रविवार, 7 जुलाई 2024

 यदि हम छोटे शिशु की गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, तब हमें यह ज्ञात होता है कि वह बिना किसी स्पष्ट कारण के कभी प्रसन्न, कभी उदास और कभी भयभीत दिखाई देता है।  छोटा शिशु अपने पूर्वजन्म का स्मरण करता रहता है और इसी कारण समय-समय पर उसकी मनोदशा में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है तब उसके मन-मस्तिष्क मे वर्तमान जीवन के संस्कार पूरी तरह अंकित हो जाते हैं तथा जिसके परिणामस्वरूप उसके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया भी अत्यंत पीड़ादायक होती है जो हमारी पूर्वजन्म की स्मृतियों के ठोस अंशों को मिटा देती है।  

 नवजात शिशु को भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता। तब फिर कोई माँ जब अपने बालक के मुँह में अपना स्तन डाल कर उसे दूध पीना या स्तनपान करना कैसे सिखा सकती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नवजात शिशु ने अपने अनन्त पूर्व जन्मों में यहाँ तक कि पशु की योनी में स्तन, निप्पल और थन से अपनी असंख्य माताओं का दूध पिया होता है। इसलिए 

जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के आधार पर अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है।

 पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किए बिना मानव मात्र में भेद करना अनिवर्चनीय और तर्कहीनता है।  यदि कोई व्यक्ति जन्म से अंधा है तब वह व्यक्ति यह कहे कि उसे ऐसा दण्ड क्यों मिला तब इसका तर्कसंगत उत्तर क्या होना चाहिए? यदि हम कहते हैं कि ये सब उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम है तब वह यह तर्क देगा कि उसने केवल वर्तमान जीवन को देखा है और इस प्रकार से जन्म लेते समय उसके कोई पूर्वकर्म ही नहीं है जो उसे इस जन्म में बुरा फल देते। यदि हम कहते हैं कि यह भगवान की इच्छा थी तब यह भी अविश्वसनीय लगता है क्योंकि अकारण करुणा-करण भगवान जो सब पर बिना भेदभाव के करुणा करते हैं और वे कभी किसी को अनावश्यक रूप से अंधा नहीं बनाना चाहेंगे। इसकी तर्कसंगत व्याख्या यही है कि वह मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारणवश अंधा है। इस प्रकार सामान्य मत और धर्मग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर हमें पूर्वजन्म की अवधारणा को स्वीकार करना चाहिए।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

 यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बलशाली युद्ध करने वाले महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद जैसे अनेक शूरवीर धनुर्धर हैं। यहाँ पर इनके साथ धृष्टकेतु, चेकितान काशी के पराक्रमी राजा कांशिराज, पुरूजित, कुन्तीभोज और शैव्य सभी महान सेना नायक हैं। इनकी सेना में पराक्रमी युधमन्यु, शूरवीर, उत्तमौजा, सुभद्रा और द्रोपदी के पुत्र भी हैं जो सभी निश्चय ही महाशक्तिशाली योद्धा हैं।

अपने सम्मख संकट को मंडराते देखकर दुर्योधन को पाण्डवों द्वारा एकत्रित की गयी सेना वास्तविकता से अपेक्षाकृत अधिक विशाल प्रतीत होनी लगी। अपनी चिन्ता को व्यक्त करने के लिए दुर्योधन ने यह इंगित किया कि पाण्डव पक्ष की ओर से महारथी यानी ऐसे योद्धा जो अकेले ही साधारण दस हजार योद्धाओं के साथ युद्ध करने की सामर्थ्य रखते हों, युद्ध करने के लिए उपस्थित हैं। दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना के ऐसे असाधारण महापराक्रमी योद्धाओं का उल्लेख भी किया जो अर्जुन और भीम के समान बलशाली महान सेना नायक थे जिन्हें युद्ध में पराजित करना कठिन होगा।

Credit to Mukundanda 

 

श्रीमद्भागवत गीता भाग 4

 दुर्योधन ने कहाः पूज्य आचार्य! पाण्डु पुत्रों की विशाल सेना का अवलोकन करें, जिसे आपके द्वारा प्रशिक्षित बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने कुशलतापूर्वक युद्ध करने के लिए सुव्यवस्थित किया है।

दुर्योधन एक कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में अपने सेनापति गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अतीत में की गई भूल को इंगित करना चाहता था। द्रोणाचार्य का राजा द्रुपद के साथ किसी विषय पर राजनैतिक विवाद था। उस विवाद के कारण क्रोधित होकर द्रुपद ने प्रतिशोध की भावना से यज्ञ किया

और यह वरदान प्राप्त किया कि उसे ऐसे पुत्र की प्राप्ति होगी जो द्रोणाचार्य का वध करने में समर्थ होगा। इस वरदान के फलस्वरूप उसका धृष्टद्युम्न के नाम से पुत्र हुआ। यद्यपि द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्न के जन्म का रहस्य जानते थे किन्तु जब द्रुपद ने अपने पुत्र धृष्टद्युम्न को सैन्य कौशल की विद्या प्रदान करने के लिए द्रोणाचार्य को सौंपा तब उदारचित द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को सैन्य युद्ध कौशल की विद्या में निपुण बनाने में कोई संकोच और भेदभाव नही किया। अब धृष्टद्युम्न पाण्डवों के पक्ष से उनकी सेना के महानायक के रूप में उनकी सेना की व्यूह रचना कर रहा था। ऐसे में दुर्योधन अपने गुरु को यह अवगत कराना चाहता था कि अतीत में की गई उनकी भूल के कारण उसे वर्तमान में संकट का सामना करना पड़ रहा है और वह यह भी इंगित करना चाहता था कि उन्हें आगे पाण्डवों के साथ युद्ध करने में किसी प्रकार की उदारता नहीं दर्शानी चाहिए।

गुरुवार, 4 जुलाई 2024

गीता प्रथम अध्याय भाग 3

 संजय ने कहाः हे राजन्! पाण्डवों की सेना की व्यूहरचना का अवलोकन कर राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर इस प्रकार के शब्द कहे।

धृतराष्ट्र इस बात की पुष्टि करना चाहता था कि क्या उसके पुत्र अब भी युद्ध करने के उत्तरदायित्व का निर्वहन करेंगे? संजय धृतराष्ट्र के इस प्रश्न के तात्पर्य को समझ गया और उसने ऐसा कहकर कि पाण्डवों की सेना व्यूह रचना कर युद्ध करने को तैयार है, यह पुष्टि की कि युद्ध अवश्य होगा। फिर उसके पश्चात उसने वार्ता का विषय बदलते हुए यह बताया कि दुर्योधन क्या कर रहा था। 

धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन निर्दयी और दुष्ट प्रवृत्ति का था। धृतराष्ट्र के जन्म से अंधा होने के कारण व्यावहारिक रूप से हस्तिनापुर के शासन की बागडोर दुर्योधन के हाथों में थी। वह पाण्डवों के साथ अत्यधिक ईर्ष्या करता था और कठोरता से उनका दमन करना चाहता था ताकि वह हस्तिनापुर पर निर्विरोध शासन कर सके। उसने यह कल्पना की थी कि पाण्डव कभी भी इतनी विशाल सेना एकत्रित नही कर सकते जो उसकी सेना का सामना कर सके। किन्तु अपने आंकलन के विपरीत पाण्डवों की विशाल सेना को देखकर दुर्योधन व्याकुल और हतोत्साहित हो गया। 

ऐसे में दुर्योधन का अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाना यह दर्शाता है कि वह युद्ध के परिणाम के संबंध में भयभीत था। वह द्रोणाचार्य के प्रति अपना आदर प्रकट करने का ढोंग करते हुए, उनके पास गया किन्तु वास्तव में वह अपनी चिन्ता को कम करना चाहता था। 

 

गीता प्रथम अध्याय भाग 1

 धृतराष्ट्र ने कहाः हे संजय! कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर युद्ध करने की इच्छा से एकत्रित होने के पश्चात, मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?

राजा धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन होने के अतिरिक्त आध्यात्मिक ज्ञान से भी वंचित था। अपने पुत्रों के प्रति अथाह मोह के कारण वह सत्यपथ से च्युत हो गया था और पाण्डवों के न्यायोचित राज्याधिकार को हड़पना चाहता था। अपने भतीजों पाण्डव पुत्रों के प्रति उसने जो अन्याय किया था, उसका उसे भलीभांति बोध था। इसी अपराध बोध के कारण वह युद्ध के परिणाम के संबंध में चिन्तित था। इसलिए धृतराष्ट्र संजय से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि जहाँ युद्ध होने वाला था-की घटनाओं के संबंध में जानकारी ले रहा था।

इस श्लोक में धृतराष्ट्र ने संजय से यह प्रश्न पूछा कि उसके और पाण्डव पुत्रों ने युद्धभूमि में एकत्रित होने के पश्चात क्या किया? अब यह एकदम स्पष्ट था कि वे युद्धभूमि में केवल युद्ध करने के उद्देश्य के लिए एकत्रित हुए थे। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि वे युद्ध करेंगे। धृतराष्ट्र को ऐसा प्रश्न करने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि उन्होंने युद्धभूमि में क्या किया? 

गीता प्रथम अध्याय भाग 2

धृतराष्ट्र द्वारा 'धर्म क्षेत्रे', धर्मभूमि शब्द का प्रयोग करने से उसकी आशंका का पता चलता है।  धृतराष्ट्र आशंकित था कि कुरुक्षेत्र की पावन धर्म भूमि के प्रभाव के परिणामस्वरूप उसके पुत्रों में कहीं उचित और अनुचित में भेद करने का ऐसा विवेक जागृत न हो जाए कि वे यह सोचने लगें कि अपने स्वजन पाण्डवों का संहार करना अनुचित और धर्म विरूद्ध होगा और कहीं ऐसा विचार कर वे शांति के लिए समझौता करने को तैयार न हो जाएं। इस प्रकार की संभावित आशंकाओं के कारण धृतराष्ट्र के मन में अत्यंत निराशा उत्पन्न हुई। वह सोचने लगा कि यदि उसके पुत्रों ने युद्ध विराम या संधि का प्रस्ताव स्वीकार किया तो पाण्डव निरन्तर उनकी उन्नति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करेंगे। साथ ही साथ वह युद्ध के परिणामों के प्रति भी संदिग्ध था और अपने पुत्रों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति सुनिश्चित होना चाहता था। इसलिए उसने संजय से कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में हो रही गतिविधियों के संबंध में पूछा। जहाँ दोनों पक्षों की सेनाएं एकत्रित हुई थीं।

 

शनिवार, 29 जून 2024

 साख बनाने में बीस साल लगते हैं और उसे गंवाने में बस पांच मिनट, अगर आप इस बारे में सोचेंगे तो आप चीजें अलग तरह से करेंगे।

जब भाग्य साथ नहीं दे रहा तो समझ लेना मेहनत साथ देगी।


समय बहरा है कभी किसी की नही सुनता,
लेकिन अंधा नही है,
देखता सबको है

कामयाबी की चाबी आत्मविश्वास और लगन है।

असफलता से डरो मत, उससे सीखो और फिर से कोशिश करो


 यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न भी हो..तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है


1. संतानों की गलत मांग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे। जैसे कौरव


2. आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो,आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र शक्ति, उच्च स्तरीय पद और वरदान सब निष्फल हो जायेंगे- जैसे कर्ण


3. संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे जैसे अश्वत्थामा


4. कभी किसी को ऐसा वचन मत दो कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े - जैसे भीष्म पितामह 


5. संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है जैसे दुर्योधन


6.  मुद्रा, मदिरा, सत्ता,अज्ञान, मोह और काम (मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में  विनाश की ओर ले जाती है - जैसे धृतराष्ट्र


 7. यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बँधी हो तो विजय अवश्य मिलती है -जैसे अर्जुन


8. हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते - जैसे शकुनि


9. यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती - जैसे युधिष्ठिर


यदि इन नौ सूत्रों से सबक लेना सम्भव नहीं होता है। तो जीवन में महाभारत संभव हो जाता है, अपने ही सगे-सम्बन्धी, दोस्तों, जानकारों के बीच में।


“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...