मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

वाल्मीकि रामायण

 वाल्मीकि रामायण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामायण का निर्माण कुछ संवाददाताओ या टेली प्रिन्टरों से भेजे गये समाचारों के आधार पर नहीं हुआ। उसका निर्माण महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा अतीत, अनागत, वर्तमान, स्थूल सूक्ष्म, सन्निकृष्ट तथा विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का साक्षात्कार कर के राम, लक्ष्मण, सीता आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि सभी व्यापारों का पूर्णरूप से साक्षात्कार किया। महर्षि वाल्मीकि अलौकिक मुनि थे। वे लौकिक गति और दिव्य गति द्वारा भी सब जगह आ जाकर सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। अतः सेतुबन्धन और समुद्र आदि के सम्बन्ध में रामायण के वर्णन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इनके विषय में वाल्मीकिरामायण ही सबसे बड़ा प्रमाण माना जायेगा ।

  सेतुबन्धन कल्पना नहीं

रामायण में वर्णित रामेश्वर की स्थापना वर्तमान इतिहास से भी प्रमाणित होती है। सहस्राब्दियों से भारत के कोने-कोने से लोग रामेश्वर का दर्शन करने जाते हैं। गङ्गोत्री से जल लेकर अतिप्राचीन काल से धर्मप्राण जनता वहाँ चढ़ाने जाती है। धर्मशास्त्र की मान्यता के अनुसार सेतुबन्ध रामेश्वर के दर्शन से ब्रह्महत्याओं के पाप दूर होते हैं। पुराणों में इन बातों का विशद वर्णन है। कूर्मपुराण पूर्वभाग के इक्कीसवें अध्याय में आये इन श्लोकों से रामेश्वर की महत्ता तथा प्राचीनता स्पष्ट होती है

"यत्त्वया स्थापितं लिङ्गं द्रचयन्तीह द्विजातयः ।

महापातकसंयुतास्तेषां पापं विनश्यतु ।। ४९ ।। 

अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधी । 

दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः ॥ ५० ॥

 यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी ।

यावत्सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः ॥ ५१ ॥


इसी प्रकार के अन्य वचन स्कन्दपुराण तथा अन्यान्य पुराणों में भी मिलते हैं। इन वचनों तथा मान्य ग्रन्थों के प्रमाणों के अतिरिक्त रामेश्वर नाम ही रामेश्वर की मूर्ति और मन्दिर का भगवान् राम के साथ असाधारण सम्बन्ध स्थापित करता है, अतः सेतुबन्ध रामेश्वर की घटना वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित रामेश्वर से भिन्न वस्तु नहीं हो सकती ।


सेतुनिर्माण की घटना मात्र कल्पना नहीं है।

वाल्मीकिरामायण में सेतुनिर्माण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसका प्रारम्भ, समाप्ति और नाप-जोख सबपर इस रामायण में प्रकाश डाला गया है। वालमिकिरामायण के युद्धकाण्ड के २२ वें सर्ग के ५० से ७२ वें श्लोक तक प्रतिदिन कितना निर्माण हुआ, कितने दिनों में सेतु बनकर तैयार हुआ इसका ब्योरेवार वर्णन किया गया है। पूर्ण सेतु का निर्माण पाँच दिनों में हुआ था। प्रथम दिन १४ योजन, दूसरे दिन २०, तीसरे दिन २१, चौथे दिन २२ एवं पांचवे दिन २३ योजन के अनुपात से पांच दिनों में पूर्ण सेतु बन कर तैयार हुआ था। उसकी लम्बाई १०० योजन तथा चौड़ाई १० योजन थी आनुनिक युग में विभिन्न देशों में निर्मित अत्यन्त विशाल सेतुओं की उपस्थिति उक्त सेतुबन्धन की घटना को वास्तविक मानने को बाध्य करती है ।

समुद्र वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति

वाल्मीकि रामायण में समुद्र, समुद्र की लहरें, जलजन्तुओं, रत्नों, तटीय वस्तुओं, चन्द्रमा के कारण आने वाले समुद्री ज्वारभाटों तथा समुद्र से सम्बद्ध अन्यान्य वस्तुओं का जितना सजीव वर्णन किया गया है, उसका जीवन्त वर्णन किसी भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है जिसने कभी समुद्र देखा ही न हो। उदाहरण के लिए सुन्दरकाण्ड के प्रथम सर्ग में हनुमानजी द्वारा समुद्र-गमन के समय का वर्णन प्रस्तुत है --

"यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः।

 स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते ॥ ६६ ॥

सागरस्योमानामुरसा शैलवर्ष्मणा 

अभिनंस्तु महावेगःपुप्लुवे स महाकपिः ॥ ६७ ॥

 

वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक वस्तु अमुक स्थान पर ही रही होगी' की कल्पना निःसार है। उस रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है, परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई हैं। ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रामाणिक की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है। महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया है। आज भी उन्हीं मार्गों से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा होती है । किष्किन्धा में वाली को मारकर राम ने चौमासा किया था। वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज भी किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना करना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक, पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शङ्काएँ उठायी गयी है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा के नासिका छेदन से हैं पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण से भी दोनों स्थानों का पास पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर है। इन स्थानों का वाल्मीकिरामायण के वर्णन से साहचर्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ साठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही हैं। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियां, आन्ध्र, चोल, पाण्डय, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं ।

समुद्रसम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकिरामायण में लङ्का जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धाकाण्ड (सर्ग ६७ श्लोक ३९ ) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत ( सुन्दरकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २६ ) पर चढ़ना बताया गया है।


इसी तरह सुबेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकिरामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकिरामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र ६ हजार वर्ष पुराना है, जब कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित वाली के शव दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है। रामायण की संस्कृति सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, वाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे । हनुमानजी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे। वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तं शरीरम्' इत्यादि वेदमन्त्र के अनुसार प्राधान्येन शवदाह का ही समर्थन किया गया है । अतः वाली एवं रावण के शव दाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था। शव को गाड़ने की कल्पना कथञ्चित् हो तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है। इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं माना जा सकता । 

उत्तर भारत में भी साधु-सन्यासी, सन्त, महात्मा इत्यादि को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है। छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है। कहीं कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क पुरुषों के शव को भी गाड़ा हो जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है। हमारे यहाँ शवों के सम्बन्ध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा है। अतः इनमें से किसी मुस्लिमबहुल प्रदेश में कत्रों को देखकर यह निर्विवाद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल का ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने को प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं। यह बात तात्कालिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है ।


जहाँ तक वाल्मीकिरामायण वर्णित स्थानों का प्रश्न है वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिए जिन स्थानों का वर्णन किया है वे अत्यन्त सजीव हैं तथा किसी भी अन्वेषण करनेवाले के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकते हैं। प्रारम्भ में जो-जो घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लङ्का विजय के पश्चात् लौटते समय भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन किया है


"अप पूर्व महादेव प्रसादमकरोद विभुः ।

 एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥ 

सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम्।

 परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥

 " "एष सेतुमया बद्धः सागरे लवणार्णवे ।। १६ ।। " "कैलासशिखराकारे त्रिकूटशिखरे स्थितम् । 

लङ्कामीक्षस्व वेदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ३ ॥ 

" "यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता बलात् । 

एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥४५॥ " ( वा० रा० ६ । सर्ग १२३)

इसी तरह हिरण्यनाम पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२-४४, शबरीमिलन स्थल ४१ अगस्त्य एवं शरभङ्ग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, श्रृंगवेरपुर ५२ इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक हैं। अभी भी उन स्थानों की उपस्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्व पर किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है।  विद्वानों वाल्मीकिरामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है । फिर उसी ग्रन्थ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता। ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अङ्ग को पकाकर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिए रख छोड़ने की घटना के समान है।

लंका की स्थिति


ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिए वाल्मीकिरामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस रामायण के अनुसार लङ्का समुद्र तट से सौ योजन दूर थी। इन लोगों द्वारा अभी तो पूर्वी मध्यप्रदेश, दक्षिणी विहार, पश्चिमी बंगाल एवं छोटा नागपुर के आस-पास लङ्का की स्थिति का निर्धारण करना है। उसके लिए अभी कोई प्रमाण भी नहीं है । आज भी लङ्का नाम से ही जब प्रसिद्ध द्वीप है तब फिर 'लक्का' को 'लङ्का' कहा होगा, यह कहने की आवश्यकता ही क्या है ? यह नहीं कहा जा सकता कि लङ्का नाम की कोई चीज नहीं थी। वर्तमान श्रीलङ्का भी हमारे मत में रावण की लङ्का नहीं है। इस लङ्का का दूसरा नाम सिलोन भी है। सिंहल के ग्रन्थों में इस सिंहलद्वीप को रावण की लङ्का से विभिन्न बतलाया गया है। भारतीय पौराणिक भूगोल के अनुसार आज की श्रीलङ्का महाभारत का सिंहलद्वीप ही है। वास्तविकता यह है कि वाल्मीकिरामायण में वर्णित रावण को लङ्का सर्वसाधारण के लिए आज लुप्त हो गयी है। वहाँ दीर्घजीवी लोग रहते हैं। वे सामान्य व्यक्तियों द्वारा नहीं देखे जा सकते। आधुनिक भूगोलवेत्ता भी यह मानते हैं कि सहस्राब्दियों में भूगोल में पर्याप्त परिवर्तन हो जाया करता है। यह मान्यता बहुसम्मत है कि जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले समुद्र था। कुछ टीले ऐसे रहे होंगे जो इस समय आस्ट्रेलिया की ओर बढ़ गये होंगे। अतः रावण की लङ्का आध्यात्मिक एवं भौगोलिक दोनों कारणों से ही लुप्त हो गयी है । लङ्का को मध्य प्रदेश अथवा इधर-उधर खोजना एक व्यर्थं का प्रयास है। वाल्मीकिरामायण की कतिपय घटनाओं को अप्रामाणिक मानने के लिए कुछ भी ठोस तर्क प्रस्तुत नहीं किये गये हैं।


जहाँ तक रावण की जाति एवं संस्कृति का सम्बन्ध है, वाल्मीकिरामायण के अनुसार वह वैदिक संस्कृति में दीक्षित कर्मनिष्ठ ब्राह्मण था वह परम तपस्वी पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा मुनि का पुत्र था। आज भी भारत में पुलस्त्य गोत्र प्रचलित है। इन प्रमाणों के रहते हुए भी उसे दूसरी जाति का व्यक्ति मानने की निराधार कल्पना करना सर्वथा अनुचित है ।


यह सही है कि वाल्मीकिरामायण की कथाएँ युगों से गायी जाती रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि उन कथाओं में प्रमाणविरुद्ध अंश आ जाय तो उसमें कुछ कल्पना का अंश आ सकता है। पर इन कथाओं में ऐसी कोई प्रमाणविरुद्ध बातें नहीं पायी गयी हैं। इसके विपरीत युगों से प्रचलित इन कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकिरामायण की प्रामाणिकता के लिए सबसे बड़ा आधार है। हमारे यहाँ वेदों की आचार्य परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य-सम्प्रदाय-परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्यों की परम्परा से ही रामायण तथा पुराणों की भी रक्षा होती रही हैं। इसलिए रामायण में यदि कोई नयी चीज प्रविष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक की संज्ञा दे दी गयी । वाल्मीकि रामायण के टीकाकारों ने तत्तत् क्षेपकों को न मानने का हेतु यही आधार बताया कि 'यहाँ सम्प्रदाय प्राप्त व्याख्या नहीं है, अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण ही वाल्मीकिरामायण के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह कहना ठीक नहीं है कि "वाल्मीकिरामायण की कथाओं में कालान्तर में व्यापक काटछाँट की गयी ।" रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। इधर काव्यों में तथा कालिदास अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन पउमचरियं में रामायण का वर्णन है। इनके आधार पर ही रामकथाओं के भिन्न रूप बने भी हैं। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी रामकथा के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण को हो सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय संस्कृति का सन्देशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथासागर में युगों से भारतीयों को गोता लगवाकर आज भी प्रत्येक भारतीय को उसमें गोता लगवाकर उनके जीवन को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे रहा है। ऐसे प्रामाणिक ग्रंथ को छोड़कर निरावार कल्पना के सहारे नयी खोजों का दावा करना बौद्धिकस्तर से नीचे उतरने की बात है ।


आधुनिक लोग के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लङ्का इन पाँच ही काण्डों को प्रामाणिक मानते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। वैसे तो वाल्मीकिरामायण में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही  राम को विष्णु का अवतार माना गया है। अतः राम को गुप्तकाल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया गलत है।


उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण प्रामाणिक हैं। भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। किसी मान्य ग्रन्थ के कुछ अंशों को प्रामाणिक तथा कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग करना इस समय अत्यावश्यक है। सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का प्रयास करना चाहिये ।


धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण पैदा हो जाता है। हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो। रामायण की घटनाओं के विषय में धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देक होना चाहिये।  

रामायणमीमांसा से साभार

हरिओम सिगंल 






शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

पापा का प्यार

 ज़िन्दगी में जब भी ख्याल आये और तुम्हें लगे कि पापा को तुम्हारी परवाह नहीं है।तब एक बात याद रखना कि जिस दिन से आपके पापा को पता चलता है कि आपकी मम्मी के पेट में आप है। उस दिन से आज तक सोते जागते उठते बैठते भागते दौडते कोई पल पल आपकी परवाह कर रहा है तो वो है आपके पापा ।आपके दुनिया में आने से लेकर उनके दुनिया से जाने तक अगर कोई चीज आती है आपकी ज़िन्दगी में वो है पापा का प्यार। 

कभी कभी जो पापा की डाड पड़ती हैं ना वो बहुत बड़ा आशीर्वाद है जो तुम्हारी आने वाली जिंदगी को खुशियों से भर देगा।

घर में तो सब अपना प्यार दिखाते हैं,अपने बच्चों को,पर एक पिता ही है,जो बिना दिखावे के प्यार करते जाते हैं। 

पिता नारियल की तरह होता है,ऊपर से कड़क जरूर होता है,पर अंदर से नरम होता है। 



बुधवार, 12 अक्टूबर 2022

Catuaba

What is Catuaba Extract?

Both historically and today, several plants and trees native to Brazil have the extract known as Catuaba.  Catuaba extract comes from the bark of trees found in the rainforests of Brazil. However, one study proves that many commercially available supplements contain bark from Trichilia catigua, an excellent source.  Knowing which source is best for your health is essential for your well-being. Talk with your doctor about taking Catuaba or any new supplement. 


History of Catuaba

The word derives from catucaba, meaning health, kindness, and vigor. With the “c” removed, you have Catuaba, which means “good for the old Indian.” 


Dr. Pires de Almeida advocated it treats skin disorders such as morphea with other medicinal properties. Dr. Mellow Moras in Brazilian Botany said according to Dr. Lacerda, Catuaba has aphrodisiac qualities. 

In 1906, botanist Arthur Jose da Silva learned about the bark of Catuaba from a story about an old Indian man in a Brazilian village who had a young wife. She bore him a healthy child every year. It seemed unbelievable that such an older man could be so robust. The people of the village investigated and discovered him taking bark from a catuabeira tree. The therapeutic benefits of the tree spread through the town, and everyone wanted some. The older man was not so quick to share his masculinity source and built a fence around his yard. 


Besides the older man’s story, there are other references to the bark. The people in Minas Gerais of Southeastern Brazil and some northern states used the bark as a powerful and harmless aphrodisiac. 


Thus, the plant became commercialized for medicinal values, such as an aphrodisiac, sexual and nervous system stimulant, and treatment for digestive disorders. In Brazil, it became known as A. arvense — the official species.  

Difficulties in obtaining the plant caused others to find cheaper alternatives with the hope of greater therapeutic values that led to several kinds of Catuaba — resulting in at least nine Catuaba species available on the market. But the most notable and used Catuaba comes from the trees called Trichilia catigua and Erythroxylum, known for their beautiful flowers. It is best known for being an aphrodisiac, tonic and a stimulant for the central nervous system. 


But it’s the bark that has the healing properties, not the roots or pulp. Trichilia catigua is the species you want for the most benefit and positive use as herbal medicine. 


It goes by many names, including Erythroxylum Catuaba, Chuchuhuasha and Golden Trumpet. Of course, many just refer to it merely as “Catuaba.”


Commonly used in traditional medicine, Catuaba helps with a wide range of health concerns that include sexual health, memory and fatigue. It also helps to promote anti-aging.  But because of the variety of sources used to create this extract, you may have a confusion about how Catuaba may benefit your health condition. 

Catuaba Extract Benefits


Like other medicinal plants, Catuaba plays an essential role in health care. The bark of the tree is popular for treating many health concerns.  Some benefits include:


Relieves Anxiety and Stress

You can treat your anxiety with exercises, change the environment, turn off the news, or take supplements. But, see a health care professional determine the cause of your stress is not hormonal imbalance or allergies.  These treatments seem to work by a doctor or other professionals. Catuaba serves as one treatment as a supplement.


The supplement does not impair your motor skills, so you can take it and drive or operate machinery since it also has antifatigue properties. Studies performed in 2018 by BMC Complementary and Alternative Medicine found that Catuaba does not affect the body in that way.  There is partial support for the folk use of Catuaba as a reliever of fatigue, which is a common symptom of anxiety. 

According to American College for Advancement in Medicine, common medications deplete vital nutrients essential to your health. Close to 50 percent of American adults take a least one prescription drug. Those prescriptions deplete your body of nutrients.  The good news is to find the supplements that are right for your body. That way, you are in control of your body and prevent chronic diseases that cause fatigue.  Although stress and anxiety are treatable conditions through nutrition, exercise, and supplements, many people are unaware of this remedy. Panic attacks are usually a result of anxiety — a condition that includes a multitude of symptoms. People suffering from anxiety may experience changes in their heart rate and breathing, like during a panic attack. 

Fights Depression

Like anxiety, depression is a condition considered treatable by exercise, allergies, supplemental therapy or lifestyle changes. In most cases, depression requires a look at the whole person.  Depression relates to other health issues. Try to discuss these health concerns with your physician that it is not a disease by medical evidence. It is more of a “trapped inward feeling,” and no two people experience the same symptoms. 


Studies have found that deficiencies and imbalances of specific nutrients, food sensitivities, artificial lighting, digestion, inactivity, toxic chemicals found in the home can cause depression. 


Based on a study performed on rats, Catuaba extract can release serotonin into your system.  Serotonin generates in our bodies and controls appetite, sleep and sexual desire.  When you have serotonin stores flowing through your body, the mood might be at an optimal level. 


If Catuaba can help to raise serotonin levels, then there is the possibility that the patient’s depression could lift or lighten. Any treatment of depression requires a consultation with a qualified medical doctor to ensure the patient’s safety. A recent study showed serotonin levels connected to gastrointestinal problems. 

Remedy for Erectile Dysfunction

This condition affects more than just older men, although their lower testosterone levels may affect it. Erectile dysfunction, or ED, is more common as a man’s body ages, though it can occur at any point in his life. 


If you recall the story of the old Indian man mentioned earlier, Catuaba may help with this health concern. There are several reasons erectile dysfunction may occur — physical problems, heart disease, smoking, stress, depression or hormonal issues.  Catuaba is historically and anecdotally used as an aphrodisiac to help with sexual health. Besides this historical use of the extract, as discussed above, Catuaba may help ease anxiety and stress, which are potential causes of erectile dysfunction in otherwise healthy men.

Several research papers and publications outline the causes of ED, the side effects of taking the medications and a list of herbs and natural remedies as treatment. Erythroxylum Catuaba is one of the many herbs listed. Others include ginkgo Biloba, Panax ginseng and asparagus racemosus. 


Another article from the American Botanical Council suggests some herbs may not work based on folkloric or anecdotal. But science has vindicated some, and Catuaba is on the list of legit aphrodisiacs used as a multi-herb combination. Some herbs in the blend were Asian ginseng, ginkgo extract, hawthorn, Tribulus and horny goat weed. A study performed on a group of men using the herbal blend lasted 12 weeks. Ninety-five percent of the men on the supplement noticed an improvement in their erections.

Other Health Benefits

A study from 2008 found that Catuaba had some effect on the cells involved in Parkinson’s disease and its symptoms. 


Inflammation is a normal reaction within the body, but chronic inflammation, which stems from oxidative stress or free radicals, can cause many serious illnesses. Reducing inflammation is a common goal you may have amongst those wishing to improve their overall health. A study in 2008 showed evidence suggesting that Catuaba has anti-inflammatory properties. 

One study in 1992 found that there was potential for Catuaba to treat bacteria causing diseases and HIV infections.  Though these are small studies, their findings provide an exciting basis for future research to enhance our understanding of the effect of Catuaba on your body.

Catuaba Extract Dosage

Read the label of your supplement and see what the manufacturer recommends. You can take as much as 1,000 mg of Catuaba extract once daily. As with all supplements, contact your doctor before changing your diet or health routine. If your doctor suggests taking another dosage, understand the reason for doing so and decide whether or not to follow their instructions.

Where to Buy Catuaba Extract?

You can purchase Catuaba extract in both powder form. 

Are you interested in trying Catuaba extract as a dietary supplement for mental health, muscle protection, or potential antioxidant properties? 


Catuaba Extract Side Effects

There has not been sufficient research on Catuaba to list the supplement’s side effects and safety definitively.


Some users have reported an upset stomach and stomach spasms while using Catuaba. Headache, dizziness and excessive sweating are potential side effects of Catuaba usage. Catuaba supplements have occasionally contained other compounds that have potential health risks. It is vital to source your supplements thoroughly. 


Catuaba Warnings

Pregnant and breastfeeding mothers should avoid Catuaba because the lack of research makes it impossible to say whether it poses a health risk to the mother or baby.


It is important to discuss using supplements with a medical professional before integrating them into your diet.


The Bottom Line

Catuaba extract powder is easy to use and readily available. Problems arise when companies use other tree bark ingredients.  


Stay away from pharmaceutical medicines. Taking medications will deplete your body’s nutrients, which causes compounding issues for your overall well-being. Try to use natural remedies for anxiety or depression. Stress is here to stay. It helps to learn its fundamental causes, such as a stressful environment, reading the newspapers, watching the news, and lacking proper diet and exercise. Treating stress with supplements and lifestyle changes are the actual solutions. And Catuaba extract may help your body withstand everyday stress. 

Catuaba extract has its unique benefits for men dealing with erectile dysfunction and libido. Catuaba is on lists of legit aphrodisiacs for ED. You can use it as a multi-herb combination, where men who took these supplements noticed a substantial improvement. 


However, Catuaba is also a viable option for relief of fatigue, memory issues and stress. While there is some evidence that Catuaba can help ease some symptoms of depression and anxiety, this requires further investigation. If you suffer from depression and anxiety, reach out for real help and try natural remedies for a lasting and positive outcome.


These statements have not been evaluated by the Food and Drug Administration. These products are not intended to diagnose, treat, cure or prevent any disease.

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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

बरडॉक

बरडॉक के फायदे और नुकसान

बरडॉक को पुराने समय से ही समग्र चिकित्सा और चीनी चिकित्सा में एक जड़ी बूटी के रूप में उपयोग किया जाता रहा है जो अपच, मधुमेह, हार्मोनल असंतुलन आदि समस्याओं का इलाज करने में मदद करता है। बरडॉक का पूरा पौधा गुणों से भरपूर होता है - इसके बीजों और पत्तियों को सुखाया जा सकता है। बीजो का तेल निकालने के लिए उपयोग किया जाता है, इसके पत्ते और तने हर्बल और वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में भी काफी उपयोगी हैं। बरडॉक चाय व्यापक रूप से दुनिया भर में जानी जाती है जबकि जापानी भी इस पौधे का अपने भोजन में उपयोग करते हैं।

बरडॉक

बरडॉक की जड़ें लंबी और सफेद रंग की सफेद होती हैं। दिखने में आकर्षक नहीं होती , पर यह जड़ें मानव शरीर को बहुत लाभ पहुंचाती हैं। यह रक्त और त्वचा के लिए एक प्रमुख विषहरण एजेंट के रूप में कार्य करता है। जड़ों में मौजूद फाइटोकेमिकल्स को भी बालों को अनिवार्य रूप से फायदा पहुंचाने वाला माना जाता है। बरडॉक की बड़ी पत्तियां एक ऊनी बनावट के साथ गहरे हरे रंग की होती हैं, जिसका आकार दिल जैसा होता है। आटिचोक के रूप में एक ही परिवार से संबंधित, बरडॉक की जड़ों स्वाद में मीठे तीखी होती हैं, जबकि पत्ते आटिचोक के समान स्वाद देती हैं। 

बरडॉक का पौषणिक मूल्य

यह आमतौर पर आर्किटियम के रूप में जाना जाता है, बरडॉक अनिवार्य रूप से एक डेटोक्सिफ्यिंग एजेंट के रूप में जाना जाता है जो विषाक्त पदार्थों को समाप्त करके रक्त को शुद्ध करता है। यह प्रकृति में डायाफ्रामिक और मूत्रवर्धक है और बरडॉक जड़ से निकाला गया तेल फाइटोस्टेरॉल और आवश्यक फैटी एसिड में अत्यधिक समृद्ध है। पौधे में फाइबर, मैग्नीशियम , पोटेशियम और विटामिन बी 6 आनुपातिक मात्रा में होने के अलावा एंटीऑक्सीडेंट भी भारी मात्रा में होते हैं । बर्डॉक की जड़ में राइबोफ्लेविन, फोलिक एसिड, पाइरिडोक्सिन , नियासिन विटामिन ई और विटामिन सी होता है । 

बरडॉक के स्वास्थ लाभ 

स्वस्थ त्वचा

डेटोक्सिफ्यिंग और हीलिंग गुणों के साथ समृद्ध, बरडॉक कुशलता से मुँहासे, खसरा , एक्जिमा जैसी त्वचा की समस्याओं का इलाज करता है और शुष्क त्वचा से निपटता है। एक स्वस्थ त्वचा प्राप्त करने के लिए, चाय के रूप में आंतरिक रूप से बरडॉक का सेवन किया जाना चाहिए , इसे बाहरी रूप से तेल के रूप में लिया जा सकता है या पत्तियों को पीसकर और उसमें दलिया मिलाकर तैयार किया गया फेस पैक भी इस्तेमाल किया जा सकता है । यह निशान और नीरसता से रहित ताजा और स्वस्थ त्वचा देता है।

वजन कम करने के लिए 

इसके द्विध्रुवीय गुणों के कारण, बरडॉक शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है ताकि इसे डेटोक्सीफी करने और शरीर प्रणालियों के कामकाज को बढ़ाया जा सके। और यह इस प्रकार वजन कम करने में मदद करता है और वजन कम करने के इच्छुक लोगों के दैनिक आहार में इसे शामिल करते है । चूँकि बरडॉक में कैलोरी काउंट पर बहुत कम है, इसलिए यह स्वाभाविक रूप से वजन कम करने के लिए एक आदर्श विकल्प है।


प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाता है

शरीर को डिटॉक्स करने की अपनी क्षमता के अलावा, बरडॉक प्रकृति में जीवाणुरोधी भी है। शरीर से अनावश्यक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने से, यह बैक्टीरिया से छुटकारा पाने और भविष्य के आक्रमण को रोकने में भी मदद करता है; इस प्रकार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देता है। 

गठिया से लड़ता है

प्रतिरोधक गुणों में इसकी दक्षता के कारण, बरडॉक गठिया से जुड़े लक्षणों और दर्द को कम करने में मदद करता है । बरडॉक की जड़ से तैयार चाय विशेष रूप से सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने के लिए जानी जाती है जो आमतौर पर पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस और गंभीर जोड़ों के दर्द से पीड़ित लोगों में नोट की जाती है ।


कैंसर को रोकता है

शोध बताते हैं कि बरडॉक उच्च कैंसर से लड़ने वाले गुणों से लैस है । एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-ऑक्सीडेटिव और डिटॉक्सीफिकेशन जैसे इसके गुणों के कारण, बरडॉक शरीर में कैंसर कोशिकाओं के विकास और गुणन को बढ़ाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने की इसकी क्षमता भी शरीर में कैंसर के ट्यूमर की पुनरावृत्ति नहीं होने देता है ।


पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है 

सभी अप्राकृतिक और अनावश्यक पदार्थों के शरीर को डेटोक्सीफी करने में इसकी उच्च दक्षता के कारण, बरडॉक अपच, अम्लता और कब्ज जैसी समस्याओं का इलाज करता है । इंसुलिन जैसे पॉलीसेकेराइड पदार्थ की उपस्थिति के कारण भूख में सुधार करते हुए जुलाब के रूप में कार्य करते हैं।


रक्त शर्करा के स्तर को संतुलित करता है

बरडॉक की जड़ में स्वाभाविक रूप से इंसुलिन होता है जो मधुमेह रोगी के लिए स्वाभाविक रूप से उनके रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प है। शोध यह भी बताते हैं कि मधुमेह से उत्पन्न होने वाली स्थितियों को कम करने के लिए बरडॉक का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जा सकता है, खासकर डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी स्थिति में ।


एक स्वस्थ यकृत के लिए 

बरडॉक की जड़ के लाभों को सबसे अच्छे और अत्यधिक प्रभावी रूप में जाना जाता है क्युकि यह यकृत विकारों को ठीक करने की क्षमता रखता है। इसके डिटॉक्सीफाइंग गुणों के कारण, यह सुनिश्चित करता है कि पित्त के रिसाव के समय यकृत किसी भी हानिकारक रसायनों और विषाक्त पदार्थों से मुक्त रहे । यह एक एंटी-कार्सिनोजेनिक फ़ंक्शन के परिणामस्वरूप यकृत को हेपेटाइटिस, पित्त की पथरी और सूजन जैसी समस्याओं से बचाता है।


टॉन्सिलिटिस को ठीक करता है

बरडॉक व्यापक रूप से टॉन्सिलिटिस का इलाज करने के लिए जाना जाता है जो सूजन वायरस के एक जीवाणु संक्रमण के कारण होता है। बरडॉक ऊतक उपचार को सक्षम करके, खांसी से राहत , गले में खराश , दर्द और सूजन को कम करके स्थिति से लड़ने में मदद करता है । 

गठिया के लिए टीकाकरण

बरडॉक किसी भी प्रतिरोधक एजेंट को शरीर से दूर रखने के लिए जाना जाता है। यह रक्त परिसंचरण को प्रवर्धक के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार, गठिया के उपचार और प्रतिरोधक स्थिति को रोकने में एक प्रभावी पदार्थ है।


बुखार और सर्दी का इलाज करता है

बरडॉक , लंबे समय से आम दवा में एक घटक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यह व्यापक रूप से बुखार , गले में खराश, सर्दी और खांसी के इलाज के लिए उपयोग किया गया है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-पायरेटिक गुण उल्लेखित समस्याओं से निपटने में मदद करते हैं। इसके अलावा, इसके डायाफ्रामिक गुणों के कारण, बरडॉक शरीर में पसीना लाने में मदद करता है, इस क्रिया के परिणामस्वरूप बुखार को कम करता है। 

बरडॉक के उपयोग

कैंसर, गठिया, किडनी की विफलता और मधुमेह जैसी समस्याओं के इलाज और रोकथाम के लिए पारंपरिक और चीनी चिकित्सा में बरडॉक का व्यापक रूप से उपयोग किया गया है । यह वजन घटाने में मदद करता है, एक स्वस्थ शरीर, त्वचा और बाल प्राप्त करता है। खांसी, जुकाम जैसी बुनियादी समस्याओं से लेकर गठिया, टॉन्सिलिटिस और गठिया जैसी बड़ी समस्याओं के लिए, प्रभावी ढंग से उन सभी को कम करने में सक्षम बनाता है।

बरडॉक के साइड इफेक्ट & एलर्जी 

फूलों से एलर्जी वाले लोगों को लग सकता है कि बरडॉक एक उपयुक्त सहायता नहीं है आम तौर पर इससे जुड़ी स्थितियों के इलाज के लिए । बर्डॉक को रक्त के थक्के को ट्रिगर करने के लिए भी जाना जाता है, इसलिए यह रक्तस्राव के विकार वाले लोगों को इसके उपयोग के बारे में इस्तमाल करने की लिए सलाह दी जाती है । गर्भवती और स्तनपान करने वाली महिलाओं को जड़ी बूटी का उपयोग नहीं करने की सलाह दी जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह भ्रूण को बहुत कम प्रभावित करता है।


बरडॉक की खेती

यूरोप में पैदा होने वाला, व्यापक रूप से उत्तरी अमेरिका और फ्रांस में इसके उपचार गुणों के कारण फैला हुआ है। यह पौधा रेतीली मिट्टी में पाया जाता है जैसे कि नाइट्रोजन में समृद्ध नम मिट्टी। यह ओहियो और संयुक्त राज्य भर में एक आम खेती है। तुर्की में, बरडॉक बुरी नज़र से दूर करने के लिए माना जाता है। इस पौधे के अध्ययन ने स्विस आविष्कारक जॉर्ज डी मेस्ट्रल द्वारा वेल्क्रो का आविष्कार हुआ । 

https://www.google.com/amp/s/www.lybrate.com/amp/hi/topic/benefits-of-burdock-and-its-side-effects 




गिंको बाइलोबा

गिंको बाइलोबा (जिन्‍कगो) के फायदे, उपयोग और नुकसान 

विश्वभर में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं, जो मानव स्वास्थ के लिए फायदेमंद होती हैं। इन्हीं जड़ी-बूटियों में से एक है गिंको बाइलोबा या जिंको बाइलोवा, जिसे मैडेनहायर भी कहा जाता है।  यह दुर्लभ जड़ी-बूटी है और बमुश्किल दिखाई देती है। साथ ही आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि प्राचीन चिकित्सा पद्धती से लेकर अभी तक गिंको बाइलोबा का उपयोग व्यापक रूप से किया जा रहा है। गिंको बाइलोबा का लाभ विभिन्न बीमारियों से बचने में किया जाता है। साथ ही अगर कोई बीमार है, तो उसके लक्षणों को कम करने में भी यह जड़ी-बूटी फायदा पहुंचा सकती है। 

गिंको बाइलोबा क्या है?

गिंको बाइलोबा एक तरह का आयुर्वेदिक पौधा है, जिसका आकार काफी बड़ा होता है। इसका पेड़ 60 से 100 फीट तक ऊंचा हो सकता है। साथ ही यह सीधा, लंबा और शाखाओं वाला होता है। इसके पत्ते लंबे और डंठल वाले होते हैं। गिंको बाइलोबा के पत्ते, जड़ और छाल में कई आयुर्वेदिक गुण होते हैं, जिसके उपयोग से कई रोगों से मुक्ति पाने में मदद मिल सकती है।

गिंको बाइलोबा के औषधीय गुण

गिंको बाइलोबा में मौजूद औषधीय गुण के कारण ही लोग इसे इस्तेमाल करते हैं। इसमें मुख्य रूप से मल्टीविटामिन और मिनरल्स की समृद्ध मात्रा पाई जाती है, जो शरीर को जरूरी पोषण प्रदान करता है। इसके अलावा, इसमें एंटीडिप्रेसेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-प्लेटलेट जैसी गतिविधि भी होती है, जो इनसे जुड़ी समस्या को दूर रखने में मदद कर सकता है ।

गिंको बाइलोबा के फायदे 

गिंको बाइलोवा की न सिर्फ पत्तियां, बल्कि इसकी शाखा से लेकर जड़ तक हर चीज उपयोग में आती है। इसकी पत्तियों से निकले अर्क से आंखों व हृदय से संबंधित कई बीमारियों का इलाज संभव है। अस्थमा, चक्कर, थकान व टिनिटस आदि बीमारियों के इलाज के लिए जिंको बाइलोबा का उपयोग सैकड़ों वर्षों से किया जा रहा है। वहीं, इसके कुछ नुकसान भी हैं, जिनके बारे में आगे लेख में विस्तार से बताया गया है । आइए, जानते हैं कि किन-किन बीमारियों में इसका उपयोग किया जा सकता है।

1. आंखों के लिए

ग्लूकोमा ऐसी स्थिति है, जिसमें देखने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इससे बचने में गिंको बाइलोबा मदद कर सकता है।  जिंको बाइलोवा में फ्लेवोनोइड्स, विटामिन-ई और विटामिन-सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो आंखों को प्रभावित करने वाले फ्री रेडिकल्स को खत्म करने में मदद करते हैं। इससे ग्लूकोमा के जोखिम और उसके स्तर को कम करने में मदद कर सकते हैं । लिहाजा, कहा जा सकता है कि गिंको बाइलोबा के लाभ आंखों के लिए हो सकते हैं।

2. रक्त संचार में सुधार के लिए

जिंको बाइलोबा के पत्तों के अर्क में एंटीऑक्सीडेंट के रूप में क्वेरसेटिन, टेरेपिन लैक्टोन, ग्लूकोज, कार्बनिक एसिड, डी-ग्लूकेरिक और जिन्कगोलिक एसिड जैसे गुण होते हैं। ये सभी रक्तचाप को नियंत्रित करके रक्त के प्रवाह में सुधार करने का काम कर सकते हैं। साथ ही ये प्लेटलेट को इकट्ठा होने से भी रोक सकते हैं । ऐसे में कहा जा सकता है कि गिंको बाइलोबा के बेनिफिट रक्त संचार में सुधार के लिए हो सकता है।

3. चिंता व तनाव को कम कर एकाग्रता बढ़ाने के लिए

चिंता और अवसाद से निजात पाने के लिए लोग गिंको बाइलोबा का उपयोग दवाओं के रूप में करते हैं। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट गुण मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों को जल्द ही आराम दिलाने में मदद कर सकते हैं । वहीं, इसके आयुर्वेदिक गुण अल्जाइमर का इलाज करने में सक्षम है। साथ ही याददाश्त को बेहतर करने में मदद कर सकते हैं, जिससे एकाग्रता बढ़ सकती है । इस विषय पर सटीक जानकारी के लिए अभी और वैज्ञानिक शोध किया जा रहा है।

4. हृदय के लिए

जिन्को बाइलोबा के अर्क में एंटीहाइपरट्रॉफिक गुण होता है, जिस कारण हृदय को बेहतर तरीके से काम करने में सहायता मिल सकती है। यहां बता दें कि हाइपरट्रॉफिक में हृदय की मांसपेशियां जरूरत से ज्यादा मोटी हो जाती हैं। इससे हृदय की खून को पंप करने की क्षमता प्रभावित होती है। इस प्रकार जिन्को बाइलोबा हृदय को स्वस्थ रखकर शरीर में रक्त संचार प्रणाली को संतुलित करने का काम कर सकता है ।

5. दर्द को कम करने के लिए

गिंको बाइलोबा का उपयोग कई परिस्थितियों में दर्द निवारक के रूप में किया जाता है। यह नसों के सिकुड़ने से पैर में होने वाले दर्द से भी राहत दिला सकता है । इसके अलावा, गिंको बाइलोबा का अर्क टिशू के क्षतिग्रस्त होने पर न्यूरोपैथिक जैसे पुराने दर्द से भी आराम दिला सकता है । लिहाजा, कहा जा सकता है कि गिंको बाइलोबा के फायदे दर्द से राहत दिलाने के लिए हो सकते हैं।

6. स्वस्थ मस्तिष्क के लिए

 जिंकगो स्वस्थ लोगों की मानसिक क्षमता में सुधार कर सकता है, लेकिन इस विषय में अभी और शोध की आवश्यकता है । वहीं, एक अन्य शोध के अनुसार जिन्को बाइलोबा के अर्क में मौजूद पॉलीफेनोल्स में न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर होता है, जो मस्तिष्क के विकास के लिए सहायक हो सकता है । इसलिए, ऐसा माना जा सकता है कि गिंको बाइलोबा के लाभ मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए हो सकते हैं।

7. ऊर्जा बढ़ाने के लिए

जिंको बाइलोबा के फायदे शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए हो सकते हैं। इस संबंध में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में दिया हुआ है कि जिन्को बाइलोबा के अर्क में फ्लेवोनोइड्स और टेरपेनेस होते हैं, जो एंडोथेलियम-ड्राइवड रिलैक्सिंग फैक्टर (ईडीआरएफ) की रिलीज को उत्तेजित कर सकते हैं। इससे मांसपेशियों में ऊर्जा का प्रवाह होता है ।

8. श्वसन तंत्र के लिए 

गिंको बाइलोबा के अर्क के उपयोग से कई श्वास संबंधी विकारों को दूर किया जा सकता है। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुणों की वजह से चीन और जापान में गिंको बाइलोबा का उपयोग अस्थमा, कफ व खांसी जैसे रोगों के इलाज के लिए किया जाता है । इसके अलावा, गिंको बाइलोबा फेफड़ों से जुड़ी समस्या को कम कर लंग्स इंजरी को भी ठीक कर सकता है ।

9. एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट की तरह

गिंको बाइलोबा के गुण में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधि भी शामिल है। इसमें पाया जाने वाला एंटीऑक्सीडेंट गुण ऑक्सीडेंटिव स्ट्रेस की समस्या को कम करने का काम कर सकता है। ऑक्सीडेंटिव स्ट्रेस मस्तिष्क और हृदय के लिए जोखिम पूर्ण होता है । वहीं, एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण कोलाइटिस की समस्या से छुटकारा दिला सकता है। यह समस्या इंफ्लेमेशन (सूजन) के कारण होती है ।

10. सिरदर्द कम करने के लिए

गिंको बाइलोबा के लाभ सिरदर्द से राहत दिलाने के लिए भी हो सकते हैं। दरअसल, गिंको बाइलोवा के पत्तियों से निकलने वाले अर्क में जिंकगोलाइड बी नामक हर्बल तत्व पाया जाता है। इस तत्व के कारण ही गिंको बाइलोवा माइग्रेन जैसे रोगों के उपचार में सहायक साबित हो सकता है ।

11. प्रीमेंसट्रूअल सिंड्रोम के लक्षण को कम करने के लिए

महावारी से पहले नजर आने वाले लक्षणों को प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम कहा जाता है। इस दौरान सूजन, सिरदर्द और मूड स्विंग का सामना करना पड़ सकता है । वैज्ञानिक शोध के अनुसार, गिंको बाइलोबा के औषधीय गुण प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम के कारण होने वाले शारीरिक और मानसिक लक्षणों को कम कर सकते हैं ।


12. एडीएचडी के लिए

गिंको बाइलोबा का उपयोग एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) जैसी समस्या से निपटने के लिए किया जा सकता है। एडीएचडी से ग्रस्त व्यक्ति के लिए किसी भी काम पर ध्यान केंद्रित करना और अपने व्यवहार को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है । शोध के अनुसार, जिन्को बाइलोबा के उपयोग से मानसिक रोगों की समस्या को दूर किया जा सकता है। साथ ही शोध के अनुसार, जिन्कगो बाइलोबा कुछ ही साइड इफेक्ट के साथ एडीएचडी के उपचार में लाभदायक हो सकता है ।

13. वजन कम करने के लिए

जिंको बाइलोबा के फायदे शरीर के वजन को कम करने के लिए भी हो सकते हैं।  इसमें एंटी-ओबेसोजेनिक प्रभाव पाया जाता है, जो वजन को संतुलित रखने में मदद कर सकता है। साथ ही यह फैट को भी कम कर सकता हैं, जिससे वजन कम हो सकता है ।

14. यौन स्वास्थ्य के लिए

एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, गिंको बाइलोबा के अर्क की खुराक कामेच्छा में सुधार कर सकती है । साथ ही गिंको बाइलोबा में मौजूद नाइट्रिक ऑक्साइड रक्त के प्रवाह को सुगम बना सकता है, जिससे महिलाओं की मांसपेशियों के टिश्यू पर भी असर हो सकता है। गिंको बाइलोबा महिलाओं के जननांग की संवेदनशीलता को बेहतर कर सकता है । इससे यह साबित होता है कि गिंको बाइलोबा के गुण यौन स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं।

15. बवासीर के लिए

बवासीर की समस्या से राहत दिलाने में भी गिंको बाइलोबा के गुण असर दिख सकते हैं।  गिंको बाइलोवा का अर्क दर्दनाक बवासीर से पीड़ित लोगों का इलाज कर सकता है। गुदा और मलाशय पर जिन्कगो बाइलोबा के अर्क का प्रयोग सूजन, रक्तस्राव और संक्रमित क्षेत्र में दर्द से राहत देने में मदद कर सकता है ।

16. फाइब्रोमायल्जिया के लिए

मांसपेशियों में दर्द और थकावट को मेडिकल भाषा में फाइब्रोमायल्जिया कहा जाता है । इस समस्या में जिंको बाइलोबा अर्क का सेवन करने से मांसपेशियों में दर्द और थकावट को दूर करने में मदद मिल सकती है। इससे फाइब्रोमायल्जिया विकार को कम किया जा सकता है । इसलिए, कहा सकते हैं कि गिंको बाइलोबा के बेनिफिट फाइब्रोमायल्जिया से छुटकारा दिलाने का काम कर सकते हैं।

17. त्वचा के लिए

गिंको बाइलोबा त्वचा को कई तरह के लाभ पहुंचा सकते हैं। इसमें पाए जाने वाले एंटी-रिंकल गुण त्वचा की झुर्रियों को रोक सकते हैं, जिससे चेहरे पर बढ़ती उम्र का असर जल्द नहीं दिखाई देता । वहीं गिंको बाइलोबा को फेस पैक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। गिंको बाइलोबा एक प्राकृतिक सनस्क्रीन है। यह त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाली सूर्य की हानिकारक किरणों से बचा सकता है। यही कारण है कि इसके अर्क का उपयोग कई सनस्क्रीन क्रीम में भी किया जाता है ।

18. बालों के लिए

जिन्को बाइलोबा लीफ एक्सट्रैक्ट बालों के फॉलिकल्स में कोशिकाओं के प्रसार और अपोप्टोसिस यानी मृत कोशिकाओं पर प्रभाव डालकर बालों के पुनः विकास यानी रिग्रोथ को बढ़ावा देने का काम कर सकता है। इसलिए, इसे हेयर टॉनिक के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी जा सकती हैं । इसलिए, गिंको बाइलोबा की पत्तियों के अर्क से बालों के फिर से विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है ।

जिन्कगो बिलोबा किन-किन रूपों में उपलब्ध है और इसे कैसे उपयोग किया जा सकता है

जिन्कगो बिलोबा कई रूपों में उपलब्ध होता है और गिंको बाइलोबा का सेवन कैसे करें, तो नीचे हम इसके उपयोग के कुछ तरीके बता रहे हैं।

गिंको बाइलोबा पत्तियों के रूप में उपलब्ध है, जिससे चाय बनाकर सेवन किया जा सकता है।

यह कैप्सूल के रूप में भी मिलता है, जिसे डॉक्टर की सलाह पर ही लेना चाहिए।

जिन्कगो बिलोबा की गोलियां भी आती है, जिसे सही परामर्श के बाद लिया जा सकता है।

गिंको बाइलोबा पत्तियों का पेस्ट बनाकर त्वचा पर लगाया जा सकता है।

इसके अर्क को तेल में मिलाकर बालों में लगा सकते हैं।

नोट : देखा जाए तो गिंको बाइलोबा एक हर्बल औषधि के रूप में इस्तेमाल में लाई जाती है। ऐसे में इसकी मात्रा और इसका उपयोग डॉक्टर की सलाह अनुसार ही करना बेहतर है।

गिंको बाइलोबा के नुकसान – 

अगर गिंको बाइलोबा का उपयाेग फायदेमंद हो सकता है, तो वहीं इसका अधिक सेवन उतना ही नुकसानदेह भी हो सकता है। इसका सेवन करने से पहले इसकी सही जानकारी का होना जरूरी है। 

कई बीमारियों का खतरा: गिंको बाइलोबा के साइड इफेक्ट में सिरदर्द, पेट खराब और त्वचा की एलर्जी शामिल है।

रक्तस्राव: अगर किसी को रक्तस्राव की समस्या है, तो इसके सेवन से जोखिम बढ़ सकता है।

थायराइड कैंसर: जिन्को बाइलोबा के अधिक सेवन से लिवर और थायराइड का कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है।

गिंको बाइलोबा का बीज: ताजा (कच्चा) या भुना हुआ जिन्को बाइलोबा का बीज जहरीला हो सकता है और इसे खाने से गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान: गर्भावस्था में जिन्कगो का सेवन असुरक्षित हो सकता है। इससे प्रसव के दौरान अधिक प्रसव पीड़ा या अतिरिक्त रक्तस्राव हो सकता है। वहीं, स्तनपान करने वाली महिलाओं के लिए यह सुरक्षित है या नहीं, इसका कोई सटीक प्रमाण नहीं हैं।

इस लेख में हमने जिन्को बाइलोबा के फायदों के बारे में विस्तार से जाना। अगर कोई इस जड़ी-बूटी को इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहा है, तो पहले इस लेख को अच्छी तरह से पढ़ ले। गिंको बायलोबा के फायदे और नुकसान के बारे में अच्छी तरह जानने के बाद ही इसका सेवन शुरू करें। वहीं, अगर कोई गंभीर रूप से बीमार है, तो इसके इस्तेमाल से पहले डॉक्टर से सलाह करना भी जरूरी है।


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स्पिरुलिना

हमारे आस-पास कई ऐसी औषधीय गुणों वाली वनस्पति मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य को कई तरीके से लाभ पहुंचा सकता है। इन्हीं में से एक है, स्पिरुलिना। यह एक एल्गी यानी पानी में पाई जानी वाली वनस्पति है, जिसका नाम आपके लिए नया हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल सालों से एक कारगर आयुर्वेदिक औषधि के रूप में किया जाता रहा है। 

स्पिरुलिना क्‍या है

स्पिरुलिना जल में पाई जाने वाली वनस्पति (एल्गी) है। यह ताजे पानी में पायी जाती है। इसे हरी-नीली एल्गी के नाम से भी जाना जाता है। यह अपने पोषक तत्वों और स्वास्थ्य लाभ की वजह से काफी प्रयोग में लाई जाने लगी है। इस नीले-हरे शैवाल में एक तीव्र स्वाद और गंध होती है, जो कई स्वास्थ्य लाभ पहुंचा सकता है । 

स्पिरुलिना के फायदे

इस भाग में स्पिरुलिना के लाभ बताने से पहले आपको यह बता दें कि औषधि होने के बाद भी स्पिरुलिना किसी बीमारी का इलाज नहीं है। यह महज उनके लक्षणों को कम कर सकती है। बीमारी का सटीक इलाज करवाने के लिए किसी अच्छे डॉक्टर से परामर्श करना जरूरी है। 


1. कैंसर से बचाव के लिए स्पिरुलिना टेबलेट्स

स्पिरुलिना में फाइकोसाइनिन (Phycocyanin) नामक यौगिक पाया जाता है। शोध के मुताबिक, यह यौगिक कैंसर के जोखिम को और इससे बचाव में कुछ हद तक मदद कर सकता है । शोध बताते हैं कि स्पिरुलिना शरीर में कीमोप्रिवेंटिव (Chemopreventive – कैंसर से बचाव) प्रभाव प्रदर्शित कर सकता है । वहीं, हम यह भी बता दें कि कैंसर एक घातक बीमारी है, इसका इलाज किसी घरेलू नुस्खे से संभव नहीं है। अगर कोई इस बीमारी से ग्रस्त होता है, तो डॉक्टरी उपचार करवाना अति आवश्यक है।

2. उच्च रक्तचाप करे नियंत्रित

उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी समस्या है, जो हृदय-रोग का कारण बन सकता है। बीपी को कम करने के लिए स्पिरुलिना का उपाय किया जा सकता है।  स्पिरुलिना में एंटीहाइपरटेंसिव गुण होते हैं, जिसके कारण यह उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है ।

3. हृदय के लिए है लाभकारी स्पिरुलिना कैप्सूल

ऐसे कई शारीरिक विकार हैं जो हृदय रोग का कारण बन सकते हैं, जैसे मोटापा, डायबिटीज और उच्च रक्तचाप। अगर किसी को हृदय रोग से बचना है, तो उसके कारणों को दूर करना जरूरी है। यह स्पिरुलिना टेबलेट्स की मदद से किया जा सकता है। इसमें एंटीहाइपरलिपिडेमिया (लिपिड को कम करने वाले), मोटापा एवं डायबिटीज को नियंत्रित करने वाले गुण पाए जाते हैं, जो हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकते हैं। वहीं, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर को फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से बचा कर हृदय रोग की आशंका को कम कर सकते हैं ।

4. मस्तिष्क स्वास्थ्य

स्पिरुलिना के फायदे में मस्तिष्क स्वास्थ्य भी शामिल है। यह दिमाग में Aβ प्रोटीन के संचय को कम कर घटती याददाश्त को रोक सकती है। स्पिरूलिना मस्तिष्क में सूजन को भी कम करने में सहायक माना गयी है। इसलिए, यह पार्किंसंस रोग (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का एक विकार) के उपचार में भी सहायक हो सकती है। स्पिरूलिना नए न्यूरॉन्स बनाकर न्यूरोनल घनत्व में भी सुधार कर सकती है, जिससे मस्तिष्क स्वास्थ्य बना रह सकता है ।


5. इम्यून सिस्टम

पोषक तत्वों की कमी की वजह से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यूनिटी में कमी आती है। अध्ययनों के मुताबिक, स्पिरुलिना में मौजूद पोषक तत्व पोषण संबंधी कमियों को दूर कर इम्यूनिटी में सुधार कर सकते हैं। इम्यूनिटी में होने वाले बदलाव की वजह से टी-कोशिकाओं के उत्पादन में होने वाले परिवर्तन को रोकने में स्पिरुलिना सहायक है ।


6. एनीमिया

एनीमिया का मतलब रक्त में हीमोग्लोबिन या लाल रक्त कोशिकाओं में कमी होना है। एनीमिया के कारण लंबे समय तक तक कमजोरी और थकान का एहसास शरीर में रहता है । स्पिरुलिना में मौजूद आयरन और फोलेट की वजह से स्पिरुलिना टेबलेट्स लेने से लाल रक्त कोशिकाओं के हीमोग्लोबिन की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो सकती है और इम्यून सिस्टम को मजबूती मिल सकती है।


7. पाचन शक्ति बेहतर करे

बात जब पाचन शक्ति बेहतर करने की हो, तो सबसे पहला नाम सामने आता है फाइबर। यह पाचन क्रिया मजबूत बनाते हैं और कब्ज से आराम दिलवा सकते हैं। वहीं, ये पेट में लंबे समय तक भरे रहने का एहसास बनाकर, वजन को नियंत्रित करने में भी मदद कर सकते हैं । बता दें कि फाइबर से भरपूर होने के कारण, स्पिरुलिना कैप्सूल्स का सेवन पाचन शक्ति को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है ।


8. इंफ्लेमेशन से बचाव

स्पिरुलिना अपने कई गुणों के लिए जाना जाता है, जैसे इम्यूनोमॉड्यूलेटरी, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीकैंसर, एंटीहाइपरलिपिडेमिक और एंटीडायबिटिक गुण। वहीं, इन्ही में से एक एंटी-इन्फ्लामेट्री भी है। दरअसल, इसका मुख्य घटक फाइकोसाइनिन (phycocyanin) है, जो एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों से समृद्ध होता है। इसलिए, कहा जा सकता है कि स्पिरुलिना शरीर में इंफ्लेमेशन को रोकने व नियंत्रित करने में एक अहम भूमिका निभा सकती है । स्पिरुलिना में मौजूद एंटी इंफ्लामेशन गुण गठिया के उपचार में भी सहायक हो सकते हैं ।


9. एचआईवी

स्पिरुलिना के फायदे बताते हुए ऊपर लेख में हम जिक्र कर चुके हैं कि यह इम्यूनिटी को बढ़ा सकती है। ऐसे में ये एचआईवी के मरीज, जिनकी इम्यूनिटी काफी कमजोर हो गई है, उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक करने में मदद कर सकती है । साथ ही इसके बढ़ते इंफेक्शन की गति को धीमा भी कर सकती है ।

10. आर्सेनिक विषाक्तता से बचाव

आर्सेनिक एक ऐसा एलिमेंट है, जो धरती के नीचे, पानी, हवा सब जगह पाया जाता है, लेकिन इसमें न तो गंध होती है और न ही कोई स्वाद । अगर इसकी मात्रा शरीर में ज्यादा हो जाती है, तो विषाक्तता यानी पॉइजनिंग हो सकती है। यहां स्पिरुलिना शरीर को आर्सेनिक से बचाने में भी मदद कर सकती है। स्पिरुलिना में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और इम्यूनिटी प्रभाव आर्सेनिक को शरीर में जमने से रोक सकते हैं ।

11. कैंडिडा के लिए

स्पिरुलिना के लाभ कई हैं। इसमें मौजूद पोषक तत्व कैंडिडा से भी बचा सकते हैं। दरअसल, कैंडिडा एक फंगस है, जो शरीर के साथ ही लगभग हर जगह मौजूद रहता है। यह इम्यून सिस्टम कमजोर होने पर संक्रमण की तरह शरीर में फैलने लगता है । स्पिरुलिना में एंटीफंगल गुण होते हैं, जो कैंडिडा होने के खतरे को कम करने में सहायक साबित हो सकते हैं ।

12. आंखों के लिए उपयोगी

जब आंखों पर अधिक प्रकाश पड़ता है, तो उससे आंखों पर ऑक्सीडेटिव तनाव का प्रभाव पड़ता है, जिससे अंधापन हो सकता है। इससे बचने के लिए स्पिरुलिना का उपयोग किया जा सकता है। दरअसल, स्पिरुलिना में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण आंखों को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के बचा सकते हैं और कम होती आंखों की रोशिन के जोखिम से बचा सकते हैं । वहीं, स्पिरुलिना आंखों से जुड़ी बीमारी जैसे मोतियाबिंद और डायबिटीज की वजह से आंखों को होने वाले नुकसान से भी बचाव का काम कर सकती है ।

13. स्किन एजिंग

स्पिरुलिना में टायरोसिन, विटामिन-ई (टोकोफेरोल) और सेलेनियम होते हैं, ये सभी तत्व चेहरे के एजिंग प्रभावों को कम करने लिए जाने जाते हैं। टायरोसिन त्वचा कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की गति को धीमा कर सकते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा पर झुर्रियों का कारण बनने वाले फ्री रेडिकल्स को खत्म कर सकते हैं । पानी की मदद से स्पिरुलिना पेस्ट को झुर्रियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता हैं।

14. बालों के लिए स्पिरुलिना के फायदे

बालों का बढ़ना एकदम से रुकने की वजह शरीर में जरूरी पोषक तत्वों जैसे प्रोटीन, फैटी एसिड और आयरन की कमी भी हो सकती है । इसलिए, पोषक तत्वों का खजाना स्पिरुलिना को बालों की ग्रोथ के लिए लाभदायक माना जाता है। इसमें बालों के लिए आवश्यक पोषक तत्व मौजूद हैं, जिसके कारण यह इन तीनों की कमी को पूरा कर सकती है। इससे झड़ते बालों की समस्या से आराम मिल सकता है ।

स्पिरुलिना के पौष्टिक तत्व – 

स्पिरुलिना में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। चलिए, स्पिरुलिना में पाए जाने वाले सभी पोषक तत्वों पर एक नजर डाल लेते हैं ।


पोषक तत्व मात्रा प्रति 100 ग्राम

जल 4.68 g

ऊर्जा 290 kcal

प्रोटीन 57.47 g

कुल फैट 7.72g

कार्बोहाइड्रेट 23.90g

फाइबर 3.6 g

शुगर 3.10 g

मिनरल

कैल्शियम 120 mg

आयरन 28.5 mg

मैग्नीशियम 195 mg

फास्फोरस 118 mg

पोटेशियम 1363 mg

सोडियम 1048 mg

जिंक 2 mg

विटामिन

विटामिन-सी 10.1 mg

थियामिन 2.38 mg

राइबोफ्लेविन 3.67 mg

नियासिन 12.82 mg

विटामिन बी-6 0.364 mg

फोलेट, डीएफई 94 µg

विटामिन ए, RAE 29 µg

विटामिन ए, IU 570 IU

विटामिन ई, (अल्फा-टोकोफेरॉल) 5 mg

विटामिन के (फाइलोक्विनोन) 25.5 µg

लिपिड

फैटी एसिड, सैचुरेटेड 2.65 g

फैटी एसिड, टोटल मोनोअनसैचुरेटेड 0.675 g

फैटी एसिड, टोटल पॉलीअनसैचुरेटेड 2.08 g

स्पिरुलिना का उपयोग

नीचे जानिए स्पिरुलिना खाने का तरीका –

स्पिरुलिना पाउडर की सीमित मात्रा को फलों के जूस में मिलाकर पी सकते हैं।

स्पिरुलिना कैप्सूल या पाउडर को खुराक के रूप में ले सकते हैं।

अगर सूखी स्पिरुलिना मिलती है, तो इन्हें स्नैक्स में टॉपिंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। स्नैक्स में स्पिरुलिना का इस्तेमाल संबंधी जानकारी डाइटिशियन से ले सकते हैं।

कितना खाना चाहिए : 

सामान्य तौर पर आहार पूरक के रूप में स्पिरुलिना को प्रति दिन 3 से 5 ग्राम तक ही खाना चाहिए । हालांकि, शारीरिक जरूरत के हिसाब से इसकी सटीक मात्रा जानने के लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

स्पिरुलिना को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखें?

स्पिरुलिना बाजार में टेबलेट और कैप्सूल के रूप में उपलब्ध है। इनकी एक्सपायरी डेट होती है, जिसके अनुसार इसका उपयोग किया जा सकता है। इसे हमेशा सूरज की रोशनी से दूर सूखी जगह पर रखना चाहिए।

स्पिरुलिना कहां से खरीदें?

स्पिरुलिना का उपयोग जानने के साथ यह जानना भी जरूरी है कि यह किस रूप में और कहां मिलती है। दरअसल, एल्गी यानी स्पिरुलिना बतौर पाउडर, गोली और कैप्सूल के रूप में बाजार में मिलती है। चाहें, तो इसे ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं । ध्यान रहे, बिना डॉक्टरी परामर्श के इसका सेवन न करें।

स्पिरुलिना के नुकसान – 

स्पिरुलिना खाने के फायदे तो हैं ही, लेकिन इसके अधिक सेवन से कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। इसलिए, स्पिरुलिना साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए इसके सेवन से पहले एक बार डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। आमतौर पर स्पिरुलिना खाने के बाद होने वाले कुछ मामूली प्रतिकूल प्रभाव कुछ इस प्रकार हैं 


दस्त

पेट खराब होना

पेट फूलना

एडिमा (सूजन)

सिरदर्द

मांसपेशियों में दर्द

त्वचा का लाल होना

पसीना

स्पिरुलिना के फायदे जानने के बाद अगर आप इसका सेवन करने की सोच रहे हैं, तो एक नजर स्पिरुलिना खाने के नुकसान पर भी जरूर डालें, क्योंकि किसी भी चीज की अधिक मात्रा हानिकारक साबित हो सकती है। अगर आपके मन में अभी भी स्पिरुलिना कैप्सूल को लेकर कुछ सवाल हैं, तो इसका सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें। इस लेख को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ शेयर करना न भूलें। 

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100 बीमारियों की 1 दवा है आंवला

100 बीमारियों की 1 दवा है आंवला

आंवला एक ऐसा फल है जो अपने औषधीय गुणों के कारण काफी फेमस है और इसे हर किसी को अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए। खासतौर पर महिलाओं की डाइट में तो इसकी खास जगह होनी चाहिए क्‍योंकि यह विटामिन सी, कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशिम, आयरन, कैरोटीन और विटामिन बी कॉम्पलेक्स का बहुत बड़ा स्रोत है। शायद यही वजह है कि आंवले को 100 रोगों की एक दवा माना जाता है और आंवले की तुलना अमृत से की जाती है।

 'इसमें कोई शक नहीं कि आंवला एक वंडर फूड है। इस छोटे से फल में ऐसे गुण हैं, जो आपकी बॉडी के लिए बेहद फायदेमंद हैं। आंवला में मौजूद गुण बॉडी की इम्‍यूनिटी बढ़ाते हैं और साथ ही कई बीमारियों को जड़ से भी खत्‍म करते हैं।' 

दाग-धब्‍बे हटाएं

 'चेहरे के दाग-धब्बे हटाकर उसे खूबसूरत बनाने के लिए भी आंवला बहुत उपयोगी होता है। इसका पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा साफ, चमकदार होती है और झुर्रियां भी कम हो जाती हैं।'

काले और घने बाल

बालों को काला, घना और चमकदार बनाने के लिए आंवले का प्रयोग होता है, इसके पाउडर से बाल धोने या फिर इसे खाने से बालों की समस्याओं से निजात मिलती है।

ब्‍लड की कमी दूर करें

महिलाओं में ब्‍लड की कमी होने पर, प्रतिदिन आंवले का जूस लेना काफी लाभप्रद होता है। यह बॉडी में रेड ब्‍लड सेल्‍स के निर्माण में सहायक होता है, और ब्‍लड की कमी नहीं होने देता।

पीरियड्स में होने वाली ऐंठन दूर करें

आंवले में मौजूद कुछ मिनरल और विटामिन सामूहिक रूप से पीरियड्स में होने वाली ऐंठन के उपचार में बहुत उपयोगी होते हैं। इसके अलावा महिलाओं को पीरियड्स में कई तरह की प्रॉब्‍लम्‍स का सामना करना पड़ता है, जिनमें अनियमित पीरियड्स, पेट व कमर में दर्द, ज्‍यादा ब्‍लीडिंग शामिल हैं। ऐसे में आंवला खाना बेहद फायदेमंद है। अगर रोजाना आंवला खाया जाए तो आंवले में मौजूद विटामिन और मिनरल पीरियड्स से जुड़ी समस्‍यओं से छुटकारा दिला देते हैं।

एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर

आंवला अपने एंटीऑक्सिडेंट गुणों के माध्यम से बॉडी में फ्री रेडिकल्‍स की मात्रा को कम करता है। फ्री रेडिकल्‍स, उम्र बढ़ने के लक्षणों जैसे झुर्रियां और उम्र के धब्बे के साथ जुड़े हुए हैं।

डाइजेस्टिव सिस्‍टम में मददगार

खाने को पचाने में आंवला बहुत मददगार है। इसे खाने से कब्‍ज, खट्टी डकार और गैस की समस्‍या से मुक्ति मिलती है। यही वजह है कि आंवले को किसी न किसी रूप में आपको अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए। आप आंवले की चटनी, मुरब्‍बा, अचार, जूस या चूरन के रूप में भी इसे अपनी डाइट का हिस्‍सा बना सकती हैं।

बढ़ती है इम्‍यूनिटी

आवंले में बैक्‍टीरिया और फंगल इंफेक्‍शन से लड़ने की ताकत होती है। इसे खाने से हमारी बॉडी की इम्‍यूनिटी बढ़ती है, जिससे हम बीमरियों से दूर रहते हैं। यही नहीं आंवला बॉडी में मौजूद टॉक्‍सिन यानि जहरीले पदार्थों को बाहर निकाल देता है। आंवला खाने से सर्दी-जुकाम, अल्‍सर और पेट के इंफेक्‍शन से मुक्ति मिलती है।

डायबिटीज में फायदेमंद

आंवला डायबिटीज से परेशान महिलाओं के लिए किसी अमृत से कम नहीं है। दरअसल, आंवले में क्रोमियम तत्‍व पाए जाते हैं जो इंसुलिन हार्मोंस को मजबूत कर ब्‍लड में शुगर लेवल को कंट्रोल करती हैं। अगर आपको डायबिटीज है तो आंवले के जूस में शहद मिलाकर पीने से बहुत आराम मिलेगा। 

हार्ट के लिए अच्‍छा

 'आंवले में मौजूद क्रोमियम बीटा ब्लॉकर के प्रभाव को कम करते हैं। इससे आपका हार्ट मजबूत और हेल्‍दी बनता है। यही नहीं आंवला खराब कॉलेस्ट्रोल को खत्म कर अच्छे कॉलेस्ट्रोल को बनाने में हेल्‍प करता है।' 

हड्डियों और आंखों के लिए गुणकारी

आंवला खाने से हड्डियों को ताकत मिलती है और वे मजबूत बनती हैं। आंवले में भरपूर मात्रा में कैल्‍शियम होता है और इसे खाने से ऑस्ट्रोपोरोसिस, अर्थराइटिस और जोड़ों के दर्द से आराम मिलता है। इसके अलावा आंवले का जूस आंखों के लिए गुणकारी होता है। यह आंखों की रोशनी बढ़ाता है। यही नहीं जिन्‍हें मोतिया बिंद, कलर ब्लाइंडनेस या कम दिखाई देता है उन्‍हें आंवले का रस पीना चाहिए।

केवल इतना ही नहीं, आंवला खाने के और भी कई फायदे हैं। शायद इतने फायदे जानकर आप इसे आज ही बाजार से खरीद लाएंगी और अपनी डाइट में शामिल कर लेंगी। हां एक बात और अगर आप सर्दियों के तीन महीने अपनी डाइट में आंवले को शामिल करती हैं तो आपकी बॉडी में कैल्शियम की कमी पूरे साल नहीं होती है। 




“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...