदेश बदल देता है। कभी कहता है, फूल लाओ; कभी कहता है, आंसू लाओ; कभी कहता है, ऐसा करो, कभी कहता है, वैसा करो; कभी कहता है, इधर बैठो, कभी कहता है, उधर बैठो--कोई फर्क नहीं पड़ता।

जब जीस्त का अपना मकसद ही तेरी खिदमत करना ठहरा

फिर इसकी शिकायत क्या तेरे फरमान बदलते रहते हैं

बुत पुजते हैं--मय पीते हैं--करते हैं तवाफे काबा भी

यूं अहले नजर तेरी खातिर ईमान बदलते रहते हैं।

तू जो करवाए--मस्जिद भेज दे, मस्जिद चले जाएंगे; मंदिर भेज दे, मंदिर चले जाएंगे; काशी तो काशी सही; काबा तो काबा सही।

बुत पुजते हैं--मय पीते हैं--करते हैं तवाफे काबा भी

मंदिर की मूर्ति भी पूज लेते हैं, तेरी शराब भी पीए चले जाते हैं, जाकर काबा की परिक्रमा भी कर आते हैं। मगर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।

यूं अहले नजर तेरी खातिर ईमान बदलते रहते हैं।

कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा

पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं।

इन अलग-अलग वचनों में अलग-अलग कुछ भी न पाओगे। एक ही बात बहुत-बहुत ढंग से कही गई है। एक ही बात, एक ही पुकार बहुत-बहुत रागों में गाई गई है। उनवान अलग-अलग हैं, शीर्षक अलग-अलग हैं--कहानी पुरानी है। मगर कौन जाने कौन सा शीर्षक तुम्हें रुच जाए, कौन सा उनवान जंच जाए! कौन जाने कौन सा शब्द लग जाए तीर की तरह हृदय पर! कौन सी पूजा की विधि किस क्षण में रुच जाए। इसलिए हम ये गीत गाएंगे। ये अनेक-अनेक गीतों की नावें एक ही दिशा में जा रही हैं। ये अलग-अलग रंग की होंगी मगर गंतव्य एक है।

आओ, प्रेम की इस झील में नौका-विहार करें!

ऐसी झील तुम कहीं और न पाओगे। हिम्मत की...और हिम्मत के बिना काम नहीं होगा। ज्ञानी को इतनी हिम्मत की जरूरत नहीं है। वह अपने ज्ञान पर थोड़ा भरोसा कर सकता है। भक्त को तो पूरी हिम्मत चाहिए। भक्त को तो पूरा साहस चाहिए। अपने पर तो कोई सवाल ही नहीं है--सब कुछ उसका है। ज्ञानी को तो थोड़ा संकल्प का सहारा है। भक्त को तो कोई संकल्प नहीं है। उसके लिए तो सिर्फ गिरधर गोपाल हैं। वह तो बेसहारा है। उसके बेसहारा होने में ही उसका बल है। निर्बल के बल राम। उसकी निर्बलता की पुकार ही उसका बल है।

साहस चाहिए होगा--इस यात्रा पर जाने को। और सबसे बड़ा साहस है--लोकलाज खोने का साहस। सबसे बड़ा साहस है--संतों के ढिग बैठने का साहस। सबसे बड़ा साहस है--पागलों की जमात में शामिल होने का साहस।

मैं तुम्हें निमंत्रण देता हूं। यह पागलों की एक जमात है।

कौन दुनिया पर भला तकिया करे

है सहारा एक तेरे नाम का

जो भी हूं हूं तेरी रहमत के तुफैल

वर्ना था मैं आदमी किस काम का

खुम पै खुम देता चला जा साकिया

काम सोहबत में तेरी क्या जाम का

जादे राह लेकर चलें ऐ हमसफर

नाम हो अल्लाह का या राम का

दूर जाना है हमें आगे बढ़ो

वक्त आएगा बहुत आराम का

तू उठा कर देख तो अपनी नजर

किस कदर दिलकश है जल्वा बाम का।

आंख तो उठा कर देखो: किस सुंदर झील की तरफ मीरा ने इशारा किया है! आंख उठा कर तो देखो: किस सुंदर झील की तरफ मैं इशारा कर रहा हूं!

तू उठा कर देख तो अपनी नजर

किस कदर दिलकश है जल्वा बाम का।

दुनिया पर बहुत भरोसा कर लिए--पाया क्या?

कौन दुनिया पर भला तकिया करे

है सहारा एक तेरे नाम का।

अब परमात्मा पर भरोसा करके भी देखो।

जो भी हूं हूं तेरी रहमत के तुफैल

हो तुम जो भी, उसके कारण हो। लेकिन तुम अपने पर भरोसा कर-कर के व्यर्थ झंझटें बना रहे हो। वही करने वाला है--तुम कर्ता नहीं हो। तुम ज्यादा से ज्यादा अभिनय में हो। करने वाला वही है। तुम कठपुतली बन जाओ। करने दो उसे जो करता है।

जो भी हूं हूं तेरी रहमत के तुफैल

वर्ना था मैं आदमी किस काम का

खुम पै खुम देता चला जा साकिया

काम सोहबत में तेरी क्या जाम का ।

और इन आने वाले दिनों में हम कुल्हड़ में शराब ढालने वाले नहीं हैं। तुम्हें जितनी पीनी हो--पी लेना। यहां कुल्हड़ों का कोई काम नहीं। तौलत्तौल कर नहीं देनी है। तो इस मधुशाला में तुम्हें निमंत्रण देता हूं।

हिम्मत करो! थोड़ी सी हिम्मत, थोड़ी सी हिम्मत--और अपूर्व घट सकता है।

भक्त जब रोता है तो उसके रोने को तुम सिर्फ रोना मत समझना। वहां बड़े वसंत छिपे हैं।

मेरी वीरानी को वीरानी-ए-सहारा न समझ

सौ बहारें लिए दामन में खिजां मेरी है

नगम्मी गम की है और दर्द का है सरूद

बस रही है सोजे तरन्नुम में फगां मेरी है

हिज्र में एक नहीं कितने जन्म बीत गए

वायदा वस्ल से उम्मीद जवां मेरी है

देखी हैं लाखों बहारें मेरी आंखों ने मगर

हुई आखिर नजर अफरोज खिजां मेरी है

अर्श से चंद कदम आगे हे मस्तों का मुकाम

मंजिल इश्क समझता हूं कहां मेरी है

जिन फिजाओं में जरूरत नहीं है बालो पर की

गाहे-गाहे हुई परवाज वहां मेरी है

मेरी हस्ती है तेरे दम से जहां में कायम

तेरी हस्ती का तकाजा है न जां मेरी है

कहलवाता है जो तू बस वही कह सकता हूं

कहने को यूं तो भला जबां मेरी है

मेरी वीरानी को वीरानी-ए-सहारा न समझ।

भक्त की उदासी को उदासी मत समझना। भक्त के विराग को विराग मत समझना। उसके विराग में परमात्मा का राग छिपा है। भक्त की उदासी में परमात्मा की तलाश छिपी है। और भक्त के आंसुओं को तुम विफलता के आंसू मत समझना। भक्त के आंसुओं में हजार वसंत छिपे हैं। वे उसकी प्रार्थनाएं हैं, उसकी आशाएं हैं, उसके मनसूबे हैं।

मेरी वीरानी को वीरानी-ए-सहारा न समझ

सौ बहारें लिए दामन में खिजां मेरी है।

भक्त का पतझड़ भी अपने भीतर हजारों वसंत छिपाए हुए है।

नगम्मी गम की है और दर्द का है उसमें सरूद

बस रही सोजे तरन्नुम में फगा मेरी है

हिज्र में एक नहीं कितने जन्म बीत गए

उस परमात्मा को खोजते, वियोग में एक नहीं, बहुत जन्म बीत गए हैं।

वायदा वस्ल से उम्मीद जवां मेरी है

लेकिन मिलने का वायदा मुझे याद है और मैं जवान हूं, मेरी उम्मीद जवान है। मिलन हो कर रहेगा। अनंत-अनंत काल भी बीत जाएं विरह में, तो भी मिलन हो कर रहेगा। ऐसी आस्था, ऐसी श्रद्धा--भक्ति है।

देखी हैं लाखों बहारें मेरी आंखों ने मगर

हुई आखिर नजर अफरोज खिजां मेरी है।

अर्श से चंद कदम आगे है मस्तों का मुकाम।

यह जो पागलों की जमात यहां बैठी है, इसका मुकाम आकाश के थोड़ा आगे है।

अर्श से चंद कदम आगे है मस्तों का मुकाम

मंजिले इश्क समझता हूं कहां मेरी है।

परमात्मा ही तुम्हारे इश्क की मंजिल है और वह आकाश से आगे है। सब सीमाओं के पार--असीम से भी पार। सब--निःशब्द से भी पार।

जिन फिजाओं में जरूरत नहीं है बालो पर की

--जहां पंखों की भी जरूरत नहीं रह जाती उड़ने के लिए।

गाहे-गाहे हुई परवाज वहां मेरी है

--धीरे-धीरे तुम्हें मैं वहां ले चलूंगा, जहां पंखों की भी जरूरत उड़ने के लिए नहीं रह जाती, जहां पंख भी उड़ने में बोझ हो जाते हैं; जहां पंख भी तोड़ देने होते हैं, छोड़ देने होते हैं, पीछे गिरा देने होते हैं; जहां सब सहारे गिरा देने होते हैं; जहां तुम बिलकुल बेसहारा हो जाते हो; पंख भी सहारा नहीं बचता।

जिन फिजाओं में जरूरत नहीं है बालो पर की

गाहे-गाहे हुई परवाज वहां मेरी है

मेरी हस्ती है तेरे दम से जहां में कायम

तेरी हस्ती का तकाजा है न जां मेरी है।

भक्त जानता है कि मैं तेरी वजह से हूं, तू ही मेरे भीतर! मेरे प्राण तू है। मेरी आत्मा तू है। मैं नहीं हूं--तू है।

कहलवाता है जो तू बस वही कह सकता हूं।

और जो तू कहलवा देता है वही कह सकता हूं।

कहने को यूं तो भला मेरी जबां मेरी है।

मीरा के ये वचन मीरा के नहीं हैं--कृष्ण के ही हैं।

कहलवाता है जो तू बस वही कह सकता हूं

कहने को यूं तो भला मेरी जबां मेरी है।

तैयारी करो--इस यात्रा के लिए। जो जन्मों में नहीं हुआ, वह क्षणों में भी हो सकता है। पुकार चाहिए। इस प्रेम की बेल को आंसुओं से सींचो।




सोमवार, 16 अगस्त 2021

हे कन्हैया क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा

 एक औरत रोटी बनाते बनाते ॐ भगवते वासूदेवाय नम: का जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही।


एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था, खुन से लथपथ। मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था। दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।


अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया। फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी। रास्ते भर भगवान को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे कन्हैया क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..।


खैर डॉक्टर सा. मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया। चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई।


रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।


उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..? उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।


फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।


उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।


तभी टीवी पर ध्यान गया तो प्रवचन आ रहा था: प्रभु कहते हैं: मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।


उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, कन्हैया मुस्कुरा रहे थे।



पाप का गुरु

 एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे। फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला। 

अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी..! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला।


एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी…! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी। स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए। वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया।


पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है? वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। अतः यह लोभ ही पाप का गुरु है।



ठंडी रोटी

 एक आलसी बेटा माँ के समझाने पर भी कुछ कमाता नहीं था और बाप-दादा की संपत्ति पर रहता खाता था।

घर वालों ने सोचा की हम इसकी शादी कर दें, हमारा कर्त्तव्य पूरा कर दें। ऐसी भी परिस्थितियाँ आती हैं जब आदमी सोचता नहीं है कि वो दूसरे घर की कन्या को ला रहा है, खिला पायेगा? रख पायेगा या नहीं? कैसे क्या होगा? नहीं सोचते।

माता-पिता को यह सोचना चाहिए कि बच्चे जब कुछ कमाने लगे, घर में आमदनी होने लगे तब शादी करें।

शादी के दूसरे दिन से ही खर्चे शुरू हो जाते हैं। आज कल कई घरों में झगडा इसलिए रहता है कि लड़का कमाता नहीं है, खर्चा वो ही रहता है, दोनों ठाट से रहना चाहते हैं।

कभी ऐसी भावना भी आ जाती है कि जो करता है वो ही खिलाएगा। मां-बाप बहु को लाये हैं तो वो ही खिलाएंगे, करेंगे।


तो उस लड़के की शादी कर दी। फिर भी लड़का कुछ न करे। तब गर्म रोटी परोसते समय माँ बोले कि खा ले, ठंडी रोटी खा ले। लड़का समझ न पाए और खाना खा ले।

कुछ लोग सोचते हैं कि माँ-बाप तो कहते ही रहते हैं। कुछ की कहने की और कुछ की सुनने की आदत बन जाती है।


लड़का भी सोचता, माँ तो कहती रहती है, छोड़ो इस बात को। एक दिन माँ बाहर गयीं तो बहु को कह कर गयीं कि गर्म रोटी परोसते समय कहना, ठंडी रोटी खा लीजिये।

जब बहु ने ऐसा कहा तो लड़का बिगड़ा कि तुम मेरी माँ से भी बड़ी हो गयी? गर्म रोटी को ठंडी रोटी क्यूँ कह रही है? बहु बोली कि अपनी माँ से पूछो। मैं तो उनके कहे अनुसार कह रही हूँ।

लड़के ने रोटी नहीं खाई। माँ जब आयीं, पूरी बात जानीं, लड़के को बुलाया, पूछा तो लड़का बोला कि आप माँ हो तो कह सकती हो। लेकिन ये पत्नी है, ये कह नहीं सकती। फिर पूछा कि आप गर्म रोटी को ठंडी क्यों कहती हो?

माँ बोली कि ठंडी रोटी उसे कहते हैं जब सुबह या शाम की बनाई रोटी को शाम या सुबह को खाया जाये। अब बतला कि तेरे पिता का धन जो तू खा रहा है वो ताजा है या ठंडा ? लड़का बोला कि ठंडा।


तब माँ बोली कि तू अपने पिता की ठंडी रोटी ही तो खा रहा है। जब तू मेहनत करके, कमा कर के लायेगा तभी तो गर्म रोटी खायेगा। तब लड़के के समझ में आ गया ठंडी रोटी का मतलब।


खुद मेहनत करनी चाहिए।


ऐसे ही पिता की दौलत, पॉवर को समझो। गुरु को सब कुछ कहा गया है, माता-पिता कहा गया है, तो गुरु की कृपा, शक्ति से हम भौतिक रोटी खाएं या आध्यात्मिक धन प्राप्त करें तो वो ठंडी रोटी ही कहलाएगी।

इसलिए प्रेमियों! खुद मेहनत करनी चाहिए।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

प्रभु कृपा

 समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥9-29॥


भावार्थ : मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट (जैसे सूक्ष्म रूप से सब जगह व्यापक हुआ भी अग्नि साधनों द्वारा प्रकट करने से ही प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्ति से भजने वाले के ही अंतःकरण में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है) हूँ॥9-29॥

ऐसा नहीं है कुछ, जैसा लोग कहते हैं अक्सर कि फलां व्यक्ति पर परमात्मा की बड़ी कृपा है। परमात्मा की कृपा किसी पर भी कम—ज्यादा नहीं है। भूलकर इस शब्द का उपयोग दोबारा मत करना। एक आदमी कहता है कि प्रभु की कृपा है। उसका मतलब कहीं ऐसा तो नहीं है कि कभी उसकी अकृपा भी होती है? या एक आदमी कहता है कि मुझ पर अभी प्रभु की कोई कृपा नहीं है। तो उसका अर्थ हुआ कि उसकी अकृपा होगी!

नहीं, उसकी अकृपा होती ही नहीं। इसलिए उसकी कृपा का कोई सवाल नहीं है। वह सम— भाव से सबके भीतर मौजूद है। यह कहना भी भाषा की कठिनाई है, इसलिए; अन्यथा सब में वही है, या सब वही है। जरा भी, रत्तीभर फर्क नहीं है। कृष्ण में या अर्जुन में, मुझ में या आप में, आप में या आपके पड़ोसी में, आप में या वृक्ष में, आप में या पत्थर में, जरा भी फर्क नहीं है।

लेकिन फर्क तो दिखाई पड़ता है! कोई बुद्ध है। कैसे हम मान लें कि बुद्ध में वह ज्यादा प्रकट नहीं हुआ है! कैसे हम मान लें कि बुद्ध में वह ज्यादा नहीं है, और हम में, हम में भी उतना ही है, कठिनाई है। साफ दिखाई पड़ता है। गणित कहेगा, नाप—जोख हो सकती है कि बुद्ध में वह ज्यादा है, कृष्ण में वह ज्यादा है। इसीलिए तो हम कहते हैं, कृष्ण अवतार हैं, बुद्ध अवतार हैं, महावीर तीर्थंकर हैं, जीसस भगवान के पुत्र हैं, मोहम्मद पैगंबर हैं, आदमियों से अलग करते हैं उन्हें। उनमें वह ज्यादा दिखाई पड़ता है।

लेकिन कृष्ण कहते हैं, मैं सम— भाव से व्यापक हूं। फिर भेद कहां पड़ता होगा? न मेरा कोई अप्रिय है और न मेरा कोई प्रिय।

प्रेम जब पूर्ण होता है, तो न कोई अप्रिय रह जाता, न कोई प्रिय। क्योंकि जब तक मैं कहता हूं कोई मुझे प्रिय है, तो उसका अर्थ है कि कोई मुझे अप्रिय है। और जब तक मैं कहता हूं कोई मुझे प्रिय है, उसका यह भी मतलब है कि जो मुझे प्रिय है, वह कल अप्रिय भी हो सकता है, क्योंकि आज जो अप्रिय है, वह कल प्रिय हो सकता है। जब प्रेम पूर्ण होता है, तो न कोई अप्रिय होता, न कोई प्रिय होता। और न आज प्रिय होता और न कल अप्रिय होता। ये सारे भेद गिर जाते हैं। परमात्मा पूर्ण प्रेम है, इसलिए कोई उसका प्रिय नहीं है और कोई अप्रिय नहीं है।

परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं उनमें प्रकट हूं।

यह फर्क है, यहीं भेद है। यहीं बुद्ध कहीं भिन्न, महावीर कुछ और, और हम कुछ और मालूम पड़ते हैं।

जो भक्त मुझे प्रेम से भजते हैं, मैं उनमें प्रकट हो जाता हूं; जो मुझे नहीं भजते हैं, उनमें मैं अप्रकट बना रहता हूं।

व्यापकता में भेद नहीं है, लेकिन प्रकट होने में भेद है।

एक बीज है। बीज को माली ने बो दिया, अंकुरित हो गया। एक बीज हम अपनी तिजोड़ी में रखे हुए हैं। दोनों बीजों में जीवन समान रूप से व्यापक है! और दोनों बीजों में संभावना पूरी है। लेकिन एक बीज बो दिया गया और एक तिजोड़ी में बंद है। जो बो दिया गया, वह अंकुरित हो जाएगा। जो अंकुरित हो जाएगा, उसमें फूल लग जाएंगे। कल हम अपने तिजोड़ी के बीज को निकालें, और उस वृक्ष के पास जाकर कहें कि तुम दोनों समान हो, हमारा तिजोड़ी का बीज मानने को राजी नहीं होगा।

वह कहेगा कैसे समान? कहां यह वृक्ष, जिस पर हजारों पक्षी गीत गा रहे हैं। कहां यह वृक्ष, जिसके फूलों की सुगंध दूर—दूर तक फैल गई है। कहां यह वृक्ष, जिससे सूरज की किरणें रास रचाती हैं। कहां यह वृक्ष और कहां मैं, बंद पत्थर की तरह! कुछ भी तो मेरे पास नहीं है। मैं दीन—दरिद्र, मेरे पास कोई आत्मा नहीं है, कोई फूल, कोई सुवास नहीं है। मुझे इस वृक्ष के साथ एक कहकर क्यों मजाक उड़ाते हो? क्यों व्यंग करते हो?

लेकिन हम जानते हैं, उन दोनों में वृक्ष सम— भाव से व्यापक है। पर एक में प्रकट हुआ, क्योंकि खाद मिली, जमीन में पड़ा, पानी पड़ा, सूरज के लिए मुक्त हुआ, उठा, हिम्मत की, साहस जुटाया, संकल्प बनाया, आकाश की तरफ फैला, अज्ञात में गया, अनजान की यात्रा पर निकला, तो वृक्ष हो गया है।

कृष्ण कहते हैं, जो मुझे प्रेम से भजते हैं!

यह प्रेम से भजना ही बीज को जमीन में डालना है। प्रेम से भजने का अर्थ है कि जो आदमी दिन—रात प्रभु को सब तरफ स्मरण करता है, उसके चारों तरफ प्रभु की भूमि निर्मित हो जाती है—चारों तरफ। उठता है तो, बैठता है तो, खाता है तो, प्रभु को स्मरण करता रहता है। चारों तरफ धीरे—धीरे, उसकी चेतना के बीज के चारों तरफ प्रभु की भूमि इकट्ठी हो जाती है। उसी भूमि में बीज अंकुरित होता है। निश्चित ही, जमीन में बीज को गाड़ना पड़ता है। तो प्रकट बीज है, प्रकट जमीन है। यह जो चेतना का बीज है, अप्रकट है, अप्रकट ही इसकी जमीन होगी। उस जमीन को पैदा करना पड़ता है। चारों तरफ मिट्टी इकट्ठी करनी पड़ती है उस जमीन की। वही प्रभु की भक्ति है।

और तब वे मेरे में और मैं उनमें प्रकट होता हूं।

यह प्रकट होना भी दोहरा है। जब एक वृक्ष आकाश में खुलता है, तो दोहरी घटना घटती है। यह वृक्ष तो आकाश में प्रकट होता ही है, आकाश भी इस वृक्ष में प्रकट होता है। यह वृक्ष तो सूरज के समक्ष प्रकट होता ही है, सूरज भी इस वृक्ष के भीतर से पुन: प्रकट होता है। यह वृक्ष तो हवाओं में प्रकट होता ही है, हवाएं इस वृक्ष के भीतर श्वास लेती हैं और प्रकट होती हैं। यह वृक्ष तो प्रकट होता ही है, इस वृक्ष के साथ जमीन भी प्रकट होती है, इस वृक्ष के साथ जमीन की सुगंध भी प्रकट होती है। यह वृक्ष ही प्रकट नहीं होता, वृक्ष के साथ सारा जगत भी इसके भीतर से प्रकट होता है।

तो जब कोई एक भक्त बीज बन जाता है और अपने चारों तरफ परमात्मा के स्मरण की भूमि को निर्मित कर लेता है, तो दोहरी घटना घटती है। भक्‍त परमात्मा भक्त में प्रकट होता है। वे दोनों प्रकट हो जाते हैं। वे आमने—सामने हो जाते हैं। एनकाउंटर।

हम सब ने सदा भगवान से साक्षात्कार का मतलब ऐसा ही सोचा है कि आमने —सामने खड़े हो जाएंगे। वे मोर—मुकुट बांधे हुए  खड़े होंगे, हम हाथ जोड़े, उनके घुटनों में पैर टेके खड़े होंगे!

ऐसा कहीं नहीं होने वाला है। यह तो कवि का काव्य है, और मधुर है, प्रीतिकर है, लेकिन काव्य है। वस्तुत: जो अभिव्यक्ति होगी प्रकट होने की, वह ऐसी नहीं होगी। वह तो ऐसी होगी कि जब हम अपने भीतर के बीज को तोड्ने में समर्थ हो जाएंगे, तो जो अभिव्यक्ति होगी, वह दो व्यक्ति आमने—सामने खड़े हैं ऐसी नहीं। बल्कि दो दर्पण आमने—सामने रखे हैं।

दो दर्पण अगर आमने—सामने रखे हैं, तो पता है क्या होगा? एक दर्पण दूसरे में दिखाई पड़ेगा, दूसरा दर्पण पहले में दिखाई पड़ेगा। और फिर अनंत दर्पण, एक के भीतर, एक के भीतर, एक के भीतर दिखाई पड़ते जाएंगे। वह जो इनफिनिटी, वह जो अनंत दर्पण दिखाई पड़ेंगे, और हर दर्पण फिर उसको दिखाएगा, और फिर वह दर्पण इसको दिखाएगा। और यह अनंत होगा।

दो दर्पण एक—दूसरे के सामने हों, तो जो होगा, वही जब हमारी चेतना परमात्मा की चेतना के सामने होती है, तो होता है। अंतहीन हो जाते हैं हम। और वह तो अंतहीन है ही। अनंत हो जाते हैं हम, वह तो अनंत है ही। अनादि हो जाते हैं हम, वह तो अनादि है ही। अमृत हो जाते हैं हम, वह तो अमृत है ही। और दोनों एक—दूसरे में झांकते हैं। और यह झांकना अनंत है। इस झांकने का फिर कोई अंत नहीं होता। यह फिर कभी समाप्त नहीं होता।

तो ध्यान रखें, परमात्मा से मिलन होता है, फिर बिछुड़न नहीं होती। फिर वह मिलन अनंत है। और फिर उस मिलन की रात का कोई अंत नहीं है। उस मिलन की रात का फिर कोई अंत नहीं है। वहा से फिर कोई वापस नहीं लौटता। वहा से पुनरागमन नहीं है।

पर इसका यह अर्थ नहीं है कि परमात्मा किसी को प्रेम करता है और उसे दर्शन दे देता है, और किसी को प्रेम नहीं करता और उसको चकमा देता रहता है कि दर्शन नहीं देंगे!

नहीं, इससे कोई संबंध नहीं है। परमात्मा के प्रेम का सवाल नहीं है, आपके श्रम का सवाल है। उसकी कृपा का सवाल नहीं है, आपके संकल्प का सवाल है।

उसकी कृपा प्रतिपल बरस रही है, लेकिन आप अपने मटके को उलटा रखकर बैठे हैं। आप चिल्ला रहे हैं कि कृपा नहीं है। पास का मटका भरा जा रहा है। वह मटका सीधा रखा है, आप अपने मटके को उलटा रखे बैठे हैं। और अगर कोई आकर कोशिश भी करे आपके मटके को सीधा रखने की, तो आप बहुत नाराज होते हैं। आप कहते हैं, यह हमारा ढंग है; यह हमारी मान्यता है; यह हमारा दृष्टिकोण है; यह हमारा धर्म है, यह हमारा मत है; यह हमारे शास्त्र में लिखा है!

आप हजार दलीलें देते हैं अपने मटके को उलटा रखे रहने के लिए। और जब भी कोई अगर जोर—जबर्दस्ती आपके मटके के साथ सीधा करने की करे, तो कष्ट होता है, पीड़ा होती है, झंझट होती है; सुखद नहीं मालूम पड़ता। मटका उलटा रखा है सदा से। हमें लगता है, यही इसके रखे होने का ढंग है। फिर पास का मटका भर जाता है, तो हम चिल्लाते हैं, परमात्मा किसी पर ज्यादा कृपालु मालूम हो रहा है और हम पर कृपालु नहीं है।

परमात्मा की वर्षा निरंतर हो रही है, जो भी अपने मटके को सीधा कर लेता है, वह भर जाता है। और कोई बाधा नहीं है। आपके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। आपके अतिरिक्त और कोई आपका शत्रु नहीं है। आपके अतिरिक्त और किसी ने कभी कोई विध्‍न नहीं डाला है।

अगर आप परमात्मा से नहीं मिल पा रहे हैं, तो इसमें आपका ही हाथ है। अगर आप मिल पाएंगे, तो यह आपकी ही आपके ऊपर कृपा है। परमात्मा की कृपा का इसमें कुछ लेना—देना नहीं है। उसका प्रेम सम है। उसका अस्तित्व हमारे भीतर समान है। उसकी क्षमता, उसकी बीज— क्षमता हमारे भीतर एक—सी है। लेकिन फिर भी हम स्वतंत्र हैं। और चाहें तो उस बीज को वृक्ष बना लें, और चाहें तो उस बीज को बंद रख लें।

हम सब तिजोडियों में बंद बीज हैं। और सब अपनी—अपनी तिजोडियो पर ताले डाले हुए हैं मजबूत कि कोई खोल न दे! कहीं बीज बाहर न निकल जाए! इसके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। 

ओशो रजनीश




रविवार, 1 अगस्त 2021

रक्षा संस्कृति

 मात्यवान और सुमाली रक्ष संस्कृति के प्रणेता हेति और प्रहेति के प्रपौत्र थे।

दो भाइयों में जब मनमुटाव होता है और वे अलग होते हैं तो परस्पर सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं। विवाद का विषय प्राय: एक ही होता है कि दूसरे ने मेरा हक मार लिया। यही झगड़ा देवों और दैत्यों में भी रहा। परिणामस्वरूप एक ही पिता, महर्षि कश्यप, की संतान होते हुये भी दोनों सत्ता के दो विपरीत धुर्व बन गये। दोनों के पिता अवश्य एक थे किन्तु माताएँ अलग-अलग थीं। देव अदिति के पुत्र थे और दैत्य दिति के इस प्रकार दोनों सौतेले भाई थे और सौतेले भाइयों का झगड़ा तो हमारे इतिहास में आम बात है।


रक्ष संस्कृति का प्रादुर्भाव यक्ष संस्कृति के साथ एक ही समय में एक ही स्थान पर हुआ था। पर कालांतर में उनमें बड़ी दूरियाँ आ गयीं। यक्षों की देवों से मित्रता हो गयी और रक्षों की शत्रुता| देव, रक्ष या दैत्य आर्यों से कोई भिन्न जाति हो ऐसा नहीं था किन्तु आर्य क्योंकि देवों के समर्थक थे (पिछलग्गू शब्द प्रयोग नहीं कर रहा मैं) इसलिये उन्होंने देव विरोधी सभी शक्तियों को त्याज्य मान लिया। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कालांतर में इस्लाम स्वीकार कर लेने वालों को हिन्दुओं ने पूर्णत: त्याज्य मान लिया । वस्तुत: ये सब आर्य संस्कृति के अंदर ही उपसंस्कृतियाँ थी फिर भी आर्य और देव इन्हें हेय मानते थे और ये सब अपनी महत्ता स्थापित करने के लिये प्रयत्नशील रहते थे। इसी के चलते संघर्ष उत्पन्न होता था। आर्य दैत्यों और रक्षों को एक ही पलड़े पर रखते थे और दोनों से समान रूप से घृणा करते थे।


यह सत्ता का संघर्ष था। समर्थक शक्तियों से देवों को कोई भय नहीं था। पूरे पौराणिक इतिहास में एक या दो ही ऐसे किस्से हैं जब किसी आर्य नृप ने देवों की सत्ता को चुनौती दी हो या देवेन्द्र के सिंहासन पर दावा किया हो किन्तु दैत्य और बाद में रक्ष इसके लिये सदैव प्रयत्नशील बने ही रहे। किसी भी शक्तिशाली दैत्य या रक्ष की पहली महत्वाकांक्षा देवेन्द्र को पदच्युत करना ही होती थी।


देव स्वयं में कोई बहुत बड़ी महाशक्ति हों ऐसा नहीं था किन्तु उस समय की तीनो महाशक्तियाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश देवों से आन्तरिक सहानुभूति रखते थे। दैत्य भी हालांकि देवों के सौतेले भाई ही थे, इस कारण इन तीनों महाशक्तियों को दोनों पक्षों के साथ समभाव रखना चाहिये था पर हकीकत में ऐसा नहीं था। इन तीनों में यद्यपि ब्रह्मा और शिव प्रयास करते थे कि उन पर खुले रूप में पक्षपात का आरोप स्थापित न हो पाये और देवों के साथ सहानुभूति होते हुये भी व्यावहारिक तुला समतल पर ही स्थित रहे। इन दोनों के विपरीत विष्णु खुल कर देवों के पक्ष में खड़े हो जाते थे। इसका कारण भी था। देवराज इन्द्र उनके बड़े भाई थे। बड़े भाई के पक्ष में खड़ा होना स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देव पराक्रमी थे किन्तु अजेय नहीं थे| दैत्यों ने उन्हें बार-बार पराजित किया किन्तु विष्णु का सहयोग मिल जाने से वे अवसर हार कर भी जीत जाते थे। अनेक उदाहरण हैं इसके और यह तो स्थापित सत्य है कि इतिहास विजेता की कलम से ही लिखा जाता हैं। विजेता की ही प्रशस्ति गाता है। पराजित को वह खलनायक (हो या न हो) के तौर पर ही दर्ज करता है।


माल्यवान आदि इन तीनों भाइयों के किस्से में भी यही हुआ था।


मात्यवान, सुमाली और माली बल पौरुष में बहुत बढ़े-बढ़े थे। अद्भुत लंका नगरी इन्होंने ही बसायी थी। बाद में इन्होंने इन्द्र को परास्त कर स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया था।


पराजित इन्द्र, अन्य देवताओं के साथ सहायता की प्रार्थना करने शिव के पास कैलाश पहुँचा किन्तु शिव ने यह कहते हुये इनकार कर दिया कि ये तीनों मेरे प्रगाढ़ मित्र सुकेश के पुत्र हैं। इनके विरुद्ध मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।


इस पर इन्द्र विष्णु के पास सहायता माँगने पहुँचा। विष्णु ने क्षीर सागर (अन्य ) पौराणिक स्थलों की भाँति ही क्षीर सागर की स्थिति के विषय में भी विद्वान अभी तक निश्चित धारणा नहीं बना पाये हैं।) के चारों ओर अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया था।

पौराणिक इतिहास में विष्णु की ख्याति सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ की है। आवश्यकतानुसार वे साम-दाम-दंड-भेद सभी विधियों का प्रयोग करने में अति कुशल थे। उनका सिद्धांत था कि बड़े उद्देश्य के लिये छोटे सिद्धांतों का त्याग भी करना पड़े तो बेहिचक कर देना चाहिये। इन्हीं विशेषताओं के चलते वे सदैव इन्द्र के संकटमोचन बन कर उभरा उन्हें कभी पराजय का स्वाद नहीं चखना पड़ा। इन्हीं समरूप विशिष्टताओं के चलते कालांतर में कृष्ण को पूर्ण विष्णु की उपाधि से सम्मानित किया गया।


विष्णु के सामने माल्वान, सुमाली और माली नहीं टिक पाये। इनकी सारी सेना विष्णु ने नष्ट कर दी थी। सबसे छोटा भाई माली भी रण में खेत रहा था।


इस समय ये बचे-खुचे थोड़े से लोग जान बचाते हुये वापस लंका की ओर भाग रहे थे। विष्णु का सैन्य इनका पीछा कर रहा था इस कारण ये दिन में सघन वनों-बागों आदि में छुपे रह थे और रात्रि में जितना संभव हो सके दूर निकल जाने का प्रयास करते थे। पिछले दो दिनों से इन्हें कोई सही आश्रय नहीं मिला था और विष्णु का सैन्य पीछे था ही इसलिये ये बिना रुके दो दिन और दो रात भागते ही रहे थे, बस एक जंगल में एक प्रहर का विश्राम अवश्य किया था। पर उस जंगल में भी खाने लायक कुछ नहीं मिला था।

चपला, अचेत होने से पूर्व उसने अपना जो नाम लिया था, के असहयोगपूर्ण व्यवहार ने माल्यवान और सुमाली दोनों को ही चिंता में डाल दिया था। उन्हें आभास हो रहा था कि सागर तक नहीं तो कम से कम विन्ध्याचल तक तो अवश्य ही उन्हें ऐसे ही शत्रुतापूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है।

उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि भले ही उनकी संस्कृति रक्ष है तो भी आर्य तो वे भी हैं,

फिर इन आर्यों के मन में उनके लिये ऐसा विकट, अतार्किक द्वेष क्यों है? क्या बिगाड़ा है उन्होंने इन आर्यों का। उन्होंने तो देवराज पर आक्रमण किया था, इस आर्यभूमि के किसी सम्राट से तो उनका कोई विवाद था ही नहीं। ठीक यही स्थिति पूर्व में दैत्यों की थी।

माल्यवान और सुमाली दोनों ही अपना विश्राम और भोजन भूल कर चपला के उपचार में लग गये थे। चोट गंभीर थी। यदि अविलम्ब उपचार न मिला तो यह जीवन भर उठने-बैठने लायक नहीं रहेगी। पूर्ण पक्षाघात का शिकार भी हो सकती हैं। भाग्य से उपचार की कुछ सामग्री उनके साथ थी। वाटिका में भी तलाश करने से भी कुछ बूटियाँ मिल गयी थीं। बस्ती में जाना दुस्साहस सिद्ध हो सकता था, अगर किसी भी प्रकार से विष्णु के किसी व्यक्ति के संज्ञान में उनकी यहाँ उपस्थिति आ गयी तो अनिष्टकारी हो सकता था। चपला के चेहरे पर कटार से हुआ घाव गंभीर था। जबड़ा चटक गया था। दाहिने जबड़े से लेकर आँख के नीचे की हड्डी तक बुरी तरह से कट गया था। उसका उपचार कर दिया गया था पर उन्हें लग रहा था कि चेहरा सदैव के लिये कुरूप तो हो ही जायेगा। ठोढ़ी टेढ़ी हो जायेगी, एक आँख पर भी असर पड़ने की संभावना है। जाँघ के दोनों ओर खपच्चियाँ रख कर औषधि लगाकर बाँध दिया गया था। अभी बच्ची है अस्थि आसानी से जुड़ जायेगी यद्यपि चाल में लंगड़ाहट रह सकती है। सबसे बुरी चोट पीठ में थी। अश्व के पैर पड़ने से रीढ़ की हड्डी के कई संधि स्थल अपने स्थान से हट गये प्रतीत हो रहे थे। माँस पेशियाँ भी फट गयी थीं। जितना संभव था उतनी व्यवस्था उन्होंने कर दी थी पर यह तय था कि इस लड़की की कमर सदैव के लिये टेढ़ी हो जायेगी। यह सीधी खड़ी नहीं हो सकेगी। पर वे क्या कर सकते थे। सारे कांड के लिये लड़की स्वयं उत्तरदायी थी। उनमें से किसी ने भी कोई वार नहीं किया था। 'काश वह थोड़ी सहिष्णुता का प्रदर्शन कर पाती' सुमाली ने सोचा।


साँझ होते होते दो और बालक आ गये थे। वे लड़की की अपेक्षा बहुत सहिष्णु साबित हुये थे। अगर वे भी लड़की जैसे ही निकलते तो लड़की के हित में बहुत घातक हो सकता था पर उन्होंने बिना हाथापाई किये सारी बात सुनी। माल्यवान ने उन्हें सारी घटना के बारे में बताया। जो-जो उपचार कर दिया गया था वह समझा दिया, आगे के लिये आवश्यक निर्देश भी दे दिये। सूरज ढलने तक उन दोनों को रोके रखा गया। फिर सबने अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर आगे की यात्रा आरंभ की। सुमाली का बड़ा पुत्र प्रहस्त सबसे बाद में निकल सब आँखों से ओझल होने की कगार पर आ गये तब वह लड़कों से बोला


" इसे अतिशीघ्र किसी कुशल वैद्य के संरक्षण में ले जाना। एक व्यक्ति जाकर एक चारपाई और कुछ व्यक्तियों को लिवा लाओ। चारपाई पर ही लेकर जाना इसे सावधानी से, कटि भी फट गयी थीं। जितना संभव था उतनी व्यवस्था उन्होंने कर दी थी पर यह तय था कि इस लड़की की कमर सदैव के लिये टेढ़ी हो जायेगी। यह सीधी खड़ी नहीं हो सकेगी। पर वे क्या कर सकते थे| सारे कांड के लिये लड़की स्वयं उत्तरदायी थी। उनमें से किसी ने भी कोई वार नहीं किया था। 'काश वह थोड़ी सहिष्णुता का प्रदर्शन कर पाती सुमाली ने सोचा।

इतना कह कर उसने अपने घोड़े को ऐड लगा दी। पलक झपकते ही घोड़ा हवा से बातें करने लगा। अब लड़के अगर बस्ती में जाकर उनकी सूचना दे भी देते तो कोई उनकी हवा भी नहीं पा सकता था।

हां! क्षतिपूर्ति लेना इन लड़कों ने भी किसी भी तरह स्वीकार नहीं किया था।

सुलभ अग्निहोत्री



गुरुवार, 3 जून 2021

कृष्ण का संन्यास, उत्सवपूर्ण संन्यास

 श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।। 1।।


श्रीकृष्ण भगवान बोले, हे अर्जुन, जो पुरुष कर्म के फल को न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है और केवल अग्नि को त्यागने वाला संन्यासी, योगी नहीं है; तथा केवल क्रियाओं को त्यागने वाला भी संन्यासी, योगी नहीं है।



कृष्ण के साथ इस पृथ्वी पर एक नए संन्यास की धारणा का जन्म हुआ। संन्यास सदा से संसार-विमुख धारा थी--संसार के विरोध में, शत्रुता में। जीवन का निषेध, कृष्ण के पहले तक संन्यास की व्याख्या थी; लाइफ निगेटिव था। जो छोड़ दे सब--कर्म को, गृह को, जीवन के सारे रूप को--निष्क्रिय हो जाए, पलायन में चला जाए, हट जाए जीवन से, वैसा ही व्यक्ति संन्यासी था। कृष्ण ने संन्यास को बहुत नया आयाम, एक न्यू डायमेंशन दिया। वह नया आयाम इस सूत्र में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं।

अर्जुन के मन में भी यही खयाल था संन्यास का। अर्जुन भी यही सोचता था कि सब छोड़कर चला जाऊं, तो जीवन संन्यास को उपलब्ध हो जाएगा। अर्जुन भी सोचता था, कर्तव्य छोड़ दूं, करने योग्य है वह छोड़ दूं, कुछ भी न करूं, अक्रिय हो जाऊं, निष्क्रिय हो जाऊं, अकर्म में चला जाऊं, तो संन्यास को उपलब्ध हो जाऊंगा। लेकिन कृष्ण ने उससे इस सूत्र में कहा है, फल की आकांक्षा न करते हुए जो कर्म को करता है, उसे ही मैं संन्यासी कहता हूं। उसे नहीं, जो मात्र कर्म को छोड़ देता है , लेकिन फल की आकांक्षा जिसकी शेष रहती है। जो बाह्य रूपों को छोड़ देता है, लेकिन अंदर जिसका पुराना का पुराना ही बना रह जाता है, उसे मैं संन्यासी नहीं कहता हूं।

तो संन्यास की इस धारणा में दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो संन्यास का बहिर रूप है; लेकिन एक संन्यास की अंतरात्मा भी है। पुराना संन्यास बहिर रूप पर बहुत जोर देता था। कृष्ण का संन्यास अंतरात्मा के रूपांतरण पर, इनर ट्रांसफार्मेशन पर जोर देता है।

कर्म को छोड़ना बहुत कठिन नहीं है। आलसी भी कर्म को छोड़कर बैठ जाते हैं। और इसलिए, अगर पुराने संन्यास की धारणा ने आलसियों को आकर्षित किया हो, तो बहुत आश्चर्य नहीं है। और इसलिए, अगर पुराने संन्यास की धारणा को मानने वाले समाज धीरे-धीरे आलसी हो गए हों, तो भी आश्चर्य नहीं है। जो कुछ भी नहीं करना चाहते हैं, उनके लिए पुराने संन्यास में बड़ा रस मालूम होता है। कुछ न करना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।

इस जगत में कोई भी कुछ नहीं करना चाहता है। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जो कुछ करना चाहता है। लेकिन सारे लोग करते हुए दिखाई पड़ते हैं, इसलिए नहीं कि कर्म में बहुत रस है, बल्कि इसलिए कि फल बिना कर्म के नहीं मिलते हैं। हम कुछ चाहते हैं, जो बिना कर्म के नहीं मिलेगा। अगर यह तय हो कि हमें बिना कर्म किए, जो हम चाहते हैं, वह मिल सकता है, तो हम सभी कर्म छोड़ दें, हम सभी संन्यासी हो जाएं! लेकिन चाह पूरी करनी है, तो कर्म करना पड़ता है। यह मजबूरी है, इसलिए हम कर्म करते हैं।

कृष्ण इससे उल्टी बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं, कर्म तो तुम करो और फल की आशा छोड़ दो। हम कर सकते हैं आसानी से, कर्म न करें और फल की आशा करें। जो आसान है, वह यह मालूम पड़ता है कि हम कर्म तो न करें और फल की आशा करें। और अगर कोई फल पूरा कर दे, तो हम कर्म छोड़ने को सदा ही तैयार हैं। कृष्ण इससे ठीक उलटी ही बात कह रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि कर्म तो तुम करो ही, फल की आशा छोड़ दो। यह फल की आशा छूट जाए, तो कृष्ण के अर्थों में संन्यास फलित होगा।

फल की आशा के बिना कर्म कौन कर पाएगा? कर्म करेगा ही कोई क्यों? दौड़ते हैं, इसलिए कि कहीं पहुंच जाएं। चलते हैं, इसलिए कि कोई मंजिल मिल जाए। आकांक्षाएं हैं, इसलिए श्रम करते हैं; सपने हैं, इसलिए संघर्ष करते हैं। कुछ पाने को दूर कोई तारा है, इसलिए जन्मों-जन्मों तक यात्रा करते हैं।

वह तारा तोड़ दो। कृष्ण कहते हैं, वह तारा तोड़ दो। नाव तो खेओ जरूर, लेकिन उस तरफ कोई किनारा है, उसका खयाल छोड़ दो। पहुंचना है कहीं, यह बात छोड़ दो; पहुंचने की चेष्टा जारी रखो।

असंभव मालूम पड़ेगा। अति कठिन मालूम पड़ेगा। फिर नाव किसलिए चलानी है, जब कोई तट पर पहुंचना नहीं!

पर कृष्ण बहुत अदभुत बात कहते हैं। वे यह कहते हैं कि नाव चलाने से कोई तट पर नहीं पहुंचता, जन्मों-जन्मों तक चलकर भी कोई मंजिल पर नहीं पहुंचता, आकांक्षाएं करने से कोई आकांक्षाएं पूरी होती नहीं हैं। लेकिन जो आदमी नाव चलाए और किनारे पर पहुंचने का खयाल छोड़ दे, उसे बीच मझधार भी किनारा बन जाती है। और जो आदमी कल की आशा छोड़ दे और आज कर्म करे, कर्म ही उसका फल बन जाता है, कर्म ही उसका रस बन जाता है। फिर कर्म और फल में समय का व्यवधान नहीं होता। फिर अभी कर्म और अभी फल।

संन्यास जीवन का त्याग नहीं है कृष्ण के अर्थों में, जीवन का परम भोग है।

जीवन का रहस्य ही यही है कि हम जिसे पाना चाहते हैं, उसे हम नहीं पा पाते हैं। जिसके पीछे हम दौड़ते हैं, वह हमसे दूर हटता चला जाता है। जिसके लिए हम प्रार्थनाएं करते हैं, वह हमारे हाथ के बाहर हो जाता है। जीवन करीब-करीब ऐसा है, जैसे मैं मुट्ठी में हवा को बांधूं। जितने जोर से कसता हूं मुट्ठी को, हवा उतनी मुट्ठी के बाहर हो जाती है। खुली मुट्ठी में हवा होती है, बंद मुट्ठी में हवा नहीं होती। हालांकि जिसने मुट्ठी बांधी है, उसने हवा बांधने को बांधी है।

जीवन को जो लोग जितनी वासनाओं-आकांक्षाओं में बांधना चाहते हैं, जीवन उतना ही हाथ के बाहर हो जाता है। अंत में सिवाय रिक्तता, फ्रस्टे्रशन, विषाद के कुछ भी हाथ नहीं पड़ता है।

कृष्ण कहते हैं, खुली रखो मुट्ठी; आकांक्षा से बांधो मत, इच्छा से बांधो मत। जीओ, लेकिन किसी आगे भविष्य में कोई फल मिलेगा, इसलिए नहीं। फिर किसलिए? हम पूछना चाहेंगे कि फिर किसलिए जीओ?

कृष्ण कहते हैं, जीना अपने में ही आनंद है।

जीने के लिए कल की इच्छा से बांधना नासमझी है। जीना अपने में ही आनंद है। यह पल भी काफी आनंदपूर्ण है। और तब श्रम ही अपने में आनंद हो जाए, कर्म ही अपने में आनंद हो जाए, तो कुछ आश्चर्य नहीं है।

लेकिन कृष्ण के समय तक सारा संन्यास भगोड़ा, एस्केपिस्ट था, पलायनवादी था। हट जाओ। जहां-जहां दुख है, वहां-वहां से हट जाओ। जहां-जहां पीड़ा है, वहां-वहां से हट जाओ। लेकिन कृष्ण कहते हैं, पीड़ा स्थान की वजह से नहीं है; पीड़ा वासना के कारण है। वही उनकी बुनियादी खोज है।

पीड़ा इसलिए नहीं है कि आप बाजार में बैठे हो; और जंगल में बैठोगे, तो सुख हो जाएगा। अगर आप जिस भांति दुकान पर बैठे हो, उसी भांति मंदिर में बैठ गए, तो कोई सुख न होगा। आप ही तो मंदिर में बैठ जाओगे! आप बाजार में थे; आप ही जंगल में बैठ जाओगे। आपमें कोई फर्क न हुआ, तो जंगल में उतनी ही पीड़ा है, जितनी बाजार में दुकान पर थी।

सवाल यह नहीं है कि जगह बदल ली जाए। जगह का कोई भी संबंध नहीं है। जहां आज आपकी दुकान है, कल कभी वहां जंगल रहा था। और कल कभी कोई संन्यास लेकर उस जंगल में आकर बैठ गया होगा। जगह वही है; अब वहां दुकान है। जहां आज जंगल है, कल दुकान हो जाएगी। जहां आज दुकान है, कल जंगल हो जाएगा। जगहों में कोई अंतर नहीं है। जमीन ने तय नहीं कर रखा है कि कहां जंगल हो और कहां दुकान हो। दुकान तय होती है मन से, स्थान से नहीं। दुकान तय होती है मनःस्थिति से, परिस्थिति से नहीं।

कृष्ण कहते हैं, अगर तुम तुम ही रहे, तो तुम कहीं भी भाग जाओ, दुख तुम्हारे साथ पहुंच जाएगा। वह तुम्हारे भीतर है, वह तुममें है, वह तुम्हारी वासना में है, वह तुम्हारी इच्छा में है। जहां इच्छा है, वहां दुख छाया की तरह पीछा करेगा। इसलिए भागो जंगल में, गुफाओं में, हिमालय पर, कैलाश पर। दुख को तुम पाओगे कि वह तुम्हारे साथ मौजूद है। खोलोगे आंख, पाओगे, सामने खड़ा है। बंद करोगे आंख, पाओगे, भीतर बैठा है।

दुख उस चित्त में निवास करता है, जो वासना में जीता है।

फिर यह भी मजे की बात है कि जो आदमी संसार छोड़कर भागता है, वह भी वासनाएं छोड़कर नहीं भागता। वह भी किसी वासना के लिए संसार छोड़कर भागता है। इस बात को भी थोड़ा ठीक से समझ लेना जरूरी है। वह पाना चाहता होगा मोक्ष, पाना चाहता होगा परमात्मा, पाना चाहता होगा स्वर्ग, पाना चाहता होगा शांति, पाना चाहता होगा आनंद। लेकिन पाना जरूर चाहता है।

नीत्शे ने कहीं बहुत व्यंग्य किया है उन सारे लोगों पर, जो जीवन को छोड़कर भागते हैं। उसने कहा है कि तुम अजीब हो पागल! तुम कहते हो, हम इच्छाओं को छोड़कर भागते हैं, लेकिन मैंने एक भी ऐसा आदमी नहीं देखा जो किसी इच्छा के लिए न भाग रहा हो। यहां इच्छाएं छोड़ता है, वहां इच्छाएं पाने के लिए भागता है! और अगर किसी इच्छा के लिए ही इच्छा छोड़ी गई, तो इच्छा कहां छोड़ी गई है? ऐसे तो कोई भी छोड़ देता है।

एक आदमी को सिनेमा जाना होता है, तो दुकान छोड़कर जाता है। एक आदमी को वेश्या को खरीदना होता है, तो कुछ छोड़कर खरीदना होता है। जीवन की इकॉनामी है। एक ही चीज से आप सब चीजें नहीं खरीद सकते। एक चीज छोड़नी पड़ती है, तो दूसरी चीज खरीद सकते हैं। जीवन का अपना अर्थशास्त्र है।

आपके खीसे में एक रुपया पड़ा हुआ है। रुपया बहुत चीजें खरीद सकता है। जब तक नहीं खरीदा है, तब तक रुपया बहुत चीजें खरीद सकता है। लेकिन जब खरीदने जाएंगे, तो एक ही चीज खरीद सकता है। जब आप एक चीज खरीदेंगे, तो बाकी जो चीजें रुपया खरीद सकता था, उनका त्याग हो गया। अगर आपने एक रुपए से टिकट खरीद ली और रात जाकर सिनेमा में बैठ गए, तो आप एक रुपए से और जो खरीद सकते थे, उस सबका आपने त्याग कर दिया। आप भी त्याग करके वहां गए हैं। हो सकता है, बच्चे को दवा की जरूरत हो, आपने उसका त्याग कर दिया। हो सकता है, पत्नी के तन पर कपड़ा न हो, उसको कपड़े की जरूरत हो, आपने उसका त्याग कर दिया। हो सकता है, आपका खुद का पेट भूखा हो, लेकिन आपने अपनी भूख का त्याग कर दिया।

जगत में जीवन की एक इकॉनामी है, अर्थशास्त्र है। यहां एक इच्छा पूरी करनी हो, तो दूसरी इच्छाएं छोड़नी पड़ती हैं। तो जो आदमी संसार की इच्छाएं छोड़कर जंगल चला जाता है, पूछना जरूरी है, वह क्या पाने वहां जा रहा है? कहेगा, परमात्मा को पाने जा रहा हूं, आत्मा को पाने जा रहा हूं, आनंद को पाने जा रहा हूं। लेकिन इच्छाओं को छोड़कर अगर किसी इच्छा को पाने ही जा रहे हैं, तो आप संन्यासी नहीं हैं।

कृष्ण कहते हैं संन्यासी उसे, जो किसी इच्छा के लिए और इच्छाओं को नहीं छोड़ता, जो इच्छाओं को ही छोड़ देता है। इस फर्क को ठीक से समझ लें। किसी इच्छा के लिए छोड़ना, तो सभी से हो जाता है। नहीं, इच्छाओं को ही छोड़ देता है।

हम कहेंगे कि इच्छा छूटी कि कर्म छूट जाएगा! हम कहेंगे कि इच्छा अगर छूट जाए, तो फिर हम कर्म क्यों करेंगे? यह भी हमारा इच्छा से भरा हुआ मन सवाल उठाता है। क्योंकि हमने बिना इच्छा के कभी कोई कर्म नहीं किया है। लेकिन कृष्ण गहरा जानते हैं। वे जानते हैं कि इच्छा छूट जाए, तो भी कर्म नहीं छूटेगा, सिर्फ गलत कर्म छूट जाएगा। यह दूसरा सूत्र इस सूत्र में समझ लेने जैसा है।

इसलिए वे कहते हैं, जो करने योग्य है, वही कर्म। जैसे ही इच्छा छूटी कि गलत कर्म छूट जाएगा, ठीक कर्म नहीं छूटेगा। क्योंकि ठीक कर्म जीवन से वैसे ही निकलता है, जैसे झरने सागर की तरफ बहते हैं। ठीक कर्म जीवन में वैसे ही खिलता है, जैसे वृक्षों में फूल खिलते हैं। ठीक कर्म जीवन का स्वभाव है।

गलत कर्म जीवन का स्वभाव नहीं है। इच्छाओं के कारण गलत कर्म जीवन करने को मजबूर होता है। जो आदमी चोरी करता है, वह भी ऐसा अनुभव नहीं करता कि मैं चोर हूं। बड़े से बड़ा चोर भी ऐसा ही अनुभव करता है कि मजबूरी में मैंने चोरी की है; मैं चोर नहीं हूं। बड़े से बड़ा चोर भी ऐसा ही अनुभव करता है कि ऐसा दबाव था परिस्थिति का कि मुझे चोरी करनी पड़ी है, वैसे मैं चोर नहीं हूं। बुरे से बुरा कर्म करने वाला भी ऐसा नहीं मानता कि मैं बुरा हूं। वह ऐसा ही मानता है, एक्सिडेंट है बुरा कर्म।

आज तक पृथ्वी पर ऐसा एक भी आदमी नहीं हुआ, जिसने कहा हो कि मैं बुरा आदमी हूं। वह इतना ही कहता है, आदमी तो मैं अच्छा हूं, लेकिन दुर्भाग्य कि परिस्थितियों ने मुझे बुरा करने को मजबूर कर दिया।

लेकिन परिस्थितियां! उसी परिस्थिति में बुद्ध भी पैदा हो जाते हैं; उसी परिस्थिति में एक डाकू भी पैदा हो जाता है; उसी परिस्थिति में एक हत्यारा भी पैदा हो जाता है। एक ही घर में भी तीन लोग तीन तरह के पैदा हो जाते हैं। बिलकुल एक-सी परिस्थिति भी एक-से आदमी पैदा नहीं कर पाती।

परिस्थिति भेद कम डालती है; इच्छाएं भेद ज्यादा डालती हैं।

इच्छाएं इतनी मजबूत हों, तो हम सोचते हैं कि एक इच्छा पूरी होती है, थोड़ा-सा बुरा भी करना हो, तो कर लो। इच्छा की गहरी पकड़ बुरा करने के लिए राजी करवा लेती है। बुरा काम भी कोई आदमी किसी अच्छी इच्छा को पूरा करने के लिए करता है। बुरा काम भी किसी अच्छी इच्छा को पूरा करने के लिए अपने मन को समझा लेता है कि इच्छा इतनी अच्छी है, साध्य इतना अच्छा है, इसलिए अगर थोड़े गलत मार्ग भी पकड़े गए, तो बुरा नहीं है। और ऐसा नहीं है कि छोटे-छोटे साधारणजन ऐसा सोचते हैं, बड़े बुद्धिमान कहे जाने वाले लोग भी ऐसा ही सोचते हैं। माक्र्स या लेनिन जैसे लोग भी ऐसा ही सोचते हैं कि अगर अच्छे अंत के लिए बुरा साधन उपयोग में लाया जाए, तो कोई हर्जा नहीं है; ठीक है। लेकिन हम जो करना चाहते हैं, वह तो अच्छा ही करना चाहते हैं।

बुरे से बुरे आदमी की भी तर्क-शैली यही है कि जो मैं करना चाहता हूं, वह तो अच्छा ही है। अगर मैं एक मकान बना लेना चाहता हूं और उसकी छाया में दोपहर विश्राम करना चाहता हूं, तो बुरा क्या है! सहज, स्वाभाविक, मानवीय है। फिर इसके लिए थोड़ी कालाबाजारी करनी पड़ती है, थोड़ी चोरी करनी पड़ती है, थोड़ी रिश्वत देनी पड़ती है, वह मैं दे लेता हूं। क्योंकि उसके बिना यह नहीं हो सकेगा।

कृष्ण कहते हैं कि जिस आदमी की इच्छाएं छूट जाएं, उस आदमी के बुरे कर्म तत्काल छूट जाते हैं। लेकिन अच्छे कर्म नहीं छूटते।

अच्छा कर्म वही है--उसकी परिभाषा अगर मैं देना चाहूं, तो ऐसी देना पसंद करूंगा--अच्छा कर्म वही है, जो बिना इच्छा के भी चल सके। और बुरा कर्म वही है, जो इच्छा के पैरों के बिना न चल सके। जिस कर्म को चलाने के लिए इच्छा जरूरी हो, वह बुरा है; और जिस कर्म को चलाने के लिए इच्छा बिलकुल भी गैर-जरूरी हो, वह कर्म अच्छा है। अच्छे का एक ही अर्थ है, जीवन के स्वभाव से निकले, जीवन से निकले।

कृष्ण कहते हैं, अगर इच्छाएं छोड़ दे कोई और सिर्फ कर्म करे, तो उसे मैं संन्यासी कहता हूं।

यह बड़ी इसोटेरिक, बड़ी गुह्य व्याख्या है। साधारणतः यही दिखाई पड़ता है संन्यासी और गृहस्थ का फर्क कि गृहस्थ वह है जो घर में रहे, संन्यासी वह है जो घर छोड़ दे। कृष्ण की परिभाषा में उलटा भी हो सकता है। घर में रहने वाला भी संन्यासी हो सकता है, घर छोड़ने वाला भी गृहस्थ हो सकता है।

कृष्ण की परिभाषा थोड़ी गहन है। अगर कोई आदमी घर छोड़ दे, किसी इच्छा के लिए, तो वह गृहस्थ है। और अगर कोई आदमी घर में चुपचाप रहा आए बिना किसी इच्छा के, तो वह संन्यासी है। अगर कोई आदमी अपने घर में बिना इच्छाओं के जीने लगे, तो घर आश्रम हो गया। और अगर कोई आदमी आश्रम में जाकर नई इच्छाओं के आस-पास जाल बुनने लगे, तो वह घर हो गया।

ऐसा संन्यासी आपने देखा है, जिसकी इच्छा न हो? अगर ऐसा संन्यासी नहीं देखा जिसकी इच्छा न हो, तो समझना कि आपने संन्यासी ही नहीं देखा है।

आदमी का मन, बहुत रूपों में अपने को बचाने में कुशल है। सब तरफ से अपने को बचाने में कुशल है। विपरीत स्थितियों में भी अपने को बचा लेता है। जंगल में भी बैठ जाएं, तो वहां भी इच्छा के जाल बुनता रहता है। मंदिर में, तीर्थ में भी बैठकर इच्छाओं के जाल बुनता रहता है। मन का काम ही इच्छाओं के जाल निर्मित करना है।

अगर हम ऐसा कहें कि मन ऐसा वृक्ष है, जिस पर इच्छाओं के पत्ते लगते हैं, लगते ही चले जाते हैं। एक पत्ता कुम्हलाया, गिरा नहीं कि नए पत्ते के पीके निकलने शुरू हो गए, अंकुरित होने लगे। अगर और गहरे में देखें, तो पुराना पत्ता गिरता तभी है, जब उसके नीचे से नया पत्ता उसे गिराने के लिए धक्के देने लगता है। एक इच्छा छूटती तभी है, जब दूसरी इच्छा जगह बनाने के लिए मांग करती है कि मुझे जगह खाली करो। एक इच्छा हटती तभी है, जब उससे भी प्रबल इच्छा धक्के देकर जगह बनाती है। मन में इच्छाएं निर्मित होती चली जाती हैं।

कृष्ण कहते हैं, इच्छाएं न हों, तो संन्यासी हो जाएगा। मैं आपसे कहता हूं, जिसमें इच्छाएं न रहीं, उसमें मन भी न रहा। क्योंकि मन और इच्छाएं एक ही चीज का नाम है। मन समस्त इच्छाओं का जोड़ है, समस्त कामनाओं का जोड़, समस्त तृष्णाओं का जोड़। अगर इच्छाएं न रही, तो मन न रहा।

कृष्ण कहते हैं, जिसके पास मन न रहा, वह संन्यासी है। कर्म न रहा, नहीं; मन न रहा, वह संन्यासी है।

बुरे कर्म तो गिर जाएंगे, क्योंकि बुरे कर्म बिना इच्छाओं के कोई भी नहीं कर सकता।

इसमें एक बहुत गहन आस्था भी प्रकट की गई है।

कृष्ण की मनुष्य पर निष्ठा अपरिसीम है। इतनी निष्ठा शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति की पृथ्वी पर कभी रही हो। जो आदमी भी मानता है कि तुम्हें अच्छा होना पड़ेगा, उस आदमी की आदमी पर बहुत निष्ठा नहीं है। कृष्ण की निष्ठा है कि आदमी तो अच्छा है, सिर्फ मन मौजूद न हो, तो आदमी की अच्छाई में कोई कमी ही नहीं है। वह अच्छा है ही। वह स्वभावतः अच्छा है। वह शुभ है। इतनी ही शर्त काफी है कि वह इच्छाएं छोड़ दे और उसके भीतर शुभ का जन्म हो जाएगा। वह बिलकुल शुद्ध, पवित्रतम, निर्दोष, निष्कलंक प्रकट हो जाएगा। उसकी इनोसेंस, उसका निर्दोषपन जाहिर हो जाएगा।

जैसे दर्पण पर धूल जम गई हो और धूल को किसी ने पोंछ दिया हो और दर्पण शुद्ध हो जाए। लेकिन क्या आप कहेंगे कि जब दर्पण पर धूल थी, तब दर्पण अशुद्ध हो गया था? आपको तस्वीर नहीं दिखाई पड़ती थी, यह बात दूसरी है। लेकिन दर्पण तब भी अशुद्ध नहीं हो गया था। दर्पण तब भी पूरा ही दर्पण था। सिर्फ धूल की एक पर्त थी कि तस्वीर दिखाई नहीं पड़ती थी। दर्पण में धूल कहीं घुस नहीं गई थी, प्रवेश नहीं कर गई थी, बाहर ही बाहर थी। फूंक मार दी, झाड़ दी। धूल हट गई, दर्पण साफ हो गया।

कृष्ण की दृष्टि में आदमी दर्पण की तरह शुद्ध है। इच्छाएं करता है, तो धूल इकट्ठी कर लेता है चारों तरफ, इच्छाओं के कण इकट्ठे कर लेता है।

अभी पश्चिम में इस बात पर काफी चिंतन-मनन चलता है कि जब आदमी इच्छाएं करता है, तो क्या उसके मन में कोई अंतर पड़ता है इच्छाओं के करने से? जब एक आदमी क्रोध से भरता है, तब उसके पास वही मन रहता है, जो क्रोध करने के पहले था? जब एक आदमी क्षमा से भरता है, तब उसके पास वही मन रहता है, जो क्रोध के वक्त था?

तो अब मनोविज्ञान कहता है कि मन तो वही रहता है, लेकिन मन के आस-पास की चीजें बदल जाती हैं। जब आदमी क्रोध से भरता है, तो शरीर की ग्रंथियां ऐसे जहर को छोड़ देती हैं, जो मन को चारों तरफ से घेर लेता है, पायजनस कर देता है, जैसे दर्पण को धूल घेर ले। और जब आदमी प्रेम से भरता है, तो उसकी रस-ग्रंथियां उसके सारे शरीर से उस अमृत को छोड़ देती हैं; तब भी मन वही रहता है, लेकिन उसके चारों तरफ रस की धार बहने लगती है--उसी आदमी के पास।

कृष्ण और भी गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि आदमी की चेतना तो निर्दोष है ही। बस, तुमने चाहा कि दोष इकट्ठे होने शुरू हुए। वे भी बाहर ही इकट्ठे होते हैं, भीतर प्रवेश नहीं करते। एक क्षण को भी कोई इच्छाएं छोड़ दे, तो वे सारे दोष गिर जाते हैं। और तब बुरा कर्म असंभव हो जाता है। लेकिन शुभ कर्म जारी रहता है। सच तो यह है कि जो शक्ति हमारे बुरे कर्म में लगती है, वह सारी शक्ति बच जाती है और शुभ कर्म में समायोजित हो जाती है।

कृष्ण के लिए, कर्म इच्छाओं के कारण से नहीं होते; कर्म जीवन के स्वभाव की स्फुरणा है; जीवन की एनर्जी से होते हैं। जहां शक्ति है, वहां कर्म आएगा। क्योंकि शक्ति कर्म में प्रकट होना चाहती है।

यह परमात्मा इतने बड़े विराट जगत में प्रकट होता है, यह उसकी ऊर्जा है, शक्ति है, जो प्रकट होना चाहती है। जमीन से एक पत्थर हटा लिया और एक फव्वारा फूटने लगा। यह फव्वारा कहीं जाने को नहीं फूट रहा है। इसके भीतर ऊर्जा है, वह प्रकट होना चाहती है।

आदमी की अगर इच्छाएं गिर जाएं, तो उसके जीवन की पूरी ऊर्जा शुभ में प्रकट होना चाहती है। इच्छाओं रहित चेतना शुभ की ऊर्जा को प्रकट करने लगती है।

तो कृष्ण कहते हैं, बुरे कर्म गिर जाएंगे। जो करने योग्य है, वही किया जा सकेगा। इसको ही मैं संन्यास कहता हूं। उसको नहीं कि जिसने अग्नि छोड़ दी।

उन दिनों अग्नि को छोड़ना बहुत बड़ी घटना थी। इसको थोड़ा खयाल में ले लें। यह सूत्र जब कहा गया, तब अग्नि को छोड़ना बहुत बड़ी घटना थी। आज हमारे मन में खयाल आएगा कि यह क्या बात कहते हैं कृष्ण कि जिसने अग्नि छोड़ दी! आज हमारे लिए अग्नि उतनी बड़ी घटना नहीं है। लेकिन जिस दिन यह बात कही गई थी, उस दिन अग्नि उतनी ही बड़ी घटना थी, जितनी अगर हम आज सोचना चाहें, तो सिर्फ एक ही बात खयाल में आ सकती है। जैसे आज अगर हम कहें कि जिस व्यक्ति ने यंत्रों का उपयोग छोड़ दिया! आज अगर पैरेलल, समानांतर कोई बात कहना चाहें; अगर आज हम कहें कि जिस व्यक्ति ने यंत्रों का उपयोग छोड़ दिया!

तो आप सोचें कि यंत्र के उपयोग छोड़ने में करीब-करीब जीवन का सब कुछ छूट जाएगा। क्योंकि आज जीवन को यंत्र ने सब तरफ से घेर लिया है। वह आदमी ट्रेन में नहीं बैठ सकेगा। वह आदमी माइक से नहीं बोल सकेगा। वह आदमी चश्मा नहीं लगा सकेगा। वह आदमी कपड़ा नहीं पहन सकेगा। सब यंत्र पर निर्भर है। वह आदमी फाउंटेनपेन से नहीं लिख सकेगा। वह आदमी जाकर नाई से बाल नहीं बनवा सकेगा। थोड़ा सोचें कि जिस आदमी ने यंत्र का उपयोग छोड़ दिया, उसके जीवन में क्या बच रहेगा? कुछ नहीं बच रहेगा।

उस दिन अग्नि इतनी ही बड़ी घटना थी। तो उस दिन कृष्ण कहते हैं कि जिसने अग्नि छोड़ दी। उस दिन सब कुछ अग्नि पर निर्भर था: भोजन, जीवन की सुरक्षा, जीवन की व्यवस्था। अग्नि बहुत बड़ी घटना थी। जब तक अग्नि नहीं थी आदमी के पास, तब तक आदमी इतना असुरक्षित था, कहना चाहिए, सभ्य नहीं था। आदमी सभ्य हुआ अग्नि के साथ।

अग्नि नहीं थी, तो मांसाहार भोजन के अतिरिक्त और कोई उपाय न था। या कच्चे फल खा लेता, या मांस खा लेता। अग्नि थी, तो भोजन पकाकर उसने खाना शुरू किया। अग्नि नहीं थी, तो दिनभर ही घूम-फिर सकता था। रात होते ही खतरे में पड़ जाता था। चारों तरफ जंगली जानवर थे, उनका भय था। रातभर आधे लोगों को पहरा देना पड़ता, आधे लोग सोते। तब भी खतरा हमेशा मौजूद रहता। सभ्य होने का मौका नहीं था। खाना और रात सो लेना, दो काम जीवन की सारी ऊर्जा ले लेते थे। अग्नि ने आकर बड़ा उपाय कर दिया। अग्नि ने सुरक्षा दे दी। जंगल का आदमी चारों तरफ अग्नि जलाकर बीच में आराम से सोने लगा। अग्नि पहला देवता था, आदमी को सभ्य करने वाला। सभ्यता आई अग्नि के साथ।

तो जिस दिन यह सूत्र कहा गया, उस दिन अग्नि ने जीवन को चारों तरफ से इसी तरह सिविलाइज किया था, सभ्य किया था, जैसे आज यंत्रों ने किया हुआ है।

अग्नि छोड़ दे जो उस दिन, उसका सब छूट जाता था। सब! उसके हाथ में कुछ बचता नहीं था। वह सभ्य जीवन से हट जाता था। वह असभ्य जीवन की ओर, वन की ओर, अरण्य की ओर हट जाता था। वह उसी दुनिया में लौट जाता, जहां अग्नि के पहले आदमी रहता था, गुफाओं में। हाथ से खाना नहीं पकाता था। आग जलाकर ठंड से अपने को नहीं बचाता था। वह वहां लौट जाता था। अग्नि छोड़ने का अर्थ यह है, गुफा-मानव की ओर वापस लौट जाए कोई।

तो भी कृष्ण कहते हैं, वह संन्यासी नहीं है। क्योंकि अगर यह कृत्य भी किसी वासना से प्रेरित होकर हो रहा है, तो संन्यास नहीं है।

कृष्ण कहते हैं, वासनाशून्य कृत्य। कोई भी कृत्य वासना से शून्य हो जाए, फिर चाहे वह कृत्य कितना ही बड़ा हो। अर्जुन युद्ध में जाने को खड़ा है। कृष्ण कहते हैं, तू युद्ध में जा। अगर फल की आकांक्षा छोड़कर जा सके, तो यह युद्ध भी संन्यास है। फिर कोई हर्ज नहीं है।

अजीब बात कहते हैं! जो आदमी सब कुछ छोड़कर जंगल की गुफा में चला जाए, उसे कहते हैं, वह भी संन्यास नहीं। अर्जुन जो युद्ध में खड़ा है, युद्ध में लड़े, उससे कहते हैं, यह भी संन्यास है!

कृष्ण का यह वक्तव्य बहुत सोचने जैसा है। सैद्धांतिक अर्थों में उतना मूल्यवान नहीं, जितना व्यावहारिक अर्थों में मूल्यवान है। अगर भविष्य में इस पृथ्वी पर कोई भी संन्यास बचेगा, तो वह कृष्ण का संन्यास बच सकता है, और कोई संन्यास बच नहीं सकता है। क्योंकि अगर आज कोई मान ले पुराने संन्यास की धारणा को; पृथ्वी पर साढ़े तीन अरब लोग हैं, अगर ये छोड़कर जंगल में चले जाएं, तो जंगल में सिर्फ मेला भर जाएगा, और कुछ भी नहीं होगा! ये जहां जाएंगे, वहीं जंगल नहीं रहेगा। ये कहीं भी चले जाएं, ये जहां जाएंगे, वहीं जंगल सपाट हो जाएगा।

यह आठ अरब लोगों की पृथ्वी, जो रोज बढ़ती जा रही है। इस सदी के पूरे होते-होते और एक अरब संख्या बढ़ जाएगी। और वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर सौ वर्ष इसी तरह संख्या बढ़ती रही, तो आदमी को कोहनी हिलाने की जगह नहीं बचेगी। सब जगह, जहां भी जाएगा, कोई हाथ चारों तरफ लगा रहेगा। अब भागकर आप नहीं जा सकेंगे।

तो फिर क्या होगा संन्यास का? पुराना गुहा वाला संन्यास तो फिर नहीं हो सकेगा। तो फिर इस पृथ्वी पर संन्यास ही नहीं होगा? तब जो जीवन का एक बहुत अमृत-फूल नष्ट हो जाएगा। तब तो जीवन की एक बहुत अदभुत सुगंध--क्योंकि जिसने संन्यास नहीं जाना, उसने जीवन नहीं जाना--वह नष्ट हो जाएगा, वह खो जाएगा। कृष्ण का संन्यास बच सकता है।

इसलिए मुझे कई बार लगता है कि गीता भविष्य के लिए बहुत सार्थक होती चली जाएगी। उसकी दृष्टि भविष्य के लिए रोज अनुकूल पड़ती चली जाएगी। कृष्ण रोज करीब आते चले जाएंगे। क्योंकि वे गहरी बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं, कहीं कोई जाने की जरूरत नहीं है। जहां हो वहीं, सिर्फ एक शर्त पूरी करो और तुम गृहस्थ न रह जाओगे। एक शर्त पूरी करो, और तुम संन्यासी हो जाओगे। और वह शर्त है कि तुम वासना मत करो, फल की आकांक्षा मत करो।

कठिन होगा समझना कि फल की आकांक्षा कैसे न करें! चौबीस घंटे के लिए प्रयोग करके देखें, तो खयाल में आ जाएगा, अन्यथा शायद जीवनभर समझने से खयाल में न आ सके।

कुछ चीजें हैं इस जीवन में, जो प्रयोग करने से तत्काल समझ में आ जाती हैं। मुंह पर कोई शक्कर का एक टुकड़ा रख दे, और तत्काल समझ में आता है कि स्वाद क्या है। एक जरा-सा टुकड़ा, एक क्षण की भी देर नहीं लगती, पूरा शरीर खबर देता है कि क्या है। और जिस आदमी ने नहीं स्वाद लिया हो, उसे हम पूरे के पूरे जीवनभर समझाते रहें कि स्वाद क्या है; वह कहेगा, आप कहते हैं, सब ठीक है। लेकिन फिर भी स्वाद क्या है, अभी समझ में नहीं आया। उसमें समझ की कोई गलती नहीं है। समझ का काम ही नहीं है; अनुभव का काम है। कुछ बातें हैं, जो समझ से समझ में आती हैं। बेकार बातें समझने से समझ में आ जाती हैं। गहरी और काम की बातें सिर्फ अनुभव से समझ में आती हैं, समझने से समझ में नहीं आतीं।

कृष्ण कहते हैं, फल की आकांक्षा छोड़ दो।

हजारों साल से हम सुन रहे हैं। गीता इतनी परिचित है, जितनी और कोई किताब परिचित नहीं है।  गीता के संबंध में बड़ा भ्रम हो गया है कि परिचित है। पढ़ ली, तो हम सोचते हैं, परिचित है। गीता से ज्यादा अपरिचित किताब मुश्किल है। एक अर्थ में ठीक है कि परिचित है। सभी लोगों के घरों में रखी  है। सभी लोगों को पता है कि गीता में क्या लिखा है।

काश, सभी लोगों को पता होता, तो यह दुनिया बिलकुल दूसरी हो सकती थी! नहीं, पता नहीं है। शब्द पता हैं। शायद अर्थ भी पता है, क्योंकि अर्थ शब्दकोश में मिल जाता है। अभिप्राय पता नहीं है, क्या प्रयोजन है!

ये कृष्ण कहते हैं कि तू फल कि आकांक्षा छोड़ दे और कर्म कर।

 एक चौबीस घंटे के लिए--दुनिया नष्ट नहीं हो जाएगी--एक दिन प्रयोग कर लें। सुबह छः बजे से दूसरे दिन सुबह छः बजे तक फल की आकांक्षा छोड़ दें और कर्म करें। और आपकी जीभ पर स्वाद आ जाएगा। और आपको पता चलेगा कि कर्म हो सकता है, फल की आकांक्षा के बिना भी। और पहली दफे आपके जीवन में ऐसा कर्म होगा, जिसको हम टोटल एक्ट, पूर्ण कर्म कह सकते हैं। क्योंकि मन कहीं नहीं दौड़ेगा; फल की कोई आकांक्षा नहीं है। और एक बार आपको स्वाद आ जाए, तो मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि वे चौबीस घंटे फिर कभी खतम नहीं होंगे। छः बजे शुरू जरूर होगी यात्रा, लेकिन दूसरे छः फिर कभी नहीं बजेंगे।

एक बार स्वाद आ जाए, तो आपको पता चले कि इतने निकट जीवन के, इतना बड़ा सागर था आनंद का, हमने कभी नजर न की; हम चूकते ही चले गए। हमारी गर्दन ही तिरछी हो गई है। हम भागते ही चले जाते हैं। बस, चूकते चले जाते हैं। देख ही नहीं पाते कि किनारे कोई एक और स्वाद भी है जीवन का। कभी-कभी उसकी झलक मिलती है किन्हीं कृत्यों में।

कभी आप अपने बच्चे के साथ खेल रहे हैं, कोई फल की आकांक्षा नहीं होती। कभी आपने खयाल किया है कि बच्चे के साथ खेलने में कैसा आह्लाद! हां, अगर बड़े के साथ खेल रहे हैं, तो उतना आह्लाद नहीं होगा, क्योंकि बड़े के साथ खेल भी काम बन जाता है। बाजी! हार-जीत शुरू हो जाती है। फल की आकांक्षा आ जाती है। बाप अपने छोटे-से बेटे के साथ खेल रहा है। कभी आपने किसी बाप को अपने छोटे बेटे के साथ खेलते देखा? वैसे यह घटना दुर्लभ होती जा रही है।

बाप अपने छोटे बेटे के साथ खेल रहा है। हराने का कोई सवाल नहीं उठता। हराने का खयाल भी नहीं उठता। हां, खेल में हार जाने का मजा जरूर वह लेता है। जमीन पर लेट गया है, बेटे को छाती पर बिठा लिया है। बेटा नाच रहा है खुश होकर; बाप को उसने हरा दिया है!

सभी बेटे बाप को हराना चाहते हैं। और जो बाप जिद्द करते हैं, वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। और जो बाप होशियार हैं, वे खुद जमीन पर लेट जाते हैं और हार जाते हैं। और उनके बच्चे बाद में पछताते हैं कि बाप ने बहुत गहरी मजाक कर दी। लेकिन तब कोई आकांक्षा नहीं है, सिर्फ उस छोटे-से खेल में सब समा गया है।

मेरे एक मित्र जापान के एक घर में मेहमान थे। सुबह घर के बच्चों ने उनको आकर खबर दी कि हमारे घर में विवाह हो रहा है, आप शाम सम्मिलित हों। उन्हें थोड़ी हैरानी हुई, क्योंकि बहुत छोटे बच्चे थे। तो उन्होंने सोचा कि कुछ गुड्डा-गुड्डी का विवाह करते होंगे। उन्होंने कहा, मैं जरूर सम्मिलित होऊंगा। लेकिन सांझ के पहले घर के बड़े-बूढ़ों ने भी आकर निमंत्रण दिया कि घर में विवाह है, आप सम्मिलित हों। तब वे समझे कि मुझसे भूल हो गई।

लेकिन जब सांझ को घर के हाल में गए, जहां कि सब बैंड-बाजा सजा था, तो देखा कि वहां दूल्हा तो नहीं है। वहां तो गुड्डा ही रखा है और बारात तैयार हो रही है! गांव के आस-पास के बूढ़े भी इकट्ठे हुए हैं; बारात बाहर निकल आई है। तब उन्होंने एक बूढ़े से पूछा कि यह क्या मामला है? मैं तो सोचता था कि बच्चों के खेल बच्चों के लिए शोभा देते हैं, आप लोग इसमें सब सम्मिलित हैं!

तो उस बूढ़े ने हंसकर कहा कि अब हमें बड़ों के खेल भी बच्चों के खेल ही मालूम पड़ते हैं। बड़ों के खेल भी! अब तो जब असली दूल्हा भी बारात लेकर चलता है, तब भी हम जानते हैं कि खेल ही है। तो इस खेल में गंभीरता से सम्मिलित होने में हमें कोई हर्ज नहीं है। दोनों बराबर हैं।

गांव के बूढ़े भी सम्मिलित हुए हैं। मेरे मित्र तो परेशान ही रहे। सोचा कि सांझ खराब हो गई। मैंने उनसे पूछा कि आप करते क्या सांझ को, अगर खराब न होती तो? रेडियो खोलकर सुनते, सिनेमा देखते, राजनीति की चर्चा करते? सुबह जो अखबार में पढ़ा था, उसकी जुगाली करते? क्या करते? करते क्या? कहा, नहीं, करता तो कुछ नहीं। तो फिर मैंने कहा कि बेकार चली गई, यह खयाल कैसे पैदा हो रहा है? बेकार जरूर चली गई, क्योंकि उस घंटेभर में आपको एक मौका मिला था, जब कि आकांक्षा फल की कोई भी न थी, तब आपको एक खेल में सम्मिलित होने का मौका मिला था, वह आप चूक गए। मैंने कहा, दोबारा जाना। कोई निमंत्रण न भी दे, तो भी सम्मिलित हो जाना। और उस घंटेभर इस बारात को आनंद से जीना, तो शायद एक क्षण में वह दिखाई पड़े, जो कि फलहीन कर्म है।

खेल में कभी फलहीन कर्म की थोड़ी-सी झलक मिलती है। लेकिन नहीं मिलती है, हमने खेलों को नष्ट कर दिया है। हमने खेलों को भी काम बना दिया है। उनमें भी हम तनाव से भर जाते हैं। जीतने की आकांक्षा इतनी प्रबल हो जाती है कि खेल का सब मजा ही नष्ट हो जाता है।

नहीं, कभी चौबीस घंटे एक प्रयोग करके देखें, और वह प्रयोग आपकी जिंदगी के लिए कीमती होगा। उस प्रयोग को करने के पहले इस सूत्र को पढ़ें, फिर प्रयोग को करने के बाद इस सूत्र को पढ़ें, तब आपको पता चलेगा कि कृष्ण क्या कह रहे हैं। और एक काम भी अगर आप फल के बिना करने में समर्थ हो जाएं, तो आपकी पूरी जिंदगी पर फलाकांक्षाहीन कर्मों का विस्तार हो जाएगा। वही विस्तार संन्यास है।

होगा क्या? अगर आप फल की आकांक्षा न करें, तो क्या बनेगा, क्या मिट जाएगा?

नहीं, प्रत्येक को ऐसा लगता है कि सारी पृथ्वी उसी पर ठहरी हुई है! अगर उसने कहीं फल की आकांक्षा न की, तो कहीं ऐसा न हो कि सारा आकाश गिर जाए। छिपकली भी घर में ऐसा ही सोचती है मकान पर टंगी हुई कि सारा मकान उस पर सम्हला हुआ है। अगर वह कहीं जरा हट गई, तो कहीं पूरा मकान न गिर जाए!

हम भी वैसा ही सोचते हैं। हमसे पहले भी इस जमीन पर अरबों लोग रह चुके और इसी तरह सोच-सोचकर मर गए। न उनके कर्मों का कोई पता है, न उनके फलों का आज कोई पता है। न उनकी हार का कोई अर्थ है, न उनकी जीत का कोई प्रयोजन है। सब मिट्टी में खो जाते हैं। लेकिन थोड़ी देर मिट्टी बहुत पागलपन कर लेती है। थोड़ी देर बहुत उछल-कूद; जैसे लहर उठती है सागर में, थोड़ी देर बहुत उछल-कूद; उछल-कूद हो भी नहीं पाती कि गिर जाती है वापस। ऐसे ही हम हैं।

कृष्ण कहते हैं कि जानो तुम कि जिस परमात्मा ने तुम्हें पैदा किया या जिस परमात्मा की तुम एक लहर हो, जिसने तुम्हें जीवन की ऊर्जा दी, वही तुमसे कर्म करवाता रहा है, वही तुमसे कर्म करवाता रहेगा। तुम जल्दी मत करो। तुम अपने सिर पर व्यर्थ का बोझ मत लो। तुम उसी पर छोड़ दो। तुम इसकी भी फिक्र छोड़ दो कि कल क्या होगा! जो होगा कल, वह कल देख लेंगे। जो आज हो रहा है, तुम उसमें राजी रहो। तुम अपने को पूरा छोड़ दो। जैसे कोई पानी में अपने को छोड़ दे और बह जाए। तैरे नहीं, बह जाए; जस्ट फ्लोटिंग। तैरने का भी श्रम मत करो। बस, बह जाओ। जीवन तुम्हें जो दे, उसमें चुपचाप बह जाओ। कोई आकांक्षा कल की मत बांधो, कोई फल निश्चित मत करो, कोई कर्म की नियति मत बांधो, वह प्रभु पर छोड़ दो। वह उस पर छोड़ दो, जो समग्र को जी रहा है। और ऐसा करते ही व्यक्ति संन्यासी हो जाता है।

संन्यासी वह है, जिसने कहा कि कर्म मैं करूंगा, फल तेरे हाथ। संन्यासी वह है, जिसने कहा कि शक्ति तूने मुझे दी है, तो काम करवा ले। न मुझे कल का पता है, न मुझे बीते कल का कोई पता है। न मुझे यह भी पता है कि क्या मेरे हित में है और क्या मेरे अहित में है। मुझे कुछ भी पता नहीं है। बाकी तू सम्हाल। जिसने जीवन की परम सत्ता को कहा कि सब तू सम्हाल; मुझमें जो ऊर्जा है, उससे जो काम लेना है, वह काम ले ले। काम मैं करूंगा, फल की बातचीत मुझसे मत कर। ऐसा व्यक्ति संन्यासी है। सच, ऐसा ही व्यक्ति संन्यासी है।

संन्यास का अर्थ ही यही है कि जिसने अपनी अस्मिता का बोझ अलग कर दिया, जिसने अपने अहंकार का बोझ अलग रख दिया, जिसने कहा कि अब समर्पित हूं। समर्पण संन्यास है।

समर्पित व्यक्ति फल की आकांक्षा नहीं करता। क्योंकि हम जानते ही नहीं कि क्या ठीक है और क्या गलत है। क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए, यह भी हमें पता नहीं है।

एक अरेबिक कहावत है कि अगर परमात्मा सबकी आकांक्षाएं पूरी कर दे, तो लोग इतने दुख में पड़ जाएं, जिसका कोई हिसाब नहीं। उस कहावत के पीछे फिर बाद में एक सूफी कहानी वहां प्रचलित हुई, वह मैं आपसे कहूं, फिर हम दूसरे सूत्र पर बात करें।

सुना है मैंने, एक आदमी ने यह कहावत पढ़ ली कि परमात्मा आकांक्षाएं पूरी कर दे आदमियों की, तो आदमी बड़ी मुसीबत में पड़ जाएं। उसकी बड़ी कृपा है कि वह आपकी आकांक्षाएं पूरी नहीं करता। क्योंकि अज्ञान में की गई आकांक्षाएं खतरे में ही ले जा सकती हैं। उस आदमी ने कहा, यह मैं नहीं मान सकता हूं। उसने परमात्मा की बड़ी पूजा, बड़ी प्रार्थना की। और जब परमात्मा ने आवाज दी कि तू इतनी पूजा-प्रार्थना किसलिए कर रहा है? तो उसने कहा कि मैं इस कहावत की परीक्षा करना चाहता हूं। तो आप मुझे वरदान दें और मैं आकांक्षाएं पूरी करवाऊंगा; और मैं सिद्ध करना चाहता हूं, यह कहावत गलत है।

परमात्मा ने कहा कि तू कोई भी तीन इच्छाएं मांग ले, मैं पूरी कर देता हूं। उस आदमी ने कहा कि ठीक। पहले मैं घर जाऊं, अपनी पत्नी से सलाह कर लूं।

अभी तक उसने सोचा नहीं था कि क्या मांगेगा, क्योंकि उसे भरोसा ही नहीं था कि यह होने वाला है कि परमात्मा आकर कहेगा। आप भी होते, तो भरोसा नहीं होता कि परमात्मा आकर कहेगा। जितने लोग मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं, किसी को भरोसा नहीं होता। कर लेते हैं। शायद! परहेप्स! लेकिन शायद मौजूद रहता है।

तय नहीं किया था; बहुत घबड़ा गया। भागा हुआ पत्नी के पास आया। पत्नी से बोल कि कुछ चाहिए हो तो बोल। एक इच्छा तेरी पूरी करवा देता हूं। जिंदगीभर तेरा मैं कुछ पूरा नहीं करवा पाया। पत्नी ने कहा कि घर में कोई कड़ाही नहीं है। उसे कुछ पता नहीं था कि क्या मामला है। घर में कड़ाही नहीं है; कितने दिन से कह रही हूं। एक कड़ाही हाजिर हो गई। वह आदमी घबड़ाया। उसने सिर पीट लिया कि मूर्ख, एक वरदान खराब कर दिया! इतने क्रोध में आ गया कि कहा कि तू तो इसी वक्त मर जाए तो बेहतर है। वह मर गई। तब तो वह बहुत घबड़ाया। उसने कहा कि यह तो बड़ी मुसीबत हो गई। तो उसने कहा, हे भगवान, वह एक और जो इच्छा बची है; कृपा करके मेरी स्त्री को जिंदा कर दें।

ये उनकी तीन इच्छाएं पूरी हुईं। उस आदमी ने दरवाजे पर लिख छोड़ा है कि वह कहावत ठीक है।

हम जो मांग रहे हैं, हमें भी पता नहीं कि हम क्या मांग रहे हैं। वह तो पूरा नहीं होता, इसलिए हम मांगे चले जाते हैं। वह पूरा हो जाए, तो हमें पता चले। नहीं पूरा होता, तो कभी पता नहीं चलता है।

कृष्ण कहते हैं, मांगो ही मत। क्योंकि जिसने तुम्हें जीवन दिया, वह तुमसे ज्यादा समझदार है। तुम अपनी समझदारी मत बताओ। डोंट बी टू वाइज। बहुत बुद्धिमानी मत करो। जिसने तुम्हें जीवन दिया और जिसके हाथ से चांदत्तारे चलते हैं और अनंत जीवन जिससे फैलता है और जिसमें लीन हो जाता है, निश्चित, इतना तो तय ही है कि वह हमसे ज्यादा समझदार है। और अगर वह भी नासमझ है, तो फिर हमें समझदार होने की चेष्टा करनी बिलकुल बेकार है।

कृष्ण कहते हैं, उस पर छोड़ दो। तुम किए चले जाओ; सब उस पर छोड़ दो।

और बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जो छोड़ देता है, वह सब पा लेता है जो मिलने जैसा है। और जो नहीं छोड़ता--इस अरेबियन कहावत में उस आदमी के हाथ में कड़ाही तो कम से कम हाथ लग गई--लेकिन जो नहीं छोड़ता है, उसके हाथ में कड़ाही भी लगती होगी, इसका कोई भरोसा नहीं।

संन्यासी वह है, जिसने फल का खयाल ही छोड़ दिया, जो आज जी रहा है, यहीं।

क्या आप सोच सकते हैं कि बिना फल के आप कुछ गलत काम कर सकेंगे? अगर चोर को भरोसा न हो कि रुपए मिल सकेंगे; तिजोरी लूट ही लूंगा, फल पा ही लूंगा; चोर चोरी करने जा सकेगा? असंभव है। आपके जीवन से बुरा कर्म तत्क्षण गिर जाएगा, अगर आकांक्षा और फल की कामना गिर गई। फिर भी जीवन की ऊर्जा काम करेगी। लेकिन तब प्रभु का हाथ बन जाती है जीवन की ऊर्जा, और वैसा प्रभु के हाथ बने हुए आदमी को कृष्ण संन्यासी कहते हैं।

ओशो रजनीश



“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...