सोमवार, 10 जुलाई 2023

राधा कृष्ण

 राधा कृष्ण एक हिंदू देवी-देवता हैं। कृष्ण को  अक्सर स्वयं भगवान के रूप में सन्दर्भित किया गया है और राधा एक युवा नारी हैं, एक गोपी जो कृष्ण की सर्वोच्च प्रेयसी हैं। कृष्ण के साथ, राधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से कृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह माना जाता है कि कृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन राधा उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी देवी में सर्वोच्च देवी हैं।

 भगवान के ऐसे रूप की पूजा  काफी पहले  से की जाती थी। परन्तु सन् बारहवीं शताब्दी में जयदेव गोस्वामी ने प्रसिद्ध गीत गोविन्द लिखा, तो दिव्य कृष्ण और उनकी भक्त राधा के बीच के आध्यात्मिक प्रेम सम्बन्ध को सम्पूर्ण भारतवर्ष में पूजा जाने लगा।  यह माना जाता है कि कृष्ण ने राधा को खोजने के लिए रास नृत्य के चक्र को छोड़ दिया था।  राधा के नाम और पहचान को भागवत पुराण में इस घटना का वर्णन करने वाले छंद में गुप्त भी रखा गया है और उजागर भी किया गया है। यह भी माना जाता है कि राधा मात्र एक चरवाहे की कन्या नहीं हैं, बल्कि सभी गोपियों या उन दिव्य व्यक्तित्वों का मूल हैं जो रास नृत्य में भाग लेती हैं।

राधाकृष्ण को दो भागों में तोड़ा जा सकता है - कृष्ण, विष्णु के आठवें अवतार और उनकी सहचरी राधा। वृन्दावन में कृष्ण को कभी-कभी बाएं तरफ खड़ी राधा के साथ चित्रित किया जाता है। 

शक्ति और शक्तिमान की आम व्युत्पत्ति अर्थात भगवान में स्त्री और पुरुष सिद्धांत का अर्थ है कि शक्ति और शक्तिमान एक ही हैं। हर देवता की अपनी साथी जो उनकी 'अर्धांगिनी' या शक्ति होती है और उस शक्ति के बिना उन्हें कभी-कभी अपरिहार्य शक्ति रहित माना जाता है। हिन्दू धर्म में यह असामान्य बात नहीं है कि जब किसी एक व्यक्तित्व के बजाय एक जोड़ी की पूजा से भगवान की पूजा की जाती है, राधा कृष्ण की पूजा ऐसी ही है। वह परंपरा जिसमें कृष्ण की पूजा स्वयं भगवान के रूप में की जाती है और उनकी राधा को सर्वोच्च के रूप में पूजा जाता है। इस विचार को स्वीकार किया जाता है कि राधा और कृष्ण का संगम, शक्ति के साथ शक्तिमान के संगम को इंगित करता है। 

 दैवीय स्त्री  शक्ति के एक दिव्य स्रोत को प्रतिबिंबित करती है। जैसे "सीता राम से संबंधित हैं, लक्ष्मी नारायण की सहचरी हैं, उसी तरह राधा कृष्ण की सहचरी हैं।" चूंकि कृष्ण को ईश्वर के सभी रूपों का स्रोत माना जाता है, श्री राधा, उनकी सहचरी सभी शक्तियों का मूल स्रोत हैं अथवा दैवीय ऊर्जा का स्त्री रूप हैं।









बुधवार, 21 जून 2023

बाली

रामायण का बाली

बाल्मीकि के बाली के चरित्र में आत्मस्थापन की प्रवृत्ति सशक्त रूप मे सक्रिय दिखलायी देती है । बडा भाई होने के कारण वह उत्कट रूप में अधिकार प्रिय (Possessive) एक आत्म-सम्मान के प्रति अत्यंत जागरुक है। अपनी शक्ति के प्रति वह किसी की चुनौती बिलकुल सहन नही कर सकता |

मायावी की चुनौती पाकर वह स्थिर न रह सका, सुग्रीव द्वारा राज्य स्वीकार कर लिए जाने की घटना को भी उसने अपने अधिकार के लिए चुनौती समझा और वह सुग्रीव के इस हस्तक्षेप को सहन नहीं कर सका । उसने सुग्रीव को राज्य से बाहर खदेड कर ही दम लिया । राम की प्रेरणा से सुग्रीव द्वारा चुनौती दी जाने पर यह समझते हुए भी कि उस चुनौनी के पीछे कोई रहस्य है, ' वह युद्ध से विरत न रह सका।

बाली के चरित्र का यह दर्प उसके तेजस्वी व्यक्तित्व का एक पक्ष मात्र है, वैसे दूसरा पक्ष अत्यन्त कोमल है। वह अत्यन्त स्नेहशील पिता है । मरते समय उसे अपने पराभव का कोई खेद नही होता, कपट पूर्ण व्यवहार के लिए वह राम को दुत्कारता है, किन्तु अपने पुत्र की भावी दशा का विचार कर वह आत्म-समर्पण कर देता है। अहंकार की उत्तेजना में वह राम के प्रति कटु शब्दों का प्रयोग कर जाता है, किन्तु अपने असहाय पुत्र का विचार कर वह राम से अत्यन्त विनम्र होकर व्यवहार करने लगता है ओर अपने पुत्र को वह अवसर के अनुसार परामर्श दे जाता है। जिससे उसे सुग्रीव के हाथों अपमान न सहना पडे । मरते समय वह सुप्रीव के प्रति प्रेम प्रदर्शित करता है उनके मूल में भी अगंद के हित की चिन्ता निहित है । सुग्रीव के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए वह उसे अगंद के सरंक्षण  की याचना करता है । इससे उसकी दूरदर्शिता भी प्रकट होती है जो उसको वात्सल्य की ही परिणति है ।

कुल मिल कर यह कहा जा सकता है कि रामायण मे बाली के व्यक्तित्व मे आत्मस्थापन पर वात्सल्य का पूर्व सामंजस्य है ।

मानस का बाली

रामायण के समान मानस मे भी बाली के चरित्र की घुरी है दर्प, जो अंहकार का ही एक रूप है | दर्फ के कारण ही वह अपने पौरुष के समक्ष किसी की चुनौती  अथवा अपने अधिकार में किसी प्रकार का हस्तक्षेप पसन्द नहीं करता। मायावी की ललकार को दर्प  के कारण हो सहन नहीं कर सका और सुग्रीव के राजा बन जाने की बात से भी दर्प के कारण हो अप्रसन्न हो गया, अन्यथा सुग्रीव के साथ उसका सम्बन्ध बहुत स्नेहिल थि इस बात को स्वयं सुग्रीव स्वीकार करता है।

मरते समय भी वह अपने पूरे दर्प के साथ राम के द्वारा अपने वध के औचित्य से सबन्ध में प्रश्न करता है।

तुलसीदास ने भक्ति के प्रवेश मे उसके मुख से राम के लिए 'नाथ' गुसाई आदि शब्द का प्रयोग करवाकर उसके दर्प का रंग कुछ हल्का कर दिया है। वाल्मिकी ने इस अवसर पर बालि द्वारा कठोर शब्दों का प्रयोग करवाकर उसके चरित्र को इस विशेषता का निर्वाह किया है । बाली के आत्मसमर्पण के साथ उसके दर्प को भी उन्होने बडा मनोवैज्ञानिक रूप प्रदान किया है। बालि अपने पुत्र अंगद की रक्षा के प्रति चितित होकर वात्सल्य की प्रेरणा से दर्पं का त्याग करता है, किन्तु मानस मे राम के ईश्वर के परिज्ञान को उनके दर्प-स्याग का कारण बतलाया गया है ।

इस प्रकार तुलसीदास ने बालि के चरित्र को मनोविज्ञान से अध्यात्म की ओर मोड़ दिया है ।




मंगलवार, 20 जून 2023

दशरथ

 वाल्मीकि के दशरथ

 वाल्मीकि रामायण मे दशरथ का जो चरित्र प्रत्यक्षीकृत होता है, वह बहुत गौरवशाली नहीं है। विश्वामित्र द्वारा राम की मांग किये जाने पर वात्सल्य की प्रबलता के कारण राम को उनके साथ न भेज कर स्वयं चलने की इच्छा व्यक्त करते हैं, किन्तु विश्वामित्र के मुख से यह सुनकर कि रावण प्रेरित मारीच और सुबाहू के विरुद्ध संघर्ष करना है, वे तुरन्त कह उठते हे — 'मैं रावण के समक्ष युद्ध मे नही ठहर सकता । आप मुझ पर तथा मेरे पुत्रों पर कृपा कीजिये ।" यह चित्र दशरथ की तेजस्विता नहीं, उनकी भीरुता और दीनता का है ।

बाल्मीकि ने दशरथ को जिस रूप मे प्रस्तुत किया है उसमें उनकी कान्ति निखरी हुई नहीं दिखलायी देती-उसमे उसका पौरुप और पराक्रम दृष्टिगोचर नहीं होता । दशरथ का जो चित्र वहाँ दिखलायी देता है वह एक ऐसे कूटनीतिपरायण व्यक्ति का चित्र है जो अपनी चतुराई का शिकार स्वयं बन जाता है । दशरथ ने कैकेयी के पिता को वचन दिया था कि कैकयी पुत्र उनका उत्तराधिकारी होगा ।

किन्तु कालान्तर मे राम के प्रति प्रेमाधिक्य तथा ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार की परम्परा के कारण वे राम को उस समय युवराज बनाना चाहते है जब भरत अपने ननिहाल गए हुए होते है । वे भरत के लौटने से पहले ही राम का अभिषेक कर देना चाहते हैं । 

वे ऐसी उतावली और शंकित चित्त से इस अभिषेक के कार्य में प्रवृत्त हुए कि मानो किसी अमंगल की छाया उन पर पडी हो, भावी अनर्थ के पूर्वाभास ने मानो अलक्षित भाव से उनके मन पर अधिकार कर लिया हो और किसी अशुभ ग्रह के फल से मानो वे स्वयं रामचन्द्र के अभिषेक के समय अचिंतनीय-पूर्व दिघ्नो को आशक्त द्वारा खीच लाए हो । 

भरत के आने और अपने सम्बधीयों के बुलाने पर, इस कार्य मे प्रवृत्त होने से इस प्रकार के अनर्थ की सभावना नहीं थी, क्योकि भरत के उपस्थित रहने पर कैकेयी का षड्यंत्र व्यर्थ जाता। यह भी दशरथ के हृदय की भीरुता--आत्म-विश्वास और आत्मबल को शून्यता के ही दर्शन होते हैं ।


फिर भी उनके चरित्र का आकर्षण वात्सल्य की अतिशयता और लोक-मर्यादा की रक्षा के कारण अक्षुण्ण रह सका है। जब उन दोनो प्रवृत्तियाँ एक दूसरे के विरोध में उपस्थित हुई तो दशरथ ने अपने प्राण देकर दोनो की एक साथ रक्षा की। रामायण मे दशरथ का आचरण यत्र तत्र  आत्म सम्मान शून्य जान पडता है। रूठी कैकेयी को मनाने का प्रयत्न करते समय वे उसके पैरों पड़ने तक की बात कह जाते हैं।किन्तु उसका कारण आत्म सम्मान की भावना का अभाव नही है। वात्सल्य की प्रबल प्रेरणा के साथ-साथ उनका स्त्रैण स्वभाव उन्हें उस सीमा तक खिच ले जाता है ।

रामायण में उनकी स्त्रैण के अनेक प्रमाण मिलते हैं। भरत  ननिहाल से  लौटने पर कहते हैं कि राजा कैकेयी के प्रासाद मे होंगे क्योकि वे बहुधा वहीं रहने है । स्वय वाल्मीकि ने लिखा है कि वृद्ध राजा तरूणी पत्नी को प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे । कदाचित् स्त्रेणता के कारण ही उन्होने कैकेयी के पिता को वचन दिया था कि वे कैकेयी के पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाएँगे, परन्तु उनकी स्त्रैणता उनके वात्सल्य की तुलना में निर्बल सिद्ध होती है। राम के निर्वासन पूर्व जो कैकेयी राजा को प्राणाधिक प्रिय थी वही उनके निर्वासन के उपरान्त त्याज्य हो जाती है । 

उनके व्यक्तित्व का यह रूप उनके चरित्र की सारी दुर्बलताओं को ढक लेता हैं ।और इसलिए उस ओर सामान्यतया पाठक का ध्यान नहीं जा पाता ।


तुलसी दास के दशरथ


तुलसीदास जी ने दशरथ की अन्तर्वृतियों का संयोजन कुछ ऐसे ढंग से किया है कि उनका चरित्र वाल्मीकि रामायण के दशरथ की तुलना में बहुत निखरा है । यद्यपि वाल्मीकि रामायण और मानस, दोनो मे हो दशरथ के चरित्र कि केन्द्रीय वृत्ति है उनका वात्सल्य, फिर भी इतर वृत्तियो और विशेषनामों में हेर-फेर के साथ तुलसीदास जी ने मानस के दशरथ का वात्सल्य भी नूतन रूप में चिह्नित किया है ।

वाल्मीकि के दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को इतना अधिक प्यार करते दिखलाई देते हैं कि उसके कारण उनका आचरण पक्षपात और कपट की सीमा तक पहुंच गया है। भरत के लौटने से पहले पहले वे चुपके से राम को युवराज बनाना चाहते हैं | 

वात्सल्य से उद्भुत उनका कपटपूर्ण आचरण ही उनके संकट का कारण बन जाता है । कैकेयी के दुराग्रह को देखकर अपने वचन की रक्षा के लिए राम को निर्वासन का आदेश तो दे देते हैं, किन्तु इसके साथ होने वास्तविक इच्छा भी प्रकट कर देते हैं- 'मुझे बलपूर्व बन्दी बना कर राजा बन जायो ।" दशरथ की इस उक्ति से यह स्पष्ट हो जाता है कि दशरथ का यह आदेश  कहने भर के लिए था, उनका अंतर्मन उस आदेश का साथ नहीं दे रहा था । तुलसीदास ने राजा दशरथ के चरित्र को इस असंतुलन से बचाया है। इसके लिए उन्होंने राम को युवराज बनाने का निर्णय किसी दुरभिसधि के रूप मे न कराकर सार्वजनिक रूप से करवाया है। वे सबको सहमति से ही इस सबंध में निर्णय करते हैं।

 इसके साथ ही उन्होंने राजा दशरथ और राम की गुप्त बातचीत आदि का कोई लेख नहीं किया है। राम को युवराज बनाने के निर्णय की सूचना भी उन्होंने राजा दशरथ से न दिलवाकर वसिष्ठ मुनि से दिलवाई। कवि की इस सावधानी के कारण 'मानस' के दशरथ पक्षपात और कपट व्यवहार के लाछंन से बच गए हैं ।

यह सब होते हुए भी कवि ने दशरथ के वात्सल्य मे किसी प्रकार की कमी नही आने दी है। विश्वामित्र द्वारा राम की याचना की जाने पर उन्हें देने में दशरथ की हिचकिचाहट दिखाकर तो कवि ने उनके वात्सल्य की अभिव्यक्ति  ही की है, किन्तु उससे भी अधिक सूक्ष्म रूप से उनके वात्सल्य की व्यजना उस अवसर पर दिखलाई देती है जब राजा जनक के दूत उनके पास धनुष भंग की सूचना लेखर पधारते हैं । उस समय राजा दशरथ उनके साथ जो व्यवहार करते हैं उससे उनका वात्सल्य प्रकट होता है।

दूतों को 'भैया' कर सम्बोधन करना और निकट बिठाना वात्सल्य का ही परिणाम है। मनोविज्ञान के अनुसार संतान या बालक से संबन्धित व्यक्तियों ओर वस्तु तक वात्सल्य का विस्तार होता है ।

इसके उपरात उनका वात्सल्य तभी प्रकट होता है जब कैकेयी द्वारा आघात पहुचाया जाता है । यहाँ उनकी सिद्धांतवादिता उनके वास्यल्य की प्रतिरोधक बनकर पाई है। सिद्धातवादिता के कारण उसके वचन के समक्ष झुकना पडता है और वे राम के निर्वासन के लिए बाध्य हो जाते हैं, किन्तु अपनी इस विवशता कारण उन्हें जो प्राणघातक पीड़ा होती है । यह उनके वात्सल्य को सर्वोपरि सिद्ध करती है । राम के वन मे चले जाने पर ये उनके वियोग की पीड़ा से तडप तडप कर प्राण दे देते हैं-

उनके चरित्रम वात्सल्य से दूसरा स्थान काम-प्रवृत्ति का दिखलाई  देता है । यो कहने को तो दशरथ एकाध स्थान पर अपने प्रेम (काम) को वात्सल्य से भी अधिक महत्त्व दे गए हैं।

  जैसे ही कैकेयी उनसे यह वरदान मांगती है कि राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास दिया जाए वैसे हो उनका मुख विवर्ण हो जाता है और वे उसे थोड़ी देर समझाने के बाद फटकारने लग जाते है। इससे पता चलता है कि राजा दशरथ के चरित्र मे काम का स्थान वात्सल्य के बाद है ।

काम का स्थान दूसरा होने पर भी उनके चरित्र में उसका रूप बड़ उग्र है ।  महाराज दशरथ कैकेयी के कोप भवन मे आते समय कांप जाते हैं। 

काम की प्रबलता के कारण ही वे कामियों के समान बढ़ चढ़ कर बातें करने लगते हैं ।

फिर भी मानस के दशरथ वाल्मीकि के दशरथ के समान कामी प्रतीत नही होते। काम की प्रधानता के कारण उन्होंने कैकेयी को कोई ऐसा वचन दिया हो कि वे उसी के पुत्र को राजा बनाएंगे- ऐसा कोई उल्लेख मानस में नहीं है जबकि वाल्मीकि में यह बात स्पष्ट रूप से उल्लिखित है ।


इसी प्रकार तुलसीदासजी ने राजा दशरथ की भीरुत को उनके चरित्र से निकाल दिया है। वाल्मीकि रामायण मे दशरथ विश्वामित्र के मुख से राम की बात सुन कर उन्हें राम न देकर उनके स्थान पर स्वयं चलने की इच्छा प्रकट करते हैं किन्तु जैसे ही उन्हें यह पता चलता है कि रावण के भेजे राक्षसों का सामना करना है वे इस सबंध में तुरत अपनी असमर्थता प्रकट कर देते हैं। राम के विवाहोपरात अयोध्या लौटते समय मार्ग में क्रुद्ध परशुराम को देखकर भी भय से व्याकुल हो जाते हैं। तुलसीदास इन दोनो परिस्थितियों को टाल गए हैं । विश्वामित्र प्रसंग मे वसिष्ठ को बीच में लाकर उन्होंने इस स्थिति को बचा लिया है और परशुराम को विवाह से पहले ही मिथिला में ला कर राजा दशरथ की अनुपस्थिति दिखा दी है।

 इस प्रकार उन्होंने राजा दशरथ के चरित्र को उज्ज्वल बनाने का पूरा प्रयत्न किया है और उसमें वे पूरी सफल रहे हैं।




गुरुवार, 8 जून 2023

चित्रांगदा

 शरद व्यतीत हो चला था। उत्तर के हिमशिखरों का स्पर्श लिए आती सन्ध्या की बयार मादक होने लगी थी। इस मादक बयार ने उसके मन पर अद्भुत प्रभाव डाला था। शृंगार के छंद मानो समीर से प्रतिस्पर्धा करते हुए रावण के मुख से बहते चले आ रहे थे। उसके अतःकरण के किसी कोने में बहुत दिनों से दुबका कवि पुनः जागृत हो गया था।

अभी कुछ समय पूर्व ही वह गंधर्वराज के साथ यहाँ पहुँचा था। उनके आगमन की कोई पूर्व-सूचना तो थी नहीं, अतः द्वार पर प्रतिहारियों के अतिरिक्त कोई उपस्थित नहीं था। गंधर्वराज ने रावण से अंतःपुर चलने का आग्रह भी किया, किन्तु रावण के मन को तो सामने ही दूर तक फैले सुवासित उपवन ने मंत्रमुग्ध कर लिया था। वह गंधर्वराज के आग्रह को टालते हुए उपवन की ओर बढ़ गया, और गंधर्वराज, महारानी से भेंट करने अंतःपुर की ओर चले गये। उपवन की प्राड्डतिक सुषमा ने उसे इतना अभिभूत कर लिया था कि उसे समय और स्थान का भान ही नहीं रहा था| इस सुषमा की स्तुति करते छंद उसके मुख से स्वतः प्रवाहित होने लगे थे।

अचानक उसे प्रतीत हुआ मानो पवन ने प्रड्डति के सितार के तारों को छेड़ दिया हो। वह विमुग्ध सा उस स्वर को सुनने का प्रयास करने लगा।

“पुरुष - श्रेष्ठ ! राजकुमारी चित्रांगदा ने तुमसे कुछ प्रश्न किया हैं । "

“क्षमा करें राजकुमारी !” रावण को चेत हुआ। वह स्वर सितार का नहीं था, एक सर्वांग सुन्दरी कन्या उसके सम्मुख खड़ी उससे ही सम्बोधित थी। 

वह बोला- “रावण, प्रड्डति की वीणा की स्वरलहरी में डूब-उतरा रहा था, इस कारण आपका प्रश्न सुन नहीं पाया, पुनः क्षमाप्रार्थी है।” “पुरुष! तुम्हारे व्यक्तित्व की कांति कह रही है कि तुम किसी उच्च कुल से हो; किन्तु तुम रक्षेन्द्र रावण हो, यह मैं कैसे मान लूँ? उनकी यहाँ उपस्थिति की कोई संभावना नहीं है। सत्य कहो कि तुम यह आडम्बर क्यों कर रहे हो, अन्यथा दंड के भागी बनोगे। "

" नहीं कुमारी, रावण मिथ्या भाषण नहीं करता। वह गंधर्वराज के साथ कुछ काल पूर्व ही आपके इस मनोरम प्रदेश में उपस्थित हुआ है, और गंधर्वराज के समान ही आपके भी अनुग्रह का आकांक्षी हैं।"

“क्या पिता आ गये? किन्तु वे तुम्हारे साथ क्यों नहीं हैं? यदि तुम उनके साथ आये हो तो उन्हें भी तो तुम्हारे साथ ही होना चाहिए था |” राजकुमारी, विश्वास-अविश्वास के भँवर में फँसी थी; उसने अनिश्चित सा प्रश्न किया।

" गंधर्वराज, महारानी की सेवा में कुछ निवेदन करने गये हैं; रावण को उपवन की सुषमा ने विमोहित कर लिया था, अतः वह यहाँ विहार करने लगा | "

"सत्य कह रहे हैं आप?" अभी तक चित्रांगदा के स्वर में विस्मय और किसी अजनबी के दुस्साहस के लिए शेष था, किन्तु अब उसके स्वर में अनायास ही सम्मान का भाव आ गया था। “ मिथ्या भाषण का कोई कारण नहीं है कुमारी; और रावण ने पहले ही कहा कि वह मिथ्या भाषण नहीं करता।" राजकुमारी की कलरव करती सखियाँ रावण को देखकर अचंभित थीं, विमोहित भी थीं। उनका कलख मौन हो गया था। वे चित्रलिखित सी रावण के चुम्बकीय व्यक्तित्व को ताक रही थीं। कुछ ऐसी ही स्थिति वित्रांगदा की भी थी। वह भी मौन हो गयी थी। अचानक अपने रेशमी उत्तरीय से खेलती, पैर के अंगूठे से भूमि कुरेदती, चित्रांगदा मुस्कुरा पड़ी। रावण की दृष्टि तो पराग से लिपटे भँवरे की भाँति उसके चेहरे पर टिकी ही थी। उसने यह स्मित लक्ष्य की, और पूछ बैठा-

"क्या हुआ कुमारी, यह अधरों पर अकस्मात स्मित, नर्तन क्यों कर उठी? क्या रावण का उपहास करने का प्रयास कर रही हैं?" "नहीं नहीं रक्षेद्र ! ऐसा कुछ नहीं है।” चित्रांगदा की सलज्ज दृष्टि आतुरता से ऊपर उठी ।

"तब क्या है?"

"सत्य कह दूँ?” अब चित्रांगदा कुछ नाटकीय हो गयी। "निस्संदेहा

"मैं रक्षेद्र के विषय में विशेष कुछ नहीं जानती थी, मात्र नाम का आख्यान सुनती थी; इस अल्पज्ञान में मैंने रक्षेन्द्र की जो छवि बनाई थी, वह थी किसी अधेड़, प्रलम्ब दाढ़ी वाले क्रोधी पुरुष की, किन्तु प्रत्यक्ष में तो रक्षेन्द्र उस छवि से पूर्णत: विपरीत हैं।”

 “प्रत्यक्ष में रक्षेन्द्र कैसे हैं? उससे भी कुरूप?" रावण ने सहास प्रश्न किया तो चित्रांगदा जैसे कुछ व्याकुल हो उठी- “क्या कहते हैं!” फिर एकाएक उसके चेहरे पर लाली दौड़ गयी, नेत्र झुक गये।

बोली-

"प्रत्यक्ष तो रक्षेन्द्र की छवि ऐसी है कि किसी के भी चित्त का हरण कर ले; नयनों में जैसे पुष्पशर बाण-संधान को आतुर बैठा हैं, और वाणी ... कोई उपमा ही नहीं सूझती। अभी आप जब कुछ गा रहे थे, तो जैसे हम सब सम्मोहित हो गये थे।” "सच देवी! आपको रक्षेन्द्र की छवि और उसके गायन ने आकर्षित किया?" रावण ने उत्साह से प्रश्न किया। यह जानकर कि सामने वाला पक्ष भी उससे प्रभावित है, उसका हृदय धड़क उठा था।

तभी गंधर्वराज ने व्यवधान दिया।

" पौलस्त्य ! यह मेरी पुत्री हैं, चित्रांगदा !”

"परिचय हुआ गंधर्वराज; अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी है आपकी पुत्री | " रावण कह ही गया। "इस दैहिक सौन्दर्य के साथ-साथ संगीत, नृत्य और कला में प्रवीणता तो हम गंधर्वों को प्रड्डति मुक्त हस्त देती ही है; मेरी पुत्री गंधर्वलोक में भी इन समस्त कलाओं में सर्वाधिक प्रवीण है।" “पिता! रक्षेन्द्र तो गायन में मुझसे भी अधिक प्रवीण हैं; अभी ये अपने में खोये कुछ गा रहे थे, हम सबका चित्त हर लिया इनके गायन ने "

“चित्रांगदे! सृष्टि में ऐसी कोई कला नहीं हैं, जिसमें तुम्हारे रक्षेन्द्र निष्णात न हों, ये तो पूर्ण-पुरुष हैं"

रावण ने संकोच का उपक्रम किया- “एक कला है गन्धर्वराज, जिसमें रावण निष्णात नहीं है; वह कामिनियों के काम-कटाक्ष को जय नहीं कर पाता।" गन्धर्वराज खुलकर हँस पड़े। चित्रांगदा भी लज्जा से मुस्कुरा उठी। मुस्कुराते समय उसके गालों में पड़ने वाले गहरों में रावण का समस्त ज्ञान डूब गया।

***

रावण ने सोचा था कि कुछ दिन गंधर्वराज का आतिथ्य स्वीकार कर वह लौट आयेगा, और फिर आगे के अभियान पर निकल जायेगा, किंतु यहाँ चित्रांगदा के रसमय सान्निध्य और गन्धर्वराज के समर्पित सत्कार, दोनों ने मिलकर उसे ऐसा बाँधा कि वह अपना उद्देश्य ही भूल गया। यह तो कवि हृदय की चाहे विशेषता कहें चाहे दुर्बलता ... वह रस का तिरस्कार नहीं कर पाता। यूँ ही हास-विलास में रावण के दिन व्यतीत होने लगे। सारी भवताओं - व्याधियों से मुक्त वह इस समय सम्पूर्ण आनंद के सागर में गोते लगा रहा था । भारतभूमि पर स्त्रियों को निर्बाध उन्मुक्तता की अनुमति गन्धर्वलोक में ही प्राप्त थी; ऐसे में सर्वांग-सुन्दरी चित्रांगदा का मादक-मोहक सौन्दर्य, रावण जैसे रस- आखेटक हृदय को पूर्णतः विमोहित किए था। इस रस - विहार में कितने दिन व्यतीत हो गये, रावण के पास इसकी कोई गणना ही नहीं थी। ऐसे ही एक दिन-

रावण और गन्धर्वराज आमोद कक्ष में बैठे थे। रावण वीणा बजा रहा था, चित्रांगदा और उसकी सखियाँ सम्पूर्ण प्रवीणता से नृत्यरत थीं, जैसे आपस में होड़ लगी हो । महाराज और महारानी बैठे इस अद्भुत प्रस्तुति का आनंद ले रहे थे। रावण की वीणा में वह सम्मोहन था कि नृत्यरत पाँवों के लिए रुक पाना संभव ही नहीं था। स्वेदबिंदु नर्तकियों का शृंगार कर रहे थे। एकाएक रावण ने एक दीर्घ आरोह लेकर अपनी उँगलियों को विश्राम दे दिया। जैसे सम्मोहन टूटा हो... कुछ पल मौन व्याप्त रहा, फिर करतल ध्वनि के साथ-साथ "साधु-साधु!” का शोर गूंज उठा। चित्रांगदा और उसकी सखियाँ भी रावण के चारों ओर धीरे से बैठ गयीं। जब प्रशंसा का कोलाहल शांत हुआ तो गन्धर्वराज बोले-

"पौलस्त्य ! एक आग्रह है ... यदि स्वीकार करें..." "कहिये गन्धर्वराज! निश्शंक कहिये।"

"मेरी कन्या आपमें अनुरक्त हैं; इतने काल में आपने भी इसके गुणों का अवलोकन भलीभाँति  किया होगा... आप यदि इसका पाणिग्रहण स्वीकार करें, तो यह और यह गन्धर्वलोक सब अपना सौभाग्य समझेंगे।" चित्रांगदा, यह प्रस्ताव सुनकर भागी नहीं; वह रक्षेन्द्र के आनन पर विमुग्ध, उत्सुक और सलज्ज

दृष्टि गड़ाये देखती रही। वह कोई आर्य कन्या नहीं थी।

रावण के लिए भी तो यह मनवाहा प्रस्ताव था। चित्रांगदा सभी प्रकार से योग्य थी, सर्वांग-सुन्दरी होने के साथ ही सर्वगुण सम्पन्न भी थी। किन्तु इससे भी बड़ी बात थी कि उससे परिणय करने के उपहार स्वरूप रावण को देवलोक के निकट एक सबल, विश्वस्त सहयोगी प्राप्त हो रहा था।

ऐसे प्रस्ताव की अवहेलना संभव ही न थी । उत्सुक दृष्टियों को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी "यह तो रावण का सौभाग्य होगा गन्धर्वराज! चित्रांगदा जैसी सर्वगुण सम्पन्न सुलक्षणा कन्या को प्राप्त कर कौन पुरुष धन्य नहीं होना चाहेगा?" चित्रांगदा स्वयं को और न रोक सकी, हुलसकर रावण के अंक में समा गयी। रावण ने उसे एक भरपूर आगलगन दिया, फिर स्नेह से अलग करते हुए गंधर्वराज से बोला-

“अब तो आप रावण के ज्येष्ठ हो गये; रावण आपको प्रणाम करता हैं, जैसा आदेश आप देंगे,

रावण उसका निर्वाह करेगा । "

सर्वप्रथम शुभ मुहूर्त में गंधर्व विधि से दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया। और कई माह इसी प्रकार व्यतीत हो गये। एक दिन, बहुत काल बाद रावण जब समाधि में बैठा, तो उसे प्रतीत हुआ कि प्रभु शिव कह रहे हैं- 'वत्स! विलास में क्या अपना उद्देश्य ही भूल गये? क्या तुम इसी उन्मुक्त विहार हेतु निकले थे? क्या मंदोदरी के सम्मुख किया गया प्रण भूल गये ?

जब तक तुम अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करोगे, वेदवती को कैसे संतोष प्राप्त होगा ? " रावण को चेत हुआ।

बिना कोई विलंब किए उसने गन्धर्वराज से भेंट कर अपनी बात उनके सम्मुख रख दी। गन्धर्वराज ने भी उसके प्रस्ताव के महत्त्व को स्वीकार करते हुए कोई बाधा नहीं दीं। रावण ने उन्हें अपना ज्येष्ठ मानते हुए उनसे ही आगे सलाह की-

"यहाँ आप ही रावण के ज्येष्ठ हैं, आप ही एकमेव परामर्शदाता हैं, अतः आप ही मार्गदर्शन कीजिये कि अब रावण को किस दिशा में प्रस्थान करना उचित होगा?" "किञष्कधापति बालि तो पौलस्त्य के मित्र हो ही चुके हैं, दण्डकारण्य का सम्पूर्ण क्षेत्र भी अब आपके नियंत्रण में हैं; गन्धर्वदेश तो अब आपका ही है। अब इस भरतभूमि पर आर्यों के अतिरिक्त एक ही शक्ति है जो शेष हैं- हैद्रयराजा हैहयराज एकमेव ही इन्द्र को पराभूत करने की सामर्थ्य रखते हैं, अब उन पर ही विजय या मित्रता का उद्योग करना उचित होगा।"

"तो फिर यही निश्चित हुआ; रावण वैजयंतपुर पहुँचकर सीधे महिष्मती की ओर प्रस्थान करेगा।" "धैर्य से वत्स, धैर्य से... हैहयराज, रावण की ख्याति से भयभीत होने वाला नहीं हैं कि दौड़कर मित्रता स्वीकार कर ले।” आवेग में औपचारिकताओं के बंधन शिथिल हो जाते हैं। गंधर्वराज भी अभी तक रावण के प्रति औपचारिक सम्मान्य संबोधनों का प्रयोग करते आ रहे थे। इस समय  अचानक आवेग में वत्स निकल गया। तत्क्षण उन्हें इसका भाष हुआ। उन्होंने अपनी भूल सुधारी- "हैहयराज प्रबल प्रतापी है पौलस्त्य; वहाँ चतुरंगिणी सैन्य के साथ ही जाना उचित है; मेरा सम्पूर्ण सैन्य आपकी सेवा में सदैव प्रस्तुत है। "

"गंधर्वराज ! आप मुझे वत्स कहकर ही सम्बोधित करें, आपके मुख से वढी श्रेष्ठ प्रतीत होता है। आपके लिए रावण पुत्रवत् ही हैं। रही बात महिष्मती पर ससैन्य अभियान की, तो रावण को नहीं प्रतीत होता कि आपकी और लंका की सेना मिलाकर भी अभी हैहय की सेना के समकक्ष हो सकती है। यह अभियान तो रावण को एकाकी ही करना होगा। भविष्य में देवों के विरुद्ध अभियान तक लंका की सेना इतनी समृद्ध हो चुकी होगी कि ससैन्य अभियान किया जा सके।" काफी समझाने पर भी जब रावण नहीं माना, तो गंधर्वराज ने अंततः यह कार्य सुमाली पर ही छोड़ना उचित समझा। बोले-

“जैसा उचित समझो, किन्तु कोई भी निर्णय अपने मातामह से परामर्श लिए बिना मत लेना, मेरी

दृष्टि में उनसे श्रेष्ठ रणनीतिज्ञ, विष्णु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। "

विष्णु का नाम सुनकर रावण की भृकुटि तन गई, किन्तु वह कुछ बोला नहीं।

"तो अब आज्ञा दीजिये।" एक छोटे से मौन के बाद रावण बोला। "उचित है वत्स! तो फिर प्रातः ही अपने अभियान हेतु प्रस्थान करो। शुभास्ते पन्थानः सन्तु ! चित्रांगदा तुम्हारी धरोहर के रूप में यहीं पितृगृह में तुम्हारी प्रतीक्षा करेगी।”

सुमाली ने भी रावण को वही समझाने का प्रयास किया, जो गंधर्वराज ने किया था। गंधर्वलोक अपनी यात्रा का विवरण और चित्रांगदा से विवाह के विषय में बताकर जैसे ही उसने सुमाली कोअपना आगे का मन्तव्य बताया, सुमाली बोल पड़ा- “अति आत्मविश्वास भी घातक होता है पुत्र! कार्तवीर्य अन्यों के समान नहीं हैं, उससे पार पाना सहज नहीं है। उस पर भगवान दत्तात्रेय की अनुकम्पा है; उसमें असीमित बल ही नहीं हैं, उसका सैन्य भी असीमित हैं।"


"रावण उसके सैन्य से युद्ध करने नहीं जा रहा हैं; निरर्थक, सैनिकों का रक्त बहाने का कोई कारण नहीं हैं... रावण को अपनी स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करनी है, अतः वह एकल ही अभियान पर जाएगा। अर्जुन भी वीर हैं, वह भी निस्संदेह रावण से एकल ही युद्ध करेगा।” "मैंने माना कि रावण को अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी है, किन्तु अब रावण लंकेश्वर है; किसी अनाम द्वीप का कोई अनाम योद्धा नहीं। उसका एकाकी युद्ध अभियान पर निकलना उसकी गरिमा के अनुकूल कदापि नहीं हैं।"

" मातामह! एकल अभियान से गरिमा का किस प्रकार क्षरण होता है? ससैन्य अभियान तो वे करते हैं जिनकी स्वयं की भुजाओं में सामर्थ्य नहीं होती। आपके रावण की भुजायें तो त्रैलोक्य विजय करने की सामर्थ्य रखती हैं... और वह अभी भी तो एकाकी अभियान से वापस लौटा है। " “पुत्र, वह युद्ध अभियान कहाँ था ? अभी तो रावण मित्रों के संधान हेतु गया था । " "कहाँ ? बालि से तो रावण ने युद्ध की ही याचना की थी । "

" और उसी में रावण को पराजय का वरण करना पड़ा था। बालि एक वनचर था, एक सरल हृदय वानर योद्धा हैहयराज वैसा नहीं हैं। वह सम्राट है, कूटनीतिज्ञ हैं, आवश्यकता पड़ने पर उसे कपट से भी संकोच नहीं होगा। वह पराजित होने की स्थिति में मित्रता का चयन कदापि नहीं करेगा; वह तो लंकेश्वर का वध कर देगा, अथवा उसे कारागृह के अंधकूप में डाल देगा। वहाँ मैं अपने पुत्र को एकाकी कदापि नहीं जाने दे सकता|"

“किन्तु मातामह! महिष्मती पर ससैन्य अभियान से क्या प्राप्त होगा? रावण को अपनी सैनिक श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करनी हैं, उसे अपनी स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करनी हैं। फिर हम कितना सैन्य लेकर चल सकते हैं? हैहयराज का सैन्य लंका के सैन्य से निस्संदेह अधिक ही होगा । " "मैं सैन्य अभियान के लिए नहीं कह रहा, किन्तु मैं तुम्हें एकाकी भी नहीं जाने दे सकता; मैं और तुम्हारे मातुल अवश्य ही तुम्हारे साथ होंगे।"

"किन्त मातामद ...." “कोई किन्तु परंतु नहीं वत्स, यह अंतिम हैं। हाँ, यदि तुम्हें प्रतीत होता है कि अब तुम पूर्ण परिपक्व हो गये हो, और तुम्हारा मातामह अब वृद्ध हो गया है, उसकी बुद्ध अब काम नहीं करती, तो बताओ, मैं कोई भी अवरोध उपस्थित नहीं करूँगा; ऐसी स्थिति में तुम स्वतंत्र होगे; जैसा उचित समझो करने के लिए "

"कैसी बात करते हैं मातामह!" रावण के पास सुमाली के इस अस्त्र की कोई काट नहीं थी।

सुलभ अग्निहोत्री 

शुक्रवार, 2 जून 2023

 पत्नी सदा मार्ग की बाधा ही नहीं होती । वह सहयात्री है - मार्ग की सहायिका भी हो सकती है । सोच-समझकर ही सह-यात्री चुना जाए तो सहायक होता है, बिना सोचे-समझे चुना जाए तो स्थायी सिर-दर्द । सीता से उन्हें विघ्न की कोई आशंका नहीं है... तो क्या संतान सदा विघ्न स्वरूप ही होती है ?

राम का मन कहता है, संतान मार्ग की बाधा नहीं है, किंतु माता-पिता की पूर्व - व्यस्तता तथा अन्य लक्ष्य सिद्धता अवश्य संतान के मार्ग की बाधा हो जाती है ।" सिद्धाश्रम से मिथिला जाते हुए, मार्ग में पूछा गया ऋषि विश्वामित्र का प्रश्न बहुधा उनके सम्मुख आ खड़ा होता है, 'ऐसा क्यों है, राम ! कि अपना घर फूंके बिना व्यक्ति परमार्थ की राह पर चल ही नहीं सकता ?"

स्वार्थपरक सामाजिक व्यवस्था की इस द्वंद्वात्मकता को राम ने सदा मन में रखा है। इसमें परिवार तथा समाज का स्वार्थ प्रायः विरोधी है, एक के लिए दूसरे का त्याग करना पड़ता है। राम नहीं चाहते कि उनके द्वारा बृहत् सामाजिक दायित्व के पालन के कारण, उनके सगे होने का दंड उनकी संतान को मिले। वे नहीं चाहते कि उनकी संतान बड़ी होकर यह कहे कि उनका दुर्भाग्य यह है कि उनका पिता सामाजिक जीवन में ईमानदारी से मग्न है, या यह कि अपने जननायक पिता की ओर से सदा उन्हें उपेक्षा ही मिली है, या यह कि उनके पिता के पास सब के लिए समय है; केवल अपनी पत्नी और बच्चों के लिए नहीं है।

इसका क्या अर्थ - क्या राम समझते हैं कि जब जीवन में अन्य कोई कार्य नहीं रहेगा, जब वे सब ओर से अवकाश प्राप्त कर लेंगे, तो ही संतान की बात सोचेंगे ? क्या ऐसा समय भी आएगा ? जीवन में कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहता है। जब जीवन में इतना कुछ - परस्पर समान और विरोधी साथ-साथ चलता रहता है; तो संतान भी उसी वैविध्यपूर्ण जीवन का एक अंश बनकर क्यों नहीं चल सकती ! ... नहीं, राम जीवन के महत्त्वपूर्ण कामों से अवकाश प्राप्त कर, वृद्धावस्था में संतान को जन्म देने की बात नहीं सोचते । संतान के जन्म का भी उचित समय होता है, ताकि व्यक्ति ठीक समय से उनका पालन-पोषण कर उन्हें उनके अपने पैरों पर खड़ा कर दे।''हां, राम कुछ अधिक मानसिक अनुकूलता तथा परिस्थितियों की स्थिरता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विवाह के पश्चात् पांच-सात वर्ष संतान न हो तो कोई आसमान नहीं गिर पड़ेगा। यदि वे विवाह ही रुककर करते तो ? कई लोग पैंतीस चालीस वर्ष के वय में विवाह करते हैं। वे तो अभी कुल उनतीस वर्ष के हैं। वे संतान के लिए दो-चार वर्ष और प्रतीक्षा कर सकते हैं...

और फिर, संतान को इतना अधिक महत्त्व देने का भी क्या अर्थ कि जीवन के प्रत्येक धर्म से संतान अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाए । मनुष्य का जीवन स्वयं कर्म करने के लिए है अथवा वंश परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम मात्र ? राम का जीवन कर्म के लिए है ।'' बच्चे उन्हें भी अच्छे लगते हैं- वात्सल्य उनके मन में भी है,

 वे कितना चाहती हैं कि सामाजिक तथा प्रशासनिक कामों में राम का हाथ बंटाएं; पर अभी तक राम की व्यक्तिगत देखभाल के साथ स्त्रियों तथा बच्चों के कल्याण संबंधी कुछ हल्के कामों के अतिरिक्त वे कुछ नहीं कर पायी हैं। इस परिवार का ही नहीं, सारे समाज का ढांचा ही कुछ ऐसा है, कि नारी कहीं शोभा की वस्तु है, कहीं भोग की । कहीं वह अत्यन्त शोषित है, कहीं परजीवी । अमरबेल होकर रह गई है नारी; जो अपने पति के माध्यम से समाज का रस खींचती है। समाज से उसका सीधा कोई संबंध ही नहीं है । घर की व्यवस्था में तो फिर भी उसका स्थान है, सामाजिक उत्पादन में वह एकदम निष्प्रयोजन वस्तु है । निर्धन किसान की पत्नी उसके साथ खेत पर जाकर उसका हाथ बंटाती है, श्रमिक की पत्नी पति के साथ या स्वतंत्र रूप से श्रम करती है; किंतु धनी वर्ग की स्त्रियां मात्र जोंकें हैं। चूसने के लिए उन्हें रक्त चाहिए। उनकी सामाजिक उपयोगिता पूरी तरह शून्य है और उनकी आवश्यकताएं आसमान को छू रही हैं। उन्हें भड़कीले वस्त्र चाहिए, चमकीले आभूषण चाहिए; प्रसाधन के लिए चंदन कस्तूरी के छकड़े भी उनके लिए अपर्याप्त हैं; चर्बी चढ़ाने के लिए दुनिया भर का गरिष्ठ और स्वादिष्ट भोजन चाहिए.

इन निकम्मी, मोटी बुद्धि वाली, निरर्थक वस्तुओं को देखकर, सीता का खून जल उठता था। उनसे घड़ी आधा घड़ी बात कर सीता का दम घुटने लगता था । रानियां, मंत्राणियां, सामंत-पत्नियां, आचार्य-पत्नियां - सब ही पुराने पड़े व्यर्थ के कबाड़ - सी वस्तुएं थीं, जिनकी कोई सामाजिक उपयोगिता नहीं थी ।

पर सीता स्वयं भी सक्रिय होकर अभी तक कोई बहुत महत्त्वपूर्ण काम नहीं कर पायी थीं। इस प्राय - निष्क्रियता में सदा आशंकित रहती थीं कि कहीं वे भी सार्थक परिश्रम के अभाव में उसी चमकीले कबाड़ का अंग न बन जाएं। पिछले चार वर्षो में कितनी बार पति-पत्नी में इस विषय पर कहा सुनी हुई थी। साधारण बातचीत हुई थी, तर्क हुए थे, तनातनी और झगड़े भी हुए थे। पर अंत में दोनों ने यही पाया था कि यह रूढ़ व्यवस्था नारी-शून्य, पुरुष समाज से काम करने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थीं कि नारी को अपने मध्य पाते ही, जैसे उसे पीसने लगती थी । यह व्यवस्था नारी को उसका उचित मानवीय स्थान देने के लिए किंचित् भी इच्छुक नहीं थी । नारी को पुरुष की बराबरी का स्थान दिलाने के लिए लंबा और जोरदार संघर्ष अपेक्षित था ।

नरेंद्र कोहली के उपन्यास अभ्दूय से 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...