गुरुवार, 25 मई 2023

 पहले कुछ दिनों से लक्ष्मण और मुखर अधिक-से-अधिक व्यस्त होते गए थे । वे लोग थोड़े-थोड़े समय के पश्चात् राक्षसों की सैनिक टुकड़ियों की गतिविधियों की सूचनाएं ला रहे थे। सूचनाओं से लगता था कि राक्षस बड़ी सावधानी से योजनाबद्ध रूप में आगे बढ़ रहे थे, और उनकी इच्छा बड़े तथा आकस्मिक आक्रमण की थी।

ग्रामवासी क्रमशः अपना भय छोड़ते गए थे और उनमें से खेतों में काम करने वालों की संख्या बढ़ती चलती गयी थी। शीघ्र ही गांव की पूरी जनसंख्या कृषि- कर्म में सम्मिलित हो गयी थी। जैसे-जैसे उनका भय कम हुआ था, स्त्रियां और बच्चे भी उस सामूहिक जीवन में सहभागी हो गए थे। कृषि के साथ ही वे अन्य गतिविधियों में भी सम्मिलित हो गए थे। करघे चलने लगे थे, कुंभकार का चाक घूमने लगा था और लकड़ी का विविध प्रकार का सामान बनने लगा था । अन्य प्रकार की शालाओं के साथ-साथ मुखर की संगीतशाला भी बहुत लोकप्रिय हो गयी थी। किंतु इतना होते हुए भी माखन और उसके साथी न तो भूमि को अपना मानने को तैयार थे और न वे लोग आश्रम के सैनिक प्रशिक्षण में सम्मिलित होने को सहमत हुए थे। इन दो कामों के लिए राम ने जब-जब प्रयत्न किया, असफल रहे। ग्राम का धातुकर्मी आश्रम के लिए शस्त्र बना देता था, किंतु अपने पास एक खड्ग रखने के लिए भी कभी तत्पर नहीं हुआ ।

इसलिए राम को ग्रामीणों की अधिक चिन्ता थी। अभी तक कुछ निश्चित नहीं था कि राक्षस कितनी संख्या में आएंगे और एक ही स्थान पर आक्रमण करेंगे अथवा एकाधिक टुकड़ियों में बंटकर, अनेक स्थानों पर धावा बोलेंगे वैसे तो अनिन्द्य की बस्ती, धर्मभृत्य का आश्रम, भीखन का ग्राम तथा आनन्दसागर का आश्रम ऐसी संचार व्यवस्था में बंधे हुए थे कि छोटी-छोटी घटनाओं की सूचनाएं भी तत्काल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच रही थीं - फिर भी यदि ग्रामवासी किसी ऐसे स्थान पर घिर गए, जहां तत्काल सहायता पहुंचाना संभव नहीं हुआ तो शस्त्रहीन होने के कारण वे लोग तनिक भी प्रतिरोध नहीं कर पाएंगे.''। दूसरी कठिनाई यह थीं कि वे नहीं चाहते थे कि राक्षस उन्हें राम के पक्ष में मानें, इसलिए वे अपनी सुरक्षा के लिए भी, आश्रम में आने को प्रस्तुत नहीं थे...

आश्रम में युद्ध समिति बैठी और विभिन्न कोणों से विचार-विमर्श किया गया। सुरक्षा की दृष्टि से खान, बस्ती, धर्ममृत्य का आश्रम, भीखन का गांव, आनन्दसागर का आश्रम तथा खेत सब ही महत्त्वपूर्ण स्थान थे। किन्तु सबसे , महत्त्वपूर्ण थी जनसंख्या । जन-प्राण की रक्षा सबसे अधिक आवश्यक थी, दूसरी कोटि में थी प्राकृतिक सम्पत्ति अर्थात् खान और खेत आनन्दसागर आश्रम में रखा हुआ शस्त्रागार भी महत्त्वपूर्ण था, किन्तु राम का तत्संबंधी प्रस्ताव मान लिया गया कि समस्त शस्त्र योद्धा अपने साथ रखें- - आवश्यक होने पर एकाधिक शस्त्र रखें, ताकि न शस्त्रागार की समस्या रहे, न ये शस्त्र शत्रुओं के हाथ पड़ें ।


नरेंद्र कोहली के उपन्यास अभ्दूय का एक अंश 

बुधवार, 24 मई 2023

 "आओ, भास्वर ! स्वागत, मुर्त !" अगस्त्य मुस्करा रहे थे।

मुर्त ने चौंककर अगस्त्य को देखा, “आपको मेरा नाम कहां से ज्ञात

हुआ ?"

"क्या वह कोई गोपनीय वस्तु है ?" ऋषि अब भी मुसकरा रहे थे।

"नहीं। पर..." 'मुर्त समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहे, आपका इस क्षेत्र के जन-जीवन से इतना अधिक संपर्क है कि किसी एक गांव के किसी एक साधारण व्यक्ति का खोया हुआ बेटा लौट आए, तो उसकी भी सूचना आपको हो जाए ।"

गुरु की मुसकान कुछ और गहरी हुई, "वैसे तो किसी के खोए हुए बेटे का घर लौट आना भी मानव जीवन की बहुत बड़ी घटना है; किंतु इस समाचार को हमारे आश्रम ने दूसरे ही प्रकार से देखा है। समाचार यह नहीं है कि भास्वर का बेटा मुर्त घर लौट आया है।"

"तो क्या समाचार है..?” मुर्त अचकचाता सा गुरु को देख रहा था।

" समाचार है.." गुरु की मुसकान स्निग्ध थी, "कि राक्षसों का एक जलपोत समुद्र में चुपचाप ठहर गया । उसमें से एक नाव जल में उतारी गयी और वह नाव एक व्यक्ति को समुद्र तट पर उतारकर चुपके से लौट गयी । वह व्यक्ति जो तट पर उतारा गया, भास्वर का बेटा मुर्त तो है ही, रावण के अनेक विशाल जलपोतों का निर्माता तथा नियंत्रक रहा है; और जल परिवहन के साधनों का अधिकारी विद्वान है।"

"क्या ?" मुर्त का मुख आश्चर्य से खुल गया, "आप यह कैसे जानते हैं ? ये तथ्य मेरे माता-पिता तक नहीं जानते। उन्होंने कभी यह जानने की चिंता ही नहीं की । ...."

" उन्हें इन बातों की भी चिंता करनी चाहिए, यह मैं उन्हें सिखा रहा हूं ।" " पर आपको ये सूचनाएं कैसी मिलीं ?"

"मेरे अपने साधन हैं, पुत्र ! समय आने पर तुम्हें ज्ञात हो जाएगा गुरु मुसकराए, “बताओ, तुम्हारा कार्यक्रम क्या है ? मेरा तात्पर्य है कि रावण के साम्राज्य का वैभव देखने के पश्चात् तुम इस वानर- यूथ के सदस्य बनकर यहां रहना चाहोगे ? रह सकोगे ? या लौट जाओगे ?"

"बाधा तो मुझे यहां है ही, ऋषिवर!" मुर्त का स्वर अनायास ही सम्मानपूर्ण हो गया, "मुझे यहां रुकने में तो कोई लाभ नहीं दिखता ।"

"लाभ किस दृष्टि से, पुत्र ?" ऋषि ने पूछा, "तुम्हारी आर्थिक समृद्धि की दृष्टि से, तुम्हारे माता-पिता के सुख की दृष्टि से अथवा तुम्हारे जनपद और यूथ की प्रगति की दृष्टि से ?"

मुर्त क्षण-भर के लिए मौन रहा, फिर बोला, "मैंने इस ढंग से सोचा ही नहीं है । मैंने केवल अपने लाभ की बात कही है; और लाभ से मेरा अभिप्राय है सुख, जो भौतिक समृद्धि से ही मिल सकता है।"

"तुमने बहुत ठीक सोचा है, पुत्र !" ऋषि बोले, "रावण के साम्राज्य के किसी भी जलपत्तन में तुम्हें अपने ज्ञान और कौशल को बेचने पर पुष्कल धन प्राप्त होगा। संभव है कि तुम्हारे हाथ में कुछ प्रस्ताव भी हों, और तुम उन्हीं को ध्यान में रखकर सुख-सुविधा को नाप रहे हो ।"

"आप ठीक कह रहे हैं।" मुर्त ने सहज ही स्वीकार कर लिया, "वस्तुतः मेरे पास अनेक जलपत्तनाधिकारियों के ही प्रस्ताव नहीं हैं, साम्राज्य की जल-सेना ने भी मुझसे जलपोतों के निर्माण के लिए अनुरोध किया है। मैं उनमें से किसी एक 'प्रस्ताव को भी मान लूं तो मुझ अकेले के पास इतना धन हो जाएगा, जितना इस सारे जनपद के पास नहीं है ।"

" तुम्हारे सुख के लिए यही उचित भी है ।" अगस्त्य कुछ वक्र होकर बोले, " मेरा परामर्श है कि तुम वापस लौट जाओ । रावण की जल सेना के लिए नये, दृढ़, शक्तिशाली तथा अधिक प्रहारक जलपोतों का निर्माण करो । उसकी सेना उन जलपोतों को लेकर आएगी और इस सारे समुद्र तट पर आक्रमण करेगी। यहां से स्त्रियों, पुरुषों तथा बच्चों का उसी प्रकार अपहरण करेगी, जिस प्रकार उन्होंने एक दिन तुम्हारा अपहरण किया था। यहां की उपज वह लूटकर ले जाएगी। यहां के घर, खेत और उद्यान नष्ट करेगी। यहां किसी को नौका तक का पता नहीं है, युद्धपोतों का क्या कहना। कोई उनको रोक नहीं पाएगा और वे सकुशल लोट जाएंगे। ...."

" ऋषिवर!..." मुर्त ने कुछ कहना चाहा।

"पूरी बात सुन लो, पुत्र !" अगस्त्य शांत स्वर में बोले, "उन अपहृत लोगों में तुम्हारे वृद्ध माता-पिता भी हो सकते हैं। तुम्हारी मां युवती नहीं है, अतः वह किसी की भोग्या नहीं हो सकती। तुम्हारा पिता किसी के यहां श्रमिक नहीं हो सकता। उन्हें या तो वे लोग खरीदेंगे, जो उनकी हत्या कर उनका मांस बेचेंगे, या वे भूखे-प्यासे मरने को छोड़ दिए जाएंगे। उनके पास अन्न के लिए धन नहीं होगा । अतः वे किसी मार्ग पर घिसटते घिसटते संज्ञाशून्य होकर गिर पड़ेंगे और मर जाएंगे। उनके शवों को भी कोई उठाकर ले जाएगा और पशु-मांस में मिलाकर, उनका मांस बेच देगा। तुम्हारा दास उसे खरीदकर लाएगा और पकाकर तुम्हें खिलाएगा..."

शुक्रवार, 19 मई 2023

राम की सीता के लिए चिन्ता

 वनवास की अवधि में लक्ष्मण किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नही करेंगे राम जानते थे—उन्हे केवल राम का संग मिल जाए तो वे मग्न हो जाते हैं और यहां तो सामने एक लक्ष्य भी था। यह सारा चित्रकूट प्रदेश उनके सम्मुख था । यहां के लोगों से परिचय प्राप्त करना था। उनकी जीवन-पद्धति को समझना था उनकी कठिनाइयां और समस्याओं को जानना था। विभिन्न आश्रमो की व्यवस्था और उनके शिक्षण स्तर को परखना था। फिर प्रकृति एक चुनौती के समान उनके सामने खडी थी । पर्वत, नदी, वन, हिंस्र पशू, और जैसा कि भरद्वाज आश्रम से ही सुनाई पडना आरंभ हो गया था कि इस क्षेत्र में राक्षसों का अन्याय भी बढ़ता जा रहा था । लक्ष्मण इन सब में उलझे रहगे। उन्हें अयोध्या की याद नही आएगी माता की याद भी नही आएगी। जानने सुनने को कुछ नया हो करने को कुछ अपूर्व हो, सामने एक चुनौती हो तो लक्ष्मण स्वयं को भी भूले रहते है।


पर सीता । चार वर्षों के दाम्पत्य जीवन में राम ने सीता को अच्छी प्रकार जाना-समझा था। किंतु लोक चिन्तन कहता है कि स्त्री कोमल होती है उसका मन कठिनाइयो से भागता है तथा वैभव और सुविधा की ओर झुकता है। सीता के आज तक के व्यवहार ने इस चिंतन का समर्थन नहीं किया था। वे सदा लोक-कल्याण की प्रवृत्ति की ओर झुकी थी किंतु आज से पहले तो राम उनके साथ इस प्रकार का कठिन वन्य जीवन व्यतीत करने के लिए बाहर भी नही निकले थे। संभव है इस कठिन जीवन में सीता को असुविधा हो


"देवी सीता। "राम का स्वर बहुत मदु था ।


सीता ने चौंककर पति की ओर देखा, 'क्या बात है राम! आप मुझे 'प्रिये' नही कह रहे। इतने अतिरिक्त कोमल और शिष्ट क्यो हो रहे हैं ? कही फिर से मुझे अयोध्या लौट जाने का प्रलोभनयुक्त उपदेश देने का विचार तो नही है ?


राम की आधी चिंता दूर हो गयी। वे कुछ हल्के हुए और कुछ सहज भी।


नही, प्रिये । अयोध्या लौटने को नही कहूंगा, किंतु यह पूछने की इच्छा अवश्य है कि इस वन्य जीवन में कोई असुविधा तो नहीं ? वन में आने का कोई पश्चात्ताप कोई उत्तर विचार कोई पुर्नविचार की इच्छा ?"


"झगडे की इच्छा तो नहीं ?" सीता सहज भरी मुसकान अधरों पर ले आयी ।


"नही" राम मुसकराए "पर अपनी पत्नी की उचित देखभाल मेरा कर्तव्य है । इसलिए उसकी सुविधा असुविधा को तो जानना होगा । जो राम सीता से विवाह कर उसे अपने घर लाया था, वह अयोध्या का संभावित युवराज था वनवासी नहीं।"


प्रिये  मैं तुम्हे और लक्ष्मण को तुम लोगो के प्रेम का दण्ड दे रहा हूं ।


 सीता पुनः मुस्कराई 'प्रेम तो अपने-आप में एक दंड है । प्रेम किया है तो उसका दर्द भी स्वीकार करना ही होगा। यह कोई नयी बात तो नही ।


किन्तु एक असुविधा मुझे है ।


 'क्या ? राम ने उत्सुकता से पूछा, वही तो मैं भी जानना चाह रहा हूं सीता गंभीर हो गयीं यदि चौदह वर्षो तक मेरे पति मुझसे इसी प्रकार औपचारिक व्यवहार करते रहे, तो मैं  अपने आप को भी परायी लगने लगूंगी।


राम जोर से हस पड़े।


'मैं आपके साथ इसलिए आयी थी कि हमारे बीच राज प्रासाद और राजपरिवार की सारी औपचारिकताएं समाप्त हो जाएगी। मैं अपने पति के लिए सघन जनसंख्या वाले प्रदेश की इकाई न होकर उनके इतनी करीब होऊगी कि वे अनेक कामों के लिए मुझ पर निर्भर होगे। हम दोनो सहज रूप में दो साथियों के समान कार्य करेंगे। मैं उनमुक्त प्रकृति के बीच अपने प्रिय साथी को नये आयाम दूंगी और आत्म निर्भर इकाई रुप में समाज के लिए कुछ उपयोगी हो सकूगी ।


राम भाव में बह गए। उन्होंने सीता के कन्धों पर हाथ रख दिए यही होगा प्रिये । यही होगा। जाने क्यो मैं कभी-कभी विभिन्न संभावनाओं पर विचार करते करते काई ऐसी बात सोचने लगता हूँ जिसमें स्वयं मुझे भी अपनी पत्नी की उदात्तता समझने में कठिनाई होने लगती है। उन्हाने सीता को अपनी बाहों में भर लिया मुझे लगता है सीते । कि आदमी कितना ही दृढ निश्चित तथा आत्मविश्वासी क्या न हो यदि वह मनुष्य है तो उसके जीवन में कभी न कभी ऐसे दुर्बल क्षण आते ही है-- जब वह आशंकित होता है असंभव सभावनाओ की कल्पना करता है तथा स्वयं अपने संबंधों पर संदेह करता है ।


'प्रिये । ऐसे ही क्षणों को सबल बनाने के लिए सीता तुम्हारे साथ आयी हैं।'।


 सीता ने अपना सिर राम के वक्ष पर टिका दिया ।


तो ऐसा ही हो प्रिये । कल से तुम्हारा नया जीवन आरंभ हो । वन प्रांत से तुम वनवासिनी वदेही बन जाओ एक स्वतंत्र आत्मनिर्भर व्यक्ति, राम के साधारण जीवन की सगिनी और सहगामी ।


सीता ने मस्तक उठाकर दुलार से राम की ओर देखा । राम मुग्ध हो उठे।


नरेंद्र कोहली की पुस्तक का अंश

मंगलवार, 16 मई 2023

घोस्ट राइटिंग

 

हिंदी में जो लोकप्रिय साहित्य की दुनिया रही है, उसमें योगेश मित्तल दशकों से सक्रिय रहे हैं। मगर उन्होंने अपने नाम से नहीं, दूसरे कई ट्रेड नामों से लेखन किया है- यानी गोस्ट राइटिंग। 'प्रेत लेखन' और 'वेद प्रकाश शर्माः यादें, बातें और अनकहे किस्से' शीर्षक से हाल में उन्होंने दो किताबें लिखी है, जो पॉकेट बुक्स, गोस्ट राइटिंग और लुगदी उपन्यास के संसार की अंतरंग कहानी कहती हैं। प्रस्तुत हैं अमितेश कुमार की योगेश मित्तल से हुई लंबी बातचीत के मुख्य अंशः

■ आपने गोस्ट राइटिंग की शुरुआत कैसे की ?

 मुझे 1970 में पॉकेट बुक पब्लिशर जानने लगे थे। मैंने गर्ग एंड कंपनी, मनोज पॉकेट बुक्स और मेरठ के कई पब्लिशर के लिए लिखना शुरू कर दिया था। एक बहुत मशहूर लेखक हुए विमल चटर्जी। उन्हें तब मनोज पॉकेट बुक्स वालों ने बाल कहानियों के लिए प्रेरित किया और लिखने से पहले कहानियों की हेडिंग दे दी। विमल बड़े परेशान थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने माजरा बयान किया। मैंने कहा बड़ा आसान है। उन्होंने कहा कि इतना आसान है तो आप लिख दो। मैंने उन्हें कहानी लिखकर दे दी। उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उससे पहले मेरी कहानियां गर्ग एंड कंपनी की गोलगप्पा मैगजीन में छपती थीं। उन्होंने बच्चों के नॉवेल लिखने का ऑर्डर दिया। मेरा पहला नॉवेल 'खूनी शैतान की बस्ती' मेरे नाम से ही छपा था। लेकिन नाम से छपने का कोई फायदा नहीं मिला, तब उसे लिखने के सिर्फ 25 रुपये मिले थे।

 हिंदी जगत में गोस्ट राइटिंग इंडस्ट्री कब और कैसे शुरू हुई?

 1970 के बाद स्टार पॉकेट बुक्स और हिंद पॉकेट बुक्स ने लगभग साथ ही इसकी शुरुआत की। तब स्टार वालों और कई दूसरे पब्लिशरों का कहना था कि लेखक टाइम पर स्क्रिप्ट नहीं देते। नाम से छपने वाले लेखक पैसों के लिए परेशान करते थे, एकदम से रेट बढ़ा देते थे। पंजाबी पुस्तक भंडार वाले स्टार पॉकेट बुक्स ने सामाजिक उपन्यास लिखने के लिए एक नए नाम 'राजवंश' का प्रयोग किया। उन्होंने आरिफ माहरवीं को चुना, जो जासूसी उपन्यास लिखते थे। मैंने अपनी किताब 'प्रेत लेखन' में आरिफ माहरवीं को गोस्ट राइटिंग का शहंशाह बताया है। उन्हीं दिनों हिंद पॉकेट बुक्स वालों ने दो नाम रखे- कर्नल रंजीत और शेखर। कर्नल के लिए उन्होंने बात की मख्मुर जालंधरी नाम के शायर से । वह पेरी मेसन के नॉवेल से विचार लेते थे, नकल नहीं करते थे मेजर बलवंत उसमें पात्र था और सोनिया उसकी साथी। दूसरे नाम शेखर के लिए उन्होंने चुना राम कुमार भ्रमर को, जो उस समय डाकुओं पर उपन्यास लिखते थे। मखमुर साहब कर्नल रंजीत के लिए आजीवन लिखते रहे। वहीं शेखर के जितने उपन्यास छपे, वे राम कुमार ने ही लिखे।

 ■ दूसरे कौन लोग लिखते थे और किन-किन नामों के लिए?

राजवंश के बाद स्टार वालों ने कई काल्पनिक नाम तय किए, जैसे- लोकदर्शी, समीर सब आरिफ माहरवीं से लिखवाया। आरिफ ने बहुत सारे नामों को स्थापित किया। मनोज पॉकेट बुक्स के लिए उन्होंने सूरज के नाम से लिखा। भारत नाम से भी लिखा। राजेश्वर नाम के टाइटल पर उनकी फोटो भी लगती थी। सामाजिक नॉवेल लिखने के लिए उन्होंने सैमुअल अंजुम अर्शी को पकड़ा, जो सफदरजंग हॉस्पिटल के 28 नंबर वॉर्ड के इंचार्ज थे। अंजुम ने मनोज में दो नॉवेल लिखे- 'खामोशी' और 'जलती चिता'। फिर एक नया लड़का दिनेश श्रीवास्तव आया। वह मुझसे करेक्शन कराता था। उसने मनोज में एक उपन्यास लिखा और अपना नाम दिनेश पाठक बताया क्योंकि उस समय सुरेंद्र मोहन पाठक का नाम चल गया था। वह नॉवेल था 'फूल और काटे'। फिर आए जमील अंजुम, जिन्होंने 30-32 उपन्यास लिखे। इसके बाद इन्होंने विनय प्रभाकर जैसे कई और नाम चलाए, जिसके लिए परशुराम शर्मा, विमल चटर्जी और असित चटर्जी ने लिखा। मैंने भी कई नामों से रायजादा, मनोज, भारत के लिए लिखा। टाइगर ट्रेड नेम के लिए यशपाल वालिया भारती पॉकेट बुक्स में लिखते थे। बाद में विजय पॉकेट बुक्स में अपनी पत्नी मीनू वालिया के नाम से लिखा, जिसमें फोटो पत्नी का होता था। गोस्ट राइटिंग में सबसे ज्यादा ईमानदारी बरती स्टार वालों ने राजवंश नाम से आरिफ माहरवीं के अलावा दूसरे लोगों को न छापा। हिंद वालों ने मख्मुर जालंधरी के असली नाम ही लिखवाया।

■ नए-नए ट्रेड नेम पैदा करने के पीछे क्या कारण थे?


जिन लेखकों के नाम से नॉवेल छपे थे, पब्लिशर को उनको मुंहमांगी रकम देनी पड़ती थी। लेकिन पब्लिशर कई बार उतनी बड़ी रकम देना नहीं चाहते थे। इसी वजह से ना नए ट्रेड नेम आए। 

# आप बता सकते हैं कि सबसे ज्यादा गोर राइटिंग किस ट्रेड नेम के लिए हुई ?

यह बताना मुश्किल है क्योंकि कई पब्लिशरों ने बाद नाम चलाए। इधर मनोज वालों ने चलाए भारत, सूरज धीरज वगैरह। बाद में सूरज नाम का पहला उपन्यास राज बाबू ने मुझे लिखने का ऑर्डर दिया था, लेकिन मेरा नॉवेल आधा हुआ था तो उन्होंने कहा कि आरिफ साहब ने नॉवेल दे दिया। यह प्रकाशकों का खेल था। सबसे ज्यादा प्रसिद्ध नाम था राजवंश और कर्नल रंजीत का।

 ■ स्थापित लेखकों से भी कोई अपने लिए गोस्ट राइटिंग कराता था ?

ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज नाम के लिए सबसे ज्यादा गोस्ट राइटिंग हुई है। एक जमाना आया हर प्रकाशक के यहां हर महीने ओम प्रकाश शर्मा ओर वेद प्रकाश कांबोज की दो-दो किताबें छप रही थीं। इतनी किताबें कोई भी नहीं लिख सकता। मेरठ में एक प्रकाशक थे, जंग बहादुर वह ओम प्रकाश शर्मा के पास नॉवेल ले गए तो उनके पास समय नहीं था। जंग बहादुर खुराफाती थे उनके टच में कोई और ओम प्रकाश शर्मा नाम का व्यक्ति था तो उन्होंने उससे बात की और हम जैसे गोस्ट राइटर ओम प्रकाश शर्मा के कैरेक्टर पर उपन्यास लिखवा लिया और यही काम वेद प्रकाश कांबोज नाम के लिए भी किया।



गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

 सिंगल लाइफ जीते जीते अचानक एक रोज शादी हो गई...दूसरे दिन सुबह 7:00 बजे नई नई बीवी ने बड़े प्यार से जगाया कि जानू उठो सुबह हो गई है...!देखा तो चाय ब्रेड स्लाइस पानी ट्रे में लिए वह खड़ी थी बेड टी के बाद बाथरूम में गए तो टावर चड़ी बनियान गर्म पानी से भरी बाल्टी तैयार थी 

नहाने के बाद नाश्ता रेडी, ऑफिस की ड्रेस तैयार टिफिन टेबल पर 3:00 जब वापस घर आया तो खाना तैयार मियां बावला हो गया।

बीवी को गले लगा कर भावुक होकर बोला कि तुम्हारे आने से मेरा जीवन सफल हो गया मैं बहुत भाग्यवान हूं कि तुम जैसी पत्नी मिली है

बीवी ने धीरे से अलग करते हुए वह तिरछी नजर से देखते हुए बोली..... अब कल से मैं भी ड्यूटी जॉइन कर रही  हूँ  कि तुम्हें कल से क्या काम कैसे करना है..यह उसका डेमो था।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

सूरदास

एक दिन ऐसी घटना हुई कि जिसने सूरदास के मन को मोह लिया। हुआ ये की एक सुन्दर नवयुवती कन्या नदी किनारे कपडे धो रही थी ।

इन  का ध्यान उनकी तरफ चला गया। उस युवती ने इनको ऐसा आकर्षित किया की ये कविता लिखना छोड़-छाड़ के तथा पुरे ध्यान से उस युवती को देखने लगे।

उनको ऐसा लगा मानो यमुना किनारे राधिका स्नान कर के बैठी हो । उस नवयुवती ने भी सूरदास की तरफ देखा और उनके पास आकर बोली आप मदन मोहन जी हो ना?

तो वे बोले हां मैं हीं मदन मोहन हूँ। कविताये लिखता हूँ तथा गाता हूँ आपको देखा तो रुक गया। नवयुवती ने पूछा क्यों ? तो वह बोले आप हो ही इतनी सुन्दर। 

ये सिलसिला कई दिनों तक चला। जब यह बात मदन मोहन के पिता को पता चली तो उनको बहुत क्रोध आया तो लगाई मदन मोहन को तगड़ी फटकार इस पर मदन मोहन ने घर छोड़ दिया। पर उस सुन्दर युवती का चेहरा उनके सामने से नहीं जा रहा था एक दिन वह मंदिर मे बैठे थे तभी वहाँ एक शादीशुदा बहुत ही सुन्दर स्त्री आई। मदन मोहन समझ गये और उनके पीछे पीछे चल दिए। जब वह उसके घर पहुंचे तो उनके पति ने दरवाजा खोला तथा पुरे आदर सम्मान के साथ उन्हें अंदर बिठाया। फिर मदन मोहन ने दो जलती हुए सिलाई मांगी तथा उसे अपनी आँख में डाल दी। इस तरह मदन मोहन बने महान कवि सूरदास।

ऐसा भी माना जाता है कि इनका वास्तविक नाम सूरध्वज था। और इनको सूरदास की उपाधि इनके गुरु वल्लभाचार्य ने दी थी।

कुछ यह भी मानते हैं कि सूरदास जन्म से ही अन्धे थे। परन्तु सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।


मंगलवार, 28 मार्च 2023

कैकेयी की माता

 केकय नरेश अश्वपति ब्रह्मज्ञानी के रूप में विख्यात थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इस संबंध में उनसे राय लेने आते रहते थे। कहते तो यहाँ तक हैं कि उन्हें पशु-पक्षियों की बोलियाँ भी आती थीं। एक कथा प्रचलित हैं कि एक बार अश्वपति महारानी के साथ बगीचे में टहल रहे थे। बगीचे में पक्षियों की चहचहाइट एक स्वाभाविक ध्वनि होती है। अचानक महाराज हँस पड़े महारानी असमंजस से पूछ बैठीं -

"महाराज मैंने कोई हास्यास्पद बात तो नहीं की जो आप हँस रहे हैं।”

महाराज ने हाथ से उन्हें शान्त रहने का संकेत किया और बड़े गौर से कहीं कान लगाकर सुनने लगे| महारानी को समझ नहीं आ रहा था कि महाराज क्या सुनने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें लगा कि महाराज उनकी उपेक्षा करने के लिये कुछ सुनने का अभिनय मात्र कर रहे हैं। पक्षियों के कलरव के अतिरिक्त वहाँ और कोई ध्वनि थी ही नहीं। इसी बीच महाराज फिर हँसने लगे फिर महारानी से संबोधित होते हुये बोले - 

"हाँ महारानी जी ! अब बताइये क्या कह रही थीं?"

"मैं क्या कह रही थी उसे तो छोड़िये। मेरी बातें तो आपको सुनने योग्य लगती ही नहीं।"

"नहीं।" महारानी भी सामान्य स्त्रियों की भाँति ही व्यवहार करने लगी थीं।

“अरे नहीं! किसने कह दिया कि मुझे आपकी बातों में रस नहीं मिलता।”

"रस मिलता होता तो मेरी बात की उपेक्षा कर इस प्रकार शून्य को सुनने का अभिनय नहीं करता "

"महारानी जी मैं शून्य को नहीं सुन रहा था। "

"तो फिर क्या सुन रहे थे? और हँस क्यों रहे थे? मेरी बात का उपहास कर रहे थे न!"

"नहीं महारानी जी! "

"नहीं तो फिर बताते क्यों नहीं कि क्यों हँस रहे थे?"

" तो उधर वृक्ष पर बैठा एक पक्षी-युगल परस्पर कुछ मनोरंजक वार्ता कर रहा था, उसी को सुनने लगा था। उसी को सुनकर हँसी भी आ गई थी।"

 "महाराज मुझे क्या आप अबोध शिशु समझते हैं जो आपके इन तथ्यहीन भुलावों में आ जाऊँगी? भला पक्षियों की बातों का भी कोई महत्व हो सकता है। यदि होता भी हो तो आपको क्या पता कि वे परस्पर क्या बातें कर रहे थे।"

"महारानी जी! कभी- कभी अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं पक्षियों की बातें। और भाग्य से  कहिये या दुर्भाग्य से, मैं उनकी बातें समझा भी सकता हूँ।”

" तो बताइये फिर क्या कह रहे थे वे?” महारानी को महाराज की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वे यही समझ रही थीं कि महाराज उनकी हँसी उड़ा रहे थे। इसी कारण उनकी चिढ़ और क्रोध बढ़ते ही जा रहे थे। उन्होंने अब हठ पकड़ लिया था।

"नहीं महारानी जी! यह हम नहीं बता सकते।"

"फिर बहाना ! क्यों नहीं बता सकते हैं। हमें तो मात्र सेविका ही समझते हैं आप "

"नहीं महारानी जी! ऐसी बात नहीं है। पर हमारी विवशता है कि हम किसी को नहीं बता सकते कि वे क्या बात कर रहे थे।"

"क्यों नहीं बता सकते भला?" महारानी भी अपने हठ पर अड़ी थीं।

"क्योंकि यदि हमने बता दिया तो उसी क्षण हमारी मृत्यु हो जायेगी। क्या आप वैधव्य की आकांक्षी हैं?"

“यह सब आपका आडंबर मात्र है। वस्तुत: आप प्रकारान्तर से हमारा तिरस्कार करना चाहते हैं।"

"भला हम आपका तिरस्कार क्यों करना चाहेंगे?"

"मुझे नहीं ज्ञात किन्तु यदि ऐसा नहीं हैं तो फिर बताइये कि वे क्या वार्ता कर रहे थे?" 

“मैंने कहा न कि मैं नहीं बता सकता। विवशता है।"

“पुन: वही अनर्गल प्रलाप !” कहती हुयी महारानी क्रोध से पैर पटकती हुयी चली गयीं।

क्रोध महाराज को भी आ गया था। वे सोचने लगे कि

 "इस स्त्री को अपने पति के जीवन की चिंता नहीं हैं, बस अपना वृथा हठ ही प्यारा हैं।" 

फिर भी उन्होंने आवाज दी-

"रुकिये महारानी अनावश्यक क्रोध उचित नहीं है। "

पर महाराजी नहीं रुकीं।

महाराज को महारानी के आचरण से अपार क्षोभ हुआ था। वे सोच रहे थे कि ऐसी पत्नी तो कभी भी उनके लिये ही नहीं राज्य के लिये भी संकट का कारण बन सकती है। उन्होंने उनके त्याग का निश्चय कर लिया। दृढ़ निश्चया इसकी किसी भी बात पर अब विश्वास नहीं करना है। किसी भी पश्चाताप के प्रदर्शन पर ध्यान नहीं देना है।

दूसरे ही दिन उन्होंने रथ तैयार करवाया और सैनिकों की एक टुकड़ी के संरक्षण में महारानी को उनके मायके भिजवा दिया इस निर्देश के साथ कि अब केकय राज्य में उनके लिये कोई स्थान नहीं है।

महारानी का तो निर्वासन हो गया किन्तु अब प्रश्न था अल्पवयस्क पुत्री की उचित देखभाल का सात भाइयों में अकेली बहन, सबकी दुलारी महाराज के जीवन का आधार किसे सौंपे यह दायित्व कैकेयी अभी मात्र तीन वर्ष की ही तो है। माता का निर्वासन कहीं उसकी भावनाओं को आहत न करे! वह अब धीरे-धीरे चीजों को समझने लगी हैं। इस समय यदि उसकी भावनाएं आहत हुई या विद्रोह की ओर उन्मुख हो गयीं तो... ? यद्यपि महारानी का सान्निध्य तो उसे उच्छृंखल और धृष्ट ही बनाता। यूँ ही किसी को तो नहीं सौंपा जा सकता उसका दायित्व यदि युधाजित (अश्वपति का बड़ा पुत्र) का विवाह हो गया होता तो उसकी पत्नी को ही यह दायित्व सौंपा जा सकता था किन्तु उसमें तो अभी विलम्ब हैं। तब ? ... एक बहुत बड़ा प्रश्न उन्हें मथ रहा था।

अचानक उन्हें ध्यान आया चपला (मंथरा) का जिसका राजकीय उपचारगृह में पाँच वर्ष तक उपचार चला था। अब चार वर्षों से वह पूर्ण स्वस्थ हो गयी थी। महाराज उसके साहस एवं दृढ़ता से अत्यंत प्रभावित थे। उसे भी उचित संरक्षण की आवश्यकता थी। उन्होंने निश्चय कर लिया कि उसे ही कैकेयी की संरक्षिका नियुक्त करेंगे। यह दोनों के लिये ही हितकर रहेगा।

इस प्रकार चौबीस वर्षीय चपला तीन वर्षीय कैकेयी की संरक्षिका बन कर कैकय नरेश अश्वपति के राजप्रासाद में आ गयी। समय के साथ चपला के घाव भर गये थे पर उसका चेहरा कटार के गहरे घाव के कारण कुरूप हो गया था। रीढ़ की हड्डी जुड़ गयी थी पर कमर स्थाई रूप से इस उम्र में ही झुक गयी थी। जाँघ की हड्डी भी जुड़ अवश्य गई थी पर चाल में लंगड़ाहट आ गई थी। उसकी गति मंथर हो गयी थी और इस मंथर गति के कारण ही उसका नाम चपला से स्वत: मंथरा हो गया था। उसे स्वयं भी इस नाम से पुकारे जाने में कोई आपत्ति नहीं थी। वह तो अब मात्र रक्षों के अस्तित्व का समूल नाश करने के अपने संकल्प के लिये जी रही थी, यद्यपि उस भयानक दिवस के उपरान्त उसे रक्षों के विषय में कोई समाचार नहीं प्राप्त हुआ था। जिससे भी उसने कुछ पूछने का प्रयास किया उसी ने अनभिज्ञता प्रदर्शित की थी।

मंथरा के संरक्षकत्व ने कैकेयी की विचारधारा को भी निश्चय ही प्रभावित किया। झुकी कमर और लंगड़ी चाल के बावजूद मंथरा को शस्त्र संचालन में रुचि थी जिससे समय के साथ कैकेयी की रुचि भी इस ओर जाग्रत हो गयी। मंथरा के सान्निध्य में उसकी यह रुचि भली-भाँति विकसित होने लगी। दोनों डट कर अभ्यास करतीं। महाराज भी उन्हें पूरा प्रोत्साहन देते थे और इसके लिए उन्होंने विशिष्ट व्यवस्थाएँ प्रसन्नतापूर्वक कर दी थीं। शीघ्र ही कैकेयी अस्त्र-शस्त्रों के  संचालन में निपुण हो गयी। रथ के अश्वों के संचालन में तो उसका कोई सानी ही नहीं था।

कैकेयी को मंथरा के संरक्षण में देकर उसकी प्रगति से महाराज अश्वपति पूर्ण संतुष्ट थे। वे मंथरा को भी अपनी पुत्री की भाँति ही स्नेह देते थे। कैकेयी उसे पूरा आदर और सम्मान देती थी। वह एक प्रकार से कैकेयी की धाय माँ थी किन्तु कैकेयी उसका अपनी माँ के समान ही सम्मान करती थी।

महाराज नित्य ही कम से कम एक बार अवश्य कैकेयी से मिलने आते थे। कैकेयी से मिलने आते थे तो मंथरा की भी उनसे भेंट होती ही थी। इस सतत परिचय से वह महाराज के साथ एक सीमा तक अनौपचारिक हो गयी थी। इस अनौपचारिकता को महाराज ने ही प्रोत्साहित किया था। एक दिन बातों ही बातों में मंथरा ने अपने जीवन के परम उद्देश्य के विषय में चर्चा छेड़ दी

"तुम्हारा कार्य तो विष्णु सम्पूर्ण कर चुके हैं।" 

अश्वपति हँसते हुये बोले।

"तात्पर्य महाराज?" 

“जब तुमसे उन लोगों की मुठभेड़ हुई तब वे विष्णु से पराजित होकर ही भाग रहे थे। माल्यवान और सुमाली का छोटा भाई माली तो विष्णु के द्वारा मारा जा चुका था । " 

मंथरा के चेहरे पर संतोष के भाव थे।

 "जी!'

“उसके बाद विष्णु ने इन लोगों को लंका तक खदेड़ा। विशाल सेना थी इनकी जिसने देवराज इन्द्र तक को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। किन्तु तुमने देखा ही होगा कि कितने थोड़े से लोग बचे थे। "

"थोड़े से कहाँ महाराज कई सौ थे|"

" अक्षौहिणियों में जब कई सौ बचते हैं तो वे थोड़े से ही कहे जाते हैं।"

 अश्वपति खुलकर हँसते हुये बोला

 “ओह ! किन्तु वे पुन: अपनी शक्ति एकत्र करेंगे, पुनः अक्षौहिणियाँ जोड़ लेंगे। उनके प्रमुखों में से दो तो अभी भी जीवित ही है।"

"नहीं! मंथरा ऐसा लगता तो नहीं है। "

 "लगता नहीं हैं किन्तु असंभव भी तो नहीं हैं। मेरा हृदय तो तभी शीतल होगा जब शेष बचे ये दोनों भी काल का ग्रास बन जायेंगे।"

"हूँ... दोनों में से बड़ा माल्यवान तो संसार त्यागकर वानप्रस्थी हो गया है। वह तभी से एकांत में तपश्चर्या में निमग्न है। उसकी कोई भी संदिग्ध गतिविधि तब से नहीं देखी गयी। यदि देखी गयी होती तो विष्णु उसे भी अवश्य समाप्त कर देते। बचा सुमाली। वह पता नहीं जीवित है भी या नहीं। तभी से उसके विषय में किसी को भी कोई समाचार नहीं मिला हैं। वह और उसके पुत्र किस जगत में हैं यह अब किसी को ज्ञात नहीं।"

“किन्तु उनकी मृत्यु हो गयी यह भी तो सुनिश्चित नहीं है। "

"यह तो हैं।”

“फिर उनके पुत्र भी तो हैं। जब तक सबकी मृत्यु प्रमाणित नहीं हो जाती है तब तक कैसे माना जा सकता है कि वे दुबारा सिर नहीं उठायेंगे?" 

“यह भी उचित है। किन्तु यदि वे पुन: सिर उठायेंगे तो पुनः उन्हें कुचल दिया जायेगा। इस बार किसी को भी जीवित नहीं छोड़ा जायेगा| "

 “देखते हैं महाराज! एक बार तो विष्णु जैसा व्यक्ति भी चूक कर ही गया। साँप को घायल करके कहीं जीवित छोड़ा जाता है। "

राम रावण 

सुलभ अग्निहोत्री 





“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...