शनिवार, 7 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 10 भाग 13

 मैं शाश्‍वत समय हूं


अक्षराणामकारोउस्थि द्वन्द्व: सामासिकस्य च।

अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख:।। 33।।

मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्रभवश्च भविष्यताम्।

कीर्ति: श्रीर्वाक्य नारीणा क्यृतिर्मेधा धृति: क्षमा।। 34।।

बृहत्साम तथा सामा गायत्री छन्दसामहम्।

मासानां मार्गशीर्षोउहमृतूनां कुसुमाकर:।। 35।।


तथा मैं अक्षरों में अकार और समासों में द्वंद्व नामक समास हूं, तथा अक्षय काल और विराट स्वरूप सबका धारण— पोषण करने वाला भी मैं ही हूं।

और हे अर्जुन मैं सबका नाश करने वाला गुण और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूं, तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूं।

तथा मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद तथा महीनों में मार्गशीर्ष महीना और ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं हूं।



मैं अक्षरों में अकार और समासों में द्वंद्व नामक समास हूं तथा अक्षय काल और विराट स्वरूप सब का धारण—पोषण करने वाला भी मैं ही हूं। हे अर्जुन, मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूं।

कुछ नये प्रतीक, कुछ नई दिशाओं से, वही अर्जुन को फिर—फिर कहने की कोशिश कृष्ण ने की है। सत्य तो एक है, समझाया बहुत प्रकार से जा सकता है। और जो समझ सकते हैं, वे बिना प्रकार के भी समझ  सकते हैं। और जो नहीं समझ पाते, अनंत—अनंत प्रकारों से भी समझाने से कुछ हल नहीं होता है। फिर भी कृष्‍ण जैसे व्यक्ति सतत चेष्टा करते हैं—एक द्वार से न दिखाई पड़े, दूसरे द्वार से; दूसरे द्वार से न दिखाई पड़े, तीसरे द्वार से। कृष्‍ण जैसे व्यक्तियों का श्रम अथक है, और धैर्य अनंत है।

इस सूत्र में कृष्‍ण कहते हैं, मैं अक्षय काल।

अस्तित्व में सभी कुछ क्षणिक है और सभी कुछ क्षीण हो जाता है। सभी कुछ परिवर्तित होता है। कुछ भी शाश्वत नहीं मालूम होता, सिवाय परिवर्तन के। सब कुछ परिवर्तित होता है, सिवाय परिवर्तन के। सब कुछ बदल जाता है, एक बदलाहट ही स्थिर बात है। जो भी है, वह दूसरे क्षण भी वही नहीं रह जाता है। इसे थोड़ा हम समझ लें, तो काल की अक्षरता और उसका अक्षय स्वरूप हमारे खयाल में आ जाए।

जो भी है, दूसरे क्षण वही नहीं रह जाता है।

वही सूरज रोज नहीं निकल सकता है। सूरज रूपांतरित हो रहा है प्रतिपल। सूरज जलती हुई आग है। और जैसे लपटें प्रतिपल बदल रही हैं, जैसे दीये की लौ प्रतिपल बदल रही है, ऐसा ही सूरज भी प्रतिपल बदल रहा है।

सांझ आप एक दीया जलाते हैं, सुबह सोचते हैं, उसी दीये को बुझा रहे हैं; तो आप गलती में हैं। सांझ जो दीया जलाया था, वह तो न मालूम कितनी बार बुझ चुका। लौ प्रतिपल खो रही है आकाश में, नई लौ उसकी जगह स्थापित होती चली जा रही है। लेकिन यह इतनी तीव्रता से हो रहा है, यह लौ का प्रवाह इतना त्वरित है कि दो लौ के बीच में आप खाली जगह नहीं देख पाते। इसलिए सोचते हैं, एक ही लौ रातभर जलती रही; सुबह हम उसी दीये को बुझा रहे हैं।

अगर उसी दीये को सुबह बुझा रहे हैं, तो रातभर जो तेल जला, वह कहां गया? रातभर तेल जलता रहा और दीये की लौ बदलती रही। सुबह आप दूसरी ही लौ बुझा रहे हैं। वही लौ नहीं, जो आपने सांझ जलाई थी। निश्चित ही, उसी श्रृंखला की लौ है, उसी लौ की संतान है, लेकिन वही लौ नहीं है।

सूरज भी ऐसा ही बदल रहा है। छोटा—सा दीया बदल रहा है इतनी तेजी से। उतना बड़ा सूरज और भी बड़ी तेजी से बदल रहा है। सुबह रोज वही सूरज नहीं उगता। और आप सोचते हों, सुबह रोज वही पृथ्वी दिखाई पड़ती है, तो भी गलती में हैं। और आप सोचते हों कि रोज उन्हीं वृक्षों के पास से आप गुजरते हैं, तो भी आप भूल में हैं। सब बदल रहा है। बदलाहट इतनी तीव्र है कि आपको दिखाई नहीं पड़ती।

सब कुछ इतनी ही तेजी से चल रहा है। आप जिस जमीन पर बैठे हैं, वह भी तेजी से, जमीन का एक—एक टुकड़ा भाग रहा है। आपके मकान की दीवाल की ईंट का एक—एक अणु तीव्रता से गतिमान है। कोई भी चीज ठहरी हुई नहीं है। सब चीजें चल रही हैं। तेजी इतनी ज्यादा है कि आपको दिखाई नहीं पड़ती।

और अगर यही सब बदल रहा होता, तब भी ठीक था। सुबह सूरज तो दूसरा होता ही है, जमीन दूसरी होती है, वृक्ष दूसरे होते हैं, आकाश दूसरा होता है, आप भी दूसरे होते हैं। रात जो सोया था, वही आदमी सुबह नहीं जगत।। आपकी जीवन धारा भी बह रही है। प्रतिपल बह रही है। आपमें भी सब बदल जाता है।

आप कभी खयाल किए हैं कि अगर मां के पेट में जो आपकी तस्वीर थी, पहले दिन मां के पेट में जो अणु निर्मित हुआ था, जो कि आप आज हो गए हैं, अगर वह आपके सामने रख दिया जाए, तो आप इन आंखों से उसे देख भी न सकेंगे। बड़ी खुर्दबीन की जरूरत पड़ेगी। और फिर भी कोई उपाय नहीं है कि आप पहचान लें कि कभी मैं यह रहा होऊंगा। लेकिन कभी आप वही थे।

और फिर एक दिन आप जल जाएंगे और राख का एक ढेर रह जाएगा। अगर आज वह ढेर आपके सामने रख दिया जाए, तो भी आप मानने को राजी न होंगे कि यही मैं हो जाऊंगा। आपको भरोसा न होगा कि यह और मैं! लेकिन वही आप हो जाएंगे। और हो जाएंगे जब मैं कह रहा हूं, तो आप ऐसा मत सोचना कि यह कल होने वाली बात है, वही आप हो रहे हैं।

हमारी भाषा हमें बहुत—सी भूलों में ले जाती है, क्योंकि भाषा एक तरह का फिक्सेशन का खयाल देती है कि चीजें ठहरी हुई हैं। हम कहते हैं, वृक्ष है। कहना चाहिए, वृक्ष हो रहा है। हम कहते हैं, नदी है। कहना चाहिए, नदी हो रही है। हम कहते हैं, बच्चा है। कहना चाहिए, बच्चा हो रहा है। हम कहते हैं, मृत्यु आएगी। कहना चाहिए, मृत्यु आ रही है।

सब कुछ हो रहा है। प्रत्येक वस्तु एक घटना है, वस्तु नहीं। कोई वस्तु वस्तु नहीं है, घटना है। घटना का अर्थ है, प्रक्रिया है। इस जगत में प्रक्रियाएं हैं, वस्तुएं नहीं। घटनाएं हैं, वस्तुएं नहीं। सब कुछ हो रहा है। प्रवाह है। इस प्रवाह के बीच में अगर कोई एक चीज अक्षय है, तो वह समय है, काल है।

यह बहुत मजे की बात है। अगर इस परिवर्तन के बीच में कोई चीज थिर है, तो वह परिवर्तन है। यह उलटा मालूम पड़ेगा। लेकिन जीवन के गहरे सत्य सभी पैराडाक्सिकल हैं, उलटे होते हैं। ऐसा हम कहें तो समझ में आ जाएगा, इस जगत में अगर कोई चीज नहीं मरती है, तो वह मृत्यु है। बाकी सब चीजें मरती हैं। और इस जगत में एक ही चीज अक्षय है, जो क्षीण नहीं होती, वह समय है। सब बदलता रहता है।

लेकिन ध्यान रहे, बदलने की प्रक्रिया समय में घटती है। समय न हो, तो बदलाहट नहीं हो सकती। आप अपने घर से यहां तक आए, आने में घंटाभर लगा। अगर समय न हो, तो आप यहां नहीं पहुंच सकते। एक घंटा चाहिए, तब आप यहां पहुंच सकते हैं। समझ लें कि समय समाप्त हो गया, तो फिर आप यहां से हिल भी न सकेंगे। क्योंकि हिलने में भी समय लगेगा। फिर आप श्वास भी न ले सकेंगे, क्‍योंकि श्वास लेने में भी समय की जरूरत।

इस जगत में जो कुछ हो रहा है, उस सबके लिए समय अनिवार्य है। सब चीजें समय के भीतर हो रही हैं। सभी के होने में समय छिपा हुआ है। अस्तित्व समय के साथ एक है। सब चीजें बदल रही हैं, बदलाहट समय के भीतर हो रही है। समय भर नहीं बदलता, क्योंकि समय किसके भीतर बदलेगा! समय को बदलने के लिए फिर एक और समय चाहिए।

गणितज्ञ उस पर विचार करते हैं, तो वे कहते हैं, टाइम ए को अगर बदलना हो, तो फिर टाइम बी चाहिए। अगर टाइम बी को बदलना हो, तो फिर टाइम सी चाहिए। समय एक को बदलना हो, तो समय दो चाहिए। समय दो को बदलना हो, तो समय तीन चाहिए। यह तो फिजूल की बात हो जाएगी। और समय को हम अंत तक खींचते चले जाएं, तो भी एक समय हमें मानना पड़ेगा, जो नहीं बदलता है। जैसे, इसे हम और तरह से समझें, तो आसान हो जाए।

आप बैठे हे जमीन पर। आपके बैठने के लिए जगह चाहिए। बिना जगह के आप नहीं बैठ सकते। आपके होने के लिए आकाश चाहिए, जगह चाहिए, स्थान, स्पेस चाहिए। तब एक सवाल उठता है, जो दर्शनशास्त्री पूछते रहे हैं कि आकाश को होने के लिए भी तो फिर कोई और स्थान चाहिए पड़ेगा। आकाश को होने के लिए कोई महाआकाश चाहिए। लेकिन फिर यह इनफिनिट रिग्रेस होगी, इसका कोई अंत न होगा। फिर उस महाआकाश के लिए कोई और महाआकाश चाहिए।

इसलिए  कहते हैं कि आकाश सब चीजों के लिए चाहिए, सिर्फ आकाश को छोड्कर। आकाश के लिए कोई स्थान की जरूरत नहीं। आकाश स्वयं स्थान है। सब चीजों के लिए आकाश जरूरी है। आकाश के लिए कुछ और जरूरी नहीं है।

ठीक वैसे ही, सब परिवर्तन के लिए समय जरूरी है, सिर्फ समय के परिवर्तन के लिए समय जरूरी नहीं है। कहना चाहिए कि जैसे स्थान आकाश है, ऐसे ही परिवर्तन समय है। और समय के लिए कोई और चीज की आवश्यकता नहीं है।

वैज्ञानिक, विशेषकर अल्वर्ट आइंस्टीन, समय और आकाश दोनों को जोड़कर एक नई धारणा निर्मित किए हैं, जो आधुनिक फिजिक्स की धारणा है। आइंस्टीन ने एक नया प्रस्ताव रखा। वह प्रस्ताव भारत के लिए बहुत पुराना है। और वह प्रस्ताव पश्चिम में बहुत कीमती सिद्ध हुआ। आधुनिक विज्ञान उसी प्रस्ताव के आस— पास निर्मित हुआ है। वह प्रस्ताव यह है कि समय और आकाश भी दो नहीं हैं, एक ही चीज हैं। तो आइंस्टीन ने कहा कि समय भी आकाश का एक आयाम है।

यह थोड़ी कठिन गणित की धारणा है।

आकाश के तीन आयाम आइंस्टीन ने कहे हैं। तीन आयाम। कोई भी चीज हो, तो लंबाई होगी, चौड़ाई होगी, गहराई होगी। किसी भी चीज के होने के लिए ये तीन आयाम जरूरी हैं, लंबाई, चौड़ाई, गहराई। ये थ्री डायमेंशन आकाश के हैं। आइंस्टीन ने कहा कि चौथा आयाम, चौथा डायमेंशन समय है। किसी भी चीज के होने के लिए एक चौथी दिशा भी है, परिवर्तन। लंबाई चाहिए, चौड़ाई चाहिए, गहराई चाहिए और अगर वह चीज है, तो एक परिवर्तन की प्रक्रिया चाहिए। वह चौथा आयाम है टाइम।

तो आइंस्टीन ने कहा, टाइम इज दि फोर्थ डायमेंशन आफ स्पेस, वह आकाश का ही चौथा आयाम है। और तब उसने एक ही शब्द निर्मित किया स्पेसियोटाइम। एक ही अस्तित्व है, समय और आकाश का, क्योंकि किसी भी चीज के होने के लिए परिवर्तन जरूरी है। अस्तित्व मात्र परिवर्तन का प्रवाह है।

कृष्ण कहते हैं, मैं अक्षय काल हूं। मैं वह समय हूं जो कभी चुकता नहीं।

सब चीजें चुक जाती हैं, समय भर नहीं चुकता। सूरज चुक जाते हैं, बुझ जाते हैं। पृथ्वियां चुक जाती हैं, बुढ़ी हो जाती हैं, मर जाती हैं। बड़े—बड़े तारे होते हैं, बिखर जाते हैं। अगर हम इस विराट अस्तित्व में खोजने चलें, तो सभी चीजें बनती हैं, बिखरती हैं। सिर्फ एक समय बनने में भी मौजूद रहता है, बिखरने में भी मौजूद रहता है। जन्म में भी मौजूद रहता है, मृत्यु में भी मौजूद रहता है। सिर्फ एक समय अक्षय रूप से मौजूद रहता है। उसकी मौजूदगी सदा है। इसलिए महावीर ने तो आत्मा का नाम ही समय रख दिया। महावीर ने तो आत्मा का नाम ही समय रख दिया। महावीर ने कहा, आत्मा यानी समय, अस्तित्व यानी समय।



कृष्ण कहते हैं, मैं अक्षय काल हूं।

हम सब समय से अपने को भिन्न समझते हैं। हम सब समय से अपने को अलग समझते हैं। हम सब ऐसा समझते हैं कि समय कोई चीज है, जिसमें से हम गुजर रहे हैं। या समय कोई चीज है, जो हमारे पास से गुजर रहा है। हमारी जो धारणा है वह यही है।

एक आदमी बैठकर कहता है कि समय पास कर रहा हूं समय काट रहा हूं। उसे पता नहीं कि वह समय को नहीं काट रहा है, अपने को काट रहा है। समय को आप कैसे काटिएगा! कोई छुरी—तलवार नहीं जो समय को काट सके। समय आपको काट सकता है, आप समय को नहीं काट सकते। लेकिन लोग कहते हैं! बैठकर ताश खेल रहे हैं। वे कहते हैं, समय काट रहे हैं! उनको पता नहीं कि ताश खेलकर समय उनको काट रहा है।

आप समय को छू भी नहीं सकते, काटना तो बहुत दूर है। समय का आपको कोई अनुभव भी नहीं होता, काटना तो बहुत दूर है। आप सिर्फ अपने को काट सकते हैं। समय तो अक्षय है, कटेगा भी नहीं। आपके काटे नहीं कटेगा। अब तक किसी के काटे नहीं कटा है। और सब काटने वाले विलीन हो जाते हैं। सब काटने वाले आते हैं और खो जाते हैं। और समय शाश्वत अपनी जगह बना रहता है।

समय की यह शाश्वतता, यह इटरनिटी, कृष्ण कहते हैं, मैं ही हूं। इस जगत में अगर किसी चीज को अक्षय का प्रतीक मानें हम, तो वह समय है। बाकी सब चीजें क्षय हो जाती हैं। समय में जितनी चीजें हैं, वे सभी क्षय हो जाती हैं, सिर्फ समय को छोड्कर। समय पर मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं है।

इसलिए हमने, विशेषकर भारत ने, समय को और मृत्यु को भी एक मान लिया है। इसलिए मृत्यु को भी हम काल कहते हैं और समय को भी काल कहते हैं।

सिर्फ समय की कोई मृत्यु नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर समय मृत्यु से अलग होता, तो समय की भी मृत्यु घटित होती। समय मृत्यु के साथ एक है। इसलिए मृत्यु की तो क्या मृत्यु होगी! मृत्यु तो कैसे मरेगी? इसलिए हमने मृत्यु को भी काल का नाम दिया।

 हमने समय को भी काल कहा, हमने मृत्यु को भी काल कहा। इनके पीछे कारण हैं। मृत्यु भी एक शाश्वतता है। और अगर हम गौर से देखें, तो मृत्यु सिर्फ एक शब्द है। समय के द्वारा हम काट दिए जाते हैं। जब हम पूरे काट दिए जाते हैं, तो उस घटना को हम मृत्यु कहते हैं। और तो मृत्यु कुछ भी नहीं है। मृत्यु और कुछ भी नहीं है।

जैसे नदी की धार बहती हो और जमीन कट जाती है, और धीरे— धीरे जमीन बह जाती  है। ऐसा ही हमारा अस्तित्व समय की धार में कटता जाता है, कटता  जाता है। एक दिन हम पाते हैं कि हम बह गए, कण—कण होकर बह गए। जिस दिन हम पूरे बह जाते हैं, उन दिन हम कहते हैं, मृत्यु हो गई। लेकिन समय हमें प्रतिपल बहाए ले जा रहा है। हम प्रतिपल बह रहे हैं।

हम रुक भी नहीं सकते। रुकने का कोई उपाय नहीं है। यह होने का ढंग है, यह नियति है। इसमें रुकने का कोई उपाय नहीं है। बहना ही होगा। जो इस बहने से लड़ने लगेगा, वह और जल्दी टूट जाएगा। जो इस बहने को रोकने की कोशिश करेगा, वह और भी जल्दी नष्ट हो जाएगा। उसकी कोशिश ऐसी ही होगी, जैसे कोई नदी की तीव्र धार के विपरीत बहने की कोशिश करता हो। वह और जल्दी थक जाएगा और धार उसे जल्दी बहा ले जाएगी।

समय के साथ एकता साध लेनी, परमात्मा के साथ एकता साध लेनी है। लेकिन समय के साथ एकता साधने का अर्थ है, परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता। जो भी हो जाए, उससे राजी हो जाने का गुण। जो भी घटित हो, उसके साथ पूरा आत्मैक्य। कहीं कोई विरोध न हो, समय जो भी ले आए, उसके साथ पूरा तालमेल। बीमारी आ जाए, तो बीमारी। बुढ़ापा आ जाए, तो बुढ़ापा। मृत्यु आने लगे, तो मृत्यु। कहीं कोई विरोध नहीं। भीतर कहीं कोई विरोध नहीं। जो भी हो, उसके साथ पूरा आत्मैक्य। तो आप समय को जान पाएंगे कि समय क्या है।

लेकिन हम सब लड़ रहे हैं। हम सब समय से हटने की कोशिश कर रहे हैं। हट नहीं सकते, वह आकांक्षा संभव नहीं होगी, लेकिन हमारी चेष्टा वही है।

हम सारे लोग ही लेकिन वैसे हैं। अगर हम जीवन की धार को देखें, तो हम सब उलटे तैरने की कोशिश करते हैं। उलटे तैरने में एक मजा जरूर है, उसी कारण हम तैरते हैं। उलटे तैरने में अहंकार निर्मित होता है। अगर मैं दो हाथ उलटे मार लेता हूं तो लगता है, मैं कुछ हूं। धार के विपरीत, प्रवाह के विपरीत, मैं कुछ हूं। और अगर प्रवाह में बहता हूं तो फिर मैं कुछ भी नहीं हूं!

अगर कोई आदमी उलटी धार में तैरकर गंगोत्री पहुंच जाए, तो सारे दुनिया के अखबार उसकी फोटो छापेंगे। और कोई आदमी गंगोत्री से बहकर सागर में पहुंच जाए, कोई अखबार छापने वाला नहीं मिलेगा। उलटा अगर हम दो हाथ जीत पाते हैं, तो विजय मालूम पड़ती है।

लेकिन ध्यान रहे, समय की धार में कोई भी उलटा नहीं तैर सकता। नदी की धार में दो हाथ कोई मार भी ले। समय की धार में उलटा नहीं तैर सकता। क्योंकि समय पीछे बचता ही नहीं कि आप उसमें तैर सकें। नदी तो पीछे भी होती है। समय तो विलीन हो जाता है। एक ही क्षण आपको मिलता है, पिछला क्षण तो विलीन हो जाता है। अतीत तो बचता नहीं कि आप पीछे जा सकें। सिर्फ भविष्य ही बचता है। आगे ही जा सकते हैं, पीछे जाने का कोई उपाय नहीं।

लेकिन मन पीछे जाने की कोशिश करता रहता है। उस विपरीत दौड़ में अहंकार निर्मित जरूर होता है, लेकिन हम समय के साथ एक होने का जो गहन अनुभव है, उससे वंचित हो जाते हैं।

धार के साथ बह जाएं, कोई बाधा न डालें। नदी की धार के साथ एक हो जाएं। और जीवन जो भी ले आए, उसे परम आनंद से स्वीकार कर लें। उसमें रंचमात्र भी नकार न हो। उसमें रंचमात्र भी अस्वीकार न हो। उसमें शिकायत न हो। ऐसे ही आदमी का नाम धार्मिक आदमी है, जिसके मन में जीवन के प्रति शिकायत नहीं है। मंदिर जाने वाला आदमी धार्मिक नहीं है। क्योंकि हो सकता है, मंदिर वह सिर्फ शिकायत के लिए जा रहे हों। अधिक लोग तो मंदिर शिकायत के लिए जाते हैं। अधिक लोगों की प्रार्थनाएं यह बताती हैं कि भगवान, तुझसे ज्यादा तो हम समझते हैं! तू जो कर रहा है, वह गलत है। हम जो चाहते हैं, वह कर! हमारी प्रार्थनाएं, हमारे मंदिर, हमारी पूजाएं, हमारी मस्जिदें, हमारी शिकायतों के घर हैं।

लेकिन जो आदमी शिकायत लेकर मंदिर गया है, वह मंदिर जा ही नहीं सकता। मंदिर में प्रवेश का तो एक ही मार्ग है कि कोई शिकायत न हो। जीवन ने जो दिया है, जीवन ने जो किया है, जीवन जैसा है, उसमें परम हर्ष हो, उसके स्वीकार में परम उत्सव हो, तब आप बहेंगे। और आपके और समय के बीच जो दुविधा मालूम पड़ती है, वह विलीन हो जाएगी। आप समय के साथ एक हो जाएंगे। इस समय के साथ जो एक होने की घटना है, उस घटना में ही आपको काल के अक्षय स्वरूप का बोध होगा। यह इटरनल टाइम क्या है!

अभी आप जिस समय को जानते हैं, वह घड़ी का समय है, उसका अक्षय काल से कोई संबंध नहीं है। घड़ी का समय, आपका निर्मित समय है। घड़ी का समय, आपका बनाया हुआ समय है। वह समय नहीं है। हमने दिन को चौबीस घंटों में बांट लिया है। हमने घंटे को साठ मिनटों में बांट लिया है। हमने मिनट को साठ सेकेंडों में बांट लिया है। यह हमारी व्यवस्था है। इससे मूल समय का कोई संबंध नहीं है। इससे हम कामचलाऊ समय को निर्मित कर लिए हैं। इसी को अगर आप समय समझते हैं, तो आप भूल में हैं, आप गलती में हैं।

समय तो उसी दिन आपको पता चलेगा, जिस दिन आप सम्पूर्ण स्वीकार को, टोटल एक्सेप्टेंस को उपलब्ध हो जाएंगे। उस दिन, यह कृष्‍ण जो काल का अक्षय स्वरूप कह रहे हैं, यह आपके अनुभव में आएगा। कभी चौबीस घंटे ही ऐसा करें कि बहकर देखें, तैरें मत। धार्मिक आदमी तैरता नहीं है, अधार्मिक आदमी तैरता है। धार्मिक आदमी बहता है। बहता है, कहना भी शायद ठीक नहीं। क्योंकि बहता है, इसमें भी ऐसा लगता है कि कुछ करता है। नहीं, धार्मिक आदमी धार के साथ एक हो जाता है। धार जहां ले जाती है, वहीं चला जाता है।

काल की यह अक्षयता अनुभव में आए, तो परमात्मा का गहनतम रूप स्मरण में आना शुरू होता है।

हे अर्जुन, मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण भी हूं। मृत्यु भी मैं हूं जन्म भी मैं हूं।

इसे थोड़ा हम समझें।

मजे की बात है कि हम कभी खयाल में नहीं लाते, जन्म आपका होता है, कभी आपने सोचा? जन्म एक घटना है, जिसके संबंध में आप कुछ भी नहीं कर सकते। करेंगे भी कैसे, क्योंकि जन्म के बाद ही आप हो सकते हैं। जन्म के पहले कोई आपसे पूछता भी नहीं कि आप जन्म लेना चाहते हैं! जन्म के पहले आपका कोई भी चुनाव नहीं हो सकता। होगा भी कैसे? जब जन्म ही नहीं हुआ, तो आपका चुनाव क्या है? जन्म आपको मिलता है। इट इज ए गिफ्ट, वह एक दान है, एक भेंट है। अस्तित्व आपको जन्म देता है। जन्म आपके हाथ की बात नहीं है। जन्म के संबंध में आप कुछ भी नहीं कर सकते। आपके निर्णय की कोई संगति ही नहीं है। आप जब भी हैं, जन्म के बाद हैं। जन्म के पहले आप नहीं हैं। निश्चित ही, जन्म आपका नहीं हो सकता।

मृत्यु भी आपकी नहीं है। जैसे जन्म आपके हाथ से घटित नहीं होता, वैसे ही मृत्यु भी आपके हाथ से घटित नहीं होती। मृत्यु भी विराट का ही हाथ है, और जन्म भी विराट का ही हाथ है। जो आपको जन्म देता है, वही आपको मृत्यु में खींच लेता है।

इसलिए अगर समस्त जगत के धर्मों ने आत्महत्या का विरोध किया है, तो उसका कारण है। आत्महत्या को अगर बड़े से बड़ा पाप कहा है, तो उसका कारण है। जन्म तो आप नहीं ले सकते, लेकिन आत्महत्या कर सकते हैं। और जो काम परमात्मा को ही करना चाहिए, जब आप करते हैं, तब महापाप घटित होता है। जन्म तो आप नहीं ले सकते, उसका कोई उपाय नहीं है, लेकिन मृत्यु आप चुन सकते हैं। लेकिन जब आप जन्म नहीं चुन सकते, तो आपको मृत्यु चुनने का कोई हक नहीं रह जाता।

कृष्ण कहते हैं, मृत्यु भी मैं हूं जन्म भी मैं हूं। जन्म का कारण भी मैं, मृत्यु का कारण भी मैं।

थोड़ी कठिनाई होगी यह जानकर कि अर्जुन पूछ सकता है कृष्ण से, तो फिर मैं इन लोगों को कैसे मारूं? इनकी हत्या मैं क्यों करूं? यह तत्‍क्षण खयाल में उठेगा। अर्जुन के मन में भी यह सवाल तो उठ ही सकता है कि जिनको मैं जिला नहीं सकता, जन्म नहीं दे सकता, उनको मैं मारूं कैसे? यही अर्जुन कह ही रहा है, यही उसकी समस्या है।

कृष्‍ण इस समस्या को जिस पर्सपेक्टिव, कृष्‍ण जिस परिप्रेक्ष्य से इस सारी स्थिति को देखते हैं, वे अर्जुन से यह कह रहे हैं कि तेरा यह मानना कि तू इन्हें मार रहा है, वह भी भ्रांति है, क्योंकि मारने वाला मैं हूं। वह भ्रांति भी तू मत पाल। वह सिर्फ तेरी भ्रांति है। तू मार भी नहीं सकता।

इसका मतलब यह हुआ कि जो आदमी आत्महत्या कर रहा है, वह भी सिर्फ भ्रांति में है कि मैं अपने को मार रहा हूं। वस्तुत: कोई अपने को मार नहीं सकता, जब तक कि मौत हो मारने को न आ गई हो, जब कि परमात्मा का ही हाथ न आ गया हो। जब आपको मरने का खयाल आता है, वह खयाल भी आपका नहीं होता। वह भी उसी स्रोत से आता है, जिस स्रोत से जन्म आता है। सिर्फ आपको भ्रांति हो सकती है। और वह भ्रांति आपको लंबे चक्कर में डाल सकती है।

इस जगत में भ्रांतियों के अतिरिक्त हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। सत्य हमारे हाथ में नहीं है, हम सत्य के हाथ में हैं। हमारे हाथ में सिर्फ भ्रांतियां हो सकती हैं। सत्य हमारे हाथ में नहीं है, हम सत्य के हाथ में हैं। हमारे हाथ में सिर्फ भ्रांतियां हो सकती हैं, झूठ हो सकते हैं। एक आदमी सोचता है, मैंने अपने को मार लिया या मार रहा हूं। उसका सोचना भ्रांत है। लेकिन भ्रांतियां बढ़ सकती हैं, और आदमी समझ सकता है कि उसने यह कर लिया। हम जिंदगी भर इसी तरह की भ्रांतियां रखते हैं।

नहीं, आप सांस भी नहीं ले रहे हैं, जी भी आप नहीं रहे हैं। अगर आप ही सांस लेते होते, तो मौत तो कभी आ ही नहीं सकती। मौत दरवाजे पर आ जाती, आप कहते, अभी मैं सांस लेना बंद नहीं करता, मैं लेता ही रहूंगा। लेकिन सांस बाहर जाएगी, नहीं लौटेगी, आप भीतर नहीं ले सकेंगे। जीवन आपसे नहीं चल रहा है, आपकी बहुत गहराई से चल रहा है। जहां से जीवन चल रहा है, वही परमात्मा है; जहां से मौत आती है, वही परमात्मा है। आप सिर्फ बीच की एक लहर हैं।

तो कृष्‍ण अर्जुन से यह कह रहे हैं कि न तू जन्म दे सकता है, न तू मृत्यु दे सकता है। अगर तू इस सत्य को समझ ले, तो फिर तू निमित्त मात्र है। मौत भी हो तेरे द्वारा, तो वह मेरे से ही होगी। और जन्म भी हो तेरे द्वारा, तो भी मेरे से ही होगा। अंततः मैं हूं। तू बीच में एक निमित्त मात्र है।

इसलिए बहुत हैरानी की बात है कि गीता ऐसे तो दिखाई पड़ती है कि हिंसा में ले जाती है, लेकिन गीता से परम अहिंसक दृष्टि खोजनी बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह मौलिक हिंसा का जो आधार है अहंकार, उसी को तोड़ डालती है। जब एक आदमी यह सोचता है कि मैं अहिंसा कर रहा हूं तब भी हिंसा होती है; क्योंकि मैं अहिंसा कर रहा हूं तो भी अहंकार मजबूत होता है। मैं मार रहा हूं तो भी, मैं बचा रहा हूं तो भी। अगर मुझे यह खयाल हो जाए कि मैंने बचाया, तो भी अहंकार वही है। भाषा वही है। कभी—कभी भाषा एक—सी हो, तो भी हमें खयाल नहीं आता। कभी—कभी भाषा अलग हो, तो भी दोनों के भीतर एक ही तत्व हो सकता है।

शब्द एक से हों, इससे भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है। एक से शब्दों के भीतर भी बड़े विभिन्न सत्य हो सकते हैं। और कई बार विभिन्न शब्दों के भीतर भी एक ही सत्य होता है; उससे भी भ्रांति में पड़ने की जरूरत नहीं है। शब्दों की खोल को हटाकर सदा सत्य को खोजना जरूरी है।

महावीर और बुद्ध जिस अहिंसा की बात कहते हैं, वह इतने पर रुक जाती है कि दूसरे को मत मारो। अच्छी है बात। गहरी है बात। धार्मिक है। साधक के लिए बड़ी उपयोगी है। लेकिन कृष्‍ण एक कदम और आगे जाते हैं। वे कहते हैं, यह मान्यता ही कि तुम मार सकते हो, यह भी हिंसा है। यह मान्यता ही कि तुम मार सकते हो या बचा सकते हो, यह भी हिंसा है। परम अहिंसा तो तब है, जब तुम जानते हो कि मारे तो, बचाए तो, परमात्मा है; मैं बीच में निमित्त से ज्यादा नहीं हूं। तब परम अहिंसा है।

हे अर्जुन, मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूं। तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूं।

पहली दफा, इन प्रतीकों में कृष्‍ण ने स्त्रियों का प्रतीक भी पहली दफा उल्लिखित किया है। स्त्रियों में भी अगर परमात्मा खोजना हो, तो कहां खोजा जा सकेगा? अगर स्त्रियों में भी परमात्मा की झलक पानी हो, तो वह कहां पाई जा सकेगी? कीर्ति में! और कीर्ति का स्त्री से क्या संबंध है? और कीर्ति क्या है?

स्त्री को जब भी हम देखते हैं, खासकर आज के युग में जब भी स्त्री को हम देखते हैं, तो स्त्री दिखाई नहीं पड़ती, सिर्फ वासना दिखाई पड़ती है। स्त्री को हम देखते ही हैं एक वासना के विषय की तरह, एक आब्जेक्ट की तरह। स्त्री को हम देखते ही ऐसे हैं, जैसे बस भोग्य है, उसका कोई अपना अर्थ, अपना कोई अस्तित्व नहीं है।

और स्त्री को भी निरंतर एक ही खयाल बना रहता है, वह भोग्य होने का। उसका चलना, उसका उठना, उसका बैठना, उसके वस्त्र, सब जैसे पुरुष की वासना को उद्दीपित करने के लिए चुने जाते हैं। चाहे स्त्री को इस बात की सचेतनता भी न हो, इसकी कांशसनेस भी न हो कि वह जिन कपड़ों को पहनकर रास्ते पर निकली है, वे भी हो, शायद वह चीख—पुकार भी मचाए, शायद रोष भी जाहिर करे, लेकिन उसे खयाल न आए कि उस धक्के में उसका भी उतना ही हाथ है, जितना मारने वाले का है। उसके वस्त्र, उसका ढंग, उसके शरीर को सजाने और श्रृंगार की व्यवस्था अपने लिए नहीं मालूम पड़ती, किसी और के लिए मालूम पड़ती है।

इसलिए उसी स्त्री को घर में देखें, उसके पति के सामने, तब उसे देखकर विराग पैदा हो। उसी स्त्री को बीच पर देखें, भीड़ में, तब उसे देखकर राग पैदा हो। पति इसीलिए तो विरक्त हो जाते हैं। स्त्रियां जिस रूप में उनको दिखाई पड़ती हैं, कम से कम उनकी स्त्रियां, पड़ोसियों की स्त्रियों में आकर्षण बना रहता है। लेकिन उनकी स्त्रियां जिस रूप में दिखाई पड़ती हैं..। क्योंकि स्त्री भी धीरे— धीरे, टेकन फार ग्रांटेड दोनों हो जाते हैं कि ठीक है। लेकिन जब स्त्री भीड़ में निकलती है, तब उसकी सारी की सारी दृष्टि अपने को एक कामवासना का विषय मानकर चलती है। और दूसरे पुरुष भी उसको यही मानकर चलते हैं।

कीर्ति का अर्थ है, जिस स्त्री में ऐसी दृष्टि न हो। ऑनर जिसको अंग्रेजी में कहते हैं, इज्जत जिसे उर्दू में कहते हैं। कीर्ति का अर्थ है, ऐसी स्त्री, जो अपने को वासना का विषय मानकर नहीं जीती; जिसके व्यक्तित्व से वासना की झंकार नहीं निकलती। तब स्त्री को एक अनूठा सौंदर्य उपलब्ध होता है। और वह सौंदर्य उसकी कीर्ति है, उसका यश है। आज वैसी स्त्री को खोजना बहुत मुश्किल पड़ेगा। बहुत मुश्किल पड़ेगा।

कीर्ति एक आंतरिक गुण है, एक भीतरी सौंदर्य है। उस सौंदर्य का नाम कीर्ति है, जिसे देखकर वासना शांत हो, उभरे नहीं।

यह थोड़ा कठिन मामला है। यह थोड़ा कठिन मामला है। लेकिन एक बात हम समझ सकते हैं कि अगर स्त्री वासना को उभाड़ सकती है, तो शांत क्यों नहीं कर सकती? जो भी उभाड़ बन सकता है, वह शांत करने वाला शामक भी बन सकता है। अगर स्त्री अपने ढंगों से वासना को उत्तेजित करती है, प्रज्वलित करती है, तो अपने ढंगों से उसे शांत भी कर दे सकती है।

वह जो शांत करने वाला सौंदर्य है, कि दूसरा व्यक्ति वासनातुर होकर भी आ रहा हो, विक्षिप्त होकर भी आ रहा हो, तो स्त्री की आंखों से, उस सौंदर्य का जो दर्शन है, उसके व्यक्तित्व से, उसकी जो छाया और झलक है, जो उसकी वासना पर पानी डाल दे और आग बुझ जाए। उसका नाम कीर्ति है।

लेकिन हम जो कीर्ति से मतलब लेते हैं, कहते हैं कि फलां स्त्री की इज्जत चली गई, उसमें सब लोग यही सोचते हैं कि इज्जत लेने वाला ही जिम्मेवार होगा। पचास परसेंट तो होगा ही। लेकिन सिर्फ पचास परसेंट ही होगा। उसमें इज्जत खोने की तैयारी भी है। और सच तो यह है कि जिस स्त्री की इज्जत को खोने के लिए कोई उत्सुक नहीं है, वह बड़ी बेचैन हो जाती है। वह परेशान हो जाती है। उसको लगेगा कि वह है ही नहीं, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है।

यह बड़े मजे की बात है। आदमी का माइंड इस तरह डबल बाइंड है, दोहरा बंधा हुआ है। हम खींचते भी हैं, और हटाते भी हैं। हम पुकारते भी हैं, और दुत्कारते भी हैं। एक तरफ हम चाहते हैं, लोग आकर्षित भी हों। और दूसरी तरफ हम चाहते हैं कि लोग हमें वासना का बिंदु भी न मानें!

कीर्ति स्त्री के भीतर उस गुणवत्ता का नाम है, जहां वासना पर पानी गिर जाता है। कीर्ति का अर्थ हुआ कि जिस स्त्री के पास बैठकर आपकी वासना तिरोहित हो जाए। इसलिए हमने मां को इतना मूल्य दिया। कीर्ति के कारण मां को हमने इतना मूल्य दिया, मातृत्व को इतना मूल्य दिया।

कृष्‍ण कहते हैं, स्त्रियों में मैं कीर्ति।

निश्चित ही, बहुत दुर्लभ गुण है, खोजना बहुत मुश्किल है।

अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के जगत में कीर्ति को खोजना बिलकुल मुश्किल है। और मंच पर जो अभिनय कर रहे हैं, वे तो कम अभिनेता हैं; उनकी नकल करने वाला जो बड़ा समाज है इमीटेशन का, वे सड़क पर, चौराहों पर भी अभिनय कर रहे हैं। इस सदी में अगर सर्वाधिक किसी के गुणों को चोट पहुंची हो, तो वह स्त्री है। क्योंकि उसके किन गुणों का मूल्य है, उनकी धारणा ही खो गई है। उन गुणों की धारणा ही खो गई है। कीर्ति का हम कभी सोचते भी नहीं होंगे। आप बाप होंगे, आपके घर में लड़की होगी। आपने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस लड़की के जीवन में कभी कीर्ति का जन्म हो। आपने लड़की को जन्म दे दिया और आप अगर उसमें कीर्ति का जन्म नहीं दे पाए, तो आप बाप नहीं हैं, सिर्फ एक मशीन हैं उत्पादन की।

लेकिन कीर्ति बड़ी कठिन बात है। और गहरी साधना से ही उपलब्ध हो सकती है। जब किसी पुरुष में वासना तिरोहित होती है, तो ब्रह्मचर्य फलित होता है। और जब किसी स्त्री में वासना तिरोहित होती है, तो कीर्ति फलित होती है। कीर्ति काउंटर पार्ट है। स्त्री में कीर्ति का फल लगता है, फूल लगता है, जैसे पुरुष में ब्रह्मचर्य का फूल लगता है।

स्त्री में ठीक पुरुष जैसा ब्रह्मचर्य फलित नहीं हो सकता। कारण हैं उसके। अगर पुरुष ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो, तो उसकी सारी वीर्य—ऊर्जा आत्मसात होने लगती है। लेकिन स्त्री की जो काम— ऊर्जा है, वह अनिवार्य रूप से उसके मासिक धर्म में स्खलित होती रहेगी। वह यंत्रवत है। इसलिए स्त्री की काम—ऊर्जा उस तरह से अंतस में तिरोहित नहीं हो सकती, जैसे पुरुष की काम—ऊर्जा तिरोहित हो सकती है।

पुरुष की काम—ऊर्जा जब अंतस में तिरोहित हो जाती है, तो तेज पैदा होता है। वही तेज ब्रह्मचर्य है। स्त्री की व्यवस्था अन्यथा है शरीर की। बायोलाजिकली उसकी शरीर की व्यवस्था अलग है। मासिक धर्म उसकी स्वेच्छा का हिस्सा नहीं है।

इसे थोड़ा समझ लें।

पुरुष की वीर्यशक्ति उसकी स्वेच्छा पर निर्भर है। स्त्री की कामशक्ति उसकी स्वेच्छा पर निर्भर नहीं है। वह स्वेच्छा से उसमें कुछ भी नहीं कर सकती। वह उसके शरीर का हिस्सा है। इसलिए स्त्री को जब ब्रह्मचर्य में उतरना हो, तो उसकी ब्रह्मचर्य की साधना पुरुष की ब्रह्मचर्य की साधना से भिन्न होगी। पुरुष के ब्रह्मचर्य की पाजिटिव है, एग्रेसिव है, आक्रामक है, लेकिन स्वेच्छा पर निर्भर है। उसका ऊर्ध्वीकरण हो सकता है। लेकिन स्त्री की काम—ऊर्जा का ऊर्ध्वीकरण नहीं होता, क्योंकि उसकी स्वेच्छा पर निर्भर नहीं है।

लेकिन कीर्ति की साधना अलग है, वह ठीक ब्रह्मचर्य के जैसी है। अगर कोई स्त्री कीर्ति को उपलब्ध हो जाए, तो पुरुष के शरीर की कोई भी जरूरत नहीं है। स्त्री के शरीर से ही मोक्ष उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन कीर्ति की प्रक्रिया बिलकुल और होगी।

कीर्ति की प्रक्रिया का अर्थ है कि स्त्री के मन में जितनी तीव्रता से मातृत्व का भाव गहन हो जाए। उसकी साधना मां की साधना होगी। वह पूरे जगत की मां हो जाए। उसके मन में एक ही भाव तरंगित होता रहे, मां होने का। स्त्री होने का भाव छूट जाए, पत्नी होने का भाव छूट जाए, सिर्फ मां होने का भाव गहन होता चला जाए। जिस दिन स्त्री के भीतर मां होने की धारणा इतनी गहन हो जाए कि अगर कोई कामातुर पुरुष भी उसके पास आकर उसके हृदय से लग जाए, तो भी उसे अपने बेटे का ही स्मरण हो। उसके भीतर न कोई भय पैदा हो, न कोई चिंता पैदा हो, न कोई घबड़ाहट पैदा हो, वह उसको बेटे की तरह छाती से लगा ले।

और यह अदभुत बात है कि अगर कोई भी स्त्री किसी पुरुष को बेटे की तरह छाती से लगा ले, पुरुष की वासना तत्‍क्षण वहीं क्षीण हो जाएगी। वहीं, उसी वक्त क्षीण हो जाएगी। क्योंकि स्त्री का जो आमंत्रक रूप है, वह अगर खो जाए, तो पुरुष तत्काल पाएगा कि वह शांत हो गया है।

इस गुण का नाम कीर्ति है। और जब यह गुण विकसित होता है, तो स्त्री पर भी एक तेज आता है। उस पर भी एक अनूठा सौंदर्य आता है। उस सौंदर्य का कोई संबंध शरीर के सौंदर्य से नहीं है। कुरूप से कुरूप स्त्री में भी अगर कीर्ति फलित हो जाए, तो उसकी सारी शारीरिक कुरूपता के भीतर से सौंदर्य की आभा फूटने लगती है। उसकी कुरूपता को लोग देख ही न पाएंगे, उसके भीतर का सौंदर्य इतना हावी हो जाएगा। और सुंदरतम स्त्री को भी, अगर कीर्ति न हो, तो उसकी सुंदरता ऊपर चमड़ी पर होती है। और थोड़ी ही देर में भीतर की कुरूपता दिखाई पड़नी शुरू हो जाती है।

इसलिए आज अगर पश्चिम में स्त्री—पुरुष के बीच के सारे संबंध टूट गए हैं, दिन दो दिन से ज्यादा नहीं टिक सकते। महीने दो महीने टिक जाएं, तो काफी लंबे हैं। साल दो साल टिक जाएं, तो मानना चाहिए कि महान घटना है। उसका कारण सिर्फ इतना ही है कि सौंदर्य एकदम छिछला है।

और पश्चिम में आज सुंदरतम स्त्रियां हैं, संभवत: पृथ्वी पर सर्वाधिक सुंदर स्त्रियां हैं। लेकिन सौंदर्य छिछला है। स्किनडीप! जितनी चमड़ी की गहराई है, उतनी ही सौंदर्य की गहराई है। और जैसे ही कोई व्यक्ति करीब आता है, थोडे दिन में ही चमड़ी के सौंदर्य के पार जो विराट कुरूपता छिपी है, वह दिखाई पड़नी शुरू हो जाती है। वही सारे संबंधों को क्षीण कर जाती है और तोड़ जाती है।

कृष्ण कहते हैं, स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति..।

श्री भी स्त्रैण गुण है, जैसे कीर्ति। कीर्ति एक साधना है। और जब कीर्ति फलित होती है, और जब कीर्ति में फूल लगते हैं, और जब कीर्ति घनी होती है, और जब कीर्ति केवल मातृत्व नहीं रह जाती, बल्कि जब स्त्री को यह बोध भी मिट जाता है कि मैं स्त्री हूं. क्योंकि मां का बोध भी स्त्री का ही बोध है। और कितना ही ऊंचा हो, मां होकर भी स्त्री स्त्री तो बनी ही रहती है। लेकिन जब कभी ऐसी घटना घटती है, कीर्ति के आगे के कदम पर जब कि स्त्री को यह बोध भी नहीं रह जाता कि वह स्त्री है, तब उसमें श्री का फूल खिलता है। तब उसमें एक सौंदर्य आता है। उस सौंदर्य को हम अपार्थिव कह सकते हैं। वह कभी किसी मीरा में दिखाई पड़ता है। कभी किसी मरियम में वह दिखाई पड़ता है। बहुत मुश्किल से!

श्री, कृष्ण कहते हैं, स्त्रियों में श्री मैं हूं।

लेकिन जब कभी वह फूल खिलता है—मुश्किल से खिलता है—लेकिन जब कभी वह फूल खिलता है, तो स्त्री स्त्री नहीं होती। पुरुष के प्रति पुरुष होने का जो खयाल है, वह भी खो जाता है। और जिन मुल्कों ने इस श्री को उपलब्ध करने की क्षमता पा ली थी, उन मुल्कों ने अपने ईश्वर की धारणा स्त्री के रूप में की, मां के रूप में की। जिन मुल्कों में स्त्रियों की साधना इस जगह तक पहुंची कि इस आंतरिक, आत्मिक श्री को उपलब्ध हो गई, उन मुल्कों ने अपने परमात्मा की जो धारणा है, वह पुरुष के रूप में नहीं की है।

इसे हम समझें थोड़ा। जर्मनी अपने मुल्क को फादरलैंड कहता है, पितृभूमि! हम अपने मुल्क को मातृभुमि कहते हैं, मदरलैंड कहते हैं। जर्मनी ने कभी भी श्री जैसी घटना नहीं देखी। उसने पुरुषों का बड़ा विकास देखा है। पुरुष के जो गुण हैं, जर्मनी में अपने चरम शिखर को पहुंचे हैं।

इसलिए जर्मनी का अपने मुल्क को फादरलैंड कहना ठीक है। पितृभूमि! स्त्री गौण है, उसने कभी वैसी चरम स्थिति नहीं पाई। पश्चिम में पुरुष के गुणों ने बड़ी गहनता से विकास किया। लेकिन पूरब ने स्त्री के गुणों को बड़ी गहनता से विकसित किया। और मजे की बात यह है कि पुरुष के गुण विकसित हो जाएं, तो अंतिम परिणाम युद्ध होगा, क्योंकि पुरुष के सारे गुण योद्धा के गुण हैं। और पुरुष का जो परम ऐश्वर्य है, वह उसके योद्धा होने में प्रकट होता है।

पूरब ने स्त्री के गुणों को बड़ी गहराई से परखा और विकसित किया। और मैं मानता हूं कि अगर दोनों में चुनाव करना हो, तो स्त्री के गुण ही विकसित करने चाहिए, क्योंकि सब पुरुषों को स्त्री से ही पैदा होना पड़ता है। और अगर स्त्री अविकसित हो, तो पुरुष कभी विकसित नहीं हो पाते। और सब पुरुषों को स्त्री के पास ही बड़ा होना पड़ता है। पुरुष की जिंदगी स्त्री के आस—पास ही व्यतीत होती है—चाहे वह मां हो, चाहे वह पत्नी हो, चाहे वह बहन हो, चाहे बेटी हो—स्त्री के इर्द—गिर्द घूमती है। स्त्री केंद्र है, पुरुष परिधि है; वह आस—पास वर्तुलाकार घूमता है। अगर स्त्री के गुण विकसित न हों, तो समाज बहुत दीन हो जाता है।

श्री जो है, स्त्री का चरम उत्कर्ष है। वह उसकी आत्मा है। जब उसमें स्त्रैणता का भाव भी चला जाता है, तब वह दिव्य हो जाती है। कृष्ण कहते हैं, वह मैं हूं।

वाक्, वाणी! स्त्रियों को हम बहुत बातचीत करते देखते ही हैं। शायद बातचीत ही उनका धंधा है। लेकिन वाक् से इस बातचीत का मतलब नहीं है। यह विकृति है स्त्री के गुण की, जो दिखाई पड़ती है। स्त्रियां चुप बैठी दिखाई पड़े, यह मिरेकल है, चमत्कार है।

लेकिन वाक् बातचीत नहीं है। वाक् तो तब प्रकट होता है, जब स्त्री अपने अस्तित्व में परम मौन को उपलब्ध होती है। जब वह बिलकुल मौन हो जाती है, तब उसकी जो वाणी है, वह बहुमूल्य हो जाती है। तब उसकी वाणी ऋचाएं बन जाती हैं। लेकिन जो स्त्री मौन नहीं हो सकती, वह कभी वाक् को उपलब्ध नहीं होगी।

इसलिए स्त्री का गुण उसका चुप होना, उसका मौन होना है।

उसका इतना मौन होना है कि पता चले कि जैसे उसके पास वाणी ही नहीं है। स्त्री में सब अच्छा लगता है, लेकिन उसकी बातचीत बिलकुल बकवास और उबाने वाली होती है। सुंदर से सुंदर स्त्री थोड़ी देर में बहुत घबड़ाने वाली हो जाती है, अगर वह बातचीत। करती चली जाए।

मौन की एक गरिमा है। असल में शब्द भी आक्रमण है। शब्द भी दूसरे पर हमला है। मौन अनाक्रमण है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं वाक् हूं स्मृति हूं मेधा हूं धृति हूं क्षमा हूं। स्मृति। पुरुष के पास एक तरह की स्मृति होती है, स्त्री के पास दूसरे तरह की। शायद मनोवैज्ञानिक राजी भी न हों। क्योंकि वे कहें, एक ही तरह की स्मृति होती है। नहीं होती है। स्त्री—पुरुष के पास एक तरह का कुछ भी नहीं होता। पुरुष की स्मृति बौद्धिक होती है, स्त्री की स्मृति अस्तित्वगत होती है, टोटल होती है।

अगर पुरुष किसी स्त्री को प्रेम करता है, तो उसके स्मरण में इतना ही रह जाता है कि मैंने प्रेम किया था। यह एक स्मृति होती है, मेंटल, मन में। लेकिन स्त्री ने अगर किसी को प्रेम किया है, तो उसके रोएं— रोएं और कण—कण में यह स्मृति समा जाती है। उसके पूरे व्यक्तित्व में रम जाती है, भर जाती है। और जब स्त्री याद करती है कि किसी ने मुझे प्रेम किया, किसी को उसने प्रेम किया, तो यह बौद्धिक बात नहीं होती, इसमें पूरा अस्तित्व समाहित होता है! वह पूरी की पूरी इसमें मौजूद होती है।

इसलिए पुरुष चाहें, तो बहुत स्त्रियों को भी प्रेम कर सकते हैं, स्त्रियों के लिए बहुत पुरुषों को प्रेम करना स्वभावत: कठिन और असंभव है।

पुरुष के लिए सभी घटनाएं बुद्धि में हैं। बुद्धि एक हिस्सा है। स्त्री के लिए सारी घटनाएं उसके पूरे व्यक्तित्व में हैं। उसका रोआं—रोआं इकट्ठा है।

मनस्विद इतना तो मानते हैं कि पुरुष की कामवासना उसके काम केंद्र में निहित होती है, लेकिन स्त्री की कामवासना उसके पूरे शरीर में फैली होती है। स्त्री का पूरा शरीर इरोटिक है, पूरा शरीर। और उसकी सारी स्मृति पूरी है। उसकी स्मृति में बौद्धिक स्मरण, ऐसा नहीं है।

और जो स्मृति पूरी हो इतनी, उसका गुण ही दूसरा हो जाता है। उसका आयाम, उसका अर्थ, अभिप्राय दूसरा हो जाता है।

कृष्ण कहते हैं, मैं स्त्रियों में स्मृति हूं। समग्रता की, इंटिग्रेटेड, पूरी, पूर्ण। स्त्री याद करती है, बुद्धि से नहीं, विचार से नहीं, अपने पूरे होने से, टोटल बीइंग।

इसलिए एक पिता है और एक मां है। पिता एक बिलकुल औपचारिक संस्था मालूम होती है। न भी हो, चल सकता है। पशुओं में नहीं भी होता है, तो भी चलता है। लेकिन मां एक औपचारिक संस्था नहीं है। मां और बेटे का संबंध एक स्मृति मात्र नहीं है बुद्धि की; एक सारे अस्तित्व का लेन देन है। मां के लिए उसका बेटा, उसका ही टुकड़ा है, उसका ही फैला हुआ हाथ है।

अगर एक बेटे की हत्या कर दी जाए और मां को पता भी न हो, तो भी मां के प्राण आंदोलित हो जाते हैं। अब तो इस पर बड़े वैज्ञानिक परीक्षण हुए हैं। एक सैनिक मरता है युद्ध में और उसकी मां बेचैन हो जाती है हजारों मील दूर। पिता पर कोई असर नहीं पड़ता। पिता का अस्तित्वगत संबंध नहीं है। मेरा बेटा है, यह एक बौद्धिक स्मृति है। और कल अगर एक चिट्ठी मिल जाए, जिससे पता चले कि नहीं, किसी और का बेटा है, तो पिता का सारा संबंध टूट जाएगा, विलीन हो जाएगा। वह संबंध गणित का है, हिसाब का है। बहुत गहरा और आंतरिक नहीं है।

इसलिए कोई पुरुष अगर पिता न भी बने, तो कोई भेद नहीं पड़ता। कोई भेद नहीं पड़ता; व्यक्तित्व में कोई कमी नहीं आती। इसलिए पुरुष की उत्सुकता पिता बनने की कम और पति बनने की ज्यादा होती है। स्त्री की उत्सुकता भी अगर पत्नी बनने की हो, तो उसे स्त्री होने का रहस्य पता नहीं है।

स्त्री की उत्सुकता मौलिक रूप से मां बनने की है। अगर वह पति को भी स्वीकार करती है, तो मां बनने के मार्ग पर। और अगर कोई पुरुष पिता बनना भी स्वीकार करता है, तो पति की मजबूरी में। कोई उत्सुकता पुरुष को पिता बनने की वैसी नहीं है। और अगर कभी रही भी है, तो उसके कारण अवांतर रहे हैं। जैसे धन है, संपत्ति है, जायदाद किसकी होगी! क्या नहीं होगा! बेटा चाहिए, तो यह सब सम्हालेगा। या क्रियाकांड और धर्म के कारण, कि अगर पिता मर जाएगा और बेटा नहीं होगा, तो अंतिम क्रिया कौन करेगा? और फिर पानी कौन चढ़ायेगा ? लेकिन ये सब गणित के संबंध हैं। इनस सबमें हिसाब है। ये परपजिव हैं।

मां का संबंध उसके बेटे से नान—परपजिव है, निष्प्रयोजन है। वह उसके ही अस्तित्व का फैलाव है। अगर बेटा मरता हो, तो मां का हृदय पीड़ित हो जाता है, दुखी हो जाता है, चिंतित हो जाता है। और मनुष्यों में ही नहीं, अभी पशुओं पर भी प्रयोग किए हैं रूस में उन्होंने। खरगोश को काटते हैं और उसकी मां मीलों दूर है और उसके हृदय में असर पड़ते हैं। उसकी हृदय—गति बढ़ जाती है। वह कंपने लगती है। उसकी आंख में आंसू आ जाते हैं। यंत्रों से अब तो इसकी परीक्षा हो चुकी है कि पशुओं की मां भी किसी अशांत मार्ग से प्रभावित होती है। कोई इतनी गहरी स्मृति है, जिसको हम बायोलाजिकल कहें, साइकोलाजिकल नहीं, जिसको हम मानसिक न कहें, बल्कि कहें कि जैविक, उसके रोएं—रोएं में भरी हुई है। कृष्ण कहते हैं, स्त्रियों में मैं स्मृति हूं।

कारण से कहते हैं। अगर कोई व्यक्ति ऐसी ही स्मृति से परमात्मा की तरफ भर जाए, तो ही उसे उपलब्ध होता है, ऐसी अस्तित्वगत स्मृति से। ऐसा खोपड़ी में राम—राम कहने से कुछ भी नहीं होता। जब रोआं—रोआं कहने लगे, धड़कन— धड़कन कहने लगे। कहना ही न पड़े और सबमें गूंजने लगे भीतर, कहने की जरूरत ही न रह जाए, होना ही उसका स्मरण बन जाए, तब, तब परमात्मा उपलब्ध होता है।

मेधा, धृति, क्षमा।

धृति का अर्थ है, धीरज, धैर्य, स्थिरता। पुरुष बहुत अधीर है। बहुत अधीर है। शायद बायोलाजिकल कारण भी है। शायद उसकी जो वीर्य—ऊर्जा है, वह भी अधीर है। इसलिए उसका पूरा व्यक्तित्व अधीर है। स्त्री शांत है, घिर है, धैर्य से भरी है।

अभी तक हम सोचते रहे थे ऐसा कि पुरुष शक्तिशाली है। एक हिसाब से है। मस्कुलर, पेशीगत उसकी सामर्थ्य ज्यादा है। अगर लड़ने जाए, तो स्त्री से ज्यादा शक्तिशाली है। लेकिन यह तो मापदंड की बात  हुई। किसी और हिसाब से स्त्री पुरुष से ज्यादा शक्तिशाली है।

जहां तक थिरता का सवाल है, जहां तक सहने का सवाल है, सहनशीलता का सवाल है, धैर्य का सवाल है...। आपको पता नहीं होगा, आपको खयाल नहीं होगा कि नौ महीने एक मां अपने बेटे को अपने पेट में ढोती है। एक पुरुष को नौ दिन भी ढोना पड़े, तो उसे पता चले! अगर पुरुष को गर्भ ढोना पड़े, तो गर्भपात नियम हो जाए। फिर बच्चे को मां बड़ा करती है। एक रात जरा छोटे बच्चे को अपने बिस्तर पर सुलाकर देखें, तब आपको पता चलेगा, कि वह  आपको पागल कर देगा।

स्त्री का धैर्य एक अर्थ में अनंत है। उसकी सहने की क्षमता भी बहुत है। आप जिस तकलीफ में टिक न सकेंगे, उसमें स्त्री टिकती है।

इसलिए आपको पता है कि स्त्रियों की उम्र पुरुषों से पांच साल ज्यादा है! औसत उम्र। स्त्रियां कम बीमार पड़ती हैं, पुरुषों की बजाय। और अगर बीमार भी पड़ती हैं, तो उसका कारण शारीरिक कम और मानसिक ज्यादा होता है। स्त्रियों की बीमारी को रेसिस्ट करने की क्षमता मेडिकली सिद्ध हो गई है कि बहुत ज्यादा है। स्त्रियां कई बीमारियों को बिना तकलीफ के पार हो जाती हैं, बीमारियां प्रवेश नहीं कर सकती हैं। पुरुष बहुत जल्दी से बीमार हो जाता है। उसकी मस्कुलर ताकत ज्यादा है।

लेकिन मस्कुलर ताकत का तो वक्त भी गया। इसलिए आने वाली दुनिया में स्त्री रोज ताकतवर होती जाएगी। सौ साल के भीतर...। क्योंकि मस्कुलर ताकत का वक्त गया। न तो अब शेर से लड़ने जाना पड़ता है, न लकड़ी काटने जाना पड़ता है। वह सब काम तो मशीन करने लगी। पुरुष के जितने काम थे, मशीन करने लगी। और स्त्री का कोई भी काम अभी तक मशीन करने में समर्थ नहीं है।

आने वाले सौ साल में स्त्री आपके ऊपर उठती जाएगी। उसकी ताकत बड़ी होती जाएगी। होती ही जाएगी। क्योंकि आपका काम तो, आप एक अर्थ में अब बेकार हैं। अगर आटोमेटिक पूरा जगत हो जाता है सौ वर्षों में, तो पुरुष बेकार है। उसके बिना काम चल सकेगा। स्त्री बेकार कभी नहीं हो सकती। उसके कुछ और ही गुण हैं, जो अनिवार्य हैं।

कृष्ण कहते हैं, धृति मैं हूं क्षमा मैं हूं।

स्त्री के व्यक्तित्व में जिस मात्रा में प्रेम है, उसी मात्रा में क्षमा है। जितना ज्यादा प्रेम होगा, उतनी क्षमा होगी। जितना ज्यादा धैर्य होगा, उतनी क्षमा होगी। और जितना ज्यादा मातृत्व होगा, उतनी क्षमा होनी ही चाहिए। पुरुष को क्षमा अभ्यास करनी पड़ती है। स्त्री की क्षमा सहज घटित होती है। वह उसका स्वभाव है।

लेकिन अब तक ऐसा हुआ कि मनुष्य—जाति ने पुरुषों को केंद्र मानकर काम चलाया। इसलिए हम कहते हैं मनुष्य—जाति, इसलिए हम कहते हैं मैनकाइंड, सब पुरुष के नाम हैं। सब पुरुष के नाम हैं! स्त्री को हम पुरुष में सम्मिलित कर लेते हैं।

लेकिन वह भूल हो गई। स्त्री का अपना व्यक्तित्व है, पुरुष से बिलकुल अलग। और जब तक इस पृथ्वी पर स्त्री के व्यक्तित्व के जिन गुणों की कृष्‍ण ने यहां बात की है, वे भी सारे विकसित नहीं हो जाते, तब तक दुनिया एक इम्बैलेंस, एक असंतुलन में रहेगी। पुरुष का पलड़ा बहुत भारी होकर नीचे बैठ गया है। और स्त्री के गुण विकसित नहीं हो पाए हैं।

और अब एक दुर्घटना घट रही है दुनिया में कि स्त्रियां इस लंबी परेशानी से पीड़ित होकर एक प्रतिक्रिया में उतर रही हैं और वे कोशिश कर रही हैं पुरुषों जैसा हो जाने की। वह बड़ी से बड़ी दुर्घटना है, जो मनुष्य—जाति के ऊपर घट सकती है। स्त्रियां कोशिश कर रही हैं पुरुष जैसा हो जाने की—कपड़े—लत्तों से, व्यक्तित्व से, ढंग से, बात से। जो—जो व्यवस्था पुरुष को है, वही—वही उनको भी होनी चाहिए।

भूल है उसमें, क्योंकि स्त्री का व्यक्तित्व बुनियादी रूप से अलग है। उसे भी हक होना चाहिए खुद के विकसित करने का, उतना ही जितना पुरुष को है। लेकिन पुरुष जैसा विकसित होने का हक बहुत महंगा सौदा है। और अगर स्त्रियां पुरुष जैसी होती हैं, तो हम इस दुनिया को बिलकुल बेरौनक कर देंगे। कुछ गुण एकदम खो जाएंगे, जो स्त्रियों के ही हो सकते थे।

आज पश्चिम में कीर्ति नहीं हो सकती स्त्रियों में। श्री नहीं हो सकती। क्षमा नहीं हो सकती। धृति नहीं हो सकती। जिस स्मृति की मैंने बात कही, वैसी समग्र स्मृति नहीं हो सकती। क्योंकि वह हर मामले में पुरुष के साथ, जैसा पुरुष है, वैसा करने की कोशिश में लगी है।

इसमें नुकसान पुरुष को होने वाला नहीं है। इसमें नुकसान स्त्री को ही हो जाएगा। क्योंकि वह नंबर दो की ही पुरुष हो सकती है। पुरुष तो हो नहीं सकती, सेकेंडरी, नंबर दो की पुरुष हो सकती है। और नंबर दो की पुरुष होकर वह एकदम कुरूप और विकृत हो जाएगी।

तो जो पुरुष के अत्याचार से भी नहीं मिटा था, वह उनकी नासमझी से बिलकुल मिट जाएगा। स्त्रियों के गुण अलग हैं।

इसलिए कृष्‍ण ने उचित ही किया कि स्त्रियों के गुण अलग से गिनाए और कहा कि अगर मुझे तुझे स्त्रियों में खोजना हो तो तू कीर्ति में, श्री में, वाक् में, स्मृति में, मेधा में, धृति में और क्षमा में मुझे देख लेना।

अर्जुन ने पूछा है कि किन भावों में मैं आपको देखूं? कहां आपको खोजूं? कहां आपके दर्शन होंगे? तो स्त्रियों में अगर देखना हो, तो इनमें खोज लेना।

तथा मैं गायन करने योग्य श्रुतियों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद तथा महीनों में मार्गशीर्ष का महीना, ऋतुओं में वसंत ऋतु हूं। अंतिम, वसंत ऋतु पर दो शब्द हम खयाल में ले लें।

ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ, उत्सव का क्षण वसंत है। परमात्मा को रूखे—सूखे, मृत, मुर्दा घरों में मत खोजना। जहां जीवन उत्सव मनाता हो, जहां जीवन खिलता हो वसंत जैसा, जहां सब बीज अंकुरित होकर फूल बन जाते हों, उत्सव में, वसंत में मैं हूं।

ईश्वर सिर्फ उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो जीवन के उत्सव में, जीवन के रस में, जीवन के छंद में, उसके संगीत में, उसे देखने की क्षमता जुटा पाते हैं। उदास, रोते हुए, भागे हुए लोग, मुर्दा हो गए लोग, उसे नहीं देख पाते। पतझड़ में उसे देखना बहुत मुश्किल है। मौजूद तो वह वहां भी है। लेकिन जो वसंत में भी उसे नहीं देख पाते, वे पतझड़ में उसे कैसे देख पाएंगे? वसंत में जो देख पाते हैं, वे तो उसे पतझड़ में भी देख लेंगे। फिर तो पतझड़ पतझड़ नहीं मालूम पड़ेगी, वसंत का ही विश्राम होगा। फिर तो पतझड़ वसंत के विपरीत भी नहीं मालूम पड़ेगी; वसंत का आगमन या वसंत का जाना होगा। लेकिन देखना हो पहले, तो वसंत में ही देखना उचित है।

शायद पृथ्वी पर हिंदुओं ने, अकेला ही एक ऐसा धर्म है, जिसने उत्सव में प्रभु को देखने की चेष्टा की है। एक उत्सवपूर्ण, एक, फेस्टिव, नाचता हुआ; छंद में, और गीत में, और संगीत में, और फूल में।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 10भाग 12

 शस्‍त्रधारियों में राम


पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्थि जाह्नवी।। 3।।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।। 32।।


और मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में राम हूं तथा मछलियों में मगरमच्छ हूं और नदियों में श्री भागीरथी गंगा जाह्नवी हूं।

और हे अर्जुन सृष्टियों का आदि अंत और मध्य भी मैं ही हूं। तथा मैं विद्याओं में अध्यात्म— विद्या अर्थात ब्रह्म— विद्या एवं परस्पर में विवाद करने वालों में तत्व— निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूं।


मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में राम हूं। इन प्रतीकों को थोड़ा हम समझें।

वायु इस जगत में सर्वाधिक स्वतंत्र है। और स्वतंत्रता ही पवित्रता है। वायु कहीं बंधी नहीं है, कहीं ठहरी नहीं है, कहीं उसका लगाव नहीं है, कहीं उसकी आसक्ति नहीं है। वायु एक सतत गति है।

तो पहली बात, जहां भी लगाव होगा, वहीं अपवित्रता शुरू हो जाएगी। जहां भी आसक्ति होगी, जहां भी ठहरने का मन होगा, जहां पड़ाव मंजिल बन जाएगा, वही अपवित्रता शुरू हो जाएगी।

जीवन की सारी दुर्गंध, जीवन की सारी कुरूपता, जहां—जहां हम ठहर जाते हैं और जकड़ जाते हैं, वहीं से पैदा होती है। जीवन जहां भी प्रवाह को खो देता है, गति को खो देता है, और जहां ठहर जाता है, जड़ हो जाता है..।

जैसे नदी बहती है, तो नदी पवित्र होती है। और डबरा बहता नहीं, अपवित्र हो जाता है। डबरे में भी वही जल है, जो नदी में है। लेकिन नदी में प्रवाह है, बहाव है, जीवन है। डबरा मृत है, मुर्दा है, कोई गति नहीं है। डबरा सड़ता है, दुर्गंधित होता है और नष्ट होता है। स्वभावत:, अपवित्र हो जाता है।

कृष्‍ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु हूं।

पहली बात, पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां प्रवाह सतत हो। पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां कोई लगाव, जहां कोई रुकाव, जहां कोई ठहराव न आ जाए। पवित्रता वहीं ठहरती है, जहां कोई फिक्सेशन, प्राणों का अवरुद्ध होना न हो। जिसके प्राण भी वायु की तरह हैं— कहीं ठहरे हुए नहीं, कहीं रुकते नहीं, कहीं बंधते नहीं, कहीं कोई आसक्ति निर्मित नहीं करते— वही केवल पवित्रता को उपलब्ध हो पाएगा।

पुराने अति प्राचीन समय से संन्यासी को प्रवाहवत जीवन व्यतीत करने को कहा गया है। नदी की तरह बहता रहे। महावीर ने अपने संन्यासियों को कहा है कि वे तीन दिन से ज्यादा कहीं रुके नहीं। तीन दिन के पहले हट जाएं। थोड़ा सोचने जैसा है। क्योंकि तीन दिन का यह राज महावीर को कैसे पता चला होगा, कहना मुश्किल है।


लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि आदमी को किसी भी जगह मन के लगने में कम से कम तीन दिन से ज्यादा का समय चाहिए। आप अगर एक नये कमरे में सोने जाएंगे, तो तीन रातें आपको थोड़ी—सी बेचैनी रहेगी, चौथी रात आप ठीक से सो पाएंगे। कहीं भी किसी नई स्थिति को पुराना बना लेने के लिए कम से कम तीन दिनों की जरूरत है। कम से कम। थोड़ा ज्यादा समय भी लग सकता है।

महावीर ने अपने संन्यासी को कहा है कि वह तीन दिन से ज्यादा एक जगह न रुके। इसके पहले कि कोई अपना मालूम पड़ने लगे, उसे हट जाना चाहिए। क्योंकि जहां लगा कि कोई अपना है, वहीं जंजीर निर्मित हो जाती है। और जिसके प्राणों पर जंजीर पड़ जाती है, उन प्राणों में कुरूपता और दुर्गंध और सड़ांध शुरू हो जाती है। डबरा बनना शुरू हो गया प्राणों का।

संन्यासी का अर्थ है, जो अपने को डबरा नहीं बनने देता। गृहस्थ का इतना ही अर्थ है कि जो अपने को डबरा बनाने का पूरा आयोजन कर लेता है। चाहे तो गृहस्थ भी प्रवाहित रह सकता है, लेकिन उसे थोड़ी कठिनाइयां होंगी। उसे बहुत होश रखना पड़े, तो ही वह डबरा बनने से रुक सकता है। अन्यथा सब चीजें धीरे— धीरे जम जाएंगी, फ्रोजन हो जाएंगी और उनके बीच वह भी जम जाएगा।

लेकिन हम सब तो यही कोशिश करते हैं कि जितने जल्दी जम जाएं, उतना अच्छा। जमने में सुविधा है, सुरक्षा है, कनवीनियंस है। गैर—जमे होने में असुविधा है, असुरक्षा है। रोज नये के सामने पड़ना पड़ता है, तो रोज नई बुद्धि की जरूरत पड़ती है। हम सब जम जाना चाहते हैं। जमे हुए आदमी का पुरानी बुद्धि से काम चल जाता है, नये की कोई आवश्यकता नहीं होती।

हम सब नये से भयभीत होते हैं। कुछ भी नया हो, तो चिंता पैदा होती है। क्योंकि पुराने के साथ कैसा व्यवहार करना, वह तो हम जानते हैं; नए के साथ फिर से व्यवहार सीखना पड़ता है। पुराना तो मृत, यंत्रवत हो जाता है। पुराने को तो हम ऐसे करते हैं जैसे कोई रोबोट, कोई मशीन का आदमी कर रहा हो। उसमें हमें फिर बुद्धिमत्ता की, चेतना की, होश की, कोई भी जरूरत नहीं रह जाती। हम करते चले जाते हैं।

आप अपने घर जब आते हैं, तो आपको सोचना नहीं पड़ता, बाएं मुडूं, दाएं मुडूं। आप मुड़ते चले जाते हैं। यह काम शरीर ही कर लेता है। इसके लिए आपको कुछ, किसी तरह के होश की जरूरत नहीं होती। शराबी भी शराब पीकर अपने घर पहुंच जाता है। कितने ही हाथ—पैर डोलते हों, वह भी अपने घर का जाकर द्वार—दरवाजा खटखटाने लगता है। यह यंत्रवत है। इसके लिए कोई सोच—विचार की जरूरत नहीं है।

इसलिए जितने हम जम जाते हैं, उतना ही सोच—विचार से छुटकारा हो जाता है। विचार बड़ा कष्टपूर्ण है। इसलिए दुनिया में कोई भी आदमी विचार नहीं करना चाहता, विचार से बचना चाहता है। इसी वजह हमारा प्रवाह समाप्त हो जाता है।

कृष्‍ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु हूं।

तो वायु का पहला लक्षण तो यह है कि वह कहीं ठहरती नहीं। आई भी नहीं, कि गई। आ भी नहीं पाई, कि जा चुकी। आना भी नहीं हो पाया, कि जाना हो गया। वायु कहीं भी मेहमान नहीं बनती; स्पर्श करती है और हट जाती है।

संन्यासी वायु की तरह होना चाहिए। रुके न। जरूरी नहीं है कि वह मकान बदलता रहे, क्योंकि मकान बदलने से कुछ भी नहीं होता। मकान बदलकर भी रुकना हो सकता है। मकान बदलकर भी रुकना हो सकता है, क्योंकि रुकने के बड़े इंतजाम हैं। अब एक आदमी रोज मकान बदल लेता है, लेकिन रोज अपने को तो नहीं बदलेगा, तो वहीं जड़ हो जाएगा।

एक संन्यासी घर छोड़ देता है, लेकिन उस घर में जो भी सीखा था, वह तो साथ ही लेकर चलता है। मजे की घटना घटती है दुनिया में कि संन्यासी भी हिंदू होता है, मुसलमान होता है, जैन होता है, ईसाई होता है। ये रुके होने के लक्षण हैं। संन्यासी को तो सिर्फ संन्यासी होना चाहिए।

तो वायु का पहला लक्षण है कि कहीं रुकती नहीं।

दूसरा लक्षण है वायु का कि दिखाई नहीं पड़ती, और है। वह और भी गहरी बात है। वायु है, अनुभव होती है, दिखाई नहीं पड़ती। स्पर्श होता है, प्रतीति होती है, पकड़ में नहीं आती। पकड़ में नहीं आती, इसलिए बांधना मुश्किल है, रोकना मुश्किल है, परतंत्र करना मुश्किल है।

कृष्ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु की भांति हूं।

जितनी पवित्रता होगी, उतनी ही ट्रासपैरेंसी हो जाएगी। जितनी पवित्रता होगी, उतना ही आर—पार दिखाई पड़ने लगेगा। अगर आपने कोई पवित्र कांच देखा हो, बिलकुल शुद्ध, तो कांच भी दिखाई नहीं पड़ेगा। आर—पार सब दिखाई पड़ेगा, बीच में कोई भी बाधा न होगी। वायु की पवित्रता उसकी पारदर्शिता भी है।

एक बहुत पुरानी इजिप्त में लोकोक्ति है कि जब कोई व्यक्ति परम पवित्र हो जाता है, तो उसकी छाया नहीं बनती। जब वह चलता है धूप में, तो उसकी छाया नहीं बनती।

यह सिर्फ इसी बात के लिए इशारा है। छाया तो बनती है महावीर की भी और कृष्ण की भी और बुद्ध की भी। लेकिन इजिप्त की यह बड़ी प्राचीन कहावत कहती है कि जो पावन, परम पवित्र हो जाता है, उसकी छाया नहीं बनती। यह सिर्फ इस बात की सूचना देता है कि जो इतना पवित्र हो जाता है कि जिसके भीतर कोई अशुद्धि न रह गई हो, तो उसके आर—पार दिखाई पड़ने लगता है। और जिसके आर—पार दिखाई पड़ने लगे, उसकी छाया नहीं बनेगी। छाया नहीं बनेगी, यह केवल प्रतीक है।

महावीर के आर—पार दिखाई पड़ता है। महावीर एक दरवाजे की भांति हैं, खुले हुए। और हम एक दीवाल की भांति हैं, हमारे आर— पार कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। हमें खुद नहीं दिखाई पड़ता, दूसरे को दिखाई पड़ना तो बहुत मुश्किल है। हम खुद एक ठोस दीवाल हैं पत्थरों की, जिसमें अपने को ही खोजना हो, तो भी बहुत मुश्किल है। कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

यह उसी मात्रा में दीवाल बिखरती चली जाती है, जिस मात्रा में मन पवित्र होता है। और जिस दिन मन वायु की तरह हो जाता है, कोई भी अपवित्रता नहीं रह जाती, ट्रांसपैरेंट हो जाता है, आर—पार दिखाई पड़ने लगता है। वायु का होना और दिखाई न पड़ना, संतत्व भी ऐसा ही है। होता है, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता।

पता चलना, ठोस हो जाना है। पता न चलना, तरल होना है, विरल होना है, हवा की तरह होना है। जिन्हें हमने भगवान भी कहा है, बुद्ध या महावीर को, उन्हें खुद कुछ भी पता नहीं है। वे निर्दोष बच्चों की भांति हैं।

हवा की तरह पवित्रता भी है, अनसेल्फकांशस; अनकांशस नहीं, अनसेल्फकांशस। अचेतन नहीं; अहंकार का जरा भी बोध नहीं है। अहंकार की चेतनता जरा भी नहीं है। और दिखाई नहीं पड़ना। जो भी चीज दिखाई पड़ने लगती है, वह पदार्थ बन जाती है। दिखाई पड़ना पदार्थ का गुण है, मैटर का गुण है। चैतन्य का गुण होना है, दिखाई पड़ना नहीं।

इसलिए हमें शरीर दिखाई पड़ते हैं, आत्मा दिखाई नहीं पड़ती। हमें पत्थर दिखाई पड़ते हैं, प्रेम दिखाई नहीं पड़ता। जो भी हमें दिखाई पड़ता है, वह पदार्थ है। जो नहीं दिखाई पड़ता, वही परमात्मा है।

वायु हमें दिखाई नहीं पड़ती, पर है। और अगर हमें किसी को सिद्ध करना हो कि वायु है, तो हम उसकी आंखों का उपयोग न कर सकेंगे। और अगर कोई जिद्द ही करे कि मेरे सामने प्रत्यक्ष करो, तो हम कठिनाई में पड़ जाएंगे। यद्यपि जो हमसे कह रहा है कि वायु को प्रत्यक्ष करो, वह भी वायु के बिना एक क्षण जी नहीं सकता है। एक श्वास आनी बंद होगी, तो प्राण निकल जाएंगे। वायु ही उसका प्राण है, जीवन है। लेकिन फिर भी वायु को सामने रखा नहीं जा सकता, प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता। हम अनुभव कर सकते हैं। लेकिन किसी के शरीर में लकवा लग गया हो और उसे स्पर्श का कोई बोध न होता हो, तो हवाएं बहती रहें, उसे कोई पता नहीं चलेगा। वह श्वास भी लेगा, उसी से जीएगा और पता नहीं चलेगा।

कहते हैं कि मछलियों को सागर का पता नहीं चलता। नहीं चलता होगा। क्योंकि सागर में ही पैदा होती हैं, सागर में ही बड़ी होती हैं, सागर में ही समाप्त हो जाती हैं। उन्हें पता नहीं चलता होगा, क्योंकि जो इतना निकट है और सदा निकट है, उसका पता चलना बंद हो जाता है।

वायु सदा निकट है, चारों तरफ घेरे हुए है। वही हमारा सागर है, जिसमें हम जीते हैं, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता। परमात्मा भी ठीक ऐसा ही है, चारों तरफ घेरे हुए है। उसके बिना भी हम क्षणभर नहीं जी सकते। वायु के बिना तो हम जी भी सकते हैं, उसके बिना हम क्षणभर नहीं जी सकते। वह हमसे वायु से भी ज्यादा निकट है। वह हमारे प्राणों का प्राण है। लेकिन उसका भी हमें कोई पता नहीं चलता।

कृष्‍ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु हूं। और शस्त्रधारियों में राम हूं।

यह बहुत प्यारा प्रतीक है।

राम के हाथ में शस्त्र बहुत कट्राडिक्टरी है। राम जैसे आदमी के हाथ में शस्त्र होने नहीं चाहिए। राम का चित्र आप थोड़ा खयाल करें। राम के शरीर का थोड़ा खयाल करें। राम की आंखों का थोड़ा खयाल करें। राम के व्यक्तित्व का थोड़ा खयाल करें। शस्त्रों से कोई संबंध नहीं जुड़ता।

राम, शस्त्रों के साथ, बड़ी उलटी बात मालूम पड़ती है। न तो राम के मन में हिंसा है, न राम के मन में प्रतिस्पर्धा है, न राम के मन में ईर्ष्या है। न राम किसी को दुख पहुंचाना चाहते हैं, न किसी को पीड़ा देना चाहते हैं। फिर उनके हाथ में शस्त्र हैं। उनके हाथ में एक कमल का फूल होता, तो समझ में आता। उनके हाथ में शस्त्र, बिलकुल समझ में नहीं आते।

जब भी मैं राम का चित्र देखता हूं और उनके कंधे में लटका हुआ धनुष देखता हूं और उनके कंधे पर बंधे हुए तीर देखता हूं तो राम के शरीर से उनका कोई भी संबंध नहीं मालूम पड़ता। राम का शरीर एक कवि का, एक काव्य का, एक काव्य की प्रतिमा मालूम होती है। राम की आंखें प्रेम की आंखें मालूम होती हैं। राम पैर भी रखते हैं, तो ऐसा रखते हैं कि किसी को चोट न लग जाए। राम का सारा व्यक्तित्व फूल जैसा है। और कंधे पर बंधे हुए ये तीर, और हाथ में लिए हुए ये धनुष—बाण, ये कुछ समझ में नहीं आते! इनका कोई मेल नहीं है, इनकी कोई संगति नहीं है।

राक्षस के हाथ में, रावण के हाथ में शस्त्र सार्थक मालूम होते हैं, संगत मालूम होते हैं। वहां गणित ठीक बैठता है। महावीर के हाथ में तीर का न होना, तलवार का न होना संगत मालूम होता है। गणित वहां भी ठीक है। महावीर हैं या बुद्ध हैं, उनके हाथ में कुछ भी नहीं है, कोई शस्त्र नहीं है। रावण के हाथ में शस्त्र हैं, सारा शरीर शस्त्रों से ढंका है, यह भी ठीक है।

राम कुछ अनूठे हैं। ये आदमी बुद्ध जैसे और इनके हाथ में शस्त्र रावण जैसे, यह बड़ा विरोधाभासी है। और कृष्‍ण को यही प्रतीक मिलता है कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूं! बहुत शस्त्रधारी हुए हैं। शस्त्रधारियों की कोई कमी नहीं है। राम को क्यों चुना होगा? जानकर चुना है, बहुत विचार से चुना है, बहुत हिसाब से चुना है। शस्त्र खतरनाक है रावण के हाथ में। इसे थोड़ा समझेंगे। थोड़ी बारीक है और बात थोड़ी कठिन मालूम पड़ेगी।

शस्त्र खतरनाक है रावण के हाथ में, क्योंकि रावण के भीतर सिवाय हिंसा के और कुछ भी नहीं है। और हिंसा के हाथ में शस्त्र का होना, जैसे कोई आग में पेट्रोल डालता हो। यह हम समझ जाएंगे। यह हमारी समझ में आ जाएगा। इस दुनिया की पीड़ा ही यही है कि गलत लोगों के हाथ में ताकत है। गलत आदमी उत्सुक भी होता है शक्ति पाने के लिए बहुत।

 शक्ति लोगों को व्यभिचारी बना देती है और पूर्ण रूप से व्यभिचारी बना देती है।  वे करप्ट हो जाते हैं, यह तथ्य है; लेकिन शक्ति के कारण करप्ट हो जाते हैं, यह गलत है। क्योंकि हमने राम के हाथ में भी शक्ति देखी है और करप्शन नहीं देखा, व्यभिचार नहीं देखा, शक्ति का कोई व्यभिचार नहीं देखा।

तब बात कुछ और है। तथ्य तो ठीक है कि हम देखते हैं कि जिनके हाथ में शक्ति आती है, वे व्यभिचारी हो जाते हैं। लेकिन इसका कारण शक्ति नहीं है। इसका बुनियादी कारण यह है कि व्यभिचारी ही शक्ति के प्रति आकर्षित होते हैं। लेकिन कमजोर आदमी अपने व्यभिचार को प्रकट नहीं कर पाता, जब शक्ति हाथ में आती है, तब वह प्रकट कर पाता है। शक्ति के कारण व्यभिचार पैदा नहीं होता, प्रकट होता है।

आप कमजोर हैं, आपके भीतर हिंसा है, दूसरा आदमी मजबूत है, आप हिंसा नहीं कर पाते। फिर एक बंदूक आपके हाथ में दे दी जाए, अब दूसरा आदमी कमजोर हो गया, अब आप ताकतवर हैं, अब हिंसा होगी।

चरित्र की असली परीक्षा तभी है, जब शक्ति पास में हो। जिनके पास शक्ति नहीं है, उनके चरित्र का कोई भरोसा नहीं है। उनका चरित्र केवल कमजोरी हो सकती है।

इसलिए इस दुनिया में जितने चरित्रवान लोग दिखाई पड़ते हैं, निन्यानबे प्रतिशत तो कमजोरी की वजह से चरित्रवान होते हैं। इसलिए इतने चरित्रवान भी दिखाई पड़ते हैं, इतनी चरित्र की बात भी होती है और दुनिया रोज चरित्रहीनता में उतरती जाती है।

कमजोर आदमी को ताकत दो और उसका चरित्र बह जाएगा। सबसे पहली जो दुर्घटना होगी, वह चरित्र की हत्या हो जाएगी। कमजोर आदमी को किसी तरह की ताकत दो— धन दो, पद दो, राजनीति की कोई सत्ता दो— सारा चरित्र बह जाएगा।

नहीं, लोग कमजोरी की वजह से केवल चरित्रवान थे। हाथ में ताकत आती है और सब चरित्र खो जाता है। परीक्षा शक्ति के बाद ही पता चलती है।

जिनके भी मन में यह भय है कि मैं क्षुद्र हूं मैं कुछ भी नहीं हूं वे किसी पद पर बैठकर अपने और दूसरों के सामने सिद्ध करना चाहते हैं कि मैं कुछ हूं।  कोई नहीं पसंद करता कि मैं कोई भी नहीं हूं। हर एक के भीतर खयाल है कि मैं कुछ हूं। कुछ हूं लेकिन यह किसको कहूं कैसे कहूं जब तक कि हाथ में ताकत न हो। हाथ में ताकत हो, तो कहूं कि मैं कुछ हूं। सिर्फ वे ही लोग ताकत की दौड़ से बच सकते हैं, जो बिना कहे भीतर हीनता की ग्रंथि से मुक्त हो जाते हैं। जिनके भीतर हीन होने का भाव ही तिरोहित हो जाता है, वे ही लोग दूसरे से श्रेष्ठ होने की कोशिश बंद कर देते हैं!

यह बड़े मजे की बात है। इस जगत में श्रेष्ठ लोग ही श्रेष्ठ बनने की कोशिश नहीं करते। हीन लोग श्रेष्ठ बनने की कोशिश करते हैं।

राम के हाथ में शस्त्र गलत आदमी के हाथ में शस्त्र हैं। गलत इसलिए कह रहा हूं कि रावण के हाथ में तो ठीक आदमी के हाथ में हैं। रावण की आत्मा और शस्त्रों के बीच सेतु है, संबंध है, एक हार्मनी है, एक संगीत है। राम और शस्त्र के बीच कोई सेतु नहीं है। एक खाई है, अलंध्य खाई है, अनब्रिजेबल गैप है। वही राम की खूबी भी है। शस्त्र हैं और राम हैं, और उन दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है। रावण के हाथ में ठीक मालूम पड़ते हैं शस्त्र, लेकिन खतरनाक हैं। क्योंकि जब भीतर हिंसा हो और शस्त्र हाथ में हों, तो हिंसा गुणित होती चली जाएगी, मल्टीप्लाइड हो जाएगी।

इसलिए लोग कहते हैं कि मनुष्यता विकसित हो रही है, वह जरा संदिग्ध बात है। अस्त्र—शस्त्र विकसित हो रहे हैं, यह निस्संदिग्ध बात है। मनुष्यता विकसित होती नहीं दिखाई पड़ती। एवोल्‍यूशन, विकास, वस्तुओं का हो रहा है।

पच्चीस हजार साल पहले जिस आदमी ने पत्थर के औजार से किसी की हत्या की होगी और पच्चीस हजार साल बाद जिसने बम से हत्या की, इनके हत्या करने का पैमाना बड़ा हो गया। पत्थर के औजार से आप एकाध को मार सकते थे, एटम से आप लाखों को एक साथ मार सकते हैं। एक हाइड्रोजन बम कोई एक करोड़ आदमियों को एक साथ मार सकता है। और अभी जमीन पर  हजारो हाइड्रोजन बम तैयार हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं कि तैयारी जरूरत से ज्यादा हो गई। वे कहते हैं कि हमारे पास इतने बम हैं अब, जितने आदमी नहीं हैं मारने को! एक—एक आदमी को सात—सात बार मारना पड़े, तो हमारे पास इंतजाम है। हालांकि एक आदमी एक ही दफे में मर जाता है! लेकिन राजनीतिज्ञ बहुत हिसाब लगाते हैं! कोई बच जाए एक दफा, दुबारा, तिबारा, तो हम सात बार मार सकते हैं एक आदमी को।  आदमी विकसित हुआ नहीं मालूम पड़ता, लेकिन ताकत विकसित हुई मालूम पड़ती है।

हिंसा हो भीतर, वैमनस्य हो भीतर, प्रतिस्पर्धा हो भीतर, शत्रुता हो भीतर, तो अस्त्र—शस्त्र घातक हैं। यह तो हमारी समझ में आ जाएगा। एक तरफ रावण है, जिससे शस्त्रों का मेल है, यह खतरनाक है। दूसरी तरफ बुद्ध और महावीर हैं। ये भी बिलकुल गणित के फार्मूले की तरह साफ हैं। जैसे ये आदमी हैं, इनके पास वैसा ही सब कुछ है; इनके पास कोई अस्त्र—शस्त्र नहीं है। भीतर प्रेम है, हाथ में तलवार नहीं है।

ये आदमी अपने लिए खतरनाक नहीं हैं, किसी के लिए खतरनाक नहीं हैं। लेकिन नकारात्मक रूप से समाज के लिए ये भी खतरनाक हो सकते हैं। नकारात्मक रूप से! क्योंकि इसका मतलब यह हुआ कि बुरे आदमी के हाथ में ताकत रहेगी और अच्छा आदमी ताकत को छोड़ता चला जाएगा। जाने—अनजाने यह बुरे आदमी को मजबूत करना है। महावीर की कोई इच्छा नहीं है, बुद्ध की कोई इच्छा नहीं है कि बुरा आदमी मजबूत हो जाए। लेकिन बुद्ध और महावीर का शस्त्र छोड़ देना, बुरे आदमी को मजबूत करने का कारण तो बनेगा ही। अच्छा आदमी मैदान छोड़ देगा, बुरा आदमी ताकतवर हो जाएगा।

दुनिया में जितनी बुराई है, उसमें सिर्फ बुरे लोगों का हाथ होता, तो भी ठीक था, उसमें अच्छे लोगों का हाथ भी है।  थोड़ी समझनी कठिन मालूम पड़ेगी। क्योंकि अच्छे आदमी का सीधा हाथ नहीं है, अच्छे आदमी का हाथ परोक्ष है, इनडायरेक्ट है। अच्छा आदमी छोड्कर चल देता है। अच्छा आदमी लड़ाई के मैदान से हट जाता है। अच्छा आदमी, जहां भी संघर्ष है, वहां से दूर हो जाता है। बुरे आदमी ही शेष रह जाते हैं। और बुरे आदमी ताकत पर पहुंच जाते हैं, तो पूरे समाज को बुरा करने का कारण होते हैं।

इसलिए कृष्‍ण राम को चुन रहे हैं, यह बहुत सोचकर कही गई बात है। राम दोहरे हैं, आदमी बुद्ध जैसे और शक्ति रावण जैसी।

और शायद दुनिया अच्छी न हो सकेगी, जब तक अच्छे आदमी और बुरे आदमी की ताकत के बीच ऐसा कोई संबंध स्थापित न हो। तब तक शायद दुनिया अच्छी नहीं हो सकेगी। अच्छे आदमी सदा पैसिफिस्ट होंगे, शांतिवादी होंगे, हट जाएंगे। बुरे आदमी हमेशा हमलावर होंगे, लड़ने को तैयार रहेंगे। अच्छे आदमी प्रार्थना—पूजा करते रहेंगे, बुरे आदमी ताकत को बढ़ाए चले जाएंगे। अच्छे आदमी एक कोने में पड़े रहेंगे, बुरे आदमी सारी दुनिया को रौंद डालेंगे।

थोड़ा हम सोचें, राम जैसा आदमी सारी पृथ्वी पर खोजना मुश्किल है। एक अनूठा आयाम है राम का। एक अलग ही डायमेंशन है। क्राइस्ट, बुद्ध, महावीर खोजे जा सकते हैं। रावण, या हिटलर, या नेपोलियन, या सिकंदर खोजे जा सकते हैं। राम बहुत अनूठा जोड़ हैं। आदमी बुद्ध जैसे, हाथ में ताकत रावण जैसी।

कृष्‍ण कहते हैं, शस्त्रधारियों में मैं राम हूं।

बुराई में भी सब बुराई नहीं है, और भलाई में भी सब भलाई नहीं है। बुराई में भी ताकत तो भली है, और भलाई में भी ताकत की कमी बुरी है। भले को भी शक्तिशाली होना चाहिए। इस जगत में बुराई कम होगी तभी, जब भला भी शक्तिशाली हो। तभी होगी कम, जब भला भी शक्ति को निर्मित करे। भला शक्ति से भाग जाए, तो वह बुरे आदमी को बुरा होने की सुविधा दे रहा है, मार्ग दे रहा है। वह साथी और संगी बन रहा है— बिना जाने, बिना इच्छा के।

इसलिए राम को, कृष्‍ण कहते हैं कि मैं शस्त्रधारियों में राम हूं।

मैं भला हूं बुद्ध जैसा, लेकिन मैं बुरा भी हो सकता हूं रावण जैसा। बुरा हो सकता हूं का मतलब यह कि मैं बुरे के साथ ठीक उसके ही तल पर युद्ध ले सकता हूं। ठीक उसके ही स्थान पर उससे जूझ सकता हूं। ठीक उसके ही उपकरणों का उपयोग कर सकता हूं।

लेकिन एक बात ध्यान देने जैसी है कि राम जैसा व्यक्ति ही रावण के शस्त्रों का उपयोग कर सकता है। कोई दूसरा व्यक्ति उपयोग करेगा, तो चाहे जीते, चाहे हारे, रावण ही जीतेगा। अगर कोई दूसरा व्यक्ति रावण से लड़ने जाए और रावण के ही शस्त्रों का उपयोग करे, तो चाहे रावण जीते और चाहे वह दूसरा व्यक्ति जीते, कोई जीते, कोई हारे, रावण ही जीतेगा। क्योंकि इस युद्ध में वह दूसरा आदमी धीरे— धीरे रावण जैसा ही हो जाएगा।

रावण की असली पराजय यही है कि रावण राम को अपने जैसा नहीं बना पाया। असली पराजय यही है। राम राम ही बने रहे। उनके व्यक्तित्व में जरा—सी एक कली भी नहीं सूखी। उनका फूल फूल जैसा ही खिला रहा। उनकी तलवार, उनके हाथ के शस्त्र, उनके भीतर की मनुष्यता में जरा—सा भी फर्क न ला पाए। वही रावण की हार है, वहीं रावण पराजित हो गया है। अगर राम भी रावण जैसे हो जाएं, तो जीत भी लें, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई फर्क नहीं पड़ता।

रावण हारा, क्योंकि जिसके हाथों हारा, वह आदमी रावण के तल का न था। इसलिए रावण प्रसन्न है कि राम के हाथ से उसकी मृत्यु घटित हुई। यह अनूठी बात है। रावण प्रसन्न है कि राम के हाथों उसकी मृत्यु हुई। रावण प्रसन्न है कि अब मुक्ति में क्या बाधा रही होगी! अगर खुद राम मुझे मारने को आए हों, इस शरीर से मुझे विदा करते हों, तो मेरे मोक्ष में बाधा ही क्या है!

राम से शत्रुता नहीं है, विरोध है, संघर्ष है। लेकिन राम की ऊंचाई का रावण को बोध है। राम की भिन्नता का भी पता है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं शस्त्रधारियों में राम हूं।

मैं शस्त्र भी ले सकता हूं लेकिन उससे मैं नहीं बदलता। शस्त्र मुझे नहीं बदल सकता है, यह उनका प्रयोजन है। मैं कुछ भी करूं, मेरा करना मेरी आत्मा को नहीं बदल सकता है, यह उनका अभिप्राय है।

ध्यान रखें, हम जो भी करते हैं, उसका जोड़ ही हमारी आत्मा है। राम जो भी करते हैं, उसका जोड़ उनकी आत्मा नहीं है। राम जो भी करते हैं, वह एक तल पर है और उनकी आत्मा बिलकुल दूसरे तल पर है। राम के कृत्यों से हम राम की आत्मा का पता नहीं लगा सकते। राम की आत्मा का पता हो, तो हम राम के कृत्यों को समझ सकते हैं।

कृत्यों से हमारी आत्मा का पता चल जाता है। और हमारे पास दूसरी कोई आत्मा नहीं है। आपने जो—जो किया है, वह अगर अलग कर लिया जाए, तो आप बिलकुल शून्य हो जाएंगे। राम ने जो भी किया है, उसे अलग कर लिया जाए, राम में कोई कमी नहीं पड़ेगी। राम का करना, हम समझें ठीक से, तो बिलकुल बाहरी घटना है। भीतर कुछ भी नहीं घटता है। भीतर कुछ भी नहीं घटता है। इसलिए एक अनूठी घटना राम के जीवन में है, जिसे समझना लोगों को मुश्किल पड़ा है।

राम सीता के चोरी जाने से रावण से लड़ने गए। स्वभावत:, हमें लगेगा कि सीता से भारी आसक्ति रही होगी! अन्यथा राम को और सीताएं भी मिल सकती थीं। राम को क्या कमी हो सकती थी सुंदर स्त्रियों की, वे उपलब्ध हो सकती थीं। राम को भारी आसक्ति रही होगी, लगाव रहा होगा, तब तो इतने बड़े युद्ध में इतनी झंझट में उतरे। और जब तक सीता को वापस न ले आए, तब तक हमें लगता होगा, कि दिन—रात सो न सके होंगे; बेचैन रहे होंगे; परेशान रहे होंगे।

लेकिन फिर दूसरी घटना बहुत मुश्किल में डाल देती है। एक धोबी की जरा—सी चर्चा, वह भी किसी के द्वारा सुनी गई! एक धोबी का अपनी पत्नी से यह कह देना कि मैं कोई राम नहीं हूं कि तू महीनों और सालों घर से नदारद रहे और मैं तुझे वापस घर में रख लूं! उसकी पत्नी एक रात घर से नदारद रह गई होगी। तो मैं कोई राम नहीं हूं! यह खबर राम को लगना और सीता का जंगल में छुड़वा देना।

यह जरा असंगत मालूम पड़ता है। यह आदमी सीता के लिए इतना बड़ा युद्ध लेने गया। इस आदमी ने अपने प्राण सीता के लिए युद्ध में लगा दिए। यह आदमी लडा, वर्षों शक्ति और श्रम व्यय किया, और एक धोबी के कहने से इस आदमी ने सीता को जंगल में छुड़वा दिया!

इस आदमी के कृत्यों से हम इस आदमी को नहीं समझ सकते। यह आदमी क्या करता है, इससे इसकी आत्मा का पता नहीं चलेगा। नहीं तो इन दोनों बातों में मेल बिठाना मुश्किल है। यह आदमी क्या है, उसे हम समझ लें, तो इसके कृत्यों की व्याख्या हो सकती है।

सीता का चोरी जाना युद्ध का कारण नहीं है, केवल युद्ध का बहाना है। सीता के लिए युद्ध नहीं किया गया है। ज्यादा समझ की बात तो यह है कि शायद युद्ध के लिए सीता को चोरी करवाने की व्यवस्था की गई हो। समझ में भी ऐसा ही आता है। क्योंकि राम एक सोने के मृग के पीछे भागते हैं शिकार करने। आप भी धोखे में न आते। हालांकि सोना बहुत आकर्षित करता है, लेकिन सोने का मृग आपको भी दिखाई पड़ता, तो आप समझते, कोई धोखा है। राम को तो सोने का मृग क्या धोखा दे सकता था!

यह जाना आयोजित है। यह जाना जानकर है। यह जाना समझ— बूझकर है। सीता चुराई जा सके, इसके लिए सुविधा देनी जरूरी है। वह जो गलत है, वह गलत कर सके, तभी उसकी गलती प्रकट होती है। वह जो बुरा है, उसे बुरे होने का पूरा मौका दिया जाए, तो ही उसकी बुराई प्रकट होती है। रावण सीता को चुराकर ही झंझट में पड़ गया। उसकी बुराई शिखर पर पहुंच गई, उसका पाप का घड़ा पूरा भर गया। और तब उसे विनष्ट किया जा सकता है।

एक खयाल आपको शायद न हो। भारतीय मन बहुत अनूठा है और कई बार पश्चिम में उसको समझना मुश्किल हो जाता है। कथा यह है कि वाल्मीकि ने रामायण पहले लिखी, राम बाद में हुए। यह बात निश्चित ही असंगत मालूम पड़ती है। लेकिन भारतीय मन में बड़े और खयाल हैं।

राम का व्यक्तित्व एक विराट योजना का हिस्सा मात्र है। वह योजना पहले से नियोजित है, वह योजना पहले से तैयार है। राम सिर्फ एक अभिनेता हैं उस योजना में। इसलिए सीता चोरी जाती है, तो युद्ध को चले जाते हैं। और एक धोबी एतराज उठाता है, तो सीता को जंगल भेज देते हैं। राम जैसे इन किन्हीं कृत्यों के बीच में नहीं हैं। बाहर खड़े हैं। जैसे ये सारे कृत्य एक अभिनय के मंच पर किए जा रहे हैं, जिनसे राम का कुछ लेना—देना नहीं है। जो करना जरूरी है, वे कर रहे हैं। जो होना चाहिए, वह हो रहा है। लेकिन वे बाहर खड़े हैं। उनकी आत्मा इनमें से किसी से भी छू नहीं जाती। कोई चीज उनको स्पर्श नहीं कर रही है।

कृष्‍ण का यह कहना कि मैं धनुर्धारियों में, शस्त्रधारियों में राम हूं इस बात की खबर देना है कि मैं जो करता हूं उससे तू मेरा पता नहीं लगा सकेगा। मेरा होना, मेरे करने के पार है। वह जो अस्तित्व है मेरा, वह मेरे कृत्य से बहुत ऊपर है।

हमारी हालत उलटी है। हमारा अस्तित्व हमारे कृत्य से भी नीचे होता है। उसे हम समझ लें, तो राम की बात हमारे खयाल में आ जाए। रास्ते पर आप जाते हैं और एक भिखारी आपसे पैसा मांगता है। अगर आस—पास कोई न हो, तो आप भिखारी की बिना फिक्र किए आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन अगर चार लोग देखने वाले हों और प्रतिष्ठा का सवाल आ जाए, तो आप भिखारी को दो पैसे दे देते हैं। वह आप भिखारी को नहीं देते, अपनी प्रतिष्ठा को देते हैं।

इसलिए भिखारी भी अकेले आदमी को नहीं घेरते। दो—चार मित्र साथ में हों, तो पैर पकड़ लेते हैं। क्योंकि वह तीन की आंखों से ही पैसा मिलने वाला है, क्योंकि उन तीन के सामने यह भी तो जरा अपमानजनक है कि दो पैसे न दे सके। आपका कृत्य तो मालूम होता है कि आपने दया की, लेकिन आपका अस्तित्व आपके कृत्य से नीचे होता है। आपकी आत्मा आपके कृत्य से भी नीची होती है। दान वह नहीं है।

जहां अहंकार तृप्त हो रहा हो, वहां दान नहीं है, वह चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा। जब तक अहंकार ही न दिया जाए, तब तक दान नहीं है। अहंकार के लिए कुछ दिया जाए, तो दान नहीं है। उसका संबंध दूसरे से नहीं है। आप जब भिखारी को देते हैं, तो उसका संबंध भिखारी से नहीं है, अपने से है। आप अपने अहंकार में दो पैसे डाल रहे हैं, ताकि अहंकार और मजबूत हो जाए। भिखारी का पात्र तो केवल आपके लिए एक निमित्त है।

लेकिन भिखारी को दो पैसे मिल जाते हैं। उसे प्रयोजन नहीं कि आपने किसलिए दिए। भिखारी को यह भी लग सकता है कि आपने दया की। हालांकि किसी भिखारी को ऐसा नहीं लगता। और जब आप देकर चले जाते हैं, तो भिखारी हंसता है कि ठीक बेवकूफ बनाया। उसका भी अपना अहंकार है, आपका ही नहीं है। वह भी भलीभांति जानता है कि किस तरह के लोग बुद्ध बन जाते हैं, किस हालत में बन जाते हैं। वह भी पीछे से हंसता है। सामने तो दुआ देता दिखाई मालूम पड़ता है। मानता तो वह उसी आदमी को है, जो बिना दिए अकड़कर चला जाता है। मानता तो वह भी उसी को है। समझता है कि इसको मैं बना नहीं पाया।

राम ठीक इसके विपरीत हैं। वे जो कर रहे हैं वह बहुत नीचा है। वे जो हैं, वह बहुत ऊपर है। कृष्ण कहते हैं, मैं जो कर रहा हूं उससे मुझे मत तौलना। मैं शस्त्रधारियों में राम जैसा हूं।

मछलियों में मगरमच्छ, नदियों में गंगा हूं। और हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी मैं ही हूं।

गंगा के प्रतीक को भी समझने जैसा है। गंगा के साथ हिंदू मन बड़े गहरे में जुड़ा है। गंगा को हम भारत से हटा लें, तो भारत को भारत कहना मुश्किल हो जाए। सब बचा रहे, गंगा हट जाए, भारत को भारत कहना मुश्किल हो जाए। गंगा को हम हटा लें, तो भारत का सारा साहित्य अधूरा पड़ जाए। गंगा को हम हटा लें, तो भारत के न मालूम कितने ऋषियों के नाम खो जाएं। गंगा को हम हटा लें, तो हमारा तीर्थ ही खो जाए, हमारे सारे तीर्थ की भावना खो जाए।

गंगा के साथ भारत के प्राण बड़े पुराने दिनों से कमिटेड हैं, बड़े गहरे में जुड़े हैं। गंगा जैसे हमारी आत्मा का प्रतीक हो गई है। मुल्क की भी अगर कोई आत्मा होती हो और उसके प्रतीक होते हों, तो गंगा ही हमारा प्रतीक है। पर क्या कारण होगा गंगा के इस गहरे प्रतीक बन जाने का कि हजारों—हजारों वर्ष पहले कृष्‍ण भी कहते हैं कि नदियों में मैं गंगा हूं?

गंगा कोई नदियों में विशेष उस अर्थ में नहीं है। गंगा से बड़ी नदियां हैं, गंगा से लंबी नदियां हैं। गंगा से बड़ी विशाल नदियां पृथ्वी पर हैं। गंगा कोई लंबाई में, विशालता में, चौड़ाई में, किसी दृष्टि से कोई बहुत बड़ी गंगा नहीं है। कोई बहुत बड़ी नदी नहीं है। ब्रह्मपुत्र है, और अमेजान है, और ह्वांगहो है, और सैकड़ों नदियां हैं, जिनके सामने गंगा फीकी पड़ जाए।

पर गंगा के पास कुछ और है, जो पृथ्वी पर किसी भी नदी के पास नहीं है। और उस कुछ और के कारण भारतीय मन ने गंगा के साथ एक तालमेल बना लिया। एक तो बहुत मजे की बात है कि पूरी पृथ्वी पर गंगा सबसे ज्यादा जीवंत नदी है, अलाइव। सारी नदियों का पानी आप बोतल में भरकर रख दें, सभी नदियों का पानी सड़ जायेगा, गंगा  का नहीं सड़ेगा। केमिकली गंगा बहुत विशिष्‍ट है। उसका पानी डिटेरिओरेट नहीं होता, सड़ता नहीं। वर्षों रखा रहे, बंद बोतल में भी वह अपनी पवित्रता, अपनी स्‍वच्‍छता कायम रखता है।

ऐसा किसी नदी का पानी पूरी पृथ्‍वी पर नहीं है। सभी नदियों के पानी इस अर्थों में कमजोर है। गंगा का पानी इस अर्थों में विशेष मालूम पड़ता है। उसका विशेष केमिकल गुण मालूम पड़ता है।

गंगा में इतनी लाशों को हम फेंकते है, गंगा में हमने हजारों—हजारों वर्षों से लाशों बहाई है। अकेले गंगा के पानी में सब कुछ लीन हो जाता हे। हड्डी भी। दूनियां की किसी भी नदी में यह क्षमता नहीं है। हड्डी भी पिधलकार लीन हो जाती है। बह जाती है और गंगा को अपवित्र नहीं कर पाती। गंगा सभी को आत्‍म सात कर लेती है। हड्डी भी। दूनियां कि किसी भी नदी में लाश को डाल दो वह पानी सड़ने लग जायेगा। पानी कमजोर है और लाश मजबूत है। गंगा में लाश कमजारे पड़ जाती है। बिखर जाती है। मिल जाती है। अपने तत्‍वों में विलिन हो जाती है। गंगा अछूति बहती रहती है। इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

गंगा के पानी की बड़ी केमिकल परीक्षाए हुई है। वैज्ञानिक। और अब तो यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया है कि उसका पानी असाधारण है।

यह क्यों है असाधारण, यह भी थोड़ी हैरानी की बात है। क्योंकि गंगा जहां से निकलती है, वहां से बहुत नदियां निकलती हैं। गंगा जिन पहाड़ों से गुजरती है, वहां से कई नदियां गुजरती हैं। तो गंगा में जो खनिज और जो तत्व मिलते हैं, वे और नदियों में भी मिलते हैं। फिर गंगा में कोई गंगा का ही पानी तो नहीं होता, गंगोत्री से तो बहुत छोटी—सी धारा निकलती है। फिर और तो सब दूसरी नदियों का पानी ही गंगा में आता है। विराट धारा तो दूसरी नदियों के पानी की ही होती है।

लेकिन यह बड़े मजे की बात है कि जो नदी गंगा में नहीं मिली, उस वक्त उसके पानी का गुणधर्म और होता है और गंगा में मिल जाने के बाद उसी पानी का गुणधर्म और हो जाता है! क्या होगा कारण? केमिकली तो कुछ पता नहीं चल पाता। वैज्ञानिक रूप से इतना तो पता चलता है कि विशेषता है और उसके पानी में खनिज और केमिकल्स का भेद है। विज्ञान इतना ही कह भी सकता है। लेकिन एक और भेद है, वह भेद विज्ञान के खयाल में आज नहीं तो कल आना शुरू हो जाएगा। और वह भेद है, गंगा के पास लाखों—लाखों लोगों का जीवन की परम अवस्था को पाना।

यह मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पानी, जब भी कोई व्यक्ति, अपवित्र व्यक्ति पानी के पास बैठता है— अंदर जाने की तो बात अलग—पानी के पास भी बैठता है, तो पानी प्रभावित होता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों से आच्छादित हो जाता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों को अपने में ले लेता है।

लाखों—लाखों वर्ष से भारत के मनीषी गंगा के किनारे बैठकर प्रभु को पाने की चेष्टा करते रहे हैं। और जब भी कोई एक व्यक्ति ने गंगा के किनारे प्रभु को पाया है, तो गंगा उस उपलब्धि से वंचित नहीं रही, गंगा भी आच्छादित हो गई है। गंगा का किनारा, गंगा की रेत के कण—कण, गंगा का पानी, सब, इन लाखों वर्षों में एक विशेष रूप से स्म्प्रिचुअली चार्च, आध्यात्मिक रूप से तरंगायित हो गया है।

इसलिए हमने गंगा के किनारे तीर्थ बनाए। इसलिए लोग गंगा की यात्रा करते रहे। इसलिए लोग सोचते थे कि गंगा में जाकर पाप धुल जाएंगे। वह पाप गंगा की वजह से नहीं धुल सकते, लेकिन गंगा के पास जो मिल्यु है, गंगा के पास जो वातावरण है, वह जो लाखों—लाखों वर्षों की छाया है, उस छाया में जरूर आप अगर अपने हृदय के द्वार खोलें, तो आप दूसरे आदमी होकर वापस लौट सकते हैं। गंगा एक आध्यात्मिक यात्रा भी है, एक नदी ही नहीं। और इस तरह के बहुत—से प्रयोग हुए हैं।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं नदियों में गंगा हूं।

गंगा साधारण नदी नहीं है, एक आध्यात्मिक यात्रा है, और एक आध्यात्मिक प्रयोग। लाखों वर्षों तक लाखों लोगों का उसके निकट मुक्ति को पाना, परमात्मा के दर्शन को उपलब्ध होना, आत्म— साक्षात्कार को पाना! लाखों लोगों का उसके किनारे आकर अंतिम घटना को उपलब्ध होना! वे सारे लोग अपनी जीवन—ऊर्जा को गंगा के पानी पर उसके किनारों पर छोड़ गए हैं।

इसलिए कृष्‍ण कहते हैं कि मैं नदियों में गंगा हूं।

और हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य मैं ही हूं। तथा विद्याओं में अध्यात्म—विद्या अर्थात ब्रह्म—विद्या, और परस्पर विवाद करने वालों में तत्व—निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद, तर्क मैं ही हूं न्याय मैं ही हूं।

ये दो बातें बहुत बहुमूल्य हैं। विद्याओं में अध्यात्म—विद्या। अनंत विद्याएं हैं, लेकिन अध्यात्म—विद्या गुणात्मक रूप से भिन्न है।

अध्यात्म—विद्या उसकी विद्या है, जिससे हम स्वयं को जानते हैं। और तब यह भी हो सकता है कि एक अध्यात्म ज्ञानी कुछ भी और न जानता हो। 

क्योंकि मान्यता यह है कि जिसने सब जान लिया और स्वयं को न जाना, उसके जानने का उपयोग क्या? और जिसने कुछ भी न जाना और स्वयं को जान लिया, उसने सब जान लिया। क्योंकि अंततः जीवन का जो परम आनंद है, वह स्वयं को जानने से घटित होगा। और अंतत: मृत्यु के भी पार जाने वाला जो अमृत सूत्र है, वह स्वयं को जानने से घटित होगा। और अंतत: सब जाना हुआ जो हमारा पराया है, वह पड़ा रह जाएगा; जो मेरे साथ जा सकेगा, वह मेरा स्वयं का बोध है।

मृत्यु के पार जिसे न ले जाया जा सके, उसे हम ज्ञान नहीं मानते। हम तो ज्ञान उसे मानते हैं कि लपटों में जब शरीर भी जल जाए, तब भी मेरा ज्ञान न जले। आग भी मेरे ज्ञान को न जला सके, मृत्यु भी मेरे ज्ञान को नष्ट न कर सके, तो ही वह ज्ञान है। अन्यथा उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।

तो हम सब जान लें, वह जानना ऊपरी है। उपयोगी हो सकता है, लेकिन आत्यंतिक उसका मूल्य नहीं है। अंततः वह व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए हम बड़े से बड़े पंडित को भी, जो बहुत जानता हो, मरते वक्त वैसा ही दीन ही जाते देखते हैं, जैसा कोई भी मर रहा हो। मृत्यु बता देती है कि आपने कुछ जाना कि नहीं जाना। मृत्यु खबर दे देती है।

ब्रह्म—विद्या, अध्यात्म—विद्या का अर्थ है, वह विद्या, वह सुप्रीम साइंस, जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो हम हैं। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो सब जान रहा है। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जिसकी कोई मृत्यु नहीं, जिसका कोई जन्म नहीं।

ब्रह्म—विद्या का अर्थ वह विद्या है, जिससे हम उसे जानते हैं, जो सब जानता है। गणित आप जिससे जानते हैं, फिजिक्स आप जिससे जानते हैं, केमिस्ट्री आप जिससे जानते हैं, उस तत्व को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है। जानने वाले को जान लेना ब्रह्म—विद्या है। ज्ञान के स्रोत को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है। भीतर जहां चेतना का केंद्र है, जहां से मैं जानता हूं आपको, जहां से मैं देखता हूं आपको; जिससे मैं देखता हूं उसे भी देख लेना, उसे भी जान लेना, उसे भी पहचान लेना, उसकी प्रत्यभिज्ञा, उसका पुनर्स्मरण ब्रह्म—विद्या है। कृष्ण कहते हैं, विद्याओं में मैं ब्रह्म—विद्या हूं।

इसलिए भारत ने फिर बाकी विद्याओं की बहुत फिक्र नहीं की। भारत के और विद्याओं में पिछड़े जाने का बुनियादी कारण यही है। भारत ने फिर और विद्याओं की फिक्र नहीं की, ब्रह्म—विद्या की फिक्र की थी।

लेकिन उसमें अड़चन है, क्योंकि ब्रह्म—विद्या जानने को कभी लाखों—करोड़ों में एक आदमी उत्सुक होता है। पूरा देश ब्रह्म—विद्या जानने को उत्सुक नहीं होता। और भारत के जो श्रेष्ठतम मनीषी थे, वे ब्रह्म—विद्या में उत्सुक थे। और भारत का जो सामान्यजन था, उसकी कोई उत्सुकता ब्रह्म—विद्या में नहीं थी। उसकी उत्सुकता तो और विद्याओं में थी। लेकिन सामान्यजन और विद्याओं को विकसित नहीं कर सकता। विकसित तो परम मनीषी करते हैं, और परम मनीषी उन विद्याओं में उत्सुक ही न थे।

पश्चिम में दूसरी विद्याएं विकसित हो सकी, क्योंकि पश्चिम के जो बड़े मनीषी हैं, वे और विद्याओं में उत्सुक हैं। इसलिए एक अदभुत घटना घटी। पश्चिम ने सब विद्याएं विकसित कर लीं और आज पश्चिम को लग रहा है कि वह आत्म— अज्ञान से भरा हुआ है।

और पूरब ने आत्म—ज्ञान विकसित कर लिया और आज पूरब को लग रहा है कि हमसे ज्यादा दीन और दरिद्र और भुखमरा दुनिया में कोई भी नहीं है।

हमने एक अति कर ली, परम विद्या पर हमने सब लगा दिया दांव। उन्होंने दूसरी अति कर ली। उन्होंने आत्म—विद्या को छोड्कर बाकी सब विद्याओं पर दांव लगा दिया। बड़ी उलटी बात है। वे आत्म—अज्ञान से पीड़ित हैं और हम शारीरिक दीनता और दरिद्रता से पीड़ित हैं।

यह जो परम विद्या है, इस परम विद्या और सारी विद्याओं का जब संतुलन हो, तो पूर्ण संस्कृति विकसित होती है। इसलिए न तो पूरब और न पश्चिम ही पूर्ण संस्कृतियां विकसित कर पाए। फिर भी अगर चुनाव करना हो, अगर फिर भी चुनाव करना हो, तो परम विद्या ही चुनने जैसी है, सारी विद्याएं छोड़ी जा सकती हैं। क्योंकि और सब पाकर कुछ भी पाने जैसा नहीं है।

कृष्ण कहते हैं, मैं परम विद्या हूं सब विद्याओं में।

लेकिन यह बात आप ध्यान रखना, और विद्याओं का वे निषेध नहीं करते हैं, और विद्याओं में जो श्रेष्ठ है, उसकी सूचना भर दे रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि सिर्फ अध्यात्म—विद्या को खोजना है, बाकी सब छोड़ देना है।

यह भी सोचने जैसा है कि अध्यात्म—विद्या परम विद्या तभी हो सकती है, जब दूसरी विद्याएं भी हों। नहीं तो वह परम विद्या नहीं रह जाएगी। आप कोई मंदिर का अकेला सोने का शिखर बना लें और दीवालें न हों, तो समझ लेना कि शिखर जमीन में पड़ा हुआ लोगों के पैरों की ठोकर खाएगा। मंदिर का स्वर्ण—शिखर आकाश में उठता ही इसलिए है कि पत्थर की दीवाले उसे सम्हालती हैं। अध्यात्म—विद्या का शिखर भी तभी सम्हलता है, जब और सारी विद्याएं दीवालें बन जाती हैं और उसे सम्हालती हैं। 

अब तक हम कहीं भी मंदिर नहीं बना पाए। हमने शिखर बना लिया, पश्चिम ने मंदिर बना लिया। जब तक हमारा शिखर पश्चिम के मंदिर पर न चढ़े, तब तक दुनिया में पूर्ण संस्कृति पैदा नहीं हो सकती।

और अंतिम बात।

कृष्ण ने कहा, एवं परस्पर विवाद करने वालों में तत्व—निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद, तर्क, न्याय मैं हूं।

तर्क दो तरह के हैं। एक तो तर्क है, जिसमें हम दूसरे को गलत सिद्ध करना चाहते हैं। वह क्या कह रहा है, उससे कोई संबंध नहीं है। दूसरे को गलत करना चाहते हैं, वह क्या कह रहा है, उससे कोई संबंध नहीं है। एक तो तर्क है, जिसमें हम अपने अहंकार को सिद्ध करना चाहते हैं, दूसरे को गलत करना चाहते हैं।

इसलिए कई दफा ऐसा होता है कि आपकी ही बात भी अगर दूसरा कह रहा हो, तो भी आप उसको गलत सिद्ध किए बिना नहीं मान सकते। दूसरा सदा गलत होता है! होना चाहिए। आप सदा सही हैं। अपने लिए आप कुछ भी तर्क का उपयोग करते हैं। लेकिन यह सत्य की जिज्ञासा से नहीं, यह केवल अहंकार की तृप्ति के लिए है। ऐसा तर्क भ्रष्ट तर्क है। इसको भारत कुतर्क कहता है। यह कितना ही विकसित हो जाए, इससे कोई मनुष्य के जीवन में रूपांतरण नहीं होता।

एक और तर्क भी है, जो हम सत्य की खोज के लिए करते हैं। तब यह सवाल नहीं है कि दूसरा गलत कह रहा है। तब सवाल यह है कि सही क्या है? कौन कह रहा है, यह मूल्यवान नहीं है। क्या है सही, यही मूल्यवान है। कोई भी सही कह रहा हो, तो हम तर्क की कोशिश करते हैं, उस सही की जांच के लिए। तर्क तो एक कसौटी है। जैसे कोई सोने को कसता है कसौटी पर, ऐसे ही तर्क विचार की क्षमता, निर्णय और निर्णय का शास्त्र एक कला है। उस पर कसना है, कि जो भी कहा जा रहा है, वह कितने दूर तक सही है।

लेकिन हम नहीं कस पाते, क्योंकि हम सही को तो पहले से ही जानते हैं! हम सब मानते हैं कि सत्य तो हमें पता ही है। इसलिए अगर दूसरा हमसे मेल खा रहा है, तो सही है। और अगर हमसे मेल नहीं खा रहा है, तो गलत है। हम कसौटी हैं।

हम कसौटी नहीं हो सकते। तर्क कसौटी है। और तर्क तो बिलकुल निष्पक्ष कसौटी है, अपने को भी उसी पर कसो और दूसरे को भी उसी पर कसो। और डबल बाइंड, दोहरा चित्त न हो, दूसरे के लिए कुछ और, हमारे लिए कुछ और।

कृष्‍ण कहते हैं, वैसा मैं तर्क नहीं हूं। सत्य के निर्णय के लिए जो आतुर हैं, सत्यनिष्ठ, जिन्हें इससे प्रयोजन नहीं है कि पक्ष में पड़ेगा कि विपक्ष में, मैं हारूंगा कि जीतूंगा; जिन्हें प्रयोजन इतना है कि सत्य क्या है, उसकी परख हो जाए, उसका पता चल जाए; ऐसे सत्य के लिए किया गया वाद, ऐसे सत्य की जिज्ञासा के लिए किया गया तर्क मैं हूं।

कृष्‍ण कहते हैं, ऐसे तर्क नहीं, लेकिन वह तर्क जो सत्य की खोज के लिए किया जाता है। तो मैं वाद, सत्य के खोजियो के लिए किया जाने वाला वाद हूं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 10 भाग 11

 काम का राम में रूपांतरण


आयुधानामहं वज्रं धेनूनामास्‍मि कामधुक्।

प्रजनश्चास्थि कन्दर्प: सर्याणामस्मि वासुकि:।। 28।।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।

पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम्।। 29।।

प्रह्वादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्।

मृगाणां न मृगेन्द्रोउहं वैनतेयश्ल पक्षिणाम्।। 3०।।


और हे अर्जुन मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूं, और संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूं, सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं।

तथा मैं नागों में शेषनाग और जलचरों में उनका अधिपति वरुण देवता हूं और पितरों में अर्यमा नामक पित्रेश्वर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूं।

और हे अर्जुन मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गिनती करने वालों में समय हूं, तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरूड़ मैं ही हूं।


और हे अर्जुन, शस्त्रों में वज्र, गौओं में कामधेनु, और जीवन की उत्पत्ति का हेतु कामदेव मैं हूं।

काम को भी भस्म तभी किया जा सकता है, जब काम हो; नहीं तो काम को भस्म नहीं किया जा सकता। भस्म भी हम उसे ही कर सकते हैं, जो मौजूद हो। और मजे की बात तो यह है कि काम को केवल वही भस्म कर सकता है, जिसमें काम इतना प्रगाढ़ हो कि अग्नि बन जाए। छोटे—मोटे काम की वासना वाला आदमी काम को भस्म नहीं कर पाता। काम की भी लपट चाहिए।

और यह दृष्टि, कि काम के होने से कोई देवता अपमानित हो जाता है, अपनी ही नासमझी पर निर्भर है। क्योंकि कृष्‍ण इस सूत्र में कहते हैं कि जीवन की उत्पत्ति का कारण कामदेव मैं हूं। 

कुछ मौलिक बातें आपसे कहूं तब यह सूत्र आपकी समझ में आ सके। यह सूत्र कठिन मालूम पड़ेगा। इसलिए नहीं कि कठिन है, इसलिए कि हमारी बुद्धि न मालूम कितनी व्यर्थ की धारणाओं से भरी है। और न मालूम कितनी निंदाएं और न मालूम कितने विक्षिप्त खयाल हमारे मन को घेरे हुए हैं।

जीवन की समस्त उत्पत्ति काम से ही है। जगत की सृष्टि भी काम से ही है। सृजन का सूत्र ही काम है। अगर ब्रह्मा ने भी जगत को उत्पन्न किया, तो शास्त्र कहते हैं, कामना पैदा हुई। काम का जन्म हुआ ब्रह्मा में, तो ही उत्पन्न होगा कुछ। इस जगत में जब भी कुछ पैदा होता है, तो पैदा होने का सूत्र ही काम है।

और ऐसा नहीं है कि बच्चे ही जब पैदा होते हैं, तभी काम की शक्ति काम आती है। नहीं, कुछ और भी पैदा होता है— एक कविता पैदा होती है, एक चित्र पैदा होता है, एक मूर्ति निर्मित होती है—जहां भी कोई व्यक्ति कुछ सृजन करता है, तो उसके भीतर जो ऊर्जा, जो शक्ति काम में आती है, वह काम ही है। उत्पत्ति मात्र काम है। सृजन मात्र काम है।

इसलिए जो लोग इस सत्य को बिना समझे काम से शत्रुता में लग जाएंगे, उनका जीवन निष्किय, और उनका जीवन सृजनहीन और उनका जीवन एक लंबी मृत्यु हो जाएगी। काम से ही सब उत्पन्न होता है।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि काम में ही सब समाप्त हो जाता है। काम के पार जाया जा सकता है। लेकिन वह पार जाना भी काम के ही मार्ग से होता है, वह सृजन भी कामवासना के ही मार्ग से होता है।

कामवासना क्या है और यह कामदेव की धारणा क्या है?

शायद पूरी पृथ्वी पर हिंदू धर्म अकेला धर्म है, जिसने काम को भी अपनी जीवन—दृष्टि में समाहित किया है। यह बड़े साहस की बात है। क्योंकि सामान्यतया धर्म काम के विरोधी हैं। और हम सोच भी नहीं सकते कि कोई ईसाई परम पुरुष कह सके कि मैं कामदेव हूं। हम सोच भी नहीं सकते कि कोई जैन धारणा इस बात की स्वीकृति दे सके ईश्वर को कहने की कि मैं कामदेव हूं। यह असंभव है, सोचना भी असंभव है। लेकिन कृष्‍ण इसे सहजता से कह रहे हैं। और बड़े साहस की बात है।

साहस की इसलिए है कि हम केवल कामवासना के एक ही रूप से परिचित हैं। और इसलिए जब भी कामवासना का खयाल भी हमारे मन में आता है, तो जो चित्र हमारे सामने मौजूद होता है, वह हमारी ही कामवासना के अनुभव का है। हमें कामवासना के दूसरे रूप का कोई पता ही नहीं है।

एक ही ऊर्जा है मनुष्य के भीतर, उसे हम कोई भी नाम दें। अगर वही ऊर्जा नीचे की तरफ प्रवाहित होती है, तो कामवासना और सेक्स बन जाती है। और वही ऊर्जा अगर ऊपर की तरफ प्रवाहित होने लगती है, तो अध्यात्म, कुंडलिनी, हम जो भी नाम देना चाहें। वही ऊर्जा, शक्ति वही है; सिर्फ आयाम, दिशा बदल जाती है।

नीचे की ओर गिरती हो वही शक्ति, तो वासना हो जाती है, ऊपर की ओर उठती हो वही शक्ति, तो आत्मा हो जाती है। नीचे की ओर गिरती हो, तो दूसरों को पैदा करती है, ऊपर की ओर उठने लगे, तो स्वयं को जन्म देती है। नीचे की ओर बहना हो उसे, तो किसी और को आधार बनाना पड़ता है, ऊपर की ओर बहना हो, तो स्वयं ही आधार होना पड़ता है। नीचे की ओर बहती हो काम—ऊर्जा, तो जननेंद्रिय के मार्ग से प्रकृति में लीन हो जाती है; और अगर ऊपर की ओर बहने लगे, तो सहस्रार से लीन होकर ब्रह्म में लीन हो जाती है।

काम—ऊर्जा दो स्थानों से विलीन होती है। या तो जननेंद्रिय से, जो कि पहला चक्र है; और या सहस्रार से, जो अंतिम चक्र है। ये दो छोर हैं आपके व्यक्तित्व के। काम—केंद्र से आप प्रकृति से जुड़े हैं और सहस्रार से आप परमात्मा से जुड़े हैं। लेकिन शक्ति एक ही है। लेकिन हमारी हालत ऐसी है कि जिस आदमी को आग का एक ही परिचय हो, घर जल जाने का, वह सोच भी नहीं सकता कि आग रोटी भी पकाती है, और वह सोच भी नहीं सकता कि रात के अंधेरे में आग प्रकाश भी देती है; और वह सोच भी नहीं सकता कि ठंड से मरते हुए आदमी के लिए आग जीवन भी हो जाती है। जिसका एक ही अनुभव हो कि उसने आग से मकान को जलते और बरबाद होते देखा हो, उसे आग के दूसरे रूपों का कोई भी पता नहीं होता।

हम कामवासना के एक ही रूप को जानते हैं, जिससे हम अपनी जीवन—शक्ति को क्षीण होते देखते हैं। हम एक ही रूप को जानते हैं, जिसके कारण हमारे जीवन में सारी विपत्तियां और सारे उपद्रव खड़े होते हैं। हम एक ही रूप को जानते हैं, जिससे हमारे आस—पास संसार निर्मित होता है। हम एक ही रूप जानते हैं, जिससे क्रोध, लोभ, भय, ईर्ष्या, वैमनस्य, सबका जन्म होता है। हम कामवासना का अधोगामी रूप ही जानते हैं।

इसलिए अगर कोई कहे कि कृष्‍ण भी कामदेव हैं, तो हमें बहुत घबड़ाहट होती है। क्योंकि काम का जो रूप हम जानते हैं, वह सोचकर भी हमें घबड़ाहट होती है। हम तो चाहेंगे कि कृष्ण कामवासना के बिलकुल ऊपर हों, बिलकुल दूर हों, उनको छू भी न जाए। यह हमारा ही अनुभव है, जिसके कारण हम ऐसा सोचते हैं। लेकिन कृष्‍ण जब कहते हैं, मैं कामदेव हूं, तो वे कामवासना के दूसरे रूप को भी समाहित कर रहे हैं। वह दूसरा रूप ही हमारी दृष्टि में नहीं है, इसलिए हमें अड़चन और कठिनाई होती है। जैसे काम की शक्ति, सेक्स एनर्जी बाहर की तरफ बहती है, नीचे की तरफ बहती है, दूसरे शरीरों की तरफ बहती है—यह बहाव का एक ढंग है।


और ध्यान रहे, दुनिया में ऐसा कोई भी बहाव नहीं है, जो विपरीत न बह सके। अगर मैं चलकर आपके पास आ सकता हूं तो लौटकर आपसे दूर भी जा सकता हूं। ऐसा कोई भी रास्ता नहीं है, जो एक ही तरफ चलता हो। जिस रास्ते से चलकर आप यहां तक आए हैं, उसी से चलकर आप अपने घर वापस लौट जाएंगे। कोई ऐसा दरवाजा नहीं है, जिससे आप बाहर आते हों और उसी से आप भीतर न जा सकते हों। हर द्वार, हर मार्ग, हर प्रवाह दो आयामों में होता है, दो दिशाओं में होता है। आप पीछे लौट सकते हैं।

कामवासना का हम एक ही द्वार जानते हैं और एक ही रूप, दूसरे की तरफ प्रवाहित होने वाला। और ध्यान रहे, जब भी कोई दूसरे की तरफ प्रवाहित होता है, तो परतंत्र हो जाता है। इसलिए कामवासना गहरे में हमारे लिए एक परतंत्रता है। इसलिए जो लोग भी स्वतंत्र होना चाहते हैं, मुक्त होना चाहते हैं, उनका संघर्ष कामवासना से शुरू हो जाता है।

इस दुनिया में गहरी से गहरी गुलामी सेक्स की गुलामी है। दूसरे आदमी पर निर्भर होना पड़ता है। दूसरा अपने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। दूसरे के इर्द—गिर्द चक्कर काटना पड़ता है, परिक्रमा करनी पड़ती है। एक गहरी गुलामी है।

इसलिए जो लोग भी मुक्ति की दिशा में चलते हैं, उनका मन अगर वितृष्णा से भर जाता हो कामवासना से, तो आश्चर्य नहीं है; तर्कयुक्त है, स्वाभाविक है। लेकिन शत्रुता से भर जाने से कुछ भी न होगा। और लड़ने से भी कुछ न होगा।

मजे की बात है! अगर मुझे स्त्री आकर्षित करती है या पुरुष आकर्षित करता है या कोई मुझे आकर्षित करता है, तो लड़ने वाला, जो मुझे आकर्षित करता है, उससे भागेगा। लेकिन मैं कहीं भी भाग जाऊं, जो मेरे भीतर आकर्षित होता था, वह मेरे साथ ही रहेगा। मैं एक स्त्री को छोड्कर भाग सकता हूं, एक पुरुष को छोड्कर भाग सकता हूं लेकिन जो भी मेरे भीतर प्रवाहित होता था नीचे की ओर, वह मेरे साथ ही चला जाएगा। वह अ को छोड़ देगा तो ब पर आकर्षित होगा, ब को छोड़ देगा तो स पर आकर्षित होगा। और मैं यह भी कर सकता हूं कि सबको छोड्कर निपट जंगल में बैठ जाऊं, तो मेरी कल्पना में ही मैं उन सबको पैदा करना शुरू कर दूंगा, जो मेरे आकर्षण के बिंदु बन जाएंगे।

स्त्रियों को छोड्कर भाग जाने से कोई स्त्रियों से मुक्त नहीं होता। स्त्रियों के बीच रहकर कभी मुक्त हो भी जाए, भागकर तो मुक्त होना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि जिससे हम भागते हैं, वह हमारा पीछा करता है कल्पना में।

और ध्यान रहे, कोई भी स्त्री वस्तुत: इतनी सुंदर नहीं है, जितनी कल्पना में सुंदर हो जाती है। न कोई पुरुष इतना सुंदर है, जितना कल्पना में सुंदर हो जाता है। कल्पना कहीं फ्रस्ट्रेट ही नहीं होती, कल्पना को कहीं विषाद का क्षण ही नहीं आता! वास्तविक अस्तित्व में तो हम सब विषाद को उपलब्ध हो जाते हैं।

जो शरीर कल बहुत सुंदर मालूम पड़ता था, दो दिन बाद साधारण मालूम पड़ने लगेगा। चार दिन बाद उससे ही घबड़ाहट होने लगेगी। पंद्रह दिन के बाद उससे भागने का मन भी होने लगेगा। लेकिन कल्पना में ऐसा क्षण कभी नहीं आता। कल्पना बड़ी सुगंधित है। कल्पना के शरीरों से न पसीना बहता है। न कल्पना के शरीरों से दुर्गंध आती है। न कल्पना के शरीर झगड़ते हैं, लड़ते हैं। कल्पना के शरीर तो आपकी ही कल्पनाएं हैं, आपको कभी भी दुख नहीं देते। लेकिन वास्तविक शरीर तो दुख देंगे। वास्तविक व्यक्ति तो दुख देंगे। वास्तविक व्यक्तियों के बीच तो कलह और संघर्ष होगा।

इसलिए जो लड़ने में लग जाएगा, वह भागेगा। लेकिन जो समझने में लगेगा, वह अपनी धारा को बदलेगा, भागेगा नहीं। दूसरे से भागने का कोई प्रयोजन नही है। मेरी ही शक्ति जो दूसरे की तरफ प्रवाहित होती है, वह मेरी तरफ प्रवाहित होने लगे, यह है सवाल।

और जब काम की ऊर्जा अपनी तरफ बहनी शुरू होती है, स्व की तरफ बहनी शुरू होती है, पर की तरफ नहीं, तब हमें कामवासना का वास्तविक अर्थ और प्रयोजन पता चलता है। तब हमें पता चलता है कि जिसे हमने जहर समझा था, वह अमृत हो जाता है। और तब हमें पता चलता है कि जिसे हमने परतंत्रता समझा था, वही हमारी स्वतंत्रता बन जाती है। और तब हमें पता चलता है कि जिसे हमने नर्क का द्वार समझा था, वही हमारी मुक्ति का द्वार भी है।

जब कृष्‍ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं तो इस सारी दृष्टि को सामने रखकर कह रहे हैं।

काम की ऊर्जा हमारी शक्ति का नाम है। हम जो भी हैं, काम की ऊर्जा के संघट हैं। अगर हमारी ऊर्जा बाहर बहती रहे, तो बिखर जाती है, दूर फैलती चली जाती है। अगर यही ऊर्जा भीतर आने लगे, तो संगठित होने लगती है, इंटीग्रेट होने लगती है, क्रिस्टलाइज होने लगती है, केंद्रित होने लगती है। और धीरे— धीरे जब सारी बाहर जाने वाली ऊर्जा स्वयं पर ही आकर इकट्ठी हो जाती है, तो जो क्रिस्टलाइजेशन, जो सेंटरिग, जो केंद्रीयता हमारे भीतर पैदा होती है, वही हमारी आत्मा का अनुभव है।

जिस व्यक्ति की कामवासना बाहर भटकती जाती है, उसका अनुभव संसार का अनुभव है, आत्मा का अनुभव नहीं। और जिस व्यक्ति की ऊर्जा भीतर इकट्ठी होती जाती है, संगठित होती चली जाती है, अंतत: एक ऐसा बिंदु निर्मित हो जाता है व्रज की भांति, जो बिखर नहीं सकता। उस अनुभव के साथ ही हम पहली दफा आत्मा के जगत में प्रवेश करते हैं या ब्रह्म के जगत में प्रवेश करते हैं। लेकिन वह भी सृजन है, अपना ही सृजन। वह भी जन्म है, अपना ही जन्म।

माता—पिता एक शरीर को जन्म देते हैं। लेकिन स्वयं को जन्म देना हो, तो स्वयं ही देना पड़ता है। यह जन्म घटित होता है, जब काम की ऊर्जा भीतर की ओर प्रवाहित होनी शुरू होती है।

यह सारा जगत आज विक्षिप्त है। मनस्विद कहते हैं— फ्रायड या जुग या एडलर— वे कहते हैं कि यह सारी विक्षिप्तता का निन्यानबे प्रतिशत कारण कामवासना है। वे ठीक ही कहते हैं। लेकिन उनका निदान तो ठीक है, उनका इलाज ठीक नहीं है। उनकी डायग्नोसिस बिलकुल सही है, लेकिन वे जो दवाएं बताते हैं, वे ठीक नहीं हैं।

उनका खयाल है, यह सारा मनुष्य इतना पीड़ित है, यह अतिशय कामुकता के कारण। इतनी कलह और इतनी ईर्ष्या और इतना संघर्ष और इतना लोभ, इस सबके भीतर अगर हम प्रवेश करना शुरू करें, तो निश्चित ही केंद्र पर कामवासना मिलेगी। तो फ्रायड कहता है कि यह कामवासना को ठीक से तृप्त करने का उपाय न हो, तो आदमी विक्षिप्त होता चला जाएगा। तो कामवासना को ठीक से तृप्त होने का उपाय होना चाहिए।

यह भी थोड़ी दूर तक ठीक है। लेकिन कामवासना को तृप्त करने के कितने ही उपाय किए जाएं, आदमी कामवासना की तृप्ति से कभी भी शांत नहीं होता। हो नहीं सकता। कामवासना को रूपांतरित किए बिना आदमी कभी भी शांत नहीं हो सकता। एक ट्रांसफामेंशन चाहिए।

यह कामवासना जो बाहर की तरफ दौड़ती है, इसकी कितनी ही तृप्ति का उपाय किया जाए, कोई तृप्ति उपलब्ध नहीं होती। बल्कि एक और नया खतरा पश्चिम में फ्रायड को मानकर फलित हुआ है। और वह यह कि पचास साल पहले, फ्रायड के पहले पश्चिम में खयाल था लोगों को कि कामवासना तृप्त हो जाएगी, तो लोग बड़े शांत, संतुष्ट हो जाएंगे। क्योंकि अगर उसी की अतृप्ति से बेचैनी है, तो तृप्ति से शांति हो जाएगी।

लेकिन आज अमेरिका में उसे तृप्त करने की सर्वाधिक सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं, संभवत: पृथ्वी पर कहीं भी नहीं थीं। सब तरह की स्वतंत्रता, एक परमिसिव सोसाइटी, सब तरह से मुक्त करने वाला समाज पैदा हो गया है। लेकिन अनूठा अनुभव हुआ। अतृप्तियां पुरानी अपनी जगह हैं, और एक नई अतृप्ति पैदा हो गई है। वह है, कामवासना की व्यर्थता का बोध। पुरानी अतृप्ति में कम से कम एक आशा थी कि कभी कहीं कोई कामवासना तृप्त होगी, तो मन शांत हो जाएगा। अब वह भी आशा न रही। अतृप्ति पुरानी अपनी जगह खड़ी है, एक नई अतृप्ति, और ज्यादा गहरी, कि यह कामवासना ही बिलकुल व्यर्थ  है। इसमें कुछ होने वाला नहीं है।

आज पश्चिम का आदमी ऐसी बेचैनी में है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वह रहेगा, क्योंकि फ्रायड का वक्तव्य अधूरा है। फ्रायड के साथ बुद्ध को और कृष्ण को और महावीर को भी जोड़ना अनिवार्य है। फ्रायड का निदान बिलकुल ठीक है, लेकिन फ्रायड का उपचार ठीक नहीं है।

कृष्ण या बुद्ध या महावीर कामवासना को रूपांतरित करने की व्यवस्था देते हैं। और जब कामवासना रूपांतरित होती है, तो फिर उसको कामवासना न कहकर हम कामदेव कहते हैं।

इस फर्क को आप समझ लें।

जब तक कामवासना नीचे की तरफ बहती है, तब तक कामवासना एक राक्षस की तरह होती है, एक दानव की तरह। चूसे चली जाती है आदमी को। पीए चली जाती है। उसकी सारी शक्तियों को खींचे चली जाती है। उसे रुग्ण और दीन और दरिद्र किए चली जाती है। खोखला कर देती है भीतर से। सब सत खिंच जाता है, फिंक जाता है, और आदमी धीरे— धीरे एक चली हुई कारतूस की तरह हो जाता है। मरने के पहले ही आदमी मर जाता है।

बुजुर्ग आदमी को खालीपन का अनुभव होता है, जैसे भीतर कुछ भी नहीं है। वह खालीपन कुछ और नहीं है, कामवासना ने सारी शक्तियों को अपशोषित कर लिया है। जवान आदमी को भरापन मालूम पड़ता है। वह भरापन भी कुछ नहीं है, वह भरापन भी कामवासना का ही भराव है। बूढ़े और जवान आदमी में उतना ही फर्क है, जितना भरी हुई कारतूस में और चल गई कारतूस में है। और कोई ज्यादा फर्क नहीं है। न तो जवान भरा हुआ है, न बुजुर्ग खाली है। भ्रांति उस ऊर्जा की वजह से हो रही है। भरे आदमी तो केवल वे ही हैं, जिनकी काम—ऊर्जा ऊपर की तरफ प्रवाहित होनी शुरू होती है। उन्हीं के लिए फुलफिलमेंट है, उन्हीं के लिए आप्तता है।

जिस दिन कामवासना ऊपर की तरफ प्रवाहित होती है, उस दिन कामदेव हो जाती है। इसलिए शायद हम अकेली कौम हैं जमीन पर, जिन्होंने कामवासना को भी देवता की स्थिति दी है। उसको भी देव कहने की हिम्मत जुटाई है। लेकिन वह रूपांतरित है; ऊपर उठ गया है। दूसरे से संबंध छूट गया है। शक्ति अपने ही भीतर प्रवाहित होने लगी है, अपने ही अंतस्तल में। अंतर्यात्रा पर निकल गई है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं समस्त जीवन के सृजन का मूल आधार मैं हूं।

और कामदेव कहने की क्या जरूरत! वे कोई और देवताओं का नाम भी ले सकते थे। देवों में कामदेव का ही नाम लेने का प्रयोजन भी है। क्योंकि कामदेव के ऊपर जो उठ जाए...। मैंने पहले आपसे कहा, काम—राक्षस। ऐसा हम करें शब्द का प्रयोग, नीचे की तरफ बहती काम—ऊर्जा। फिर कामदेव, ऊपर की तरफ बहती हुई काम— ऊर्जा। कामदेव के भी ऊपर जो उठ जाए, वह देवताओं से पार हो जाता है।

बाहर की तरफ बहती ऊर्जा, काम—राक्षस। भीतर की ओर बहती हुई ऊर्जा, कामदेव। और कहीं भी बहती हुई ऊर्जा नहीं, ठहरी हुई ऊर्जा, न बाहर, न भीतर, समस्त गति को खो दिया हो ऊर्जा ने, ठहर गई ऊर्जा, थिर हो गई ऊर्जा, जैसे कि दीये की ली ठहर जाए, हवा का कोई झोंका न हो; उस स्थिति में आदमी कामदेव के भी ऊपर उठ जाता है।

इसलिए साधक को पहले दूसरे की परेशानी रहती है कि दूसरा खींचता है। फिर अंतिम परेशानी आती है कि स्वयं का खिंचाव है। उसके भी पार जाकर, द्वंद्व के पार आदमी हो जाता है।

जो व्यक्ति कामदेव के पार हो जाता है, वह देवताओं के पार हो जाता है। इसलिए हमने, बुद्ध को जब ज्ञान हुआ, तो कथाएं कहती हैं कि समस्त देवता उनके चरणों में सिर रखकर मौजूद हुए। क्या हो गया बुद्ध को कि देवता उनके चरणों में सिर रखें! क्योंकि देवता, कितने ही ऊपर हों, कामदेव के ऊपर नहीं होते। लेकिन जब कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है, तो वह काम के अंतिम रूप से ऊपर चला जाता है। फिर देवता भी नीचे पड़ जाते हैं। फिर देवता भी बुद्ध को नमस्कार करने आते हैं।

बुद्ध को अंतिम क्षण में, या महावीर को अंतिम क्षण में, या जीसस को अंतिम क्षण में, जो आखिरी संघर्ष है, जो आखिरी पार होना है, वह काम ही है। काम के जो पार हो गया, वह देवत्व के पार हो गया। वह फिर भगवत्ता में सम्मिलित हो गया।

तीन कोटियां हैं। मनुष्य हम उसे कहें, जिसकी कामवासना नीचे की ओर बहती है। देव हम उसे कहें, जिसकी कामवासना ऊपर की ओर बहती है या भीतर की ओर बहती है। भगवान हम उसे कहें, जिसकी कामवासना बहती नहीं— न बाहर न भीतर, न नीचे न ऊपर। ये तीन कोटियां हैं।

इसलिए बुद्ध को हम भगवान कहते हैं। भगवान कहने का कुल कारण इतना है कि अब वे देव के भी पार हैं।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं देवताओं में कामदेव हूं। अगर देवताओं में ही मुझे खोजना हो, तो तुम काम में खोजना। क्योंकि काम ही सृजन का मौलिक आधार है। जगत में जो भी घटता है, सुंदर, शुभ, सत्य, वह सब काम की ऊर्जा का ही प्रतिफलन है। चाहे कोई गीत पैदा होता हो सुंदर, चाहे कोई चित्र बनता हो सुंदर, और चाहे कोई व्यक्तित्व निर्मित होता हो सुंदर, वह सब काम—ऊर्जा का ही फैलाव है। इस जगत में जो भी सुंदर है और शुभ है, वह सब काम की ऊर्जा की ही लहरें हैं।

हमने ही अकेले पृथ्वी पर ऐसे मंदिर बनाए, खजुराहो, कोणार्क, जहां हमने भीतर परमात्मा को स्थापित किया और भित्ति—चित्रों पर काम के अनूठे—अनूठे चित्र खोदे। असंगत मालूम पड़ता है। खजुराहो के मंदिर में प्रवेश करें, तो घबड़ाहट मालूम होती है। मंदिर, जहां प्रभु को स्थापित किया है भीतर, उसकी भित्ति, उसकी दीवालों पर संभोग के, मैथुन के, काम के चित्र खुदे हैं, स्तुतियां निर्मित हैं! और ऐसी मूर्तियां पृथ्वी पर किसी ने कभी नहीं बनाईं। बाप बेटी के साथ मंदिर में प्रवेश करने में घबड़ाता है। भाई भाई के साथ जाने में डरेगा। बेटा मां के साथ मंदिर में जाने में भयभीत होगा। इस भय और डर के कारण शायद हम कहेंगे कि ये मंदिर ठीक नहीं बने, गलत बने हैं।

जिनको भारतीय संस्कृति का कोई पता नहीं है, उन्हीं को ऐसा लगेगा।  खजुराहो जगत—ख्याति का मंदिर है और भारत का टूरिज्म का बड़ा धंधा खजुराहो और कोणार्क जैसे मंदिरों पर निर्भर है। अगर बाहर से पर्यटक देखने न आते हों इन मंदिरों को, और इन मंदिरों की जगत—ख्याति न हो, तो हमने जरूर इन पर मिट्टी ढांक दी होती, इनको पूर दिया होता, इनको मिटा दिया होता।

इतना हमें क्यों डर लगता है? मां अपने बेटे के साथ इस मंदिर में जाने में भयभीत क्यों होती है? क्योंकि हम जीवन के तथ्यों को स्वीकार नहीं करते। हम जीवन के तथ्यों को झुठलाते हैं; हम बेईमान हैं। जीवन की सीधी सचाइयों के प्रति हम बहुत बेईमान हैं। नहीं तो बात ही क्या है? जब कोई मां बनती है किसी बेटे की, तभी काम— ऊर्जा के कारण बनती है। जब कोई बाप बनता है किसी बेटे का, तो काम—ऊर्जा के कारण बनता है।

लेकिन काम—ऊर्जा के प्रति हमने इस तरह के छिपाव खड़े किए हैं कि हम दुनिया में बात ही नहीं होने देते। जो मौलिक है सत्य, उसको हम ऐसे छिपाते हैं, जैसे वह घटता ही नहीं है। उस घबड़ाहट के कारण ये मंदिर हमें प्रवेश करने में डर पैदा करवाते हैं।

यह मंदिर बहुत सत्य है। सत्य, नग्न रूप से सत्य है। और विचार करके इसे निर्मित किया गया है। दीवाल के बाहरी हिस्सों पर कामवासना के चित्र हैं। और मंदिर इस बात का प्रतीक है कि जब तक तुम्हारा मन दीवाल के बाहर के चित्रों में लीन हो, तब तक भीतर प्रवेश नहीं हो सकेगा। जिस दिन तुम्हें बाहर मंदिर की दीवाल पर खुदे हुए मैथुन के गहन चित्र जरा भी आकर्षित न करें, उसी दिन तुम भीतर आना, उसी दिन तुम परमात्मा के मंदिर में प्रवेश कर सकोगे।

संसार इस मंदिर के बाहर खुदे हुए चित्रों की परिधि है। और जब तक किसी का मन कामवासना में डोल रहा है, तब तक वह मंदिर में प्रवेश नहीं हो सकता। और कामवासना में डोलने के दो ढंग हैं। या तो कामवासना के लिए डोल रहा हो, या कामवासना से भयभीत होकर डरकर डोल रहा हो।

जो आदमी इस मंदिर के पास जाता है और आंखें गड़ाकर इन चित्रों को देखने लगता है, वह भी उनसे उलझा है, और जो इन चित्रों को देखकर आंखें नीची करके दुबककर अंदर घुस जाता है, वह भी इन्हीं चित्रों से उलझा हुआ है। जो आदमी इन चित्रों के पास से ऐसे गुजर जाता है, जैसे चित्र हों ही न, वही आदमी मंदिर में प्रवेश के योग्य है। कामवासना से जो पार नहीं जाता, वह मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकता है।

लेकिन कामवासना का विरोध करके कोई कभी पार नहीं गया है। इस जगत में समझने के अतिरिक्त पार जाने का कोई भी उपाय नहीं है। लड़ते हैं नासमझ, जानते हैं समझदार। और जानना ताकत है। ज्ञान शक्ति है।

बेकन ने कहा है, नालेज इज पावर। सभी अर्थों में सही है। जहां भी ज्ञान है, वहीं शक्ति है। और जिस चीज का हमें ज्ञान है, हम उसके मालिक हो सकते हैं। और जिसका हमें ज्ञान नहीं है, हम उससे चाहे भयभीत हों, चाहे पराजित हों, चाहे उसके गुलाम रहें, चाहे उससे डरकर भागते रहें, हम उसके मालिक कभी भी न हो सकेंगे।

आकाश में बिजली कौंधती है, आज हम उसके मालिक हो गए हैं। वैसे ही ठीक कामवासना और भी बड़ी बिजली है, जीवंत बिजली है, उसके भी मालिक होने का उपाय है। लेकिन मालिक केवल वे ही हो सकते हैं, जो उसके प्रति भी सदभाव रखकर चलें।

जब कृष्ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं, तो सदभाव रखा जा सकता है। तब कोई विरोध, तब कोई निंदा का सवाल नहीं है। तब यह भी शक्ति परमात्मा की है, और इस शक्ति का कैसे अधिकतम उपयोग हो सके, और कैसे यह शक्ति जीवन के लिए मंगलदायी हो जाए, और कैसे यह शक्ति हमारी मृत्यु का कारण न बने, वरन परम जीवन में प्रवेश का द्वार हो जाए, इसकी दिशा में मेहनत की जा सकती है।

सिर्फ अकेले हिंदुस्तान ने एक विज्ञान को जन्म दिया जिसका नाम तंत्र है। एक पूरे विज्ञान को जन्म दिया, जिसके माध्यम से काम की ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो जाती है। और जिसके अंतिम प्रयोगों से काम—ऊर्जा थिर हो जाती है, उसका प्रवाह समाप्त हो जाता है। कृष्‍ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई कामवासना में पड़ा रहे। काम को भी दिव्य बनाना है, तभी यह कृष्‍ण के कामदेव की बात समझ में आएगी। उसे भी दिव्यता देनी है।

हमारा तो काम पशुता से भी नीचे चला जाता है, दिव्यता तो बहुत दूर की बात है। पशुओं की कामवासना में भी एक तरह की स्वच्छता है। और पशुओं की कामवासना में भी एक तरह की सरलता है, एक निर्दोष भाव है। आदमी की कामवासना में उतना निर्दोष भाव भी नहीं है। आदमी की कामवासना, लगती है, पशुओं से भी नीचे गिर जाती है। क्या कारण होगा?

क्योंकि पशुओं की कामवासना उनकी शुद्ध शारीरिक घटना है। और आदमी की कामवासना शारीरिक कम और मानसिक ज्यादा है। मानसिक होने से विकृत है। मानसिक होने से विकृत है, सेरिब्रल होने से विकृत है। एक आदमी संभोग में उतरे, यह निर्दोष हो सकता है। लेकिन एक आदमी बैठकर और संभोग का चिंतन करे, यह विकृत है, यह बीमार है।

तीन संभावनाएं हैं। या तो कामना, काम की शक्ति, प्रकृत हो, नेचुरल हो। अगर नीचे गिर जाए, तो विकृत हो जाए, अननेचुरल हो जाए। अगर ऊपर बढ़ जाए, तो संस्कृत हो जाए, सुपरनेचुरल हो जाए। प्रकृत कामवासना दिखाई पड़ती है पशुओं में, पक्षियों में। इसलिए नग्न पक्षी भी हमारे मन में कोई परेशानी पैदा नहीं करता। लेकिन कुछ लोग इतने रुग्ण हो सकते हैं कि नग्न पशु—पक्षी भी परेशानी पैदा करें।

हम ढांक क्या रहे हैं? हम अपने शरीर को नहीं ढांक रहे हैं। अगर बहुत गौर से हम समझें, तो हम अपने मन को ढांक रहे हैं। और चूंकि शरीर कहीं खबर न दे दे हमारे मन की, इसलिए हम शरीर को ढांके हुए बैठे हैं। लेकिन जब कोई डर ही न रहा हो, शरीर की तरफ से कोई खबर मिलने का उपाय न रहा हो, क्योंकि मन में ही कोई उपाय न रहा हो, तो महावीर नग्न होने के अधिकारी हो जाते हैं।

तीन संभावनाएं हैं। अगर कामवासना विकृत हो जाए, जैसी कि आज जगत में हो गई है.. .एकदम विकृत मालूम पड़ती है, और चारों तरफ से घेरे हुए है हमें। चाहे आप फिल्म देख रहे हों, तो भी कामवासना अनिवार्य है। चाहे आप अखबार पढ़ रहे हों, चाहे आप किताब पढ़ रहे हों, चाहे कहानी पढ़ रहे हों, और यह तो छोड़ दें, अगर आप साधु—संतों के प्रवचन भी सुन रहे हों, तो भी कामवासना अपना निषेधात्मक रूप प्रकट करती रहती है।

यह बहुत मजे की बात है कि मैंने बहुत—सी किताबें देखी हैं उन लोगों की भी जिन्होंने पोर्नोग्राफी, जिन्होंने अश्लील साहित्य लिखा है, और स्त्री—पुरुषों के अंगों की नग्न चर्चा की है। उन साधु—संतों की किताबें भी मैंने देखी हैं, जिन्होंने स्त्री—पुरुषों के अंगों की चर्चा की है निंदा के लिए। लेकिन बड़े मजे की बात है, कोई पोनोंग्राफर इतने रस से चर्चा नहीं कर पाता, जितने साधु—संत कर पाते हैं। इतना रस नहीं मालूम पड़ता। कोई अश्लील लिखने वाला इतने रस से चर्चा नहीं करता।

यह विकृत रस है। भीतर दमन है, भीतर दबाया है, जबरदस्ती की है, वह पीछे से निकलता है।


चाहे सिनेमागृह में जाएं, तो एक रूप है वासना का। और मंदिर में जाकर चर्चा सुनें, तो यह खींचने वाला रूप है वासना का। लेकिन सब तरफ वासना घेरे हुए है। सब तरफ वासना घेरे हुए है। यह तो रुग्ण मालूम होती है अवस्था पशु से भी नीचे गिर गई अवस्था मालूम पड़ती है।

इससे ऊपर उठा जा सकता है। लेकिन उठने के लिए पहली ध्यान रखने की बात जरूरी जो है, वह यह है कि जो भी इससे लड़ने लगेगा, वह ऊपर नहीं उठ पाएगा। क्योंकि जिससे हम लड़ते हैं, उसमें हमारा रस निर्मित होता है। आप अपने मित्र को भी भूल सकते हैं; शत्रु को भूलना इतना आसान नहीं है। मित्र को भूल जाने में इतनी कठिनाई नहीं है, मित्र भूल ही जाते हैं, समय भुला देता है। लेकिन शत्रु! शत्रु को भुलाना बहुत मुश्किल है।

जिससे आप लड़ते हैं, उससे चौबीस घंटे लड़ना पड़ता है। और एक बड़ी कीमिया की बात है भीतरी कि जिससे आप बहुत दिन तक लड़ते हैं, आप उसके जैसे ही हो जाते हैं। किसी से भी लड़कर देखें आप। अगर दों—चार साल किसी दुश्मन से आपकी दुश्मनी चल जाए, तो चार साल के बाद आप पाएंगे कि आप अपने दुश्मन जैसे हो गए।

दो मित्र भी इतने एक से नहीं होते, जितने दो शत्रु अंत में एक से हो जाते हैं। क्योंकि जिससे लड़ना पड़ता है, उसकी ही तरकीबें काम में लानी पड़ती हैं। और जिससे लड़ना पड़ता है, उसी की भाषा काम में लानी पड़ती है। और जिससे लड़ना पड़ता है, उसका सत्संग भी करना पड़ता है। और जिससे लड़ना पड़ता है, चौबीस घंटे चेतना में उसका भाव बना रहता है।

इसलिए कामवासना से लड़ने वाले लोग एक बहुत मानसिक व्यभिचार में पड़ जाते हैं। भीतर व्यभिचार चलने लगता है। उनके सपने विकृत हो जाते हैं।

सपना भी आपका है, किसी और का नहीं है। और सपना आपसे पैदा होता है। जैसे आपसे कर्म पैदा होता है, वैसे ही स्वप्न भी आपसे पैदा होता है। अगर मैं एक आदमी की हत्या करता हूं दिन में, तो मैं उतना ही जिम्मेवार हूं जितना मैं हत्या करने का सपना देखूं तब। अदालत मुझे नहीं पकड़ेगी, वह दूसरी बात है। लेकिन सपना भी मुझमें ही पैदा होता है, जैसे कर्म मुझमें पैदा होता है। कर्म भी मेरा है, स्वप्न भी मेरा है।

और मजा यह है कि कर्म तो मैं किसी दूसरे से भी करवा सकता हूं सपना मैं किसी दूसरे से नहीं दिखवा सकता। मैं किसी की हत्या करवाना चाहूं तो एक आदमी को भी रख सकता हूं लेकिन मेरा सपना मैं ही देख सकता हूं दूसरा नहीं देख सकता, नौकर नहीं रखे जा सकते। इसका मतलब यह हुआ कि कर्म से भी गहरा संबंध सपने का मुझसे है। सपने के लिए तो मैं निपट जिम्मेवार हूं। और कोई जिम्मेवार नहीं है।

यह जो हमारे चित्त की रुग्णता पैदा होती है, वह है दमन, संघर्ष, वैमनस्य, शत्रुता, अज्ञान से भरा हुआ।

कामवासना कामदेव बन जाती है, अगर हम शांत, मौन, प्रेम से उस ऊर्जा को समझने की कोशिश करें, जो हमारे भीतर वासना बन गई है। और फिर उसे ऊपर उठा ले जाने का विज्ञान है। उसको बदलने का इंच—इंच शास्त्र है। फिर हम उसे बदलना शुरू करें।

कभी दो—चार छोटे प्रयोग करें, आप चकित हो जाएंगे। जब भी आपको कामवासना उठे, तब आप अपना ध्यान तत्क्षण सहस्रार के पास ले जाएं। आख बंद कर लें, और अपने ध्यान को दोनों आंखों को ऊपर ले जाएं और अनुभव करें कि आपकी चेतना खोपड़ी के छप्पर से लग गई है। एक सेकेंड, और आप अचानक पाएंगे कि वासना तिरोहित हो गई। जब भी वासना उठे, तब तत्क्षण अपनी चेतना को खोपड़ी के पास ले जाएं, और आप पाएंगे, वासना तिरोहित हो गई। कितनी ही प्रगाढ़ वासना उठी हो, एक क्षण में विलीन हो जाएगी। क्योंकि वासना को चलने के लिए आपकी चेतना के सहयोग की जरूरत है।

और जो लोग इस तरह जीना शुरू कर देते हैं, कि उनकी चेतना धीरे— धीरे— धीरे सतत ऊपर की ओर प्रवाहित रहने लगती है, उनमें वासना पैदा होनी बंद हो जाती है। और अंततः चेतना की डोर को पकड़कर वासना की ऊर्जा ऊपर चढ़ने लगती है। और जिस दिन वासना ऊपर चढ़ती है, उस दिन जीवन में जैसे आनंद का अनुभव होता है, वैसा हजारों संभोगों में भी नहीं हो सकता। क्योंकि हर संभोग शक्ति को खोना है और हर समाधि शक्ति को पाना है।

नीचे उतरना, अपनी चेतना के तल को भी नीचे गिराना है। ऊपर उठना, अपनी चेतना के तल को भी ऊपर उठाना है। और जितने हम ऊपर उठते हैं और जितने हम हल्के होते हैं, उतने गहन आनंद में प्रवेश होता है।

जिस दिन कोई व्यक्ति अपनी खोपड़ी के पार भी अपनी चेतना को ले जाने में समर्थ हो जाता है, उस दिन उसे अनंत आनंद की उपलब्धि होती है।

इसे हम ऐसा समझ सकते हैं, जब कोई व्यक्ति अपनी ऊर्जा को काम—केंद्र से नीचे गिराता है, तब उसे सुख का आभास होता है, और जब कोई व्यक्ति अपनी काम—ऊर्जा को सहस्रार से आकाश में तिरोहित करता है, तब उसे आनंद का अनुभव होता है।

इसलिए कृष्‍ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं। समस्त जन्म, समस्त सृजन मेरे ही द्वारा है। मैं ही हूं।

यह जीवन को स्वीकार करने का अदभुत सूत्र है।

हम राम के साथ सीता को खड़ी कर सकते हैं, और राम को भगवान मान सकते हैं। हम कृष्‍ण के साथ गोपियां नाचती हों, तो बिना एतराज किए कृष्ण को भगवान मान सकते हैं। ईसाइयत नहीं मान सकती। ईसाइयत तो मानती ही है कि कामवासना ही इस जगत में पाप का कारण है। इसलिए कामवासना से हट जाना है। और हट जाने का मतलब गहरा दमन है।

दो हजार साल में ईसाइयत ने पश्चिम में कामवासना का इस बुरी तरह दमन किया कि आज उस दमन का प्रतिफल पश्चिम में आ रहा है। जब कोई चीज बहुत दबाई जाती है, तो उसका प्रतिकार और रिएक्यान और प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। ईसाइयत ने जिस चीज को खूब दबाया था जोर से, आज वह जोर से फैलकर पैदा हो गई है। आज पश्चिम में जो वासना का खुला खेल है, उसमें जिम्मेवार पश्चिम के आज के लोग कम और दो हजार साल के वे लोग ज्यादा हैं, जिन्होंने वासना को बिलकुल दबाने का पागलपन से भरा हुआ आग्रह किया।

 ऐसे लोग भारत में जरूर हुए हैं, जो जीवन निषेधक हैं। लेकिन भारत की मूल धारा जीवन निषेधक नहीं है। भारत की मूल धारा जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है, उसकी पूर्णता में स्वीकार करती है। जीवन जैसा है, भारत उसको अंगीकार करता है और फिर अंगीकार के द्वारा उसे रूपांतरित करता है।

इस भेद को ठीक से समझ लें। आप किसी चीज से लड़ सकते हैं बदलने के लिए, आप किसी चीज को स्वीकार कर सकते हैं बदलने के लिए। स्वीकार करके जो बदलाहट है, वह गहरी होती है। लड़कर जो बदलाहट है, वह गहरी नहीं होती। क्योंकि जिससे आप लड़ते हैं, उसे आप समझ ही नहीं पाते। समझने के लिए मैत्री चाहिए। कामवासना से भी मैत्री चाहिए।

कृष्ण कहते हैं, मैं कामदेव हूं। वे यह कहते हैं कि यह पूरा जीवन मुझसे ही पैदा होता है। यह जीवन का सारा खेल मेरा ही खेल है। और यह सब दिव्य हो सकता है। इसलिए अपने को इससे संयुक्त करते हैं।

सर्पों में वासुकि हूं नागों में शेषनाग, जलचरों में वरुण देवता हूं पितरों में पित्रेश्वर तथा शासन करने वालों में यमराज हूं।

यह प्रतीक बहुत कीमती है; वैसा ही, जैसा कामदेव, वैसा ही यमराज। इसे हम थोड़ा समझ लें।

शासन करने वालों में यमराज, मृत्यु का दूत, मृत्यु का शासक! शासन करने वालों में कृष्ण को कोई और न सूझा! बड़े शासक हो गए हैं। पृथ्वी ने बड़े शासक देखे हैं। स्वर्ग भी शासकों को जानता है। लेकिन कृष्‍ण को यमराज क्यों शासकों में श्रेष्ठ मालूम पड़ा? कुछ कारण हैं।

एक, इस जगत में मृत्यु के सिवाय और कुछ भी निश्चित नहीं है। इस जगत में अगर कोई एक चीज सुनिश्चित है, तो वह मृत्यु है। बाकी सब चीजें अनिश्चित हैं। हो भी सकती हैं, न भी हों। मृत्यु होगी ही। मृत्यु न हो, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता।

जीवन में बाकी  सब अनिश्चित है। जीवन में सब ऐसा है, जैसे कोई कागज की नाव समुद्र की लहरों पर कहीं भी डोल रही हो। कहीं भी जा सकती है; पूरब भी जा सकती है, पश्चिम भी जा सकती है, बड़ी लहरों पर, छोटी लहरों पर। यह नाव कहीं भी डोल सकती है। तरंगों के हाथ में सब अनिश्चित है। एक बात सुनिश्चित है कि यह नाव कागज की डूबेगी। उतनी बात निश्चित है। और वह निश्चय बदला नहीं जा सकता। मृत्यु सर्वाधिक सुनिश्चित तथ्य है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, शासकों में मैं यमराज हूं। क्योंकि उसके शासन में जरा भी शिथिलता नहीं है, जरा भी अपवाद नहीं है। सब चीजों में अपवाद हो सकता है; उसके शासन में अपवाद नहीं है। उसका शासन निरपवाद है। कानून वहां पूरा है, उसमें रत्तीभर फर्क नहीं है।

दूसरी बात, एक आदमी अमीर हो सकता है, एक गरीब हो सकता है। एक आदमी बुद्धिमान हो सकता है, एक आदमी बुद्धिहीन हो सकता है। एक आदमी सुंदर हो सकता है, एक आदमी असुंदर हो सकता है। हम चेष्टा करके कल सारी संपत्ति बांट दें, सभी आदमियों के पास बराबर संपत्ति हो जाए, तब भी दो बराबर संपत्ति वाले आदमियों का सुख बराबर नहीं होता। हम संपत्ति बांट दें, तो हम संपत्ति को भूल जाएंगे, सौंदर्य पीड़ा देने लगेगा। बुद्धि पीड़ा देगी। कोई ज्यादा बुद्धिमान होगा, कोई कम बुद्धिमान होगा।

जीवन में समानता असत्य है, होती ही नहीं। सब तरह से जीवन असमान है। दो व्यक्ति जरा भी समान नहीं हैं। प्रकृतिगत एक—एक व्यक्ति अलग—अलग असमान है।  मृत्यु के समक्ष सब समान है।

जीवन में सब असमान है, मृत्यु के समक्ष सब समान है। गरीब और अमीर, बुद्धिमान और मूढ़, सुंदर और असुंदर, सफल और असफल, स्त्री और पुरुष, बच्चे और बूढ़े, काले और गोरे, नीग्रो और अंग्रेज, कोई भी—मृत्यु इस जगत में अब तक पाई गई एकमात्र सोशलिस्टिक डिक्टेटरशिप है, एकमात्र समाजवादी तंत्र उसी के पास है। वहां सब समान है।

मृत्यु सबको समान कर देती है। उसका शासन पक्षपात नहीं मानता। अमीर यह नहीं कह सकता कि थोड़ी देर रुक, क्योंकि मैं अमीर हूं। अभी थोड़ी देर से आना, क्योंकि इस वक्त मेरी पार्टी हुकूमत में है! अभी फुरसत नहीं मिलने की, क्योंकि अभी मैं मिनिस्टर हूं। नहीं, यह कोई भी उपाय नहीं है। गरीब भिखारी हो कि सम्राट हो, हारा—पराजित आदमी हो कि विजेता हो, मृत्यु के समक्ष पक्षपात नहीं है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, शासकों में मैं यमराज। न कोई पक्षपात है, न कोई अनिश्चितता है; न कोई भेदभाव है, न कोई अपवाद है। मृत्यु अनूठी घटना है।


मृत्यु का शासन इस अर्थ में, शायद किसी भी और शासन से तुलना नहीं किया जा सकता।

कृष्‍ण ने कहा कि तथा शासन करने वालों में मैं यमराज हूं।

तो मुझसे पक्षपात नहीं चाहा जा सकता, इसका अर्थ हुआ यह। इसका अर्थ हुआ कि जो परमात्मा से पक्षपात मांग रहे हैं, वे पागल हैं। पक्षपात नहीं मिल सकता। जो परमात्मा से प्रार्थनाएं कर रहे हैं कि उनके लिए अपवाद बना दिया जाए, वे गलती पर हैं। कोई अपवाद नहीं हो सकता।

हम सब इसी कोशिश में लगे हैं कि परमात्मा हमारे लिए अपवाद हो। सबके साथ कुछ भी करे, हमें छोड़ दे। सबके पाप माफ करे न करे, हमारे माफ कर दे। हम ऐसे हिसाब में लगे हैं कि सबको तो उनके पापों का दंड ठीक से मिले और हमारे पाप हमें क्षमा कर दिए जाएं, क्योंकि हम गंगास्नान कर आए हैं! या हम रोज पूजा करते हैं, कि हम रोज माला फेरते हैं। हम कुछ रिश्वत दे रहे हैं। हम एक नारियल चढ़ा देते हैं। हम फूल रख आते हैं परमात्मा के चरणों में। हम कुछ रिश्वत दे रहे हैं। हम उसे फुसला रहे हैं कि मेरे साथ कुछ जरा अपनेपन का खयाल करो। मुझ पर कुछ पक्षपात करो। कुछ मेरे साथ अपवाद करो। सबके नियम मुझ पर मत लगाना।

नहीं, यह कुछ भी नहीं हो सकता। कृष्‍ण कहते हैं, शासन करने वालों में मैं यमराज हूं। नियम पूरा होगा, पूरा किया जाएगा। नियम बिलकुल तटस्थ है।

कृष्‍ण कह रहे हैं कि तू खयाल रखना अर्जुन, मैं शासन करने वालों में यमराज हूं। न कोई अपवाद हो सकता है, न कोई भेद हो सकता है, न कोई रियायत हो सकती है, न कोई सुविधा हो सकती है। नियम तो पूरा लागू होगा। और उतनी ही सख्ती से लागू होगा, जैसे मौत लागू होती है। उसमें कोई भेद— भाव नहीं किया जा सकता। नियम का अर्थ ही खो जाता है, जब उसमें भेद— भाव किया जाता है।

तो कृष्ण कहते हैं, यमराज हूं मैं। मृत्यु की तरह सुनिश्चित मेरा शासन है।

और हे अर्जुन, मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गिनती करने वालों में समय हूं। पशुओं में मृगराज, पक्षियों में गरुड़ हूं।

ये दो छोटे प्रतीक और समझ लेने जैसे हैं।

मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूं! प्रह्लाद जन्मा तो दैत्यों के घर में। लेकिन घर में जन्मने से कुछ भी नहीं होता। घर बंधन नहीं है। प्रह्लाद दैत्य के घर में जन्मता है और परम भक्ति को उपलब्ध हो जाता है। शायद दैत्यों के घर में जो नहीं जन्मे हैं, वे भी इतनी भक्ति को उपलब्ध नहीं हो पाते। प्रह्लाद जैसा भक्त खोजना बिलकुल मुश्किल है।

यह बड़े मजे की बात है। दैत्य के घर में जन्मा हुआ बच्चा परम भक्त हो गया, और सदगृहस्थों, सज्जनों और देवताओं के घर में जन्मे बच्चे भी प्रह्लाद के मुकाबले एक नहीं टिक पाते। इससे कुछ बातें निकलती हैं।

एक, आप कहां पैदा होते हैं, किस परिस्थिति में, यह बेमानी  है। लेकिन हम सब यही रोना रोते रहते हैं कि परिस्थिति ऐसी है, क्या करें? परिस्थिति ही ऐसी है, मैं कर क्या सकता हूं? और अभी तो इस सदी में यह रोना इतना भयंकर हो गया है कि अब किसी को कुछ करने का सवाल ही नहीं है।

एक आदमी चोर है, तो इसलिए चोर है, क्योंकि परिस्थिति ऐसी है। और एक आदमी हत्या करता है, तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं, वह क्या कर सकता है!  उसका पालन—पोषण जिस ढंग से हुआ है, उसमें वह हत्या ही कर सकता है! सब कुछ परिस्थिति पर निर्भर है।

ध्यान रखें, धर्म और धर्म के विरोध में जो भी धारणाएं हैं, उनके बीच यही फासला है। धर्म कहता है, आदमी निर्माण करता है सब कुछ, परिस्थिति का और अपना। और धर्म के विपरीत जो धारणाएं हैं, वे कहती हैं, आदमी कुछ निर्माण कर नहीं सकता, परिस्थितियां सब निर्माण करती हैं, अपना भी और आदमी का भी।

धर्म कहता है, परिस्थिति कितनी ही बदलो, आदमी नहीं बदलेगा। आदमी को बदलो, तो परिस्थिति बदल जा सकती है। आदमी ज्यादा कीमती है, चेतना ज्यादा मूल्यवान है। परिस्थिति जड़ है। आदमी मालिक है।

और इसलिए कृष्ण कहते हैं, राक्षस दैत्यों के घर में पैदा हुआ, दैत्यों में प्रह्लाद मैं हूं।

सारी परिस्थिति विपरीत थी। सारी परिस्थिति विपरीत थी। वहां भक्त होने का कोई उपाय न था। उपाय ही न था, और प्रह्लाद इतना गहरा भक्त हो सका।

दूसरी बात आपसे कहता हूं जब विपरीत परिस्थिति हो, तब ऊपर से जो विपरीत दिखता है, उसका अगर उपयोग करना आता हो, तो वह अनुकूल हो जाता है। असल में विपरीत परिस्थिति बन जाती है चुनौती। अगर प्रहाद को कहीं अच्छे आदमी के घर में पैदा कर देते, तो शायद इतना बड़ा भक्त न हो पाता। और कभी—कभी ऐसा भी होता है कि अच्छे आदमियों के बच्चे इसीलिए बिगड़ जाते हैं कि अच्छे आदमी अच्छे होने की चुनौती नहीं देते, बुरे होने की चुनौती देते हैं।


उसका कुल रहस्य इतना है कि वे इतने जोर से अच्छाई थोपते हैं , कि अगर बच्चा बुद्ध हो तो ही मान सकता है, और बुद्ध हो तो बहुत आगे नहीं जाता। थोड़ा बुद्धिमान हो, रिबेलियस हो जाता है, बगावती हो जाता है। उसका भी अपना अहंकार है, अपनी अस्मिता है। अगर बहुत ज्यादा दबाव डाला, तो एक सीमा के बाद या तो आदमी टूट ही जाता है, तो मिट जाता है; और या फिर भाग खड़ा होता है, विपरीत यात्रा पर निकल जाता है।

शायद प्रह्लाद के लिए भी सहयोगी हुआ पिता का होना। इससे जो मैं मतलब निकालना चाहता हूं वह यह कि आप कभी यह मत कहना कि परिस्थिति बुरी है, इसलिए मैं अच्छा नहीं हो पा रहा हूं। सच तो यह है कि परिस्थिति बुरी हो, तो अच्छे होने की संभावना ज्यादा होनी चाहिए, क्योंकि चुनौती है।

हां, अगर कोई आदमी मुझसे कहे कि परिस्थिति इतनी अच्छी है कि मैं अच्छा नहीं हो पा रहा, तो मुझे तर्कयुक्त मालूम पड़ता है। ठीक कह रहा है। बेचारा क्या कर सकता है? परिस्थिति इतनी अच्छी है, अच्छा हो भी कैसे सकता है!

लेकिन जब कोई आदमी कहता है कि परिस्थिति बुरी है, इसलिए अच्छा नहीं हो पा रहा है, तो वह सिर्फ अपनी नपुंसकता, अपनी इंपोटेंस घोषित कर रहा है। उसका मतलब यह है कि वह कुछ भी नहीं हो सकता। जब परिस्थिति इतनी विपरीत है, तब भी अगर तुम अकड़कर खड़े नहीं हो सकते उसके विरोध में, तो तुम कभी भी खड़े नहीं हो सकोगे।

इसका यह मतलब हुआ कि जिसके पास समझ हो, वह विपरीत परिस्थिति को भी अनुकूल बना लेता है। और जिसके पास नासमझी हो, वह अनुकूल परिस्थिति को भी खो देता है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं प्रह्लाद हूं दैत्यों में।

प्रह्लाद से ज्यादा खिला हुआ, शांत और मौन और निर्दोष फूल कहां है? लेकिन दैत्यों के बीच में! पर ऐसे यह उचित ही है। कमल भी खिलता है, तो कीचड़ में! और कमल यह नहीं चिल्लाता फिरता कि कीचड़ में मैं कैसे खिलूं बहुत गंदी कीचड़ नीचे भरी पड़ी है! कमल खिल जाता है। उसी कीचड़ से रस खींच लेता है, उसी कीचड़ से सुगंध खींच लेता है। उसी कीचड़ से रंग खींच लेता है। और उस कीचड़ के पार हो जाता है। न केवल उस कीचड़ के पार हो जाता है, बल्कि उस पानी के भी पार हो जाता है जिससे प्राण पाता है। खिलता है खुले आकाश में।

हम सोच भी नहीं सकते कि कमल और कीचड़ में कोई बाप— बेटे का संबंध है, कमल और कीचड़ में कोई उत्पत्ति और जन्म का संबंध है। कमल और कीचड़ को एक साथ रखिए, समझ में भी नहीं आएगा कि इन दोनों के बीच कोई सेतु, कोई श्रृंखला है।

लेकिन कीचड़ ही कमल है। और हर कीचड़ से कमल हो सकता है। कीचड़ के लिए बैठकर जो रोता रहता है, वह नाहक ही अपने आलस्य के लिए कारण खोज रहा है। कीचड़ से कमल हो जाते हैं। और जिंदगी में जहां भी कीचड़ हो, समझ लेना कि यहां भी कोई न कोई कमल खिल सकता है। कोई भी कीचड़ हो, समझ लेना, कमल खिल सकता है। यह कमल के खिलने का अवसर है।

लेकिन हम सब ऐसे लोग हैं, हम खिलना ही नहीं चाहते। खिलने में शायद श्रम मालूम पड़ता है, मेहनत मालूम पड़ती है। हम जो हैं, वही रहना चाहते हैं। इसलिए हम इस तरह के तर्क खोज लेते हैं, जिन तर्कों के आधार से हम जो हैं, वही बने रहने में सुविधा मिलती है।

हम कहते हैं, क्या कर सकते हैं, परिस्थिति अनुकूल नहीं है! सब तरफ विरोध है, सब तरफ प्रतिकूलता है, बढ़ने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए हम नहीं बढ़ पा रहे हैं। ऐसे तो हम शिखर पर पहुंच सकते थे, सुमेरु पर्वत के शिखर पर बैठ सकते थे, लेकिन परिस्थिति ही नहीं है।

परिस्थिति कभी भी नहीं होगी। परिस्थिति कभी भी नहीं थी। जो परिस्थिति के पार नहीं उठ सकता, वह किसी भी परिस्थिति में इसी रोने को लेकर बैठा रहेगा।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं प्रह्लाद हूं दैत्यों में।

जहां ईश्वर का नाम लेने की भी मनाही थी, वहां प्रहाद केवल नाम के ही सहारे ईश्वर को पा लिया। इसे थोड़ा समझें, क्योंकि हमें तो कोई मनाही नहीं है। जितनी मौज हो लें, रोज अपनी कुर्सी पर बैठ जाएं और ईश्वर का नाम लेते रहें।

बड़े मजे की बात है! प्रह्लाद ईश्वर के नाम से पा लिया। और आप काफी लेते रहते हैं। लोग अपने बच्चों का नाम ईश्वर पर इसीलिए रख लेते हैं—किसी का नाम राम, किसी का नारायण—कि दिनभर बुलाते रहें। लेकिन बुलाने का परिणाम यह होता है कि नारायण को चांटा भी लगाना पड़ता है, गाली भी देनी पड़ती है। ये सब परिणाम होते हैं, और कुछ नहीं होता।

नाम तो लोग रखते थे भगवान पर बच्चों का इसलिए कि दिन में अकारण ही, अनायास ही, बिना वजह के भगवान का नाम आ जाए। लेकिन जो फल होता है, वह कुल इतना ही होता है कि नारायण नाहक पिटते हैं, नाहक गाली खाते हैं! और धीरे— धीरे जब नारायण को गाली देने की भी क्षमता आ जाती है, तो फिर असली नारायण भी मिल जाएं, तो गाली ही निकलेगी। आदतें हैं।

लेकिन प्रह्लाद को तो कोई अवसर भी न था, भगवान के नाम के लेने की मनाही थी। उस बीच वह आदमी भगवान के नाम के ही सहारे जीवन को इतनी उत्कृष्टता पर ले जा सका, इसका कारण क्या होगा?

इसका कारण यह है कि जीवन की जो डायनेमिक्स, जीवन का जो गत्यात्मक रूप है, वह हम नहीं समझते हैं। अगर आपको भी बंद कर दिया जाए एक कोठरी में और सख्त मनाही कर दी जाए कि राम का नाम मत लेना, तब आपके हृदय की बहुत गहराई से राम का नाम आएगा। क्योंकि यह आपकी स्वतंत्रता की घोषणा होगी। और आपको बिठाया जाए और कहा जाए कि लो राम का नाम! जैसा कि मां—बाप बिठा रहे हैं बच्चों को ले जा ले जाकर कि लो राम का नाम! बच्चे जबरदस्ती ले रहे हैं, कहीं कोई गहराई पैदा नहीं होती। कहीं कोई गहराई नहीं पैदा होती। जीवन की गत्यात्मकता बड़ी उलटी है।

यह प्रहाद की घटना विचारणीय है। इसलिए अपने बच्चों पर अच्छाई जबरदस्ती मत थोपना। नहीं तो बच्चे बुराई की तरफ हट जाएंगे। इसलिए बहुत डेलिकेट है मामला।  इसका यह मतलब नहीं है कि आप बुराई थोपना बच्चे पर। बहुत डेलिकेट है, नाजुक है। अच्छाई थोपना मत। और अच्छाई को खिलने में सहयोग देना, थोपना मत। बुराई की इतने जोर से निंदा मत करना कि बुराई में रस पैदा हो जाए। निंदा से रस पैदा होता है। बुराई का इतना निषेध मत करना कि निमंत्रण बन जाए।

किसी दरवाजे पर लिख दो कि यहां झांकना मना है, फिर कोई महात्मा भी वहां से बिना झांके नहीं निकल सकता। झांकना ही पड़ेगा। और अगर महात्मा चले गए बिना झांके, तो फिर किसी बहाने उनको लौटना पड़ेगा। और अगर हिम्मत न पड़ी कि कहीं भक्तगण देख न लें कि वहां झांककर देखते हो, जहां झांकना मना है, तो रात सपने में वे जरूर वहां आएंगे। उस पट्टी को झांकना ही पड़ेगा। वह मजबूरी, वह आब्सेशन हो जाता है।

बुराई को ऑब्सेशन मत बना देना। भलाई को इतना मत थोपना कि उसके विपरीत भाव पैदा हो जाए।

इसलिए बच्चे को बड़ा करना एक बहुत डेलिकेट बात है, बहुत नाजुक बात है। और अब तक आदमी सफल नहीं हो पाया है। बच्चे को ठीक से बड़ा करने में आदमी अभी भी असफल है। अभी भी शिक्षा की सारी व्यवस्थाएं गलत हैं। क्योंकि बहुत नाजुक मामला है। और उस नाजुकपन को समझने में बड़ी कठिनाई है। बड़ी से बड़ी कठिनाई तो यह है कि हमें इस बात का खयाल ही नहीं है कि आदमी के भीतर गति कैसे पैदा होती है?

यह प्रह्लाद के भीतर जो गति पैदा हुई, यह प्रह्लाद के पिता की वजह से पैदा हुई। और चूंकि वह दैत्यों के घर में पैदा हुआ था, इसलिए जब विपरीत चला, तो ठीक दैत्यों से उलटा सारे भक्तों को पार कर गया।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं प्रह्लाद हूं दैत्यों में।

और गिनती करने वालों में समय हूं टाइम।

समय के कुछ लक्षण हैं। एक, कि आपको एक क्षण से ज्यादा कभी नहीं मिलता; कभी नहीं। आपके हाथ में एक क्षण ही होता है, बस। जब एक क्षण निकल जाता है, तब दूसरा मिलता है। जब दूसरा निकल जाता है, तब तीसरा मिलता है। आपके हाथ में दो क्षण एक साथ कभी नहीं होते।

समय भी बड़ा कैलकुलेटर है। समय से ज्यादा ठीक गिनती करने वाला कोई भी नहीं दिखाई पड़ता। एक—एक व्यक्ति को एक—एक क्षण से ज्यादा कभी नहीं मिलता, कोई इसमें धोखा नहीं दे सकता। कोई कितना ही बड़ा महायोगी हो, और कोई कितना ही बड़ा धनी हो, और कोई कितना ही बड़ा ज्ञानी हो, कितना ही बड़ा वैज्ञानिक हो, वह समय को डिसीव नहीं कर सकता कि उससे दो क्षण एक साथ ले ले। बस, एक ही क्षण हाथ में आता है।

कभी आपने रेत की घड़ी देखी है? रेत की घड़ी में से रेत का एक—एक दाना नीचे गिरता रहता है। उसमें तो कभी भूल हो सकती है, क्योंकि आदमी की बनाई हुई घड़ी है और रेत के दाने छोटे—बड़े भी होते हैं। तो कभी कोई दो दाने भी गिर सकते हैं। लेकिन समय की घड़ी में से कभी भी दो दाने नहीं गिरते। एक ही क्षण आपके हाथ में होता है, नपा—तुला। और पूरी जिंदगी!

तो कृष्‍ण कहते हैं कि मैं समय हूं गिनती करने वालों में।

 ये प्रतीक ऐसे ही नहीं चुन लिए हैं। अर्जुन को यही खयाल है कि इनको मैं —मार डालूंगा, ये जो दुश्मन इकट्ठे हैं। कृष्‍ण कह रहे हैं, मैं समय हूं गिनती करने वालों में। एक क्षण पहले तू किसी को मार नहीं सकता और एक क्षण ज्यादा जिलाने का कोई उपाय नहीं है। जो मरेंगे, उनका समय चुक गया था। जो बचेंगे, उनका समय बचा था। तू केवल निमित्त है। इससे ज्यादा तू नहीं है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...