रविवार, 6 जुलाई 2025

 ईश्वर भक्ति में प्रेमयोग

कैलासपति भगवान् शिव के प्रति अनन्य प्रेम होने में ही इस जीवन की सार्थकता है। जिस बड़भागी ने इस दिव्य, अनन्य एवं विशुद्ध प्रेम-पीयूष का पान कर लिया, उसका जन्म सफल हो जाता है। उसकी युग-युग की, जन्म-जन्मों की विषय-पिपासा बुझ जाती है। भवताप से संतप्त प्राणी भगवत्प्रेम की पावन मन्दाकिनी में निमज्जन करके ही पूर्ण शान्ति प्राप्त कर सकता है। यही वह परम रस है, जिसे पीकर मनुष्य सिद्ध, अमर और तृप्त हो जाता है। उसके प्राप्त होने पर प्राणी इच्छा-शोक-राग-द्वेष आदि की परिधि से बाहर अनन्त अगाध आनन्दराशि में तरंगायमान होता रहता है। वह न तो विषय-भोगों में रमता है और न उनमें कभी उसका उत्साह ही होता है।

प्रेम साधन भी है और साधनों का फल यानी साध्य भी। परमात्मा की ही भांति प्रेम का स्वरूप भी अनिर्वचनीय है। गूंगे के स्वाद की तरह यह वाणी का विषय नहीं होता। इसलिए प्रेम का स्वरूप अलौकिक बताया गया है; क्योंकि वह लोक से सर्वथा विलक्षण है।

लौकिक प्रेम भोग-कामनाओं और दुर्वासनाओं से वासित होने के कारण शुद्ध नहीं होता। जहां वासना का आधिपत्य है, वह प्रेम नहीं, आसक्तिमूल मोह है। इसके अलावा लौकिक प्रेम के आलम्बन क्षणिक एवं नाशवान होते हैं; अतः वह भगवत्प्रेम के सामने हेय ही है। यदि भगवत्प्रेम भी किसी कामना से किया जाए तो वह सकाम कहलाता है। सकाम प्रेम में दिव्यता, अनन्यता एवं विशुद्धता का अभाव होता है। कामना लौकिक वस्तु के लिए ही होती है, अतः लौकिकता का सम्मिश्रण हो जाने से उसकी दिव्यता नष्ट हो जाती है तथा उक्त कामना में वह प्रेम बंट जाता है, इसलिए उसमें ऐकनिष्ठता एवं अनन्यता नहीं रह जाती।

इसी प्रकार कामना से मिश्रित या दूषित हो जाने से वह प्रेम विशुद्ध नहीं रह पाता। दिव्य, अनन्य एवं विशुद्ध प्रेम तो तीनों गुणों से अतीत और कामनाओं से रहित होता है। यह प्रतिक्षण बढ़ता है, कभी घटता नहीं, वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म होता है, उसे वाणी द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता, यह तो अनुभव की वस्तु है। हेतु या कामना ही प्रेम का दूषण है, निर्हेतुक अथवा निष्काम प्रेम में कामना की गन्ध भी नहीं है, इसलिए यह शुद्ध है। अपने अभिन्न प्रियतम परमात्मा भगवान् शंकर के सिवा कोई दूसरा इस प्रेम का लक्ष्य नहीं है, इसलिए यह अनन्य है तथा ऊपर कहे अनुसार लोक से सर्वथा विलक्षण होने के कारण यह प्रेम दिव्य है।

इस प्रेम को पाकर प्रेमी सदा आनन्द में मस्त रहता है। संसार की सारी चिन्ताएं उसका स्पर्श भी नहीं कर सकतीं, उसकी दृष्टि में प्रेम के सिवा और कुछ रह ही नहीं जाता। यह तो प्रेम को ही देखता है, प्रेम को ही सुनता और प्रेम का ही वर्णन तथा चिन्तन करता है। उसके मन, प्राण और आत्मा प्रेम की ही गंगा में अनवरत अवगाहन करते रहते हैं। वह अपने सब धर्म और आचरण प्रेममय भगवान् शंकर को ही अर्पण कर देता है। वह उनकी पलभर के लिए भी याद भूलने पर अत्यन्त व्याकुल और बेचैन हो जाता है। वह सर्वत्र प्रेममय भगवान् को ही देखता है, सब कुछ भगवान् में ही देखता है, ऐसी दृष्टि रखने वाले की नजरों से भगवान् अलग नहीं हो सकते तथा वह भी भगवान् से अलग नहीं हो सकता। इस प्रकार दोनों का नित्य ऐक्य शाश्वत संयोग बना रहता है। भगवान् ऐसे भक्त का लोकोत्तर अनुराग देख अपनी महेश्वरता भूल जाते हैं और मुग्ध होकर अपने प्राणप्रिय भक्त को निहारते रहते हैं। उसके साथ उसी के अनुरूप बनकर उसकी इच्छा के अनुकूल विग्रह धारण कर खेलते, नृत्य करते, गाते, बजाते और आनन्दित होते रहते हैं।

प्रेमी भक्त मिलन और विछोह की चिन्ता से भी परे होता है। उसे क्या गरज पड़ी है, जो मिलने के लिए विकल हो। उसे तो केवल प्रेम करना है, वह भी प्रेम के लिए। वह प्रेम तत्वज्ञ प्रियतम स्वयं ही मिले बिना नहीं रह सकता। उसे गरज होगी तो स्वयं ही आएगा, भक्त क्यों मिलने के लिए परेशान हो? वह विछोह से भी क्यों डरे? उसे अपने लिए तो सुख या आनन्द की चाह है नहीं; वह तो सब कुछ उस प्रियतम के ही सुख के लिए करता है। यदि उसे मिलन में सुख मिलता है तो स्वयं ही आकर मिले। विछोह से दुःख होता हो तो अपने आप दौड़ा आएगा, न होगा तो बुलाने से भी नहीं आएगा। इसीलिए जो निष्काम प्रेमी होते हैं, वे भगवान् को बुलाते भी नहीं।

वास्तव में न तो भगवान् को दर्शन देने के लिए बुलाने की आवश्यकता है, न रोकने की। बिना किसी कामना या हेतु के ही भगवान् में केवल प्रेम बढ़ाना आवश्यक है। अहंकार से दूर रहकर संयोग-वियोग की चिन्ता से बेपरवाह होकर उत्तरोत्तर प्रेम बढ़ता रहे, इसी के लिए सारा प्रयत्न-सम्पूर्ण चेष्टा होनी उचित है। भक्त प्रहलाद ने कभी प्रार्थना नहीं की कि मुझे दर्शन दो। सब कुछ भगवान् ने अपने आप ही किया।

भगवत्प्रेमी का पूजन; खाना, पीना, रोना-गाना आदि सब भगवत्प्रीत्यर्थ होना चाहिए। प्रेमी का प्रेममय भगवान् के सिवा कोई दूसरा लक्ष्य न हो। दार्शन-मिलन आदि तो आनुषंगिक फल हैं। अपने आप प्राप्त होते हैं। इस प्रेम की पूर्णता उस दिव्य, अनन्य एवं विशुद्ध प्रेम में ही है, जहां प्रेम, प्रेमी और प्रियतम की एकता होती है।

ऐसा प्रेम उस दिव्य प्रेम का साक्षात् स्वरूप होता है। उसकी वाणी प्रेम से ओतप्रोत तथा शरीर और मन प्रेमरस में सराबोर होते हैं। उसका रोम-रोम प्रेमानन्द से थिरकता दिखायी देता है। उसके साथ सम्भाषण, उसका चिन्तन तथा उसके निकट गमन करने से अपने अन्दर प्रेम के परमाणु आते हैं। उसका स्पर्श पाकर नीरस हृदय में भी प्रेम का संचार होता है। बड़े-बड़े नास्तिक भी उसके सम्पर्क में आने पर सब कुछ भूलकर प्रेम दीवाने बन सकते हैं। उसके अनन्य अनुराग या अलौकिक भावोद्रेक को ठीक-ठीक हृदयंगम कराने के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं। समझाने के लिए उसके भाव को चाहे कोई भाव कह दिया जाए; वास्तव में वह सब भावों से ऊपर होता है। यहां न भाव है, न अभाव। उसकी स्थिति सभी भावों से परे है। साख्यभाव से भी इस दिव्य प्रेम की तुलना नहीं हो सकती। यह साख्य से भी ऊंचा है। दास्यभाव से भी उस अनन्य प्रेम का भाव अत्यन्त उत्कृष्ट है। दास्यभाव में ऊंच-नीच, स्वामी-सेवक की दृष्टि है, पर यहां तो पूर्ण समता है-न कोई सेवक है, न स्वामी। भक्त भगवान् की प्रेम गंगा में निमज्जन करके प्रसन्न होता है तो भगवान् भी वैसे ही प्रेम में मग्न हो जाते हैं।

वात्सल्यभाव से भी इस दिव्य अनन्यभाव का स्थान ऊंचा है। वहां उस लोकोत्तर साम्य का दर्शन नहीं होता, जो यहां सहज ही अनुभव में आता है। उसमें छोटे-बड़े, पिता-पुत्र आदि भाव रहते हैं, किन्तु यहां न कोई छोटा है, न बड़ा; न कोई माता-पिता है, न कोई किसी का पुत्र। सब एक समान हैं। माधुर्यभाव से भी यह अद्भुत प्रेमभाव और परकीयाभाव है। परम श्रेष्ठ सतीशिरोमणि पतिव्रता नारी का अपने प्रियतम पति के प्रति जो भाव होता है, वही स्वकीयाभाव है तथा परस्त्री का परपुरुष में जो गुप्त प्रेम होता है, उसी भाव से जो भगवान् के दिव्य स्वरूप में उच्च श्रेणी का प्रेम हो, उसे परकीयाभाव कहते हैं। उपर्युक्त प्रेमी इन सभी भावों से ऊपर उठा होता है।

भगवान् के साथ उसका एक क्षण के लिए भी कभी वियोग नहीं होता। भगवान् उसके अधीन होते हैं, उसके हाथों बिके रहते हैं। उसका साथ छोडकर कहीं जाते ही नहीं। वह अनन्यप्रेमी भक्त पूर्ण प्रेममय-भगवन्मय हुआ रहता है। भगवान् से वह भिन्न नहीं, भगवान् उससे भिन्न नहीं। इस अवस्था में न भय है न संकोच, मान, आदर और सत्कार का भी यहां कुछ खयाल नहीं रहता। बड़े-छोटे का कोई लिहाज नहीं किया जाता। उन (भक्त और भगवान) में न कोई उत्तम है न मध्यम। दोनों समान हैं। पतिव्रता पति को नारायण मानती है और अपने को उनकी दासी। यह भाव बड़ा ही उत्तम और परम कल्याणकारी है। फिर भी इसमें बड़े-छोटे का दर्जा तो है ही। परन्तु उपर्युक्त दिव्य प्रेम में बड़े-छोटे की कोई श्रेणी नहीं है। वहां दोनों की समान अवस्था है।

परकीयाभाव में भी दूसरों से भय है, छिपाव है, सदा यह डर बना रहता है कि कोई जान न ले, पर यहां इस दिव्य प्रेम में न भय है, न छिपाव। फिर संकोच की तो बात ही क्या है। भगवान के गुण और प्रभाव से प्रभावित होकर ही परकीया का मन उनकी ओर आकृष्ट होता है। जहां अपने से अन्यत्र श्रेष्ठता का अनुभव है, वहां अपने में किंचित् न्यूनता का आभास भी है। अतः वहां भी निर्भीकता एवं पूर्ण समानता नहीं है। परन्तु अनन्य और विशुद्ध प्रेम में गुण एवं प्रभाव के गुण और प्रभाव से प्रभावित होकर ही परकीया का मन उनकी ओर आकृष्ट होता है। जहां अपने से अन्यत्र श्रेष्ठता का अनुभव है, वहां अपने में किंचित् न्यूनता का आभास भी है। अतः वहां भी निर्भीकता एवं पूर्ण समानता नहीं है। परन्तु अनन्य और विशुद्ध प्रेम में गुण एवं प्रभाव की विस्मृति है। स्मृति होने पर भी उनका कोई मूल्य नहीं है। यहां तो दोनों में अनिर्वचनीय ऐक्य है। वहां सर्वशक्तिमान और सर्वान्तर्यामी कहकर स्तवन नहीं किया जाता। स्तुति की अवस्था तो बहुत पहले ही समाप्त हो जाती है। अब तो कौन सर्वशक्तिमान और कहां का सर्वेश्वर दोनों एक हैं, समान हैं। दोनों ही एक-दूसरे के प्रेमी और प्रियतम हैं; इनमें परस्पर हेतुरहित सहज प्रेम होता है। इसमें भक्त और भगवन्त-सब एक हो जाते हैं। किसी भावुक भक्त के निम्नांकित वचन से भी इसी भाव की पुष्टि हुई है

त्रिधाप्येकं सदागम्यं गम्यमेकप्रभेदने । 

प्रेम प्रेमी प्रेमपात्रं त्रितयं प्रणतोऽस्म्यहम् ।।

अर्थात् प्रेम, प्रेमी और प्रेमपात्र (प्रियतम) - देखने में तीन होने पर भी वास्तव में एक हैं। इनका तत्व सदा सबकी समझ में नहीं आता। इन्हें एक रूप ही जानना चाहिए। मैं इन तीनों को, जो वस्तुतः एक हैं, प्रणाम करता हूं। ऐसे अनन्य प्रेमी की दृष्टि में सर्वत्र और सदा ही दिव्य प्रेम की अखण्ड ज्योति जगमगाती रहती है। वह सम्पूर्ण जगत पर समान रूप से प्रेमामृत की वर्षा करता है। उसकी दृष्टि में कोई घृणा या द्वेष का पात्र नहीं है। उसके लिए सर्वत्र ही प्रेम का महासागर लहराता है। ज्ञानमार्ग से चलने वाले महात्मा अद्वैत-अभेद रूप से ब्रह्म को प्राप्त होते हैं- 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' पर यहां तो इस दिव्य प्रेम-संसार की अनुभूति ही निराली है। यहां न द्वैत है, न अद्वैत ! दोनों से विलक्षण स्थिति है। प्रेमी और प्रियतमा का नित्य-नूतन प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता है। 'प्रतिक्षणं वर्धमानम्' की स्थिति में पुष्ट होता है। बढ़ते-बढ़ते यह असीम अनन्त हो जाता है कि उनमें द्वैत का सा भान नहीं होता। इनके दिव्य भाव को वाणी द्वारा व्यक्त करना असम्भव है। यहां प्रेम के सिवा कुछ रहता ही नहीं। इन प्रेमियों का मिलन भी बड़ा ही विलक्षण और अत्यन्त अलौकिक होता है। यहां अद्वैत होते हुए भी द्वैत है और द्वैत होते हुए भी अद्वैत । हमारे दोनों हाथ परस्पर मिलकर एक हो जाते हैं। उस समय ये दो होते हुए भी एक हैं और एक होते हुए भी दो। इस प्रकार यहां न भेद है, न अभेद।

गंगा और समुद्र मिलकर एक से हो जाते हैं, किन्तु भगवान् और अनन्यप्रेमी भक्त का दिव्य मिलन इनसे भी विलक्षण एवं उत्कृष्ट है। वह अलौकिक एवं अनिर्वचनीय अवस्था है। भेद-अभेद से परे की फलरूपा स्थिति है। यह मिलन नित्य है। यहां वस्त्र, आभूषण या आयुध का व्यवधान भी वांछनीय नहीं है। वस्त्र का व्यवधान लज्जा-निवारण के लिए अपेक्षित होता है और लज्जा दूसरे से होती है। यहां तो प्रेमी और प्रियतम एकप्राण हो चुके हैं। भला अपने से भी कोई लज्जा करता है। यदि बंद एकान्त कमरे में अपने सिवा कोई दूसरा न हो तो लज्जा निवारण के लिए वस्त्र की आवश्यकता नहीं होती। इस दिव्य मिलन में द्वैतभाव मिट चुका है, दूसरों की ही दृष्टि में भेद प्रतीत होता है। इस मिलन में तो आभूषण भी दूषण जान पड़ते हैं। यहां परस्पर मान-सम्मान, आदर-सत्कार का भी कोई व्यवहार नहीं है। जहां पूर्णरूप से प्रेम है, वहां आदर-सत्कार तो एक विघ्न है। क्या कोई स्वयं ही अपना आदर करता है।

इस स्थिति में शोक, मोह और भय आदि का नामोनिशान भी नहीं रहता। यहां तो देखने मात्र की भिन्नता होते हुए भी वास्तव में पूर्ण एकत्व है। अनन्य प्रेमी का ऊपरी व्यवहार चाहे जैसा हो, भीतर से वह एकनिष्ठ है, भगवन्मय है, इसीलिए वह भगवान् में नित्य स्थित है। जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में स्थित मुझ शिव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मेरे में ही बरतता है क्योंकि उसके अनुभव में मेरे सिवा अन्य कुछ है ही नहीं। यह द्वैत-अद्वैत, भेद-अभेद से विलक्षण एवं अनिर्वचनीय स्थिति है। इस अनन्य प्रेम को प्राप्त करना ही मानवमात्र का वास्तविक लक्ष्य है। इसी की प्राप्ति में जन्म और जीवन की सार्थकता है।

रावण संहिता 

शनिवार, 5 जुलाई 2025

 'वानरराज ! राक्षसराज ने कहा है कि', शुक असाधारण शालीनता से बोला, 'हमारे दोनों राज्यों की मैत्री अपके पिता सम्राट ऋक्षराज के समय से ही चली आ रही है। वाली मेरा मित्र था। उसके हाथों अपने परिजन मायावी के वध के पश्चात् भी मैंने उसका विरोध नहीं किया। इस दृष्टि से तुम मेरे भाई के समान हो। तुम्हारा मैंने कभी कोई उपकार नहीं किया, तो कभी कोई अपकार भी नहीं किया। तुमसे मेरी शत्रुता नहीं है। ऐसे में एक बाहरी व्यक्ति, जिसका न अपना राज्य है, न सेना है, वानर जिसकी न जाति के हैं, न गोत्र के - वह बाहरी व्यक्ति तुम्हें फुसलाकर मेरे विरुद्ध लड़ने के लिए ले आया है। शत्रुता किसी की और युद्ध में प्राण देने कोई और आया है। यदि मैंने राम की पत्नी का हरण किया है तो उसमें तुम्हें मुझ जैसे मित्र के विरुद्ध युद्ध करने की क्या आवश्यकता है ? इस युद्ध में विजय वानरों की हो या राक्षसों की - राज्य या मेरा जाएगा या तुम्हारा, सेनाएं मेरी नष्ट होंगी या तुम्हारी, परिजन मेरे मरेंगे या तुम्हारे- इस युद्ध में इस कंगले राम का कुछ भी दांव पर लगा हुआ नहीं है। इस युद्ध की जय-पराजय से निरपेक्ष- वह दोनों स्थितियों में लाभ में ही रहेगा। उस कंगले परदेसी के बहकावे में क्यों आते हो? तुम्हें कुछ चाहिए तो मुझसे कहो । युद्ध में सिवाय अपने और अपनी जाति के विनाश के तुम्हें और कुछ हाथ नहीं लगेगा ।'

आरम्भ में सुग्रीव भी अत्यन्त शांत बने रहे थे, किन्तु क्रमशः उनकी व्यग्रता उनके चेहरे पर प्रकट होती दिखाई दी। अंत तक आते-आने लगा कि यदि दूत मौन नहीं हो गया होता तो सुग्रीव उसे मौन कर ही देते ।

दूत के चुप होने तक सुग्रीव का धैर्य जैसे समाप्त हो चुका था। वे वानरराज की मर्यादा भूलकर अत्यन्त क्रुद्ध व्यक्ति के समान फूट पड़े, 'आज रावण को याद आया है कि वह राक्षसराज है और मैं वानरराज हूं; इसलिए हममें मैत्री ही नहीं, भ्रातृत्व का सम्बन्ध है। वह भूल गया कि आज तक समस्त नृपों को वह अपना दास बनाने के लिए सैनिक अभियान करता आया है। उसने नृपों को अपना मित्र नहीं; दास माना है। वह नृप होकर भी पर-धन, पर-अधिकार और पर-स्त्रियों का हरण करता आया है, और जिसे वह बार-बार उपेक्षा और अवहेलना से कंगला, निर्धन और तपस्वी कहता आया है वह स्वत्वहीन आर्य राम मुझ और विभीषण जैसे अपमानित, अवमानित, निष्कासित असहाय मित्रों को साम्राज्यदान करते आए हैं। जब मेरी पत्नी का अपहरण कर, मुझे किष्किंधा से निष्कासित किया गया था और मैं अपने प्राणों की रक्षा के लिए वनों-पर्वतों में छिपा फिरता था, तब रावण को याद नहीं आया था कि मैं उसका भाई हूं।' सुग्रीव ने रुककर शुक को देखा और पूरे आक्रोश से बोले, 'रावण से कहना कि मैं और वह कैसे भाई हैं, इसे वह भूल जाए; किन्तु विभीषण और रावण कैसे भाई हैं, इसे याद रखे। यह संदेश उसने अपने सहोदर भ्राता विभीषण को क्यों नहीं भेजा कि वे उससे मिलकर अपना मतभेद दूर कर लें। और दूत!' सुग्रीव का स्वर और भी ऊंचा हो गया, 'अभी तक कोई नहीं भूला कि रावण लंका का निवासी नहीं है- वह बाहर का व्यक्ति है। रावण की राजसभा में एक भी सभासद लंका का मूल निकासी नहीं है। और जहां तक जाति की बात है, राम मेरी जाति के नहीं हैं; 

किन्तु वे सब दीन-हीन, निराश्रित दुर्बल लोग, जिन्हें रावण की राक्षसी सेनाएं मारती, काटती, पीटती, लूटती तथा पीड़ित करती रही हैं- वे सब मेरी ही जाति के हैं। राम की जाति को रावण नहीं जानता। राम की जाति मानवता की जाति है. यह बात तुम्हारे उस रावण की समझ में नहीं आएगी ... तुम अब जाओ, अन्यथा तुम्हारा कोई अनिष्ट हो जाए तो मैं उत्तरदायी नहीं होऊंगा ।'

किन्तु शुक वहां से टला नहीं। वह धृष्टतापूर्वक वहीं खड़ा रहा। 'एक निवेवन और है, सम्राट् !' वह अत्यन्त वक्र वाणी में बोला, 'यदि आप राम और लक्ष्मण को बंदी कर राक्षसराज को सौंप दें तो वे आपको समस्त वानर जातियों का एकछत्र सम्राट्‌ स्वीकार कर लेंगे; अन्यथा वह चुप हो गया ।

'अन्यथा ?' सुग्रीव ने पूछा ।

'अन्यथा', वह एक विषैली मुसकान अपने अधरों पर ले आया, 'अन्यथा स्वर्गीय सम्राट वाली के न्यायोचित उत्तराधिकारी युवराज अंगद को वानरों के सम्राट्‌ के रूप में प्रतिष्ठित कर, आपको भ्रातृ वध के अपराध के दंडस्दरूप मृत्यु-दंड...'

शुक की बात अभी पूरी नहीं हुई थी कि अंगद उस पर झपट पड़े। इससे पहले कि कोइ उन्हें रोकता. उन्होंने शुक के मुख पर तीन-चार मुष्टि-प्रहार कर डाले । वह मुख से रक्त थूक रहा था कि राम ने आगे बढ़‌कर अंगद की बांह पकड़ ली।

अंगद का शरीर, राम के स्पर्श से जैसे बंध गया किन्तु उनकी जिह्वा चल निकली, 'नीच ! तू यहां अपनी धूर्तता दिखाने आया है। हममें फूट का विष-वृक्ष बोना चाहता है। तेरा राजाधिराज क्या सारे विश्व का न्यायनियंता है ! उसने किस न्याय से कुबेर की लंका छीनी थी तथा अन्य लोगों के राज्यों, धन तथा स्त्रियों का हरण किया था। जा, जाकर उसे कह दे कि वह राजनीति की चिंताएं अब छोड़ दे। हम स्वयं लंका में आ रहे हैं, उसके अपराधों और पापों के लिए उसे मृत्युदंड देने; और लंका के हेमसिंहासन पर न्यायोचित उत्तराधिकारी को बैठाने...'

'शांत हो जाओ, युवराज !' राम मधुर स्वर में बोले, 'इस व्यक्ति पर क्रोध करना अनावश्यक है। यह तो दूत मात्र है।' वे शुक की ओर मुड़े, 'दूत ! यद्यपि रावण ने मुझसे सम्बोधित होना अपने लिए अवमानना माना है, फिर भी जब कभी रावण के पास पहुंच सको, उसे मेरा एक संदेश दे देना।' वे थमकर बोले, 'मेरे पास न राज्य है, न सत्ता, न सेना- मैं निर्धन, कंगाल तथा निष्कासित वनवासी हूं; किन्तु मेरे पास अपने इन मित्रों के रूप में जो धन है, वह रावण के साम्राज्य पर भी भारी पड़ेगा।' वे मुसकराए।

नरेन्द्र कोहली अभूदय 

रविवार, 29 जून 2025

 पहले तो रावण ने रक्षिकाओं को ही आदेश दिया कि सीता को अशोक-वाटिका तक पहुंचा आएं; किंतु बाद में जाने क्या सोचकर उसने अपना विचार बदल दिया था। सीता को अशोक-वाटिका तक पहुंचाने के लिए वह स्वयं साथ आया था। उसका साथ आना सुरक्षा-व्यवस्था की दृष्टि से आवश्यक नहीं था। जितने सशस्त्र सैनिक सीता के रथ को घेरकर चल रहे थे, उनका विरोध कर, उनके हाथों से निकल जाना, सीता की अपनी कल्पना के लिए भी दुरूह था। किंतु, फिर भी रावण साथ चल रहा था ।

"सीते !" रावण का स्वर अत्यन्त कोमल था ।

सीता ने उसकी बातों तथा संबोधनों के उत्तर प्रायः बंद कर दिए। क्या उत्तर दिया जाए इस षड्यंत्रकारी नीच पुरुष की बातों का !

"सीते ! यदि तुम स्वेच्छा से मुझे अंगीकार कर लो तो मैं राम और लक्ष्मण को जीवित छोड़ दूंगा और उन्हें कोई छोटा-मोटा राज्य भी दे दूंगा।" वह रुका, "और स्त्री के बिना राम यदि अत्यन्त दुःखी हो, तो मैं उसका विवाह शूर्पणखा से कर दूंगा।"

"तुम्हारी बहन तो अपने दहेज में लंका का राज्य और राजाधिराज का शव लाने वाली थी।" सीता का स्वर वितृष्णा से भर उठा।

रावण हतप्रभ रह गया।

उसे अपनी स्थिति में उबरने में कुछ क्षण लगे, "क्या कहा था शूर्पणखा ने ?"

 "उसी से क्यों नहीं पूछ लेते !"

रावण सीता को देखता रह गया। वह सीता को नहीं जानता था, किंतु शूर्पणखा को जानता था। उसकी कामाग्नि वस्तुतः इतनी उग्र थी कि यदि उसका वश चलता तो वह अपनी इच्छापूर्ति के लिए अपने समस्त बंधुओं तथा लंका के साम्राज्य को होम डालती। शूर्पणखा रावण की वास्तविक बहन थी ।

सहसा रावण का ध्यान दूसरी ओर चला गया। यदि किसी प्रकार राम लंका के आस-पास या लंका में आ गया और उसने शूर्पणखा की इच्छा पूर्ण कर दी तो लंका में भयंकर गृह-युद्ध होगा। शूर्पणखा रावण सरीखी योद्धा न सही, किंतु युद्ध-कुशल वह भी है। उसके समर्थक एवं प्रेमी भी अनेक हैं। कालकेय दैत्य आज भी उसके इंगित पर मरने को तत्पर बैठे हैं..

रावण ऐसा गृह-युद्ध नहीं चाहेगा। उसे अनेक लोगों से निबटना है।" और सबसे बड़ी बात, सीता से आत्म-समर्पण करवाना है। ऐसी स्थिति में शूर्पणखा का लंका में अधिक दिन रहना उचित नहीं है। वैसे भी यदि सीता ने रावण को अंगीकार कर लिया तो शूर्पणखा अपनी ईर्ष्या और क्रोध में ही जल मरेगी। उससे सावधान रहना होगा और उसे राम से यथासंभव दूर रखना होगा इसी सीता के कारण, किस झंझट में फंस गया रावण ! एक ओर मंदोदरी क्रुद्ध सिंहनी बनी हुई है, दूसरी ओर शूर्पणखा किसी भी समय घातक हो सकती है !

...और विभीषण ! विभीषण रावण की नीति को कभी स्वीकार नहीं करेगा। इन सारी परिस्थितियों में, रावण को लंका में ही पर्याप्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है रावण को पहले अपने घर का व्यूह साधना होगा शूर्पणखा को तो तत्काल ही अश्मद्वीप भेज देना होगा। उसका यहां रहना रावण के लिए घातक है। रावण की ओर से निराश होकर, वह राम को लंका में बुलाने का भी प्रयत्न कर सकती है और यदि राम लंका में आ गया उसने एक बार मुसकराकर शूर्पणखा की ओर देख लिया तो शूर्पणखा उसकी प्रणय-कृपा पाने की एक आशा में ही लंका को फूंक देगी...


कैसे झंझट में फंस गया रावण! केवल इस एक स्त्री के कारण..


रावण ने दृष्टि फेरकर सीता को देखा दासियों में घिरी, गंभीर तथा परेशान सीता ! इसे प्राप्त न किया तो राजाधिराज होने की क्या सार्थकता ? इसे पाने के लिए प्राणन दिए, तो जीवन की क्या उपयोगिता ? शूर्पणखा, राम को पाने के लिए यदि लंका को फूंक सकती है, तो रावण सीता को पाने के लिए संपूर्ण राक्षस साम्राज्य दांव पर लगा सकता है।


तभी प्रतिरावण हंसा, "यह विरोध राम और रावण का है या रावण और


शूर्पणखा का..?"

पर रावण का ध्यान प्रतिरावण से हटकर किन्ही अनजाने मागों पर भटकन भरी यात्राएं करता चला गया। सीता-प्राप्ति तो बाद में होगी, पहले उसे अपने घर में अपना शासन स्थापित करना पड़ेगा।


प्रतिरावण भी विलीन हो गया। इस बार उसने अधिक हठ नहीं ठाना। कदाचित् शूर्पणखा का भय उपजा जाना ही उसे पर्याप्त लगा था ।


सीता से रावण ने कोई विशेष बातचीत करने का प्रयास नहीं किया। वह अन्यमनस्क-सा बैठा, किन्ही गुत्थियों को मन-ही-मन सुलझाता रहा। उसके संकेत पर ही रथ अशोक वाटिका में प्रविष्ट हुआ। उसकी दृष्टि वाटिका के बाह्र स्थापित किए गए सैनिक शिविरों पर पड़ी- एक बार मन में आया भी कि एक साधारण-सी कोमल और कमनीय स्त्री को बन्दी बनाए रखने के लिए इतने सैनिकों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए पर तत्काल ही उसका मन सशंक हो उठा. सीता के सम्बन्ध में तनिक भी असावधानी नहीं बरती जानी चाहिए। अपने बल पर मीता निकल भागने का प्रयत्न कदाचित् न भी करे, किन्तु शूर्पणखा अपने सहायकों के माध्यम में उसकी हत्या भी कर सकती है। मीता की हत्या ! इस कल्पना से ही रावण का मन क्षुब्ध हो उठता है विभीषण उभे मुका करवाने में गहायक हो सकता है। और मंदोदरी? फिर राम के पक्ष का भी कोई व्यक्ति आ सकता है। इन षड्यंत्रों के विरुद्ध रावण को सावधान रहना होगा पहरे में शिथिलता नहीं करनी होगी...


प्रतिरावण ने अट्टहास किया "राम का भय तेरे रक्त में घुल गया है. उसके यहां आ पहुंचने की ६. कल्पना करने लगा है तू?..."

 द्वार पर किसी के हाथ की थाप पड़ी ।

राम तत्काल उठ खड़े हुए। आज कुछ भी असहज नहीं था। किसी भी क्षण कोई भी सूचना आ सकती थी।...

राम ने कपाट खोला। दीपक के प्रकाश में सामने सौमित्र खड़े थे। उनका चेहरा पहले से भी अधिक निर्जीव लग रहा था। एक ही संध्या में कितने बदल गये थे सौमित्र !

"अभी तक सोये नहीं ?" राम स्वयं को संभालकर अत्यन्त कोमल स्वर में बोले, "कोई समाचार आया है क्या ?"

लक्ष्मण ने ऐसी दृष्टि से राम को देखा, जैसे उनकी कठोरता के विरुद्ध शिकायत कर रहे हों। फिर आंखें झुकाकर धीमे स्वर में बोले, "थोड़ी देर आपके पास बैठ सकता हूं ?"...

राम हतप्रभ रह गये वे एक के पश्चात एक भूल कैसे करते जा रहे हैं. पहले भी उन्होंने सौमित्र की भावनाओं की ओर ध्यान नहीं दिया था, अब फिर वे उनकी ओर से आंखें मूंद, अपने कुटीर में अकेले बंद हो गये थे। अपने दुख को कलेजे से लगाये, लोगों की दृष्टि से बचकर, एकांत में रोने का प्रयत्न कर रहे थे - उन्होंने क्यों नहीं सोचा कि इस दुख का बहुत बड़ा अंश उनके और सौमित्र के बीच सामान्य भी था। सीता उनकी पत्नी हैं तो सौमित्र की सखावत भाभी. मुखर उनसे बढ़कर सौमित्र का मित्र था फिर अन्याय के विरुद्ध यह युद्ध, जीवन का यह लक्ष्य, अकेले राम का नहीं था। वनवास में, लक्ष्य के लिए संघर्ष में सौमित्र कभी पीछे नहीं रहे थे फिर सौमित्र से अलग उनका दुख अपना कैसे हो सकता है. दोनों का दुख था, दोनों को सहना था इसको तो भाई के वक्ष से लगकर ही, साथ रोकर ही सहन किया जा सकता था; और भाई के कंधे से कंधा मिलाकर ही इसका प्रतिकार किया जा सकता था.

"आओ, सौमित्र !" राम का स्वर विह्वल हो उठा। वे लक्ष्मण को उनके बांहों से घेर भीतर ले आये ।

लक्ष्मण को आसन पर बैठा, राम सम्मुख बैठ गये। सहज होने का प्रयत्न करते हुए धीरे से बोले, "बहुत दुखी हो, सौमित्र ?"

लक्ष्मण तुरन्त नहीं बोले। कुछ देर शून्य में देखते रहे, जैसे बोलने के लिए शक्ति बटोर रहे हों, "दुखी क्षुब्ध अपमानित सबसे अधिक अपराध-बोध से पीड़ित हूं..।"

"सौमित्र !"

"मुझे दंड दें, भैया ! मैं अपराधी विश्वासघाती..." राम चौके, "क्या है तुम्हारे मन में, सौमित्र!"...

"आपकी अनुपस्थिति में रक्षा का दायित्व मेरा था।" लक्ष्मण का स्वर अत्यन्त उदास था, "भाभी के अपहरण, मुखर के वध के लिए अपराधी मैं हूं। उन्हें अकेले, असुरक्षित छोड़कर जाने का औचित्य..."

"सौमित्र ! सीता और मुखर 'वस्तु' नहीं थे, जिनकी रक्षा का दायित्व तुम पर था।" राम बोले, "वे सचेतन प्राणी थे। तुम्हारे संरक्षित थे, किंतु तुम्हारे साथी भी थे। वे सैनिक थे और शत्रु से युद्ध कर रहे थे।" राम ने रुककर लक्ष्मण को देखा, "इस दीर्घकालीन युद्ध में अनेक छोटी-बड़ी झड़पों में हम विजयी हुए हैं, किंतु इस झड़प में शत्रु विजयी हो गया है। इस पराजय को उसके वास्तविक रूप में ग्रहण कर, हमें आगामी व्यूह के लिए सन्नद्ध रहना चाहिए। अपनी भूलों से कुछ सीख आगे बढ़ना चाहिए। तुम्हें दंड किस बात का दूं ?..."

"मैं अपनी ग्लानि और अपराध-बोध का क्या करूं?" अपनी व्याकुलता में लक्ष्मण ने अपने सिर को अनेक झटके दिये ।

"यह तर्क नहीं, भावना है- जो निजी क्षति से उत्पन्न हुई है।" राम का स्वर भर्रा आया, "निजी रूप से मैं भी बहुत पीड़ित हूं, सौमित्र ! व्यक्तिगत क्षति के लिए बहुत रो चुका हूं। अब सैनिक-धर्म समझने का प्रयत्न कर रहा हूं।"

लक्ष्मण की दृष्टि में राम के लिए सम्मान और स्नेह दोनों थे, "आपके जैसा ठंडा कलेजा कहां से लाऊं?" लक्ष्मण की आंखों से अश्रु चू पड़े, "इस धधकती ज्वाला का क्या करूं ? इच्छा होती है, इस सृष्टि को नष्ट कर दूं, यहां न्याय कभी विजयी नहीं होगा।"

राम स्नेहसिक्त आंखों से लक्ष्मण को निहारते रहे, जैसे उनकी भावना की प्रशस्ति गा रहे हों; और फिर धीरे से बोले, "आग तो मेरे वक्ष में भी ऐसी लगी है कि स्वयं ही भस्मीभूत होने की आशंका जगती है। विनाश का उन्माद मेरे मन में भी बवंडर के समान उठा था; किन्तु सौमित्र ! संसार के कुछ नियम हैं। उनके विरुद्ध आचरण करने से कभी सफलता नहीं मिलती। हमें धैर्य तथा विवेक से योजनाबद्ध रूप में सीता की खोज करनी होगी। सीता का अपहरणकर्ता ही मुखर का हत्यारा भी है। उसकी शक्ति के अनुरूप अपना संगठन करना होगा। ऐसा न हो कि अपनी असावधानी से हम अपना अहित कर बैठें और वैदेही के लिए और अधिक कष्ट के कारण बन जाएं ו"

"मैं क्या करूं, भैया ?"

"अपने शोक को ऊर्जा में बदलो।" राम की शांति में उनका संकल्प बोल रहा था, "व्यक्ति के रूप में नहीं, सैनिक के रूप में सोचो।"

लक्ष्मण ने अपने सिर को झटका दिया, "शोक मना चुका। अब स्वयं को युद्ध के लिए तैयार करूंगा।"

जाने के लिए लक्ष्मण उठ खड़े हुए ।

"आज रात यहीं सो रहो, सौमित्र !" राम के स्वर में अथाह प्यार था।

"नहीं, भैया !" लक्ष्मण के शोक में से उनका ओज. झांक उठा, "शोक का काल समाप्त हुआ। शस्त्रागार के प्रहरी के रूप में, अपने ही कुटीर में सोऊंगा।"

नरेन्द्र कोहली अभूदय 

गुरुवार, 26 जून 2025

 प्राचीन काल में हमारे पूजनीय पूर्वजों ने, ऋषियों ने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से विज्ञान के इस सूक्ष्म तत्त्व को पकड़ा था, उसी की शोध और सफलता में अपनी शक्तियों को लगाया था। फलस्वरूप वे वर्तमान काल के यशस्वी भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अनेक गुने लाभों से लाभान्वित होने में समर्थ समर्थ हुए थे। वे आद्यशक्ति के सूक्ष्म शक्ति प्रवाहों पर अपना अधिकार स्थापित करते थे। यह प्रकट तथ्य है कि मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार की शक्तियों का आविर्भाव होता है। हमारे ऋषिगण योग-साधना के द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में छिपे पड़े हुए शक्ति-केन्द्रों को, चक्रों को, ग्रन्थियों को, मातृकाओं को, ज्योतियों को, भ्रमरों को जगाते थे और उस जागरण से जो शक्ति प्रवाह उत्पन्न होता था, उसे आद्यशक्ति के त्रिविध प्रवाहों में से जिसके साथ आवश्यकता होती थी, उससे सम्बन्धित कर देते थे। जैसे रेडियो का स्टेशन के ट्रांसमीटर यन्त्र से सम्बन्ध स्थापित कर दिया जाता है, तो दोनों की विद्युत् शक्तियाँ सम श्रेणी होने के कारण आपस में सम्बन्धित हो जाती हैं तथा उन स्टेशनों के बीच आपसी वार्तालाप का, सम्वादों का आदान-प्रदान का सिलसिला चल पड़ता है। इसी प्रकार साधना द्वारा शरीर के अन्तर्गत छिपे हुए और तन्द्रित पड़े हुए केन्द्रों का, जागरण करके सूक्ष्म प्रकृति के शक्ति प्रवाहों से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो मनुष्य और आद्यशक्ति आपस में सम्बन्धित हो जाते हैं। इस सम्बन्ध के कारण मनुष्य उस आद्यशक्ति के गर्भमें भरे हुए रहस्यों को समझने लगता है और अपनी इच्छानुसार उनका उपयोग करके लाभान्वित हो सकता है। चूँकि संसार में जो कुछ है वह सब आद्य-शक्ति के भीतर है, इसलिये वह सम्बन्धित व्यक्ति भी संसार के सब पदार्थों और साधनों से अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकता है।

वर्तमान काल के वैज्ञानिक पंचतत्त्वों की सीमा तक सीमित, स्थूल प्रकृति के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए बड़ी-बड़ी कीमती मशीनों को विद्युत्, वाष्प, गैस, पेट्रोल आदि का प्रयोग करके कुछ आविष्कार करते हैं और थोड़ा-सा लाभ उठाते हैं। यह तरीका बड़ा श्रम-साध्य, कष्ट-साध्य, धन-साध्य और समय-साध्य है। उसमें खराबी टूट-फूट और परिवर्तन की खटपट भी आये दिन लगी रहती है। उन यन्त्रों की स्थापना, सुरक्षा और निर्माण के लिए हर समय काम जारी रखना पड़ता है तथा उनका स्थान परिवर्तन तो और भी कठिन होता है। यह सब झंझट भारतीय योग-विज्ञान के विज्ञानवेत्ताओं के सामने नहीं थे। वे बिना किसी यन्त्र की सहायता के, बिना संचालक, विद्युत्, पेट्रोल आदि के केवल अपने शरीर के शक्ति केन्द्रों का सम्बन्ध सूक्ष्म प्रकृति से स्थापित करके ऐसे आश्चर्यजनक कार्य कर लेते थे, जिनकी सम्भावना तक को आज के भौतिक विज्ञानी समझने में समर्थ नहीं हो पा रहे हैं।

महाभारत और लंका युद्ध में जो अस्त्र-शस्त्र व्यवहृत हुए थे, उनमें से बहुत थोड़ों का धुँधला रूप अभी सामने आया है। रडार, गैस बम, अश्रु-बम, रोग कीटाणु बम, परमाणु बम, मृत्यु किरण आदि का धुँधला चित्र अभी तैयार हो पाया है। प्राचीनकाल में मोहक शस्त्र, ब्रह्मपाश, नागपाश, वरुणास्त्र, आग्नेय बाण, शत्रु को मारकर तरकस में लौट आने वाले बाण आदि व्यवहृत होते थे, शब्द वेध का प्रचलन था। ऐसे अस्त्र-शस्त्र किन्हीं कीमती मशीनों से नहीं, मन्त्र बल से चलाये जाते थे, जो शत्रु को जहाँ भी वह छिपा हो, ढूँढ़कर उसका संहार करते थे। लंका में बैठा हुआ रावण और अमेरिका में बैठा हुआ अहिरावण आपस में भली प्रकार वार्तालाप करते थे, उन्हें किसी रेडियो यन्त्र या ट्रांसमीटर की जरूरत नहीं थी। विमान बिना पेट्रोल के उड़ते थे।

अष्ट-सिद्धि और नव-निधि का योग शास्त्रों में जगह-जगह पर वर्णन है। अग्नि में प्रवेश करना, जल पर चलना, वायु के समान तेज दौड़ना, अदृश्य हो जाना, मनुष्य से पशु-पक्षी और पशु-पक्षी से मनुष्य का शरीर बदल लेना, शरीर को बहुत छोटा या बड़ा, बहुत हल्का या भारी बना लेना, शाप से अनिष्ट उत्पन्न कर देना, वरदानों से उत्तम लाभों की प्राप्ति, मृत्यु को रोक लेना, पुत्रेष्टि यज्ञ, भविष्य का ज्ञान, दूसरों के अन्तस् की पहचान, क्षण भर में यथेष्ट धन, ऋतु, नगर, जीव-जन्तु गण, दानव आदि उत्पन्न कर लेना, समस्त ब्रह्माण्ड की हलचलों से परिचित होना, किसी वस्तु का रूपान्तर कर देना, भूख, प्यास, नींद, सर्दी-गर्मी पर विजय, आकाश में उड़ना आदि अनेकों आश्चर्य भरे कार्य केवल मन्त्र बल से, योगशक्ति से, अध्यात्म विज्ञान से होते थे और उन वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिये किसी प्रकार की मशीन, पेट्रोल, बिजली आदि की जरूरत न पड़ती थी। यह कार्य शारीरिक विद्युत् और प्रकृति के सूक्ष्म प्रवाह का सम्बन्ध स्थापित कर लेने पर बड़ी आसानी से हो जाते थे। यह भारतीय विज्ञान था, जिसका आधार था-साधना ।

साधना द्वारा केवल तम तत्त्व से संबंध रखने वाले उपरोक्त प्रकार के भौतिक चमत्कार ही नहीं होते वरन् रज और सत् क्षेत्र के लाभ एवं आनन्द भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त किये जा सकते हैं। हानि, शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विपन्न परिस्थितियों में पड़कर जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य मानसिक कष्ट पाते हैं, वहाँ आत्म-शक्तियों के उपयोग की विद्या जानने वाला व्यक्ति विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा और ईश्वर-विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते-हँसते आसानी से काट लेता है और बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी अपने आनन्द को बढ़ाने का मार्ग ढूँढ़ निकालता है। वह जीवन को इतनी मस्ती, प्रफुल्लता और मजेदारी के साथ बिताता है, जैसा कि बेचारे करोड़पतियों को भी नसीब नहीं हो सकता। जिसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आत्मबल के कारण ठीक बना हुआ है, उसे बड़े अमीरों से भी अधिक आनन्दमय जीवन बिताने का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है। रज शक्ति का उपभोग जानने का यह लाभ भौतिक विज्ञान द्वारा मिलने वाले लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

पंडित श्री राम शर्मा 

 गायत्री सूक्ष्म शक्तियों का स्रोत है

पिछले पोस्ट पर बतलाया जा चुका है कि एक अव्यय, निर्विकार, अजर-अमर परमात्मा की 'एक से अधिक हो जाने' की इच्छा हुई। ब्रह्म में स्फुरण हुआ कि 'एकोऽहं बहुस्याम्' मैं अकेला हूँ, बहुत हो जाऊँ। उसकी यह इच्छा ही शक्ति बन गयी। इस इच्छा, स्फुरणा या शक्ति को ही ब्रह्म पत्नी कहते हैं। इस प्रकार बह्म एक से दो हो गया। अब उसे लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधे-श्याम, उमा-महेश, शक्ति-शिव, माया-ब्रह्म, प्रकृति- परमेश्वर आदि नामों से पुकारने लगे।

इस शक्ति के द्वारा अनेक पदार्थों तथा प्राणियों का निर्माण होना था, इसलिए उसे भी तीन भागों में अपने को विभाजित कर देना पड़ा; ताकि अनेक प्रकार के सम्मिश्रण तैयार हो सकें और विविध गुण, कर्म, स्वभाव वाले जड़, चेतन पदार्थ बन सकें। ब्रह्मशक्ति के ये तीन टुकड़े (१) सत् (२) रज (३) तम-इन तीन नामों से पुकारे जाते हैं। सत् का अर्थ है- ईश्वर का दिव्य तत्त्व। तम का अर्थ है- निर्जीव पदार्थों में परमाणुओं का अस्तित्व । रज का अर्थ है- जड़ पदार्थों और ईश्वरीय दिव्य तत्त्व के सम्मिश्रण से उत्पन्न हुई आनन्ददायक चैतन्यता, ये तीन तत्त्व स्थूल सृष्टि के मूलकारण हैं। इनके उपरान्त स्थूल उपादान के रूप में मिट्टी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश-ये पाँच स्थूल तत्त्व और उत्पन्न होते हैं। इन तत्त्वों के परमाणुओं तथा उनकी शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तन्मात्राओं द्वारा सृष्टि का सारा कार्य चलता है। प्रकृति के दो भाग हैं- सूक्ष्म प्रकृति जो शक्ति प्रवाह के रूप में, प्राण संचार के रूप में कार्य करती है, वह सत्, रज, तममयी है। स्थूल प्रकृति जिससे दृश्य पदार्थों का निर्माण एवं उपयोग होता है, परमाणुमयी है। यह मिट्टी, पानी, हवा आदि स्थूल पञ्चतत्त्वों के आधार पर अपनी गतिविधि जारी रखती है।

आप समझ गये होंगे कि पहले एक ब्रह्म था, उसकी स्फुरणा से आदिशक्ति का आविर्भाव हुआ। इस आदिशक्ति का नाम ही गायत्री है। जैसे ब्रह्म ने अपने तीन भाग कर लिये- (१) सत्- जिसे 'ह्रीं' या सरस्वती कहते हैं (२) रज- जिसे 'श्रीं' या लंक्ष्मी कहते हैं (३) तम- जिसे 'क्लीं' या काली कहते हैं। वस्तुतः सत् और तम दो ही विभाग हुए थे, इन दोनों के मिलने से जो धारा उत्पन्न हुई, वह रज कहलाती है। जैसे गंगा, यमुना जहाँ मिलती है, वहाँ उनकी मिश्रित धारा को सरस्वती कहते हैं। सरस्वती वैसे कोई पृथक् नदी नहीं है। जैसे इन दो नदियों के मिलने से सरस्वती हुई वैसे ही सत् और तम के योग से रज उत्पन्न हुआ और यह त्रिधा प्रकृति कहलाई ।

अद्वैतवाद, द्वैतवाद, त्रैतवाद का बहुत झगड़ा सुना जाता है, वस्तुतः यह समझने का अन्तर मात्र है। ब्रह्म, जीव, प्रकृति यह तीनों ही अस्तित्व में हैं। पहले एक ब्रह्म था यह ठीक है, इसलिये अद्वैतवाद भी ठीक है। पीछे ब्रह्म और शक्ति (प्रकृति) दो हो गये, इसलिए द्वैतवाद भी ठीक है। प्रकृति और परमेश्वर के संस्पर्श से जो रसानुभूति और चैतन्यता मिश्रित रज सत्ता उत्पन्न हुई, वह जीव कहलायी। इस प्रकार त्रैतवाद भी ठीक है। मुक्ति होने पर जीव सत्ता नष्ट हो जाती है। इससे भी स्पष्ट है कि जीवधारी की जो वर्तमान सत्ता मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के ऊपर आधारित है, वह एक मिश्रण मात्र है।

तत्त्व-दर्शन के गम्भीर विषय में प्रवेश करके आत्मा के सूक्ष्म विषयों पर प्रकाश डालने का यहाँ अवसर नहीं है। इन पंक्तियों में तो स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति का भेद बताया था, क्योंकि विज्ञान के दो भाग यहीं से होते हैं, मनुष्यों की द्विधा प्रकृति यहीं से बनती है। पञ्चतत्त्वों द्वारा काम करने वाली स्थूल प्रकृति का अन्वेषण करने वाले मनुष्य, भौतिक विज्ञानी कहलाते हैं। उन्होंने अपने बुद्धि बल से पञ्चतत्त्वों के भेद-उपभेदों को जानकर उनसे अनेक लाभदायक साधन प्राप्त किये। रसायन, कृषि, विद्युत्, वाष्प, शिल्प, संगीत, भाषा, साहित्य, वाहन, गृह-निर्माण, चिकित्सा, शासन, खगोल विद्या, अस्त्र-शस्त्र, दर्शन, भू- परिशोध आदि अनेक प्रकार के सुख-साधन खोज निकाले और रेल, मोटर, तार, डाक, रेडियो, टेलीविजन, फोटो आदि विविध वस्तुयें बनाने के बड़े-बड़े यंत्र निर्माण किये। धन, सुख, सुविधा और आराम के साधन सुलभ हुए। इस मार्ग से जो लाभ मिलता है, उसे शास्त्रीय भाषा में 'प्रेय' या 'भोग' कहते हैं। यह विज्ञान, भौतिक विज्ञान कहलाता है। यह स्थूल प्रकृति के उपयोग की विद्या है।

सूक्ष्म प्रकृति वह है, जो आद्यशक्ति गायत्री से उत्पन्न होकर सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा में बँटती है। यह सर्वव्यापिनी शक्ति-निर्झरिणी पंचतत्त्वों से कहीं अधिक सूक्ष्म है। जैसे नदियों के प्रवाह में, जल की लहरों पर वायु के आघात होने के कारण 'कल-कल' से मिलती-जुलती ध्वनियाँ उठा करती हैं, वैसे ही सूक्ष्म प्रकृति की शक्ति-धाराओं से तीन प्रकार की शब्द-ध्वनियाँ उठती हैं। सत् प्रवाह में 'ह्रीं', रज प्रवाह में 'श्रीं' और तम प्रवाह में 'क्ली' शब्द से मिलती-जुलती ध्वनि उत्पन्न होती है। उससे भी सूक्ष्म ब्रह्म का ॐकार ध्वनि प्रवाह है। नादयोग की साधना करने वाले ध्यान मग्न होकर इन ध्वनियों को पकड़ते हैं और उनका सहारा पकड़ते हुए सूक्ष्म प्रकृति को भी पार करते हुए ब्रह्म सायुज्य तक जा पहुँचते हैं। 

पंडित श्री राम शर्मा 

 ब्रह्म की स्फुरणा से गायत्री का प्रादुर्भाव

अनादि परमात्म तत्त्व ब्रह्म से यह सब कुछ उत्पन्न हुआ। सृष्टि उत्पन्न करने का विचार उठते ही ब्रह्म में एक स्फुरणा उत्पन्न हुई, जिसका नाम है-शक्ति। शक्ति के द्वारा दो प्रकार की सृष्टि उत्पन्न हुई- एक जड़, दूसरी चैतन्य । जड़ सृष्टि का संचालन करने वाली शक्ति 'प्रकृति' और चैतन्य सृष्टि का संचालन करने वाली शक्ति का नाम 'सावित्री' है।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि सृष्टि के आदिकाल में भगवान् की नाभि में से कमल उत्पन्न हुआ। कमल के पुष्प में से ब्रह्मा हुए, ब्रह्मा से सावित्री हुई, सावित्री और ब्रह्मा के संयोग से चारों वेद उत्पन्न हुए। वेद से समस्त प्रकार के ज्ञानों का उद्भव हुआ। तदनन्तर ब्रह्माजी ने पंचभौतिक सृष्टि की रचना की। इस आलंकारिक गाथा का रहस्य यह है-निर्लिप्त, निर्विकार, निर्विकल्प परमात्म तत्त्व की नाभि में से, केन्द्र भूमि में से-अन्तःकरण में से कमल उत्पन्न हुआ और वह पुष्प की तरह खिल गया। श्रुति ने कहा कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा की इच्छा हुई कि 'एकोऽहं बहुस्याम्' मैं एक से बहुत हो जाऊँ। यह उसकी इच्छा, स्फुरणा नाभि देश में से निकल कर स्फुटित हुई अर्थात् कमल की लतिका उत्पन्न हुई और उसकी कली खिल गयी।

इस कमल पुष्प पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। ये ब्रह्मा सृष्टि-निर्माण की त्रिदेव शक्ति का प्रथम अंश है। आगे चलकर यह त्रिदेवी शक्ति उत्पत्ति, स्थिति और नाश का कार्य करती हुई, ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में दृष्टिगोचर होती है। आरम्भ में कमल के पुष्प पर केवल ब्रह्माजी ही प्रकट होते हैं, क्योंकि सर्वप्रथम उत्पन्न करने वाली शक्ति की आवश्यकता हुई।

अब ब्रह्माजी का कार्य आरम्भ होता है। उन्होंने दो प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की-एक चैतन्य, दूसरी जड़। चैतन्य शक्ति के अन्तर्गत सभी जीव आ जाते हैं, जिनमें इच्छा, अनुभूति, अहंभावना पाई जाती है। चैतन्य की एक स्वतंत्र सृष्टि है, जिसे विश्व का 'प्राणमय कोश' कहते हैं। निखिल विश्व में एक चैतन्य तत्त्व भरा हुआ है, जिसे 'प्राण' नाम से पुकारा जाता है। विचार, संकल्प, भाव, इस प्राण तत्त्व के तीन वर्ग हैं और सत्, रज, तम यह तीन इसके वर्ण हैं। इन्हीं तत्त्वों को लेकर आत्माओं के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर बनते हैं। सभी प्रकार के प्राणी इसी प्राण तत्त्व से चैतन्यता एवं जीवन सत्ता प्राप्त करते हैं।

जड़ सृष्टि निर्माण के लिए ब्रह्माजी ने पंचभूतों का निर्माण किया। पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश के द्वारा विश्व के सभी परमाणु मय पदार्थ बने। ठोस, द्रव, गैस इन्हीं तीन रूपों में प्रकृति के परमाणु अपनी गतिविधि जारी रखते हैं। नदी, पर्वत, धरती आदि का सभी पसारा इन पंच-भौतिक परमाणुओं का खेल है, प्राणियों के स्थूल शरीर भी इन्हीं प्रकृति जन्य पंच-तत्त्वों के बने होते हैं।

क्रिया जड़-चेतन, दोनों सृष्टि में है। प्राणमय चैतन्य सृष्टि में अहंभाव, संकल्प और प्रेरणा की गतिविधियाँ विविध रूपों में दिखलाई पड़ती हैं। भूतमय जड़ सृष्टि में, शक्ति, हलचल और सत्ता इन आधारों के द्वारा विविध प्रकार के रंग-रूप, आकार-प्रकार बनते-बिगड़ते रहते हैं। जड़ सृष्टि का आधार परमाणु और चैतन्य सृष्टि का आधार संकल्प है। दोनों ही आधार अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त बलशाली हैं, इनका नाश नहीं होता केवल रूपान्तर होता रहता है।

जड़-चेतन सृष्टि के निर्माण में ब्रह्माजी की दो शक्तियाँ काम कर रही हैं- (१) संकल्प शक्ति (२) परमाणु शक्ति । इन दोनों में प्रथम संकल्प शक्ति की आवश्यकता हुई, क्योंकि बिना उसके चैतन्य का आविर्भात नहीं होता और बिना चैतन्य के परमाणु का उपयोग किस लिए होता। अचैतन्य सृष्टि तो अपने में अचैतन्य थी, क्योंकि न तो उसको किसी का ज्ञान होता और न उसका कोई उपयोग होता है। 'चैतन्य' के प्रकटीकरण की सुविधा के लिए उसकी साधन- सामग्री के रूप में 'जड़' का उपयोग होता है। अस्तु, आरम्भ में ब्रह्माजी ने चैतन्य बनाया, ज्ञान के संकल्प का आविष्कार किया, पौराणिक भाषा में यह कहिये कि सर्वप्रथम वेदों का प्राकट्य हुआ।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि ब्रह्मा के शरीर से एक सर्वांग सुन्दरी तरुणी उत्पन्न हुई, यह उनके अंग से उत्पन्न होने के कारण उनकी पुत्री हुई। इसी तरुणी की सहायता से उन्होंने अपना सृष्टि निर्माण कार्य जारी रखा। इसके पश्चात् उस अकेली रूपवती युवती को देखकर उनका मन विचलित हो गया और उन्होंने उससे पत्नी के रूप में रमण किया। इस मैथुन से मैथुनी संयोजक परमाणुमय पंचभौतिक-सृष्टि उत्पन्न हुई। इस कथा के आलंकारिक रूप को-रहस्यमय पहेली को न समझकर कई व्यक्ति अपने मन में प्राचीन तत्त्वों को उथली और अश्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। वे भूल जाते हैं कि ब्रह्या कोई मनुष्य नहीं है और न ही उनसे उत्पन्न हुई शक्ति पुत्री या स्त्री है और न पुरुष-स्त्री की तरह उनके बीच में समागम होता है। इस सृष्टि निर्माण काल के एक तथ्य को गूढ़ पहेली के रूप में आलंकारिक ढंग से प्रस्तुत करके कवि ने अपनी कलाकारिता का परिचय दिया है।

ब्रह्मा, निर्विकार परमात्मा की शक्ति है, जो सृष्टि का निर्माण करती है। इस निर्माण कार्य को चालू करने के लिये उसकी दो भुजाएँ हैं, जिन्हें संकल्प और परमाणु शक्ति कहते हैं। संकल्प शक्ति चेतन सत्- सम्भव होने से ब्रह्मा की पुत्री है। परमाणु शक्ति स्थूल क्रियाशील एवं तम-सम्भव होने से ब्रह्मा की पत्नी है। इस प्रकार गायत्री और सावित्री ब्रह्मा की पुत्री तथा पत्नी नाम से प्रसिद्ध हुई।

पंडित श्री राम शर्मा 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...