शनिवार, 14 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 7


 प्‍यास और धैर्य—

    यो मामैवमसंमूढो जानति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वोविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।। 19।।

इति गुह्यतमं शास्त्रीमदमुक्‍तं मयानघ।

एतदबद्ध्वा बुद्धिमान्‍स्‍यत्‍कृतकृत्‍यश्‍च भारत।। 20।।


हे भारत, इस प्रकार तत्व से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार मे निरंतर मुझ परमेश्वर को ही भजता है।

है निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्ययुक्‍त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।


हे भारत, इस प्रकार तत्व से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ परमेश्वर को ही भजता है।

हे निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

एक—एक शब्द समझें।

इस प्रकार से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ परमेश्वर को ही भजता है। जिसको भी यह स्मरण आ गया कि परिधि पर शरीर है, मध्य में चेतना है और अंत में केंद्र पर अंतर्यामी पुरुषोत्तम है, जिसको भी यह स्मरण आ गया कि केंद्र परमात्मा है, फिर उसकी परिधि भी परमात्मा के ही गुणगान करने लगती है। फिर उसकी परिधि पर भी परमात्मा का ही स्वर गूंजने लगता है। फिर उसके बाहर भी वही प्रकट होने लगता है, जो भीतर है। फिर वह उठता भी है, तो परमात्मा में, बैठता भी है, तो परमात्मा में। फिर परमात्मा उसके लिए कुछ पृथक नहीं रह जाता, उसके अपने होने का अभिन्न अंग हो जाता है। फिर वह जो भी करता है, वह सब परमात्मा में ही घटित होता है। जैसे मछली सागर में होती है, ऐसा फिर वह परमात्मा में होता है। भजने का यही अर्थ है।

भजने का यह अर्थ नहीं कि आप बैठे हैं, कभी—कभी राम—राम, राम—राम कर लिया। भजने का यह अर्थ है कि आपके जीवन की कोई भी गतिविधि परमात्मा से शून्य न हो। आप जो भी करें, जो भी न करें, सब में परमात्मा का स्मरण सतत भीतर बना रहे। आपके जीवन के कृत्य माला के मनके हो जाएं और परमात्मा आपके भीतर का धागा हो जाए। हर मनके में दिखाई पड़े या न दिखाई पड़े, वह धागा भीतर समाया रहे। सभी मनके उसी धागे से बंध जाएं, भजन का यह अर्थ है।

पर हम तो हर चीज को विकृत कर लेते हैं। तो हम काम करते जाते हैं और सोचते हैं, भीतर राम—राम करते जाओ। लोग अभ्यास कर लेते हैं उसका। तो वे कार ड्राइव करते रहेंगे और भीतर राम—राम करते रहेंगे! वह अभ्यस्त हो जाता है।

मन जो है, आटोमैटिक किया जा सकता है। तो मन स्वचालित यंत्र बन जाता है। आप अपना काम करते रहें, वहां राम—राम, राम—राम, राम—राम चलता रहे। उसका कोई मूल्य नहीं है। वह मन का एक कोना दोहराता रहता है।

भजन का अर्थ है, अपने जीवन में डूब जाए स्मृति परमात्मा की। कैसे यह हो?



किसी मित्र की आंख में झांकें, तब आपको मित्र तो दिखाई पडे, वह परिधि रहे, लेकिन उसमें पुरुषोत्तम भी दिखाई पड़े, तो वह भजन हो जाएगा। फूल को देखें, फूल तो परिधि रहे और फूल में जो सौंदर्य प्रकट हुआ है, वह जो खिलावट, वह जो जीवन की अभिव्यक्ति हुई है, वह जो पुरुषोत्तम वहां मौजूद है, उसका स्मरण आ जाए। चाहे फूल देखें, चाहे आंख देखें, चाहे आकाश देखें, जो भी देखें वहां आपको पुरुषोत्तम की स्मृति बनी रहे।

ऐसा नहीं कि फूल देखें, तो भीतर राम—राम, राम—राम करने लगें। उसमें तो फूल भी चूक जाएगा। राम—राम करने की शाब्दिक बात नहीं है। फूल के अनुभव में पुरुषोत्तम का अनुभव मौजूद रहे। भोजन करें, पुरुषोत्तम का अनुभव मौजूद रहे। स्नान करें, पुरुषोत्तम का अनुभव मौजूद रहे।

 भगवान को अनुभव में जानना है, अनुभव से पलायन करके नहीं। उससे बचना नहीं, उससे भागना नहीं। जैसा भी जीवन है, जहां भी जीवन ले जाए, वहां मेरी आंख परिधि पर ही न रहे, केंद्र पर सदा पहुंचती रहे। जो भी मैं देखूं, उसमें मुझे केंद्र की प्रतीति बनी रहे, वह धारा भीतर बहती रहे कि पुरुषोत्तम मौजूद है। ऐसी अगर प्रतीति हो जाए, तो आपका पूरा जीवन भजन हो जाएगा। वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ परमेश्वर को भजता है। तभी निरंतर भजन हो सकता है। अगर राम—राम जपेंगे, तो निरंतर तो हो ही नहीं सकता। क्योंकि दो राम के बीच में भी जगह छूट जाएगी। एक दफा कहा राम, दूसरी दफा कहा राम, बीच में खाली जगह छूट गई, तो निरंतर तो हो ही नहीं पाया।

फिर कब तक कहिए! जब तक होश रहेगा कहिए, रात नींद लग जाएगी, वह चूक जाएगा। कोई डंडा सिर पर मार देगा, क्रोध आ जाएगा; वह निरंतर का चूक जाएगा, निरंतर नहीं रह पाएगा। कितनी ही तेजी से कोई राम—राम जपे, तो भी दो राम के बीच में जगह छूटती रहेगी, उतनी खाली जगह में परमात्मा चूक गया। निरंतर तो तभी हो सकता है कि जो भी हो रहा हो, उसी में परमात्मा हो। जो डंडा मार रहा है सिर पर, अगर उसमें भी पुरुषोत्तम दिखे, तो भजन निरंतर हो सकता है। और जो राम—राम के बीच में खाली जगह छूट जाती है, उस खाली जगह में भी पुरुषोत्तम दिखे, तभी पुरुषोत्तम निरंतर हो सकता है।

और जब तक भजन निरंतर न हो जाए, सतत न हो जाए, तब तक ऊपर—ऊपर है, तब तक चेष्टित है, तब तक वह हमारी सहज आत्मा नहीं बनी है।

हे निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्यमय—रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

कृष्ण निरंतर अर्जुन को निष्पाप कहते हैं। कहे चले जाते हैं, निष्पाप! क्योंकि यह हिंदू धारणा है और बड़ी मूल्यवान है कि निष्पापता हमारा स्वभाव है। उससे वंचित होने का उपाय नहीं है। पाप करके भी आपके निष्पाप होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह हिंदू विचार की बड़ी गहन धारणा है।

पश्चिम, विशेषकर ईसाइयत इसको समझने में बिलकुल असमर्थ होती है। क्योंकि जब पाप किया, तो निष्पाप कैसे रहे? पाप किया, तो पापी हो गए।

यहीं हिंदू चिंतन बड़ा कीमती है। हिंदू चिंतन कहता है, क्या तुम करते हो, यह ऊपर ही ऊपर रह जाता है। जो तुम हो, उसे तुम्हारा कोई भी करना नष्ट नहीं कर पाता। तुम्हारी निर्दोषता तुम्हारा स्वभाव है। तो जिस दिन भी तुम यह समझ लोगे कि कृत्य से मैं दूर हूं? उसी दिन तुम पुन: अपनी निष्पाप स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे। उसे तुमने कभी खोया नहीं है, चाहे तुम भूल गए हो।

तो ज्यादा से ज्यादा संसार एक विस्मरण है। ज्यादा से ज्यादा पाप अपनी निष्पाप दशा का विस्मरण है। हमने उसे खोया नहीं है; हम उसे खो भी नहीं सकते। हमारी निर्दोषता, हमारी जो इनोसेंस है, वह हमारी सहज अवस्था है, वह सांयोगिक नहीं है। उसे नष्ट करने का उपाय नहीं है।

जैसे आग गरम है, ऐसे हम निष्पाप हैं। चेतना का निष्पाप होना धर्म है। अर्जुन को इसीलिए कृष्ण निष्पाप कहते हैं। हे निष्पाप अर्जुन!

अर्जुन को स्मरण नहीं है इस निष्पाप स्थिति का, इसलिए वह भयभीत है। वह डरा हुआ है कि पाप हो जाएगा। युद्ध मैं लडूंगा, काटूंगा, मारूंगा—पाप हो जाएगा। फिर इस पाप के पीछे भटकूगा अनंत जन्मों तक। और कृष्ण कह रहे हैं, तू निष्पाप है।

जैसे ही कोई व्यक्ति पहली पर्त से पीछे हटेगा, वैसे ही निष्पापता की धारा शुरू हो जाती है। और तीसरी पर्त पर सब निष्पाप है।

इसे मैं ऐसा समझ पाता हूं। पहली पर्त पर सभी पाप है। शरीर के पर्त पर सभी पाप है। वह शरीर का स्वभाव है। पुरुषोत्तम के पर्त पर सभी निष्पाप है। वह पुरुषोत्तम का स्वभाव है, केंद्र का स्वभाव है। और दोनों के बीच में हमारा जो मन है, वहा सब मिश्रित है, पाप, निष्पाप, सब वहां मिश्रित है। इसलिए मन सदा डांवाडोल है। वह सोचता है, यह करूं न करूं? पाप होगा कि पुण्य होगा? अच्छा होगा कि बुरा होगा?

अर्जुन वहीं खड़ा है, दूसरे बिंदु पर। कृष्ण तीसरे बिंदु से बात कर रहे हैं। अर्जुन दूसरे बिंदु पर खड़ा है। भीम और दूसरे, पहले बिंदु पर खड़े हैं। उनको सवाल भी नहीं है।

उस महाभारत के युद्ध में तीन तरह के लोग मौजूद हैं। पहली पर्त पर सभी लोग खड़े हैं। वह पूरे युद्ध में जो सैनिक जुटे हैं, योद्धा इकट्ठे हुए हैं, वे पहली पर्त में हैं। उनको सवाल ही नहीं है कि क्या गलत और क्या सही! इतना भी उनको विचार नहीं है कि जो हम कर रहे हैं, वह ठीक है या गलत है! वह शरीर के तल पर कोई विचार होता भी नहीं। शरीर मूर्च्छित है, वहा सभी पाप है।

अर्जुन बीच में अटका है। उसके मन में संदेह उठा है। उसके मन में चिंतना जग गई है; विमर्ष पैदा हुआ है। वह सोच रहा है। सोचने से दुविधा में पड़ गया है। वे जो पहली पर्त में खड़े लोग हैं, उनकी कोई दुविधा नहीं है, स्मरण रखें। वे निसंदिग्ध लड़ने को खड़े हैं।

उनके मन में कोई संदेह, कोई सवाल नहीं है। लड़ने आए हैं, लड़ना उनका धर्म है, लड़ना नियति है, उसमें कोई विचार नहीं है।

अर्जुन दुविधा में पड़ा है। उसकी बुद्धि अड़चन में है। बुद्धि सदा अड़चन में होगी, क्योंकि वह मध्य में खड़ी है। वह पाप के जगत की तरफ भी जा सकती है और निष्पाप के जगत की ओर भी जा सकती है। वह दोनों की तरफ देख रहा है। और पीछे कृष्ण हैं, वे पुरुषोत्तम हैं, वहां सभी निष्पाप है।

एक बात मजे की है कि जो पाप के तल पर खड़े हैं, उन्हें भी कोई संदेह नहीं। जो निष्पाप के तल पर खड़ा है, उसे भी कोई संदेह नहीं। क्योंकि वहा सभी निष्पाप है। कुछ पाप हो ही नहीं सकता। जो पाप के तल पर खड़े हैं, उसे निष्पाप का कोई पता ही नहीं है, इसलिए तुलना का कोई उपाय नहीं है। अर्जुन मध्य में खड़ा है।

अर्जुन शब्द का अर्थ भी बड़ा कीमती है। अर्जुन शब्द बनता है ऋजु से। ऋजु का अर्थ होता है, सीधा। अऋजु का अर्थ होता है, तिरछा, डांवाडोल, कंपता हुआ। अर्जुन का अर्थ है, कंपता हुआ, लहरों की तरह डांवाडोल, इरछा—तिरछा। कुछ भी सीधा नहीं है। और दोनों तरफ उसके कंपन हैं। वह तय नहीं कर पा रहा है।

कृष्ण निष्पाप पुरुषोत्तम हैं। वहा कोई कंपन नहीं है। इसलिए अर्जुन कृष्ण से पूछ सकता है और इसलिए कृष्ण अर्जुन को उत्तर दे सकते हैं। कृष्ण की पूरी चेष्टा यह है कि अर्जुन पीछे सरक आए, निष्पाप की जगह खड़ा हो जाए; वहां से युद्ध करे। यही गीता का पूरा का पूरा सार है। कैसे अर्जुन सरक आए निष्पाप की दशा में और वहा से युद्ध करे!

दो हालतों में युद्ध हो सकता है। एक तो अर्जुन सरक जाए शरीर के तल पर, जहां भीम और दुर्योधन खड़े हैं, वहा; वहां युद्ध हो सकता है। और या वह कृष्ण के तल पर सरक आए, तो युद्ध हो सकता है।

पहले तल पर सरक जाए, तो युद्ध साधारण होगा। जैसा रोज होता रहता है। तीसरे तल पर सरक जाए तो युद्ध असाधारण होगा। असाधारण होगा, जैसा कभी—कभी होता है, सदियों में कभी कोई एक आदमी तीसरे तल पर खड़े होकर युद्ध में उतरता है। और अगर वह बीच में खड़ा रहे, तो वह कुछ भी न कर पाएगा; युद्ध होगा ही नहीं। वह सिर्फ दुविधा में नष्ट हो जाएगा। वह संदेह में डूबेगा और समाप्त हो जाएगा। अधिक लोग संदेह में ही डूबते—उतराते रहते हैं।

हे निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

सुनकर नहीं; क्योंकि सुन तो अर्जुन ने लिया। अगर सुनकर ही होता होता, तो अर्जुन कहता कि बात खतम हो गई, कृतार्थ हो गया। सुन आपने भी लिया......।

तत्व से जानकर! ऐसा जो कृष्ण ने कहा है, जब अर्जुन ऐसा स्वयं जान ले; जब यह उसकी अनुभूति बन जाए; जब उसकी प्रतीति हो जाए; जब वह कह सके, ही, पुरुषोत्तम मैं हूं तो कृतार्थ हो जाता है। तो फिर जीवन में अर्थ आ जाता है। फिर प्रत्येक किया अर्थवान हो जाती है। फिर व्यक्ति जो भी करता है, सभी में फल और फूल लग जाते हैं। फिर व्यक्ति जो भी, जिस भांति भी जीता है, सभी तरह के जीवन से सुगंध आनी शुरू हो जाती है। उस व्यक्ति में पुरुषोत्तम के फल लगने शुरू हो जाते हैं, पुरुषोत्तम के फूल आने शुरू हो जाते हैं।

और कृष्ण कहते हैं, इस रहस्यमय गोपनीय शास्त्र को मैंने तुझसे कहा।

यह रहस्यमय तो बहुत है, और गोपनीय भी है। रहस्यमय इसलिए है कि जब तक आपने नहीं जाना, इससे बड़ी कोई पहेली नहीं हो सकती कि पाप करते हुए कैसे निष्पाप! संसार में खड़े हुए कैसे पुरुषोत्तम! दुख में पड़े हुए कैसे अमृत का धाम! इससे ज्यादा पहेली और क्या होगी? स्पष्ट उलझन है। इसलिए रहस्यमय।

और गोपनीय इसलिए कि इस बात को, कि तुम पुरुषोत्तम हो, कि तुम निष्पाप हो, अत्यंत गोपनीय ढंग से ही कहा जाता रहा है। क्योंकि पापी भी इसको सुन सकता है। और पापी यह मान ले सकता है कि जब निष्पाप हैं ही, तो फिर पाप करने में हर्ज क्या है? और जब पाप करने से निष्पाप होने में कोई अंतर ही नहीं पड़ता, तो किए चले जाओ।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, गोपनीय भी, गुप्त रखने योग्य भी। हम सब इसी तरह के लोग हैं। हम अपने मतलब का अर्थ निकाल ले सकते हैं। हम सोच सकते हैं, जब निष्पाप हैं, तो बात खत्म हो गई। अब हम चोरी करें, बेईमानी करें, डाका डालें, हत्या करें, कोई हर्ज नहीं। क्योंकि भीतर का निष्पाप तो निष्पाप ही बना रहता है; पुरुषोत्तम को तो कोई अंतर पड़ता नहीं है!

इसलिए बात गोपनीय है। उन्हीं से कहने योग्य है, जो सोचने को, बदलने को तैयार हुए हों। उन्हीं को समझाने योग्य है, जो उसे ठीक से समझेंगे; जो उसे सम्यकरूपेण समझेंगे; जो उसका विपरीत अर्थ निकालकर अपने को नष्ट न कर लेंगे। क्योंकि सभी कुंजिया ज्ञान की खतरनाक हैं। उनसे आप नष्ट भी हो सकते हैं। जरा—सा गलत उपयोग, और जो अग्नि आपके जीवन को बदलती, वही अग्नि आपको भस्मीभूत भी कर दे सकती है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, यह गोपनीय है शास्त्र, रहस्यमय है। क्योंकि जब तक तू अनुभव न कर ले, तब तक यह पहेली बना रहेगा। और इसको तत्व से जानकर ही मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

सुनकर नहीं, समझकर नहीं; अनुभव करके।

आपने भी सुना। उसमें से थोड़ा कुछ सोचना, पकड़ना, थोड़ा—सा, एक रंचमात्र। और उस रंचमात्र के आस—पास जीवन को ढालने की कोशिश करना। एक छोटा—सा बिंदु भी इसमें से पकड़कर अगर आपने जीवन को बसाने की कोशिश की, तो वह छोटा—सा बिंदु आपके पूरे जीवन को बदल देगा।

छोटी—सी चिंगारी पूरे पर्वत को जला डालती है। चिंगारी असली हो, चिंगारी जीवंत हो। चिंगारी शब्द नहीं जंगल को नहीं जला देगा, चिंगारी जलाएगी।

बहुत—सी चिंगारियां कृष्ण ने अर्जुन को दी हैं। अगर मनपूर्वक सहानुभूति से समझा हो, तो उसमें से कोई चिंगारी आपके मन में भी बैठ सकती है, आग बन सकती है।

लेकिन सिर्फ मुझे सुन लेने से यह नहीं होगा। करने का खयाल मन में जगाए।

जल्दी परिणाम न आएं, घबडाएं मत। आपने शुरू किया, इतना ही काफी है। परिणाम आएंगे; परिणाम सदा ही आते हैं। परमात्मा की तरफ उठाया गया कोई भी कदम व्यर्थ नहीं जाता।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 6

पुरूषोत्‍तम की खोज


 द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्‍यते।। 16।।

उत्तम: पुरूषस्‍त्‍वन्य: परमात्मेत्युदाह्वत:।

यो लस्केत्रयमाविश्य बिभर्त्सव्यय ईश्वर:।। 17।।

यस्मात्‍क्षरमर्तोतोऽहमक्षरादीप चोत्तम:।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:।। 18।।


हे अर्जुन, हम संसार में क्षर अर्थात नाशवान और अक्षर अर्थात अविनाशी, ये दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो क्षर अर्थात नाशवान और कूटस्थ जीवात्‍मा अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है।

तथा उन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है कि जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण—पोषण करता है, एवं अविनाशी ईश्वर और परमात्‍मा, ऐसे कहा गया है।


क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूं और माया में स्थित अक्षर, अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं इसलिए लम्बे में और वेद में पुरूषोत्तम नाम मे प्रसिद्ध हूं।


हे अर्जुन, इस संसार में क्षर अर्थात नाशवान और अक्षर अर्थात अविनाशी, ये दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो क्षर अर्थात नाशवान और कूटस्थ जीवात्मा अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है। तथा उन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सब का धारण—पोषण करता है एवं अविनाशी ईश्वर और परमात्मा, ऐसा कहा गया है।

क्योंकि मैं नाशवान जड्वर्ग क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूं और माया में स्थित अक्षर अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं, इसलिए लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं।

यह सूत्र पुरुषोत्तम की व्याख्या है। पुरुषोत्तम शब्द हमें परिचित है। लेकिन कृष्ण का अर्थ खयाल में लेने जैसा है।

कृष्ण कह रहे हैं कि तीन स्थितियां हैं। एक विनाशशील जगत है। उस विनाशशील जगत के भीतर छिपा हुआ एक अविनाशी तत्व है। और इस अविनाशी और विनाशी दोनों के पार, दोनों को अतिक्रमण करने वाला एक तीसरा तत्व है।

इसे हम ऐसा कहें शरीर, संसार, आत्मा और परमात्मा। शरीर क्षर है, प्रतिपल विनष्ट हो रहा है, प्रतिपल बह रहा है, परिवर्तन है। शरीर के भीतर छिपी हुई आत्मा अविनाशी है। इन दोनों के पार क्या कहते हैं, मैं हूं; जो पुरुषोत्तम है। ये दो पुरुष, एक क्षर और एक अक्षर, और दोनों के पार मैं हूं।

जो लोग भी दार्शनिक चिंतन करते हैं, उनको सवाल उठता है कि दोनों से काम हो जाता है, तीसरे की क्या जरूरत है? जैनों की यही मान्यता है। वे कहते हैं, संसार है और आत्मा है। बात खतम हो गई। जीव है और अजीव है। क्षर है और अक्षर है। यह तीसरे की क्या जरूरत है! इन दो से काम हो जाता है। दोनों अनुभव के हिस्से हैं। इसलिए जैन विचार द्वैत पर पूरा हो जाता है। लेकिन कृष्ण कहते हैं, मैं तीसरा हूं। जैन विचार में इसलिए परमात्मा की कोई जगह नहीं है, क्योंकि तीसरे की कोई जगह नहीं है।

कृष्ण का यह जोर तीसरे के लिए क्यों है, यह समझना जरूरी है। क्योंकि अगर दो ही हैं, तो दोनों बराबर मूल्य के हो जाते हैं। दोनों का संतुलन हो जाता है। जैसे एक तराजू है, उस पर दो पलवे लगे हैं। और अगर एक तीसरा काटा नहीं, जो दोनों का अतिक्रमण करता हो, तो तराजू बिलकुल व्यर्थ हो जाता है।

एक कांटा चाहिए जो दोनों का अतिक्रमण करता है। और चूंकि दोनों के पार है, इसलिए हिसाब भी बता सकता है कि किस तरफ बोझ ज्यादा है और किस तरफ बोझ कम है। तौल संभव हो सकती है।

अगर पदार्थ है और आत्मा है, और इन दोनों के पार कुछ भी नहीं है, तब बडी अड़चन है। क्योंकि तब पदार्थ और आत्मा के बीच न तो कोई जोड्ने वाला है, न कोई तोड्ने वाला है। पदार्थ और आत्मा के बीच जो संघर्ष है, उससे पार जाने का भी उपाय नहीं है। इसलिए जैन चिंतन में एक पहेली सुलझती नहीं। जैन विचारकों से पूछा जाता रहा है कि आत्मा इस संसार में उलझी क्यों? तो उनकी बड़ी कठिनाई है। वे कैसे बताएं कि उलझी। अगर वे कहें कि पदार्थ ने खींच ली, तो पदार्थ ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है। और अगर पदार्थ ज्यादा शक्तिशाली है, तो तुम मुक्त कैसे होओगे?

अगर वे कहते हैं, आत्मा खुद ही खिंच आई अपनी मरजी से, तो सवाल यह उठता है कि कल हम मुक्त भी हो गए, फिर भी आत्मा खिंच आए, तो क्या करेंगे? क्योंकि कभी आत्मा अपने आप खिंच आई बिना किसी कारण के, तो मुक्ति फिर शाश्वत नहीं हो सकती। मोक्ष में भी पहुंचकर क्या भरोसा, दस—पाच दिन में ऊब जाएं और आत्मा फिर खिंच आए! इतनी मेहनत करें—तप, उपवास, तपश्चर्या, ध्यान, साधना—मोक्ष में जाकर पंद्रह दिन में ऊब जाएं, और आत्मा फिर पदार्थ में खिंच आए।

फिर पूछा जाता है, इन दोनों के बीच नियम क्या है? किस नियम से दोनों का मिलना और हटना चलता है?

तीसरे को चूंकि वे स्वीकार नहीं करते, इसलिए बड़ी अड़चन है। और ध्यान रहे, गणित या तर्क की कोई भी चीज उलझ जाएगी, अगर दो के बीच तीसरी न हो। इसलिए हिंदू ईसाई, मुसलमान, दो की जगह त्रैत में विश्वास करते हैं, ट्रिनिटी में, त्रिमूर्ति में।

जहां दो हैं वहा तीसरा भी मौजूद रहेगा। क्योंकि दो को जोड़ना हो, तो तीसरे की जरूरत है; दो को तोड़ना हो तो, तीसरे की जरूरत है। दो के पार जाना हो, तो तीसरे की जरूरत है। दो के बीच जो नियम है, जो शाश्वत व्यवस्था चल रही है, उसके लिए भी तीसरे की जरूरत है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, मैं तीसरा हूं। और गहरे अनुभव से भी यही सिद्ध होता है।

एक तो शरीर है, जो दिखाई पड़ता है हमें। एक हमारा मन है, हमारी तथाकथित चेतना है, जो हमने अभी तक नहीं देखी। लेकिन अगर हम थोड़ा भीतर पीछे हटें और शांत हों, तो हमें मन भी दिखाई पड़ने लगेगा। और जब मन भी दिखाई पड़ेगा, तब हम तीसरे हो जाएंगे। तब एक तो शरीर होगा पदार्थ से निर्मित, और एक मन होगा चेतन कणों से निर्मित, और एक हम होंगे। और यह हमारा होना सिर्फ साक्षी का भाव होगा, द्रष्टा का भाव होगा। हम सिर्फ देखने वाले होंगे। ये दोनों का खेल चल रहा होगा, हम सिर्फ देखने वाले होंगे।

यह जो तीसरा है, यह पुरुषोत्तम है। यह पुरुषोत्तम प्रत्येक में छिपा है। पर्त शरीर की ऊपर है, फिर पर्त मन की ऊपर है। इन दोनों परतों को हम तोड़ दें, तो यह पुरुषोत्तम हमें उपलब्ध हो सकता है। अब हम कृष्ण के सूत्र को खयाल में लें।

इस संसार में क्षर अर्थात नाशवान और अक्षर अर्थात अविनाशी, ये दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो क्षर अर्थात नाशवान और कूटस्थ जीवात्मा अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है। तथा उन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो कि तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण—पोषण करता है एवं अविनाशी ईश्वर और परमात्मा, ऐसा कहा गया है।

क्योंकि मैं नाशवान जडवर्ग क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूं और माया में स्थित अक्षर अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं इसलिए लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं।

ये तीन परतें दार्शनिक सिद्धात नहीं हैं। ये तीन परतें आपके भीतर अनुभव की परतें हैं। जैसे—जैसे आप भीतर जाएंगे, वैसे—वैसे पर्त उघड़नी शुरू हो जाएगी।

अधिक लोग पहली पर्त पर ही रुके हैं, जो अपने को मान लेते हैं कि मैं शरीर हूं। जिस व्यक्ति ने अपने को मान लिया कि मैं शरीर हूं, वह अपने भीतरी खजानों से अपने ही हाथ से वंचित रह जाता है। उसका तर्क ही गलत नहीं है, उसका पूरा जीवन ही अधूरा अधकचरा हो जाएगा। क्योंकि जो वह हो सकता था, जो उसके बिलकुल हाथ के भीतर था, वह उसने ही द्वार बंद कर दिए। जैसे अपने ही घर के बाहर आप बैठे हैं ताला लगाकर, और कहते हैं कि यही घर है। बाहर की जो छपरी है, उसको घर समझे हुए हैं। पोर्च में जी रहे हैं, उसको घर समझे हुए हैं।

नास्तिक की, शरीरवादी की भूल तार्किक नहीं है, जीवनगत है, एक्सिस्टेंशियल है। और एक दफा आप पक्का जड़ पकड़ लें कि यही मेरा घर है, तो खोज बंद हो जाती है। फिर आप डरते हैं, फिर आप आंख भी नहीं उठाते, फिर प्रयत्न भी नहीं करते।

आस्तिक के साथ संभावना खुलती है। क्योंकि आस्तिक कहता है, तुम जहां हो, उतना ही सब कुछ नहीं है और भीतर जाया जा सकता है। इसलिए नास्तिक बंद हो जाता है। आस्तिक सदा खुला है। और खुला होना शुभ है।

अगर आस्तिक गलत भी हो, तो भी खुला होना शुभ है, क्योंकि खोज हो सकती है। जो छिपा है, उसको हम प्रकट कर सकते हैं। नास्तिक अगर ठीक भी हो, तो भी गलत है, क्योंकि खोज ही बंद हो गई, आदमी जड़ हो गया। उसने मान लिया कि जो मैं हूं बस, यह बात समाप्त हो गई।

जैसे एक बीज समझ ले कि बस, बीज ही सब कुछ है, तो फिर अंकुरण होने का कोई कारण नहीं है। फिर अंकुरित हो, जमीन की पर्त को तोड़े, कष्ट उठाए, आकाश की तरफ उठे, सूरज की यात्रा करे—यह सब बंद हो गया। बीज ने मान लिया कि मैं बीज हूं। जो व्यक्ति मान ले कि मैं शरीर हूं उसने अपने ही हाथ से अपने पैर काट लिए। पोर्च भी हमारा है, लेकिन घर के और भी कक्ष हैं। और जितने भीतर हम प्रवेश करते हैं, उतने ही सुख, उतनी ही शांति, उतने ही आनंद में प्रवेश होता है। क्योंकि उतने ही हम घर में प्रवेश होते हैं। उतने ही विश्राम में हम प्रवेश होते हैं।

कृष्ण कहते हैं, शरीर, वह क्षर; आत्मा, वह अविनाशी, शरीर के साथ जुड़ा हुआ; और इन दोनों के पार साक्षी— आत्मा है, दोनों से मुक्त।

आत्मा और साक्षी— आत्मा में इतना ही फर्क है। वे दो नहीं हैं। एक ही चेतना की दो अवस्थाएं हैं।

आत्मा का अर्थ है, शरीर से जुड़ी हुई। आत्मा का अर्थ है, जिसे खयाल है मैं का। आत्मा शब्द का भी अर्थ होता है, मैं, अस्मिता। जिस आत्मा को खयाल है शरीर से जुड़े होने का, उसको खयाल होता है मैं का।

शरीर से मैं भिन्न हूं, तो मैं भी खो जाता है। और मैं के खोते ही सिर्फ शुद्ध चैतन्य रह जाता है। वहा यह भी खयाल नहीं है कि मैं हूं। उस शुद्ध चैतन्य का नाम पुरुषोत्तम है।

ये आपके ही जीवन की तीन परतें हैं। और पहली पर्त से तीसरी पर्त तक यात्रा करनी ही सारी आध्यात्मिक खोज और साधना है। और तीसरी का लक्षण है कि वह दोनों के पार है। न तो वह देह है, न वह मन है। न वह पदार्थ है, न अपदार्थ है। वह दो से भिन्न, तीसरा है।



आप अपने भीतर कभी—कभी उसकी झलक पाते हैं। और चेष्टा करें, तो कभी—कभी उसकी झलक आयोजन से भी पा सकते हैं। भोजन कर रहे हैं, तब एक क्षण को देखने की कोशिश करें। भोजन शरीर में जा रहा है, भोजन क्षर है और क्षर में जा रहा है। लेकिन जो उसे शरीर में पहुंचा रहा है, वह आत्मा है। और आत्मा मौजूद न हो, तो शरीर भोजन न तो कर सकेगा, न पचा सकेगा। भूख शरीर में लगती है, लेकिन जिसको पता चलता है, वह आत्मा है। आत्मा न हो, तो शरीर को भूख लगेगी नहीं, पता भी नहीं चलेगी। भूख शरीर में पैदा होती है, लेकिन जिसको एहसास होता है, वह आत्मा है।

भूख, भूख की प्रतीति, ये दो हुए तल। क्या आप तीसरे को भी खोज सकते हैं, जो देख रहा है दोनों को कि शरीर में भूख लगी और आत्मा को भूख का पता चला और मैं दोनों को देख रहा हूं। इस तीसरे की थोड़ी— थोड़ी झलक पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए।

कोई भी अनुभव हो, उसमें तीनों मौजूद रहते हैं। इन तीन के बिना कोई भी अनुभव निर्मित नहीं होता। लेकिन तीसरा छिपा है पीछे। इसलिए अगर आप बहुत संवेदनशील न हों, तो आपको उसका पता नहीं चलेगा। वह गुप्ततम है।

वह जो पुरुषोत्तम है, वह गुप्ततम भी है। जितनी संवेदना आपकी बढ़ेगी, धीरे— धीरे उसकी प्रतीति होनी शुरू होगी।

कोई आदमी आपको गाली दे रहा है। तत्‍क्षण गाली देने वाला और आप गाली सुनने वाले, गाली और आप, दो हो गए। अगर थोड़ी संवेदना को जगाए, तो आपको वह भी भीतर दिखाई पड़ जाएगा जो दोनों को देख रहा है। गाली दी गई, तो गाली भौतिक है; कान पर चोट पड़ी, मस्तिष्क में शब्द घूमे, मस्तिष्क ने व्याख्या की; यह सब भौतिक है। मस्तिष्क ने कहा, यह गाली बुरी है।

व्याख्या की बात है। कभी—कभी गाली अच्छी भी लगती है, जब मित्र देता है। सच में मित्रता की कसौटी यह है कि गाली अच्छी लगे। अगर मित्र एक—दूसरे को गाली न दें, तो समझते हो कि कोई मित्रता में कमी है, मिठास नहीं है।

शत्रु भी गाली देते हैं, वही गाली; मित्र भी गाली देते हैं, वही गाली, शत्रु के मुंह से सुनकर बुरी लगती है, मित्र के मुंह से सुनकर भली लगती है, प्यारी लगती है। अच्छी गालियां भी हैं ही। व्याख्या पर निर्भर है।

शरीर पर चोट पड़ती है, कान पर झंकार जाती है, मस्तिष्क व्याख्या करता है। यह सब भौतिक घटना है। व्याख्या जो करता है, वह चेतना है। इसलिए वहीं गाली भली भी लग सकती है कभी, वही गाली बुरी भी लग सकती है कभी। वह जो व्याख्या करने वाली है, वह चेतना है।

क्या आपके पास कोई तीसरा तत्व भी है, जो दोनों को देख सके? इस घटना को भी देखे, इस बड़े यंत्र की प्रक्रिया को—गाली, कान में जाना, मस्तिष्क में चक्कर, शब्दों का व्याघात, ऊहापोह; फिर आत्मा का अर्थ निकालना। और क्या इनके पीछे दोनों को देख रहा हो कोई, ऐसी कभी आपको प्रतीति होती है? तो वही पुरुषोत्तम है। न प्रतीति होती हो, तो उसकी तलाश करनी चाहिए। और हर अनुभव में क्षणभर रुककर उसकी तरफ खयाल करना चाहिए।

लेकिन हमारी मुसीबत यह है कि जब भी कोई अनुभव होता है, हम बाहर दौड़ पड़ते हैं। किसी ने गाली दी; व्याख्या की, हम बाहर गए। उस आदमी पर नजर पड़ जाती है, जिसने गाली दी। क्यों दी गाली? या उसको कैसे हम बदला चुकाएं? तो जब हमें भीतर जाना था और तीसरे को खोजना था, तब हम बाहर चले गए। वह क्षणभर का मौका था, खो गया। रोज ऐसे अवसर खो जाते हैं।

तो जब भी आपके भीतर कोई घटना घटे, बाहर न दौड़कर भीतर दौड़ने की फिक्र करें। तत्‍क्षण! ध्यान बाहर न जाए, भीतर चला जाए। और भीतर अगर ध्यान जाए, तो आप पाएंगे साक्षी को खड़ा हुआ। और अगर साक्षी आपके खयाल में आ जाए, तो पूरी स्थिति बदल जाएगी, पूरी स्थिति का अर्थ बदल जाएगा।

किसी ने गाली दी हो, आत्मा व्याख्या करती है कि बुरा है या भला है, कोई प्रतिक्रिया करती है। अगर उसी वक्त तीसरा भी दिखाई पड़ जाए, तो भी आत्मा फिर व्याख्या करेगी। अब यह तीसरे की व्याख्या करेगी जो भीतर छिपा है। और हो सकता है, आपको हंसी आ जाए। शायद आप खिलखिलाकर हंस पड़े।

वह जो बाहर गाली आई थी, वह भी मस्तिष्क में आई, उसकी व्याख्या आत्मा ने की। फिर आपने पीछे लौटकर देखा और साक्षी का अनुभव हुआ, यह भी अनुभव मस्तिष्क में आएगा और आत्मा इसकी भी व्याख्या करेगी।

अगर आपको साक्षी दिखाई पड़ जाए, तो आपकी मुस्कुराहट धीरे— धीरे सतत हो जाएगी। हर अनुभव में आप हंस सकेंगे। क्योंकि हर अनुभव लीला मालूम पड़ेगा। और हर अनुभव एक गहरी मजाक भी मालूम पड़ेगी कि यह क्या चल रहा है! क्या हो रहा है! और इतनी क्षुद्र बातों को मैं इतना मूल्य क्यों दे रहा हूं! मैंने सुना है कि एक स्त्री ने अपने घर के भीतर झांककर अपने पति को कहा कि बाहर एक आदमी पड़ा है। पागल मालूम होता है। सामने सड़क पर लेटा है। पति ने भीतर से ही पूछा, लेकिन उसे पागल कहने का क्या कारण है? पत्नी ने कहा, पागल कहने का कारण यह है कि एक केले के छिलके पर फिसलकर वह गिर पड़ा है। उठ नहीं रहा है, केले को पड़ा—पड़ा गाली दे रहा है।

कोई भी सामान्य आदमी होता, तो पहला काम वह यह करता है कि किसी ने देख तो नहीं लिया! कपड़े झाड़कर, जैसे कुछ भी नहीं हुआ। केले को गाली भी देगा, तो भीतर और बाद में।

पत्नी ने कहा, आदमी बिलकुल पागल मालूम होता है। लेटा है वहीं, जहां गिर गया है; और सामने केले का छिलका पड़ा है, उसको गाली दे रहा है!

पति ने कहा, एक बात तय है, पागल हो या न हो, सामान्य नहीं है। मैं आया। वह बाहर जाकर देख रहा है। वह आदमी गाली भी दे रहा है, मुस्कुरा भी रहा है। तो उसने आदमी को पूछा कि यह क्या कर रहे हो? उसने कहा, बाधा मत दो।

वह एक सूफी फकीर था। वह केले पर से गिर पड़ा है। एक घटना घटी, एक भौतिक घटना। उसके मस्तिष्क में खबर पहुंची, जो सामान्य आदमी के सभी के पहुंचेगी। और जो केले पर नाराजगी आएगी, वह भी आई। लेकिन वहां से भागा नहीं वह। क्योंकि वह चूक जाएगा क्षण। वह वहीं लेट गया। क्योंकि यह मौका खो देने जैसा नहीं है।

एक केले का छिलका क्या कर रहा है? भीतर क्या हो रहा है? तो मस्तिष्क जो भी करना चाहता है, वह गाली भी दे रहा है। लेकिन एक तीसरी घटना वहा घट रही है। वह इन दोनों को देख भी रहा है, अपनी इस पागलपन की अवस्था को, इस पड़े हुए छिलके को। इस पूरी घटना में वह पीछे है, और धीमे—धीमे मुस्कुरा भी रहा है। इसलिए अक्सर संत पागल भी मालूम पड़ सकते हैं। एक बात तो पक्की है कि वे सामान्य नहीं हैं। एबनार्मल तो हैं ही। असाधारण तो हैं ही। क्योंकि आप यह नहीं कर सकेंगे। मगर अगर कर सकें, तो जो हंसी आएगी भीतर से........।

आप कभी एक बात को सोचते हैं कि जब दूसरा आदमी कुछ करता है, उसमें आपको हंसी आती है। जैसे एक आदमी केले के छिलके से फिसला और गिर पड़ा। ऐसा आदमी खोजना कठिन है, जिसको देखकर हंसी न आ जाए। अगर दूसरे को देखकर आपको इतनी हंसी आती है, कभी आपने खुद फिसलकर गिरकर और फिर हंसकर देखा? तब आपको तीसरे तत्व का थोड़ा—सा अनुभव होगा। क्योंकि उस वक्त गिरने वाले आप होंगे, गिरने वाले की जो प्रतिक्रिया है, वह भी आप होंगे, और देखने वाले भी आप होंगे। दूसरे को गिरते देखकर आप हंसते हैं, क्योंकि स्थिति पूरी की पूरी मजाक जैसी मालूम पड़ती है। पर कभी आपने इस पर विचार किया है कि ऐसा होता क्यों है? आखिर केले में, उसके छिलके पर से गिर जाने में ऐसा क्या कारण है जिससे हंसी आती है? इसमें हंसने योग्य क्या है?

मनोवैज्ञानिक बड़ी खोज करते हैं। क्योंकि इसमें हंसी सभी को आती है, सारी दुनिया में आती है। इसका कारण क्या है? इसमें ऐसी कौन—सी बात है जिसको देखकर हंसी आती है?

मेरी जो दृष्टि है, मुझे जो कारण दिखाई पड़ता है, वह यह है कि आदमी के अहंकार को केले का छिलका भी गिरा देता है, उसे देखकर हंसी आती है।

वह आदमी अकड़कर चला जा रहा था, हैट—वैट लगाए था, टाई वगैरह सब। ऐसा बिलकुल शक्तिशाली आदमी, अचानक एक केले का छिलका उसको जमीन पर चारों खाने चित्त कर देता है। उसकी सब सामर्थ्य खो जाती है। अकड़ खो जाती है। क्षणभर में पाता है कि दीन है, सड़क पर पड़ा है। इस दीनता से एकदम हंसी आती है। आदमी की इस असहाय अवस्था पर। उसके अकड़पन की स्थिति और फिर एकदम जमीन पर पड़े होने में इतना अंतराल है, इतना फर्क है, कि यह आप पहचान ही नहीं सकते थे कि यह आदमी केले के छिलके से गिरने वाला है। गिरने वाला नहीं है। यह सम्राट हो सकता है।

इसलिए आप खयाल रखें, अगर एक भिखारी गिरेगा, कम हंसी आएगी। अगर एक सम्राट गिरेगा, ज्यादा हंसी आएगी। आप सोचें, एक भिखारी गिर पड़े, आप कहेंगे, ठीक है। एक छोटा बच्चा गिरेगा, तो शायद हंसी न भी आए। क्योंकि बच्चे को हम समझते हैं, बच्चा ही है, इसकी अकड़ ही क्या है अभी! लेकिन अगर एक सम्राट गिरेगा, तो आप बिलकुल पागल हो जाएंगे हंस—हंसकर।

जिस—जिस स्थिति में हंसी आती है आपको देखकर, कभी—कभी उस स्थिति में अपने को देखें। तब भी एक हंसी आएगी; और वह हंसी ध्यान बन जाएगी; और उस हंसी से आपको साक्षी की झलक मिलेगी।

कोई भी अनुभव हो, तीसरे को पकड़ने की कोशिश करें। पुरुषोत्तम की तलाश जारी रखें। और हर अनुभव में वह मौजूद है। इसलिए न मिले, तो समझना कि अपनी ही कोई भूल—चूक है। मिलना चाहिए ही। क्षुद्र अनुभव हो कि बड़ा अनुभव हो, कैसा भी अनुभव हो, पुरुषोत्तम भीतर खड़ा है।

जैसे ही किसी को भीतर के पुरुषोत्तम का स्वर सुनाई पड़ता है, फिर कुछ चाहने को बचता नहीं है। वह पा लेना सब पा लेना है। लेकिन उसकी तलाश करनी होगी। पास ही है बहुत, फिर भी खोदना पड़ेगा। और जितनी त्वरा से खोदेंगे, जितनी तीव्रता से, उतना ही निकट उसे पाएंगे। अगर तीव्रता परिपूर्ण हो, सौ प्रतिशत हो, तो बिना खोदे भी मिल सकता है।

धीरे— धीरे बेमन से खोदेगे, तो बहुत दूर है। ऐसे ही खोदेंगे कि चलो देख लें, शायद हो, कभी न मिलेगा। क्योंकि खोदने की भावना क्या है, इस पर सब निर्भर है। अगर कोई तीव्रता से, पूर्ण तीव्रता से चाहे, तो किसी भी क्षण उसके द्वार खुल जाते हैं।

और हमें अगर जन्मों—जन्मों से नहीं मिला पुरुषोत्तम, तो उसका कारण यह नहीं है कि वह दूर है। उसका एक कारण है कि एक तो हमने खोजा ही नहीं। कभी खोजा भी, तो बेमन से खोजा। कभी गहरी प्यास से न पुकारा। कभी पुकारा भी, तो ऐसा कि लोगों को दिखाने के लिए पुकारा। प्रार्थना भी की, तो वह हार्दिक न थी; ऊपर—ऊपर थी, शब्दों की थी।

अगर इतना स्मरण रहे, तो उसे किसी भी क्षण पाया जा सकता है। हाथ बढ़ाने भर की बात है।


(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 5

 एकाग्रता और ह्रदय—शुद्धि


      यदादित्यगतं तेजो जगद्यासयतेऽखिलम्।

यच्‍चन्द्रमलि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि मांक्कम्।। 12।।

गामांविश्य च भूतानि धारयाथ्यमोजसा।

पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।। 13।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमांश्रित:।

प्राणायानसमांयुक्त: पचाम्यन्‍नं चतुर्विधम्।। 14।।

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत: स्मृतिज्ञनिमयहेनं च।

वेदैश्च सवैंरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदीवदेव चाहम्।। 15।।


और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थित हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान।

और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्‍ति से सब भूतों को धारण करता हूं और रस—स्वरूप अर्थात अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।

मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अश्निरूप होकर प्राण और अपान मे स्थित हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं।


और मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं तथा मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन अर्थात संशय—विसर्जन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।


और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थित हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान।

और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूं और रस—स्वरूप अर्थात अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।

मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त अन्न को पचाता हूं। और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं तथा मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन अर्थात संशय—विसर्जन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।

कुछ बातें। पहली बात, कृष्ण के ये सारे सूत्र अर्जुन का समर्पण संभव हो सके, इसके लिए हैं। कृष्ण ये सारी बातें कह रहे हैं उस एक केंद्र की ओर इशारा करने को, जो सबका आधार है।

और अगर वह आधार हमें दिखाई पड़ने लगे, तो हम उस आधार की शरण सहज ही जा सकेंगे। अगर हमारी बुद्धि को उसकी झलक भी मिलने लगे, तो हम अपने होने का आग्रह, और अपने आपको कुछ समझने का आग्रह, अस्मिता और अहंकार की अति हमारी छूटनी शुरू हो जाएगी।

तो कृष्ण जब बार—बार यह कहते हैं कि मैं यह हूं मैं यह हूं मैं यह हूं तो बहुत—से पढ़ने वालों को गीता में ऐसा लगता है कि कृष्ण बड़े अहंकारी हैं। यह आदमी अजीब है। यह क्यों कहे चला जाता है कि सभी चांद—सूरज की रोशनी मैं हूं! कि सभी रसों में छिपा हुआ रस मैं हूं! कि सभी प्राणों में धड़कता प्राण मैं हूं!

आज के जमाने में तो गीता जैसी किताब लिखनी बड़ी मुश्किल हो जाए; कहनी भी मुश्किल हो जाए। फौरन पत्थर पड़ जाएं। क्योंकि लोग कहें कि दिमाग खराब है आपका! सभी कुछ आप हैं?

और अगर हिंदुओं को गीता पढ़ते वक्त यह खयाल नहीं आता, तो श्रृदा के कारण। उनको लगता है, कृष्ण भगवान हैं, इसलिए ठीक है। लेकिन मुसलमान जब गीता पढ़ता है, तो उसे फौरन खयाल आता है कि यह आदमी ठीक नहीं मालूम पड़ता। जैन जब पढ़ता है, तो उसे फौरन समझ में आता है कि यह आदमी अहंकारी है।

हिंदू सोच लेता है कि भगवान हैं, ठीक है। बाकी अगर वह भी विचार करेगा, तो उसको भी लगेगा कि यह बात क्या है? कृष्ण क्यों इतना जोर देते हैं कि मैं ही सब कुछ हूं?

और आपको अगर ऐसा लगे कि कृष्ण अहंकारी हैं, इतना जोर अपने मैं पर देते हैं, तो समझना कि यह चोट आपके अहंकार को लग रही है। यह आपका अहंकार क्रुद्ध हो रहा है।

कृष्ण का क्या प्रयोजन होगा? कृष्ण क्यों इतना जोर दे रहे हैं स्वयं पर? कृष्ण के जोर का कारण आप समझ लें।

कृष्ण का जोर स्वयं पर नहीं है; कृष्ण का जोर अर्जुन मिट जाए, इस पर है। पर इसके लिए एक ही उपाय है कि अर्जुन का केंद्र अर्जुन के बाहर हट जाए। अर्जुन का केंद्र अर्जुन के भीतर न हो, कहीं बाहर हो जाए। कृष्ण की यह सारी चेष्टा इसीलिए है कि अर्जुन देख पाए कि उसके भीतर जो मैं की आवाज है, वह व्यर्थ है; और वह संपूर्ण के केंद्र पर समर्पित हो जाए।

अर्जुन ने कहीं भी यह सवाल नहीं उठाया कि आप इतने अहंकार की बातें क्यों कर रहे हैं! यह भी जरा आश्चर्यजनक है। क्योंकि अर्जुन बुद्धिमान है; जैसा सोफिस्टिकेटेड होना चाहिए, उतना है। सुशिक्षित है, सुसंस्कारी है। उस समय के प्रतिभावान व्यक्तियों में एक है। मेधावी है। नहीं तो कृष्ण की मित्रता का कोई अर्थ भी न था। और कृष्ण जिसके सारथी बनने को राजी हो गए हैं, वह कोई साधारण गंवार नहीं है। पर अर्जुन एक बार भी नहीं कहता कि आप क्यों अपने अहंकार की घोषणा किए जा रहे हैं!

कृष्ण अर्जुन से कह सके, क्योंकि अर्जुन का एक प्रेम, एक सतत प्रेम कृष्ण के प्रति है। और जहां प्रेम हो, वहां हम समझ पाते हैं कि यह जो कहा जा रहा है इसमें कोई अहंकार नहीं है। और प्रेम हो, तो यह भी हम समझ पाते हैं कि यह मेरे लिए कहा जा रहा है। तो अर्जुन को पूरे समय यह लगा है कि मैं मिट जाऊं, इसकी चेष्टा के लिए कृष्ण अपने मैं को बड़ा कर रहे हैं। वे अपने मैं को खड़ा कर रहे हैं, ताकि मेरा मैं उस बड़े मैं में खो जाए। वे अपने मैं के विराट रूप को मुझे दे रहे हैं, ताकि मैं एक बूंद की तरह उस सागर में खो जाऊं।

यह सिर्फ एक उपाय है। अर्जुन मिट सके, राजी हो सके मिटने को, इसके लिए यह सिर्फ एक सहारा है।

प्रत्येक गुरु अपने शिष्य को यह सहारा देगा ही। जिस दिन शिष्य मिट जाएगा, उस दिन गुरु हंसकर उससे भी कह देगा कि तुम भी नहीं हो, मैं भी नहीं हूं।

लेकिन उसके पहले यह नहीं कहा जा सकता। यह बड़ी अड़चन की बात है। क्योंकि गुरु अगर यह कह दे, मैं भी नहीं हूं तुम भी नहीं हो, तो शिष्य यह तो मान लेगा कि तुम नहीं हो, यह नहीं मान सकता कि मैं नहीं हूं। क्योंकि यह मानना बहुत कठिन बात है। यह तो कोई भी मान लेगा कि तुम नहीं हो, बिलकुल ठीक है, सच है। यह तो हम पहले ही जानते थे। इसलिए जो गुरु कहे, मैं नहीं हूं? शिष्य बिलकुल राजी होगा।

और एक खतरा हो जाता है कि अब जहां भी कृष्ण मिल जाएंगे उनको, और कृष्ण कहेंगे कि मैं हूं प्राणों का प्राण; मैं हूं ज्योतियों की ज्योति। वे कहेंगे, आपका दिमाग खराब है।  ज्ञानी तो सदा यह कहते हैं कि मैं कुछ भी नहीं हूं।

ज्ञानी सदा जानते हैं कि वे कुछ भी नहीं हैं। लेकिन अज्ञानियों से बात करना जोखम का काम है।

कृष्ण इतने जोर से कह रहे हैं कि मैं यह हूं ताकि अर्जुन को प्रतीति होने लगे कि वह कुछ भी नहीं है।

यह ठीक वैसा ही है, जैसा कि एक बड़ी प्रसिद्ध घटना है, जो आपने सुनी होगी कि अकबर ने एक लकीर खींच दी दीवाल पर और अपने दरबारियों को कहा कि इसे बिना छुए छोटा कर दो। वे नहीं कर पाए क्योंकि बुद्धि सीधी कहेगी कि बिना छुए कैसे छोटी होगी? हाथ लगाना पड़े, पोंछना पड़े। लेकिन बीरबल ने एक बड़ी लकीर उसके पास खींची। उस लकीर को नहीं छुआ, लेकिन वह छोटी हो गई।

ये कृष्ण इतना ही कर रहे हैं कि अर्जुन की लकीर के पास एक बहुत बड़ी लकीर खींच रहे हैं, कृष्ण की लकीर। वह अर्जुन का मैं है, छोटा—सा टिमटिमाता दीया; और कृष्ण कह रहे हैं, सूर्यों का सूर्य मैं हूं। तू इधर देख, तू इस तरफ मुड़, तू कहां छोटे—से दीए की टिमटिमाती लौ! और मिट्टी का तेल—वह भी मिलना मुश्किल—उसमें तू कब तक टिमटिमाता रहेगा, इस तरफ देख। और अर्जुन का प्रेम है इतना कृष्ण के प्रति, वह देख सकता है। इतना भरोसा है कि यह आदमी कह रहा है, तो कोई सूरज होगा उसमें। और सूरज सबके भीतर छिपा है, इसलिए अड़चन कुछ भी नहीं है। अगर अर्जुन भाव से देख ले, तो कृष्ण के भीतर का सूरज दिख जाएगा। और जिस दिन कृष्ण के भीतर का सूरज दिखेगा, वह अपने टिमटिमाते दीए को छोड़ देगा।

टिमटिमाता दीया छूट जाए तो अपने भीतर का सूरज भी दिखेगा। लेकिन यह गुरु जो है, वह मीडियाकार है। अपने ही भीतर के सूरज को देखना अति कठिन है। क्योंकि अपनी नजर तो अपने दीए पर ही लगी है। इस दीए का बुझना जरूरी है। यह गुरु के सहारे बुझ जाएगा। और एक बार बुझ जाए, तो गुरु के सूरज को देखने की कोई जरूरत नहीं है, अपना सूरज भी दिखाई पड़ने लगेगा।

हम दीए से आविष्ट होकर बैठे हैं। हमारी हालत ऐसी है, सूरज निकला है खुले मैदान में, हम अपना दीया रखे उस पर आंख गड़ाए बैठे हैं। इतने जन्मों से आंख गड़ाए हैं कि हिप्‍नोटाइज्‍ड हो गए हैं। वह दीया ही दिखाई पड़ता है। और दीया देखते—देखते आंखें भी इतनी छोटी हो गई हैं कि अगर एक दफे सूरज की तरफ देखें, तो अंधेरा ही दिखाई पड़ेगा।

कृष्ण का सहारा सिर्फ इतना है कि आहिस्ता से अर्जुन को उसके दीए से हटा लें। और एक बार वह सूरज कृष्ण का देख ले, तो वह कृष्ण का सूरज नहीं है, वह सभी का सूरज है; वह सभी के भीतर बैठा है। इसे खयाल में रखें।

और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थित हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान। और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण किए हूं और रस—स्वरूप अर्थात अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।

सोम दो अर्थ रखता है। एक तो सोम का अर्थ है, चंद्रमा। हिंदुओं का जो रस—विज्ञान है, उसमें औषधियों को जो पुष्टि मिलती है, वह चंद्रमा से मिलती है। सूर्य उनको प्राण देता है। सूर्य के बिना औषधियां बड़ी नहीं होंगी, वनस्पतिया बड़ी नहीं होंगी; वृक्ष बड़े नहीं होंगे। सूरज उन्हें प्राण देता है। लेकिन जो रस है, जो उनमें जीवनदायी तत्व है, वह उन्हें चांद से मिलता है; वह चांद के द्वारा मिलता है।

यह बात काल्पनिक समझी जाती थी आज तक कि आयुर्वेद और हिंदुओं की यह जो रस—विद्या है, यह काव्य है, प्रतीक है। लेकिन इधर पचास वर्षों में जो खोजबीन हुई है, उससे सिद्ध हो रहा है कि चांद निश्चित ही प्राण देने वाला है।

और सूरज जो कुछ भी देता है, उसमें एक उत्तेजना है, और चांद जो भी देता है, उसमें एक शांति है। इसलिए जितनी शांत औषधियां हैं, उन सब में चांद छिपा है। और जो सर्वाधिक शांतिदायी औषधि थी, इसी कारण—वह दूसरा अर्थ है सोम का—उसे हम सोम—रस कहते थे।

पश्चिम में वैज्ञानिक बड़ी खोज में लगे हैं कि वेदों ने जिसको सोम—रस कहा है, वह क्या है? पच्चीसों प्रस्ताव किए गए हैं, पच्चीसों दावे किए गए हैं कि यह वनस्पति सोम—रस होनी चाहिए। कुछ लक्षण मिलते हैं, लेकिन पूरे लक्षण किसी वनस्पति से नहीं मिलते। संभावना इस बात की है कि वह वनस्पति पृथ्वी से खो गई। या हिंदुओं ने उसे विलुप्त कर दिया।

काफी काम इस समय विज्ञान में चलता है। बड़े ग्रंथ लिखे जाते हैं, बड़ी शोध की जाती है सोम की खोज के लिए। क्यों? क्योंकि पश्चिम में इधर तीस वर्षों में वनस्पति के द्वारा, औषधि के द्वारा, रसायन के द्वारा समाधि कैसे प्राप्त की जाए, इस संबंध में बड़ा आंदोलन है। तो एल. एस डी., मारिजुआना, मेस्कलीन, इन सब की बड़ी पकड़ है। और सारी गवर्नमेंट्स डर गई हैं, सारी दुनिया में रुकावट लगा दी गई है कि कोई भी इन चीजों को न ले।

और यह बड़े मजे की बात है कि शराब सबसे ज्यादा खतरनाक है, लेकिन शराब सब जगह प्रचलित है! और ये औषधियां शराब जैसी खतरनाक नहीं हैं, लेकिन इन पर भारी रोक है। और डर इस बात का है कि ये औषधियां व्यक्ति में ऐसे क्रांतिकारी फर्क ले आती हैं कि आज का जो समाज है, वह उस व्यक्ति का उपयोग नहीं कर सकेगा।

जैसे अगर युवक एल. एस डी, मारिजुआना, और इस तरह की चीजों का उपयोग करने लगें, तो उनको युद्ध पर नहीं भेजा जा सकता। वे इतने शांत हो जाएंगे कि उनको युद्ध पर नहीं भेजा जा सकता। उनसे दंगे, उपद्रव नहीं करवाए जा सकते। उन्हें रस ही नहीं रह जाएगा लड़ने का।

इन सारी औषधियों के कारण पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक अल्डुअस हक्सले ने घोषणा की थी कि इस सदी के पूरे होते—होते हम सोम का पता लगा लेंगे। क्योंकि सोम इन्हीं से मिलती—जुलती कोई चीज होनी चाहिए। इनसे बहुत श्रेष्ठ, लेकिन इनसे मिलती—जुलती। क्योंकि वेद में जो वर्णन है सोम का कि ऋषि सोम को पी लेते हैं और समाधिस्थ हो जाते हैं, और परमात्मा के आमने—सामने उनकी चर्चा और बातचीत होने लगती है। इस लोक से रूपांतरित हो जाते हैं; किसी और आयाम में प्रविष्ट हो जाते हैं।

हो सकता है, सोम इस तरह का रासायनिक रस रहा हो कि समाज को उसे विलुप्त कर देना पड़ा हो। क्योंकि समाज उसके सहारे नहीं चल सकता। अगर लोग बहुत आनंदित हो जाएं, नाचने—गाने लगें और तल्लीन रहने लगें, तो समाज नहीं चल सकता है। समाज के लिए थोड़े दुखी, परेशान लोग चाहिए; वे ही चलाते हैं। उनके बिना नहीं चल सकता।

अगर सभी लोग प्रसन्न हों, तो बहुत मुश्किल है काम। किसको लगाइएगा दौड़ में कि तू फैक्टरी चला। वह कहेगा, ठीक है, रोटी मिल जाती है। किसको दौड़ में लगाइएगा कि तू दिल्ली जा! वह कहेगा, हम पागल नहीं हैं। हम जहा हैं, वहीं दिल्ली है। हम मजे में हैं।

यह जो इतनी दौड़ चलती है, अर्थ की, राजनीति की, सब तरह की विक्षिप्तता की, इसके लिए दुखी लोग चाहिए। युद्ध चलते हैं, संघर्ष चलता है, और चैन नहीं है एक क्षण को, इसके लिए बेचैन लोग चाहिए।

हिप्पियों से अमेरिका डर गया था। क्योंकि अगर सारे लड़के और लड़किया हिप्पियों जैसे हो जाएं, तो अमेरिका डूबेगा। इस अर्थ—तंत्र में उसकी कोई जगह न रह जाएगी।

इनको लड़वाया नहीं जा सकता है। ये लड़ने से इनकार करते हैं। और यह परिणाम है एल एस. डी. और मांरिजुआना और मेस्कलीन का, तो सोम का क्या परिणाम रहा होगा!

सोम अदभुततम रस है। हिंदू धारणा से सभी वनस्पतियों में चांद उतरता है। लेकिन सोम नाम की जो वनस्पति है, उसमें चांद पूरा उतरता है। वह चांद की पूरी शांति को पी जाती है। उसके पत्ते—पत्ते में, उसके फूल में, उसकी जड़ों में चांद छिप जाता है। और उसका अगर विधिवत उपयोग किया जाए, तो समाधि फलित होती है। निश्चित ही, उस पर रोक लगाई गई होगी; उसको छिपाया गया होगा या नष्ट कर दिया गया होगा। इसलिए बहुत खोज करके हिमालय में भी सोम वनस्पति उपलब्ध नहीं होती।

लेकिन कृष्ण यहां कह रहे हैं कि मैं वही सोम हूं। चांद भी मैं हूं, सूरज भी मैं हूं। इस जगत में जो तेज है, वह भी मेरा है, और इस जगत में जो शांति है, सन्नाटा है, वह भी मेरा है। इस जगत में जो तरंगें हैं, वे भी मेरी हैं। इस जगत में जो मौन है, वह भी मेरा है। इस जगत का जो ताप—उत्तप्त व्यक्तित्व है, वह भी मैं हूं; और इस जगत का जो शांत समाधिस्थ व्यक्तित्व है, वह भी मैं हूं।

मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त हुआ अन्न को पचाता हूं। और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं।

यह काफी महत्वपूर्ण बात है, सभी प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं।

आपके भीतर कहां अंतर्यामी है? अगर आप अपने अंतर्यामी को पकड़ लें, तो भगवान के चरण हाथ में आ गए। कौन—सा तत्व है आपके भीतर जो अंतर्यामी है? कैसे उस तत्व को पकड़े?

अंतर्यामी का अर्थ होता है, भीतर का जानने वाला। भीतर जो छिपा है जानने वाला। तो जिस तत्व को आप जान नहीं सकते और जो सबको जानता है, धीरे— धीरे उसकी गहराई में डूबना है।

शरीर को मैं जानता हूं। शरीर को देखता हूं। तो जिसे मैं जानता हूं और देखता हूं वह अलग हो गया, पृथक हो गया, वह मेरा ज्ञाता न रहा, ज्ञेय हो गया, वह आब्जेक्ट हो गया। वह संसार का हिस्सा हो गया।

भीतर आंख बंद करता हूं तो हृदय की धड़कन भी मैं सुनता हूं? अपने हृदय की धड़कन भी सुनता हूं। तो यह हृदय की धड़कन मेरी न रही; यंत्रवत हो गई, शरीर की हो गई। मैं देखने वाला इसके पीछे खड़ा हूं। इसको भी मैं सुनता हूं; इससे मैं अलग हो गया, फासला हो गया।

आंख बंद करता हूं विचारों की बदलियां घूमती हैं। उनको भी मैं देखता हूं कि यह विचार जा रहा है, यह अच्छा, यह बुरा; यह क्रोध, यह लोभ। इन विचारों के पार मैं देखने वाला हो गया।

समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं इतनी ही चेष्टा करती हैं कि तुम्हें यह समझ में आना शुरू हो जाए कि तुम क्या—क्या नहीं हो। नेति—नेति; यह भी मैं नहीं, यह भी मैं नहीं। काटते जाओ। जो भी दिखाई पड़ जाए, जो भी ज्ञेय बन जाए जो भी आब्जेक्ट बन जाए, उसे छोड़ते जाओ; इलिमिनेट करो, नकार करो। और उस जगह ही रुको, जहा सिर्फ जानने वाला ही रह जाए। वह अंतर्यामी है। वह जो भीतर छिपा और सब जानता है, और किसी के द्वारा कभी जाना नहीं जाता। क्योंकि उसके पीछे जाने का कोई उपाय नहीं है। वह सबसे पीछे है। वह अंत है। वह मूल है। वह उत्स है।

अगर हम अपने भीतर के अंतर्यामी को पकड़ लें, वही हम हैं, अगर उसमें हम खडे हो जाएं और ठहर जाएं, तो हम कृष्ण में खड़े हो गए। और तब हम भी कह सकेंगे कि यह सूरज मेरी ही रोशनी है, और यह चांद मुझसे ही चमकता है, औषधियां मुझसे ही बड़ी होती हैं; और इस जगत में जो सोम बरस रहा है, वह मैं ही हूं।

अंतर्यामी को आप पकड़ लें, तो यही घोषणा जो कृष्ण की है, आपकी घोषणा हो जाएगी। और तभी आप समझ पाएंगे कि कृष्ण अहंकार के कारण यह घोषणा नहीं कर रहे हैं, यह एक आंतरिक अनुभव के कारण कर रहे हैं।

और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं तथा मेरे से ही स्मृति, जान और अपोहन, संशय—विसर्जन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं तथा वेदात का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।

मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन।

तीन शब्दों का कृष्ण ने उपयोग किया है, स्मृति, ज्ञान और अपोहन। अपोहन का अर्थ है, संशय—विसर्जन। यह बड़ी समझने की बात है। अपोहन शब्द याद रखने जैसा है।

आपके भीतर सदा ऊहापोह चलता है। ऊहापोह का मतलब है, यह ठीक कि वह ठीक! यह भी ठीक, वह भी ठीक! कुछ समझ नहीं पड़ता, क्या ठीक। संशय! मन डोलता रहता है घड़ी के पेंडुलम की तरह, बाएं —दाएं; कहीं ठहरता नहीं मालूम पड़ता। यह ऊहापोह की अवस्था है।

अपोहन का अर्थ है, इससे विपरीत अवस्था। जहा कोई ऊहापोह नहीं, जहा संशय चला गया; जहा असंशय आप खड़े हो गए। जहा पेंडुलम घूमता नहीं है; खड़ा हो गया है घिर। जहा कोई कंपन नहीं है। जहा यह ठीक या वह ठीक, ऐसा भी कोई सवाल नहीं है। जहा आप सिर्फ खड़े हैं, जहा चुनाव न रहा। जिसको कृष्णमूर्ति च्चाइसलेसनेस कहते हैं, वह अपोहन है। जहा सब चुनाव शांत हो गए; जहा मुझे चुनना नहीं कि यहां जाऊं कि वहा जाऊं। जहा आप बिना चुनाव चुपचाप खड़े हैं, जहां चित्त थिर है।

कृष्ण कहते हैं, स्मृति मैं हूं। क्योंकि आपके भीतर जिसको आप स्मृति कहते हैं, उसको कृष्ण स्मृति नहीं कह रहे हैं। जिसको आप मेमोरी कहते हैं, वह नहीं। कि आपको पता है कि आपका नाम क्या है, आपकी तिजोरी में कितना रुपया जमा है, आपकी दुकान कहां है, इससे प्रयोजन नहीं है स्मृति का। स्मृति से इस बात का प्रयोजन है कि मैं कौन हूं। सेल्फ रिमेंबरिग। मेमोरी नहीं, आत्म—बोध, कि मैं कौन हूं!

आप दुकानदार हैं, यह आत्म—बोध नहीं है। क्योंकि दुकानदार होना सांयोगिक है; कोई आपका स्वभाव नहीं है।

लेकिन हम उसको भी स्वभाव की तरह पकड़ लेते हैं। दुकानदार को दुकान से हटाओ, उसको लगता है, उसकी आत्मा जा रही है। नेता को पद से हटाओ, उसको लगता है, मरे; गए। पद के बिना वह कुछ भी नहीं है।

मैंने सुना है, एक गाव से चार चोर निकलते थे। उन्होंने देखा कि एक नट छलांग लगाकर बड़ी ऊंची रस्सी पर चढ़ गया। और रस्सी पर नाचने के कई तरह के करतब दिखाने लगा। उन चोरों ने कहा, यह आदमी तो काम का है! इसको उड़ा ले चलें। हमें बड़ी मेहनत पड़ती है मकानों में चढ़ने में रात। यह तो गजब का आदमी है! एक इशारा करो कि दूसरी मंजिल पर पहुंच जाए।

उस नट को उन्होंने उड़ा लिया। रात उन्होंने बड़े से बड़ा जो नगर का सेठ था, उसकी हवेली चुनी; जिसको वे अब तक नहीं चुन पाए थे, क्योंकि हवेली बड़ी थी, चढ़ने में अड़चन थी।

नट को लेकर वे पहुंचे। बड़े प्रसन्न थे। उन्होंने नट से कहा, अब तू देर न कर भाई। एक, दो, तीन, छलांग लगा, ऊपर चढ़। लेकिन नट वहीं खड़ा रहा। उन्होंने फिर दुबारा कहा; नट वहीं फिर खड़ा रहा। उन्होंने फिर तीसरी बार कहा। तीसरी बार एक चोर बिलकुल नाराज हो गया, उसने कहा, अभी तू खड़ा क्यों है? चढ़! हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।

नट ने कहा, पहले नगाड़ा बजाओ। बिना नगाड़े के कैसे नट चढ़ सकता है! नगाड़ा जब बजे, तब उसने कहा, मैं नहीं तो मेरे पैर में गति ही नहीं है। हम खड़े नहीं हैं, कोई उपाय ही नहीं है। अब चोर नगाड़ा तो बजा नहीं सकता। पर नट ठीक कह रहा था। लेकिन उसको भी खयाल नहीं है कि अगर वह छलांग लगा सकता है, तो नगाड़े से कुछ लेना—देना नहीं है।

दुकानदार होना आपका, कि डाक्टर होना, कि मजदूर होना, कि स्त्री होना, कि पुरुष होना, सांयोगिक है। वह कोई आपका स्वभाव नहीं है। और आप वह नहीं रहेंगे, तो सब मिट गया, ऐसा कुछ नहीं है। कुछ नहीं मिटता। उसकी जो स्मृति है, उसको कृष्ण नहीं कह रहे हैं कि वह मैं हूं नहीं तो आप सोचें कि कृष्ण।

कृष्ण कह रहे हैं, आत्म—स्मरण मैं हूं सेल्फ रिमेंबरेंस मैं हूं। जिस दिन आप स्मरण करेंगे इन सब संयोगों से हटकर आपका जो स्वभाव है, आप कौन हैं! मैं कौन हूं!

ये सारी सांयोगिक बातें हैं। मेरा नाम, मेरा घर, पता, ये सब कुछ मूल्य के नहीं हैं। मेरा न कोई नाम है, और न मेरा कोई घर है, और न मेरा कोई रूप है। मेरी वह जो अरूप और अनाम स्थिति है, उसको कृष्ण कहते हैं, वह स्मृति है।

स्मृति शब्द बाद में बिगड़ा और कबीर और दादू के समय में सुरति हो गया। नानक और दादू और कबीर सुरति का उपयोग करते हैं। वे कहते हैं, सुरति जगाओ। सुरति का मतलब है, जगाओ उसको, जो आपके भीतर परमात्मा है।

 वह जो सब संयोगों के पार है, सब स्थितियों के पार है, सभी स्थितियों से गुजरता है, फिर भी किसी स्थिति के साथ एक नहीं है, सभी अवस्थाओं से गुजरता है।

कभी आप बच्चे हैं; कभी जवान हैं; कभी बुढ़े हैं; लेकिन आपके भीतर कोई है, जो न बच्चा है, न जवान है, न बुढ़ा है; जो तीनों से गुजरता है। जैसे तीन स्टेशनें हों और आपकी ट्रेन तीनों से गुजर जाए। वह जो यात्री भीतर बैठा है, जो सदा चल रहा है, कहीं भी ठहरता नहीं है, किसी भी अवस्था के साथ एक नहीं हो जाता है; सदा अवस्था—मुक्त है, उसकी स्मृति को कृष्ण कहते हैं, मैं हूं। ज्ञान! यहां ज्ञान से अर्थ नालेज का नहीं है। विश्वविद्यालय ज्ञान देते हैं। कृष्ण उस ज्ञान की बात नहीं कर रहे हैं। शिक्षक ज्ञान देते हैं! स्मृति इकट्ठी कर लेती है ज्ञान को। संग्रह हो जाता है आपके पास, बड़ी सूचनाएं इकट्ठी हो जाती हैं। कृष्ण उसको ज्ञान नहीं कह रहे हैं।

ज्ञान से अर्थ नालेज नहीं है। ज्ञान से अर्थ प्रज्ञा है। ज्ञान से अर्थ विजडम है। बड़ी अलग बात है। क्योंकि यह हो सकता है, आप कुछ न जानते हों और ज्ञानी हों। और यह भी हो सकता है, बहुत कुछ जानते हों और निपट अज्ञानी हों। आपके जानने से कोई संबंध नहीं है।



एक आदमी बहुत कुछ जान सकता है। सब शास्त्र कंठस्थ हों; तोते की तरह कंठस्थ हो सकते हैं, जरा भी भूल न करे। यंत्रवत स्मृति हो। और फिर भी जीवन में व्यवहार जो करे, वहां अज्ञानी सिद्ध हो।

आपको वेद कंठस्थ हों, सारी बातें याद हों, और गीता आपकी जबान पर बैठी हो; और आपको मालूम है बिलकुल कि न तो शस्त्रों से छिदता हूं न अग्नि मुझे जला सकती है। और जरा—सा दुख आ जाए और आप छाती पीटकर रो रहे हैं! सब गीता वगैरह रखी रह जाती है! वहा पता चलता है कि यह प्रज्ञा है या नहीं। प्रज्ञा आपके अनुभव में काम आती है। और ज्ञान केवल बुद्धि की बातचीत है। और बुद्धि की बातचीत तो हम कुछ भी इकट्ठी कर ले सकते हैं।

मैं एक प्रोफेसर के घर मेहमान था। ऐसे अचानक मेरे कान में पति—पत्नी की बात पड़ गई। मैं अपने कमरे में बैठा था, जहा उनके घर में रुका था। पति बाहर से आए। पत्नी से कहा—कुछ जोर से ही कहा, बड़े प्रसन्न थे—कि आज रोटरी क्लब में रात मेरा व्याख्यान है तिब्बत के ऊपर। पत्नी ने कहा, तिब्बत? लेकिन तुम तिब्बत तो कभी गए नहीं! पति ने कहा, छोड़ो भी। सुनने वाले ही कौन से तिब्बत होकर आए हैं!

यह मैं सुन रहा था। तब मुझे पता चला कि ज्ञान के लिए तिब्बत जाने की कोई जरूरत नहीं है, न सुनने वाले को, न बोलने वाले को। अक्सर अध्यात्म के नाम पर ऐसे ही तिब्बत के यात्री चलते रहे हैं। न सुनने वाले को कुछ पता है कि ब्रह्म क्या, न बोलने वाले को कुछ पता है। जब दोनों को पता नहीं, तो कोई अड़चन ही नहीं है। यहां जो कृष्ण कह रहे हैं ज्ञान, तो विजडम, प्रज्ञा से उसका संबंध है। अनुभव में जिसके, जीवन में जिसका बोध सधा हुआ है, कैसी भी अवस्था हो, जिसके बोध को डिगाया नहीं जा सकता, वह मैं हूं। स्मृति, ज्ञान और अपोहन, सब वेदों द्वारा जानने योग्य। ये ही तीन बातें हैं। सारा वेदांत इन्हीं तीन की खोज करता है। और न केवल सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं वरन वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।

सारे वेद मुझे ही खोजते हैं। और सारे वेद मेरे ही अनुभव से निकलते हैं।

सारे वेदों की खोज क्या है? कि वह अंतर्यामी मिल जाए। वह जो भीतर छिपा हुआ राजों का राज है, वह मिल जाए। लेकिन वेद निकलते कहां से हैं?

जिनको वह मिल जाता है, उनकी वाणी वेद बन जाती है। जो उसे पा लेते हैं, उनकी सुगंध वेद बन जाती है। जो वहां तक पहुंच जाते हैं उस अंतर्यामी तक, फिर वे जो भी कहते हैं, वही वेद बन जाता है। वे न कहें, तो मौन उनका वेद हो जाएगा। वे चलें—फिरें, उठें, तो उनकी गतिविधि वेद हो जाएगी।

अगर बुद्ध को चलते हुए भी देख लो, तो भी उस चलने में समाधि है; उसमें भी इशारा है। अगर कृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देख लो, तो उस बांसुरी में वेद है; उसमें सारा वेदांत है, उसमें सारा इशारा है।

कृष्ण कहते हैं कि मैं ही सबकी खोज, और मैं ही सब का मूल उत्स। और यह जो मैं है, तुम्हारे भीतर छिपा हुआ अंतर्यामी है। कृष्ण बाहर से बोल रहे हैं, लेकिन जिसकी तरफ इशारा कर रहे हैं, वह अर्जुन के भीतर है।

गुरु सदा बाहर से बोलता है, लेकिन जिस तरफ इशारा करता है, वह शिष्य के भीतर है। इसलिए दो पड़ाव हैं यात्रा के। एक तो बाहर का गुरु, वह पहला पड़ाव है। और फिर भीतर का गुरु, वह अंतिम पड़ाव है।


(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 4

समर्पण की छलांग

   उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्‍जानं वा गुणान्यितम्।

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचमुष:।। 10।।

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यज्यात्मन्यवस्थितम्।

यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यक्यधेतस:।। 11।।


परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी ज्ञानीजन नहीं जानते है केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व से जानते हैं।

क्योंकि योगीजन भी अपने हृदय में स्थित हुए इस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं।


परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते हैं, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व से जानते हैं।

शरीर छोड़कर जाते हुए को……।

जब शरीर छूटता है, और आपका बहुत बार छूटा है, लेकिन वह घड़ी चूक—चूक जाती है। क्योंकि शरीर छूटने के पहले ही आप बेहोश हो जाते हैं। जब भी कोई मरता है, मरने के पहले ही बेहोश हो जाता है। तो मौत का अनुभव नहीं हो पाता और मृत्यु की जो रहस्यमय घटना है, वह अनजानी रह जाती है।

मरने के पहले आदमी मूर्च्छित हो जाता है। इसलिए मृत्यु में जो भेद घटित होता है, शरीर अलग होता है, आत्मा अलग होती है, इंद्रियों के फूल पीछे पड़े रह जाते हैं, सुगंध, सूक्ष्म वासनाएं, संस्कार आत्मा के इर्द—गिर्द सुगंध की तरह लिपटे हुए नई यात्रा पर निकल जाते हैं। यह घटना हमारी समझ में नहीं आ पाती, क्योंकि हम मूर्च्छित होते हैं। मूर्च्छित हम क्यों हो जाते हैं मरते क्षण में?

एक जीवन की व्यवस्था है कि दुख एक सीमा तक झेला जा सकता है। जहां दुख असह्य हो जाता है, वहीं मूर्च्छा आ जाती है। इसलिए जब आप कभी—कभी कहते हैं कि मैं असह्य दुख में हूं तो आप गलत कहते हैं। क्योंकि असह्य दुख में आप होश में नहीं रह सकते, आप बेहोश हो जाएंगे। तभी तक होश रहता है, जब तक सहने योग्य हो।

इसलिए जब भी कोई पीड़ा बहुत हो जाएगी, आप बेहोश हो जाएंगे। कोई भी आघात गहरा होगा, आप बेहोश हो जाएंगे।

मूर्च्छा दुख का असह्य हो जाना है। और मृत्यु सब से बड़ा दुख है, हमारे लिए। हम डरते हैं मिटने से, इसलिए। मृत्यु के कारण नहीं है दुख, मिटने से डरते हैं इसलिए; कि मैं मिट जाऊंगा, मैं मिटा! इससे जो भय, पीड़ा और संताप पैदा होता है, उसके धुएं में चित्त बेहोश हो जाता है।

लेकिन जिन लोगों ने जीवन में ही समर्पण की कला साधी हो, मृत्यु उन्हें बेहोश नहीं कर पाएगी। क्योंकि मिटने के लिए वे पहले से ही तैयार हैं। वे तलाश कर रहे हैं। वे मिटने का ही विज्ञान खोज रहे हैं। जिन्होंने योग साधा हो, तंत्र साधा हो, जिन्होंने ध्यान के कोई प्रयोग किए हों, प्रार्थना की हो कभी, उनकी तलाश एक ही है कि मैं कैसे मिट जाऊं, क्योंकि मेरा होना पीड़ा है। मृत्यु के क्षण में ऐसे लोग सहर्ष मृत्यु के लिए राजी होंगे।

संत अगस्तीन एक चर्च बनवा रहा था। उसने एक बहुत बड़े चित्रकार को बुलाया और कहा कि इस चर्च के प्रथम द्वार पर मृत्यु का चित्र अंकित कर दो। क्योंकि जो मृत्यु को नहीं समझ पाता, वह मंदिर में प्रवेश भी कैसे कर पाएगा!

अगस्तीन ने चर्च के द्वार पर मृत्यु का चित्र बनवाया। जब चित्र बन गया, तो अगस्तीन उसे देखने आया। पर उसने कहा कि और तो सब ठीक है, लेकिन यह जो मृत्यु की काली छाया है, इसके हाथ में तुमने कुल्हाड़ी क्यों दी है?

चित्रकार ने मृत्यु की काली छाया बनाई है, एक भयंकर विकराल रूप और उसके हाथ में एक कुल्हाड़ी दी है।

उस चित्रकार ने कहा, यह प्रतीक है कि मृत्यु की कुल्हाडी सभी को काट डालती है, तोड़ डालती है। अगस्तीन ने कहा, और सब ठीक है, कुल्हाड़ी अलग कर दो और हाथ में चाबी दे दो।

चित्रकार ने कहा, कुछ समझ में नहीं आया! चाबी से क्या लेना—देना? अगस्तीन ने कहा, जो हमारा अनुभव है, वह यह है कि मृत्यु सिर्फ एक नया द्वार खोलती है, किसी को मिटाती—करती नहीं। इसलिए चाबी! नया द्वार खोलती है।

लेकिन नया द्वार उनके लिए खोलती है, जो होशपूर्वक मरते हैं। जो बेहोशी से मरते हैं, उनकी तो गरदन ही काटती है। उनके लिए तो मृत्यु के हाथ में कुल्हाड़ी ही है।

शरीर छोड़कर जाते हुए को हम नहीं जान पाते, क्योंकि हम बेहोश होते हैं। और हम तभी जान पाएंगे, जब मृत्यु में होश सधे। इसका अभ्यास करना होगा। इसका इतना अभ्यास करना होगा कि यह चेतन से उतरते—उतरते अचेतन में चला जाए। और जब तक यह अचेतन में न चला जाए अभ्यास।

इसलिए योग दो शब्दों का उपयोग करता है, वैराग्य और अभ्यास। बस, प्रक्रिया पूरी उन दो में समाई हुई है। वैराग्य की हमने बात की, क्या है वैराग्य। और दूसरा है कि उसका गहन अभ्यास, रोज—रोज साधना। ताकि मरने के पहले आपके भीतर इतना उतर जाए कि मृत्यु उसको हिला न सके।

मेरे एक मित्र हैं। मिलिट्री में मेजर हैं। उनकी पत्नी मेरे पड़ोस में रहती थीं। वे तो कभी—कभी आते थे। जगह—जगह उनकी बदलिया होती रहती थीं। पत्नी उनकी एक कालेज में प्रोफेसर थीं।

जब भी मित्र आते, तो पत्नी थोड़ी परेशान हो जाती। क्योंकि और तो सब ठीक था, बहुत प्यारे आदमी हैं, लेकिन रात में धुर्राते बहुत थे। और पत्नी अकेली रहने की आदी हो गई थी वर्षों से। तो जब भी साल में महीने, दो महीने के लिए आते, तो उसकी नींद हराम हो जाती थी।

उसने मुझे एक दिन कहा कि बड़ी अजीब हालत है। कहते भी अच्छा नहीं मालूम पड़ता; वे कभी आते हैं। लेकिन मेरी नींद मुश्किल हो जाती है। या मैं यह कहूं कि मैं दूसरे कमरे में सोऊ, तो भी अशोभन मालूम पड़ता है, इतने दिन के बाद पति घर आते हैं। और रात में तो सो ही नहीं पाती।

मैंने उनसे पूछा कि मुझे पूरा ब्यौरा दो।

तो उसने कहा कि जब भी वे बाएं सोते हैं, तो घुर्राते हैं। जब दाएं बदल लेते हैं करवट, तो ठीक सो जाते हैं। पर रात में उनको सोते में करवट कौन बदलवाए! और वजनी शरीर है, भारी, सैनिक हैं। और बदलाओ उनको करवट, तो नींद टूट जाएगी।

तो मैंने उसको कहा कि मैं तुझे एक मंत्र देता हूं; उनके कान में अभ्यास करना। दूसरे दिन उसने अभ्यास करके मुझे कहा कि अदभुत मंत्र है!

छोटा—सा मंत्र था। मैंने कहा, उनके कान में कहना राइट टर्न। मिलिट्री के आदमी। जिदगीभर का अभ्यास। मंत्र काम कर गया। जैसे ही उसने कहा राइट टर्न, उन्होंने नींद में अपनी करवट बदल ली।

मौत के क्षण में तो आप तभी होश रख पाएंगे, जब जिंदगीभर अभ्यास किया हो। और वह इतना गहरा हो गया हो कि मौत भी सामने खड़ी हो, तो भी चित्त बेहोश न हो। अचेतन तक, अनकांशस तक पहुंच जाना जरूरी है।

इसलिए समर्पण का जितना से जितना प्रयोग हो सके, जितना ज्यादा प्रयोग हो सके, जिन—जिन स्थितियों में आप अपने को खो सकें, खोए। अपने को सम्हाले मत। क्योंकि वह खोना इकट्ठा होता जाएगा। रत्ती—रत्ती इकट्ठा होते—होते उसका पहाड़ बन जाएगा। और जब मौत आएगी, तो आप होशपूर्वक जा सकेंगे।

और जो व्यक्ति होशपूर्वक मर गया, उसका दूसरा जन्म होशपूर्वक होता है। क्योंकि जन्म और मृत्यु एक ही द्वार के दो हिस्से है इस तरफ से जब हम प्रवेश करते है, तो मृत्यु; और जब उसी दरवाजे से उस तरफ निकलते है, तो जन्म। जैसे एक ही दरवाजे पर लिखा होता है, भीतर। तो बाहर से जब हम प्रवेश करते हैं, तो भीतर, वह बाहर जब हम खड़े थे दरवाजे के। लेकिन जैसे ही दरवाजे के भीतर गए, दूसरा जगत शुरू हो गया।

मृत्यु, इस शरीर से बाहर; और जन्म, दूसरे शरीर में भीतर। लेकिन प्रक्रिया एक ही है। अगर आप होशपूर्वक मर सकते हैं, तो आपका जन्म होशपूर्वक होगा। और तब आपको पिछले जन्म की याद रहेगी। और तब पिछले जन्म के अनुभव व्यर्थ नहीं जाएंगे। उनका निचोड़ आपके हाथ में होगा। और तब आपने जो भूलें पिछले जन्म में कीं, वे आप इस जन्म में न कर सकेंगे। अन्यथा हर बार वही भूल है। और यह चक्र दुष्टचक्र  है। हर बार भूल जाते हैं; फिर वही भूल करते हैं।

ऐसा आप बहुत बार कर चुके हैं। यही काम जो आप आज कर रहे हैं, इसको आप अनंत बार कर चुके हैं। यही शादी, यही बच्चे, यही धन, यही पद—प्रतिष्ठा, यही लड़ाई—झगड़ा, कलह, अदालत, दुकान; यह आप बहुत बार कर चुके हैं।

काश, आपको एक दफे भी याद आ जाए कि यह आप बहुत बार कर चुके हैं, तो इसमें जो आज आप इतना रस ले रहे हैं, वह एकदम खो जाएगा। यह पागलपन मालूम पड़ेगा। आप एकदम ठहर जाएंगे।

मृत्यु में जो होशपूर्वक मरे, वह जन्म में भी होशपूर्वक पैदा होता है। और जो मृत्यु और जन्म में होशपूर्वक रह जाए, वह जीवन में होशपूर्वक रहता है। क्योंकि मृत्यु और जन्म छोर हैं; बीच में जीवन है। और हम तीनों में बेहोश हैं।

इसलिए हम कितना ही सुनें कि शरीर नहीं है, आत्मा है, यह बात बैठती नहीं है। कितना ही कोई कहे कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं, मान भी लें, तो भी यह बात भीतर उतरती नहीं। क्योंकि हमारा अनुभव नहीं है। लगता तो ऐसे ही है कि शरीर ही होंगे। यह आत्मा हवा मालूम पड़ती है, हवाई बात मालूम पड़ती है।

कृष्ण कहते हैं, परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते हैं। क्योंकि मूर्च्छा सतत है। केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व को जानते हैं।

कौन—सा है ज्ञान—नेत्र जो ज्ञानियों को मिल जाता है? उसको ही मैं अमूर्च्छा कह रहा हूं। होशपूर्वक घटनाओं को घटने देना, मृत्यु को, जन्म को, जीवन को। ये तीन घटनाएं हैं। अगर ये तीनों होशपूर्वक घट जाएं, तो आपके पास ज्ञान—नेत्र उपलब्ध हो गया। जहां आप हैं, वहीं से शुरू करना पड़ेगा। जन्म तो पीछे छूट गया। मौत आगे आ रही है। वह अभी दूर है। जीवन अभी है। जीवन के साथ शुरू करना जरूरी है कि हम जीएं, तो ज्ञानपूर्वक जीएं। जो भी करें, होशपूर्वक करें। बार—बार होश छूट जाएगा, फिर उसे पकड़े।

रास्ते पर चलें, तो होश से। भोजन करें, तो होश से। किसी से बात करें, तो होश से। एक बात सतत बनी रहे कि मेरे द्वारा मूर्च्छा में कुछ न हो। कोई गाली दे, तो पहले होश को सम्हाले, फिर उत्तर दें।

आप चकित हो जाएंगे, होश सम्हल जाए तो उत्तर निकलेगा नहीं। और होश न सम्हला हो, तो जो आप नहीं करना चाहते, वह भी हो जाता है, वह भी निकल जाता है।

जीवन है हाथ में अभी, और अभी ही कुछ किया जा सकता है। वाणी, विचार, आचरण, सब पहलुओं पर होश की साधना। जो भी मैं कहूं जो भी मैं सोचूं जो भी मैं करूं, वह होशपूर्वक हो, इतना भर काफी है। तो धीरे—धीरे आप पाएंगे कि बेहोशी टूटने लगी। और बेहोशी के टूटने के साथ ही दुख टूटने शुरू हो जाते हैं। बेहोशी के कारण ही दुखों को हम निमंत्रण देते हैं। और बेहोशी के कारण ही हम वे क्षण चूक जाते हैं जिनसे आनंद उपलब्ध हो सकता था।

हम सब ऐसे ही जी रहे हैं। कुछ कर रहे हैं, कुछ खयाल आ रहा है। कुछ करना चाहते हैं, कुछ हो जाता है। कुछ सोचा था, कुछ परिणाम आते हैं। कभी भी वही नहीं हो पाता, तो हम चाहते हैं। वह होगा भी नहीं, क्योंकि वह केवल तभी हो सकता है, जब होश पूरा हो।

जिसका होश पूरा है, उसके जीवन में वही होता है, जो होना चाहिए। उससे अन्यथा का कोई उपाय नहीं है। जिसका जीवन मूर्च्छा में चल रहा है, वह शराबी की तरह है। जाना चाहता था घर, पहुंच गया कहीं और। क्योंकि पैर का उसे कोई पता नहीं कि कहा जा रहे हैं। वह शराबी की तरह है। करना चाहता था कुछ और, हो गया कुछ और।

मैं पढता था एक शराबी के संस्मरणों को। वह एक रात ज्यादा पीकर लौटा। पत्नी से बचने के लिए कि पत्नी को पता न चले..। और ज्यादा पी गया, तो रास्ते पर कई जगह गिरा था। तो चेहरे पर कई जगह खरोंच और चोट लग गई। तो वह बाथरूम में गया और उसने मलहम की पट्टियां अपने चेहरे पर लगाई। जाकर चुपचाप बिस्तर में सो गया। और बड़ा प्रसन्न हुआ कि पत्नी को पता भी नहीं चला; शोरगुल भी नहीं हुआ; खरोंच वगैरह भी सुबह तक काफी ठीक हो जाएगी; पता भी नहीं चलेगा। बात निपट गई।

लेकिन सुबह ही उसकी पत्नी चिल्लाती बाथरूम से बाहर आई कि तुमने बाथरूम का दर्पण क्यों खराब किया है? पति ने पूछा, कैसा दर्पण!

क्योंकि वह रात बेहोशी में जो मलहम—पट्टी चेहरे पर लगानी थी, दर्पण पर लगा आया था। होश न हो, तो यही होगा। करेंगे कुछ, हो जाएगा कुछ। और शराबी को होना बिलकुल आसान है। क्योंकि चेहरा दिखाई दर्पण में पड़ रहा था, वहीं उसने पट्टिया लगा दीं।

कृष्ण कह रहे हैं कि केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व से जानते हैं।

केवल वे ही, जो होश से जगे हुए हैं और प्रतिपल जिनका ज्ञान जाग्रत है, वे ही जन्म में, मृत्यु में, जीवन में, भीतर के तत्व को पूरी तरह पहचानते हैं।

क्योंकि योगीजन भी अपने हृदय में स्थित हुए इस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं। और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहीं जानते हैं।

यत्न ही काफी नहीं है। यत्न जरूरी है, पर्याप्त नहीं है। प्रयास तो करना होगा सघन, लेकिन अकेला प्रयास काफी नहीं है, हृदय की शुद्धि भी चाहिए।

यहां थोड़ा—सा समझ लेना जरूरी है। क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है कि लोग सिर्फ प्रयास ही करते रहते हैं, बिना इस बात की फिक्र किए कि भाव शुद्ध नहीं है, हृदय शुद्ध नहीं है। तो उसके परिणाम भयानक हो सकते हैं। कोई आदमी हृदय को शुद्ध न करे और एकाग्रता को साधे, कनसनट्रेशन को साधे। साध सकता है।

बुरे से बुरा आदमी भी एकाग्रता साध सकता है। एकाग्रता से बुराई का कोई लेना—देना नहीं है, बल्कि बुरा आदमी शायद एकाग्रता ज्यादा आसानी से साध सकता है। क्योंकि बुरे आदमी का एक लक्षण होता है कि वह जिस काम में भी लग जाए, पागल की तरह लगता है। और बुरा आदमी जिद्दी होता है, क्योंकि बुराई बिना जिद्द के नहीं की जा सकती। तो बुरे आदमी के लिए हठयोग बिलकुल आसान है। उसको पकड़ भर जाए उसके खयाल में भर आ जाए। और बुरा आदमी दुष्टता कर सकता है, दूसरों के साथ भी, अपने साथ भी। दुष्टता करने में उसे अड़चन नहीं है।

अगर आप हठयोग साधेंगे, तो ऐसा लगेगा कि क्यों सताओ इस शरीर को! क्यों इतना आसन लगाकर बैठो! पैर दुखने लगते हैं; आंख से आंसू झरने लगते हैं। दुष्ट आदमी इनकी फिक्र नहीं करता। वह दूसरे को भी सता सकता है, उतनी ही मात्रा में खुद को भी सता सकता है।



इसलिए आप हैरान होंगे जानकर कि आपके तथाकथित योगियों में, महात्माओं में आधे से ज्यादा तो दुष्टजन हैं। पर उनकी दुष्टता दूसरों की तरफ नहीं है। इतनी भी उनकी बड़ी कृपा है। अपनी ही तरफ किए हुए हैं। इससे समाज को उनसे कोई हानि नहीं है। अगर हानि है, तो उनको खुद को है।

अगर एक दुष्ट हत्यारा एकाग्रता साधे, तो साध सकता है। लेकिन उसकी एकाग्रता से खतरा होगा। क्योंकि एकाग्रता से शक्ति आएगी, और हृदय शुद्ध नहीं है। उस शक्ति का दुरुपयोग होगा। आपने दुर्वासा ऋषि की कहानियां पढ़ी हैं। बस, वह इस तरह का आदमी दुर्वासा हो जाएगा। उसके पास शक्ति होगी; क्योंकि अगर वह कुछ भी कह दे, तो उसका परिणाम होगा।

अगर कोई व्यक्ति बहुत एकाग्रता साधा हो, तो उसके वचन में एक शक्ति आ जाती है, जो सामान्यत: दूसरों के वचन में नहीं होती। उसका वचन आपके हृदय के अंतस्तल तक प्रवेश कर जाता है। वह जो भी कहेगा, उसके पीछे बल होगा। हमारी जो कथाएं हैं, वे झूठी नहीं हैं, उन कथाओं में सच है।

अगर एकाग्रता साधने वाला आदमी कह दे कि तुम कल मर जाओगे, तो बचना बहुत मुश्किल है। इसलिए नहीं कि उसके कहने में कोई जादू है, बल्कि उसके कहने में इतना बल है कि वह बात आपके हृदय में गहरे तक प्रवेश कर जाएगी। उसका तीर गहरा है, एकाग्र है, और उसने वर्षों तक अपने को साधा है। वह एक विचार पर अपनी पूरी शक्ति को इकट्ठा कर लेता है। तो उसका विचार आपके लिए सजेशन बन जाएगा।

वह कह देगा, कल मर जाओगे! तो उसकी आंखें, उसका व्यक्तित्व, उसका ढंग, उसकी एकाग्रता, उसकी अखंडता, उस विचार को तीर की तरह आपके हृदय में चुभा देगी। अब आप लाख कोशिश करो, उस विचार से छुटकारा मुश्किल है। वह आपका पीछा करेगा। कल आने तक, वह कल आने के पहले ही आपको आधा मार डालेगा। कल आप मर जाएंगे।

अभिशाप इसलिए लागू नहीं होता कि परमात्मा अभिशाप पूरा करने को बैठा है, कि दुर्वासाओं का रास्ता देख रहा है कि अभिशाप दें, और परमात्मा पूरा करे। लेकिन दुर्वासा ने एकाग्रता साधी है वर्षों तक; पर हृदय शुद्ध नहीं है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, सिर्फ यत्न काफी नहीं है। अगर अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, तो यत्न करते हुए भी अज्ञानीजन आत्मा को नहीं जानते हैं।

इसलिए दो बातें हैं। प्रयत्न चाहिए और साथ—साथ हृदय की शुद्धि चाहिए।

तो बुद्ध और महावीर जैसे साधकों ने तो हृदय की शुद्धि को पहले रखा है, ताकि भूल—चूक जरा भी न हो पाए। आहार शुद्धि, शरीर शुद्धि, आचरण शुद्धि, सब तरह से शुद्ध हो जाए व्यक्ति, फिर वे कहते हैं, यत्न करो। नहीं तो खतरा है।

हृदय की शुद्धि का अर्थ है, भावों की निर्मलता। बच्चे जैसा हृदय हो जाए। कठोरता छूटे, क्रोध छूटे, अहंकार छूटे, ईर्ष्या—द्वेष छूटे, घृणा—वैमनस्य छूटे और हृदय शुद्ध हो; और साथ में योग का यत्न हो। यत्न और शुद्ध भाव।

इसे हम ऐसा भी कह सकते हैं कि सिर्फ योगी होना काफी नहीं है, भक्त होना भी जरूरी है। सिर्फ योगी खतरनाक है, सिर्फ भक्त कमजोर है।

भक्त निर्बल है। वह सिर्फ दीनता—हीनता की प्रार्थना कर सकता है कि तुम पतित—पावन हो और मैं पापी हूं मुझे मुक्त करो। यह सब कह सकता है। लेकिन निर्बल है। उसके पास कोई शक्ति नहीं है। योगी के पास बड़ी शक्ति इकट्ठी हो सकती है, लेकिन उसके पास भाव नहीं है।

जहां भक्त और योगी का मिलन होता है, जहां भाव और यत्न दोनों संयुक्त हो जाते हैं, वहां आत्मा उपलब्ध होती है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 3

 संकल्‍प—संसार का या मोक्ष का


न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पाक्क:।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। 6।।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 7।।

शरीरं यदवाम्नोति यच्‍चाप्‍युत्‍क्रामतीश्‍वर:।

गृहीत्‍वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्:।। 8।।

श्रोत्रं चक्षु: स्यर्शनं च रमनं घ्राणमेव च।

आधिष्ठाय मनश्चायं विश्यानुपसेवते।। 9।।


उस स्वयं प्रकाशमय परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकता है तथा जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे संसार में नहीं आते है वही मेरा परम धाम है।

और हे अर्जुन, इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और  इन की त्रिगुणमयी माया में स्थित हुई मन सहित पांचों इंद्रियों को आकर्षण करता है।

जैसे कि वायु गंध के स्थान से गंध को ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिकों का स्वामी जीवात्मा भी जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे इन मन सहित इंद्रियों की ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है।

और उस शरीर में स्थित हुआ यह जीवात्‍मा श्रोत्र, चक्षु और त्‍वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों की सेवन करता है।


उस स्वयं प्रकाशमय परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही। तथा जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे संसार में नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

पहली बात, इस जगत में जो भी हम देखते हैं, वह दूसरे से प्रकाशित है। आप मुझे देख रहे हैं; बिजली बुझ जाए, फिर आप मुझे नहीं देख सकेंगे। मैं आपको देख रहा हूं; बिजली बुझ जाए, फिर मैं आपको नहीं देख सकूंगा। आप हैं, लेकिन कोई और चीज चाहिए, जिसके द्वारा आप प्रकाशित हैं।

दिन में दिखाई पड़ता है, रात में दिखाई नहीं पड़ता। आंख तो होती है, चीजें भी होती हैं, लेकिन सूरज नहीं होता। सभी चीजें पर—प्रकाश चाहती हैं। कोई और चाहिए, जो प्रकाशित कर सके। कृष्ण कह रहे हैं, लेकिन मेरा परम धाम वहां है, जहां न तो सूर्य के प्रकाश की कोई जरूरत है, न चंद्र के प्रकाश की कोई जरूरत है; न अग्नि की कोई जरूरत है, जहां दूसरे प्रकाश की कोई जरूरत नहीं है। मेरा परम धाम स्व—प्रकाशित  है।

यह बात बड़ी समझ लेने जैसी है। क्योंकि यह बहुत गहरा और मौलिक आधार है समस्त साधना का। और इसकी खोज ही साधक का लक्ष्य है। ऐसी कौन—सी घटना है जो स्व—प्रकाशित है? ऐसा क्या अनुभव है जो स्व—प्रकाशित है?

आप आंख बंद कर लें, तो मैं नहीं दिखाई पडूंगा। आंख बंद करके लेकिन आप तो अपने को दिखाई पड़ते ही रहेंगे। शरीर दिखाई नहीं पड़ेगा, लेकिन स्वयं का होना तो प्रतीत होता ही रहेगा। दीया बुझ जाए, मैं आपको दिखाई नहीं पडूंगा। लेकिन आप अपने को तो अनुभव करते ही रहेंगे कि मैं हूं। आपके होने के लिए तो किसी और प्रकाश की जरूरत नहीं है।

तो आपके होने में कोई एक तत्व चेतना का है, जो स्वयं प्रकाशित है; जिसका होना अपने आप में काफी है। यह जो चेतना की हल्की—सी झलक आपके भीतर है, यही झलक जब पूरी प्रकट हो जाती है, तो कृष्ण कहते हैं, वह परम धाम मेरा है; वही मैं हूं।

उस स्वयं प्रकाशमय परम पद को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है—न करने की कोई जरूरत है—न चंद्रमा और न अग्नि, तथा जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे संसार में नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

यहां कृष्ण कह रहे हैं कि जितना ही व्यक्ति चेतन होता चला जाता है, उतना ही वह परम धाम की तरफ गति करता है। और जिस दिन परम चैतन्य प्रकट होता है, उस परम चैतन्य को प्रकाशित करने के लिए किसी की भी कोई जरूरत नहीं है, वह स्व—प्रकाशित है। और एक ही बात इस जगत में स्व—प्रकाशित है, वह स्वयं का होना है। उसके लिए किसी प्रमाण की कोई जरूरत नहीं है। उसको असिद्ध करने का भी कोई उपाय नहीं है। अगर आप यह भी कहें कि मैं नहीं हूं, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। आपके कहने से सिर्फ आपका होना ही सिद्ध होता है।

और अंधा आदमी भी अपने को अनुभव करता है। अंधेरे में भी आप अपने को अनुभव करते हैं। आपकी आंखें चली जाएं, आपके कान खो जाएं, आपके हाथ काट दिए जाएं, आपकी जीभ काट दी जाए, आपकी नाक नष्ट कर दी जाए, तो भी आप अपना अनुभव कर सकते हैं, तो भी आप होंगे और आपकी प्रतीति में रत्तीभर का भी फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि आंखों से दूसरे देखे जाते हैं, स्वयं नहीं। कानों से दूसरे सुने जाते हैं, स्वयं नहीं। सारी इंद्रियां भी खो जाएं, तो भीतर के होने में जरा भी अंतर नहीं पड़ता।

वह जो भीतर का होना है, वहा कोई प्रकाश नहीं है, फिर भी आप जानते हैं कि आप हैं। और आप कभी भीतर नहीं गए हैं अभी। अगर आप भीतर जाएं, तो आपको वहा भी प्रकाश का अनुभव होना शुरू हो जाएगा।



ध्यान में जो लोग भी गति किए हैं, उन सभी का अनुभव प्रकाश का अनुभव है। वे किस प्रकाश को जानते हैं?

कबीर कहते हैं कि जैसे आकाश में बिजलियां चमक रही हैं, ऐसा मेरे भीतर कुछ हो रहा है। दादू कहते हैं कि जैसे हजार सूरज एक साथ उग गए हों, ऐसा मेरे भीतर कुछ उग आया है। फिर चाहे मुसलमान फकीर हों, ईसाई फकीर हों, सभी फकीरों का अनुभव है कि जब भीतर ध्यान की गहराई उतरती है, तो परम प्रकाश के अनुभव होते हैं।

वह प्रकाश न तो सूरज का है, न अग्नि का है, न चांद का है। वह प्रकाश कहां से आता है? वह प्रकाश कहीं से भी नहीं आता; आप स्वयं ही वह प्रकाश हैं। आपका होना ही वह प्रकाश है।

इस प्रकाश को कह रहे हैं कृष्ण कि वह मेरा परम धाम है। और जो उस स्थिति को उपलब्ध हो जाता है, वह इस संसार में वापस नहीं लौटता। वही मूल—स्रोत है, वही उदगम है।

और हे अर्जुन, इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन त्रिगुणमयी माया में स्थित हुई मन सहित पांचों इंद्रियों को आकर्षण करता है।

उस स्व—प्रकाशित ज्योति—पुंज का एक हिस्सा ही प्रत्येक देह के भीतर छिपा है।

इसे हम ऐसा समझें। आप आंख बंद कर लें, तो आप अपने विचारों को देख सकते हैं। आंख बंद है; विचार देखे जा सकते हैं। कौन देखता है? भीतर क्रोध उठे, कामवासना उठे, आप उसे भी देख सकते हैं। कौन देखता है? वह जो देखने वाला है, उसको आप नहीं देख सकते।

जिस—जिसको आप देख सकते हैं, वह—वह आप नहीं हैं, यह गणित है। और जो सबको देखता है, लेकिन स्वयं नहीं देखा जा सकता, वह आप हैं। वही आपका मूल उत्स है। उससे पीछे जाने का कोई उपाय नहीं। नहीं तो उसको भी आप देख लेते। उससे पीछे खड़े हो जाते, उसको भी देख लेते। लेकिन उसे आप नहीं देख सकते।

सब देख सकते हैं। शरीर देखा जा सकता है, मन के विचार देखे जा सकते हैं; हृदय की भावनाएं देखी जा सकती हैं; कुंडलिनी के अनुभव देखे जा सकते हैं; सब देखा जा सकता है। जो भी देखा जा सकता है, वह आपका स्वभाव नहीं है। देखने वाला जो है, वही आपका स्वभाव है। वह जो द्रष्टा है, वह इररिडयूसिबल है। उसे आप दृश्य नहीं बना सकते। उसको आप विषय नहीं बना सकते। वह हमेशा विषयी है। वह हमेशा सब्जेक्ट है, वह आब्जेक्ट नहीं हो सकता।

जैसे ही सारे विषय खो जाते हैं, और सिर्फ जानने वाला ही रह जाता है, और जानने को कुछ नहीं बचता, परम प्रकाश का उदय होता है। यह परम प्रकाश बाहर से नहीं आता, न सूरज से, न चांद से, यह आपके भीतर ही छिपा है।

सूरज भी चुक जाएगा। उसकी गरमी भी कम होती है। यह बिजली भी चुक जाएगी। दीया जलता है, तेल चुक जाएगा, दीया बुझ जाएगा। सिर्फ एक ज्योति है, जो कभी नहीं बुझती, क्योंकि वह बिना ईंधन के जलती है, वह चेतना की ज्योति है। कोई तेल उसे नहीं जलाता। कोई ईंधन, कोई पेट्रोल, कोई बिजली, कोई हीलियम गैस उसे नहीं जलाती। इसलिए उसके समाप्त होने का कोई उपाय नहीं है। वह शाश्वत है।

वैज्ञानिक बड़ी खोज करते हैं कि कोई ऐसा प्रकाश उपलब्ध हो जाए, जो बिना ईंधन के चले। क्योंकि सब ईंधन चुकते जाते हैं, सब ईंधनों की सीमा है। कोयला खत्म होता जाता है, पेट्रोल खत्म होता जाता है। आज नहीं कल सब ईंधन चुक जाएंगे। और आदमी बिना ईंधन के जी नहीं सकता। तो बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई है। वैज्ञानिक सोचते हैं, ईंधनरहित कोई प्रकाश।

और कृष्ण उसी प्रकाश की बात कर रहे हैं। वह प्रकाश प्रत्येक के भीतर है। लेकिन उसे यंत्र से पैदा करने का कोई भी उपाय नहीं है। चैतन्य उसी प्रकाश का नाम है।

इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है—उस परम प्रकाश का ही अंश है—और वही इन त्रिगुणमयी माया में स्थित हुई मन सहित पांचों इंद्रियों को आकर्षण करता है।

और यह जो चेतना का अंश आपके भीतर है, यही आपकी पांचों इंद्रियों को अपने में आकर्षित किए हुए है, सम्हाले हुए है। यह थोड़ा समझने जैसा है। क्योंकि बडी भ्रांति है इस संबंध में।

आमतौर से आदमी सोचते हैं कि इंद्रियों ने आपको बांधा हुआ है। कृष्ण कह रहे हैं कि आप ही इंद्रियों को पकड़े हुए हैं। इंद्रियां आपको क्या बांधेगी! इंद्रियां जड़ हैं, वे आपको बांधें, इसका कोई उपाय नहीं है। आप बंधे हुए हैं। और यह आपका ही संकल्प है; यह आपका ही निर्णय है। इस निर्णय की बड़ी प्रक्रिया है।

आप रूप देखना चाहते हैं। रूप देखने की जो वासना है, वह आपकी आंखों को आपसे बांधे रखती है। उस वासना के रज्‍जु से आंख बंधी रहती है। अगर आपकी देखने की इच्छा खो जाए, आप इसी क्षण अंधे हो जाएंगे।

आप आंखों को पकड़े हैं, क्योंकि देखना चाहते हैं। कान को पकड़े हैं, क्योंकि सुनना चाहते हैं। हाथ को पकड़े हैं, क्योंकि छूना चाहते हैं। आपकी चाह आपकी इंद्रियों के और आपके बीच सेतु है। इसलिए बुद्ध ने कहा है कि आंखें मत फोड़ो; कान बंद करने से कुछ भी न होगा। चाह को गिरा दो, चाह को हटा दो, तो इंद्रियों से संबंध धीरे— धीरे अपने आप छूट जाता है।

ध्यान रहे, आप आमतौर से यही सुनते रहे हैं कि इंद्रियों ने आपको बांधा है, इंद्रिया दुश्मन हैं। और कृष्ण बिलकुल उलटी बात कह रहे हैं। क्या कह रहे हैं कि आपने इंद्रियों को चाहा है; उनका उपयोग किया है। आपने ही उनको खींचा और आकर्षित किया है, इसलिए वे हैं। और जिस दिन आप निर्णय करेंगे, जिस दिन आपका रुख बदल जाएगा, आपकी धारा भीतर बहने लगेगी, उसी दिन इंद्रिया तिरोहित हो जाएंगी।

इंद्रियों को दोष मत दें। दोष किसी का भी नहीं है। आपका संकल्प है। आपकी चेतना ने इस शरीर में रहना चाहा है, इसलिए शरीर में है। जिस दिन नहीं रहना चाहेगी, उसी दिन शरीर छूट जाएगा।

अगर यह बात खयाल में आ जाए, तो इंद्रियों से जो दुश्मनी चलती है, वह बंद हो जाए। वह मूढूतापूर्ण है। उसका कोई भी मूल्य नहीं है। और वह गलत है। उसके परिणाम भयानक हैं। क्योंकि आप इंद्रियों से लड़ने में शक्ति गंवा देते हैं। और लड़ाई वहा अर्थहीन है। लड़ाई कहीं और होनी चाहिए। लड़ाई होनी चाहिए कि मेरा इंद्रियों को पकड़ने का रुख कम हो जाए।

मन सहित पांचों इंद्रियों को वही आकर्षण करता है। जैसे कि वायु गंध के स्थान से गंध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिको का स्वामी जीवात्मा भी जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे इन मन सहित इंद्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है।

जब आप मरते हैं, तब भी आप सूक्ष्म इंद्रियों को अपने साथ ले जाते हैं। जैसे हवा फूलों की गंध को अपने साथ ले जाती है। फूल को तो नहीं ले जा सकती, फूल तो पीछे रह जाता है, लेकिन हवा का झोंका फूल की गंध को अपने साथ ले जाता है। आपकी चेतना शरीर को तो नहीं ले जा सकती, लेकिन शरीर को पकड़ने की जो वासना है, उसको गंध की तरह अपने साथ ले जाती है।

उसी वासना के आधार पर, उसको हिंदुओं ने सूक्ष्म इंद्रियां कहा है। आंख स्थूल इंद्रिय है; देखने की वासना सूक्ष्म इंद्रिय है। जीभ स्थूल इंद्रिय है; स्वाद की आकांक्षा सूक्ष्म इंद्रिय है। फूल तो पड़े रह जाते हैं।

आप जानकर चकित होंगे कि हिंदू मरे हुए आदमी के शरीर की हड्डियां जब मरघट से उठाकर लाते हैं, तो उनको फूल कहते हैं। बिलकुल प्यारा शब्द है।

फूल पड़े रह जाते हैं, लेकिन गंध आपके साथ चली जाती है। और वह जो गंध आपके साथ चली जाती है, वह नए जन्मों की तलाश करती है। वह नए शरीर खोजती है, नए गर्भ खोजती है। और जैसी आपकी वासना होती है, वैसा गर्भ आपको उपलब्ध हो जाता है।

जो आप होना चाहते हैं, जो आप होना चाहने की कामना इकट्ठी करते रहे हैं, वही संगृहीभूत हो जाती है, वही क्रिस्टलाइज हो जाती है। नई देह का निर्माण... आप नई देह को पकड़ लेते हैं।

यह तब तक चलता रहेगा, जब तक हवा गंध को ले जाती रहेगी। यह उस दिन बंद हो जाएगा, जिस दिन हवा फूल को ही नहीं छोड़ेगी, गंध को भी छोड़ देगी। हवा खाली उड़ जाएगी।

बुद्ध ऐसे ही उड़ते हैं। महावीर ऐसे ही उड़ते हैं। फूल भी छोड़ जाते हैं, गंध भी छोड़ जाते हैं। फिर कोई देह उपलब्ध नहीं होती, फिर कोई गर्भ उपलब्ध नहीं होता। फिर किसी शरीर में प्रवेश का उपाय नहीं रह जाता। प्रवेश का उपाय आपको साथ लेकर चलना पड़ता है।

और उस शरीर में स्थित हुआ यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है।

फिर यात्रा शुरू हो जाती है। फिर वही भोग शुरू हो जाता है। फूल बदल जाते हैं, गंध की यात्रा चलती रहती है। इंद्रियां बदल जाती हैं, वासना की यात्रा चलती रहती है।

इंद्रियों को छोड़ना नहीं है, वासनाओं को छोड़ देना है। इंद्रियां अपने से छूट जाती हैं। लेकिन हमें इंद्रियां छोड़ना आसान मालूम पड़ता है। कोई भोजन छोड़ देता है, कोई भोजन में नमक छोड़ देता है, कोई भोजन में घी छोड़ देता है, कोई भोजन में शक्कर छोड़ देता है, कोई आंखें नीची करके चलने लगता है, कोई स्त्री के स्पर्श से भयभीत हो जाता है; कोई कीमती वस्त्र का स्पर्श नहीं करता। यह सब इंद्रियों का छोड़ना है।

यह वैसे ही है, जैसे कोई जीवन से ऊबा हुआ आदमी आत्महत्या कर ले। और आत्महत्या से जीवन समाप्त नहीं होता; सिर्फ देह बदलती है। मरे नहीं कि नया शरीर ग्रहण हो जाएगा। और आत्महत्या करने वाले को और भी विकृत देह के उपलब्ध होने की संभावना है। क्योंकि जिसने अपने को नष्ट करना चाहा, उसका चित्त विकृत अवस्था में है। और इस विकृति की छाप उसके ऊपर रहेगी, आत्महत्या की।

आपने अपने को आग लगाकर जला लिया। तो एक क्षण में तो नहीं जल जाएंगे। जलने के पहले सोचेंगे, विचारेगे, सब विकृति भीतर इकट्ठी होगी। फिर आग लगाएंगे। फिर तड़पेंगे। फिर उस तड़पती हुई आग में बचना भी चाहेंगे, और बच भी न सकेंगे। पुकारेंगे, चीखेंगे, सोचेंगे कि भूल हो गई; बड़ा विषाद उत्पन्न होगा, बड़ा संताप, बड़ी पीड़ा होगी। और उस पीड़ा में मरेंगे।

इस पीड़ा की छाप, ये कुंठित वासनाएं, ये जलती हुई आग की लपटें, सब की गंध आपके साथ चली जाएगी। गंध तो जाएगी ही, दुर्गंध भी जाएगी, उत्तप्तता भी जाएगी। और नया गर्भ आप लेंगे, वह गर्भ भी विकृत, उत्तप्त होगा। उसमें भी आप अपंग पैदा होंगे, अंधे पैदा होंगे, टूटे—फूटे पैदा होंगे, खंडहर की तरह पैदा होंगे। क्योंकि खंडहर करने की जो चेष्टा आपने की, उसका संस्कार अपने साथ ले आए।

लेकिन यह तो हमारी समझ में आ जाता है कि इस तरह कोई अपने को आत्मघात करे तो पाप है, बुरा है और इसके दुष्परिणाम होंगे। लेकिन छोटी—छोटी आत्महत्याएं लोग करते हैं, वे हमारी समझ में नहीं आती हैं।

एक आदमी आंखें बंद करके बैठ जाता है। वह एक बटे पांच आत्महत्या हुई, क्योंकि पांच इंद्रियां हैं। एक आदमी ने पांचों को जला लिया, और एक आंख बंद करके बैठ गया।

सूरदास की हमने कथा सुनी है। अगर सूरदास ढंग के आदमी रहे हों, तो कथा झूठी होनी चाहिए। अगर कथा सच्ची हो, तो सूरदास ढंग के आदमी नहीं हो सकते। कथा है कि एक सुंदर युवती को देखकर उन्होंने अपनी आंखें फोड़ लीं।

यह तर्क तो समझ में आता है। इस तरह के बहुत सूरदास हैं। लेकिन सुंदर स्त्री की जो वासना उठती है, वह सुंदर स्त्री से नहीं उठ रही है, वह मेरे भीतर से उठ रही है। वह मेरी आंखों से भी नहीं उठ रही। आंखों से मेरे भीतर से आ रही है, आंखों से गुजर रही है। उस सुंदर स्त्री को शायद पता भी न हो कि कोई उसके पीछे सूरदास हो गया। और इन आंखों का कोई कसूर भी न था। आंखें तो वहीं गईं, जहां मैं ले जाना चाहता था। आंखों ने वही देखा, जो मैं देखना चाहता था। आंखों ने वही चाहा, जो मेरी चाह थी। आंखें मेरा अनुसरण कर रही थी। और मैंने आंखें फोड़ दीं।

यह आत्महत्या हुई, एक बटा पांच। इस तरह की आत्महत्या करने वाले को हम साधु कहते हैं। मगर यह भी विकृति है। और इस तरह की आत्महत्या करने वाला भी दुर्गति को उपलब्ध होता है। सवाल इंद्रियों को नष्ट करने का है ही नहीं, सवाल इंद्रियों से मुक्त होने का है। और इंद्रियों ने आपको नहीं बांधा है, आपने उनको बांधा है। इसलिए इंद्रियों का कहीं भी कोई कसूर नहीं है। आपका भी कोई कसूर नहीं है। अगर आप चाहते हैं यही, तो कोई कसूर नहीं है। पर इसे होशपूर्वक होने दें। फिर इसमें प्रसन्न हों। फिर वैराग्‍य की कामना न करें।

राग की कामना कर रहे हैं और वैराग्य के सवाल उठाते हैं, तब आप दुविधा में पड़ जाते हैं।

रोज मेरे पास लोग आते हैं, जिनका कष्ट एक ही है, राग और वैराग्य की दुविधा। राग तो उनके जीवन का रस है और किन्हीं सिरफिरों की बातें सुनकर वैराग्य उनको पकड़ गया है। तो वैराग्य भी उनके सिर में घूम रहा है। और राग उनकी अवस्था है। अब इन दो झंडों के नीचे उनकी यात्रा चल रही है। इससे वे बड़े कष्ट चुनाव है। और अगर इस गुलामी को भी मैंने चुना है, तो जिस क्षण में हैं और खंडित हो गए हैं, टूट गए हैं, स्‍प्‍लिट। दो आदमी हैं मैं चाहूं उसी क्षण तोड़ सकता हूं। यह ध्यान आते ही रुख बदल उनके भीतर। एक राग की तरफ खींचता है, एक वैराग्य की तरफ जा सकता है।

इसलिए एक क्षण में समाधि लग सकती है, और एक क्षण में इस संताप से कोई आत्म—उपलब्धि होने वाली नहीं है। वैराग्य और राग साथ—साथ नहीं जी सकते हैं। जब तक राग है, तब तक वैराग्य को पकड भी नहीं सकते आप, सिर्फ सोच सकते हैं शब्दों में। शब्दों में सोचने का कोई अर्थ नहीं है, वह निष्प्राण है।

अपने राग को ठीक से समझें। और यह भी समझें कि यह मेरा संकल्प है। यह मैंने ही तय किया है, चाहे अनंत जन्मों पहले तय किया हो। यह मेरा ही निर्णय है कि मैं शरीर की यात्रा पर जाता हूं; इस संसार के सागर में उतरता हूं; इस संसार के वृक्ष में डूबता हूं; यह मेरा निर्णय है। मैं नियंता हूं। जिस दिन मैं यह निर्णय बदलूंगा, उसी दिन धारा बदल जाएगी। कोई मुझे ले जा नहीं रहा है।

यह हिंदू विचार अनूठा है। कोई मुझे ले जा नहीं रहा है, मैं मालिक हूं; इस गुलामी में भी मैं मालिक हूं। मैं जा रहा हूं यह मेरा बोध उत्पन्न हो सकता है। बुद्ध होने के लिए अनंत जन्मों की जरूरत नहीं है। एक क्षण में भी घटना घट सकती है।

कृष्ण यही अर्जुन को कह रहे हैं कि मेरा ही अंश तेरे भीतर है, सबके भीतर है। उसी अंश ने इंद्रियों को पकडा है। और वही अंश उन इंद्रियों की गंध को ले जाता है नई यात्राओं पर। जिस क्षण तू जान लेगा कि तेरा संकल्प ही तेरी यात्रा है, उस क्षण तू चाहे तो यात्रा रुक सकती है। और अगर तू यात्रा करना चाहे, तो कर सकता है। लेकिन तब यात्रा खेल होगी; तब यात्रा लीला होगी। क्योंकि तू ही कर रहा है; कोई करवा नहीं रहा है। तेरी ही मौज है।

इस संबंध में यह बड़ी क्रांतिकारी बात है। क्योंकि ईसाई सोचते हैं कि ईश्वर ने दंड दिया आदमी को, इसलिए संसार है। अदम ने भूल की, पाप किया, गुनाह किया, तो निष्कासित किया अदम को। मुसलमान भी वैसा ही सोचते हैं। जैन सोचते हैं कि आदमी ने कोई पाप किया, कोई कर्म—बंध किया, उसकी वजह से भटक रहा है। बुद्ध भी ऐसा ही सोचते हैं।

हिंदुओं का सोचना बहुत अनूठा है। हिंदू चितना यह है कि यह तुम्हारा संकल्प है। न तुम्हारा पाप है, न किसी ने तुम्हें दंड दिया है, न कोई दंड देने वाला बैठा है। और पाप तुम करोगे कैसे? कभी तो तुमने शुरुआत की होगी! कभी तो पहले दिन तुमने किया होगा बिना किसी पिछले कर्म के! आज हो सकता है कि मैं जो कर रहा हूं—पिछले कर्मों के कारण, पिछले जन्म में और पिछले कर्मों के कारण। लेकिन प्रथम क्षण में तो बिना किसी कर्म के मैंने कुछ किया होगा। वह मेरा संकल्प रहा होगा। वह मैंने चाहा होगा।

अगर यह मेरी चाह से ही संसार का वृक्ष है, तो मेरी चाह से ही समाप्त हो जा सकता है। राग संसार में उतरने का संकल्प है, वैराग्य संसार से पार होने का संकल्प है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 15 भाग 2

दृढ़ वैराग्‍य और शरणागति


            न रूपमस्येह तथोपलभ्यते

नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।

अश्वथमेनं सुविरूद्धमूलम्

असङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्‍वा।। 3।।

तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं

यीस्मन्गता न निवतर्न्ति भूय:।

तमेव ब्राह्य पुरुषं पुपद्ये

यत: प्रवृत्ति: प्रमृता पुराणी।। 4।।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा

अध्यात्मनित्या विनिवृक्कामा:।

द्वन्द्वैर्विमुक्‍ता: सुखदुखसंज्ञै:

गव्छज्यमूढा: पदमव्ययं तत्।। 5।।


इस संसार— वृक्ष का रूप जैसा कहा है, वैसा यहां नहीं पाया जाता है; क्योंकि न तो इसका आदि है और न अंत है तथा न अच्‍छी प्रकार से स्थिति ही है। इसलिए हम अहंता? ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसाररूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा काटकर, उसके उपरांत उस परम पद रूप परमेश्वर को अच्छी प्रकार खोजना चाहिए कि जिसमें गए हुए पुरुष फिर पीछे संसार में नहीं आते हैं।


और जिस परमेश्वर से यह पुरातन संसार— वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है उस ही आदि पुरुष के मैं शरण है इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके नष्ट हो गया है मान और मोह जिसका तथा जीत लिया है आसक्तिरूप दोष जिन्होंने और परमात्मा के स्वरूप में है निरंतर स्थिति जिनकी तथा अच्छी प्रकार से नष्ट हो गई है कामना जिनकी? ऐसे वे सुख— दुख नामक द्वंद्वों से विमुक्त हुए ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।



इस संसार—वृक्ष का रूप जैसा कहा है, वैसा यहां नहीं पाया जाता है, क्योंकि न तो इसका आदि है और न अंत है तथा न अच्छी प्रकार से स्थिति ही है। इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसाररूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा काटकर।

यह जो उलटे वृक्ष की कल्पना कृष्ण ने दी, ऐसा हम खोजने जाएंगे, तो हमें मिलेगा नहीं। उसके कई कारण हैं।

पहला तो कारण यह है कि हम उस वृक्ष की एक छोटी शाखा हैं। हम खोजने जा नहीं सकते। हम उस वृक्ष से दूर खड़े होकर देख नहीं सकते। हम उस वृक्ष के अंग हैं। इसलिए हम कैसे देख पाएंगे कि वृक्ष उलटा खड़ा है; जड़ ऊपर है और पत्ते नीचे हैं। हम पत्ते ही हैं या हम शाखाएं हैं। हम वृक्ष के अंग हैं, उससे हम दूर नहीं हो सकते हैं।

इसलिए संसार के वृक्ष की यह उलटी जो अवस्था है, ध्यान की परम गुह्य स्थिति में ही दिखाई पड़ती है। उसके पहले नहीं। क्यों? क्योंकि ध्यान की उस गुह्य स्थिति में आप वृक्ष के हिस्से नहीं रह जाते, आप संसार के हिस्से नहीं रह जाते। इसलिए सिर्फ समाधि में ही इस उलटे वृक्ष का पूरा रूप दिखाई पड़ता है। यह समाधिस्थ चित्त की अनुभूति है।

आप इसे समझ लें बुद्धि से, उतना ही काफी है। आप इसे देख न पाएंगे। वृक्ष विराट है। वैज्ञानिक कहते हैं, इसका हम कोई ओर—छोर नहीं उपलब्ध कर पाते हैं। जितनी खोज बढ़ती है, उतना ही यह वृक्ष विराट मालूम होता है। रोज नए तारे खोजे जाते हैं; नए सूरज खोजे जाते हैं।

अब तक कोई चार अरब सूरज खोजे जा चुके हैं। और कभी ऐसा लगता था कि एक सीमा आ जाएगी, जब खोज समाप्त हो जाएगी; हम पहुंच जाएंगे अंतिम सीमा पर। पर अब कोई सीमा नहीं मालूम होती है। जितना आगे बढ़ते हैं, नई खोज होती चली जाती है।

वृक्ष बहुत बड़ा मालूम होता है, विराट मालूम होता है। और हम उसके अंग हैं, इसलिए दूर खड़े होकर हम देख नहीं पाते हैं। देखने की कोई संभावना भी नहीं है।

फिर न तो इसका कोई आदि है और न अंत है। अगर इसका कोई प्रारंभ होता, तो भी देखना आसान था। अगर कभी यह अंत होता होता, तो भी देखना आसान था। यह एक अनंत श्रृंखला है। एक तरफ एक ग्रह उजड्ता है, तो दूसरा ग्रह निर्मित हो जाता है। एक तरफ एक सूरज बुझता है, तो दूसरे सूरज में प्राण आ जाते हैं।

वैज्ञानिक सोचते हैं कि शायद पांच हजार वर्ष बाद हमारा सूरज ठंडा हो जाएगा, क्योंकि उसकी गरमी रोज चुकती जाती है। लेकिन कुछ दूसरे सूरज, जो ठंडे पडे हैं, गरम होते जा रहे हैं। जैसे ही हमारा सूरज ठंडा होगा, कोई सूरज दूसरा गरम हो जाएगा। इस सूरज के ठंडे होते ही इस पृथ्वी से जीवन तिरोहित हो जाएगा। लेकिन किसी और पृथ्वी पर जीवन के अंकुरण शुरू हो जाएंगे। वैज्ञानिक हिसाब से कोई पचास हजार पृथ्वियों पर जीवन अभी है। होना चाहिए। वृक्ष की एक शाखा सूखती है, तो दूसरी शाखा निकल जाती है। वृक्ष मुरझाए, कि नए अंकुर आ जाते हैं। पुराने पत्ते गिर भी नहीं पाते कि नए पत्ते प्रकट होने लगते हैं।

श्रृंखला अनंत है। इसलिए न पीछे खड़े होने का उपाय है, न आगे खड़े होने का उपाय है। न किनारे खड़े होने का उपाय है, क्योंकि हम उसके हिस्से हैं, हम श्रृंखला हैं।

और इसलिए भी अच्छी प्रकार से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि इसकी कोई ठीक स्थिति नहीं है। यह शब्द समझ लेने जैसा है। स्थिति केवल परमात्मा की है, संसार की केवल गति है, स्थिति नहीं है।

यहां सब चीजें हो रही हैं; कोई भी चीज है की अवस्था में नहीं है। इसलिए बुद्ध ने तो कहा कि है शब्द का प्रयोग ही मत करना। जैसे हम कहते हैं, वृक्ष है। तो बुद्ध कहते हैं, ऐसा कहना ही मत, क्योंकि है की कोई स्थिति नहीं है। वृक्ष हो रहा है। जब तुम कहते हो, वृक्ष है, तब भी वह हो रहा है। हम कहते हैं, यह जवान है, तब भी हम गलत कहते हैं। क्योंकि जब हम कहते हैं, जवान है, तब वह जवान हो रहा है या बुुुढा हो रहा है। लेकिन है की कोई स्थिति नहीं है। हमेशा होने की स्थिति है, भवति। सभी कुछ बिकमिंग है। कहीं कुछ ठहरा नहीं है।

स्थिति का अर्थ है, ठहराव। परमात्मा के सिवाय और किसी की कोई स्थिति नहीं है। बाकी सब बहाव है। जैसे नदी बह रही है, ऐसे आप भी बह रहे हैं। ऐसी हर चीज बह रही है।

यह वृक्ष एक बहाव है, इसलिए भी देखना बहुत मुश्किल है। क्योंकि हर चीज बदल रही है। आप देख भी नहीं पाते कि बदल जाती है। आप इसके पहले कि समझ पाएं, स्थिति बदल जाती है। इसके पहले कि आप पकड़ पाएं, जिसको आप पकड़ रहे थे, वह वहा मौजूद न रहा। कुछ और हो गया। यहां सब धुआं— धुआं है, बादलों की तरह है। जैसे बादलों में हम आकृति नहीं पकड़ पाते हैं। आप देख रहे हैं कि एक हाथी बन रहा है बादलों में; और आप देख भी नहीं पाए कि हाथी बिखर गया, कुछ और बन गया।

पूरा जगत धुआं— धुआं है। स्थिति केवल परमात्मा की है। और जब तक स्थिति उपलब्ध न हो, तब तक कोई भी ठहराव समझ का, बुद्धि का नहीं हो सकता। तब तक ज्ञान की कोई अवस्था नहीं है। इसलिए हिंदुओं की सारी चेष्टा इस बात में रही है कि कैसे आप गति से मुक्त हों और स्थिति को प्राप्त हों। कैसे दौड़ना बंद हो और ठहरना आए। कैसे प्रवाह रुके, थम जाए। नदी बहते—बहते कैसे एकदम जम जाए, बर्फ हो जाए। सब चीजें ठहर जाएं।

इस भीतर के चित्त की दौड के रुक जाने का नाम ही ध्यान है। भीतर कुछ भी न दौड़े, कोई गति न रहे, कोई प्रवाह न रहे, सब चीजें फ्रोजन हो जाएं, जड़ हो जाएं, ठहर जाएं, सब कंपन समाप्त हो जाएं; उसी क्षण आप परमात्मा हो गए। जब तक आप बहते हैं, तब तक संसार है। जब आप ठहरते हैं, तब आप परमात्मा हैं।

परमात्मा ही समझा जा सकता है। यह बड़ा विरोधाभासी लगेगा। क्योंकि विज्ञान कहता है, संसार समझा जा सकता है, परमात्मा को समझने का कोई उपाय नहीं। परमात्मा का पता ही नहीं चलता है कि वह कहां है! समझना दूर, यह भी तय करना मुश्किल है कि है भी या नहीं। और गीता कहती है कि सिर्फ परमात्मा ही समझा जा सकता है, क्योंकि वह थिर है। वह जाना जा सकता है, उस पर भरोसा किया जा सकता है, वह रिलाएबल है। ऐसा नहीं कि आप एक आंख उठाकर देखेंगे और जब दुबारा आंख खोलेंगे, तो वह बदल गया। वह वही होगा—इस जन्म में, अगले जन्म में, कल्पों—कल्पों बाद, युगों—युगों बाद—आप जब भी लौटकर आएंगे, वह वही होगा।

वह कूटस्थ है, वह ठहरा हुआ है, वहां कुछ भी बदलता नहीं। आप कितना ही परिभ्रमण करें, कितना ही समय व्यतीत करें, जब भी आप लौटेंगे, आप पाएंगे, परमात्मा वैसा का वैसा है, सब वही है। वहां रत्तीभर कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

यह अपरिवर्तित ही समझा जा सकता है। क्योंकि यह भरोसे योग्य है। इस पर श्रद्धा की जा सकती है। संसार तो भरोसे योग्य नहीं है। वह तो छाया की भांति है।

खलील जिब्रान की एक बड़ी प्रसिद्ध कहानी है। एक लोमडी सुबह—सुबह उठी। भोजन की तलाश पर निकली। सूरज उगता था उसके पीछे। बड़ी लंबी छाया लोमड़ी की बनी। लोमड़ी ने अपनी छाया देखी और सोचा, आज तो एक हाथी मिले, तभी पेट भर पाएगा! इतनी लंबी छाया कि एक हाथी के बिना भोजन का कोई उपाय नहीं। और छाया से ही लोमडी जान सकती है कि मैं कितनी बडी हूं। और जानने का उपाय भी नहीं। आप भी दर्पण से ही जानते हैं कि आप कौन हैं। और तो कोई उपाय नहीं। दर्पण यानी छाया!

लोमड़ी बड़ी चिंतित भी हुई, क्योंकि कहां पाएगी हाथी? और भूख बढ़ने लगी और खोजती रही, खोजती रही। दोपहर हो गई, सूरज ऊपर आ गया; अभी तक भोजन भी नहीं मिला। और हाथी को पाने का खयाल, तो भूख भी हाथी जैसी, हाथी को पचाने जैसी भीतर हो गई। क्योंकि सारा मन का खेल है।

लेकिन हाथी मिला नहीं, भोजन मिला नहीं। नीचे झुककर उसने फिर छाया देखी। सूरज अब ऊपर आ गया, तो छाया करीब—करीब खो गई। तो लोमड़ी ने कहा, अब तो एक चींटी भी मिल जाए तो भी काम चलेगा।

संसार छाया की तरह है। और बचपन में हर आदमी सोचता है कि हाथी नहीं मिला, तो काम नहीं चलेगा। और बुढ़ापे में हर आदमी जानता है कि चींटी भी मिल जाए, तो भी काम चलेगा। छाया छोटी होती जाती है।

सभी बच्चे सिकंदर होना चाहते हैं। सभी बुजुर्ग कहने लगते हैं, अंगूर खट्टे हैं। सभी बच्चे संसार को जीतने निकलते हैं। सभी बूढ़े वैराग्य की बातें करने लगते हैं। इसलिए नहीं कि वैराग्य आ गया। इसलिए कि छाया सिकुड़ गई। और अब इतने से भी काम चल जाएगा। और कुछ न भी मिला, तो भी काम चल जाएगा।

वैराग्य का मतलब है, छाया सिकुड़ गई। यह वैराग्य कोई वास्तविक नहीं है। अगर यह वैराग्य वास्तविक हो, तो जवानी में भी आ सकता था। इसके लिए बुढ़ापे तक रुकने की कोई जरूरत न थी।

यह जो लोमड़ी का कहना है कि चींटी से भी काम चल जाएगा, यह कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। अगर यह बुद्धिमत्ता होती, तो सुबह भी छाया की भ्रांति में आने का कोई प्रयोजन न था। सिर्फ छाया सिकुड़ गई है।

इस संसार को समझने का ठीक—ठीक उपाय नहीं है, क्योंकि प्रतिपल बदल रहा है। इसकी कोई स्थिति नहीं है। इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसाररूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य शस्त्र द्वारा काटकर।

इसको जानने में उलझने की भी कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि इसको जान—जानकर भी कोई कभी जान नहीं पाता।

विज्ञान सोचता था, इसी सौ वर्ष पहले, कि जल्दी ऐसा दिन आ जाएगा, जब हम सब जान लेंगे। अब वैज्ञानिक कहते हैं कि वह दिन कभी भी नहीं आएगा। क्योंकि जितना हम जानते हैं, उतना पता चलता है कि और भी जानने को शेष है। जितना हम जानते हैं, उतने ही अनजान तथ्य सामने आ जाते हैं जिनको जानने की चुनौती मिल जाती है। एक समस्या हल नहीं होती, पचास खड़ी हो जाती हैं। उसको हल करने के कारण ही पचास समस्याएं उठ आती हैं, पचास प्रश्न उठ आते हैं।

अब विज्ञान का भरोसा डगमगा गया है। अब विज्ञान भी मानता है कि कोई अंतिम ज्ञान उपलब्ध हो सकेगा, इसकी आशा नहीं है। सब कामचलाऊ ज्ञान है। रिलेटिविटी का यही मतलब है कि सब ज्ञान कामचलाऊ है। हम जितना जानते हैं, उतने तक ठीक है। बाकी जितना हम और ज्यादा जानेंगे? सब गड़बड़ हो जाएगा।

परमात्मा ही जाना जा सकता है। उसकी स्थिति है। इसलिए धर्म के अतिरिक्त ज्ञान का कोई भी द्वार नहीं है।

विज्ञान कामचलाऊ उपयोगिता का द्वार है, ज्ञान का नहीं। उससे जो भी हम जानते हैं, वह करीब—करीब सत्य है, एप्राक्सिमेटली। लेकिन करीब—करीब सत्य का कोई मतलब नहीं होता। करीब—करीब सत्य का असत्य ही मतलब होता है। या तो कोई चीज सत्य होती है या नहीं होती। करीब—करीब सत्य का कोई अर्थ नहीं होता। पर उपयोगिता विज्ञान की है।

ज्ञान धर्म के माध्यम से उपलब्ध होगा। और ज्ञान तभी उपलब्ध होगा, जब हम स्थिति को उपलब्ध हो जाएं। अगर परमात्मा की स्थिति है और हमारी गति है, तो मिलन नहीं हो सकता। समान समान का ही मिलन संभव है। जब हम भी स्थित होंगे, तो उससे मिलन हो जाएगा। उस जैसे जब होंगे, तब हमारा उससे मिलन हो जाएगा।

ठहरते ही उस ठहरे हुए का अनुभव शुरू हो जाता है। और ठहरने का एक ही उपाय है। इस संसार के वृक्ष को समझने से कुछ न होगा, वरन अहंता (घमंड), ममता और वासना, इन तीनों को वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा काटकर, उसके उपरांत उस परम पद परमेश्वर को अच्छी प्रकार खोजना चाहिए।

वृक्ष को खोजने में न पड़े। वृक्ष को तो काट ही दें। और उसको खोजने में चलें, जिसका पतन वृक्ष है। जिससे गिरकर वृक्ष पैदा हो रहा है, उस मूल उदगम को खोजने चलें। उस बीज को पकड़े, उस मूल स्रोत को पकडे।

कभी आपने बीज को तोड़कर देखा? बीज आप बोते हैं, एक वृक्ष उससे निकल आता है। लेकिन जो बीज आप बोते हैं, उससे यह वृक्ष निकलता है? क्योंकि वह बीज तो सड़ जाता है, गल जाता है, मिट्टी में मिल जाता है। उस बीज से यह वृक्ष निकलता नहीं। उस बीज को कभी तोड़कर आपने देखा है? कहीं आप इस वृक्ष को खोज पाएंगे? उस बीज में कहीं यह वृक्ष मिलता भी नहीं है खोजने से। वैज्ञानिक, वनस्पतिशास्त्री भी कहते हैं कि बीज में कोई शून्य से ही वृक्ष निकलता है। बीज तो केवल उस शून्य को अपने भीतर छिपाए हुए है। बीज तो सिर्फ खोल है, भीतर कोई शून्य छिपा है। बीज की खोल टूटकर मिट्टी में मिल जाती है, उस शून्य से ही वृक्ष निकलता है।

तो बीज के भीतर जो छिपा शून्य है, वही उदगम है। और जब तक हम उस शून्य में प्रवेश न कर जाएं, तब तक मूल का, सत्य का कोई अनुभव संभव नहीं है।

इसलिए बुद्ध ने तो अपने सारे धर्म को शून्यता की छाया दे दी, शून्यता का रंग दे दिया। और कहा कि शून्य में प्रवेश कर जाओ, तो ब्रह्म की उपलब्धि है। और कोई ब्रह्म नहीं है।

जो भी दिखाई पड़ता है, वह खोल है। उस खोल के भीतर न दिखाई पड़ने वाला छिपा है। उस अदृश्य को जानने की दो बातें कृष्ण कह रहे हैं। पहले तो वैराग्य से अहंकार, ममता और वासना को काट डालें।

वैराग्य का क्या मतलब है? वैराग्य का मतलब है, यह बोध कि जहां —जहां मुझे सुख का खयाल होता है, वहा सुख नहीं है। यह शास्त्र से पढ़कर नहीं आ जाएगा। संसार को ही उसके पूरे तत्व में समझने से आएगा।

आपने बहुत प्रयोग किए हैं। जहां—जहां सुख की छाया दिखी है, वहा—वहा दौड़े हैं। फिर वहा सुख पाया या नहीं? अगर नहीं पाया, कभी भी नहीं पाया। जहां भी प्रतिबिंब दिखा, वहीं गए और मृग—मरीचिका मिली। जहां भी ध्वनि मिली, वहीं गए, लेकिन पाया कि सिर्फ खाली घाटियों में गूंजती आवाज थी। इंद्रधनुषों की खोज की। बड़े रंगीन थे दूर से; पास गए, खो गए। हाथ में कुछ भी न आया। इन सारे जीवन के अनुभवों का जो निचोड़ है, वह वैराग्य है। तो किसी शास्त्र को पढ़ने से वैराग्य नहीं आ जाएगा; कि आप भर्तृहरि का वैराग्य—शतक पढ़ लें और सोचें कि वैराग्य आ जाएगा। भर्तृहरि को वैराग्य—शतक का अनुभव आया गहन भोग से।

भर्तृहरि ने दो किताबें लिखी हैं। एक का नाम है, श्रृंगार—शतक। वह उसका पहला अनुभव है, संसार का अनुभव। तब उसने भोगा।

उसने सब भूलें कीं, जो कोई भी समझदार आदमी करेगा। जो कोई भी हिम्मती आदमी करेगा, उसने वे सब भूलें कीं। उसने अपने को भूलों से बचाया नहीं। क्योंकि भूलों से जो बचता है, वह अनुभव से भी बच जाता है। वह संसार के सब गली—कूचों में भटका। उसने संसार की सब पगडंडियां छान डालीं। उसने बुरे और भले का भेद भी नहीं किया। जहां उसकी वासना ले गई, गया। लेकिन होश सजग रखा और इस बात को जांचता रहा कि जहां—जहां वासना ले जाती है, वहां कुछ मिलता है या नहीं!

हर बार असफलता मिली। सुख कभी भी न पाया। सदा ही भ्रांति सिद्ध हुई। वासना ने जहां —जहां मार्ग दिखाया, वहीं—वहीं व्यर्थता हाथ आई, वहीं—वहीं विषाद मिला।

हजारों वासनाओं के मार्गों पर चलकर जब एक ही अनुभव होता है निरपवाद रूप से, तो वैराग्य का जन्म होता है। वैराग्य वासना की असफलता का सतत अनुभव, उसका सार—निचोड़ है। और तब यह बात कठिन नहीं रह जाती, अहंकार को, ममता को, वासना को काट देना जरा भी कठिन नहीं रह जाता।

वैराग्य की प्रतीति का अर्थ है, जहां —जहां वासना कहती है सुख है, वहां—वहा सुख नहीं है। जहां—जहां वासना कहती है सुख है, वहा—वहा दुख है, और जहां—जहां वासना कहती है दुख है, वहां—वहां सुख है। वासना धोखा देती है, प्रवंचक है, दि ग्रेट डिसीवर। इस प्रतीति का नाम वैराग्य है। और तब सुख में खोजना बंद, और दुख में खोज शुरू होती है।

दुख की खोज को हम तप कहते हैं। तपश्चर्या का अर्थ है, अब मैं सुख में नहीं खोजता; सुख में खोजा और नहीं पाया, अब मैं दुख में खोजूंगा। क्योंकि अगर सुख में खोजने से दुख मिला, तो संभावना है कि शायद दुख में खोजने से सुख मिल सके। विपरीत यात्रा करूंगा।

वैराग्य अनुभव है वासना की विफलता का। और जैसे ही यह अनुभव गहरा हो जाता है, यह अनुभव शस्त्र बन जाता है। तब साधक अपने भीतर वैराग्य के शस्त्र को लिए रहता है। जैसे ही वासना उससे कहती है वहां सुख, वहीं वह शस्त्र से गिराकर काट डालता है। वह कहता है, मैं जानता हूं; यह बहुत बार हो चुका। बुद्ध को जब पहली समाधि उपलब्ध हुई, तो उन्होंने जो पहले शब्द अपने भीतर कहे—किसी और से नहीं, खुद से कहे—वे ये थे कि बस, हे काम के देवता, अब तुझे मेरे लिए कष्ट न करना पड़ेगा। मैं भी दौड़ा और मेरे कारण तू भी काफी दौड़ा। अब तुझे मेरे लिए नए घर न बनाने पड़ेंगे। क्योंकि मैंने आधार ही गिरा दिया, अब कोई बुनियाद ही न रही।

वैराग्य के शस्त्र का अर्थ है, भीतर एक सजगता। वासना जहां—जहां धोखा देने लगे, वहां —वहां सजगता रुकावट बन जाए। वहां—वहां हम पुन: स्मरण कर सकें कि इस तरह की वासना में हम बार—बार उतर चुके हैं।

आप भी बहुत बार वैराग्य की हलकी झलक से भरते हैं। हर वासना के बाद वैराग्य की झलक हर आदमी को आती है। हर संभोग के बाद क्षणभर को प्रत्येक स्त्री—पुरुष को यह प्रतीति होती है कि बस, बहुत हुआ, व्यर्थ है। लेकिन थोड़ी देर आराम के बाद फिर वासना सजग हो जाती है। तो वह जो क्षणभर का अनुभव था, वह शस्त्र नहीं बन पाता। वह जो अनुभव था, संगृहीत नहीं होता। वह बूंद—बूंद की तरह खो जाता है, कभी गागर भर नहीं पाती। साधक बूंद—बूंद अनुभव को इकट्ठा करता है और गागर को भरता है। वह बूंद—बूंद को खो जाने नहीं देता।

आपके अनुभव में और बुद्ध के अनुभव में बहुत फर्क नहीं है। बस, इतना ही फर्क है कि आपके पास कोई गागर नहीं है, जिसमें आप अपनी बूंदें भर लेते। आपको उतने ही अनुभव हुए हैं, ज्यादा हो गए होंगे, क्योंकि बुद्ध को मरे पच्चीस सौ साल हो गए। बुद्ध से ज्यादा अनुभव आपको हो चुके हैं। लेकिन बूंद—बूंद होते हैं, खो जाते हैं। इकट्ठे नहीं हो पाते हैं; उनकी चोट नहीं बन पाती। शस्त्र निर्मित नहीं हो पाता।

अपने अनुभवों को इकट्ठा करें। अनुभवों को खो जाने मत दें। क्योंकि उनके अतिरिक्त ज्ञान का और कोई मार्ग नहीं है। बूंद—बूंद। इकट्ठा करके आपके पास इतनी अनुभव की क्षमता हो जाएगी कि वासना कमजोर पड़ जाएगी। काटना भी नहीं पड़ता, अनुभव ही काफी होता है। अनुभव ही काफी होता है, वासना से लड़ना भी नहीं पड़ता। वासना धीरे— धीरे निर्वीर्य हो जाती है।

इस वृक्ष को वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा काटकर, उसके उपरांत उस परम पद परमेश्वर को अच्छी प्रकार खोजना चाहिए कि जिसमें गए हुए पुरुष फिर पीछे संसार में नहीं आते। और जिस परमेश्वर से यह पुरातन संसार—वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उस ही आदि पुरुष के मैं शरण हूं इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके..।

इस प्रक्रिया को थोड़ा सजगता से समझ लें।

हम सब बार—बार जन्मते हैं, बार—बार मरते हैं। लेकिन हर मरण मूर्च्छा में है, और हर जन्म भी मूर्च्छा में है। इसलिए आपको कुछ याद नहीं कि पहले भी आप थे। यह जन्म आपको पहला मालूम पड़ता है, और यह मौत जो आती है, आखिरी मालूम पड़ती है। क्योंकि दोनों तरफ अंधकार है। स्मृति खो गई है। होशपूर्वक मर सकें, तो होशपूर्वक जन्म होगा।

लेकिन मरना अभी दूर है, भविष्य में है। पीछे लौटा जा सकता है। और जो जन्म हो चुका है आपका चालीस, पचास, साठ साल पहले, उस जन्म को होशपूर्वक फिर से देखा जा सकता है। उसकी पूरी फिल्म आपके भीतर संगृहीत है। 

आपका मस्तिष्क बिलकुल टेप का यंत्र है। वह सब रिकार्ड कर रहा है। वहा कुछ भी नहीं खोया है। जो भी आपने कभी जाना है, वह वहा अंकित है। आप पीछे इस रिकार्ड का उपयोग करना सीख जाएं, इसे लौटाकर बजाना सीख जाएं, तो आप उन अनुभवों से फिर गुजर सकते हैं, जिनसे आप बेहोशी में गुजर गए हैं। आप पिछले जन्म में वापस जा सकते हैं, और पिछले जन्म के पीछे मृत्यु में जा सकते हैं। और तब यात्रा का द्वार खुल जाता है।

इस भांति जो व्यक्ति पीछे लौटता है होशपूर्वक, उसकी आगे के लिए भी होश की क्षमता निर्मित हो जाती है। वह मरेगा, लेकिन होशपूर्वक मरेगा। वह जन्मेगा, लेकिन होशपूर्वक जन्मेगा। वह जीएगा, लेकिन होशपूर्वक जीएगा। और जो व्यक्ति होशपूर्वक जीने लगा, संसार उसे नहीं बांध पाता। बांधती है हमारी मूर्च्छा। वैराग्य के द्वारा ममता, अहंता और वासना को काटकर जो व्यक्ति परमेश्वर को खोजता है, मूल उदगम को खोजता है, वह व्यक्ति फिर संसार में वापस नहीं आता।

फिर संसार में वापस आने का कोई कारण नहीं रह जाता। संसार में हम वापस होते हैं बार—बार मूर्च्छा के कारण, सोए हुए होने के कारण।

और जिस परमेश्वर से यह पुरातन संसार—वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उस ही आदि पुरुष के मैं शरण हूं, इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके नष्ट हो गया है मान और मोह जिनका तथा जीत लिया है आसक्तिरूप दोष जिन्होंने और परमात्मा के स्वरूप में है निरंतर स्थिति जिनकी तथा अच्छी प्रकार से नष्ट हो गई है कामना जिनकी, ऐसे वे सुख—दुख नामक द्वंद्वों से विमुक्त हुए ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

यह सूत्र, कि मैं उस आदि पुरुष, उस आदि उदगम के शरण हूं बहुमूल्य है। शरण का भाव बहुमूल्य है। क्योंकि वासना भी काटी जा सकती है वैराग्य से, फिर भी अहंकार शेष रह जाता है। वासना तोड़ी जा सकती है वैराग्य से, लेकिन तब वैराग्य का अहंकार सघन हो जाता है कि मैं विरागी हूं, कि मैं त्यागी हूं कि मैंने इतना छोड़ा, कि मैंने वासना नष्ट कर दी। एक गहन अग्नि जलने लगती है। अहंकार नए रूप ले लेता है, सूक्ष्म, पर और भी प्रगाढ़।

इसलिए कृष्ण एक शर्त जोड़ते हैं, वैराग्य के शस्त्र से काटकर मैं उस आदि पुरुष के शरण हूं, ऐसा दृढ़ भाव करें।



यह वैराग्य कहीं मेरे अहंकार को भरने का कारण न बने। क्योंकि जब तक मैं हूं तब तक मूल उदगम में खोना आसान नहीं, तब तक बूंद अपने को पकड़े है, सागर में खोने को राजी नहीं है।

मूल उदगम में मैं मैं नहीं रह जाऊंगा, मेरी अस्मिता खो जाएगी। मेरा सत्व बचेगा, मेरी चेतना बचेगी, लेकिन मैं का रूप खो जाएगा, मैं का नाम खो जाएगा। सभी नाम—रूप विलीन हो जाएंगे। यदि साधक वैराग्य को साधते—साधते साथ में शरणागति के भाव को न साधे, तो भटक जाता है। तब वैसा साधक हो सकता है शुद्ध हो जाए, लेकिन उसकी शुद्धि में भी जहर होगा। पवित्र हो जाए, लेकिन उसकी पवित्रता निर्दोष न होगी। उसकी पवित्रता में भी दोष होगा। शुभ हो जाए, सच्चा हो जाए नैतिक हो जाए; लेकिन उसकी नीति, उसकी सचाई, उसकी शुभता, भीतर एक मूल गलत भित्ति पर खड़े होंगे। वे अस्मिता की भित्ति पर खड़े होंगे। मैं शुद्ध हूं मैं शुभ हूं, मैं नैतिक हूं, यह भाव बना ही रहेगा। और यह आखिरी दीवार हो जाएगी। मैं हूं यह बना ही रहेगा। और जब तक मैं हूं तब तक परमात्मा नहीं है।

लोग मुझसे पूछते हैं कि परमात्मा को हम खोजते हैं, मिलता नहीं है। मैं उनसे कहता हूं, तुम जब तक खोजोगे, तब तक मिलने का कोई उपाय भी नहीं है! क्योंकि तुम ही बाधा हो। यह खोजने वाला ही उपद्रव है। और जब तक यह खोजने वाला न खो जाए, तब तक मिलने की कोई आशा नहीं है।

बुद्ध ने परमात्मा को अस्वीकार किया है। और कहा कि कोई परमात्मा नहीं है।

लेकिन तब एक मुसीबत शुरू हुई। दार्शनिक रूप से कोई अड़चन नहीं है परमात्मा को अस्वीकार करने में, लेकिन तब साधक में शरणागति का भाव कैसे पैदा करोगे? परमात्मा हो या न हो, यह मूल्यवान भी नहीं है। है, इसको सिद्ध करने की कोई जरूरत भी नहीं है।

बुद्ध ने कह दिया कि नहीं कोई परमात्मा है। लेकिन तब एक अडचन शुरू हुई। और वह अड़चन यह थी कि शरणागति कैसे हो? व्यक्ति अपने अहंकार को कैसे खोएगा? तो उसके लिए नए सूत्र खोजने पड़े। वे नए सूत्र फिर वही के वही हो गए; उससे कोई फर्क न पड़ा।

तो बुद्ध—भिक्षु कहता है, बुद्धं शरणं गच्छामि। संघ शरणं गच्छामि। धम्म शरणं गच्छामि। पर शरणं गच्छामि, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है!

बुद्ध कहते हैं, कोई भगवान नहीं है। लेकिन बुद्ध के साधक को बुद्ध को ही भगवान कहना पड़ता है। और बुद्ध भी इनकार नहीं करते कि मुझे भगवान मत कहो। क्योंकि बुद्ध को एक अड़चन साफ दिखाई पड़ती है। बुद्ध कह सकते हैं, मुझे भगवान मत कहो। क्योंकि बुद्ध को कोई रस आता होगा किसी के भगवान कहने से, यह धारणा ही मूढूतापूर्ण है।

फिर बुद्ध इनकार क्यों नहीं कर देते? और जब कोई बुद्ध के सामने आकर कहता है, बुद्धं शरणं गच्छामि—हे बुद्ध, तुम्हारी शरण जाता हूं तब वे क्यों नहीं कहते कि मैं कोई भगवान नहीं हूं। मेरी शरण क्यों जाते हो!

कारण है। बुद्ध को कोई रस नहीं है कि कोई उन्हें भगवान कहे, न कहे। लेकिन यह जो जा रहा है शरण, इसके शरण जाने का कोई मार्ग खोजना पड़े। और परमात्मा को इनकार कर दिया है, तो परमात्मा को जिस झंझट से छुटकारा दिला दिया, उसी झंझट में खुद को बैठ जाना पड़ा। वह परमात्मा की जगह खाली कर दी। और कोई चाहिए, जिसकी शरण जा सकें।

लेकिन बुद्ध तो कल मर जाएंगे। परमात्मा तो कभी नहीं मरता, बुद्ध कल मर जाएंगे। फिर क्या होगा? फिर किसकी शरण जाएंगे? क्योंकि लोग पूछेंगे, बुद्ध अब कहां हैं? अगर कहते हो, आकाश में हैं, तो फिर परमात्मा बन गया। अगर कहते हो, कहीं भी बुद्ध हैं और वहा से सहायता करेंगे, तो परमात्मा बन गया।

तो संघ शरणं गच्छामि। इसलिए दूसरा सूत्र जोड़ना पड़ा कि यह जो भिक्षुओं का संघ है, साधकों का, सिद्धों का, इसकी शरण जाओ। यह रहेगा।

लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि सदा हो। हिंदुस्तान से खो गया, बुद्धों का कोई संघ न रहा। तो किसकी शरण जाओ? तो बुद्ध को तीसरा सूत्र खोजना पड़ा, धम्म शरणं गच्छामि—धर्म की शरण जाओ। धर्म सदा रहेगा।

लेकिन क्या फर्क पड़ता है! शरण जाना ही पड़ेगा। क्योंकि शरण जाए बिना साधक का अहंकार नहीं खोता। इसलिए पतंजलि ने अनूठी बात कही है, और वह यह कि परमात्मा स्वयं को खोने की एक विधि है। परमात्मा है या नहीं, यह सवाल ही नहीं है। यह परमात्मा तो सिर्फ एक तरकीब है खुद को खोने की। इस दार्शनिक विवेचन का कोई भी मूल्य नहीं है हिंदुओं के लिए कि ईश्वर है या नहीं।

ईसाइयों ने बड़ी मेहनत की ईश्वर को सिद्ध करने की कि वह है। मगर उनकी मेहनत से कुछ सिद्ध नहीं होता। क्योंकि जिन दलीलों से सिद्ध करो, वे दलीलें काटी जा सकती हैं। कट जाती हैं। उनमें कोई बड़ी दलील ऐसी नहीं है, जो न काटी जा सके।

हिंदुओं ने कभी कोशिश नहीं की ईश्वर को सिद्ध करने की। क्योंकि वे कहते हैं, यह तो सिर्फ एक ट्रिक है, यह तो सिर्फ एक युक्ति है; यह तो सिर्फ एक उपाय है। उपाय है कि तुम शरण जा सको।

इसलिए जब पहली दफा ईसाई भारत आए या इस्लाम भारत आया, तो उनको बड़ी हैरानी हुई कि हिंदू भी कैसे मूढ़ हैं! कोई पत्थर को रखकर पूज रहा है, कोई झाड़ को पूज रहा है, कोई नदी को पूज रहा है। पत्थर! कोई मूर्ति भी नहीं है। ऐसे ही अनगढ़ पत्थर पर सिंदूर पोत दिया है, उसको पूज रहे हैं। हनुमान जी हैं! बहुत अजीब लगा उनको कि यह सब क्या हो रहा है!

लेकिन उन्हें पता नहीं कि हिंदुओं ने बड़े गहन तत्व को खोज लिया है। वे यह कहते हैं कि इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि तुम किसको पूज रहे हो। तुम पूज रहे हो, यह सवाल है। तुम कहां झुक रहे हो, यह बेमानी है। तुम झुक रहे हो, बस इतना काफी है।

तो तुम पीपल के वृक्ष के सामने झुक जाओ। यह तो बहाना है। यह पीपल का वृक्ष बहाना है। परमात्मा भी बहाना है। है या नहीं, इससे हमें कोई प्रयोजन भी नहीं है। हमें झुकने में सहयोगी है, तो झुक जाओ। क्योंकि झुकने से तुम उसे जान लोगे, जिसे बिना झुके तुम कभी नहीं जान सकते हो। और वह तुम्हारे भीतर छिपा है। इसलिए दुनिया में हिंदू धर्म को समझने में बड़ी अड़चन हुई है। हिंदू धर्म सबसे कम समझा गया धर्म है। क्योंकि उसके रूप ऐसे अनगढ़ दिखाई पड़ते हैं। पर उनके अनगढ़ होने का कारण है। कारण है कि बड़ी गहरी बात हिंदुओं की पकड़ में आ गई। ईश्वर महत्वपूर्ण नहीं है, झुकता हुआ साधक, झुका हुआ साधक, शरण में गया हुआ साधक।

तो जहां शरण मिल जाए, जिसके माध्यम से मिल जाए। वह है या नहीं, यह भी गौण है। शरण मिल जाए, तो सब हो जाता है। कृष्ण कह रहे हैं, उस आदि पुरुष के मैं शरण हूं, इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके नष्ट हो गया है मान और मोह जिसका......।

स्वाभाविक है, जो भी शरण जाएगा, उसका मान और मोह नष्ट हो जाएगा। और जो शरण नहीं गया, उसका मान और मोह कभी नष्ट नहीं होता।

इसलिए मैं कई दफा चकित होता हूं। जैन या बौद्ध भिक्षु गहन मान से भर जाते हैं। जैनों को तो शरण जाने का और भी उपाय नहीं। बौद्धों ने तो बुद्ध को ही शरण जाने का उपाय बना लिया। महावीर ने कहा, अशरण रहो, किसी की शरण मत जाओ।

बात में कुछ गलती नहीं है। अगर अशरण रहकर भी निरअहंकारी हो सको, तो इससे बडी और कोई बात नहीं है। फिर जरूरत भी नहीं है शरण जाने की। लेकिन कौन रह सकेगा बिना शरण जाए निरअहंकारी? कभी करोड़ में एकाध कोई व्यक्ति, जो शरण न गया हो और निरअहंकारी हो जाए। शरण जा—जाकर भी अहंकार नहीं मिटता। झुक—झुककर भी नहीं झुकता, तो बिना झुके बहुत कठिन है। महावीर का झुक गया होगा, महावीर के पीछे चलने वालों को मुश्किल खड़ी है। वह झुक नहीं पाता।

इसलिए जैन साधु बड़ी साधना करता है। वैसी साधना संभवत: दुनिया में कोई भी धर्म का साधु नहीं करता है। उसकी साधना प्रगाढ़ है। लेकिन उसका अहंकार भी उतना ही प्रगाढ़ है। इसलिए जैन साधु जिस अकड़ से चलता है, वैसी अकड़ की हम सूफी फकीर में कल्पना भी नहीं कर सकते। सूफी फकीर तो सोचकर चकित ही हो जाएगा कि क्या कर रहे हो तुम! इतनी अकड़! जैन साधु किसी को नमस्कार नहीं कर सकता। क्योंकि कोई है ही नहीं जिसकी शरण जाना है।

लेकिन हिंदुओं ने मौलिक तत्व को पकड़ लिया है, कि कहीं से भी झुकना आ सके, और किसी भी तरह शरण जाने का भाव पैदा हो सके, तो वही परम साधना है।

स्वभावत:, मान और मोह नष्ट हो जाएगा। और जैसे—जैसे मान—मोह—आसक्ति नष्ट होते हैं, वैसे—वैसे परमात्मा के स्वरूप में स्थिति बनने लगेगी। क्योंकि ये ही हिलाते हैं। इनकी वजह से कंपन होता है। इनकी वजह से बेचैनी और अशांति होती है। इनकी वजह से गति होती है।

परमात्मा में जिसकी स्थिति बनने लगती है, सुख—दुख नामक द्वंद्वों से विमुक्त हुए ज्ञानीजन उस अविनाशी पद को, परम पद को प्राप्त होते हैं।

वह परम पद छिपा है भीतर। जैसे ही हमारा हिलन—डुलन बंद हो जाता है, कंपन शात हो जाता है, ज्योति थिर हो जाती है, वह परम पद हमें उपलब्ध हो जाता है। जो सदा से हमारा है, जो सदा से हमारा रहा है, हम उसके प्रति प्रत्यभिज्ञा से भर जाते हैं। हम पहचान जाते हैं कि हम कौन हैं!

मैं के मिटते ही मैं कौन हूं इसकी पहचान आ जाती है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल


“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...