बुधवार, 26 जुलाई 2023

मुल्ला नसरुद्दीन की हकीमी

मुल्ला की हकीमी


जिस तरह मुल्ला नसीरुद्दीन को चाहने वालों की कमी नहीं थी, उसी तरह उससे जलने वालों की भी कमी नहीं थी। उससे ईर्ष्या रखने वाले हमेशा ऐसे अवसर की ताक में रहते थे जिसमें उन्हें उसकी खिल्ली उड़ाने का मौका मिल जाए।एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन सुबह की सैर करने निकला था। हमेशा की तरह उसने लम्बा चोगा और सलवार पहन रखा था। पाँव में नक्काशीदार जूती थी और सिर पर नोकदार लम्बी टोपी। अपनी दाढ़ी सहलाता हुआ मुल्ला अपनी गली में लम्बे डग भर रहा था कि उसका एक पड़ोसी, जो कहीं से आ रहा था, रास्ते में ठोकर लगने के कारण गिर पड़ा। मुल्ला नसीरुद्दीन उस समय उसके पास ही था इसलिए बिना समय गंवाए उसने उसे उठाया और उसके कपड़ों की गर्द झाड़ने लगा तो देखा, उस व्यक्ति के पाजामे से घुटने के पास खून रिस रहा है। मुल्ला को यह समझते देर नहीं लगी कि उस व्यक्ति का घुटना गिरने के कारण जख्मी हो गया है।

मुल्ला नसीरुद्दीन ने उस व्यक्ति से कहा- " अपना पाजामा घुटने तक उठा लो । मैं गेंदे के पौधे के पत्ते तोड़ लाता हूँ। उसका रस लगा देने से तुम्हारा जख्म भर जाएगा। खून गिरना तो तुरन्त बन्द हो जाएगा।" इतना कहकर मुल्ला नसीरुद्दीन बिना किसी की इजाजत लिये एक घर के आगे सजावट के लिए लगाए गए गेंदे के पौधों से 'कुछ' पत्तियाँ तोड़ने लगा। 

यह अहाता जिसमें गेंदा के पौधे लगाए गए थे रहमत खान का था। रहमत खान मुल्ला नसीरुद्दीन से बैर रखता था । उसे इस बात की रंजिश थी कि एक ही मुहल्ले में रहते हुए मुल्ला नसीरुद्दीन को दूर-दूर तक लोग जानते और मानते हैं जबकि मुल्ला नसीरुद्दीन की माली हैसियत उसके आगे कुछ भी नहीं है और उसे कोई नहीं जानता। मानने की तो बात ही जुदा है।

जब रहमत खान ने मुल्ला नसीरुद्दीन को गेंदे के पत्ते तोड़ते देखा तो उसके तन-बदन में आग लग गई। जलन से वह सुलग उठा और झल्लाई आवाज में बोला- "मियाँ नसीर ! यह क्या कर रहे हो? गेंदे के पौधे मैंने घर की शोभा के लिए लगाए हैं और तुम उसके पत्ते नोच रहे हो? वह भी बिना इजाजत?"

मुल्ला नसीरुद्दीन जानता था कि रहमत खान उससे खार खाए रहता है, किन्तु अभी वह वाकई बिना इजाजत उसके लगाए गेंदे पौधों के पत्ते तोड़ रहा है। यह खयाल आते ही कि रहमत का टोकना उचित है, उसने मासूमियत से कहा- "माफ करना रहमू! इस आदमी के घुटने छिल गए हैं। उस रिसते खून को देखकर मुझे कुछ भी खयाल नहीं रहा सिवा इसके कि इसके जख्म से खून बहना बन्द हो जाए। मैंने यहाँ गेंदे के पौधे देखे तो याद आया कि इसके रस से खून का बहना बन्द हो सकता है। बस, मैं गेंदे के पत्ते बेखयाली में तोड़ने लगा।" ऐसा कहते हुए मुल्ला नसीरुद्दीन गेंदे के पत्तों को अपनी हथेली पर मसलता भी रहा।

रहमत खान मुल्ला नसीरुद्दीन को नीचा दिखाने पर आमादा था। उसने उससे कहा - "हाँ, ठीक है, पहले तुम इस आदमी का ठीक से इलाज कर लो। मैं भी एक हकीम की तलाश में था। अब तुम पास में हो तो क्या गम है! तुमसे ही अपना भी इलाज करवा लूँगा । दरअसल मुझे मालूम नहीं था कि तुम हकीमी भी करते हो!"

मुल्ला नसीरुद्दीन रहमत खान की बातों में छुपे व्यंग्य को समझ रहा था मगर उसकी बातों पर ध्यान दिए बिना ही उसने उस चोटिल व्यक्ति के जख्म पर गेंदे के पत्तों का रस टपकाया। वाकई खून का बहना रुक गया। वह व्यक्ति मुल्ला नसीरुद्दीन को धन्यवाद कहता हुआ विदा हो गया। तब तक रहमत खान अपने दरवाजे पर खड़ा रहकर मुल्ला नसीरुद्दीन की हकीमी देख रहा था।

जब मुल्ला नसीरुद्दीन अपने काम से मुक्त हुआ तब रहमत खान ने मुल्ला नसीरुद्दीन को व्यंग्य भरी –दृष्टि से देखते हुए कहा- "हाँ, तो हकीम साहब! मुझे भी आपसे इलाज करवाना है, आप तो खुदाई खिदमतगार हैं, मेरा भी भला करें...."

मुल्ला नसीरुद्दीन समझ रहा था कि रहमत खान उसका मजाक उड़ा रहा है मगर अपनी शैली में जीने का आदी मस्त मलंग मुल्ला अपने पड़ोसी रहमत खान की व्यंग्य-बुझी बातों से अप्रभावित रहा और मुस्कुराते हुए पूछा - "बताओ तो सही, तकलीफ क्या है? जितना तजुर्बा है उतनी मदद तो मैं किसी की भी करूँगा...।”

रहमत खान ने मुल्ला नसीरुद्दीन के सामने खड़े होकर अपनी तोंद सहलाते हुए कहा -“ कल रात एक अजीब वाकया हुआ। वह भी तब, जब मैं गहरी नींद सोया हुआ था। नींद में ही मुझे अकबकाहट महसूस हुई। मेरी आदत है कि मैं मुँह खोलकर सोता हूँ... अकबकाहट के मारे मुझे जम्हाई आई और जम्हाई के कारण मेरा मुँह पूरा खुल गया। मेरे घर में बहुत चूहे हैं। जिस वक्त मैं जम्हाई ले रहा था उसी वक्त एक चूहा तेजी से दौड़ता हुआ आया और मेरे मुँह में घुसकर गले की नली के रास्ते मेरे पेट में पहुँच गया और वहीं ऊधम मचाए हुए है। कोई ऐसा उपाय बताइए कि यह चूहा मरे और मेरे पेट में शान्ति हो । "

"बस इतनी सी बात?... यह तो कोई ऐसी समस्या नहीं है कि चिन्तित हुआ जाए!" मुस्कुराते और अपनी दाढ़ी सहलाते हुए मुल्ला नसीरुद्दीन ने कहा- "देखो रहमू! तुम बड़ा- सा मुँह खोलकर जम्हाई लेना जानते ही हो... बस, कहीं से एक छोटी-सी बिल्ली पकड़ लाओ और मुँह बड़ा-सा करके बिल्ली को गटक जाओ और दो-तीन बार बाएँ से दाएँ, दाएँ से बाएँ करवटें लो और इसके कुछ देर बाद एक कटोरा ठंडा दूध पी लो। फिर देखो कमाल ! बिल्ली चूहे को निगल जाएगी और तुम्हारे पेट में चल रहा चूहे का ऊधम बन्द हो जाएगा  ।... और हाँ, यह समस्या तो केवल सामान्य ज्ञान से हल हो जाने वाली समस्या थी,.. इसमें हकीमी की कोई जरूरत ही कहाँ थी!"

इतना कहकर मुल्ला नसीरुद्दीन फिर से लम्बे डग भरने लगा। वह अपनी दाढ़ी भी सहलाता जा रहा था और मस्त चाल से चल भी रहा था। और रहमत खान कभी मुल्ला नसीरुद्दीन को तो कभी अपने अहातें में गेंदे के पौधों को देख रहा था ठगा सा !

निशानेबाज मुल्ला नसीरुद्दीन

अपने गाँव के बाजार के चबूतरे पर बैठकर मुल्ला नसीरुद्दीन लोगों को एक कपोल कल्पित घटना सुना रहा था - "एक बार मैं अपने गदहे पर सवार होकर अपनी ससुराल जा रहा था। ससुराल के रास्ते में एक जंगल है। जब मेरा गदहा जंगल में घुसा तो मेरे सामने एक शेर आ गया। शेर को देखकर मैंने अपना साहस नहीं खोया । तुरन्त धनुष और बाण निकाला। प्रत्यंचा पर बाण रखा और कान तक प्रत्यंचा खींचकर बाण छोड़ दिया। पलक झपकते देखा कि बाण से बिंधा हुआ शेर मेरे गदहे के आगे पड़ा हुआ था । "लोगों को मुल्ला नसीरुद्दीन की बात पर भरोसा नहीं हुआ । श्रोताओं में से एक ने टोका "मैंने तो कभी आपके पास धनुष-बाण नहीं देखा?”

मुल्ला नसीरुद्दीन ने कहा- "जरूरत के समय ही मैं अपना धनुष-बाण निकालता हूँ। लेकिन मेरा यकीन करो कि मैं अचूक निशानेबाज हूं।"दूसरे श्रोता ने कहा- “जब इसे सन्देह हो ही गया है तो आप अपना धनुष-बाण लाकर इन सबको अपना अचूक निशाना दिखा ही दीजिए।”

मन-ही-मन मुल्ला नसीरुद्दीन ने सोचा- 'बुरे फँसे ।' मगर उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और मजमा लगाकर बैठे लोगों से कहा- "अब कौन घर जाए और धनुष-बाण लाए! इतनी देर में तो सूरज ढल जाएगा...तब क्या खाक मजा आएगा निशानेवाजी का!" मुल्ला नसीरुद्दीने की बात श्रोतावृन्द को ठीक लगी।

उनमें से एक श्रोता तेजी से उठा - " मैं अभी तीर-धनुष और लक्ष्य लेकर आता हूँ।" इतना कहते-कहते वह तेजी से दौड़ गया। थोड़ी ही देर में वह निशानेबाजी का सारा सामान लेकर चबूतरे के पास आया और मुल्ला नसीरुद्दीन को धनुष-बाण देकर कहा- "मैं लक्ष्य को सामने वाले पेड़ के तने पर लटकाकर आता हूँ। मेरे आने के बाद आप अपनी निशानेबाजी दिखाना।"

मुल्ला के पास हामी भरने के सिवा और कोई चारा नहीं था। लक्ष्य बाँधकर वह व्यक्ति लौट आया और मुल्ला नसीरुद्दीन से कहा- -“अब चलाइए बाण।" -

मुल्ला नसीरुद्दीन ने पहला बाण छोड़ा जो लक्ष्य से बहुत पहले रास्ते में ही गिर पड़ा। सभी हँसने लगे।मुल्ला ने कहा- "यह निशाना मेरा नहीं था। ऐसे बाण चलाया करते हैं हमारे कोतवाल !”लोग फिर हँस पड़े।

मुल्ला को दूसरा बाण दिया गया। मुल्ला ने इस बार थोड़ा और जोर लगाकर प्रत्यंचा खींची। बाण छूटा मगर लक्ष्य तक नहीं पहुँचा। लोग फिर हँसने लगे।

मुल्ला ने कहा- "हां तो भाइयो, वह थी काजी की निशानेबाजी। ऐसी निशानेबाजी पर मुझे भी हँसी आती है। "

मुल्ला को फिर तीसरा बाण दिया गया। मुल्ला ने इस बार प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाया ही था कि लोगों ने पूछना शुरू कर दिया- “यह निशाना तो मुल्ला नसीरुद्दीन का है न?" 

मगर मुल्ला नसीरुद्दीन ने उनकी बातों का कोई जवाब नहीं दिया और कान तक प्रत्यंचा खींचकर बाण छोड़ा-सन्न करता हुआ बाण लक्ष्य को बेध चुका था। बाण छोड़कर मुल्ला नसीरुद्दीन ने विजेता भाव से सबकी ओर देखा और पूछा - "देख लिया न, बन्दे का निशाना।" लोगों ने मान लिया कि मुल्ला नसीरुद्दीन निशानेबाज भी है।

महत्त्वाकांक्षी युवा तपस्वी

 


विजयनगर में प्रत्येक वर्ष कोई-न-कोई उत्सव समारोह आदि हुआ करता था। महाराज कृष्णदेव राय उत्सव- प्रेमी ही नहीं, अध्यात्म प्रेमी भी थे। उनका मानना था कि आध्यात्मिक होने का अर्थ यह नहीं है कि आप धार्मिक कर्मकांडों में उलझ जाएँ। ये कर्मकांड तो मनुष्य को विचारों की संकीर्णता की ओर ले जाते हैं। यह करो, ऐसे करो बतानेवाले कर्मकांड निषेध और वर्जनाओं पर आधारित हैं क्योंकि ये यह भी बताते हैं कि वह न करो, वैसा न करो। प्रायः महाराज अपने चिन्तन की चर्चा तेनाली राम से करते रहते थे। एक उत्सव के अवसर पर महाराज ने प्रसन्न होकर एक तपस्वी को विजयनगर में कुटिया बनाने के लिए भूमि एवं अन्य सुविधाएँ दे दीं। तेनाली राम ने महाराज के इस व्यवहार पर अपनी शंका जताई, “महाराज! मुझे तो यह युवा तपस्वी कहीं से भी पहुंचा हुआ प्राणी नहीं लगा और न ही इसमें पांडित्य की वैसी प्रखरता है जिससे यह दूसरों का मार्गदर्शन कर सके। फिर आपने यह उदारता क्यों दिखाई?"


"देखो तेनाली राम ! मैं विजयनगर का राजा हूं ।और इससे इतर भी मेरा एक निजत्व है। मैं स्वयं आध्यात्मिक चिन्तक हैं। विजयनगर मंठे हर वर्ष आयोजित होनेवाले समारोहों का उद्देश्य ही है लोगों को जोड़ना। इन समारोहों के समय ऐसे अनेक कार्यक्रम होते हैं जिनमें भाग लेकर या देख-सुनकर लोगों की दमित इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है। इसलिए विजयनगर के निवासियों में तुम्हें सन्तोष और उल्लास की कमी नहीं दिखेगी। यही है मेरे शासन की सफलता का पहला सोपान ।...मेरे पास जब यह युवक पहुंचा तब मुझे यह विश्वास हो गया कि यह युवक महत्त्वाकांक्षी है, अन्यथा सामान्य साधु-सन्तों की तरह यह किसी के द्वार पर भी जा सकता था। जब इसने मुझसे वियजनगर में कुटिया बनाने की सुविधा माँगी, तो मेरे सामने यह बात साफ हो गई कि यह युवक किसी दूसरे राज्य से आया है। इस प्रकार एक राजा के समक्ष वह एक शरणागत की तरह था, तो उसे कुटिया बनाने की सुविधा देकर मैंने राजधर्मानुकूल कार्य किया है। रही उसके सिद्ध नहीं होने की बात तो मुझे विश्वास है कि वह सिद्धि तो प्राप्त कर ही लेगा, क्योंकि महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति वांछित को प्राप्त करके ही दम लेता है।” महाराज ने कहा ।


महाराज की तर्कसंगत बातें सुनकर तेनाली राम मौन हो गया।


धीरे-धीरे समय बीतता रहा। महाराज उस युवक को भूल गए। दो राज्य महोत्सव बीत गए। उस युवक ने महाराज के दर्शन नहीं किए।


तीसरे राज्य महोत्सव के प्रारम्भ मं ही वह युवक महाराज के पास पहँ ुचा। उसके मुख


से विद्वत्ता का तेज प्रकट हो रहा था। वह दूर से ही तेजस्वी प्रतीत हो रहा था। युवक ने महाराज के समीप आकर कहा, “महाराज! मैंने सभी धर्मग्रन्थों का अध्ययन कर लिया है। मैं सभी शास्त्रों का ज्ञाता हो गया हैं। आप मुझे अपना गुरु बना लें!"


महाराज ने युवक की ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोले, "युवक यह ठीक है कि तुमने सभी शास्त्र पढ़ लिये हैं मगर मेरा गुरु बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है। अब तो तुम्हें अपने अध्ययन पर चिन्तन करना चाहिए। ...मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि तुममें अभी भी कोई कमी है जिसके कारण मैं अभी तुम्हें अपना गुरु नहीं बना सकता।"


महाराज की बातें सुनकर वह युवक वापस लौट गया।


तेनाली राम उस समय वहीं था। उसने महाराज और युवक की बातें सुनी थीं। उसने कहा, "महाराज! आपने ठीक ही कहा था कि युवक बहुत महत्त्वाकांक्षी है। सोद्देश्य साधना कर रहा है, यह भी उसके महत्त्वाकांक्षी होने का संकेत है... और देखिए उसकी महत्त्वाकांक्षा की पराकाष्ठा वह आपका गुरु बनना चाहता है। इसका अर्थ तो यही है कि वह विजयनगर का राजगुरु बनने की अभीप्सा से यहाँ आया है।"


"तुम ठीक समझे तेनाली राम !” महाराज ने उत्तर दिया।


और बात वहीं समाप्त हो गई।


महाराज अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गए। वही रोज दरबार का काम-काज देखना और कभी-कभी प्रजा का दुख-सुख जानने के लिए विजयनगर के भ्रमण पर निकल जाना- यही थी उनकी सामान्य दिनचर्या ।


वर्ष बीतते देर नहीं लगी। महाराज अपने अभ्यास के अनुरूप ही वार्षिक समारोह की तैयारियों की स्वयं समीक्षा करते। कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित होंगे, कहाँ रंगमंच बनेगा, पनसाला कहाँ लगेगी और भोजनालय कहाँ बनेगा; प्रजा को इस वर्ष के समारोह के समय राज्य की ओर से मिलनेवाले भोजन के लिए क्या-क्या पकेगा-यानी छोटी से छोटी बात के लिए भी महाराज स्वयं निर्देश दे रहे थे। तेनाली राम हमेशा की तरह उनके साथ था।


हर्षोल्लास के साथ विजयनगर का वार्षिकोत्सव आरम्भ हुआ। इस वार्षिकोत्सव के आरम्भ में वह युवा तपस्वी महाराज के पास आया लेकिन इस बार उसने महाराज से गुरु बनाने को नहीं कहा। महोत्सव के अवसर पर उसने महाराज को शुभकामनाएँ दीं तथा महाराज से कहा, “महोत्सव के समय रास-रंग- मनोरंजन के साथ ही उन्हें कोई धार्मिक अनुष्ठान कराना चाहिए।'


महाराज ने तेनाली राम की ओर देखा ।

तेनाली राम ने महाराज का भाव समझा और युवा तपस्वी से कहा, “प्रभु! सभी धर्म एक सी ही बात करते हैं। इसलिए संशय है कि कौन-सा धार्मिक अनुष्ठान किया जाए और जब तक संशय है तब तक कोई अनुष्ठान हो ही नहीं सकता क्योंकि संशययुक्त मन से धर्म की बातें सम्भव नहीं हैं। "


युवा तपस्वी ने कहा, “आप ठीक कह रहे हैं।"


तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी से विनम्रता के साथ कहा, “प्रभु! ऐसा प्रतीत होता है कि आपने चिन्तन कार्य तो पूरी निष्ठा से किया है, अब आप निष्ठापूर्वक मनन कार्य में लगें तब ही आपकी साधना पूर्ण होगी।”


वह युवक वहाँ से चला गया। महाराज महोत्सव का आनन्द उठाने में लगे और तेनाली राम सखा भाव से उनके साथ रमा रहा।


इसके बाद कई वर्षों तक युवा तपस्वी महोत्सव के समय महाराज से मिलने नहीं आया।


एक बार विजयनगर में जब महाराज और तेनाली राम वार्षिक महोत्सव के लिए कार्यक्रम तय करने बैठे तो बात ही बात में उन्हें उस युवा तपस्वी का स्मरण हो आया। उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “कई वर्ष व्यतीत हो गए, मेरा गुरु बनने की इच्छा से विजयनगर में कुटिया बनाकर तपश्चर्या में लगा वह युवक आया नहीं...कुछ अता-पता है उसका?"


तेनाली राम ने तत्परता से उत्तर दिया, “ शीघ्र ही सूचित करूँगा महाराज!”


इसके बाद तेनाली राम ने उस युवा तपस्वी के सन्दर्भ में सूचनाएँ एकत्रित करवाईं। सूचना थी कि वह युवा तपस्वी अब कुटिया से निकलता ही नहीं। कभी-कभी किसी-किसी को दिख जाता है। वह न तो पूजा अनुष्ठान करता दिखाई देता है और न किसी से कोई याचना करने जाता है। पिछले वर्ष जब अतिवृष्टि के कारण गाँव के गाँव पानी में डूब गए थे तब इस युवा तपस्वी ने पीडित लोगों को बचाने और उनके लिए सुविधाएँ जुटाने में अपना जी-जान लगा दिया था।


तेनाली राम ने महाराज को युवा तपस्वी के सन्दर्भ में मिली समस्त सूचनाएँ दीं और


कहा, “लगता है, महाराज! यह युवा तपस्वी सिद्ध हो चुका है। "


महाराज कुछ बोले नहीं। महोत्सव आरम्भ हुआ। राजा के साथ प्रजा के मेल से उन्मुक्ति और आनन्द का एक सुखद और आह्लादकारी वातावरण बना। विजयनगर की खुशहाली के इसी सूत्र को स्मरण रखने के लिए महाराज इस महोत्सव का आयोजन कराते थे। महोत्सव के समापन के बाद महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम, चलो, जरा उस युवा तपस्वी से मिल आएँ।"


महाराज और तेनाली राम स्वयं चलकर युवा तपस्वी की कुटिया में गए। युवा तपस्वी ने उन्हें देखकर अपने हाथ जोड़ लिये और कहा, “धन्यभाग्य! हमारे गुरुजन पधारे!" महाराज विस्मित से रह गए युवक की बात सुनकर। उन्होंने कहा, “प्रभु, यह आप क्या कह रहे हैं? मैं तो यह समझता हैं कि अब आप सिद्ध हो चुके हैं इसलिए आपसे दीक्षा लेने


की इच्छा से आपके पास आया था।"


युवक ने गम्भीरता से कहा, "महाराज! आप मेरे आश्रयदाता हैं। पिता तुल्य और आदरणीय और तेनाली राम मेरे गुरु हैं उन्होंने मुझे मनन करने की सीख दी थी और मैं उनके निर्देश पर ही मन में डूब गया। तब मैंने जाना कि संसार में ऐसा कोई नहीं जिसमें ज्ञान का सागर न हो... चाहने पर कोई भी इस ज्ञान सागर में गोते लगा सकता है।" उस युवक ने तेनाली राम के चरण छुए और तेनाली राम ने उसे अपने गले से लगा लिया।

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

भगवान नहीं, शेखचिल्ली का घर

शेखचिल्ली पन्द्रह साल का हो चुका था। उसके गाँव में कई मकान पक्के और दो-मंजिले थे। उसके एक सहपाठी शकील अहमद का मकान भी दो मंजिला बन चुका था। मगर उसका घर जैसा था वैसा ही रहा, कोई तब्दीली नहीं हुई। उसकी भी इच्छा थी कि उसका घर भी दो मंजिला  बने। कच्चे मकान में रहते-रहते उसकी तबीयत भर गई थी। 

एक दिन वह स्कूल से जल्दी वापस आ गया था। घर पहुँचने पर उसने शेख बदरुद्दीन और रसीदा बेगम को एक जगह बैठकर बातें करते देखा। हालाँकि उसे बचपन से अब तक ऐसा मौका कम मिला जब उसने अपने मम्मी-पापा को एक साथ बैठकर बातचीत करते देखा हो। उसे देखकर शेख बदरुद्दीन ने आवाज लगाई 

" तू भी इधर ही आ जा शेखू!" शेखचिल्ली ने अपना स्कूल बैग एक तरफ रखा और मम्मी पापा के बीच में जाकर बैठ गया । मम्मी ने उसका सिर प्यार से सहलाते हुए कहा- "बता तो बेटे, इस बार ईद में तू कैसे कपड़े लेगा? तू जैसे कपड़े चाहेगा, इस बार तुम्हें वैसे कपड़े दिलवाएंगे हम। मम्मी पापा को खुश देखकर शेखचिल्ली ने आखिर अपने मन की बात कह दी - “मम्मी! हर ईद में कपड़े बनते ही हैं, इस बार नहीं भी बने तो चलेगा। मेरी तमन्ना है कि अपना घर पक्का हो-दो मंजिल वाला, जिसमें ऐसा छज्जा भी हो जहाँ टहला जा सके... घूम-घूम कर पढ़ा जा सके।"

शेखचिल्ली की बातें सुनकर शेख बदरुद्दीन चौक पड़े। तभी रसीदा बेगम ने कहा- "हों जी! इस बार गन्ने की फसल अच्छी हुई हैं। हम लोग इस बार दिल खोलकर खर्च करेंगे... और कुछ नहीं तो बाहर वाले दोनों कमरों पर छत डलवाकर उसके ऊपर एक कमरा शेखू के लिए बनवा देंगे। शेखू अब बड़ा हो रहा है। कल को उसकी शादी के लिए पैगाम लेकर लोग आएँगे। इस बात का खयाल करके ही सही, अपना जी कड़ा कर लीजिए और मकान बनवाने में पैसा लगवा दीजिए। खुदा ने चाहा तो मकान बन ही जाएगा। अच्छा सम्बन्ध पाने के लिए थोड़ा दिखावा भी तो करना जरूरी है।"

शेख बदरुद्दीन अपनी पत्नी और बेटे की बात सुनकर गम्भीर हो गए और थोड़ी देर सोचने के बाद धीरे से रसीदा बेगम से बोले "ठीक है, कल मैं सुभाष मिस्तरी से बातें करूँगा... वह हिसाब लगाकर बता देगा कि कितना खर्च आएगा-यदि बाहर के दोनों कमरों पर छत डलवाई जाए तो...!"


इस घटना के दो दिनों के बाद ही शेखचिल्ली ने देखा, उसके घर में राज मिस्तरी काम कर रहे हैं। अम्मी ने उसे बताया कि उनके मकान के आगे वाले भाग में छत ढलाई का काम दो-तीन दिनों में हो जाएगा और उसके बाद छत पर उसके लिए एक अच्छा सा कमरा बनवाया जाएगा जिसमें बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ होंगी... रोशनदान होगा। उसके कमरे का फर्श भी रंगीन होगा चकमक-बूटेदार! यह सब सुनकर शेखचिल्ली बहुत खुश हुआ और उस दिन से ही उसे प्रतीक्षा रहने लगी कि कब उसके घर में छत ढलाई हो... और कब उसके लिए कमरा बने।

और वह दिन भी जल्दी आ गया। शेख बदरुद्दीन इस बात पर आमादा थे कि जब पैसे खर्च हो ही रहे हैं तो दो-चार मजदूर बढ़ाकर मकान का सारा काम ईद से पहले पूरा करा लिया जाए। शेख बदरुद्दीन को अपने इस मकसद में कामयाबी मिली। ईद से पहले नई ढली छत पर शेखचिल्ली के लिए कमरा बनकर तैयार हो गया। नीचे के दो कमरे पापा मम्मी के  लिए और छत का शानदार फर्शवाला कमरा शेखचिल्ली के लिए तय हो गया। रसीदा बेगम ने बड़े जतन से शेखचिल्ली का सामान छतवाले कमरे में करीने से सजाया और ईद के दिन ही शेखचिल्ली को वह कमरा सौंप दिया गया।


अब शेखचिल्ली के पास जब भी वक्त होता, वह झरोखे से मुक्त आकाश का सौन्दर्य निहारता । घर के सामने की सड़क पर आने-जानेवाले लोगों को देखता । छज्जे पर टहलता । उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था क्योंकि बाहर से देखने पर उसका पूरा घर दो मंजिला ही दिखता था। उसका सीना गर्व से चौड़ा हो गया कि अब गाँव में वह भी दो मंजिला मकानवाला कहा जाएगा।

एक शाम शेखचिल्ली अपने कमरे के सामने की खुली छत पर टहल रहा था तभी उसने सुना, नीचे सड़क से किसी की आवाज आई - "देखो, यह दो मंजिला मकान शेखचिल्ली का है।"

शेखचिल्ली ने जब यह सुना तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगा। “भगवान! क्या बात है! अब तो इस मकान के कारण लोग मुझे भी जानने लगे हैं!" खुश होकर उसने छत से नीचे झाँककर देखा । तीन-चार लड़के उसके मकान के सामने नुक्कड़ पर खड़े होकर बात कर रहे थे।

शेखचिल्ली छत पर टहलता हुआ उस किनारे तक गया जहाँ से नुक्कड़ पर खड़े लड़कों की बातचीत वह सुन सके।शेखचिल्ली ने सुना, उनमें से एक लड़का कह रहा था - "शेखचिल्ली का घर है। "

“यह कहकर तुम क्या जताना चाहते हो? अरे! मैं तो मानकर चलता हूँ, यह सारी दुनिया भगवान ने बनाई है इसलिए हर घर भगवान का घर है फिर शेखचिल्ली का घर कहे जाने की जरूरत ही क्या है?"

इतना सुनना था कि शेखचिल्ली गुस्से से तिलमिला उठा। वह तैश में आकर बुदबुदाने लगा-”मेरे मम्मी-पापा ने मेरे लिए यह घर बनवाया है। मेरे कहने पर बना है यह दो- मंजिला । यह मुआ कौन है जो इस बात को अहमियत देने से इनकार कर रहा है... अभी चलकर मजा चखाता हूँ इसे !" और शेखचिल्ली दनादन सीढियाँ लाँघते-कूदते उन लड़कों के पास पहुँचकर दहाड़ा-"अबे! कौन कह रहा था कि शेखचिल्ली का घर है, इस बात को अहमियत देने की जरूरत नहीं?"

शेखचिल्ली का तेवर देखकर लड़के डर गए और उनमें से एक ने उँगली दिखाकर दूसरे लड़के की तरफ इशारा कर दिया और शेखचिल्ली का एक घूँसा उस लड़के के जबड़े पर पड़ा-"तो तू है मेरे घर को भगवान का घर बताने वाला! तो ले, मेरे घूंसे को भगवान का घूँसा समझ !” इतना कहते हुए शेखचिल्ली ने दूसरा घूँसा भी जड़ दिया।

घूँसा खाकर उस लड़के ने तुरन्त माफी माँग ली। कहा- "भूल हो गई, माफ करो, अब मैं ऐसा नहीं बोलूँगा। बोलना होगा तो कहूंगा, भगवान का घर भी शेखचिल्ली का घर है।"

शेखचिल्ली शान से फिर अपनी छत पर आकर टहलने लगा।


https://archive.org/details/shekhchillikianokhiduniyahindi


https://archive.org/details/mullanaseeruddinkianokhiduniya/page/n162/mode/1up


https://archive.org/details/tenaliramkianokhiduniyahindi/page/n5/mode/1up

मुल्ला नसरुद्दीन

 मुल्ला नसरुद्दीन बहुत ही हाजिर जवाब और चतुर व्यक्ति था।  बेचारा अपनी बीवियों के सामने लाचार हो जाता था। मुल्ला नसरुद्दीन की दो बीवियां थीं। दोनों अक्सर मुल्ला नसरुद्दीन से पूछती थी कि तुम दोनों में से किसे ज्यादा प्यार करते हो। मुल्ला जी बेचारे कुछ भी जवाब नहीं दे पाता था।

एक दिन मुल्ला जी को तरकीब सूझी। उन्होंने अपनी दोनों बीवियों को एक-एक नीला मोती दिया और कहा कि किसी को मत बताना कि ये मोती मैंने तुम्हें दिया है।

 मुल्ला नसरुद्दीन की दोनों बीवियां मोती देखकर खुश हो गईं।अब जब भी मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी पूछती कि आप किसे ज्यादा प्यार करते हो, तो मुल्ला जी कहता, मैं तो नीले मोती वाली को  ज्यादा प्यार करता हूं । दोनों बीवियां मन ही मन खुश हो जातीं और मुल्ला जी भी अपनी चतुराई पर खूब इठलाता था।

कहानी की सीख

चतुराई और समझदारी से मुश्किल से मुश्किल समस्या का हल भी आसानी से निकाला जा सकता है।


https://www.momjunction.com/hindi/kahaniya/mulla-nasruddin-ki-do-biwiyan/

सोमवार, 24 जुलाई 2023

 क्या आपको पता है, जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से बांधा जाता है| हाथी का बच्चा छोटा एंव कमजोर होने के कारण उस रस्सी को तोड़कर भाग नहीं सकता| लेकिन जब वही हाथी का बच्चा बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो भी उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से ही बाँधा जाता है,

 जिसे वह आसानी से तोड़ सकता है लेकिन वह उस रस्सी को तोड़ता नहीं है और बंधा रहता है| ऐसा क्यों होता है?

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो वह बार-बार रस्सी को छुड़ाकर भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह कमजोर होने के कारण उस पतली रस्सी को तोड़ नहीं सकता और आखिरकर यह मान लेता है कि वह कभी भी उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता| हाथी का बच्चा बड़ा हो जाने पर भी यही समझता है कि वह उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता और वह कोशिश ही नहीं करता| इस प्रकार वह अपनी गलत मान्यता अथवा गलत धारणा  के कारण एक छोटी सी रस्सी से बंधा रहता है जबकि वह दुनिया के सबसे ताकतवर जानवरों में से एक है|

रविवार, 23 जुलाई 2023

 1. केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्व है, जो कहीं भी, किसी भी अवस्था में और किसी भी काल में, मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता। 

2. धरती पर जिस प्रकार मौसम में बदलाव आता है, उसी प्रकार जीवन में भी सुख-दुख आता जाता रहता है। 

3. युद्ध हो या जीवन सफलता केवल तीन शस्त्रों से प्राप्त होती है धर्म, धैर्य और साहस। 

4. कोई भी मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि अपने कर्मो से महान बनता है। 

5. कुछ पाना है तो खुद पर भरोसा कीजिये, क्योकि सहारे कितने भी सच्चे और अच्छे हो साथ छोड़ ही जाते है। 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...