मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

 लिखित "ब्रीफ़" में क्या जानकारी दी जाए?

ब्रीफ़ उतनी ही सावधानी से तैयार किया जाना चाहिए जितनी सावधानी से वकील कोर्ट में चल रहे अपने केस का ब्रीफ तैयार करता है। जब तक कि आवेदक को इस तरह के ब्रीफ तैयार करने का अनुभव न हो विशेषज्ञ की राय ली जानी चाहिए और इस हेतु उसकी सेवाएँ ली जानी चाहिए। सफल व्यवसायी ऐसे लोगों को नौकरी पर रखते हैं जो अपने माल की विशेषताओं और खासियत के विज्ञापन करने की कला और मनोविज्ञान को समझते हैं। जिसे अपनी व्यक्तिगत सेवाएँ बेचनी हो उसे भी यही करना चाहिए। ब्रीफ में निम्न जानकारी होनी चाहिए :

1. शिक्षा : संक्षेप में परंतु स्पष्ट रूप से लिखें कि आपकी शिक्षा कहाँ तक है, आपने कॉलेज में किन विषयों में विशेषज्ञता हासिल की है और उस विशेषज्ञता के पीछे के कारण भी बताएँ।

2. अनुभव : अगर आपको उस तरह की नौकरी का कोई अनुभव है जिसके लिए आप आवेदन कर रहे हैं तो पूरी तरह से उसका उल्लेख करें और अपने पूर्व नियोक्ताओं के नाम और पते भी लिखें। यह निश्चित रूप से लिखें कि आपको उस पद पर किस तरह के काम का विशेष अनुभव है जिस वजह से आप उस पद के लिए अधिक उपयुक्त हैं जिसके लिए आप आवेदन कर रहे हैं।

3. संदर्भ : लगभग हर बिज़नेस फर्म उन संभावित कर्मचारियों के पिछले रिकॉर्ड के बारे में सब कुछ जानना चाहती है जो ज़िम्मेदारी के पद के लिए आवेदन करते हैं। अपने ब्रीफ के साथ इन लोगों के पत्रों की छायाप्रतियाँ लगा दें :

अ. पूर्व नियोक्ता।

ब. वे शिक्षक जिनसे आपने पढ़ा है।

स. प्रसिद्ध लोग जिनकी बात पर भरोसा किया जा सकता है। .

 4 अपना फोटोग्राफ़ : अपने ब्रीफ के साथ अपना हाल ही का फोटोग्राफ़ लगा दें।

 5. किसी निश्चित पद के लिए आवेदन दें: आवेदन करते समय यह उल्लेख करना न भूलें कि आप किस पद के लिए आवेदन दे रहे हैं। "किसी भी पद" के लिए आवेदन न करें। इससे यह समझा जाएगा कि आपमें विशेषज्ञीय योग्यता का अभाव है।

6. जिस पद के लिए आप आवेदन दे रहे हैं उसके लिए अपनी योग्यताओं का वर्णन करें : पूरा ब्यौरा दें कि आपको यह विश्वास क्यों है कि आप उस पद के लिए पूरी तरह योग्य हैं। यह आपके आवेदन का सबसे महत्वपूर्ण विवरण है। किसी भी अन्य जानकारी की तुलना में यह जानकारी निर्धारित करेगी कि आपको चुना जाएगा या नहीं।

7. परिवीक्षा पर काम करने का प्रस्ताव रखें : यह एक क्रांतिकारी सुझाव लग सकता है, परंतु अनुभव ने यह सिद्ध किया है कि इससे कम से कम एक मौक़ा अवश्य मिलता है। अगर आपको अपनी योग्यताओं पर विश्वास है तो आपको सिर्फ एक मौके की ही तो ज़रूरत है। साथ ही इस तरह के प्रस्ताव से यह पता चलता है कि आपको उस पद पर काम करने की अपनी योग्यता पर विश्वास है जिसके लिए आप आवेदन दे रहे हैं। इससे नियोक्ता सबसे अधिक आश्वस्त होता है। इस तथ्य को स्पष्ट करें कि आपका प्रस्ताव इन बातों पर आधारित है :

अ. आपको उस पद के लिए अपनी योग्यता पर विश्वास है।

ब. आपको अपने संभावित नियोक्ता के फ़ैसले पर भी विश्वास है कि वह आपको परिवीक्षा का अवसर देने के बाद नियुक्ति देगा। 

स. आपके मन में उस पद को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प है।

8. अपने संभावित नियोक्ता के बिज़नेस का ज्ञान : किसी भी नौकरी के लिए आवेदन देते समय उस बिज़नेस के बारे में पर्याप्त रिसर्च कर लें और उस बिज़नेस की पर्याप्त जानकारी हासिल कर लें। अपने ब्रीफ में यह संकेत करें कि आपने उस क्षेत्र में क्या ज्ञान हासिल किया है। इससे बहुत फर्क पड़ेगा क्योंकि इससे यह पता चलता है कि आपमें कल्पनाशीलता है और उस पद को हासिल करने में आपकी सच्ची रुचि है।

याद रखें कि वह वकील केस नहीं जीतता जिसका वकालत का ज्ञान सबसे अधिक होता है, बल्कि वह वकील केस जीतता है जो अपने केस की सबसे अच्छी तैयारी करता है। अगर आपने "केस" को अच्छी तरह से तैयार और प्रस्तुत किया है तो आप शुरुआत में ही आधी जीत हासिल कर चुके हैं।

इस बात से न डरें कि आपका ब्रीफ ज़्यादा लंबा हो जाएगा। रोज़गार खोजने में आपकी जितनी रुचि है, सुयोग्य कर्मचारियों की सेवाएँ खरीदने में नियोक्ता की भी उतनी ही रुचि होती है। दरअसल, सबसे सफल नियोक्ताओं की सफलता का राज़ सुयोग्य सेनापति चुनने की उनकी योग्यता होती है। वे पूरी जानकारी चाहते हैं।

एक और बात का ध्यान रखें अगर आप अपने ब्रीफ़ की तैयारी सफ़ाई से करेंगे तो उससे यह पता चलेगा कि आप मेहनती इंसान हैं। मैंने क्लाइंट्स के लिए ऐसे ब्रीफ़ तैयार करने में मदद की है जो इतने प्रभावी और असाधारण थे कि आवेदक को बिना व्यक्तिगत इंटरव्यू के ही नौकरी मिल गई।

जब आपका ब्रीफ़ पूरी तरह से तैयार हो जाए तो इसके ऊपर अच्छी तरह से टाइप करवा लें।

रॉबर्ट के. स्मिथ की योग्यताओं का विवरण

द ब्लैंक कंपनी, इंक. के प्रेसिडेंट के प्राइवेट सेक्रेटरी के पद के लिए आवेदन

हर बार जब आप ब्रीफ़ भेजें तो कंपनी का नाम बदल दें।

यह व्यक्तिगत तरीका ध्यान आकर्षित करने का अचूक तरीका है। अपने ब्रीफ़ को उस सबसे अच्छे काग़ज़ पर टाइप कराएँ जो आपको मिल सके और इसे किसी पुस्तक के कवर जैसे भारी काग़ज़ से बाइंड कराएँ। अगर आप एक से अधिक कंपनी में आवेदन दे रहे हैं तो हर बार बाइंडिंग और फर्म का नाम बदल लें। आपका फोटो आपके ब्रीफ वाले किसी पेज पर लगा होना चाहिए। इन निर्देशों का पूरी तरह पालन करें और जब आपकी कल्पनाशीलता आपको कोई सुझाव दे तो इसे बेहतर बनाने का प्रयास करते रहें।

सफल सेल्समैन अपने पहनावे पर ध्यान देते हैं। वे जानते हैं कि पहली छाप अमिट होती है। आपका ब्रीफ़ आपका सेल्समैन है। इसे अच्छा सा सूट पहनाएँ ताकि यह दूसरों से अलग दिख सके, ताकि आपका संभावित नियोक्ता कहे कि उसने आज तक इस तरह का ब्रीफ़ नहीं देखा जो किसी पद के लिए आवेदन के साथ आया है। अगर आप जिस पद के लिए प्रयास कर रहे हैं वह महत्वपूर्ण है तो उसके लिए सावधानी से तैयारी करना भी महत्वपूर्ण है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर आप अपने नियोक्ता को खुद को इस तरीके से बेचते हैं कि वह आपसे प्रभावित हो जाता है तो आपको शायद शुरुआत में ही उससे अधिक तनख्वाह मिलने लगे जो आपको पारंपरिक तरीके से आवेदन देने पर मिलती।

अगर आप एडवर्टाइज़िंग एजेंसी या एम्प्लॉयमेंट एजेंसी के माध्यम से रोज़गार ढूँढ़ रहे हैं तो अपने एजेंट से अपने ब्रीफ की प्रतियाँ इस्तेमाल करने को कहें ताकि आपकी सेवाओं की बेहतर मार्केटिंग हो सके। इससे एजेंट और संभावित नियोक्ता दोनों ही आपको प्राथमिकता देंगे।

शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

 आचार्य द्रोण ने आज बहुत दिनों के पश्चात् अपने अतीत को पलटा था; अंतर्मुखी हो कर अपने भीतर झाँक कर देखा था। ... वे तो जैसे उस सारे काल को ही भूल गए थे। पर उनके भूलने से ही तो किसी काल-खंड का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। उसमें उत्पन्न हुई परिस्थितियाँ नष्ट नहीं हो जातीं। वे परिस्थितियाँ ही उन्हें स्मरण कराती रहेंगी कि वे कौन हैं; और किन परिस्थितियों में वे किन लोगों के मध्य रह रहे हैं...

हस्तिनापुर में वे आजीविका के लिए आए थे; किंतु हस्तिनापुर ही क्यों ? क्योंकि जीविका उपार्जित करने के साथ-साथ द्रुपद से प्रतिशोध भी लेना था उनको । तब भीष्म ने उन्हे कुरु राजकुमारों का गुरु नियुक्त किया था। उन राजकुमारों की प्रतिभा, उनकी भक्ति और शक्ति देख कर वे प्रसन्न हो गए थे। उन्होंने स्वयं युद्ध नहीं किया था, द्रुपद से: किंतु जब अर्जुन और उसके भाई, द्रुपद को बॉध कर ले आए थे, तो द्रोण को पहली बार अपनी शक्ति का अनुभव हुआ था। उस बोध से ही जैसे उनको मद चढ़ आया था। उन्होंने द्रुपद जैसे शक्तिशाली राजा का आधा राज्य छीन लेने का साहस किया था।

तब से अब तक हस्तिनापुर की राजनीति ने कई करवटें ली थीं। और आचार्य ने हर बार सावधान हो कर उस सत्ता समीकरण को साधा था। युधिष्ठिर का युवराज्याभिषेक हुआ था, तो भी उन्हें बहुत संकट का अनुभव नहीं हुआ था। यद्यपि युधिष्ठिर का चिंतन उनके बहुत अनुकूल नहीं था; किंतु युधिष्ठिर उनका शिष्य था। और फिर अर्जुन था वहाँ। अर्जुन के बिना युधिष्ठिर हस्तिनापुर पर शासन नहीं कर सकता था; और अर्जुन किन्हीं भी परिस्थितियों में द्रोण का विरोध नहीं कर सकता था। अर्जुन के रहते उन्हें युधिष्ठिर से किसी प्रकार की कोई आशंका नहीं हो सकती थी।... किंतु जब उनकी समझ में आ गया कि धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर को हस्तिनापुर में टिकने नहीं देगा, तो उनके लिए दुर्योधन के निकट हो कर उसे अपने अनुकूल रखना ही, अधिक लाभकारी था। वे भली प्रकार समझते थे कि डूबती नाव में बैठे रहनेवाले लोग नदी के पार नहीं उतरा करते। दुर्योधन भी अपने सहायकों को ढूँढ़ रहा था। अश्वत्थामा से उसकी मित्रता थी ही। उसे आचार्य द्रोण अपना संबल लगने लगे थे...

वारणावत प्रसंग के पश्चात् जब पांडव हस्तिनापुर लौटे थे, तो वे द्रोण के परम शत्रु द्रुपद के जामाता बन चुके थे। द्रोण ने अपने भाग्य को सराहा था कि उन्होंने समय रहते, दुर्योधन का समर्थन आरंभ कर दिया था, अन्यथा वे कहीं के भी न रहते। पांडव, द्रुपद और द्रोण दोनों का एक साथ न तो समर्थन कर सकते थे, न दोनों से एक साथ सहायता पा सकते थे। और अपने ससुर का पक्ष छोड कर पांडव अपने आचार्य का समर्थन कैसे कर सकते थे। दूसरी ओर दुर्योधन, पांडवों के किसी समर्थक को हस्तिनापुर में टिकने नहीं देता।  किन्तु  वे न तो अपने मन में दुर्योधन को अर्जुन का स्थान दे पाए, न दुर्योधन ही उन्हें अर्जुन की सी भक्ति दे पाया। अर्जुन उनसे प्यार करता था, और दुर्योधन उनको अपने लिए उपयोगी मानता था। अश्वत्थामा भी, दुर्योधन का वैसा मित्र नहीं हो पाया, जैसा कि उसे हो जाना चाहिए था। दुर्योधन अपने लाभ की दृष्टि से सारी घटनाओं को देख रहा था।... अश्वत्थामा और अर्जुन में न कोई प्रतिस्पर्धा थी, न ईर्ष्या। तो दुर्योधन अर्जुन के वध के लिए, अश्वत्थामा पर कैसे निर्भर रह सकता था। उसे उस कार्य के लिए कर्ण ही अधिक उपयोगी लगता था। कर्ण की क्षमता किसी भी रूप में अश्वत्थामा से अधिक नहीं थी, किंतु कर्ण के मन में अर्जुन के प्रति जैसी घृणा थी, वैसी अश्वत्थामा के मन में कैसे हो सकती थी। और दुर्योधन के लिए पांडवों के प्रति कर्ण की घृणा, अधिक मूल्यवान थी, कर्ण का धनुष नहीं ।

हस्तिनापुर के सत्ता समीकरण में अन्य लोगों के उतार-चढ़ाव से द्रोण को उतना अंतर नहीं पड़ता था, जितना कर्ण के अभ्युदय से। कर्ण वह व्यक्ति था, जिसे द्रोण ने धनुर्वेद का ज्ञान देना अस्वीकार किया था। उन्होंने कर्ण का तिरस्कार किया था। अब यदि कर्ण दुर्योधन पर अपना प्रभाव जमा लेता है, तो उसका अर्थ है कि सत्ता पर द्रोण के एक विरोधी का प्रभाव। और यह स्थिति हस्तिनापुर में द्रोण के महत्त्व के लिए कभी भी संकटपूर्ण हो सकती थी । अश्वत्थामा ने कक्ष में प्रवेश कर पिता को प्रणाम किया। "क्या समाचार है ?" 

"यह सत्य है पिताजी ! हस्तिनापुर की अधिकांश वाहिनियाँ युद्धाभ्यास कर रही हैं।" "तुमने सेनापति से पूछा कि  यह सब किसकी आज्ञा से हो रहा है ?"

द्रोण ने प्रश्न किया। "युवराज की आज्ञा से।"

"कारण ?"

"अंगराज महावीर कर्ण दिग्विजय के लिए प्रस्थान करनेवाले हैं।" अश्वत्थामा ने बताया ।

द्रोण ने लक्ष्य किया कि अश्वत्थामा ने कर्ण के नाम से पूर्व ये सारे विशेषण सम्मान के कारण नहीं जोड़े थे। वह उसका उपहास कर रहा था।

"हाँ । पांडवों ने दिग्विजय की थी तो दुर्योधन उसके बिना कैसे रह सकता था। अब यह राजसूय यज्ञ भी करना चाहेगा।" द्रोण जैसे सशब्द चिंतन कर रहे थे।

अश्वत्थामा अपने पिता की गंभीर मुद्रा देखता रहा। कुछ बोला नहीं । वह समझ रहा था कि इन शब्दों में दुर्योधन का समर्थन नहीं था।


बुधवार, 22 नवंबर 2023

 भारतीय संस्कृति के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान करने वाले चौबीस अथवा दस अवतारों  में भगवान राम और कृष्ण का विशिष्ट स्थान है। उन्हें भारतीय धर्म के आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्र कहा जा सकता है। उन्होंने व्यक्ति और समाज के उत्कृष्ट स्वरूप को अक्षुण्ण रखने एवं विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए, इसे अपने पुण्य-चरित्रों द्वारा जन साधारण के सामने प्रस्तुत किया है। ठोस शिक्षा की पद्धति भी यही है कि जो कहना हो, जो सिखाना हो, जो करना हो, उसे वाणी से कम और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाले आत्म-चरित्र द्वारा अधिक व्यक्त किया जाय। यों सभी अवतारों के अवतरण का प्रयोजन यही रहा है, पर भगवान राम और भगवान कृष्ण ने उसे अपने दिव्य चरित्रों द्वारा और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रखर रूप में बहुमुखी धाराओं सहित प्रस्तुत किया है ।

राम और कृष्ण की लीलाओं का कथन तथा श्रवण पुण्य माना जाता है। रामायण के रूप में रामचरित्र और भागवत के रूप में कृष्ण चरित्र प्रख्यात है। यों इन ग्रंथों के अतिरिक्त भी अन्य पुराणों में उनकी कथाएँ आती हैं। उनके घटनाक्रमों में भिन्नता एवं विविधता भी है। इनमें से किसी कथानक का कौन सा प्रसंग आज की परिस्थिति में अधिक प्रेरक है यह शोध और विवेचन का विषय है। यहाँ तो इतना जानना ही पर्याप्त है कि उपरोक्त दोनों ग्रंथ दोनों भगवानों के चरित्र की दृष्टि से अधिक प्रख्यात और लोकप्रिय हैं। उन्हीं में वर्णित कथाक्रम की लोगों को अधिक जानकारी है ।

कथा चरित्रों के माध्यम से लोक शिक्षण अधिक सरल पड़ता है। इस रीति से वह सर्वसाधारण के लिए अधिक बुद्धिगम्य हो जाता है और हृदयंगम भी। तत्वदर्शी मनीषियों ने इस तथ्य को समझा था और जनमानस के परिष्कार के लिए आवश्यक लोक शिक्षण की व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से कथा शैली को अपनाया था। वही सुबोध रही और लोकप्रिय बनी । अस्तु, एक प्रकार से इसी प्रक्रिया के माध्यम से धर्म चर्चा करने की रीति अपनाई गई और सफल भी हुई । वेद चार हैं और चारों को मिलाकर २० हजार मंत्र हैं। पर एक-एक पुराण का आधार विस्तार कहीं अधिक है, जितना कि चारों वेदों का सम्मिलित रूप है । अकेले महाभारत में एक लाख से अधिक श्लोक हैं। स्कंद पुराण भी ८१ हजार श्लोकों का है । उपयोगिता के अनुरूप पुराणों का विस्तार होता ही गया। १८ पुराण बने और इसके बाद १८ उप पुराण । यह विस्तार उस शैली की लोकप्रियता और सफलता पर प्रकाश डालता है ।

भगवान राम और भगवान कृष्ण के चरित्रों में लोक-शिक्षण की प्रचुर सामग्री विद्यमान है । रामायण और भगवान के कथानकों के माध्यम से जनमानस का परिष्कार और सामाजिक सुव्यवस्था का प्रतिपादन बहुत ही अच्छी तरह किया जा सकता है, किया जाता भी रहा है ।

इस प्रयास प्रचलन में एक त्रुटि यह थी कि कथा-ग्रंथों का श्रवण एवं पाठ मात्र पुण्य फल प्राप्त करने के लिए पर्याप्त बताया जाने लगा था और नाम जप की महिमा आकाश- पाताल जैसी बताई गई थी। साथ ही भक्ति को अमुक कर्मकांडों के बोध (नवधा भक्ति) तक सीमित रखा जा रहा था। इससे कथा-प्रसंगों की उपयोगिता ही नष्ट न हुई वरन उल्टी गंगा बहने लगी । जब श्रवण, पठन, जप और सरलतम कर्मकांडों में कुछ मिनट लगाने से पाप कट सकते हैं, पुण्य फल, ईश्वर का अनुग्रह और मुक्ति जैसी उपलब्धियाँ सहज ही मिल सकती हैं, तो फिर उन कष्ट साध्य आदर्शों को जीवन में उतारने का झंझट मोल क्यों लिया जाय ? सरल कृत्यों का अत्यधिक माहात्म्य बताने की परोक्ष प्रक्रिया यह हुई कि लोगों ने अनाचार से बचने और सदचार को अपनाने के लिए जिस उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की अनिवार्य आवश्यकता है उसकी उपेक्षा आरंभ कर दी। फलतः लोग पाप-कर्मों का दंड मिलने की ओर से निर्भय हो गए। जब पाप अमुक कथा सुनने से नष्ट हो जाते हों और उनका दंड न मिलता हो तो उनके सहारे जो भौतिक लाभ मिल सकते हैं उन्हें क्यों छोड़ा जाय ? इसी प्रकार यदि अति सरल कर्मकांड आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करा सकते हैं तो आदर्श जीवन जीने और लोक मंगल के लिए त्याग, बलिदान के झंझट में पड़ने की क्या जरूरत ? यह उल्टे तर्क लोगों के मन में बैठते चले गए। कथा वाचकों ने इसी सरलता को प्रस्तुत करते हुए शायद सोचा होगा कि इस सरल प्रक्रिया से आकर्षित होकर लोग जल्दी धर्मप्रेमी बनेंगे । पर वैसा होना संभव ही नहीं था और हुआ भी नहीं। छुटपुट क्रिया-कृत्यों की टंट-घंट तो इस प्रलोभन में बहुत फैली पर धर्म की आत्मा का हनन हो गया । धर्माडंबर ओढ़े हुए लोग अपने को पाप दंडों से मुक्त और ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी मानकर चलने लगे । उन्होंने उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व को झंझट कहना आरंभ कर दिया। सरलता के आकर्षण ने उस ओर से मुँह मोड़ लेने के लिए जन साधारण को प्रेरणा दी । इस प्रकार कथा शैली के विकास का मूलभूत आधार ही नष्ट हो गया ।

सीधी धारा को उल्टी बहाया गया यह अनर्थ ही हुआ। अनर्थ को सुधारना, सही करना आवश्यक था । इसके बिना कथाक्रम का लक्ष्य भ्रष्ट ही बना रहता। रामचरित्र और कृष्णचरित्र का वही उद्देश्य और स्वरूप जन साधारण के सामने रखा जाना चाहिए जिसके लिए उनका अवतरण हुआ। धर्म की स्थापना और अधर्म का उन्मूलन यही दो प्रयोजन अवतार के रहे हैं। यह प्रयोजन उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व अपनाए बिना और किसी प्रकार पूरा नहीं हो सकता। अवतारों की कथा-गाथाओं में यही तथ्य पग-पग पर उभर रहा है । हमारी कथा शैली की दिशा यही होनी चाहिए। आज धर्म की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए, उसके मूल स्वरूप से जनसाधारण को परिचित कराते हुए धर्मनिष्ठा को प्राणवान बनाने का यही तरीका है। अब कर्मकांडों का अलंकारिक माहात्म्य न बताकर चरित्र निष्ठा को अवतारों के अवतरण का मूल प्रयोजन बताया जाय और उसी के अनुगमन की दिशा में लोक मानस को प्रोत्साहित किया जाय ।

एक अन्य विकृति कथा-शैली में और भी घुस पड़ी थी जिसमें चरित्र नायकों के जीवन क्रम में ऐसी घटनाएँ जोड़ दी गई थीं जो नैतिक एवं सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन और अवांछनीय आचरण के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। लोग गुणाग्रही कम और दोषों के अनुकरण में कुशल होते हैं। जहाँ भी देवताओं, अवतारों, ऋषियों, महामानवों के चरित्रों में दोष की बात सुनते हैं, वहाँ न केवल अश्रद्धा करते हैं, वरन अपनी पथ-भ्रष्टता को सरल स्वाभाविक सिद्ध करने के लिए उन चरित्रों का संदर्भ देते हैं, जो महामानवों के लीला प्रसंग में जोड़ दिए गए हैं। दुःख की बात यह है कि कथावाचक उन्हीं को लोक रंजन की दृष्टि से चटपटा बनाकर कहते रहते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे धर्ममंच से किन अवांछनीय प्रेरणाओं का प्रवाह बहा रहे हैं।

कथा शौली के माध्यम से लोक-शिक्षण भारत की वर्तमान मनोभूमि एवं आवश्यकताओं को देखते हुए एक नितांत उपयोगी और वांछनीय प्रक्रिया है। 

- श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 21 नवंबर 2023

शादी करना जहां एक खूबसूरत और अनोखा एहसास होता है, वहीं इस फैसले के साथ आपके मन में एक सवाल भी आता है। वो सवाल यह है कि एक सही जीवन साथी कैसा होना चाहिए? हमारे लाइफ पार्टनर में वो कौन-सी बातें होनी चाहिए, जिससे हमारी जिंदगी सुख और शांति से गुजरे? हर कोई चाहता है कि उसका जीवन साथी जिंदगी में हर कदम पर साथ खड़ा रहे और हर चुनौती को अवसर में बदलना जानता हो। 

 पति-पत्नी का अस्तित्व दो शरीर और एक आत्मा का स्वरुप होता है। उनमे से किसी एक के भी स्वतंत्र रूप से सुखी रहने की आशा कम ही की जाती है। सच्चा जीवनसाथी  वही है जो अपने पति या पत्नी के लिये अपनी अभिलाषाओं, अपने सुखों का त्याग कर सके, उसके दुःख को अपना दुःख मानते हुए हरदम उसका साथ निभाये। उसकी उन्नति और प्रगति के लिये प्रयासरत रहे, उससे प्यार करे, सम्मान दे, और सबसे बढकर उसे अपने जीवन लक्ष्य को पाने में हरसंभव सहयोग दे।

मान-सम्मान सभी के लिए उन अभूषणो की तरह है जो बहुत ही कीमती है, यदि आपका जीवन साथी आपका अत्यधिक सम्मान करता है व आपके साथ-साथ परिवार के अन्यों व्यक्तियों का भी उसी तरह सम्मान करता है तो वह /वो आपसे असीम प्रेम करता है, यदि आपका जीवन साथी आपको प्यार तो जताते है परंतु सम्मान नहीं करते व बात-बात पर आपको गाली देते है व आपके चरित्र पे लांछन लगाते है तो वह व्यक्ति आपको ज़िंदगी में कभी खुश नहीं रख पाएगा सच्चे प्रेम की नींव सम्मान से है।

सच्चा जीवन साथी आपके बुरे वक्त मे एक सेकंड के लिए भी आपका साथ नहीं छोड़ेगा, यदि आप बीमार है या कोई भी ऐसी दुर्घटना घटित होती है आपके साथ तब आपका सच्चा प्रेम आपको इग्नोर नहीं करेगा आपके हर कदम पर आपसे कहेगा घबराओ मत मैं हू ना सब ठीक हो जाएगा।

यदि आपके जीवन साथी में उपरोक्त गुण पाए है तो आप इस दुनिया के उन भाग्यशाली  इंसानों में से है। आप स्वयं को गोरान्वित महसूस कर सकते हैं। सौभाग्य से मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसा जीवन साथी मिला।

अनजान राही की तरह मिलें। सफ़र जैसे जैसे आगे बढ़ा तो लगने लगा हम एक दूसरे के लिए ही बने हैं। आज बाराह सदस्यों  का परिवार एक दूसरे के सुख-दुख में एक साथ खड़ा रहता है।यह सब मेरे हमसफ़र की परवरिश से सम्भव हो सका है।

“जीवनसाथी वो है जो हमें हमसे भी अधिक प्यार करता है।”



शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

एक लंबे समय तक उसे अपने इस एकाकीपन का कोई बोध नहीं था । कहाँ था यह एकाकीपन ? उसके अपने भीतर ही रहा होगा; किंतु कुंडली मारे दम साधे पडा होगा। यहाँ तक कि जिस शकुनि के भीतर यह छिपा बैठा था, उस शकुनि को ही उसके अस्तित्व का बोध नहीं था। आज ऐसा क्या हो गया था कि वह अपनी कुंडली त्याग, फन काढ कर खड़ा हो गया था, आकर उसे ही डराने लगा था...

वर्षो पहले, जब उसकी युवावस्था अपनी आँखें खोल ही रही थी, इसी  हस्तिनापुर के एक दूत के संदेश ने, गंधार के राजप्रासाद तथा राजवंश को हिला कर रख दिया था। कुरुकुल का भीष्म अपने नेत्रहीन भ्रात पुत्र धृतराष्ट्र के लिए गांधार की राजकुमारी का दान माँग रहा था। गांधार इतने शक्तिशाली नहीं थे कि हस्तिनापुर के दूत के शरीर के टुकड़े कर उसे बोरी में डाल, अश्व की पीठ से बाँध हस्तिनापुर लौटा देते; किंतु वे कुरुओं के इस आदेश को चुपचाप स्वीकार भी तो नहीं कर सकते थे।... तब गांधारों ने ऐसे अवसरों के लिए, अपना परंपरागत मार्ग अपनाया था - धीरता का और धूर्तता का शकुनि ने अपने जीवन के सारे स्वप्नों को छिन्न-भिन्न कर दिया था और कुरुओं द्वारा किए गए गांधारों के इस अपमान के प्रतिशोध को अपने जीवन का एक मात्र लक्ष्य मान, वह अपनी बहन के साथ हस्तिनापुर चला आया था।... उसे यहीं रहना था। इन्हीं लोगों के मध्य । उनका अपना बन कर । उसे उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को जगाना था, उकसाना था। महत्त्वपूर्ण आकांक्षाओं को नहीं, अपने व्यक्तिगत महत्त्व की आकांक्षाओं को जगाना था। तो कितना सुविधापूर्ण था नेत्रहीन धृतराष्ट्र को समझाना राज्य वस्तुतः उसी का था किंतु उसे उससे वंचित कर दिया गया था।उसे किसी भी प्रकार उसे प्राप्त करके ही दम लेना चाहिए ।... शकुनि को सीधे धृतराष्ट्र को भी कुछ कहने की आवश्यकता नहीं थी। वह तो गांधारी को ही स्मरण कराता रहता था। गांधारी का एक स्पर्श धृतराष्ट्र को मंत्रमुग्ध करने के लिए पर्याप्त था । ... और फिर यह भी लगा धृतराष्ट्र को कुछ सिखाने पढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं थी। उसके भीतर इतना लोभ, मोह और स्वार्थ भरा हुआ था कि पूरे कुरुकुल को नष्ट करने के लिए, वह अकेला ही पर्याप्त था । ... वह तो कहो कि भीष्म और विदुर उसके मन में जलने वाली ज्वाला पर शीतल जल के छींटे डालते रहते थे, अन्यथा वह अग्नि कब की, भरत वंश को जला कर क्षार कर चुकी होती।... शकुनि और गांधारी को इतना ही करना था कि वे धृतराष्ट्र को भीष्म और विदुर के धर्म से प्रभावित न होने देते ।...

आज शकुनि स्मरण करने का प्रयत्न करता है, तो वह याद नहीं कर पाता कि उसका और गांधारी का मार्ग कब से पृथक् हो गया और उसे उसका आभास भी नहीं हुआ। यह आभास तो आज ही हुआ, जब गांधारी ने उसे अपने कक्ष में बुलाकर कहा, "दुर्योधन मेरा पुत्र है भैया ! और मैं उससे प्रेम करती हूँ।"...तो दुर्योधन अब उस भरतकुल का वंशज नहीं रहा, जिसे नष्ट करने के लिए, शकुनि अपना प्रत्येक सुख छोड़ कर यहाँ आया था। वह गांधारी का पुत्र हो गया था । अब धृतराष्ट्र वह अत्याचारी राजा नहीं था, जिसने नेत्रहीन होते हुए भी, मात्र अपनी सैनिक शक्ति के बल पर सुनयना गांधार राजकुमारी का अपहरण कर लिया था; और गांधारी ने उसका मुख देखना भी स्वीकार नहीं किया था। उसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली थी। आज धृतराष्ट्र गांधारी का मनभावन पति था । ... तो शकुनि ही मूर्ख था, जिसने अपना राज्य राजधानी, कुल परिवार त्याग कर अपना सारा जीवन अपने कुल और अपनी बहन के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए खपा डाला था। आज गांधारी उसी वंश की रक्षा के लिए, अपने भाई को चेतावनी दे रही थी, जिसे नष्ट करने के लिए वे दोनों यहाँ आए थे ।...

शकुनि यह क्यों नहीं समझ सका कि भाई बहन का एक परिवार तभी तक होता है, जब तक अपनी संतान नहीं हो जाती। वह तो आज तक यही मानता रहा कि उसका और गांधारी का एक ही परिवार है। उसने क्यों नहीं जाना कि इन सबंधों की प्रकृति बडी विचित्र है। मनुष्य की ममता अपने दाएँ-बाएँ खडे बहन-भाइयों से तब तक ही होती है, जब तक उसको अपने सम्मुख खड़ी अपनी संतान दिखाई नहीं पड़ती। एक बार संतान हो जाए, तो बहन भाई साधन और माध्यम हो सकते हैं, ममता के पात्र नहीं रहते।

यदि गांधारी ने धृतराष्ट्र को अपना पति, कुरुकुल को अपना श्वसुर कुल तथा धृतराष्ट के पुत्रों को अपने पुत्र स्वीकार कर लिया था, तो उसी दिन शकुनि से क्यो नहीं कह दिया, "भैया! तुम अब अपने  राज्य में लौट जाओ। जब मैंने इन परिस्थितियों को स्वीकार कर लिया है तुम भी उन्हें स्वीकार कर लो।" 

आज जैसे शकुनि की आँखें खुल गई क्यों कहती गांधारी यह सब उससे । अब वह कुरुकुल के विनाश की नहीं, धार्तराष्ट्रों के विकास की इच्छुक थी। वह अपने पति को भी राजा बनाना चाहती थी और अपने पुत्र को भी । शकुनि ही मूर्ख था कि वह समझ नहीं सका कि वह कैसे अपने शत्रुओं के लिए उपयोगी हो गया था आज गांधारी उसकी भर्त्सना कर रही है कि वह दुर्योधन को अधर्म के मार्ग पर ले जा रहा है। अधर्म का मार्ग विनाश का मार्ग है; तो उस दिन क्यो नहीं बोली, जब पांडवों को वारणावत भेजा गया था; उस दिन क्यों नहीं बोली, जब पांडवों को खांडव वन दिया गया था; उस दिन क्यों नहीं बोली, जब युधिष्ठिर को द्यूत के लिए हस्तिनापुर आने का आदेश दिया गया था ?

क्यों बोलती तब ? तब तो उसके पति और पुत्रों का अभ्युत्थान हो रहा था... अब, जब पांडवों का सर्वस्व हरण कर लिया गया था; दुर्योधन सारे वैभव का स्वामी हो चुका था और उसकी स्थिति एक शक्तिशाली सम्राट् की सी हो गई थी ... अब यदि शकुनि को बीच से, दूध की मक्खी के समान निकालकर फेंक दिया जाए, तो दुर्योधन का क्या बिगड़ेगा ?... अब गांधारी को अपने पुत्रों की सुरक्षा का ध्यान आ रहा था। अब उनके लिए शकुनि का सान्निध्य हानिकारक हो गया था। 

क्या गांधारी सचमुच इतनी चतुर राजनीतिज्ञ थी कि उसने शकुनि और अपने पुत्रों को तब तक तनिक भी नहीं टोका था, जब तक शकुनि उन्हें उन्नति के मार्ग पर ले चल रहा था; और अब वह समझ गई थी कि आरोह का समय समाप्त हो चुका था और अवरोह का क्षण आ गया था, इसलिए शकुनि को बीच में से हटा दिया जाना चाहिए ? क्या वह जान गई थी कि उसके पुत्रों को अब शकुनि के माध्यम से कोई उपलब्धि नहीं होनेवाली ! अब शकुनि उन्हें उस मार्ग पर ले चलेगा, जिस पर चलने की तैयारी में, उसने अपना सारा जीवन हस्तिनापुर में व्यतीत किया था ? 

तो शकुनि अब धार्तराष्ट्रों के लिए अनावश्यक हो गया था ?... सच भी तो है, दुर्योधन, पांडवों से कुछ और छीनना चाहे, तो पांडवों के पास अब और है ही क्या ?... तो गांधारी ने ठीक ही पहचाना था कि पांडव अब और वंचित नहीं हो सकते थे। ऐसे में अब हस्तिनापुर मे शकुनि की क्या आवश्यकता थी ।.... शकुनि ने अपने मस्तक को एक झटका दिया वह स्वयं को इस प्रकार प्रवंचित नहीं होने देगा। हस्तिनापुर में वह असहाय अवश्य है, किंतु इतना असहाय भी नहीं है कि अपना सारा यौवन नष्ट कर, मस्तक लटकाए चुपचाप गंधार लौट जाए। ... गांधारी समझती है कि अब शकुनि की आवश्यकता नहीं है; किंतु दुर्योधन तो अभी ऐसा नहीं सोचता । .... . इससे पहले कि दुर्योधन भी कुछ ऐसा ही सोचने लगे, शकुनि को कुछ करना होगा। क्या कर सकता है, शकुनि ? दुर्योधन के सम्मुख अब वह कौन-सा ऐसा प्रलोभन रख सकता है, जिससे शकुनि दुर्योधन के लिए परम आवश्यक बना रहे ?... और यदि शकुनि दुर्योधन के लिए आवश्यक बना रहेगा, तो उस पर गांधारी का आदेश नहीं चल सकता। शायद गान्धारी यह नहीं जानती है कि हस्तिनापुर में आज्ञा ही नहीं, इच्छा भी दुर्योधन की ही चलती है राजा चाहे कोई भी हो, और महारानी चाहे गांधारी ही क्यों न हो।

 शकुनि के मन में एक योजना आकार ग्रहण करने लगी ... विषधर का सा एक विचार उसके मन में निःशब्द रेंगा, और फिर क्रमशः उसके अंग-प्रत्यंग स्पष्ट होने लगे। उस जीव की आँखें खुल कर चारों ओर देखने लगीं। फन तन कर सीधा हो गया और उसकी जिह्वा लपलपाने लगी ।... लोभ का अस्तित्व बाहर किसी भौतिक पदार्थ में होता है, अथवा मनुष्य के अपने मन में ?... मनुष्य का अहंकार अपनी उपलब्धियों से अधिक तृप्त होता है, अथवा अपने शत्रुओं की वंचना से ?... दुर्योधन के लिए अपना वैभव अधिक सुखद है अथवा युधिष्ठिर की अकिंचनता ? शत्रु को अभावों के कष्ट में तड़पते देखने में जो सुख है, वह अपनी बड़ी से बड़ी उपलब्धि में भी नहीं है। ... ठीक है कि शकुनि अब दुर्योधन को और कुछ भी उपलब्ध नहीं करवा सकता; किंतु वह उसे पांडवों की पीड़ा का सुख तो प्राप्त करवा ही सकता है......।

शकुनि की दृष्टि में एक दृश्य जन्म ले रहा था ... एक बालक एक सर्प को ढेला मारता है। सर्प अपने घाव की पीड़ा से तड़पता है। बालक उसकी पीड़ा देख-देखकर प्रसन्न होता है। थोड़ी देर में सर्प अपनी पीडा से निढाल हो कर अपना सिर टेक देता है। बालक की क्रीडा समाप्त हो जाती है। उसका सुख जैसे तिरोहित हो जाता है। उसे अच्छा नहीं लगता। वह एक छड़ी ले कर सर्प को उकसाता है, उसे कोंचता है, उसके घावों को अपनी छड़ी से कुरेदता है, छीलता है... और सर्प अपनी असह्य पीडा में भी अपना सिर उठा लेता है। बालक को फिर से क्रीड़ा का सा सुख मिलने लगता है। वह सर्प को छड़ी से नहीं अपनी अंगुली से छेडना चाहता है। वह अपना हाथ उसके निकट ले जाता है। सर्प क्रोध में उसे दंश मारता है। अब तडपने की बारी बालक की है बालक सर्प विष से तड़प-तड़पकर मर जाता है; और सर्प, सिर में लगे अपने घाव से !...

शकुनि मन ही मन मुस्कराया. गांधारी कुरुओं की रक्षा करना चाहती है। उन कुरुओं की, जिन्होंने गांधारों का अपमान किया था। अपमान के प्रतिशोध का अवसर पाने के लिए शकुनि ने जीवन भर सेवा की है।जब वह अवसर इतना निकट है, उसके सामने खड़ा है गांधारी चाहती है। कि वह चुपचाप गंधार लौट जाए। ... वह भूल गई वह गांधारी है, गांधार राजकन्या । शायद अपने आपको कौरवी समझती है ।...

शकुनि की आँखों में एक कठोर भाव जन्म लेता है यदि उसकी अपनी बहन गांधारी से कौरवी हो गई है, तो उसे भी की क्रोधाग्नि में जलना होगा शकुनि के लिए तो बस एक ही काम शेष रह गया है .....  दुर्योधन के हाथ मे एक छडी पकडा देने भर का वह स्वयं ही पांडवों को कोंचने के लिए द्वैतवन जा पहुंचेगाऔर पांडवों को कोंचने का परिणाम ...

शकुनि की इच्छा हुई कि वह जोर का एक अट्टहास करे। इतने जोर का कि वह गांधारी के कानों में ही नहीं, उसके मन में भी देर तक गूंजता रहे.........।

नरेंद्र कोहली 



रविवार, 12 नवंबर 2023

 द्रौपदी, एक वृक्ष के नीचे, अकेली बैठी, बड़ी देर से अपने विचारों में लीन थी पिछले दिनों, उन लोगों ने परस्पर बहुत चर्चा की थी। चर्चा ही क्यों, उसे वाद-विवाद कहना चाहिए । “कितनी कटुता थी द्रौपदी के मन में युधिष्ठिर के लिए, और उसके पश्चात् भीम, अर्जुन तथा नकुल सहदेव के लिए । “कभी-कभी तो उसे लगने लगता था कि जिन धार्तराष्ट्रों ने उसका अपमान किया था, उनके प्रति भी उसके मन में उतनी कटुता नहीं थी, जितनी अपने पतियों के प्रति थी पर यह तो मन का छल मात्र था। ऊपरी काई हटाकर देखने पर उसकी समझ में आ गया था कि धार्तराष्ट्रों के प्रति उसके मन में घृणा थी, शत्रुता थी वह उनका नाश चाहती थी, सर्वनाश ! सबकी मृत्यु ! मृत्यु से कम कुछ नहीं । उनके साथ, उसके मन के माधुर्य का कोई एक सूत्र, कभी एक क्षण के लिए भी नहीं जुड़ा था। उनसे उसे कोई अपेक्षा नहीं थी । कटुता तो उनके प्रति थी, जिनसे उसे प्रेम था, जिनसे उसे अपेक्षाएँ थीं, जिन्हें वह अपने रक्षक मानती थी उन लोगों की ओर से उसके प्रेम की प्रतिध्वनि नहीं हुई। उन्होंने उसके प्रेम में बहकर अपने धर्म को तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने अपने धर्म की रक्षा की और उसे असुरक्षित छोड़ दिया...।

द्रौपदी सोचती जाती थी और उसके अपने ही मन की परतें उघड़ती जाती थीं उसके मन में, यह बहुत बाद में स्पष्ट हुआ था पांडवों के व्यवहार से जो आहत हुई, वह द्रौपदी के भीतर की नारी थी। वह रूपगर्विता नारी, जो मानती थी कि पुरुष की दृष्टि उस पर पड़ी नहीं कि वह मदांध हुआ नहीं ! उसने चाहा तो यही चाहा कि जिस पुरुष  की ओर वह एक अपांग से देख ले, वह घुटनों के बल उसके सम्मुख आ गिरे। फिर उसका आचार-व्यवहार, धर्म- नीति, कुछ न हो, बस उसका रूप ही हो। पांडवों ने सदा उसे अपनी प्रिय पत्नी माना था। उसकी हल्की सी कसक से भी वे तड़प उठते थे; किंतु परीक्षा की इस घड़ी में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि वह उन्हें कितनी भी प्रिय क्यों न हो, उनके लिए धर्म से बढ़कर नहीं थी । 

द्रौपदी अपने-आपको भी धीरे-धीरे पहचान रही थी वह केवल एक रूपगर्विता नारी ही नहीं थी । नारी तो वह थी ही, और उसका रूप भी ऐसा था, जिस पर कोई भी गर्व कर सकता था किंतु यह तो उसके व्यक्तित्त्व का एक अंश मात्र था । उसके संपूर्ण व्यक्तित्त्व में तो और भी बहुत कुछ था वह धर्म को जानती थी, धर्मशास्त्र की पंडिता थी, चरित्र और संकल्प से परिचय था उसका ।अब यह उसकी बारी थी कि वह पांडवों के चरित्र पर मुग्ध हो । युधिष्ठिर को ठीक ही कहा जाता था 'धर्मराज !' और कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो पितृ आज्ञा को, अपना धर्म मानकर, अपना साम्राज्य इस प्रकार त्याग दे त्रेता में भगवान राम ने ऐसा किया था और द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर ने । ठीक है कि यह वैसा त्याग नहीं था,  जैसा भगवान राम ने किया था किंतु इसका मूल स्वरूप तो वही था । धृतराष्ट्र पांडवों का राज्य छीन लेना चाहता था, जैसे कैकेयी राम का राज्य छीनना चाहती थी । धृतराष्ट्र जानता था कि युधिष्ठिर उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे और वह यह भी जानता था कि द्यूत में शकुनि उनके हाथों में पासे आने ही नही देगा यह सब युधिष्ठिर भी जानते थे । वे द्यूत का विरोध करते रहे, किंतु धृतराष्ट्र की इच्छा का विरोध नहीं किया उन्होंने । खेलने बैठ ही गए थे, तो किसी भी दाव के पश्चात् वे उठ भी सकते थे । किंतु धृतराष्ट्र की आज्ञा की अपेक्षा में, वे बैठे, हारते रहे । पासों में हार चुकने के पश्चात् वे राज्य देना अस्वीकार कर सकते थे, इतना सैन्य बल था उनके पास । किंतु अपने वचन के विरुद्ध नहीं जा सकते थे । उनकी पत्नी को सभा में लाकर उनके सम्मुख निर्वस्त्र करने का प्रयत्न किया गया; किंतु धर्मराज तनिक भी नहीं डोले । वे जानते थे कि द्रौपदी दासी नहीं है, किंतु वे स्वयं तो दास हो चुके थे। वे स्वामी के विरुद्ध शस्त्र कैसे उठाते । पत्नी की रक्षा उन्होंने कुलवृद्धों, धर्म और ईश्वर पर छोड़ दी ।

कैसी परीक्षा ली थी धार्तराष्ट्रों ने पांडवों की ! पर क्या दुर्योधन पांडवों का राज्य ही छीनना चाहता था ?--यदि केवल इतनी ही बात होती, तो पांडवों से राज्य लेना क्या कठिन था ? युधिष्ठिर तो किसी भी बात पर राज्य त्याग देते ! और द्यूत के पश्चात् तो उनका राज्य ले ही लिया था। फिर उन्हें इस प्रकार अपमानित करने की क्या आवश्यकता थी ? वह मात्र पर-पीड़न का सुख लेना चाहता था ? पर नहीं । इस सुख कितना जोखिम था । वह पांडवों के बल को भी जानता था और क्रोध को भी । यदि पांडवों में से कोई एक भी अपनी मर्यादा तोड़ बैठता, तो कुछ  ही क्षणों में धार्तराष्ट्रों की इतनी अपरिहार्य क्षति हो जाती उसके पश्चात् पांडवों का जो भी होता। पांडव यदि मार भी डाले जाते, तो वे धृतराष्ट्र की इतनी हानि कर चुके होते, जो उसके जीवन का रोग बन गई होती। और बात पांडवों की मृत्यु के साथ ही तो समाप्त नहीं हो जाती। पांडवों के मित्र प्रतिशोध लेकर छोड़ते ।मित्र भी कैसे कृष्ण और धृष्टद्युम्न ! नहीं ! दुर्योधन पांडवों को मात्र अपमानित ही नहीं कर रहा था। वह उनकी परीक्षा भी नहीं ले रहा था। किसी की परीक्षा लेने के लिए, कोई अपने लिए इतना संकट आमंत्रित नहीं करता कदाचित् दुर्योधन एक ओर पांडवों का धर्म खंडित करना चाह रहा था और दूसरी ओर उनकी एकता ! वह युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ का राजा नहीं रहने देना चाहता, तो वह उन्हें धर्मराज भी नहीं रहने देना चाहता । वह चाहता है कि पांडव, धर्म के लिए न लड़ें, अपने राज्य के लिए लड़ें, अपने स्वार्थ के लिए लड़ें। वह चाहता है कि युधिष्ठिर भी उसी के समान मात्र एक भोगी, लोलुप और अत्याचारी क्षत्रिय बनें, ताकि धर्म का बल पांडवों की ओर न रहे । कोई राजा इसलिए पांडवों की ओर से न लड़े, क्योंकि वे धर्म के लिए लड़ रहे हैं; वह उनके पक्ष से इसलिए युद्ध करे, क्योंकि युद्ध जीतने से भोग-सामग्री उपलब्ध होती है । अहंकार स्फीत होता है। दूसरों का दमन करने का अधिकार मिलता है । और उस दिन धर्मराज तनिक भी दुर्वल पड़ते, तो ऐसा हो गया होता ।

नरेंद्र कोहली 

शनिवार, 11 नवंबर 2023

 अमृत बीज हालो, हलीम,चन्द्रशूर के फायदे गुण और उपयोग 

आयुर्वेद में कई ऐसे मसालों के बारे में बताया गया है, जो सुपरफूड की तरह काम करते हैं। आपने आज तक तरबूज के बीज, अलसी के बीज और मेथी के बीज के बारे में सुना होगा।  इनसे आपने कुछ मसालों का प्रयोग भी किया होगा। गार्डन क्रेस सीड्स को हिंदी में हलीम बीज के नाम से भी जाना जाता है, और महाराष्ट्र में यह हलीम सीड्स के नाम से भी लोकप्रिय है। यह छोटे लाल रंग के बीज आयरन, फोलेट, स्टार्च, विटामिन सी, ई, ई और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का एक शक्तिशाली घर हैं।

हलीम के बीज में आयरन का उच्च स्तर लाल रक्त पाउडर के उत्पादन को बढ़ावा मिलता है और शरीर में हिमोग्लोबिन के स्तर को बनाने में भी मदद मिलती है। लंबे समय में वे कुछ हद तक बीमारी के इलाज में भी मदद कर सकते हैं। इस बीज की तासीर गर्म होती है। यही कारण है कि हलीम के बीजों का सेवन पानी में भिगोने के बाद ही किया जाता है।

1 खून की कमी को ठीक करता है:–

हलीम के यंत्र में लौह की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। आयरन का अच्छा प्रोटीन प्रोटीन की वजह से यह बीज शरीर में होने वाली कमी को पूरा करने में मदद करता है।

2. वेट लॉस में है पोषक तत्व

हलीम के बीज में स्टार्च और प्रोटीन होता है। यह दोनों ही पोषक तत्व वेट लॉस में अपनी अहम भूमिका साझा करते हैं। ईसाइयों के अनुसार, हलीम के बीजों का सेवन करने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, इसके कारण भूख को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

3. यह स्तन में दूध के उत्पादन को पुनःप्राप्त करता है :–

हलीम के बीज में प्रोटीन और आयरन की प्रचुरता होती है और इसमें गुणकारी गैलोगॉग गुण होते हैं। इसलिए यह बोतल से दूध  पिलाने वाली महिलाओं के लिए बेहद की लाभकारी होती हैं। गैलेक्टोगोग ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो स्तन ग्रंथि से स्तन के दूध के उत्पादन को प्रेरित करते हैं, उसे बनाए रखते हैं और बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

4. मासिक धर्म को नियमित करने में मदद करता है :–

महिलाओं को गर्भधारण योजना के लिए मासिक धर्म चक्र को नियमित करना  बहुत जरूरी है। हलीम बीज फाइटोकेमिकल्स में समृद्ध है, जो एस्ट्रोजन हार्मोन की उत्पादन करता हैं, मासिक धर्म नियमित रूप से करते हैं।

इम्यूनिटी बूस्ट करें

फ्लेवो करोनोइड्स (एंटीऑक्सिडेंट्स), फोलिक एसिड और विटामिन-ए, सी और ई सेपेरिटन हलीम के बीज, शरीर की प्रतिरक्षा में सुधार के लिए एक बेहतरीन भोजन है जो आपको विभिन्न संक्रमणों और दवाओं से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। इसके रोगाणुरोधी  बुखार, आंख और गले में खराश जैसे विभिन्न संक्रमणों को रोकने में मदद करते हैं।

ऐसे और भी कई फायदे हैं जो इस छोटे बीज को अपने आहार में शामिल करने से निश्चित रूप मिलते हैं ये । इस प्रकार  से आपके शरीर के पोषण को बढ़ाने वाला है।

इसका सेवन करने के लिए एक गिलास पानी में 1चमच हलीम के बीज को रात भर के लिए छोड़ दें। सुबह खाली पेट का सेवन करें।

इसके अलावा हलीम के मसाले को रोटी और सब्जी में मिलाकर भी शामिल किया जा सकता है।

काला जीरा,मेथी, अजवायन, हालों के बीज इन चारों को मिलाकर दवाई बनाई जाती है जो बहुत उपयोगी है।


“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...