शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

एकोनाइटम नैपेलस (Aconitum Napellus) )

(Monkshood)


भय और बेचैनी की हालत, मानसिक और शारीरिक चिन्ता व कष्ट, शारीरिक और मानसिक बेचैनी, डर, एकोनाइट के खास लक्षण हैं। ज्वर के साथ किसी रोग का तीव्र, अकस्मात् और कठोर आक्रमण इस दवा की आवश्यकता बताता है। स्पर्श से घृणा । एकाएक भारी निर्बलता । रोग और खींचन जो सूखे, ठंडे मौसम से पैदा हों, ठंडी बाहरी हवा से पसीना रुकने से और वे रोग जो बहुत गरम मौसम से पैदा हो, खासकर आँतों और आमाशय सम्बन्धी गड़बड़ी इत्यादि प्रदाद और प्रदाहपूर्ण ज्वर की पहली दवा |रक्ताम्बु स्रावी झिल्ली और पेशिक तन्तु का रोगग्रस्त होना । आन्तरिक भाग में जलन | चुनचुनाहट, ठण्डापन और स्पर्शज्ञान की कमी। इन्फ्लूएंजा धमनियों में तनाव, मन में आवेग और शरीर सम्बन्धी खींचना आम पाई जाती है। एकोनाइट देने के समय याद रखिए कि एकोनाइट केवल क्रिया सम्बन्धी गड़बड़ी करता है, इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि वह तान्तविक परिवर्तन भी कर सकता है। इसका प्रभाव अल्पकालीन है और इसमें कोई सामयिकता नहीं पायी जाती इसका क्षेत्र किसी तीव्र रोग के आरम्भ में है। जब लक्षणों में कोई परिवर्तन आ जाये तो इसे जारी नहीं रखना चाहिए। रात्रि की अवस्था में; रस संचयता के पहले। इन्फ्लूएंजा


मन - थोड़े से थोड़े रोग में भी बहुत डर, चिन्ता, आकुलता, घबराहट पायी जाती है। सन्निपात में प्रायः चेतना के साथ दुःख, चिन्ता, डर, बकना झकना सभी की विशेषता रहती है, परन्तु बेहोशी नहीं आती। भविष्य की चिन्ता और डर, मौत से डरना; और यह विश्वास करना कि जल्दी ही मर जायगा दिन तक बता देता है। भविष्य का भीड़ और सड़क पार करने का डर । करवटें बदलना | चौंकने की प्रवृत्तिः कल्पना तीव्र, दिव्य दृष्टि दर्द सहन न हो पागल बना दे | संगीत सहन न हो, उसको दुःखी बना दे | ( ऐम्ब्रा) | सोचता है कि उसके सभी विचार आमाशय में से आते हैं, जैसे शरीर के अंग अधिक मोटे हैं। सोचता है अभी जो हुआ है, वह स्वप्नमात्र था ।


सिर- भरापन; भारी, टपकन, गरम; जैसे फट पड़ेगा, जलन होने का संवेदन | सिर में दबाव ( हेडेरा, हेलिक्स); जलन के साथ सिर दर्द: भेजे में पानी खौल रहा हो ( इण्डिगो ); चक्कर जो उठने से बढ़े ( नक्स और चाँद पर ऐसा मालूम हो जैसे बाल खोंचे जा रहे हो या बड़े हो गये हो में भयानक प्रलाप |

आँखें- लाल, सूजी हुई | गरम और सूखी मालूम पड़ें; जैसे उनमें बालू पडा हो । पलक सूजे हुए, कड़े लाल | रोशनी से बचना चाहे, सूखी ठंडी से बहुत पानी बहे; बर्फ का प्रतिविम्ब पड़ने से आये उपद्रव; किसी सपची या दूसरो बाहरी चीज को निकालने के बाद की हालत |


कान-- आवाज असह्य; संगीत असह | बाहरी कान गरम, लाल, सुजे हुए दर्द करें। कान दर्द ( कैमो)। जैसे बायें कान में पानी की बूंद हो ऐसा संवेदन |


नाक - गंध असह्य । नाक की जड़ में दर्द । सर्दी जुकाम, छींक अधिक, नथुनों में थरथराहट, चमकदार, लाल रक्त प्रवाह | श्लैष्मिक झिल्ली सूखी, नाक बन्द, सूखी या थोड़ा पानी ऐसा स्राव |


चेहरा--लाल, गरम, भरभराया, सूजा, फूला एक गाल गरम दूसरा पीला ( कैमो, इपिका ) | उठने पर लाल चेहरा मुर्दे जैसा पीला हो जाये या चक्कर आये। गालों में सिहरावन और स्पर्शज्ञान शून्यता, स्नायुशूल खासकर बायीं तरफ का इसके साथ में बेचैनी, सिहरावन और सुन्नपन | जबड़ों में दर्द |


मुह सुन्न, सूखा टपकन । जबान सृजी, सिरों में टपकन । दाँत ठंडक सहन न करें। निचला जबडा हिलाया करे जैसे कुछ चबा रहा हो । मसूड़े और सूजे हुए ! जवान पर सफेद मैल ( ए टिमकूडम ) ।


गला--लाल, सूखा, संकुचित, सुन्न, गडन, जलन, डंक लगने जैसा दर्द | तालुमूल सूजे हुए और सुखे ।


पेट -कै हो, इसके साथ डर, गरमी, पसीना और पेशाब अधिक ठंडे पानी की प्यास | पानी के सिवाय सभी चीजों का स्वाद कड़वा । घोर प्यास | पीता है. कै कर देता है और कहता है कि मर जायगा । पित्त की, श्लेष्मा की और खून मिली हरी-सी कै। साँस की तंगी से आमाशय में दाब | खून की कै करना । पेट से गले तक जलन । पेट- गरम, तना, फूला हुआ, छना असह्य | आंत्रशूल जो किसी करवट कम न हो। गर्म शोरबा पीने के बाद पाकाशय के लक्षणों में कमी । नाभि प्रदेश में जलन |


मलान्त्र -गुदा में रात को खाज और चिलकन के साथ दर्द हो । घड़ी घड़ी ऐंठन के साथ थोड़ा-थोड़ा मल निकले, हरा, महीन कटी हुई हरियाली की तरह ।लाल पेशाब के साथ सफेद मल । हैजे का दस्त, पतनावस्था, चिन्ता, बेचैनी के साथ खूनी बवासीर । हैमा मेलिस) बच्चों के पानी जैसे दस्त। वे चिल्लाते हैं और शिकायत करते हैं, बेचैन और सो न पायें | पेशाब थोड़ा, गरम लाल, कष्टदायक मूत्राशय की गरदन पर जलन और ऐंठन | मूत्रमार्ग में जलन | पेशाब न हो, खुनी पेशाब। पेशाब करने के पहले चिन्तित रहना। पेशाब रुक जाना, साथ में बेचैनी और चीखना और लिंग को पकड़ना। गुदा प्रदेश कोमल अधिक पेशाब होना, इसके साथ पसीना अधिक हो और अतिसार ।

पुरुष -लिंग के सिर पर सरसराहट। फोतों में कचट दर्द, अपड कडे, सूजे हुए । अकसर उतेजित होना और वीर्यस्खलन होना । कष्टदायक स्खलन ।

स्त्री - योनि सूखी, गरम, कोमल | मासिकस्राव मात्रा में अधिक, साथ में नकसीर या बहुत देर में हो और बहुत दिनों तक जारी रहे। मासिक रक्त दिखाई पड़ते ही घबराहट आये। डर या ठण्डक से दब गया हो। डिम्बाशय में रक्ताधिक्य और दर्द | गर्भाशय में तेज दर्द | प्रसवान्तक वेदना, डर और बेचैनी के साथ |

श्वास यन्त्र -- बायें सीने में लगातार दाब जरा-सा हिलने से श्वास-कष्ट ! खड़खड़ाती, सूखी, सुरसुरादार काली खाँसी, तेज आवाज के साथ और कठिनता से साँस लेना । बच्चा जब भी खाँसता है, गला पकड़ लेता है। भीतर खींची हुई हवा बहुत असह | साँस कम गहरी स्वरनली कोमल | सीने के आरपार चिलकन | खाँसी सूखी, छोटी, कड़ा; रात में और आधा रात के बाद बढ़; फुफ्फुस में गरमी लगना | खंखारने में खून ऊपर आवे खाँसने के बाद सीने में चुनचुनाइट|


दिल - तेज धड़कन, दिल की बीमारी, बांय कन्धे में दर्द के साथ सीने में चिलकन दर्द, धड़कन के साथ उत्सुकता, गशी और अंगुलियों के सिरों में चुनचुना हट । नाड़ी भरी हुई, कड़ा, खिची-सा उछलती हुई, कभी-कभी रुकती चाल | बैठने में कनपटी और गर्दन की धमनी की गति सुनाइ दें ।


पोठ--सुन्न, कड़ी, वेदना पूर्ण रेंगने और चुनचुनाइट: मानो कुचली गई है। गर्दन की जड़ में कड़ापन; कंधों में कुचले जाने जैसा दर्द |


अग-सुन्न और चुनचुनाहट; गोली लगने की तरह का दर्द, बर्फ-सी ठंडक और हाथ-पैर का सुन्न होना। बाया बाह के नाचे तक दर्द उतर ( कंक्टस, क्रॉटेल, केलाम, टेबकम ) | हाथ गरम और पैर ठण्ड जोड़ों का प्रदाह रात में कष्ट बढ़ लाल चमकदार सूजन | अति कोमल, कूल्हा और जांध के जोड़े लंगड मालूम है। खास कर लेटने के बाद घुटने लड़खडाये पैर  पीछे को मुडने की प्रवृति( एस्क्यूलस ) सभी जोड़ों की नस कमजोर और ढीली जोड़ों में बिना दर्द कर कड़ाहट दाहने हाथ पर चमकदार लाल उभरन जांघो के ऊपर पानी की बूदें टपकती जान पड़े।


नींद - दुःस्वप्न । रात को बकना । उत्सुक स्वप्न | अनिंद्रा बिस्तर में करवटें बदलना ( ३० शक्ति का प्रयोग करें ) नींद में चोकना स्वप्न, सोने में व्यग्रता, बूढ़ों को नींद न आना।


चर्म -लाल, गरम सूजा हुआ; सूखा, लाल फुन्सियों । शीतला जैसे दाने। सुरसुरी और पीठ में गगनी और रेंगन नीचे की तरफ को उत्तेजक औषधियों से कम हो ।


ज्वर- शीतावस्था विशेष है। ठंडा पसीना और चेहरा बर्फ-सा ठंडा ठंड और गरमी बारी-बारी से बिस्तर में जाने के बाद सर्दी लगे ।  ठंडी उसके शरीर से गुजरती हैं। प्यास और वेचैनी साथ रहती है। कपड़ा हटाने और छूने से सर्दी लगे । सूखी, गरमी, लाल चेहरा । अति लाभदायक ज्वरनाशक दवा है । जबकि मानसिक कष्ट और बेचैनी इत्यादि साथ हों। इससे सभी लक्षणों में कमी हो जाती है ।

घटना बढ़ना- खुली हवा में कम; गरम कमरे में शाम को और रात में बढ़ना; रोगग्रस्त्र करवट लेटने से, संगीत से, धूम्रपान से, सूखी ठंडी हवा से बढ़ना । अधिक मात्रा में सिरका पीने से इस औषधि का विष नष्ट हो जाता है ।

सम्बन्ध -तेजाबी पदार्थ, शराब, कॉफी, लेमोनेड और खट्टे फल इस औषधि की क्रिया को प्रभावित करते हैं। मलेरिया, मंद ज्वर, क्षय ज्वर, रक्त विष दोष और स्थानान्तरित प्रदाह में प्रयोग नहीं होता । अक्सर इसके बाद सल्फर दिया जाता है।


तुलना कीजिये - कैमोमिला और कॉफिया से घोर पीड़ा और अनिद्रा में | एग्नोस्टिस और स्पाईरैन्यस ज्वर और सूजन में एकोनाइट की तरह काम करते हैं। पूरक कॉफिया, सल्फर | सल्फर को 'जीर्ण एकोन' समझना चाहिये । अक्सर एकोन के शुरू किये काम को सल्फर पूरा करता है ।


तुलना-- बेलाडो, कैमो, कॉफिया, फेरम फास |



मात्रा -ज्ञानेन्द्रियों के रोग पर ६ शक्ति और प्रदाह की दशा में १-३ शक्ति | तीव्र रोग में जल्दी जल्दी दोहराना चाहिये । एकोनाइट तेज काम करने वाली दवा है। स्नायुशूल में जड़ का टिचर बनाकर प्रयोग करना चाहिए, एक १बूंद (विषैली ) या फिर ३० शक्तिः जैसी मरीज की हालत हो।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

Covid

 ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी कोरोना मुक्त हो.. मास्क पहनें... सामाजिक दूरी बनाए रखें

करोना का मतलब मृत्यु नहीं हैं। 96-97% लोग ठीक हो जाते हैं। सिर्फ़ जानकारी फैलाइये, अफ़वाह बिलकुल नहीं।

साहस, आत्मविश्वास कोरोना के इलाज की पहली दवा है..

परीक्षा के लिए सैम्पल देने के बाद रिपोर्ट आने का इंतजार न करें।

तुरन्त यह इलाज शुरू कर दें।

https://youtu.be/sh5RyEHsf_c

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Covid tablets

Doxy 100 mg   (10 tab) 5days 1-0-1 Daily 2 tab

Zincovit(7Tab) 7 days 1-0-0 Daily 1 tab

Azithral 500mg (5tab)5 days 0-1-0 Daily 1 tab

Limcee 500mg Chewable (14 tab) 7days 1-0-1 

2 tab daily

Shelcal 500mg (7Tab) 7days 0-0-1 Daily 1tab

Ivermectin 12mg (5tab) 5 days 0-1-0 Daily 1tab

Dolo 650mg 5days (15 tab )1-1-1 Daily 3 tab.

Mask & Sanitizer 

ठंडी सामग्री मत खाओ.. AC मत चलाओ...

गर्म पानी का सेवन करें।

आप पहले से बीपी,शुगर, डिप्रेशन की जो भी दवा ले रहे हैं।वो दवा लेते रहे।इस बीमारी में बीपी,शुगर, डिप्रेशन ओर बढ़ जाता है।अपने डाक्टर के सम्पर्क में रहें।

(कोरोना के साथ साथ कोई पहले की हेल्थ प्रॉब्लम हो तो अपने डॉक्टर से मिलें और सलाह लें)

इमरजेंसी 

ऑक्सीजन की समस्या है तो तुरन्त अस्पताल की ओर चलें ऑक्सीजन की मात्रा तय सीमा से कम नहीं होनी चाहिए। 

अगर आप की रिपोर्ट पॉजिटिव हो तो फिटकरी के गुणों को जान

लो।

 100 ग्राम फिटकरी तवे पर रखिये। पिघल जाए तो उसे ठंडा कर लीजिए। उसे तवे से उतार कर कूट कर डिब्बी में डालकर रख लें।

यह आपकी रामबाण दवाई है जो फेंफड़े सीज हों, दमा हो या दिल कमजोर हो, बलगम हो उसे दी जा सकती है

किसी के दांत में दर्द हो तो इससे कुल्ला करो

किसी घाव पर लगाओ

 इसे बाल्टी में डालकर उस पानी से नहाओ सब्जियां धो लो ।

यह एकमात्र ऐसा सेनिटाइजर है जिसका सेवन किया जा सकता है।

 एक चुटकी फिटकरी का भुना हुआ पाउडर लें। 1 चम्मच शहद लें, पांच बूंद अदरक के रस की डालें और पीड़ित को चटा दें। एक dose सुबह एक dose शाम । कुल दो दिन में चार dose. ।

फेफड़े की तमाम दिक्कतों में रामबाण दवाई है यह ।

इस दवाई ने डेथ बेड से रोगी को उठाया जब उनके फेफड़े न्यूमोनिया और बलगम से सीज हो गए थे और डाक्टर ने जवाब दे दिया था।

 आक्सीजन की कमी है तो घबराईये मत, 3-4 छोटे टुकड़े कपूर 3-4 लौंग 1 छोटी चमच अजवाइन और 2-3 बूंद निलगिरी का तेल एक सूती कपड़े मे पोटली बना लिजीए और उसे एक प्लास्टिक के जीपर में रख ले और थोड़ी थोड़ी देरबाद सुंघते रहे...तेल ना भी मिले तो बाकी सामान तो घर मे है।

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ऑनलाइन कंसल्टेशन आपको विभिन्न चिकित्सकों से निःशुल्क अथवा फी के साथ भी मिल सकता है।

फी आम तौर पर 300 से 1000 ( विभिन्न राज्यों, शहरों अनुसार ) रुपये तक हो सकती है डॉक्टर की ।

घर बैठे आप सलाह लेंगे एक्सपर्ट की तो आप सही कदम सही समय पर उठाते रहेंगे।

अब मैं बात कर रहा था भर्ती की स्थिति है एवं बेड नहीं मिल रहा या आप किसी बहुत छोटी ज़गह, गांव या कस्बे में हैं जो शहर से दूर है। तब उपरोक्त डॉक्टर से ये दो दवाएं और उनका डोज़ लिखवा लें । दरअसल जान इन्ही से बचती है रेमदेसीवीर से नहीं ।

तो निम्न दवाएं हैं जो जान बचाएंगी ।

1. समय पर ऑक्सीजन यदि ऑक्सीजन saturation 88 के नीचे हो ।

2. स्टेरॉयड :

इंजेक्शन अथवा टेबलेट Dexamethasone / Methylprednisolone.

ये बेहद सस्ती, आसानी से उप्लब्ध दवाएं हैं जो टेबलेट एवं इंजेक्शन दोनों रूप में उपलब्ध हैं। मैं dose जानबूझकर नहीं लिख रहा जिससे लोग सेल्फ मेडिकेशन न करें ।

इन्हें देने के बाद ऑक्सीजन की आवश्यकता भी जल्दी ही कम दिखने लगती है बहुत से मरीजों में ।

3. खून का थक्का रोकने वाली दवाएं :

Injection Low molecular weight heparin Eg.. enoxparin / clexon etc..

Injection न दे सकने की स्थिति में कैप्सूल Debigatron Doctor से लिखवा लें ।

डाक्टर अव्यक्त

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ऑक्सिजन लेबल गिर रहा तो ऑक्सिजन  का इंतजाम होने तक "ASPIDOSPERMA Q" 10 बूँद प्रति घंटा एक कप पानी मे देने से ऑक्सिजन लेबल तुरंत मेंटेन हो जाएगा जो हमेशा बना रहेगा। Homeopathic medicine है। 

'एस्पीडोस्पर्मा क्यू' फेफड़े की क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है, जो निश्चित तौर पर कोरोना पीड़ितों और उनके परिवारीजनों के लिए राहत की बात है। मगर जब शरीर को अधिक मात्रा में आक्सीजन की जरूरत होती है, वहां यह उतना प्रभावी नहीं है। कोरोना पाजिटिव मरीजों के लिए एस्पीडोस्पर्मा क्यू एक बेस-लाइन सपोर्ट दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मसलन जिन मरीजों को बुखार और खांसी हो, सांस लेने पर सीने में घड़घड़ाहड हो। यह दवा श्वसन केंद्रों को उत्तेजित कर फेफड़ों की क्षमता बढ़ाती है और रक्त के आक्सीकरण एवं कार्बन-डाइऑक्साइड के निष्कासन को बढ़ा देता है। डा. अनिल बताते हैं कि होम्योपैथी लक्षणों के आधार पर कार्य करने वाली सुरक्षित और असरदार चिकित्सा पद्धति है। इस पद्धति में दवाओं का चयन रोगियों के लक्षणों व रोग की प्रकृति के आधार पर किया जाता है, क्याेंकि एक जैसा रोग होने के बाद भी प्रत्येक राेगी के लिए दवा अलग-अलग हो सकती है।

Aconitum napellus 200C  is  one single medicine in homeopathy for Covid, which can cure almost every case, provided being trusted rightly, and given in the right manner

https://hmpathy.wordpress.com/2020/04/12/possible-homeopathic-medicine-for-coronavirus/

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आयुर्वेद की कोरोना दवा

आयुर्वेद की चार दवाओं से कोरोना के हल्के लक्षण वाले मरीजों का इलाज संभव है। आयुष मंत्रालय के दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की केस स्टडी में यह दावा किया गया है। आयु केयर जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में कहा गया है जिन चार दवाओं से कोरोना मरीज का उपचार किया गया है उसमें शामिल है आयुष क्वाथ, संशमनी वटी, फीफाट्रोल और लक्ष्मीविलास रस।


आयुष क्वाथ 10 मिली लीटर  तीन बार

संशमनी वटी 250 मिली ग्राम  दो बार

लक्ष्मीविलास रस 250 मिली ग्राम  दो बाऱ

फीफाट्रोल 500 मिलीग्राम दो बार

फीफाट्रोल पांच प्रमुख जड़ी-बूटियों सुदर्शन घन वटी, संजीवनी वटी, गोदांती भस्म, त्रिभुवन रस तथा मत्युंजय रस से निर्मित है। जबकि आठ अन्य बूटियां तुलसी, कुटकी, चिरायता, गुडुची, दारुहरिद्रा, अपामार्ग, करंज तथा मोथा के अंश भी शामिल हैं। जबकि आयुष क्वाथ दालचीनी, तुलसी, काली मिर्च तथा शुंथी(सोंठ) का मिश्रण है। संशमनी वटी को गिलोय की छाल से तैयार किया गया है।

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खांसी के लिए

1. सितोपलादि चूर्ण 120gm

2. स्फटिक भस्म 10gm

3. टंकण भस्म 10gm

4. गोदन्ती भस्म 10gm

5. अभ्रक भस्म 10gm

इन सबको मिलाकर 1 छोटी चम्मच ये पाउडर एक चम्मच शहद

के साथ 3-3 घण्टे बाद ले, शुगर के मरीज शहद न ले, इसके बाद खूब गर्म पानी पिये। कोरोना के लक्षण खत्म हो जाएंगे।

बुखार होने पर डोलो 650mg ले

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मरीजों को दी जाने वाली दवाएं और उनके प्रमुख विकल्प

एजिथ्रोमाइसिन- यह दवा बाजार में एजी, एजीसिप एजोपेट 500, एजेक्स, मोजिल, आजाद, एजिलैब, जीथ्रोम आदि नाम से मौजूद हैं। इनमें से कोई भी गोली इस्तेमाल की जा सकती है।

डोलो 650- इसका फार्मूला पैरासिटामॉल 650 एमजी है। यह बाजार में कॉलपोल, क्रोसिन, पैसिमोल, पीयूसी, पैराग्रेट, एक्सटी पैरा, पायराकेम, वेलसेट आदि नामों से आती है। बाजार में इस दवा के 511 विकल्प मौजूद हैं।

जिंकोविट- इसका फार्मूला विटामिन बीकॉंम्प्लेक्स और जिंक है। बाजार में इसके विकल्प के रूप में जिंकोनिया, एटूजेड, सुप्राडाइन, बीको जिंक जी, एटूजे गोल्ड, जिंकोलैक, बीकॉसूल जेड, कोबाडेक्स जेड आदि विकल्प मौजूद हैं।

लिम्सी 500- यह विटामिन सी की गोली है। बाजार में यह सिलिन 500, बीटाक्योर सी प्लस, आदि नामों से उपलब्ध हैं।

कैल्सीरॉल- यह विटामिन डी3 है। बाजार में इसके विकल्प के रूप में डी3, अपराइज डी, टायो 60, डी राइज 60, आर्किटाल नैनो लिक्विड, विटानोवा डी3 आदि मौजूद हैं।

डॉक्सी 100- इसका फॉर्मूला डॉक्सी साइक्लिन है। यह बाजार में डॉक्सी1 एल, डॉक्स्ट एसएल, माइक्रोडॉक्स, डॉक्सीपाल, रेवीडॉक्स एलबी, डॉक्सी श्योर, लेंटेक्लिन एलबी, रेस्पीलेक्स, बायोडेक्सी एली सहित 46 वैकल्पिक नाम से मौजूद हैड्ड।

आइवरमेक्टिन- बाजार में इस दवा के 59 विकल्प मौजूद हैं। इनमें प्रमुख आइवरट्रीट, स्कैविस्टा, वरमैक्ट, आइवेल, आइवरकेम, मेक्टिन, नेक्टोल आदि हैं।

फेबीफ्लू- इसका फॉर्मूला फेवीपिराविर है। बाजार में यह दवा, फ़्लू गार्ड, आराफ्लू, फेवीगेनो,  सिप्लेंजा, कोविहाल्ट, सिपविर, फॉयविर, फेवेंजा आदि नाम से उपलब्ध है। इस दवा के बाजार में 15 विकल्प मौजूद हैं।

https://shreemadgeetadarshan.blogspot.com/2021/04/covid.html?m=1

एक छोटा सा प्रयास आपको कोरोनावायरस से बचाने के लिए जानकारी अच्छी लगी हो तो अपने जानने वालों को इसका लिंक भेजे।

हरिओम सिगंल

















बुधवार, 18 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 18भाग 21

 परमात्‍मा को झेलने का पात्रता


 संजय उवाच:

ड़त्यहं वासुदेवस्य यार्थस्य च महात्मन:।

संवादभिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।। 74।।

व्याक्यसादाच्‍छूतवानेतदगह्यमहं परम्।

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्‍साक्षाक्कथयत स्वयम्।। 75।।

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।

केशवार्जुनयो पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु:।। 76।।

तव्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूयमत्यद्भुतं हरे:।

विस्मयो मे महान् राजन्हष्यामि च युन: पुन:।। 77।।

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पाथों धनर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिमर्तिर्मम।। 78।।


इसके उपरांत संजय बोला, हे राजन, इस प्रकार मैने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना।

श्री व्यासजी की कृपा से दिव्‍य—दृष्टि के द्वारा मैने इस परम रहस्ययुक्त गोपनीय योग को साक्षात कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान से सुना है।

इसीलिए हे राजन, श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के इस रहस्ययुक्तु कल्याण् कारक और अदभुत संवाद को पुनः—पुन: स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूं।

तथा हे राजन, श्री हरि के उस अति अदभुत रूप को भी पुन—पुन: स्मरण करके मेरे चित्त में महान विस्मय होता है और मैं बारंबार हर्षित होता हूं।

हे राजन, विशेष क्या कहूं! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान हैं और जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन है, वही पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।


इसके उपरात संजय बोला, हे राजन, इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत, रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना।

थोड़ा जीवंत, थोड़ा प्राणवान चैतन्य हो, तो सुनकर भी द्वार खुलने लगेंगे। बात संजय से कही न गयी थी। संजय तो केवल एक गवाह है। कही थी किसी और ने, कही थी किसी और के लिए। संजय तो एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह है, एक चश्मदीद गवाह है। संजय तो सिर्फ एक साक्षी है। उसने वही दोहरा दिया है अंधे धृतराष्ट्र के सामने, जो घटा था। संजय तो एक रिपोर्टर है, एक अखबारनवीस। लेकिन उसके जीवन में भी कुछ घटने लगा।

सत्य की महिमा ऐसी है कि तुम उसके निकट जाओगे, तो वह तुम्हें छू ही लेगा। तुम शायद गवाही की तरह ही गए थे, या तुम सिर्फ एक दर्शक की भांति गुजरे थे, लेकिन सत्य की महिमा ऐसी है, उसका रहस्य ऐसा है कि तुम्हारे हृदय में कुछ होना शुरू हो जाएगा। तुम दर्शक की भांति गए हो, लेकिन दर्शक की भांति वापस न लौट सकोगे।

कभी दर्शक भी कभी कुतूहलवशात आ जाए सत्य के करीब, तो उसके हृदय में भी रोमाच हो जाता है।

इसके उपरांत संजय बोला, हे राजन, इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना। मेरा भी रोमांच हो गया है! मैं भी आपूरित हो गया हूं! सुन—सुनकर मैं भी और हो गया!


और संजय कहता है, महात्मा अर्जुन!

उसने एक अपूर्व जन्म देखा है। वह एक ऐसे जन्म की घटना का गवाह रहा है कि कोई दूसरा गवाह खोजना मुश्किल है। जिसने संदेह को समर्पण बनते देखा, जिसने अहंकार को विसर्जित होते देखा; जिसने योद्धा को संन्यासी बनते देखा; जिसने क्षत्रिय के अहंकार को ब्राह्मण की विनम्रता बनते देखा; जिसने अर्जुन का नया जन्म देखा। शुरू से लेकर, आखिर तक, पूरी जीवन—यात्रा देखी। वह कहता है, महात्मा अर्जुन! अब साधारण अर्जुन कहना ठीक न होगा।

श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य—दृष्टि द्वारा मैंने इस परम रहस्ययुक्त गोपनीय योग को साक्षात कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान से सुना है।

इसलिए हे राजन, श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अदभुत संवाद को पुन: —पुन: स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूं।

जैसे एक झरना भीतर कलकलित हो रहा है, जैसे भीतर एक फुहार पडी जाती है, बार—बार मेघ घिर आते हैं, बार—बार वर्षा हो जाती है!

बारंबार हर्षित होता हूं स्मरण कर—करके!

जो देखा है, वह अपूर्व है। जैसा आंखों से देखा नहीं जाता, ऐसा देखा है! जो कभी सुना नहीं, ऐसा सुना है! और जो घटना देखी है, भरोसे के योग्य नहीं है!

अहंकार समर्पण बन जाए, इससे ज्यादा रहस्ययुक्त घटना इस संसार में दूसरी नहीं है। इससे बड़ी कोई रोमांचकारी घटना नहीं है। यह अपूर्व है। यह असाधारण से भी असाधारण बात है।

और व्यक्ति तब तक साधारण ही रहता है, जब तक अहंकार में रहता है। जिस दिन अहंकार समर्पण बनता है, उस दिन व्यक्ति भी असाधारण हो जाता है। उसके पैर जहां पड़ते हैं, वहा मंदिर हो जाते हैं। वह मिट्टी छूता है और स्वर्ण हो जाती है। उसकी हवा में काव्य होता है। उसके स्पर्श से सोए लोग जाग जाते हैं, मृत जीवित हो जाते हैं।

मरे हुए अर्जुन को पुन: जीवित होते देखा है। हाथ—पांव शिथिल हो गए थे, गांडीव छूट गया था, उदास, थका—मादा अर्जुन बैठ गया था। विषाद की कथा को आनंद तक पहुंचते देखा है! नर्क से स्वर्ग तक की पूरी की पूरी सोपान—सीढ़ियां देखी हैं!

पुन: स्मरण करके बारंबार हर्षित होता हूं।

तथा हे राजन, श्री हरि के उस अदभुत रूप को भी पुन: —पुन: स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है.......।

कितनी करुणा! कितनी बार अर्जुन छूटा; भागा; फिर—फिर खींचकर उसे ले आए। जरा भी नाराज न हुए! एक बार भी उदासी न दिखाई! कितना अर्जुन ने पूछा, थका डाला पूछ—पूछकर वही—वही बात। लेकिन कृष्ण उदास न हुए; वे फिर—फिर वही कहने लगे, फिर—फिर नए द्वारों से कहने लगे, नए शब्दों में कहने लगे!

कृष्ण पराजित न हुए! अर्जुन का संदेह पराजित हुआ, कृष्ण की करुणा पराजित न हुई। अर्जुन का अज्ञान पराजित हुआ, ज्ञान कृष्ण का पराजित न हुआ।

महान आश्चर्य होता है और मैं बारंबार हर्षित होता हूं।



संजय कुछ कह नहीं पा रहा; बार—बार कहता है, बस हर्षित हो रहा हूं। एक गीत बज रहा है भीतर। नाचने का मन हो रहा है। और उसे कुछ भी नहीं हुआ है। वह दूर खड़ा दर्शक है।

धन्यभागी हैं वे भी, जो धर्म के दर्शक बन जाएं। धन्यभागी हैं वे भी, जो मंदिर के पास से गुजर जाएं और जिनके कानों में मंदिर की घंटियों का नाद भी पड़ जाए! क्योंकि वह भी हर्षित करेगा।

हे राजन, विशेष क्या कहूं! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान हैं और जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर विजय है, श्री है, विभूति है, अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।

और वह यह कह रहा है कि माना कि आपके पुत्र विपरीत खड़े हैं और आपका पिता का हृदय चाहेगा कि वे जीत जाएं, लेकिन यह असंभव है। क्योंकि जहां कृष्ण भगवान हैं और जहां महात्मा अर्जुन है, वहीं होगी नीति, वहीं होगा सत्य, वहीं होगी श्री, वहीं होगी संपदा, वहीं आएगी विजय। सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं।

तो संजय कहता है, माना, आपके पिता के हृदय को मैं समझता हूं कि आप चाहेंगे कि आपके बेटे जीत जाएं, लेकिन यह हो नहीं सकता। यह असंभव है। सत्य ही जीतेगा। सत्य ही जीतना भी चाहिए।

विषाद से शुरू होने वाली यह गीता, सत्य की विजय पर पूरी हो जाती है। विषाद में तुम हो। गीता के इशारे तुम्हारे काम पड़ जाएं, तो सत्य की विजय—यात्रा तुम्हारी भी पूरी हो सकती है।

कोई भी कारण नहीं है, जो अर्जुन को हुआ, वह सभी को हो सकता है। कोई भी बाधा नहीं है। जितनी बाधाएं अर्जुन को थीं, उससे ज्यादा तुमको नहीं हैं। जितना अज्ञान अर्जुन का था, उससे ज्यादा तुम्हारा नहीं है।

इसलिए अगर तुम राजी हो, जैसा अर्जुन राजी था, संदेह के बावजूद भी राजी था; संदेह के बावजूद भी कृष्ण के साथ चलने को राजी था; संदेह के बावजूद भी खोजने की उत्सुकता थी, तो पहुंच गया मंजिल पर। प्रत्येक व्यक्ति पहुंच सकता है। परमात्मा प्रत्येक व्यक्ति के भीतर की स्वभाव—सिद्ध संभावना है।


गीता के ये सारे वचन हजार—हजार बार मैंने दोहराकर तुमसे कहे, इस आशा में ही कि किसी क्षण में, किसी मनोभाव की दशा में चोट पड़ जाएगी, तीर लग जाएगा।

तीर लगा हो, तो उसे सम्हालना। उसकी पीड़ा अमृतदायी है। उस पीड़ा को सींचना। संसार में मिला सुख भी असार है। परमात्मा के मार्ग पर मिला दुख भी अहोभाग्य है।

उसे पाने में कितनी ही कठिनाई हो, जिस दिन तुम पाओगे, उस दिन जानोगे, कठिनाई कुछ भी न थी। क्योंकि जो मिलेगा, वह अमूल्य है। तुम किसी भी मूल्य से उसे कूत नहीं सकते। जब तक नहीं मिला है, तब तक भला लगे किं बड़ी कठिनाई है; जिस दिन मिलेगा, उस दिन तुम भी कहोगे, तेरे प्रसाद से!

गीता समाप्त हो जाती है, लेकिन तुम्हारी यात्रा शुरू होती है! और सम्हलकर चले, होशपूर्वक चले, तो एक दिन जरूर वह अहोभाग्य की घड़ी आएगी, जब तुम्हारी स्मृति जगेगी; तुम्हें अपना स्मरण आएगा; भूला विस्मरण, भूला—बिसरा अपना स्वरूप याद आएगा; तुम्हारी प्रज्ञा थिर होगी!

और उसी दिन इस जगत के सारे रहस्य तुम्हारे लिए खुल जाएंगे! तुम फिर याद कर—करके ही आनंदित होओगे, आह्लादित होओगे! फिर तुम्हारा रोआं —रोआं पुलकित होगा! तुम्हारी धड़कन— धड़कन स्वर्ग के सुख से भर जाएगी!

जब तक तुम्हें स्मरण नहीं आया अपना, तब तक दुख है, तब तक महा अंधकारपूर्ण रात्रि है जीवन, अमावस है। जैसे ही स्मरण आया, फिर कोई रात्रि होती ही नहीं। फिर दिवस ही दिवस है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 18 भाग 20

मनन और निदिध्‍यासन


कच्चिदेतव्छ्रुतं पार्थ त्‍वयैकाग्रेण चेतसा।

कच्चिमानसंमोह: मनष्टस्ते धनंजय।। 72।।


अर्जन उवाच:

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्‍धा त्‍वत्ससादान्मयाव्युत।

स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्‍ये वचनं तव।। 73।।


इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, हे पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?

इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पाल करूंगा।

इस प्रकार गीता का माहात्म्‍य कहकर भगवान कृष्ण ने अर्जुन से पूछा, हे पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?

पूछने को ही पूछ रहे हैं। जांच के लिए पूछ रहे हैं। इसलिए पूछ रहे हैं कि अर्जुन को खबर मिली या नहीं! जो हुआ है, उसकी खबर कृष्ण को तो मिल गई है।

कृष्ण को पता तो चल गया है, इसीलिए माहात्म्य कहा है। नहीं तो माहात्म्य कहने की कोई जरूरत न थी। अब तक नहीं कहा; अठारह अध्याय बीत गए। अचानक माहात्म्य कहा है। अचानक यह बताया कि कौन पात्र है, किसको कहना। अचानक यह कहा है कि कहने का कितना मूल्य है। बिन कहे मत रह जाना।

पता चल गया है, लेकिन पूछते हैं माहात्म्य कहकर, हे पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? तूने सुना, क्या कहा मैंने? ले समझा, क्या कहा मैंने? तू जागा? तूने देखा, कौन हूं मैं? और हे धनंजय, क्या तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?

वे यह कह रहे हैं, अब भीतर जरा टटोलकर देख, कहां है तेरा मोह? कहा हैं वे बातें तेरे भीतर कि ये मेरे अपने प्रियजन खड़े हैं, इनको मैं कैसे काटू? अब जरा पीछे मुड़, खोज। कहां गए वे प्रश्न, संदेह—शंकाएं? वे सारी चित्त की विचलित दशाएं कहां हैं अब? तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?

भगवान के ऐसा पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍यूत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पालन करूंगा।

एक—एक शब्‍द बहुमूल्‍य है। सारी गीता की चेष्‍टा इन थोड़े—से शब्दों के लिए थी कि अर्जुन के भीतर ये थोड़े—से शब्द प्रकट हो सकें। यह कृष्ण का पूरा आयोजन, इतनी—इतनी बार अर्जुन को समझाना, बार—बार अर्जुन का छिटक—छिटक जाना, कृष्ण का फिर—फिर उठाना, यह इन थोड़े—से शब्दों को सुनने के लिए था।

सारे गुरुओं की चेष्टाएं शिष्य से इन थोड़े—से शब्दों को सुनने के लिए हैं, कि किसी दिन वह घड़ी आएगी सौभाग्य की और शिष्य का हृदय अहोभाव से भरकर कहेगा, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे स्मृति प्राप्त हुई, संशयरहित हुआ मैं स्थित हूं और आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा है।

हे अच्‍यूत.....।

अच्‍यूत का अर्थ होता है, जो कभी डिगाया न जा सके। अर्जुन ने बहुत डिगाने की कोशिश की कृष्ण को। कितने संदेह उठाए! कितने प्रश्न पूछे! कोई भी थक जाता। कोई भी कहता कि बस, बहुत हुआ। अब मेरा सिर मत खा। लेकिन बार—बार कृष्ण फिर अनुकंपा से भरे अपना हाथ बढ़ा देते हैं।

तो अर्जुन कहता है, हे अच्‍यूत, तुम जो कि डिगाए नहीं जा सके।

और वही गुरु तो तुम्हें थिर कर सकेगा, जिसे तुम डिगा न सको। जो गुरु तुम से डिग जाए, वह तुम्हें कैसे अनडिगा बना सकेगा? वह तो असंभव है।

कृष्ण न तो नाराज हुए, न परेशान हुए, न चिंतित हुए, न निराश हुए। जरा भी डिगे नहीं।

तो अर्जुन कहता है, हे अच्‍यूत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ। तुम्हारे प्रसाद से....।

यह बहुत बहुमूल्य बात है। वह सीधा भी कह सकता था, मेरा मोह नष्ट हुआ। लेकिन तब भूल हो जाती। तब गीता अभी समाप्त नहीं हो सकती थी। यात्रा और चलती।

अगर वह कहता, मेरा मोह नष्ट हुआ, तो मेरा अभी भी महत्वपूर्ण था। मोह नष्ट हो गया, इसको भी वह मेरे का ही आभूषण बना लेता। अभी भी वह अकड़ से कहता, मेरा मोह नष्ट हुआ। तो कृष्ण को फिर चेष्टा करनी पड़ती।

नहीं; पहली बार उसने कहा है, आपके प्रसाद से मेरा मोह नष्ट हुआ। मेरे प्रयास से नहीं, तुम्हारे अनुग्रह से। तुम बरसे मेरे ऊपर—अकारण। मेरी कोई पात्रता न थी; मेरा कोई पुण्य का उदय भी न था। मैं खो जाता अंधकार में, तो शिकायत करने का कोई उपाय न था। लेकिन तुम बरसे, तुम औघड़दानी, तुमने बिना मेरी पात्रता की फिक्र किए मेरे ऊपर खूब बरसा की, खूब अमृत बरसाया। तुम्हारे प्रसाद से मेरा मोह नष्ट हुआ।

जब भी मैं नष्ट होता है, तो वह परमात्मा के प्रसाद से नष्ट होता है। अगर तुम यह कहो कि मेरे ही प्रयास से नष्ट हुआ, मेरी साधना से, मेरे तप से, तो वह अभी नष्ट हुआ ही नहीं। अभी तपस्वी के भीतर तप में तपा हुआ अहंकार खड़ा ही रहेगा। यह खतरनाक अहंकार है। यह पवित्र अहंकार है। यह साधारण आदमी के अहंकार से भी ज्यादा उपद्रव से भरा हुआ रोग है। 

साधारण आदमी का अहंकार तो रोगग्रस्त है, अपवित्र है। उसे भी लगता है कि यह बीमारी जैसा है, छोड़ना है। नहीं छूटता, मजबूरी है। पर छोड़ने की आकांक्षा है।

पवित्र अहंकार वह साधु पुरुषों को उपलब्ध होता है। तप किया, ध्यान किया, धारणा की, समाधि को पाया, चेष्टा से उत्पन्न हुआ, श्रम से पाया, अपने ही प्रयास से पाया, तो बड़ा सघन और सूक्ष्म अहंकार निर्मित होता है।

अगर कृष्ण जरा—सा शब्दों में फर्क पाते, अगर अर्जुन जरा बदलकर बात कहता, जमीन— आसमान का अंतर हो जाता। अगर उसने इतना ही कहा होता, मेरा मोह नष्ट हो गया, तो अभी और चेष्टा करनी जरूरी थी। अभी मोह भला नष्ट हो गया हो, लेकिन अब इस नष्ट हुए मोह ने एक और नया अहंकार खड़ा कर दिया, कि मेरा मोह नष्ट हो गया।

आपकी कृपा से, तुम्हारे प्रसाद से मेरा मोह नष्ट हो गया हे अच्‍यूत, और मुझे मेरी स्मृति प्राप्त हुई।

वह यह नहीं कहता कि मुझे कुछ नया मिल गया। जो मिला है, वह केवल स्मृति है, वह स्मरण है। जो मिला है, वह केवल याददाश्त है। जिसे मैं भूल गया था, जो मेरे भीतर था और जिसकी तरफ मेरी नजर न रही थी, तुमने मेरी दृष्टि को फेर दिया। तुमने मुझे याद दिला दी। तुमने मुझे मुझसे ही मुलाकात करवा दी, मुझे मुझसे ही मिला दिया।

पर तुम्हारे प्रसाद से हुआ है। अपने हाथ से तो मैं कभी भी यहां न पहुंच पाता। शायद जितनी मैं चेष्टा करता, उतनी ही स्मृति मुश्किल होती चली जाती।

 अर्जुन कहता है, मुझे स्मृति प्राप्त हुई। अब मैं पहचान गया अपने को। अब मुझे याद आ गई मेरे होने की। अपने ही अस्तित्व से मुलाकात हो गई। अब मैं अपने आमने—सामने खड़ा हूं।

और इसलिए अब मैं संशयरहित स्थित हूं......।

जिस दिन भी तुम्हें स्मरण आ जाता है कि तुम कौन हो, उसी क्षण सब संशय गिर जाते हैं। विस्मरण की अंधेरी रात में ही संशयों की बाढ़ उपजती है। स्मरण के प्रकाश में सब संशय ऐसे ही खो जाते हैं, जैसे दीया जल जाए, तो अंधेरा खो जाता है। सुबह सूरज उग आए, तो रात विदा हो जाती है, रात के तारे विदा हो जाते हैं। संशयरहित हुआ स्थित हूं..।

और अब मुझे कुछ करना नहीं पड़ रहा है स्थिर होने के लिए। अचानक मैं पाता हूं हे अच्युत, कि स्मृति क्या आ गई, मैं स्थित हो गया हूं। मेरी प्रज्ञा ठहर गई। अब दीए की लौ हिलता नहीं। तूफान आएं, आंधिया उठें, मेरे भीतर कोई कंपन नहीं हो रहा है। स्थित हुआ मैं अपने भीतर ठहर गया हूं।

यह गीता का लक्ष्य है, स्थितप्रज्ञ की अवस्था। जब चेतना थिर हो जाए; जैसे कोई दीए की लौ हो, और हवा के झोंके उसे कंपान सकें; थिर रहे, अकंप, निष्कंप।

और अब आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा करता हूं।

अब तक वह कहता था, मैं ऐसा करना चाहता हूं वैसा करना चाहता हूं। ये मेरे प्रियजन हैं, इन्हें मैं मारना नहीं चाहता। मैं त्याग करना चाहता हूं। मैं संन्यास लेना चाहता हूं। पहली बार उसने कहा कि अब मैं थिर हुआ; स्मृति मुझे आ गई, अच्‍यूत; अब तुम्हारी आज्ञा। अब तुम्हारी मर्जी। अब तुम जो कहो। अब मुझे रत्तीभर भी प्रश्न नहीं है। तुम जो कहोगे, वह ठीक है या गलत, यह सवाल नहीं है। अब तुम जो कहोगे, वह ठीक ही है।


यह थोड़ा समझ लेने जैसा है। जब तक ऐसी दशा न आ जाए तब तक गुरु से मिलन नहीं। जब तुम ऐसा न कह सको कि अब तुम जो कहोगे, वही ठीक है; अब ठीक और गलत का कोई मापदंड तुम पर हम् लगा न करेंगे, अब तुम्हारा कहना ठीक, तुम्हारा न कहना गलत। तुम जो न कहो, वह गलत, तुम जो कहो, वह ठीक। तुम जो छोड़ दो, वह गलत, तुम जो इशारा करो, वह सही। अब तुम्हारा होना पर्याप्त है।

पर यह तभी होता है, जब स्वयं का स्मरण आ जाए। स्वयं की पहचान के साथ ही गुरु के भीतर की पहचान भी होती है।

अभी तक कृष्ण सखा थे, साथी थे, सारथी थे, हितेच्छु थे, मंगलकामी थे। मित्र थे और कल्याण चाहते थे। इस क्षण गुरु हुए।

इस घड़ी आकर अर्जुन शिष्य हो गया, इस घड़ी आकर रथ ही अर्जुन ने कृष्ण के हाथों में नहीं छोड़ा, अपने को भी छोड़ दिया, कि अब तुम मेरे भी सारथी हो गए। तुम मेरे घोड़ों को ही मत सम्हालो, अब मुझे भी सम्हालो। अब तुम मेरे रथ की ही लगाम मत पकडो, मेरी लगाम भी पकड़ लो।

अब मैं थिर हुआ। स्मरण को उपलब्ध हुआ। तुम्हें पहचान पाता हूं। तुम्हारी महिमा को देख पाता हूं तुम कौन हो। यह अपने को पहचानकर मैं तुम्हें भी पहचान गया हूं। अब मुझे कोई संशय नहीं है। अब तुम्हारी आज्ञा की प्रतीक्षा है।

जिस दिन शिष्य आज्ञा की प्रतीक्षा करता है, समर्पण हो गया। शिष्य उसी दिन शिष्य बनता है, और उसी दिन उसे गुरु में परमात्मा के दर्शन होते हैं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 18 भाग 19

 गीता—ज्ञान—यज्ञ

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट स्‍यामिति मे मति:।। 70।।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादीय यो नर:।

सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राम्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।। 71।।


तथा हे अर्जुन, जो पुरूष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद— रूप गीता को पढ़ेगा अर्थात नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान— यज्ञ से पूजित होऊंगा, ऐसा मेरा मत है।

तथा जो पुरूष श्रद्धायुक्त और दोष— दृष्टि से रहित हुआ इस गीता का श्रवण— मात्र भी करेगा, वह भी पापों से मुक्‍त हुआ पुण्य करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा।


तथा हे अर्जुन, जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद—रूप गीता को पढ़ेगा अर्थात नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान—यज्ञ से पूजित होऊंगा, ऐसा मेरा मत है।

हे अर्जुन, जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद—रूप गीता को पढेगा.....।

जिस संवाद की मैंने बात कही, वही कृष्ण कह रहे हैं, इस धर्ममय हम दोनों के संवाद—रूप....।

एक तो विवाद है, जहां जो भी तुमसे कहा जाता है, तुम उसके विपरीत सोचते हो। एक संवाद है, जहां तुमसे जो भी कहा जाता है, तुम उसके अनुकूल सोचते हो, सामंजस्य का अनुभव करते हो। तुम्हारा हृदय उसके साथ—साथ धड़कता है, विपरीत नहीं। एक गहन सहयोग होता है।

तो कृष्ण कहते हैं, इस धर्ममय हम दोनों के संवाद—रूप गीता को जो भी पढेगा...।

एक संवाद घटित हुआ है, एक अनूठी घटना घटी है। दो व्यक्तियों ने एक—दूसरे को अपने में उंडेला है, एक—दूसरे में डूबे हैं। इस अनूठी घटना को कृष्ण धर्ममय कहते हैं। यही धर्म की घटना है, जहां दो चेतनाएं इतने अपूर्व रूप से एक—दूसरे में डूब जाती हैं कि कोई अस्मिता और अहंकार की घोषणा नहीं रह जाती कि हम अलग— अलग हैं; अपनी कोई सुरक्षा की आकांक्षा नहीं रह जाती। बूंद जैसे सागर में डूब जाए, सरिता जैसे सागर में कूद जाए!

इस धर्ममय हम दोनों के संवाद—रूप गीता को जो पढेगा, नित्य पाठ करेगा…..।





नित्य पाठ एक अनूठी बात है, जो पूरब में ही विकसित हुई। पश्चिम में नित्य पाठ जैसी कोई चीज नहीं है। पश्चिम में लोग किताबें पढ़ते हैं, पाठ नहीं करते। किताब पढ़ने का अर्थ है, पढ़ ली एक बार, खतम हो गई बात; अब उसे दुबारा क्या पढ़ना? जो पढ़ ही ली, उसे दुबारा क्या पढ़ना? एक फिल्म एक बार देख ली, बात खतम हो गई, दुबारा क्या देखने को बचता है? एक उपन्यास एक बार पढ़ लिया, बात खतम हो गई। फिर दुबारा उसे वही पढेगा, जो मंदबुद्धि हो, जिसकी अकल में कुछ भी न आया हो। दुबारा कोई क्यों पढेगा?

लेकिन पाठ का अर्थ है, करोड़ों बार पढ़ना, रोज पढ़ना, जीवनभर पढ़ना।

नित्य पाठ का क्या अर्थ है फिर? यह साधारण पढ़ना नहीं है। नित्य पाठ का अर्थ है, धर्म के वचन ऐसे वचन हैं कि तुम एक बार उन्हें पढ़ लो, तो यह मत समझना कि तुमने पढ़ लिया। उनमें पर्त दर पर्त अर्थ हैं। उनमें गहरे—गहरे अर्थ हैं। तुम जैसे—जैसे गहरे उतरोगे, वैसे—वैसे नए अर्थ प्रकट होंगे। जैसे—जैसे तुम उनमें प्रवेश करोगे, वैसे—वैसे पाओगे, और नए द्वार खुलते जाते हैं।
गीता को तुम जितनी बार पढ़ोगे, उतने ही अर्थ हो जाएंगे। बहुआयामी है प्रत्येक शब्द धर्म का। और तुम्हारी जितनी प्रज्ञा विकसित होगी, उतनी ही ज्यादा तुम्हें अर्थ की अभिव्यंजना होने लगेगी। कृष्ण का ठीक—ठीक अर्थ जानते—जानते तो तुम कृष्ण ही हो जाओगे, तभी जान पाओगे, उसके पहले न जान पाओगे।
ऐसा समझो कि जब तुम गीता शुरू करोगे, तो तुम ऐसे पढ़ोगे, जैसा अर्जुन है, और जब गीता पूरी होगी, तो तुम ऐसे पढ़ोगे, जैसे कृष्ण हैं। और बीच में हजारों सीढ़ियां होंगी।

बहुत बार, बहुत बार तुम्हें लगेगा, इतनी बार पढने के बाद भी यह अर्थ इसके पहले क्यों नहीं दिखाई पड़ा? यह शब्द कितनी बार मैं पढ़ गया हूं लेकिन इस शब्द ने कभी ऐसी धुन नहीं बजाई मेरे भीतर! आज क्या हुआ?

आज भाव—दशा और थी। आज तुम्हारा चित्त शांत था, तुम आनंदित थे, तुम प्रफुल्लित थे, तुम थोड़े ज्यादा मौन थे, नया अर्थ प्रकट हो गया। कल तुम परेशान थे, मन उपद्रव से भरा था, यही शब्द तुम्हारी आंख के सामने से गुजरा था, लेकिन हृदय पर इसका कोई अंकुरण नहीं हुआ था, कोई छाप नहीं छोड़ सका था, कोई संस्कार नहीं बना सका था।

ऐसे बहुत—बहुत भाव—दशाओं में, बहुत—बहुत चेतना की स्थितियों में तुम गीता का पाठ करते रहना, बहुत—बहुत तरफ से गीता को देखते रहना, तुम्हें नए—नए अर्थ मिलते चले जाएंगे।
हम धर्मग्रंथ उसी को कहते हैं, जो पढ़ने से न पढ़ा जा सके, जो केवल पाठ से पढ़ा जा सके। इसलिए हर किताब का पाठ नहीं किया जाता, सिर्फ धर्मग्रंथ का पाठ किया जाता है।

असल में जिसका पाठ किया जा सकता है, वही धर्मग्रंथ है। जिसमें रोज—रोज नए—नए अर्थ की कलमें लगती जाएं, नए फूल खिलते जाएं; तुम हैरान ही हो जाओ कि तुम जितने भीतर जाते हो, और नए रहस्य खुलते चले जाते हैं, इनका कोई अंत नहीं मालूम होता, तभी तुम धर्मग्रंथ पढ़ रहे हो। इसे तुम्हें रोज ही पढ़ना होगा। यह तुम्हें तब तक पढ़ना होगा, जब तक कि आखिरी अर्थ प्रकट न हो जाए, जब तक कि कृष्ण का अर्थ प्रकट न हो जाए।
जैसे हम प्याज को छीलते हैं, ऐसे गीता को रोज छीलते चले जाना। एक पर्त उघाड़ोगे, नयी ताजी पर्त प्रकट होगी। वह पहले से ज्यादा ताजी होगी, नयी होगी, गहरी होगी। उसे भी उघाड़ोगे, और भी नयी पर्त मिलेगी। ऐसे उघाडते जाओगे, उघाडते जाओगे, एक दिन सब पर्तें खो जाएंगी, भीतर का शून्य प्रकट होगा।

वही शून्य कृष्ण का अर्थ है। उस शून्य में ही समर्पण हो जाता है, उस शून्य में ही कोई डूब जाता है।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद—रूप गीता को पढेगा, नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान—यज्ञ से सुसज्जित होऊंगा, ऐसा मेरा मत है।

उसे कोई और यज्ञ करने की जरूरत नहीं, उसने रोज ज्ञान—यज्ञ कर लिया। जितनी बार उसने मेरे शब्दों को, तुझसे कहे शब्दों को अर्जुन, बड़े प्रेम और श्रद्धा और आस्था से पढ़ा; और जितनी बार इस गीत का उसके भीतर भी थोड़ा— थोड़ा उदय हुआ; वह भी नाचा और डोला और मतवाला हुआ; उसने भी यह शराब पी, जो हम दोनों के बीच घटी है, वह भी इसी मस्ती में मस्त हुआ, जिसमें हम दोनों डोलते गए हैं और डूबते गए हैं, उतनी ही बार उसने ज्ञान—यज्ञ किया, ऐसा मेरा मत है। उसे किसी और यज्ञ की कोई जरूरत भी नहीं है।

तथा जो पुरुष श्रद्धायुक्त और दोष—दृष्टि से रहित इस गीता का श्रवण—मात्र भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त हुआ पुण्य कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा।

और जो पुरुष श्रद्धायुक्त।

बड़े प्रीतिभाव से, अनन्य श्रद्धा से। संदेह की एक रेखा भी न उठती हो।

दोष—दृष्टि से रहित.....।

दोष न खोजने को तैयार हो। क्योंकि दोष जो खोजने को तैयार है, उसे मिल ही जाएंगे। लेकिन इन दोषों के मिल जाने से किसी और की कोई हानि नहीं है, उसकी ही हानि है। तुम अगर गुलाब के पौधे के पास जाओगे और कांटे ही खोजना चाहते हो, तो मिल ही जाएंगे। वे वहां हैं, काफी हैं। मगर इससे सिर्फ तुम्हारी हानि हुई। जो गुलाब के फूल का दर्शन हो सकता था, और जो दर्शन तुम्हारे जीवन को रूपांतरित कर देता, उससे तुम वंचित हो गए।

जो दोष—दृष्टि से रहित, श्रद्धाभाव से......।

कांटों को नहीं गिनेगा जो, फूलों को छुएगा जो, फूलों की गंध को अपने भीतर ले जाएगा। अपने द्वार खोलेगा। भयभीत नहीं, संदिग्ध नहीं, असंशय, आस्था से भरा हुआ।

वह श्रवण—मात्र से भी...!

क्योंकि ऐसी घड़ी में, ऐसी भाव—दशा में श्रवण भी काफी है। ऐसा सुन लिया, तो सुनने से भी पार हो जाता है। क्योंकि ऐसा सुना हुआ तीर की तरह प्राणों के प्राण तक उतर जाता है।
श्रवण—मात्र भी करेगा, वह पापों से मुक्त हुआ पुण्य कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त हो जाएगा।

मात्र श्रवण से भी!

बुद्ध ने बड़ा जोर दिया है, सम्यक श्रवण। महावीर ने कहा है कि मेरा एक घाट श्रावक का है। जिसने ठीक से सुन लिया, वह भी नाव पर सवार हो गया, वह भी उस पार पहुंच जाएगा। कृष्णमूर्ति राइट लिसनिंग पर रोज—रोज समझाते हैं, ठीक से सुन लो।
जानने का अर्थ सिर्फ ठीक से सुन लेना है। लेकिन ठीक से सुन लेना बड़ी मुश्किल से घटता है। क्योंकि हजार बाधाएं हैं, आलोचक की दृष्टि है, दोष देखने का भाव है, निंदा का रस है। उसमें तुम काटो में उलझ जाते हो।

कांटे हैं। मेरे पास तुम सुन रहे हो; अगर दोष देखने की दृष्टि हो, दोष मिल जाएंगे। इस पृथ्वी पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जहां कांटे न हों। क्योंकि कांटे फूलों की रक्षा के लिए हैं। कांटे फूलों के दुश्मन नहीं हैं, विपरीत भी नहीं हैं। वे फूलों की रक्षा के लिए हैं; वे फूलों के पहरेदार हैं; उनके बिना फूल नहीं हो सकते। और जितना सुगंधयुक्त गुलाब होगा, उतने ही बड़े काटे होंगे। जितना बड़ा गुलाब का फूल होगा, उतने ही बड़े काटे होंगे। वे रक्षा कर रहे हैं। तो तुम्हें कीटों से उलझने की कोई जरूरत नहीं है। कांटे हैं; तुम फूल को देखो।

और एक मजे की बात है। अगर तुमने फूल को ठीक से देखा, जीया, अपने भीतर जाने दिया, तो तुम एक दिन पाओगे कि सब कांटे फूल हो गए। तुम्हारी दृष्टि फूल की हो गयी, अब तुम्हें कांटे दिखायी ही नहीं पड़ते। और अगर तुमने कांटों को ही गिना और उनको ही चुभा—चुभाकर देखा, घाव बनाए, तो तुम फूल से भी डर जाओगे; फूल से भी ऐसे डरोगे, जैसे फूल भी कांटा है। एक दिन तुम पाओगे, फूल बचे ही नहीं तुम्हारे लिए, कांटे ही कांटे हो गए। तुम्हारी दृष्टि ही अंततः तुम्हारा जीवन बन जाती है।

तो जिसने श्रद्धा से, प्रेम से, अहोभाव से, दोष—दृष्टि से नहीं, सत्य की आकांक्षा—अभीप्सा से मात्र सुना भी, वह भी मुक्त हो जाता है।

इससे बड़ी भूल पैदा हुई। कृष्ण के इन वचनों से वही हुआ जिसका डर था। लोगों ने समझा, तो फिर ठीक है, गीता सुन लेने से सब हो जाता है। मगर वे भूल गए कि शर्तें हैं. श्रद्धायुक्त, दोष—दृष्टि से रहित......।

इसका मतलब यह नहीं कि सोए—सोए सुन लेना। सोए रहोगे, न संदेह उठेगा, न दोष—दृष्टि होगी; आंख बंद किए झपकी लेते रहना। धार्मिक सभाओं में लोग सोए रहते हैं। इसका मतलब सोए—सोए सुनना नहीं है, इसका मतलब है, बहुत जागरूक होकर सुनना, ताकि दोष—दृष्टि प्रविष्ट न हो जाए। दोष—दृष्टि नींद का हिस्सा है, मूर्च्छा का हिस्सा है।

बहुत अनन्य जागरूक, चैतन्य होकर सुनना, ताकि श्रद्धा का आविर्भाव हो जाए। तो ही सुनने से भी कोई पार हो जाता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 18भाग 18

 आध्‍यात्‍मिक संप्रेषण संप्रेषण की गोपनीयता


हदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्‍यसूयीत।। 67।।

य इमं परमं गुह्मं मद्भक्तेम्बीभधास्यति।

भक्‍ति मयि परां कृत्या मामैवैष्यत्यसंशय:।। 68।।

न च तस्मान्मनुष्येधु कीश्चन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।। 69।।


हे अर्जुन, इस प्रकार तेरे हित के लिए कहे हुए इस गीतारूप परम रहस्य को किसी काल में भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिए और न भक्तिरहीत के प्रति तथा न बिना सुनने की इच्छा वाले के प्रति ही कहना चाहिए; एवं जो मेरी निंदा करता है उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए।

 जो पुरुष मेरे में परम प्रेम करके इस परम गुह्म रहस्य गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।

और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है, और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी में दूसरा कोई होवेगा।


हे अर्जुन, इस प्रकार तेरे हित के लिए कहे हुए इस गीतारूप परम रहस्य को किसी काल में भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिए और न भक्तिरहित के प्रति तथा न बिना सुनने की इच्छा वाले के प्रति ही कहना चाहिए; एवं जो मेरी निंदा करे, उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए।

समझने की कोशिश करो।

इस प्रकार तेरे हित के लिए कहे हुए इस गीतारूप परम रहस्य को......।

यह अत्यंत गुह्य और गोपनीय है। इससे जीवन के आत्यंतिक द्वार खुलते हैं। यह कुंजी बहुत बहुमूल्य है। यह हर किसी को मत दे देना। ये मोती हैं, ये पारखियों को देना। ये हीरे हैं, ये जौहरियों को देना।

तो कृष्ण कहते हैं

  इस परम रहस्य को भी किसी भी काल में तपरहित मनुष्य के प्रति नहीं कहना चाहिए.......।

तपस्वी कौन है? तपस्वी का अर्थ है, जिसने सत्य को पाने के लिए अथक चेष्टा की, अपने को जलाया, तपाया। जो कुतूहलवश नहीं आ गया है सत्य को पूछने। जिसने सत्य को अपने को समर्पित किया है, जो सत्य के लिए मिटने को तैयार है। अगर जीवन की भी आहुति देनी पड़े, तो वह तैयार है। वह एक हाथ में अपने जीवन को लेकर आया है, यह रहा जीवन, सत्य मुझे मिल जाए, तो मैं जीवन देने को तैयार हूं।

तपस्वी का अर्थ है, जो सत्य को जीवन के ऊपर रखता है। जो कहता है, जीवन चला जाए, हर्जा नहीं; सत्य खरीद लेना है। जीवन दो कौड़ी का है जिसके लिए सत्य के मुकाबले।
भोगी का अर्थ है, जो जीवन को किसी भी हालत में खोने को तैयार नहीं है। जिसके लिए जीवन से ऊपर कुछ भी नहीं है। त्यागी का अर्थ है, जिसके लिए जीवन से भी ऊपर कुछ है। जो जीवन को भी कुछ पाने के लिए साधन बना लेता है।

तो तपस्वी को कहना चाहिए। कुतूहलवश कोई आया हो, उसको नहीं; जिज्ञासा मात्र से कोई आया हो, उसको नहीं। मुमुक्षा से आया हो! जो अपने जीवन को मोक्ष बनाने के लिए तत्पर हो। जो कहता हो, जान भी देनी पड़े, तो यह रही गरदन।

तपरहित मनुष्य के प्रति नहीं कहना, न भक्तिरहित के प्रति कहना।

क्योंकि जो भक्ति ही न हो, तो गोपनीय बात नहीं कही जा सकती। अत्यंत निकटता चाहिए।

पुराना शब्द है कि जब गुरु मंत्र देता है शिष्य को, तो हम कहते हैं, कान फूंकता है। उसका मतलब क्या है? उसका मतलब है, इतनी गुप्त है बात कि कान में ही कहता है। कोई और सुन न ले! वह गुफ्तगू है; वह बड़ी हृदय से हृदय में कही गई है बात। कान फूंकना तो प्रतीक है।

कान फूंकना प्रतीक है, उसका अर्थ है, कानों—कान कहना। कोई दूसरे के कान में न पड़ जाए। अत्यंत निकटता में कहना, सामीप्य में कहना।

जिसकी मुमुक्षा है, वह ही यहां तक पहुंच पाएगा। जिसका प्रेम है, वह सब सहकर यहां तक पहुंच जाएगा।

प्रेम कोई बाधाएं नहीं मानता। प्रेम कोई सीमाएं नहीं मानता। प्रेम बड़ी से बड़ी दीवालें लांघ जाता है।

तो कृष्ण कहते हैं, भक्तिरहित के प्रति मत कहना......।

क्योंकि तुम तो कह दोगे, लेकिन जिसने भक्ति से सुना ही नहीं, वह समझेगा ही नहीं। तो क्यों अपनी श्वास खराब करनी! और डर यह है कि अगर वह बुद्धि से समझेगा। क्योंकि दो ही जगह हैं समझने की, या तो हृदय या बुद्धि। अगर भक्ति है, तो हृदय से समझेगा। वही समझने का ठीक केंद्र है। अगर भक्ति नहीं है, तो बुद्धि से समझेगा। वह तुमने जो कहा है, उसका तर्क बनाएगा, शास्त्र बनाएगा, सिद्धात बनाएगा, उसमें वह भटक जाएगा।

बुद्धि का तो जंगल है, वहा कोई खुले स्थान नहीं हैं। हृदय का खुला आकाश है। हृदय में कोई कभी भटका नहीं, बुद्धि में लोग सदा भटके हैं।

तो बुद्धि वाला आदमी तो वैसे ही भटका है, उसको और यह गोपनीय बात कहकर और न भटका देना, और उसका जंगल बड़ा मत कर देना। वह वैसे ही उलझा है।

और न बिना सुनने की इच्छा वाले के प्रति ही कहना।

और जो सुनने को इच्छुक ही न हो, आतुर न हो, अभीप्‍सु न हो, उससे मत कहना। उसके तो कान पर भी न पहुंचेगा। और खतरा एक है कि जब सुनने की इच्छा न हो, तब अगर कोई कुछ कह दे, तो ऊब पैदा होती है। और उस ऊब के कारण वह सदा के लिए अनुत्सुक हो जाएगा।

बहुत बच्चे धर्म से इसीलिए अनुत्सुक हो जाते हैं। जब उनकी तैयारी नहीं होती सुनने की, तब मां—बाप उनको गीता सुना रहे हैं! मंदिर ले जा रहे हैं! वे घसिटे जा रहे हैं। उनको फिल्म जाना है, पिक्चर देखना है। बाजार में मदारी आया है। और ये कहां के कृष्ण और गीता को लगाए हुए हैं!

और जो मेरी निंदा करता हो, उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए। 
क्योंकि जहां मन निंदा से भरा हो, विरोध से भरा हो, वहा तुम कुछ भी कहो, अनर्थ होगा। तुम जो भी कहोगे, उससे उलटा अर्थ निकाला जाएगा। जब निंदा भीतर हो, तो तुम अपनी निंदा को हर चीज पर टांग दोगे। तुम्हारी निंदा तुम्हारी आंखों पर छाई होगी। तुम उसी के माध्यम से देखोगे। हर चीज निंदा के ही रंग में रंग जाएगी। कोई जरूरत नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है।

क्योंकि जो पुरुष मेरे में परम प्रेम करके इस परम गुह्य रहस्य को, गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा। और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी पर दूसरा कोई होवेगा।


भगवद्गीता भगवान का गीत है। अर्जुन के बहाने स्वर्ग की गंगा को पृथ्वी पर उतारा है। उस गंगा को उन्हीं के पास ले जाना, जिनके हृदय में स्वर्ग की गंगा की प्यास उठ गई है।

जो अभी इसी पृथ्वी के जल से तृप्त हैं, उन्हें व्यर्थ परेशान मत करना। अभी यही जल उनके लिए काफी है। एक दिन आएगा कि वे पाएंगे, इस जल से किसी की प्यास बुझती नहीं, तभी वे तलाश करेंगे उस जल की जो भगवान का है।

भगवद्गीता एक दिव्य गीत है। सभी न सुन पाएंगे। संगीत को, उस संगीत को सुनने के लिए बड़ी अहर्निश तैयारी चाहिए; बड़ा श्रद्धा— भाव से भरा मन चाहिए। नाचता, उत्सव करता हुआ, एक अहोभाव चाहिए, तभी उस गीत की कड़ियां सुनाई पड़ेगी। और तब वे गीत की कड़ियां साधारण न होंगी। वह गीत की कड़ियां भगवत्ता से भरी होंगी। उनका स्वाद इस पृथ्वी का नहीं है, उनका स्वाद परलोक का है।

उस स्वाद के लिए तैयार हो जाए कोई, तो कृष्ण कहते हैं, उससे जरूर कहना। और जो ऐसे प्यासे व्यक्ति को मेरा गीत पिला देता है, उससे ज्यादा प्यारा मेरा कोई भी नहीं है।

क्योंकि इसका अर्थ हुआ कि वह एक व्यक्ति को और भगवान में वापस बुला लेता है। इसका अर्थ हुआ कि एक हृदय को और उसने भगवत्ता में डुबा दिया। इसका अर्थ हुआ, एक बटोही भटका था, वह वापस लौट आया, उसे अपना घर मिल गया। इसका अर्थ हुआ, अस्तित्व का एक खंड शांत हुआ, आनंदित हुआ, निर्वाण को उपलब्ध हुआ, निस्संशय हुआ। यात्रा एक खंड की पूरी हुई। अस्तित्व का एक टुकड़ा स्वर्ग को, शांति को, महासुख को, सच्चिदानंद को उपलब्ध हुआ।

स्वभावत:, जो भगवान के गीत में लोगों को डुबा देता है, उससे ज्यादा प्यारा भगवान का और कौन होगा!

कृष्ण कहते हैं, वह मेरे भक्तों में मुझे परम प्रिय है। वह निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा। वह मेरे साथ एकरूप हो जाता है।

कृष्ण के गीत को गाते—गाते व्यक्ति कृष्ण हो जाता है। भगवद्गीता को सुनते—सुनते, कहते—कहते, अगर ताल—मेल बैठ जाए, अगर सुर बैठ जाए, साज बैठ जाए, तो व्यक्ति कृष्णमय हो जाता है।

लेकिन घृणा से भरा हो, निंदा से भरा हो, विरोध से भरा हो, तो यह नहीं हो पाएगा। उत्सुक न हो, अनुत्सुक हो, जबरदस्ती कहा जा रहा हो उसे, तो यह न होगा। अभी उसकी मुमुक्षा ही न हो, अभी वह धन चाहता हो, तुम धर्म की बात करते हो, तो तीर स्थान पर न लगेंगे। अभी वह पद चाहता हो, तुम परमात्मा की पुकार उठाते हो, उसे सिर्फ व्याघात मालूम होगा कि तुम व्यर्थ का उपद्रव कर रहे हो।

व्यक्ति की आकांक्षा के विपरीत उसे परमात्मा में भी वापस नहीं पहुंचाया जा सकता है। स्वतंत्रता परम है, आखिरी है। और प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही स्वतंत्रता से जीता है। हम सहारा दे सकते हैं। बुद्ध पुरुष इशारा कर सकते हैं, चलना तो प्रत्येक को ही पड़ता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 18 भाग 17

 समर्पण का राज-


सर्वगुह्मतमं भूय: श्रृणु मे परमं वचः।

हष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।। 64।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामैवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।। 65।।

सर्वधर्मान्परित्‍यज्य मामेकं शरणं ब्रज।

अहं त्वा सर्वपापेध्यो मीक्षयिष्यामि मा शुचः।। 66।।


इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण श्रीकृष्ण भगवान फिर बोले कि हे अर्जुन, संपूर्ण गोपनीयों से भी अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन, क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, हमसे यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिए कहूंगा।

हे अर्जुन, तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य— निरंतर अचल मन वाला हो और मुझ पश्मेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा— भक्‍ति सहित निरंतर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो और सर्वगुण— संपन्‍न हो सके आश्रयरूप वासुदेव को नमस्कार कर; ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय सखा है।

इसलिए सब धर्मों की अर्थात संपूर्ण कर्मो के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ सव्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो? मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा; तू शोक मत कर।


इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण कृष्ण फिर बोले कि हे अर्जुन, संपूर्ण गोपनीयों से भी अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन, क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं फिर तेरे लिए कहूंगा।

अर्जुन चुप होकर बैठ गया, सोचने लगा, क्या करूं, क्या न करूं! खोजने लगा, क्या है मेरी इच्छा!

उतर गया पहाड से फिर नीचे। चढ़ने में वर्षों लग जाते हैं, उतरने में क्षणभर लगता है। बनाने में वर्षों लग जाते हैं, गिरने में वर्षों नहीं लगते, मिटाने में वर्षों नहीं लगते।

और यह जीवन की तो इतनी बारीक यात्रा है, इतनी सूक्ष्म यात्रा है, कि तुम पहुंचते तो इंच—इंच मुश्किल से हो, यात्रा करते हो। और जब खोता है, तो मीलों खो जाते हैं, एक साथ खो जाते हैं। क्योंकि नीचे उतरना सुगम है, ऊपर जाना दूभर है।

इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर न मिलने के कारण......।

कृष्ण ने कहा कि तू अब कह; तेरी जो मर्जी हो, तू बोल दे। अब तुझे जो करना हो, चुन ले।

अगर अर्जुन समझ गया होता, वह हंसता और कहता कि अब बस खेल बंद करो। मुझे पक्का पता है, तुम पुराने खिलाड़ी हो, पर अब बहुत हो गया। अब मुझे और न भरमाओ, और न भटकाओ। अब मेरी क्या मर्जी? अब उसकी मर्जी।

कृष्ण ने प्रतीक्षा की होगी कि वह उत्तर दे, लेकिन वह सोचने लगा। और सोचने से कहीं उत्तर आया है! सोचने से ही उत्तर आता होता, तो बुद्ध पुरुष पागल थे कि न सोचने की शिक्षा देते! वह विचार में पड़ गया। वह चूक गया, वह फिर उलझ गया जाल में। कृष्ण देखते रहे होंगे, प्रतीक्षा की होगी।

इतना कहने पर भी जब कोई उत्तर न मिला और अर्जुन फिर खो गया विचारों के जाल में, तो उन्होंने फिर से कहा कि हे अर्जुन.......!




यह गीता की पूरी कथा गुरु के अथक होने की कथा है। शिष्य थक— थक जाए, गुरु नहीं थकता। वह बार—बार चूक जाए, गुरु उसे फिर—फिर बुलाने लगता है। क्योंकि गुरु इस बात को भलीभांति जानता है, यह स्वाभाविक है। बहुत बार भटक जाना स्वाभाविक है। अनंत बार भी कोई भटककर अंततः वापस आ जाए मार्ग पर, तो भी जल्दी आ गया।

कृष्ण बोले, हे अर्जुन, फिर से तुझ से कहूंगा। गोपनीयों में भी गोपनीय परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर से सुन।

फिर उसे जगाया, फिर सीढ़ी पकडाई।

क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है।

यह क्यों कृष्ण बार—बार अर्जुन को दोहराते हैं कि तू मेरा अतिशय प्रिय है? यह कृष्ण बार—बार अर्जुन को अपने प्रेम के प्रति सचेत क्यों करते हैं? ताकि उसका प्रेम आविर्भूत हो सके। वे अपने प्रेम को उससे बार—बार कहते हैं, ताकि उसके भीतर भी श्रद्धा का ऐसा ही जन्म हो सके।

गुरु की तरफ से शिष्य के लिए जो प्रेम है, शिष्य की तरफ से गुरु के प्रति वही श्रद्धा है। गुरु प्रेम के बीज बोता है शिष्य के हृदय में, ताकि शिष्य श्रद्धा की फसल काट सके।

इसलिए कृष्ण बार—बार यह बात डाले जाते हैं, मौके—बेमौके, जब भी उन्हें अवसर मिलता है वह कहते हैं, क्योंकि तू मेरा अतिशय !? प्रिय है। प्रेम को दोहराते हैं, ताकि अर्जुन को भरोसा आ जाए।

प्रेम ही भरोसा ला सकता है। प्रेम ही श्रद्धा को जन्मा सकता है। और प्रेम ही समर्पण की संभावना खोल सकता है।

इससे यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिए कहूंगा......।

तुम ऐसा मत सोचना, जैसा कि भूल शिष्यों को अक्सर हो जाती है, कि ऐसा कृष्ण अर्जुन से ही कह रहे हैं। उनके और शिष्य रहे होंगे, तो सब से उन्होंने यही कहा होगा कि तू मेरा अतिशय प्रिय है। यह परम हितकारक वचन मैं तुझ से फिर—फिर कह रहा हूं क्योंकि मेरा प्रेम तेरे प्रति गहन है, न चुकने वाला है।

यह गुरु हर शिष्य को यही कहता है। इससे तुम यह मत समझ लेना कि गुरु किसी एक शिष्य को विशेष प्रेम करता है और किसी दूसरे शिष्य को कम विशेष प्रेम करता है। किसी को ज्यादा, किसी को कम, ऐसा सवाल नहीं है। लेकिन गुरु हर शिष्य से यही कहता है कि तुझ से मेरा प्रेम अतिशय है। क्योंकि जब तक शिष्य को ऐसा भरोसा न आ जाए कि प्रेम गुरु का अतिशय है, असाधारण है, बस उसके प्रति है, तब तक उसके भीतर की श्रद्धा का उभार न आ पाएगा, तब तक उसकी श्रद्धा दबी पड़ी रहेगी। वह अतिशय और असाधारण प्रेम में ही उठ सकती है।

हे अर्जुन, तू केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य——निरंतर अचल मन वाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा— भक्ति सहित निरंतर भजने वाला हो तथा मन, वाणी और शरीर के द्वारा सर्वस्व अर्पण करके मेरा पूजन करने वाला हो और मुझ सर्वगुण—संपन्न सबके आश्रयरूप वासुदेव को नमस्कार कर, ऐसा करने से तू मुझ को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय सखा है।

 अर्जुन फिर सोचने लगा। समर्पण कहीं सोचा जाता है! किया जाता है। सोचना तो होशियारी है। सोचने में तो भरोसा तुम्हारा अपने ही ऊपर है।

सोचकर भी समर्पण करोगे, वह समर्पण होगा? अगर सोचकर किया, तो तुमने समर्पण किया ही नहीं। क्योंकि सोच—सोचकर पाया कि ठीक है। यह ठीक तुमने पाया, इसलिए समर्पण किया। लेकिन अंततः निर्णायक तुम ही रहे; अहंकार ही अंततः निर्णायक रहा।

और समर्पण को तुम किसी दिन वापस लेना चाहो, तो वापस भी ले लोगे। तुम जाकर कहोगे कि बस, समर्पण समाप्त। अब मुझे नहीं करना है। क्योंकि तुम बच ही रहे थे। पहले ही दिन बच गए थे। तुम समर्पण के पीछे खड़े रहे थे। तुमने समर्पण किया था, वह तुम्हारा कृत्य था, कर्ता तो पीछे खड़ा रहा था।

और समर्पण तो तभी होता है, जब कर्ता मिट जाए। इसलिए समर्पण को वापस नहीं ले सकते हो। अगर वापस ले लिया, वह कोई समर्पण है! समर्पण से पीछे नहीं लौट सकते हो। वह कमिटमेंट, वह प्रतिबद्धता आखिरी है। उससे कैसे वापस लौटोगे? कौन वापस लौटेगा? क्योंकि जो वापस लौट सकता था, उसे तो तुमने समर्पित कर दिया।

जब अर्जुन फिर सोचने लगा, कृष्ण के मन में बड़ी दया और करुणा उपजी होगी, कि यह पागल फिर विचार करने लगा! यह फिर चूक गया! एक अवसर दिया था कि बिना सोचे कह देता अब कि बस ठीक है, अब सोच लिया बहुत। सोच—सोचकर तो विषाद में पड़ा हूं। अब और मत भरमाओ मुझे। अब जो तुम्हारी मर्जी। तुम्हारे शरण आया हूं अनन्य भाव से आया हूं अब तुम ही मेरे प्राण हो; तुम ही मेरी आत्मा हो। तुम ही जहां चलाओगे, चलूंगा; न चलाओगे, न चलूंगा।

समर्पण तो अहंकार की आत्मघात अवस्था है। जैसे कोई अपनी गरदन काट दे। फिर जोड्ने का उपाय नहीं।

नहीं, लेकिन अर्जुन को सोचते देखकर कृष्ण को फिर कहना पड़ा, मन, वाणी और शरीर के द्वारा सर्वस्व को तू मुझमें अर्पण कर दे, ऐसा करने से तू मुझ को प्राप्त होगा..।

और कोई उपाय नहीं है। नदी गिरे सागर में, तो ही सागर हो सकती है। बीज टूटे भूमि में, तो ही अंकुरित होगा।

यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं.....।

गुरु को ऐसी बातें भी शिष्य से कहनी पड़ती हैं, जिन्हें कहने की कोई जरूरत न थी। लेकिन शिष्य की अपनी दुनिया है। गुरु को शिष्य की भाषा में बोलना पड़ता है। कृष्ण जैसे व्यक्ति को भी प्रतिज्ञा करनी पड़ती है शिष्य के सामने, कि मैं प्रतिज्ञा करता हूं। क्योंकि तुम केवल इसी तरह की बातें समझ सकते हो।

भरोसा तुम्हें नहीं है। अन्यथा प्रतिज्ञा करवाते? अन्यथा तुम कृष्ण को यह कहने का मौका दिलवाते कि मैं तुझे आश्वासन देता हूं? तुम्हारा बस चले, तो तुम जाकर कृष्ण को रजिस्ट्री आफिस में दस्तखत करवा लो स्टैम्प पर, कि लिख दो इस पर कि अगर न किया पूरा, तो अदालत से हरजाना वसूल कर लूंगा।

मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करता हूं......।

महाकरुणा तुम्हारी भूल के कारण, तुम्हारी नासमझी के कारण, तुम्हें खोजने के लिए तुम्हारे अंधेरे में भी उतरती है। तुम्हारी भाषा का भी सहारा लेती है। तुम्हारे ही शब्दों का उपयोग करती है। तुम्हें पाने के लिए कृष्ण जैसे व्यक्ति को तुम्हारी जगह आना पड़ता है, ताकि तुम्हें ले जाया जा सके।

इसलिए सब धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, मैं तेरे को संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा; तू शोक मत कर।

अर्जुन सोचने लगा, फिर शोकग्रस्त हो गया। सोचने से विषाद आ जाता है। न सोचने से आनंद की वर्षा होती है, सोचने से विषाद घिर जाता है। सोचना ही विषाद है।

वह फिर विचार करने लगा, फिर शोक चारों तरफ छा गया, पाप का भय, पुण्य का लोभ, आकांक्षा। मारूं, न मारूं! करूं, न करूं! अपने हैं, पराए हैं! सब जाल फिर से खड़ा हो गया।

अंत— अंत तक, जब तक कि तुम छलांग ही नहीं ले लेते, संसार तुम्हें आखिरी दम तक पकड़ता चला जाता है। अठारहवां अध्याय आ गया। गीता का अंत करीब है। और थोड़े—से सूत्र बचे हैं। और अर्जुन अभी भी चूकता चला जा रहा है!

मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर। तू विषाद में मत उलझ, तू चिंता मत कर। तू सब धर्मों को छोड्कर, सब कर्मों के आश्रय को छोड्कर, सब धारणाएं छोड्कर, अनन्य भाव से मेरी शरण आ जा।

कृष्ण का निमंत्रण समर्पण का निमंत्रण है; मिटने की, पूरी तरह मिट जाने की, सब भांति खो जाने की पुकार है।

जब तक तू है, तब तक संसार है। जब तक तू है, तब तक मेरा है, पराया है। जब तक तू है, तब तक जन्म है, मृत्यु है। जब तक तू है, तब तक पाप और पुण्य है। वहां भीतर टूट गया मैं, तू मिटा; फिर न कोई पाप है, न कोई पुण्य है।

इसलिए कृष्ण कह सकते हैं, ठीक ही कहते हैं। इससे तुम यह मतलब मत समझ लेना जो लोगों ने समझा है। लोग हमेशा गलत ही समझते हैं। लोगों ने यह समझा है कि बिलकुल ठीक। तो हम कृष्ण का नाम गुणगान करते रहें, वे सब पापों से हमें मुक्त कर देंगे। और पाप भी किए चले जाएं, क्योंकि जब मुक्त करने वाला ही मिल गया, तो अब पाप से क्या बचना!

तुम चालबाजी कर रहे हो; तुम कृष्ण का अर्थ ही न समझे। कृष्ण का कुल अर्थ इतना है कि अगर समर्पण पूरा है, तो पाप मिट गए; कोई मिटाता थोड़े ही है। वह तो तुम्हारी भाषा के कारण कहना पड़ रहा है कि मैं तुम्हारे पापों को मिटा दूंगा, तू शोक मत कर। कोई और ढंग कहने का नहीं है। अन्यथा कोई पाप मिटाता है! पाप बचते ही नहीं।

अहंकार के जाते ही पाप भी गए। वे तो अहंकार के ही संगी—साथी हैं, अहंकार के बिना बच ही नहीं सकते। और अहंकार के जाते ही सारा संसार रूपांतरित हो जाता है। वहां फिर एक ही बचता है। कौन करेगा पाप? किसके साथ करेगा पाप? वही मारने वाला, वही जिलाने वाला। वही मरने वाले में बैठा है, वही मारने वाले में बैठा है। सब हाथ उसके हैं। जिस हाथ में तलवार है, वह भी हाथ उसका है। और जिस गरदन पर तलवार गिरती है, वह गरदन भी उसकी है। फिर कैसा पाप? कैसा पुण्य?

एक मैं के जाते ही सब खो जाती है वह पुरानी शब्दों की दुनिया—पाप की, पुण्य की, विभाजन की, द्वंद्व की, अच्छे की, बुरे की, शुभ की, अशुभ की—सब खो जाती है। निर्द्वंद्व भाव उत्पन्न होता है।

यह अर्थ है कृष्ण का कि मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा। इसका यह मतलब नहीं है कि तू मजे से पाप कर, मैं तुझे मुक्त कर दूंगा! इसका कुल मतलब इतना ही है कि तू मैं को छोड़ दे, तू पाएगा कि पाप बचे ही नहीं। तभी तू समझ पाएगा कि न तो कोई माफ करता है, न कोई मिटाता है। पाप थे ही नहीं; तुम्हारी भ्रांति में तुमने उन्हें माना था कि वे हैं।

अहंकार छोड़ते ही कोई पाप कर ही नहीं सकता। सब पाप अहंकार से पैदा होते हैं। अहंकार छूटा, पाप की जड़ कट गयी। फिर कोई पाप के वृक्ष में न फल लगते हैं, न पत्ते लगते हैं, न फूल लगते हैं।

और अलग—अलग पत्तों को तोड्ने जो गए, वे नाहक भटके हैं। क्योंकि जड़ बनी रहती है, नए पत्ते निकल आते हैं। एक तोड़ो, दस निकल आते हैं। वृक्ष समझता है, तुम कलम कर रहे हो। वृक्ष और घना होता जाता है।

कृत्यों को, एक—एक कृत्य को काटने जाओगे—बुरे को काटू अच्छे को करूं—तुम भटकते ही रहोगे। जड़ को ही काट दो। जिसने जड़ को काटा, उसने अचानक पाया, पूरा वृक्ष ही गिर गया। अहंकार जड़ है, समर्पण उस जड़ को काट देना है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...