मंगलवार, 11 जुलाई 2023

हम साथ साथ हैं 1

 प्रत्येक जीव के जीवन में यौवन के उभार के समय एक ऐसा अवसर आता है, जब वह धीरे-धीरे इस बात का अनुभव करने लगता है कि उसके पास कुछ वस्तुओं, गुणों, स्वाभाविक विशेषताओं की कमी है। पुरुष में यौवन उभार आने पर जहाँ उसका पुरुषत्व विकसित होता है, वहाँ उसके अन्तर्मन में कामावेग भी उत्पन्न होता है। वह किसी पर अधिकार करने के लिये प्रेमोपासना करने लगता है, पुरुष स्त्री की ओर सहज भाव से रस लेने लगता है उसमें उसे कुछ अजीब आकर्षण प्रतीत होने लगता है उसके हाव-भाव उसे आकर्षक लगते हैं। इसी प्रकार नारी जीवन में भी प्रणय की गुप्त इच्छाएँ धीरे-धीरे विकसित होने लगती हैं। अपनी कोमलता,  लज्जा इत्यादि के कारण वह मनोभावों के आत्म समर्पण के लिये उन्मुख होती है। वह अपने भेद गुप्त रखने में कुशल होती है किन्तु उसका सहज ज्ञान क्रमश प्रकट होने लगता है। नर-नारी की ये स्वभावगत विशेषताएँ हैं, जो समाज का निर्माण करती हैं  

पृथक् स्त्री-पुरुष अधूरे और अपूर्ण हैं। यदि स्त्री-पुरुष पृथक रहेंगे, तो वे समाज के लिये अनुपयोगी, अपरिक्व, अविकसित रहेंगे स्त्री और पुरुष दोनों के मिलने से नर-नारी की स्वाभाविक अपूर्णता दूर होती है। एक-दूसरे की कमी जीवन सहचर प्राप्त करने से हो पाती है जैसे धनात्मक और ऋणात्मक तत्वों के मिलने से विश्व बनता है, वैसे ही स्त्री तथा पुरुष के मिलने से 'मनुष्य' बनता है यहीं पूरा मनुष्य समाज के उत्तरदायित्वों को पूर्ण करता है।


विवाह की उपयोगिता

आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार काम इच्छाओं का दमन मानसिक बीमारियाँ उत्पन्न करता है इसी से अनेक बार मानसिक नपुंसकता उत्पन्न होती है। मनुष्य के अन्तस्थल में अनेक वासनाएँ दब कर अन्त प्रदेश में छिप जाती हैं। इनसे समय-समय पर अनेक बेढंगे व्यवहार गाली देने की प्रवृत्ति, कुशब्दों का उच्चारण, आत्महीनता की भावना ग्रन्थि की उत्पत्ति, स्मरण-विस्मरण, पागलपन तथा प्रलाप, हिस्टीरिया इत्यादि अनेक मानसिक व्याधियों उत्पन्न होती हैं। मानसिक व्यापारों में एक विचित्र प्रकार का संघर्ष चला करता है। मन की अनेक भावनाएं विकसित नहीं हो पाती, मनुष्य शिकायत करने की मनोवृत्ति का शिकार बना रहता है दूसरे के प्रति वह अनुदार रहता है, उसकी कटु आलोचना किया करता है। अधिक उम्र या असन्तोषी, नाराज प्रकृति, तेज स्वभाव का कारण वासनाओं का समुचित विकास एवं परिष्कार न होना ही है। इस प्रकार का जीवन गीता में निद्य माना गया है।


प्रत्येक स्त्री-पुरुष के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब उसे अपने जीवन साथी की तलाश करनी होती है। आयु, विचार, भावना स्थिति के अनुसार सद्ग्रहस्थ के लिये उचित जीवन साथी की तलाश होनी चाहिये उचित शिक्षा एवं आध्यात्मिक विकास के पश्चात् किया हुआ विवाह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ठीक है। आजन्म कौमार्य या ब्रह्मचर्य महान है। उनका फल अमित है किन्तु साधारण स्त्री-पुरुषों के लिये यह सम्भव नहीं है। इससे मन की अनेक कोमल भावनाओं का उचित विकास एवं परिष्कार नहीं हो पाता। वासना को उच्च स्तर एवं उन्नत भूमिका में ले जाने के लिये एक-एक सीढ़ी चढ़ कर चलना होता है। एक सीढ़ी को लाँघ कर दूसरी पर कूद जाना कुछ इच्छाओं का दमन अवश्य करेगा, जिसके फलस्वरूप मानसिक व्याधि हो सकती है अत प्रत्येक सीढ़ी पर पाँव रख कर उन्नत जीवन पर पहुंचना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिये।


एक पिता तथा माता के हृदय में जो नाना प्रकार के स्वर झंकृत होते है, उन्हे भुक्त भोगी ही जान सकते है। दो हृदयों के पारस्परिक मिलन से जो मानसिक विकास सम्भव है, वह पुस्तको के शुष्क अध्ययन से नहीं प्राप्त किया जा सकता। विवाह कामवासना की तृप्ति का साधन मात्र है, ऐसा समझना भयंकर भूल है। वह तो दो आत्माओं के दो मस्तको के दो हृदयो के और साथ ही साथ दो शरीरों के विकास तथा एक दूसरे में लय होने का मार्ग है। विवाह का मर्म दो आत्माओं का स्वरैक्य है, हृदयों का अनुष्ठान है, प्रेम, सहानुभूति कोमलता, पवित्र भावनाओं का विकास है। यदि हम चाहते हैं कि पुरुष प्रकृति तथा स्त्री-प्रकृति का पूरा-पूरा विकास हो, हमारा व्यक्तित्व पूर्ण रूप से खिल सके तो हमें अनुकूल विचार, बुद्धि, शिक्षा एवं धर्म वाली सहधर्मिणी चुननी चाहिये। उचित वय में विवाहित व्यक्ति आगे चलकर प्रायः सुशील, आज्ञाकारी प्रसन्नचित सरल, मिलनसार, साफ-सुथरे, शान्तचित्त वचन के पक्के, सहानुभूतिपूर्ण मधुर भाषी, आत्म विश्वासी और दीर्घजीवी पाये जाते हैं। कुँवारा प्रायः अतृप्त वासना, स्वप्नदोष लड़कपन, संकोची और संकुचित दृष्टिकोण वाला रहता है. वह जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता, सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी नहीं रखता, दूसरों के दुर्गुणों तथा न्यूनताओं में आनन्द लेता है। संघर्ष से दूर भागता है, वह विरोधी, वाचाल तथा ईर्ष्या से युक्त होता है, क्रोध, घृणा, भय, वासना और लज्जा से उसकी शान्ति सदैव भंग रहती है। आजन्म कौमार्य देश, धर्म और समाज के लिये हितकर नहीं है।


गृहस्थ धर्म एक योग-साधना


गृहस्थ धर्म एक योग-साधन है, कि मनुष्य पर पग-पग पर उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यों का भार है। यह आश्रम हमें आगे आने वाले कष्टसाध्य जीवन की एक तैयारी कराता है। यदि इसमें रह कर हम इन्द्रिय सुखों की निरसारता, क्षणभंगुरता एवं नीरसता को न जानें और सीधे वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम ग्रहण कर ले, तो हमारी बड़ी साधना में वासनाओं और क्षुद्र इच्छाओं का ताण्डव चलता ही रहेगा।


गृहस्थाश्रम अन्य तीनों आश्रमों की पुष्टि के लिए है। दूसरे शब्दो में यों कहा जाता है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संन्यास यह तीनों ही आश्रम गृहस्थाश्रम को व्यवस्थित और सुख-शान्तिमय बनाने के लिए हैं। ब्रह्मचारी इसलिए ब्रह्मचर्य का पालन करता है कि उसका भावी गृहस्थ जीवन शक्तिपूर्ण और समृद्ध हो वानप्रस्थ और संन्यासी लोग लोकहित की साधना करते हैं। इहलोक और संसार का सुख प्रकट करने वाला गृहस्थ धर्म ही है। यदि गृहस्थाश्रम की व्यवस्था बिगड़ जाय तो अन्य तीनों आश्रम ठीक रीति से नहीं चल सकेगे।


गृहस्थाश्रम से 'अहं' का विस्तार होता है। आत्म-भाव की सीमा बढ़कर उसमे परिवार के अन्य सदस्य भी आते है। छोटे-छोटे शिशुओं की सेवा सुश्रूषा में निःस्वार्थ भाव से संलग्न होना पड़ता है।स्त्री, पुत्र, सगे-सम्बन्धी परिवार, पड़ोसी, घर के पशु-पक्षी आदि में आत्मीयता बढ़ जाती है। क्रमश उन्नति की और हम चलते हैं। अन्त में मनुष्य पूर्ण अथवा आत्म-संयमी हो जाता है। दूसरों के लिए अपने को भूल जाता है। खुदी मिटती जाती है और खुदा मिलता जाता है। गृहस्थ-योग को साधना जब अपनी विकसित अवस्था पर पहुँचती है तो आत्मा-परमात्मा में लीन हो जाती है।

गृहस्थ हमें तुच्छता और संकीर्णता से महानता और उदारता की ओर ले जाता है, स्वार्थ का परिशोधन कर परमार्थी बना देता है। यदि हम गृहस्थ धर्म के सब उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते रहें, स्वार्थ हटाकर परमार्थ की साधना करते रहें, तो ब्रह्म-निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं।आत्मीयता की उन्नति का अभ्यास करने के लिए सबसे उत्तम स्थान अपना घर है। आत्मीयता के साधन में अपना दृष्टिकोण देने और सेवा करने का बनाना पड़ता है। प्रेम की उदार भावनाओं से अपने अन्त करण को परिपूर्ण कर सगे-सम्बन्धियों के लिए त्याग करना पड़ता है। इस आत्मीयता के प्रसार से घर स्वर्ग बन जाता है।


गृहस्थ का सोपान पार करने के पश्चात् जीवन यात्रा का एक नया चरण प्रारम्भ होता है। मनुष्य को प्रतीत होने लगता है कि सांसारिक सुखो के आगे भी कोई चीज है। काम, क्रोध, लोभ, मोह से भरे हुए जीवन से उसे परितोष नहीं हो पाता। वह धीरे-धीरे आत्मा के सुखमय प्रदेश में प्रवेश करता है। आत्मा का प्रदेश वह मंगलमय संसार है जहाँ इन्द्रियों की लोलुपता आकर्षण और प्रलोभन नहीं है।


गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता महान है


भारतवर्ष मे विवाह-बन्धन अत्यन्त पवित्र धार्मिक कृत्य माना गया है। इसमें अनेक उद्देश्यो की प्रतीति और महान् उत्तरदायित्वों की पूर्ति के साधन समाविष्ट है। भारत के प्राचीन मुनियों ने इसमें मानव प्रकृति की उद्दाम प्रवृत्तियों को संयमित करने, प्रकृति द्वारा आयोजित प्रजनन तथा सृष्टि विस्तार, सामाजिक सुव्यवस्था सुदृढ नागरिक निर्माण और अन्त में निवृत्ति की चरम सीमा पर पहुँचने की व्यवस्था की है।


धर्म-शास्त्र का प्रवचन है- "तथातथैव कार्याणि न कालस्तु विधीयते।


अभिनव प्रयुज्जानो इस्मिन्नेव प्रलीयते ॥"


इस संसार के साथ हमारा संयोग है, इसी संसार में हमारा लय हो जायगा, तब हमे जिस समय जो कर्तव्य हो, वही करना अनिवार्य है। व्यक्तिगत सुविधा तथा असुविधा को लेकर कर्तव्य के पुण्य पथ से परिभ्रष्ट होना उचित नहीं इसीलिए धर्म ने गृहस्थाश्रम को तपोभूमि कह कर उसकी महत्ता स्वीकार की है। यहाँ तक कि धर्म की दृष्टि में गृहस्थाश्रम ही चारों आश्रमो का मुख्य केन्द्र है। इस सम्बन्ध मे योगिवर वशिष्ठ का निर्देश देखिए-


"गृहस्थ एवं यजते गृहस्थस्तप्यते तपः। चतुर्णामाश्रमाणान्तु गृहस्थस्तु विशिष्यते ॥"

अर्थात् गृहस्थ ही वास्तविक रूप से यज्ञ करते है। गृहस्थ हो वास्तविक तपस्वी है— इसलिए चारी आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सबका सिरमौर है।


भारतीय धर्म के अनुसार गृहस्थाश्रम प्रकृत तपोभूमि है। इस काल में दो पवित्र आत्माओं का परस्पर सामंजस्य होता है तथा वे जीवन के युद्ध में प्रविष्ट होते है। उन्हें पग-पग पर उत्तरदायित्व कठिनाइयों सांसारिक संघर्ष, प्रतियोगिताओं में भाग लेना होता है। दोनों आत्माएँ। परस्पर सम्मिलित होकर एक दूसरे की सहायता करते


हुए तपस्या और साधना के मार्ग पर अग्रसर होती है। प्रकृति के प्रजनन क्रिया की सिद्धि के निमित्त जिस उद्दाम वासना को मानव हृदय में प्रतिष्ठित किया है, उसको उच्छृंखलता यौवन में आकर इतनी तीव्र हो उठती है कि सामाजिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उसका सम आवश्यक है। भारतीय धर्म ने उस उद्दाम प्रवृत्ति को स्वीकार किया है तथा विश्व को संस्थिति और सम्पूर्णता के लिए मनुष्य के विकास के लिए उसे जरूरी माना है। अतएव प्रत्येक नागरिक को इस महायज्ञ में प्रवृत्त होने का आदेश प्रदान किया है।


गृहस्थाश्रम विषय भोग को सामग्री नहीं है, विलास मन्दिर नहीं वरन् दो आत्माओं के पारस्परिक सहवास द्वारा शुद्ध आत्म-सुख, प्रेम और पुण्य का पवित्र प्रसाद है. वात्सल्य और त्याग की लीलाभूमि है, निर्वाण प्राप्ति के लिए शान्ति-कुटीर है। विवाह से मनुष्य समाज का एक अंग बनता है अपूर्णता से पूर्णता प्राप्त करता है, निर्बलता से सबलता की ओर अग्रसर होता है उसे नये सम्बन्ध प्राप्त होते हैं नये उत्तरदायित्व और नये आनन्द प्राप्त होते है। भारतीय ऋषियों ने गृहस्थाश्रम को अनेक व्रत नियम अनुष्ठान आतिथ्य सत्कार इत्यादि पुण्य कर्तव्यो की लीलाभूमि बनाकर उसकी महिमा को द्विगुणित किया है। उन्होंने पारिवारिक व्यवस्था में प्रेम और वात्सल्य तथा दूसरी ओर अपने से छोटों के लिए उन्हीं के हित में त्याग तथा तपस्या के द्वारा इसे तपोभूमि के समान पवित्र बना दिया है।


स्वामी अभेदानन्द लिखते है— इस तपोभूमि के पुण्य स्वरूप और पुण्य साधना का मधुर रहस्य जानने के लिए हम हिमालय की उस तुषार मण्डित शिला पर चले जहाँ हिमालय की किशोरी पार्वती तपश्चर्या में निमग्न है। यहाँ भारतीय गृहस्थाश्रम के मंगलमय स्वरूप का प्रथम दर्शन है। गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने से पूर्व रमणी को तपोमयी साधना में प्रवृत्त होना पड़ता, क्योंकि जिस मंगलमय उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अपने पवित्र सुन्दर जीवन को उत्सर्ग करती है, उसके लिए तपस्या और त्याग की परम आवश्यकता है। कुमार की उत्पत्ति तपस्या की सिद्धि का मधुर फल है, क्योंकि विश्व के परित्राण के लिये देश के मंगल के लिये समाज के "अभ्युदय के लिये और मनुष्यता की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिये ही कुमार के अवतार की आवश्यकता है। पुत्र या कन्या का जन्म भी धार्मिक महत्व रखता है। उसमें रमणी की उत्कृष्ट सिद्धि भी सम्मिलित है।"


भारतीय वैवाहिक जीवन मंगलमय है। उसका प्रत्येक व्रत, नियम, अनुष्ठान, पूजन-चिन्तन इत्यादि विशेष महत्त्व रखता है। सतीत्व तथा एकपलीवत की पवित्रता से समुज्ज्वल मातृत्व के मृदुल वात्सल्य से विभूषित, उत्तरदायित्वों के मनोरम भार से परिपूर्ण प्रेम के प्रवाह से पूर्ण भारतीय विवाहित जीवन त्याग का तेजोमय तीर्थ और पुण्य एवं कर्म की भूमि है। इसी के द्वारा लियों में स्त्रीत्व तथा पुरुषो मे पुरुषत्व का विकास होता है। नर-नारी के मंगलमय थिर सम्मिलिन के समय भारतीय समाज उन दोनों को प्रणय सूत्र में आवद्ध करने के साथ ही साथ इस जन्म तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में भी परस्पर सहायता सहानुभूति एवं स्नेहमय व्यापार के प्रतिज्ञासूत्र में आवद्ध करता है।


हमारा हिन्दू धर्म जिस मंगलमयी साधना को लेकर सदा व्यस्त रहता है, वह है "प्रवृत्ति को निवृत्ति के पथ पर परचालित करना" हमारे यहाँ वासना को प्रवृत्ति को माना है, किन्तु साथ ही साथ इस प्रवृत्ति के परिष्कार, उन्नतिकरण और अन्तत निवृत्ति में परिणत करना यह फल माना है। वैवाहिक जीवन हमारे जीवन की एक स्टेज है. जो भावी जीवन के निर्माण में सहायक है। हम सदा से यह मानते आये हैं कि असंस्कृत और उच्छृंखल प्रवृत्ति, साधना और तपस्या के द्वारा परम शान्त और त्यागमयी बनाई जा सकती है। विनाश की अपेक्षा वृत्तियो का सही मार्गों में बहाव, स्वार्थ और लालसा से निकल कर प्रेम और त्याग के मार्गों में उनका प्रवाह हमारे लिये विशेष महत्व रखता है।


आदि कवि से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक ने अपने साहित्य में गृहस्थाश्रम का मनमोहक रूप प्रतिष्ठित किया है। कौन ऐसा प्रान्त है जिसमें मातृत्व को मंगलमय मूर्ति सतीत्व का त्याग सौन्दर्य और वात्सल्य की मन्दाकिनी प्रवाहित न हुई हो ?


गृहस्थ में प्रविष्ट न होने वाला व्यक्ति अनेक प्रकार से मानसिक रोगों का शिकार बनता है। आयु कम रहती है. मानसिक भावनाएँ विकसित नहीं हो पाती, संसार के महत्वपूर्ण कार्यों में जी नहीं लगता, मन पुनः पुनः सुन्दर स्त्रियों के मानचित्र बनाता और स्वप्नदोष उत्पन्न करता है अविवाहित पुरुष की उत्पादन शक्ति क्षीण होती है। विवाह से उसे नया चाव, उत्साह, स्फूर्ति और प्रेरणा प्राप्त होती है। इसी प्रकार अविवाहित स्त्री कुदन, अनिद्रा, प्रमाद, चिन्ता, हिस्टीरिया प्रजनन को गुप्त भावना, अतृप्ति, स्वार्थी और क्रोधी हो जाती है। विवाहित स्त्री का सौन्दर्य बढ़ता है। शरीर के सब अंगो का नवीन ढंग से विकास होता है। मृदुल भावनाओं- दया, प्रेम, सहानुभूति, वात्सल्य, करुणा की अभिवृद्धि होती है।


विवाह से पूर्णता की प्राप्ति

 पृथक् पृथक् स्त्री और पुरुष अपूर्ण है। उनके गुण तथा स्वभाव भी अपने अन्दर एक प्रकार की कमी, हीनता और किसी अदृश्य वस्तु की कामना करते है। जो गुण एक में नहीं है, दूसरों में उनकी मौजूदगी आकर्षण का विषय बनती है। स्त्री-पुरुष दोनों के स्वभावों का विश्लेषण करना हो, तो निम्न प्रकार से हो सकता है


स्त्रियों में लज्जाशीलता, चारुता, सहजज्ञान, पातिव्रत्य कोमलता, सूक्ष्मता भावुकता होती है। वे मानसिक संवेगी को तीव्रता से अनुभव करती हैं। वे स्नेह सरोवर की मीन है। उन्हें रूप लावण्य की अनुपम राशि प्रदान की गई है। शान्तिप्रियता, सहनशीलता और धैर्य भी बहुत होता है। ये बातें बहुत कम करती है, पर सुनती बहुत अधिक हैं।


पुरुष पाशविक वृत्तियों, शक्ति क्रोध, कार्य- दक्षता तथा अहंवादी है। क्रियाशीलता और प्रभुता प्रदर्शन उसके प्रमुख गुण है। पुरुष का मस्तिष्क पाशविक वृत्तियों के क्षेत्र में अत्यधिक बलवान है। प्रेम, क्रोध और प्रतिशोध के समय कुछ काल के निमित्त उद्भ्रान्त-सा हो जाता है। प्रेम में शीघ्रता करता है। वह स्वभावतः मजबूत, निर्णायक, प्रामाणिक, स्वाभिमानी, प्रचण्ड, उप, दांता, उदार, कठिन परिश्रमी, बेलगाम, निग्रहहीन और युद्ध करने वाला है। उसका मन अस्थिर, चंचल-बेकाबू और एक विस्फोटक समान है।


दोनों में स्वतन्त्र यौन प्रभेद मिलते है। नर प्रेम करने में उन्मत्त, शीघ्र आवेगपूर्ण काम-स्थिति में प्रचण्ड है। वह प्रेम से पूर्व स्त्री को हर प्रकार से अनुगत करने में सवेष्ट रहते हैं। तत्पश्चात् प्रेमाराधना में लापरवाह से हो जाते हैं। पुरुष के प्रेम में प्रचण्डता है, किन्तु वह शीघ्र ही ठण्डा हो जाने वाला ज्वालामुखी है। पुरुष के लिए प्रेम एक प्रकार का खेल है। इसके विपरीत स्त्री का सम्पूर्ण जीवन ही प्रेम से निर्मित हुआ है। वह प्रेम से ही जीती है और उसी से अपना भविष्य बनाती है। उसके आन्तरिक भावो का विकास प्रेम से ही होता है। किसी कवि ने सत्य ही कहा है- प्रेम स्त्री का सम्पूर्ण अस्तित्व है  

स्त्री का प्रेम शान्त पर सतत् प्रवाहित होने वाली सरिता की तरह गम्भीर है। वह इन्द्रियों से प्रारम्भ होकर आत्मिक ज्ञान की ओर अभिवृद्धि को प्राप्त होने वाला है। स्त्री एक बार प्रेम-दान देकर पुरुष को अपना सर्वस्व दान देती है। उसमें भक्तिभाव, पातिव्रत्य और आत्मिकशन अपेक्षाकृत अधिक है। स्टीफन विंग ने सत्य ही निर्देश किया है— पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में मन क्षेत्र अधिक स्थूल और प्रसारित है, परन्तु उनमें वह उतने प्रधान भाव से व्यक्त नहीं होता। पुरुषों में कामवासना की स्वाभाविक प्रवृत्ति, शक्ति का एक अशान्त स्रोत है। वह उछल-उछल कर सब प्रकार की नालियों में बह जाता है।"


स्त्री प्रेम से शासन करना चाहती है। उसका प्रेम विकेन्द्रित होता है, जिसमे उसके बच्चे, पति, भाई-बहिन इत्यादि सम्मिलित है। मातृत्व का भार उठाने पर उसका वात्सल्य विकसित होता है, करुणा, सहानुभूति, दया, प्रेम, की नाना धाराओं में बहने लगता है। वह अपने बच्चे पर तो प्रेम न्यौछावर करती ही है, सभी बच्चों, पशु-पक्षियों तक को भावुक दृष्टि से निहारती है। स्त्री की भावनाएँ तीव्र होती है। संवेग तथा भावना का उसके हृदय में राज्य है। सोच में डूबे रहना, प्रतीक्षा करना और सहजज्ञान ये स्त्री के सनातन गुण हैं। वे अपने सहजज्ञान से पुरुष की साधारण और मुख्य आवश्यकताओं को पहले से ही भांप लेती है और उसका प्रबन्ध करती हैं। दूसरों के मनोभावों को भाँपने तथा भविष्य में आने वाली विपत्तियों का अनुमान लगाने के लिए उन्हें विशेष गुप्त मनोवैज्ञानिक शक्तियाँ प्रदान की गई है।


 अधिकांश स्त्रियाँ एक तीखी और गहरी दृष्टि से जान लेती हैं कि यह व्यक्ति कैसा है ? धोखेबाज, बदमाश या सज्जन, नैतिक, बुद्धिमान मूर्ख स्त्रियाँ दुराचारियो के वश मे आ सकती है किन्तु बुद्धिमती स्त्री बड़ी चतुर होती है। वह उसके चेहरे से अन्दर के मनोभाव पढ़ सकती है। यदि आप अपना दुःख-दर्द स्त्रियों के सामने वर्णन करे तो दे सहानुभूति प्रदर्शित करेंगी। वे पुरुषों की अपेक्षा अधिक भावुक हैं, अधिक प्रकार से मानसिक भावो का प्रकाश और अनुभव करती है। धार्मिक विचार में वे पुराने संस्कारों से चिपकी रह जाने वाली है। स्त्री पुरुष की अपेक्षा अधिक व्यवहारकुशल है, अपने व्यवहार में अधिक उदार होती है। पुरुष के प्रेम पर सदा विचार किया करती हैं और उसके प्रशंसायुक्त प्रेम भरे वाक्य सुनने के लिये सदैव लालायित रहा करती है। संक्षेप में पुरुष की अपेक्षा वह अधिक सहनशील, शान्त, प्रतिभासम्पन्न उदार एवं सहजज्ञान युक्त होती हैं।


विवाह में स्त्री-पुरुष के उल्टे गुण एक दूसरे से मिलकर पूर्णता की सृष्टि करते हैं। दोनों का संयोग समाज का एक 'यूनिट' बनाता है। यही यूनिट सम्मिलित रूप में समाज को आगे बढ़ाता है। न तो पुरुष स्त्री के बराबर है, न स्त्री पुरुषों के गुणों का अनुकरण कर अपने अन्दर उन्हें उत्पन्न कर सकती है। सृष्टिकर्ता की रचना ऐसी है कि दो विभिन्न गुण वाले प्राणी भाईचारे और पारस्परिक साझेदारी से एक दूसरे के स्वभाव और प्रकृति को समझकर सम्मिलित रूप से आगे बढ़ते हैं। स्त्री तथा पुरुष के गुण-दोष एवं प्रकृति एक स्थान पर मिलने से 'मनुष्य' बनता है। यदि ये दोनों लिंगों के प्राणी एक दूसरे से पृथक् रहेंगे या लैगिक प्रतियोगिताओं में उलझे रहेंगे, तो गृहस्थों में पारस्परिक कलह की वृद्धि रहेगी, समाज की समस्वरता नष्ट हो जायगी।


 गृहस्थी एक साझे की दुकान है। इस दुकान के प्रधान साझेदार दो है—स्त्री और पुरुष यह दुकान तभी फलती-फूलती है और लाभप्रद होती है, जब ये दोनों साझेदार एक-दूसरे के स्वाभाव, प्रकृति, गुण, दोष, आवश्यकता और विशेषता को समझते हो। एक दूसरे का सम्पर्क ज्ञात न होने से उनका साझा भली भाँति नहीं चल सकता। विज्ञान ने स्त्री और पुरुष की तुल्यता की घोषणा की है, न कि उनकी समानता की बात केवल इतनी ही है कि स्त्री और पुरुष दोनों के संयोग से मनुष्य बनता है, ठीक उसी प्रकार जैसे धनात्मक और ऋणात्मक अणुओं के मिलने से विश्व बना है।"


विवाह के पश्चात् पुरुष को स्त्री के सुख के लिये तथा स्त्री को पति के आनन्द के निमित्त कुछ बलिदान करना पड़ता है। दोनो ही एक दूसरे को सुखी देखना चाहते है। अपने जीवन-मित्र के लिये अधिक से अधिक त्याग करने को प्रस्तुत रहते हैं। अतः स्वार्थ और संकुचितता नष्ट हो कर उदारता और त्याग की भावनाएं जागृत होती है। जीवन का क्रम है "सुख की ओर अग्रसर होना।" इस त्याग का यह फल होता है कि दोनों ही सुखी रहते हैं। एक दूसरे के लिये सुख खोजने की प्रवृत्ति तथा उपकरण प्रस्तुत करने से अपने लिये सुख पाने का राज-पथ तैयार किया जाता है। इस प्रवृत्ति का जनक है कर्तव्यनिष्ठ गृहस्थ जीवन गृहस्थ जीवन एक ऐसी पाठशाला है जिसमे स्त्री-पुरुष के स्वभाव एक होकर एक दूसरे के कमी की पूर्ति करते हुये अधिक से अधिक सुख, समृद्धि और समाज हित के लिये अग्रसर होते हैं। विवाहित स्त्री-पुरुष त्याग और आत्म समर्पण की प्रतिमूर्ति है। पुरुष सिंह के समान बलशाली, क्रोधी और तीव्र मनोविकारो का लड़ाकू जीव है। लेकिन अपनी पत्नी के समक्ष वह दयालु हो उठता है। जिस नारी को वह एक पराये घर से लाता है, अपने गृह की सम्पूर्ण व्यवस्था गुप्त बातें उसे सौंप कर ठण्डी साँस लेता है। सब रुपया कमा कर उसी लक्ष्मी को अर्पण करता है। वह स्वयं अपने आप कुछ नहीं खाना चाहता। भूखा रह कर पत्नी के लिये अच्छी से अच्छी सामाग्री प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार पत्नी स्वयं दुःख उठा कर घर के कार्यों में लग कर पति को सुखी देखना चाहती है। वह अपना सुख, खान-पान, पहनावा इत्यादि पति के सुख पर उत्सर्ग कर देती है। यह पारस्परिक आत्म-समर्पण ही गृहस्थ जीवन का निर्माण करता है।



दाम्पत्य जीवन की सफलता


पुरुष का स्वभाव है कि जब तक अपनी प्रेमिका को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे पाने के लिये अत्यन्त इच्छुक रहता है, प्राणपण से चेष्टा करता है, प्रत्येक प्रकार से प्रेम प्रदर्शन करता है और स्त्री के अतिरिक्त अन्य कुछ भी चीज नहीं प्राप्त करना चाहता है किन्तु एक बार मनचाही पत्नी पाने के पश्चात् क्रमश उसके मन क्षेत्र में भारी परिवर्तन प्रारम्भ होता है। विवाह के तीन चार मास पश्चात् वह पत्नी की ओर से उदासीन सा होने लगता है। आधी उम्र आने पर अर्थात् ३५, ४० वर्ष का होने पर उसे स्त्री में विशेष आकर्षण नहीं रह जाता। वह उसे अपने विचारों का केन्द्र नहीं मानता प्रत्युत अन्य सांसारिक कार्यों में प्राणपण से जुट जाता है। स्त्री उसके हृदय के एक कोने में पड़ी रहती है। अधिक आयु होने पर वह स्त्री से चिढ़ने लगता है। कितने ही उनसे डरने लगते है। दूसरे उनसे सर्वथा उदासीन होने लगते हैं। कुछेक स्त्री को देख कर डर सकते हैं, उनकी फरमाइश पूरी नहीं करना चाहते।


स्त्री का प्रेम प्रारम्भ में बिल्कुल नहीं रहता किन्तु विवाह के पश्चात् या जान पहिचान होने के पश्चात् धीरे-धीरे विकसित होता है। तीन मील लम्बे बूटों की रफ्तार से वह नहीं बढ़ती, जरा-जरा सी आगे चलती है। जब वह एक बार प्रेमी प्राप्त कर लेती है तो स्वभावतः उसे छोड़ना नहीं चाहती। उसमे ममता अहं, करुणा, सहानुभूति की मात्रा अधिक है। विवाह के पश्चात् उसकी यह आकांक्षा रहती है कि पति के प्रति उसका प्रेम बढ़े वह उसके हाथ में रहे, उसी से प्रेम करे, अन्य किसी को अपने प्रेम में कोई हिस्सा न दे। स्त्री हर प्रकार आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक दृष्टि से उसकी स्वामिनी बनने को लालायित रहती है।


स्त्री का हृदय प्रेम, करुणा, ममता एवं सहानुभूति की रंगभूमि है, वह कोमलता एवं सहनशीलता की कल्पलता है, क्षमा एवं त्याग की तपोभूमि है, वह भिन्न-भिन्न भावनाओं का आश्चर्यजनक सम्मिश्रण है। वह चिर सुन्दर है, चिर कोमल है, वह अपने प्रिय के लिए अपने सर्वस्व का त्याग कर सकती है और अपने मान-अपमान एवं निन्दा-स्तुति की भी चिन्ता नहीं करती। वह बड़े से बड़े अपराधी को भी क्षमा कर सकती है।


दो प्रतिकूल तत्वों का सम्मिश्रण उक्त दोनों प्रतिकूल तत्वों से ही संसार का निर्माण हुआ है। इसी प्रतिकूलता में संसार का आनन्द अन्तर्निहित है। बिना पुरुष के नारी अभाव का अनुभव करती है, बिना स्त्री के पुरुष में लग कर पति को सुखी देखना चाहती है। वह अपना सुख, खान-पान, पहनावा इत्यादि पति के सुख पर उत्सर्ग कर देती है। यह पारस्परिक आत्म-समर्पण ही गृहस्थ जीवन का निर्माण करता है।


पुरुष का निर्माण एक युद्ध करने वाले, दृढ़ी, निडर, हृदयहीन सैनिक के समान किया गया है। उसमें जीवन निर्वाह के साधनों को एकत्रित करने का साहस है। दूसरी ओर, स्त्री में लावण्य एवं रूप की अनुपम राशि प्रदान की गई है। यदि पुरुष उद्दण्ड है, तो स्त्री कोमल, सहनशील। पुरुष शक्ति आक्रामक है, तो स्त्री-शक्ति आत्म रक्षक। पुरुष उन्नतिशील होता है, तो स्त्री धैर्यवान। पुरुष अधिकार, शक्ति व दण्ड से शासन करता है, स्त्री अपने प्रेम से आँसू से और मृदुलता से यदि पुरुष शब्दों में विनय करता है तो स्त्री दृष्टि की विनम्रता से ।

 "पुरुष वर्तमान में भविष्य को भूल जाता है, स्त्री भविष्य को संभालने व अधिक सुखकर बनाने में सदैव प्रयत्नशील रहना चाहती है। स्त्री के मातृभाव के लिए पूर्ण त्याग व निःस्वार्थ परिश्रम की आवश्यकता है। पुरुष अपने प्रेम को केन्द्रित कर सकता है, परन्तु स्त्री जब मातृत्व का भार ग्रहण कर लेती है तो उसकी प्रेम-धारा सर्वतोमुखी होकर प्रवाहित होती है।"


"पुरुष अग्रगामी है किन्तु स्त्री मार्ग प्रदर्शक । पुरुष शीघ्रता से प्यार करता है परन्तु स्त्री का प्रेम इतना प्रबल होता है कि वह अपने प्रेमी के दुर्गुण भी नहीं देखना चाहती पुरुष प्रेम के प्रमाण नहीं चाहता, स्त्री का आत्म समर्पण ही उसके लिये यथेष्ट प्रमाण है पर स्त्री पुरुष के प्रेम पर हमेशा सोचा- विचारा करती है।"


"पुरुष के जीवन में प्रेम एक छोटा-सा हिस्सा है, वह शीघ्रता से प्यार करता है, जैसे भागता सा हो। किन्तु स्त्री पग-पग पर रुकती है, सोचती है, तब अपना हृदय देती है। वह अपने प्रेमी के प्रेम का सबूत दिन में कई बार उसके मुख से वाणी से एवं नेत्रों से चाहती है। उसका संसार मोहब्बत से सराबोर है, अन्य बातें उसमें गौण महत्व रखती हैं। स्त्री जीवन प्रेम पर ही अवलम्बित है। प्रेम की प्यासी स्त्री को ठुकरा कर भारी शत्रुता खड़ी की जा सकती है। पुरुष आखिर निश्चयी, मजबूत एवं स्फूर्तिमान होता है, स्त्री अधिक सहनशील प्रेमी, उदार। पुरुष चीर-फाड़ करने वाला निर्दय सर्जन बन सकता है तो सेवा-शुश्रूषा के लिये कोमल हृदय स्त्री की आवश्यकता पड़ती है।"


सफल दाम्पत्य जीवन का रहस्य

हम साथ साथ हैं

 मित्रता की आवश्यकता एवं उसका निर्वाह

परिवार में अनेक ऐसी अड़चनें आती है जिनमे पड़ोसी तथा मित्रो की सहायता के बिना काम नहीं चलता । विवाह, जन्मोत्सव, प्रवास में जाने पर बीमारी में, मृत्यु के दुःखद प्रसंगों में आर्थिक कठिनाइयों के मौकों पर तथा जटिल अवसरों पर राय लेने के लिए मित्रो की  आवश्यकता है। मित्र तथा उत्तम पड़ोसी का चुनाव बड़ा कठिन है। अनेक व्यक्ति आपसे अपना काम निकालने के स्वार्थमय उद्देश्य से मित्रता करने को उतावले रहते हैं किन्तु अपना कार्य निकल जाने पर कोई सहायता नही करते। मित्र का चुनाव सावधानी से व्यक्ति का चरित्र, आदतें, संग, शिक्षा इत्यादि का निश्चय करके  होना चाहिए। आपका मित्र उदार, बुद्धिमान पुरुषार्थ और सत्यपरायण होना चाहिए। विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषधि है। हमे अपने मित्रों से यह आशा करनी चाहिए कि वे हमारे उत्तम संकल्पों को दृढ करेंगे तथा दोषो एवं त्रुटियों से बचायेंगे, हमारी सत्य पवित्रता और मर्यादा को पुष्ट करेंगे। यदि हम कुमार्ग पर पाँव रखेंगे, तब हमे सचेत करेंगे सच्चा मित्र एक पथ-प्रदर्शक, विश्वासपात्र और सच्ची सहानुभूति से पूर्ण होना चाहिए।

 "उच्च और महत्वपूर्ण कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिखाना कि तुम अपनी निज की सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ। यह कर्तव्य उसी से पूर्ण होगा, जो दृढ चित्त और और सत्य संकल्प का हो। हमें ऐसे ही मित्रों का पल्ला पकड़ना चाहिए, जिनमें आत्मबल हो जैसे सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था।"

मित्र हों तो प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के हो, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हो, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सके और यह विश्वास कर सके कि किसी प्रकार का धोखा न होगा। मित्रता एक नई शक्ति की योजना है।  "आचरण, दृष्टान्त ही मनुष्य जाति की पाठशाला है, जो कुछ उससे सीख सकता है वह और किसी से नही।'

यदि आप किसी के मित्र बनते हैं तो स्मरण रखिये आपके ऊपर यही जिम्मेदारी आ रही है आपको चाहिए कि अपने मित्र की विवेक-बुद्धि अन्तरात्मा को जाग्रत करे, कर्तव्य बुद्धि को उत्तेजना प्रदान करें और उसके लड़खड़ाते पाँवों में दृढ़ता उत्पन्न कर दे। जीवन के आवश्यक कार्य हमारे कर्म चार प्रकार के होते है।

(१) पशु तुल्य (२) राक्षस तुल्य, (३) सत्पुरुष तुल्य, (४) देव तुल्या प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार में कार्य करते समय इन पर दृष्टि डालनी चाहिए। वे सब कार्य जिनमे बुद्धि का उपयोग न किया जाय, क्षणिक आवेग या प्रकृति के संकेत पर बिना जाने-बुझे कर डाले जायें पशु तुल्य कार्य हैं। जैसे भोजन, कामेच्छा की पूर्ति, गुस्से में मार बैठना, प्रसन्नता में वृथा फूल उठना जीभ तथा वासनाजन्य सुख इसी श्रेणी में आते है।

स्वार्थ की पूर्ति के लिए जो कार्य किये जायें, वे राक्षस जैसे कार्य होते है। राक्षस वृत्ति वाले पुरुष साम दाम, दण्ड, भेद से अपना ही अपना भला चाहते हैं। दूसरो को मार कर स्वयं आनन्द में मस्त रहते हैं। उन्हें किसी के दुःख तकलीफ, मरने-जीने से कोई सरोकार नहीं है। ऐसे अविवेकशील माँस भक्षण, रति-प्रेम, व्यभिचार, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, जैसे गुप्त पाप किया करत है। 'खाओ-पीओ मौज उड़ाओ' यही उनका आदर्श है। दुर्भाग्य व्यभिचार, मांस भक्षण, मद्यपान, भोग उनके आनन्द के ढंग है। 

सत्पुरुष आज की आवश्यकताओं की पूर्ति करता, कल के लिए योजना बनाता, धन, अनाज, वस्त्र इत्यादि का संग्रह करता, अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखता, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भावी उन्नति का विचार रखता है। वह पृथ्वी पर ही अपनी सद्भावनाओं तथा सद्बछाओ द्वारा स्वर्ग का निर्माण करता है। वह जानता है कि जीवन में धन सफलता की कसौटी नहीं है। धर्म ही वह साधन है जिसके द्वारा पुण्यजीविका एकत्र की जाती है।

वह पाप जीविका, छल-जीविका, जुआ, सट्टा, भिक्षा, ब्याज से दूर रहता है वह दूसरे को ठगने का प्रयत्न नहीं करता। उसकी जीविका उपार्जन का कार्य सउद्देश्य से होता है। सच्चाई और पुण्य की कमाई से खूब फूलता फलता है। बुराई से खरीदी हुई प्रतिष्ठा क्षणिक होती है। यथाशक्ति वह दूसरों को दान-पुण्य से सहायता करता है। जीवन निर्वाह के बदले वह उचित सेवा भी करता है।

देव तुल्य जीवन का उद्देश्य त्याग तथा साधना द्वारा जन सेवा के कार्य है। यह सेवा शरीर, मन या शुभ विचारों के द्वारा हो सकती है। विश्व कल्याण के लिए जीने वाला व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी देवता है। वह अपनी बुद्धि एवं ज्ञान को विश्वहित के लिए बलिदान करता है। ज्ञान चर्चा द्वारा वह दूसरों का मन भी उच्च विषयों की ओर फेरता है। उसकी दिनचर्या में उत्तम प्रवचनों का श्रवण, शंकानिवारण, पठन, चिन्तन, आत्मनिरीक्षण, निर्माण और उपदेश होते है। वह संसार की वासनाओं के ऊपर शासन करता है।


दाम्पत्य जीवन का सुख यों प्राप्त करें

दाम्पत्य जीवन में आपसी सम्यक बूझ और स्नेह प्रेम न हुआ, तो पास्परिक क्लेश कटुता बढ़ने लगते हैं और जीवन जल्दी ही नरक तुल्य बन जाता है। इस नारकीयता से त्राण पाने के लिए पति-पत्नी तलाक की आवश्यकता महसूस करते है और जिस जीवन की शुरूआत सुख-सृष्टि की अनन्त संभावनाओं के साथ हुई थी, वह अन्ततः दारुण दुःख के साथ बिखर जाता है। यहाँ कुछ आवश्यक ज्ञातव्य दिये जा रहे है, जिनका यदि दाम्पत्य जीवन में पालन किया गया, तो उनसे पति-पत्नी के बीच वास्तविक स्वर्ग-सृजन में सहायता मिल सकती

 पति-पत्नी एक दूसरे को सच्चे हृदय के गहन तल से प्रेम करें। प्यार का अर्थ है प्रियजनों के दोष और त्रुटियो को क्षमा करते रहना। मतभेद होने पर समझौता करे और गलतफहमी होने पर जल्दी से जल्दी उसे दूर करे। प्रेम मे अभाव को भुला देना चाहिए। क्षमाशीलता से सरसता पुनः आ जाती है।  पति-पत्नी परस्पर एक दूसरे में अविचलित विश्वास रखें। दाम्पत्य जीवन में सन्देह के समान कोई बड़ा शत्रु नहीं है। मन को विषमय बनाने के लिए सन्देह से बढ़कर अन्य भावना नहीं है।

 साथ-साथ रहे सुख-दुःख में संपद- विपद में, हर्ष और आह्लाद में सदा एक-दूसरे के साथ रहें। जीवन में कष्ट आये, तो साथ रहें, हर्ष के अवसर आये तो साथ ही हर्षित होकर खुशी मनायें। बीमारी में एक दूसरे का पूरा साथ दें धर्म के सब कार्य हमारे यहाँ सम्मिलित मिलकर मनाने की प्रथा है। सम्मिलित दान, स्नान, यात्रा, कर्म इत्यादि से धर्म की सिद्धि मानी गई है। पति-पत्नी को चाहिए कि सब कामों में साथ-साथ रहे।

एक दूसरे की निस्वार्थ भाव से सेवा करें और उसके लिए अपने स्वार्थो का परित्याग करें। पत्नी पति के लिए और पति पत्नी के लिए अपने संकुचित स्वार्थ का त्याग करें। इस पारिवारिक त्याग से, आदान-प्रदान की नीति से काम लें। इससे वाणिज्य व्यापार तो चलता ही है, पर गृह संसार में भी यही नीति लाभ देती है।

 एक दूसरे के आचरण की आलोचना न करें। बुराई किसमें नहीं है ? कमजोरियों से कौन बचा है ? सबसे पहले दम्पत्ति को दोषान्वेषण की आदत छोड़ देनी चाहिए। एक दूसरे के दोष दर्शन से दाम्पत्य जीवन में कटुता उत्पन्न होती है और पारस्परिक विश्वास नष्ट हो जाता है। दोष देखने का अर्थ एक दूसरे को नीचा दिखाना है। इससे घृणा उत्पन्न होती है, यह घृणा बड़े-बड़े राज्यों को समाप्त कर देती है। घृणा से मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।

 मैं अपनी पत्नी की अपेक्षा बड़ा हूँ या मैं अपने पति से ऊँची हूँ, यह सब मन मे न आने दीजिये। इससे अहंभाव उत्पन्न होता है, स्वेच्छाचारिता बढ़ जाती है और स्वार्थ की इस खीचातानी में दाम्पत्य जीवन की डोर टूट जाती है। दाम्पत्य जीवन में तो दोनों को सदा समानता का ही भाव मन और कर्म में रखना चाहिए।

 विवाह किया है, इसलिए हमारा दूसरे के ऊपर पूरा-पूरा हर प्रकार का अधिकार है। हम अपने साथी से सब प्रकार की आशा कर सकते है—ऐसा कभी भी न सोचें। मनुष्य आखिर मनुष्य ही है, देवता नही है। मनुष्य मे चाहे योग्यता और शक्ति कितनी ही बड़ी क्यों न हो, किन्तु दुर्बलता आखिर सब में है— इस बात का स्मरण रखिए। हो सकता है कि अपनी पत्नी से या पति से कोई दुर्बलता सूचक कार्य हो जाय, यदि ऐसा हो तो उदारतापूर्वक उसे क्षमा कर देने में ही दोनो की भलाई है।  सदा गम्भीर मत बने रहिए, इससे जीवन नीरस हो जाता है। दोनों मिल-जुलकर हँसी-खुशी के लिए भी समय रखिये, हँसना, बोलना, मनोरंजन करना भोजन से भी अधिक उपयोगी है। हँसमुख आदमी कभी अस्वस्थ नहीं रहता। हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ व्यक्ति ही प्रसन्नचित होते हैं मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि हँसने से शरीर का रक्त उष्ण होता है और नाड़ी की स्पन्दन क्रिया नियमित होती है। हँसने से शरीर में बल और साहस की वृद्धि होती है। हँसना जीवन की शक्ति को बढ़ाता है, प्रसन्नता और आनन्दी स्वभाव चेतना-शक्ति बढ़ाते हैं। मृदुल हास से स्वभाव, शरीर और आत्मा दृढ होते हैं। हास-परिहास, दाम्पत्य जीवन के लिए बहुत आवश्यक है, स्वास्थ्य और सुख का आधार है। हँसते हुए जीवन बिताना एक प्रकार से मानसिक और शारीरिक शक्ति बढ़ाने की चिकित्सा है। ९. पहले प्रियजन बाद में मैं पहले उसका सुख, इस बात को स्मरण रखते हुए अपने सुख को पीछे रखिये।पति पत्नी से और पत्नी पति से शिष्टाचार का पालन करें। अभ्यागत के प्रति भी ऐसा ही व्यवहार उचित है। अशिष्ट व्यवहार दाम्पत्य जीवन में भी सर्वधा निन्दनीय और त्याज्य है।


हमारे उत्सव तथा त्यौहार


वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का उदय सुखद पारिवारिक जीवन के लिए उत्सव तथा त्यौहार बड़े उपयोगी है। इनके द्वारा अनेक लाभ है। (१) अच्छा मनोरंजन होता है। इसमे सामूहिक रूप से समस्त परिवार के व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। अभिनय, गान, कीर्तन, पठन-पाठन, स्वाध्याय इत्यादि साथ-साथ करने में सबमें भ्रातृभाव का संचार होता है। (२) समता का प्रचार त्यौहारों में हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सामूहिक रूप से उन्हें सफल बनाने का उद्योग करता है। (३) पुराने सांसारिक एवं आध्यात्मिक गौरव की स्मृति पुनः हरी हो जाती है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो हमे प्रतीत होगा कि प्रत्येक त्यौहार का कुछ गुप्त आध्यात्मिक अर्थ है। हिन्दू उत्सव एवं त्यौहारों ने समता, सहानुभूति तथा पारस्परिक संगठन की पवित्र भावना निहित है। इन गुणो का विकास होता है। (४) आध्यात्मिक उन्नति का अवसर हमे इन्हीं त्यौहारों द्वारा प्राप्त होता है। हमारे प्रत्येक उपवास, मौनवत समारोह का अभिप्राय सब परिवार में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, उदारता, दया, श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के भाव उत्पन्न करना होता है। ये सब आत्मा के स्वाभाविक गुण है। यही मनुष्य की स्थायी शक्तियाँ है।


ये उत्सव तथा त्यौहार केवल रस्म अदायगी, बाह्य प्रदर्शन या झूठा दिखावा मात्र न बने, प्रत्युत पारिवारिक भावना, संगठन, एकता, समता और प्रेम की भावना के विकास में सहायक हो। पारिवारिक जीवन का विकास करने के लिए हमें कटुता और विषमता को भावना त्वागनी होगी, स्नेह सरिता प्रवाहित करनी होगी और सहानुभूति का सूर्य उदय करना होगा।


उत्सव तथा त्यौहारों में हम सबको एक ही स्थान पर एकत्रित होने का अवसर प्राप्त हो जाता है, हम मिल-जुल कर परस्पर विचार-विनिमय कर सकते हैं, एक ही विषय पर सोच-विचार कर अपनी समस्याओं का हल सोच सकते हैं। परस्पर साथ रहने से हम एक-दूसरे के गुण-दोषों की ओर भी संकेत कर सकते है। ये वे अवसर हैं जो पारिवारिक भेद-भाव भुला कर पुनः स्नेह, सहानुभूति में आबद्ध करते हैं। बड़े उत्साह से हमें इन्हें मनाना चाहिए।


मूर्खतापूर्ण आदतें-वे आदतें कौन सी हैं जिनसे परिवार का सर्वनाश होता है ? प्रथम तो स्वार्थमय दृष्टिकोण है, जिसकी संकुचित परिधि में केवल मुखिया ही रहता है। जो मुखिया अपने आप अच्छी से अच्छी चीजें खाता, सुन्दर वस्त्र पहिनता अपने आराम का ध्यान रखता है और परिवार के अन्य सदस्यों को दुःखी रखता है, वह दुर्मति अस्त है। इसी प्रकार अत्यधिक क्रोधी, कामी, अस्थिर चित्त, मारने-पीटने वाला, वेश्यागामी व्यक्ति परिवार के लिए अभिशाप है।


अनेक परिवार अभक्ष्य पदार्थ के उपयोग के कारण नष्ट हुए हैं। शराब ने अनेक परिवारों को नष्ट किया है। इसी प्रकार सिगरेट, पान, तम्बाकू, बीड़ी, गाँजा, भाँग, चरस, चाय इत्यादि वस्तुओं में सबसे अधिक धन स्वाहा होता आया है। इन चीजो से जब खर्चा बढ़ता जाता है तो उसकी पूर्ति जुआ, सट्टा, चोरी, रिश्वत, भ्रष्टाचार से की जाती है। जो व्यक्ति संयमी नहीं है, उससे उच्च आध्यात्मिक जीवन की कैसे आशा की जा सकती है ? नशे में मनुष्य अपव्यय करता है और परिवार तथा समाज के उत्तरदायित्व को पूर्ण नहीं कर पाता। विवेकहीन होने के कारण वह दूसरों का अपमान कर डालता है, व्यर्थ सताता है, मुकदमेबाजी चलाता है। समय और धन नष्ट हो जाता है। शराबी लोगों के गृह नष्ट हो जाते है। प्रतिष्ठा की हानि होती है बच्चों और पत्नी की दुर्दशा हो जाती है। जो लोग भाँग, अफीम इत्यादि का नशा करते हैं वे भी एक प्रकार के मद्यपी ही परिगणित किये जायेंगे।


माँस भक्षण भी एक ऐसा ही दुष्कर्म है, जिससे प्राणी मात्र को हानि होती है। इससे हिंसा, प्राणीवध, भाँति-भाँति के जटिल रोग उत्पन्न होते है पशु प्रकृति जायत होती है। अधिक मिठाइयाँ या चाट-पकौड़ी खाना भी उचित नहीं है।


कर्जा लेने की आदत अनेक परिवारों को नष्ट करती है। विवाह जन्मोत्सव, यात्रा, आमोद-प्रमोद में अधिक व्यय करने के आदी अविवेकी व्यक्ति अनाप-शनाप व्यय का लिया हुआ कर्ज कभी नहीं उतरता। सामान और घर तक बिक जाते हैं। आभूषण बेचने तक की नौबत आती है। इसी श्रेणी में मुकदमेबाजी आती है। यवाशक्ति आपस में मेल-मिलाप कर लेना ही उचित है। मुकदमे के चक्र में समय और धन दोनों की बरबादी होती है।


व्यभिचार सम्बन्धी आदतें समाज में पाप और छल की वृद्धि करती है। विवाहित जीवन में जब पुरुष अन्य स्त्रियों के सम्पर्क में आते हैं, तो समाज में पाप फैलता है। कुटुम्ब का प्रेम, समस्वरता, संगठन नष्ट हो जाता है। गृह-पत्नी से विश्वासघात होने से सम्पूर्ण घर का वातावरण दूषित और विषैला हो उठता है। शोक है कि इस पाप से हम सैकड़ों परिवारों को नष्ट होते देखते हैं और फिर भी ऐसी मूर्खतापूर्ण आदतें डाल लेते हैं। आज के समाज में प्रेयसी, सखी, क्रेन्ड के रूप में खुला आदान-प्रदान चलता है। इसके बड़े भयंकर दुष्परिणाम होते


बचे हुए समय का उपयोग कैसे


होना चाहिए ?


परिवार के स्त्री-पुरुष दोनों को कुछ-न-कुछ फालतू समय मिलता है। जिसका उपयोग आलस्य, हँसी-ठट्ठा या चुगली, गप-शप में किया जाता है। हमारे परिवारों मे समय का मूल्य नहीं समझा जाता है। पुरुष प्रायः आर्थिक समस्याओं में उलझे हुए गृह से बाहर रहते हैं। खियाँ भोजनोपरान्त या तो सो जाती है या घर में बैठ कर व्यर्थ की टीका-टिप्पणी, परछिद्रान्वेषण लड़ाई-झगड़ो, चौपड़ खेलने में समय नष्ट करती है।


आज का युग हमें पुकार-पुकार कर चेतावनी दे रहा है, 'उठो, तन्द्रा छोड़ो, जागो और अपनी उन्नति के लिए प्रत्येक क्षण का समुचित उपयोग करो। देखो प्रत्येक परमाणु आगे बढ़ रहा है, उन्नति करने के लिए उद्योग कर रहा है। व्यर्थ की सुस्ती, आलस्य या व्यर्थ की टीका-टिप्पणी में समय नष्ट करने का किसे अवकाश है ? यहाँ तो प्रत्येक पल उन्नति के लिए लगाना है। अब विश्व का कण-कण प्रगतिशील है, तो क्या आप व्यर्थ ही सोते रहेंगे ? क्या अपना समय हम व्यर्थ नष्ट कर देंगे ?


दैनिक कार्यक्रम: परिवार के स्त्री वर्ग का उत्तरदायित्व अधिक है। अब युग उन्नति करने का है। प्रत्येक पल का उचित उपयोग कर निरन्तर अवसर होने का है। प्रत्येक प्रगतिशील परिवार के स्त्री-पुरुष को चाहिए कि दिन-भर का कार्यक्रम दिन प्रारम्भ होने से पूर्व तैयार कर ले। यदि दिन प्रारम्भ हो जायेगा, तो इतना अवकाश प्राप्त न होगा कि यह सोचा जा सके कि आज कौन-कौन सा महत्त्वपूर्ण कार्य करना है चतुर विद्यार्थी, व्यापारी, अध्यापक, इंजीनियर, ठेकेदार रात्रि में दूसरे दिन के लिए कार्यक्रम तैयार करते हैं। खियों को भोजन बनाना नित्य कर्म, घर की सफाई और शिशु पालन का समय निकालकर कुछ फुरसत का अवकाश निकालना चाहिए।


अवकाश का सदुपयोग सर्वप्रथम प्रत्येक परिवार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि घर की जितनी नारियाँ निरक्षर हो, उनको साक्षर बनाया जाय। बेपढ़ा-लिखा होना सबसे बड़ा अभिशाप है। यदि पति, भाई या घर का और कोई सदस्य शिक्षित हो, तो उसे घर में विद्यादान का कार्य करना चाहिए। आज के युग में विद्या प्राप्ति के साधन इतने सुलभ और सस्ते हैं, जितने किसी भी युग में न थे। पुस्तकें, मासिक-पत्र, स्टेशनरी, कागज इत्यादि अत्यन्त सस्ते में ही प्राप्त हो जाते हैं। समाचार-पत्रों की सुविधा थोड़े ही पैसों में हो जाती है। मासिक पत्रिकाएँ प्रत्येक स्थान पर सुलभतापूर्वक ली जा सकती है। पास-पड़ोस से माँग कर भी इनका उपयोग किया जा सकता है।


परिवार में आने वाले समाचार-पत्रों का, पत्रिकाओं का चुनाव बड़ी सतर्कता से होना चाहिए। आजकल सिनेमा से सम्बन्धित अश्लील, कुरुचिपूर्ण, कामोत्तेजक पुस्तकें और पत्रिकाएँ ढेर की ढेर मिलती हैं। इनके मायाजाल में कदापि न फँसिये स्त्रियों के लिए कोई भी सद्विचारपूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाली, उत्तम मासिक पत्रिका चुनी जा सकती है। परिवार में एक छोटा-सा घरेलू, पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए, जिसमें मानव जीवन को ऊंचा उठाने वाले सद्ग्रन्य रहे


जो परिवार अच्छी स्थिति में हैं, उनमें घर के लिए एक मास्टर की योजना रह सकती है, जो अशिक्षितों को अक्षर ज्ञान करा कर उच्च स्थिति में पदार्पण कर सके। परिवार स्वयं एक पाठशाला है, जिसमें प्रत्येक सदस्य को प्रेम और उत्तरदायित्व की शिक्षा प्राप्त होती है। फिर क्यों न शिक्षा का विधिवत् पालन किया जाए?


शिक्षा के जिस महान कार्य को आप पूर्ण करना चाहते हैं, उसे छोटे से प्रारम्भ कीजिए। एक छोटे से भाग को हाथ में लीजिए और उस भाग को पूरी सावधानी से दिलचस्पी और लगन से दृढ़तापूर्वक करने का प्रयत्न कीजिए। जब आप परिवार से शिक्षा की बात कहेंगे, तो वे सम्भव है इसे पहले न पसन्द करें, पर बाधाओं से मत घबराइये। इस पुण्य कार्य को मत त्यागिये वरन् जैसे भी बन पड़े थोड़ा-बहुत समय इस कार्य के निमित्त नित्य लगाते रहिये। नियमित रूप से कुछ पढ़ाने लिखाने, कविता पाठ कराने, खेल, कहानी, समाचार-पत्र पढ़ाने से साधारण योग्यता अवश्य प्राप्त क जा सकती है। पहले एक सदस्य को फिर उसकी सहायता से दूसरे-तीसरे और चौथे को शिक्षित कीजिए। जिस आदमी को एक बार अपनी योग्यता पर विश्वास हो गया, वह बड़े कठिन कामों में हाथ डालने लगता है और बड़े से बड़े कार्यों को सुगमता से सम्पन्न कर डालता है। 

विद्या ही आत्मा का भोजन है। फालतू समय का उपयोग सात्विक ज्ञान संचय, पुस्तक पढ़ने, अखबारों से संसार की घटनाओं के विषय में जानने, मासिकपत्रों के अध्ययन में व्यतीत होना चाहिए। पहले पुस्तकें, कहानियों, कविताएँ, उपन्यास इत्यादि पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न कीजिए। तत्पश्चात् क्रमश: कठिन और गम्भीर विषयों की ओर अग्रसर हुजिए अध्यात्म, मनोविज्ञान इत्यादि गम्भीर विषयों का अध्ययन करने से मानव जीवन के ज्ञान का सम्पूर्ण भाग प्राप्त किया जा सकता है।


ज्ञान प्राप्ति के अन्य साधन स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है। जो व्यक्ति पुस्तके पढ़ता है, वह उच्चतम ज्ञान के साथ अटूट सम्बन्ध स्थापित करता है। सुशिक्षा, विद्या, विचारशीलता, समझदारी, सुविस्तृत जानकारी अध्ययन, चिन्तन, मनन, सत्संग तथा दूसरों के अनुभव द्वारा हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सुसंस्कृत बना सकता है। मनुष्य स्वयं अनेक शक्तियों को लेकर भूतल पर अवतरित हुआ है। जन्म से प्रायः हम सब समान ही है। अन्तर केवल विकास का ही है। स्वाध्याय द्वारा ही हमारा विकास सम्भव है। स्कूल-कालिज में भी केवल स्वाध्याय करने के उचित साधन उपस्थित किए जाते हैं। स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अपने परिवार और उद्योग से शिक्षित होकर संसार में महात्मा भवत, ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी, गुणी, विद्वान, महापुरुष, नेता, देवदूत, पैगम्बर तथा अवतार हुए है। ज्ञान ने ही मनुष्य को तुच्छ पशु से ऊंचा उठाकर एक सुदृढ़ असीम शक्तिपुंज नाना देवी सम्पदाओं तथा कृत्रिम साधनों से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्यायल पर ही बहुत हद तक निर्भर है। ज्ञान प्राप्ति के कुछ उपाय ये है-


१. विद्वानों के प्रवचनों को ध्यान से सुनना और


उनके अनुसार आचरण करना।


२. उत्तम ग्रन्थों का पठन-पाठन उन्हें स्मरण रखना, मस्तिष्क का एक भाग बनाना। ३. ज्ञान का विस्तारण दूसरे को देने से विद्याबल बढ़ता है।


४. स्वयं विचार करना। जगत, संसार, मानव


स्वभाव तथा आदतों पर विचार करना।


५. आत-निरीक्षण ६. उपदेश ग्रहण किसी के उपदेश की सत्यता की जाँच लोग उनके आचरण से ही करेगे। इसलिए यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगों को आलसी बनाने का एक बहुत बड़ा कारण बन जायेगा।


शिक्षित स्त्रियों पति को आर्थिक सहायता देने के लिए छोटी-मोटी नौकरी भी सकती है। कर उनके लिये (१) अध्यापिका, (२) नर्स (३) डाक्टरनी (४) सम्पादिका, लेखिका (५) शिशु संस्थाओं की देखभाल, (६) उद्योग मन्दिरों में कार्य सिखलाने का काम उपयुक्त है। शिक्षा के क्षेत्र में खियो की नितान्त आवश्यकता है। कुमारी अध्यापिकाओं से विवाहित अध्यापिकाएँ तथा लेड़ी प्रोफेसर अधिक चतुर और अनुभवी समझी जाती है। बाल मन्दिरों में शिशुओं की देखभाल के लिए शिक्षित मनोविज्ञानवेत्ता स्त्रियों की बेहद जरूरत है। स्त्रियों के शफाखानों में, प्रसूति गृहों में लेडी डाक्टरों की तथा चतुर नर्सों की आवश्यकता है। सरकार के दफ्तरों, पोस्टऑफिसों तथा रेलवे में टिकट चेक करने के लिए स्त्रियों की आवश्यकता है। जो बहिने अपने चरित्र की दृढ़ता में विश्वास करती है और साधारण से ऊँची है, उन्हें विवेकपूर्ण ढंग से घर को आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिये।


ऐसे भी अनेक उद्योग-धन्धे हैं, जिन्हें आप अपने पति की सहायता से घर में कर सकती है। देशी-विदेशी हर प्रकार के सुगन्धित तथा सादे तेल, इत्र, एसेन्स, वेसलीन, स्नो, क्रीम, हैजलीन, फलों के शर्बत इत्यादि की कुछ शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं और छोटे पैमाने पर इन्हें तैयार कर सकती हैं। देशी बड़ी-बूटियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के रंग बनाना, कपड़े रंगना, कपड़े सीने का काम, फूल-पत्ती काढ़ना भी चलाये जा सकते हैं। थोड़ी पूँजी से घर में प्रिंटिंग प्रेस चलाया जा सकता है, जिसमें खियाँ कम्पोजिंग, कटाई, छपाई, जिल्दसाजी, लिफाफे बनाना, लेटरपैड तैयार करने का कार्य कर सकती है।


यदि आपके पास थोड़ी-सी भूमि है तो दो पेशे और भी शुरू किये जा सकते हैं। (१) बागवानी-घर के लिए सब्जी उगाना, पुष्ष उत्पन्न करना, गमलों में कलम इत्यादि लगाना, छोटे फल उत्पन्न करना बड़ा लाभदायक मनोरंजन है। (२) दूध का व्यवसाय तीन-चार गाय-भैंस पालकर दूध, घी और मक्खन का काम चलाया जा सकता है। दूध, घी का कार्य तो त्रियों के हाथ में सफलता से दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती बनाना दियासलाई बनाना इत्यादि के काम भी चलाये जा सकते हैं। दरवाजों तथा खिड़कियों पर लगाने का पेन्ट घर में बनाया जा सकता है। पंजाब में अनेक दुकानें पापड़ का ही व्यवसाय कर हजारों का लाभ उठाती है। पापड़ों के साथ वे कुरेरी, वड़ियो तथा अन्य इसी प्रकार की वस्तुएं घर पर तैयार कर सकती हैं। रंग का काम भी उनके हाथ की बात है। मोमबत्ती का व्यापार थोड़े पैसे से परों में प्रचलित किया जा सकता है। आतिशबाजी का सामान तैयार करने के लिए थोड़ी-सी सामग्री- शोरा, गन्धक, पोटाश, बारूद इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त गड़े-से परिश्रम से डबल रोटी बनाना सीख सकती है। वाराई बुनना, निवाड़ तैयार करना, चर्खा कातकर सूत तैयार करना, गाले बुनना, टोकरियाँ तैयार करना चिके, दरियाँ इत्यादि तैयार करना- घरो में किए जाने वाले कुछ उद्योग धन्धे है। आजकल पाश्चात्य देशों की महिलाओं के


कार्य-कलाप देखकर दंग हो जाना पड़ता है। हम वहाँ की उच्छृंखलता को खतरनाक समझते हैं, किन्तु सदाचार और नैतिकता हमारे चरित्र के अंग हैं। हमें सतर्कता से उनके परिश्रम तथा सात्विक गुणों को अपनाना चाहिये। परिश्रम की दृष्टि से पाश्चात्य देशों की स्त्रियों को कई भागों में विभाजित किया जा सकता है– (१) शिक्षालयों की अध्यापिकाएँ २ - गृहपरिचारिका ३- अभिनेत्रियाँ ४- कार्यालयों की लेखिकाएँ ५–उच्च गृह की गृहस्वामिनियाँ ६ दाइयाँ और डाक्टरनियाँ इत्यादि । अभिनेत्री का जीवन निद्य और वासना-जन्य है। प्रत्येक दृष्टि से यह निकृष्ट एवं त्याज्य है। उसे छोड़कर अन्य पेशों के लिए चुनाव किया जा सकता है।


फालतू समय का एक उपयोग मनोरंजन है। सम्पूर्ण दिन कार्य करते-करते महिलाओं का दिल और दिमाग शिथिल हो जाता है। वे घर के कारावास में बन्द रहती हैं। छुट्टी के दिन उन्हें उद्यानों की सैर करनी चाहिए, सहेलियों के यहाँ मिलने जाना चाहिए, सरिताओं के तट पर तथा पर्वत प्रदेशों की यात्राएँ करनी चाहिए। तैरना खेलना भी है और व्यायाम भी फोटोग्राफी, लकड़ी का काम, लेख लिखना, कविता करना या अन्य कोई शौक का कार्य किया जा सकता है। अपने बच्चों को पढ़ाने का कार्य बहुत श्रेयस्कर है। राष्ट्रीय कार्यों में अनेक विजयलक्ष्मियों की आवश्यकता है। यदि प्रयत्न करें तो भारत में रचनात्मक योजनाओं के लिए अनेक राष्ट्रीय विचारों वाली विदुषी नारियाँ तैयार की जा सकती है। भारत में अभी देवमाता अदिति, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी, जैसी महामान्या नारियों को भुलाया नहीं जा सकता। फालतू समय में शास्त्रों का अध्ययन कर भारतीय ललनाएँ वक्ता लेखिकाएँ, कवयित्री विदुषी, ब्रह्मवादिनी बन सकती हैं।


शान्तिमय गृहस्थ जीवन


आपका परिवार का एक छोटा-सा स्वर्ग है, जिसका निर्माण आपके हाथ में है। परिवार एक ऐसी लीला भूमि है जिसमें पारिवारिक प्रेम, सहानुभूति सम्वेदना, मधुरता अपना गुप्त विकास करते हैं। यह एक ऐसी साधना भूमि है, जिसमें मनुष्य को निज कर्त्तव्यों तथा अधिकारों, उत्तरदायित्वों एवं आनन्द का ज्ञान होता है। मनुष्य को इस भूतल पर जो सच्चा और अकृत्रिम सौख्य और दुःख से मुक्त सुख प्राप्त हो सकता है वह कुटुम्ब का ही सुख है।


कुटुम्ब की देवी स्त्री है। चाहे वे माता भगिनी या पुत्री किसी भी रूप में क्यों न हो उन्हीं के स्नेह से, हृदय की करुणा, रस स्निग्ध वाणी और सौन्दर्यशील प्रेम से परिवार सुखी बनता है। वह स्त्री जिसका हृदय दया प्रेम से उछलता है परिवार का सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसकी वाणी में सुधा की सी शीतलता और सेवा में जीवनप्रदायिनी शक्ति है। उसके प्रेम की परिधि का निरन्तर विकास होता है। वह ऐसी शक्ति है, जिसका कभी क्षय नहीं होता और जिसका उत्साह एवं प्रेरणा, परिवार में नित्य नवीन छटाएँ पूर्णता में नवीनता उत्पन्न कर मन को मोद, बुद्धि को प्रबोध और हृदय को संतोष प्रदान करती है।


हिन्दू परिवार में पुत्र क्षणिक आवेश में आकर स्वच्छन्द विहार के लिये परिवार का तिरस्कार नहीं करता वरन् परिवार के उत्तरदायित्व को और भी दृढ़ता से वहन करता है। हिन्दू जीवन में पति उत्तरदायित्वों से भरा हुआ प्राणी है। अनेक विघ्नों के होते हुए भी उसका विवाहित जीवन मधुर होता है। यहाँ संयम, निष्ठा, आदर प्रतिष्ठा तथा जीवन-शक्ति को रोक रखने का सर्वत्र विधान रखा गया है। यदि यह संयम न हो तो विवाहित जीवन गरल-मय हो सकता है। हिन्दू नारी को भोग-विलास की सामग्री नहीं, नियन्त्रण प्रेरणा, साधना, विघ्नबाधाओं के साथ देने वाली जीवन संगिनी के रूप में देखता है।


इन देवी गुणों की वृद्धि कीजिए- पारिवारिक जीवन को मधुर बनाने वाला प्रमुख गुण निःस्वार्थ प्रेम है। यदि प्रेम की पवित्र रज्जु से परिवार के समस्त अवयव सुसंगठित रहें, एक दूसरे की मंगल कामना करते रहें, एक-दूसरे को परस्पर सहयोग प्रदान करते रहे, तो सम्पूर्ण सम्मिलित कुटुम्ब सुघड़ता से चलता रहेगा। परिवार एक पाठशाला है, एक शिक्षा संस्था है, जहाँ हम प्रेम का पाठ पढ़ते हैं।


अपने पारिवारिक सुख की वृद्धि के लिये यह स्वर्णसूत्र स्मरण रखिये कि आप अपने स्वार्थों को पूरे परिवार के हित के लिये अर्पित करने को प्रस्तुत रहें। हम अपने सुख की इतनी परवाह न करें, जितनी दूसरों की हमारे व्यवहार में सर्वत्र शिष्टता रहे। यहाँ तक कि परिवार के साधारण सदस्यों के प्रति भी हमारे व्यवहार शिष्ट रहें छोटों की प्रतिष्ठा करने वाले उनका आत्म-सम्मान बढ़ाने वाले, उन्हें परिवार में अच्छा स्थान देकर समाज में प्रविष्ट कराने वाले भी हमी हैं।


छोटे-बड़े भाई-बहिन घर के नौकर, पशु-पक्षी सभी से आप उदार रहें। प्रेम से अपना हृदय परिपूर्ण रखे। सबके प्रति स्नेहसिक्त, प्रसन्न रहें आपको प्रसन्न देखकर . घर भर प्रसन्नता से फूल उठेगा, प्रफुल्लता वह गुण है जो थके-हारे सदस्यों तक में नवोत्साह भर देता है।


आप अपने परिवार में खूब हँसिये खेलिये, क्रीड़ा कीजिये। परिवार में ऐसे रम जाइए कि आपको बाहरीपन मालूम न हो आत्मा तृप्त हो उठे। चुन-चुन कर अपने परिवार में मनोरंजन के भी नवीन ढंग अपनायें। लेकिन इन सब के मूल में जो वृत्ति है वह हँसी-विनोद और


विश्राम की है।


http://literature.awgp.org/book/gruhasth_ek_tapovan/v5.24

हम साथ साथ हैं।2

 दाम्पत्य जीवन का समस्त सुख केवल एक बात में है पति-पत्नी एक दूसरे के मनोभावों को समझ लें। अपने साथी की इच्छाओं, आकांक्षाओं, मनोभावनाओं का विश्लेषण करें। एक-दूसरे के दृष्टिकोण को सहानुभूतिपूर्वक देखें, समझें और एक-दूसरे के सम्मुख सदा सिर झुकाने को तैयार रहें तो उनका जीवन स्वर्गीय प्रकाश से परिपूर्ण हो सकता है। एक-दूसरे के मनोभावों के अनुसार चलने से उनके जीवन में प्रेम की सुखद निर्झरिणी शत-शत धाराओं में बह सकती है। स्मरण रखिये जहाँ पुरुष दुर्बल है वहाँ स्त्री की शक्ति प्रकट होती है। पुरुष सर्वस्व प्राप्त कर सकता है और स्त्री सर्वस्व दान दे सकती है। स्त्री और पुरुष दोनों ही सृष्टि की महान् शक्तियाँ हैं किन्तु पूर्ण होने के लिये दोनों का सहयोग चाहिये । पुरुष एवं स्त्री का पारस्परिक सम्मिलन आत्मा का सम्मिलन है।


स्त्री कल्पलता है। जब पुरुष अकिंचन हो जाता है तो स्त्री की छत्र-छाया में रह कर वह पुनः शान्ति प्राप्त कर सकता है।


विवाह के प्रारम्भ में आप खूब देख-भाल कर पत्नी चुन सकते हैं। खूब टीका-टिप्पणी कर सकते हैं किन्तु विवाह के पश्चात् एक दूसरे के दुर्गुणों को आँख मीच कर टाल देने में ही लाभ है। आपस की आलोचना डराने-धमकाने, मारने-पीटने से गृह कलह बढ़ता है क्योंकि हमारे 'अहं' भाव को भारी धक्का पहुँचता है।


पति को वश में करने का उपाय 

 जो पत्नी अपने पति का स्थायी प्रेम चाहती है उसे अपने पति के स्वभाव, प्रकृति, विचार, मनोभाव, संवेदनाओं का गहन अध्ययन करना चाहिए। पुरुष पर शासन करने के लिये यह मालूम करना चाहिये कि वह पत्नी से क्या-क्या आशाएँ रखता है ? उसे किस काम में पत्नी की सहायता चाहिये। वह उसे किस रूप में सहायक, मित्र, प्रेमिका, गृहणी, सेविका - देखना अधिक पसन्द करता है ? किन-किन गुणों, कलाओं को चाहता है ? साथ ही पत्नी को यह भी मालूम करना चाहिए कि पति में कौन-कौन-से दुर्गुण हैं ? क्या-क्या कमजोरियाँ हैं ? क्या-क्या दूसरों की कुसंगति से लग गई हैं ?


पुरुष बल पराक्रम का पुतला है और किसी न किसी पर शासन करने में आनन्द लेता है अतः उसे अपने ऊपर शासन करने देकर पत्नी उसके 'अहं' को सन्तुष्ट कर सकती है। पत्नी उसकी प्रेमिका होती है अतः वह उस पर पूरा-पूरा अधिकार रखना चाहता है। अतः उसे अनुशासन का अवसर दीजिये। विवाहित जीवन में छोटी-छोटी बातों पर खड़े होने वाले मतभेदों, गलतफहमियों, झगड़ों से सतर्क रहिये । यदि कोई मतभेद आये तो भी तो अपने साथी के दृष्टिकोण को सहानुभूति पूर्वक समझिये ।


पति अपनी पत्नी के मुख से ऐसे वचन सुनने को जीवन भर लालायित रहता जिनसे उसकी श्रद्धा और अगाध विश्वास प्रकट हो। अतः ऐसे वचन कहने में कंजूसी नहीं  करनी चाहिए। अपने स्वाभाविक गुणों की वृद्धि करें। कोमलता, मधुरता, सौन्दर्य बढ़ायें। पुरुष इन गुणों से  अधिक आकर्षित होता है क्योकि ये उसमें नहीं हैं। स्त्री  के लिए हँसमुखी और रसिक होना सुन्दर होने से अधिक आवश्यक है। पुरुष स्त्री की रसिकता, हँसी, बाँकी चितवन पर अधिक आकर्षित होता है। स्त्री का जीवन छोटी-छोटी झंझटो से युक्त होता है। यदि वह उन्हें हँस कर न टाल सके, तो पागलखानो या तपेदिक के अस्पतालों की ही शोभा बढ़ा सकती है। पति को दास वे ही बना सकती है, जो उसके दोषों या विशेषताओं पर चिढ़ने के स्थान पर हँस कर टाल देती है।


प्रियतमा को जीतने के मनोवैज्ञानिक सूत्र-

हम में जो गुण नहीं हैं उनसे युक्त व्यक्तियों के प्रति हम स्वतः आकर्षित होते हैं। अतः प्रियतमा को जीतने के लिये अपने पुरुषोचित गुणों बल, वीर्य, पराक्रम, साहस, अनुशासन की अभिवृद्धि कीजिए। कोमल, पतले दुबले, कमजोर, स्त्रेण पुरुष स्त्रियों को अच्छे नहीं लगते।स्त्री जितना वीर पुरुष से प्यार करती है उतना धनियों या पण्डितों को नहीं। श्री दास एवं दब्बू पुरुष को भी पसन्द नहीं करतीं।


अपने वस्त्रों और वेश पर सदा ध्यान रखें। स्त्री सदा अपने सौन्दर्य   की चिन्ता करती है, यदि तुम्हारी प्रसन्नता के लिए, उसकी अभिवृद्धि के लिए वह निरन्तर चेष्टा करती है तो इसका यह अर्थ है कि वह सौन्दर्य का मूल्य समझती है और तुम्हें भी आकर्षक, साफ-सुधरे रूप में देखना चाहती है।


स्त्री की खूबियों बगान करो, उसका आदर करो, उसके उत्तम कार्यों पर अपनी प्रसन्नता प्रकट करो और इन सबके लिए थोड़ी प्रशंसा भी करो बार-बार उसे यही भी दर्शाओ कि तुम उसे बहुत प्रेम करते हो। यह समझकर चुप न रह जाओ कि उससे एक बार तो कह ही दिया है। वह आपके मुख से अपने प्रति बार-बार सुनना पसन्द करती है।


दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने वाले स्वर्ण सूत्र


वैवाहिक जीवन में सुख-दुःख के आर्थिक और सामाजिक कारण अवश्य होते हैं। किन्तु प्रधान कारण मनोवैज्ञानिक होते है। पति-पत्नी में अनेक अज्ञात भावनाएँ प्रसुप्त इच्छाएँ पुराने संस्कार कल्पनाएँ होती हैं। जो अप्रकट रूप से प्रकाशित हो जाती है। प्रायः दो प्रेमी प्रसन्नता से वैवाहिक सूत्र में आबद्ध होते हुए देखे गये है। किन्तु विवाह के कुछ समय बाद उनका पारस्परिक आकर्षण न्यून होता देखा जाता है। बाद में तो वे परस्पर घृणा तक करने लगते है। इस घृणा के कारण प्रायः आन्तरिक होते हैं। इसका प्रधान कारण मनुष्य की उभयलिगंता है जिसका अभिप्राय यह है कि हर एक पुरुष में स्त्रीत्व का अंश विद्यमान हैं तथा हर स्त्री में पुरुषत्व का। बड़े होने पर किन तत्वों की प्रधानता हो जायगी इस मनोवैज्ञानिक आधार पर स्त्री-पुरुष का मेल निर्भर है। यदि संयोगवश ऐसे दो प्राणी वैवाहिक सूत्र में आवद्ध हो गये हैं, जिनमें एक ही लिंग की प्रधानता है— जैसे स्त्री में पौरुषत्व और पुरुष में भी पुरुषत्व के गुण बढ़े हुए हैं अथवा स्त्री में तो स्त्रीत्व है ही, उसके पति में भी स्त्री तत्व की  प्रधानता है, तो वैवाहिक जोड़े में साम्य, सुख-समृद्धि और आन्तरिक सन्तुलन न रह पायेगा।


वास्तव में दाम्पत्य जीवन का वास्तविक सुख तभी प्राप्त हो सकता है, जब स्त्री में स्त्रीत्व के गुणों का तथा पुरुषों में पुरुषोचित गुणों का स्वाभाविक और अबाध विकास हो। इसका अभिप्राय यह नहीं कि उनमें विपरीत गुण बिलकुल ही न हो इसका आशय केवल इतना ही है कि पुरुष में पुरुषत्व की प्रधानता हो और स्त्री में स्त्री तत्व की प्रधानता हो। पुरुष में स्त्रीत्व के गुण केवल गौण रूप से और स्त्री में पुरुषत्व के गुण गौण रूप से रह सकते हैं।


पुरुषत्व के गुण-

 पुरुष का प्रधान गुण है पौरुष अर्थात् शक्ति, साहस, निर्भयता, सक्रियता। उनमें 1-शरीर बल 2-मानसिक बल 3-चरित्र बल 4-संकल्प बल की प्रधानता है। पुरुष का निर्माण सतत् युद्ध करने वाला. कठोरता, दृढ़ता और पाशविक शक्ति से पूर्ण जीव की भाँति हुआ है। पुरुष अहंकारी, क्रोधी, तामसी, मदोन्मत्त, प्रेमोन्मत्त है। उसे शक्ति का अवतार कहना युक्तिसंगत होगा आदि प्रकृति का बर्वर जंगली पुरुष आज भी उसमें जाग रहा है। पुरुष स्वभाव से ही उपार्जनशील और रमणशील है। वह अपने अन्दर एक शक्ति का अनुभव करता है और उसी से प्रेरित होकर शीघ्रता और आतुरता में काम करता है।


स्त्रीत्व के गुण

- स्त्री कोमलता, मृदुता, सौम्यता एवं सहानुभूति की खान है उसमें भावनाओं की प्रचुरता है, दयालुता, स्नेह, सौकुमार्य, विवेक है। उसका भाव पक्ष पुरुष की अपेक्षा विशेष उन्नत एवं परिपक्व है। वह गम्भीरता से सोचती है, उसके दृष्टिकोण में विशालता है, उसकी अन्तर्दृष्टि अत्यन्त व्यापक है। स्त्री स्वभाव और शरीर से कोमल है।


स्त्री और पुरुष को अपने अन्दर ही सीमित रहने में सुख का अनुभव नहीं होता, वरन् वे विपरीत सेक्स वाले प्राणी के सहवास में रहकर पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए इच्छुक होते हैं। एक दूसरे के प्रत्येक कार्य में सहायता करते हैं और अतृप्त कामनाओं को पूर्ण करते है, पुरुष जब पवित्र त्यागमयी भावनाओं से अपनी पत्नी को अपने समान सीमित कर उच्च आध्यात्मिक भूमि पर लाता है, तो उसे उसके पौरुष में विश्वास होता है। इसी प्रकार स्त्री सहायक, मित्र विपत्तियों में धैर्य प्रदान करने वाली, सहनशील बन कर पुरुष को समुन्नत करती है। 

सुखी, सन्तुष्ट, पवित्र भावनाओं वाले संयमशील और शिक्षित पति-पत्नी के बच्चे प्रारम्भ से ही उच्च संस्कार लेकर जन्मते है और पूर्ण गृहस्थ फलता-फूलता है। पति-पत्नी की हिंसात्मक क्रियाओं का स्थान रचनात्मक प्रवृत्तियों से लेती है। मनोविश्लेषण की दृष्टि से बाँझ स्त्री तथा वह पुरुष जिसके बच्चे न हो, भयानक विषैली भावना ग्रन्थियों से प्रसित रहते हैं, हिंसात्मक, घृणास्पद और बेरहमी के कार्य करते हैं। जब स्त्री-पुरुष को अपनी उच्चता, पवित्र आध्यात्मिक गुप्त शक्तियों में विश्वास होने लगता है, तब उनकी दबी हुई प्रवृत्तियों का रुझान रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक हो जाता है। घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ नष्ट हो जाते है। विवाहित स्त्रियाँ कुँवारियों से अधिक जीती है।


गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के स्वर्ण सूत्र — डेलकार्नेगी ने दाम्पत्य मनोविज्ञान का गूढ अध्ययन कर जो निष्कर्ष निकाला है, उसे आज पाश्चात्य देशों में क्रांति हो गयी है। इसमें स्त्री-पुरुष के मन की अपेक्षा गुप्त भेदों का ज्ञान भरा पड़ा है। इनमें से कुछ निम्न हैं-


(१) पतियों को तंग मत करो यह नियम उन स्त्रियों के लिए है, जो समय-कुसमय अपने पति से उसकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में न रख भाँति-भाँति की फरमायश करती हैं। जीभ पर अधिकार न होना, प्रलोभन, सिनेमा देखना, आभूषण अच्छे वस्त्रों की जिद से पति परेशान हो उठता है। विचार तथा स्वभाव के मतभेद होते है, फिर बढ़ कर पारिवारिक जीवन को नष्ट करते हैं।


(२) समालोचना मत करो 

पति या पत्नी जब एक दूसरे की कमजोरियों, खराबियों पर ध्यान देने लगते हैं, तो फिर प्रेम-डोर टूट जाती है। प्रेम की उच्च भूमिका में आपको एक दूसरे के दुर्गुणो, कमजोरियों को भी सहन करना है। यदि शीघ्र ही एक दूसरे की त्रुटियों पर ध्यान एक हो जाय तो एकता के नियमों के अनुसार उन्ही की अभिवृद्धि होगी।


(३) निष्कपट भाव से प्रशंसा करो

 अपने जीवन साथी को उत्साहित करना, ऊँचा उठाना, शिक्षित, सुसंस्कृत, सभ्य नागरिक बनाना आपका कर्तव्य होना चाहिए। प्रत्येक अच्छाई की प्रशंसा कीजिए और दिल खोल कर कीजिए। प्रशंसा से उनके और भी गुण, अच्छा स्वभाव विकसित हो सकेगा। मित्रभाव, सहनशीलता, सहयोग बढ़ेगा। अधिकांश पत्नियां अच्छी ही होती हैं, पर पति के उत्साहित न करने से उनका विकास रुक जाता है। झिड़कने, मारने पीटने, अशिष्ट व्यवहार करने या निर्दयता का व्यवहार करने से पत्नी का दिल टूट  जाता है। गुप्त विश्वास टूटते ही तलाक की नौबत आती है। अतः पति को सदा सर्वदा पत्नी को उच्च गुणों के सजेशन ही देने चाहिए। निष्कपट भाव से उसके प्रत्येक कार्य, घर की सजावट, रसोई बनाव-शृंगार, शिशुपालन आर्थिक सहयोग की प्रशंसा करनी चाहिए।

 (४) छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखो-

गृहस्थी छोटी-छोटी बातों से टूटती और बनती है। स्त्रियाँ पति को साफ-सुथरा देखना पसन्द करती है, अपनी बाबत अच्छे विचार पुनः पुनः सुनना चाहती हैं, अपने कपड़ो घरेलू व्यवस्था, भोजन की प्रशंसा सुनना चाहती है। यदि आप उनके किये हुए कार्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते तो वह क्यों अच्छी बनेगी।


कुछ व्यक्ति रुपया-पैसा अपने हाथ में रखते हैं और पत्नी को दो-दो चार बार आपसे माँगने पड़ते हैं। उसके 'अंह' और गर्व को धक्का पहुँचता है। अपने अन्दर वह हीनत्व की भावना का अनुभव करती है. जिससे पारस्परिक प्रेम में दरार पड़ जाती है। अतः पत्नी के प्रति व्यवहार में सावधानी बरतनी चाहिए। उसकी उचित और नैतिक मांगों की पूर्ति में आलस्य करना घर में झगड़े का वृक्ष बोना है।


जो युवक-युवती एक-दूसरे पर अंधाधुन्ध आसक्त होकर विवाह करते हैं, वे एक दूसरे के सुख और आनन्द पाने की बड़ी आशाएँ लेकर आते है। यदि दोनों एक दूसरे की छोटी-छोटी बातों का ध्यान न रखे तो शीघ्र ही दाम्पत्य जीवन कंटकाकीर्ण हो जाता है। एक दूसरे का मन रखने के लिए पर्याप्त समझ, साहस और कड़े परिश्रम की आवश्यकता है।


पत्नी से कुछ भी मत छिपाइए अन्यथा वह शक करेगी और गुप्त मानसिक व्यथा से दग्ध होती रहेगी। उसे यह बतला दीजिए कि आप क्या कमाते है ? कैसे व्यय करते है ? कितना बीमा करा रखा है ? किसके नाम वसीयत है ? आय-व्यय कैसे चलता है ? भविष्य में आपकी क्या-क्या योजनाएँ है ? कितना रुपया आपने एकत्रित किया है ? इत्यादि-इत्यादि ।


पति को निरन्तर कोमलता और निरन्तर पत्नी की देख-रेख द्वारा उसके प्रति अपने प्रेम का प्रकाश करते रहना चाहिए अन्यथा प्यार की भूखी स्त्री जहाँ भी उसे प्रेम मिलेगा, उसी ओर आकर्षित हो जायगी विवाह के पश्चात् जब तक जीवित रहे प्रेम दान करते रहना चाहिए। शिष्टाचार की छोटी-मोटी बातों को इज्जत और नये-नये उपहार लाने की बात भूल नहीं जाना चाहिये क्योंकि स्त्रियाँ इस बात को बहुत महत्व देती है। स्त्री प्रेम और प्यार के अभाव में साधारण सुख का जीवन भी व्यतीत नहीं कर सकती। प्रेम उसकी आत्मा का भोजन है।


(५) सुशील बनो -

 आपको ऐसा चुम्बक बनना चाहिए, जिससे आकर्षित होकर स्त्री अथवा पुरुष आपसे कुछ आध्यात्मिक प्रेरणा, उत्साह, शिक्षा, पथप्रदर्शन प्राप्त कर सके। प्रसन्नता, सौम्यता और सुशीलता से आप घर भर में रस संचार कर सकते हैं। ऐसा पति किस अर्थ का जिसके घर में प्रवेश करते ही सब डर जायें, बच्चे दुबक जायें, खामोशी और मुर्दानी छा जाय । विनयशीलता से आप अपनी पत्नी की इच्छाएँ समझ सकेगे। उसकी अनुचित मांगो को तर्क और बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे दूर कर सकेंगे। क्रोध, मारपीट, द्वेष या तलाक द्वारा आप कदापि कुछ न कर सकेंगे। समानता, निष्कपटता, शिष्टता का व्यवहार ही सम्मानीय है।


(६) कामशास्त्र के ज्ञान की अनिवार्यता

 मनुष्य के काम जीवन का क्या तात्पर्य है ? उसकी निगूढतम गुत्थियों का अध्ययन प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए अतीव उपयोगी है। सस्ती बाजारू अश्लील पुस्तकों से सावधान यह मार्ग बड़े उत्तरदायित्व और आर्थिक परीक्षा का है। अतः इसकी पुस्तकों के चुनाव विवेकपूर्ण ढंग से होना चाहिए।


दाम्पत्य कलह का एक कारण दाम्पत्ति का विशेषकर पुरुष का काम विज्ञान से अनभिज्ञ होना है। पुरुष स्वभाव से ही ढीठ और स्त्री शीलवती है। इसके अतिरिक्त वह केवल पतित्व की वेदी पर ही अपने को निछावर करने में आनन्द मानती है, वह पतित्व के साथ ही दाम्पत्य प्रेम भी चाहती है जो पुरुष प्रथम संयोग में ही स्त्री को अपनी कामना का शिकार बनाने की बर्वरता करता है, वह भयंकर भूल करके दाम्पत्य कलह का बीज बोता है। विषय मानसिक विकार एवं शरीर का मल पदार्थ है। किन्तु पवित्र दाम्पत्य प्रेम  हृदय की उच्चतम अभिव्यक्ति है। हृदय के आदान-प्रदान में पर्याप्त समय लगता है। हृदय ही स्त्री की सम्पत्ति है। वह सहज ही पुरुष को नहीं देती और एक बार देकर फिर वापिस नहीं लेना चाहती। अतः कामविज्ञान के शिक्षण से मनुष्य नारी हृदय की निगूढतम गहराइयों की शिक्षा पाकर बर्वरता, निष्ठुरता से बच सकता है।


उपरोक्त नियमों के पालन से बहुत लाभ हो सकता है। स्मरण रखिए गृहस्थाश्रम पति और पत्नी की साधना का आश्रयस्थल है। यहाँ जीवन की, धर्म, अर्थ और काम की साधना की जाती है। पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक है, सहायक है, मित्र हैं। दोनों का कार्य एक दूसरे के गुणो की अभिवृद्धि करना है, क्षुद्रताओं का उन्मूलन करना है और परस्पर एक अभिन्नता बनाये रखना है। इसके लिए प्रत्येक को संयम, सहनशीलता एवं स्वार्थ त्याग अपने अन्दर विकसित करना चाहिए।


पति का नाम 'भर्तार' अर्थात् भरण और पोषण करने वाला है। पत्नी में उसको शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक जो विभूतियाँ या न्यूनताएँ हैं, उनकी पूर्ति का उत्तरदायित्व भी उसी के ऊपर है। उसकी शक्तियों का विकास करे, पोषण करे, कुत्सित मार्ग से बचावे तथा सदा सर्वदा सन्तुष्ट रखे।


पत्नी साधिका है। जिस प्रकार एक साधक अपने प्रभु की साधना में अपना सर्वस्व समर्पण कर देता है, उसी प्रकार पत्नी अपने मन में द्वेष की भावना न रखकर पति को अपना आराध्य मानकर अपना भला और बुरा सब कुछ सौंप दे। यदि पति कुमार्गगामी हो, तो प्रेम प्रशंसा और युक्ति द्वारा उसका परिष्कार करे। कुमार्गगामिता एक मानसिक रोग है। अशिक्षा और मूढ़ता की निशानी है। इस रोग के उपचार के लिए समझने, तर्क, बुद्धि तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कुमार्ग की हीनता प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। निराश होने के स्थान पर प्रयास पुरुषार्थ से अधिक लाभ हो सकता है।


पितृ ऋण के उद्धार का एकमात्र साधन दाम्पत्य जीवन की शान्ति है। सन्तान का उत्पादन और सुशिक्षण योग्य दम्पत्ति के बिना कदापि सम्भव नहीं है। योग्य माता-पिता, उचित वातावरण, घरेलू संस्कार, पुस्तकों तथा सत्संग द्वारा योग्य सन्तान उत्पन होती है। योग्य सन्तान के इच्छुकों को सर्वप्रथम स्वयं अपना परिष्कार एवं सुधार करना चाहिए।


दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य 'भोग' नहीं उन्नति है। सब प्रकार की उन्नति के लिए दाम्पत्य जीवन आपको अवसर प्रदान करता है। यहाँ पहले शरीर फिर सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत जीवन और आध्यात्मिक जीवन की उन्नति के साधनों को एकत्रित करना चाहिए। उन साधनों को अपनाना चाहिए जिससे परस्पर का द्वैत नष्ट हो और आत्मरति एवं आत्मप्राप्ति की ओर दोनो जीवन-साथी विकासमान हो। जब दोनों एक दूसरे की उन्नति में सहयोग प्रदान करेंगे, तो निश्चय ही अभूतपूर्व गति उत्पन्न होगी।


भोग का शमन भोग से नहीं होता। भोगने से वासनाएँ द्विगुणित होती है और अपने चंगुल से मनुष्य की मुक्ति नहीं होने देतीं। एक के पश्चात् दूसरा प्रलोभन मनुष्य को आकर्षित करता है। अतः जितने से शरीर मन, आत्मा की उन्नति हो, उतने से ही सम्पर्क करना चाहिये। जीवन में फैशनपरस्ती, अभक्ष पदार्थो का उपयोग, नशीली वस्तुओं, रुपया उधार देना या लेना, व्यर्थ के दिखावे बढ़ाने से मनुष्य उनका गुलाम बन जाता है। इनमें व्यवधान उपस्थित होने से कलह बढ़ता है।


स्त्री-पुरुष का दाम्पत्य सम्बन्ध आत्म-यज्ञ के लिये है यज्ञ में ईश्वरीय शक्तियों का विकास एवं आत्मभाव का विस्तार होता है। उच्च संस्कारों द्वारा मानव जीवन को परिपुष्टि करने के लिए ही यह दाम्पत्य जीवन का निर्माण किया गया है। इसलिये स्त्री-पुरुष को विषय-वासना का गुलाम नहीं बनना चाहिये। भोग से जितनी दूर रहा जाय, उतना ही उत्तम है।


सौन्दर्य की निस्सारता


"आवश्यकता है एक सुन्दर पढ़ी-लिखी कन्या की, जो सम्पूर्ण गृहकार्यों में निपुण हो तथा सीना-पिरोना इत्यादि जानती हो।" आजकल छपने वाले विवाह सम्बन्धी विज्ञापनों में सौन्दर्य की माँग उत्तरोत्तर अभिवृद्धि पर है। सौन्दर्य के लिये दौड़-धूप बढ़ रही है। रूप-रंग की चिन्ता माता-पिताओं के लिये एक विषम पहेली बनी है। युग की इस बढ़ती हुई मांग को देखते हुए अनेक प्रश्न मानस जगत् में उठ आते हैं। एक स्त्री के लिये सुन्दरता का क्या स्थान है ? क्या सुन्दर लड़की सीधी-साधी लड़की की अपेक्षा सुगमता के साथ जीवन यात्रा तय कर सकती है। क्या उसका सौन्दर्य उसके मार्ग को साफ करेगा ? क्या सब लोग सौन्दर्य के कारण उससे मित्रता करेंगे ? उसके चरणों पर लोटेंगे ? ये प्रश्न आधुनिक युग में यूरोप तथा अमेरिका के समाजो में वाद-विवाद के विषय बने हैं। सौन्दर्यशास्त्र के विशेषज्ञों में इस विषय पर मतभेद है।


बर्नार्डशा से एक बार पूछा गया कि स्त्री जीवन में सौन्दर्य का क्या मूल्य है ? तो उनने कहा था कि सुन्दर से सुन्दर स्त्री कुछ दिन पश्चात् साधारण सी प्रतीत होने लगती है। पति के लिये सौन्दर्य भी फीका सा लगने लगता है। वह रहते-रहते यह विस्मृत कर देता है कि उसकी पत्नी में सौन्दर्य नाम की कुछ चीज भी है। उसके लिये वह पत्नी साधारण सी हो जाती है। यही हाल मामूली स्त्रियों का है। प्रारम्भ में सम्भव है सौन्दर्य न होने के कारण वे पति प्रेम से वंचित रहें किन्तु कुछ सम्पर्क से अन्य स्त्री सुलभ गुणों का विस्तार होता है, तथा पारस्परिक दाम्पत्य प्रेम निखर आता है।


अभी हाल ही में चार्ल्स ग्रिफिथ का ब्यूटी इन दि इस्ट' नामक एक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है, उससे इंग्लैण्ड में खलबली मच गई है। उनका कथन है कि सौन्दर्य का स्थान जीवन में अत्यन्त न्यून है जो स्त्रियां रुपवती नहीं थीं, ऐसी अनेकों ने समाज में सफलता एवं आदर दोनों प्रचुर मात्रा में प्राप्त किये हैं। सुन्दरता चाहे और सब कुछ हो, किन्तु वह व्यक्तिगत सफलता के लिये आवश्यक नहीं है। चार्ल्स ग्रिफिथ का कथन है कि सौन्दर्य का प्रत्येक व्यक्ति पर प्रभाव तो पड़ता है किन्तु बुद्धि, शील, चरित्र के अन्य गुणों के बिना वह निरर्थक है।


संसार में शायद ही कभी ऐसा युग आया हो जब सौन्दर्य पर आकर्षक बनने की विधियों, वस्तुओं तथा साधनों पर इतना रुपया-पैसा लगा हो, जितना इस युग में लग रहा है। आजकल सिनेमा ने तो और भी गजब ढाया है। स्त्रियों को सिनेमा एक्ट्रेस बनने की धुन सवार है। घण्टों सुन्दरता की खोज चलती है। नये-नये वस्त्रों के आविष्कार किये जाते हैं। इसका फल यह है कि आज हमारे गृहस्थ जीवन में भयंकर असन्तोष उत्पन्न हो गया है।स्त्री का स्त्रीत्व ही सबसे सुन्दर है उसका स्त्री होना , महिलोचित गुणों से सम्पन्न होना उसका प्रधान आभूषण है। उन देशों की महिलाओं को देखिये जो साधारण ही हैं सुन्दर नहीं, किन्तु जो समाज में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त कर रही है। सब कुछ सौन्दर्य पर ही निर्भर नहीं है। सौन्दर्य एक उन्माद है जो मार्ग में रोड़ा अटकाता है। इसके विपरीत जिस गृह में स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, विद्या प्रेम आदि सद्गुणों का निवास है, उसमें सौन्दर्य आँधी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। आज के पुरुष केवल कोरे सौन्दर्य से ऊबने लगे हैं। उन्हें सौन्दर्य के खोखलेपन का ख्याल हो उठा है। चकाचौध करने वाली रूप कुमारी के स्थान पर गुणवती कन्या ही श्रेष्ठ है।


वैवाहिक असफलता के कारण


हमारे समाज में नब्बे फीसदी विवाह केवल इस कारण असफल होते है कि पति या पत्नी निरन्तर एक दूसरे में कोई न कोई खराबी, कमजोरी या न्यूनता निकाला करते हैं। विवाह के पश्चात् कटुता का यहाँ तक कि तलाक का प्रमुख कारण है, तीखी आलोचना, निर्मम हृदय विदारक टीका-टिप्पणी, पति पत्नी में जरा सी कमी पाते ही झल्ला उठता है और बिगड़कर दो चार उलटी-सुलटी, जली-कटी सुना देता है। उधर सम्भ्रांत पत्नियाँ तक पति की बात पर तुनक उठती है, अपनी स्वतन्त्रता में जरा सा फर्क आते देख कर चिल्ला उठती है। भाँति-भाँति के भय दिखा कर पति पर आतंक जमाना चाहती है। इसके कारण क्या है ?


कारण है मनुष्य का 'अहं' प्रत्येक स्त्री-पुरुष बड़ी तत्परता से 'अहं' की रक्षा करता है। वह नहीं चाहता है कि कोई तनिक भी हानि उसे पहुंचाये जरा सी भी आलोचना 'अहं' पर बड़ा प्रभाव डालती है। कुछ व्यक्तियों का स्वभाव तो इतना ग्रहणशील होता है कि साधारण सी आलोचना का बड़ा विषैला प्रभाव उनके अन्तर्मन पर पड़ता है। उनका मानसिक संस्थान एक दम विक्षुब्ध हो उठता है और वह विद्रोह कर बैठते है। 'अहं' की रक्षा के लिये मनुष्य कुछ का कुछ करने को तत्पर रहता है पचास प्रतिशत विवाहो के असफल होने का एकमात्र कारण अपने जीवन साथी के 'अहं' पर हमला करने का है।


पति-पत्नी को इस सम्बन्ध में बड़ा सतर्क रहना चाहिए। यदि आप पति हैं तो भूल कर भी पत्नी के कामो की आलोचना न कीजिए। दोष निकालना, अधिक टीका-टिप्पणी करना, अपने विवाहित जीवन को काले बादलों से आच्छादित कर लेना है। यदि सम्भव हो तो इस अप्रिय कार्य को बिल्कुल ही न करें। यदि जीवन साथिन में कुछ कमजोरियाँ हैं तो उनकी ओर एक हल्का-सा संकेत यथेष्ट होता है। प्रेमपूर्ण सहानुभूति से स्निग्ध स्वर में जब कभी आपकी सहधर्मिणी अच्छी मुखमुद्रा में हो, सरलता से उनकी कमजोरियों पर प्रकाश डाल दीजिए। आलोचना ऐसे ढंग से की जाय कि उसका प्रभाव सृजनात्मक हो, वह केवल दूसरे को नीचा दिखाने या मजाक बनाने के लिए न हो, उनमे व्यंग्य-बाण न हो, कडवाहट न हो, शुष्कता न हो। आलोचना ऐसी हो जो अहं को मर्माहित न करे वरन् उसे सहारा देकर ऊपर उठाये, उन्नत एवं परिपुष्ट होने में सहायता करे। आपकी आलोचना सुनकर आपकी पत्नी आपसे घृणा करने के  स्थान पर आपको अपना हितैषी मान कर आपके कथनानुसार कार्य करने मे गर्व का अनुभव करे एवं क्रमश वह अपनी कमजोरियाँ दूर करती जाय।


उदारहणार्थ मान लीजिये, पत्नी ने भोजन अच्छा नहीं बनाया रोटियाँ जली हुई हैं, दाल मे नमक अधिक है और वह कुछ क्रुद्ध भी है। क्रोध की अवस्था में यदि आप आलोचना करने बैठ जायेंगे, तो कदापि उसका अच्छा प्रभाव न पड़ेगा। उल्टी पत्नी और नाराज होगी। जब उनका क्रोध शान्त हो ले, तब आप आलोचना करने बैठे, वह भी इस प्रकार मानो आप कोई सलाह उनके भले के लिये दे रहे हैं। उन्हें यह भ्रम न हो कि आप उन्हें नीचा समझते है और कुछ सिखलाना चाहते हैं। आप कहिए, आज आपका भोजन उस उच्च श्रेणी का नहीं बना है, जैसा प्रायः रहता है। आज शायद कुछ और काम बीच में आ पड़ा हो आप जैसा भोजन अन्यत्र दुष्प्राप्य है, सायं काल का भोजन बहुत ही उत्तम बनेगा।


व्यक्तिगत आलोचना, चाहे आप किसी की करें, यह ध्यान रखिए कि कही वह 'अहं' पर चोट तो नहीं कर रही है। यदि आपकी आलोचना अहं पर प्रभाव डाल रही है. तो इसका प्रत्यक्ष बुरा प्रभाव होगा। हो सकता है कलह बढ़ती जा या तलाक का अवसर भी आ जाय। प्राय स्त्रियां भावुक होती है और उन पर तनिक-सी भी आलोचना का कटु प्रभाव हो सकता है। प्रत्येक पति का कर्तव्य है कि. वह अपनी पत्नी के गर्व का उसके अहं का रक्षक बने।


प्रश्न है कि इस अहं की रक्षा क्योंकर की जाय ? आप पत्नी के साधारण कार्यों की तारीफ कीजिए। बढ़ावा दीजिए और कभी-कभी उसे प्रोत्साहन देने के लिए उसकी प्रशंसा कीजिए तारीफ करना, स्तुति के वाक्य कहना, बढ़ावा देना, खुशामद करना, स्त्री के गर्व की रक्षा के लिए वैसा ही जरूरी है, जैसे जीवन के लिए श्वास-प्रश्वाँस यदि पति इस गर्व की रक्षा का ध्यान रखें तो समाज मे फैलने वाले अनेक उपद्रव, तलाक, कलह इत्यादि रुक जायें


विवाह विज्ञान के एक आचार्य का मत है- 'सफल पति बनने के लिए स्त्रियों की खूबियों का बखान करो, उसका आदर करो अपनी प्रसन्नता प्रकट करो और इन सबके लिए उसकी अकारण प्रशंसा भी करो। यह समझकर चुप रह जाने की भूल न करनी चाहिए कि यह तो उसका कर्त्तव्य ही है। अपने कपड़ो और वेश पर सदा ध्यान रखो। स्त्री यदि अपने सौन्दर्य की चिन्ता करती है. अगर तुम्हारी प्रसन्नता के लिए उसकी वृद्धि के लिए वह निरन्तर नेष्टा करती है, तो इसका यह अर्थ है कि सौन्दर्य का मूल्य समझती है और दूसरे को भी साफ-सुथरे देखना पसन्द करती है।

यदि पति-पत्नी एक दूसरे के मनोभावों को समझे और उनका समुचित आदर करें तो कोई भी विवाह असफल न हो।


अपनी पत्नी से शिष्ट व्यवहार


अपनी पत्नी से भी सभ्यता का व्यवहार ही रखिये। जो पुरुष कभी-कभी उन पर हाथ उठा बैठते हैं, अपनी समझ कर तिरस्कार करते हैं, उनकी बेइज्जती करते रहते हैं, वे अशील हैं। गुप्त मन में उनकी स्त्रियों उन्हें दुष्ट, राक्षस-तुल्य समझती हैं। ऐसा प्रसंग ही मत आने दीजिए कि नारी को मारने-पीटने का अवसर आये। उसे अपने आचार, व्यवहार, प्रेम भरे सम्बोधन से पूर्ण सन्तुष्ट रखिये। पत्नी की भावनाओ की रक्षा, उसके गुणों का आदर, उसके शील-लज्जा व्यवहार की प्रशंसा मधुर सम्बन्धों का मूल रहस्य है पत्नी आपकी जीवन सहचरो है। अपने सद्व्यवहार से उसे तृप्त रखिये।


पत्नी पति की प्राण है, पुरुष की अन्द्धांगिनी है। पत्नी से बढ़कर कोई दूसरा मित्र नहीं पत्नी तीनों फलो धर्म, अर्थ, काम को प्रदान करने वाली है और संसार सागर को पार करने में सबसे बढ़ी सहायिका है। फिर, किस मुँह से आप उसका तिरस्कार करते हैं।


उससे मधुर वाणी में बोलिए। आपके मुँह पर मधुर मुस्कान हो, हृदय में सच्चा निष्कपट प्रेम हो, वचनों में नम्रता, मृदुलता, सरलता, प्यार हो। स्मरण रखिए, स्त्रियो का 'अहं' बड़ा तेज होता है, वे स्वाभिमानी, आत्माभिमानी होती हैं। तनिक सी अशिष्टता या फूहड़पन से क्रुद्ध होकर आपके सम्बन्ध में घृणित धारणाएँ बना लेती हैं। उनकी छोटी-मोटी माँगों या फरमाइशों की अवहेलना या अवज्ञा न करें। इसमे बड़े सावधान रहे। जो स्त्री एक छोटे से उपहार से प्रसन्न होकर दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने को प्रस्तुत रहती है, उसके लिये सब कुछ करना चाहिये।


दाम्पत्य जीवन का सच्चा सार


संसार में एक दूसरे के अनुकूल स्वभाव वाले हर प्रकार से सन्तुष्ट, सन्तुलित, सुखी विवाहित जोड़े बहुत कम हैं जो युवक विवाह से पूर्व अपनी धर्मपत्नी के विषय में सिनेमा के रोमानी जगत जैसी सुमधुर कल्पनाएँ बना कर गगन-विहार किया करते हैं, उन्हें प्रायः विवाहित जीवन में भारी निराशा का सामना करना पड़ता है। पाश्चात्य देशों में विवाहों की अपेक्षा तलाको की संख्या उत्तरोत्तर अभिवृद्धि पर है। इसका कारण विवाहित जीवन में पारस्परिक उत्तरदायित्व की कमी और असन्तोष है।


एक शिक्षित युवक जब विवाह करता है तो उसके मन में अपनी पत्नी का एक आदर्श रूप उपस्थित रहता है वह उसे पुष्प सी कोमल चन्द्रमा सी सुन्दर, विद्या बुद्धि मे चतुर, संगीत-नृत्य विधाओं में निपुण, हर प्रकार से सरल, साधु, मीठे स्वभाव की कल्पना करता है। वह सिनेमा के चलचित्रों में कार्य करने वाली नर्तकियों को देखते-देखते एक ऐसा आदर्श मन में बसा लेता है जो कभी पूर्ण नहीं हो पाता। यह बड़ी-बड़ी आशाएँ, स्वप्नों के महल, कपोल कल्पनाएँ, रोमांस, मनोरंजन की आशाएँ वैवाहिक जीवन में प्रविष्ट होते ही टूटने लगते हैं। मनोविज्ञान का यह अटूट नियम है कि दूर से स्त्री को पुरुष तथा पुरुष को स्त्री आकर्षक प्रतीत होती है। विवाह के कुछ मास एक प्रकार के उन्माद में व्यतीत होते हैं। तत्पश्चात् मन ऊबने लगता है। पुरुष स्वभाव से नवीनता का उपासक है। समीप रहने वाली वस्तु उसे पुरानी नीरस, आकर्षणविहीन, फीकी-सी प्रतीत होने लगती है। यही दाम्पत्य जीवन के असन्तोष का कारण है, जिसकी वजह से तलाक जैसी अप्रिय बातें होती हैं। इस वृत्ति से संघर्ष कर उस पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है।


विवाह से पूर्व स्त्री को पुरुष तथा पुरुष को स्त्री को देख लेने, परखने, उसके विषय में दूसरों से सलाह लेने, यदि सम्भव हो सके तो परीक्षा करने, हर प्रकार की सतर्कता, दूरदर्शिता बरतने की गुंजायश है। वर-वधू को चाहिए झूठी शर्म त्याग कर एक दूसरे के गुण, कर्म, स्वभाव का ज्ञान प्राप्त करें। समस्वभाव के विवाहित जोड़े प्रसन्न रहते हैं। यदि स्वभाव एक जैसा न हो, तो दूसरे साथी को उसका सन्तुलन करना होता है। एक सी रुचि के दो व्यक्ति जीवन में सरलता से जी सकते हैं। एक शिक्षित तथा दूसरा अशिक्षित होने से अनेक बार दृष्टिकोण में विभिन्नता तथा कटुता उत्पन्न होकर दाम्पत्य माधुर्य को नष्ट कर देती है। अतएव वर-वधू को प्रारम्भ में अति सावधानी एवं सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।


अपने साथी के शरीर, मस्तिष्क, विचार तथा स्वभाव का ज्ञान प्राप्त कीजिये वह नीरस प्रकृति है या हँसमुख, मजाकिया 7 वह गम्भीर अध्ययनशील है या सदैव जल्दबाजी में रहने वाला तीव्र भावों में वह जाने चाला ? वह उदार है या संकुचित, जिद्दी निश्चयी, पुरुषार्थी मत्त या स्फूर्तिदान वह किसी कार्य को लगातार करता है या बीच में ही छोड़ भागने का अभ्यस्त है ? उसकी आर्थिक स्थिति तथा आवश्यकताएँ कैसी है इन तथा इसी प्रकार के अनेक प्रश्नो पर विवाह से पूर्व ही खूब देखभाल तथा विचार-विनियम करने की आवश्यकता है।


उत्तरदायित्व का निर्वाह विवाह के पश्चात् आप पर एक बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है। पति को पत्नी के स्वास्थ्य, आराम, मानसिक तथा शारीरिक सुख का ध्यान रखना है तथा पत्नी को पति के कार्य, पेशे, भोजन, मनोरंजन, बच्चों की देखभाल, गृहप्रबन्ध इत्यादि में अपने पृथक्-पृथक् उत्तरदायित्व का निर्वाह करना है। पति का कार्यक्षेत्र अधिकतर घर के बाहर संघर्षपूर्ण कार्यस्थल है जहाँ उसे जीविका उपार्जन करने के हेतु कठोर परिश्रम, कार्यदक्षता, कौशल प्रदर्शित करना होता है। उसका उत्तरदायित्व अधिक है, क्योंकि उसे जीविका कमाने का कार्य तत्परता से करना होता है। पत्नी अपने गृहप्रबन्ध, मृदुल, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार तथा सौन्दर्य से घर को स्वर्ग बनाती है।


"हमें अपने विवाहित जीवन में अपनी जिम्मेदारी निभानी है, अपने जीवन-साथी की निर्बलताओं को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से निकालना है, उसके स्थान पर उत्तम गुणों का समावेश करना है, हम सब तरह के असन्तोषों को दूर करेंगे, परस्पर एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझेंगे, आपसी गलतफहमियों को न बढ़ने देगे, यह मानकर दाम्पत्य जीवन में प्रविष्ट होना श्रेयस्कर है। यह समझौते की भावना सुखमय दाम्पत्य जीवन का मूल मन्त्र है।


कौन पति-पत्नी नहीं झगड़ते ? विचारों में अन्तर कहाँ नहीं है ? एक से स्वभाव कहाँ मिलते है ऐसा कौन है जिसमें कमजोरियाँ, दुर्गुण, शारीरिक या मानसिक दुर्बलताएँ नहीं है ? यदि आप एक-दूसरे की दुर्बलताओं पर कलह करेंगे, तो अल्पकाल में असन्तोषदायक महा भयंकर राक्षस आपका विवाहित जीवन कटु बना देगा। आपका सौन्दर्य और प्रेम पिपासु मन एक स्त्री की सुन्दरता छोड़ दूसरी दूसरी से तीसरी, चौथी न जाने कहाँ-कहाँ मारा-मारा फिरेगा। मन की बागडोर ढीलो न कीजिए। अपने जीवन-साथी में ही सरलता, सौन्दर्य, कौशल, चतुरता, माधुर्य खोज निकालिये। उसकी अपूर्णता को पूर्ण बनाइये अशिक्षित है तो शिक्षित कीजिये, पुस्तकें, समाचार-पत्र, कहानियाँ उपन्यास पढाइये। यदि स्वास्थ्य खराब है, तो स्वास्थ्य रक्षा, व्यायाम, पौष्टिक भोजन और दुश्चिन्ताओं को दूर कर उसे सुन्दर बनाइये, किन्तु उसे त्यागने का भाव कदापि मन में उदित न होने दीजिये। त्यागने की बात सोचना, एक दूसरे की सहायता न करना, शील-सौन्दर्य की अभिवृद्धि न करना, विद्या प्रदान न करना पति के लिए लज्जा के योग्य है। दो-सूत्र


इस स्थिति पर विजय प्राप्त करने के दो मार्ग -प्रथम वह है जो दाम्पत्य जीवन का सच्चा सार है— अर्थात् यह दृढ प्रतिज्ञा और उसका निर्वाह कि हम दोनों पति-पत्नी एक दूसरे का परित्याग नहीं करेंगे हम प्रत्येक प्रेम, सहानुभूति, त्याग, शील, आदान-प्रदान, सहायता के टूटे हुए तार को गाँठ लेंगे हम विश्वास, आशा, सहिष्णुता, अवलम्ब उपयोगिता की गिरी हुई दीवार के प्रत्येक भाग की निरन्तर प्रयत्न और भक्ति से मरम्मत करेंगे, हम एक दूसरे से माँफी माँगने और समझौता करने को सदैव प्रस्तुत रहेंगे। सुलह दूसरा उपाय है पति-पत्नी की एक दूसरे के प्रति अनन्य भाव। पति-पत्नी एक दूसरे को लीन कर दें समा जायें, लय हो जायें, आधीनता की भावना छोड़ समभाव की पूजा करें। विवाह का आध्यात्मिक अभिप्राय दो आत्माओं का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक सम्बन्ध है। इसमें दो आत्माएँ ऐसी मिल जाती है कि इस पार्थिक जीवन तथा उच्च देवलोक में भी मिली रहती है। यह दो मस्तिष्कों, दो हृदयो, आत्माओ तथा साथ ही साथ दो शरीरों का एक-दूसरे में लय हो जाना है। जब तक यह स्वरैक्य नहीं होता। विवाह का आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता विवाहित जोड़े का परस्पर वह विश्वास और प्रतीत होना आवश्यक है, जो दो हृदयों को जोड़कर एक करता है। जब दो हृदय एक-दूसरे के लिये आत्म समर्पण करते है, तो एक-दूसरे का कोई तीसरा व्यक्ति बिगाड़ने नहीं पाता है केवल इस प्रकार ही वह आध्यात्मिक दाम्पत्य अनुराग सम्भव हो सकता है, जिनका समझना उन व्यक्तियों के लिये कठिन है, जो अपने अनुभव से इस प्रेम और समझौते के इस पारस्परिक उत्तरदायित्व तथा सम्मान के, आशक्ति और आत्म सन्तोष के मानव तथा दिव्य प्रेरणाओं के विस्मयोत्पादक संयोग को, जिसका नाम सच्चा विवाह है, नहीं जानते।


एक-दूसरे की सहायता करते हुए, कष्टों को दूर करते हुए आर्थिक पूर्णता की ओर चलने से ही पारस्परिक सन्तोष प्राप्त होता है। मनु ने लिखा है कि जिस परिवार में पाँत और पत्नी सन्तुष्ट रहते हैं, वहाँ नित्य ही कल्याण होता रहता है। जहाँ स्त्रियों की पूजा है वहाँ देवताओं का वास होता है और जहाँ उनका सत्कार नहीं होता वहाँ की प्रत्येक क्रिया निष्फल होती है। जिस कुल को खियों में शोक होता है अर्थात् जिस कुल में स्त्रियाँ सताई जाती है शोकातुर, दुःखी, संतप्त रहती हैं, वह कुल नष्ट हो जाता है। खियाँ घर की लक्ष्मी हैं। जहाँ वे प्रसन्न रहती है, उस कुल को निरन्तर वृद्धि होती है। पति को पत्नी का तथा पत्नी को पति के सुखवर्द्धन का प्रयत्न करना चाहिये।


झगड़ों का निपटारा शीघ्र करें


पति-पत्नी के झगड़े कभी-कभी थोड़ी-थोड़ी बात में हो जाया करते हैं। छोटे-छोटे झगड़े यदि शान्त न किये जायें, तो विकट रूप ले लेते हैं। प्रायः पति मन ही मन अपने को बड़ा समझता रहता है। कलह होने पर वह सोचता है कि पत्नी को स्वयं उसे मनाना चाहिए, क्षमा-याचना करनी चाहिए। इसी प्रकार पत्नी का अहं कहना है कि वह पति को प्रेम करती है। पति उसे मनाते, वह क्यों माँफी माँगे ये दोनो ही दृष्टिकोण व्यर्थ और थोथे हैं। अतएव हर दृष्टि से त्याज्य है।


कभी-कभी पति को पत्नी के पत्नी को पति के चरित्र पर सन्देह हो जाता है भ्रम और सन्देह के जड़ पकड़ते ही गलतफहमी बढ़ती है। कालान्तर में वह एक जटिल मानसिक ग्रन्थि बन जाती है। गलतफहमी के कारण अनेक पति पत्नियों की हत्या कर डालते देखे गये हैं। चरित्र पर किया गया सन्देह अनेक बार झूठा सिद्ध होता है। पति-पत्नी को चाहिए कि खुल कर उसका निवारण कर लें। जो दोषी हो दूसरे से माफी मांग ले कलह और मनमुटावों को जल्दी से जल्दी तोड़ देने को प्रस्तुत रहना चाहिए। यदि पति-पत्नी में सच्चाई, ईमानदारी, एक दूसरे के प्रति वफादारी का भाव है, तो वे अवश्य अपने झगड़ों का का निवारण कर लेंगे। अपना दृष्टिकोण एक दूसरे के प्रति उदार, सहानुभूतिपूर्ण एवं कोमल रखिए। दूसरे शब्दों में एक दूसरे के लिए त्याग करने के लिए तैयार रहिए एक दूसरे के सुख-दुःख में साथ देना, झगड़ों को निपटाना, अवगुणों को दूर करना प्रेम का एक आवश्यक अंग है।


स्त्रियों का अहं बड़ी जल्दी घायल होता है। तनिक सी बात उनके मन में लग जाती है। स्वभावतः कोमल, लज्जाशील, सुकुमार होने के कारण वे जरा सी तिरछी बात में बुरा मानने, रूठने और नाराज होने को तैयार रहती है। उनकी पसन्द तथा आपकी पसन्द में अन्तर रहता है। संभव है जो बातें आपको प्रिय लगे, जो आपकी दिलचस्पी के विषय हो, उनमें वे तनिक भी दिलचस्पी न लें।


मनोविज्ञान का यह अटल सिद्धान्त है कि बिना चाही हुई राय, आचरण योग्य बातें शिक्षायें सम्मतियाँ, योजनाएँ, आलोचनाएँ दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता, चाहे वे कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो। दूसरों की योजना या राय स्वीकार करने में हमारे 'अहं' भाव को चोट लगती है और हम हेठी समझते है। अपनी पराजय का भाव किसी को पसन्द नहीं आता।


अतएव कलह दूर करने के लिए आप सावधान रहिये। यदि आप पत्नी के कामों में अधिक हस्तक्षेप करेंगे या पत्नी पति के कार्यों में अनावश्यक टीका-टिप्पणी करेगी, तो उत्तेजना उत्पन्न होगी। तब पति उत्तेजित हो तो पत्नी को और जब पत्नी उम्र हो तो पति को पूर्ण शान्ति, सहानुभूति और सहनशीलता का परिचय देना चाहिए। दो गर्म या तोखी बात आपका जीवन-साथी कह दे तो उसे सहन करने में ही भलाई है। पति-पत्नी के जीवन मे सहिष्णुता का मूल्य अत्यधिक है। सहन कीजिए, उखाड़ये मत। यदि क्रोध, ईर्ष्या, नाराजगी के भाव को सहन कर कुछ दिन व्यतीत होने दिया जाय, तो समय के प्रभाव पुराने घाव स्वयं अच्छे हो जाते है। कटुता घुल जाती है। तनिक सोचकर देखिये, नाराज होने वाली आखिर आपकी पत्नी ही तो है। वह आपको प्रेम करती है, दिन-रात सेवा में जुटी रहती है, आपके बच्चों का पालन-पोषण, शिक्षण इत्यादि करती है यदि वह कुछ कह ही बैठी या उत्तेजना मे नाराज हो गई तो लौटकर उसे अपशब्द कहना, मारपीट बैठना, मानहानि करना कैसा अविवेकपूर्ण कार्य है ? इसी प्रकार पत्नी को यह स्मरण रखना चाहिए कि पति उसके तथा बाल बच्चों की उदर पूर्ति के लिये दिन-रात खून-पसीना एक करके कड़ा परिश्रम करता है, संसार के अनेक संघर्षो को झेलता है, दफ्तर में बीस बाबू खरी-खोटी सुनता है, यदि वह नाराज होकर कुछ कह बैठे तो इसमें उलट कर नाराज होने की कौन-सी बात है ? पत्नी का प्रेम, मृदुलता, सौहार्द, सहानुभूति, सज्जनता के गुण है, जिनसे उसका क्रोध स्वयं विलुप्त हो जायगा।


पाणिग्रहण के प्रथम मंत्र से ही स्त्रियों को यह उपदेश दिया जाता है कि वह गृहस्थ धर्म को अच्छी तरह प्रतिपालित करे और पाणिग्रहण करने वाले व्यक्ति के साथ इस संसार में सुख-सौभाग्य की वृद्धि करे। दूसरे मन्त्र का तात्पर्य यह होता है कि पति के घर जाकर अपने क्रोध एवं अमर्ष की संचित वासनाओं को जलाकर दूर कर दें, कभी भूलकर भी क्रोध, ईर्ष्या को दृष्टि से पति के प्रति या पति के स्वजनों के प्रति न देखे, प्रतिकूल आचरण न करें। ऐसा व्यवहार करें कि पति, पड़ौसी, सम्बन्धी यहाँ तक कि पशु आदि की भी मंगलकारिणी बने, क्योंकि पशु ही गृहस्थ पति के घर के सौभाग्यवर्द्धक एवं प्रतिष्ठा के सूचक है। नवोदा मे यही भावना होनी चाहिये। तीसरे मंत्र में पारिवारिक कठिनाइयों पर पति के साथ मनोयोगपूर्वक सहयोग का संकेत है।


एक मन्त्र का संक्षेप में तात्पर्य इस प्रकार है- "प्रियतमे । तुम्हें मैं केवल अपने सुख भोग और सेवा के लिए नहीं वरण कर रहा हूँ। तुम मेरे पिता की सेवा करना, मेरी माता बहिन तथा भाइयों की सुख-सुविधा का भी तुम्हें ध्यान रखना होगा।"


पूर्व काल में स्वार्थत्याग और सेवा का भाव कैसा महत्त्वपूर्ण था, यह उपरोक्त मंत्रों से विदित हो जाता है। इस पुनीत कर्त्तव्यक्षेत्र में कलह, क्लेश, ईयां द्वेष के लिए स्थान नहीं होना चाहिए।


पत्नी को चाहिए कि प्रेमिका के रूप में पति से व्यवहार करे। आजकल दाम्पत्य जीवन में जो विषमता और असन्तोष दिखाई देता है उसका कारण यही है कि पति-पत्नी के मध्य वैसा निस्वार्थ सेवामय, त्यागपूर्ण प्रेमपूर्ण व्यवहार नहीं होता जो विवाहोपरान्त कुछ वर्ष तक रहता है। स्री प्रेम की देवी है। उसका जीवन प्रेम से हो है। पुरुष बाह्य जगत में उलझा रहता है। वह विशुद्ध भाव से अनुरक्त पत्नी के लिए संसार के सब कष्टो को उसके प्रेम के लिए सहन करता है। अतः सब प्रकार के झगड़ो मनोमालिन्य और कलह से प्रेमपूर्ण सहानुभूति से ही काम लेकर एक दूसरे की गलतफहमी दूर करनी चाहिए।


अपने हृदय को विशाल कोजिए और ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष, संदेह से ऊपर उठिये विवाहित जीवन एक समझौता है। शोध और ईर्ष्या से वह संकुचित होता है। अतएव दूसरों की बुराई देखना, चुगली करना, गुप्तरीति से चरित्रहीनता की चर्चा, पतन या गिरावट में प्रसन्नता इत्यादि दुर्गुणों को त्याग दीजिए। पतित व्यक्ति की टीका-टिप्पणी से आपको कोई लाभ नहीं हो सकता, केवल संकीर्णता ही उत्पन्न होती है। अतः परिवार के अन्य व्यक्तियों तक की बातें स्वीकार करते हुए दूसरो के विचारों एवं भावों की रक्षा करते हुए, सहनशीलता का परिचय देना चाहिए। पतियों को सहनशीलता का पालन करना चाहिए। यदि कभी उब बातें भी हो जायें, तो व्यर्थ मानसिक क्लेश बढ़ाने से कोई लाभ नहीं है। छोटे-छोटे झगड़े तो चुप रहने और थोड़े समय के प्रवाह से स्वयं विलुप्त हो जाते हैं।


सास-बहू के झगड़े- बहुसंख्यक परिवारों में सास-बहू के झगड़े चल रहे हैं। इसके अनेक कारण है। सास बहू को अपने नियन्त्रण में रखकर अनुशासन करना चाहती है। अपनी आज्ञानुसार उससे कार्य कराना चाहती है। कभी-कभी वह अपने पुत्र को बहका कर बहू की मरम्मत कराती है। प्रायः देखा गया है कि जहाँ कोई पुरुष स्त्री को कष्ट देता है, तो उसके मध्य में अवश्य कोई स्त्री सास, ननद या जिठानी रहती है। स्त्रियों में ईर्ष्या भाव अत्यधिक होता है। यह का व्यक्तित्व प्रायः लुप्त हो जाता है तथा उसे रौरव (नर्क) की यन्त्रणाएँ सहन करनी पड़ती है।


कहीं पर पति बहू के इंगित पर नृत्य करता है और उसके भड़काने से वृद्धा सास पर अत्याचार करता है। वृद्धा से कठिन कार्य कराया जाता है। वह धुंए में परिवार के निमित्त भोजन व्यवस्था करती है, जबकि बहू सिनेमा देखने या टहलने के लिए जाती है।


ये दोनों ही सीमाएँ निंद्य है। सास बहू के सम्बन्ध पवित्र हैं। सास स्वयं बहू को देखने के लिए लालायित रहती है। उसके लिए वह दिन बड़े गौरव का होता है, जब घर बहूरानी के पदार्पण से पवित्र होता है। उसे उदार, स्नेही, बड़प्पन से परिपूर्ण होना चाहिए। बहू की सहायता तथा पथ-प्रदर्शन के लिए कार्य करना चाहिए। छोटी-मोटी भूलों को सहृदयता से माफ कर देना चाहिए। इसी प्रकार यहू को सास में अपनी माता के दर्शन करने चाहिए और उसकी वही प्रतिष्ठा करनी चाहिए, जो वह अपनी माता की करती रही है। यदि पुरुष माता को माता के स्थान पर पूज्य माने और पत्नी को पत्नी के स्थान पर जीवन सहचरी, मिष्ठभाषिणी प्रियतमा माने तो ऐसे संकुचित झगड़े बहुत कम उत्पन्न होगे।


ऐसे झगड़ों में पुत्र का कर्तव्य बड़ा कठिन है। उसे माता की मान-प्रतिष्ठा का ध्यान रखना और पत्नी के गर्व तथा प्रेम की रक्षा करनी है। अतः उसे पूर्ण शान्ति और सहृदयता से कर्तव्य भावना को ऊपर रखकर ऐसे झगड़ो को शान्त करना उचित है। किसी को भी अनुचित रीति से दबा कर मानहानि न करनी चाहिए। यदि पति कठोर, उय लड़ने वाले स्वभाव का है, तो पारिवारिक शान्ति और समृद्धि भंग हो जायेगी। प्रेम और सहानुभूति से दूसरों के दृष्टिकोण को समझकर बुद्धिमत्ता से अग्रसर होना चाहिए।


ननद-भौजाई के झगड़े प्रायः देखा जाता है कि जहाँ ननदे अधिक होती है या विधवा होने के कारण मायके में रहती है, वहाँ बहू पर बहुत अत्याचार होते हैं। ननद-भाभी के विरुद्ध अपनी माता के कान भरती और भाई को भड़काती है। इसका कारण यह है कि बहिन भाई पर अपना पूर्ण अधिकार समझती है और अपने गर्व, अहं और व्यक्तित्व को अन्यों से ऊपर रखना चाहती है। भाई यदि अदूरदर्शी होता है, तो बहिन की बातों में आ जाता है और बहू अत्याचार का शिकार बनती है।


इन झगडों में पति को चाहिए कि पृथक्-पृथक् अपनी बहिन और पत्नी को समझा दे और दोनों के स्वत्व तथा अहं को पूर्ण रक्षा करे। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से दोनों का अध्ययन कर परस्पर मेल करा देना ही उचित है। मेल कराने के अवसरों की ताक में रहना चाहिए। दोनों को परस्पर मिलने, बैठने, साथ-साथ टहलने जाने एक-सी दिलचस्पी विकसित करने का अवसर प्रदान करना उचित है यह नहीं होना चाहिए कि पत्नी ही दोनों समय भोजन बनाती झूठे बर्तन साफ करतो, जिठानी के बच्चों को नहलाती घुलाती, आटा पीसती कपड़े धोती, दूध पिलाती या झाडू बुहारी का काम करती रहे। चतुर पति को चाहिए कि काम का बँटवारा कर दे। पत्नी को कम काम मिलना चाहिए क्योंकि उसके पास बच्चे भी पालने के लिए हैं। यदि कोई बीमार पड़ेगा, तो उसे उसका कार्य भी करना होगा।


वृद्धो का चिड़चिड़ापन और परिवार के अन्य व्यक्ति प्रायः देखा गया है कि आयु वृद्धि के साथ-साथ वृद्ध चिड़चिड़े नाराज होने वाले, सनकी, क्रोधी और सठिया जाते हैं। वे तनिक सी असावधानी से नाराज हो जाते हैं और कभी-कभी अपशब्दों का भी उच्चारण कर बैठते हैं। ऐसे वृद्ध क्रोध के नहीं, हमारी दया और सहानुभूति के पात्र है और हमें उनके साथ वही आचरण करना उचित है, जैसा बच्चो के साथ उनको विवेकशील योजनाओं तथा अनुभव से लाभ उठाना चाहिए और उनकी मूर्खताओं को उदारतापूर्वक क्षमा करना चाहिए।


वृद्धों को परिवार के अन्य व्यक्तियों के प्रेम और सहयोग की आवश्यकता है। हमें उनसे प्रीति करना, जितना हो सके आज्ञा पालन प्रतिष्ठा, उनके स्वास्थ्य का संरक्षण ही उचित है। खाने के लिए कपड़ों के लिए तथा थोड़े से आराम के लिए वह परिवार के अन्य व्यक्तियों की सहानुभूति की आकाक्षा करता है। उसने अपने यौवन काल में परिवार के लिए जो श्रम और बलिदान किए हैं, अब उसी त्याग का बदला हमे अधिक से अधिक देना उचित है परिवार के संचालन की कुंजी उत्तम संगठन है। प्रत्येक व्यक्ति यदि सामूहिक उन्नति में सहयोग प्रदान करे, अपने श्रम से अर्थ संग्रह करे, दूसरों को उन्नति में सहयोग प्रदान करे, सब के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थो का बलिदान करता रहे तो बहुत कार्य हो सकता है।


स्वस्थ दृष्टिकोण दूसरों के लिए कार्य करना, अपने स्वार्थो को तिलांजिल देकर दूसरों को आराम पहुँचाना सृष्टि का यही नियम है। कृषक हमारे निमित्त अनाज उत्पन्न करता है, जुलाल वस्त्र बुनता है, दर्जी कपड़े सीता है, राजा हमारी रक्षा करता है। हम अकेले सब काम नहीं कर सकते हैं। मानव-जाति में पुरातन काल से पारस्परिक लेन-देन चला आ रहा है। परिवार में प्रत्येक सदस्य को इस त्याग, प्रेम, सहानुभूति की नितान्त आवश्यकता है। जितने सदस्य है सबको आप प्रेम-सूत्र में आवद्ध कर लीजिए। प्रत्येक का सहयोग प्राप्त कीजिए, प्यार से उनका संगठन कीजिए।


इस दृष्टिकोण को अपनाने से छोटे-बड़े सभी झगड़े नष्ट होते हैं। अक्सर छोटे बच्चों की लड़ाई बढ़ते-बढ़ते बड़ो को दो हिस्सो में बाँट देती है। पड़ोसियों में बच्चों की लड़ाइयों के कारण युद्ध उन उठता है। स्कूल में बच्चों की लड़ाई घरो में घुसती है। कलह बढ़कर मारपीट और मुकदमेबाजी की नौबत आती है। उन सबके मूल में संकुचित वृत्ति, स्वार्थ की कालिमा व्यर्थ वितंडावाद, दुरभिसन्धि इत्यादि दुर्गुण सम्मिलित हैं।


हम मन में मैल लिए फिरते हैं और इस मानसिक विष को प्रकट करने के लिए अवसरों की प्रतीक्षा में रहते हैं झगड़ालू व्यक्ति जरा-जरा सी बातों में झगड़ों के लिए अवसर ढूँढा करते हैं। परिवार में कोई न कोई ऐसा झगड़ालू व्यक्ति जिद्दी बच्चा होना साधारण-सी बात है। इन सब को भी विस्तृत और सहानुभूति के दृष्टिकोण से ही निरखना चाहिए।


हमें एक दूसरे के भावों, दिलचस्पी, रुचि, दृष्टिकोण, स्वभाव, आयु का ध्यान रखना अपेक्षित है। किसी को वृथा सताना या उससे अधिक कार्य लेना बुरा है उद्धत स्वभाव का परित्याग कर प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए। कुटिल व्यवहार के दोषों से जैसे अपना आदमी पराया हो जाता है. अविश्वासी और कठोर बन जाता है, वैसे ही मृदुल व्यवहार से कट्टर


शत्रु भी मित्र हो जाता है। विश्व में साम्यवाद को परिपुष्ट करने के लिए परिवार ही से श्रीगणेश करना उचित है। न्याय से मुखिया को समान व्यवहार करना चाहिए।


परिवार के युवक तथा उनकी समस्याएँ - प्रायः युवक स्वच्छन्द प्रकृति के होते हैं और परिवार के नियन्त्रण में नहीं रहना चाहते। वे उच्छृंखल प्रकृति के पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हलके रोमांस के वशीभूत होकर पारिवारिक संगठन से दूर भागना चाहते है। यह बड़े परिताप का विषय है।


युवकों के झगड़ों के कारण है-१- अशिक्षा, २- कमाई का अभाव, ३- प्रेम सम्बन्धी अड़चने-घर के सदस्यों की रूढ़िवादिता और युवकों की उन्मुक्त प्रकृति, ४- कुसंग पानी का स्वच्छन्दता प्रिय होना तथा पृथक घर में रहने की आकाक्षा ६ विचार सम्बन्धी पृथकता- पिता का पुरानी धारा के अनुकूल चलना, पुत्र का अपने अधिकारों पर जमे रहना, ७-जायदाद सम्बन्धी बँटवारे से झगड़े। इन पर पृथक-पृथक विचार करना चाहिए।


यदि युवक समझदार और कर्तव्यशील है, तो झगड़ो का प्रसंग ही उपस्थिति न होगा। अशिक्षित, अपरिपक्व युवक ही आवेश में आकर बहक जाते हैं और झगड़े कर बैठते हैं। एक पूर्ण शिक्षित युवक कभी पारिवारिक विद्वेष या कलह में भाग न लेगा। उसका विकसित मस्तिष्क इन सबसे ऊंचा उठ जाता है। वह जहाँ अपना अपमान देखता है, वहाँ स्वयं ही हाथ नही डालता।


कमाई का अभाव झगड़ों का एक बड़ा कारण है। निखट्टू पुत्र परिवार में सब की आलोचना का शिकार होता है। परिवार के सभी सदस्य उससे यह आशा करते हैं कि वह परिवार की आर्थिक व्यवस्था में अधिक ह यॅटायेगा जो युवक किसी पेशे या व्यवसाय के लिए प्रारम्भिक तैयारी नहीं करते, वे समाज में 'फिट' नहीं हो पाते। हमें चाहिए कि प्रारम्भ से ही घर के युवको के लिए काम तलाश करले, जिससे बाद में जीवन प्रवेश करते समय कोई कठिनाई उपस्थित न हो। संसार कर्मक्षेत्र है। यहाँ हम में से प्रत्येक को अपना कार्य समझना तथा उसे पूर्ण करना है। हम में जो प्रतिभा, बुद्धि, अज्ञात शक्तियाँ हैं, उन्हें विकसित कर समाज के लिए उपयोगी बनना चाहिए।


जरमी टेलर कहते हैं "जीवन एक बाजी के समान है। हार-जीत तो हमारे हाथ में नहीं है, पर बाजी का ठीक तरह से खेलना हमारे हाथ में है। यह बाजी हमें बड़ी समझदारी से, छोटी-छोटी भूलों से बचते हुए निरन्तर आत्म-विकास और मनोवेगों का परिष्कार करते हुए करनी चाहिए।


बटैण्ड रसेल ने लिखा है- "इस जगत् में सब से बड़ी तारीफ की बात यह है कि जिन लोगों में स्वाभाविक शक्ति की न्यूनता रहती है, यदि वे उसके लिए सच्चा साधन और अभ्यास करें, तो परमेश्वर उन पर अनुग्रह करता है।" वर्गसा ने भी निर्देश किया - "गुवा पुरुष बहुत से अंशो मे जो होना चाहे हो सकते हैं।" मैक्सिम गोर्की ने कहा है- "जीवन में शारीरिक और मानसिक परिश्रम के बिना कोई फल नहीं मिलता दृढ वित्त और महान उद्देश्य वाला मनुष्य जो चाहे कर सकता है।"


प्रतिभा की वृद्धि कीजिए आपको नौकरी, रुपया, पैसा, प्रतिष्ठा और आत्म सम्मान प्राप्त होगा। उसके अभाव में आप निखट्टू बने रहेंगे। प्रतिभा आपके दीर्घकालीन अभ्यास, सतत् परिश्रम, अध्यवसाय उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर है। प्रतिभा हम अभ्यास और साधन से प्राप्त करते हैं। मनुष्य की प्रतिभा स्वयं उसी के संचित कर्मों का फल है। अवसर को हाथ से न जाने दे, प्रत्येक अवसर का सुन्दर उपयोग करें और दृढ़ता, आशा और धीरता के साथ उन्नति के पथ पर अग्रसर होते जायें। स्वसंस्कार का कार्य इसी तरह सम्पन्न होगा।


पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्तव्य है-१-स्नेह, २-सम्मान तथा आज्ञा पालन जिस युवक ने पिता, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, वही आत्मिक शान्ति का अनुभव कर सकता है।


परिवार से युवक का मन तोड़ने में विशेष हाथ पत्नी का होता है, उसे अपने 'स्व' का बलिदान कर सम्पूर्ण परिवार की उन्नति का ध्यान रखना चाहिए। समझदार गृहिणी समस्त परिवार को सम्हाल लेती है।


आज के युवक-प्रेम-विवाह से प्रभावित है। जिसे प्रेम-विवाह कहा जाता है, वह क्षणिक वासना का तांडव, थोथी समझ की मूर्खता, अदूरदर्शिता है जिसे ये लोग प्रेम समझते हैं, वह वासना के अलावा और कुछ नहीं होता। उसका उफान मत होते ही प्रेम-विवाह टूक-टूक हो जाता है। चुनावों में भारी भूलें मालूम होती हैं। समाज में प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।


अनेक पुत्र विचारों में विभिन्नता होने के कारण झगड़ों का कारण बनते हैं सम्भव है युवक पिता से अधिक शिक्षित हो किन्तु पिता को अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है। पुत्र को उदारतापूर्वक अपने विचार पिता के समक्ष रखने चाहिए और उनसे आवश्यक परामर्श करना चाहिए।


दाम्पत्य मनोरंजन


पति-पत्नी का सम्बन्ध केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी होता है। मानसिक क्षुधा के निवारण के लिए मनोरंजन की आवश्यकता है जब अप एकान्त मे रहते है. तो क्या बाते करते हैं?


पति को सबसे अधिक आवश्यकता पत्नी के द्वारा किये गये मनोरजन की होती है। एक अंग्रेज लेखक ने लिखा है कि उसने निश्चय कर रखा था कि मैं तब तक विवाह न करूँगा, जब तक मुझे रसिक पत्नी न मिलेगी स्त्री के लिए हँसमुख तथा रसिक होना सुन्दर होने की अपेक्षा कई गुना अधिक अच्छा है। जो स्त्री या पुरुष रसिक, आमोदप्रिय आनन्दी स्वभाव के है, वे अपनी गरीबी में भी विवाहित जीवन का आनन्द लूटते हैं। लड़की के विवाहित जीवन का सुखमय या दुःखमय होना इस तत्व पर निर्भर करता है कि उसमे रसिकता, आमोद-प्रमोद, आशावादिता है या नहीं ? यदि वह अपने पति को एक बहुत ही हँसाने वाले हँसा हँसा कर लोट-पोट करने वाले के रूप में देख सकती है, तो समझ लो कि उसका दाम्पत्य जीवन सुखमय होगा। गृहस्थी को नष्ट करने वाली स्त्रियाँ प्रायः वे होती है, जो पति की प्रत्येक बात को गम्भीरता से देखती है, जो जब कभी भी उनके पति की दृष्टि किसी दूसरी स्त्री पर पड़ जाय या जब वह नियत समय पर घर न पहुँचे तत्काल लड़ना प्रारम्भ कर देती है या पति के उनकी कोई चीज लाना भूल जाने पर रोने लगती है। इसके विपरीत हँसमुख प्रकृति की स्त्रियाँ वृद्धावस्था तक जीवन का आनन्द लेती हैं।


ऐसे अवसर ढूंढिये जिसमें आपको एक दूसरे से मनोरंजन करने का अवसर प्राप्त हो सायंकाल दोनों हवाखोरी को जाइये और अपने हृदयों के भार को हल्का करते चलिये। भावी जीवन की आनन्ददायक कल्पनाओं में बड़ा रस और आनन्द आता है। यह गम्भीरता का समय नहीं है। अपने दफ्तर की चिन्ताओं को छोड़ कर हंसी-खुशी के दो क्षण व्यतीत कीजिये। उद्यान में नदी के तट पर प्रात: सायंकाल टहलने से न केवल स्वास्थ्य ही बनता है प्रत्युत जीवन में रस और ताजगी आती है।


जो दम्पत्ति संगीत में निपुण है, उन्हें संगीत द्वारा मन में उल्लास उत्पन्न करना चाहिये। ताश खेलिए, कैरम शुरू कीजिए, चौपड़ या घर के कोई खेल ले सकते हैं। बच्चों में दिलचस्पी लीजिए। अखबार पढ़ कर सुनाइए जिससे एक दूसरे का मनोरंजन हो सके। कहानी, कविता, उपन्यास इत्यादि एक दूसरे को पढ़ कर सुनाइए। कभी-कभी सम्मिलित रूप में सिनेमा भी देखने जा सकते है। छोटी-छोटी यात्राएँ मनोरंजन की वृद्धि करती हैं। भोजन पकाने में दिलचस्पी लेकर आप पत्नी को प्रोत्साहित कर सकते है। सम्मिलित चाय मिष्ठान्न या फल खाना सुन्दर है। यथासम्भव एक-दूसरे की आवश्यकताएँ देखकर मनोरंजन की योजना बनानी चाहिए। कला, साहित्य, शिल्प बागवानी, छोटे जानवर पालकर, घर मे अच्छी-अच्छी तरकारियाँ, सलाद, मिठाइयाँ बनाकर नए-नए स्थानों की सम्मिलित सैरकर जीवन में सरसता का संचार किया जा सकता है। प्रति वर्ष कुछ धन संचित कर नए-नए स्थानों पर भ्रमण करने की योजना रखनी चाहिए। सप्ताह में इतवार की छुट्टी घर से बाहर किसी सुन्दर प्राकृतिक स्थान पर व्यतीत की जा सकती है। 

कुछ व्यक्तियों में यह गलत धारणा बैठ गई है कि काम सेवन ही दाम्पत्य जीवन का मुख्य मनोरंजन है। विवाह को काम सेवन का पासपोर्ट समझना महा अनर्थकारी विचार है। काम सेवन की मर्यादाएँ निश्चित होनी चाहिए और कम से कम इस ओर प्रवृत्त होना चाहिए।


काम वासना स्त्री-पुरुष के पारस्परिक आकर्षण का एक मनोवैज्ञानिक कारण है। पति-पत्नी जितना कम संभोग करते हैं, उतना ही उनका एक दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है। प्रतिदिन सम्भोग का आनन्द लूटने वाले उस आकर्षण को नष्ट कर देते है, जो नियन्त्रित जीवन द्वारा प्राप्त होता है।


काम वासना की पूर्ति के पश्चात् व्यक्ति को मालूम होता है कि क्षणिक समागम के लिए उसने अपने जीवन का सार तत्व बहुमूल्य वीर्य नष्ट कर दिया है। अधिक वीर्यपात का अर्थ अनेक घृणित रोग होते हैं। ऐसा व्यक्ति वेश्यागामी बन जाता है और नपुसंकता, बहुमूत्र, गर्मी, सुजाक, कब्ज, प्रमाद तथा अन्य गन्दे रोगों का शिकार बन अल्पायु में ही काल-कलवित होता है। इस गन्दे मनोरंजन के प्रति सचेत रहना चाहिए।


भगवान का भजन, पूजन, कीर्तन, गायन, वादन, कविता पाठ, नृत्य, भ्रमण, घरेलू कार्यों में मनोरंजन के आनन्द लिये जा सकते है। अपने बच्चों भाई-बहिनों के साथ खेल कूदकर मन बहलाव किया जा सकता है।


उपयोगी मनोरंजन


हमारे परिवारों में आमोद-प्रमोद का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा जा रहा है, फलतः वह दुःख से भरे है। हम अपने परिवार से अनेक प्रकार के काम तो चाहते है, उसके लिए पुनः पुनः उनसे कहते हैं, किन्तु हम यह नहीं सोचते कि परिवार में मनोरंजन के कितने साधन हमने एकत्र किये हैं। सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार अशिक्षा के अन्धकार में डूबे है उनमें आमोद-प्रमोद की आवश्यकता ही अनुभव नहीं की जाती। जिन परिवारों में आमोद-प्रमोद का ध्यान नहीं दिया जाता, वहाँ के व्यक्तियों का जीवन बड़ा शुष्क और व्यस्त रहता है। वहाँ के व्यक्ति अल्पायु होते हैं।


अन्न-जल की तरह प्रफुल्लता- सरसता भी जीवन के सम्यक् संचालन हेतु आवश्यक है। इन्हें भी नियमित आहार जैसा ही अनिवार्य मानना चाहिए। इनके अभाव में जीवन शुष्क और बोझिल बन जाता है। इसलिए प्रत्येक परिवार के प्रधान सदस्यों को परिवारिक आमोद-प्रमोद की


व्यवस्था हेतु भी निरन्तर सजग तत्पर रहना चाहिए। आज सामान्यतः पारिवारिक मनोरंजन का एकमेव माध्यम सिनेमा रह गया है। किन्तु वस्तुतः सिनेमा स्वस्थ मनोरंजन अभी नहीं बन सका है और वह भौड़ा, स्तरहीन आर्थिक दृष्टि से महँगा तथा मानसिक बौद्धिक दृष्टि से हानिकर व दूषित माध्यम है हमारी अधिकांश वर्तमान फिल्ममेकर विषाक्त, विसंगत, विकृत एवं विचित्र कथानकों तथा दृश्यों का एक बेतुका संग्रह भर होती हैं। वे दर्शको के मस्तिष्क पर न केवल उत्तेजक, अवांछित प्रभाव डालती हैं, अपितु ये चिन्तन-शक्ति और विवेक-बुद्धि को भी दुर्बल बनाने वाली प्रेरणाओं से भरी होती है किन्तु हमारे परिवारों में आजकल मनोरंजन की व्यवस्था न किये जाने के कारण फिल्मे ही आमोद-प्रमोद का सर्वमान्य माध्यम बन चली है। जबकि यह मनोरंजन परिवार और समाज को पतन एवं विनाश के ही पथ पर ढकेलता है। अतः परिवार निर्माण के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था करने में चूकना न चाहिए।


मनोरंजन के सामान्य सिद्धान्तों को समझ लेना आवश्यक है। शारीरिक श्रम की प्रधानता वाले व्यवसायों में लगे लोगों के लिए आमोद-प्रमोद के साधन मानसिक होने चाहिए, जबकि मानसिक श्रम की प्रधानता वाले लोगों को शारीरिक हलचलों वाले कार्यों खेल-कूद, दौड़-भाग, टहलना आदि को मनोरंजन के लिये अपनाना चाहिए।


दिन भर शरीरश्रम कर पसीना बहाकर आजीविका उपार्जन करने वाले मनोरंजन के ऐसे साधन चुने जिससे उनके थके-मंदि शरीर को अधिक परिश्रम न करना पड़े। सर्वोत्तम तो यह कि ये लोग अवकाश का समय पुस्तकालय में बिताएँ, समाचार-पत्र, साप्ताहिक मासिक पत्र-पत्रिकायें पढ़ें नई-नई पुस्तकें पढ़े तथा मनोरंजन के साथ ज्ञानवृद्धि भी करें।


इन दिनों सरकार प्रौढ़ शिक्षा को उचित महत्व दे रही है। श्रमिक, मिल-कर्मचारी, मिस्त्री, किसान, फुटकर व्यापारी जिन्हें शारीरिक भाग-दौड़ खूब करनी होती है, मनोरंजन के लिये प्रौढ़-शिक्षा योजना का भी लाभ उठाये। जो साक्षर है वे इसके द्वारा आगे शन-विकास करें। दूसरो को पढ़ायें। पढ़ाने के माध्यम इनमें औपचारिक पाठ्य पुस्तकों जैसे नहीं रखे जाते हैं, अपितु मनोरंजक ढंग से ही अनौपचारिक शिक्षा पाठ्यक्रम तैयार होता है। अतः उसे भी अपने मनोरंजन तथा विकास का एक साथ साधन बनाया जा सकता है। कविताएँ, गीत, दोहे, चौपाई, लोकगीत आदि सुलभ एवं सात्विक मनोरंजन है।


इनके सरस अंशों का उच्च-स्वर से पाठ करने से थकान और शुष्कता दोनों दूर हो जाते है।


लिखा-पढ़ी क्लक, अफसरी करने वाले सायंकाल कुछ न कुछ खेलने की योजना बनाये हाकी, फुटबाल, टेबिल-टेनिस, बेडमिंटन आदि जो भी रुचि हो, खेलें, टहलने जाये भागे दौड़े, उछलें कूदें, शारीरिक व्यायाम अवश्य करें। सामूहिक मनोरंजन के लिए भोजन के उपरान्त रात्रि में पूरा परिवार एक साथ बैठे एक व्यक्ति किसी स्वस्थ मनोरंजक पुस्तक, समाचार-पत्र, पौराणिक, धार्मिक ग्रन्थ आदि का उच्च स्वर से पाठ करे, अन्य सुनें। यह क्रम बदलता रहे। यदि सामर्थ्य हो, तो धीरे-धीरे करके घर में एक घरेलू पुस्तकालय खोल लिया जाय व अच्छे साहित्य का आनन्द लूटा जाय। उपयोगी पत्र-पत्रिकायें मँगाई जाये।


प्रयास यह रहना चाहिए कि प्रत्येक परिवार में कम से कम, महिला समस्याओं का सुगम संगीत का अभ्यास हो ही। हारमोनियम, सितार, तानपूरा तबला, ढोलक जो भी वाद्ययन्त्र रुचे और सुलभ हो उसी पर गाना चाहिए। अच्छी कवितायें गायी जायें। संगीत और वादन, मनोरंजन के श्रेष्ठ सात्विक साधन हैं। रेडियो से भी अच्छी धुनें सीखी जाती रह सकती है। एक रेडियो खरीद लेने की व्यवस्था करने का आजकल प्रायः प्रत्येक परिवार प्रयास करता है। इस रेडियो का उपयोग पूरी तरह किया जाये। मात्र फिल्मी गाने सुनते रहने से ही समय न खोया जाये। अपितु रेडियो कार्यक्रमों को भरपूर उपयोग किया जाये, जिनसे कि मनोरंजन एवं जानकारी दोनों प्राप्त होते हैं। रेडियो में विविध शैक्षणिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम रखे जाते हैं। महिलाओं और बच्चों के अलग-अलग कार्यक्रम भी होते हैं। इनसे सुरुचिपूर्ण मनोरंजन एवं जानकार की वृद्धि दोनों लाभ हुआ करते हैं।


स्त्रियों का जीवन अधिक बँधा हुआ है। अतः उनके लिए छुट्टियों, पिकनिक, सैर आदि की अत्यन्त आवश्यकता है छुट्टी का दिन सदैव घर से बाहर बिताने का प्रबन्ध करना चाहिए। भोजन लेकर किसी उद्यान, झील नदी तट समीपस्थ जंगल या अन्य रमणीय प्राकृतिक स्थानों में जाया जाये वन-संचार के सामूहिक कार्यक्रम भी रखे जा सकते हैं। शिविर-जीवन का अभ्यास नितान्त आवश्यक है। ऐसे भ्रमण से शरीर और मन दोनों में नवीन स्फूर्ति का संचार होता है।कुछ लम्बी छुट्टियों में स्थान परिवर्तन किया जाये। पर्यटन से स्वास्थ्य संवरता है। प्रफुल्ल चित्त से घर-परिवार में नई ताजगी का संचार होता है। साप्ताहिक अवकाश के दिन भी भोजन के साथ ही खेलने का सामान साथ ले जाकर दिनभर का स्नान, भोजन, खेल संगीत, भ्रमण का कार्यक्रम रखा जा सकता है।


पव-त्यौहारों का वर्तमान बोझिल रूप तो सर्वथा त्याज्य और परिवार के सदस्यों को उनका यही स्वरूप भी भली-भाँति ज्ञात हो चुका है। वर्षो का उल्लास और प्रेरणा के विशिष्ट अवसरों के रूप में ही मनाया जाना चाहिए, ताकि हृदय में उत्साह और मन में आह्लाद का संचार हो उठे।

अपने मिशन के प्रत्येक सदस्य को विभिन्न संस्कार आयोजना तथा पर्वो को सर्वोत्कृष्ट रूप में मनाने की दिशायें प्राप्त है और ये आयोजन पारिवारिक एवं सामाजिक मनोरंजन तथा लोकशिक्षण के अनूठे माध्यम हैं। इनका समाज में सर्वत्र प्रचलन हो जाये, तो स्वस्थ्य मांगलिक मनोरंजन का अक्षय स्रोत ही सबके सामने खुल जाये और सिनेमा के विषाक्त मनोरंजन का आकर्षण भी उतना प्रबल तथा प्रभावकारी न रहे।


हर घर में विचार गोष्ठियों और छोटे आयोजनो का प्रचलन विस्तार हो। जन्मदिन, विवाह, पुंसवन, नामकरण अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ जैसे परिवारिक संस्कारों का समुचित आयोजन हो, जप, हवन, सहगान, प्रवचन क्रम चले तो प्रत्येक परिवार में श्रेष्ठ परम्पराओं की स्थापना का प्रकाश और प्रेरणा तो मिलेगी ही, उत्कृष्ट, सात्विक मनोरंजन की आवश्यकता भी पूरी होती चलेगी।


इसी प्रकार दीपावली, बसंतपंचमी, शिवरात्रि, होली, रामनवमी, गायत्री जयन्ती, गंगादशहरा, श्रावणी, कृष्णाष्टमी और विजयादशमी के पर्वो के सामूहिक आयोजन मनोरंजन एवं लोकशिक्षण को नई दिशाएँ उद्घाटित करने वाले सिद्ध होगे। स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण, सात्विक, आमोद-प्रमोद की व्यवस्था के अभाव में हमारा पारिवारिक जीवन शुष्क तथा बोझिल हो चला है। इस स्थिति में हम सबका पारिवारिक एवं सामाजिक भूमिका तथा दायित्व और अधिक महत्त्वपूर्ण हो उठा है। उसका निर्वाह करते हुए हम स्वयं को भी तथा औरो को भी आनन्द तथा नवीन शक्ति से भरते रह सकते है।



सोमवार, 10 जुलाई 2023

राधा कृष्ण

 राधा कृष्ण एक हिंदू देवी-देवता हैं। कृष्ण को  अक्सर स्वयं भगवान के रूप में सन्दर्भित किया गया है और राधा एक युवा नारी हैं, एक गोपी जो कृष्ण की सर्वोच्च प्रेयसी हैं। कृष्ण के साथ, राधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से कृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह माना जाता है कि कृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन राधा उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी देवी में सर्वोच्च देवी हैं।

 भगवान के ऐसे रूप की पूजा  काफी पहले  से की जाती थी। परन्तु सन् बारहवीं शताब्दी में जयदेव गोस्वामी ने प्रसिद्ध गीत गोविन्द लिखा, तो दिव्य कृष्ण और उनकी भक्त राधा के बीच के आध्यात्मिक प्रेम सम्बन्ध को सम्पूर्ण भारतवर्ष में पूजा जाने लगा।  यह माना जाता है कि कृष्ण ने राधा को खोजने के लिए रास नृत्य के चक्र को छोड़ दिया था।  राधा के नाम और पहचान को भागवत पुराण में इस घटना का वर्णन करने वाले छंद में गुप्त भी रखा गया है और उजागर भी किया गया है। यह भी माना जाता है कि राधा मात्र एक चरवाहे की कन्या नहीं हैं, बल्कि सभी गोपियों या उन दिव्य व्यक्तित्वों का मूल हैं जो रास नृत्य में भाग लेती हैं।

राधाकृष्ण को दो भागों में तोड़ा जा सकता है - कृष्ण, विष्णु के आठवें अवतार और उनकी सहचरी राधा। वृन्दावन में कृष्ण को कभी-कभी बाएं तरफ खड़ी राधा के साथ चित्रित किया जाता है। 

शक्ति और शक्तिमान की आम व्युत्पत्ति अर्थात भगवान में स्त्री और पुरुष सिद्धांत का अर्थ है कि शक्ति और शक्तिमान एक ही हैं। हर देवता की अपनी साथी जो उनकी 'अर्धांगिनी' या शक्ति होती है और उस शक्ति के बिना उन्हें कभी-कभी अपरिहार्य शक्ति रहित माना जाता है। हिन्दू धर्म में यह असामान्य बात नहीं है कि जब किसी एक व्यक्तित्व के बजाय एक जोड़ी की पूजा से भगवान की पूजा की जाती है, राधा कृष्ण की पूजा ऐसी ही है। वह परंपरा जिसमें कृष्ण की पूजा स्वयं भगवान के रूप में की जाती है और उनकी राधा को सर्वोच्च के रूप में पूजा जाता है। इस विचार को स्वीकार किया जाता है कि राधा और कृष्ण का संगम, शक्ति के साथ शक्तिमान के संगम को इंगित करता है। 

 दैवीय स्त्री  शक्ति के एक दिव्य स्रोत को प्रतिबिंबित करती है। जैसे "सीता राम से संबंधित हैं, लक्ष्मी नारायण की सहचरी हैं, उसी तरह राधा कृष्ण की सहचरी हैं।" चूंकि कृष्ण को ईश्वर के सभी रूपों का स्रोत माना जाता है, श्री राधा, उनकी सहचरी सभी शक्तियों का मूल स्रोत हैं अथवा दैवीय ऊर्जा का स्त्री रूप हैं।









“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...