यदि पुरुष स्त्री को अपनी बाहों में लेना चाहता है तो उसका तात्पर्य केवल वासना मात्र ही नहीं हो सकता है कई दफा इसका अर्थ होता है वह स्त्री को उसकी आत्मा तक स्पर्श करना चाहता है उस स्त्री के मन को टटोलना चाहता है जो अथाह प्रेम को अपने मन में कहीं दबा लेती है वह अपने सीने से लगाकर स्त्री की आंखों के आँसुओ को प्रेम से सोख लेना चाहता है उस स्त्री के सूखे वीरान पड़े जीवन को प्रेम की बारिशों में भिगो देना चाहता है यह वासना नही है उस पुरुष का अथाह समर्पण है उस स्त्री के लिए जिसे वह हृदय से प्रेम करता है.
गीता का एक-एक अध्याय अपने में पूर्ण है। गीता एक किताब नहीं, अनेक किताबें है। गीता का एक अध्याय अपने में पूर्ण है। अगर एक अध्याय भी गीता का ठीक से समझ में आ जाए--समझ का मतलब, जीवन में आ जाए, अनुभव में आ जाए, खून में, हड्डी में आ जाए; मज्जा में, मांस में आ जाए; छा जाए सारे भीतर प्राणों के पोर-पोर में--तो बाकी किताब फेंकी जा सकती है। फिर बाकी किताब में जो है, वह आपकी समझ में आ गया। न आए, तो फिर आगे बढ़ना पड़ता है।
शनिवार, 23 मार्च 2024
गुरुवार, 4 जनवरी 2024
नेटवर्क मार्केटिंग भारत में हमेशा से बड़ा ही विवादित रहा है।
अगर आप थोड़ा रिसर्च करेंगे तो पाएंगे कि अमेरिका, जापान, चीन, मलेशिया, कोरिया, रूस जैसे देशों में 20 से 30% लोग नेटवर्क मार्केटिंग से जुड़े हैं, लेकिन भारत में ये आंकड़ा 3% के आसपास है।
नेटवर्क मार्केटिंग में न आने की कई वजह हैं।
लोगों की नौकरी पे निर्भरता वाली सोच। लोग रिस्क लेने से कतराते हैं। बिज़नेस कोई भी हो, रिस्क तो थोड़ा या ज़्यादा होगा ही। मेहनत भी शुरुआत में नौकरी से ज़्यादा होगी।
शिक्षा की कमी। भारत में शिक्षितों की कमी तो है लेकिन कई पढ़े लिखे लोगों में भी व्यवहारिक ज्ञान की कमी है। इसलिए धूर्त लोग उनको आसानी से ठग लेते हैं। फिर वो अपनी ठगी के किस्से लोगों को सुनाते है और लोग पूरी नेटवर्क मार्केटिंग इंडस्ट्री को ठग मान लेते हैं बिना सोचे समझे।
कड़े कानूनों की कमी। विदेशों में कानून की कड़ाई इतनी है कि या तो फर्जी फ्रॉड कंपनी खुलती नहीं हैं या फिर ठगी करके भाग नहीं पाती, पकड़ी जाती है और लोगों के पैसे वापस करने पड़ते हैं। यहाँ तो एक्शन छोड़ो FIR तक करवाना मुश्किल काम है। इसलिए थोक के भाव मे फ्रॉड नेटवर्क मार्केटिंग कंपनी आती है और लाखों लोग ठगे जाते हैं। तो इस इंडस्ट्री को बदनाम तो होना ही है।
नेटवर्क मार्केटिंग के लीडर्स की कमज़ोरी। कहते हैं अपराध गलत लोगों की हिम्मत से नहीं, सही लोगों की चुप्पी से बढ़ता है। नेटवर्क मार्केटिंग में बहुत सारे अच्छे और ईमानदार लीडर्स भी हैं लेकिन उनमें से ज़्यादातर डरपोक हैं। आम आदमी को पता चले न चले, एक नेटवर्कर को तो पता चलता है कि कौन फ्रॉड कंपनी है कौन सही लेकिन वो भी फ्रॉड कंपनी के खिलाफ नही बोलते। उनको एक्सपोज़ नहीं करते। डर क्या की कहीं मेरी वाल पे आके ट्रोल न करे, कल को इसे अच्छी कंपनी में जुड़ना हुआ तो मेरे पास नहीं आएगा। रहो चुप। नुकसान तो आपका ही होना है।
इसमें भी एक पॉजिटिव बात है कि भारत मे ये एकमात्र इंडस्ट्री है जिसमे असिमित सम्भावनाएँ बची हुई हैं।
नेटवर्क मार्केटिंग दुनिया का सबसे खूबसूरत व्यवसाय है।
इसमें कोई कालाधन नहीं है।
कोई खाली जेब आकर भी लगातार मेहनत और ईमानदारी से मिलियनेयर बन सकता है।
इस इंडस्ट्री में पूरी दुनिया मे दुनिया की सारी इंडस्ट्री से ज़्यादा लोग जुड़े हैं।
इस इंडस्ट्री ने सबसे ज़्यादा मिलियनेयर बनाये हैं।
ये एकमात्र इंडस्ट्री है जो इंसान को हमेशा पॉजिटिव सोचना सिखाती है। उम्मीद देती है। सपने देखना और उनको पूरा करना सिखाती है। सपने तोड़ती नही है। ये इंडस्ट्री जोड़ना सिखाती है, तोड़ना नहीं।
इसमें जात पात, धर्म, शिक्षा, रंग रूप, भाषा, देश, क्षेत्र, लिंग, उम्र के नाम पर कोई भेदभाव नहीं होता। सिर्फ आपके काम से आपकी पहचान होती है।
ये एकमात्र इंडस्ट्री है जिसमें आप दूसरों को कमाना सिखाकर ही कमा सकते हैं। अकेले कोई सफल नहीं होता।
लेकिन लोग फैल भी होते हैं। कौन फैल होता है???
नेटवर्क मार्केटिंग। नाम से ज़ाहिर है कि नेटवर्क भी बनाना है और मार्केटिंग भी करनी है। तो जाहिर है आपको दोनों सीखना भी पड़ेगा। अब अगर आप आये इस इंडस्ट्री में और यही दो काम नहीं कर पाए तो कैसे सफल हो सकते हैं।
कोई क्रिकेट को कैरियर बनाये और ना वो बैटिंग करना सीखें ना बॉलिंग तो कैसे कैरियर बनेगा।
क्रिकेट में तो चलो खुद सीखकर जाना पड़ता है। यहाँ तो आपको इंडस्ट्री फ्री में सिखाती है। बार बार सिखाती है। तबतक मौका देती है जबतक आप सफल ना हो जाओ। आप ही बीच मे हिम्मत हार जाओ तो क्या कह सकते हैं।
बार बार फैल होने पर तो घरवाले भी ताना मारने लगते हैं। यहां आपको फिर भी हिम्मत और सपोर्ट ही मिलता है।
सुनी सुनाई बातों पर ना जाये। समझें, विवेचना करें, सभी डाउट क्लियर करें और फिर शुरू करें। पहाड़ चढ़ने की शुरुआत भी एक छोटे पहले कदम से ही होती है।
सोमवार, 1 जनवरी 2024
2023 2जनवरी की रात बहुत धीरे धीरे गुजर रही थी। आंखों से नींद गायब थी। किसी का इन्तज़ार कितना मुश्किल रहता है। रात सरक सरक कर सुबह के करीब पहुंच रही थी। 3जनवरी की सुबह 4-45 पर इवान ने मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश किया। एक छोटी सी जान, गोद में लेते डर लग रहा था। परन्तु दिल के हाथों मजबूर होकर गोद में उठाना ही पड़ा। अन्दर से बहुत डर रहा था।
देखते ही देखते एक साल गुजर गया। मासूम इवान कब बदमाश हो गया पता ही नहीं चला।आज दादू को हर बात के लिए मजबूर कर देता है। दादू के फ़ोन पर पुरा अधिकार जमा लिया है। दादू तथा दादू का फ़ोन दोनों इवान की जान है। किसी की परवाह न करने वाला दादू इवान की हर इच्छा के आगे झूक जाता है। भगवान के पास जाने की इच्छा रखने वाला दादू अब अपने इवान के पास ही रहना चाहता है। भगवान उसे लम्बी उम्र दे।
मंगलवार, 12 दिसंबर 2023
लिखित "ब्रीफ़" में क्या जानकारी दी जाए?
ब्रीफ़ उतनी ही सावधानी से तैयार किया जाना चाहिए जितनी सावधानी से वकील कोर्ट में चल रहे अपने केस का ब्रीफ तैयार करता है। जब तक कि आवेदक को इस तरह के ब्रीफ तैयार करने का अनुभव न हो विशेषज्ञ की राय ली जानी चाहिए और इस हेतु उसकी सेवाएँ ली जानी चाहिए। सफल व्यवसायी ऐसे लोगों को नौकरी पर रखते हैं जो अपने माल की विशेषताओं और खासियत के विज्ञापन करने की कला और मनोविज्ञान को समझते हैं। जिसे अपनी व्यक्तिगत सेवाएँ बेचनी हो उसे भी यही करना चाहिए। ब्रीफ में निम्न जानकारी होनी चाहिए :
1. शिक्षा : संक्षेप में परंतु स्पष्ट रूप से लिखें कि आपकी शिक्षा कहाँ तक है, आपने कॉलेज में किन विषयों में विशेषज्ञता हासिल की है और उस विशेषज्ञता के पीछे के कारण भी बताएँ।
2. अनुभव : अगर आपको उस तरह की नौकरी का कोई अनुभव है जिसके लिए आप आवेदन कर रहे हैं तो पूरी तरह से उसका उल्लेख करें और अपने पूर्व नियोक्ताओं के नाम और पते भी लिखें। यह निश्चित रूप से लिखें कि आपको उस पद पर किस तरह के काम का विशेष अनुभव है जिस वजह से आप उस पद के लिए अधिक उपयुक्त हैं जिसके लिए आप आवेदन कर रहे हैं।
3. संदर्भ : लगभग हर बिज़नेस फर्म उन संभावित कर्मचारियों के पिछले रिकॉर्ड के बारे में सब कुछ जानना चाहती है जो ज़िम्मेदारी के पद के लिए आवेदन करते हैं। अपने ब्रीफ के साथ इन लोगों के पत्रों की छायाप्रतियाँ लगा दें :
अ. पूर्व नियोक्ता।
ब. वे शिक्षक जिनसे आपने पढ़ा है।
स. प्रसिद्ध लोग जिनकी बात पर भरोसा किया जा सकता है। .
4 अपना फोटोग्राफ़ : अपने ब्रीफ के साथ अपना हाल ही का फोटोग्राफ़ लगा दें।
5. किसी निश्चित पद के लिए आवेदन दें: आवेदन करते समय यह उल्लेख करना न भूलें कि आप किस पद के लिए आवेदन दे रहे हैं। "किसी भी पद" के लिए आवेदन न करें। इससे यह समझा जाएगा कि आपमें विशेषज्ञीय योग्यता का अभाव है।
6. जिस पद के लिए आप आवेदन दे रहे हैं उसके लिए अपनी योग्यताओं का वर्णन करें : पूरा ब्यौरा दें कि आपको यह विश्वास क्यों है कि आप उस पद के लिए पूरी तरह योग्य हैं। यह आपके आवेदन का सबसे महत्वपूर्ण विवरण है। किसी भी अन्य जानकारी की तुलना में यह जानकारी निर्धारित करेगी कि आपको चुना जाएगा या नहीं।
7. परिवीक्षा पर काम करने का प्रस्ताव रखें : यह एक क्रांतिकारी सुझाव लग सकता है, परंतु अनुभव ने यह सिद्ध किया है कि इससे कम से कम एक मौक़ा अवश्य मिलता है। अगर आपको अपनी योग्यताओं पर विश्वास है तो आपको सिर्फ एक मौके की ही तो ज़रूरत है। साथ ही इस तरह के प्रस्ताव से यह पता चलता है कि आपको उस पद पर काम करने की अपनी योग्यता पर विश्वास है जिसके लिए आप आवेदन दे रहे हैं। इससे नियोक्ता सबसे अधिक आश्वस्त होता है। इस तथ्य को स्पष्ट करें कि आपका प्रस्ताव इन बातों पर आधारित है :
अ. आपको उस पद के लिए अपनी योग्यता पर विश्वास है।
ब. आपको अपने संभावित नियोक्ता के फ़ैसले पर भी विश्वास है कि वह आपको परिवीक्षा का अवसर देने के बाद नियुक्ति देगा।
स. आपके मन में उस पद को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प है।
8. अपने संभावित नियोक्ता के बिज़नेस का ज्ञान : किसी भी नौकरी के लिए आवेदन देते समय उस बिज़नेस के बारे में पर्याप्त रिसर्च कर लें और उस बिज़नेस की पर्याप्त जानकारी हासिल कर लें। अपने ब्रीफ में यह संकेत करें कि आपने उस क्षेत्र में क्या ज्ञान हासिल किया है। इससे बहुत फर्क पड़ेगा क्योंकि इससे यह पता चलता है कि आपमें कल्पनाशीलता है और उस पद को हासिल करने में आपकी सच्ची रुचि है।
याद रखें कि वह वकील केस नहीं जीतता जिसका वकालत का ज्ञान सबसे अधिक होता है, बल्कि वह वकील केस जीतता है जो अपने केस की सबसे अच्छी तैयारी करता है। अगर आपने "केस" को अच्छी तरह से तैयार और प्रस्तुत किया है तो आप शुरुआत में ही आधी जीत हासिल कर चुके हैं।
इस बात से न डरें कि आपका ब्रीफ ज़्यादा लंबा हो जाएगा। रोज़गार खोजने में आपकी जितनी रुचि है, सुयोग्य कर्मचारियों की सेवाएँ खरीदने में नियोक्ता की भी उतनी ही रुचि होती है। दरअसल, सबसे सफल नियोक्ताओं की सफलता का राज़ सुयोग्य सेनापति चुनने की उनकी योग्यता होती है। वे पूरी जानकारी चाहते हैं।
एक और बात का ध्यान रखें अगर आप अपने ब्रीफ़ की तैयारी सफ़ाई से करेंगे तो उससे यह पता चलेगा कि आप मेहनती इंसान हैं। मैंने क्लाइंट्स के लिए ऐसे ब्रीफ़ तैयार करने में मदद की है जो इतने प्रभावी और असाधारण थे कि आवेदक को बिना व्यक्तिगत इंटरव्यू के ही नौकरी मिल गई।
जब आपका ब्रीफ़ पूरी तरह से तैयार हो जाए तो इसके ऊपर अच्छी तरह से टाइप करवा लें।
रॉबर्ट के. स्मिथ की योग्यताओं का विवरण
द ब्लैंक कंपनी, इंक. के प्रेसिडेंट के प्राइवेट सेक्रेटरी के पद के लिए आवेदन
हर बार जब आप ब्रीफ़ भेजें तो कंपनी का नाम बदल दें।
यह व्यक्तिगत तरीका ध्यान आकर्षित करने का अचूक तरीका है। अपने ब्रीफ़ को उस सबसे अच्छे काग़ज़ पर टाइप कराएँ जो आपको मिल सके और इसे किसी पुस्तक के कवर जैसे भारी काग़ज़ से बाइंड कराएँ। अगर आप एक से अधिक कंपनी में आवेदन दे रहे हैं तो हर बार बाइंडिंग और फर्म का नाम बदल लें। आपका फोटो आपके ब्रीफ वाले किसी पेज पर लगा होना चाहिए। इन निर्देशों का पूरी तरह पालन करें और जब आपकी कल्पनाशीलता आपको कोई सुझाव दे तो इसे बेहतर बनाने का प्रयास करते रहें।
सफल सेल्समैन अपने पहनावे पर ध्यान देते हैं। वे जानते हैं कि पहली छाप अमिट होती है। आपका ब्रीफ़ आपका सेल्समैन है। इसे अच्छा सा सूट पहनाएँ ताकि यह दूसरों से अलग दिख सके, ताकि आपका संभावित नियोक्ता कहे कि उसने आज तक इस तरह का ब्रीफ़ नहीं देखा जो किसी पद के लिए आवेदन के साथ आया है। अगर आप जिस पद के लिए प्रयास कर रहे हैं वह महत्वपूर्ण है तो उसके लिए सावधानी से तैयारी करना भी महत्वपूर्ण है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर आप अपने नियोक्ता को खुद को इस तरीके से बेचते हैं कि वह आपसे प्रभावित हो जाता है तो आपको शायद शुरुआत में ही उससे अधिक तनख्वाह मिलने लगे जो आपको पारंपरिक तरीके से आवेदन देने पर मिलती।
अगर आप एडवर्टाइज़िंग एजेंसी या एम्प्लॉयमेंट एजेंसी के माध्यम से रोज़गार ढूँढ़ रहे हैं तो अपने एजेंट से अपने ब्रीफ की प्रतियाँ इस्तेमाल करने को कहें ताकि आपकी सेवाओं की बेहतर मार्केटिंग हो सके। इससे एजेंट और संभावित नियोक्ता दोनों ही आपको प्राथमिकता देंगे।
शुक्रवार, 24 नवंबर 2023
आचार्य द्रोण ने आज बहुत दिनों के पश्चात् अपने अतीत को पलटा था; अंतर्मुखी हो कर अपने भीतर झाँक कर देखा था। ... वे तो जैसे उस सारे काल को ही भूल गए थे। पर उनके भूलने से ही तो किसी काल-खंड का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। उसमें उत्पन्न हुई परिस्थितियाँ नष्ट नहीं हो जातीं। वे परिस्थितियाँ ही उन्हें स्मरण कराती रहेंगी कि वे कौन हैं; और किन परिस्थितियों में वे किन लोगों के मध्य रह रहे हैं...
हस्तिनापुर में वे आजीविका के लिए आए थे; किंतु हस्तिनापुर ही क्यों ? क्योंकि जीविका उपार्जित करने के साथ-साथ द्रुपद से प्रतिशोध भी लेना था उनको । तब भीष्म ने उन्हे कुरु राजकुमारों का गुरु नियुक्त किया था। उन राजकुमारों की प्रतिभा, उनकी भक्ति और शक्ति देख कर वे प्रसन्न हो गए थे। उन्होंने स्वयं युद्ध नहीं किया था, द्रुपद से: किंतु जब अर्जुन और उसके भाई, द्रुपद को बॉध कर ले आए थे, तो द्रोण को पहली बार अपनी शक्ति का अनुभव हुआ था। उस बोध से ही जैसे उनको मद चढ़ आया था। उन्होंने द्रुपद जैसे शक्तिशाली राजा का आधा राज्य छीन लेने का साहस किया था।
तब से अब तक हस्तिनापुर की राजनीति ने कई करवटें ली थीं। और आचार्य ने हर बार सावधान हो कर उस सत्ता समीकरण को साधा था। युधिष्ठिर का युवराज्याभिषेक हुआ था, तो भी उन्हें बहुत संकट का अनुभव नहीं हुआ था। यद्यपि युधिष्ठिर का चिंतन उनके बहुत अनुकूल नहीं था; किंतु युधिष्ठिर उनका शिष्य था। और फिर अर्जुन था वहाँ। अर्जुन के बिना युधिष्ठिर हस्तिनापुर पर शासन नहीं कर सकता था; और अर्जुन किन्हीं भी परिस्थितियों में द्रोण का विरोध नहीं कर सकता था। अर्जुन के रहते उन्हें युधिष्ठिर से किसी प्रकार की कोई आशंका नहीं हो सकती थी।... किंतु जब उनकी समझ में आ गया कि धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर को हस्तिनापुर में टिकने नहीं देगा, तो उनके लिए दुर्योधन के निकट हो कर उसे अपने अनुकूल रखना ही, अधिक लाभकारी था। वे भली प्रकार समझते थे कि डूबती नाव में बैठे रहनेवाले लोग नदी के पार नहीं उतरा करते। दुर्योधन भी अपने सहायकों को ढूँढ़ रहा था। अश्वत्थामा से उसकी मित्रता थी ही। उसे आचार्य द्रोण अपना संबल लगने लगे थे...
वारणावत प्रसंग के पश्चात् जब पांडव हस्तिनापुर लौटे थे, तो वे द्रोण के परम शत्रु द्रुपद के जामाता बन चुके थे। द्रोण ने अपने भाग्य को सराहा था कि उन्होंने समय रहते, दुर्योधन का समर्थन आरंभ कर दिया था, अन्यथा वे कहीं के भी न रहते। पांडव, द्रुपद और द्रोण दोनों का एक साथ न तो समर्थन कर सकते थे, न दोनों से एक साथ सहायता पा सकते थे। और अपने ससुर का पक्ष छोड कर पांडव अपने आचार्य का समर्थन कैसे कर सकते थे। दूसरी ओर दुर्योधन, पांडवों के किसी समर्थक को हस्तिनापुर में टिकने नहीं देता। किन्तु वे न तो अपने मन में दुर्योधन को अर्जुन का स्थान दे पाए, न दुर्योधन ही उन्हें अर्जुन की सी भक्ति दे पाया। अर्जुन उनसे प्यार करता था, और दुर्योधन उनको अपने लिए उपयोगी मानता था। अश्वत्थामा भी, दुर्योधन का वैसा मित्र नहीं हो पाया, जैसा कि उसे हो जाना चाहिए था। दुर्योधन अपने लाभ की दृष्टि से सारी घटनाओं को देख रहा था।... अश्वत्थामा और अर्जुन में न कोई प्रतिस्पर्धा थी, न ईर्ष्या। तो दुर्योधन अर्जुन के वध के लिए, अश्वत्थामा पर कैसे निर्भर रह सकता था। उसे उस कार्य के लिए कर्ण ही अधिक उपयोगी लगता था। कर्ण की क्षमता किसी भी रूप में अश्वत्थामा से अधिक नहीं थी, किंतु कर्ण के मन में अर्जुन के प्रति जैसी घृणा थी, वैसी अश्वत्थामा के मन में कैसे हो सकती थी। और दुर्योधन के लिए पांडवों के प्रति कर्ण की घृणा, अधिक मूल्यवान थी, कर्ण का धनुष नहीं ।
हस्तिनापुर के सत्ता समीकरण में अन्य लोगों के उतार-चढ़ाव से द्रोण को उतना अंतर नहीं पड़ता था, जितना कर्ण के अभ्युदय से। कर्ण वह व्यक्ति था, जिसे द्रोण ने धनुर्वेद का ज्ञान देना अस्वीकार किया था। उन्होंने कर्ण का तिरस्कार किया था। अब यदि कर्ण दुर्योधन पर अपना प्रभाव जमा लेता है, तो उसका अर्थ है कि सत्ता पर द्रोण के एक विरोधी का प्रभाव। और यह स्थिति हस्तिनापुर में द्रोण के महत्त्व के लिए कभी भी संकटपूर्ण हो सकती थी । अश्वत्थामा ने कक्ष में प्रवेश कर पिता को प्रणाम किया। "क्या समाचार है ?"
"यह सत्य है पिताजी ! हस्तिनापुर की अधिकांश वाहिनियाँ युद्धाभ्यास कर रही हैं।" "तुमने सेनापति से पूछा कि यह सब किसकी आज्ञा से हो रहा है ?"
द्रोण ने प्रश्न किया। "युवराज की आज्ञा से।"
"कारण ?"
"अंगराज महावीर कर्ण दिग्विजय के लिए प्रस्थान करनेवाले हैं।" अश्वत्थामा ने बताया ।
द्रोण ने लक्ष्य किया कि अश्वत्थामा ने कर्ण के नाम से पूर्व ये सारे विशेषण सम्मान के कारण नहीं जोड़े थे। वह उसका उपहास कर रहा था।
"हाँ । पांडवों ने दिग्विजय की थी तो दुर्योधन उसके बिना कैसे रह सकता था। अब यह राजसूय यज्ञ भी करना चाहेगा।" द्रोण जैसे सशब्द चिंतन कर रहे थे।
अश्वत्थामा अपने पिता की गंभीर मुद्रा देखता रहा। कुछ बोला नहीं । वह समझ रहा था कि इन शब्दों में दुर्योधन का समर्थन नहीं था।
बुधवार, 22 नवंबर 2023
भारतीय संस्कृति के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान करने वाले चौबीस अथवा दस अवतारों में भगवान राम और कृष्ण का विशिष्ट स्थान है। उन्हें भारतीय धर्म के आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्र कहा जा सकता है। उन्होंने व्यक्ति और समाज के उत्कृष्ट स्वरूप को अक्षुण्ण रखने एवं विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए, इसे अपने पुण्य-चरित्रों द्वारा जन साधारण के सामने प्रस्तुत किया है। ठोस शिक्षा की पद्धति भी यही है कि जो कहना हो, जो सिखाना हो, जो करना हो, उसे वाणी से कम और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाले आत्म-चरित्र द्वारा अधिक व्यक्त किया जाय। यों सभी अवतारों के अवतरण का प्रयोजन यही रहा है, पर भगवान राम और भगवान कृष्ण ने उसे अपने दिव्य चरित्रों द्वारा और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रखर रूप में बहुमुखी धाराओं सहित प्रस्तुत किया है ।
राम और कृष्ण की लीलाओं का कथन तथा श्रवण पुण्य माना जाता है। रामायण के रूप में रामचरित्र और भागवत के रूप में कृष्ण चरित्र प्रख्यात है। यों इन ग्रंथों के अतिरिक्त भी अन्य पुराणों में उनकी कथाएँ आती हैं। उनके घटनाक्रमों में भिन्नता एवं विविधता भी है। इनमें से किसी कथानक का कौन सा प्रसंग आज की परिस्थिति में अधिक प्रेरक है यह शोध और विवेचन का विषय है। यहाँ तो इतना जानना ही पर्याप्त है कि उपरोक्त दोनों ग्रंथ दोनों भगवानों के चरित्र की दृष्टि से अधिक प्रख्यात और लोकप्रिय हैं। उन्हीं में वर्णित कथाक्रम की लोगों को अधिक जानकारी है ।
कथा चरित्रों के माध्यम से लोक शिक्षण अधिक सरल पड़ता है। इस रीति से वह सर्वसाधारण के लिए अधिक बुद्धिगम्य हो जाता है और हृदयंगम भी। तत्वदर्शी मनीषियों ने इस तथ्य को समझा था और जनमानस के परिष्कार के लिए आवश्यक लोक शिक्षण की व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से कथा शैली को अपनाया था। वही सुबोध रही और लोकप्रिय बनी । अस्तु, एक प्रकार से इसी प्रक्रिया के माध्यम से धर्म चर्चा करने की रीति अपनाई गई और सफल भी हुई । वेद चार हैं और चारों को मिलाकर २० हजार मंत्र हैं। पर एक-एक पुराण का आधार विस्तार कहीं अधिक है, जितना कि चारों वेदों का सम्मिलित रूप है । अकेले महाभारत में एक लाख से अधिक श्लोक हैं। स्कंद पुराण भी ८१ हजार श्लोकों का है । उपयोगिता के अनुरूप पुराणों का विस्तार होता ही गया। १८ पुराण बने और इसके बाद १८ उप पुराण । यह विस्तार उस शैली की लोकप्रियता और सफलता पर प्रकाश डालता है ।
भगवान राम और भगवान कृष्ण के चरित्रों में लोक-शिक्षण की प्रचुर सामग्री विद्यमान है । रामायण और भगवान के कथानकों के माध्यम से जनमानस का परिष्कार और सामाजिक सुव्यवस्था का प्रतिपादन बहुत ही अच्छी तरह किया जा सकता है, किया जाता भी रहा है ।
इस प्रयास प्रचलन में एक त्रुटि यह थी कि कथा-ग्रंथों का श्रवण एवं पाठ मात्र पुण्य फल प्राप्त करने के लिए पर्याप्त बताया जाने लगा था और नाम जप की महिमा आकाश- पाताल जैसी बताई गई थी। साथ ही भक्ति को अमुक कर्मकांडों के बोध (नवधा भक्ति) तक सीमित रखा जा रहा था। इससे कथा-प्रसंगों की उपयोगिता ही नष्ट न हुई वरन उल्टी गंगा बहने लगी । जब श्रवण, पठन, जप और सरलतम कर्मकांडों में कुछ मिनट लगाने से पाप कट सकते हैं, पुण्य फल, ईश्वर का अनुग्रह और मुक्ति जैसी उपलब्धियाँ सहज ही मिल सकती हैं, तो फिर उन कष्ट साध्य आदर्शों को जीवन में उतारने का झंझट मोल क्यों लिया जाय ? सरल कृत्यों का अत्यधिक माहात्म्य बताने की परोक्ष प्रक्रिया यह हुई कि लोगों ने अनाचार से बचने और सदचार को अपनाने के लिए जिस उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की अनिवार्य आवश्यकता है उसकी उपेक्षा आरंभ कर दी। फलतः लोग पाप-कर्मों का दंड मिलने की ओर से निर्भय हो गए। जब पाप अमुक कथा सुनने से नष्ट हो जाते हों और उनका दंड न मिलता हो तो उनके सहारे जो भौतिक लाभ मिल सकते हैं उन्हें क्यों छोड़ा जाय ? इसी प्रकार यदि अति सरल कर्मकांड आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करा सकते हैं तो आदर्श जीवन जीने और लोक मंगल के लिए त्याग, बलिदान के झंझट में पड़ने की क्या जरूरत ? यह उल्टे तर्क लोगों के मन में बैठते चले गए। कथा वाचकों ने इसी सरलता को प्रस्तुत करते हुए शायद सोचा होगा कि इस सरल प्रक्रिया से आकर्षित होकर लोग जल्दी धर्मप्रेमी बनेंगे । पर वैसा होना संभव ही नहीं था और हुआ भी नहीं। छुटपुट क्रिया-कृत्यों की टंट-घंट तो इस प्रलोभन में बहुत फैली पर धर्म की आत्मा का हनन हो गया । धर्माडंबर ओढ़े हुए लोग अपने को पाप दंडों से मुक्त और ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी मानकर चलने लगे । उन्होंने उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व को झंझट कहना आरंभ कर दिया। सरलता के आकर्षण ने उस ओर से मुँह मोड़ लेने के लिए जन साधारण को प्रेरणा दी । इस प्रकार कथा शैली के विकास का मूलभूत आधार ही नष्ट हो गया ।
सीधी धारा को उल्टी बहाया गया यह अनर्थ ही हुआ। अनर्थ को सुधारना, सही करना आवश्यक था । इसके बिना कथाक्रम का लक्ष्य भ्रष्ट ही बना रहता। रामचरित्र और कृष्णचरित्र का वही उद्देश्य और स्वरूप जन साधारण के सामने रखा जाना चाहिए जिसके लिए उनका अवतरण हुआ। धर्म की स्थापना और अधर्म का उन्मूलन यही दो प्रयोजन अवतार के रहे हैं। यह प्रयोजन उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व अपनाए बिना और किसी प्रकार पूरा नहीं हो सकता। अवतारों की कथा-गाथाओं में यही तथ्य पग-पग पर उभर रहा है । हमारी कथा शैली की दिशा यही होनी चाहिए। आज धर्म की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए, उसके मूल स्वरूप से जनसाधारण को परिचित कराते हुए धर्मनिष्ठा को प्राणवान बनाने का यही तरीका है। अब कर्मकांडों का अलंकारिक माहात्म्य न बताकर चरित्र निष्ठा को अवतारों के अवतरण का मूल प्रयोजन बताया जाय और उसी के अनुगमन की दिशा में लोक मानस को प्रोत्साहित किया जाय ।
एक अन्य विकृति कथा-शैली में और भी घुस पड़ी थी जिसमें चरित्र नायकों के जीवन क्रम में ऐसी घटनाएँ जोड़ दी गई थीं जो नैतिक एवं सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन और अवांछनीय आचरण के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। लोग गुणाग्रही कम और दोषों के अनुकरण में कुशल होते हैं। जहाँ भी देवताओं, अवतारों, ऋषियों, महामानवों के चरित्रों में दोष की बात सुनते हैं, वहाँ न केवल अश्रद्धा करते हैं, वरन अपनी पथ-भ्रष्टता को सरल स्वाभाविक सिद्ध करने के लिए उन चरित्रों का संदर्भ देते हैं, जो महामानवों के लीला प्रसंग में जोड़ दिए गए हैं। दुःख की बात यह है कि कथावाचक उन्हीं को लोक रंजन की दृष्टि से चटपटा बनाकर कहते रहते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे धर्ममंच से किन अवांछनीय प्रेरणाओं का प्रवाह बहा रहे हैं।
कथा शौली के माध्यम से लोक-शिक्षण भारत की वर्तमान मनोभूमि एवं आवश्यकताओं को देखते हुए एक नितांत उपयोगी और वांछनीय प्रक्रिया है।
- श्रीराम शर्मा आचार्य
मंगलवार, 21 नवंबर 2023
शादी करना जहां एक खूबसूरत और अनोखा एहसास होता है, वहीं इस फैसले के साथ आपके मन में एक सवाल भी आता है। वो सवाल यह है कि एक सही जीवन साथी कैसा होना चाहिए? हमारे लाइफ पार्टनर में वो कौन-सी बातें होनी चाहिए, जिससे हमारी जिंदगी सुख और शांति से गुजरे? हर कोई चाहता है कि उसका जीवन साथी जिंदगी में हर कदम पर साथ खड़ा रहे और हर चुनौती को अवसर में बदलना जानता हो।
पति-पत्नी का अस्तित्व दो शरीर और एक आत्मा का स्वरुप होता है। उनमे से किसी एक के भी स्वतंत्र रूप से सुखी रहने की आशा कम ही की जाती है। सच्चा जीवनसाथी वही है जो अपने पति या पत्नी के लिये अपनी अभिलाषाओं, अपने सुखों का त्याग कर सके, उसके दुःख को अपना दुःख मानते हुए हरदम उसका साथ निभाये। उसकी उन्नति और प्रगति के लिये प्रयासरत रहे, उससे प्यार करे, सम्मान दे, और सबसे बढकर उसे अपने जीवन लक्ष्य को पाने में हरसंभव सहयोग दे।
मान-सम्मान सभी के लिए उन अभूषणो की तरह है जो बहुत ही कीमती है, यदि आपका जीवन साथी आपका अत्यधिक सम्मान करता है व आपके साथ-साथ परिवार के अन्यों व्यक्तियों का भी उसी तरह सम्मान करता है तो वह /वो आपसे असीम प्रेम करता है, यदि आपका जीवन साथी आपको प्यार तो जताते है परंतु सम्मान नहीं करते व बात-बात पर आपको गाली देते है व आपके चरित्र पे लांछन लगाते है तो वह व्यक्ति आपको ज़िंदगी में कभी खुश नहीं रख पाएगा सच्चे प्रेम की नींव सम्मान से है।
सच्चा जीवन साथी आपके बुरे वक्त मे एक सेकंड के लिए भी आपका साथ नहीं छोड़ेगा, यदि आप बीमार है या कोई भी ऐसी दुर्घटना घटित होती है आपके साथ तब आपका सच्चा प्रेम आपको इग्नोर नहीं करेगा आपके हर कदम पर आपसे कहेगा घबराओ मत मैं हू ना सब ठीक हो जाएगा।
यदि आपके जीवन साथी में उपरोक्त गुण पाए है तो आप इस दुनिया के उन भाग्यशाली इंसानों में से है। आप स्वयं को गोरान्वित महसूस कर सकते हैं। सौभाग्य से मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसा जीवन साथी मिला।
अनजान राही की तरह मिलें। सफ़र जैसे जैसे आगे बढ़ा तो लगने लगा हम एक दूसरे के लिए ही बने हैं। आज बाराह सदस्यों का परिवार एक दूसरे के सुख-दुख में एक साथ खड़ा रहता है।यह सब मेरे हमसफ़र की परवरिश से सम्भव हो सका है।
“जीवनसाथी वो है जो हमें हमसे भी अधिक प्यार करता है।”
“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...
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यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ यज्ञ - अर्थात् एकमात्र यज्ञ या विष्णु के लिए किया...
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यदि किसी को कोई जहरीली चीज काट लेती है, तो प्रभावित क्षेत्र पर घाव बनने लगता है। बवासीर का घाव इतना दर्दनाक होता है कि इसे ठीक करना मुश्कि...
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परिशिष्टम् - २ गृह-समृद्धि हेतु वास्तु नियम अनन्त शक्तियों से समन्वित प्रकृत प्रकृति में सृष्टि, विकास एवं प्रलय की प्रक्रिया सतत् प्रवहमा...