शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

ध्यान और ओषधि

मनुष्य एक बीमारी है। बीमारियां तो मनुष्य पर आती हैं, लेकिन मनुष्य खुद भी एक बीमारी है। मैन इज ए डिसईज। यही उसकी तकलीफ है, यही उसकी खूबी भी। यही उसका सौभाग्य है, यही उसका दुर्भाग्य भी। जिस अर्थों में मनुष्य एक परेशानी, एक चिंता, एक तनाव, एक बीमारी, एक रोग है, उस अर्थों में पृथ्वी पर कोई दूसरा पशु नहीं है। वही रोग मनुष्य को सारा विकास दिया है। क्योंकि रोग का मतलब यह है कि हम जहां हैं, वहीं राजी नहीं हो सकते। हम जो हैं, वही होने से राजी नहीं हो सकते। वह रोग ही मनुष्य की गति बना, रेस्टलेसनेस बना। लेकिन वही उसका दुर्भाग्य भी है, क्योंकि वह बेचैन है, परेशान है, अशांत है, दुखी है, पीड़ित है।

मनुष्य को छोड़ कर और कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है। जब तक कि मनुष्य किसी पशु को पागल न करना चाहे, तब तक कोई पशु अपने से पागल नहीं होता, न्यूरोटिक नहीं होता। जंगल में पशु पागल नहीं होते, सर्कस में पागल हो जाते हैं। जंगल में पशु विक्षिप्त नहीं होते, अजायबघर में, ‘जू’ में विक्षिप्त हो जाते हैं! कोई पशु आत्महत्या नहीं करता, स्युसाइड नहीं करता, सिर्फ आदमी अकेला आत्महत्या कर सकता है।
यह जो मनुष्य नाम का रोग है, इस रोग को सोचने, समझने, हल करने के दो उपाय किए गए हैं। एक  है उपाय..औषधि। और दूसरा ध्यान है उपाय..मेडिटेशन। ये दोनों एक ही रोग का इलाज हैं।
इसे थोड़ा ऐसा समझना अच्छा होगा कि औषधिशास्त्र, मेडिसिन मनुष्य के रोग को एटामिक, आणविक दृष्टि से देखता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के एक-एक रोग को अलग-अलग व्यवहार करता है। औषधिशास्त्र एक-एक रोग को आणविक मानता है। ध्यान मनुष्य को ‘ऐज ए होल’ बीमार मानता है, एक-एक रोग को नहीं। ध्यान मनुष्य के व्यक्तित्व को बीमार मानता है। औषधिशास्त्र मनुष्य के ऊपर बीमारियां आती हैं, विजातीय हैं, फॉरेन हैं, ऐसा मानता है।
लेकिन धीरे-धीरे यह दूरी कम हुई है और धीरे-धीरे मेडिसिन ने भी कहना शुरू किया है..डोंट ट्रीट दि डिजीज, ट्रीट दि पेशेंट। मत करो इलाज बीमारी का; बीमार का इलाज करो। यह बड़ी कीमती बात है। क्योंकि इसका मतलब यह है कि बीमारी भी बीमार के जीने का एक ढंग है, ए वे ऑफ लाइफ। हर आदमी एक सा बीमार नहीं हो सकता। बीमारियां भी हमारी इंडिविजुअलिटी रखती हैं, व्यक्तित्व रखती हैं। ऐसा नहीं है कि मैं क्षय रोग से, टी.बी. से बीमार पडूं और आप भी पड़ें, तो हम दोनों एक ही तरह के बीमार होंगे। हमारी टी.बी. भी दो तरह की होंगी, क्योंकि हम दो व्यक्ति हैं। और हो सकता है कि जो इलाज मेरी टी.बी. को ठीक कर सके वह आपकी टी.बी. को ठीक न कर सके। इसलिए बहुत गहरे में बीमारी नहीं है, बहुत गहरे में बीमार है।
औषधिशास्त्र, मेडिसिन..आदमी की ऊपर से बीमारियों को पकड़ता है। मेडिटेशन, ध्यान का शास्त्र..आदमी को गहराई से पकड़ता है। इसे ऐसा कह सकते हैं कि औषधि मनुष्य को ऊपर से स्वस्थ करने की चेष्टा करती है। ध्यान मनुष्य को भीतर से स्वस्थ करने की चेष्टा करता है। न तो ध्यान पूर्ण हो सकता है औषधिशास्त्र के बिना और न औषधिशास्त्र पूर्ण हो सकता है ध्यान के बिना। असल में आदमी चूंकि दोनों है..भाषा ठीक नहीं है यह कहना कि आदमी दोनों है, क्योंकि इसमें कुछ बुनियादी भूल हो जाती है।
मनुष्य हजारों वर्षों से इस तरह सोचता रहा है कि आदमी का शरीर अलग है और आदमी की आत्मा अलग है। इस चिंतन के दो खतरनाक परिणाम हुए। एक परिणाम तो यह हुआ कि कुछ लोगों ने आत्मा को ही मनुष्य मान लिया, शरीर की उपेक्षा कर दी। जिन कौमों ने ऐसा किया उन्होंने ध्यान का तो विकास किया, लेकिन औषधि का विकास नहीं किया। वे औषधि का विज्ञान न बना सके। शरीर की उपेक्षा कर दी गई। ठीक इसके विपरीत कुछ कौमों ने आदमी को शरीर ही मान लिया और उसकी आत्मा को इनकार कर दिया। उन्होंने मेडिसिन और औषधि का तो बहुत विकास किया, लेकिन ध्यान के संबंध में उनकी कोई गति न हो पाई। जब कि आदमी दोनों है एक साथ। 
नहीं, असल में आदमी का शरीर और आदमी की आत्मा एक ही चीज के दो छोर हैं।  आदमी मनस-शरीर है, या शरीर-मनस है।
मेरी दृष्टि में, आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है और आत्मा का जो हिस्सा हमारी इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है उसका नाम आत्मा है। अदृश्य शरीर का नाम आत्मा है, दृश्य आत्मा का नाम शरीर है। ये दो चीजें नहीं हैं, ये दो अस्तित्व नहीं हैं, ये एक ही अस्तित्व की दो विभिन्न तरंग-अवस्थाएं हैं।
असल में दो, द्वैत, डुआलिटी की धारणा ने मनुष्य-जाति को बड़ी हानि पहुंचाई। सदा हम दो की भाषा में सोचते रहे और मुसीबत हुई। पहले हम सोचते थेः मैटर और एनर्जी। अब हम ऐसा नहीं सोचते। अब हम यह नहीं कहते कि पदार्थ अलग और शक्ति अलग। अब हम कहते हैं, मैटर इज एनर्जी। अब हम कहते हैं, पदार्थ ही शक्ति है। सच तो यह है कि यह पुरानी भाषा हमें दिक्कत दे रही है। पदार्थ ही शक्ति है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। कुछ है, एक्स, जो एक छोर पर पदार्थ दिखाई पड़ता है और दूसरे छोर पर एनर्जी, शक्ति दिखाई पड़ता है। ये दो नहीं हैं। ये एक ही ऊर्जा, एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं।
ठीक वैसे ही आदमी का शरीर और उसकी आत्मा एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। बीमारी दोनों छोरों में किसी भी छोर से शुरू हो सकती है। शरीर के छोर से शुरू हो सकती है और आत्मा के छोर तक पहुंच सकती है। असल में जो भी शरीर पर घटित होता है, उसके वाइब्रेशंस, उसकी तरंगें आत्मा तक सुनी जाती हैं।
इसलिए कई बार यह होता है कि शरीर से बीमारी ठीक हो जाती है और आदमी फिर भी बीमार बना रह जाता है। शरीर से बीमारी विदा हो जाती है और डाक्टर कहता है कि कोई बीमारी नहीं है और आदमी फिर भी बीमार रह जाता है और बीमार मानने को राजी नहीं होता कि मैं बीमार नहीं हूं। चिकित्सक के जांच के सारे उपाय कह देते हैं कि अब सब ठीक है, लेकिन बीमार कहे चला जाता है कि सब ठीक नहीं है। इस तरह के बीमारों से डाक्टर बहुत परेशान रहते हैं, क्योंकि उनके पास जो भी जांच के साधन हैं वे कह देते हैं कि कोई बीमारी नहीं है।
लेकिन कोई बीमारी न होने का मतलब स्वस्थ होना नहीं है। स्वास्थ्य की अपनी पाजिटिविटी है। कोई बीमारी का न होना सिर्फ निगेटिव है। हम कह सकते हैं कि कोई कांटा नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि फूल है। कांटा नहीं है, इससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि कांटा नहीं है। लेकिन फूल का होना कुछ बात और है।
लेकिन चिकित्सा-शास्त्र अब तक, स्वास्थ्य क्या है, इस दिशा में कुछ भी काम नहीं कर पाया है।  उसका कारण यही है कि चिकित्सा-शास्त्र बाहर से पकड़ता है। बाहर से बीमारी ही पकड़ में आती है। वह जो भीतर है मनुष्य का आंतरिक अस्तित्व, वह जो इनरमोस्ट बीइंग, वह जो भीतरी आत्मा, स्वास्थ्य सदा वहीं से पकड़ा जा सकता है।
ओशो रजनीश



रविवार, 30 जनवरी 2022

प्रेम सेक्स समाधि

 जब तक काम के निसर्ग को परिपूर्ण आत्‍मा से स्‍वीकृति नहीं मिल जाती है, तब तक कोई किसी को प्रेम कर ही नहीं सकता। काम दिव्‍य है, डिवाइन है।

      सेक्‍स की शक्‍ति परमात्‍मा की शक्‍ति है, ईश्‍वर की शक्‍ति है।

      इसलिए तो उससे ऊर्जा पैदा होती है। और नये जीवन विकसित होते है। वही तो सबसे रहस्‍यपूर्ण शक्‍ति है, वहीं तो सबसे ज्‍यादा मिस्‍टीरियस फोर्स है। उससे दुश्‍मनी छोड़ दें। अगर आप चाहते है कि कभी आपके जीवन में प्रेम की वर्षा हो जाये तो उससे दुश्‍मनी छोड़ दे। उसे आनंद से स्‍वीकार करें। उसकी पवित्रता को स्‍वीकार करें, उसकी धन्‍यता को स्‍वीकार करें। और खोजें उसमें और गहरे और गहरे—तो आप हैरान हो जायेंगे। जितनी पवित्रता से काम की स्‍वीकृति होगी, उतना ही काम पवित्र होता हुआ चला जायेगा। और जितना अपवित्रता और पाप की दृष्‍टि से काम का विरोध होगा, काम उतना ही पाप-पूर्ण और कुरूप होता चला जायेगा।

       जब कोई अपनी पत्‍नी के पास ऐसे जाये जैसे कोई मंदिर के पास जा रहा है। जब कोई पत्‍नी अपने पति के पास ऐसे जाये जैसे सच में कोई परमात्‍मा के पास जा रहा हो। क्‍योंकि जब दो प्रेमी काम से निकट आते है जब वे संभोग से गुजरते है तब सच में ही वे परमात्‍मा के मंदिर के निकट से गुजर रह होते है। वहीं परमात्‍मा काम कर रहा है, उनकी उस निकटता में। वही परमात्‍मा की सृजन-शक्‍ति काम कर रही है।

       मनुष्‍य को समाधि का, ध्‍यान का जो पहला अनुभव मिला है कभी भी इतिहास में,तो वह संभोग के क्षण में मिला है और कभी नहीं। संभोग के क्षण में ही पहली बार यह स्‍मरण आया है आदमी को कि इतने आनंद की वर्षा हो सकती है।

       जिन्‍होंने सोचा, जिन्‍होंने मेडिटेट किया, जिन लोगों ने काम के संबंध पर और मैथुन पर चिंतन किया और ध्‍यान किया, उन्‍हें यह दिखाई पडा कि काम के क्षण में, मैथुन के क्षण में मन विचारों से शून्‍य हो जाता है। एक क्षण को मन के सारे विचार रूक जाते है। और वह विचारों का रूक जाना और वह मन का ठहर जाना ही आनंद की वर्षा का कारण होता है।

      तब उन्‍हें सीक्रेट मिल गया, राज मिल गया कि अगर मन को विचारों से मुक्‍त किया जा सके किसी और विधि से तो भी इतना ही आनंद मिल सकता है। और तब समाधि और योग की सारी व्‍यवस्‍थाएं विकसित हुई। जिनमें ध्‍यान और सामायिक और मेडिटेशन और प्रेयर (प्रार्थना) इनकी सारी व्‍यवस्‍थाएं विकसित हुई। इन सबके मूल में संभोग का अनुभव है। और फिर मनुष्‍य को अनुभव हुआ कि बिना संभोग में जाये भी चित शून्‍य हो सकता है। और जो रस की अनुभूति संभोग में हुई थी। वह बिना संभोग के भी बरस सकती है। फिर संभोग क्षणिक हो सकता है। क्‍योंकि शक्‍ति और उर्जा का वहाँ बहाव और निकास है। लेकिन ध्‍यान सतत हो सकता है।

एक युगल संभोग के क्षण में जिस आनंद को अनुभव करता है, उस आनंद को एक योगी चौबीस घंटे अनुभव कर सकता है। लेकिन इन दोनों आनंद में बुनियादी विरोध नहीं है। और इसलिए जिन्‍होंने कहा कि विषयानंद और ब्रह्मानंद भाई-भाई है। उन्‍होंने जरूर सत्‍य कहा है। वह सहोदर है, एक ही उदर से पैदा हुए है, एक ही अनुभव से विकसित हुए है। उन्‍होंने निश्‍चित ही सत्‍य कहां है।

      अगर चाहते है कि पता चले कि प्रेम क्‍या है—तो  काम की पवित्रता, दिव्‍यता, उसकी ईश्वरीय अनुभूति की स्‍वीकृति होगी। उतने ही आप काम से मुक्त होते चले जायेगे। जितना अस्‍वीकार होता है, उतना ही हम बँधते है। 

      जितना स्‍वीकार होता है उतने हम मुक्‍त होते है।

      अगर परिपूर्ण स्‍वीकार है, टोटल एक्‍सेप्‍टेबिलिटी है जीवन की, जो निसर्ग है उसकी तो आप पाएंगे.....वह परिपूर्ण स्‍वीकृति आस्‍तिकता व्‍यक्‍ति को मुक्‍त करती है।

      नास्‍तिक  जीवन के निसर्ग को अस्‍वीकार करते है, निषेध करते है। यह बुरा है, पाप है, यह विष है, यह छोड़ो , वह छोड़ो। जो छोड़ने की बातें कर रहे है, वह ही नास्‍तिक है।

      जीवन जैसा है, उसे स्‍वीकार करो और जीओं उसकी परिपूर्णता में। वही परिपूर्णता रोज-रोज सीढ़ियां ऊपर उठती जाती है। वही स्‍वीकृति मनुष्‍य को ऊपर ले जाती है। और एक दिन उसके दर्शन होते है,जिसका काम में पता भी नहीं चलता था। काम अगर कोयला था तो एक दिन हीरा भी प्रकट होता है प्रेम का। 

      

ओशो रजनीश



शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

स्वधर्म

 जिसे स्वधर्म की खोज करनी हो, उसे बाहर की दुनिया से कम से कम चौबीस घंटे में घंटेभर के लिए बिलकुल छुट्टी ले लेनी चाहिए, और भीतर की दुनिया में डूब जाना चाहिए। कर देने चाहिए द्वार बंद बाहर के। कह देना चाहिए बाहर के जगत को बाहर, और अब मैं होता भीतर। सब इंद्रियों के द्वार बंद करके भीतर घंटेभर के लिए डूब जाना चाहिए। वहीं पता चलेगा उस रहस्य का जो स्व है, जो निजता है। वहीं से सूत्र मिलेंगे, ध्वनि सुनाई पड़ेगी, वहीं से इशारे मिलेंगे। और धीरे-धीरे इशारे गहरे होते चले जाते हैं। पहले आवाज बड़ी छोटी होती है। स्वधर्म का पता अंतर की वाणी के अतिरिक्त और कहीं से नहीं चलता है।

घंटेभर के लिए चौबीस घंटे में, बंद कर देना बाहर की दुनिया को, भूल जाना; छोड़ देना सब बाहर का बाहर; अपने भीतर डुबकी लगा जाना। उस डुबकी में धीरे-धीरे भीतर की अंतर्वाणी सुनाई पड़नी शुरू होगी। सबके भीतर छिपा है वह।  छोटी है आवाज--धीमी, नाजुक, सूक्ष्म। केवल वे ही सुन सकते हैं, जो उतनी सूक्ष्म आवाज को सुनने के लिए अपने को ट्रेन करते हैं, प्रशिक्षित करते हैं।

इसलिए आज आप आंख बंद करके बैठ जाएंगे, तो भीतर की आवाज नहीं सुनाई पड़ेगी। आंख बंद करके भी बाहर की ही आवाज सुनाई पड़ती रहेगी। कल, परसों--बैठते रहें, बैठते रहें, जल्दी न करें, घबड़ाएं न। तेईस घंटे बाहर की दुनिया को दे दें, एक घंटा अपने को दे दें। बस, आंख बंद करें और सुनने की कोशिश करें भीतर। सुनने की कोशिश, जैसे भीतर कोई बोल रहा है, उसे सुन रहे हैं।

जैसे कि इतनी भीड़ है। यहां बहुत लोग बातचीत कर रहे हैं और आपको किसी की बात सुननी है, तो आप सबकी बातों को छोड़कर अपनी पूरी चेतना और एकाग्रता को उस आदमी के ओठों के पास लगा देते हैं। वह फुसफुसाकर भी बोलता हो, विस्पर भी करता हो, तो भी आप सुनने की कोशिश करते हैं--और सुन पाते हैं। चेतना सिकुड़कर सुनती है, तो सुन पाती है। एकाग्र हो जाती है, तो सुन पाती है।

जल्दी न करें। एक घंटा तय कर लें स्वधर्म की खोज के लिए। आपको पता नहीं, लेकिन आपकी अंतरात्मा को पता है कि क्या है आपका स्वधर्म। आंख बंद करें। मौन हो जाएं। चुप बैठकर सुनें। मौन, सिर्फ भीतर ध्यान को करके, सुनने की कोशिश करें कि भीतर कोई बोलता है! कोई आवाज!

बहुत-सी आवाजें सुनाई पड़ेंगी। पहचानने में कठिनाई न होगी कि ये बाहर की आवाजें हैं। मित्रों के शब्द याद आएंगे, शत्रुओं के शब्द; दुकान, बाजार, मंदिर, शास्त्र--सब शब्द याद आएंगे। पहचान सकेंगे भलीभांति, बाहर के सुने हुए हैं। छोड़ दें। उन पर ध्यान न दे। और भीतर! और प्रतीक्षा करते रहें।

अगर तीन महीने कोई सिर्फ एक घंटा चुप बैठकर प्रतीक्षा कर सके धैर्य से, तो उसे भीतर की आवाज का पता चलना शुरू हो जाएगा। और एक बार भीतर का स्वर पकड़ लिया जाए, तो आपको फिर जिंदगी में किसी से सलाह लेने की जरूरत न पड़ेगी।

जब भी जरूरत हो, आंख बंद करें और भीतर से सलाह ले लें; पूछ लें भीतर से कि क्या करना है। और स्वधर्म की यात्रा पर आप चल पड़ेंगे। क्योंकि भीतर से स्वधर्म की ही आवाज आती है। भीतर से कभी परधर्म की आवाज नहीं आती। परधर्म की आवाज सदा बाहर से आती है।

जो व्यक्ति अपने भीतर की इनर वॉइस, अंतर्वाणी को नहीं सुन पाता, वह व्यक्ति कभी स्वधर्म के तप को पूरा नहीं कर पाएगा। यह जो स्वधर्मरूपी यज्ञ की बात कृष्ण ने कही है, यह वही व्यक्ति पूरी कर पाता है, जो अपने भीतर की अंतर्वाणी को सुनने में सक्षम हो जाता है।

लेकिन सब हो सकते हैं, सबके पास वह अंतर्वाणी का स्रोत है। जन्म के साथ ही वह स्रोत है, जीवन के साथ ही वह स्रोत है। बस, हमें उसका कोई स्मरण नहीं। हमने कभी उसे टैप भी नहीं किया; हमने कभी उसे खटकाया भी नहीं; हमने कभी उसे जगाया भी नहीं। हमने कभी कानों को प्रशिक्षित भी नहीं किया कि वे सूक्ष्म आवाज को पकड़ लें।

इसमें एक बात और आपको खयाल दिला दूं कि भीतर की आवाज एक बार सुनाई पड़नी शुरू हो जाए, तो आपको अपना गुरु मिल गया। वह गुरु भीतर बैठा हुआ है। लेकिन हम सब बाहर गुरु को खोजते फिरते हैं। गुरु भीतर बैठा हुआ है।

परमात्मा ने प्रत्येक को वह विवेक, वह अंतःकरण, वह कांसिएंस, वह अंतर की वाणी दी है, जिससे अगर हम पूछना शुरू कर दें, तो उत्तर मिलने शुरू हो जाते हैं। और वे उत्तर कभी भी गलत नहीं होते। फिर वह रास्ता बनाने लगता है भीतर का ही स्वर, और तब हम स्वधर्म की यात्रा पर निकल जाते हैं।

अंतर्वाणी को सुनने की क्षमता ही स्वधर्मरूपी यज्ञ का मूल आधार है।





गुरुवार, 27 जनवरी 2022

संन्यास


गृहस्थ का क्या लक्षण है? गृहस्थ का लक्षण है, हर चीज में कर्ता हो जाना। संन्यासी का लक्षण है, हर चीज में अकर्ता हो जाना।

संन्यास जीवन का, जीवन को देखने का और ही ढंग है। बस, ढंग का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में, घर का फर्क नहीं है, ढंग का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में जगह का फर्क नहीं है, भाव का फर्क है। संन्यासी और गृहस्थी में, परिस्थिति का फर्क नहीं है, मनःस्थिति का फर्क है। संसार में जो है। हम सभी संसार में होंगे। कोई कहीं हो--जंगल में बैठे, पहाड़ पर बैठे, गिरि-कंदराओं में बैठे--संसार के बाहर जाने का उपाय, परिस्थिति बदलकर नहीं है। संसार के बाहर जाने का उपाय, मनःस्थिति बदलकर,  मन को ही रूपांतरित करके है।

जो जहां है, वह वहां से हटे नहीं। क्योंकि हटते केवल कमजोर हैं; भागते केवल वे ही हैं, जो भयभीत हैं। और जो संसार को भी झेलने में भयभीत है, वह परमात्मा को नहीं झेल सकेगा। जो संसार का ही सामना करने में डर रहा है, वह परमात्मा का सामना कर पाएगा? नहीं कर पाएगा। संसार जैसी कमजोर चीज जिसे डरा देती है, परमात्मा जैसा विराट जब सामने आएगा, तो उसकी आंखें ही झप जाएंगी; वह ऐसा भागेगा कि फिर लौटकर देखेगा भी नहीं। यह क्षुद्र-सा चारों तरफ जो है, यह डरा देता है, तो उस विराट के सामने खड़े होने की क्षमता नहीं होगी। 

 उसकी मर्जी और मंशा यही है कि पहले लोग क्षुद्र को, आत्माएं क्षुद्र को सहने में समर्थ हो जाएं, ताकि विराट को सह सकें। संसार सिर्फ एक प्रशिक्षण है, एक ट्रेनिंग है।

पत्नी होगी पास, भागना मत। क्योंकि पत्नी से भागकर कोई स्त्री से नहीं भाग सकता। पत्नी से भागना तो बहुत आसान है। पत्नी से तो वैसे ही भागने का मन पैदा हो जाता है। पति से भागने का मन पैदा हो जाता है। जिसके पास हम होते हैं, उससे ऊब जाते हैं। नए की तलाश मन करता है।

पत्नी से भागना बहुत आसान है। भाग जाएं; स्त्री से न भाग पाएंगे। और जब पत्नी जैसी स्त्री को निकट पाकर स्त्री से मुक्त न हो सके, तो फिर कब मुक्त हो सकेंगे! अगर पति जैसे प्रीतिकर मित्र को निकट पाकर पुरुष की कामना से मुक्ति न मिली, तो फिर छोड़कर कभी न मिल सकेगी।

इस देश ने पति और पत्नी को सिर्फ काम के उपकरण नहीं समझा; सेक्स, वासना का साधन नहीं समझा है। इस मुल्क की गहरी समझ और भी, कुछ और है। और वह यह है कि पति-पत्नी प्रारंभ करें वासना से--अंत हो जाएं निर्वासना पर। एक-दूसरे को सहयोगी बनें। स्त्री सहयोगी बने पुरुष की कि पुरुष स्त्री से मुक्त हो सके। पुरुष सहयोगी बने पत्नी का कि पत्नी पुरुष की कामना से मुक्त हो सके। ये अगर सहयोगी बन जाएं, तो बहुत शीघ्र निर्वासना को उपलब्ध हो सकते हैं।

लेकिन ये इसमें सहयोगी नहीं बनते। पत्नी डरती है कि कहीं पुरुष निर्वासना को उपलब्ध न हो जाए। इसलिए डरी रहती है। अगर मंदिर जाता है, तो ज्यादा चौंकती है; सिनेमा जाता है, तो विश्राम करती है। चोर हो जाए, समझ में आता है; प्रार्थना, भजन-कीर्तन करने लगे, समझ में बिलकुल नहीं आता है। खतरा है। पति भी डरता है कि पत्नी कहीं निर्वासना में न चली जाए।

अजीब हैं हम! हम एक-दूसरे का शोषण कर रहे हैं, इसलिए इतने भयभीत हैं। हम एक-दूसरे के मित्र नहीं हैं! क्योंकि मित्र तो वही है, जो वासना के बाहर ले जाए। क्योंकि वासना दुख है और वासना दुष्पूर है! वासना कभी भरेगी नहीं। वासना में हम ही मिट जाएंगे, वासना नहीं मिटेगी। तो मित्र तो वही है, पति तो वही है, पत्नी तो वही है, मित्र तो वही है, जो वासना से मुक्त करने में साथी बने। और शीघ्रता से यह हो सकता है।

इसलिए  पत्नी को मत छोड़ो, पति को मत छोड़ो; किसी को मत छोड़ो। इस प्रशिक्षण का उपयोग करो। हां, इसका उपयोग करो परमात्मा तक पहुंचने के लिए। संसार को बनाओ सीढ़ी। संसार को दुश्मन मत बनाओ; बनाओ सीढ़ी। चढ़ो उस पर; उठो उससे। उससे ही उठकर परमात्मा को छुओ।

 संन्यास धर्म है, संप्रदाय नहीं। गृहस्थ संप्रदायों में बंटा हो, समझ में आता है। उसके कारण हैं। जिसकी दृष्टि बहुत सीमित है, वह विराट को नहीं पकड़ पाता। वह हर चीजों में सीमा बनाता है, तभी पकड़ पाता है। हर चीज को खंड में बांट लेता है, तभी पकड़ पाता है। आदमी-आदमी की सीमाएं हैं।

अगर आप बीस आदमी पिकनिक को जाएं, तो आप पाएंगे कि पिकनिक पर आप पहुंचे, चार-पांच ग्रुप में टूट जाएंगे। बीस आदमी इकट्ठे नहीं रहेंगे। तीनत्तीन, चार-चार की टुकड़ी हो जाएगी। सीमा है। तीनत्तीन चार-चार में टूट जाएंगे। अपनी-अपनी बातचीत शुरू कर देंगे। दो-चार हिस्से बन जाएंगे। बीस आदमी इकट्ठे नहीं हो पाते। ऐसी आदमी की सीमा है।

सारी मनुष्यता एक है, यह साधारण आदमी की सीमा के बाहर है सोचना। सब मंदिर, सब मस्जिद उसी परमात्मा के हैं, यह सोचना मुश्किल है। साधारण की सीमा के लिए कठिन होगा। लेकिन संन्यासी असाधारण होने की घोषणा है। संन्यास धर्म में प्रवेश है--हिंदू धर्म में नहीं, मुसलमान धर्म में नहीं, ईसाई धर्म में नहीं, जैन धर्म में नहीं--धर्म में। इसका क्या मतलब हुआ? हिंदू धर्म के खिलाफ? नहीं। इस्लाम धर्म के खिलाफ? नहीं। जैन धर्म के खिलाफ? नहीं। वह जो जैन धर्म में धर्म है, उसके पक्ष में; और वह जो जैन है, उसके खिलाफ। और वह जो हिंदू धर्म में धर्म है, उसके पक्ष में; और वह जो हिंदू है, उसके खिलाफ। और वह जो इस्लाम धर्म में धर्म है, उसके पक्ष में; और वह जो इस्लाम है, उसके खिलाफ। सीमाओं के खिलाफ, और असीम के पक्ष में। आकार के खिलाफ, और निराकार के पक्ष में।

संन्यासी किसी धर्म का नहीं, सिर्फ धर्म का है। वह मस्जिद में ठहरे, मंदिर में ठहरे, कुरान पढ़े, गीता पढ़े। महावीर, बुद्ध, लाओत्से, नानक, जिससे उसका प्रेम हो, प्रेम करे। लेकिन जाने कि जिससे वह प्रेम कर रहा है, यह दूसरों के खिलाफ घृणा का कारण नहीं, बल्कि यह प्रेम भी उसकी सीढ़ी बनेगी, उस अनंत में छलांग लगाने के लिए, जिसमें सब एक हो जाता है। नानक को बनाए सीढ़ी, बनाए। बुद्ध-मोहम्मद को बनाना चाहे, बुद्ध-मोहम्मद को बनाए। कूद जाए वहीं से। पर कूदना है अनंत में।

आज रूस और चीन में कोई संन्यासी होकर नहीं रह सकता। क्योंकि वे कहते हैं, जो करेगा मेहनत, वह खाएगा। जो मेहनत नहीं करेगा, वह शोषक है, एक्सप्लायटर है; इसको हटाओ। वह अपराधी है।

बिखर गई! चीन में बड़ी गहरी परंपरा थी संन्यास की--बिखर गई, टूट गई। मोनेस्ट्रीज उखड़ गईं। तिब्बत गया। शायद पृथ्वी पर सबसे ज्यादा गहरे संन्यास के प्रयोग तिब्बत ने किए थे, लेकिन सब मिट्टी हो गया। 

संन्यास अब तो एक ही तरह बच सकता है कि संन्यासी स्वनिर्भर हो। समाज पर, किसी पर निर्भर होकर न जीए। तभी हो सकता है स्वनिर्भर, जब वह संसार में हो, भागे न। अन्यथा स्वनिर्भर कैसे हो सकता है?

ओशो रजनीश




बुधवार, 22 दिसंबर 2021

दान

 दुनिया के सारे धर्मों में चैरिटी पर, दान पर, बहुत जोर दिया गया है। और उसका कारण यह है कि आदमी ने धन के साथ सदा अपराधभाव महसूस किया है। दान का इतना प्रचार इसीलिए किया गया है ताकि मनुष्य कुछ कम अपराध भाव महसूस करे। तुम्हें हैरानी होगी; प्राचीन अंग्रेजी में एक शब्द है गिल्ट जिसका अर्थ है धन। जर्मन भाषा में एक शब्द है गेल्ड जिसका अर्थ धन है। और गोल्ड तो बहुत करीब है ही। गिल्ट, गिल्ट, गोल्ड—किसी ने किसी तरह गहरे में धन के साथ अपराध भाव जुड़ा है।


जब कभी भी तुम्हारे पास धन होता है तुम अपराधी अनुभव करते हो...और यह स्वाभाविक हैं, क्योंकि इतने सारे लोगों के पास धन नहीं है। तुम अपराध भाव से बच कैसे सकते हो? जब कभी भी तुम्हें धन मिलता है, तुम जानते हो कि तुम्हारी वजह से कोई गरीब हो गया है। जब कभी भी तुम्हें धन मिलता है, तुम जानते हो कि कहीं न कहीं कोई न कोई जरूर भूख से मर रहा होगा। और इधर तुम्हारा बैंक बैलेंस बड़ा और बड़ा होता जा रहा है। किसी बच्चे को जीवित रहने के लिए औषधि न मिल सकेगी। किसी स्त्री को दवा न मिल सकेगी, कोई गरीब आदमी मर जाएगा क्योंकि उसके पास भोजन न होगा। इन चीजों से तुम कैसे बच सकते हो? ये तो वहां होगी ही। जितना अधिक धन तुम्हारे पास होगा, उतनी ही अधिक ये चीजें तुम्हारी चेतना में विस्फोटित होती रहेंगी, तुम अपराधी अनुभव करोगे।


 दान तुम्हें तुम्हारे अपराध-भाव से निर्भार करने के लिए है, इसलिए तुम कहते हो, ‘मैं कुछ तो कर रहा हूं: मैं एक अस्पताल खोलने जा रहा हूं, एक कॉलेज खोलने जा रहा हूं। मैं इस दान फंड को रूपया देता हूं, उस ट्रस्ट को रूपया देता हूं।’ तुम थोड़े से आनंदित महसूस करते हो। संसार सदा निर्धनता में जिया है, संसार सदा तंगी में जिया है, निन्यान्वे प्रतिशत लोग निर्धनता का जीवन जिए है। करीब-करीब भूखे रहते है, और मर जाते है। और केवल एक प्रतिशत व्यक्ति समृद्धि के साथ, धन के साथ जिए है। उन्होंने सदैव अपराध-भाव अनुभव किया है। उनकी सहायता करने के लिए धर्मों ने दान की धारणा का विकास किया है। यह उन्हें उनके अपराध-भाव से छुटकारा दिलाने के लिए है।

 दान कोई सदगुण नहीं है—यह बस तुम्हारी स्थिर बुद्धि को सकुशल बनाए रखने के लिए है, वरना तो तुम विक्षिप्त हो जाओगे। दान सद्गुण नहीं है—यह एक पुण्य भी नहीं है। यह नहीं कि जब तुम दान देते हो तो तुम कोई अच्छा काम करते हो। बात कुल यह है कि धन को इकट्ठा करने में तुम जो बुरे काम करते हो, तुम उसके लिए पश्चाताप करते हो।  दान कोई महान गुण नहीं है—यह तो पश्चाताप है, तुम पश्चात्ताप कर रहे होते हो। एक सौ रूपये तुमने कमाये, दस रूपये तुमने दान में दे दिए। यह एक पश्चात्ताप है। तुम थोड़ा सा अच्छा महसूस करते हो; तुम उतना खराब महसूस नहीं करते, तुम्हारे अहंकार थोड़ा सा सुरक्षित महसूस करता है। तुम परमात्मा से कह सकते हो, ‘मैं केवल शोषण ही नहीं कर रहा था, मैं गरीब आदमियों की मदद भी कर रहा था।’ मगर यह किसी तरह की मदद है? एक तरफ तो तुम सौ रूपए छीन लेते हो, और दूसरी और देते हो केवल दस रूपये—ये तो ब्याज तक नहीं?


यह एक तरकीब है जिसका आविष्कार तथाकथित धार्मिक लागों ने किया था। गरीबों की सहायता करने के लिए नहीं बल्कि धनवालों की सहायता करने के लिए। यदि निर्धन लोगों की सहायता हुई भी, वह तो मात्र इसका परिणाम था, एक उप-उत्पाद, परंतु यह उनका उद्देश्य नहीं था।

मैं दान की बात ही नहीं करता हूं। यह शब्द ही मुझे कुरूप लगता है। मैं तो बांटने की बात करता हूं—और इसमें एक बिलकुल ही भिन्न गुण के साथ बांटना। यदि तुम्हारे पास है, तुम बांट लो। इसलिए नहीं कि बांटने से तुम दूसरों की सहायता करोगे, न; बल्कि बांटने से तुम विकसित होओगे। जितना ज्यादा तुम बांटते हो, उतना ही ज्यादा तुम विकसित होते हो।


और जितना ज्यादा तुम बांटते हो, उतना ही ज्यादा तुम्हें और मिलता है—चाहे जो भी हो। यह केवल धन का ही प्रश्न नहीं है। यदि तुम्हारे पास ज्ञान हो, उसे बांटो। यदि तुम्हारे पास प्रेम हो, उसे भी बांटो। जो भी तुम्हारे पास हो, उसे बांटो, उसे चारों और फैलाओ; हवाओं में उड़ती एक फूल की सुगंध की तरह इसे फैलने दो। इसका विशेष रूप से गरीबों से ही कोई संबंध नहीं है। जो भी उपलब्ध हो उसी के साथ बांट लो...और गरीब भी तरह-तरह के होते है।


एक धनी व्यक्ति भी गरीब हो सकता है क्योंकि उसने कभी कोई प्रेम जाना ही नहीं है। उसके साथ प्रेम बांटो। एक गरीब आदमी ने शायद प्रेम जाना हो पर अच्छा भोजन नहीं—उसके साथ भोजन को बांटो। एक धनी व्यक्ति के पास शायद सब कुछ हो, परंतु समझ न हो, उसे अपनी समझ को बांटो लो, वह भी गरीब है। गरीबी की हजार किस्में है। जो भी तुम्हारे पास हो, उसे भी बांट लो।

लेकिन याद रखना, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यह पुण्य है, कि परमत्मा इसके लिए स्वर्ग में तुम्हें एक विशेष स्थान देगा, कि तुम्हारे साथ एक विशेष्ट व्यवहार किया जाएगा। कि तुम्हें एक अति विशिष्ट व्यक्ति माना जाएगा। और न ही बांटने से तुम अभी और यही आनंदित हो जाओगे। जमाखोर कभी आनंदित नहीं हो सकता।वह जमा ही किए चला जाता है। वह विश्राम नहीं कर सकता, वह दे नहीं सकता। वह जमा ही किए जाता है, जो कुछ भी उसे मिलता है, वह बस उसी को जमा कर लेता है। वह कभी उसका आनंद नहीं उठा पाता क्योंकि आनंद उठाने के लिए भी तुम्हें बांटना तो पड़ता ही है—क्योंकि सारा आनंद एक तरह का बांटना ही है।


यदि तुम सच में ही अपने भोजन का आनंद उठाना चाहते हो, तुम्हें मित्रों को  बुलाना होगा। यदि तुम सच में ही भोजन का आनंद उठाना चाहते हो, तुम्हें अतिथियों को निमंत्रण देना होगा, वरना तुम इसका आनंद न उठा पाओगे। यदि सच में ही तुम मदिरापान का लुत्फ उठाना चाहते हो, कैसे तुम अकेले अपने कमरे में इसका लुत्फ उठा सकते हो। तुम्हें दोस्त, अपने साथी खोजने ही होगे। तुम्हें बांटना आना ही चाहिए, आनंद बांटने से बढ़ता है।


आनंद सदा बांटना है। आनंद अकेले में नहीं होता। अकेले तुम कैसे आनंदित हो सकते हो? एकदम अकेले—जरा सोचो!  नहीं, आनंद तो एक संबंध है। यह संग-साथ है। सच तो यह है कि जो लोग पहाड़ पर भी चले गए होते हैं, और एकांत जीवन जीते होते हे। वे भी अस्तित्व के साथ बांटते है, वे भी अकेले नहीं होते। वे बांट लेते है, तारों और पहाड़ों, पक्षियों और वृक्षों के साथ—वे भी वहां अकेले नहीं होते।


जरा सोचो! बारह वर्ष तक महावीर जंगल में अकेले खड़े रहे थे—पर वह अकेले नहीं थे। मैं तुमसे कहता हूं, अधिकारता से, कि वह अकेले नहीं थे। पक्षी वहां आते थे, और उनके चारों और खेलते रहते थे। पशु आते थे उनके पास बैठ जाते थे। वृक्ष उन्हें देख कर गद्दगद्द हो कर उन पर फूल बरसाते थे। रात को सितारे जगमगाते थे, सुबह जब सूर्य उदय होता तो उनके तन बदन को छूता था, दिन-रात, सर्दियां-गर्मिया... और सारे वर्ष कुछ न कुछ होता ही रहता था। यह आनंदपूर्ण था। हां, इंसानों से वह दूर थे—उन्हें दूर रहना ही था क्योंकि इन्सानों ने उन्हें इतनी हानि पहुंचाई थी कि स्वस्थ होने के लिए उन्हें दूर रहना ही था। यह तो बस एक निश्चित समय तक इंसानों से दूर रहने के लिए चले गए थे। ताकि वह उन्हें और अधिक कष्ट न पहुंचा सके। यही कारण है कि संन्यासी कभी-कभी एकांत में चला जाता है। बस अपने घाव को भरने के लिए। वरना लोग अपने खंजर तुम्हारे धावों में चुभोते ही रहेंगे, वे उन घावों को हरा ही रखेंगे; वे उन्हें भरने न देंगे, वे तुम्हें जो उन्होंने किया है उसे अनकिया करने का अवसर ही न देंगे।

बारह वर्ष तक महावीर मौन थे: चट्टानों और वृक्षों के पास खड़े, बैठे, पर वह अकेले न थे—सारे अस्तित्व ने उनके आसपास भीड़ लगा रखी थी। सारा अस्तित्व उनके ऊपर समाविष्ट हो रहा था। फिर एक दिन वह आया जब वह स्वस्थ्य हो गए। उनके घाव भर गए। और अब वह जान गए थे कि कोई उन्हें हानि नहीं पहुंचा सकता है। वह पार जा चुके थे। अब कोई भी इंसान उन्हें चोट नहीं पहुंचा सकता था। वह इंसानों से संबंधित होने के लिए, उस आनंद को बांटने के लिए जो उन्हें वहां जंगल में प्राप्त हुआ था, वापस लौट आना ही पड़ा।


जैन धर्मग्रंथ केवल इतना ही कहते है कि वह इस संसार को छोड़ कर चले गए थे। वे उस दूसरे तथ्य की बात ही नहीं करते...वह संसार में वापस क्यों लोट कर आ गए? कौन सा कारण है जो उन्हें संसार में धकेल रहा था, वह आनंद जो उनके भीतर घटा था वह बहने को तत्पर हो रहा था। यह तो आधी ही बात हुई कि वह संसार को छोड़ कर जंगलों में चले गए, यह पूरी कथा नहीं है।


बुद्ध जंगल में चले गए थे, पर वह वापस भी लौट आये थे। कैसे तुम वहां जंगल में बने रह सकते हो जब कि तुम्हें ‘वह’ मिल गया हो? तुम्हें वापस आना होगा और इस बांटना होगा। हां, वृक्षों के साथ बांट लेना अच्छा है, पहाड़ो के साथ बाटा जा सकता है, पक्षियों के साथ बांट सकते हो। परंतु वृक्ष इतना तो नहीं समझ पाते। वे तो बड़े ही र्निबुद्धि हैं। पशुओं के साथ बांट लेना अच्छा है; वे सुंदर है—पर मानवीय आदान-प्रदान की सुंदरता ही कुछ और होती है। उस सम्पूर्णता की पूर्णता मनुष्य के पास बांटना ही प्रत्युत्तर हो सकता है। उन सबको वापस लौटना ही पड़ा, संसार में, मनुष्य के बीच में, अपनी उत्फुल्लता, अपने आनंद, अपनी समाधि को बांटने के लिए।


‘दान’ कोई अच्छा शब्द नहीं है,  यह बड़ा ही भारी शब्द है। मैं तो बांटने की बात करता हूं। अपने संन्यासियों से मैं कहता हूं कि बांटो। ‘दान’ शब्द में कुछ कुरूपता भी है; ऐसा लगता है कि तुम तो ऊंचे हो और दूसरा तुमसे नीचे है; कि दूसरा एक भिखारी है। कि तुम दूसरे की मदद कर रहे हो, कि वह जरूरत में है। यह अच्छी बात नहीं है। दूसरों को ऐसे देखना मानो कि वह तुमसे नीचा हो—तुम्हारे पास है और उसके पास नहीं है—अच्छी बात नहीं है। यह अमानवीय है।


बांटना एक बिल्कुल ही भिन्न दृष्टि की बात है। इस बात का प्रश्न ही नहीं है कि उसके पास है अथवा नहीं है। प्रश्न तो बस यह है कि तुम्हारे पास बहुत अधिक है—तुम्हें बांटना ही है। जब तुम दान देते हो, तुम दूसरे से तुम्हें धन्यवाद देने की अपेक्षा करते हो। जब तुम बांटते हो, तुम उसे धन्यवाद देते हो कि उसने तुम्हें ऊर्जा उडेलने का अवसर दिया—जो कि तुम पर बहुत एकत्रित हो गई थी। यह भारी होने लगी थी। तुम कृतज्ञ अनुभव करते हो।


बांटना तुम्हारी प्रचुरता से है। दान दूसरे की गरीबी के लिए है। वरना तुम्हारी समृद्धि से है। उनमें गुणात्मक भेद है।


नहीं, मैं दान की बात ही नहीं करता, मैं तो बांटने की बात करता हूं...और यह बढ़ेगा। यह एक आधारभूत नियम है। जितना अधिक तुम देते हो, उतना ही अधिक तुम्हें मिलता है। देने में कभी कंजूस न बनो।

ओशो रजनीश

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

नारी

 नाराजगी में देवताओं ने एक आदमी को अभिशाप दिया कि आज से तेरी छाया खो जाएगी। धूप में भी चलेगा तो तेरी छाया नहीं बनेगी। वह आदमी अपने मन में बहुत हंसा कि छाया से मेरा क्या बिगड़ जाएगा। और देवता कैसे नासमझ हैं, अभिशाप भी दे रहे हैं तो छाया के खोने का दे रहे हैं। वह समझ ही न सका कि छाया के खोने से क्या नुकसान हो सकता है? आप भी नहीं समझ सकेंगे कि छाया के खोने से क्या नुकसान है? लेकिन जैसे ही वह आदमी अपने गांव में आया उसे पता चला कि बहुत नुकसान हो गया, जिस आदमी ने भी देखा कि धूप में उसकी छाया नहीं बन रही है वही आदमी उससे भयभीत हो गया।

गांव में खबर फैल गई कि वह आदमी कुछ गड़बड़ हो गया है, उसकी छाया नहीं बनती, ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि किसी आदमी की छाया न बने। उसके घर के लोगों ने द्वार बंद कर लिए, उसके मित्रों ने मुंह मोड़ लिया। उसकी पत्नी ने उसे पति मानने से इनकार कर दिया, उसके बच्चे भी उसे इनकार करने लगे। गांव में उसका जीना मुश्किल हो गया। और गांव के लोगों ने कहा कि तुम गांव के बाहर निकल जाओ। ऐसी बीमारी कभी किसी को नहीं हुई है आज तक कि उसकी छाया खो जाए। पता नहीं तुम कैसे अभाग्य के लक्षण हो। उस आदमी को वह गांव छोड़ देना पड़ा।

क्या ऐसा हो सकता है कि किसी आदमी की छाया खो जाए? लेकिन जब नारियों के संबंध में मैं सोचता हूं तो मुझे पता चलता है कि उनके संबंध में मामला बिलकुल उलटा हो गया है। वे सिर्फ छाया रह गई हैं और उनकी आत्मा खो गई हैं।

नारी सिर्फ पुरुष की छाया रह गई है, उसके पास अपनी कोई आत्मा नहीं हैं।  स्त्रियों में मां मिलती है, बहन मिलती है, बेटी मिलती है नारी कहीं भी नहीं मिलती। मां है, पत्नी है, बेटी है, बहन है लेकिन नारी, नारी कहीं भी नहीं है। स्त्री का कोई भी अस्तित्व है तो पुरुष से संबंधित होकर है, अपने में उसका कोई भी अस्तित्व नहीं है। अपनी उसकी कोई हैसियत नहीं है। अपना उसका कोई व्यक्तित्व नहीं है।

हिंदुस्तान में भी स्त्री को हम संपत्ति मानते रहे हैं। नारी संपत्ति, स्त्री संपत्ति शब्द का हम प्रयोग करते हैं। कन्या का दान कर देते हैं, जैसे कि कोई वस्तु किसी को दान में दी जा रही हो। स्त्री के व्यक्तित्व का अंगीकार ही नहीं हो सका। और इस बात में कि स्त्री सिर्फ छाया है, मनुष्य-जाति को जितने दुख दिए हैं उतने किसी और बात ने नहीं दिए हैं। क्योंकि जिस स्त्री के पास आत्मा ही न हो, वह स्त्री न तो स्वयं के लिए आनंद बन सकती है और न किसी और के लिए। जिसकी आत्मा ही खो गई हो वह एक दुख का ढेर होगी और उसके व्यक्तित्व के चारों तरफ दुख की किरणें ही फैलती रहेंगी, दुख का अंधेरा ही फैलता रहेगा।

परिवार एक आनंद का फूल नहीं बन पाया क्योंकि जिसकी आत्मा के खिलने से वह आनंद बन सकता था उसके पास आत्मा ही नहीं है। परिवार एक संस्था है मृत और मरी हुई क्योंकि नारी है केंद्र और नारी के पास कोई व्यक्तित्व नहीं है। मनुष्य-जाति बहुत से दुर्भाग्य में से गुजरती रही है, उसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्य, बड़े से बड़ा दुर्भाग्य नारी की स्थिति है। किन्होंने यह स्थिति नारी की बना दी है? कौन है जिम्मेवार? इस संबंध में खोजबीन करने से बहुत अजीब नतीजे हाथ में आते हैं। संतों से पूछिए, महात्माओं से पूछिए, वे कहेंगे, नारी--ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। उनमें वे गिनती करते हैं।

संत कहते हैं कि नारी नर्क का द्वार है।

कोई पूछे इन संत को कि पैदा कहां से हुए थे? नौ महीने किसके पेट में रहे थे? खून किसका दौड़ता है तुम्हारी नसों में, हड्डियां किससे बनी हैं, मांस किससे पाया है? अब तक ऐसा तो उपाय नहीं हो सका कि संत पुरुषों के पेट में रह कर पैदा हो सकेगा। लेकिन जिस स्त्री से मांस-मज्जा बनती है, हड्डी बनती है, जिसके खून से जीवन चलता है। नौ महीने तक जिसके शरीर का हिस्सा होकर आदमी रहता है उसी स्त्री के छूने से वह अपवित्र हो जाता है। और स्त्री के अतिरिक्त तुम्हारे पास है क्या तुम्हारे शरीर में जो अपवित्र हो गए? और स्त्रियां ही भीड़ लगा कर पूजा करेंगी कि संत बहुत बड़ा संत है, स्त्री के छूने से अपवित्र हो जाता है।

मूढ़ता की भी कोई सीमा होती है, जहालत की भी कोई हद्द होती है। किन्होंने स्त्री को अपमानित किया है और उसके व्यक्तित्व से आत्मा छीन ली है? उन लोगों ने स्त्री को अपमानित किया है और उसकी आत्मा का हनन किया है, जो लोग इस जीवन, इस जगत, इस धरती के विरोध में हैं। और उनका, उनके विरोध में एक संगति है, जो लोग भी मानते हैं कि असली जीवन मरने के बाद शुरू होता है, जो लोग मानते हैं कि असली जीवन मोक्ष में शुरू होता है, स्वर्ग में शुरू होता है, जो लोग भी मानते हैं कि यह पृथ्वी पापपूर्ण है, यह जीवन असार है। जो लोग भी मानते हैं, यह जीवन निंदित है, कंडेम है, यह जीवन जीने के योग्य नहीं है। ऐसे सारे लोग नारी को गाली देंगे, क्योंकि इस जीवन को जो निंदित करते हैं वे नारी को भी निंदित करेंगे, क्योंकि यह जीवन नारी से ही निकलता और विकसित होता और प्रभावित होता है।

इस जीवन का द्वार नारी है और इसलिए नारी नर्क का द्वार है क्योंकि इस जीवन को कुछ लोग नर्क मानते हैं। जिन लोगों ने इस जीवन की निंदा की है उन लोगों ने स्त्री को भी अपमानित किया है। दुनिया में मुश्किल से कोई धर्म होगा जिसने स्त्री को कोई भी इज्जत दी हो। 

यह तथ्य समझ लेना जरूरी है, तो ही नारी के जीवन में आने वाले भविष्य में कोई क्रांति हो सकती है और नारी को आत्मा मिल सकती है। जब तक पृथ्वी का जीवन भी स्वीकार योग्य नहीं बनता, जब तक यह जीवन भी अहोभाग्य नहीं बनता, जब तक इस जीवन को भी आनंद और इस जीवन को भी परमात्मा का प्रसाद मानने की क्षमता पैदा नहीं होती, तब तक नारी की आत्मा को वापस लौटाना मुश्किल है।

जब तक परलोक महत्वपूर्ण रहेगा नारी अपमानित रहेगी। जब तक परलोक श्रेष्ठ रहेगा तब तक नारी श्रेष्ठ नहीं हो सकती। परलोकवाद में और नारी के व्यक्तित्व में बुनियादी संघर्ष चल रहा और इसलिए परलोकवादी जो संत, साधु, महात्मा हैं वे नारी के जन्मजात दुश्मन हैं। उनको लगता है कि नारी ही मनुष्य को उलझाती है, जन्म देती है, प्रेम में डालती है, वासना में बांधती है, और यह सारा का सारा जीवन का जो उपक्रम है नारी चलाती है, नारी केंद्र है। यह बात थोड़ी दूर तक सच है कि जीवन के केंद्र पर नारी है, लेकिन यह बात गलत है कि जीवन असार है। यह बात गलत है कि जीवन त्याज्य है। यह बात गलत है कि इस जीवन को लात मारने से कोई बड़ा जीवन उपलब्ध होता है। बड़ा जीवन उपलब्ध होता है इसी जीवन को ठीक से जीने से। बड़ा जीवन उपलब्ध होता है इसी जीवन की सम्यक अनुभूति से। बड़ा जीवन उपलब्ध होता है इसी जीवन को सीढ़ी बनाने से।

लेकिन अब तक दुनिया का कोई धर्म जीवन को अंगीकार नहीं कर पाया। दुनिया के सारे धर्म लाइफ निगेटिव हैं। वह जीवन का निषेध करते हैं, लाइफ अफरमेटिव नहीं है। और जब तक पृथ्वी पर लाइफ अफरमेशन का, जीवन स्वीकार को धर्म पैदा नहीं होता, तब तक नारी को आत्मा नहीं मिल सकती। जीवन का जब तक निषेध चलेगा नारी सम्मानित नहीं हो सकती। जीवन के निषेध करने वाले लोगों ने नारी को अपमानित किया है और उसके व्यक्तित्व को दीनऱ्हीन कर दिया है। इसलिए पहली क्रांति नारी को करनी है तथाकथित धार्मिक लोगों, धर्मगुरुओं, धर्मों के खिलाफ। पहली क्रांति धर्मों के खिलाफ, और वह इस आधार पर कि इस जीवन की स्वीकृति होनी चाहिए, इस जीवन की धन्यता होनी चाहिए, इस जीवन का आनंद होना चाहिए, इस जीवन की दुश्मनी नहीं, शत्रुता नहीं, लेकिन इस जीवन की धन्यता को स्वीकार करने के लिए हमें जीवन की सारी वैल्यूज, सारे सिद्धांत, सारे आधार बदल देने होंगे। क्योंकि अब तक हम मानते हैं जो जीवन को छोड़ देता है वह आदमी श्रेष्ठ है, जो आदमी जीता है वह आदमी नहीं।

और जीवन को छोड़ने का मतलब क्या होता है? संन्यासी जो भागते हैं, कहते हैं, घर छोड़ कर आ गए हैं; अगर उनके घर में बहुत गौर करो तो घर का मतलब होगा स्त्री। घर का मतलब वैसे स्त्री ही होता है। वह स्त्री को छोड़ कर भागने वाला संन्यासी इतना आदृत हुआ है। वह क्यों आदृत हुआ है? स्त्री को छोड़ते ही लगता है, एक आदमी जीवन का विरोधी हो गया। लेकिन जीवन को छोड़ने की इन लंबी परंपराओं ने जीवन के सारी जड़ों को विषाक्त कर दिया है। जीवन से सारा आनंद, सारा रस, सारा सौंदर्य छीन लिया है। जीवन को एक उदासी और एक दुख की कालिमा दे दी है। जीवन से सारी मुस्कुराहट छीन ली है।

धर्म एक नृत्य करता हुआ धर्म नहीं रह गया, धर्म एक गीत गाता हुआ धर्म नहीं रह गया। धर्म उदास, चेहरे लटके हुए लोगों का, भागे हुए लोगों का एक लंबी कतार हो गई। ये सारी की सारी कतारें स्त्री के विरोध में हैं। इस देश में चूंकि जीवन विरोधी चिंतकों का बहुत प्रभाव रहा है, और जीवन के विरोध में कुछ लोग क्यों हो जाते हैं?


एक लोमड़ी एक बगीचे से गुजरती है। अंगूरों के गुच्छे लगे हैं। वह छलांग लगाती उन गुच्छों को पाने के लिए, लेकिन गुच्छे दूर हैं और हाथ उसके नहीं पहुंच पाते। बहुत कोशिश करती है, तभी चारों तरफ देखती है कि कुछ खरगोश एक झाड़ी में से झांक कर देख रहे हैं। फिर वह खड़ी हो जाती है और शान से रास्ते पर वापस लौटने लगती है। वे खरगोश उससे पूछते हैं, देवी, अंगूर कैसे थे? वह देवी कहती है, अंगूर, अंगूर खट्टे थे, खाने योग्य नहीं थे, इसलिए मैंने छोड़ दिए। लोमड़ी यह नहीं कहती कि पाए नहीं जा सके, लोमड़ी यह नहीं कहती मेरी छलांग छोटी थी, लोमड़ी यह नहीं कहती कि अंगूर मुझे मिल ही नहीं सके, चखने का सवाल नहीं उठा। लेकिन अहंकार भीतर से कहता है कि नहीं, अंगूर तो मैं पा लेती लेकिन वे खट्टे थे इसलिए छोड़ दिए हैं।

जो लोग जीवन के रस को उपलब्ध नहीं कर पाते, वे बजाय यह कहने के कि हमें जीवन जीने की कला नहीं आती, यही कहना पसंद करते हैं कि जीवन असार है, जीवन खट्टा है, जीवन पाने योग्य नहीं है। जितने लोग जीवन को पाने में, जीवन के सत्य को अनुभव करने में असमर्थ हो जाते हैं, वे सारे लोग जीवन विरोधी हो जाते हैं। और इन जीवन विरोधी लोगों ने सारे लोगों के चित्त को विकृत करने, परवर्ट करने का काम किया है। 

जब तक हम मरना सिखाते रहेंगे और जब तक धर्म स्युसाइडल होगा, आत्मघाती होगा तब तक नारी का सम्मान नहीं हो सकता है। जिस दिन जीवन को जीने की कला बनेगा धर्म, जिस दिन हम जीवन के जीने को ही जीवन के जीने की ठीक विधि को ही, जीवन को जीने की कला और आर्ट को ही धर्म कहेंगे उस दिन नारी सम्मानपूर्ण रीति से ही स्वीकृत हो सकती है। लेकिन कोई पूछ सकता है कि हिंदुस्तान में जहां धर्म का इतना प्रभाव है नारी अपमानित हुई, तो पश्चिम में, यूरोप में, अमेरिका में, जहां धर्म का इतना प्रभाव नहीं है वहां नारी की क्या स्थिति है? वहां भी नारी अपमानित है लेकिन दूसरे ढंग से।

हिंदुस्तान में नारी का एक ही उपयोग है, जिसको स्वर्ग या मोक्ष जाना हो, वह नारी को छोड़ कर भागे। ऐसा निगेटिव उपयोग है। नारी का एक ही उपयोग है और वह यह कि जिसको मोक्ष जाना हो नारी को छोड़ कर भागे। हिंदुस्तान ने नारी को छोड़ कर आदर दिया है। ठीक इससे दूसरी एक्सट्रीम पश्चिम में पैदा हुई है। और वह यह है कि नारी का एक ही उपयोग है कि उसका भोग किया जाए। वहां भी नारी को आत्मा नहीं मिल सकी है। यहां नारी का उपयोग है कि उसका त्याग किया जाए और पश्चिम में उसका उपयोग है कि भोग किया जाए। लेकिन नारी न त्याग के लिए बनी है और न नारी भोग के लिए बनी है। नारी का अपना कोई अस्तित्व भी है त्याग और भोग से पृथक, उसकी अपनी कोई गरिमा भी है, अपनी कोई आत्मा भी है।

पश्चिम एक अति पर है कि नारी भोग्य है। उसे भोग लेना है और फेंक देना है, इससे ज्यादा उसका कोई उपयोग नहीं। पश्चिम में भी नारी की आत्मा नहीं उठ पाई है ऊपर। पश्चिम में नारी का उपयोग भी एक शोषण है और पूरब में भी शोषण है। इसलिए दुनिया में कहीं भी नारी नहीं पैदा हो पाई है। नारी को आत्मा का विकास करने का कोई मौका नहीं मिल पाया है। एक तरफ धर्मगुरुओं ने नारी को अपमानित किया है, दूसरी तरफ धर्म के विरोधी लोगों ने नारी को दूसरी दिशा से अपमानित किया है। लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है कि पुरुष नारी को अपमानित करने को तत्पर है वह उसको अंगीकार और स्वीकार नहीं करना चाहता।

और बड़ी हैरानी की बात है, बाप अपनी बेटी से कहता है कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। पति अपनी पत्नी से कहता है कि मैं तुझे प्रेम करता हूं। बेटे अपनी मां से कहते हैं कि हम तुझे प्रेम करते हैं। लेकिन यह प्रेम बड़ा अजीब है पुरुषों का कि नारी को व्यक्तित्व नहीं दे पाया हजारों साल के प्रेम के बाद भी। यह प्रेम कैसा है कि दूसरे व्यक्ति को आत्मा नहीं दे पाता? यह प्रेम कैसा है कि दूसरे की गर्दन जकड़ लेता है लेकिन उसको मुक्त नहीं कर पाता? जो प्रेम बांधता है, वह प्रेम नहीं है। जो प्रेम मुक्त करता है, वही प्रेम है। प्रेम अगर मुक्त न कर सके, तो फिर प्रेम में और घृणा में अंतर क्या है?

अगर एक पति अपनी पत्नी को प्रेम करता है, तो इस प्रेम का एक ही अर्थ होगा कि पहले इसे आत्मा, इसे व्यक्तित्व, इसकी अपनी इनडिपेंडेंट इंडिविजुअलिटी पैदा करने में सहयोगी बने। और जब यह एक व्यक्ति होगी, तभी प्रेम का कोई अर्थ है। हम जिसे प्रेम करते हैं उसे व्यक्ति बनाना चाहते हैं। लेकिन पुरुष ने आज तक नारी को व्यक्ति नहीं बनने दिया है, बल्कि वह व्यक्ति न बन जाए इसकी सारी कोशिश की है। हजारों वर्ष तक नारी को शिक्षा नहीं मिलने दी, क्योंकि शिक्षा एक व्यक्तित्व देती है। तो शिक्षा को रोक रखा कि नारी को शिक्षा की कोई जरूरत नहीं है।

नारी को शिक्षा वर्जित रखी हजारों साल तक, क्योंकि शिक्षा जैसे ही मिलेगी, नारी में विचार पैदा होंगे। विचार विद्रोह लाते हैं, विद्रोह व्यक्तित्व लाता है। नारी को अशिक्षित रखने की साजिश जारी रही। फिर किसी भांति नारी ने अगर थोड़ी-बहुत शिक्षा लेनी शुरू की, तो एक नई साजिश शुरू हुई कि नारी को ठीक पुरुष जैसी शिक्षा दे दो। नारी को पुरुष जैसी शिक्षा देने से भी नारी की आत्मा प्रकट नहीं होती। वह नंबर दो का पुरुष बन जाती है, कार्बनकापी बन जाती है। अब सारी दुनिया में नारी को शिक्षा देने के लिए पुरुष मजबूरन राजी हुआ है। लेकिन उस राजी में एक नई साजिश शुरू हुई कि जो पुरुष की शिक्षा है वही नारी को दे दो।

नारी के पास अपना व्यक्तित्व है पुरुष से बहुत भिन्न, बहुत अलग आयाम, बहुत अलग डायमेंशन है उसके व्यक्तित्व का। उसके मनस्य का बहुत अलग रूप है। उसके मनस्य की दिशा बहुत भिन्न है वह ठीक पुरुष जैसी नहीं है। और यही तो कारण है कि पुरुष और उसमें जो भेद है, जो भिन्नता है, वही उनके बीच आकर्षण का कारण है। वे बिलकुल दो उलटे ध्रुव हैं। और जिस दिन स्त्री को या तो शिक्षा मत दो, तब वह गुलाम बन जाती है, तब वह पंगु हो जाती है और अगर मजबूरी में शिक्षा देनी पड़े, तो उसे ठीक पुरुषों जैसी शिक्षा दे दो ताकि वह नंबर दो का पुरुष बन जाए, कार्बनकापी हो जाए और व्यर्थ हो जाए।

हिंदुस्तान में नारी दास है, पश्चिम में नारी कार्बनकापी है और कार्बनकापी की भी अपनी कोई आत्मा नहीं होती। स्त्री को खतम करने के लिए एक उपाय यह था कि शिक्षा मत दो, दूसरा उपाय यह है कि वही शिक्षा दे दो जो तुम पुरुष को दे रहे हो। तब वह पुरुष जैसी क्लर्क बन जाएगी, पुरुष जैसी पाइलट बन जाएगी, पुरुष जैसी फौज का जवान बन जाएगी, वह सब बन जाएगी लेकिन एक बात पक्की है कि पुरुष जैसा होने में वह स्त्री नहीं रह जाएगी, नारी नहीं रह जाएगी। और आज पश्चिम में यह दुर्घटना दिखाई पड़नी शुरू हो गई है।

पूरब में स्त्री स्त्री नहीं है सिर्फ दासी है। वह जो स्त्रियां लिखती हैं न प्रेम-पत्र, तो नीचे लिखती हैं--आपकी दासी। और जिसको लिखती हैं वे बड़े प्रसन्न होते हैं पति परमेश्वर वगैरह जो होते हैं। और उनको खयाल भी नहीं आता कि जिसको हमने दासी लिखने को मजबूर कर दिया है, जो हमारे सामने मुकाबले पर खड़ी नहीं रह गई है, उससे प्रेम पाने का आनंद कभी भी नहीं मिल सकता। प्रेम पाने का आनंद उनके साथ है जो समकक्ष हैं, उनके साथ कभी नहीं है जो हमसे नीचे हैं। क्योंकि जो हमसे नीचे हैं उनसे प्रेम डिमांड किया जा सकता है, मांगा जा सकता है लिया जा सकता है। और ध्यान रहे, प्रेम मांग कर कभी भी नहीं मिलता है। प्रेम मिलता है तो बिना मांगे मिलता है। प्रेम मांग कर कभी नहीं मिलता।

और प्रेम देने के लिए मजबूर कभी नहीं किया जा सकता। लेकिन स्त्री को आज तक यही समझाया गया है कि वह प्रेम दे, पति परमेश्वर है उसको प्रेम देना ही चाहिए। प्रेम कोई कर्तव्य नहीं है कि करना चाहिए। जो प्रेम करना पड़ता है, वह तत्काल प्रेम नहीं रह जाता, तत्क्षण प्रेम नहीं रह जाता। इसलिए जहां गुलामी है वहां प्रेम कभी भी नहीं हो सकता। गुलाम कभी प्रेम नहीं करते। गुलाम भयभीत होते हैं, प्रेम नहीं करते। पत्नियां भयभीत हैं पतियों से, और पत्नियां जब तक भयभीत हैं तब तक उनसे प्रेम नहीं मिल सकता।

और जब पत्नियों से प्रेम नहीं मिलता, तो पुरुष खोजता है प्रेम को कहीं और। वेश्याओं में खोजता है, बाजारों में खोजता है। और उसे पता नहीं कि जब पत्नी से प्रेम नहीं मिलता तो वेश्या से कैसे प्रेम मिल सकता है? हालांकि उसकी बुद्धि वही है। वह पत्नी में और वेश्या में बुनियादी फर्क नहीं मानता है। पत्नी स्थाई वेश्या है, जिसको सदा के लिए खरीद लाया है।

बिना प्रेम के जिसे खरीद लाया गया है उसमें और एक रात के लिए स्त्री को खरीदने में बुनियादी फर्क नहीं है। फर्क सिर्फ डिग्री का है, मात्रा का है, एक रात के लिए खरीदा है कि पूरी जिंदगी के लिए खरीदा है। जब तक पुरुष बिना प्रेम के एक स्त्री को घर में बांध लाता है, तब तक प्रेम की कोई संभावना नहीं है। और फिर जिंदगी भर कोशिश करो कि हम प्रेम करते हैं। वह दिखावा रहेगा, बातचीत रहेगी, ऊपर से कहेंगे कि हम प्रेम करते हैं। प्रेम के पत्र भी लिखे जाएंगे, भीतर कहीं भी प्रेम नहीं होगा।

पूछें पति अपने मनों से कभी अपनी पत्नियों को प्रेम किया है? पूछें पत्नियां अपने मन से कभी प्रेम किया है? जिनको हम कहते हैं कि हम प्रेम करते हैं। कि वह सब बातचीत हो गई है। अगर हमने प्रेम किया होगा तो घरों की ऐसी स्थिति होती जैसी आज है, चौबीस घंटे कलह की, संघर्ष की, वैमनस्य की? घरों का यह रूप होता, यह कुरूपता, यह अग्लीनेस होती घरों में? यह परिवारों की हालत होती? क्या आज हर आदमी परिवार से भाग जाने को आतुर होता है।

 घर वह पत्नी रास्ता देख रही है। पति और पत्नियों के बीच संबंध प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी होगा, प्रेम का नहीं। प्रेम की बातचीत निपट बातचीत है। और बातचीत से भरने की कोशिश चलती है, लेकिन बातचीत से जिंदगी नहीं भरती।

और तब एक बेचैनी शुरू होती है और वह बेचैनी सारे जीवन को रुग्ण कर देती है। प्रेम के बिना कोई भी आदमी अधूरा रह जाता है। स्त्रियां भी और पुरुष भी और सारी मनुष्य-जाति अधूरी है। उसके भीतर कुछ कमी है जो पूरी नहीं हो पाती, जीवन भर दौड़ कर भी प्रेम नहीं मिल पाता। प्रेम नहीं मिल सकता है इस भांति। प्रेम मिलता है समकक्ष से, और जब तक स्त्री पुरुष के समकक्ष नहीं होती तब तक स्त्री से प्रेम नहीं मिल सकता है। और अच्छा होगा कि स्त्रियां यह कह दें कि जब तक हम दासी हैं तब हमसे प्रेम लिया जा सकता है, लेकिन हम दे नहीं सकते। और यह उचित होगा।

लेकिन पति परमात्मा बहुत प्रसन्न होते हैं यह जान कर कि पत्नी उनकी दासी। और उन्हें कभी खयाल नहीं कि जिसको आपने दासी बना लिया, उससे मनुष्यता खो गई है, वह मनुष्य नहीं रहा। पूरब की हालत है दासियों की और पश्चिम की हालत, पश्चिम की हालत और भी बदतर हो गई है। पश्चिम की स्त्री और भी खिलवाड़ का साधन हो गई है। जब दिल आए स्त्री को बदला जा सकता है।

ओशो रजनीश




मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

मेरी बहू मेरी बेटी


  • "मेरी बेटी "
 एक बेटी मेरे घर में भी आई है, 
सिर के पीछे उछाले गये चावलों को,

माँ के आँचल में छोड़कर, 
पाँव के अँगूठे से चावल का कलश लुढ़का कर, 
महावर रचे पैरों से, महालक्ष्मी का रूप लिये, 
बहू का नाम धरा लाई है.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.

माँ ने सजा धजा कर बड़े अरमानों से,
 दामाद के साथ गठजोड़े में बाँध विदा किया, 
उसी गठजोड़े में मेरे बेटे के साथ बँधी, 
आँखो में सपनों का संसार लिये सजल नयन आई है.

एक बेटी मेरे घर भी आई है.

किताबों की अलमारी अपने भीतर संजोये, 
गुड्डे गुड़ियों का संसार छोड़ कर, 
जीवन का नया अध्याय पढ़ने और जीने,
 माँ की गृहस्थी छोड़, अपनी नई बनाने, 
बेटी से माँ का रूप धरने आई है.

एक बेटी मेरे घर भी आई है.

माँ के घर में उसकी हँसी गूँजती होगी, 
दीवार में लगी तस्वीरों में, 
माँ उसका चेहरा पढ़ती होगी, 
यहाँ उसकी चूड़ियाँ बजती हैं,
 घर के आँगन में उसने रंगोली सजाई है.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.

शायद उसने माँ के घर की रसोई नहीं देखी,
 यहाँ रसोई में खड़ी वो डरी डरी सी घबराई है,
 मझसे पुछ पुछ कर खाना बनाती है
मेरे बेटे को मनुहार से खिलाकर,
 प्रशंसा सुन खिलखिलाई है.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.

अपनी ननद की चीज़ें देखकर,
 उसे अपनी सभी बातें याद आईहैं,
 सँभालती है, करीने से रखती है, 
जैसे अपना बचपन दोबारा जीती है, 
बरबस ही आँखें छलछला आई हैं.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.

मुझे बेटी की याद आने पर "मैं हूँ ना",
 कहकर तसल्ली देती है, 
उसे फ़ोन करके मिलने आने को कहती है, 
अपने मायके से फ़ोन आने पर आँखें चमक उठती हैं
 मिलने जाने के लिये तैयार होकर आई है.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.

उसके लिये भी आसान नहीं था,
 पिता का आँगन छोड़ना,
 पर मेरे बेटे के साथ अपने सपने सजाने आई है,
 मैं खुश हूँ, एक बेटी जाकर अपना घर बसा रही,
 एक यहाँ अपना संसार बसाने आई है.

एक बेटी मेरे घर में भी आई है.






“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...