मंगलवार, 9 जुलाई 2024

 डाकू हत्या करने के प्रयोजन से चाकू का प्रयोग करता है जबकि एक सर्जन उसी चाकू का प्रयोग एक उपकरण के रूप में लोगों का जीवन बचाने के लिए करता है। यह चाकू स्वयं न तो किसी की हत्या करता है और न ही किसी के जीवन की रक्षा करता है। इसके प्रभाव का परिणाम इसका प्रयोग करने के प्रयोजन से ज्ञात होता है। कोई भी कर्म बुरा या अच्छा नहीं होता किन्तु हमारी सोच इन्हें ऐसा बनाती है।  मनुष्य की मनोदशा के अनुसार यह बंधन या उत्थान का कारण हो सकता है। इन्द्रिय सुख भोगों और अपने अहम् की तुष्टि के लिए किया गया कार्य भौतिक संसार में बंधन का कारण होता है और भगवान के सुख के लिए यज्ञ के रूप में किया गया कर्म माया के बंधनों से मुक्त करता है तथा भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त करने की ओर उत्साहित करता है। क्योंकि कर्म करना हमारी प्रकृति है और हम दो प्रकार के कार्यों में किसी एक को करने के लिए बाध्य होते हैं। हम एक क्षण के लिए भी अकर्मा नहीं रह सकते क्योंकि हमारा मन खाली नहीं रह सकता। अगर कोई भी कार्य हम भगवान को अर्पण किए बिना करते हैं तब हम अपने मन और इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कार्य करने के लिए विवश होंगे। जब हम किसी कार्य को समर्पण की भावना से सम्पन्न करते हैं तब हम यह पाते हैं कि यह सारा संसार और उसमें व्याप्त सभी वस्तुएँ भगवान से संबंधित हैं और उनका उपयोग भगवान की सेवा के लिए ही है। 

सोमवार, 8 जुलाई 2024

 जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुष्य के रूप में प्रकट हुए तब उन्होंने योद्धा राजाओं के परिवार के एक सदस्य के रूप में समाज में अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार उपयुक्त सभी प्रकार के अपेक्षित शिष्टाचारों और कुलाचारों को अपनाया। यदि वे इसके विपरीत कर्म करते तब अन्य मनुष्य भी यह सोचकर उनका अनुकरण करते कि उन्हें भी धर्मपरायण राजा वासुदेव के सुयोग्य पुत्र के आचरण का अनुकरण करना चाहिए। यदि श्रीकृष्ण वैदिक कर्म का अनुपालन करने में असफल हो जाते तब मानव जाति भी उनके पदचिन्हों का अनुसरण कर कर्म के अनुशासन से पलायन कर अराजकता की स्थिति में आ जाती। यह एक गम्भीर अपराध होता और श्रीकृष्ण इसके दोषी कहलाते इसलिए वे अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि यदि वह अपने वर्ण धर्म का पालन नहीं करेंगे तब उसके कारण समाज में अराजकता उत्पन्न होगी। 

अर्जुन युद्ध में पराजित न होने वाला विश्व विख्यात योद्धा था और धर्मपरायण सत्यवादी राजा युधिष्ठर का भाई था। यदि अर्जुन धर्म की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य का पालन करने से मना कर देता तब अन्य पराक्रमी और श्रेष्ठ योद्धा भी उसका अनुकरण करते हुए धर्म की रक्षा के निमित्त अपने नियत कर्त्तव्य पालन को त्याग देते। इससे संसार का संतुलन डगमगा जाता और निर्दोष तथा सदगुणी लोगों का विनाश हो जाता। इसलिए श्रीकृष्ण ने समूची मानव जाति के कल्याणार्थ अर्जुन को उसके लिए निश्चित वैदिक कर्त्तव्यो की उपेक्षा न करने के लिए मनाया।

 हम सब इसलिए कार्य करते हैं क्योंकि हमारी कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ होती हैं। हम सब भगवान के अणु अंश हैं जो आनन्द के महासागर हैं और इसलिए हम भी आनन्द चाहते हैं। फिर भी हमें अभी तक पूर्ण आनन्द प्राप्त नहीं हुआ है क्योंकि हम स्वयं को असंतुष्ट और अपूर्ण समझते हैं। हम जो कुछ भी करते हैं, केवल आनन्द की प्राप्ति के लिए ही करते हैं लेकिन आनन्द भगवान की एक शक्ति है और केवल वे ही असीम आनन्द के स्वामी हैं। भगवान ही पूर्ण और स्वयंसिद्ध हैं और उन्हें किसी बाहरी पदार्थ की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती इसलिए उन्हें आत्माराम, आत्मरति और आत्मक्रिया भी कहा जाता है। यदि ऐसा परम पुरुष कोई कार्य करता है तब उसका केवल एकमात्र यह कारण होता है कि वे अपने लिए कुछ न कर लोगों के कल्याण के लिए ही कार्य करेगा। इस प्रकार से श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि साकार रूप में भी ब्रह्माण्ड में मेरे लिए किस प्रकार के नियत कर्म नहीं हैं लेकिन फिर भी मैं लोगों के कल्याण के लिए कर्म करता हूँ। अब वे स्पष्ट करते हैं कि जब वे कर्म करते हैं तब भी उससे किस प्रकार से मानव मात्र का कल्याण पूरा होता है।

 प्राचीनकाल में सौभरि नाम के परम तपस्वी थे सौभरि का अपने शरीर पर इतना नियंत्रण था कि वे यमुना नदी के बीच में जल में डुबकी लगाकर जल के नीचे तपस्या करते थे। एक दिन उन्होंने दो मछलियों को मैथुन क्रिया करते हुए देख लिया। इस दृश्य ने उनके मन और इन्द्रियों को हर लिया और उनमें संभोग करने की इच्छा जागृत हो गयी। उन्होंने तपस्या को बीच में छोड़ दिया और नदी से बाहर निकल आये और अपनी काम-वासना की तृप्ति के संबंध में सोचने लगे। उस समय अयोध्या में मान्धाता नामक राजा, जो बहु-यशस्वी और दयालु शासक था। उसकी पचास कन्याएँ थीं जो सब एक-दूसरे से सुन्दर थीं। सौभरि ने राजा के पास जाकर उससे पचास राजकुमारियों में से एक कन्या उसे सौंपने को कहा। राजा को उस तपस्वी की विवेकशीलता पर आश्चर्य हुआ और वह समझ गया-"यह वृद्ध तपस्वी विवाह करना चाहता है। राजा, तपस्वी सौभरि की शक्ति से परिचित होने के कारण वह भयभीत थे कि यदि उन्होंने सौभरि मुनि के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो वे राजा को श्राप दे देंगे। राजा के लिए इस प्रस्ताव को मानने का अर्थ यह होता कि उसकी एक कन्या का जीवन नष्ट हो जाता। वह दुविधा में पड़ गया। राजा ने कहा, "हे पुण्यात्मा! मुझे आपके आग्रह को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। कृपया आसन ग्रहण करें, मैं अपनी पचास कन्याओं को आपके सम्मुख प्रस्तुत करता हूँ और जो भी कन्या आपका वरण करेगी, मैं उससे आपका विवाह कर दूंगा।" राजा को विश्वास था कि उसकी कोई भी कन्या उस बूढ़े तपस्वी का चयन नहीं करेगी और इस प्रकार से वह उस मुनि के श्राप से बच जाएगा। सौभरि राजा के अभिप्राय को भली-भांति समझ गया। उन्होंने राजा से कहा कि वे कल आएँगे। संध्या के समय उसने अपनी योग शक्ति द्वारा स्वयं को एक सुंदर नवयुवक के रूप में परिवर्तित कर लिया। अगले दिन जब सौभरि मुनि महल में पहुंचे तब सभी पचास राजकुमारियों ने उन्हें पति के रूप में वरण कर लिया। राजा ने अपने दिए गये वचन से बंधे होने के कारण विवश होकर अपनी सभी कन्याओं का विवाह तपस्वी के साथ कर दिया। अब राजा को अपनी कन्याओं में परस्पर कलह होने की चिन्ता सताने लगी क्योंकि उन्हें एक ही पति के साथ जीवन व्यतीत करना था। सौभरि ने पुनः अपनी योग शक्ति का प्रयोग किया। राजा की आशंका को दूर करने के लिए उसने अपने पचास रूपा धारण कर लिए और अपनी पत्नियों के लिए पचास महल बना दिए और उन सभी के साथ अलग-अलग रहने लगा। इस प्रकार सहस्रों वर्ष व्यतीत हो गए। 

पुराणों में उल्लेख है कि सौभरि की उन सभी पत्नियों से अनेक सन्तानों ने जन्म लिया और उनकी आगे और संतानें हुई और यहाँ तक कि एक छोटा नगर बस गया। एक दिन सौभरि के चित्त में विचार आया और वे शोक से कहने लगे “अहो इमं पश्यत मे विनाशं " अर्थात हे मनुष्यों! तुम में से जो लौकिक पदार्थों से सुख प्राप्त करना चाहते हैं, वे सावधान हो जाएँ। मेरे अधोपतन की ओर देखें कि पहले मैं कहाँ था और अब मैं कहाँ पर हूँ। मैंने योग शक्ति द्वारा पचास शरीर धारण किए तथा सहस्त्रों वर्षों तक पचास स्त्रियों के साथ रहा फिर भी इन्द्रिय भोगों से तृप्ति नहीं हुई, अपितु और अधिक तुष्टि की लालसा बनी रही। अतः मेरे अधोपतन से शिक्षा लें और सावधान रहकर इस दिशा की ओर न भटकें।"

 यह गीता के सभी 18 अध्यायों का सार मात्र 18 वाक्यों में हैं।

वन लाइनर गीता

अध्याय 1 - गलत सोच ही जीवन की एकमात्र समस्या है।

अध्याय 2 - सही ज्ञान ही हमारी सभी समस्याओं का अंतिम समाधान है।

अध्याय 3 - निःस्वार्थता ही प्रगति और समृद्धि का एकमात्र मार्ग है।

अध्याय 4 - प्रत्येक कार्य प्रार्थना का कार्य हो सकता है।

अध्याय 5-व्यक्तित्व के अहंकार को त्यागें और अनंत के आनंद का आनंद लें।

अध्याय 6 - प्रतिदिन उच्च चेतना से जुड़ें।

अध्याय 7 - आप जो सीखते हैं उसे जिएं।

अध्याय 8 - अपने आप को कभी मत छोड़ो।

अध्याय 9 - अपने आशीर्वाद को महत्व दें।

अध्याय 10 - चारों ओर देवत्व देखें।

अध्याय 11 - सत्य को जैसा है वैसा देखने के लिए पर्याप्त समर्पण करें।

अध्याय 12 - अपने मन को उच्चतर में लीन करें।

अध्याय 13 - माया से अलग होकर परमात्मा से जुड़ो।

अध्याय 14 - एक ऐसी जीवन-शैली जिएं जो आपकी दृष्टि से मेल खाती हो।

अध्याय 15 - देवत्व को प्राथमिकता दें।

अध्याय 16 - अच्छा होना अपने आप में एक पुरस्कार है।

अध्याय 17 - सुखद पर अधिकार चुनना शक्ति की निशानी है।

अध्याय 18 - चलो चलें, ईश्वर के साथ मिलन की ओर बढ़ते हैं।

 इन्द्रियों की तुष्टि करने के लिए उसके विषयों से संबंधित इच्छित पदार्थों की आपूर्ति करते हुए इन्द्रियों को शांत करने का प्रयास ठीक वैसा ही है जैसे जलती आग में घी की आहुति डालकर उसे बुझाने का प्रयास करना। इससे अग्नि कुछ क्षण के लिए कम हो जाती है किन्तु फिर एकदम और अधिक भीषणता से भड़कती है।  इन इच्छाओं की तुलना शरीर के खाज रोग से की जा सकती है। खाज कष्टदायक होती है और खुजलाहट करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न करती है। खुजलाहट समस्या का समाधान नहीं है, कुछ क्षण इससे राहत मिलती है और फिर यह खुजलाहट अधिक वेग से बढ़ती है। यदि कोई इस खाज को कुछ समय तक सहन कर लेता है तब इसका दंश दुर्बल होकर धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यह खाज से राहत पाने का रहस्य है। यही तर्क कामनाओं पर भी लागू होता है। मन और इन्द्रियाँ सुख के लिए असंख्य कामनाएँ उत्पन्न करती हैं लेकिन जब तक हम इनकी पूर्ति के प्रयत्न में लगे रहते हैं तब ये सब सुख मृग-तृष्णा की भांति भ्रम के समान होते हैं। किन्तु जब हम भगवान का अलौकिक सुख प्राप्त करने के लिए इन सब कामनाओं का त्याग कर देते हैं तब हमारा मन और इन्द्रियाँ शांत हो जाती हैं। 

 

 "सभी लोग सुख प्राप्त करने के लिए साकाम कर्मों में संलग्न रहते हैं किन्तु फिर भी उन्हें इससे संतोष नहीं मिलता अपितु फल के प्रति आसक्त होकर कर्म करने से उनके कष्ट और अधिक बढ़ जाते हैं।" परिणामस्वरूप व्यावहारिक रूप से सभी लोग इस संसार मे दुखी है। कुछ शारीरिक और मानसिक कष्ट भोग रहे हैं। कुछ लोग अपने परिवार के सदस्यों या सगे-संबंधियों से उत्पीड़ित होते हैं और कुछ धन और जीवन यापन के लिए मूलभूत वस्तुओं के अभाव से दुखी होते हैं। भौतिक सुखों में लिप्त सांसारिक मनोवृत्ति वाले लोग जानते हैं कि वे वास्तव मे दुखी हैं किन्तु वे सोचते हैं कि जो अन्य लोग उनसे अधिक समृद्ध हैं, वे सुखी होंगे और इसलिए वे भी सांसारिक सुख सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा की ओर निरन्तर भागने में लगे रहते हैं। यह अंधी दौड़ अनेक जन्मों तक चलती रहती है और फिर भी सुख की कोई किरण दिखाई नहीं देती। जब लोगों को यह अनुभव होता है कि साकाम कर्मों में संलग्न होने से कभी भी कोई मनुष्य सुख प्राप्त नहीं कर सकता, तब उन्हें समझ में आता है कि वे जिस दिशा की ओर भाग रहे हैं, वह निस्सार है और फिर वे आध्यात्मिक जगत की ओर मुड़ने के लिए सोचते हैं। 

वे बुद्धिमान पुरुष जो आध्यात्मिक ज्ञान से दृढ़-निश्चयी हो जाते हैं और यह जान जाते हैं कि भगवान सभी पदार्थों के भोक्ता हैं। परिणामस्वरूप वे अपने कर्मों के प्रति आसक्ति के भाव को त्याग कर सब कुछ भगवान को अर्पित करते हैं और सुख-दुख आदि सभी को समान रूप से स्वीकार करते हैं। ऐसा करने से उनके कर्म उन प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाते हैं जो मनुष्य को जन्म और मृत्यु के बंधन मे बांधते हैं।

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...