बुधवार, 6 जुलाई 2022

राक्षसेन्द्र रावण

रावण ने अब अपनी अजेय सामर्थ्य और प्रबल प्रतिभा से लंका का महाराज्य सुदृढ़ किया । मय दानव की पुत्री मन्दोदरी से विवाह करके उसने एक सबल जाति को अपना सम्बंधी बना लिया था । इसके बाद उसने दैत्यपति विरोचन की दौहित्री वज्र ज्वाला से अपने भाई कुम्भकरण का और गन्धर्वों के राजा शैलूष की पुत्री सरमा से विभीषण का विवाह किया। इससे ये दोनो प्रबल और प्रतिष्ठित कुल भी उसके सम्बन्धी बन गए । राक्षस जाति का भलीभांति सगठन कर वह रक्ष संस्कृति का प्रतिष्ठाता हो गया । इस तेजस्वी महापुरुष ने अपने को समुद्र का रक्षक घोषित कर राक्षसेन्द्र की उपाधि धारण की। और अपने बाहुबल से लंका महाराज्य की स्थापना कर ली, जिसके अन्तर्गत यवद्वीप, सुमात्रा, मलाया, कुशद्वीप और मेडागास्टर आदि सात महाद्वीप तथा अन्य अनगिनत छोटे-छोटे द्वीपसमूह भी थे । उसने अपने नाना सुमाली को अपना प्रधान सलाहकार बनाया, तथा प्रवरण, प्रहस्त, महोदर, मारीचि, महापार्श्व, महादंष्ट्र, यज्ञकोष, दूषण, खर, त्रिशरा, दुर्मुख, अतिकाम, देवान्तक, अकम्पन आदि महारथी, रणमत्त, नीतिवन्त, अनुगत उच्च वशीय राक्षसो को अपना मन्त्री, सेनापति, नगरपाल आदि बनाया। ये सब मन्त्री और सेनापति रणनीति और राजनीति के महापण्डित थे। स्वयं रावण भी नीति और वेद का महान् पण्डित था । वह दुर्मद रावण अकेला ही अजेय योद्धा और नीतिविशारद था। अब कुम्भकरण जैसे वीर भाई और ऐसे योग्य मन्त्री और सेनानायको को पाकर उसका बल बहुत बढ़ गया । शीघ्र ही उसे पुत्ररत्न की उपलब्धि हुई । उसका नाम रखा मेघनाद | वह द्वितीया के चन्द्रमा-जैसा बढ़ कर सब शास्त्रों तथा शस्त्रो मे निपुण हो गया। रावण के इस पुत्र में भी पिता का शौर्य और तेज था । इसके अतिरिक्त दूसरी पत्नियों से रावरण को त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, अतिकाम, महोदर, महापार्श्व आदि अनेक और पुत्र भी हुए जो महाकाल के समान दुर्जय योद्धा थे । रावण के रनवास मे अनेक दैत्य, दानव, नाग और यक्ष-वंश की सुन्दरियां थी । रावण ने मेघनाद का विवाह भी दानव की कन्या सुलोचना से किया । इस प्रकार पुत्र, परिजन, आमात्य, बान्धव और राक्षसों से सम्पन्न वह रावण परम ऐश्वर्य और सामर्थ्य का प्रतीक हो गया ।

इस प्रकार स्वर्ण-लंका मे अपना महाराज्य स्थापित करके तथा सम्पूर्ण दक्षिणवर्ती द्वीपसमूहों को अधिकृत करके अब उसका ध्यान भारतवर्ष की ओर गया । लंका भारत ही के चरणों मे थी।

उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड मे ही आर्यों के सूर्य मण्डल और चन्द्रमण्डल नामक दो राजसमूह थे। दोनो मण्डलों को मिलाकर आर्यावर्त कहा जाता था । उन दिनों आर्यों मे यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रृंखला भंग करनेवालो को समाज - बहिष्कृत कर दिया जाता था । दण्डनीय जनो को जाति बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित्त, जेल और जुर्माने के दण्ड भी दिए जाते थे । प्रायः ही ये बहिष्कृत जन दक्षिणारण्य मे निष्काषित कर दिए जाते थे । धीरे-धीरे इन बहिष्कृतजनों की दक्षिण और वहां के द्वीपपुंजों मे दस्यु, महिष, कपि, नाग, पौण्ड्र, द्रविड़, काम्बोज, पारद, खस, पल्लव, चीन, किरात, झल्ल, मल्ल, दरद, शक आदि जातियां सगठित हो गई थीं । प्रारम्भ मे केवल ब्रात्य ही जाति-च्युत किए जाते थे । पर पीछे यह निष्कासन उग्र होता गया । सगर ने अपने पिता के शत्रु शक, यवन, काम्बोज, चौल,केरल, आदि कुटुम्बो को जीतकर उनका समूल नाश करना चाहा पर वशिष्ट के कहने से उन्हें वेद- वहिष्कृत करके दक्षिण के अरण्यों मे निकाल दिया । इसी प्रकार नहुषपुत्र ययाति ने नाराज होकर अपने पुत्र तुर्वसु को सपरिवार जातिभ्रष्ट करके म्लेछो की दक्षिण दिशा में खदेड़ दिया था । विश्वामित्र ने भी अपनी आज्ञा का उल्लंघन करने पर अपने पचास कुटुम्बो को दक्षिणारण्य में निष्कासन दिया था, जिनके वशधर दक्षिण मे आकर आन्ध्र, पुण्ड्र, शवर, पुलिन्द आदि जातियों में परिवर्तित हो गए थे ।

इस काल मे लोभी, धोखेबाज, ठग, व्यापारी वणिक को परिणक कहते थे । इसका अर्थ 'परमलोभी' है। ऐसे लोभी परिणकों को भी आर्यलोग बहिष्कृत करके दक्षिण में निष्कासित करते थे । दक्षिण मे आकर भी ये लोग पण्यकर्म करने लगे- माल खरीदने बेचने का व्यापार करने लगे। आगे चलकर इनकी एक जाति 'पाण्य' ही बन गई, और जिस प्रदेश मे ये बसे वह प्रदेश भी 'पाण्यन्य' के नाम से विख्यात हुआ ।

ऐसे ही निष्कासित चोरों की एक शाखा दक्षिण में आकर 'चोल' जाति और प्रान्त मे परिगत हो गई। पणियों ने सागवान के जहाज बनाकर समुद्र के द्वीपपु जो मे दूर-दूर तक जाकर व्यापार विनिमय आरम्भ कर दिया। उनमे से बहुत से परिणक मध्यसागर के किनारे बस्तियां वसा कर बस गए। आगे समुद्र के उस पार जाकर इन्हीं 'परिणयो' और 'चोलों' ने उन देशो को आबाद किया, जिन्हें आज हम 'फिनीशिया' और 'चाल्डिया' कह कर पुकारते है । इस समय कोल और द्रविड़ो से लेकर लंका, मैडागास्टर, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया तक जितनी 'इथिओपिक' उप जातियां हैं, वे सब इन्हीं बहिष्कृत आर्यों की परंपरा में है, तथा उन सबका एक ही वंश और संस्कृति है । इनमे बहुत सी तो भारत में दक्षिण में बस गई थीं, और बहुत सी अन्य द्वीपसमूहों तक फैल गई थीं, जिनके उत्तराधिकारी आज समस्त एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और योरोप के देशो मे मिलते हैं । रावण के शरीर में शुद्ध आर्य और दैत्य वंश का रक्त था । उसका पिता पौलस्त्य विश्रवा आर्य ऋषि था, और माता दैत्य राजपुत्री थी । उसका पालन-पोषण आर्य विश्रवा के आश्रम मे उसी के तत्वावधान में हुआ । उसकी शिक्षा-दीक्षा भी उसके पिता ने अपने अनुरूप ही दी थी। उस समय वेद का जो स्वरूप था, उसे उसने अपने बाल्यकाल में अपने पिता से पढ़ लिया था । उस काल तक वेद ही आर्यों का एकमात्र साहित्य और कर्म वचन था जो केवल मौखिक था - लेखबद्ध न था । रावण के मातृपक्ष मे दैत्य-संस्कृति थी । दैत्य और असुर, देवो तथा आर्यो के भाई बन्द ही थे। परन्तु रहन सहन, विचार-व्यवहार मे दोनो मे बहुत अंतर था। विशेषकर बहिष्कृत जातियां आर्यो से द्वेष और घृणा करती थीं । बहिष्कार का सबसे कटु रूप ऋषियो-पुरोहितों द्वारा संसर - क्रिया से उन्हें वचित रखना, तथा यज्ञो से बहिष्कृत समझना था । यद्यपि अभी यज्ञो का भी वह विराट् रूप न बना था जो आगे बना । फिर भी यह एक ऐसी अपमानजनक बात थी जिसने इन जातियो मे आर्यों के विरुद्ध दैत्यों और असुरो से भी अधिक - जो आर्यो के दायाद बान्धव थे - विद्वेष और विरोध की ज्वाला सुगला दी थी ।

रावण के मन मे तीन तत्व काम कर रहे थे । उसका पिता शुद्ध आर्य और विद्वान वैदिक ऋषि था, उसकी माता शुद्ध दैत्य वंश की थी, उसके बन्धुबान्धव बहिष्कृत आर्यवंशी थे । उन्हें क्रियाकर्म तथा यज्ञ च्युत कर दिया गया था। अब उसने भारत और भारतीय आर्यों को दलित करने, उनपर आधिपत्य स्थापित करने, और सब आर्य-अनार्य जातियो के समूचे नृवश को एक ही रक्ष संस्कृति के आधीन समान भाव से दीक्षित करने का विचार किया । तत्कालीन परम्पराओ के अनुसार उसने नृवंश के सब धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व अपने हाथ मे लेने का संकल्प दृढ़ किया ।

देवों और आर्यों का संगठन उस काल मे अत्युत्तम था । उन्होने लोकपालों, दिग्पालो की स्थापना की थी, जो देवभूमि और आर्य देश के प्रान्त भाग की रक्षा करते थे । देवो की प्रवर जातियों में तब मरुत, दसु और आदित्य ही प्रमुख थे । चोटी के पुरुषो में इन्द्र, यम, रुद्र, वरुण, कुबेर आदि थे । यम, वरुण, कुबेर और इन्द्र चार वंशपरा से लोकपाल थे ।

रावण ने देवो और आर्यों के इस संगठन को जड़-मूल उखाड़ फेकने की योजना बनाई। उसने सांस्कृतिक और राजनैतिक दोनो ही प्रकार के विप्लवो का सूत्रपात किया । उसका मेधावी मस्तिष्क और साहसिक शरीर ही यथेष्ट था, तिस पर उसके साथी सहयोगी, सुमाली, मयप्रवरण, प्रहस्त, महोदर, मारीचि, महापार्श्व, महादष्ट्र, यज्ञकोप, खर, दूपण, त्रिशरा, अतिकाय, अकम्पन आदि महारथी सुभट और विचक्षण मन्त्री थे । कुम्भकर्ण-सा भाई और मेघनाद-सा पुत्र था। रावण की सामरिक शक्ति अव चरम सीमा तक पहुंच गई थी। खूब सलाह- सूत करके और आगापीछा विचार कर उसने रामेश्वर के निकट मंदराचल की समुद्रमन्न पर्वत श्रृंखला के सहारे दक्षिण भारत से संबन्ध स्थापित किया। इस समय दक्षिण भारत मे दो प्रधान दल थे – एक वे जो बहिष्कृत आर्य थे, दूसरे वे - जो विदेशो से आकर भारत समुद्र उपकूलो पर आ बसे थे। ये दल आर्य-अनार्य के नाम से पुकारे जाते थे । रावण ने दोनो को अपने साथ मिला लिया ।

सबसे प्रथम उसने यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र के चारो देवलोको के लोकपालो को और फिर आर्यावर्त को जय करने का संकल्प किया। अब वह खूब चाक-चौबन्द होकर सुअवसर और घात लगने की ताक मे बैठ गया।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री 



मंगलवार, 5 जुलाई 2022

राम भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न

 "भ्राता ! आज शत्रुघ्न को मैंने बहुत पीछे छोड़ दिया।"

 लक्ष्मण ने राम के निकट पहुँचकर घोड़े की रास खींचते हुए उत्साह से सूचना दी। 

“लक्ष्मण ! तुम दोनों की प्रतिद्धन्द्धिता आखिर कब समाप्त होगी?” 

उनके पीछे-पीछे ही आ रहे भरत ने हँसते हुए कहा-

 “अब बालक नहीं रहे तुम दोनों, बड़े हो गये हो, कुछ तो गम्भीरता लाओ अपने व्यवहार में।"

“भ्राता ! गम्भीरता तो सारी प्रभु ने आप दोनों को ही दे डाली, हमारे लिये तो बची ही नहीं है।"

 लक्ष्मण ने पूरा खुलकर ठहाका मार कर घोड़े से उतरते हुए कहा|

"हाँ! गम्भीर रहना राजाओं की विवशता है, हमें क्या?"

 अब तक शुत्रुघ्न भी निकट आ गया था। उसने लक्ष्मण के कथन को आगे बढ़ाते हुए कहा। लक्ष्मण का प्रथम कथन वह संभवत: सुन नहीं पाया था| यदि सुन लिया होता तो बात का रुख लड़ाई की तरफ मुड़ गया होता। दोनों के ठहाके आसमान में तैरने लगे।

राम और भरत ने उनके ठहाकों का उत्तर मन्द मुस्कान से दिया ।

राम की कमर में मात्र अधोवस्त्र था। उत्तरीय एक ओर रखा था। शरीर पसीने से लथपथ था। उनके सामने चिरी हुई लकड़ियों का ढेर लगा था। एक बड़ा लड़ा और रह गया था चीरने को। लक्ष्मण की बात सुनने के लिये वे कुल्हाड़ी जमीन में टिकाकर खड़े हो गये थे। अब उन्होंने फिर कुल्हाड़ी उठा ली| लक्ष्मण ने आगे बढ़ते हुए उनके हाथ से कुल्हाड़ी लेने का प्रयास करते हुए कहा

 “लाइये मुझे दीजिये, आप बहुत कर चुके। "

“नहीं, गुरुदेव ने यह कार्य मुझे सौंपा है। यह मुझे ही करना है।” राम ने दाहिने हाथ में कुल्हाड़ी थामकर बायें हाथ से लक्ष्मण के बढ़े हुए हाथ को रोकते हुए कहा।

“अरे दीजिये भी!"

“नहीं लक्ष्मण! मैं अपनी देह की सुविधा के लिये गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता । "

 “रहने दो लक्ष्मण! क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि राम भइया गुरु, ब्राह्मणों और गुरुजनों की आज्ञा का यथावत पालन करते हैं, उसमें कोई तर्क स्वीकार नहीं करते।" 

भरत ने हँसते हुए कहा।

 “अच्छा भ्राता!” 

शत्रुघ्न कुछ गणित लगाते हुए भरत से संबोधित हुए- 

“अगले कुछ दिनों में हम लोगों का गुरुकुल जीवन समाप्त हो जायेगा।" 

"हाँ, वह तो हैं।"

"सच में आनन्द आ जायेगा, यहाँ तो वर्जनायें ही वर्जनायें हैं।"

"वर्जनाओं की समस्या थोड़े ही हैं तुम्हें, यहाँ परिश्रम करना पड़ता हैं, और तुम ठहरे कामचोर ! देखो भ्राता राम कितनी तन्मयता से अपना काम कर रहे हैं।" 

लक्ष्मण ने शत्रुघ्न की टाँग खींचने का अवसर नहीं छोड़ा।

“कामचोर होंगे आप! कौन सा काम कम करता हूँ आपसे?” शत्रुघ्न तिनक कर बोल पड़ा ।

“तुम करते थोड़े हो, गुरुदेव करवा लेते हैं तुमसे काम। तुम्हारा वश चले तो घोड़े की पीठ से नीचे ही नहीं उतरो; राम भ्राता से सीख तो कुछ "

 "अब उनकी बात मत करो, वे तो साक्षात मर्यादा का मूर्तिमन्त स्वरूप हैं, उनकी समता हम-तुम नहीं कर सकते। "

“चलो इस बात में मैं तुमसे सहमत हो जाता हूँ, भ्राता की कोई समता नहीं हो सकती।”

 “मैं भी सहमत हूँ।” 

इनकी लड़ाई का चुपचाप आनंद ले रहे भरत ने भी अपनी सहमति प्रकट की।राम, बाकी तीनों भाइयों की बातों से निर्लिप्त पूरे मनोयोग से अपना कार्य कर रहे थे। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि उनकी प्रशंसा हो रही हैं या खिंचाई। तभी दूर से आते गुरुदेव के दर्शन हुए। सब शान्त हो गये और गुरुदेव के निकट आने की प्रतीक्षा करने लगे।

गुरुदेव के आते-आते राम ने अपना कार्य सम्पूर्ण कर लिया था। चारों भाइयों ने झुक कर गुरुदेव की चरणधूलि ली।

गुरुदेव सबको आशीर्वाद देते हुए राम से बोले

“वाह! तुमने तो कार्य सम्पूर्ण कर लिया, मुझे आशा नहीं थी कि अभी हुआ होगा। चलो अब तुम विश्राम कर लो, ये तीनों इन लकड़ियों को यथास्थान रख देंगे; क्यों भरत?"

“जी गुरुदेव! अवश्य।"

लक्ष्मण ने कनखियों से शत्रुघ्न की ओर देखा, जो आख-भौंह सिकोड़ रहा था। यदि गुरुदेव सामने नहीं खड़े होते तो उसके लिये यह अच्छा अवसर था शत्रुघ्न की खिंचाई करने का। भरत और शत्रुघ्न ने लकड़ियाँ उठाना आरम्भ कर दिया। राम भी उठाने के लिये झुके तो गुरुदेव ने रोक दिया

“तुम मेरे साथ चलो, विश्राम करो थोड़ा "

जब वही दोनों अकेले रह गये तो गुरुदेव बोले 

"आओ, उधर आमों के झुरमुट में चलते हैं।”

दोनों टहलते हुए पर्याप्त दूर आमों के झुरमुट में निकल आये तो वशिष्ठ ने बात आरंभ की

“अब समय आ गया हैं राम तुम्हें बताने का" 

उन्होंने कुछ रुककर राम के चेहरे की ओर देखा । राम, शान्त भाव से सिर झुकाये उनकी बात सुन रहे थे। 

“तुम्हें ज्ञात ही होगा कि अब तुम लोगों का गुरुकुल जीवन सम्पूर्ण होने को हैं; तुम चारों को जितना कुछ मैं सिखा सकता था, उसमें पारंगत हो चुके हो।"

 गुरुदेव ने राम के बोलने की प्रतीक्षा की किन्तु जब वे नहीं बोले तो गुरुदेव ने प्रश्न किया

 “अपने भावी जीवन के विषय में कुछ परिकल्पना की है तुमने?"

“बस इतना ही चाहता हूँ गुरुदेव कि मेरा जीवन प्राणिमात्र के हित के लिये समर्पित रहे, मुझसे अनजाने भी किसी का अहित न हो।" 

"वह तो तुमसे संभव ही नहीं है; राज्य व्यवस्था के विषय में कुछ सोचते हो? तुम ही तो अयोध्या के भावी सम्राट हो ।”

 “यह तो पिताजी का विषय हैं, मुझे तो जो भी कार्य भार वे सौंप देंगे उसी का पूरे समर्पण के साथ निर्वाह करूँगा और सम्राट बनने के विषय में अभी से सोचना बहुत शीघ्रता होगी, अभी तो सुदीर्घकाल तक पिताजी की छत्रछाया हमारे सिर पर रहने वाली है। " 

वशिष्ठ मुस्कुराये। राम के उत्तर जैसा वे सोच रहे थे वैसे ही थे। राम के व्यक्तित्व का उनका आकलन सर्वथा सही था। यह आगत काल में स्वयं को धरती का सबसे पराक्रमी व्यक्ति सिद्ध करके रहेगा।

“गुरुदेव! आप कुछ और भी कह रहे थे, अनुमति दें तो पूछू।”

 राम के शब्दों ने उन्हें विचारों की वीथियों से बाहर खींचा 

 "निःशंक पूछे वत्स!"

“मुझे क्या बताने का समय आ गया है, अभी आप ऐसा ही कुछ कह रहे थे?"

""अरे हाँ, यही तो मैं तुम्हें बताने यहाँ लाया था, किन्तु ध्यान दूसरी ओर चला गया।"

 फिर वे बोले

 “देखा राम! यह सत्य तुम्हारे पिता को भी नहीं ज्ञात हैं, उन्हें ज्ञात होना भी नहीं चाहिये।” 

“तो कृपया न बतायें गुरुदेव! यदि कभी पिताजी ने पूछ लिया तो मैं उनसे मिथ्याभाषण नहीं कर सकूँगा।"

 “वे कभी नहीं पूछेंगे, इसकी चिंता तुम मत करो।"

“जैसी आज्ञा आपकी! आप बतायें, जो भी आप कहेंगे वह राम की जिव्हा से दुबारा उच्चारित नहीं होगा|"

“देखो! तुम कोई साधारण राजकुमार नहीं हो, तुम्हारा और लक्ष्मण का चयन देवों और ऋषियों ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य के लिये किया है, तुम्हें राज्य का भार सँभालने से पूर्व वह कार्य सम्पादित करना होगा।"

“यह तो अकिंचन राम का सौभाग्य है कि उसे देवों और ऋषियों ने महत्त्वपूर्ण समझा। सत्य तो यह हैं कि यह सब मात्र आपका ही प्रताप हैं; राम तो मात्र मिट्टी था, उसे गढ़ा तो आपने ही हैं... किन्तु वह कार्य क्या है गुरुदेव ?"

“तुम जानते ही हो वत्स कि आज लंकेश्वर के आतंक से समस्त त्रिलोक भयभीत हैं, उसके आतंक से विश्व को तुम्हें ही त्राण दिलाना हैं।" 

"गुरुदेव एक शंका है !"

“कहो।"

वशिष्ठ को इस शंका की पूर्व ही सम्भावना थी।

“गुरुदेव! जहाँ तक मुझे ज्ञान हैं, लंकेश्वर ब्राह्मण हैं, पूज्य कुल से हैं। विद्वान हैं, पराक्रमी हैं,प्रजापालक हैं; देवेन्द्र से तो चरित्र में भी वह अत्यंत श्रेष्ठ है। फिर भी आप उसके आतंक की बात कर रहे हैं? देव अपनी पराजय से खिन्न हो सकते हैं, किन्तु अब त्रिलोक विजय के उपरांत तो रावण शांत है।"

 “मुझे तुमसे इसी प्रश्न की अपेक्षा थी। यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं है, यहाँ प्रश्न संस्कृति का हैं। निस्संदेह रावण, इन्द्र से सभी प्रकार श्रेष्ठ है, किन्तु वह आर्य संस्कृति को नष्ट कर रहा हैं। वह अपनी, अपितु कहना चाहिये अपने मातामह की रक्ष-संस्कृति का प्रसार कर रहा है; यदि वह जीवित रहा तो एक दिन आर्यावर्त से ही आर्य संस्कृति का मूलोच्छेद हो जायेगा "

राम कुछ पल सोचते रहे। उन्हें स्वप्न में भी यह आशा नहीं थी कि उनके सम्मुख ऐसी परिस्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। गुरुदेव, मौन उन्हें निहारते रहे, उनके बोलने की प्रतीक्षा करते रहे। अंततः राम बोले

 “किन्तु गुरुदेव ब्रह्महत्या ? ब्राह्मण तो अवध्य हैं, फिर रक्षेन्द्र जैसा श्रेष्ठ ब्राह्मण... वृत्रासुर के वध के पश्चात स्वयं देवेन्द्र को भी ब्रह्महत्या का पातक झेलना पड़ा था, फिर मैं तो एक साधारण मनुष्य मात्र हूँ, मैं शास्त्र विरुद्ध आचरण कैसे कर सकता हूँ? और करके फिर उसके पातक से कैसे बच सकता हूँ?"

“वह ब्राह्मण तो तभी तक था, जब तक वह आर्य संस्कृति का अनुयायी था। ये चार वर्ण तो आर्य संस्कृति के ही उपादान हैं। जब रावण ने अपनी नयी संस्कृति का सूत्रपात कर दिया, जिसमें वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं, तब उसके ब्राह्मण या अब्राह्मण होने का प्रश्न अपने आप असंगत हो गया। वह अपने आप अपने ब्राह्मणत्व से च्युत हो गया, अब तो वह मात्र रक्ष हैं।"

राम फिर मौन रहे। उनके मस्तिष्क में झंझावात चल रहा था। गुरुदेव के तर्क से वे सहमत नहीं हो पा रहे थे, किन्तु गुरुदेव का विरोध करना भी उनके चरित्र में नहीं था। यही उनके चरित्र की मर्यादा थी| गुरुदेव भी समझते थे कि राम के मस्तिष्क में इस समय क्या चल रहा होगा। उन्होंने भी कोई बाधा नहीं दी। अंततः तो राम को सहमत होना ही था। वह गुरुजनों की आज्ञा को नकार ही नहीं सकता। कुछ समय दोनों वहीं टहलते रहे, फिर अंततः राम बोले

 "गुरुदेव! सम्राट तो पिताजी हैं; कटक भी उन्हीं के अधीन है; वे क्या इस युद्ध के लिये प्रस्तुत होंगे? मुझे तो प्रतीत होता है नहीं होंगे।"

“यह युद्ध दशरथ को नहीं, राम को करना है; लक्ष्मण ही सहयोगी होगा तुम्हारा | सम्राट दशरथ क्या, किसी भी आर्य सम्राट और उनकी सेना की इस अभियान में कोई भूमिका नहीं होगी।"

 "यह कैसे संभव हैं गुरुदेव ?” 

राम आश्चर्य से बोल पड़े- 

"त्रैलोक्य विजयी लंकेश्वर के सामने राम और लक्ष्मण तो भंगुरवत हैं, वह फूँक मार कर उड़ा देगा हमें "

"ऐसा नहीं होगा राम ! तुम अपना सही मूल्यांकन नहीं कर रहे हो, यह कार्य तुम्हारे ही हाथों सम्पादित होना है, यही विधि का विधान हैं।"

“गुरुदेव मैं अपना अनुचित मूल्यांकन नहीं कर रहा, किन्तु लंकेश्वर का भी तो उचित मूल्यांकन करना ही होगा!" 

वशिष्ठ हल्के से हँसे। राम, धीरे-धीरे अभियान के लिये स्वयं को तैयार कर रहा था। फिर बोले 

“इस अभियान पर कल ही नहीं निकलना है तुम्हें, अभी तुम्हें इसके लिये बहुत तैयारी करनी है, तुम्हें और लक्ष्मण दोनों को। देवगण और ऋषिगण अत्यंत दीर्घकाल से, तुम्हारे जन्म के भी पहले से, इस हेतु कार्यरत हैं; तुम्हारा चयन तो इस कार्य के लिये हम सबने ही नहीं नियति ने भी, तुम्हारे जन्म से भी पूर्व ही कर लिया था, मात्र लक्ष्मण को तुम्हारे सहयोगी के रूप में मैंने बाद में जोड़ा हैं। " 

“यह क्या कह रहे हैं गुरुदेव, देवगण व ऋषिगण इस प्रयोजन को मूर्त रूप देने के लिये....?"

“वह सब तुम्हें समय-समय पर ज्ञात होता रहेगा, बस इतना समझ लो कि अब मेरा दायित्व पूर्ण हो गया है। "

“पर अभी तो आप कह रहे थे कि मुझे अभी बहुत तैयारी करनी है।”

 “मैं जितना कुछ दे सकता था, वह मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया है, और मुझे प्रसन्नता है कि तुमने भी सब कुछ सम्पूर्ण मनोयाग से ग्रहण किया है; शेष दायित्व अब ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का है। वे तुम दोनों को अपने साथ ले जाने हेतु सिद्धाश्रम से प्रस्थान कर चुके हैं।"

 "ओह! धन्य हो जायेगा राम यह सौभाग्य पाकर "

“अभी तुम कुछ काल के लिये उनके साथ जाओगे; अभी उनके साथ तुम... जैसे प्रायोगिक शिक्षा के लिये आखेट पर जाते हो उसी प्रकार कुछ राक्षसों के आखेट के लिये जाओगे। तत्पश्चात तुम्हारा मुख्य अभियान कब और किस भाँति आरंभ होगा यह तुम्हें समय आने पर ज्ञात होगा।"

"जी गुरुदेव!"

 “पुनः स्मरण करा दूँ कि तुम्हारे वनगमन का वास्तविक प्रयोजन पूर्णतः गुप्त ही रहना चाहिये; किसी भी अतिरिक्त व्यक्ति को इसकी भनक तक नहीं लगनी चाहिये।"

 “पिताजी को भी नहीं ?"

" उन्हें तो कदापि नहीं, अन्यथा वे किसी भी स्थिति में इसके लिये स्वीकृति नहीं देंगे ।”

 “जैसी आज्ञा गुरुदेव!"

"याद रखो, तुम्हें सम्पूर्ण भारत भूमि पर सप्तम विष्णु के रूप में प्रतिष्ठित होना है।" 

राम ने झटके से अपना सिर ऊपर उठाया परंतु बोले कुछ नहीं। वशिष्ठ ने भी इसे लक्ष्य किया, पर बोले वे भी कुछ नहीं, बस धीरे से मुस्कुरा दिये।

सुलभ अग्निहोत्री





सोमवार, 4 जुलाई 2022

नारद जनक का सीता के लिए चिंतन

 जनक ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, उर्मिला आकर उनकी बाँहों में झूल गयी - 

“आज आप कुछ शीघ्र आ गये पिता!”

 “अरे-अरे ! गिरा देगी क्या?”

 जनक हँसते हुए बोलें। उसके इस प्रकार झूल जाने से वे कुछ लड़खड़ा गये थे । 

“अब तू बड़ी हो गयी है।”

“वाह! यह भी कोई बात हुई; कभी कहते हैं छोटी हैं, कभी कहते हैं बड़ी हो गयी । ” 

उर्मिला ने लड़ियाते हुए कहा और हँसने लगी ।

“अत्यंत ढीठ हो गयी है तू!"

“पिता के साथ ढिठाई नहीं करूँगी तो किसके साथ करूंगी?” उर्मिला उसी भाँति बोली। अब तक ये लोग कक्ष में आ गये थे। उर्मिला, पिता को हाथ पकड़कर पर्यंक पर बिठाती हुई बोली- “अच्छा आप विश्राम कीजिये, मैं अभी आपके लिये मधु-दुग्ध लेकर आती हूँ।”

पिता को बैठाकर उर्मिला दूध लेने के लिये कक्ष से बाहर की ओर बढ़ने की सोच ही रही थी, तभी सीता का स्वर उभरा

 “तू रहने दे, मैं लेकर आ रही हूँ। "

सीता का स्वर सुनकर उर्मिला पिता के पास ही पर्यक पर बैठ गयी। कुछ ही देर में सीता, दुग्ध-पात्र लिये कक्ष में प्रविष्ट हुई। उससे दूध का पात्र लेते हुए जनक बोले

“पुत्री हो तो ऐसी!”

 फिर वे उर्मिला की ओर घूमते हुए बोले

“क्या कह रही थी तू... आज आप शीघ्र आ गये... तुझे अच्छा नहीं लगा हो तो वापस चला जाऊँ!”

 कहते-कहते वे हँस पड़े ।

 “क्या पिता, मेरा उपहास कर रहे हैं!”

 “अच्छा तुम्हारी माता कहाँ हैं? उनके दर्शन नहीं हुए अभी ।" जनक ने विषय परिवर्तन करते हुए कहा।

“भोजन का प्रबन्ध कर रही हैं।"

“अरे! स्वयं ?”

“इसमें आश्चर्य क्या है, वे तो बहुधा करती हैं।”

 “तो जाकर अपनी माता से कह दे कि कुछ ही काल में देवर्षि आ रहे होंगे, स्वल्पाहार मैं उनके साथ ही करूँगा।"

उर्मिला, माता तक सूचना पहुँचाने चली गयी ।

“पिता! एक प्रश्न हैं?"

“पूछ ना” 

जनक ने पर्यंक पर पालथी मारकर बैठते हुए कहा। अपना उत्तरीय उन्होंने सिकोड़कर गले में डाल लिया।

“मिथिला में इधर कुछ दस्युकर्म की घटनायें सुनने में आ रही हैं ।” “सत्य कह रही है तू, आज सभा में भी यह प्रश्न उठा था; मैंने रक्षकों को और अधिक सजग रहने की चेतावनी भी दे दी है।"

"कितना सजग रहेंगे वे ? मिथिला के पास रक्षकदल है ही कितना?"

“शान्तिप्रिय मिथिला को कभी अधिक रक्षकदल की आवश्यकता ही नहीं पड़ी; यहाँ पूर्व में कभी इस प्रकार की घटनाएँ नहीं हुई। " “इसीलिये तो मिथिला के रक्षकदल में आलस्य घर कर गया है, इसे चैतन्य करने की आवश्यकता हैं। "

“प्रमुख, प्रयास तो कर रहे हैं इस हेतु । ”

 "वे कुछ नहीं कर पायेंगे पिता "

 सीता ने दो टूक कहा।

“क्या कह रही हैं तू? प्रमुख पर सीधे-सीधे अक्षमता का आरोप लगा रही है?” 

सीता के मुख से ऐसी दो टूक बात सुनकर जनक अवाक रह गये थे। 

“मैं प्रमुख पर आरोप नहीं लगा रही पिता, वे अत्यंत योग्य पुरुष हैं, किन्तु आपने उन्हें जो कार्यभार सौंपा है, वह उनकी प्रवृत्ति के विपरीत है, यही कारण है कि मुझे लगता है कि वे सफल नहीं हो पायेंगे। इन दस्युओं का सिर उठाते ही दमन कर देना आवश्यक है, अन्यथा इनका साहस बढ़ता जायेगा, इन्हें देखकर अन्य व्यक्ति भी इस प्रकार के कर्म में प्रवृत्त हो सकते हैं।” 

“क्या कहना चाहती हैं तू, खुलकर कहा "

 जनक ने राजकीय व्यवस्था के विषय में पुत्री के इस प्रकार हस्तक्षेप पर डाँटकर उसे चुप नहीं कराया |

“देखिये पिता ! मिथिला में प्रायः प्रत्येक पद पर आपके समान सतोगुणी व्यक्ति आसीन हैं, करुणा और दया उनका स्थाई गुण हैं, वे सबको अपने समान ही साधु प्रकृति का समझकर व्यवहार करते हैं। सुरक्षा, चाहे वह आन्तरिक हो अथवा वाह्य, उसके लिये सतोगुण नहीं, रजोगुण की आवश्यकता होती है, क्षात्रदर्प की आवश्यकता होती है। दस्यु, दमन की भाषा समझते हैं, स्नेह की नहीं। उनके साथ उसी भाषा में वार्ता करना उचित हैं, जिसे वे समझते हैं।”

“पुत्री ! यह मिथिला की नीति नहीं है; मिथिला की सम्पूर्ण व्यवस्था शांति, सद्भाव और सहयोग पर आधारित है। मिथिला चाहता है कि व्यक्ति स्वेच्छा से सदाचारी बने, भय से नहीं... और तू जानती ही है, कि अभी तक मिथिला की यह नीति सफल रही हैं, भविष्य में भी होगी... ये जो भटके हुए कुछ व्यक्ति हैं, ये भी हमारे प्रयासों से दस्युकर्म त्यागकर अवश्य ही अपनी भूल पर पश्चाताप करेंगे।”

“मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता पिता; सहजवृत्ति प्रत्येक व्यक्ति को आकर्षित करती है। यदि सहजता से अधिक उपार्जन हो रहा है, तो व्यक्ति कदापि परिश्रम नहीं करना चाहता। संतोष आपका गुण है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति का तो नहीं हो सकता। अधिकांश व्यक्ति सदैव अपने प्राप्ति से असंतुष्ट रहते हैं, उन्हें अपने श्रम के बदले अधिक की आकांक्षा रहती है। "

“यह तो अनुचित है पुत्री; इस भावना को प्रश्रय कदापि नहीं दिया जा सकता।” 

“निस्संदेह अनुचित है, किन्तु यही सामान्य व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति होती है, इसे भय के द्वारा ..... ""

 तभी नारायण-नारायण की ध्वनि सुनकर वार्ता का क्रम भंग हो गया । नारद का पदार्पण हो गया था। उनके पीछे-पीछे उर्मिला आ रही थी। जनक और सीता दोनों ने उठकर देवर्षि का अभिवादन किया, और उन्हें आसन प्रदान किया।

“उर्मिला! माता को सूचना कर दी ?"

“जी, अभी करके आती हूँ।”

“देवर्षि! आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था मैं, देवराज सानन्द तो हैं?"

“देवराज सानन्द कैसे हो सकते हैं!”

“क्यों भला?”

“जिसे किसी भी पल रावण के आक्रमण का भय हो, वह आनन्द से कैसे हो सकता है?”

 “सत्य हैं देवर्षि!"

“देवेन्द्र की बात छोड़िये विदेहराज, उनके साथ तो यह सदैव ही लगा रहता है, और रहेगा; उनकी चिंता में हम कब तक घुलेंगे? आप अपनी बताइये ! प्रतीत होता है अभी कुछ गम्भीर वार्ता चल रही थी पुत्री के साथ ?”

""चल तो रही थी देवर्षि! सीता कह रही थी कि दस्युओं का दमन आवश्यक हैं; वे स्नेह की भाषा नहीं समझ सकते, इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि ये कुछ भटके हुए व्यक्ति हैं, हम यदि निष्ठा     से प्रयास करें तो ये भी अपनी भूल का अनुभव करेंगे, और उसपर पश्चाताप करेंगे । ” 

“पुत्री! तेरे पिता संत हैं, संत पुरुषार्थ के मार्ग का अनुसरण नहीं करता वह तो प्रेम के मार्ग पर ही चलता है। पुरुषार्थ का मूल तो महत्वाकांक्षा होती है, और संत सर्वप्रथम इस महत्त्वाकांक्षा का ही त्याग करता है।" 

नारद अपने चिर-परिचित हास्य के साथ बोले ।

सीता भी मुस्कुरा दी। देवर्षि ने कितनी सहजता से बात स्पष्ट कर दी थी।

 “किन्तु विदेहराज ! राजा को दण्डधारी कहा गया है; उसकी प्रजा का अहित करने वाले को दण्डित करना उसका बाध्यकारी कर्तव्य है; लोभ और भय के बिना प्रीति नहीं होती। स्वर्ग और नर्क की अवधारणा ही मात्र इसलिये की गयीं, कि व्यक्ति सद्कर्म में प्रवृत्त हो। कोई भी व्यक्ति में अपने मनोनुकूल आचरण करने हेतु स्वतंत्र है, परंतु उसकी यह स्वतंत्रता वहीं तक सीमित है, जब तक उसके आचरण से किसी अन्य व्यक्ति के हित प्रभावित नहीं होते। जो भी व्यक्ति किसी दूसरे का अहित करता है, वह राजा द्वारा दण्डनीय हैं; आप यदि इससे विरत होते हैं, तो आप स्वयं भी दण्ड के भागी होते हैं, क्योंकि आपकी प्रजा के किसी भी व्यक्ति के हितों में अनधिकार हस्तक्षेप करने वाले किसी भी व्यक्ति को नियंत्रित करना आपका प्रथम दायित्व है... दंड के पात्र को दण्डित करना राजा की इच्छा पर निर्भर नहीं हैं, राजा इसके लिये बाध्य हैं; इस प्रकार इस विषय में आपकी पुत्री का परामर्श उचित है, आपको उसका सम्मान करना चाहिये।""

 “देवर्षि! मैं आपके कथन का सम्मान करता हूँ, तथापि मेरा मत हैं कि यदि व्यक्ति को प्रेम के द्वारा सही मार्ग पर लाया जा सके, तो वही सर्वश्रेष्ठ उपाय हैं; दण्ड तो अन्तिम उपाय होना चाहिये।”

“विदेहराज ! राजा के और संत के.... दोनों के कर्तव्य पृथक होते हैं; जब तक आप राजदण्ड के स्वामी हैं, आप उसके अनुसार कर्तव्य करने को बाध्य हैं। सतोगुण तीनों गुणों में सर्वश्रेष्ठ हैं, परंतु राजा का आभूषण रजोगुण ही है, इसीलिये तो वह रजोगुण कहा गया है। जब आप राजदण्ड किसी सक्षम उत्तराधिकारी को सौंप देंगे तब... तब आपके लिये वह उपाय अनुकरणीय होगा, जो अभी आप अपनाना चाह रहे हैं। ”

इसी बीच महारानी सुनयना और उर्मिला ने कक्ष में प्रवेश किया। दो दासियाँ स्वल्पाहार के पात्र लिये उनका अनुसरण कर रही थीं। प्रवेश करने के साथ ही सुनयना ने देवर्षि का अभिवादन किया। दासियाँ, यथास्थान सारे पात्र रखकर और देवर्षि को प्रणाम निवेदन कर चली गयीं। रानी और उर्मिला ने भी आसन ग्रहण किये।

“महारानी ! सानन्द तो हैं?"

“जी देवर्षि! अनुकम्पा हैं आपकी । ”

“महारानी, आपकी कन्यायें अत्यंत विदुषी हैं, सीता तो अन्यतम है। "

 “सौभाग्य है हमारा देवर्षि!”

“अत्यंत भाग्यशाली होगा वह पुरुष, जो सीता का वरण करेगा। "

अपने विवाह की चर्चा आरम्भ होते ही सीता ने अनुमति माँगी - “हम लोग चलें पिताश्री?”

जनक ने हँसते हुए अनुमति में सिर हिला दिया। सीता, उर्मिला का हाथ पकड़कर उसे भी अपने साथ खींच ले गयी |

“कुछ चिंतन किया नहीं आप लोगों ने अभी इस विषय में?” सीता के जाते ही नारद ने प्रश्न किया।

“ मैं तो इन्हें नित्य ही स्मरण दिलाती हूँ, किन्तु ये पता नहीं क्या सोच रहे हैं!”

महारानी ने पति को उलाहना सा देते हुए कहा।

 “देवर्षि! मैं भी इस विषय में विन्तन किया करता हूँ, परंतु सीता के अनुरूप वर मिलना भी क्या सहज हैं?" 

“अरे विदेहराज! समस्त आर्यावर्त के राजकुलों में क्या कुमारों का अकाल पड़ गया है, जो आप ऐसा कह रहे हैं?"

“कुमारों का अकाल तो नहीं पड़ गया, किन्तु योग्य कुमारों का निस्संदेह अकाल ही है... दंभ, ईर्ष्या, मिथ्याचार, अनाचार, पौरुष के नाम पर परपीड़न... कौन सा अवगुण नहीं हैं आर्य कुमारों में। आर्य कुमारों में ही क्यों, सभी राजवंशों में यही होता है; शक्ति और सता के साथ ही ..... महाराज ने हताशा में अपनी बात अधूरी छोड़ दी |

“विदेहराज ! इस भूलोक में दो कुमार हैं, जो सीता के योग्य वर हो सकते हैं।” 

“कौन देवर्षि?”

 जनक और सुनयना दोनों ने एक साथ उत्सुकता से प्रश्न किया ।

“प्रथम तो है दशरथ पुत्र राम ... समस्त गुणों से युक्त हैं।”

 “सत्य हैं, मैंने भी ख्याति सुनी है उसके गुणों की, और दूसरा ?”

“दूसरा है रावण पुत्र मेघनाद... किन्तु उससे सीता का विवाह हो नहीं सकता "

“कारण देवर्षि?”

“आर्य संस्कारों में पली कन्या का रक्ष-संस्कृति में निर्वाह अत्यंत कठिन है।"

 “आपका कथन सत्य है। ... तो अब बचा मात्र राम; किन्तु क्या दशरथ इस संबंध के लिये सम्मति देंगे? मुझे तो शंका है देवर्षि!”

“मुझे भी है। इक्ष्वाकुवंश में विवाह की दो ही परम्परायें प्रचलित रही हैं; एक तो शक्ति के द्वारा, दूसरी कुल-गोत्र के द्वारा। राम का चरित्र दशरथ के विपरीत है, वह प्रथम परम्परा का अनुकरण कदापि नहीं करेगा..."

“दूसरी परम्परा का अनुसरण करने पर दशरथ कदापि सम्मति नहीं देंगे।” 

जनक ने नारद का वाक्य पूरा किया।

“निरसंदेह !”

“तब क्या निष्कर्ष निकला?"

"निष्कर्ष भी निकलेगा, हताश क्यों होते हैं विदेहराज? यदि नारद ने यह सम्बन्ध निश्चित कर लिया है तो निष्कर्ष को निकलना ही पड़ेगा।"

 नारद के स्वर में अपूर्व दृढ़ता थी, किन्तु अधरों पर अब भी वही मोहिनी स्मित नृत्य कर रही थी ।

“किस भाँति देवर्षि?”

“आप सीता को वीर्यशुल्का ; जिससे विवाह हेतु पराक्रम की कोई विशेष शर्त निर्धारित हो घोषित कर दीजिये | "

“और उसके लिये पराक्रम क्या निर्धारित किया जाये?”

“आपके पास शिव का वह अद्भुत धनुष धरोहर के रूप में रखा हुआ है, जिससे उन्होंने दक्ष यज्ञ का विध्वंस किया था।""

“उसी धनुष को उठाकर उस पर शरसंधान का शुल्क निर्धारित कर दीजिये।”

 “तब तो मेरी कन्या कुमारी ही रह जायेगी; उस धनुष का संधान भला कौन कर पायेगा ?” 

“नहीं रह जायेगी... शिव के अतिरिक्त चार व्यक्ति हैं, जो उस धनुष पर शरसंधान कर सकते हैं।”

 “कौन-कौन? "

“विश्वामित्र, शुक्राचार्य, रावण और परशुराम।"

“ तो देवर्षि! इनमें से किसे आप मेरी सीता देना चाहते हैं?”

 जनक व्यंग्यपूर्वक बोल पड़े-

 “आप तो राम का उल्लेख कर रहे थे?" 

“राम को यह ज्ञान विश्वामित्र देंगे न !"

"क्या राम यह कर लेगा?"

 जनक को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था।

 “देवहित और लोकहित का कोई भी कार्य राम के लिये असंभव नहीं हैं विदेहराज |""

सुलभ अग्निहोत्री 



चन्द्रनखा ‌(शूर्पणखा)

 अपनी मनःस्थिति को चन्द्रनखा स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी। अपने भाई से उसे अगाध स्नेह था, उस पर उसे सदैव गर्व रहा था; आज भी था... किन्तु विद्युत की मृत्यु के उपरांत अब उससे उसे उतनी ही घृणा भी थी । न चाहते हुए भी उसे वही कार्य करने की इच्छा होती थी, जिन्हें रावण अच्छा नहीं समझता था।

दण्डकारण्य, सम्पूर्णतः वन्य प्रांत था। बड़ी दूर-दूर पर स्थित छोटे-छोटे ग्रामों को छोड़कर सम्पूर्ण प्रदेश जनशून्य था| ये जो छोटे-छोटे ग्राम थे भी, इनमें चन्द्रनखा को कोई रुचि नहीं थी। कभी कभी उसे पश्चाताप भी होता था कि क्यों उसने भाई का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था ? यहाँ उससे बात करने को कोई भी नहीं था। खर और दूषण से कितनी बात करती? और उनसे अधिक बात करने की आवश्यकता भी क्या थी? होंगे उसके मौसेरे भाई, किन्तु अब तो वे उसके अनुचर थे। एकांत में उसे बहुधा विद्युत की यादें घेर लेती थीं, और भाई के प्रति उसका आक्रोश और बढ़ जाता था। अच्छा होता यदि उसने विद्युत का प्रस्ताव मान लिया होता, वह भी भाग गयी होती उसके साथ, जैसा कुम्भी ने किया... तब वह भी विद्युत के साथ चिरकाल तक रमण करती । कितना आनन्द होता। विद्युत का राज्य छोटा सा था तो क्या हुआ, प्रेम महत्त्वपूर्ण होता है। प्रेमास्पद साथ हो तो विपन्नता में भी सुखपूर्वक रहा जा सकता है। यूँ ही एक दिन जब वह एकाकी पड़ी पड़ी ऊब गयी तो सोचने लगी क्या करे? किसके साथ अपनी व्यथा बाँटे ? लंका में होती तो भाभियों के साथ ही मन बहला लेती... कितनी अच्छी हैं उसकी तीनों की तीनों भाभियाँ! कितना प्यार करती हैं उससे । यहाँ असंख्य दासियाँ हैं, किन्तु दासियों के साथ क्या व्यथा बाँटी जा सकती हैं? उनके सम्मुख क्या अपना मन खोला जा सकता है?

“सुकीर्ति!” अचानक उसने एक दासी को पुकारा ।

“जी महारानी जी!” दौड़ते हुए दासी ने प्रवेश किया। दासी, हाथ जोड़े खड़ी थी और चन्द्रनखा उसे ताक रही थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे क्यों पुकारा था। उसने उसे अकारण बुरी तरह डाँटकर भगा दिया। जब वह जाने लगी तो पुनः बुलाया और पूछा

 "तेरा पति है?"

“जी महारानी!”

“क्या करता है?"

 “कुछ नहीं, महापान किए पड़ा रहता है। "

“तू लड़ती नहीं उससे ?"

“खूब लड़ती हूँ, किन्तु तब वह मुझे बुरी तरह पीटता है।"

 “और तू पिट लेती है?” 

“वह पति है मेरा महारानी । "

“तू छोड़ क्यों नहीं देती उसे?"

 “कैसे छोड़ दूँ? पति हैं मेरा वह "

“तू प्रेम करती है उससे ?”

"जी!"

“पीटता है तब भी प्रेम करती है?”

 वह मौन रही, तो चन्द्रनखा ने पुनः कुछ तीव्र स्वर में कहा

“उत्तर क्यों नहीं देती ?"

“वह भी तो करता हैं।”

“जा भाग जा।"

दासी चली गयी, किन्तु चन्द्रनखा के मन को एक नया प्रश्न दे गयी... यदि विद्युत उसे पीटता तो वह क्या करती ? अचानक उसका मन करने लगा कि विद्युत आये और उसे खूब पीटे । किन्तु विद्युत कैसे आ सकता था? उसे तो भाई ने ... उसके मन में पुन: रावण के प्रति घृणा का ज्वार उबलने लगा। उसके मन में रावण से प्रतिशोध लेने की इच्छा तीव्र होने लगी ।

किन्तु वह तो अपने भाई से बहुत-बहुत प्यार करती थी। भाई भी तो उससे कितना स्नेह करता था| उसका मन किया कि वह अभी जाये और भाई से खूब लड़े, जी भर के खरी-खोटी सुनाये उसे।संभवतः इसी से उसका गुबार निकल जाये, उसे कुछ शांति मिले। किन्तु ऐसे जा भी कैसे सकती थी ।यही सब सोचते-सोचते उसके सिर में तीव्र पीड़ा होने लगी ।उसने पुनः पुकारा

 “सुकीर्ति !”

दासी पुनः उपस्थित हुई।

"जा, वैद्य से शिरोपीड़ा की औषधि ले आ " 

“जी महारानी !”

“अथवा ऐसा कर, उन्हें बुला ही ला । "

वैद्य भी त्रस्त था महारानी की अबूझ व्याधियों से। उसकी किसी औषधि से महारानी को लाभ नहीं होता था। होता भी कैसे ? उसके पास शारीरिक व्याधियों का उपचार था, मानसिक व्याधियों का नहीं। वह चन्द्रनखा की वास्तविक पीड़ा समझ रहा था, किन्तु उनकी ऐसी मनःस्थिति में उनसे कुछ कहने का साहस उसमें नहीं था। वह कोई ऐसी राह खोज रहा था जिससे यह सत्य सम्राट् तक पहुँचा सके। उसकी स्वयं की न तो सम्राट तक पहुँच थी और न ही उनसे यह सब कहने का साहस।

ऐसे ही दिन व्यतीत हो रहे थे।

ऐसे ही में एक दिन चन्द्रनखा को रावण की देवराज पर विजय का समाचार ज्ञात हुआ। मेघनाद के पराक्रम का समाचार ज्ञात हुआ। उसका मन अपूर्व उल्लास से भर गया । उसने प्रसन्नता में दासियों को ढेर सारे उपहार बाँट डाले। वह पूरे मन से लंका जाने की तैयारी करने लगी । वह बड़े उत्साह से आई थी लंका, किन्तु लंका में आकर उसका मन खिन्न हो गया था। ऐसा नहीं कि किसी ने उसका अपमान करने की चेष्टा की हो... सब उससे वैसे ही मिले थे जैसे पूर्व में मिलते थे, किन्तु उसका मन उदास था। वह चाहती थी कि सबसे हँसकर बोले, ठिठोली करे, किन्तु जैसे ही कोई बोलता था, उसका मन करता था उसका मुँह तोड़ दे। सबको प्रसन्न देखकर उसे चिढ़ सी होने लगती थी।

जब उत्सव में चलने के लिये मन्दोदरी उसे बुलाने आयी, तो उसके साथ चित्रांगदा भी थीं। उसे देखते ही चन्द्रनखा सुलग उठी। बड़े प्रयास से उसने स्वयं को संयत किया। उसका मन किया कि तुलना भी नहीं कर सकी। सारे उत्सव में रावण की जय-जयकार सुनकर वह कुढ़ती रही। उसकी स्थिति देखकर मन्दोदरी भी व्यथित हो उठी थी। उसने निश्चय किया कि शीघ्र ही किसी दिन एकान्त में वह अवश्य रावण से इस विषय में वार्ता करेगी। इसे टालना अनर्थकारी हो सकता है। 

***

उत्सव तक रावण स्वयं इतना व्यस्त था कि वह चन्द्रनखा से भेंट ही नहीं कर पाया। मान से भरी चन्द्रनखा भी उससे मिलने नहीं पहुँची । उत्सव के उपरांत सब एकत्र थे। चन्द्रनखा भी थी। उसे देखते ही रावण उसके पास पहुँचा और स्नेह से उसे छाती से लगा लिया, और उसके बाल सहला सहलाने लगा। चन्द्र भी पिघल गयी। वह भी कसकर भाई से चिपट गयी, जैसे बचपन में किया करती थी।

 “प्रसन्न तो हैं दण्डकारण्य की महारानी ?"

चन्द्रनखा उखड़ गयी

“क्या है प्रसन्नता के लिये वहाँ ? स्वयं तो यहाँ, ऐसे स्वर्ण प्रासाद में सम्पूर्ण वैभवों के मध्य निवास कर रहे हैं, और मुझे वहाँ निर्जन वन में डाल दिया है जहाँ कोई व्यवस्था ही नहीं है । " 

उसके इस व्यवहार से सब चौंक गये। रावण भी एक क्षण को समझ नहीं पाया। फिर उसने चन्द्रनखा का चिबुक पकड़कर उसका सिर उठाया और उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला

“अरे, तो क्रोध क्यों करती है? अभी हुई जाती है समस्त व्यवस्था, तुझे तो ज्ञात ही है कि तुझे दण्डकारण्य सौंपने के उपरांत तेरे भाई को अवकाश ही नहीं मिला।"

 इसके साथ ही वह प्रहस्त से सम्बोधित हुआ- 

"मातुल ! आप स्वयं अपनी देख-रेख में दण्डकारण्य में चन्द्र के लिये समस्त वैभवों की व्यवस्था करवाइये ।”

रावण की आँखों के सम्मोहन में फँसी चन्द्रनखा प्रसन्न हो गयी । रात्रि में मन्दोदरी ने भी रावण से इस विषय में बात की। 

“महारानी, उसे क्रोध करने का अधिकार हैं, रावण उसका अपराधी है।”

“वह मैं समझती हूँ महाराज, किन्तु उसकी इस अवस्था का उपचार आवश्यक है; उसकी ऐसी विक्षिप्तता स्वयं उसके लिये अहितकर है। अब आप अभियानों से निवृत्ति पा चुके हैं, अब सर्वप्रथम चन्द्र के उपचार पर ही ध्यान दीजिये ।”

“वह तो रावण करेगा ही, किन्तु कैसे? यही विचार कर रहा है। उसके अन्तर्मन की गहराइयों में अपने पति के हत्यारे के प्रति घृणा बस गयी है। वह अपने भाई से अत्यंत प्रेम करती है, किन्तु इस समय यह घृणा उसकी चेतना को आवृत्त किये हैं। यह घृणा उसकी मूल प्रवृत्ति बन गयी है, और सम्मोहन से किसी व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। समय और हमारा स्नेह ही उसका उपचार करेगा। फिर भी रावण अपने प्रयासों में कोई न्यूनता नहीं आने देगा” 

“जैसा आप उचित समझें !”

रावण कुछ देर उसके चेहरे पर दृष्टि टिकाये मुस्कुराता रहा, फिर उसे आलिंगन में लेता हुआ बोला

“रावण अपराधी तो आपका भी है।”

मंदोदरी सब कुछ बिसारकर उसके अंक में सिमट गयी। थोड़ी देर वह सब कुछ भूली रही । सघन मेघों से आच्छादित धरती अपनी प्यास बुझाती रही।... पर तभी जैसे अकस्मात उसे कुछ स्मरण हुआ, वह बोली

“महाराज ! चित्रांगदा भी उद्विग्न है। मन्दोदरी का तो यही परिवार है, यहाँ सभी उसके आत्मीय स्वजन हैं, किन्तु उसके स्वजन अभी मात्र आप ही हैं, उसे भी आपके प्रेम की आवश्यकता है, अन्यथा वह स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगेगी । " 

“आप अपने मन से अपना पति किसी अन्य स्त्री को सौंप रही हैं?" रावण ने विस्मित होते हुए कहा

“नहीं, मैं एक नई विपत्ति को टालने का प्रयास कर रही हूँ, मेरे पति का मन तो मात्र मेरा ही हैं, उसे मुझसे कोई नहीं बाँट सकता।"

 वह एक बार फिर रावण के सीने से लग गयी, पर तुरंत ही हटती हुई बोली

“जाइये, इस समय चित्रांगदा को आपकी अधिक आवश्यकता है; विलम्ब मत कीजिये, अन्यथा बहुत विलम्ब हो जायेगा|" 

किन्तु विलम्ब तो हो गया था।

सुलभ अग्निहोत्री 



रविवार, 3 जुलाई 2022

रम्भा से रमण

प्रिय के आगमन का समाचार सुनते ही विरहिणी चित्रांगदा का मन- कमल खिल उठा वह सब कुछ भूलकर जैसी बैठी थी वैसी ही द्वार की ओर भाग ली। वह द्वार पर पहुँची, तब रावण, गन्धर्वराज के साथ प्रवेश कर ही रहा था। वह लोक-लज्जा सब विस्मृत कर वल्लरी की भाँति प्रियतम से लिपट गयी। कुछ काल मान-मनौवल और उपालम्भों का दौर चला, और फिर सब आनन्दमय हो गया।

गन्धर्वराज को सुमाली का संदेश प्राप्त हो गया था। वे प्रयाण हेतु तत्पर थे।

विरह के बाद मिलन में ज्वार अधिक होता है; फिर गन्धर्वलोक में उन्मुक्त विलास में किसी भाँति की मर्यादा की बाधा ही नहीं थी। सैन्य के आगमन की प्रतीक्षा करते रावण के दिन एक बार पुनः चित्रांगदा के मंदिर सान्निध्य में रमण करते व्यतीत होने लगे।

सुमाली और प्रहस्त, गन्धर्वलोक के रमणीय वातावरण का आनन्द ले रहे थे, साथ ही गन्धर्वराज के साथ रणनीति पर भी मन्थन कर रहे थे। फिर एक दिन लंका के सैन्य का आगमल हो गया।

कुछ दिन बाद ही मधु का आगमन भी हो गया। रावण ने सुमाली और गन्धर्वराज को समस्त सैन्य का नेतृत्व सौंपा और स्वयं एकाकी कैलाश की ओर जाने का मन बनाया। वह इन्द्र पर आक्रमण से पूर्व एक बार शिव का आशीर्वाद लेने का इच्छुक था। सैन्य के कूच करते ही रावण भी चित्रांगदा से विदा लेने पहुँच गया। “पुनः जा रहे हैं? आपको अपनी चित्रांगदा पर तनिक भी तरस नहीं आता?"

“प्रियतमा, तुम्हें तो ज्ञात था रावण का उद्देश्य, फिर ऐसा उपालंभ भला क्यों?” 

“इन बातों से विरहाग्नि शीतल तो नहीं हो जाती!"

“सत्य है चित्रांगदे ! किन्तु महत् उद्देश्य के लिये अपने क्षणिक सुख का त्याग तो करना ही पड़ता हैं। "

 “समझती हूँ; किन्तु इस मन को किस भाँति समझाऊँ? यह तो कोई तर्क नहीं समझता "

“समझ जायेगा, तुम प्रसन्न वदन विदा दो रावण को, अन्यथा वह अपने लक्ष्य पर चित्त केन्द्रित नहीं कर पायेगा "

 “किन्तु शीघ्र वापस लौटने का वचन देना होगा।"

"दिया!”

“याद रखियेगा, आपका पुत्र भी प्रतीक्षा करेगा आपकी !" चित्रांगदा ने तिर्यक मुस्कान के साथ इठलाते हुए कहा "

 “क्या?”

 रावण के स्वर में कौतूहल भी था और प्रसन्नता भी ।

“हाँ! मैं गर्भवती हैं।"


रावण ने उत्साह से उसे पुनः बाँहों में भर लिया और अपने जलते अधर उसके मंदिर अधरों पर रख दिये।

******

शिव, रावण की मानो प्रतीक्षा ही कर रहे थे। प्रभु के लिये क्या अज्ञात रह सकता है- रावण ने मन ही मन सोचा शिव ने उसे खुले मन से आशीर्वाद दिया। पार्वती यद्यपि देवेन्द्र के प्रति सहज स्नेह के चलते प्रसन्न नहीं थीं, किन्तु उन्होंने भी आशीर्वाद दिया फिर शिव ने बताया कि वे दीर्घ समाधि में जाने वाले थे, बस उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। शिव की  समाधि में विघ्न डालना उचित नहीं था, अतः रावण ने अमरावती की ओर प्रस्थान किया|

 *****


कैलाश क्षेत्र का सुरम्य वातावरण रावण के मन-मस्तिष्क पर सदैव अद्भुत प्रभाव डालता रहा था। आज वह अकेला था। सुवासित सोमरस का पात्र उसके हाथ में था, जिसे वह धीरे-धीरे चुसकता जा रहा था। प्रकृति की मोहकता ने उसे अपने सम्मोहन में जकड़ लिया और उसका मन - विहग आनन्दलोक में उड़ान भरने लगा। जैसे-जैसे वह आगे अलका के निकट पहुँचता जाता था, वातावरण की सम्मोहकता बढ़ती ही जाती थी। उसने अलका के परकोटे से थोड़ी ही दूर एक विशाल उपवन में पुष्पक को उतार लिया । आकाश में बिखरी चाँदनी, सर्वत्र व्याप्त रातरानी की मादक सुगंध और अलका से आती गीत-संगीत की उन्मत्त स्वर-लहरियाँ, उसे जैसे अपने साथ उड़ाये लिए जा रही थीं। किलोल करती यक्षिणियों, किन्नरियों, अप्सराओं की आनन्दातिरेक से परिपूर्ण फुसफुसाहटें, जैसे रावण की चेतना पर उन्मादी प्रभाव डाल रहीं थीं। बीच-बीच में यत्र-तत्र विचरते आपस में खोये गंधर्व-युगल जैसे एक-दूसरे में समा जाने को व्याकुल हो रहे थे। रावण को लगा, जैसे उसका स्वयं पर से नियंत्रण छूटा जा रहा हैं। उसे चित्रांगदा के साथ उन्मुक्त रमण के पल याद आने लगे। वह विचलित होता जा रहा था। चलते-चलते कहे गये चित्रांगदा के शब्द और उसके बाद उसका उन्मादी चुम्बन - आलिंगन.....


यह उसे क्या होता जा रहा हैं? उसने सोचा। क्या यह सोमरस का प्रभाव हैं? उसने पात्र एक ओर रख दिया और पुष्पक से बाहर निकल आया। उसने सिर को झटक कर सामान्य होने का प्रयास किया, किन्तु व्यर्थ। उसकी चेतना को मानो अनंग ने अपने पुष्पशर से अवश कर दिया था। वह निरुद्देश्य भटकने लगा । वह जिधर जा रहा था उधर ही .... यहाँ तो उन्मुक्त रमण का साम्राज्य था। क्या उसे रमण का अधिकार नहीं है? कैसा हतभाग्य है वह। दैव उसे प्रियतमा का सान्निध्य देता है, फिर छीन लेता है। उसे अचानक वेदवती की याद आ गयी। उसके साथ बिताये गये पल याद आ गये। आह ! वह मधुर रमण... और दैव ने बलात उससे वेदवती को छीन लिया। फिर उसे मन्दोदरी याद आ गयी। उससे भी तो कितने काल से वह ठीक से बात तक नहीं कर पाया है! जब भी मिलता है कोई न कोई व्याधि उसके रस को निचोड़ लेती है और उसके पास मन्दोदरी के लिये रस बचता ही नहीं। उसे फिर चित्रांगदा याद आ गयी। उसका उन्मत समर्पण याद आ गया। दैव को उससे कौन सा वैर है?

“यहाँ एकान्त में यह कौन एकाकी विचरण कर रहा है?"

 एक अत्यंत मधुर मादक सा स्वर सुनकर उसे लगा जैसे वेदवती ने उसे पुकारा हो। वह चौंक पड़ा। घूमकर देखा तो एक अनिंद्य सुन्दरी, सुवासित पुष्पाभूषणों से जैसे सृष्टि को मदोन्मत्त करती हुई चली आ रही थी। उसके झीने वस्त्रों से झाँकती उसके मादक यौवन की अंगड़ाई जैसे धवल चाँदनी को भी सम्मोहित किये ले रही थी । नहीं, यह मेरी वेदवती नहीं हैं।

 “सुन्दरी कौन हो तुम?"

 उसने पूछा।


“मैं रम्भा हूँ। "

"कौन ? अप्सरा रम्भा?"

“हाँ वही; आप कौन हैं, और इस वातावरण में एकाकी कहाँ विचर रहे हैं?"

 "मैं रावण हूँ, लंकेश्वर रावण !”

 “ओह! प्रणाम स्वीकार करें पौलस्त्य!”

 रम्भा ने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया।

“रम्भे! तुमने प्रश्न किया कि मैं एकाकी कहाँ घूम रहा हूँ, तो क्यों नहीं तुम ही मेरी सहचरी बन जातीं। रावण को तुम्हारे इस रूप के व्याध ने अपने जाल में बुरी प्रकार जकड़ लिया है।

 " “लंकेश! काश रम्भा आपकी मनोकामना पूर्ण कर सकती!" रावण की आशाओं पर तुषारापात करते हुए रम्भा ने विनम्रता से उत्तर दिया

 “क्यों सुन्दरी, क्या असमर्थता है? किसका भय हैं?”

 रावण का स्वर थोड़ा सा तीव्र हो गया। 

“भय रम्भा को किसका होगा, किन्तु लंकेश ! आज यह संभव नहीं है कि रम्भा आपके साथ रमण का सौभाग्य प्राप्त करे।”

“तुम लंकेश को न कह रही हो; क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि आज लंकेश त्रिलोक की सबसे बड़ी शक्ति है; लंकेश की इच्छा की अवमानना करने का साहस आज किसी को नहीं है। " 

"ज्ञात है, किन्तु रम्भा लंकेश की इच्छा की अवमानना कहाँ कर रही हैं? रम्भा तो उनसे विनय कर रही है कि आज उसे क्षमा करें, रम्भा आज वचनबद्ध है।"


“नहीं!” वातावरण का प्रभाव, मद्य का प्रभाव, वेदवती - मन्दोदरी - चित्रांगदा से रमण की स्मृतियों का प्रभाव... सबने मिलकर रावण की वासना को जाग्रत कर दिया था। उसे अपना आकाशचारी आत्मगौरव विस्मृत हो गया था। उसका विवेक तो जैसे प्रसुप्त पड़ा था। रम्भा के न कहने से वह उत्तेजित हो उठा - 

“रावण के समक्ष न कहना संभव नहीं है; कुछ ही काल में तुम्हारा देवराज भी रावण के चरणों में होगा "

 “मैं स्वीकार करती हूँ आपकी श्रेष्ठता, किन्तु आपके साथ रमण, मर्यादा का उल्लंघन होगा, अतः मुझे जाने दें। "

"मर्यादा का उल्लंघन !"

 रावण ने अट्टहास किया-

 “अप्सरा की भी कोई मर्यादा होती है रम्भे ? अप्सराओं का तो अस्तित्व ही उन्मुक्त भोग के लिये है... आज तक समर्थ देव ही अप्सराओं के साथ रमण करते रहे हैं, आज लंकेश्वर रावण, रम्भा के साथ रमण करेगा। क्या रम्भा, लंकेश्वर रावण के आदेश की अवहेलना करने का दुस्साहस कर सकती है? इतनी सामर्थ्य है उसकी ?”

“नहीं-नहीं, लंकेश्वर ! रम्भा की इतनी सामर्थ्य नहीं है, रम्भा तो मात्र अपनी मर्यादा से बँधी है।”

“पुनः वही मर्यादा! रावण को ठगना चाहती हो तुम? क्या सभी देव, मनचाही अप्सरा के साथ रमण नहीं करते? क्या रम्भा कभी किसी देव को न भी कह देती हैं?" 

“यह सच है कि रम्भा ने सभी देवों के साथ रमण किया है, वह कभी किसी देव को न नहीं कहती, किन्तु देव कभी भी उसे मर्यादा का उल्लंघन करने को बाध्य नहीं करते, वे इसका सदैव ध्यान रखते हैं।"

“किस मर्यादा की दुहाई दे रही हो तुम? अभी तो तुमने स्वयं स्वीकार किया कि तुम सभी देवों के साथ रमण करती हो; मात्र देव ही क्यों, अप्सरायें तो देवों से इतर भी सामर्थ्यवान पुरुषों के निमंत्रण की कभी अवहेलना नहीं करतीं, फिर रावण तो रावण हैं; त्रिलोक में सर्वाधिक सामर्थ्यवान पुरुष ... उसके निमंत्रण की अवहेलना कैसे कर सकती हो तुमा "

“रम्भा आज वचनबद्ध है; आज की रात्रि वह किसी के लिये पत्नीवत है। यही अप्सराओं की मर्यादा हैं। वे निर्धारित अवधि के लिये किसी की पत्नी होती हैं। उस काल में वे किसी अन्य के साथ रमण नहीं करतीं। आज वह आपके भ्रातृज नलकूबर ; कुबेर का पुत्रद्ध के साथ वचनबद्ध हैं, आज वह उसकी पत्नी हैं। इस मर्यादा से आज वह आपकी पुत्रवधू है, आज उसके साथ रमण की अभिलाषा आप के लिये अशोभनीय हैं। रम्भा पर अनुग्रह कीजिये, इस अभिलाषा को त्याग दीजिये, अन्यथा रम्भा की मर्यादा टूटने के साथ-साथ आपकी उज्ज्वल कीर्ति भी कलंकित हो जायेगी ।”

“अब तुम रावण के धर्य की परीक्षा ले रही हो ! उसे बलप्रयोग के लिये बाध्य कर रही हो।"

 कहते हुए रावण ने रम्भा का हाथ पकड़कर उसे अपने कठोर आलिंगन में बाँध लिया। रम्भा प्रतिरोध करती रही किन्तु रावण मदोन्मत्त सा बोलता रहा

 “रावण की पुत्रवधू! ... रावण के साथ छल करने का प्रयास करती है। रावण की सर्वोच्च सत्ता की अवमानना का प्रयास करती हैं। रावण आज तुझे बतायेगा कि वह क्या हैं... उसकी सत्ता क्या है!!”

“नहीं ऽऽ!”

 की एक दीर्घ चीत्कार दूर-दूर तक तैर गई। उसने कठिनता से कहने का प्रयास किया-

 “रम्भा सत्य कह रही है, आज की रात वह आपके भातृज नलकूबर...."

 रम्भा का वाक्य पूरा नहीं हो पाया। रावण ने अपने ओठों से उसके अधर पीस दिये।

*****

“रम्भे! रम्भे!”

 का स्वर सुनकर रावण चैतन्य हुआ। उसने अलसायी आँखों से देखा, रम्भा कुछ दूर पर घुटनों में सिर दिये बैठी थी। उसने वस्त्र पहन लिये थे, किन्तु वे अब भी अस्त-व्यस्त थे।

बाल बिखरे हुए थे, चेहरा घुटनों में छुपा हुआ था। 

“रम्भे! रम्भे!”

 वही स्वर पुनः सुनाई पड़ा। रावण उठ बैठा। फिर उसने एक निगाह रम्भा पर डाली । वह वैसी ही जड़वत बैठी हुई थी। रावण ने खड़े होकर अपने वस्त्र ठीक किये, फिर पुनः बैठ गया और स्वर की ओर काल कर दिये। कुछ ही पलों में आकृति स्पष्ट होने लगी। आकृति पास आई तो उसके चेहरे पर पहचान के चिन्ह उभरे, फिर उसने पास आकर उसके चरणों में प्रणाम किया और बोली

“आह पितृव्य ! अरे आप यहाँ ?”

रावण की दृष्टि में अभी भी पहचान के भाव नहीं उभरे थे। वह अपने मस्तिष्क पर जोर दे रहा था

“कौन?”

 उसने धीरे से पूछा ।

तभी जैसे वह समझ गया हो - 

“क्या नलकूबर?"

“हाँ पितृव्य! आप यहाँ कैसे बैठे हैं? क्या पुनः अलका पर आक्रमण का कोई कुचक्र रच रहे हैं? और... और यह कौन है?”

 नलकूबर की दृष्टि सिर झुकाये बैठी रम्भा पर पड़ चुकी थी, किन्तु उसका चेहरा घुटनों में छिपा होने से और उसकी उजड़ी उजड़ी सी अवस्था के चलते वह उसे पहचान नहीं पाया था। रम्भा ने अभी भी सिर नहीं उठाया था।

“अब उसकी कोई आवश्यकता नहीं हैं।" 

रावण ने किंचित दंभ से कहा- 

“रावण अब सीधे तुम्हारे देवराज पर आक्रमण हेतु प्रस्तुत हैं; अब वह त्रिलोकेश्वर होगा।" 

फिर उसने औपचारिक प्रश्न किया

“किन्तु तुम इस समय, अर्धरात्रि को यहाँ ? तुम्हें तो इस समय अपने प्रासाद में विलास-लीला में निमग्न होना चाहिये!”

 उसके स्वर में उपहास था।

“आह!” 

नलकूबर की दृष्टि अब भी रम्भा पर ही थी। शायद वह पहचान रहा था। - 

“नलकूबर यहाँ नहीं होता इस समय तो और कहाँ होता ?”

फिर उसने रम्भा को पुकारा

 “रम्भे! रम्भे! ... क्या यह तुम्हीं हो? शीश उठाओ तो तनिक "

“हाँ, यह रम्भा ही हैं, आज की निशा की तुम्हारी पत्नी ।"

 झटके से सिर उठाते हुए रम्भा ने आवेश में कहा। उसका चेहरा आँसुओं से गीला था। काजल ने पूरे चेहरे को काला कर दिया था-

 “आज तुम्हारे पितृव्य ने बलात्... रम्भा ने बार-बार चेताया इन्हें बार-बार रोका, किन्तु इन्हे तो अपनी शक्ति का दंभ था, इन्हांने..."

“यह क्या किया आपने पितृव्य? अप्सराओं की मर्यादा के अनुसार आज रम्भा मेरी पत्नी थी, इस नाते वह आपकी पुत्रवधू हुई... और... और आपने ..."

रावण का मस्तिष्क इस समय पूर्ण चैतन्यावस्था में था। नलकूबर की बात सुनते ही उसे लगा कि जैसे उसपर वज्राघात हुआ हो। उसे भान हो रहा था कि उसने क्या अनर्थ कर डाला है। निस्संदेह नलकूबर से उसके संबंध मित्रता के नहीं थे, किन्तु था तो वह उसके भाई का पुत्र ही; इस रक्त संबंध की उपेक्षा कैसे की जा सकती थी! हाँ ! कुछ ऐसा ही तो कह रही थी रम्भा ! अब उसे स्मरण हो रहा था। उसे स्वयं पर क्रोध आ रहा था।

“पितृव्य! आपने अपने नाम के साथ आज यह कैसा अपवाद जोड़ लिया? युगों तक जब-जब आपका नाम लिया जायेगा, लोग आपका यह कुकृत्य भी याद करेंगे ... आपको धिक्कारेंगे ..."

 नलकूबर, क्रोध और हताशा में जो भी मुँह में आ रहा था कहता जा रहा था। किन्तु रावण इससे आगे नहीं सुन सका। उसकी इच्छा हो रही थी कि अभी धरती फट जाये और वह उसमें समा जाये। वह नलकूबर और रम्भा के सामने दृष्टि उठाने का साहस नहीं कर पा रहा था।


“आह प्रभु शिव! आपका कैलाश क्षेत्र रावण के प्रति इतना निर्दय क्यों हो जाता हैं। रावण तो यहाँ मात्र इसलिये आया था कि वह आपके दर्शन करना चाहता था । "

 रावण होठों में ही बड़बड़ा रहा था। उसकी चेतना से अब नलकूबर और रम्भा दोनों ही मिट गये थे । उसे न उनके स्वर सुनाई दे रहे थे, न उनकी आकृतियां दिखाई दे रही थीं। उसकी आँखें बंद थीं। फिर वह पद्मासन में बैठ गया। कुछ ही देर में वह पूर्ण समाधि की अवस्था में था। उस अवस्था में उसके मस्तिष्क में एक ही स्वर गूँज रहा था 

'आज के बाद रावण अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी स्त्री पर वासनामय दृष्टि नहीं डालेगा; रावण सदैव एकनिष्ठ रहेगा|' आत्मसम्मोहन विधि से उसने आज यह अटूट प्रण ले लिया था।

सुलभ अग्निहोत्री 



शनिवार, 2 जुलाई 2022

नारद देवलोक में

“कहिये देवेन्द्र! आज तो आप अत्यंत प्रसन्न प्रतीत हो रहे हैं। अप्सरायें हैं, सोमरस है... तात्पर्य, राग-रंग का सम्पूर्ण आयोजन है.... और वह भी ऐसे समय में, जब रावण किसी भी समय आप पर आक्रमण करने हेतु प्रस्तुत है।"

 नारद ने आश्चर्य का प्रदर्शन करते हुए कहा-

 “जब रावण के तत्काल आक्रमण का कोई भय नहीं था, तब आप व्यथित थे; आपके स्वभाव का यह विलोम भाव तो नारद के लिये रहस्य बन गया है।" 

उनकी उँगलियाँ अनजाने ही वीणा के तारों को छेड़ रही थीं।

“प्रणाम देवराज! सब आपकी महिमा हैं। आपके ही मार्गदर्शन से हम देव अपनी उस मनःस्थिति से उबरने में समर्थ हुए हैं, और अब आपकी ही योजना के क्रियान्वयन में लगे हुए हैं। ”

 नारद के आगमन से नृत्यरत अप्सरायें भी रुक गयी थीं। देवों के उपरान्त उन सभी ने भी नारद को प्रणाम किया। नारद ने भी आशीर्वाद दिया।


“जानकर सन्तोष हुआ | " 

नारद बोले । फिर अप्सराओं की ओर संकेत करते हुए बोले- “अच्छा अब  तनिक इस रागरंग की सभा को विसर्जित कीजिये। थक गयी होंगी ये अप्सरायें, इन्हें विश्राम करने दीजिये । "


“क्यों मुनिवर? नृत्य और संगीत तो मन को आनंद देते हैं, क्या ये अप्सरायें सुन्दर नहीं लग रहीं आपको ? आदेश हो तो उर्वशी या रम्भा को आमंत्रित किया जाये?"

 इन्द्र ने चुटकी ली।

 “अरे नहीं देवेन्द्र! इन्हें विश्राम ही करने दीजिये, मुझे तो जबसे नारायण ने मोहिनी प्रकरण में  मूर्ख बनाया था, तभी से सुन्दरियों को देखकर भय होने लगता है, अपना वही वानर रूप स्मरण होने लगता है। "

इन्द्र सहित सभी देव, देवर्षि के अभिनय पर हँस पड़े। अग्निदेव हठात बोल पड़े

“देवर्षि! इस समय आपके नारायण यहाँ हैं कहाँ, और हममें से किसी का साहस नहीं कि आपके साथ वैसा कोई कृत्य करें।”

“नारद पर तो कृपा ही बनाये रखिये; मुझे तो अब समस्त नारियाँ मातावत् ही प्रतीत होती हैं,और माता की शारीरिक सुन्दरता या कुरूपता कोई अर्थ नहीं रखती। माता का तो मन देखा जाता है, और वह सदैव अतीव सुन्दर ही होता है । "

“जैसी आपकी आज्ञा !”

 कहते हुए इन्द्र ने सबको जाने का संकेत किया, सब अप्सरायें और वादक, सारा सामान समेटकर प्रस्थान कर गये।

"मुनिवर ! सोमरस चलेगा?”

 इन्द्र ने पुन: चुटकी ली। 

“आ गये न अपने वास्तविक रूप में देवेन्द्र! किन्तु यह तो कहना ही पड़ेगा कि आप अच्छे आतिथेय नहीं हैं।”

“अरे! ऐसा आक्षेप क्यों मुनिवर? देवेन्द्र तो आपको सोमरस पान का निमंत्रण दे रहे हैं।”

 हँसते हुए पंचम आदित्य बोलें।

 “हाँ! हाँ! ऐसा निमन्त्रण तो देवेन्द्र बड़ी कृपणता से ही देते हैं।" अष्टग वसु ने बात को आगेबढ़ाया।

 “सोमरस पान आप लोगों को ही शोभा देता है; नारद की मदमत्त होकर किसी कोने में अचेत पड़े रहने की कोई आकांक्षा नहीं है; वैसे सुना है कि इस बार नंदन कानन में सुस्वादु फलों की बहार आई हुई है। नारद तो उन फलों को चखने के चाव से आया था, उसके लिये आपके देवेन्द्र पूछ ही नहीं रहे। चतुर कृपण ऐसा ही करते हैं; व्यक्ति को जिस वस्तु की चाह नहीं होती, उसके लिए वही प्रस्तुत करते हैं। जिसकी चाह होती है वह छुपा लेते हैं।”

 “इतनी छोटी से बात मुनिवर! अभी लीजिये..."

 कहते हुये इन्द्र ने ताली बजाई। जैसे जादू के जोर से एक चर उपस्थित हो गया- 

“जाओ, नंदन से छाँट-छाँटकर सर्वश्रेष्ठ ताजे फल लेकर आओ।” “रुको तुम! कहीं नहीं जाना है।" 

उस चर को रोकते हुए नारद बोले-

 “फलों का वास्तविक आनंद तो अपने हाथ से तोड़कर खाने में ही हैं; नारद को फलों से तृप्त करना हैं तो नंदन में ही चलिये। ” 

नारद ने हँसते हुए कहा । उनका लहजा देखकर सारे देव भी हँसने लगे। इसी बीच किसी ने चर को इशारा कर दिया, वह वापस चला गया।

“चलिये ऐसा ही सही।”

 देवेंद्र अपनी हँसी रोकने का प्रयास करते हुए बोले- 

“मुनिवर का मंतव्य यदि कोई समझ जाये, तब फिर इनकी विशेषता ही क्या रह जाये। चलिये भाई सब लोग, नर्तन तो हमें करना ही पड़ेगा मुनिवर की बीन पर” 

एक समवेत अट्टहास गूँज गया सभाभवन में। सब उठ खड़े हुए और नंदन कानन की ओर चल पड़े।

 “हाँ तो देवेन्द्र! क्या उपलब्धियाँ हैं आपके गुरुकुलों की?" अट्टहास थमने के बाद मार्ग में नारद ने प्रश्न किया।

“उत्साहजनक हैं मुनिवर! कई लक्ष दुर्जेय वानर योद्धा प्रशिक्षित किये जा चुके हैं, युद्ध का समय आते-आते यह संख्या अभी और बढ़ेगी।”

“मुझे तो प्रसन्नता है देवेन्द्र कि आप अपनी हताशा से बाहर आ गये। यही सबसे बड़ा उपाय है; अभी पूर्व की भेंट में किस प्रकार इस योजना को व्यर्थ बता रहे थे |”

 “देव क्षमा प्रार्थी हैं मुनिवर ! हम अपनी हताशा में आपके कौटिल्य का उचित मूल्यांकन नहीं कर पाये।” 

इन्द्र ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा|

 “तात्पर्य? आप नारद को कुटिल व्यक्ति की संज्ञा प्रदान कर रहे हैं? आप नारद का अपमान कर रहे हैं?” 

नारद ने अभिनय पूर्वक कहा।

“अन्यथा क्यों ले रहे हैं देवर्षि! कौटिल्य तो राजनीति का सर्वोच्च गुण हैं; मुझे तो प्रतीत होता हैं आपने इस गुण में अब अपने नारायण को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।”

“क्या बात करते हैं देवेन्द्र! नारायण अद्वितीय हैं; नारद ने जो भी गुण ग्रहण किये हैं, उन्हीं की कृपा हैं... उन्हीं की प्रेरणा हैं।”

“यह तो आपकी महानता है देवर्षि, जो आप श्रेय स्वीकार करने में संकोच कर रहे हैं, अन्यथा आज यदि देव स्वयं को किसी सीमा तक चिन्तामुक्त अनुभव कर रहे हैं, तो इसके नेपथ्य में सम्पूर्ण उद्योग भी आपका है, और सम्पूर्ण कौशल भी आपका ही हैं। सम्पूर्ण योजना और उसका सटीक क्रियान्वयन आपने ही तो किया है, हम देव तो हताश - निराश बैठे मन ही मन पितामह को अभिशाप दे रहे थे ।”

“यही तो हमारा मिथ्या अहंकार होता है देवेन्द्र, यही आपमें और नारद में अन्तर है; आप स्वयं को  कर्ता मानते हैं, और नारद स्वयं को मात्र माध्यम मानता है। जो करता है वह दैव करता है, जो करवाता है वह दैव करवाता है। आप विचार कीजिये, नारद ने क्या किया... नारद ने नारायण की प्रेरणा से बालि के मन में एक बीज रोपा, किन्तु उस बीज को उचित समय पर अंकुरित होने का अवसर तो दैव ही प्रदान करेगा। किस प्रकार करेगा, यह तो वही जानता होगा किन्तु करेगा अवश्य यह नारद का विश्वास है। इसी भाँति नारद ने नारायण की प्रेरणा से जामदग्नेय की महान योद्धा बनने की लालसा की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त किया, किन्तु उचित समय पर अर्जुन से जो कुछ करवाया, वह तो दैव ने ही करवाया। ... अगर नारद कुछ भी करने में समर्थ हो पाया, तो तभी हो पाया जब दैव ने उस कार्य को होने देने का मन बना लिया। यदि दैव की इच्छा न होती तो क्या नारद, बालि के मन में संदेह का रोपण कर पाता? अथवा महर्षि जमदग्नि, 'राम' को विश्वामित्र के आश्रम भेजने को सहमत होते?... कदापि नहीं होते।”

 नारद, इन्द्र की आँखों में झाँकते हुये कुछ क्षण मौन रहे, फिर अचानक अपना गाम्भीर्य त्यागते हुए पुन: चुटकी ले उठे

"देवेन्द्र! नारद का परामर्श मानते हुए आप जितना शीघ्र स्वयं को इस कर्ता भाव से मुक्त कर लेंगे, उतना ही शीघ्र आप भी नारद के समान उन्मुक्त हो जायेंगे" 

कहते हुए नारद हँसे, अपनी वीणा के तार छेड़े और फिर आगे बोले-

 “किन्तु नारद जानता है कि आप यह नहीं कर पायेंगे, क्योंकि दैव आपके ऊपर यह कृपा करना नहीं चाहता |" 

“देवर्षि ! क्या आप कभी बिना कटाक्ष किये भी रह सकते हैं?" इन्द्र ने हँसते हुए कहा। आज देवेन्द्र प्रसन्न थे, अन्यथा नारद के कटाक्ष बहुधा उन्हें तिलमिला देते थे।

“लीजिये, वार्ता के मध्य जान ही नहीं पड़ा कि कब नंदन आ गया।" 

मरुत ने कानन में प्रवेश करते हुए नारद से प्रश्न किया-

 “आप तो स्वयं तोड़कर खायेंगे फल?”

नंदन - कानन.... स्वर्ग का प्रसिद्ध उपवन, उसकी विशेषताओं के विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। बस इतना ही बहुत हैं कि उसका सौन्दर्य वर्णनातीत था; उसके पुष्प, उसके फल, उसकी लतायें... उसकी प्रत्येक सज्जा वर्णनातीत थी |

 “सेवकों को ही लाने दें देवराज, अन्यथा उन्हें अच्छा नहीं प्रतीत होगा; वे सोचेंगे कि नारद उनके कार्य में अनुचित हस्तक्षेप कर रहा है।" 

मरुत के कटाक्ष की उपेक्षा करते हुये नारद बोलो

“अच्छा देवर्षि! जामदग्नेय ने अर्जुन को तो समाप्त कर दिया, उस विशेष दिवस में स्थितियाँ उसके पक्ष में थीं, किन्तु क्या वह एकाकी सम्पूर्ण हैहय साम्राज्य को समाप्त कर पायेगा ?”

 “वह अपराजेय हैं देवेन्द्र! आपको क्या ज्ञात नहीं कि भार्गव, मात्र हैहयों के ही नहीं, सम्पूर्ण महिष्मती साम्राज्य के समस्त क्षत्रिय वंशों के कुलगुरु हैं? जमदग्नि के उपरांत अब 'राम' ही परम्परानुसार उन सबका कुलगुरु है? सब उसका हृदय से सम्मान करते हैं। अब अर्जुन के पुत्रों का अंत निकट ही हैं। महिष्मती के हैहयों के अतिरिक्त समस्त क्षत्रिय वंश, अर्जुन के पुत्रों को कुलगुरु की हत्या का दोषी मान रहे हैं, जनता उन्हें कुलगुरु की हत्या का दोषी मान रही है। अर्जुन के जीवित रहते किसी की सामर्थ्य नहीं थी उसका विरोध करने की, किन्तु अब अर्जुन के उपरान्त और राम जैसे अजेय योद्धा का नेतृत्व मिल जाने पर ... आपको क्या प्रतीत होता हैं वे हैहयों के प्रति विद्रोह नहीं कर उठेंगे? राम उन सबका नेतृत्व करने जा रहा है, अब वह एकाकी नहीं है, आप उस ओर से निश्चिंत रहियो अति शीघ्र ही हैहयों के सर्वनाश की सूचना आपको मिलेगी।"

देवों के चेहरों की दमक अनायास और बढ़ गयी।

 “आप तो बस एक बार पराजित होने के लिये मानसिक रूप से स्वयं को तैयार कर लें।”

“अब हम हैं, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है; वध हम उसका कर नहीं सकते प्रयास करके ही क्या कर लिया, पितामह के सम्मुख हम सब विवश हैं।" 

"अपने मन से भ्रम निकाल दीजिये देवराज! इस बार रण में मेघनाद भी होगा, वह रावण से भी ज्यादा पराक्रमी है। अब आप प्रयास करके भी रावण को परास्त नहीं कर पायेंगे, दूसरी ओर आपको यह समर, नारायण की अनुपस्थिति में ही करना पड़ेगा । " 

“कैसा अशुभ भाषण कर रहे हैं देवर्षि! विष्णु हमारे पक्ष से युद्ध भला क्यों नहीं करेगा? उसने सदैव ही इन्द्र का साथ दिया है, वह इन्द्र का सहोदर है। ”

“देवराज! आप समझने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे? नारायण, मात्र युद्ध करने हेतु युद्ध नहीं करते; वे युद्ध करते हैं तो प्रतिपक्ष का सम्पूर्ण दलन करने हेतु करते हैं; पूर्व के समस्त समर क्या इसका प्रमाण नहीं हैं?"

इन्द्र ने सहमति व्यक्त की।

“वे जब भी युद्धरत होते हैं, तो प्रतिपक्षी के प्राणों को उसके शरीर से मुक्ति अवश्य प्रदान करते हैं, उनके सुदर्शन चक्र के प्रहार से आज तक कोई जीवित नहीं बचा।”

इन्द्र ने पुन: सहमति व्यक्त की।

 “नारायण ने एक बार ही भूल की थी, जिसका उन्हें आज तक पश्चाताप हैं; उन्होंने माल्यवान और सुमाली को जीवित छोड़ दिया था। किन्तु यूँ ही तो नहीं छोड़ दिया था... ये दोनों तो नारायण को माली पर चक्र का प्रहार करते देखकर ही रण छोड़कर भाग गए  थे... और ऐसे भागे कि फिर खोजे ही नहीं मिले। मिले, तो माल्यवान संन्यास ले चुका था, वह प्रायाश्चित कर रहा था। ऐसे व्यक्ति पर अकारण वार करना तो पराक्रम नहीं कहलाता ? सुमाली तब जाकर प्रकट हुआ, जब वह वृद्ध हो चुका था, जब उसके दौहित्र ; पुत्री के पुत्रद्ध पितामह से वर प्राप्त कर चुके थे। अब उसके वध का कोई अर्थ नहीं है, अब तो रावण का विनाश करना आवश्यक है ... और रावण, पितामह के वचनों के चलते देवों के लिये अवध्य है। तो देवराज! जब नारायण रावण का वध कर ही ... नहीं सकते, तो फिर उनके युद्धक्षेत्र में आने का कोई अर्थ ही नहीं है। वे कदापि युद्ध नहीं करेंगे। रावण यदि क्षीरसागर पर आक्रमण कर देगा, तब भी वे किसी भी बहाने से युद्ध को टाल ही देंगे, भले ही पराजय स्वीकार करने का अभिनय क्यों न करना पड़े। 

" “क्या इसके...” 

इन्द्र ने कुछ कहना चाहा, किन्तु नारद ने हाथ उठाकर उन्हें रोकते हुये अपनी बात जारी रखी

“यद्यपि नारद को पूर्ण विश्वास है कि अपनी सामर्थ्य भर, सुमाली, रावण को कदापि नारायण से नहीं उलझने देगा। वह उनके व्यक्तित्व से भलीभाँति परिचित है; और आप पर विजय प्राप्त करने के बाद लंकेश्वर को किसी अन्य विजय की आवश्यकता भी नहीं रह जायेगी। हाँ, एक कार्य यदि इस युद्ध में आप कर पायें तो नारद व्यक्तिगत रूप से आपका आभारी रहेगा ।”

 "वह क्या?" 

इन्द्र ने आश्चर्य के साथ पूछा। 

“विगत में नारायण से जो भूल हुई थी, उसे आप सुधार दें। "

“तात्पर्य क्या हैं आपका? देवर्षि, आप बात स्पष्ट कहा करें।”

“इस सुमाली नाम के कंटक को निपटा डालें, इस युद्ध के उपरांत आपके पास इसका अवसर कदापि नहीं होगा।" 

“यह कार्य हो जायेगा देवर्षि, वह तो पितामह के रक्षा कवच से बाहर हैं, हम सब अपना ध्यान विशेष रूप से उसी पर केन्द्रित करेंगे।"

 समस्त देवों ने एक स्वर से कहा 

 “अब आप कहिये देवेन्द्र, क्या कह रहे थे?”


“आपने कहा कि भले ही विष्णु को पराजय का अभिनय ही क्यों न करना पड़े, वह रावण से युद्ध नहीं करेगा- क्या इसके लिये वह आलोचना का पात्र नहीं बनेगा?" 

“किसी महत् उद्देश्य की प्राप्ति के लिये आलोचना स्वीकार करने से कब भयभीत हुये हैं नारायण ? उनका तो सूत्र - वाक्य ही है 'साध्य की शुचिता महत्त्वपूर्ण है, उसके लिये यदि साधन की शुचिता का त्याग भी करना पड़े तो करणीय है।'... फिर यह बात आप कह रहे हैं, जो आलोचना के पात्र बनते ही रहते हैं!”

 नारद ने कटाक्ष कर दिया

 “देवर्षि!”

 इन्द्र आहत स्वर में बोल पड़े।


नारद ने मुस्कुराते हुये इन्द्र को देखा, फिर बोल पड़े- 

“छोड़िये जाने दीजिये.... तो देवराज! निष्कर्ष यही है कि अपने सम्पूर्ण पराक्रम से युद्ध करने के बाद भी इस समय पराजित होना आपकी नियति है... रावण का पक्ष पितामह के वचनों के कवच के बिना भी इस समय आपसे प्रबल है... अब ?" 

"देखेंगे।" 

इन्द्र के स्वर में निराशा थी।

थोड़े से मौन के बाद इन्द्र पुनः बोला

“देवर्षि! एक शंका है। "

“पूछिये।”

“ये जो दक्षिणापथ में हमारे गुरुकुल चल रहे हैं, इनमें अत्यंत प्रतिभाशाली योद्धा सामने आ रहे हैं; आपने बालि और सुग्रीव में फूट अवश्य डलवा दी है, इससे हम देव प्रसन्न भी हैं, किन्तु ये सब योद्धा तो संग्राम के समय बालि के साथ ही होंगे, वही तो वानरराज हैं, और बालि तो रावण का मित्र है, ऐसी स्थिति में आपके इस उद्योग का क्या लाभ होगा?”

“देवेन्द्र! क्या सत्य ही इतने भोले हैं आप? वानर योद्धा अब दो अलग-अलग पक्षों में रहेंगे, किन्तु यह आज की स्थिति है। सर्वश्रेष्ठ वानर योद्धा हनुमान तो अभी से सुग्रीव के पक्ष में है, धीरे-धीर अन्य भी आयेंगे; और नारद का प्रयास तो यही रहेगा कि समय आने पर बालि के स्थान पर किष्किंधा का सिंहासन सुग्रीव के पास हो, ताकि समस्त वानर पक्ष राम के साथ खड़ा हो।"

“कैसे होगा मुनिवर ? क्या सुग्रीव कभी बालि को परास्त कर सकता है?”

“नहीं, किन्तु कुछ तो राम के करने के लिए भी छोड़िये; समय की प्रतीक्षा कीजिये, इसका भी मार्ग मिलेगा।"

"करेंगे देवर्षि ! करनी ही पड़ेगी । "

"वैसे देवेन्द्र! अन्य कौन-कौन से उल्लेखनीय वानर योद्धा हैं, जिन पर आपको गर्व हो रहा हो । ”

 “ हनुमान का नाम तो आपने स्वयं ही लिया अभी ।"

 यह स्वर अब तक शांत भाव से सारा वार्तालाप सुन रहे पवन देव का था। 

“मेरा पुत्रवत, और सूर्यदेव का यह शिष्य, स्वयं में रावण और कुंभकर्ण दोनों को पराजित करने की सामर्थ्य रखता है । " 

“इसी क्रम में... “ 

इन्द्र ने आगे बताना आरंभ किया- 

“सुग्रीव स्वयं, कुबेर का शिष्य गन्धमादन, विश्वकर्मा का शिष्य नल, अग्निदेव का शिष्य नील, अश्विनी कुमारों के शिष्य मैन्द और द्विविद, वरुण के शिष्य सुषेण, पर्जन्य के शिष्य शरभ, ये विशेष उल्लेखनीय हैं; शेष तो मैंने पहले ही बताया कई लक्ष वानर योद्धा गढ़े गये हैं, और अभी भी गढ़े जा रहे हैं। ... और फिर स्वयं पितामह के पुरातन शिष्य, वार्धक्य की ओर अग्रसर जाम्बवान भी तो हैं। वे वृद्ध हो गये हैं तो भी उनके पराक्रम में कोई न्यूनता नही आयी है। हनुमान के पिता केसरी भी तो हैं....."

 “बस-बस देवराज ! पूरी सूची बताने की आवश्यकता नहीं है। आप लोगों की मुखमुद्रा बता रही हैं कि आप अपने शिष्यों की प्रगति से पूर्णतया संतुष्ट हैं।” 

“पूर्णत: मुनिवर ! हमें तो स्वप्न में भी आभास नहीं था कि इन वनवासियों में इतना पराक्रम छिपा हो सकता है; पराक्रम में ही नहीं मुनिवर, वे बुद्ध में भी किसी से कम नहीं हैं।”

***

नारद का विश्वास अन्यथा नहीं था। लगभग एक वर्ष के अन्तराल में जामदग्नेय राम ने हैहय वंश का सम्पूर्ण विनाश कर डाला। इसके लिये उसे इक्कीस बार युद्ध करना पड़ा। नारद के विश्वास के अनुरूप ही महिष्मती क्षेत्र के समस्त क्षत्रिय कुल एक-एक कर उसके पक्ष में आते चले गये थे। उनके इस महान पराक्रम के लिये मानव जाति ने उन्हें षष्ठ विष्णु की मानद उपाधि से विभूषित किया।

विष्णु की उपाधि उस काल में भारत की जनता की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक थी। यह कोई औपचारिक उपाधि नहीं थी, जो किसी व्यक्ति, संस्था या राज्य द्वारा प्रदान की जाती हो, यह तो जनहित में किसी असंभावित से कार्य को अपने पराक्रम और चातुर्य से संभव बना देने वाले व्यक्ति को प्राप्त होती थी। श्रद्धा में डूबा कोई भी व्यक्ति अनायास ही इसका सूत्रपात कर देता था, और यदि जनता इससे सहमत होती थी, तो शनैः-शनै: इसे मान्यता देती चली जाती थी। परशुराम के पराक्रम के लिये जनता एक मत से उनकी आभारी थी।

सुलभ अग्निहोत्री 


शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

जनक दुलारी सीताजी

जनक कोई पुस्तक खोले अध्ययन-मनन में मग्न थे। वे वास्तव में विद्या- व्यसनी थी। आर्यावर्त में एकमात्र मिथिला का ही साम्राज्य था, जहाँ शूद्रों और स्त्रियों के अध्ययन पर कोई प्रतिबंध नहीं था। यह अलग बात है कि जनक के प्रोत्साहन के बाद भी अत्यल्प मात्रा में ही ये लोग गुरुकुल जाने में रुचि लेते थे। तभी उनकी दोनों पुत्रियों के आगमन के कलरव ने उनका ध्यान भंग किया। पुत्रियाँ अभी हाल ही में अपना गुरुकुल का अध्ययन पूर्ण कर मिथिला वापस आ गयी थीं। उनके आगमन के साथ ही बहुत दिनों तक नीरव रहे राजप्रासाद में पुन: कोलाहल की भी वापसी हुई थी।

जनक का निवास, राजा का निवास था मात्र इसीलिये उसे राजप्रासाद कहा जा सकता था, अन्यथा वह भी मिथिला के सामान्य निवासियों के भवनों के समान ही था। जनक राजर्षि थे, उनके निवास में भोग विलास का कोई उपक्रम नहीं था। दास-दासी भी बहुत अधिक नहीं थे। बड़ी पुत्री सीता की वयस चौदह वर्ष के लगभग हो गयी थी। सर्वांग सुंदरी- दूध में जैसे हल्की सी केसर मिश्रित कर दी गयी हो। ऐसा रंग, खूब ऊँचा कद, नितम्बों से भी नीचे आती वेणी, मीन भी लजा जाये ऐसे विशाल- चंचल नयन, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे अधरों पर सदैव विलास करती स्मित... विधाता ने जैसे पूरे मन से गढ़ा था उसे। वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही विदुषी भी थी, और उतनी ही संस्कारवान भी । योद्धा भी वह बुरी कदापि न थी। ये समस्त गुण छोटी पुत्री उर्मिला में भी थे, किन्तु सीता कुछ विशेष ही थी ।

“पिता! अथर्ववेद को कुछ लोग वेद क्यों नहीं स्वीकारते?” 
सीता, प्रश्न कर रही थी । 
“पुत्री, यह तो वे लोग ही सही बता सकते हैं, मैं कैसे बता दूँ उनकी ओर से?” जनक ने मंद स्मित के साथ कहा।

“आप मुझसे उपहास कर रहे हैं?”

“अरे ! इतना दुस्साहस कैसे कर सकता है जनक ? यदि सीता कहीं रूठ गयीं, तो जनक तो कहीं का नहीं रह जायेगा, क्यों उर्मिला!"

“हाँ सीता ही तो आपकी सगी है, उर्मिला तो कहीं पड़ी मिल गयी थी । ” 
उर्मिला ने मुँह बनाते हुए कहा। सीता वास्तव में सभी की विशेष दुलारी थी, किन्तु इससे उर्मिला को कोई शिकायत नहीं थी । उसे भी तो अपनी दीदी, विश्व में सबसे अच्छी लगती थी; वह थी ही इतनी अच्छी । कम दुलारी उर्मिला भी नहीं थी, और सीता के तो उसमें प्राण बसते थे ।

“ बताइये न!”
 सीता ने जनक से लड़ियाते हुई बोली। उसने उर्मिला की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया था। ध्यान देने की कोई आवश्यकता भी तो नहीं थी। वह क्या जानती नहीं थी कि उर्मिला को उससे कितना स्नेह हैं।

“पुत्री! कोई विशेष कारण नहीं है; कुछ पुरातनपंथी विचारधारा के लोग होते हैं, जो किसी नवीन को स्वीकार नहीं करना चाहते, बस वे ही अथर्व को वेद नहीं स्वीकार करते |”
“आप करते हैं?" 
“हाँ, मैं तो करता हूँ!”
“अच्छा, तो आप क्यों करते हैं?”
“बड़ा विकट प्रश्न है यह तो ।” जनक अपनी हँसी को रोकने का प्रयास करते हुए बोले । 
 “हँसिये मत ! उत्तर दीजिये सीधे से।”

इस बीच पीछे से आकर उर्मिला ने उनके गले में हाथ पिरो दिये थे और उनके सिर पर अपनी ठोढ़ी टिकाये दोनों के वार्तालाप का आनंद ले रही थी ।

"वेद क्या हैं?”
 जनक ने थोड़ा गंभीर होते हुए प्रतिप्रश्न किया, फिर स्वयं ही उत्तर भी दिया।
 "वेद, ज्ञान का कोष हैं; तो अब अथर्व वेद भी तो ज्ञान का कोष हैं, आयुर्वेद का जनक है अथर्ववेद, अतीन्द्रिय शक्तियों का ज्ञान देता हैं अथर्ववेद, प्रकृति के कुछ अनसुलझे रहस्यों को समझने का प्रयास करता है अथर्ववेद; और भी बहुत कुछ है उसमें, तो फिर उसे भला वेद क्यों न स्वीकार किया जाए ?"

“तो फिर कुछ लोग उसे वेद क्यों नहीं स्वीकार करना चाहते?”

“बताया तो, वे पुरातनपंथी लोग हैं, वे किसी नवीन को सहजता से स्वीकार नहीं कर सकते; ऐसे लोग तर्क की उपेक्षा कर, मात्र भावना को प्रश्रय दिया करते हैं।” जनक ने सीता के गालों पर
चुटकी लेते हुए कहा

“उई! खेल मत कीजिये, सही से समझाइये, नहीं तो मैं माता से शिकायत कर दूँगी।”

“अरे नहीं, ऐसा मत कर देना, बताता हूँ... बताता हूँ !” जनक ने डरने का अभिनय करते हुए कहा । जनक के अभिनय पर उर्मिला हँस पड़ी। सीता अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से एकटक उनके मुख की ओर देख रही थी।

“देखो, पहले ऋग्वेद की सर्जना हुई, फिर..." 
“सर्जना नहीं हुई पिता, ऋषियों ने मंत्रों के दर्शन किये।” पहली बार उर्मिला ने अपनी सम्मति देने का प्रयास किया। जनक ने बड़े प्रयास से अपनी हँसी रोकी, और अपने गले में पड़ी उर्मिला की हथेलियाँ पकड़कर उसे सामने खींचकर उसकी आँखों में देखते हुए पूछा

“अच्छा, किसने बताया यह ?”

“ऋषिका मैत्रेयी ने, ऋषि याज्ञवल्क्य ने, और भी सब तो यही कहते हैं। ”
 “तुम उनकी बात सही से समझीं नहीं पुत्री ।”

“कैसे नहीं समझी? सबने स्पष्ट यही कहा है। " 
“अरे कैसे समझाऊँ तुझे?” जनक अपनी सुदीर्घ जटाओं पर हाथ फेरते हुये जैसे अपने आप से बोले-
 “अच्छा हाँ?” जैसे उन्हें समझ आ गया हो-
 “देख, तेरी दीदी कभी-कभी कविता करती है ?"

“हाँ, करती हूँ!”
 उर्मिला बोलती, उससे पहले ही सीता ने गर्व से छाती फुलाते हुए कहा ।
 “अच्छा, क्या जब मन हो तब कविता कर सकती है यह?”
 फिर उन्होंने सीता से पूछा-
 “यदि में कहूँ कि चल अभी मुझे कविता लिखकर दिखा, तो लिख देगी?”

“ऐसे कैसे ? कविता तो बड़ी कठिनता से बनती है; यह कोई गणित का प्रश्न तो नहीं है जो बस सूत्र लगाया और हल हो गया।" फिर जैसे कुछ समझ में आया हो-
 “किन्तु नहीं, कभी-कभी तो अकस्मात स्वतः बन जाती है तो कभी कई-कई दिन मनन करते रहो नहीं बनती, सच में मेरे वश में नहीं होता कविता करना; वह जब उसकी अपनी इच्छा होती है तभी बनती है।” 
सीता ने उत्तर दिया।
“यही बात है।” जनक किसी बच्चे की तरह ताली बजाते हुए बोले- “तो सत्य यह है कि कविता तुम नहीं करतीं, वह अपने आप होती है; परंतु कहती यह हो कि मैंने की है।" 
फिर उर्मिला की ओर देखते हुए बोले- “देखा।"

"ऐसा कैसे ? करती तो मैं ही हूँ।" सीता ने प्रतिवाद किया। 
“अरे! अभी तुमने ही तो कहा जब उसकी इच्छा होती है तो बन जाती है, क्या असत्य बोला था तुमने?"
 “नहीं, किन्तु ... “ सीता गड़बड़ा गई, फिर पिता की बाँह झकझोरते हुए बोली-
 “क्या आप भी ! ... मेरे प्रश्न का उत्तर तो दिया नहीं, उल्टे मेरी कविता का उपहास करने लगे; मेरा यश अच्छा नहीं लगता आपको?”

“अरे! रूठती क्यों हैं? तेरे प्रश्न का भी उत्तर दे रहा हूँ, पहले इस उर्मिला को तो उत्तर दे लूँ ” 
जनक उसके सिर को प्यार से सहलाते हुए कहा- 
"देख, जैसे कविता करना तेरे वश में नहीं है, वह अपने आप बनती है; कविता बनाते समय तू लेखनी दाँतों से चबाते हुए शून्य में निहारा करती है, जैसे शून्य में कुछ देख रही हो और फिर लिखने लगती हैं। " 
 “मैं लेखनी चबाती हूँ? फिर उपहास किया आपने?” सीता ने उनका हाथ झटक दिया

“अरे! छोड़ उस बात को, मैंने अपने शब्द वापस ले लिये; किन्तु उस समय लगता तो ऐसा ही है कि तू शून्य में कविता की पंक्तियाँ देखती हैं और फिर उन्हें लिपिबद्ध कर देती है । "
 “हाँ! देखने वाले को प्रतीत तो ऐसा हो सकता है।” सीता कुछ सोचती हुई बोली।

“आई बात समझ में; ऐसे ही ऋषिगण भी शून्य में देखते होंगे और फिर मंत्र लिख देते होंगे, तो समझा यह गया कि वे मंत्र को देख रहे हैं, यही बात है न?”
 उर्मिला कुछ इस प्रकार बोली जैसे कोई बहुत बड़ा रहस्य समझ लिया हो ।
 “कुछ-कुछ यही बात है।" परंतु एक बात और- "जब ऋषियों ने वेद-मंत्रों की सर्जना आरंभ की, तब मनुष्य को लेखनी का ज्ञान ही नहीं था, तो उस समय ऋषियों ने मंत्र लिखे नहीं, बस उनका सृजन किया और कंठस्थ कर लिया, फिर अपने शिष्यों को कंठस्थ करा दिया; ऐसे ही कई पीढ़ियों तक यही क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे वेद समृद्ध होते रहे।”

“अर्थात् पीढ़ियों तक वेदों की रचना चलती रही?”

“और क्या ! ऋक् के बाद कुछ ऋषियों ने यजुः पर कार्य आरम्भ कर दिया, उसके बाद कुछ अन्य ऋषियों ने साम् पर कार्य आरम्भ कर दिया। इस प्रकार पहले यह वेदत्रयी हमारे सामने आई। उस समय सब लोग तीन ही वेद जानते थे। फिर कुछ काल बाद कुछ ऋषियों ने अथर्व वेद की सर्जना आरंभ की; एक बात और जान लो जब वेदत्रयी की सर्जना हुई, तब उनके सर्जक ऋषियों ने उन्हें वेद नहीं कहा था, वेद तो उनके महत्त्व को देखते हुए बाद में कहा गया । "
“तो पहले वेदों को क्या कहा ऋषियों ने?” उर्मिला ने प्रश्न किया

“पहले तो ऋषियों ने उन्हें स्मृति कहा, क्योंकि वे स्मृति के माध्यम से सुरक्षित रखे गये थे... इसे इस प्रकार समझो कि यह वह ज्ञान था जिससे ऋषिगण चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ भी लाभान्वित होती रहें, इसीलिये उन्होंने इस ज्ञान को अपने शिष्यों की स्मृति में सुरक्षित कर दिया शिष्य इसे अपने शिष्यों की स्मृति में सुरक्षित करते गये। पीढ़ियों तक यही क्रम चलता रहा, फिर जब मनुष्य ने लिखना सीखा, तब वेदों को लिपिबद्ध कर दिया गया। " “सच में पिता ?” सीता ने आश्चर्य से कहा ।
“हाँ सच में! फिर जब अथर्व की रचना हुई तो उस समय वेदपाठी तीन ही वेद जानते थे- ऋक्, यजु: और सामा कुछ उत्साही और नवीन का स्वागत करने वाले ऋषियों ने अथर्व को भी वेद की संज्ञा देना आरंभ कर दिया, किन्तु बहुसंख्य इसके विरोध में ही रहे। धीरे-धीरे अथर्व की भी स्वीकार्यता बढ़ती गयी; फिर भी आज भी अनेक ऋषि और वेदपाठी अथर्व को वेद के रूप में स्वीकार नहीं करते। तुम्हें पता है कि अभी कुछ काल पूर्व तक अथर्व को अन्य वेद शाखाओं के ऋषि अत्यंत हैय दृष्टि से देखते थे। कुछ कट्टर परंपरावादी आज भी ऐसे ही हैं, किन्तु अधिकांश ने अब अथर्व को भी मान्यता दे ही दी हैं। ”

“अर्थात यह और कुछ नहीं, मात्र नवीन और पुरातन का ही द्वन्द्व है ?" 
"हाँ! ... अच्छा जाओ अब माता के पास जाओ, उनका हाथ बटाओ जाकर" 
“... और मुझे अध्ययन करने दो।" खिलखिलाकर हँसते हुए उर्मिला ने जनक का वाक्य पूरा किया। जनक मुस्कुराकर रह गये। बड़ी हो गयीं है अब दोनों, इनके विवाह के विषय में सोचना पड़ेगा।

सुलभ अग्निहोत्री 





 

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...