शुक्रवार, 19 मई 2023

राम की सीता के लिए चिन्ता

 वनवास की अवधि में लक्ष्मण किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नही करेंगे राम जानते थे—उन्हे केवल राम का संग मिल जाए तो वे मग्न हो जाते हैं और यहां तो सामने एक लक्ष्य भी था। यह सारा चित्रकूट प्रदेश उनके सम्मुख था । यहां के लोगों से परिचय प्राप्त करना था। उनकी जीवन-पद्धति को समझना था उनकी कठिनाइयां और समस्याओं को जानना था। विभिन्न आश्रमो की व्यवस्था और उनके शिक्षण स्तर को परखना था। फिर प्रकृति एक चुनौती के समान उनके सामने खडी थी । पर्वत, नदी, वन, हिंस्र पशू, और जैसा कि भरद्वाज आश्रम से ही सुनाई पडना आरंभ हो गया था कि इस क्षेत्र में राक्षसों का अन्याय भी बढ़ता जा रहा था । लक्ष्मण इन सब में उलझे रहगे। उन्हें अयोध्या की याद नही आएगी माता की याद भी नही आएगी। जानने सुनने को कुछ नया हो करने को कुछ अपूर्व हो, सामने एक चुनौती हो तो लक्ष्मण स्वयं को भी भूले रहते है।


पर सीता । चार वर्षों के दाम्पत्य जीवन में राम ने सीता को अच्छी प्रकार जाना-समझा था। किंतु लोक चिन्तन कहता है कि स्त्री कोमल होती है उसका मन कठिनाइयो से भागता है तथा वैभव और सुविधा की ओर झुकता है। सीता के आज तक के व्यवहार ने इस चिंतन का समर्थन नहीं किया था। वे सदा लोक-कल्याण की प्रवृत्ति की ओर झुकी थी किंतु आज से पहले तो राम उनके साथ इस प्रकार का कठिन वन्य जीवन व्यतीत करने के लिए बाहर भी नही निकले थे। संभव है इस कठिन जीवन में सीता को असुविधा हो


"देवी सीता। "राम का स्वर बहुत मदु था ।


सीता ने चौंककर पति की ओर देखा, 'क्या बात है राम! आप मुझे 'प्रिये' नही कह रहे। इतने अतिरिक्त कोमल और शिष्ट क्यो हो रहे हैं ? कही फिर से मुझे अयोध्या लौट जाने का प्रलोभनयुक्त उपदेश देने का विचार तो नही है ?


राम की आधी चिंता दूर हो गयी। वे कुछ हल्के हुए और कुछ सहज भी।


नही, प्रिये । अयोध्या लौटने को नही कहूंगा, किंतु यह पूछने की इच्छा अवश्य है कि इस वन्य जीवन में कोई असुविधा तो नहीं ? वन में आने का कोई पश्चात्ताप कोई उत्तर विचार कोई पुर्नविचार की इच्छा ?"


"झगडे की इच्छा तो नहीं ?" सीता सहज भरी मुसकान अधरों पर ले आयी ।


"नही" राम मुसकराए "पर अपनी पत्नी की उचित देखभाल मेरा कर्तव्य है । इसलिए उसकी सुविधा असुविधा को तो जानना होगा । जो राम सीता से विवाह कर उसे अपने घर लाया था, वह अयोध्या का संभावित युवराज था वनवासी नहीं।"


प्रिये  मैं तुम्हे और लक्ष्मण को तुम लोगो के प्रेम का दण्ड दे रहा हूं ।


 सीता पुनः मुस्कराई 'प्रेम तो अपने-आप में एक दंड है । प्रेम किया है तो उसका दर्द भी स्वीकार करना ही होगा। यह कोई नयी बात तो नही ।


किन्तु एक असुविधा मुझे है ।


 'क्या ? राम ने उत्सुकता से पूछा, वही तो मैं भी जानना चाह रहा हूं सीता गंभीर हो गयीं यदि चौदह वर्षो तक मेरे पति मुझसे इसी प्रकार औपचारिक व्यवहार करते रहे, तो मैं  अपने आप को भी परायी लगने लगूंगी।


राम जोर से हस पड़े।


'मैं आपके साथ इसलिए आयी थी कि हमारे बीच राज प्रासाद और राजपरिवार की सारी औपचारिकताएं समाप्त हो जाएगी। मैं अपने पति के लिए सघन जनसंख्या वाले प्रदेश की इकाई न होकर उनके इतनी करीब होऊगी कि वे अनेक कामों के लिए मुझ पर निर्भर होगे। हम दोनो सहज रूप में दो साथियों के समान कार्य करेंगे। मैं उनमुक्त प्रकृति के बीच अपने प्रिय साथी को नये आयाम दूंगी और आत्म निर्भर इकाई रुप में समाज के लिए कुछ उपयोगी हो सकूगी ।


राम भाव में बह गए। उन्होंने सीता के कन्धों पर हाथ रख दिए यही होगा प्रिये । यही होगा। जाने क्यो मैं कभी-कभी विभिन्न संभावनाओं पर विचार करते करते काई ऐसी बात सोचने लगता हूँ जिसमें स्वयं मुझे भी अपनी पत्नी की उदात्तता समझने में कठिनाई होने लगती है। उन्हाने सीता को अपनी बाहों में भर लिया मुझे लगता है सीते । कि आदमी कितना ही दृढ निश्चित तथा आत्मविश्वासी क्या न हो यदि वह मनुष्य है तो उसके जीवन में कभी न कभी ऐसे दुर्बल क्षण आते ही है-- जब वह आशंकित होता है असंभव सभावनाओ की कल्पना करता है तथा स्वयं अपने संबंधों पर संदेह करता है ।


'प्रिये । ऐसे ही क्षणों को सबल बनाने के लिए सीता तुम्हारे साथ आयी हैं।'।


 सीता ने अपना सिर राम के वक्ष पर टिका दिया ।


तो ऐसा ही हो प्रिये । कल से तुम्हारा नया जीवन आरंभ हो । वन प्रांत से तुम वनवासिनी वदेही बन जाओ एक स्वतंत्र आत्मनिर्भर व्यक्ति, राम के साधारण जीवन की सगिनी और सहगामी ।


सीता ने मस्तक उठाकर दुलार से राम की ओर देखा । राम मुग्ध हो उठे।


नरेंद्र कोहली की पुस्तक का अंश

मंगलवार, 16 मई 2023

घोस्ट राइटिंग

 

हिंदी में जो लोकप्रिय साहित्य की दुनिया रही है, उसमें योगेश मित्तल दशकों से सक्रिय रहे हैं। मगर उन्होंने अपने नाम से नहीं, दूसरे कई ट्रेड नामों से लेखन किया है- यानी गोस्ट राइटिंग। 'प्रेत लेखन' और 'वेद प्रकाश शर्माः यादें, बातें और अनकहे किस्से' शीर्षक से हाल में उन्होंने दो किताबें लिखी है, जो पॉकेट बुक्स, गोस्ट राइटिंग और लुगदी उपन्यास के संसार की अंतरंग कहानी कहती हैं। प्रस्तुत हैं अमितेश कुमार की योगेश मित्तल से हुई लंबी बातचीत के मुख्य अंशः

■ आपने गोस्ट राइटिंग की शुरुआत कैसे की ?

 मुझे 1970 में पॉकेट बुक पब्लिशर जानने लगे थे। मैंने गर्ग एंड कंपनी, मनोज पॉकेट बुक्स और मेरठ के कई पब्लिशर के लिए लिखना शुरू कर दिया था। एक बहुत मशहूर लेखक हुए विमल चटर्जी। उन्हें तब मनोज पॉकेट बुक्स वालों ने बाल कहानियों के लिए प्रेरित किया और लिखने से पहले कहानियों की हेडिंग दे दी। विमल बड़े परेशान थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने माजरा बयान किया। मैंने कहा बड़ा आसान है। उन्होंने कहा कि इतना आसान है तो आप लिख दो। मैंने उन्हें कहानी लिखकर दे दी। उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उससे पहले मेरी कहानियां गर्ग एंड कंपनी की गोलगप्पा मैगजीन में छपती थीं। उन्होंने बच्चों के नॉवेल लिखने का ऑर्डर दिया। मेरा पहला नॉवेल 'खूनी शैतान की बस्ती' मेरे नाम से ही छपा था। लेकिन नाम से छपने का कोई फायदा नहीं मिला, तब उसे लिखने के सिर्फ 25 रुपये मिले थे।

 हिंदी जगत में गोस्ट राइटिंग इंडस्ट्री कब और कैसे शुरू हुई?

 1970 के बाद स्टार पॉकेट बुक्स और हिंद पॉकेट बुक्स ने लगभग साथ ही इसकी शुरुआत की। तब स्टार वालों और कई दूसरे पब्लिशरों का कहना था कि लेखक टाइम पर स्क्रिप्ट नहीं देते। नाम से छपने वाले लेखक पैसों के लिए परेशान करते थे, एकदम से रेट बढ़ा देते थे। पंजाबी पुस्तक भंडार वाले स्टार पॉकेट बुक्स ने सामाजिक उपन्यास लिखने के लिए एक नए नाम 'राजवंश' का प्रयोग किया। उन्होंने आरिफ माहरवीं को चुना, जो जासूसी उपन्यास लिखते थे। मैंने अपनी किताब 'प्रेत लेखन' में आरिफ माहरवीं को गोस्ट राइटिंग का शहंशाह बताया है। उन्हीं दिनों हिंद पॉकेट बुक्स वालों ने दो नाम रखे- कर्नल रंजीत और शेखर। कर्नल के लिए उन्होंने बात की मख्मुर जालंधरी नाम के शायर से । वह पेरी मेसन के नॉवेल से विचार लेते थे, नकल नहीं करते थे मेजर बलवंत उसमें पात्र था और सोनिया उसकी साथी। दूसरे नाम शेखर के लिए उन्होंने चुना राम कुमार भ्रमर को, जो उस समय डाकुओं पर उपन्यास लिखते थे। मखमुर साहब कर्नल रंजीत के लिए आजीवन लिखते रहे। वहीं शेखर के जितने उपन्यास छपे, वे राम कुमार ने ही लिखे।

 ■ दूसरे कौन लोग लिखते थे और किन-किन नामों के लिए?

राजवंश के बाद स्टार वालों ने कई काल्पनिक नाम तय किए, जैसे- लोकदर्शी, समीर सब आरिफ माहरवीं से लिखवाया। आरिफ ने बहुत सारे नामों को स्थापित किया। मनोज पॉकेट बुक्स के लिए उन्होंने सूरज के नाम से लिखा। भारत नाम से भी लिखा। राजेश्वर नाम के टाइटल पर उनकी फोटो भी लगती थी। सामाजिक नॉवेल लिखने के लिए उन्होंने सैमुअल अंजुम अर्शी को पकड़ा, जो सफदरजंग हॉस्पिटल के 28 नंबर वॉर्ड के इंचार्ज थे। अंजुम ने मनोज में दो नॉवेल लिखे- 'खामोशी' और 'जलती चिता'। फिर एक नया लड़का दिनेश श्रीवास्तव आया। वह मुझसे करेक्शन कराता था। उसने मनोज में एक उपन्यास लिखा और अपना नाम दिनेश पाठक बताया क्योंकि उस समय सुरेंद्र मोहन पाठक का नाम चल गया था। वह नॉवेल था 'फूल और काटे'। फिर आए जमील अंजुम, जिन्होंने 30-32 उपन्यास लिखे। इसके बाद इन्होंने विनय प्रभाकर जैसे कई और नाम चलाए, जिसके लिए परशुराम शर्मा, विमल चटर्जी और असित चटर्जी ने लिखा। मैंने भी कई नामों से रायजादा, मनोज, भारत के लिए लिखा। टाइगर ट्रेड नेम के लिए यशपाल वालिया भारती पॉकेट बुक्स में लिखते थे। बाद में विजय पॉकेट बुक्स में अपनी पत्नी मीनू वालिया के नाम से लिखा, जिसमें फोटो पत्नी का होता था। गोस्ट राइटिंग में सबसे ज्यादा ईमानदारी बरती स्टार वालों ने राजवंश नाम से आरिफ माहरवीं के अलावा दूसरे लोगों को न छापा। हिंद वालों ने मख्मुर जालंधरी के असली नाम ही लिखवाया।

■ नए-नए ट्रेड नेम पैदा करने के पीछे क्या कारण थे?


जिन लेखकों के नाम से नॉवेल छपे थे, पब्लिशर को उनको मुंहमांगी रकम देनी पड़ती थी। लेकिन पब्लिशर कई बार उतनी बड़ी रकम देना नहीं चाहते थे। इसी वजह से ना नए ट्रेड नेम आए। 

# आप बता सकते हैं कि सबसे ज्यादा गोर राइटिंग किस ट्रेड नेम के लिए हुई ?

यह बताना मुश्किल है क्योंकि कई पब्लिशरों ने बाद नाम चलाए। इधर मनोज वालों ने चलाए भारत, सूरज धीरज वगैरह। बाद में सूरज नाम का पहला उपन्यास राज बाबू ने मुझे लिखने का ऑर्डर दिया था, लेकिन मेरा नॉवेल आधा हुआ था तो उन्होंने कहा कि आरिफ साहब ने नॉवेल दे दिया। यह प्रकाशकों का खेल था। सबसे ज्यादा प्रसिद्ध नाम था राजवंश और कर्नल रंजीत का।

 ■ स्थापित लेखकों से भी कोई अपने लिए गोस्ट राइटिंग कराता था ?

ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज नाम के लिए सबसे ज्यादा गोस्ट राइटिंग हुई है। एक जमाना आया हर प्रकाशक के यहां हर महीने ओम प्रकाश शर्मा ओर वेद प्रकाश कांबोज की दो-दो किताबें छप रही थीं। इतनी किताबें कोई भी नहीं लिख सकता। मेरठ में एक प्रकाशक थे, जंग बहादुर वह ओम प्रकाश शर्मा के पास नॉवेल ले गए तो उनके पास समय नहीं था। जंग बहादुर खुराफाती थे उनके टच में कोई और ओम प्रकाश शर्मा नाम का व्यक्ति था तो उन्होंने उससे बात की और हम जैसे गोस्ट राइटर ओम प्रकाश शर्मा के कैरेक्टर पर उपन्यास लिखवा लिया और यही काम वेद प्रकाश कांबोज नाम के लिए भी किया।



गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

 सिंगल लाइफ जीते जीते अचानक एक रोज शादी हो गई...दूसरे दिन सुबह 7:00 बजे नई नई बीवी ने बड़े प्यार से जगाया कि जानू उठो सुबह हो गई है...!देखा तो चाय ब्रेड स्लाइस पानी ट्रे में लिए वह खड़ी थी बेड टी के बाद बाथरूम में गए तो टावर चड़ी बनियान गर्म पानी से भरी बाल्टी तैयार थी 

नहाने के बाद नाश्ता रेडी, ऑफिस की ड्रेस तैयार टिफिन टेबल पर 3:00 जब वापस घर आया तो खाना तैयार मियां बावला हो गया।

बीवी को गले लगा कर भावुक होकर बोला कि तुम्हारे आने से मेरा जीवन सफल हो गया मैं बहुत भाग्यवान हूं कि तुम जैसी पत्नी मिली है

बीवी ने धीरे से अलग करते हुए वह तिरछी नजर से देखते हुए बोली..... अब कल से मैं भी ड्यूटी जॉइन कर रही  हूँ  कि तुम्हें कल से क्या काम कैसे करना है..यह उसका डेमो था।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

सूरदास

एक दिन ऐसी घटना हुई कि जिसने सूरदास के मन को मोह लिया। हुआ ये की एक सुन्दर नवयुवती कन्या नदी किनारे कपडे धो रही थी ।

इन  का ध्यान उनकी तरफ चला गया। उस युवती ने इनको ऐसा आकर्षित किया की ये कविता लिखना छोड़-छाड़ के तथा पुरे ध्यान से उस युवती को देखने लगे।

उनको ऐसा लगा मानो यमुना किनारे राधिका स्नान कर के बैठी हो । उस नवयुवती ने भी सूरदास की तरफ देखा और उनके पास आकर बोली आप मदन मोहन जी हो ना?

तो वे बोले हां मैं हीं मदन मोहन हूँ। कविताये लिखता हूँ तथा गाता हूँ आपको देखा तो रुक गया। नवयुवती ने पूछा क्यों ? तो वह बोले आप हो ही इतनी सुन्दर। 

ये सिलसिला कई दिनों तक चला। जब यह बात मदन मोहन के पिता को पता चली तो उनको बहुत क्रोध आया तो लगाई मदन मोहन को तगड़ी फटकार इस पर मदन मोहन ने घर छोड़ दिया। पर उस सुन्दर युवती का चेहरा उनके सामने से नहीं जा रहा था एक दिन वह मंदिर मे बैठे थे तभी वहाँ एक शादीशुदा बहुत ही सुन्दर स्त्री आई। मदन मोहन समझ गये और उनके पीछे पीछे चल दिए। जब वह उसके घर पहुंचे तो उनके पति ने दरवाजा खोला तथा पुरे आदर सम्मान के साथ उन्हें अंदर बिठाया। फिर मदन मोहन ने दो जलती हुए सिलाई मांगी तथा उसे अपनी आँख में डाल दी। इस तरह मदन मोहन बने महान कवि सूरदास।

ऐसा भी माना जाता है कि इनका वास्तविक नाम सूरध्वज था। और इनको सूरदास की उपाधि इनके गुरु वल्लभाचार्य ने दी थी।

कुछ यह भी मानते हैं कि सूरदास जन्म से ही अन्धे थे। परन्तु सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।


मंगलवार, 28 मार्च 2023

कैकेयी की माता

 केकय नरेश अश्वपति ब्रह्मज्ञानी के रूप में विख्यात थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इस संबंध में उनसे राय लेने आते रहते थे। कहते तो यहाँ तक हैं कि उन्हें पशु-पक्षियों की बोलियाँ भी आती थीं। एक कथा प्रचलित हैं कि एक बार अश्वपति महारानी के साथ बगीचे में टहल रहे थे। बगीचे में पक्षियों की चहचहाइट एक स्वाभाविक ध्वनि होती है। अचानक महाराज हँस पड़े महारानी असमंजस से पूछ बैठीं -

"महाराज मैंने कोई हास्यास्पद बात तो नहीं की जो आप हँस रहे हैं।”

महाराज ने हाथ से उन्हें शान्त रहने का संकेत किया और बड़े गौर से कहीं कान लगाकर सुनने लगे| महारानी को समझ नहीं आ रहा था कि महाराज क्या सुनने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें लगा कि महाराज उनकी उपेक्षा करने के लिये कुछ सुनने का अभिनय मात्र कर रहे हैं। पक्षियों के कलरव के अतिरिक्त वहाँ और कोई ध्वनि थी ही नहीं। इसी बीच महाराज फिर हँसने लगे फिर महारानी से संबोधित होते हुये बोले - 

"हाँ महारानी जी ! अब बताइये क्या कह रही थीं?"

"मैं क्या कह रही थी उसे तो छोड़िये। मेरी बातें तो आपको सुनने योग्य लगती ही नहीं।"

"नहीं।" महारानी भी सामान्य स्त्रियों की भाँति ही व्यवहार करने लगी थीं।

“अरे नहीं! किसने कह दिया कि मुझे आपकी बातों में रस नहीं मिलता।”

"रस मिलता होता तो मेरी बात की उपेक्षा कर इस प्रकार शून्य को सुनने का अभिनय नहीं करता "

"महारानी जी मैं शून्य को नहीं सुन रहा था। "

"तो फिर क्या सुन रहे थे? और हँस क्यों रहे थे? मेरी बात का उपहास कर रहे थे न!"

"नहीं महारानी जी! "

"नहीं तो फिर बताते क्यों नहीं कि क्यों हँस रहे थे?"

" तो उधर वृक्ष पर बैठा एक पक्षी-युगल परस्पर कुछ मनोरंजक वार्ता कर रहा था, उसी को सुनने लगा था। उसी को सुनकर हँसी भी आ गई थी।"

 "महाराज मुझे क्या आप अबोध शिशु समझते हैं जो आपके इन तथ्यहीन भुलावों में आ जाऊँगी? भला पक्षियों की बातों का भी कोई महत्व हो सकता है। यदि होता भी हो तो आपको क्या पता कि वे परस्पर क्या बातें कर रहे थे।"

"महारानी जी! कभी- कभी अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं पक्षियों की बातें। और भाग्य से  कहिये या दुर्भाग्य से, मैं उनकी बातें समझा भी सकता हूँ।”

" तो बताइये फिर क्या कह रहे थे वे?” महारानी को महाराज की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वे यही समझ रही थीं कि महाराज उनकी हँसी उड़ा रहे थे। इसी कारण उनकी चिढ़ और क्रोध बढ़ते ही जा रहे थे। उन्होंने अब हठ पकड़ लिया था।

"नहीं महारानी जी! यह हम नहीं बता सकते।"

"फिर बहाना ! क्यों नहीं बता सकते हैं। हमें तो मात्र सेविका ही समझते हैं आप "

"नहीं महारानी जी! ऐसी बात नहीं है। पर हमारी विवशता है कि हम किसी को नहीं बता सकते कि वे क्या बात कर रहे थे।"

"क्यों नहीं बता सकते भला?" महारानी भी अपने हठ पर अड़ी थीं।

"क्योंकि यदि हमने बता दिया तो उसी क्षण हमारी मृत्यु हो जायेगी। क्या आप वैधव्य की आकांक्षी हैं?"

“यह सब आपका आडंबर मात्र है। वस्तुत: आप प्रकारान्तर से हमारा तिरस्कार करना चाहते हैं।"

"भला हम आपका तिरस्कार क्यों करना चाहेंगे?"

"मुझे नहीं ज्ञात किन्तु यदि ऐसा नहीं हैं तो फिर बताइये कि वे क्या वार्ता कर रहे थे?" 

“मैंने कहा न कि मैं नहीं बता सकता। विवशता है।"

“पुन: वही अनर्गल प्रलाप !” कहती हुयी महारानी क्रोध से पैर पटकती हुयी चली गयीं।

क्रोध महाराज को भी आ गया था। वे सोचने लगे कि

 "इस स्त्री को अपने पति के जीवन की चिंता नहीं हैं, बस अपना वृथा हठ ही प्यारा हैं।" 

फिर भी उन्होंने आवाज दी-

"रुकिये महारानी अनावश्यक क्रोध उचित नहीं है। "

पर महाराजी नहीं रुकीं।

महाराज को महारानी के आचरण से अपार क्षोभ हुआ था। वे सोच रहे थे कि ऐसी पत्नी तो कभी भी उनके लिये ही नहीं राज्य के लिये भी संकट का कारण बन सकती है। उन्होंने उनके त्याग का निश्चय कर लिया। दृढ़ निश्चया इसकी किसी भी बात पर अब विश्वास नहीं करना है। किसी भी पश्चाताप के प्रदर्शन पर ध्यान नहीं देना है।

दूसरे ही दिन उन्होंने रथ तैयार करवाया और सैनिकों की एक टुकड़ी के संरक्षण में महारानी को उनके मायके भिजवा दिया इस निर्देश के साथ कि अब केकय राज्य में उनके लिये कोई स्थान नहीं है।

महारानी का तो निर्वासन हो गया किन्तु अब प्रश्न था अल्पवयस्क पुत्री की उचित देखभाल का सात भाइयों में अकेली बहन, सबकी दुलारी महाराज के जीवन का आधार किसे सौंपे यह दायित्व कैकेयी अभी मात्र तीन वर्ष की ही तो है। माता का निर्वासन कहीं उसकी भावनाओं को आहत न करे! वह अब धीरे-धीरे चीजों को समझने लगी हैं। इस समय यदि उसकी भावनाएं आहत हुई या विद्रोह की ओर उन्मुख हो गयीं तो... ? यद्यपि महारानी का सान्निध्य तो उसे उच्छृंखल और धृष्ट ही बनाता। यूँ ही किसी को तो नहीं सौंपा जा सकता उसका दायित्व यदि युधाजित (अश्वपति का बड़ा पुत्र) का विवाह हो गया होता तो उसकी पत्नी को ही यह दायित्व सौंपा जा सकता था किन्तु उसमें तो अभी विलम्ब हैं। तब ? ... एक बहुत बड़ा प्रश्न उन्हें मथ रहा था।

अचानक उन्हें ध्यान आया चपला (मंथरा) का जिसका राजकीय उपचारगृह में पाँच वर्ष तक उपचार चला था। अब चार वर्षों से वह पूर्ण स्वस्थ हो गयी थी। महाराज उसके साहस एवं दृढ़ता से अत्यंत प्रभावित थे। उसे भी उचित संरक्षण की आवश्यकता थी। उन्होंने निश्चय कर लिया कि उसे ही कैकेयी की संरक्षिका नियुक्त करेंगे। यह दोनों के लिये ही हितकर रहेगा।

इस प्रकार चौबीस वर्षीय चपला तीन वर्षीय कैकेयी की संरक्षिका बन कर कैकय नरेश अश्वपति के राजप्रासाद में आ गयी। समय के साथ चपला के घाव भर गये थे पर उसका चेहरा कटार के गहरे घाव के कारण कुरूप हो गया था। रीढ़ की हड्डी जुड़ गयी थी पर कमर स्थाई रूप से इस उम्र में ही झुक गयी थी। जाँघ की हड्डी भी जुड़ अवश्य गई थी पर चाल में लंगड़ाहट आ गई थी। उसकी गति मंथर हो गयी थी और इस मंथर गति के कारण ही उसका नाम चपला से स्वत: मंथरा हो गया था। उसे स्वयं भी इस नाम से पुकारे जाने में कोई आपत्ति नहीं थी। वह तो अब मात्र रक्षों के अस्तित्व का समूल नाश करने के अपने संकल्प के लिये जी रही थी, यद्यपि उस भयानक दिवस के उपरान्त उसे रक्षों के विषय में कोई समाचार नहीं प्राप्त हुआ था। जिससे भी उसने कुछ पूछने का प्रयास किया उसी ने अनभिज्ञता प्रदर्शित की थी।

मंथरा के संरक्षकत्व ने कैकेयी की विचारधारा को भी निश्चय ही प्रभावित किया। झुकी कमर और लंगड़ी चाल के बावजूद मंथरा को शस्त्र संचालन में रुचि थी जिससे समय के साथ कैकेयी की रुचि भी इस ओर जाग्रत हो गयी। मंथरा के सान्निध्य में उसकी यह रुचि भली-भाँति विकसित होने लगी। दोनों डट कर अभ्यास करतीं। महाराज भी उन्हें पूरा प्रोत्साहन देते थे और इसके लिए उन्होंने विशिष्ट व्यवस्थाएँ प्रसन्नतापूर्वक कर दी थीं। शीघ्र ही कैकेयी अस्त्र-शस्त्रों के  संचालन में निपुण हो गयी। रथ के अश्वों के संचालन में तो उसका कोई सानी ही नहीं था।

कैकेयी को मंथरा के संरक्षण में देकर उसकी प्रगति से महाराज अश्वपति पूर्ण संतुष्ट थे। वे मंथरा को भी अपनी पुत्री की भाँति ही स्नेह देते थे। कैकेयी उसे पूरा आदर और सम्मान देती थी। वह एक प्रकार से कैकेयी की धाय माँ थी किन्तु कैकेयी उसका अपनी माँ के समान ही सम्मान करती थी।

महाराज नित्य ही कम से कम एक बार अवश्य कैकेयी से मिलने आते थे। कैकेयी से मिलने आते थे तो मंथरा की भी उनसे भेंट होती ही थी। इस सतत परिचय से वह महाराज के साथ एक सीमा तक अनौपचारिक हो गयी थी। इस अनौपचारिकता को महाराज ने ही प्रोत्साहित किया था। एक दिन बातों ही बातों में मंथरा ने अपने जीवन के परम उद्देश्य के विषय में चर्चा छेड़ दी

"तुम्हारा कार्य तो विष्णु सम्पूर्ण कर चुके हैं।" 

अश्वपति हँसते हुये बोले।

"तात्पर्य महाराज?" 

“जब तुमसे उन लोगों की मुठभेड़ हुई तब वे विष्णु से पराजित होकर ही भाग रहे थे। माल्यवान और सुमाली का छोटा भाई माली तो विष्णु के द्वारा मारा जा चुका था । " 

मंथरा के चेहरे पर संतोष के भाव थे।

 "जी!'

“उसके बाद विष्णु ने इन लोगों को लंका तक खदेड़ा। विशाल सेना थी इनकी जिसने देवराज इन्द्र तक को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। किन्तु तुमने देखा ही होगा कि कितने थोड़े से लोग बचे थे। "

"थोड़े से कहाँ महाराज कई सौ थे|"

" अक्षौहिणियों में जब कई सौ बचते हैं तो वे थोड़े से ही कहे जाते हैं।"

 अश्वपति खुलकर हँसते हुये बोला

 “ओह ! किन्तु वे पुन: अपनी शक्ति एकत्र करेंगे, पुनः अक्षौहिणियाँ जोड़ लेंगे। उनके प्रमुखों में से दो तो अभी भी जीवित ही है।"

"नहीं! मंथरा ऐसा लगता तो नहीं है। "

 "लगता नहीं हैं किन्तु असंभव भी तो नहीं हैं। मेरा हृदय तो तभी शीतल होगा जब शेष बचे ये दोनों भी काल का ग्रास बन जायेंगे।"

"हूँ... दोनों में से बड़ा माल्यवान तो संसार त्यागकर वानप्रस्थी हो गया है। वह तभी से एकांत में तपश्चर्या में निमग्न है। उसकी कोई भी संदिग्ध गतिविधि तब से नहीं देखी गयी। यदि देखी गयी होती तो विष्णु उसे भी अवश्य समाप्त कर देते। बचा सुमाली। वह पता नहीं जीवित है भी या नहीं। तभी से उसके विषय में किसी को भी कोई समाचार नहीं मिला हैं। वह और उसके पुत्र किस जगत में हैं यह अब किसी को ज्ञात नहीं।"

“किन्तु उनकी मृत्यु हो गयी यह भी तो सुनिश्चित नहीं है। "

"यह तो हैं।”

“फिर उनके पुत्र भी तो हैं। जब तक सबकी मृत्यु प्रमाणित नहीं हो जाती है तब तक कैसे माना जा सकता है कि वे दुबारा सिर नहीं उठायेंगे?" 

“यह भी उचित है। किन्तु यदि वे पुन: सिर उठायेंगे तो पुनः उन्हें कुचल दिया जायेगा। इस बार किसी को भी जीवित नहीं छोड़ा जायेगा| "

 “देखते हैं महाराज! एक बार तो विष्णु जैसा व्यक्ति भी चूक कर ही गया। साँप को घायल करके कहीं जीवित छोड़ा जाता है। "

राम रावण 

सुलभ अग्निहोत्री 





बुधवार, 11 जनवरी 2023

 ओशो अमेरिका जेल में 

ओशो 12 दिन अमेरिका की जेल में थे .. ना कोई आधार ना वारंट ना सबूत .. कुछ नही। फिर भी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उन्हें जेल भिजवा दिया..और कहा कि हम आपको बिना सबूतों के भी अंदर रखेंगे ट्रायल के रूप में और कहेंगे कि आपने देश विदेश से अपने शिष्यों को बिना वीसा के अमेरिका लाकर अमेरिकी कानून का उल्लंघन किया है ..आपको ये साबित करने में कि आप निर्दोष हो 10 साल लग जायेंगे और तब तक आपका कम्यून आपके बिना नष्ट हो जायेगा या हम उसे तबाह कर देंगे .. और फिर हम आपको बाइज्जत आपके मुल्क भारत भेज देंगे...


वह ऐसा इसलिए कर रहा था क्योंकि ओशो का कम्यून बहुत बडे़ भू-क्षेत्र में फैला हुआ था। उसमें खुद का airport, हॉस्पिटल, स्कूल, कॉलेज सब था और वहाँ कोई भी मुद्रा नहीं चलती थी .. निःशुल्क था सब। सभी राजनीति से हटकर अपना आनन्दपूर्ण जीवन जी रहे थे.. लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही थी ... जिससे रोनाल्ड रीगन डर गया...ओशो के शिष्यों को जब यह पता चला तो उन्होंने फूल भेजे जेल में भी और राष्ट्रपति भवन में भी .. जिस जेल में ओशो बंद थे वहाँ के जेलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैंने पहली बार देखा जब किसी असंवैधानिक गिरफ्तारी का विरोध बिना हिंसा या उग्र प्रदर्शन के हुआ हो ..

उसने लिखा है कि वो 12 दिन मेरी जेल चर्च में बदल गई थी। अमेरिका के कोने कोने से ढेरों फूल, गुलदस्ते, गमले आ रहे थे। जब भी ओशो जेल से कोर्ट जाते, लोग उन्हें फूल भेंट करते। पूरा न्यायालय परिसर फूलों से भर गया था। जज हैरान थे, पूरे पुलिस कर्मी हैरान थे।

तब जजों ने ओशो से कहा ... हम सभी असामान्य रूप से चकित हैं, हमने स्पेशल फोर्सेस बुलवा कर रखी थीं क्योंकि आपके शिष्य लाखों में हैं। प्रदर्शन उग्र हो सकता था। पर यहाँ तो सब उम्मीद के विपरीत हो रहा है। यह कैसा विरोध है?

तब ओशो ने कहा ... यही मेरी दी हुई शिक्षा है, वो जैसा प्रदर्शन करेंगे असल में वह मुझे, मेरे आचरण और मेरी शिक्षा को ही व्यक्त करेंगे!!

ओशो ने भारत में रहते हुए इंदिरा, नेहरू, हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई एवं अन्य सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों का खुलेआम विरोध किया। पर ना तो नेहरू ने उन्हें जेल भेजा। ना इंदिरा ने, ना मोरारजी ने, ना चरण सिंह ने, ना अन्य किसी ने .....


क्योंकि सभी ये बात जानते थे कि ये आदमी इतना तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण है कि ये हमारे राजनैतिक शिकंजों में ना आ सकेगा ... ना हम इसका कभी विरोध कर सकेंगे क्योंकि हम आधारहीन हैं!


और अंततः CIA ने थैलियम नाम का धीमा ज़हर देकर उन्हें अत्यधिक दर्दनाक और यातनापूर्ण ढंग से मार दिया ... 1985 में दिया गये जहर से वे 5 सालों में 1990 में शरीर मुक्त हुए ..

क्योंकि जिसका तुम जवाब नहीं दे सकते, उसे मारना ही बेहतर लगता है। लेकिन शिष्यों ने तो फिर भी कोई विरोध नहीं किया। नाच गाकर, नृत्य में डूबकर ओशो को विदा किया ... कोई रोया नहीं। ना किसी ने किसी पर दोषारोपण किया। ना कोई विरोध, ना चक्काजाम, ना लोग मरे, ना शहर जलाए गए ..!


एक गुरु को इससे अधिक क्या चाहिए..

शिष्य ही गुरु का प्रतिबिंब होते हैं ..

जैसा शिष्य करेंगे दरअसल वही

गुरु की दी हुई शिक्षा होगी!


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 Yogesh Mittal Friend: 

   *भगवान का मंगल विधान*  

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          *(सत्य घटना पर आधारित)*


*पुरानी बात है - कलकत्ते में सर कैलाशचन्द्र वसु प्रसिद्ध डॉक्टर हो गये हैं। उनकी माता बीमार थीं। एक दिन श्रीवसु महोदय ने देखा—माता की बीमारी बढ़ गयी हैं, कब प्राण चले जायँ, कुछ पता नहीं।*


*रात्रि का समय था। कैलाश बाबू ने बड़ी नम्रता के साथ माताजी से पूछा- 'माँ, तुम्हारे मन में किसी चीज की इच्छा हो तो बताओ, मैं उसे पूरी कर दूँ।'*


*माता कुछ देर चुप रहकर बोलीं- 'बेटा! उस दिन मैंने बम्बई के अंजीर खाये थे। मेरी इच्छा है अंजीर मिल जायँ तो मैं खा लूँ।' उन दिनों कलकत्ते के बाजार में हरे अंजीर नहीं मिलते थे। बम्बई से मँगाने में समय अपेक्षित था । हवाई जहाज थे नहीं। रेल के मार्ग से भी आजकल की अपेक्षा अधिक समय लगता था।*


*कैलाश बाबू बड़े दुखी हो गये - माँ ने अन्तिम समय में एक चीज माँगी और मैं माँ की उस माँग को पूरी नहीं कर सकता, इससे बढ़कर मेरे लिये दु:ख की बात और क्या होगी ? पर कुछ भी उपाय नहीं सूझा । रुपयों से मिलने वाली चीज होती तो कोई बात नहीं थी ।*


*कलकत्ते या बंगाल में कहीं अंजीर होते नहीं, बाजार में भी मिलते नहीं। बम्बई से आने में तीन दिन लगते हैं। टेलीफोन भी नहीं, जो सूचना दे दें। तब तक पता नहीं - माता जी जीवित रहें या नहीं, अथवा जीवित भी रहें तो खा सकें या नहीं। कैलाश बाबू निराश होकर पड़ गये और मन-ही-मन रोते हुए कहने लगे—'हे भगवन्! क्या मैं इतना अभागा हूँ कि माँ की अन्तिम चाह को पूरी होते नहीं देखूँगा।*


*रात के लगभग ग्यारह बजे किसी ने दरवाजा खोलने के लिये बाहर से आवाज दी। डॉक्टर वसु ने समझा, किसी रोगी के यहाँ से बुलावा आया होगा। उनका चित्त बहुत खिन्न था। उन्होंने कह दिया-'इस समय मैं नहीं जा सकूँगा।*


 *बाहर खड़े आदमी ने कहा- 'मैं बुलाने नहीं आया हूँ, एक चीज लेकर आया हूँ-दरवाजा खोलिये।' दरवाजा खोला गया। सुन्दर टोकरी हाथ में लिये एक दरवान ने भीतर आकर कहा-'डॉक्टर साहब! हमारे बाबूजी अभी बम्बई से आये हैं, वे सबेरे ही रंगून चले जायँगे, उन्होंने आपको यह अंजीर की टोकरी भेजी है, वे बम्बई से लाये हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि वे सबेरे जल्दी ही रंगून चले जाएंगे इसलिये अभी अंजीर दे आओ । इसीलिये मैं अभी लेकर आ गया। कष्ट के लिये क्षमा कीजियेगा ।*

     

*कैलाश बाबू अंजीर का नाम सुनते ही उछल पड़े। उन्हें उस समय कितना और कैसा अभूतपूर्व आनन्द हुआ, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। उनकी आँखों में हर्ष के आँसू आ गये, शरीर  आनन्द से रोमांचित हो गया। अंजीर की टोकरी को लेकर वे माताजी के पास पहुँचे और बोले—‘माँ! लो - भगवान् ने अंजीर तुम्हारे लिये भेजे हैं।'*


*उस समय माता का प्रसन्न मुख देखकर कैलाश बाबू इतने प्रसन्न हुए, मानो उन्हें जीवन का परम दुर्लभ महान् फल प्राप्त हो गया हो ।*


*बात यह थी कि, एक गुजराती सज्जन, जिनका फार्म कलकत्ते और रंगून में भी था, डॉक्टर कैलाश बाबू के बड़े प्रेमी थे। वे जब भी बम्बई से आते, तब अंजीर लाया करते थे।*


*भगवान्‌ के मंगल विधान का आश्चर्य देखिये, कैलाश बाबू की मरणासन्न माता आज रात को अंजीर चाहती है और उसकी चाह को पूर्ण करने की व्यवस्था बम्बई में चार दिन पहले ही हो जाती है और ठीक समय पर अंजीर कलकत्ते उनके पास आ पहुँचते हैं! एक दिन पीछे भी नहीं, पहले भी नहीं।*


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*आप भगवान को मानते हों या न मानते हों! कोई तो है - जो इस दुनिया को चलाता है और अपने कालचक्र के अनुसार बुरों को भी उनके अन्जाम तक पहुँचाता है और अच्छों को उनकी अच्छाई का पुरुस्कार भी देता है!*


*इसे कहते हैं कि परमात्मा जिसको जो चीज देना चाहते हैं उसके लिए किसी न किसी को निमित्त बना ही देते हैं। इसलिए यदि कभी किसी की मदद करने को मिल जाये तो अहंकार न कीजियेगा।*

*बस इतना समझ लीजियेगा कि परमात्मा आपको निमित्त बनाकर किसी की सहायता करना चाह रहे हैं....। इसका अर्थ ये हुआ कि आप परमात्मा की नजर में हैं।*


By :

*अरुण कुमार शुक्ला*


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बुधवार, 9 नवंबर 2022

जीवन तो अंधकार है, लेकिन जिनके पास सत्य का दीपक है, वे सदा प्रकाश में ही जीते हैं। जिनके भीतर प्रकाश है, उनके लिए बाहर का अंधकार रह ही नहीं जाता। बाहर अंधकार की मात्रा उतनी ही होती है, जितना कि वह भीतर होता है। वस्तुतः बाहर वही अनुभव होता है, जो कि हमारे भीतर उपस्थित होता है। बाहरी अनुभव भीतर की उपस्थितियों के ही प्रक्षेपण हैं। यह कारण है कि इस एक ही जगत से भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न जगतों में रहने में समर्थ हो जाते हैं।  इस एक ही जगत में उतने ही जगत हैं जितने कि व्यक्ति हैं। और किसे किस जगत में रहना है, यह स्वयं उसके सिवाय और किसी पर निर्भर नहीं। हम स्वयं ही उस जगत को बनाते हैं, जिसमें हमें रहना है। हम स्वयं ही अपने स्वर्ग या अपने नर्क हैं।  अंधकार या आलोक जिससे भी जीवन पथ पर साक्षात होता है, उसका उदगम कहीं बाहर नहीं, वरन हमारे भीतर होता है। क्या कभी अपने सोचा है कि सूर्य अंधकार से परिचित नहीं है? उसकी अभी तक अंधकार से भेंट ही नहीं हो सकी है?  जेम्स लावेल ने कहा हैः ‘सत्य को हमेशा सूली पर लटकाए जाते देखा और असत्य को हमेशा सिंहासन पाते! मैं कहता हूं कि यह बात तो सत्य है, किंतु आधी सत्य है, क्योंकि सत्य सूली पर लटका हुआ भी सिंहासन पर होता है और असत्य सिंहासन पर बैठकर भी सूली पर ही लटका रहता है।  सत्य विश्वास नहीं है। सब विश्वास अंधे होते हैं और सत्य तो आत्म चक्षु है। वह विश्वास नहीं, विवेक है। और विवेक के जन्म के लिए समस्त विश्वासों की जंजीरें तोड़ देनी होती हैं, क्योंकि जिसे सत्य को जानना है उसे सत्य को मानने का अवकाश ही नहीं है। क्या कोई अंधा अंधा रहकर भी प्रकाश को देखने में समर्थ हो सकता है और क्या कोई तट पर जंजीरों से बंधा हुआ जहाज भी सागर की यात्रा कर सकता है?  सत्य सिद्धांत नहीं, अनुभूति है। इससे शास्त्र में नहीं, स्वयं में ही उसे खोजना है। शब्दों से हुआ उसका ज्ञान तो अक्सर अज्ञान से भी घतक है। क्योंकि अज्ञान में एक पीड़ा है और उसके ऊपर उठने की आकांक्षा है, लेकिन तथाकथित थोथा शास्त्रीय ज्ञान तो उल्टे अहंकार की दृष्टि बन जाता है, अहंकार अज्ञान से भी घातक है वस्तुतः तो ज्ञान का अहंकार, अज्ञान का ही अत्यंत घनीभूत रूप है- इतना घनीभूत कि वह फिर अज्ञान ही प्रतीत नहीं होता है।  सत्य शक्ति है। असत्य अशक्ति इसलिए असत्य को चलने के लिए सत्य के ही पैर उधार लेने होते हैं। सत्य के सहारे के बिना यह एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। फिर भी हम ऐसे पागल हैं कि उसका ही सहारा खोजते हैं जो कि स्वयं ही सहारे की खोज में है। क्या भिखारी से भीख मांगने जैसा ही यह उपक्रम नहीं है?  जीवन में दो ही चीजें पाने जैसी हैं। सत्य और प्रेम, लेकिन जो सत्य को पा लेता है, वह अनजाने ही प्रेम में प्रतिष्ठित हो जाता है और जिसका प्रवेश प्रेम के मंदिर में हो जाता है वह पाता है कि वह सत्य के समक्ष खड़ा हुआ है। प्रेम सत्य का प्रकाश और सत्य है प्रेम की यात्रा की पूर्णता। लेकिन यदि सत्य का साधक स्वयं में प्रेम को विकसित होता हुआ न पावे, तो जानना चाहिए कि वह किसी भ्रांत मार्ग पर है और ऐसे ही प्रेम की साधना में ज्ञात हो कि सत्य निकट नहीं आ रहा है तो निश्चित है कि प्रेम के नाम से किसी भांति की मूर्च्छा और मादकता ही साधी जा रही है। सत्य के पथ पर प्रेम कसौटी है और प्रेम पथ पर सत्य परीक्षा है।  क्या आपको ज्ञात है कि हीरा मूलतः कोयला ही है! कोयले में ही हीरा छिपा होता है? ऐसे ही स्वयं हम में ही सत्य भी छिपा हुआ है।  सत्य ही एकमात्र धर्म है। और अधार्मिक वह नहीं है, जो कि तथाकथित धर्मों के विरोध में खड़ा है, क्योंकि अक्सर तो वही सत्य के अधिक निकट होता है। अधार्मिक तो वह है जो कि सत्य के विरोध में खड़ा होता है और तब बहुत से धार्मिक अधार्मिक ही हैं। सत्य स्वयं ही धर्म है, इसीलिए सत्य का कोई भी धर्म नहीं है। सत्य का कोई संप्रदाय नहीं है, नहीं हो सकता है। संप्रदाय तो सब स्वार्थ के हैं। सत्य का कोई संगठन नहीं है क्योंकि सत्य तो स्वयं ही शक्ति है और उसे संगठन की कोई आवश्यकता नहीं हो सकती है।  सत्य की कोई शिक्षा नहीं होती है। प्रेम की भी नहीं होती। सिखाया गया प्रेम क्या होगा! सिखाया हुआ सत्य नहीं होता है।  सत्य एक ही है। इसलिए जहां विचार है, वहां सत्य नहीं होगा, क्योंकि विचार अनेक हैं। विचारों को छोड़कर जब चित्त निर्विचार होता है, तभी सत्य की अनुभूति होती है। सत्य साक्षात का द्वार विचार नहीं, निर्विचार समाधि है।

ओशो रजनीश 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...