शनिवार, 13 जुलाई 2024

 कितना आधुनिक थे रामायण के समय धरती और मनुष्य ? 


1. उस समय नदी में नाव और जलपोत चलते थे।

 2. कई लोगों के पास मायावी विमान तक होते थे जिनपर एक साथ 4 लोग बैठते थे!

3. रावण के पास पुष्पक विमान के साथ और कई विमान और आधुनिक नाव व समुंद्री जलपोत थे।

4. उस समय लोकप्रिय खेल शतरंज था जिसकी रचना रावण की पत्नी मंदोदरी ने की थी उस समय इसे चतुरंग कहते थे!

5. पुराणों के अनुसार श्रीराम और रावण का युद्ध धनुष, बाण,गदा, तलवार और आदि से भी ज्यादा शस्त्रो से लड़ा गया था!

6. जिस तरह आज के समय कई तरह की Missile, Rocket, Bomb, Tank और कई हथियार होते है उसी तरह के एक हथियार से सदासुर राक्षस ने श्रीराम की सेना पर प्रहार किया जिसने सुवेल नामक पर्वत के साथ दक्षिण भारत के गिरी को समंदर में गिरा दिया था।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

ऑफिस के बिजी शेड्यूल और थकान के उपरांत एक महिला मेट्रो में चढ़ी और अपनी सीट पे बैठकर आंखें बंद करके थोड़ा मानसिक आराम कर तनाव दूर कर रही थी..

जैसे ही ट्रेन स्टेशन से आगे बढ़ी, वर्मा जी जो कि महिला के बगल वाली सीट पर बैठे थे...

अपना मोबाइल निकाला और जोर जोर से बातें करने लगे.. वर्मा जी का संवाद इस प्रकार था :-

जानेमन, मैं अनिल बोल रहा हूं और मेट्रो पकड़ ली है.. हां, मुझे पता है कि अभी सात बजे है पांच नहीं.. मैं मीटिंग में व्यस्त था इसलिए देर हो गई..

नहीं जानेमन, मैं एकाउन्टेंट प्रीति के साथ नहीं बल्कि बॉस के

साथ मीटिंग में था..

नहीं जान, केवल तुम अकेली ही मेरे जीवन मे हो.. हाँ, पक्का कसम से..!!

पन्द्रह मिनट बाद भी जब वर्मा जी जोर जोर से वार्तालाप जारी किए हुए थे..

तब वो महिला जो कि परेशान हो चुकी थी.. फोन के पास जाकर जोर से बोली :-

अनिल डार्लिंग फ़ोन बंद करो ना.. बहुत हो चुका.. अब तुम्हारी प्रीती और इंतजार नहीं कर सकती..!!

अब वर्मा जी हॉस्पीटल से वापिस आ चुके है और..उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया है..!!

आप भी ध्यान रखें वरना कोई प्रीति आपकी जिंदगी खराब कर सकती हैं।

 श्रवण कुमार के पिता रत्नऋषि नंदीग्राम के राजा अश्वपति के राजपुरोहित थे और कैकेयी राजा अश्वपति की बेटी थी। रत्नऋषि ने कैकेयी को सभी शास्त्र वेद पुराण की शिक्षा दी।

एक दिन बातों ही बातों में अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ की चर्चा चल पड़ी। रत्नऋषि ने कैकेयी को बतलाया कि दशरथ की कोई संतान राज गद्दी पर नहीं बैठ पायेगी और साथ ही ज्योतिष गणना के आधार पर यह भी बतलाया कि दशरथ की मृत्यु के पश्चात यदि चौदह वर्ष के दौरान कोई संतान गद्दी पर बैठ भी गया तो रघुवंश का नाश हो जाएगा।

यह बात कैकेयी ने पूरी तरह हृदयगंम कर लिया और विवाह के बाद भी कैकेयी के जेहन मे यह बात पूरी तरह समायी हुई थी।

जब राम के राज तिलक करने का अवसर आया तो बुद्धिमती कैकेयी को राजपुरोहित के कथन का स्मरण हो आया और उसने यह निश्चय कर लिया कि वह अपने प्रिय पुत्र राम को रघुवंश के विनाश का कारण नहीं बनने देगी और वही हुआ।

राम के वन गमन के पश्चात् भी कैकेयी भरत के लिए भी यही चाहती थी कि वह राजसिंहासन पर बैठ कर राज्य का संचालन न करे और यही हुआ। भरत ने राज कार्य तो संभाला लेकिन राजसिंहासन धारण न कर सिंहासन पर राम की चरण पादुका स्थापित कर राज्य का शासन कुशासन पर बैठ कर संचालित किया।

गुरुवार, 11 जुलाई 2024

 एक बार भूतभावन भगवान् शंकर ने अपनी प्राणवल्लभा पार्वती जी से अपने ही साथ भोजन करने का अनुरोध किया। भगवती पार्वती जी ने यह कहकर टाला कि वे विष्णुसहस्रनाम का पाठ कर रही हैं। थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करके शिवजी ने जब पुनः पार्वती जी को बुलाया तब भी पार्वती जी ने यही उत्तर दिया कि वे विष्णुसहस्रनाम के पाठ के विश्राम के पश्चात् ही आ सकेंगी। शिव जी को शीघ्रता थी। भोजन ठण्डा हो रहा था। अतः भगवान् भूतभावन ने कहा- पार्वति! राम राम कहो। एक बार राम कहने से विष्णुसहस्रनाम का सम्पूर्ण फल मिल जाता है। क्योंकि श्रीराम नाम ही विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। इस प्रकार शिवजी के मुख से ‘राम’ इस दो अक्षर के नाम का विष्णुसहस्रनाम के समान सुनकर ‘राम’ इस द्व्यक्षर नाम का जप करके पार्वती जी ने प्रसन्न होकर शिवजी के साथ भोजन किया।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।

 सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥

हे पार्वति! मैं भी इन्हीं मनोरम राम में रमता रहता हूँ। यह राम नाम विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। 

इस मंत्र को श्री राम तारक मंत्र भी कहा जाता है। और इसका जाप, सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है। यह मंत्र श्री राम रक्षा स्तोत्रम् के नाम से भी जाना जाता है।

 हरे कृष्ण हरे कृष्ण

कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम

राम राम हरे हरे॥

 श्रील प्रभुपाद जी महाराज ने इस 'हरे कृष्ण महामंत्र' को पूरे विश्व में प्रसिद्ध कर दिया। यह अति पवित्र मंत्र है । 

दुनियाभर में भगवान कृष्ण के असंख्य भक्त हैं. इन सभी के लिए एक इंटरनेशनल संगठन का निर्माण किया गया.जिसका इस्कॉन नाम दिया गया, इस्कॉन का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस है. 

1. इस्कॉन मंदिर के अनुयाई तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का सेवन नहीं करते.

2. इन लोगों को अनैतिक आचरण वाली चीजों से दूर रहना होता है.

3. नियमित रूप से सभी को एक घंटा शास्त्रों का अध्ययन करना होता है. जिसमें गीता और भारतीय धर्म से जुड़े शास्त्रों के बारे में पढ़ते हैं.

4. सबसे मुख्य नियम हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे महामंत्र की 16 बार माला करनी होती है.



बुधवार, 10 जुलाई 2024

प्रथम अध्याय में दोनों सेनाओं का वर्णन किया जाता है। शंख बजाने के पश्चात अर्जुन सेना को देखने के लिए रथ को सेनाओं के मध्य ले जाने के लिए कृष्ण से कहता है। सहसा अर्जुन के चित्त पर एक दूसरे ही प्रकार के मनोभाव का आक्रमण हुआ, कार्पण्य का। एक विचित्र प्रकार की करुणा उसके मन में भर गई और उसका क्षात्र स्वभाव लुप्त हो गया। जिस कर्तव्य के लिए वह कटिबद्ध हुआ था उससे वह विमुख हो गया। ऊपर से देखने पर तो इस स्थिति के पक्ष में उसके तर्क धर्मयुक्त जान पड़ते हैं, किंतु उसने स्वयं ही उसे कार्पण्य दोष कहा है और यही माना है कि मन की इस कायरता के कारण उसका जन्मसिद्ध स्वभाव उपहत या नष्ट हो गया था। 

तब मोहयुक्त हो अर्जुन कायरता तथा शोक युक्त वचन कहता है। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि युद्ध करे अथवा वैराग्य ले ले। क्या करें, क्या न करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इस मनोभाव की चरम स्थिति में पहुँचकर उसने धनुषबाण एक ओर डाल दिया।

कृष्ण ने अर्जुन की वह स्थिति देखकर जान लिया कि अर्जुन का शरीर ठीक है किंतु युद्ध आरंभ होने से पहले ही उस अद्भुत क्षत्रिय का मनोबल टूट चुका है। बिना मन के यह शरीर खड़ा नहीं रह सकता। अतएव कृष्ण के सामने एक गुरु कर्तव्य आ गया। अत: तर्क से, बुद्धि से, ज्ञान से, कर्म की चर्चा से, विश्व के स्वभाव से, उसमें जीवन की स्थिति से, दोनों के नियामक अव्यय पुरुष के परिचय से और उस सर्वोपरि परम सत्तावान ब्रह्म के साक्षात दर्शन से अर्जुन के मन का उद्धार करना, यही उनका लक्ष्य हुआ। इसी तत्वचर्चा का विषय गीता है। पहले अध्याय में सामान्य रीति से भूमिका रूप में अर्जुन ने भगवान से अपनी स्थिति कह दी।

मंगलवार, 9 जुलाई 2024

 15. सदैव संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता ना इस लोक में है ना ही कहीं और।

16. जब इंसान अपने काम में आनंद खोज लेता हैं, तब वे पूर्णता प्राप्त कर लेता हैं। 

17. व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को वश में रखने के लिए बुद्धि और मन को नियंत्रित रखना होगा।

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...