रविवार, 12 नवंबर 2023

 द्रौपदी, एक वृक्ष के नीचे, अकेली बैठी, बड़ी देर से अपने विचारों में लीन थी पिछले दिनों, उन लोगों ने परस्पर बहुत चर्चा की थी। चर्चा ही क्यों, उसे वाद-विवाद कहना चाहिए । “कितनी कटुता थी द्रौपदी के मन में युधिष्ठिर के लिए, और उसके पश्चात् भीम, अर्जुन तथा नकुल सहदेव के लिए । “कभी-कभी तो उसे लगने लगता था कि जिन धार्तराष्ट्रों ने उसका अपमान किया था, उनके प्रति भी उसके मन में उतनी कटुता नहीं थी, जितनी अपने पतियों के प्रति थी पर यह तो मन का छल मात्र था। ऊपरी काई हटाकर देखने पर उसकी समझ में आ गया था कि धार्तराष्ट्रों के प्रति उसके मन में घृणा थी, शत्रुता थी वह उनका नाश चाहती थी, सर्वनाश ! सबकी मृत्यु ! मृत्यु से कम कुछ नहीं । उनके साथ, उसके मन के माधुर्य का कोई एक सूत्र, कभी एक क्षण के लिए भी नहीं जुड़ा था। उनसे उसे कोई अपेक्षा नहीं थी । कटुता तो उनके प्रति थी, जिनसे उसे प्रेम था, जिनसे उसे अपेक्षाएँ थीं, जिन्हें वह अपने रक्षक मानती थी उन लोगों की ओर से उसके प्रेम की प्रतिध्वनि नहीं हुई। उन्होंने उसके प्रेम में बहकर अपने धर्म को तिलांजलि नहीं दी। उन्होंने अपने धर्म की रक्षा की और उसे असुरक्षित छोड़ दिया...।

द्रौपदी सोचती जाती थी और उसके अपने ही मन की परतें उघड़ती जाती थीं उसके मन में, यह बहुत बाद में स्पष्ट हुआ था पांडवों के व्यवहार से जो आहत हुई, वह द्रौपदी के भीतर की नारी थी। वह रूपगर्विता नारी, जो मानती थी कि पुरुष की दृष्टि उस पर पड़ी नहीं कि वह मदांध हुआ नहीं ! उसने चाहा तो यही चाहा कि जिस पुरुष  की ओर वह एक अपांग से देख ले, वह घुटनों के बल उसके सम्मुख आ गिरे। फिर उसका आचार-व्यवहार, धर्म- नीति, कुछ न हो, बस उसका रूप ही हो। पांडवों ने सदा उसे अपनी प्रिय पत्नी माना था। उसकी हल्की सी कसक से भी वे तड़प उठते थे; किंतु परीक्षा की इस घड़ी में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि वह उन्हें कितनी भी प्रिय क्यों न हो, उनके लिए धर्म से बढ़कर नहीं थी । 

द्रौपदी अपने-आपको भी धीरे-धीरे पहचान रही थी वह केवल एक रूपगर्विता नारी ही नहीं थी । नारी तो वह थी ही, और उसका रूप भी ऐसा था, जिस पर कोई भी गर्व कर सकता था किंतु यह तो उसके व्यक्तित्त्व का एक अंश मात्र था । उसके संपूर्ण व्यक्तित्त्व में तो और भी बहुत कुछ था वह धर्म को जानती थी, धर्मशास्त्र की पंडिता थी, चरित्र और संकल्प से परिचय था उसका ।अब यह उसकी बारी थी कि वह पांडवों के चरित्र पर मुग्ध हो । युधिष्ठिर को ठीक ही कहा जाता था 'धर्मराज !' और कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो पितृ आज्ञा को, अपना धर्म मानकर, अपना साम्राज्य इस प्रकार त्याग दे त्रेता में भगवान राम ने ऐसा किया था और द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर ने । ठीक है कि यह वैसा त्याग नहीं था,  जैसा भगवान राम ने किया था किंतु इसका मूल स्वरूप तो वही था । धृतराष्ट्र पांडवों का राज्य छीन लेना चाहता था, जैसे कैकेयी राम का राज्य छीनना चाहती थी । धृतराष्ट्र जानता था कि युधिष्ठिर उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे और वह यह भी जानता था कि द्यूत में शकुनि उनके हाथों में पासे आने ही नही देगा यह सब युधिष्ठिर भी जानते थे । वे द्यूत का विरोध करते रहे, किंतु धृतराष्ट्र की इच्छा का विरोध नहीं किया उन्होंने । खेलने बैठ ही गए थे, तो किसी भी दाव के पश्चात् वे उठ भी सकते थे । किंतु धृतराष्ट्र की आज्ञा की अपेक्षा में, वे बैठे, हारते रहे । पासों में हार चुकने के पश्चात् वे राज्य देना अस्वीकार कर सकते थे, इतना सैन्य बल था उनके पास । किंतु अपने वचन के विरुद्ध नहीं जा सकते थे । उनकी पत्नी को सभा में लाकर उनके सम्मुख निर्वस्त्र करने का प्रयत्न किया गया; किंतु धर्मराज तनिक भी नहीं डोले । वे जानते थे कि द्रौपदी दासी नहीं है, किंतु वे स्वयं तो दास हो चुके थे। वे स्वामी के विरुद्ध शस्त्र कैसे उठाते । पत्नी की रक्षा उन्होंने कुलवृद्धों, धर्म और ईश्वर पर छोड़ दी ।

कैसी परीक्षा ली थी धार्तराष्ट्रों ने पांडवों की ! पर क्या दुर्योधन पांडवों का राज्य ही छीनना चाहता था ?--यदि केवल इतनी ही बात होती, तो पांडवों से राज्य लेना क्या कठिन था ? युधिष्ठिर तो किसी भी बात पर राज्य त्याग देते ! और द्यूत के पश्चात् तो उनका राज्य ले ही लिया था। फिर उन्हें इस प्रकार अपमानित करने की क्या आवश्यकता थी ? वह मात्र पर-पीड़न का सुख लेना चाहता था ? पर नहीं । इस सुख कितना जोखिम था । वह पांडवों के बल को भी जानता था और क्रोध को भी । यदि पांडवों में से कोई एक भी अपनी मर्यादा तोड़ बैठता, तो कुछ  ही क्षणों में धार्तराष्ट्रों की इतनी अपरिहार्य क्षति हो जाती उसके पश्चात् पांडवों का जो भी होता। पांडव यदि मार भी डाले जाते, तो वे धृतराष्ट्र की इतनी हानि कर चुके होते, जो उसके जीवन का रोग बन गई होती। और बात पांडवों की मृत्यु के साथ ही तो समाप्त नहीं हो जाती। पांडवों के मित्र प्रतिशोध लेकर छोड़ते ।मित्र भी कैसे कृष्ण और धृष्टद्युम्न ! नहीं ! दुर्योधन पांडवों को मात्र अपमानित ही नहीं कर रहा था। वह उनकी परीक्षा भी नहीं ले रहा था। किसी की परीक्षा लेने के लिए, कोई अपने लिए इतना संकट आमंत्रित नहीं करता कदाचित् दुर्योधन एक ओर पांडवों का धर्म खंडित करना चाह रहा था और दूसरी ओर उनकी एकता ! वह युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ का राजा नहीं रहने देना चाहता, तो वह उन्हें धर्मराज भी नहीं रहने देना चाहता । वह चाहता है कि पांडव, धर्म के लिए न लड़ें, अपने राज्य के लिए लड़ें, अपने स्वार्थ के लिए लड़ें। वह चाहता है कि युधिष्ठिर भी उसी के समान मात्र एक भोगी, लोलुप और अत्याचारी क्षत्रिय बनें, ताकि धर्म का बल पांडवों की ओर न रहे । कोई राजा इसलिए पांडवों की ओर से न लड़े, क्योंकि वे धर्म के लिए लड़ रहे हैं; वह उनके पक्ष से इसलिए युद्ध करे, क्योंकि युद्ध जीतने से भोग-सामग्री उपलब्ध होती है । अहंकार स्फीत होता है। दूसरों का दमन करने का अधिकार मिलता है । और उस दिन धर्मराज तनिक भी दुर्वल पड़ते, तो ऐसा हो गया होता ।

नरेंद्र कोहली 

शनिवार, 11 नवंबर 2023

 अमृत बीज हालो, हलीम,चन्द्रशूर के फायदे गुण और उपयोग 

आयुर्वेद में कई ऐसे मसालों के बारे में बताया गया है, जो सुपरफूड की तरह काम करते हैं। आपने आज तक तरबूज के बीज, अलसी के बीज और मेथी के बीज के बारे में सुना होगा।  इनसे आपने कुछ मसालों का प्रयोग भी किया होगा। गार्डन क्रेस सीड्स को हिंदी में हलीम बीज के नाम से भी जाना जाता है, और महाराष्ट्र में यह हलीम सीड्स के नाम से भी लोकप्रिय है। यह छोटे लाल रंग के बीज आयरन, फोलेट, स्टार्च, विटामिन सी, ई, ई और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का एक शक्तिशाली घर हैं।

हलीम के बीज में आयरन का उच्च स्तर लाल रक्त पाउडर के उत्पादन को बढ़ावा मिलता है और शरीर में हिमोग्लोबिन के स्तर को बनाने में भी मदद मिलती है। लंबे समय में वे कुछ हद तक बीमारी के इलाज में भी मदद कर सकते हैं। इस बीज की तासीर गर्म होती है। यही कारण है कि हलीम के बीजों का सेवन पानी में भिगोने के बाद ही किया जाता है।

1 खून की कमी को ठीक करता है:–

हलीम के यंत्र में लौह की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। आयरन का अच्छा प्रोटीन प्रोटीन की वजह से यह बीज शरीर में होने वाली कमी को पूरा करने में मदद करता है।

2. वेट लॉस में है पोषक तत्व

हलीम के बीज में स्टार्च और प्रोटीन होता है। यह दोनों ही पोषक तत्व वेट लॉस में अपनी अहम भूमिका साझा करते हैं। ईसाइयों के अनुसार, हलीम के बीजों का सेवन करने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, इसके कारण भूख को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

3. यह स्तन में दूध के उत्पादन को पुनःप्राप्त करता है :–

हलीम के बीज में प्रोटीन और आयरन की प्रचुरता होती है और इसमें गुणकारी गैलोगॉग गुण होते हैं। इसलिए यह बोतल से दूध  पिलाने वाली महिलाओं के लिए बेहद की लाभकारी होती हैं। गैलेक्टोगोग ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो स्तन ग्रंथि से स्तन के दूध के उत्पादन को प्रेरित करते हैं, उसे बनाए रखते हैं और बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

4. मासिक धर्म को नियमित करने में मदद करता है :–

महिलाओं को गर्भधारण योजना के लिए मासिक धर्म चक्र को नियमित करना  बहुत जरूरी है। हलीम बीज फाइटोकेमिकल्स में समृद्ध है, जो एस्ट्रोजन हार्मोन की उत्पादन करता हैं, मासिक धर्म नियमित रूप से करते हैं।

इम्यूनिटी बूस्ट करें

फ्लेवो करोनोइड्स (एंटीऑक्सिडेंट्स), फोलिक एसिड और विटामिन-ए, सी और ई सेपेरिटन हलीम के बीज, शरीर की प्रतिरक्षा में सुधार के लिए एक बेहतरीन भोजन है जो आपको विभिन्न संक्रमणों और दवाओं से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। इसके रोगाणुरोधी  बुखार, आंख और गले में खराश जैसे विभिन्न संक्रमणों को रोकने में मदद करते हैं।

ऐसे और भी कई फायदे हैं जो इस छोटे बीज को अपने आहार में शामिल करने से निश्चित रूप मिलते हैं ये । इस प्रकार  से आपके शरीर के पोषण को बढ़ाने वाला है।

इसका सेवन करने के लिए एक गिलास पानी में 1चमच हलीम के बीज को रात भर के लिए छोड़ दें। सुबह खाली पेट का सेवन करें।

इसके अलावा हलीम के मसाले को रोटी और सब्जी में मिलाकर भी शामिल किया जा सकता है।

काला जीरा,मेथी, अजवायन, हालों के बीज इन चारों को मिलाकर दवाई बनाई जाती है जो बहुत उपयोगी है।


मंगलवार, 7 नवंबर 2023

"कृष्णे !”

द्रौपदी का, अब तक का सहेजकर रखा गया संयम टूट गया। इतने दिनों से वह जिसकी प्रतीक्षा कर रही थी, उसका वह सखा आ गया था पहले उसकी आँखें भर आईं, और फिर टप-टप आँसू गिरने लगे । स्वयं को सँभालने के, उसके सारे प्रयत्न निष्फल हो गए, तो वह सशब्द रो उठी ।

"पांचाली !” कृष्ण का स्वर शीतल वयार का सा प्रभाव लिये हुए था । “मैं अब और नहीं सह सकती केशव ! असहनीय है, यह सब कुछ मेरे लिए ।" द्रौपदी हिचकियों के मध्य बोली, “जिसका कोई न हो, उस अनाथा का भी, इतना अपमान नहीं होता। वह अपमान ।"

"मैं समझता हूँ कृष्णे !” कृष्ण बोले, "और यह भी कहा कि निश्चय ही, कौरव इस पाप का भीषण दंड पाएँगे। धर्म उनको कभी क्षमा नहीं करेगा ।"

लगा, द्रौपदी के शरीर पर जैसे कशाघात हुआ सारा शरीर झकोला खा गया। भीतरी ताप से उसके अश्रु सूख गए । हिचकियां बंद हो गई। आँखों से चिंगारियाँ फूटने लगीं, “नाम मत लो धर्म का उसके लिए ये धर्मराज ही बहुत हैं ।"

कृष्ण, उस स्थिति में भी मुस्करा पड़े "धर्मराज !...." 'धार्तराष्ट्रों के विरुद्ध मेरे  मन में क्या  है, वह कहने की बात नहीं ।"

 द्रौपदी आवेश भरे स्वर में बोली, “मैं धिक्कारती  हूँ अपने इन पाँच पतियों को, इनके क्षत्रियत्व को, इनके युद्ध-कौशल इनके दिव्यास्त्रों को ..." द्रौपदी अग्नि-शिखा- सी जल रही थी, “केशों से पकड़, दुःशासन, मुझे भरी सभा में घसीट लाया; और ये लोग बैठे देखते रहे । वे मुझे निर्वस्त्र करने का प्रयत्न करते रहे, काम-भोग का निमंत्रण देते रहे; और ये सिर झुकाए धर्म-चिंतन करते रहे। क्या करूँ मैं धर्मराज के धर्म का, मध्यम के बल का, धनंजय के गांडीव का, सहदेव की खड्ग का तथा नकुल की अश्व संचालन क्षमताओं का ? ये सब मिलकर भी अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा नहीं कर सके ! एक साधारण-सा अपंग पुरुष भी, अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा के लिए दहाड़ता और चिंघाड़ता है और दिव्यास्त्रों से सज्जित ये विश्वविख्यात् क्षत्रिय योद्धा मुँह लटकाए बैठे, अपने पैरों के अंगूठों से भूमि कुरेदते रहे । धर्म- ।"

"मैं तुम्हारा कष्ट समझता हॅू कृष्णा !" कृष्ण धीरे से बोले, "यदि मैं वहाँ उपस्थित होता, तो निश्चित् रूप से दुर्योधन यह सब नहीं कर पाता । "

" पर तुम वहाँ उपस्थित नहीं थे केशव !” द्रौपदी का स्वर पुनः आरोह की ओर बढ़ा, "और धर्मराज आज भी क्षमा को प्रतिशोध से अधिक वरेण्य बता रहे हैं । अब तुम ही कहो, मैं यह सारा अत्याचार कैसे भूल जाऊँ ?”

"तुम भूल भी जाओ, तो मैं नहीं भूलूँगा । धर्म इसे नहीं भूलेगा, प्रकृति इसे नहीं भूलेगी। प्रकृति कुछ नहीं भूलती । धार्तराष्ट्रों को उनके कृत्य का फल अवश्य मिलेगा। कौरव दंडित होंगे ।"

"कौन दंड देगा उन्हें ?" द्रौपदी का अविश्वास जैसे मूर्तिमंत हो उठा, "धर्मराज ?"

"हाँ ! धर्मराज उन्हें दंडित करेंगे। पाँचों पांडव मिलकर उन्हें दंडित करेंगे ।" कृष्ण की आँखों में एक असाधारण ज्योति थी, "वे नहीं करेंगे, तो मैं कौरवों को दंडित करूँगा । यदि धर्मराज को आपत्ति न हो, तो मैं यहीं से, हस्तिनापुर चलने को प्रस्तुत हूँ । उन सारे पापियों का संहार मैं स्वयं अपने हाथों से, वैसे ही कर दूँगा, जैसे शिशुपाल का किया था ।"

द्रौपदी उन आँखों को देख नहीं रही थी, वह तो उनके तेज का पान कर रही थी । उसके चेहरे पर उभर आई उग्र रेखाएँ कुछ शांत हुईं। नयनों में कुछ विश्वास जागा, "मैं तुम्हारे वचन पर अविश्वास नहीं करूँगी केशव मै तो मानती हूँ कि कौरवों की उस सभा में, मेरी रक्षा, तुमने ही की है। द्रौपदी का स्वर शांत था, “तुम वहाँ उपस्थित चाहे नहीं थे, किंतु तुम वर्तमान थे । दुःशासन के मन में तुम्हारा ही भय था, जिसने मेरी रक्षा ली; नहीं तो उन पिशाचों ने अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी।"

"बहन !" धृष्टद्युम्न ने पहली बार मुंह खोला, "जब वासुदेव ने कह दिया तो निश्चित् जानों कि कौरवों को इसका दंड अवश्य दिया जाएगा। इन नीचों को अपने रक्त से, अपने पिशाच कृत्यों का मूल्य चुकाना होगा। इनमें से एक भी क्षमा नहीं किया जायेगा ।"

द्रौपदी चुप रही, किंतु उसकी आँखों से पुनः अश्रु बह निकले, जैसे उसके भीतर का दुख रह-रहकर, हृदय से उठकर आँखों में आ जाता था ।

"मैं क्या करूँ ! मैं उस दृश्य को भूल नहीं पाती । और जब-जब मुझे उसकी याद आती है, मैं जैसे फिर से उस सभा में खड़ी कर दी जाती हूँ। मेरे कानों में उन दुष्टों के अट्टहास और अपशब्द गूँजने लगते हैं। उनकी दृष्टियाँ मेरे शरीर को भेदने लगती हैं। कैसे बताऊँ कि मेरे मन में अपने पतियों के लिए, कैसे-कैसे धिक्कार उठने लगते हैं । मेरे मन में इतनी भयंकर प्रतिहिंसा जागती है कि, इच्छा होती है, सारी सृष्टि को जलाकर क्षार कर दूँ ।"

"नहीं द्रौपदी ! यह मानव-धर्म नहीं है ।" कृष्ण की वाणी सांत्वना देकर, रक्त के तप्त कणों को शांत ही नहीं करती थी, सारे शरीर में जैसे बल का संचार कर जाती थी ।

द्रौपदी की उग्रता, उस वाणी से क्षीण होकर भी, पुनः भड़क उठी, "फिर वही धर्म ! धर्म की चर्चा मुझसे मत करो। मुझे धर्म से घृणा हो गई है । 

नरेंद्र कोहली 



सोमवार, 6 नवंबर 2023

 अब धृष्टद्युम्न स्वयं को रोक नहीं पाया। बोला, “कृष्णे ! तुम्हें अपने इन महावीर पतियों पर तनिक भी क्रोध नहीं आता ? ये अपना इतना अपमान सहकर क्लीवों के समान चुपचाप वहाँ से चले आए और अब तपस्वी-मुनियों के समान यहाँ शांतिपूर्वक बैठे, साधना कर रहे हैं।"

द्रौपदी के चेहरे पर सहमति नहीं उभरी। बोलीं , "मैं अपने भाई को यह अधिकार नहीं दे सकती, कि वह मेरे सम्मुख मेरे पतियों की निन्दा करे। वे साधारण जन नहीं हैं । वे अपने धर्म पर अटल हैं; और मैं भी अपने धर्म पर दृढ़ हूँ। मैं अपने भाई अथवा पिता के द्वारा अपने पतियों को अपमानित होते नहीं देखना चाहती ।"

 धृष्टद्युम्न सँभल गया कृष्णा केवल उसकी बहन ही नहीं, पांडवों की पत्नी भी थी। पति से अधिक घनिष्ठ और विश्वसनीय और कोई व्यक्ति नहीं होता, भाई भी नहीं ! 

"मैं उनका अपमान करना नहीं चाहता। वे अपने धर्म पर अटल हैं, यह तो उचित ही है; किंतु धर्मराज को द्यूत में अपनी पत्नी को दाव पर लगाने की क्या आवश्यकता थी ?" इच्छा होते हुए भी, धृष्टद्युम्न स्वयं को रोक नहीं पाया, "नारी पर इतना अत्याचार !और तुम उसे धर्म कह रही हो।"

द्रौपदी की आँखें, अपने भाई की ओर उठीं। उनमें कटाक्ष था, "क्या अब परिवार को भी नारी और पुरुष में विभक्त कर देखा जायेगा ? जब महाराज शांतनु की पट्टमहिषी गंगा ने अपने सात-सात पुत्र देव-सरिता में प्रवाहित कर जीवन- मुक्त कर दिया था, तब तो किसी ने नहीं पूछा था कि वे नारी होकर पुरुषों पर इतना अत्याचार क्यों कर रही माँ और पुत्र का संबंध भी क्या 'नारी' और 'पुरुष' के रूप में वर्गीकृत हो सकता है ?"

"नहीं !" धृष्टद्युम्न को द्रौपदी की उक्ति में ही अपना समर्थन मिल गया, “किंतु पति और पत्नी का संबंध तो स्त्री और पुरुष का ही है ।"

“नहीं ! वह दो समुदायों के प्रतिनिधियों का मिलन नहीं है । वह दो व्यक्तियों का एक हो जाने का प्रयत्न है ।" द्रौपदी बोली, "और जहाँ तक धर्मराज के द्यूत का संबंध है, उन्होंने पहले अपने भाइयों को दाव पर लगाया, जो पुरुष हैं।" द्रौपदी का स्वर कुछ उग्र हो उठा,

 “वे कभी न चाहते कि उनके भाई और उनकी पत्नी दाव पर लगें; किंतु वे द्यूत-शास्त्र, द्यूत-परंपरा और धृतराष्ट्र के आदेश का क्या करते ! संपत्ति शेष रहते, कोई पक्ष द्यूत से उठ नहीं सकता था। अब बताओ, तुम्हारे अर्थशास्त्र के अनुसार, परिवार के सदस्य, परिवार के मुखिया की संपत्ति हैं या नहीं ? तुम पिताजी की संपत्ति हो या नहीं ? तुम्हारी पत्नी और संतान, तुम्हारी संपत्ति हैं या नहीं ? गंगा के पुत्र उनकी संपत्ति थे या नहीं ?"

“तुम सत्य कह रही हो ।" धृष्टद्युम्न का स्वर मंद हो गया । " मैंने अपने पिता के संकल्प के कारण हवन कुंड से पुनर्जन्म ग्रहण किया था; और वीर्य-शुल्का बन गई थी," द्रौपदी की आँखों में तेज लहरा रहा था, "अब जब मैं अपने पति के धर्म के कारण दावँ पर लगी, तो स्थिति बदल गई ? तब 'पुत्री' थी, तो अब 'पत्नी' क्यों नहीं हूँ ? अब मैं पत्नी न रहकर 'स्त्री' हो गई ? क्या तुम नहीं समझते भैया ! कि मैंने कांपिल्य के धनुर्यज्ञ में कर्ण का जो तिरस्कार किया था, कर्ण उसका प्रतिशोध ले रहा है। जो पीड़ा मैंने उसे दी, वह उससे शतगुणित पीड़ा पांडवों को दे रहा है ? पांडव, महाराज द्रुपद के जामाता हैं, इसलिए वे भीष्म और द्रोण के द्वारा तिरस्कृत हो रहे है ? मैं उनके कारण कष्ट नहीं पा रही; वे मेरे कारण अपमानित और प्रताड़ित हो रहे हैं ।"

धृष्टद्युम्न कुछ क्षण मौन खड़ा, द्रौपदी के इस रूप को देखता रहा। पंडिता तो वह पहले भी थी। तर्क भी किया करती थी । किंतु इतनी सहिष्णु तो वह कभी नहीं थी...." मैंने कभी इस रूप में नहीं सोचा कृष्णे !" अंततः धृष्टद्युम्न बोला, "तुम जानती हो, मैं योद्धा हूँ, तुम्हारे समान दार्शनिक कभी नहीं रहा। जब चर्चा होती है, विश्लेषण होता है, तो मैं भी कुछ-कुछ समझने लगता हूँ कि धर्मराज युधिष्ठिर असाधारण हैं, हमसे, सब सामान्य लोगों से भिन्न हैं, उदात्त हैं, किंतु मेरी प्रकृति इससे विद्रोह करती है । मैं अपने विपक्षी के विरुद्ध, तत्काल शस्त्र उठा लेना चाहता हूँ, धर्मराज के समान, उसे क्षमा नहीं कर देना चाहता । तुम जानती हो कृष्णा ! मैं अपनी प्रकृति को बदल नही सकता। मैं हवन- में से उत्पन्न हुआ हूँ, अग्नि के रथ पर । मैं जिस धर्म को जानता और हूँ, वह क्षत्रिय धर्म है-- ।"

"तुम कहना चाहते हो भैया ! कि पांडव क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं कर रहे ? भीम और अर्जुन क्षत्रिय नहीं धृष्टद्युम्न ने कोई उत्तर नहीं दिया वह यह कैसे कह सकता था कि भीम और अर्जुन क्षत्रिय नहीं हैं" न यह कह सकता था कि वे अपने धर्म का आचरण नहीं कर रहे" 

" वस्तुतः मात्र हिंसा करने वाला क्षत्रिय नहीं है ।" द्रौपदी का स्वर एक गहरी गूँज लिये हुए था, "कई बार तो धर्म, शस्त्र न उठाने में होता है ।"

धृष्टद्युम्न समझ गया । बहन से तर्क-वितर्क करना व्यर्थ था। अग्नि कुंड में से, उसके साथ जन्मी, उसकी यह सहोदरा, अब कदाचित् अग्नि-धर्मा नहीं रह गई थी । वह धर्मराज के प्रभाव में शीतलमना हो गई थी. "तो फिर अब तुम लोगों की क्या योजना है ?" 

धृष्टद्युम्न का स्वर, कुछ उत्तेजना लिये हुआ था, “क्या तुम लोग मोक्ष प्राप्ति तक यहीं साधना करना चाहते हो ?..." और सहसा, उसे जैसे कुछ नया सूझ गया, "वैसे तुम्हें यह भी बता दूँ कृष्णे ! यदि धर्मराज शांतिपूर्वक यहाँ, वन में, तपस्वी का जीवन व्यतीत करना चाहें, तो वह दुष्ट दुर्योधन, उन्हें वह भी नहीं करने देगा। तुम लोग यहाँ तनिक भी सुरक्षित नहीं हो ।"

नरेंद्र कोहली 

 

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

 अर्जुन सजग हुआ । उसने कृष्ण की ओर देखा, वे उसके प्रिय सखा के रूप में सामने खड़े मुस्करा रहे थे। इस समय वे सर्वथा आत्मीय लग रहे थे। उनमें कुछ भी असाधारण नहीं था, कुछ भी भिन्न नहीं था। उनका दिव्य-भाव जाने कहाँ तिरोहित हो गया था। साधारण मनुष्य के समान अधरों पर नटखट मुस्कान लिए उसे देख रहे थे, जैसे कह रहे हों, 'देखा, तुम्हें कैसे छकाया ।" कृष्ण यह कैसे कर लेते हैं. कभी तो वे इतने निकट, इतने आत्मीय, इतने अपने होते हैं, और कभी वे इतने दिव्य, इतने विराट, इतने दूर होते हैं, जैसे आकाश पर खड़े हों, जिन्हें छूना अर्जुन के लिए संभव न हो "मैं सोचता हूँ कृष्ण ! जिस अनासक्ति की चर्चा तुम कर रहे हो, क्या इस संसार में रहकर वह संभव है ?..."

"क्यों ? संभव क्यों नहीं ?" कृष्ण ने कहा, "मिट्टी का साधारण-सा खिलौना टूट जाने पर, एक छोटा बालक जिस प्रकार गला फाड़कर चिल्लाता है, किसी वयस्क को रोते देखा है तुमने ?" उसी प्रकार रोते देखा है।

"नहीं !"

"क्यों नहीं रोता वयस्क ? इसलिए कि उसका चिंतन-मनन, ज्ञान तथा अनुभव से यह समझ चुका है और प्रौढ़ मन, अपने मिट्टी का खिलौना इतना मूल्यवान नहीं कि उसके लिए इस प्रकार रोया जाए ।" कृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा, "क्या उसी प्रकार कुछ और अधिक प्रौढ़ नहीं हुआ जा सकता, जिससे सांसारिक सुखों की वास्तविकता भी मिट्टी के उस खिलौने के समान हमारे सामने प्रकट हो जाए ?"

"संभव क्यों नहीं !" अर्जुन जैसे "उन सुखों की निरर्थकता का साक्षात्कार हम कर लेंगे, तो उनके प्रति आसक्ति अपने आप ही समाप्त हो जायेगी । अर्जुन अपने-आपसे बोला । कृष्ण से कहा।

"तुम ठीक कह रहे हो । मेरा ध्यान कभी इस ओर गया ही नहीं ।" अर्जुन पुनः अपने भीतर कहीं बहुत डूब गया था।

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

 आज की हिन्दी 1960 के दशक की हिन्दी से बहुत भिन्न है। तब हिन्दी में कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग शब्दों में अनुस्वार अर्थात बिन्दी का प्रयोग भिन्न-भिन्न ढंग से भिन्न भिन्न शब्दों पर किया जाता था। चन्द्र बिन्दी का उपयोग भी बहुत सारे शब्दों पर किया जाता था, किन्तु हिन्दी को भारत के सभी अहिन्दीभाषी राज्यों तथा विदेशों में भी लोकप्रिय बनाने के लिए दिल्ली प्रेस के संस्थापक विश्वनाथ जी के पदचिन्हों का अनुकरण बहुत से भाषाई विद्वानों ने किया और हिन्दी को सरल और सरलता से पठनीय बनाने के लिए हिन्दी लेखन में कुछ विशेष परिवर्तन किये गये, जो कि आज बहुतायत में नज़र आते हैं।

हिन्दी में विराम चिह्नों के रूप में पहले तीन चिह्न प्रयोग किये जाते थे। कौमा (, अल्प विराम) सैमी कौमा (; अर्द्ध विराम) और पूर्ण विराम। हिन्दी को सरल बनाने के लिए अर्द्ध विराम का प्रयोग अब लगभग समाप्त कर दिया गया है। एक वाक्य है. उसे अपने घर जाना था, लेकिन अचानक उसके एक दोस्त का फोन आया, जिसकी तबियत बहुत खराब थी, इसलिए अपने घर जाने का इरादा त्याग कर, वह फौरन दोस्त के घर गया। इस सम्पूर्ण पैराग्राफ में जहाँ-जहाँ हमने कौमा (अल्प विराम) लगाया है, वहाँ पुरानी हिन्दी में सैमी कौमा (अर्द्ध विराम) लगाया जाता था। कौमा (अल्प विराम) वहाँ लगाया जाता था, जहाँ वाक्य बहुत हल्की सी रुकावटों के साथ बोला जा रहा हो। उदाहरण- राम, कृष्ण, सीता, गीता और राधा अच्छे मित्र हैं।

कौमा लगाने और न लगाने में कुछ और बातें ध्यान रखने योग्य हैं।उन बातों को हम बताते हैं।

1. जब दो वाक्यों के बीच 'तो' अथवा 'कि' शब्द आते हैं तो 'तो' और 'कि' से पहले या बाद में कौमा नहीं लगाया जाता। कुछ व्याकरण की पुस्तकों में भी इस तरह निरन्तर गलतियाँ हैं।

2. जब एक दूसरे से सम्बद्ध दो वाक्यों में से दूसरे वाक्य का पहला शब्द * लेकिन, किन्तु,, परन्तु, पर, क्योंकि, जो, जैसा, जिसे, जिसने, जिन्हें, जिन्होंने, जिनके, इसलिए, बल्कि, बशर्ते, वरना, अन्यथा, जबकि आदि हो तो उपरोक्त किसी भी शब्द से पहले वाले वाक्य के अन्तिम शब्द के बाद कौमा () लगाया जाना चाहिए।

3. एक बात यह भी ध्यान में रखनी चाहिए कि जब हम भविष्य काल का संकेत देता कोई वाक्य लिखते हैं तो उस वाक्य का अन्तिम अक्षर यदि * 'गा, गे, गी* हो तो उस पर अनुस्वार या बिन्दी का प्रयोग नहीं किया जाता।

*'गा' से पहले के अक्षर पर कभी अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जाता, लेकिन ** से पहले वाले अक्षर पर हमेशा अनुस्वार का उपयोग किया जाता है, जबकि *'गी'* से पहले के अक्षर पर अनुस्वार का उपयोग तभी किया जाता है, जब वाक्य बहुवचन का बोध करा रहा हो अथवा जिसके लिए वाक्य लिखा जा रहा हो, उसे सम्मान दिया जा रहा हो। उदाहरण-

(क) * वे सब कुतुबमीनार देखने जायेंगी । *(बहुवचन)

(ख) * दादीजी आज व्रत का खाना खायेंगी । *(सम्मान सूचक)

यदि हम किसी एक ही स्त्री के लिए * 'गी'* का प्रयोग करेंगे तो उससे पहले के अक्षर पर अनुस्वार नहीं आयेगा।

उदाहरण - *सीता स्कूल जायेगी। * 

* गीता खाना खायेगी। *।

समझ जाइये कि जब आप खायेगा, गायेगा, जायेगा, चलेगा, बोलेगा, कहेगा, सुनेगा, देखेगा, लिखेगा '* आदि शब्द लिखेंगे तो 'गा'* से पहले वाले अक्षर पर अनुस्वार अर्थात बिन्दी का प्रयोग नहीं होगा। किन्तु जब आप *'खायेंगे, गायेंगे, जायेंगे, चलेंगे, बोलेंगे, कहेंगे, सुनेंगे, देखेंगे, लिखेंगे'* आदि शब्द लिखेंगे तो *'गे'* से पहले वाले अक्षर पर सदैव अनुस्वार अर्थात बिन्दी लगाई जायेगी। मगर जब आप भविष्य काल के वाक्य में * 'गी'* का प्रयोग करेंगे तो * 'गी'* से पहले वाले अक्षर पर अनुस्वार का प्रयोग तभी होगा, जब वाक्य का प्रारम्भिक शब्द बहुवचनीय हो अथवा किसी महिला के सम्मान में प्रयुक्त हो, जबकि एकवचनीय स्थिति में * 'गी'* से पहले के अक्षर पर अनुस्वार अर्थात बिन्दी नहीं लगाई जायेगी।

गौर कीजिये -

हमने आरम्भ में एक वाक्य लिखा है- परन्तु कौमा लगाने और न लगाने में कुछ और बातें ध्यान में रखने योग्य हैं..... यहाँ हमने *'परन्तु'* से एक स्वतंत्र वाक्य आरम्भ किया है, इसलिए यहाँ परन्तु से पहले कौमा होने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन जब * किन्तु, परन्तु, लेकिन ' * किन्हीं दो वाक्यों को जोड़ने का काम करते हैं और ये शब्द जुड़ने वाले दूसरे वाक्य का पहला शब्द होते हैं तो इन शब्दों से पहले, पहले वाक्य के अन्तिम शब्द के बाद बिना किसी स्पेस के कौमे का उपयोग किया जाना चाहिए।

यह सब जो मैंने इस पोस्ट में लिखा है,  निसन्देह आप विद्यार्थियों के साथ  कुछ नये लेखकों को शुद्ध-अशुद्ध का सही ज्ञान हो सकेंगा।

बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

 आत्मविश्वास का फार्मूला:-

पहला : मैं जानता हूँ कि मुझमें जीवन के निश्चित लक्ष्य को हासिल करने की योग्यता है और इसलिए मैं खुद से यह अपेक्षा रखता हूँ कि मैं इसे हासिल करने के लिए निरंतर और लगन से कार्य करूँ और मैं यहाँ पर अभी यह वादा करता हूँ कि मैं इसी तरह से कार्य करूँगा।

दूसरा : मुझे एहसास है कि मेरे मस्तिष्क के प्रबल विचार अंततः अपने आपको बाहरी, भौतिक कार्यों में बदल लेंगे और धीरे-धीरे अपने आपको भौतिक वास्तविकता में रूपांतरित कर लेंगे। इसलिए मैं अपने विचारों को हर दिन तीस मिनट तक इस बात पर एकाग्र करूँगा कि मैं किस तरह का इंसान बनने के बारे में सोच रहा हूँ ताकि मेरे मस्तिष्क में इसकी एक स्पष्ट तस्वीर रहे।

तीसरा : मैं जानता हूँ कि आत्मसुझाव के सिद्धांत के प्रयोग के द्वारा मैं जिस भी इच्छा को अपने मस्तिष्क में निरंतर बनाए रखूँगा वह अंततः किसी प्रैक्टिकल तरीके के द्वारा अपने आपको भौतिक समतुल्य में बदल लेगी और मुझे वह वस्तु हासिल हो जाएगी जिसका मैंने लक्ष्य बनाया है। इसलिए मैं हर दिन दस मिनट इस काम में दूंगा कि मैं आत्मविश्वास का विकास करूँ ।

चौथा : मैंने स्पष्ट रूप से जीवन में अपने प्रमुख निश्चित लक्ष्य का वर्णन लिख लिया है और मैं कोशिश करना कभी नहीं छोडूंगा जब तक कि मुझमें इसे हासिल करने का पर्याप्त आत्मविश्वास विकसित न हो जाए।

पांचवां: मुझे पूरी तरह एहसास हैं कि कोई भी संपत्ति या पद तब तक लंबे समय तक बना नहीं रह सकता जब तक कि यह सत्य और न्याय पर आधारित न हो। इसलिए मैं किसी भी ऐसी गतिविधि में संलग्न नहीं होऊँगा जिससे इससे प्रभावित होने वाले सभी लोगों को लाभ न हो। मैं ऐसी शक्तियों को अपनी तरफ आकर्षित करके सफलता पाऊँगा जिनका मैं प्रयोग करना चाहता हूँ और मैं दूसरे लोगों के सहयोग के द्वारा सफलता पाऊँगा। मैं दूसरे लोगों को प्रेरित करूँगा कि वे मेरी सेवा करें क्योंकि मैं हमेशा दूसरों की सेवा करने का इच्छुक रहूँगा। मैं सारी मानवता के प्रति प्रेम विकसित करूँगा और घृणा, ईर्ष्या, स्वार्थ और दोष देखने की आदत को अपने मस्तिष्क से दूर करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि दूसरों के प्रति नकारात्मक नज़रिया रखने से मुझे कभी सफलता नहीं मिल सकती। मैं ऐसे काम करूँगा जिससे दूसरों को मुझ पर विश्वास हो क्योंकि मैं उनमें और अपने आपमें विश्वास रखूँगा। मैं इस फ़ॉर्मूले पर अपने हस्ताक्षर करूँगा और इसे याद कर लूँगा और इसे हर दिन ज़ोर-ज़ोर से दोहराऊँगा । ऐसा करते समय मुझे पूरा विश्वास होगा कि यह मेरे विचारों और कार्यों को धीरे-धीरे प्रभावित करेगा ताकि मैं एक स्वावलंबी और सफल व्यक्ति बन सकूँ।

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...