बुधवार, 28 सितंबर 2022

वह केवल मेरे मजे ले रहा था...

इस बात में कोई दो राय नहीं कि टीनएज में हम अक्सर प्यार में पड़ जाते हैं। किसी के संग दो-चार मुलाकातों में ही हम उसे अपना जीवनसाथी बनाने का सपना देखने लगते हैं। लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी होती हैं, जिन पर हमारा कभी ध्‍यान नहीं जाता। यह चीजें न केवल हमें एक वक्त के बाद समझ आती हैं बल्कि कभी-कभार हमारे पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं रहता।

'वह केवल मेरे मजे ले रहा था... काश! 30 की होने से पहले मुझे पता चल पाती ये बातें, तो मेरा दिल नहीं टूटता।'

जीवन में अगर हमें सब कुछ पहले ही पता चल जाता, तो शायद कभी किसी का दिल नहीं टूटता। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ चीजें हम उम्र के साथ-साथ अपने अनुभवों से ही सीखते हैं। हमारे अनुभव न केवल हमें एक सफल व्‍यक्ति के रूप में विकसित होने में मदद करते हैं बल्कि इनसे हमें जिंदगी में आगे बढ़ने के तौर-तरीके भी पता चलते हैं। मेरा यह अनुभव प्‍यार से संबंधित था। मैं एक ऐसे शख्स के जाल में फंस गई थी, जिसने मुझे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मैं उससे बहुत ज्यादा प्यार करती थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह मेरे साथ इतना बुरा भी कर सकता है।

मैं हमेशा से ही उसकी हरकतों से अंजान थी। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं बुरी तरह उसके प्‍यार में दीवानी थी। लेकिन आज जब मैं मैच्‍योर हो गई हूं, तब जाकर मुझे एहसास होता है कि मैंने बेकार में ही उस पर अपना वक्‍त जाया किया। हालांकि, इसमें मेरी गलती भी नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि 30 साल से कम उम्र की लड़कियाें के साथ अक्‍सर ऐसा हो जाता है। मेरी कहानी से शायद उन लड़कियाें को थोड़ी मदद मिल सकती है।

वह मुझे बहुत प्यार करता था। जब भी मैं रोती थी, मुझ पर बहुत लाड लड़ता था। यह सब कुछ मेरे लिए एक ब्यूटीफुल ड्रीम की तरह था। मैंने बस देखा कि मैं उसके प्‍यार में बहुत बदल गई थी। मैं पहले से ज्यादा खुश रहने लगी थी। इस दौरान जो एक चीज मैं नहीं देख पाई, वो यह कि वह बिल्कुल भी एक व्यावहारिक व्‍यक्ति नहीं था।

दरअसल, जब आप किसी से प्‍यार करते हैं, तो आप चाहते हैं कि वह हमेशा आपके साथ रहे। लेकिन कहते हैं ना कि प्‍यार अंधा होता है। प्‍यार में सोचने समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

वह हर डेट पर मुझे सरप्राइज देता था। मेरी पसंद का शो देखता था, मेरी पसंद उसके लिए सबसे पहले थी। वह मुझसे मिलने के लिए ऑफिस के बाद अपने घर से 20 मिनट दूर बस से उतरता था। मुझे लगता था कि यही मेरा ड्रीम मैन है।

जब अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल में थी, तब मुझे ऐसा लगता था कि मेरी शेक्सपियर वाली लव स्‍टोरीज सच हो रही हैं। लेकिन मैं नहीं जानती थी कि यह सब केवल दिखावा है, जो वक्त के साथ बदल जाएगा। सच कहूं तो वह केवल मेरे मजे ले रहा था।

मुझे आज भी अच्छे से याद है कि जब मैं उसे डेट कर रही थी, तो मैं बहुत ज्यादा सिंपल कपड़े पहनती थी। हालांकि, वह बहुत पैसे वाला था। उसके पास न केवल अपना घर-मकान था बल्कि उसका समाज में रूतबा भी अच्छा खासा था। ऐसे में जिस दिन मैंने उसे बताया कि हम किराए के फ्लैट में रहते हैं, वह आदमी मुझे दो दिन में ही छोड़कर भाग गया।

उस दिन मुझे समझ आया कि ऐसे लोग भले पांडा की तरह क्‍यूट दिख सकते हैं। लेकिन यह आपके जीवन में धीमे जहर की तरह होते हैं। वह हर समय आपके साथ प्‍यारा व्‍यवहार करते हैं। उनके अंदर आपको मैच्‍योरिटी जरा भी नहीं दिखती। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। इन लोगों के बारे में हम तब तक नहीं जान पाते, जब तक की हम 30 के न हो जाएं।

कोई आदमी आपसे प्यार कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह जीवनभर आपको खुश रख सके। सच्‍चे प्‍यार के अलावा भी जीवन में बहुत कुछ होता है। एक बार जब आप 30 के हो जाते हैं और थोड़ी मैच्‍योरिटी आ जाती है, तब आपको पता चलता है कि आप कितने बेवकूफ थे।

अगर वह कहे कि उसके जीवन का मकसद आपको खुश रखना है और आपकी बाहों में मरना है, तो उसके प्यार में पागल न हो जाएं। उससे उसकी महत्‍वकांक्षाओं के बारे में भी बात करें। अगर वह इन मुद्दों पर बात नहीं करता है, तो समझ लें कि वास्‍तव में आपने जीवन में बहुत गलत आदमी को चुन लिया है।

Authored by Tina 

| Navbharat Times |




मंगलवार, 27 सितंबर 2022

द्वारका

 परमात्मा श्रीकृष्ण आनन्द स्वरूप हैं। निराकार आनन्द ही नराकार श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ है। श्रीकृष्ण की सारी लीला आनन्दमय है। श्रीकृष्ण की कथा जब कभी सुनें, तब आनन्द आता है। प्रभु का दर्शन जब भी करो, तब नया ही आनन्द मिलता है। श्रीकृष्ण का स्मरण जब करो, तब नया ही आनन्द मिलता है।

कंस जब तक जीवित था, तब तक व्यासजी ने भागवत में उसकी रानियों का नाम नहीं दिया था। उसके मरने के बाद उनका नाम दिया गया है।  कंस की दो रानियों का नाम है अस्ति और प्राप्ति । अस्ति और प्राप्ति का पति कंस है। अस्ति अर्थात् बैंक में इतना रुपया जमा है। प्राप्ति का अर्थ है कि इस वर्ष इतने रुपये आने वाले हैं। यह सुख मुझे मिला है और यह सुख मुझे भोगना है। सभी जानते हैं कि आत्मा इस शरीर से भिन्न है। इसलिए आत्मा का आनन्द भी भिन्न होना चाहिए। फिर भी मनुष्य का अधिकाँश जीवन शरीर और इन्द्रिय का सुख भोगने में ही बीतता है। सुख की इच्छा तो सभी को होती है, किन्तु मनुष्य सच्चे सुख का विचार नहीं करता। यही कंस का स्वरूप है। कंस के मरने के बाद उसकी दोनों रानियाँ अपने पीहर चली गईं। उन्होंने अपने पिता जरासन्ध को मथुरा की सारी घटनायें बता दीं। जरासन्ध ने श्रीकृष्ण को अपना बैरी मान लिया। जरासन्ध ने तेईस अक्षौहिणी सेना एकत्र कर मथुरा पर चढ़ाई कर दी। प्रभु ने बलरामजी से कहा कि बड़े भाई, आप जरासन्ध को मारिए मत। श्रीकृष्ण के कहने से बलरामजी ने जरासन्ध को नहीं मारा। फिर भी उसकी सारी सेना का विनाशकर डाला। जरासन्ध घर गया और कई अक्षौहिणी सेना लेकर फिर युद्ध करने आया। प्रभु ने उसे पराजित किया और उसकी सेना का विनाश किया। इस प्रकार जरासन्ध सत्रह बार पराजित हुआ। इस उत्तरार्ध में जरासन्ध के साथ किए गए युद्ध का वर्णन अच्छी तरह किया गया है। उनचासवें अध्याय में पूर्वार्ध पूरा हुआ है।

तुम्हारे जीवन में उनचास वर्ष पूरा होने पर जरासन्ध लड़ने आयेगा। भोजन न पचना, आँख से अच्छी तरह न दिखाई देना, थकावट लगना ही जरासन्ध की सेना है। जिस समय लोग सौ वर्ष जीवित रहते थे उस समय पचास वर्ष तक पूर्वार्ध और उसके बाद का समय उत्तरार्ध था। अब लोग सौ वर्ष जीवित नहीं रहते। पैंतीस-चालीस वर्ष की उम्र से उत्तरार्ध शुरू हो जाता है। उत्तरार्ध में बहुत सावधान रहना चाहिए। सत्रह बार जरासन्ध यांनी बीमारी आती है। उससे रक्षा होने पर अठारहवीं बार जरासन्ध काल यवन को लेकर लड़ाई करने आता है। उस समय शरीर छोड़ना ही पड़ता है। अन्त में श्रीकृष्ण मथुरा छोड़कर चले जाते हैं।

भागवत की कथा अनेक तरह से कही जाती है। जरासन्ध काल यवन से मैत्री करता है और उससे कहता है कि तुम मथुरा जाओ। फिर बाद में मैं मथुरा आऊँगा। काल-यवन ने मथुरा पर चढ़ाई कर दी। उसके बाद जरासन्ध भी आने वाला था। प्रभु ने बलरामजी से कहा कि अब क्या किया जाएगा? बलरामजी ने कहा कि जरासन्ध को सत्रह बार हराया, फिर भी वह लड़ने आया है। ये लोग मथुरा में शान्ति से नहीं रहने देंगे। मुझे तो आनर्त (गुजरात) देश में जाकर रहना है। उसी समय रेवत की पुत्री के साथ बलामजी का विवाह हो गया। बलरामजी को इस विवाह में आनर्त-ओखा मण्डल का राज्य दहेज में मिला था। बलरामजी ने वहाँ रहने की इच्छा प्रकट की और मथुरा छोड़ना चाहा। प्रभु ने कहा कि आप बड़े भाई हैं। आपकी इच्छा यदि वहाँ रहने की है तो मैं भी वहीं रहने आऊँगा। उन्होंने विश्वकर्मा को बुलाया और समुद्र के मध्य एक नगरी बनाने की आज्ञा उन्हें दी। देवताओं ने अपनी सारी सम्पत्ति श्रीकृष्ण को अर्पण कर दी । समुद्र के मध्य सुवर्ण नगरी की रचना की गई।

 उसमें बड़े-बड़े बाड़े (घेरे) बनाए गए थे। यादवों को उसमें से बाहर निकलने के लिए जल्दी रास्ता नहीं मिला। वे बार-बार पूछने लगे। 'द्वार कहाँ है? द्वार कहाँ है?' इसलिए उसका नाम द्वारका पड़ा।  इस प्रकार श्रीकृष्ण ने मथुरा नगरी छोड़ दी। जरासन्ध जब अन्तिम बार युद्ध करने आया, तब श्रीकृष्ण द्वारका पहुँच चुके थे। द्वारका ब्रह्मविद्यापुरी है। जिस प्रकार समुद्र का अन्त नहीं है, वैसे ही ब्रह्म का अन्त नहीं है। इसीलिए परमात्मा को अनमा कहते हैं। समुद्र में स्थित द्वारका ब्रह्मविद्या स्वरूप है। द्वार का अर्थ दरवाजा और 'का' अर्थ ब्रह्म परमात्मा है। 

 इसके प्रत्येक द्वार में भगवान् विराजमान हैं। हम सब लोग यदि द्वारका जाकर रहने लगें, तो वहाँ कितनी भीड़ होगी? तीर्थ में रहना अच्छा है; किन्तु प्रभु ने तुम्हें रहने के लिए जो घर दिया है, उसे तीर्थ तुल्य पवित्र बनाओ तो अधिक अच्छा है। अपना घर ऐसा पवित्र रखो कि वहाँ कोई आए तो उसका मन शुद्ध हो और उसे भगवान् की भक्ति करने की भावना पैदा हो अपने घर को तीर्थ बनाने की कोशिश करो, जिसके प्रत्येक स्थान पर भगवान् विराजमान हों। शरीर रूपी घर में इन्द्रिय रूपी  दरवाजे हैं भगवान् को अपने शरीर में रखो। अपनी आँख में श्रीकृष्ण को रखो, कान में श्रीकृष्ण को रखो। जिस इन्द्रिय से भक्ति नहीं होती उससे जाने अनजाने पाप होता है। जो अपनी सभी इन्द्रियों से भक्ति करता है उसकी बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश होता है। पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान समय बीतते भूल जाता है; किन्तु अन्दर से प्राप्त किया गया ज्ञान स्थायी होता है। इसलिए अपनी एक-एक इन्द्रिय से भक्ति करो। जो ब्रह्मरूप हो जाता है, उसे काल-यवन भी नहीं मार सकता।

यादवों को द्वारका में छोड़कर श्रीकृष्ण ने काल-यवन से युद्ध करने के लिए प्रस्थान किया । ब्रह्मा ने काल-यवन को वरदान दिया था कि तुमको कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मार सकेगा जिसने यदुकुल में जन्म लिया हो। प्रभुजी ने ब्रह्माजी का वरदान सफल किया। युद्ध में काल-यवन की जीत हुई और श्रीकृष्ण की हार हुई। परमात्मा ने लीला की। वे रण छोड़कर भागे। काल-यवन ने श्रीकृष्ण का पीछा किया। उसने प्रभु से कहा, 

"लोग तुमको मानते हैं, लेकिन मुझे विश्वास है कि तुम डरपोक हो। । तुम रण छोड़कर जा रहे हो।" 

काल यवन ने 'रणछोड़, रणछोड़' कहकर पुकारा। इसलिए उनका नाम रणछोड़राय पड़ गया। श्रीकृष्ण ने भागते-भागते गिरनार पर्वत में स्थित मुचकुंद ऋषि की गुफा में प्रवेश किया। उस समय राजर्षि मुचकुंद सो गये थे। श्रीकृष्ण ने उनके शरीर पर अपना पीताम्बर उढ़ा दिया। काल यवन इसके बाद वहाँ पहुँचा। मुचकुंद ने राजऋर्षिको श्रीकृष्ण मानकर जोर से लात मारी। मुचकुंद ऋषि ने अपनी आँखें खोलीं। मुचकुंद ऋषि को यह वरदान था कि जो तुम्हारी निद्रा भंग करे उस पर यदि तुम्हारी दृष्टि पड़े तो वह जलकर भस्म हो जाए। फलस्वरूप मुचकुंद ऋषि की नजर पड़ते ही काल-यवन जलकर भस्म हो गया। इसके बाद मुचकुंद ऋषि को द्वारकानाथ का दर्शन हुआ। मुचकुंद महाराज ने परमात्मा की स्तुति की।

मुचकुंद महाराज ने अपनी स्तुति में वर्णन करते हुए कहा, 

"मनुष्य की दशा सर्प के मुँह में स्थित मेढ़क जैसी है। सर्प के मुँह में जो मेढ़क होता है उसका आधा शरीर सर्प के मुख में होता है। वह एक-दो मिनट में ही काल का कौर बनने वाला होता है। ऐसे समय यदि मेढ़क के ऊपर कोई मक्खी फड़कती हुई आई हो, तो वह उसे खाने का प्रयत्न करता है।"

 "पचास वर्ष की उम्र पूरी होते ही मनुष्य का शरीर काल के मुख में पड़ जाता है, फिर भी उसे भक्ति की ओर प्रेरणा नहीं होती और वह विषयों में लगा लिपटा रहता है। यह जीव कितना गाफिल है? यदि किसी को कहीं बाहर जाना हो तो वह दो-तीन दिन पहले तैयारी करता है कुछ लोग तो दो-चार महीने पहले से तैयारी करते हैं। आश्चर्य है कि प्रभु के घर जाने का निश्चय होने पर भी कोई उसकी तैयारी नहीं करता। यह कथा सुनने के बाद आप लोग हर रोज थोड़ी तैयारी करते रहें। इस में घबराने की आवश्यकता नहीं। अभी बहुत देर है । फिर भी थोड़ी-थोड़ी तैयारी करने की आवश्यकता है। देश के बदलने के साथ-साथ उसका सिक्का भी बदलता रहता है। इसलिए यहाँ का सिक्का वहाँ नहीं चल सकता मनुष्य अपने जीवन काल में मरने की तैयारी नहीं करता। इसीलिए उसे अंत काल में बहुत पछताना पड़ता है। मुचकुन्द महाराज ने कहा है, 

"मुझे गर्गाचार्य का सत्संग प्राप्त हुआ है। आज मैं आपका दर्शन कर कृतार्थ हो गया हूँ। आप मुझे अपनी भक्ति दीजिए।"

 प्रभु ने कहा कि जिसने जवानी में विलासी जीवन गुजारा है उसे शेष जीवन में अनन्य भक्ति नहीं मिलती, अपितु उसका सारा जीवन विलास में बरबाद हो जाता है। यदि वह वृद्धावस्था में भक्ति करे तो उसका दूसरा जन्म सुधरता है। हाँ, उसे एक ध्यान होना होता है। बद्री केदार में जाकर वहाँ एक ध्यान करो वहीं शरीर छोड़ दो।" 

मुचकन्द महाराज ने बद्री केदार जाकर अपना शरीर छोड़ा। वे कलियुग में नरसिंह मेहता के रूप में पैदा हुए। प्रभुने मुचकुन्द ऋषि को सद्गति दी।

इसके बाद श्रीकृष्ण मथुरा पहुँचे। उनसे जरासंध अठारहवीं बार युद्ध करने आया। उसने ब्राह्मणों को यह कहकर धमकाया कि यदि मेरी हार होगी तो मैं तुम्हारा कत्ल कर दूँगा । प्रभु ने लीला की जरासंध की जीत हुई और श्रीकृष्ण की हार हुई जरासंध प्रभु के पीछे-पीछे उन्हें मारने के लिए दौड़ा। उस समय श्रीकृष्ण प्रवर्षण पर्वत पर पहुँचे। यदि तुम्हारे पीछे भी जरासंध दौड़े तो तुम भी प्रवर्षण पर्वत पर जाओ। जहाँ ज्ञान और भक्ति की नित्य वर्षा होती है वही सात्विक भूमि प्रवर्षण पर्वत है। पचास-पचपन वर्ष हो जाने के बाद विलासी लोगों से दूर रहना। क्योंकि उनका संग मन को दुर्बल बनाता है। समाज में रहकर मनुष्य होना सरल है, किन्तु विलासी लोगों का साथ कर मन को पवित्र रखना कठिन है।

 इक्यावन, बावन, सत्तावन का अर्थ यह होता है कि अब 'वन' में जाओ। इस जीवन में बहुत सावधान रहो।  अधिक नहीं तो प्रतिदिन नियमपूर्वक प्रभु का इक्कीस हजार जप करो। एक घंटे में नौ सौ साँस ली जाती है। चौबीस घंटे में २१,६०० साँस ली जाती है। प्रति साँस पर जप करने की आवश्यकता है। नियम से इक्कीस हजार जप करो। 'श्रीराम', 'श्रीकृष्ण' जैसा दो तीन अक्षरों का मन्त्र हो तो एक घण्टे में चार-पाँच हजार मन्त्र बोला जा सकता है। ऐसा एक आसन पर पाँच घण्टा बैठने पर पूरा होगा। जब पुत्र विवाहित हो गया और घर में पुत्र- वधू आ गई तो यह समझना कि अब तुम्हारा गृहस्थाश्रम पूरा हो गया वानप्रस्थाश्रम शुरू हो गया अब तुम्हें वन में जाने की आवश्यकता है। कुछ वृद्धाएँ ऐसी होती हैं जो मरते समय तक चाभी का गुच्छा अपनी बहू को नहीं देतीं और बहू को यह इच्छा होती है कि यदि सासु को कुछ हो जाए तो अच्छा। पुत्र के विवाहित हो जाने के बाद सावधान होकर रहना। घर में रहना हो तो भले रहो; किन्तु विवेकपूर्वक रहो, सादा भोजन करो और सतत भक्ति करो। ऐसा भाव रखो कि मेरा घर भगवान् के चरणों में है। मुझे अब यह घर छोड़ना है।

मन घर में रहने से नहीं बिगड़ता, किन्तु वह घर पर अधिक ममता रखने से बिगड़ता है।' सतत भक्ति करने से मरण सुधरेगा। भक्ति करने से जरासंध के त्रास से यानी जन्म और मरण के संकट से छूट सकोगे। प्रभु का नाम जप सतत करने की बहुत आवश्यकता है। बिना जप के पाप की आदत नहीं छूटती। यज्ञ करने से पुण्य बढ़ता है, किन्तु पाप नहीं छूटता। पाप करने की आदत इस जीव को जन्म-जन्मान्तर से पड़ी है। एक स्थान पर शान्ति से बैठकर जप करने पर ही पाप छूटता है। बिना जप के वासना का विनाश नहीं होता। छः महीने जप करके देखोगे और अनुभव करोगे कि मेरा मन अब पहले की अपेक्षा कुछ सुधरा है। मन्त्र जप करने से पाप कुछ कम होगा और तुम्हारी आत्मा यह कहेगी कि अब तुझे भक्ति का रंग लगा है। इस प्रकार प्रभु ने जगत् को प्रवर्षण पर्वत पर जाने का उपदेश दिया है। 


श्री डोंगरेजी महाराज 

हरिओम सिगंल 






मंगलवार, 20 सितंबर 2022

जीव ईश्वर का मिलन

 परिपूर्ण आनन्दमय श्रीकृष्ण को कोई सुख भोगने की इच्छा ही नहीं होती। प्रभु ने यह लीला गोपियों को परमानन्द देने के लिए की है और योगमाया का आश्रय लिया है। भगवान् ने आज क्रीड़ा करने की इच्छा की है, बाँसुरी बजाई है, गोपियों को बुलाया है। बाँसुरी की ध्वनि गोपियों के कान में पड़ती है। गोपियाँ परमात्मा से मिलने की तीव्र भावना लेकर दौड़ पड़ती हैं। उस समय गोपियाँ जो काम कर रही थीं, उसे छोड़कर दौड़ पड़ती हैं?

बाँसुरी की आवाज सुनाई दी। उसने सोचा कि भगवान् मुझे बुला रहे हैं। वह जल्दी में काजल लगाने के बदले कुमकुम लगाकर उधर दौड़ी। यदि गोपी में स्त्रीत्व होता, तो वह ऐसा कदापि नहीं करती। हम दर्पण में मुँह देखकर सब ठीक कर बाहर निकलते हैं।  गोपियों में स्त्री-भाव नहीं है। रासलीला में किसी स्त्री को प्रवेश नहीं मिला है। उसमें तो शुद्ध जीव ही जा सकता है, जिसके वासना का पर्दा दूर हो गया हो, जिसमें लौकिक नाम-रूप की पूर्ण विस्मृति हो ।

भगवान् गोपियों से कहते हैं कि तुम बहुत भाग्यशाली हो । महाभागा हो, बहुत भाग्यशाली वह है, जिसे भगवान् से मिलने की तीव्र इच्छा हो।  भाग्यशाली वह होता है, जो परमात्मा से मिलने के लिए आतुर हो । भगवान् कहते हैं, 

"तुम बड़ी भाग्यशाली हो। तुम इस समय क्यों आईं ? सुन्दर रात्रि है। इसमें तुम वृन्दावन की शोभा देखो। इसके बाद अपने घर जाओ, अपने पति के पास जाओ।" 

 श्रीकृष्ण किसी को सुख नहीं देते। वे आनन्द देते हैं। यह संसार सुख-दुःख से भरा हुआ है। जो सुख देता है, वही दुःख का कारण बनता है। यहाँ न सुख है, न दुःख है। श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। सभी को आनन्द देते हैं। उन्होंने गोपियों से कहा कि तुम्हें सुख तुम्हारे पति देंगे। तुम उनके पास जाओ। गोपियाँ कहती हैं कि जिसे सुख की इच्छा है, वह पति या पत्नी के पास जाएगा। जिसे सुख की इच्छा नहीं है, वह परमात्मा के पास आता है। हमें कोई सुख नहीं चाहिए। श्रीकृष्ण गोपीयों को स्त्री - धर्म समझाते हैं और घर जाने की आज्ञा देते हैं।

कृष्ण ने गोपीयों से कहा है कि,

 "पति रोगी हो, दरिद्री हो तो भी उसमें परमात्मा की भावना रखकर सेवा करने से स्त्री का यह लोक सुधरता है और परलोक भी सुधरता है। रात्रि काल में तुम क्यों बाहर आती हो? तुम्हारा पति तुम्हारी प्रतीक्षा करता होगा। पति में परमात्मा की भावना रखो।"

 श्रीकृष्ण ने गोपियों को घर जाने की आज्ञा दी है। 

 पुरुष को जल्दी मुक्ति नहीं मिलती; किन्तु स्त्री को भगवान् जल्दी मिल जाते हैं। स्त्री को भगवान् के लिए इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं है। उसका हृदय कोमल होता है। यदि स्त्री घर के एक-एक जीव में ईश्वर का भाव रखकर उसकी सेवा करे और भगवान् का स्मरण करें, तो उसे अनायास ही मुक्ति मिल जाती है। क्यों कि उसका हृदय अत्यन्त कोमल होता है। पुरुष अपने व्यवसाय में जो पाप करता है, उसका पूरा फल उसे अकेले ही भोगना पड़ता है। यदि वह पैसे से कोई दान पुण्य करे, तो उसमें स्त्री का भी आधा भाग होता है। जो स्त्री अपने पति में परमात्मा का भाव रखकर उसकी सेवा करती है, उसे ही पुण्य मिलता है।

भगवान् गोपियों से कहते हैं,

 "स्त्री का इधर-उधर भटकना ठीक नहीं है। फिर तुम सब क्यों इधर-उधर भटक रही हो?"

श्रीकृष्ण गोपियों को स्त्री - धर्म समझाते हैं और गोपियाँ उसका उत्तर आत्मधर्म से देती हैं। वे भगवान् से कहती हैं कि,

" जो स्त्री होगी, वह स्त्री - धर्म का पालन करेगी। जो स्त्री न हो, उसे स्त्री-धर्म का पालन करने की क्या आवश्यकता है? मेरा मन रिक्त है। मैंने सबका त्याग कर दिया है और स्त्रीत्व का भी त्याग कर दिया है। गोपियों में स्त्रीत्व नहीं है।"

 श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ दुःख रूप है ऐसा समझकर जो बुद्धि पूर्वक त्याग किया जाये वह सच्चा त्याग है।  गोपियाँ सब बातें समझकर त्याग करती हैं।  श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ दुःख रूप ही है। ऐसा मानकर उन्होंने सर्वस्व का त्याग किया है और कृष्ण के चरणों का सहारा लिया है। 

"हे नाथ! आप निष्ठुर मत बनिए।"

गोपियों ने कहा-,

 प्रभु ने कहा कि

" मैं निष्ठुर नहीं हूँ। मैं तुम्हारा प्रेम जानता हूँ, किन्तु मुझे धर्म बहुत प्रिय है। तुम अपना धर्म छोड़ रही हो। अपने पति की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। "

एक गोपी ने कहा कि ,

"महाराज, आपने मुझे अपना धर्म समझाया। अब यह समझाइये कि धर्म का फल क्या होता है ? अथवा धर्म करने से क्या होता है? "

श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हैं कि,

 "प्रभु ने जिसका जो धर्म निश्चित किया है उसे फल की अपेक्षा छोड़कर पालन करके अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, इससे उसका पाप नष्ट हो जाता है। धर्म का फल है पाप का विनाश करना।"

 यह सुनकर गोपियों ने पूछा कि ,

"पाप का विनाश होने के बाद क्या होता है? यदि धर्म का फल पाप का विनाश है तो पाप के नाश का फल क्या है?" 

प्रभु ने कहा कि, 

"जिसके पाप का विनाश होता है, उसका मन शुद्ध हो जाता है। अर्थात् पापनाश का फल है मन की शुद्धि।"

 गोपियों ने कहा कि, 

"अब यह बताइए  कि मन की शुद्धि का क्या फल होता है?"

 भगवान् ने कहा कि,

 "जिसका मन शुद्ध होता है उसे परमात्मा मिलता है।" 

गोपियों ने कहा कि,

 'हमारा मन शुद्ध है। इसीलिए तो हमें आप मिले। यदि धर्म का फल पापनाश है, पापनाश का फल मन-शुद्धि है, मन-शुद्धि का फल परमात्मा की प्राप्ति है तो परमात्मा के मिलने के बाद धर्म पालने की क्या आवश्यकता है? फल हाथ में आने के बाद कोई वृक्ष को नहीं पकड़ने जाता । परमात्मा फल-स्वरूप मिलता है। साधन की अपेक्षा साध्य के हाथ में आ जाने पर साध्य छोड़कर साधन कौन पकड़ने जाए? आज तक हमने धर्म का बहुत पालन किया और हमारा मन शुद्ध हो जाने पर आप मिले हैं। मन की शुद्धि के बिना परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन का लाभ मिल ही नहीं सकता। अब आपको छोड़कर हमें धर्म पालने की जरूरत नहीं रहती। आपने हमें धर्म का जो उपदेश दिया है उसका हमने ठीक तरह पालन किया। हमारा मन शुद्ध हो गया है। इसीलिए आपके दर्शन हुए हैं। आपको छोड़ हम धर्म पालने के लिए कहाँ जाएँ? हमने आपके चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण किया है। नाथ! हम पर कृपा कीजिए ।"

प्रभु ने गोपियों से कहा कि,

 "सखियो ! क्या तुम मुझे मानती हो?"

 सखियों ने कहा, 

'हाँ हम आपको मानती हैं। ' 

भगवान् ने कहा,

 'तो मेरी आज्ञा है कि तुम यहाँ से अपने घर जाओ। तुम्हारे पति के शरीर में भी मैं ही निवास करता हूँ। क्या मैं यहाँ जो खड़ा हूँ, उतना ही हूँ? मैं सबका आधार हूँ। तुम अपने पति के शरीर में विराजने वाले परमात्मा से मिलो।'

यह सुनकर गोपी ने बहुत सुन्दर जबाब दिया,

 "पति के शरीर में परमात्मा है और पत्नी के शरीर में जो परमात्मा है, वह माया से ढँका हुआ है। पति-पत्नी में विद्यमान परमात्मा वासना के स्पर्श से दूषित है। आप वासना रहित शुद्ध परमात्मा हैं, पूर्ण निष्काम हैं। मैं वासना का पर्दा फेंककर यहाँ आयी हूँ, पूर्ण निर्वसन होकर आई हूँ। जहाँ वासना का स्पर्श है, वहाँ हमें परमात्मा से नहीं मिलना है। जो वासना-रहित है, शुद्ध है। उस परमात्मा से मैं मिलने आई हूँ।"

 प्रभु ने यह बात सुनी। वे मन में विचार करते हैं कि मुझे किसी ने भी ऐसा उत्तर नहीं दिया। फिर कहा कि,

 "तुम्हारी बात सुनकर मुझे बहुत आनन्द होता है, किन्तु मेरी इच्छा है कि तुम अपने घर जाओ। तुम अपने पति में ऐसी भावना रखो कि वह माया-रहित परमात्मा है। लोग पत्थर की मूर्ति पूजते हैं। मूर्ति पत्थर की होती है, किन्तु लोग भावना रखते हैं कि यह भगवान् की है।  यदि कोई मूर्ति में ईश्वर की भावना रखकर पूजा करे, तो वह पूजा भगवान् को मिलती है। इससे पूजा सफल होती है और पूजा करने वाले का कल्याण होता है। पति चाहे जैसा है, किन्तु वह चेतन है, पत्थर की मूर्ति जड़ है। जड़ में परमात्मा की भावना रखकर, जड़ में चेतन की भावना रखकर जो पूजा की जाती है, वह सफल होती है। फिर तुम चेतन पति में परमात्मा की भावना क्यों नहीं करतीं?"

 तब एक गोपी ने उत्तर दिया, 

"पति में परमात्मा की भावना रखी जाए तो वह भावना वियोग में फलित होती है। वह भावना संयोग में नहीं होती। प्रत्यक्ष परमात्मा के दर्शन के बाद कोई पत्थर की मूर्ति की पूजा नहीं करता। जिसे दर्शन नहीं हुआ है, वह ऐसी भावना रखता है कि यही भगवान् है।जब तक आपके दर्शन नहीं हुए थे तब तक हम सब में आपकी ही भावना करते थे। अब आपके दर्शन हो जाने पर आपको छोड़कर हम भावना सिद्ध करने के लिए कहाँ जाएँ?"

परमात्मा ने कहा,

 "मेरी आज्ञा है कि तुम अपने घर जाओ।"

 गोपियों ने कहा कि,

" हम आपकी आज्ञा मानकर घर तो जाएँ, किन्तु हमारा मन जो आपके पास है, उसे वापस दीजिए।"

 परमात्मा ने कहा,

 "तुम्हारा मन तो मुझ में मिल गया है। परमात्मा में मन मिलने के बाद उसे परमात्मा भी अलग नहीं कर सकता। जो मन भगवान् को अर्पण किया जाता है, वह उसमें मिल जाता है। उसे भगवान् भी अलग नहीं कर सकता ।"

 एक गोपी बोली,

 "जहाँ मन मिलता है वहीं आत्मा स्थिर हो जाती है। हे नाथ, ऐसा मत कीजिए।"

प्रभु ने कहा,

 "सखियो, तुम्हारे वचन बड़े सुन्दर हैं। तुम्हारी इच्छा क्या है?"

 गोपी कहती हैं, 

"मुझे अधरामृत दीजिए। मैं अधरामृत लेने आई हूँ।"

अधरामृत का अर्थ भागवत में एक-दो स्थानों पर ऐसा किया गया है-  जहाँ जगत् नहीं है, जहाँ मैं नहीं हूँ, जहाँ केवल परमात्मा ही विराज रहा है। उस परमात्मा के साथ मैं एकाकार हो जाऊँ। परमात्मा के साथ एकाकार होने का अर्थ जगत् की विस्मृति है। मुझे ऐसा ही अधरामृत दीजिए।

 गोपी अधरामृत माँगती है। मुझे ऐसा ज्ञानामृत दीजिए।

 पृथ्वी ही धरा है- संसार के विलासी जीव तो धरामृत का भोग करते हैं, जो अमृत पीने पर मृत्यु होती है। ऐसा ज्ञानामृत दो कि मैं एक क्षण भी श्रीकृष्ण से दूर न होऊँ, ऐसा अधरामृत दो कि आपका नित्य संयोग प्राप्त हो। यानी जहाँ जगत् नहीं, जहाँ केवल परमात्मा है। गोपी अब श्रीकृष्ण से अलग रह ही नहीं सकती। उसे अब श्रीकृष्ण का वियोग असह्य है। रासलीला में गोपी श्रीकृष्ण का रूप ग्रहण संयोग प्राप्त हो। यानी जहाँ जगत् नहीं, जहाँ केवल परमात्मा है। गोपी अब श्रीकृष्ण से अलग रह ही नहीं सकती। उसे अब श्रीकृष्ण का वियोग असह्य है। रासलीला में गोपी श्रीकृष्ण का रूप ग्रहण करती है। वह कहती है, 

"मुझे ऐसा अधरामृत दीजिए। उसे ही पीने मैं यहाँ आई हूँ।"

 श्रीकृष्ण ने कहा, 

"तुम्हें तो अधरामृत लेने की इच्छा है, किन्तु यदि मेरी इच्छा अधरामृत देने की न हो तो? मुझे अधरामृत नहीं देना है। तुम यहाँ से अपने घर जाओ।"

 गोपियों ने कहा, 

"आप घर जाओ,  घर जाओ, किससे कहते हैं। हम आपको अपने लिए नहीं मना रही हैं। हम जानती हैं कि आप बड़े ही संकोची हैं। यदि हम सब घर चली जाएँ, तो आप यहाँ रहकर क्या करेंगे? भगवान् की शोभा भक्तों से है। आप भी हमसे मिलने के लिए आतुर हैं। ईश्वर की इच्छा होती है कि जीव मेरा अंश है, वह मुझसे मिले। हे नाथ, हम पर कृपा करो। हमारे मन में श्रीकृष्ण को छोड़ दूसरा कोई नहीं है। हम यहाँ से घर जाकर आपके वियोग में प्राण त्यागकर आपसे ही मिलने वाली हैं। अन्तिम उपाय तो हमारे हाथ में है। अर्थात् हम अपने प्राण छोड़कर आपसे मिलने ही वाली हैं, किन्तु उसका कलंक आपको न लगने पाए। आपकी अपकीर्ति न हो, इसीलिए हम आपको मना रही हैं। "

"मुझे मरण से थोड़ी भी भीति नहीं लगती। मृत्यु से वही घबराता है; जिसके मन में वासना होती है। जिसके मन में वासना नहीं होती, उसे मृत्यु से कोई भय नहीं लगता । मृत्यु तो मिलन कराने वाली होती है, वह परमात्मा के साथ ऐक्य कराती है।"

 गोपियों को मरने का न तो कोई दुःख है, न भीति है। प्रभु ने यह सुना और उनकी हार हो गई।

भगवान् विचार करते हैं, 

इन गोपियों में कितनी आतुरता है? मैं इनसे मिलूँ और मिलन क्रम में जिसकी अन्तिम बारी हो, वह कदाचित् अपने प्राण छोड़ दे तो?इसीलिए श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियाँ थीं उतने स्वरूप धारण कर यह अनुभव कराया कि मैं तेरे साथ ही हूँ। हजारों वर्षों से भगवान् से बिछुड़ा हुआ यह जीव प्रभु के पास आया है और भगवान् उसे भुजाओं में भरकर आलिंगन देते हैं। गोपी और श्रीकृष्ण का यह मिलन जीव ईश्वर का मिलन है। इस समय अंशी और अंश एक हो गए हैं। गोपी के हाथ में भगवान् आ गए हैं। वे इस बात से मगन हैं कि मुझे परमात्मा मिले हैं। इससे उन्हें अत्यन्त आनन्द हुआ। आज भगवान् को भी आनन्द हो रहा है कि मुझसे बिछुड़ा हुआ अंश आज मुझसे मिला है। रास में संगीत, साहित्य और नृत्य तीनों का समन्वय हुआ है। गोपियाँ आनन्दातिरेक में नाच रही थीं। उन्हें देखकर श्रीकृष्ण ने भी ताल का अनुसरण करते हुए नाचना शुरू कर दिया।

 यह लीला खुले मैदान में हुई है। यह दरवाजा बन्द करके नहीं की गई। श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में खुले मैदान में यह लीला की है। प्रत्येक गोपी के साथ श्रीकृष्ण का एक स्वरूप है। मध्य में राधा-माधव हैं। उस समय ब्रह्मादिक देव इस लीला के दर्शन करने आए। ब्रह्माजी ने विचार किया कि यह लीला शुद्ध तो है; किन्तु मेरे विचार से कुछ लोक- विरुद्ध है। 

 वास्तव में इस मिलन में कोई विकार नहीं हैं, कोई वासना नहीं है। यह बिल्कुल निष्काम है, शुद्ध है। फिर भी लोक-विरुद्ध है इस प्रकार स्त्रियों के साथ नाचना-कूदना अधर्म है। इससे ब्रह्माजी को थोड़ी शंका हुई। श्रीकृष्ण तो ब्रह्माजी के मन में विराजमान हैं, अन्तर्यामी हैं। श्रीकृष्ण को ज्ञात हुआ कि ब्रह्माजी की भावना कुछ बिगड़ी है। मैंने उसे धर्म का मर्म समझाया है; किन्तु आज वह मुझे समझा रहा है। प्रभु ने अब ऐसी लीला की कि गोपी को छाती से लगा कर आलिंगन किया और  उसे आत्मस्वरूप दान किया। अब साड़ी पहनने वाली कोई गोपी नहीं रह गई। सभी पीताम्बर धारी कृष्ण बन गईं। अब श्रीकृष्ण के साथ श्रीकृष्ण की क्रीड़ा हो रही है। शुद्ध जीव अब ब्रह्म रूप बन जाता है। ब्रह्म का ब्रह्म के साथ विलास करने का नाम रास है।

यदि सजातीय सजातीय से मिले तो धर्म- मर्यादा का भंग नहीं होता। विजातीय का सजातीय से मिलना यह भले ही धर्म-भंग हो । यह तो आत्मा का अंश परमात्मा को मिला। यह लोक विरुद्ध नहीं हो सकता न तो धर्म-विरुद्ध है। यह तो स्वयं धर्म का फल है। ब्रह्माजी को दर्शन हुआ कि साड़ी पहनने वाली कोई गोपी है ही नहीं। सभी पीताम्बर धारी श्रीकृष्ण हैं! तब उन्हें विश्वास हुआ कि यह मिलन लोक-विरुद्ध नहीं है, यह अति शुद्ध  है । 

ब्रह्माजी साष्टांग वन्दन करते हैं और रासबिहारी लाल की जय-जयकार करते हैं। जब ब्रह्माजी वन्दन कर खड़े हुए तब लाला ने विनोद किया अब तो पीताम्बरधारी कृष्ण दिखाई नहीं देते, सब गोपियाँ हैं। श्रीकृष्ण एक बार दर्शन कराते हैं तो सब श्रीकृष्ण ही हैं, उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। अब जो दर्शन कराते हैं, उनमें कोई पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण नहीं है। सभी साड़ी पहनने वाली गोपियाँ ही हैं। यह पूर्ण अद्वैत की कथा है।

श्रीकृष्ण-लीला का रहस्य श्रीकृष्ण कृपा से ही ध्यान में आता है। अब गोपी के साथ श्रीकृष्ण का स्वरूप दिखाई देता है। उस समय नारदजी वहाँ आए। उनकी इच्छा हुई कि यदि मैं अन्दर जाऊँ तो क्या भगवान् मुझे आलिंगन देंगे? मुझे परमात्मा से मिलना है लेकिन इधर तो सखियों का पहरा है। उन्होंने नारदजी से कहा,

 "आप दूर से दर्शन कर सकते हैं। आपको अन्दर प्रवेश नहीं मिल सकता। आप अन्दर नहीं जा सकते।"

 प्रवेश न मिलने पर नारदजी को दुःख हुआ । उनको मन में ऐसा आया कि ब्रह्माजी का पुत्र होकर मैंने बड़ी भूल की। मैं यदि गोपी हुआ होता तो मुझे अन्दर प्रवेश मिलता। अब नारदजी 'श्री राधे-राधे' कहकर रोने लगे। इस पर राधाजी को दया आ गई। श्रीधाम वृन्दावन में यदि कोई जीव रोने लगे, तो श्रीराधाजी वहाँ तुरन्त पहुँच जाती हैं।

आनन्दमय वृन्दावन में कोई रोता नहीं है। वहाँ तो ब्रह्म भी नाचता है। राधाजी नारदजी से  पूछती हैं, 

'नारद, तू क्यों रोता है? तुझे क्या हो गया है?' 

उस समय नारदजी ने हाथ जोड़कर कहा है,

 'मुझे अन्दर आना है किन्तु ये सब मुझे रोकती हैं।'

 राधाजी की आज्ञा मिल गई। नारदजी राधा-कुण्ड में स्नान कर रहे हैं। इससे उनमें अलौकिक गोपी भाव पैदा हो जाता है, और नई नारदी गोपी उत्पन्न हो उठती है। अब नारदजी ने पुरुषत्व के अभिमान का त्याग कर दिया। क्योंकि किसी पुरुष या स्त्री को रास में प्रवेश नहीं मिलता। राधाजी इस नई सखी को श्रीकृष्ण के पास ले जाती हैं। श्रीकृष्ण नारदी सखी का आलिंगन कर रहे हैं। नारदजी ने विचार किया यदि भगवान् मिलता हो, तो साड़ी पहनने से मेरा क्या बिगड़ता है? मैं बहुत भटक चुका।  मैं पुरुष हूँ। यह अहं धारण कर मैं बहुत दुःखी हुआ। गोपियाँ स्त्रीत्व छोड़कर प्रभु से मिलने आती हैं। इसलिए नारदजी ने पुरुषत्व का अभिमान छोड़ दिया। उनमें गोपीभाव जागृत हो उठा। इस प्रकार प्रभु ने गोपियों को परमानन्द दिया है और गोपियाँ कृतार्थ हो उठी हैं। 

श्री डोंगरेजी महाराज  

हरिओम सिगंल 




मदनमोहन भगवान श्रीकृष्ण

 रासलीला में स्त्री और पुरुष के मिलन की कथा नहीं है, बल्कि जीव-ब्रह्म के मिलन का वर्णन है। 'गोपी' शब्द सुनने से प्रायः लोगों को स्त्री का शरीर दिखाई देता है।   गोपियों का आकार कुछ स्त्री जैसा दिखाई देता है, किन्तु उनमें स्त्रीत्व नहीं है। आचार्यों ने 'गोपी' शब्द के अनेक अर्थ किए हैं।  जिसके शरीर में कृष्ण का स्वरूप गुप्त हैं, जिसके हृदय में श्रीकृष्ण को छोड़ कुछ नहीं है जो भगवद्-स्वरूप को ही अपने हृदय में रखता है उसे गोपी कहते हैं।

 साधारण मनुष्य अपने मन में संसार को रखता है। मन में जो संसार है, वही रुलाता है, वहीं सताता है। तुम संसार में भले रहो, किन्तु संसार को अपने मन में मत रखो। संत लोग संसार में रहते हैं, किन्तु संसार उनके मन में नहीं आता। संत जन अपने मन में परमात्मा का स्वरूप स्थिर करते हैं। गोपी ने मन से सर्वस्व त्याग कर दिया है और मन में परमात्मा का स्वरूप स्थिर कर लिया है। न तो गोपी नाम की कोई स्त्री, न कोई पुरुष और न कोई स्त्री- पुरुषोत्तर है। परमात्मा के दर्शन की, मिलन की तीव्र इच्छा ही गोपी है। भागवत में ही 'गोपी' शब्द का अर्थ परमात्मा को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा बताया गया है। इस जीव को प्रभु के दर्शन की इच्छा ही नहीं होती। मनुष्य का मन ऐसा मैला है कि इसे संसार सरस लगता है। मनुष्य का मन संसार में उलझा हुआ है। इसे यह इच्छा नहीं होती कि मुझे भगवान् का दर्शन हो अथवा मुझे परमात्मा से मिलना है। प्रभु मिलन की तीव्र भावना ही गोपी है।

 जो प्रत्येक इन्द्रिय से भक्तिरस का पान करता है। भक्ति अलौकिक दिव्य रस है। जो आँख से भक्ति करे, कान से भक्ति करे, मन से भक्ति करे, जीभ से भक्ति करे, जो अपनी प्रत्येक इन्द्रिय को भक्तिरस में डुबो दे उसे गोपी कहते हैं। जब प्रत्येक इन्द्रिय से भक्ति फूटती हैं, तब देहाभिमान छूटता है।  इन्द्रियों को भक्तिरस से पुष्ट करना है। वासना का विनाश करने के बाद प्रेम-मार्ग में प्रवेश मिलता है। प्रेम और मोह दोनों का आकार समान है, किन्तु दोनों में बहुत अन्तर है। मोह में सुख भोगने की इच्छा होती है, किन्तु प्रेम मार्ग में प्रियतम के लिए सर्वसुख का त्याग करना पड़ता है। मोह प्रेम माँगता है और प्रेम प्रेम देता है। प्रेम सारी वासनाओं को नष्टकर, प्रतिकूल सारे विषयों में से इन्द्रियों को हटाकर अनुकूल परमात्मा के प्रति अपने भावों को मोड़ता है। 

रासलीला में स्त्री और पुरुष के मिलन की कथा नहीं है। न तो गोपी कोई स्त्री है और न श्रीकृष्ण कोई पुरुष श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम परमात्मा हैं, गोपी शुद्ध जीव है और रासलीला शुद्ध जीव तथा ईश्वर के मिलने की कथा है। यही भागवत का फल है। भागवत में वर्णन आता है, गोपियों के शरीर ने प्रभु का स्पर्श किया ही नहीं, जब शरीर का विचार किया जाता है, जब शरीर का स्पर्श होता है तभी काम पैदा होता है। 

 परमात्मा का स्वरूप आनन्दमय है। निराकार आनन्द निराकार श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ है। हमारे शरीर में माँस-रुधिर है। ठाकुरजी का स्वरूप आनन्दमय है। जीव को जो शरीर मिलता है, वह पूर्वजन्म की वासना के अनुसार ही मिलता है। परमात्मा अपनी इच्छा से शरीर धारण करते हैं।

भगवान् की तरह गोपियों का स्वरूप भी अलौकिक, अप्राकृतिक और दिव्य है। गोपियों का शरीर भगवान् का सतत ध्यान करने से भगवान् की तरह गोपियों का स्वरूप भी अलौकिक, अप्राकृतिक और दिव्य है। गोपियों का पंच-भौतिक शरीर श्रीकृष्ण-वियोग में भस्म हो गया है। वियोग बहुत बड़ी अग्नि है ।  गोपियों ने परमात्मा का अलौकिक दिव्य स्वरूप प्राप्त किया है । गोपियों को श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद प्रेम जगा है। प्रेम का आरम्भ द्वैत से होता है किन्तु प्रेम की समाप्ति अद्वैत में होती है। आरम्भ में प्रेमी और प्रियतम दोनों अलग होते हैं, किन्तु अतिशय प्रेम बढ़ने पर ये दोनों अलग नहीं रह सकते और मिट कर एक हो जाते हैं। प्रेम का अर्थ है 'मैं' मिटाकर 'तू' हो जाना। साधारण प्रेम में 'मैं' और 'तू' दोनों अलग है। अतिशय प्रेम बढ़ने पर 'मैं' अलग नहीं रह सकता, वह 'तू' में मिल जाता है। गोपियाँ अब श्रीकृष्ण से अलग नहीं रह सकतीं। गोपियों का प्रेम अन्तिम कक्षा में पहुँच गया है। रासलीला में गोपी और श्रीकृष्ण एक हो गए हैं।  

रासलीला की कथा सुनने के पहले तीन सिद्धान्त ध्यान में रखने चाहिए। प्रथम यह कि यह रमण शरीर के साथ नहीं है, दूसरा यह शुद्ध जीव-ईश्वर की दिव्य लीला है और तीसरा यह कि इसमें स्त्री-पुरुष के मिलन की इच्छा नहीं है। गोपी में स्त्रीत्त्व है ही नहीं। 

 बाहर से जो शरीर दिखाई दे रहा है उसे स्थूल शरीर कहते हैं। अन्दर सूक्ष्म शरीर है जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि ये सत्रह तत्व होते हैं। सूक्ष्म शरीर में मन के अन्दर अनेक जन्मों की जो वासनाएँ होती हैं, उन्हीं के कारण उसे शरीर कहा गया है।  जिस मन में कोई वासना नहीं होती वह शांत हो जाता है। मन वासना से ही जीता है। बिना संकल्प के मन नहीं जी सकता। हमारे जैसे साधारण मनुष्य यह कथा कहने के योग्य नहीं हैं और हमारे जैसे साधारण मनुष्य यह कथा सुनने योग्य भी नहीं हैं। यह सर्वोच्च भाव है। मन के पूर्ण निष्काम होने के बाद अब गोपियाँ परमात्मा से अलग नहीं रह सकतीं। यह शुद्ध मिलन की कथा है। गोपियाँ ऋषिरूपा हैं।

यदि काम का विषय कोई स्त्री या पुरुष हो तो वह पतन करता है और यदि परमात्मा उसका विषय हो तो जीव निष्काम बन जाता है।  निष्काम परमात्मा को अर्पण किए गए काम से विकार उत्पन्न नहीं होता। काम के सकाम होने पर विकार-वासना जागृत होती है और उसे निष्काम में रखने पर विकार वासना का विनाश होता है। सकाम का स्मरण करने पर काम जागृत होता है, किन्तु निष्काम का चिन्तन करने पर निष्काम बना जा सकता है।

 गोपियाँ ऋषिरूपा हैं। उन्होंने निश्चय किया है कि श्रीकृष्ण को काम अर्पित करूँगी। तुम यह इच्छा रखो कि भगवान् से मिलना है। विचार करो कि तुम्हें किसी मनुष्य से मिलने पर सुख मिलता है, तो यदि भगवान् से मिलो तो कैसा आनन्द प्राप्त होगा! जो एक बार परमात्मा से मिलता है वह उससे अलग नहीं हो सकता। वह परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है। ऋषिरूपा गोपियाँ काम को श्रीकृष्ण को अर्पण करती हैं। बड़े-बड़े ऋषि गोपी बनकर आए हैं। गोपियाँ चार-पाँच वर्ष की थीं, तभी से उनकी इच्छा है कि श्रीकृष्ण उनके पति हों। इसके लिए गोपियों ने उन दिनों में कात्यायनी व्रत किया था। 

ऋषिरूपा गोपियों के लिए भागवत में कुमारिका शब्द प्रयोग किया गया है। संस्कृत भाषा में चार-पाँच वर्ष की कन्या को कुमारिका कहा गया है। पाँच वर्ष पूरा होने पर छठा वर्ष लगते ही कन्या कुमारिका नहीं कही जा सकती। ये गोप कन्यायें चार-पाँच वर्ष की हैं और आशा रखती हैं कि श्रीकृष्ण पति होकर मिलें। चार-पाँच वर्ष की कन्या को भला क्या खबर पड़े कि पति क्या और पत्नी क्या? श्रीकृष्ण पतिरूप में मिलें ऐसी अपेक्षा रखने का अर्थ यह है कि मेरा सम्बन्ध किसी जीव से न हो। मुझे परमात्मा से मिलना है और परमात्मा के साथ एकाकार बनना है।  वे चार-पाँच वर्ष की कन्याएँ है। ये अपना वस्त्र यमुनाजी के किनारे रखती हैं और नग्न स्नान करती हैं। नग्न स्नान करने वाला तीर्थदेव का अपमान करता है और उसे पाप लगता है। भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ पहुँचते हैं, उनके वस्त्र उठाकर कदम्ब वृक्ष पर रख देते हैं और कहते हैं तुम बाहर आओ और अपने वस्त्र पहनकर ले जाओ। कुछ लोगों को इस लीला में अश्लीलता दिखाई देती है। वास्तव में यह लीला शुद्ध है। ध्यान में रखकर विचार करने पर पता लगेगा कि वहाँ श्रीकृष्ण गोपियों की नग्न काया देखने नहीं आए हैं। यमुनाजी के जल में श्रीकृष्ण जलस्वरूप बनकर निवास करते हैं, गोपियों से मिले ही हैं। गोपियों पर वासना का पर्दा पड़ा होने के कारण मिलन का अनुभव नहीं होता था। यह समस्त जगत् भगवान् में स्थित है। जगत् का आधार परमात्मा हैं। इसलिए वह सबमें सम्मिलित हैं। यदि ईश्वर एक से मिले और दूसरे से न मिले तो उसे सर्वव्यापक कौन माने? सर्वव्यापक तो सबका आधार होता है। वे भगवान् सबसे मिले ही हैं। जीव और ईश्वर तो साथ ही होते हैं। ईश्वर जीव को देखता है, किन्तु जीव ईश्वर को देख नहीं सकता। जीव और ईश्वर के बीच एक परदा है। परमात्मा सबसे मिले हुए हैं और वह मिला हुआ भगवान् ही मिलता है। तत्त्व दृष्टि से विचार करने पर परमात्मा सबसे मिला हुआ दिखाई देता है। वासना रूपी अज्ञान अथवा माया का पर्दा होने के कारण जीव को ईश्वर का अनुभव नहीं होता। शरीर को वस्त्र और आत्मा को वासना ढँकती है। जिस प्रकार सामान्य बादल सूर्य को ढँकता है। उसी प्रकार वासना परमात्मा को ढँकती है। परमात्मा सर्वत्र है, किन्तु उसका दर्शन नहीं होता। प्रभु ने वस्त्रहरण द्वारा वासना का पर्दा दूर किया है।और गोपियों से कहा है, 

"यह तुम्हारा आखिरी जन्म है। तुम शरद पूर्णिमा की रात्रि को मिलना। फिर तुम्हें जन्म लेने का अवसर नहीं आयगा ।'

गोपियों की संख्या अधिक है, किन्तु उनमें सबको रास में प्रवेश नहीं मिला है। जिसका अन्तिम जन्म है, जिसकी वासना का पर्दा प्रभु ने दूर किया है और जिस जीव को  परमात्मा ने अपनाया है, वही जीव रास में जाता है। यह लीला दिव्य है, मधुर है।

रासलीला श्रीकृष्ण का काम विजय है। ब्रह्मादि देवों का पराभव करने से कामदेव का अभिमान बहुत बढ़ गया है। वह अपने को ईश्वर समझने लगा हैं काम का नाम ही महारथी है। अनेक देवों और ऋषियों को मारने से जिस कामदेव का अभिमान बढ़ गया है, वह श्रीकृष्ण से युद्ध करने आया है । कामदेव कहता है कि मैं इस बात को भूला नहीं हूँ, यह मुझे याद है कि आपने रामावतार में मुझे हराया है। रामावतार में कामदेव ने अनेक बार ऐसा अवसर उपस्थित किया है, जिससे रामजी की आँख में अथवा उनके मन में विकार उत्पन्न हो, किन्तु वे तो निष्काम हैं, कामदेव ने कहा कि

 रामावतार में मेरी हार तो हुई, किन्तु मेरे मन में सन्देह रह गया है। रामावतार में आपक नियम था कि किसी स्त्री का स्पर्श न करूँगा, प्रत्येक स्त्री में मातृभाव रखूँगा। आपने मर्यादा में रहकर मुझें हराया। वास्तव में मर्यादा का बन्धन ईश्वर के लिए नहीं है। वह जीव के लिए है। आपको सब ईश्वर मानते हैं। इसलिए आपको बन्धन में रहने की क्या आवश्यकता है?

 श्रीकृष्ण ने कहा कि भाई, तेरी क्या इच्छा है?

 कामदेव ने कहा,

 "मेरी इच्छा हैं कि शरद ऋतु हो, पूर्णिमा हो, मध्यरात्रि का समय हो उस समय किसी स्त्री को स्पर्श न कर उसमें मातृ भाव रखने की मर्यादा आप न रखिये। उस समय आप स्त्रियों के साथ क्रीड़ा कीजिए और मैं आकाश में रहकर बाण मारूँ। यदि आपके मन में विकार पैदा हो, तो मैं ईश्वर होऊँगा । उस समय आप निष्काम रूप ईश्वर नहीं माने जाएँगे। काम की मार खाने वाला जीव है और जो काम की मार नहीं खाता, वह ईश्वर है।"

प्रभु ने कहा कि मैं यह शर्त मानने को तैयार हूँ। प्रभु इसीलिए शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि को गोपियों के साथ क्रीड़ा करते हैं। कामदेव आकाश में खड़ा है और श्रीकृष्ण को बाण मारता है। श्रीकृष्ण के चरण में गंगाजी है, और भगवान् शिवजी के माथे पर भी गंगाजी हैं। शिवजी और श्रीकृष्ण ज्ञान - स्वरूप हैं। उनका काम क्या बिगाड़ सकता है? काम अनेक प्रयत्न करने पर भी श्रीकृष्ण को अपने आधीन नहीं बना सका। इसलिए उसे विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं। वह अब श्रीकृष्ण की शरण में आया है। श्रीकृष्ण ने मदन का पराभव किया। इसलिए उनका नाम मदनमोहन पड़ गया। मदन का अर्थ है काम। अर्थात् काम से ही काम का नाश करना। महापुरुष लौकिक काम को अलौकिक काम से मारते हैं। मुझे किसी मनुष्य से नहीं मिलना है, केवल परमात्मा से मिलना है और उनके साथ एकाकार होना है ।


श्री डोंगरेजी महाराज 

हरिओम सिगंल 




रासलीला 2

 श्रीकृष्ण बालकों के साथ भोजन करते हैं। उस समय सबने बछड़े चरने के लिए छोड़े हैं। ब्रह्माजी बछड़ों को उठाकर ब्रह्मलोक में ले गए। भोजन के बाद बालकों ने देखा कि बछड़े नहीं हैं। उन्होंने लाला से कहा कि कन्हैया, बछड़े दिखाई नहीं देते। लाला ने कहा कि तुम भोजन करो। मैं बछड़ों को खोजकर ले आता हूँ। कन्हैया बछड़े खोजने निकल पड़ता है। उसी समय ब्रह्माजी ने उन बालकों को भी उठा लिया और उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए। लाला को मालूम हो गया कि यह बुड्ढा आज अकारण ही मेरे पीछे पड़ गया है। यह बात लाला को पसन्द नहीं आई। इसलिए उसने एक ही समय सभी बछड़ों और ग्वालबालों का स्वरूप अचानक प्रकट कर दिया। 

कमरी भी श्रीकृष्ण हो गई, लकड़ी भी श्रीकृष्ण हो गई। जिसका जो स्वभाव था, वह श्रीकृष्ण हो गया। जिसका स्वभाव उताबलापन था, भगवान् भी उसी तरह उताबले हो गए। श्रीकृष्ण इसके स्वभाव के अनुसार उनका स्वरूप धारणकर घर लौट आए हैं। सबेरे गए हुए बालक. शाम को घर लौट आए हैं और वे दौड़ते-दौड़ते अपनी दादी माँ के पास गए हैं। दादी माँ ने बालकों को गोद में लेकर छाती से लगा लिया है। अत्यंत आनन्द-आनन्द पैदा हो गया है। इस प्रकार आज ये वृद्ध गोपियाँ बालकों से न मिलकर सीधे परमात्मा श्रीकृष्ण से मिलती हैं, जब कि उनके बालक ब्रह्मलोक में हैं। इन वृद्ध गोपियों को श्रीकृष्ण मिलन की तीव्र भावना थी इसलिए बालकों के स्वरूप में श्रीकृष्ण उनके घर आए हैं, वृद्ध गोपियों से मिलते हैं तथा एक-एक का मनोरथ सफल करते हैं।

आज गोकुल के एक-एक घर में आनन्द समुद्र बह रहा है। आज तक गोपियाँ आनन्द लेने के लिए यशोदाजी के घर जाती थीं, किन्तु आज प्रत्येक गोपी के घर परमानन्द प्रकट हुआ है। आज गायों को भी अत्यंत आनन्द हुआ हैं उनके बछड़े ब्रह्मलोक में हैं और बछड़ों के स्वरूप में श्रीकृष्ण ही घर आए हैं। यह गायों के साथ रासलीला है। यह जीव और ईश्वर का मिलन है। गायों को अत्यंत आनन्द हो रहा है। ग्वाल गायों को रोकने के लिए जाते हैं लेकिन उन्हें अपने बछड़ों के प्रति ऐसा अलौकिक प्रेम जागा हैं कि वे दौड़ती-दौड़ती बछड़ों के पास चली जाती हैं। यह देखकर ग्वालों को आश्चर्य होता है। इस प्रकार गायों को ब्रह्म-सम्बन्ध प्राप्त हो गया है। इस समय कमरी श्रीकृष्ण, डण्डा श्रीकृष्ण, गोप बालक श्रीकृष्ण, बछड़े श्रीकृष्ण, यानी सभी श्रीकृष्ण- श्रीकृष्ण बनकर परस्पर क्रीड़ा कर रहे हैं।

ज्ञानी पुरुष आत्म-स्वरूप में रमण करते हैं, बिहार करते हैं। वेदान्त का विवर्तवाद और वैष्णवाचार्यों का ब्रह्म परिणामवाद इन दोनों का उद्भव इस लीला से हुआ है। भागवत में इन दोनों वादों का समन्वय किया गया है। वेदान्त का ऐसा कहना है कि ब्रह्म तत्व सत्य है, सभी में ब्रह्म ही सत्य है, माया के कारण यह संसार चित्र-विचित्र दिखाई देता है। प्रभु के सहारे यह संसार दृष्टिगोचर होता है। सिनेमा के पर्दे पर अनेक चित्र दिखाई देते हैं। कभी उस पर जोरदार बरसात दिखाई देती है, कभी समुद्र उछलता है। चित्र में यह भले दिखाई दे, किन्तु पर्दे का एक सूत भी भीगता नहीं। ब्रह्म एक सच्चा आधार है। सहारा है। ब्रह्म में माया के कारण यह संसार चित्र-विचित्र रूप में दिखाई देता है।  लकड़ी और बछड़ा दिखाई देते हैं, किन्तु वे श्रीकृष्ण हैं उन्हें छोड़ कुछ दूसरे नहीं। माया के कारण विविधता दिखाई देती है। इस प्रकार की अनेकता और विविधता ही अविद्या है। इसलिए ज्ञानी महापुरुष इसे माया का भँवर मानते हैं। वैष्णवाचार्यों का कथन है कि यह जगत् ब्रह्म का परिणाम है अर्थात् ब्रह्म ही एक प्रकार से जगत् है । ब्रह्म ही अनेक स्वरूप धारण करता है और वही सर्वत्र दिखाई देता है। श्रीकृष्ण ही अनेक रूपों में दर्शन देते हैं।

यह लीला एक वर्ष तक चलती रही। किसी को भी वास्तविक बात खबर न पड़ी। श्रीकृष्ण अनेक बछड़ों के स्वरूप में, अनेक ग्वाल-बालों के स्वरूप में स्वयं अपने स्वरूप के साथ क्रीड़ा करते रहे। महान् योगी अपने ही आत्म - स्वरूप आत्मरति में ही लीन रहते हैं। ब्रह्माजी ने विचार किया कि ग्वाले बहुत दुःखी हुए होंगे, रोते होंगे, उन्हें देखने के लिए वे गोकुल में आए। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि एक भी बालक कम नहीं हुआ है, सभी दिखाई दे रहे हैं। अब ब्रह्माजी विचार में पड़ गए कि मैंने जिन्हें ब्रह्मलोक में रखा है, वे सच्चे हैं अथवा जो सामने दिखाई दे रहे हैं वे सच्चे हैं?

उस समय लाला ने एक और चमत्कार दिखाया। वे ब्रह्माजी का स्वरूप धारणकर उनकी गद्दी पर जा बैठे और उनके सेवकों से कहा, 

"अब मैं अन्दर आराम कर रहा हूँ। आजकल एक भूत जैसा नकली ब्रह्मा उत्पन्न हुआ है। वह कदाचित् आधे घण्टे बाद यहाँ आएगा। तुम उसके लिए मुझसे पूछे बिना ही बाहर ही छड़ी से अच्छी तरह से उसकी पूजा करना।"

 श्रीकृष्ण ब्रह्मा होकर उनकी गद्दी पर बैठे हैं और आराम कर रहे हैं। ब्रह्मा विचार करते-करते गोकुल से ब्रह्मलोक में आते हैं। यहाँ आने पर उनके नौकर ही उन्हें मारने लगते हैं। इससे ब्रह्मा को बहुत बुरा लगता है। उन्होंने अपने नौकरों से कहा

 "अरे! तुम्हें कुछ होश है। तुम मेरे नौकर हो और मेरा ही अपमान कर रहे हो! मैं ब्रह्मलोक का राजा हूँ।"

 नौकर कहते हैं

 "तुम किसके राजा? हमारे राजा तो अन्दर आराम कर रहे हैं। तू भूत जैसा कहाँ से यहाँ आया है? हम लोग तुझे अन्दर नहीं जाने देंगे।" 

इस प्रकार लाला की परीक्षा करने वाले बूढ़े ब्रह्मा की ही परीक्षा हो गई। मार पड़ने पर ही अक्ल आती है। मार न पड़े तो बुद्धि नहीं आती यह एक सिद्धांत है। ब्रह्माजी ने आँखें बन्दकर ज्यों ही ध्यान लगाया तो, उन्हें विश्वास हो गया कि मेरी गद्दी पर कृष्ण कन्हैयालालजी विराजमान हैं। यह बस श्रीकृष्ण की लीला है। वास्तव में श्रीकृष्ण देव नहीं हैं, सर्व देवों के देव हैं, परमात्मा हैं। ब्रह्माजी को पश्चाताप होने लगता है कि मैंने भूल की है, परमात्मा का अपमान किया है। क्या अब मैं उनके पास जाकर क्षमा माँगू? ब्रह्माजी जिस समय क्षमा माँगने आए, उस समय अनेक बछड़े और अनेक ग्वाल-बालों में श्रीकृष्ण का जो स्वरूप था वह एक ही क्षण में अन्तर्धान हो गया। अकेले श्रीकृष्ण रह गए और ऐसा नाटक किया मानों उन्हें डर लग रहा है। उस समय श्रीकृष्ण रोते जा रहे हैं, बड़ों और मित्रों को ढूंढ रहे हैं और कहते हैं, मधुमंगला मनसुखा श्रीदामा तुम सब मुझे छोड़कर कहाँ चले गए? मुझे अकेले बहुत डर लग रहा है। ब्रह्माजी ने उन्हें देखकर हाथ जोड़े और कहा, महाराज किसी को तुम्हारे जैसा नाटक करना नहीं आएगा, मैं तुम्हारे चरणों में पड़कर क्षमा माँगने आया तो मुझे आप ऐसा स्वरूप दिखा रहे हैं?


रोना यह माया का धर्म है श्रीकृष्ण में माया का यह धर्म भले ही दिखाई दे, किन्तु श्रीराम श्रीकृष्ण माया रहित शुद्ध ब्रह्म हैं, आनन्दमय हैं। जिस प्रकार सूर्य के पास अन्धकार नहीं जा सकता उसी प्रकार ब्रह्मा के पास माया नहीं जा सकती, उसे स्पर्श नहीं कर सकती। यह तो प्रभु ने ऐसा नाटक किया है कि आज आनन्द रोता हुआ दिखाई देता है। कदाचित् श्रीराम- श्रीकृष्ण रोएँ, किन्तु वे अपने स्वरूप में स्थिर होकर ही लीला करते हैं। जिस प्रकार किसी नाटक में कोई राजा भिखारी का वेश धारणकर भीख माँगने जाए और भीख न मिलने पर नाटक करे कि मुझे कुछ नहीं मिला और रोने लगे किन्तु अन्दर से उसे पता है कि मैं राजा हूँ। उसी प्रकार परमात्मा श्रीराम-श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। भले ही वे रोते हुए दिखाई दें।

रामायण में वर्णन आता है। जब रावण सीताजी को हरण करके ले गया, तब श्रीराम सीताजी को खोजने निकल पड़ते हैं। जब लंका में रामजी का स्मरण कर सीताजी रोती हैं, तब रामचन्द्रजी ऐसा नाटक करते हैं कि सीता के वियोग से मुझे बहुत दुःख है। यदि कभी भक्त भगवान् के वियोग में रोने लगे, तब भगवान् कभी-कभी ऐसी लीला करते हैं कि मुझे भक्त का वियोग सहन नहीं होता। श्रीसीताजी के वियोग में रामजी को रोते देखकर लक्ष्मणजी समझाते हैं, 

"बड़े भाई,आप रोएँ नहीं, सीताजी मिलेंगी।"

 रामजी कहते हैं कि मेरी सीता कहाँ है? वृक्ष से पूछते हैं कि सीता कहाँ है? श्रीराम जिस समय दंडकारण्य से होकर गुजर रहे थे उसम समय भगवान् शंकर सतीजी के साथ उसी मार्ग में आ जाते हैं और उन्हें श्रीराम-लक्ष्मण के दर्शन होते हैं। शिवजी वृक्ष की ओट में खड़े हैं, प्रेम से उनका दर्शन करते हैं, शरीर में रोमाँच का अनुभव करते हैं। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए हैं। यह कैसा नाटक है! मनुष्य जैसी लीला हो रही है। आज आनन्द रोता- रोता जा रहा है।

श्रीराम आनन्दमय हैं, श्रीकृष्ण आनन्दमय हैं। शिवजी महाराज वृक्ष की ओट में खड़े होकर वंदन करते हैं। वे सोचते हैं कि यदि मैं सामने जाकर वंदन करूँ, तो भगवान् की लीला में विघ्न पड़ेगा। सतीजी ने पूछा कि आप किसे वंदन करते हैं। शिवजी ने कहा,

 "ये परमात्मा हैं। मैं इनको वंदन करता हूँ।"

 सतीजी ने कहा,

 "यह तो रोते-रोते जा रहे हैं। क्या आनन्द कभी इस प्रकार रोयेगा? यह तो राजा दशरथ के पुत्र हैं।" 

शिवजी ने कहा, 

"ये राम हैं, परमात्मा हैं, मेरे इष्ट देव हैं। ये राम सर्वमय हैं। ये अंदर से आनन्दमय हैं, सावधान हैं। यह तो लीला कर रहे हैं।"

 सतीजी को इस बात पर विश्वास नहीं होता। वे कहती हैं कि मैं इनकी परीक्षा लूँगी। शिवजी ने परीक्षा लेने की अनुमति दी। सतीजी परीक्षा लेने निकल पड़ीं। रामचन्द्रजी जिस मार्ग से आने वाले हैं, उसी मार्ग पर वे सीता का रूप धारण कर खड़ी हो गई हैं। सतीजी ने सोचा कि राम जब सीता का स्वरूप देखेंगे, तब एकदम प्रसन्न हो जाएँगे। सतीजी को सामने खड़ी देखकर राम ने वह रास्ता छोड़ दिया और दूसरा रास्ता पकड़ लिया। सतीजी ने यह समझा कि राम स्त्री - वियोग में बहुत व्याकुल हैं, बहुत दुःखी हैं। इसलिए उन्होंने मुझे नहीं देखा है। अतः वे फिर रामजी के रास्ते में चलकर आगे खड़ी हो जाती हैं। यह भी पुकारकर कहा कि मैं तो यहाँ खड़ी हूँ। आप क्यों रो रहे हैं? श्रीराम इस बात को अनसुनी कर देते हैं और वे रास्ता छोड़कर दूसरा रास्ता पकड़ लेते हैं। सतीजी को आश्चर्य होता है कि अभी उनकी नजर ठीक तरह मुझ पर नहीं पड़ी है। मैं उनके पास जाकर खड़ी रहूँ तो वे प्रसन्न होंगे। सीताजी के रूप में सतीजी रामचन्द्रजी के पास जाकर खड़ी हों गईं। उन्हें देखकर श्रीराम अपना मस्तक धरती पर झुकाकर वन्दन करते हैं और कहते हैं,

 "दशरथ पुत्र राम आपको वन्दन करता है। माँ, तुम अकेले ही जंगल में क्यों घूम रही हो? भगवान् शंकर कहाँ हैं?"

 अब सतीजी को विश्वास हो गया, 

"भले ही ये रो रहे हैं, किन्तु अन्दर से बहुत सावधान हैं, आनन्द में हैं। इनको माया का स्पर्श नहीं है।"

 जो परमात्मा का सेवा-स्मरण करे, उसे माया का स्पर्श नहीं होता। फिर स्वयं परमात्मा को श्रीराम को, श्रीकृष्ण को माया कैसे स्पर्श कर सकती है?


ब्रह्माजी ने निश्चय किया है कि श्रीकृष्ण भले ही रोयें, किन्तु ये परमात्मा हैं। ब्रह्माजी को यह विश्वास हो गया। हंस पर विराजे हुए ब्रह्माजी नीचे उतरते हैं और 'कृष्ण कन्हैयालाल की जय' कहकर श्रीकृष्ण के चरणों में वंदना करते हैं। 

आपका श्रीअंग मेघ जैसा श्याम है। आपने पीला पीताम्बर धारण किया है और आपके गले में अर्थात् चणोठी (गुजराती शब्द) ब्रह्माण्ड का आकार गुँजा जैसा है श्रीकृष्ण अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के नायक हैं। उन्होंने ब्रह्माजी को बताया है तुम तो एक ही ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा हो, ऐसे-ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड मेरे श्रीअंग में विलास करते हैं। वे अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के नायक हैं इसलिए उन्होंने गले में गुंजा की माला धारण की है, उनके मस्तक पर मोर पिच्छ का मुकुट है। 

माता के पेट में निवास करने वाला बालक यदि अज्ञान में उसे लात भी मारे, तो वह उसे क्षमा करती है। इसी प्रकार आप मुझे क्षमा कीजिए। मैं आपकी लीला से विमोहित हो गया था । आपकी लीला का पार भला कौन पा सकता है? 

श्रीकृष्ण की लीला ही उनकी बहुत बड़ी कृपा है। श्रीकृष्ण आनन्द में हैं। इसलिए उन्हें सुख भोगने की इच्छा होती ही नहीं। श्रीकृष्ण को कोई भी स्वार्थ नहीं होता । परमात्मा जो कोई काम करता है, वह हमारे लिए करता है। यह जीव ईश्वर का है। परमात्मा का होते हुए भी यह जीव अपने को भूल गया है। यह जीव ऐसा मानता है कि मैं ही जगत् हूँ, मैं किसी स्त्री का हूँ, मैं किसी पुरुष का हूँ। जीव का जगत् से जो सम्बन्ध है, वह कच्चा है, केवल श्री परमात्मा, श्रीकृष्ण के साथ ही स्थापित होने वाला सम्बन्ध सच्चा है। यह जीव भगवान् का होने पर भी संसार में उलझ गया है। जीव के आकर्षण के लिये ही परमात्मा लीला करते हैं।  श्रीकृष्ण-लीला में ऐसी दिव्य शक्ति है कि उनकी कथा सुनते ही अनायास हमारा मन संसार को भूल जाता है। मुक्ति मन को मिलती है, आत्मा को नहीं मिलती। आत्मा परमात्मा का अंश है। 

आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में सन्तों में थोड़ा मतभेद है। अनेक सन्त ऐसा मानते हैं कि आत्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं। आत्मा-परमात्मा के स्वरूप में जो भेद दिखाई देता है वह सच्चा नहीं है, वह अज्ञान से पैदा हुआ है। अनेक साधु-सन्त ऐसा मानते हैं कि यह जीव ईश्वर का अंश है, परमात्मा अंशी है। ज्ञानी पुरुषों का कथन है कि परमात्मा का स्वरूप ऐसा दिव्य है कि उसमें से थोड़ा भी अंश अलग नहीं हो सकता।

अनेक लोगों को व्यवहार में यह अनुभव होता है कि ठाकुरजी ने मुझपर बड़ी कृपा की है, मुझे किसी तरह की चिन्ता नहीं है। क्योंकि दो लड़के काम-धन्धे में लग गए हैं। दो लड़कों के लिए दो बंगले अलग बनवा दिये हैं। उनमें झगड़ा होगा ही नहीं। मुझे कोई परेशानी नहीं है, कोई बन्धन नहीं है। अब मैं स्वतंत्र हूँ। अब मैं कितनी भक्ति करूँ, उतनी कम है। अब मुझे भक्ति करने के लिए गंगा तट पर जाना है। मनुष्य जितना बोलने में होशियार है, उतना व्यवहार में होशियार नहीं है। वह कहता है कि मुझे कोई झंझट नहीं है। एक पुत्री बाकी है। इसकी शादी हो जाए, तो मैं तुरन्त गंगा तट पर भजन करने चला जाऊँगा। वहीं अपना शरीरान्त करना है। क्या अभी आप गंगा तट पर नहीं गए? यह सुनकर कोई वृद्ध पुरुष उत्तर देता है, "मुझे तो सब कुछ छोड़ना है; किन्तु ये लड़के जाने नहीं देते। ये घर में रहने के लिए ही जिद करते हैं और कहते हैं कि घर में भी भक्ति होती है।

यह बात सत्य है कि घर में भक्ति होती है, लेकिन घर में रहकर सतत भक्ति नहीं होती।घर में रहने पर बालक बालिकाओं की भी भक्ति करनी पड़ती है। घर में सारे दिन भगवान् की घर भक्ति करना अशक्य है। वृद्ध कहता है कि लड़कों के इनकार करने के कारण मैं कहीं बाहर भक्ति करने नहीं जाता। वास्तव में उसे घर छोड़ने की इच्छा नहीं है किन्तु लड़कों को व्यर्थ अपयश देता है। जब यमराज के यहाँ से धर-पकड़ का वारण्ट आएगा, तब क्या उसे किसी प्रकार रोका जा सकेगा? या यह कहा जाएगा कि लड़के जाने नहीं देते। उस समय तो यमदूत धक्का मारकर ले जाएँगे। एक दिन सब कुछ छोड़ना ही पड़ेगा। जब विवश होकर छोड़ना पड़ता है, तो बड़ी तकलीफ होती है और मनुष्य सोच समझकर छोड़ दे तो बड़ा सुख मिलता है। उसके बिना कोई काम रुका नहीं है, न किसी ने उसे बाँध रखा है। फिर भी वह अपने अज्ञान के कारण स्वयं बँधा हुआ है। आत्मा को किसी प्रकार का बन्धन नहीं है। बन्धन तो मन को है।

श्रीकृष्ण-लीला में ऐसी दिव्य शक्ति है कि सांसारिक विषयों में फँसा हुआ मन अनायास ही संसार को भूल जाता है। इस जगत् में रहकर किसी न किसी निमित्त से इसे भूलना है और परमात्मा के स्मरण में तन्मय होना है। यही श्रीकृष्ण लीला का रहस्य है। श्रीकृष्ण की लीला अमृत है। मनुष्य स्वर्ग का अमृत पीने से अमर नहीं बनता। उल्टे स्वर्ग का अमृत पीने से विकार-वासना की वृद्धि होती है। यदि कृष्ण कथामृत का पान करे और प्रभु में प्रेम जगे, तो धीरे-धीरे मनुष्य की वासना विनष्ट होती जाती है। स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य का नाश होता है; किन्तु कथामृत - पान से पापों का विनाश होता है। स्वर्ग का अमृत थोड़े समय के लिए सुख-शान्ति देता है; किन्तु कुछ समय पश्चात् मन अशान्त बन जाता है। तुम जितने समय तक कथा सुनते हो, उतने समय तक संसार को भूल जाते हो । भगवान् की लीला में ऐसी दिव्य शक्ति है। योगीजन जगत् को भूलने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार करते हैं। कृष्ण-लीला ऐसी मधुर है कि इसमें अनायास ही यह जीव जगत् को भूल जाता है। इससे प्रभु में प्रेम जगता है और परमात्मा के दर्शन स्मरण में तन्मयता उत्पन्न होती है। 

श्रीकृष्ण की कृपा से ही श्रीकृष्ण-लीला का रहस्य ध्यान में आता है। भगवान् की सारी लीला बड़ी अटपटी है। उसमें अनेक बार ब्रह्मादिक देवता भी भ्रम में पड़ जाते हैं। प्रभुजी ने ब्रह्मा का मोह दूर कर दिया। ब्रह्माजी बालकों और बछड़ों को ब्रह्मलोक से धरती पर ले आए हैं। वे सब मानो ऊँघ में से जाग गए हैं। 

श्री डोंगरेजी महाराज 

हरिओम सिगंल 




रास लीला 1

 आज की भोजन व्यवस्था कमलाकार हो रही है। यह बालकों का शुद्ध प्रेम है। उनकी इच्छा है कि मुझे आज श्रीकृष्ण से सटकर ही बैठना है। जो श्रीकृष्ण से दूर बैठता है उसे आनन्द नहीं मिल पाता, श्रीकृष्ण को स्पर्श कर बैठने वाले को ही आनन्द प्राप्त होता है।  चार प्रकार की रासलीलाओं का वर्णन है। एक रास लीला में श्रीकृष्ण वृद्ध गोपियों के साथ रमण करते हैं। दूसरी रासलीला गायों के साथ होती है, तीसरी रासलीला ग्वालमित्रों के साथ होती है और चौथी रासलीला युवती गोपियों के साथ होती है। 

रासलीला का क्या तात्पर्य है इसे समझो। उपनिषद् में "रसो वै सः " कहकर परमात्मा का वर्णन किया गया है। अर्थात् परमात्मा रसस्वरूप है, रसमय है। अति मधुर रस ही परमात्मा है। रसमय मनुष्य ही परमात्मा को प्राप्त करता है। रसमय परमात्मा के साथ एक होना ही रास कहलाता है। गोकुल में वृद्ध गोपियाँ थीं। वे बालकृष्णलाल का दर्शन करती हैं। दर्शन में आनन्द तो आता है किन्तु उनके मन में यह भाव जगता है कि यदि हमें श्रीकृष्ण के दर्शन में इतना अधिक आनन्द आता है तो जब यशोदा माता लाला को अपनी गोद में लेकर छाती से चिपकाती होंगी तो उन्हें कितना आनन्द आता होगा। किन्तु हमें लाला से मिलना है, मुझे उसके साथ एकाकार होना है। ये वृद्ध गोपियाँ श्रीकृष्ण के दर्शन करते-करते अपने मन द्वारा श्रीकृष्ण से मिलती हैं। वे मन से तो श्रीकृष्ण से मिल रही हैं, अब भी उनकी भावना प्रत्यक्ष मिलन की है। 

गोकुल में जो गायें थीं, उन्हें भी लाला से मिलने की इच्छा थी।  इन गायों से लाला किस प्रकार मिले? यह बड़ा भारी प्रश्न है। गायों के मन में ऐसा भाव जगता है कि जिस प्रकार बछड़ा गाय का दूध पीता है, उसी प्रकार कृष्ण मेरा दूध पिएँ तो मैं उससे मिलूँ। गाय जब बछड़े को दूध पिलाती है तब गाय और बछड़ा दोनों एकमय हो जाते हैं। उनका अद्वैत ऐसा हो जाता है। कि उसे कोई तीसरा नहीं समझ सकता। इसका अनुभव गाय और बछड़े ही कर सकते हैं। इन गायों को कन्हैया के साथ एकाकार होना है, लाला से मिलना है। 

 ग्वालों की ऐसी भावना है कि मुझे श्रीकृष्ण को स्पर्श करके ही बैठना है कोई श्रीकृष्ण से दूर बैठने को तैयार नहीं है। अब श्रीकृष्ण तो ठहरे एक और बालक हैं अनेक। फिर वे एक ही समय सबसे किस प्रकार मिलें।

आज की भोजन-बैठक कमल जैसी है। कमल के मध्य में गाभा (पुष्प दण्ड) होता है। श्रीकृष्ण मध्य में हैं। छोटी-छोटी पंखुरियाँ गाभे के पास होती है। बड़ी पंखुरी गाभा से दूर दिखाई देती हैं। दूर दिखाई देने पर भी प्रत्येक पंखुरी का संयोग गाभा के साथ होता ही है। कमल एक हजार पंखुरियों का होता है। उसमें एक भी पंखुरी ऐसी नहीं होती जिसका सम्बन्ध गाभा से न हो। छोटे बालक श्रीकृष्ण के पास हैं और बड़े बालक थोड़े दूर हैं।  तुम्हारे बड़े हो जाने पर कन्हैया तुम्हें दूर रखेगा। 

 यदि छोटे होगे, मन से बालक की तरह छोटे रहोगे, तो श्रीकृष्ण तुम्हें पास बैठाएँगे।  प्रभु ने अनेक बालकों को एक साथ अपने मिलने का अनुभव कराया है कि तुम से सटकर बैठा हूँ। श्रीकृष्ण ने रासलीला में प्रत्येक गोपी को यह अनुभव कराया है कि मैं तेरे पास हूँ।

बालकों का प्रेम शुद्ध हैं। ये बच्चे अपने-अपने घर से जो कुछ लाते उसमें जो अच्छी से अच्छी वस्तु होती उसे लाला के लिए अलग रख देते, जो मध्यम वस्तु होती उसे मित्रों को देते और जो साधारण वस्तु होती उसे अपने आप खाते। अच्छी वस्तु दूसरे को देना ही भक्ति है। जो अच्छी वस्तु अपने लिए रखी जाए, वह आसक्ति है बालकों की ऐसी भावना है कि लाला के मुँह में मुझे कौर (कवल) देना है। यदि मैं श्रीकृष्ण से दूर बैठूं तो मुँह में कौर किस प्रकार दे सकूँगा? बालक प्रेम से लाला को भोजन कराते हुए कहते हैं,

 'लाला मेरी माँ ने तेरे लिये जलेबी बनाई है। उसने मुझसे यह कहा है कि तू इसे लाला के हाथ में मत देना। उसके मुँह में ही खिला देना । लाला मैं इसे तेरे मुँह में ही दूँगा।' 

कन्हैया भोजन में भी बालकों को बोध देता है और कहता है कि तू मुझ अकेले को ही जलेबी देता है, मेरे मित्रों को नहीं देता। मेरे गुरु ने मुझे यह विशेष रूप से सिखाया है जो अकेला खाता है, वह दूसरे जन्म में बिल्ली हो जाता है। इसलिए किसी दिन अकेले नहीं खाना चाहिए। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो वस्तु अधिक हो तो देने की उदारता दिखाते हैं,  किन्तु थोड़ी होने पर उसे छिपा रखते हैं। यदि अंगूर खाते हों और उस समय अपने किसी साथी को आते हुए देखते हैं, जिनके साथ दो बच्चे हैं तो तुरन्त ही अपनी पत्नी से कहते हैं इसे अन्दर रख दो, वे आते हैं। इसलिए जय श्रीकृष्ण-जय श्रीकृष्ण किया जाता है। वह पूछता है कि क्या कर रहे हो? तो जवाब मिलता है कि-

'कुछ नहीं खाली बैठे हैं।'

 मित्र ने देखा था इसका सीढ़ी चढ़ते समय मुँह कुछ हिल रहा था, यह कुछ खाता होगा; लेकिन यह बात बदल गया। जगत् में कोई मूर्ख नहीं है, जो दूसरे को मूर्ख समझता है वही मूर्ख होता है। सभी यह समझते हैं कि जीव ईश्वर का अंश है। यदि तुम खाने बैठे हो और उसी समय तुम्हारे घर कोई आ जाए, तो ऐसा मानना कि इस अन्न में इसका भी भाग है। वह अपना भाग लेने आया है। अर्थात् वह खाने नहीं आया है। आज उसका भाग नहीं दोगे तो एक दिन ब्याज के साथ उसे देना पड़ेगा। दूसरे को देने से कुछ घटता नहीं है बल्कि बढ़ता है। जिसका मन बड़ा है, उसके घर में कमी नहीं होती। मन बड़ा रखो। कोई चीज थोड़ी हो, तो थोड़े में से भी थोड़ा भाग दूसरे को दो ।

कन्हैया उस बालक को समझता हैं, 

'सभी को जलेबी दो।' 

वह बालक सभी को जलेबी देने के बाद लाला के मुँह में जलेबी डालता है। कन्हैया उसे खाता है, उसकी प्रशंसा करता है और कहता है कि तेरी माँ ने जलेबी बहुत अच्छी बनाई है। ऐसी जलेबी मेरी माँ को बनानी नहीं आती।

तात्पर्य यह है कि जिसका खाओ उसका बखान करो। जिसने मेहनत की है, जिसने पैसा लगाया है उसकी ऐसी इच्छा होती है कि लोग मुझे अच्छा कहें, मेरा बखान करें और मैं उसे सुनूँ। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि मेरा बखान मुझे पसन्द नहीं आता । किन्तु प्रायः वे गलत कहते हैं। अपना बखान सभी को पसन्द आता है। क्योंकि बखान सुनने के बाद क्या नया उत्साह आता है, थकावट उतर जाती है। दूसरा एक बालक आया और उसने कहा कन्हैया मैं तो बरफी लाया हूँ। मैंने सभी को दे दी है। तू ही अकेला बाकी है। उसने लाला के मुँह में बरफी डाल दी। इस प्रकार श्रीकृष्ण ग्वालबाल मित्रों के साथ प्रेम से भोजन करते हैं। तुम इसका दर्शन मन से करो और ऐसी भावना करो कि मैं इस समय वृन्दावन में हूँ, श्रीकृष्ण के ग्वालबाल मित्रों के साथ मण्डल में हूँ। मैं कृष्ण के लिए अच्छी सामग्री ले गया हूँ। मैं लाला को खिला रहा हूँ। उस समय तुमको समाधि लग जाएगी। यह मन संसार की लीला का चिन्तन करने से बिगड़ गया है। यह यदि श्रीकृष्ण लाला का चिन्तन करे, तो धीरे-धीरे सुधर सकता है। कन्हैया बर्फी खाता है और बखान करता है कि यह बहुत अच्छी है।

श्रीकृष्ण के बाल मण्डल में एक ब्राह्मण का बालक भी है। वह शांडिल्य ऋषि का पुत्र है। उसका नाम मधुमंगल है। उस बालक की उम्र चार-पाँच वर्ष की है। नंदबाबा ने शांडिल्य ऋषि से कहा है कि यज्ञोपवीत करने के बाद आपका बालक हमारे घर में नहीं खाएगा। अभी उसको जनेऊ नहीं दिया गया है। इसलिए रोज सुबह-शाम हमारे यहाँ भोजन करने के लिए भेजना। वह पुरोहित महाराज का लड़का था इसलिए यशोदा माता उसका बहुत आदर करती हैं उसे लाला के साथ ही भोजन करने के लिए बैठाती हैं। यशोदा मैया यदि लाला के लिए कुछ बनातीं तो बनाने के बाद सबसे पहले पुरोहित महाराज के लड़के को देतीं। इसके बाद लाला को देतीं। यशोदा माता की ऐसी भावना है कि पुरोहित महाराज के आशीर्वाद से बालक का जन्म हुआ है। कन्हैया उसका यजमान है। इसलिए वह रोज लाला के घर भोजन करने आता है।

आज कन्हैया मधुमंगल के पीछे पड़ गया और कहा कि तू प्रतिदिन मेरे घर खाने आता है, लेकिन किसी दिन अपने घर मुझे भोजन करने के लिए नहीं बुलाता। आज मुझे तेरे घर भोजन करना है। तू अभी अपने घर जा और तेरी माँ ने जो कुछ बनाया हो, उसे ले आ। यह सुनकर मधुमंगल थोड़ा शरमा गया और सोचने लगा कि मेरी माँ ने कभी लाला को अपने घर नहीं बुलाया। वह दौड़ते-दौड़ते अपने घर गया। उसकी माँ का नाम पूर्णमासी है। उसने माँ से कहा कि लाला को अपने घर क्यों नहीं बुलाती? तूने अपने घर जो खाने की चीज तैयार की हो, उसे लाला को खाने की इच्छा प्रबल हो उठी है। तू उसमें से मुझे थोड़ा दे दे। पूर्णमासी जानती थी कि कन्हैया परमात्मा है। आज परमात्मा को मेरे घर की वस्तु खाने की इच्छा हुई है। परमात्मा तो माँगता है, किन्तु मैं उन्हें क्या दूँ! पूर्णमासी का हृदय पिघल गया है। वह बोली, 

"बेटा, मैं घर में रसोई करती ही नहीं। तेरे पिता महान् तपस्वी भक्त हैं। उन्हें खाने के लिए अधिक फुर्सत ही नहीं मिलती ।। शांडिल्य ऋषि ऐसे तपस्वी ब्राह्मण हैं कि सबेरे चार बजे उठते हैं, यमुनाजी में स्नान कर आसन पर बैठते हैं और रात के सात-आठ बजे तक नित्य कर्म पूरा करते हैं। उन्होंने सत्कर्म के इतने अधिक नियमों का पालन किया था कि एक पूरा हो, तो दूसरा शुरू करें। प्रातः संध्या पूरी होने पर सूर्यनारायण को अर्घ्य देते हैं, वंदन करते हैं। इसके बाद उनकी स्तुति करते हैं। फिर गणपति महाराज की पूजा शंकर-पार्वती की पूजा, लक्ष्मीनारायण की पूजा करते हैं, वेद मन्त्र बोल-बोल कर एक-एक देवता की अभिषेक के साथ पूजा करते-करते बारह बज जाते हैं। बारह के नाम बजने के बाद मध्याह्न की संध्या करते हैं। मध्याह्न की संध्या में गायत्री का जप करते हैं, वेदाध्ययन करते हैं, देव, ऋषि, पितरों का तर्पण करते हैं। महाराज का नियम है कि प्रतिदिन प्रभु के इक्कीस हजार जप नियमपूर्वक करें। ब्राह्मण का अवतार खाने के लिए नहीं, बल्कि सारे दिन भक्ति करने के लिए है।  यह सब करते-करते सायंकाल की संध्याकाल की संध्या का समय हो जाता है। फिर वे सायं-संध्या करते हैं। भला उन्हें खाने की फुर्सत ही कहाँ है? सायं-संध्या के बाद रात को दो-चार केले खाकर सो जाते हैं। कभी-कभी दूध पीकर सो जाते हैं।

पूर्णमासी महान् पतिव्रता है। वह यह सोचकर कि मेरे पतिदेव भोजन नहीं करते, तो मुझे भी भोजन नहीं करना है। इसलिए वह घर में रसोई ही नहीं बनाती। उसके घर में एक लड़का है वह रोज नंदबाबा के घर खाने जाता है फिर रसोई की आवश्यकता किसके लिए ? पूर्णमासी सारे दिन पतिदेव की सेवा में रहती है। पतिदेव फल खाएँ तो रात को वह बाकी बचे दो-चार फल खाकर उनके चरणों में सो जाती है। पति-पत्नी सारे दिन तपश्चर्या करते हैं। उनका घर तपस्वी ब्राह्मण का घर है। उनके घर में कुछ नहीं हैं, किन्तु सन्तोष है जहाँ सन्तोष है वहाँ सब कुछ है। जहाँ सन्तोष नहीं है वहाँ सब कुछ होने पर भी कुछ नहीं है। पूर्णमासी को सन्तोष है, वह कहती है कि मैं बहुत गरीब हूँ, किन्तु मैंने पूर्वजन्म में कुछ पुण्य तप किया था, जिससे मुझे ऐसे पति प्राप्त हुए हैं। उसके पति को पैसे के लिए कोई प्रवृत्ति करने की इच्छा नहीं होती। वे सारे दिन भक्ति करते हैं। वे प्रायः गरीबी ही में रहते हैं। जो सारे दिन भक्ति करता है वह लक्ष्मीजी को पसन्द नहीं होता। लक्ष्मीजी को मन में ऐसा लगता है कि यह व्यक्ति मुझे अपने मालिक के साथ पाँच-सात मिनट भी एकान्त में बोलने नहीं देता। यह यहाँ से चला जाय तो मैं कुछ अपनी निजी बात करूँ। यह तो मेरे पतिदेव का चरण छोड़ता ही नहीं। इसीलिए जो दिन भर भक्ति करता है, वह लक्ष्मीजी को नहीं सुहाता। जो भगवान् को छोड़कर प्रवृत्ति करता है वह लक्ष्मीजी को सुहाता है। पूर्णमासी ने सुना कि लाला को मेरे घर की वस्तु खाने की इच्छा हुई है, यह सुनकर उनका हृदय भर आया । भला यह गरीब ब्राह्मणी लाला को क्या दे? यशोदाजी रोज मुझसे कहती हैं कि मुझे कुछ सेवा बताओ, किन्तु मेरे पतिदेव किसी की सेवा लेते ही नहीं। कल मैं यशोदाजी से कहूँगी कि थोड़ा खोया भेजो में उससे लाला के लिए मिठाई बनाऊँगी और उसे दूंगी। आज तो घर में कुछ भी नहीं है। यह सुनकर बालक बोला, 

"माँ तू मुझे कुछ दे। दूसरे सभी मित्र लाला के लिये मिठाई लाते हैं। मैं ही एक ऐसा हूँ जो खाली हाथ जाता हूँ।"

 यह कहकर बालक रोने लगा। पूर्णमासी ने अपने घर में देखभाल की, किन्तु उसे दूसरा कुछ नहीं मिला। थोड़ी छाछ पड़ी थी। वही हाथ लगी। पूर्णमासी ने विचार किया कि यह गरीब ब्राह्मणी लाला को दूसरा कुछ क्या दे? वह छाछ देते समय आँख में आँसू भरकर बोली, लाला के लिए घर में जो अच्छी से अच्छी वस्तु हो वही देनी चाहिए, किन्तु मेरे घर में कुछ दूसरी वस्तु नहीं है केवल यह छाछ है, किन्तु वह भी खट्टी है। कन्हैया का शरीर बहुत कोमल है। उसे यह खट्टी छाछ पीने पर बहुत तरह की तकलीफ खड़ी होगी। बेचारी गरीब ब्राह्मणी दूसरा कर ही क्या सकती थी। उसने छाछ में थोड़ी चीनी मिला दी और उसे मीठी बनाकर एक छोटी-सी हाँडी में रख दिया। उसने बालक के हाथ में वह हाँडी देते हुए कहा, 

'बेटा, आज मैं लाला के लिए छाछ दे रही हूँ, किन्तु कल मैं उसके लिए मिठाई दूँगी। आज मेरे घर में कुछ नहीं है। लाला से कहना कि यह छाछ देते हुए मेरी माँ रोने लगी थी, मैं छाछ लेकर आया हूँ।'

गरीब ब्राह्मण का बालक प्रेम से वह छाछ लेकर आया है, लेकिन उसे लाला को छाछ देने की हिम्मत नहीं होती। वह जानता है कि कन्हैया परमात्मा है। यदि उसे छाछ दूँ तो मुझे भी जन्म भर छाछ पीनी पड़ेगी। हमें लाला को अच्छी से अच्छी वस्तु देनी चाहिए। यह छाछ लाला को नहीं दी जा सकती। इसे मैं ही पी जाऊँ। कल मेरी माँ मिठाई बनाएगी। वह मिठाई लाकर मैं लाला को दूँगा। यह विचारकर मधुमंगल छाछ पीने लगा। यह देखकर लाला ने कहा,

 'हे मधुमंगल तेरी माँ ने मेरे लिए छाछ भेजी है, वह मुझे दे।'

 मधुमंगल ने कहा कन्हैया मैं वह छाछ तुझे नहीं दूँगा कल मैं तुझे मिठाई लाकर दूँगा। कन्हैया बोला, 

'तू यह छाछ क्यों नहीं देगा, कल की बात कल देखी जाएगी। मैं तेरी हाँडी खींच लूँगा। मधुमंगल ने देखा कि कन्हैया खड़ा हो गया है। वह दौड़ता हुआ आएगा और हाँडी मुझसे छीन लेगा। मुझे लाला को मिठाई खिलानी है। क्या मैं उसे छाछ दूँ। जब तक कन्हैया आए, तब तक मैं अकेले सारी छाछ पी जाऊँ और हाँडी खाली कर दूँ। ऐसा विचार कर मधुमंगल ने छाछ पीली और हाँडी खाली कर दी। लेकिन अधिक जल्दी के कारण उसके मुँह में से छाछ की एक धारा बाहर निकल पड़ी। वह प्रेम में देह का भान भूल गया था। कन्हैया दौड़ता आया और मधुमंगल का मुँह चाटने लगा। यह प्रेम कथा है। यह जीव जब परमात्मा के साथ प्रेम करते हुए अपना देह भान भूल जाता है, तब परमात्मा भी उसके सामने अपना ईश्वरत्व भूल जाता है। आज श्रीकृष्ण को यह याद नहीं आता कि मैं लक्ष्मी का पति हूँ, वैकुण्ठ का स्वामी हूँ। उसने ग्वालों के साथ ऐसा सच्चा प्रेम किया है कि मधुमंगल उससे शरमा गया। उसने कहा कि 

कन्हैया, तू यह क्या कर रहा है ? 

लाला ने कहा,

 'तेरे घर की जूठी छाछ भी यदि मुझे मिल जाए, तो मेरी बुद्धि सुधर जाए। तेरे पिता महान् तपस्वी ब्राह्मण हैं। उनके पुण्य प्रताप से हमारा ब्रज सुखी हुआ है। चौबीस लाख गायत्री जप का एक -पुरूश्चरण होता है। उस तपस्वी ब्राह्मण ने ऐसे तीन पुरूश्चरण किए हैं। दिन में तीन बार नियमित रूप से संध्या करता है, भगवान् भी उसके घर का माँगकर भोजन करते हैं।'

 लाला ने मधुमंगल के पिता का खूब बखान किया। गरीब ब्राह्मण का बालक अपने पिता का बखान सुनकर खूब खुश हो गया और लाला के कंधे पर हाथ रखकर कहा,

 "कन्हैया, मेरे घर में आज कुछ नहीं था। इसलिए मेरी माँ रोने लगी थी। मेरी माँ ने कहा है कि कल मैं लाला के लिए स्वादिष्ट मिठाई बनाऊँगी। इसलिए मैं कल तेरे लिए मिठाई ले आऊँगा ।"


आकाश में ब्रह्मादि देवता इस लीला का दर्शन करते हैं। ब्रह्माजी के मन में शंका हुई कि यह श्रीकृष्ण तो बालकों का मुँह चाटता है। क्या यह परमात्मा है? क्या जो परमात्मा होगा वह बालकों का मुँह चाटेगा? श्रीकृष्ण की लीला ऐसी विचित्र है कि देवता भी भ्रम में पड़ जाते हैं। यदि आज कल के लोग शंका करें, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। ब्रह्माजी ने ऐसा निश्चय किया कि मुझे श्रीकृष्ण की परीक्षा करनी पड़ेगी कि वे ईश्वर हैं या देव हैं? 

श्री डोंगरेजी महाराज 

हरिओम सिगंल 






सोमवार, 19 सितंबर 2022

परमानन्द

 अति सम्पत्ति के कारण जुआखोरी का व्यसन आ जाता है। अति सम्पत्ति से माँस मदिरा का व्यसन पैदा हो जाता है। सम्पत्तिवान लोग सादा भोजन नहीं करते। वे वासना - विकार बढ़ाने वाले तामसी अन्न का सेवन करते हैं। तदुपरांत अति सम्पत्ति में स्त्री-भोग का व्यसन होता है। मदिरा पान कर स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करते हैं।  

यह गंगा तट बहुत पवित्र है। ये विलासी लोग गंगा-तट पर आकर इस तीर्थ को भ्रष्ट कर रहे हैं। विलासी लोगों के आने से तीर्थ-देवों को भी कष्ट होता है। कितने ही लोग गंगा तट या यमुना तट पर बैठकर अपने घर की बातें करते हैं। यदि घर की बात ही करनी थी तो उसे छोड़ा ही क्यों? तुम किसी यात्रा में जाओ, भगवान् के लिए घर छोड़ो, भगवान् में यह विश्वास करो कि वह तुम्हारा घर सम्हालेगा, तुम्हारे बच्चों को सम्हालेगा। घर में रहकर गंगाजी और यमुनाजी का स्मरण करना पुण्य है किन्तु गंगा के किनारे बैठकर घर का स्मरण करना पाप है।  मनुष्य को कितना सुन्दर शरीर मिला है, प्रभु ने बिना टूटे फूटे यह शरीर दिया है। इसका दुरुपयोग वह भोग-विलास में करता है। इस जीव को यह पता नहीं है कि इस शरीर पर किसका अधिकार है? माता यह समझती है कि पुत्र हमारा है। मैंने इसे पेट में दस मास रखा है। वर्ना यह पैदा ही नहीं होता। इस प्रकार माता अपने पुत्र के शरीर पर अपना अधिकार जताती है। बाप यह समझता है कि पुत्र मेरा है। मेरे बिना पुत्र पैदा ही नहीं होता। इस प्रकार पुत्र- शरीर पर मेरा अधिकार है। पत्नी यह कहती है कि जब तक विवाह नहीं हुआ था, तब तक आप दोनों का अधिकार था। मैं अपने माँ-बाप को छोड़कर यहाँ आई हूँ। इस शरीर पर अब आपका कोई अधिकार नहीं। अब इस पर मेरा अधिकार है। अग्नि देव इन सबसे पहले कहते हैं कि पिता, माता और पत्नी इस शरीर पर अपना-अपना अधिकार जताते हैं, किन्तु प्राण निकल जाने के बाद कोई इसे घर में रखने को तैयार नहीं होता ? ये लोग उसे जल्दी से जल्दी श्मशान में ले जाते हैं। वे मुझे मेरा भोजन देने के लिए वह शरीर मेरे पास ले आते हैं। यह शरीर मेरा भोजन है। इस पर मेरा अधिकार है। प्रभु ने यह फैसला किया कि इस शरीर पर न तो पत्नी का, न पिता का, न माता और न अग्नि का अधिकार है। इस पर भगवान् का अधिकार है। यह जीव अनेक योनियों में भटकते-भटकते थक जाता है। इसलिए प्रभु को इस पर दया आती है और वह इसे मनुष्य योनि प्रदान करते हैं, जिससे यह परमात्मा का काम करे और उसकी शरण में जाए। भगवान् ने मानव-शरीर भगवान् की भक्ति करने के लिए दिया है। फिर भी कोई मनुष्य भक्ति नहीं करता। मनुष्य को सुन्दर शरीर मिला है, घर में सब सुविधाएँ मिली हैं। फिर भी वह भोग-विलास में फँस गया है, अपने को भूल गया है। 

भगवान् यदि तुमको खूब सम्पत्ति दें तो सुख मत भोगना, नित्य कुछ दुःख सहन करके भी भक्ति करना, तप करना ।

कन्हैया ओखली के साथ बँधा पड़ा है। कन्हैया मेरा पुत्र है। नन्दबाबा ने इस प्रकार अपना वात्सल्य भाव दिखाया। उनको ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरा बालक घबड़ा गया है। ये गोप गोपियाँ बातें कर रहे हैं। कोई लाला को छुड़ाता नहीं। अनेक देवताओं की मनौती मानने पर बुढापे में यह बालक मिला है। इसकी माता को जरा भी इसकी चिन्ता नहीं है।

नन्दबाबा यह दृश्य न देख सके। आँखें गीली हो गईं। वे दौड़कर उस स्थान पर आ गये। लाला ने देखा कि नन्दबाबा दौड़ते हुए आ रहे हैं। इसलिये वे मुझे छुड़ा देंगे। लाला ने दोनों हाथ जोड़ कर ऊँचा किया और कहा, 

"बाबा, मुझे मेरी माता ने बाँधा है।"

 नन्दबाबा ने कहा कि बेटा, मैं तुझे छुड़ा देता हूँ। नन्दबाबा लाला को छुड़ा देते हैं और उसे अपनी छाती से चिपका लेते हैं। पिता-पुत्र एकाकार हो जाते हैं। लाला बाबा को प्यार करता है और कहता है कि बाबा, मेरी माता मुझे बाँधती है और मारती है। नन्दबाबा ने कहा कि तेरी माता ने तुझे बाँधा, किन्तु मैंने तुझे छुड़ाया है। लाला ने कहा, 

“हाँ आपने छुड़ाया है।" 

नन्दबाबा ने पूछा, 

"तू किसका लड़का है?

  कृष्ण ने कहा कि मैं अपनी माता का बालक हूँ। नन्दबाबा की बड़ी इच्छा है कि लाला कभी यह कहे कि बाबा, मैं आपका बालक हूँ आपका पुत्र हूँ, लेकिन उनकी इच्छा परिपूर्ण न हुई। वे बालकृष्णलाल को लेकर घर में आए और यशोदाजी को उलाहना दिया कि क्या तेरी बुद्धि खराब हो गई है? तू ने मेरे लाला को क्यों बाँधा ? यशोदा माता ने कहा, 'सब मुझे ही उलाहना देते हैं गोपियाँ मुझे उलाहना देती हैं, किन्तु इसे चोरी करने की आदत पड़ गई है। नन्दबाबा ने कहा कि ,

"यह अभी बालक है। बाल्यावस्था में सब ऐसा ही करते हैं। बड़ा होने पर भला ऐसा क्यों करेगा? तूने लाला को बाँधकर अच्छा नहीं किया।,"

 यशोदा माता व्याकुल हो उठीं और कहा कि मैंने प्रेम से बाँधा है। वह लाला को प्रेम से बुलाती हैं, 

"बेटा, तू मेरे पास आ ।"

 लाला ने माता के पास जाने से इनकार करते हुए कहा कि

 "मैं तो बाबा का पुत्र हूँ।"

 लाला को खुश करने के लिए नन्दबाबा ने कहा, 

"लाला, तू रो मत। तुझे तेरी माँ ने बाँधा था। तो मैं उसे खम्भे से बाँध दूँगा और सोटी से मारूँगा।"

 लेकिन यह सुनकर भी कन्हैया खुश नहीं हुआ। लाला ने कहा,

 "बाबा, मेरी माता भले मुझे मारे, किन्तु उसे न बाँधिए और न मारिए। वह मेरी माता है" 

यशोदा माता इसे सुनती है और कहती है कि बालक का यह कैसा प्रेम है। मुझे सब रोकते थे, किन्तु मैंने इसे बाँधा। मेरी बुद्धि ही बिगड़ गई थी, मैं बहुत निष्ठुर बन गई। यह कैसे प्रेम कर रहा है और मेरे बाँधे जाने की बात पसन्द नहीं करता । मैं इसकी योग्य माता नहीं हूँ। मैं निष्ठुर हूँ, यह प्रेम की मूर्ति है, सबके साथ प्रेम करता है । यह सोचकर यशोदा माता रोने लगती हैं और कहती हैं कि कन्हैया मेरी गोद में कब आएगा ? वह मुझसे रूठ गया है, वह मेरे पास नहीं आएगा। माता का हृदय विकल हो उठा है।


कोई भी जीव जब परमात्मा के लिए रोने लगता है, तब प्रभु को दया आ जाती है। लाला ने देखा कि मेरी माता मेरे लिए रो रही है। उसी समय लाला ने नन्दबाबा से कहा,

 "बाबा, मुझे तो भूख लगी है। आपके पास तो कुछ है नहीं। मैं आपका लड़का नहीं हूँ, बल्कि अपनी माता  का लड़का हूँ। "


यह कहकर कन्हैया बाबा को छोड़ दौड़ता-दौड़ता अपनी माता के पास पहुँच जाता है, उनकी गोद में बैठ जाता है और उनसे कहता है कि माता, मैं आ गया। उस समय माता ने अपनी आँखें खोलकर देखा तो कन्हैया उनकी गोद में था। माता ने उसे छाती से लगा लिया और कहा कि मेरा रोना इससे सहा नहीं गया, मेरी आँखों में आँसू आना इसे सहन नहीं होता है। यह मुझसे बहुत प्रेम करता है। माता लाला को प्यार करने लगी। रस्सी से बाँधे जाने के कारण लाला का नाम दामोदर पड़ गया।

ग्वाल-बालों ने आज अपने-अपने घरों में पानी भी नहीं पिया। क्योंकि उनका कन्हैया बाँधा गया है। लाला ने कहा कि मैंने अपने मित्रों से कहा था कि अपनी माता का बन्धन छूट जाने पर वह सबको अपनी ओर से खाने की दावत देगा। माता! मुझे मित्रों को खाने के लिए दावत देनी है? यशोदा माता ने कहा, "बेटा, घर में सभी चीजें तैयार हैं। तुम सब एक साथ खाने बैठ जाओ ।"

 लाला ने कहा कि मुझे आज परोसना है। मुझे परोसने में बड़ा मजा आता है; खाने में मजा नहीं आता। जब मैं अपने मित्रों को खिलाता हूँ, तब मुझे और भी मजा आ जाता है। खाने वाले की अपेक्षा प्रेम से परोसने वाले को हजार गुना सुख मिलता है। खाने वाले में भगवान के दर्शन करो, प्रेम से परोस कुछ लोग परोसते समय दौड़ते-दौड़ते चलते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। जो खिलाकर तृप्त होता है, वह सच्चा वैष्णव है।

यशोदा माता समझाती हैं, 

"बेटा! तू अभी छोटा है। तुझे परोसना नहीं आएगा।"

 बालकृष्णलाल ने कहा कि मुझे परोसना बड़ा अच्छा आता है। आज मुझे परोसने दो। मेरे मित्र भूखे हैं। यह कहकर बालकृष्णलाल परासेने लगे। सभी उनकी जय-जय करते हैं और प्रेम से भोजन करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि आज बहुत खाया, बहुत खाया। अब मेरे पेट में जगह नहीं है। कन्हैया कहता है कि मेरे गुरु ने मुझे ऐसा मंत्र सिखाया है कि उसे बोलने पर पेट के अन्दर भी दिखाई देता है। मैं उसके प्रभाव से देख रहा हूँ कि अभी तुम्हारे पेट में दो मालपुए की जगह है। इस प्रकार वे प्रेम से मालपुआ परोसते हैं, बारंबार मित्रों से विनोद करते हैं। इससे बालक प्रसन्न हो जाते हैं। कन्हैया एक-एक का हाथ पकड़ता है, उसे उठाता है और जल देता है। एक मित्र कहता है, 

"मेरा पेट बहुत भर गया है; मुझसे तो उठा ही नहीं जाता। लाला तूने मुझे बहुत परोस दिया था। अब तो यदि कोई बिछौना बिछा दे, तो यहीं सो जाऊँ। इस समय मुझे नींद आ रही है। "..

 कन्हैया मजाक में जबाब देता है,

 "मित्र, प्रसाद तो मेरा था, किन्तु पेट तो तेरा था। तू ने इतना अधिक क्यों खा लिया?"

 मित्रों ने कहा कि लाला, जब परोसने लगा तो अपने आप ही अधिक खाया गया। इस प्रकार सब विनोद करते हैं और परमानन्द प्राप्त करते हैं।

श्री डोंगरेजी महाराज 

हरिओम सिगंल






“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...