शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

 श्रीरामचन्द्रजी का बन्धु-प्रेम


रामजी का बन्धु-प्रेम भी अलौकिक हैं। ऐसा बन्धु-प्रेम भी तुमको जगत में कहीं देखने को नहीं मिलेगा। महाराज दशरथ ने जब रामजी का राज्याभिषेक करना निश्चित किया तो रामजी ने लक्ष्मण से कहा

लक्ष्मण ! यह राज्य तुम्हारा है। इसके कर्ता-भोक्ता तुम ही हो मैं तो निमित्त मात्र हूँ । लक्ष्मण ! तुम तो मेरे बाह्य प्राण हो । मेरी दूसरी अन्तरात्मा हो । यह जीवन और यह राज्य तुम्हारे ही लिए है ।

रामजी वन में पधारे तथा रामजी के पीछे-पीछे लक्ष्मण भी चल पड़े। इसमें क्या आश्चर्य है ? थोड़ा विचार करो। कैकेयी ने बनवास तो रामजी को दिया था लक्ष्मण जी को दिया नहीं। फिर भी रामजी वन में पधारे तो लक्ष्मण जी माता-पिता और पत्नी का त्याग करके बड़े भाई के पीछे वन गये। रामजी का प्रेम हो ऐसा है कि राम-वियोग में लक्ष्मण अयोध्या में रह सकते ही नही। लक्ष्मण पत्नी को छोड सकते हैं, माता-पिता का त्याग कर सकते है, राजमहल के सुख का त्याग कर सकते है परन्तु ये बड़े भाई को छोड नहीं सकते । राम-वियोग लक्ष्मण से सहन हो सकता नहीं । जहाँ श्रीराम है वही लक्ष्मणजी हैं ।


रामजी ने खेल-कूद में भी छोटे भाइयों का दिल कभी नही दुखाया । खेलने मे भी उन्होने कभी अपनी विजय नही की जानबूझकर पराजय ही ली। रामजी ऐसी रीति से खेलते थे कि रामजी की हार हो जाय और लक्ष्मण भरत की जीत हो खेल में भी कभी  लक्ष्मण भरत को उन्होंने नाराज नहीं किया। रामजी विचारते है कि 'भरत हमारा भाई है, मेरे भाई की हार, मेरी हार है मेरे भाई की जीत मेरी जीत है। कौशल्या से रामचन्द्रजी  कहते हैं माँ मेरा भाई भरत छोटा है परन्तु बहुत होशियार है माँ! हम खेलते  रहे तो मेरी हार हो गयी और मेरा भरत जीत गया । भरतजी की आँख सजल हो जाती है और वे कौशल्या से कहते हैं 'माँ मेरे बड़े भाईका मेरे ऊपर बहुत प्यार है. इससे मां यह जान-बूझकर हार जाते हैं और मुझे जिता देते है।'

रामजी ने जगत को बन्धु-प्रेम का आदर्श बताया है। कैकेयी ने जब कहा कि मैं भरत को राज्य देती हूँ, तुम वन मे जाओ तो छोटे भाई भरत को गद्दी मिलने की बात से रामजी को बहुत आनन्द हुआ। रामजी ने कैकेयी से कहा 'माँ ! मुझे राजा नही बनना । मेरा भाई भरत गद्दीपर बैठे, मेरा भाई राजा बने, मेरा भाई बहुत सुखी हो। इसमे मैं बहुत राजी हूँ, मेरे भाई का सुख ही मेरा सुख है, भाई का दुख ही मेरा दुख हैं । माँ ! तुम्हारी आज्ञा हो तो चौदह वर्ष तो क्या मैं आजीवन वन में रहने को तैयार है। जैसा प्रेम श्रीरामजी का है, वैसा ही प्रेम श्रीभरतजी का है। लोग तो कहते है कि रामजी के प्रेम से भी भरतजी का प्रेम श्रेष्ठ है। भरतजी ने मिला हुआ राज्य भी छोड़ दिया। भरतजी कहते हैं 'इस के मालिक मेरे बड़े भाई है। मैं तो उनका सेवक हूँ।' गद्दी मिली परन्तु भरतजी ने ली नहीं । गद्दी के ऊपर उन्होंने रामजीकी चरण पादुका पधरा दी और भरतजी तप करते रहे। महात्मा तो वहाँ तक कहते है कि रामजी की तपस्य  से भरतजी की तपस्या महान है। रामजी वन मे तप करे, इसमे क्या आश्चर्य है । भरतजी तो राजमहल मे तप करते है । वनमें तप करना सरल है, परन्तु राज्यमहल में अथवा बँगले में तप करना बहुत कठिन है ।

श्री डोंगरेजी महाराज

श्रीराम की मातृ-पितृ-भक्ति

 श्रीराम की मातृ-पितृ-भक्ति

श्री रामकी मातृ-पितृभक्ति अलौकिक है रामजी माता-पिता के अनन्य भक्त है। रामजी का ऐसा नियम था कि नित्य माता-पिता की वन्दना करना और सदा माता-पिता की आज्ञा मे रहना। कितने ही लोग ऐसे होते हैं कि मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं, ठाकुरजी की वन्दना करते है परन्तु घर के अन्दर वृद्ध माता-पिता को प्रणाम करते ही नही । एक भाई से पूछा कि तुम हमारे पाँव छूते हो परन्तु घर में बूढी माँ के पाँव छूते हो कि नहीं? उसने जवाब दिया कि महाराज पहले पाँव छूता था परन्तु बी. ए. पास किया तब से छोड़ दिया।

वह शिक्षा किस काम की जिसको प्राप्त करने के उपरान्त माता - पिता का वन्दन करने में, माता-पिता की सेवा करने में संकोच हो ? इससे तो यह मूर्ख रहे तो क्या बुराई ? विद्वान तो ऐसा होना चाहिए कि प्रभु में प्रेम जागे, धर्म मे विश्वास बढ़े, माता-पिता की, समाज की देश की सेवा करने की भावना जगे । सबमे भगवद्भाव दृढ हो । अरे, जो माता-पिता की सेवा करते नहीं, वे समाज की और देश की क्या सेवा कर सकते है ? वे भगवान की क्या सेवा कर सकते हैं ? जो विद्या मां-बाप को बन्दना करने मे शर्म जगाये यह विद्या नही ।बाप की सम्पत्ति लेने में शर्म या संकोच होता नहीं किंतु वन्दन करने में संकोच होता है, शर्म आती है। कितने ही तो बाप से कहते हैं 'बङ्गला हमारे नाम कर देना, नहीं तो पीछे बहुत परेशानी होती है।' बाप का सब कुछ लेते हैं किंतु बाप की सेवा करते नहीं ।

कितने ही लोग माता-पिताका वन्दन तो करते हैं परन्तु उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते । इस वन्दन का कोई अर्थ नही । वन्दन का अर्थ तो यह है कि 'मैं तुम्हारे अधीन हूँ अपना मस्तक और हाथ  तुमको समर्पण करता हूं, तुम्हारी इच्छा के अनुसार ही मैं कार्य करूंगा, तुम्हारी आज्ञा मे रहूंगा, मैं तुम्हारा सेवक हूँ। माथा है बुद्धि का प्रतीक और हाथ है क्रियाशक्ति के प्रतीक मस्तक में बुद्धि रहती है, हाथ से क्रिया होती है । वन्दन अर्थात इन सब का समर्पण |

माता - पिता की आज्ञा का पालन करो। तुमको सुखी होना हो तब माता-पिता की सेवा करो । शास्त्र मे तो ऐसा लिखा है कि जिसके माता-पिता जीवित न हो या साथ रहते न हों, तो चौबीस घण्टे मे एक बार माँ को याद करे, पिता को याद कर वन्दन करे । अपने माता-पिता की सेवा तुम करते हो तब वृद्धावस्था में तुम्हारे बालक तुम्हारी सेवा करेगे । माता-पिता, गुरु और अतिथि ये संसार मे प्रत्यक्ष चार देव है । उनकी सेवा करो ।

मातृदेवो भव ।

 पितृदेवो भव । 

आचार्यदेवो भव | 

अतिथिदेवो भव ।

माता का नम्बर पहला है, पिता का नम्बर दूसरा है और गुरु का तीसरा है। माता पिता ये परमात्मा के प्रत्यक्ष स्वरूप है। माता-पिता मे जिसका भगवद्भाव नहीं, उसे मन्दिर मे, मूर्त्ति में, किसी दिन भगवान दीखते नही । शास्त्र मे तो ऐसा लिखा है कि तुम कदाचित परमात्मा की भक्ति न करो तो चल सकता है, परन्तु माता-पिता की भक्ति-सेवा पहले करो । परमात्मा तो प्रत्यक्ष दीख पड़ते नही इसलिए प्रभु की भक्ति करना बहुत कठिन है। परन्तु माता- पिता की भक्ति करने योग्य है ।

तुम अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा न करो तो परमात्मा को बहुत खोटा लगता है, प्रभु नाराज होते है। जगत मे कितने ही लोग ऐसे है कि अभिमान के आवेश मे ऐसा भी बोलने लगते है कि मै धर्म को मानता नही, ईश्वर को मानता नही। ईश्वर कहाँ है ? ऐसे नालायक का पोषण भी ईश्वर करते है । नास्तिक को भी परमात्मा प्रकाश, पानी और पवन देते है। नास्तिक भी प्रभु की सृष्टि में ही रहता है। भगवान की पूजा न करो तो भगवान को खोटा लगता नहीं परन्तु जो वृद्ध माता-पिता की सेवा नही करता, वह भगवान को जरा भी सहन नही होता ।

कितने ही लोग मन्दिर में पद त्राण घिसने जाते है, परन्तु घर में माता-पिता की  सेवा करते ही नहीं । इनका मुख भगवान देखते नहीं । भगवान कहते हैं यह मूर्ख है । मुझे मुँह दिखाने आया है ? घर पर वृद्ध माता-पिता का अपमान करता है, माता-पिता के सामने जबाब देता है और मुझे फूल की माला अर्पण करने आया है ? इसके हाथ की फुल की माला मैं देखता भी नहीं । भगवान तो उसी की सेवा को स्वीकार करते है जो माता-पिता को परमात्मा समझ कर उनकी सेवा-पूजा करता है तुम परमात्मा की पूजा न करो तो चले, परन्तु माता-पिता की पूजा न करो तो नही चले ।

माता-पिता की सेवा महान् पुण्य है। अनेक यज्ञों के करने वाले को जो पुण्य नही मिलता वह वृद्ध माता-पिता की सेवा करने वाली सन्तान को अनायास ही प्राप्त हो जाता है । माता-पिता की अनन्य भाव से सेवा करने वाले के ऊपर परमात्मा बहुत कृपा करते हैं, इनके घर प्रत्यक्ष पधारते है। पुण्डरीक की कृपा तुम जानते हो। पुण्डरीक ने प्रभु की सेवा नही की थी । ग्रन्थो मे लिखा है कि पुण्डरीक ने परमात्मा का स्मरण किया था प्रभु की सेवा नही की थी । पुण्डरीक स्मरण श्रीकृष्ण का करता था और सेवा माता-पिता की करता था । पुण्डरीक भगवान के दर्शन करने नहीं गया, पुण्डरीक के दर्शन करने भगवान स्वयं उनके घर पधारे थे। पुण्डरीक की मातृ-पितृ भक्ति से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष द्वारिकानाथ पुण्डरीक के घर आये थे । पुण्डरीक उम समय माता-पिता की सेवा कर रहे थे ।

 प्रभु ने उनसे कहा कि

 'मैं आया हूँ।'

 पुण्डरीक ने कहा -

 ' महाराज मैं आपकी वन्दना करता हूँ । इस समय मैं माता पिता की सेवा मे व्यस्त हूँ । माता-पिता की सेवा के फलस्वरूप आप मिले हो, इसलिए माता की सेवा प्रथम है । आप तनिक बाहर खड़े रहो ।'

माता-पिता की सेवा करने वाले में इतनी शक्ति आती है कि वह ईश्वर को भी खड़े रहने के लिए कह सकता है । 

प्रभु ने थोड़ी परीक्षा की। पुण्डरीक से बोले

 'अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड के अधिनायक लक्ष्मी के पति तेरे घर आये है।' 

पुण्डरीक ने कहा

 'आप पधारे। यह बहुत अच्छी बात है । मैं आपका वन्दन करता है, परन्तु इस समय आपकी सेवा करने की मुझे फुरसत नहीं।'


प्रभुने कहा, 

'तू मेरी सेवा करता नहीं तो मैं यहाँ चला जाऊँ।'

 पुण्डरीक ने कहा, 

'आपकी मर्जी भले ही आप जाओ ।'

पुण्डरीक को विश्वास है कि मैंने माता-पिता की सेवा छोड़ी नहीं। वह माता-पिता की सेवा करता रहा।  भगवान भले ही चले जाये, परन्तु ठाकुरजी को वापिस यही आना ही पड़ेगा । पुण्डरीक ने ठाकुरजी को उत्तर दिया,

 'भले ही आप जाओ, परन्तु आपको वापिस यही आना पड़ेगा। मैं माता-पिता की ऐसी सेवा करता हूँ कि तुमको दौडते हुए वापिस यही आना पड़ेगा ।'


श्रीकृष्ण जगत का आकर्षण करते है परन्तु माता-पिता की सेवा करने वाला तो परमात्मा का भी आकर्षण करता है और कहता है 'आप जाओ तो, वापिस फिर आना पडेगा। प्रभु भक्ति के अधीन है। पुण्डरीक ने प्रभु को खड़े रहने के लिए एक ईंट दे दी थी। भगवान ईट के ऊपर खडे रहे और पुण्डरीक की प्रतीक्षा करते रहे । पुण्डरीक ने माता पिता की सेवा का काम छोड़ा नहीं प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहने से भगवान को थकान हुई तो कमर पर हाथ रखना पड़ा। आज भी पण्ढरपुर में पाण्डुरङ्ग भगवान कमर पर हाथ रखे हुए ईंट पर खड़े हैं। माता-पिता की सेवा की यह महिमा है ।

शास्त्रों में लिखा है कि मनुष्य देह बहुत दुर्लभ है। 'दुर्लभो मानुषोदेहो' कारण कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ सिद्ध करने वाला अपना यह मनुष्य शरीर ही है और यह शरीर माता-पिता ने दिया है। माता-पिता का यह ऋण माथे पर है। माता पिता ने बालको के लिए बहुत कष्ट सहन किए है परन्तु आजकल बहुत से लोग स्त्री का पक्ष लेकर माता-पिता का अपमान करते है । शास्त्र कहते है कि माता-पिता का अपमान करनेवाला कभी सुखी रहता नहीं।

रामजी का ऐसा नियम था कि माता-पिता को किसी दिन भी सम्मुख उत्तर दिया नहीं। वृद्धावस्था में माता-पिता से कदाचित् कोई भूल हो जाय तो इनके सम्मुख उत्तर नहीं देना । उनका बारम्बार वन्दन करो, सम्मान करो और पीछे विवेक से समझाओ । वृद्ध को जो सम्मुख उत्तर देता है उसको शाप मिलता है। वृद्ध का हृदय बहुत कोमल होता है । सम्मुख उत्तर मिलता है तो उनको ऐसा लगता है कि इसने हमारा अपमान किया है। तुम सुखी होना चाहो तो अपने माता-पिता को सम्मुख उत्तर न देना । कितने ही छोकरे तो माता-पिता से ऐसा कहते हैं कि

 'तुमको कोई खबर नहीं, तुम कुछ न जानते हुए भी बोलते हो। मैं कहता हूँ, वैसा करो।' 

छोकरे ऐसा बोलते हैं तो माँ-बाप को कैसा लगता है ? तुमको अच्छा लगे चाहे न लगे, अपने माता-पिता की आज्ञा में रहोगे तभी तुम्हारा कल्याण होगा।

तुमको भला न लगनेपर भी माता-पिता की आज्ञा का पालन करो। रामायण का यही आदर्श है। तुमको भला न लगे, ऐसी आज्ञा भी तुम्हारे माता-पिता करे तो भी तुम प्रभु विश्वास रखना, रामायण में विश्वास रखना और भली न लगने वाली आज्ञा का भी पालन करना तो तुम ईश्वर को अच्छे लगोगे |

रामायण में लिखा है कि दशरथ महाराज ने कभी रामजी को मुख से नहीं कहा कि तुम वन में जाओ। दशरथ महाराज की जिह्वा कभी बोल सकती ही नहीं कि रामजी वन में जाये । दशरथजी ने स्पष्ट आज्ञा दी नही । यह तो कैकेयी ने कहा कि तुम्हारे पिता की इच्छा है, आज्ञा है कि तुम वन में जाओ। तब रामजी बोले कि मेरे पिता की ऐसी इच्छा है तो आज्ञा का - पालन करना मेरा धर्म है


अहं हि वचनाः पतेयमपि पावके । 

मक्षयेयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे ॥


"पिताकी आज्ञा में अग्नि में अथवा समुद्र कूद पड़ने को तैयार हूँ, जहर भी पी जाने को तैयार हूँ ।'


रामजी माता-पिताका वन्दन करके वन में चले जाते हैं।


थोड़ा विचार करो कि कैकेयी ने राज्य भरत को भले ही दिया परन्तु रामजी को बनवास क्यों दिया ? रामजी ने कोई अपराध किया नहीं। रामायण में लिखा है कि एक बार नही अनेक बार कैकेयी ने अपने मुख से कहा है कि

 'श्रीराम निरपराध हैं। रामजी ने कोई भूल नही की तो भी कैकेयी ने रामजी को वनवास दिया परन्तु रामजी ने कैकेयीसे एक बार भी नहीं पूछा कि मुझे वनवास क्यों देती हो माता-पिता की आज्ञा है, प्रभु को खबर मिली तो तुरन्त उन्होने आज्ञा का पालन किया। राजा दशरथ ने प्रत्यक्ष आज्ञा दी नहीं । केवल कैकेयी के कहने मात्र से ही रामजी वन में चले गये कैकेयी की आज्ञा अयोग्य है, अनुचित है, परन्तु रामजी ने ऐसा विचार नही किया । रामजी तो मानते है कि मैं अपने माता-पिता के अधीन हूं।


नास्ति शक्तिः पितुर्वाक्यं समतिक्रमितुं मम ।


सर्वसमर्थ रामजी कहते है कि पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन करनेकी मुझमें शक्ति नही। श्रीरामचन्द्रजी की-सी मातृ-पितृ-भक्ति करने वाला जगत में कोई दिखाई देता नही ऐसा आदर्श जगत मे किसी जगह तुमको मिलेगा नहीं। रामचन्द्रजी की मातृ-पितृ-भक्ति अनन्य है।

श्री डोंगरेजी महाराज






भगवान

 आपको लगता होगा कि मंदिर में तो मैं रोज प्रभु के दर्शन करता ही हूँ पर मंदिर में प्रभु के दर्शन तो सामान्य दर्शन हैं। कई व्यक्तियों को मंदिर में प्रभु दीख पड़ते हैं, पर मंदिर के बाहर निकलने के बाद प्रभु नहीं दिखाई देते और प्रभु जब नहीं दिखाई देते तब आँखें पाप करती हैं। मन बुरे विचार करने लगता है। मंदिर में भगवान की भक्ति करने वाला मानव मंदिर के बाहर पाप करता है। अनेक बार मंदिर में दर्शन करते करते भी मन बिगड़ता है। मंदिर में बहुत भीड़ हो जाने पर किसी का धक्का लग जाय तो मन अशांत हो जाता है। कइयों को तो ठाकुरजी के समक्ष ही क्रोध आ जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मंदिर में प्रभु के दर्शन उत्तम दर्शन नहीं हैं। साधारण दर्शन हैं। साधारण दर्शन से शांति भी साधारण ही मिलती है।


थोड़ा सोचिये मंदिर में आपको क्या दिखलायी देता है?- भगवान या मूर्ति ? आप मानेंगे कि प्राय: मूर्ति दिखाई देती है। आँख को भले ही मूर्ति दिखायी दें, वैष्णव ऐसी भावना रखते हैं कि यह मूर्ति नहीं है, ये प्रत्यक्ष परमात्मा हैं। जिसका मन शुद्ध है, उसे भावना से मंदिर में भगवान् दिखाई देते हैं। ये प्रत्यक्ष साक्षात् परमात्मा हैं। बैकुण्ठ के नारायण ये ही हैं। जो मंदिर में सिंहासन पर विराजमान हैं, वे साक्षात् प्रभु ही तो हैं।

हृदय में भाव न हो तो मंदिर में पत्थर की मूर्ति दिखाई देती है। वैष्णव मंदिर में मूर्ति के दर्शन नहीं करते, परमात्मा के दर्शन करते हैं। आप बहुत प्रेम-भाव से प्रभु के दर्शन कीजिये । प्रभु के उपकार को अनुभूत करके थोड़ी स्तुति कीजिये। संकल्प कीजिए कि आज से मैंने पाप छोड़ दिये। आज से मैं भगवान् की कथा सुनने वाला हूँ। आज से मैं सत्कर्म करूँगा। अब मैं भगवान् का हो गया हूँ। मैं ऐसा ही बोलूँगा, जो मेरे भगवान् को पसंद होगा। मैं ऐसा ही कार्य करूँगा जो मेरे प्रभु को प्रिय होगा।

जब मानव पाप छोड़कर भक्ति का संकल्प करता है, तब भगवान् मन में धीरे धीरे हँसते हैं। प्रभु को आनंद होता है कि आज मेरा पुत्र समझदार हो गया है। पत्थर की जड़ मूर्ति कभी नहीं हँसती है। आप से कभी पाप हो जाय तो पाप के बाद दर्शन करने पर आपको ऐसा अनुभव होगा कि आज भगवान् नाराज हो गये हैं। आज प्रसन्न नहीं हैं, आज मुझे देख कर हँसते भी नहीं हैं। भगवान् दृष्टि नहीं डाल रहे हैं बल्कि उपालम्भ दे रहे हैं। मानो कह रहे हैं कि मेरा नाम धारण किया पर अभी तक पाप नहीं छोड़ रहे हो! पुत्र बुरा हो जाता है तो पिता को क्षोभ होता ही है।

जीव ईश्वर का पुत्र है। जीव पाप करके भगवान् के दर्शन करने जाता है तब उसे देखकर भगवान् को बहुत संकोच होता है। भगवान् उलाहना देते हैं। मानो कह रहे हों कि आज तुम्हारी ओर देखने का मन नहीं हो रहा है।

मेरा पुत्र होकर ऐसा पाप कर रहा है? पत्थर की मूर्ति उलाहना नहीं देती है। पत्थर की मूर्ति हँसती भी नहीं है। जिसका हृदय शुद्ध है, जिसकी आँख पवित्र है, जिसके हृदय में भावना है, उसे मंदिर में भगवान् दीखते हैं आँख से भले ही पत्थर की मूर्ति दिखाई दे, वैष्णव भावना से भगवान के ही दर्शन करते हैं। सौ रुपये के नोट में एक भी पैसा नहीं दीख पड़ता। आँख को तो कागज ही दिखाई देता है, किन्तु आँख को भले ही कागज दीख पड़े, पर बुद्धि कहती है, यह कागज नहीं है, रुपये हैं। वैष्णव मूर्ति के दर्शन नहीं कर रहे हैं, भावना से प्रत्यक्ष परमात्मा के, नारायण के दर्शन करते हैं। बाजार में हो तब तक वह भले ही पत्थर की मूर्ति रहेगी पर मंदिर में विराजने पर वह साक्षात् भगवान् का स्वरूप ही है। लोहे की छैनी, अग्नि में गर्म हो जाने पर अग्निरूप ही हो जाती है। वेद-विधि से प्राण-प्रतिष्ठा हो जाने पर वह मूर्ति नहीं कही जाती वह तो साक्षात् परमात्मा का स्वरूप ही है। भावना से भगवान् मंदिर में विराजमान दिखाई दे रहे हैं, भावना के बिना से ही पत्थर की मूर्ति दिखाई देते हैं।

आप जिस तरह मंदिर में भावना से भगवान् के दर्शन करते हैं, उसी तरह प्रत्येक मानव शरीर में भी भगवान् के दर्शन कीजिए। आपको कोई स्त्री दीख पड़े, कोई पुरुष दीख पड़े तो ऐसी भावना कीजिए कि मैं जिन इष्टदेव की पूजा करता हूँ, वे इस शरीर में विराजमान हैं। शरीर में उसी को देव के दर्शन होते हैं, जिसमें देह-दृष्टि नहीं है। मानव के शरीर में देव के दर्शन करने हो तो देह को न देखिये जो देह को देखता है, उसे देव नहीं दीख पड़ते हैं। वह देव से दूर हो जाता है। मल-मूत्र से पूर्ण यह देह देखने योग्य नहीं है। अगर यह शरीर सचमुच ही अच्छा है तो शरीर से प्राण निकल जाने के बाद उसे घर में सँभाल के क्यों नहीं रख लेते? अगर वह अच्छी वस्तु है तो लोग क्यों जल्दी करते हैं? क्यों कहते हैं कि जल्दी निकालिये, नहीं तो वजन बढ़ जायगा ? शरीर के भीतर भगवान् विराजमान हैं। इसी से शरीर की शोभा है। देह की शोभा देव के कारण है। उसे ही देव के दर्शन होते हैं, जो देह से दृष्टि हटा लेता है तथा जो देह का चिंतन नहीं करता है।

आप आज से नियम लीजिए कि मैं किसी के शरीर को नहीं देखूंगा। एक सौ रुपये के नोट में जैसे आप भावना से रुपयों के दर्शन करते हैं, उसी तरह, प्रत्येक मानव शरीर में भावना से परमात्मा के दर्शन कीजिए। आप जिस देव की पूजा करते हैं, वे देव सर्व में हैं। ये सर्वशक्तिमान् हैं। 

श्री डोंगरेजी महाराज



गुरुवार, 15 सितंबर 2022

मानव जीवन

 परमात्मा ने मानव को ही ऐसी शक्ति दी है कि मानव अपनी शक्ति और बुद्धि का सदुपयोग कर सकता है। वह इस शक्ति और बुद्धि का उपयोग भगवान् के लिए करता है, तब मृत्यु से पहले ही उसे परमात्मा के दर्शन होते हैं, पर प्रायः मानव अपनी बुद्धि का उपयोग धन प्राप्ति के लिए करता है और शक्ति का उपयोग भोग के लिए करता है। इससे वह अन्तकाल - में बहुत पछताता है। शक्ति और बुद्धि परमात्मा के लिए हैं। दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर परमात्मा के दर्शन के लिए जो प्रयत्न नहीं करता है, वह स्वयं अपनी ही हिंसा कर रहा है। ऋषि उसे आत्मघाती कहते हैं।

जिसकी परमात्मा के दर्शन की इच्छा है, जो प्रभु के दर्शन के लिए प्रयत्न करता है, उसे भले ही परमात्मा के दर्शन न हों, पर उसका मरण सुधरता है। अन्तकाल के समय में उसे शान्ति प्राप्त होती है। उसका मरण मंगलमय होता है। किसी भी प्रकार के लौकिक मन में रहती है, अन्तकाल के समय में उसे बहुत त्रास होता है। सुख की इच्छा जिसके मानवेतर किसी प्राणी को प्रभु के दर्शन नहीं होते हैं। स्वर्ग के देवों को भी भगवान् के दर्शन नहीं होते हैं। स्वर्ग में देव अति सुखी हैं। भले ही वे सुख भोग लें, पर उस सुख का अन्त तो है ही। संसार का एक नियम है जहाँ सुख है, वहाँ दुःख भी है जो मर्यादा को छोड़कर सुख भोगता है, उसकी इच्छा चाहे न हो, उसे दुःख भोगना ही पड़ता है स्वर्ग के देव हमसे अधिक सुख भोगते हैं, उन्हें अति सुख मिलता है, फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती है शान्ति तो परमात्मा के दर्शन से ही मिलती है।

इससे देव ऐसी इच्छा करते हैं कि उन्हें भारत में जन्म मिले। भारत भक्ति-भूमि है। स्वर्ग में नर्मदाजी नहीं हैं, गंगाजी नहीं है, साधु-संन्यासी नहीं हैं। वहाँ सभी भोगी जीव है। स्वर्ग भोग भूमि है जिसने बहुत पुण्य एकत्र किये हों वह सुख भोगने के लिए स्वर्ग में जाता है परन्तु स्वर्ग से भी भारत देश श्रेष्ठ है। देव, भक्ति नहीं कर सकते हैं। भक्ति मानव शरीर से ही होती है। मानव सावधान रहने पर पाप छोड़ सकता है। मानव प्रतिक्षण सावधान रह कर, पाप छोड़कर भक्ति करे तो मृत्यु से पहले उसे भगवान् के दर्शन होते हैं। सभी मानवेतर प्राणियों को भोग ही मिलता है। मानव-शरीर की यही विशेषता है कि मानव, विवेक से थोड़ा सुख भोग करे और भक्ति करे तो उसे भोग और भगवान दोनों मिलते हैं। श्रीकृष्ण दर्शन मानव शरीर द्वारा ही हो सकते हैं। मानव में ऐसी शक्ति है।

स्वर्ग के देव पुण्य का फल, सुख भोगते हैं। पशु, पाप का फल, दुःख भोगते हैं। पशु आत्मा को शरीर समझता है। शरीर से आत्मा अलग है, मानव इसे जानता है। "शरीर ही मैं हूँ, शरीर ही आत्मा है"- ऐसा पशु समझते हैं। इससे वे शरीर-सुख में मग्न रहते हैं। पशु का स्वभाव सुधरता नहीं है। बिल्ली जन्म से लेकर मृत्यु तक चूहे की हिंसा करती है। बिल्ली ने कभी चूहे की हिंसा करना छोड़ दिया हो, ऐसा सुना नहीं है। पशु स्वभाव को छोड़ नहीं सकते। उनका स्वभाव एक-सा रहता है।

मानव चाहे तो अपने स्वभाव को सुधार सकता है। जप करने से, कथा सुनने से आपका स्वभाव सुधरेगा। सत्संग से स्वभाव सुधरता है। भक्ति करने से जीव में परमात्मा के सद्गुण आते हैं और तब मानव का स्वभाव सुधरता है। जिसका स्वभाव सुधरता है उसे मृत्यु से पहले ही मुक्ति मिलती है।

मानव चाहे तो पाप छोड़ सकता है और पुण्य कर सकता है। पशु-पक्षी नया पाप नहीं कर सकते हैं। उनसे कदाचित् पाप हो तो प्रभु क्षमा करते हैं। देव, पुण्य नहीं कर सकते हैं। मानव चाहने पर पाप छोड़ सकता है। वह निरन्तर भक्ति कर सकता है। निरन्तर भक्ति करने पर भगवान के दर्शन होते हैं। परमात्मा के दर्शन से जीव कृतार्थ होता है।

श्री डोंगरेजी महाराज



बुधवार, 14 सितंबर 2022

श्रीराम- श्रीश्याम 1

 

राम-नाम का सतत जप करो और रामजी की सेवा करो ! रामजी की सेवा अर्थात् रामजी की मर्यादा का पालन ।रामजी की मर्यादा का पालन करोगे तो तुम्हारे मन का रावण अर्थात् काम मरेगा तुम्हारे मन का काम मरेगा तो श्रीकृष्ण परमात्मा आयेंगे। श्रीराम के  पीछे ही श्रीकृष्ण आते हैं। भागवत में भी श्रीरामचरित के कहने के उपरान्त ही श्रीकृष्ण चरित का वर्णन किया है। रामचन्द्रजी का वर्णन रामायण में विस्तार से किया हुआ होनेपर भी श्रीमद्भागवत में भी उसका संक्षेप में वर्णन किया गया है। कारण यह है कि जो श्रीरामचन्द्रजी की मर्यादा का पालन करता है, उसको ही कन्हैया मिलता है । रावण को अर्थात् कामवासना को मारे, वही श्रीकृष्ण लीला का दर्शन कर सकता है ।

वासना दो प्रकार की है, स्थूल और सूक्ष्म । इन्द्रियो मे रहने वाली वासना स्थूल है और मन-बुद्धि में रहने वाली वासना सूक्ष्म है । सन्तो का धर्म जीवन में उतारने से स्थूल वासना का तो नाश हो जाता है परन्तु मन-बुद्धि में रहने वाली सूक्ष्म वासना नष्ट नहीं हो पाती सूक्ष्म वासना का नाश तो श्रीराम श्रीकृष्ण करते हैं।


श्रीरामचन्द्रजी सूर्यवंश में प्रकट हुए है और श्रीकृष्ण, चन्द्रवंश में प्रकट हुए है। चन्द्र मन के मालिक है और सूर्य बुद्धि के । मन-बुद्धि में रहनेवाली सूक्ष्म वासना का तभी विनाश हो पाता है, जब श्रीराम-कृष्ण की आराधना करने में आवे । वासना का पूर्ण क्षय हुए बिना मोह का नाश होता नही और मोह का नाश हुए बिना मुक्ति मिलती नहीं । मन में से सूक्ष्म मल का नाश हो, तभी मन मरता है । मन मरे, मन श्रीराम कृष्ण में मिल जाय तो मुक्ति मिलती है । आत्मा तो नित्य मुक्त है । मुक्त तो मन को करना है । बन्धन मन को बाँधते है। मन के बन्धन का आरोप अज्ञान से आत्मा अपने ऊपर ले लेता है । यह अज्ञान से ऐसा समझता है कि मुझे किसीने बांधा है।

मन ने विषय-वासनाओं को पकड़ रखा है, उससे वह बन्धन मे पड़ जाता है ।  मानव को किसने बांधा है ? वासनाओ के अधीन होकर स्वयं ने स्वयं को बाँध रखा है।

ईश्वर के साथ एक होना है परन्तु मन-बुद्धि मे रहने वाली सूक्ष्म वासना प्रभु मिलन में विघ्न करती है । मानव का लक्ष्य परमात्मा से मिलना है, ईश्वरके साथ एक रूप होना है । उसके लिए बुद्धि में से भी वासनाओं का विनाश करना है। बुद्धि में वासना का थोड़ा भी अंश रह जाय तो बुद्धि निर्व्यसन होती नही, शुद्ध होती नही, स्थिर होती नही बुद्धि को निर्व्यसन करने के लिये शुद्ध करने के लिए स्थिर करने के लिए मन के मालिक चन्द्र की और बुद्धि के मालिक सूर्य की आराधना करनी आवश्यक है।

राम न आये तब तक श्रीकृष्ण आते नहीं। भागवत में मुख्य कथा श्रीकृष्ण की होने पर भी पहले श्रीराम का प्रकटन है और पीछे श्रीकृष्ण पधारे है । मनुष्य रामजी की मर्यादा का पालन करे तो ही श्रीकृष्ण लीला का रहस्य समझ सकता है। मनुष्य को थोड़ी सम्पत्ति मिले, थोड़ा अधिकार मिले, उसी से वह मर्यादा को भूल जाता है । रामजी की मर्यादा का पालन ही रामजी की उत्तम सेवा है। रामजी को पधाराना हो तो रामजी की मर्यादा का पालन करो। रामजी न पधारें तब तक श्रीकृष्ण आते नही । जो वेद की, शास्त्रों की मर्यादा का बराबर पालन करते हैं, उन्हीं का मन शुद्ध होता है । उन्ही को पीछे प्रेम भक्ति का रङ्ग लगता है । इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम की लीला पहले वर्णन की गयी है । पुष्टि- पुरुषोत्तम पीछे आये है । उदाहरण के तौर पर मास्टरजी सरल अक्षर पहले पढाते हैं और जटिल अक्षर पीछे पढ़ाते हैं।


श्रीराम मर्यादा रूप हैं और श्रीकृष्ण प्रेम-रूप है। मर्यादा और प्रेम जीवन में उत्तारोगे तो सुखी रहोगे श्रीराम और श्रीकृष्ण एक ही है। दोनों साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम के अवतार हैं श्रीमद्भागवत में भगवान के चौबीस अवतारों की कथा आती है महापुरुष कहते हैं कि अल्पकाल के लिए थोड़े जीवों का उद्धार करने के लिए जो अवतार होता है, वह अंशावतार है और अनन्तकाल के लिए अनन्त जीवों का कल्याण करने के लिए जो अवतार होता है, वह पूर्णावतार है । भगवान के जितने अवतार हुए हैं वे सभी श्रेष्ठ हैं, कोई अवतार साधारण नहीं परन्तु श्रीराम और श्रीकृष्ण के समान कोई हुआ नहीं। इनकी लीला अलौकिक है।


भक्ति में दुराग्रह न रखो श्रीराम में दो कला कम है, ऐसा मत मानो। दोनों अवतार परिपूर्ण है। रामावतार में रामजी ने सब कुछ किया राक्षसों को मारा, अनेक यज्ञ किये, प्रजा को अतिशय सुखी किया, अनेक जीवों को तारा। परन्तु रामजी राजाधिराज थे, इसलिए गायों की सेवा कर सके नहीं। रामजी के यहाँ अनेक सेवक थे, इसलिए गायों की पूजा, गायों की सेवा उन्होंने रामजी को करने दी नहीं। इसी कारण से रामजी श्रीकृष्ण स्वरूप में गायों की सेवा करने के लिए व्रज में पधारे है। श्रीराम ही श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण ही श्रीराम है।

श्रीराम श्रीकृष्ण एक ही है। दोनों की लीला पृथक है। एक दशरथ महाराज के राजमहल में अवतरित हुए है, दूसरे कंस के कारागार मे । एक दिन के बारह बजे प्रगट हुए हैं, दूसरे रात्रि के बारह बजे ।


मनुष्य दिन में दो बार सुध-बुध खोता है। दिन के बारह बजे भूख से और रात्रि को निवृत्ति में काम सुख की याद से ।ये दोनों समय पवित्र करने है। दिन मे रामजी को बाद करो और रात्रि में श्रीकृष्ण को, तो ये दोनो समय पवित्र हो जायेगे मर्यादापुरुषोत्तम रामजी की मर्यादा का पालन करो तो  पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पुष्टिपूर्वक कृपा करेंगे ।

श्रीकृष्ण में समस्त सद्गुण होने पर भी श्रीकृष्ण का चरित्र ऐसा दिव्य है कि जल्दी  से बुद्धि स्वीकार नही करती। श्रीकृष्ण का जीवन रहस्य समझना कठिन है। श्रीराम की लीला का रहस्य समझना बहुत कठिन नहीं । श्रीरामजी की मर्यादा का पालन करना - यह बहुत कठिन है। तुम किसी भी देवता की सेवा करो, किसी भी सम्प्रदाय की शिक्षा ग्रहण करो परन्तु तुम को रामजी की सेवा तो करनी ही पड़ेगी। श्रीरामजी के दर्शन बिना श्रीरामजी की सेवा बिना, जीवन शुद्ध होगा ही नही। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करे उसे भी श्रीरामजी की सेवा करनी ही पड़ेगी। कोई वैष्णव ऐसा मानता हो कि मैं रामजी की सेवा नहीं करूँ, रामजी को नहीं मानें, तो उसकी सेवा श्रीकृष्ण को सहन होती नहीं। कोई शिवजी की सेवा करता हो और रामजी को न माने तो उसकी सेवा शिवजी को सहन नही होती।


जगत में जिसने देवता हैं, सबकी लीला अनुकरणीय नहीं रामजी की प्रत्येक लीला अनुकरणीय है।शिवजीकी सभी लीला अनुकरणीय नहीं।

श्रीशिवजी महाराज तो सारे अंग पर चिता भस्म धारण करते हैं। चिता-भस्म शिव स्पर्श से पवित्र होती है। तुम उज्जैन गये होगे, उज्जैन में महाकालेश्वर विराजते है। वहाँ श्मशान में से शिवजी महाराज के लिए भस्म आती है। वहाँ जो पूजा होती है, उसमें ऐसा नियम है कि शिवजी को अभिषेक कराने के पश्चात् सबसे पहले चिता भस्म अपंग करते हैं परन्तु हमसे ऐसा नहीं होगा। हम चिता भस्म लगायें तो नहाना पड़ेगा। शंकर भगवान तो जहर भी पी गये। हमसे ऐसा हो सकेगा क्या ?

भगवान शंकर के पास एक बार कामदेव गया था। शिवजी ने आँख उठाकर देखा । कामदेव जलकर भस्म हो गया। शिवजी का कामदेव स्पर्श कर सकता नहीं । जो अमंगलरूप काम को मारता है उसका सब कुछ मंगलमय है । शास्त्र मे काम को अमंगल कहा गया है।

शिवजी की लीला दिव्य है। अपने जैसे साधारण मनुष्यो से उनका अनुकरण हो नहीं सकेगा। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला अनुकरणीय नहीं है। श्रीकृष्ण जो करें सो अपने से होगा नही ।

श्रीकृष्ण माखन की चोरी करते हैं और हम करे तो ? करो तो उसके पीछे खबर पढे कि क्या होता है। श्रीकृष्ण की सभी लीला अटपटी है। श्रीकृष्ण माखन की चोरी नहीं करते हैं यह तो गोपियो का प्रेम ऐसा है कि वह परमात्मा का आकर्षण करता है ।गोपियो के घर माखन खाने की परमात्मा की इच्छा होती है । श्रीकृष्ण जगत का आकर्षण करते है और श्रीकृष्ण का आकर्षण गोपी-प्रेम करता है । श्रीकृष्ण ने चोरी की, ऐसा सन्तों ने कहा नही, श्रीकृष्ण तो मालिक ही हैं। ये तो गोपियाँ, लाला को लाड़ में ऐसा कहती थी कि कन्हैया माखन चोर है । प्रेम मे कोई गाली भी दे तो तनिक भी बुरा लगता नही । गोपी तो प्रेम की मूर्ति हैं गोपी भले ही लाला को माखन चोर कहकर बुलायें परन्तु तुम किसी भी दिन माखन चोर कहना नही । तुम लाला को माखन चोर कहोगे तो लाला को सहन होगा नहीं। कन्हैया कहेगा, मैं चोर नही, तू चोर, तेरा बाप चोर और तेरा दादा भी चोर घर मे किस प्रकार एकत्रित करके बङ्गला बनाया है उस सबको मैं जानता हूँ । मुझको सब खबर है कैसा है, यह तो मैं जानता हूँ चोर तो तू है मैं तो मालिक हूँ।

अरे ! ताला तोड़कर ले जाय, क्या उसी को चोर कहते है ? आजकल तो कितने ही चोरी की ऐसी चतुराई करते हैं कि किसी को खबर ही नही पडती । यहाँ भले ही खबर न पड़े परन्तु ऊपर तो ठाकुरजी को सब खबर पड़ ही जाती है।

जगत में जो कुछ भी है, उसके मालिक श्रीकृष्ण ही है। श्रीकृष्ण जो करे, वह तुमको करणीय नही । गोपी तो तन, मन, धन सर्वस्व श्रीकृष्ण को अर्पण कर देती है। उन गोपियो के घर जाकर कन्हैया माखन खायगे तो यह उनकी प्रेम-लीला है। उसके अनुकरण करने की मनाही है।

श्रीकृष्ण कालिय नाग के ऊपर नाचते थे । अपने को तो नाग का नाम लेते ही घबराहट होती है। 

जहर पचाने के पीछे ही श्रीकृष्ण का अथवा शिवजी महाराज का अनुकरण हो सकता है? अपने में यह शक्ति नहीं। हम जहर पीकर पचा सकते नहीं ।

श्रीकृष्ण की रासलीला का श्रवण करो। सुनकर पीछे उसका मनन करो परन्तु उनका अनुकरण न करो। रासलीला का अनुकरण नहीं करना है । रासलीला का श्रवण करो, आँख बन्द करके रासलीला का चिन्तन करो। रासलीला का चिन्तन करने से काम विकार का नाश होता है । शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ रमण, यही तो रास है । रासलीला अर्थात् जीव और ईश्वर का मिलन रासलीला, यह कामलीला नहीं रासलीला में जिसे काम की गन्ध आती है, उसकी बुद्धि बिगड़ी हुई है श्रीकृष्ण के सामने काम टिक ही नहीं सकता ।

एक समय कामदेव को अभिमान हुआ कि मैं बड़े से बड़ा देव हूँ। बड़े-बड़े ऋषि मेरे अधीन हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवता भी मेरे अधीन रहते हैं उस अभिमान काम देव श्रीकृष्ण के पास गया और उनसे कहा- 

'मेरी और आपकी कुश्ती हो', 

संस्कृत में काम का नाम है मार । समय आनेपर सभी को मारता है । कामदेव की श्रीकृष्णके ऊपर शक्ति आजमाने की इच्छा हुई।

श्रीकृष्णने कामदेव से कहा 

'शिवजीने तुमको जला दिया था, वह भूल गया।'

कामदेवने कहा-

 'शिवजी ने मुझे जलाया, यह बात सच है परन्तु उसमें मेरी थोड़ी भूल थी। शिवजी समाधि में बैठे थे । तेजोमय ब्रह्म का चिन्तन कर रहे थे । पूर्ण सावधान थे, उसी समय में मैं उनको मारने गया । मैंने समय का विचार किया नहीं। इससे मेरी हार हो गयी और शिवजी ने मुझे जलाकर भस्म कर दिया। समाधि में बैठे-बैठे जलावे, इसमें विशेष आश्चर्य नहीं ।'

प्रभुने कहा- 

'रामावतार में भी तेरी हार हुई।'

कामदेवने कहा-

' रामावतार मे तो आप खुब मर्यादा में रहते थे। किसी भी स्त्री का स्पर्श करते नहीं थे। स्त्री के सामने देखते भी नहीं थे देखते तो मातृभाव से देखते थे। रामावतार मे खूब मर्यादा पाल कर मेरा पराभव किया था। मर्यादा में रहकर साधारण जीव भी मेरा पराभव कर सकता है। गृहस्थाश्रम रूपी किले में रहकर आपने मुझे मारा है। रामावतार मे तो आप एक पत्नीव्रत पालते थे। इसलिए आपने मुझे मारा। इसमें क्या आश्चर्य ?'

श्रीकृष्णने कहा 

'तो अब तेरी क्या इच्छा है ?'

कामदेवने कहा--- 

'रामावतार में मर्यादा में रहकर आपने मुझे हराया, इसमें कोई खास बात नही । अब इस कृष्णावतार में आप कोई मर्यादा न रखो। मर्यादा तो साधारण मनुष्य के लिए है, परमात्मा के लिए होती नही ।आपको मर्यादा पालने की क्या जरूरत है ? सब प्रकार की मर्यादा छोड़कर शरद् पूर्णिमा की रात्रि मे अनेक स्त्रियों के साथ वृन्दावन में आप विहार करो और मैं आपको बाण मारूं तब भी आप निर्विकारी रहो तो आपकी जीत और कामाधीन बनो तो मेरी जीत ।आप निर्विकारी रहो तो आप ईश्वर और मेरे अधीन बनो मै  ईश्वर ।

रामावतार में शरीर से तो नही परन्तु मन से भी किसी स्त्री का स्पर्श किया नहीं । मन से स्पर्श हो, यह भी पाप है। कृष्णावतार में श्रीकृष्ण पुष्टि पुरुषोत्तम हैं। काम ने ऐसा माना कि

 'श्रीकृष्णको हराना सरल है।' 

श्रीकृष्ण तो गोपियों के साथ स्त्रियो के साथ मुक्त रूप से विहार करते हैं, इसलिए में उन्हें हरा सकूंगा ।

श्रीकृष्णने कहा है 

'तेरी इच्छा है तो मैं ऐसा ही करूंगा।'

स्त्रियों से दूर जङ्गल में बैठकर पत्ता चबा कर संयम पाले, काम को मारे इसमें आश्चर्य नहीं। प्रत्येक स्त्री में मातृभाव रखे और काम को मारे, इसमे भी कोई आश्चर्य नही परन्तु श्रीकृष्ण ने तो स्त्रियों के बीच रहकर काम को मारा। शरद् पूर्णिमा की रात्रि में गोपियो के साथ रासलीला मे रमण किया और काम के ऊपर विजय प्राप्त की । श्रीकृष्ण का स्मरण करने वाले को भी काम त्रास दे नहीं सकता तो श्रीकृष्ण  को तो वह दे सकता है ? काम का पराभव हुआ। काम ने धनुष-बाण फेंक दिया। रासलीला, यह काम के ऊपर विजय करने की लीला है । श्रीकृष्ण योगेश्वर हैं ।

श्रीकृष्ण की लीला अनुकरण करने के लिए नही परन्तु उसका श्रवण करके, चितन करके, उनमें तन्मय होने के लिए है । रामजी की प्रत्येक लीला अनुकरणीय है । रामजी की अमुक लीला अनुकरणीय और अमुक लीला चिन्तनीय है, ऐसा नही। रामजी का समस्त आचरण अनुकरणीय है । रामजी की प्रत्येक लीला अनुकरण करने योग्य है । आचरण हमेशा रामजी की तरह रखो श्रीकृष्ण परमात्मा है। श्रीकृष्ण कहे, वही करने योग्य है। । वे करे, वह करना नही है । श्रीराम परमात्मा है। श्रीराम करे वह करना है। रामजी पूर्ण पुरुषोत्तम होने पर भी मनुष्य को आदर्श बतलाते हैं। रामजी के सद्गुण जीवन में उतारने हैं। रामजी सब सद्गुणोके भण्डार है।


रामजी प्रत्येक स्त्री में मातृभाव रखते थे। किसी स्त्री को काम भाव से देखते नही थे। रामजी का मातृ प्रेम, पितृ प्रेम, बन्धु-प्रेम, रामजी का एकपत्नी व्रत, एकवचनी व्रत, रामजीका संयम, रामजीका सदाचार, रामजी की उदारता, रामजी की निष्कामता आदि मानव-जीवन में उतारने योग्य है। रामजी ने ऐश्वर्य छिपाया है। मनुष्यों जैसा नाटक किया है साधक का व्यवहार कैसा होना चाहिए, वह रामजी ने बताया है । साधक का व्यवहार रामजी जैसा होना चाहिए। सिद्ध पुरुष का आचरण कदाचित् श्रीकृष्ण का जैसा हो सके ।

रामजी की लीला सरल हैं। श्रीकृष्ण की सभी लीला गहन है। अटपटी हैं। रामजी की बाल- लीला भी अति सरल है। इनकी बाल लीला में भी अतिशय मर्यादा है। कन्हैया ने विचार किया कि रामावतार में मर्यादा का बहुत पालन किया, इसलिए दुःखी हुआ। अब की बार कृष्णावतार में मर्यादा का पालन नहीं करूँगा कन्हैया तो यशोदा माँ को भी चलाते है । बालकृष्ण माता से कहते हैं कि माँ तुम मुझे छोड़कर कहीं जाना नहीं तू घर का काम-काज छोड़कर मुझे खिलाया कर । पूरे दिन मुझे गोदी में लेकर खिलाया कर । कदाचित् कभी यशोदा माँ कन्हैया को छोड़कर घर का काम करने चली जायें तो क्या  तुफान मचा डालते है। दही -माखन की हांड़ी - मटके फोड़ देते हैं और माँ सजा देने आये तो लाला हाथ मे आवे ही नहीं।

श्रीराम तो अति सरल है, अति शान्त है। रामजी की बाल लीला में अतिशय मर्यादा है। छोटे भाइयो के साथ खेलते है तो इस रीति से खेलते है कि स्वयं की हार हो जाती है और लक्ष्मण की जीत हो जाती है ये तो बहुत सरल है सोचते है कि  भले ही मेरी हार हो जाय । बालकृष्ण जब खेलते है तो लाला की किसी दिन भी हार होती नही । कन्हैया जहाँ जाते है, वहाँ उनकी जीत ही होती है । रामजी माता-पिता की आज्ञा के बिना किसीके भी घर जाते नही । कन्हैया कभी यशोदा माँ की आज्ञा लेने जाते नहीं।


अयोध्या के लोग आये और रामलला को मनावे कि मेरी बहुत भावना है, तुम मेरे घर पधारो । तब रामचन्द्रजी कहते हैं- मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मैं तो माता-पिता के अधीन हूँ। मैं माँ की आज्ञा मे रहता हूँ । तुम मेरी माँ से कहो। माँ मुझे आज्ञा देगी तो मैं तुम्हारे घर आऊँगा।


लोग कौशल्य जी को मनाते हैं, प्रार्थना करते हैं कि माँ मेरी बहुत इच्छा है कि रामजी मेरे घर पधारे तुम रामजी को मेरे घर भेज दो माँ !

कौशल्याजी आज्ञा देती हैं तो रामजी जाते हैं परन्तु ये तो मर्यादापुरुषोत्तम है और राजाधिराज है ये किसी के घर जाते हैं तो यहाँ शान्ति से गद्दे तकिये के सहारे बैठे ही रहते है । श्रीराम अति शांत है । कन्हैया की सभी लीला निराली हैं, बहुत गहन है । कन्हैया कभी किसी से ऐसा कहते नही कि तुम मेरी माँ से कहो ये आज्ञा देगी तो मैं तुम्हारे घर आऊंगा । कन्हैया को तो किसी के आमन्त्रण की जरूरत ही क्या थी ? कन्हैया तो कहते है, मुझे कौन निमन्त्रण देगा ? मैं तो घर का धनी हूँ। इसलिए वह तो सबके बगैर बुलाये ही गोपियों के घर जाते है परन्तु लाला का ऐसा नियम था कि जिस घर का मालिक है, जिसने अपना सर्वस्व मन से लाला को अर्पण कर दिया है, उसी के ही घर लाला जाता है यह किसी अन्य के घर नही जाता, चाहे जिसके घर जाकर यह माखन नही खाता। खाता तो वहा है जहाँ प्रेम है, वही जाता है। श्रीकृष्णकी लीला मे अतिशय प्रेम है। एक गोपी के घर लाला माखन खा रहे थे। उस समय गोपी ने लाला को पकड़ लिया । तब कन्हैया बोले- तेरे धनी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, अब फिर कभी भी तेरे घर मे नही आऊँगा गोपी ने कहा- मेरे धनी की सौगन्ध क्यों खाता है ?

कन्हैया ने कहा -

तेरे बाप की सौगन्ध, बस ?


गोपी और ज्यादा चिड जाती है और लाला को धमकाती है परन्तु तु मेरे घर आया ही क्यों ?

 कन्हैया ने कहा - 

अरी सखी! तू रोज कथा मे जाती है, फिर भी तू मेरा-तेरा छोड़ती नही इस घर का मै धनी हूं, यह घर मेरा है। गोपी को आनन्द हुआ कि मेरे घर को कन्हैया अपना घर मानता है। कन्हैया तो सबका मालिक है । सभी घर उसी के हैं। उसको किसी की आज्ञा लेने की जरूरत नही गोपी कहती है- तूने माखन क्यों खाया ?

लाला ने कहा -माखन किसने खाया है ? इस माखन मे चीटी चढ़ गई थी, उसे निकालने को हाथ डाला। इतने में ही तू टपक पड़ी। गोपी कहती है परन्तु, लाला ! तेरे ओठ के ऊपर भी तो माखन चिपक रहा है। कन्हैया ने कहा- चीटी निकालता था, तभी होट के ऊपर मक्खी बैठ गयी, उस उड़ाने लगा तो माखन ओठ पर लग गया होगा । कन्हैया जैसा बोलते है, ऐसा बोलना किसी को आता नही कन्हैया जैसे सा चलना भी किसीको आता नही। गोपी ने तो पीछे लाला को घर में थम्ब के साथ डोरीसे बांध दिया। कान्हा का श्रीअङ्ग बहुत ही कोमल है। गोपी ने जब डोरी कसकर बांधी तो कान्हा की आंख में पानी आ गया। गोपी को दया आयी, उसने लाला से पूछा लाला ! तुझे कोई तकलीफ है क्या ? लाला ने गर्दन हिलाकर कहा-

'मुझे बहुत दुख  रहा है, डोरी जरा ढीली कर।'

गोपी ने विचार किया कि लाला को डोरी से कसकर बांधना ठीक नहीं मेरे लाला को दुःख होगा। इसलिए गोपी ने डोरी थोड़ी ढीली रखी और पीछे सखियो को खबर देने गयी कि मैंने लाला को बाँधा है। तुम लाला को बाँधो परन्तु किसी से कहना नहीं। तुम खूब भक्ति करो परन्तु उसे प्रकाशित मत करो। भक्ति प्रकाशित हो जायेगी तो भगवान सटक जायेगे। भक्ति का प्रकाश होने से भक्ति बढ़ती नही, भक्तिमें आनन्द आता नहीं ।..


बालकृष्ण सूक्ष्म शरीर कर के डोरी में से बाहर निकल गये और गोपी को अंगुठा दिखाकर कहा, तुझे बाँधना ही कहाँ आता है ?


गोपी कहती है तो मुझे बता, किस तरह से बांधना चाहिये । गोपी को तो लाला के साथ खेल करना है, लाला गोपी को बांधते हैं।


योगीजन मन से श्रीकृष्णका स्पर्श करते है तो समाधि लग जाती है। यहां तो गोपी को प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण का स्पर्श हुआ है। गोपी लाला के दर्शन में तल्लीन हो जाती है। गोपी का ब्रह्म-सम्बन्ध हो जाता है। लाला ने गोपी को बाँध दिया ।

गोपी कहती है कि लाला छोड़! छोड़! लाला कहते है मुझे बांधना आता है, छोड़ना तो आता ही नहीं । यह जीव एक ऐसा है, जिस को छोड़ना आता है। चाहे जितना प्रगाढ़ सम्बन्ध हो परन्तु स्वार्थ सिद्ध होने पर उसको भी छोड़ सकता है। परमात्मा एकबार बांध लें तो छोड़ते नहीं ।




श्रीराम- श्रीश्याम 2

 रामहिं केवल प्रेम विजारा जानि लेहु जो जाननि हारा ॥

 श्रीरामजीका नाम भी सरल है और स्वरूप भी सरल है। रामावतार में तो रामजी बहुत सरल थे परन्तु सरलता को लोगों ने मान नही दिया। जो बहुत सरल होता है, उसको भी लोग बहुत त्रास देते हैं । रामजी को बहुत सहन करना पड़ा था और इसी लिये तो कृष्णावतार में श्रीकृष्ण जन्म मे ही थोड़े बांके बने। प्रभु ने विचार किया, रामावतार में मैं बहुत ही सरल था परन्तु लोगो ने मान नही दिया। अतएव अब की बार मैं जन्म से ही बाँका रहूँगा ।

रामजी का नाम भी सरल है। राम नाम में एक भी जुड़वाँ अक्षर नहीं है। कृष्ण नाम में एक भी सरल अक्षर नही है, दोनो युग्माक्षर है। श्रीकृष्ण प्रकट हुए मथुरा के कारागार में, झूले गोकुल में, खेले वृन्दावन में, बड़े हुए मथुरा में और राज्य किया द्वारिका मे । इस प्रकार उनकी सभी लीला अटपटी हैं।

रामावतार मे तो ये अतिशय सरल हैं। रामजी खड़े रहते है तो भी सरलता से । बालकृष्ण खड़े रहते है, कभी-कभी वाँके होकर इसीलिए तो लाला का नाम पड़ा है। बाके बिहारी लाल !

श्रीकृष्ण सरल भी तो है कन्हैया बहुत भोले है बहुत प्रेमी है। लाला के लिये कोई थोड़ा माखन मिश्री ले जाय तो कन्हैया प्रेम से आरोगते हैं कि मेरे लिये माखन लाया है। कन्हैया बहुत सरल है परन्तु ये जगत को बताते है कि मै सरल के साथ सरल हैं परन्तु कोई बांका होकर आवे तो मैं भी उसके साथ बाँका हो जाता हूँ ।

श्रीराम तो सबके साथ सरल हैं । श्रीकृष्ण सरल के साथ सरल है, बांकेके साथ बाँके हैं । श्रीराम तो रावण के साथ भी सरल हैं। श्रीराम सज्जन - दुर्जन सबके साथ सरल हैं। जीव का अपराध रामजी देखते नही श्रीकृष्ण सज्जन के साथ सरल है, दुर्जन के साथ सरल नही हैं। सुदामाजी आँगनमे आये है, ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण सिंहासन से कूद पड़े और सामने गये, सुदामाजी को आलिंगन किया । परमात्मा श्रीकृष्ण सुदामाजी के चरण पखारते है और उनको गद्दी के ऊपर बैठाते है, स्वयं नीचे बैठे है सुदामाजी सच्चे ब्राह्मण है इसलिए श्रीकृष्ण उनके साथ अतिशय सरल है परन्तु श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्यके साथ सरल नहीं है, बाँके है। सुदामाजी ब्राह्मण है और द्रोणाचार्य भी ब्राह्मण है। द्रोणाचार्य वेद-शास्त्रो सम्पन्न ज्ञानी ब्राह्मण है।

द्रोणाचार्य साधारण ब्राह्मण नही है। चार वेद और छः शास्त्रोके ज्ञाता है । प्रभुने विचार किया कि बहुत ज्ञाता होनेसे क्या ? वे स्वरूपको भूले हुए हैं। बहुत ज्ञानवान हो कर पाप करे तो ठाकुरजी को भी गुस्सा आता है। जिसने ज्ञान पचाया है, वह कभी कपट करता नही, किसी के साथ अन्याय नहीं करता । कपट करने से ही हृदय बाँका होता है। सच्चे ज्ञानी का लक्षण यह है कि उसका हृदय बहुत सरल होता है, कोमल होता है और उसका व्यवहार शुद्ध होता है । द्रोणाचार्य जानते थे कि युद्ध करना ब्राह्मण का धर्म नही । फिर भी वह युद्ध करते हैं। इनको अच्छी तरह खबर थी कि दुर्योधन ने अन्याय किया है, फिर भी दुर्योधन को सहायता करनेके लिए वे युद्ध करते हैं।


द्रोणाचार्य ने इतना बड़ा अपराध किया। श्रीकृष्णने विचार किया कि इतना बड़ा ज्ञानवान है, ज्ञानी है। जानते हुए भी पाप करता है। मैं भी समझकर कपट करूंगा ।

महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मरवा कर श्रीकृष्ण ने इस बात की चर्चा फैलायी कि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मारा गया है। द्रोणाचार्य को ऐसा लगा कि श्रीकृष्ण तो कदाचित् बुरा भी बोल सकते है। इनसे कौन कहने वाला है ? चलो, युधिष्ठिर से पूछें, ये असत्य नहीं बोलते।

परन्तु श्रीकृष्ण ने तो धर्मराज से पहले कह रखा था कि मैं जो कहूँ वही तुम कहना । सत्य की व्याख्या समझाते हुए श्रीकृष्ण भगवान ने धर्मराजसे कहा, सबमें सद्भाव रखते हुए सबका हित हो, ऐसा बोले उसी का नाम सत्य है । द्रोणाचार्य ज्ञानी ब्राह्मण हुए भी दुर्योधन रूपी अधर्म की सहायता करते है । 'अश्वत्थामा मारा गया, सुनकर द्रोणाचार्य युद्ध छोड़ देंगे। युद्ध छोड़े, उसीमें उनका कल्याण है। इसलिए तुम मेरी बात का अनुमोदन करना। श्रीकृष्णके कहने से ही धर्मराज को 'नरो वा कुंजरो वा' कहना पड़ा। धर्मराजके कहने से द्रोणाचार्य ने शस्त्र छोड़े और उनका वध हुआ । श्रीकृष्ण कपट करके मारते हैं। श्रीकृष्ण ब्राह्मणकी पूजा भी करते है और कोई ब्राह्मण जब ज्ञान को भूलता है तो कपट करके उसे मारते भी है। श्रीकृष्ण की सभी लीलाएं दिव्य है। रामजी की सभी लीलाएँ बहुत सरल हैं। रामजी की जैसी सरलता कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी।  

 राम-रावण युद्ध में रावण जिस समय बहुत थक गया, घायल हो गया, घबरा गया, उस समय श्रीरामचन्द्रजी उसे घर जाकर आराम करने को कहते हैं। फिर आने वाले कल को युद्ध करेंगे रामजी रावणसे ऐसा कहते हैं।


श्रीराम रावणके साथ सरल हैं परन्तु श्रीकृष्ण दुर्योधनके साथ सरल नही । रामचन्द्रजी कुटिल के साथ भी सरल व्यवहार करते हैं और श्रीकृष्ण सरल के साथ सरल और कुटिल के साथ कुटिल व्यवहार रखते हैं। तुम किसी को धोखा मत देना परन्तु व्यवहार में सावधान रहना कि तुमको भी कोई धोखा न दे जाये ।


श्रीराम और श्रीकृष्ण के समान इस जगतमें हित करनेवाला और कोई नही। देवता, मनुष्य सब की यह रीति है कि सब स्वार्थके लिए ही प्रीति करते हैं । श्रीराम श्रीकृष्ण तो पूर्ण निष्काम है। बालि को मारकर किष्किन्धा का राज्य रामजी के चरणों आया। राज्य का शासन करने के लिए सुग्रीव ने रामजी से विनती की।

रामजी ने मना किया और किष्किन्धा का राज्य सुग्रीवको सौप दिया। रावण को मारने के पश्चात् लंका का राज्य रामजी ने विभीषण को सौंप दिया।

कंस को मारने के बाद मथूरा का राज्य मिला, वह श्रीकृष्ण ने लिया नहीं उग्रसेन को सौंप दिया।

श्रीराम एवं श्रीकृष्ण जैसा उदार कोई हुआ नहीं। ये पूर्ण अनासक्त है। परमात्मा जीव के प्रति अतिशय उदार हैं अतिशय दयालु है। जीव की योग्यता न होते हुए भी ये जीवके ऊपर खूब अनुग्रह करते हैं।


श्रीरामकी उदारता और दीन वत्सलता बेजोड़ है ।


ऐसो को उदार जग माहीं ।

 बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर

 राम सरिस कोउ नाहीं ॥


जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी । 

सो गति देव गीध परी कहूँ प्रभु ने बहुत जिय जानी ॥


अरे, परमात्मा तो ऐसे उदार है, ऐसे दयालु है कि वैर भाव से भी भजने वाले को मुक्ति दे देते हैं। राम ने राक्षसो को सद्गति दी है। श्रीकृष्ण ने पूतना, शिशुपाल, दन्तवक्त्र इत्यादि को सद्गति दी है। श्रीराम श्रीकृष्ण दो नहीं एक ही के दो स्वरूप है, निराकार ब्रह्म है, एक ही परमात्मा के दो भिन्न अवतार है ।


ब्रह्म जो व्यापक विरन अन अकल अनीह अमेद ।


सो कि देह परि होर नर जादि न जानरा वेद ।।






शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

बस की सीट


प्रेरक कहानी 

 महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है ...!

          

सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था , एक दिन दोनों भाई मरने मारने पर उतारू हो चले, तो पिताजी बहुत जोर से हँसे। 

पिताजी को हँसता देखकर दोनों भाई  लड़ाई को भूल गये और पिताजी से हँसी का कारण पूछा।  

 तो पिताजी ने कहा-- 

"इस छोटे से ज़मीन के टुकड़े के लिये इतना लड़ रहे हो, छोड़ो इसे, आओ मेरे साथ,एक अनमोल बेहद कीमती खजाना दिखाता हूँ मैं तुम्हें !आज वो खजाना हमारे पास क्यों नहीं है ! यह भी जानना तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है!"

   पिता घनश्याम जी और दोनों पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये !

पिताजी ने कहा -

"देखो यदि तुम फिर से आपस में लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नहीं लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा ! 

 अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया कि चाहे कुछ भी हो जाये, पर हम लड़ेंगे नहीं, प्रेम से यात्रा पे चलेंगे !

   गाँव जाने के लिये एक बस मिली, पर सीट दो की ही मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया।      

घनश्याम दोनों पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये  हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा कि  हवेली मे जगह-जगह कबूतरों ने अपना घोंसला बना रखा है तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे।    

दोनों पुत्रों ने पूछा -

"क्या हुआ पिताजी, आप रो क्यों रहे है ?"

तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा -

"जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन, जो तुमने यहाँ बिताया था, तुम्हें याद है पुत्रों, इस हवेली के लिये मैंने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी,सो ये हवेली तो मुझे मिल गई, पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया, क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा ! अच्छा, तुम ये बताओ बेटा कि बस में जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब कि उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे !"

तो दोनों पुत्रों ने एक साथ कहा कि 

"ऐसा कैसे हो सकता है, बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं !पहले कोई और बैठा था, आज हम बैठे ! फिर कोई और बैठा होगा और पता नहीं कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है, जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी थी !"

  पिताजी फिर हँसे ! फिर रोये और फिर वो बोले -

"देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है, तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था ! बाद में पता नहीं कब कौन होगा? बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।बस बेटा, एक बात ध्यान रखना कि इस थोड़ी सी देर के लिये कहीं अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना कि अच्छे-अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है।बस बेटा, मुझे यही कहना था कि बस की उस सीट को याद कर लेना, जिसकी रोज सवारियां बदलती रहती हैं ! उस सीट की खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था, बस वैसे ही जीवन की यात्रा में भी तालमेल बिठा लेना !" 

 दोनों पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये, और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे !


शिक्षा :-


*मित्रों, जो कुछ भी ऐश्वर्य - सम्पदा हमारे पास है, वो सब कुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है, थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्ते बड़े अनमोल होते हैं ! छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना ....!*


 Mansi Dwivedi की प्रस्तुति !!*





“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...