सोमवार, 7 अगस्त 2023

चींटी और तितली

एक थी चींटी। वह घूमने जा रही थी । चलते-चलते उसे बहुत भूख लगी। इतने में उसे चावल का एक दाना मिला। वह खुश हो गई। चींटी ने चावल का दाना मुँह में रखा। आगे चलने लगी। चलते-चलते रास्ते में उसे मूँग का एक दाना मिला। चींटी मूँग का दाना देखकर खुश हो गई। चींटी ने सोचा, मूंग और चावल की मैं खिचड़ी बनाऊँगी। उसके मुँह में पानी आ गया। यह सोचकर चींटी मूँग का दाना मुँह में रखा। इससे चावल का दाना गिर गया। उसने चावल का दाना मुँह में पकड़ा, लेकिन ऐसा करते ही मूँग का दाना गिर गया। चींटी तो थी छोटी-सी, जरा-सी । उसका मुँह भी छोटा । इसलिए मूँग और चावल दोनों के दाने एक साथ उसके मुँह में नहीं आ सके। एक रहे तो दूसरा निकल जाए !

दोनों दाने न ले जाये तो खिचड़ी नहीं बनेगी। इसलिए चींटी ने बहुत कोशिश की। वह थक गई लेकिन दाने मुँह में नहीं आए। चींटी तो निराश हो गई । वह खड़ी खड़ी सोचने लगी।

इतने में वहाँ से एक तितली निकली। चींटी को निराश खड़ा देखकर तितली ने पूँछा, बहन, क्यों इस तरह चिंता में हो? चींटी ने कहा- "मुझे खिचड़ी बनानी है, लेकिन मूँग और चावल इन दोनों के दाने मेरे मुँह में एक साथ नहीं आते हैं और एक दाने से खिचड़ी बनेगी नहीं। एक दाना घर ले जाकर मैं खिचड़ी कैसे बनाऊँ ?" तितली ने सोचकर कहा, मैं तुम्हारी कुछ सहायता करूँ ?

चींटी बहुत खुश हो गई। चींटी ने कहा- "तुम मूँग का दाना ले लो, मैं चावल का दाना ले लेती हूँ। अपने साथ मिलकर मेरे घर जाएँगे।" तितली ने कहा- "लेकिन एक शर्त है, तुम जो खिचड़ी बनाओगी उसमें मेरा भी हिस्सा रहेगा | आधी खिचड़ी मुझे देनी होगी।”

यह सुनकर चींटी बोली, "हां क्यों नहीं.... इसमें क्या शर्त रखती हो ? जो मेहनत करे वह खाए। फिर तुम तो मेरी मेहमान हो।"

दोनों साथ में मिलकर मूँग और चावल का दाना चींटी के घर पहुँचाया। चींटी ने मूंग और चावल की खिचड़ी बनाई। फिर चींटी और तितली ने मिलकर बड़े मजे से खिचड़ी खाई ।

धन

 सिकंदर एक फकीर से मिला और उसने फकीर से कहा कि मैं संसार को जीतने निकला हूं, मुझे आशीर्वाद दो। उस फकीर ने कहा,आशीर्वाद दूंगा, उसके पहले एक प्रश्न है! मान लो कि तुम संसार जीत लिए और एक महा रेगिस्तान में अकेले पड़ गए हो,  भयंकर प्यास लगी है और एक गिलास पानी मिल जाए इसके लिए तडफ रहे हो; अगर नहीं मिला तो मर जाओगे। और मैं एक गिलास पानी लेकर वहां आता हूं। लेकिन मैं एक गिलास पानी भी मुफ्त नहीं दे दूंगा । तुम कितना मूल्य चुकाने को राजी होओगे? सिकंदर ने कहा,जो मांगोगे। फकीर ने कहा,आधा राज्य। सिकंदर थोड़ा झिझका,हालांकि अभी देने,लेने की कोई बात नहीं थी, यह केवल कल्पना का सवाल था, लेकिन फिर भी झिझका,आधा राज्य, एक गिलास पानी के लिए।

 लेकिन फिर पूरे हालात पर गौर किया। भयंकर रेगिस्तान,आग बरसती भरी दोपहरी, कहीं कोई रास्ते का पता नहीं, दूर दूर तक गांव की कोई खबर नहीं;कब पहुंच पाऊंगा इस रेगिस्तान के बाहर कोई संभावना नहीं, प्यास से मरा जा रहा हूं। तो अब आधा राज्य भी अगर देना पड़े एक गिलास पानी के लिए सिंकंदर ने थोड़े संकोच से कहा कि ठीक है, अगर ऐसी परिस्थिति होगी और मृत्यु सामने खड़ी होगी, तो फिर आधा राज्य भी दे दूंगा। फकीर ने कहा,मैं भी  इतनी जल्दी पानी बेच नहीं दूंगा, पूरा राज्य चाहिए। सिकंदर ने कहा, क्या बात करते हो, कुछ सीमा होती है एक गिलास पानी का इतना मूल्य! पर फकीर ने कहा,परिस्थिति सोच लो, वही एक गिलास पानी तुम्हारा जीवन है, पूरा राज्य दोगे तो ही दे सकूंगा। सिकंदर ने थोड़ा सोचा और कहा,अच्छा, अगर ऐसी स्थिति होगी तो पूरा राज्य भी दूंगा, क्योंकि जीवन बड़ी चीज है। 

फकीर हंसने लगा। उसने कहा, बस इसको तुम याद रखना, जीवन बड़ी चीज है। तुम जीवन को गंवा दोगे, राज्य पा लोगे,और राज्य की इतनी कीमत है कि जरूरत पड़ जाए तो एक गिलास पानी में बिक जाए। इसका मूल्य कितना है?

लोग धन खोज रहे हैं, सुख खोज रहे हैं, सोचते हैं धन से सुख मिल जायेगा, लेकिन मिला तो दुख। तुमने सोचा था आम बो रहे हो, बो दी थी नीम। फल सिद्ध करेगा कि क्या बोया था। तुम जरा अमीर आदमियों को देखो, तुम उनकी आंखों मे जीवन की खुशी पाते हो? और उनके हृदय में प्रेम का गीत उठता है? और उनके पैरों में कोई नृत्य है, अनुग्रह है, परमात्मा के प्रति कोई धन्यवाद है? नहीं, दुख है, शिकायत है। वे बिलकुल हारे थके खड़े है। 

उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अब क्या करें? अब तक सोचते थे धन मिलने से सुख मिलेगा, धन मिल गया और सुख का तो कुछ पता नहीं है, और जीवन हाथ से गया, धन का ढेर लगा है और जीवन हाथ से खो गया है, वह जीवन जो दुबारा वापस नहीं मिल सकता, वह समय जिसे लौटाने का कोई उपाय नहीं। यह ठीकरे का ढेर लग गया। किस कीमत पर? 

तुम धनी आदमी को जरा गौर से देखो, जाचो; जो पद पर पहुंच गए हैं, उनको जरा परखो, पहचानो; वे सभी यह सोचते थे कि सुख की तलाश में चले हैं; नर्क में पहुंच गए हैं। मानने से थोड़े ही कोई स्वर्ग पहुंचता है। तुम्हारी दिशा कहां है। तो दुनिया में जिनको तुम संसारी कहते हो, वे भी दुख ही खोज रहे हैं। सिर्फ अपने को भरमाने के लिए उन्होंने दुख के डिब्बों पर सुख के लेबिल लगा रखे हैं। और जिसको तुम धार्मिक कहते हो, वह भी दुख खोज रहा है। उसने अपने दुख के डिब्बों पर पुण्य के लेबिल लगा रखे हैं। इतना ही भेद है। लेबिल का भेद है। दोनों दुख खोज रहे हैं।  

फिर सुख का क्या मतलब होगा? सुख का एक ही मतलब हो सकता है कि दुख मेरे मैं को पुष्ट करता है; सुख की खोज का एक ही अर्थ हो सकता है कि मैं इस मैं को छोड़ दूं जो दुख पर जीता है, जिसके लिए दुख अनिवार्य है, मैं इस दुख को छोड़ दूं। दुख का त्याग इस जगत में सब से बड़ा त्याग है।

बिना मिटे इस जगत में होने का कोई उपाय नहीं। छोटे तल पर मिटो तो बड़े तल पर प्रकट होते हो। जितने ज्यादा मिटो, उतने प्रकट होते हो। जब परिपूर्ण रूप से मिटते हो, तब भगवत्ता उपलब्ध होती है क्योंकि भगवत्ता पूर्णता है, उसके पार फिर कुछ और नहीं। लेकिन यह हो सकता है इसीलिए, क्योंकि यह हुआ ही  है। इस उदघोषणा को जगह दो अपने हृदय मे।

तुम भगवान हो सकते हो, क्योंकि तुम भगवान हो। भगवान ने तुम्हें एक क्षण को नहीं छोड़ा, तुम भला पीठ करके खड़े हो गए हो। तुमने भला आखें बंद कर ली हैं, सूरज निकला है और चारों तरफ जगत रोशन है। तुम अंधेरे मे खड़े हो, यह तुम्हारा निर्णय है। अंधेरा है नहीं, अंधेरा बनाया हुआ है, कृत्रिम है। इस कृत्रिम बनाए हुए अंधेरे का नाम माया है, जो आदमी खुद बना लेता है।

लोग दुख को बड़ी मुश्किल से छोड़ते हैं? बात एकदम से कहो तो बेबूझ लगती है।आदमी सुख चाहता है। यह बात तो इतनी प्रचारित की गई है कि हम ने मान लिया है कि आदमी सुखवादी है, सभी सुख चाहते है। लेकिन जरा आदमी को गौर से देखो। आदमी दुख को पकड़ता है, दुख को छोड़ता नहीं। आदमी दुखवादी है।

मौत

जरा गौर से सुनो, मौत के कदम रोज-रोज करीब आते जा रहे हैं। मौत फासला कम कर रही है। जिस दिन से तुम पैदा हुए हो, उसी दिन से मौत फासला कम करने में लग गयी है: तुम रोज मर रहे हो। सांसों में बहुत भटके मत रहना। इनका बहुत भरोसा नहीं। अभी आ रही है सांस, अभी न आएगी तो कुछ भी न कर सकोगे। अवश पड़े रह जाओगे। तब बहुत पछताओगे। रोओगे फिर, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी। कहते हैं सुबह का भूला सांझ भी घर आ जाए तो भूला नहीं कहाता। लेकिन सांझ भी आ जाए तो! अगर मौत आ गयी तो सांझ भी आयी और गयी। फिर लौटने का उपाय न रहा, समय न रहा।

मौत का अर्थ क्या होता है? इतना ही कि जितना समय तुम्हें दिया था, चुक गया। मौत का अर्थ होता है, जितना अवसर तुम्हें दिया था, तुमने गंवा दिया। मौत का अर्थ होता है, अब और समय नहीं बचा। अब करने का कोई उपाय नहीं। एक आह भी न भर सकोगे। एक प्रार्थना भी न कर सकोगे। राम का नाम भी न ले सकोगे। सांस ही न लौटी तो राम का नाम अब कैसे ले सकोगे? एक नाम रहने की भी, लेने की भी सुविधा नहीं बचती।

और मौत रोज करीब आ रही है। और तुम जिंदगी की सांसों में उलझे पड़े रहते हो। अथातो भक्ति जिज्ञासा! अब भक्ति की जिज्ञासा करो!

ओशो श्री रजनीश अथातो भक्ति जिज्ञासा।

शनिवार, 5 अगस्त 2023

मां बेटा

 पति और पत्‍नी एक क्षण के लिए मिलते है, एक क्षण के लिए दोनों की आत्‍माएं एक हो जाती है। और उस घड़ी में जो उन्‍हें आनंद का अनुभव होता है। वही उनको बांधने वाला हो जाता है।

 कभी आपने सोचा कि मां के पेट में बेटा नौ महीने तक रहता है। और मां के अस्‍तित्‍व से मिला रहता है। पति एक क्षण को मिलता है। बेटा नौ महीने  इक्ट्ठा होता है। इसीलिए मां का बेटे से जो गहरा संबंध है, वह पति से  कभी भी नहीं होता। हो भी नहीं सकता। पति एक क्षण के लिए मिलता है आस्‍तित्‍व के तल पर,  फिर बिछुड़ जाता है। एक क्षण को करीब आते है ओर फिर कोसों का फासला शुरू हो जाता है।

लेकिन बेटा नौ महीने तक मां की सांस से सांस लेता है। मां के ह्रदय से धड़कता है। मां के खून, मां के प्राण से प्राण, उसका अपना कोई अस्‍तित्‍व नहीं होता है। वह मां का एक हिस्‍सा होता है। इसीलिए स्‍त्री मां बने बिना कभी भी पूरी तरह तृप्‍त नहीं हो पाती। कोई पति स्‍त्री को कभी तृप्‍त नहीं कर सकता। जो उसका बेटा उसे कर देता है।  

स्‍त्री मां बने बिना पूरी नहीं हो पाती। उसके व्‍यक्‍तित्‍व का पूरा निखार और पूरा सौंदर्य उसके मां बनने पर प्रकट होता है। उससे उसके बेटे के आत्‍मिक संबंध बहुत गहरे होते है।

 इसीलिए आप यह भी समझ लें कि जैसे ही स्‍त्री मां बन जाती है। उसकी काम में रूचि कम हो जाती है।  फिर काम में उसे उतना रस नहीं मालूम पड़ता। उसने एक और गहरा रस ले लिया है। मातृत्‍व का। वह एक प्राण के साथ और नौ महीने तक इकट्ठी जी ली है। अब उसे काम में रस नहीं  रह जाता है। 

अकसर पति हैरान होते है। पिता बनने से पति में कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मां बनने से स्‍त्री में बुनियादी फर्क पड़ जाता है। जो नया व्‍यक्‍ति पैदा होता है उससे पिता का कोई गहरा संबंध नहीं है। पिता बिलकुल सामाजिक व्‍यवस्‍था है।  पिता के बिना भी दुनिया चल सकती है, क्योंकि पिता का कोई गहरा संबंध नहीं है बेटे से। मां से उसके गहरे संबंध है, और मां तृप्‍त हो जाती है उसके बाद। और उसमें एक और ही तरह की आध्‍यात्‍मिक गरिमा प्रकट होती है। जो स्त्री मां नहीं बनी है, उसको देखे और जो मां बन गई है उसे देखें। उन दोनों की चमक और उर्जा और उनका व्‍यक्‍तित्‍व अलग मालूम होगा। मां की दीप्ति दिखाई पड़ेगी शांत, जैसे नदी जब मैदान में आ जाती है, तब शांत हो जाती है। जो अभी मां नहीं बनी है, उस स्‍त्री में एक दौड़ दिखेगी, जैसे पहाड़ पर नदी दौड़ती है। झरने की तरह टूटती है, चिल्‍लाती है; गड़गड़ाहट करती है; आवाज है; दौड़ है; मां बन कर वह एक दम से शांत हो जाती है।

 स्‍त्री तृप्‍त होने लगती है मां बनकर क्‍यों? उसने एक आध्‍यात्‍मिक तल पर सेक्‍स का अनुभव कर लिया बच्‍चे के साथ। और इसीलिए मां और बेटे के पास एक आत्‍मीयता है। मां अपने प्राण दे सकती है बेटे के लिए, मां बेटे के प्राण लेने की कल्‍पना नहीं कर सकती। पति पत्‍नी के बीच चौबीस घंटे एक कलह चलती है। जिसे हम प्रेम करते है, उसी के साथ चौबीस घंटे कलह चलती है। लेकिन न पति समझता है, न पत्‍नी समझती है। कि कलह का क्‍या करण है। पति सोचता है कि शायद दूसरी स्‍त्री होती तो ठीक हो जाता। पत्‍नी सोचती है कि शायद दूसरा पुरूष होता तो ठीक हो जाता। यह जोड़ा गलत हो गया है।

दुनिया भर के जोड़ों का यही अनुभव है। और आपको अगर बदलने का मौका दे दिया जाये तो कुछ  फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरी स्‍त्री दस पाँच दिन के बाद फिर पहली स्‍त्री साबित होती है। दूसरा पुरूष पन्द्रह दिन के बाद फिर पहला पुरूष साबित हो जाता है। इसके कारण गहरे है। इसके कारण इसी स्‍त्री और इसी पुरूष के संबंधित नहीं है। इसके कारण इस बात से संबंधित है कि जो पति और पत्‍नी का संबंध बीच की यात्रा का संबंध है। वह मुकाम नहीं है, वह अंत नहीं है। अंत तो वही होगा, जहां स्‍त्री मां बन जायेगी। 

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

वृक्ष के त्याग की कहानी

 एक बहुत पुराना वृक्ष था। आकाश में सम्राट की तरह उसके हाथ फैले हुए थे। उस पर फल आते थे तो दूर-दूर से पक्षी सुगंध लेते आते थे। उस पर फूल लगते थे तो तितलियां उड़ती चली आती थी। उसकी छाया, उसके फैले हाथ, हवाओं में उसका वह खड़ा रूप आकाश में बड़ा सुन्‍दर लगता था। एक छोटा सा बच्‍चा उसकी छाया में रोज खेलने आता था। उस बड़े वृक्ष को उस छोटे बच्‍चे से  प्रेम हो गया।

बड़ों को छोटों से प्रेम हो सकता है। अगर बड़ों को पता न हो कि हम बड़े है। वृक्ष को कोई पता नहीं था कि मैं बड़ा हूं, यह पता सिर्फ आदमियों को होता है। इसलिए उसका प्रेम मर गया है, और वृक्ष अभी निर्दोष है निष्कलुष है उन्‍हें नहीं पता की मैं बड़ा हूं।

 अहंकार हमेशा अपने से बड़ों से प्रेम करने की कोशिश करता है। अहंकार हमेशा अपनों से बड़ों से संबंध जोड़ता है। प्रेम के लिए कोई बड़ा छोटा नहीं है। जो आ जाएं, उसी से संबंध जूड़ जाता है।

 वहां एक छोटा सा बच्‍चा खेलने आता था, उस वृक्ष के पास। उस वृक्ष को उससे प्रेम हो गया। लेकिन वृक्ष की शाखाएं ऊपर थीं। बच्‍चा छोटा था तो वृक्ष अपनी शाखाएं उसके लिए नीचे झुकाता, ताकि वह फल तोड़ सके, फूल तोड़ सके। प्रेम हमेशा झुकने को राज़ी है, अहंकार कभी भी झुकने को राज़ी नहीं होता है।

अहंकार के पास जाओगे तो अहंकार के हाथ और ऊपर उठ जायेंगे। ताकि आप उन्‍हें छू न सकें। क्‍योंकि जिसे छू लिया जाये। वह छोटा आदमी है। जिसे न छुआ जा सके, वह आदमी बड़ा आदमी है।

उस वृक्ष की शाखाएं नीचे झुक आती थी, जब वह बच्‍चा खेलता हुआ आता उस वृक्ष के पास, और जब वह उसका फूल तोड़ता, तब वह वृक्ष अंदर तक सिहर जाता, प्रेम की छुअन से सराबोर हो जाता। और खुशी के मारे उसकी शाखाएं नाचने झूमने लगती। उसके प्राण आनंद से भर जाते।

 प्रेम जब भी कुछ दे पाता है तो खुश हो जाता है। अहंकार जब भी कुछ ले पाता है, तभी खुश होता है।

 फिर वह बच्‍चा बड़ा होने लगा। वह कभी उसकी छाया में सोता, कभी उसके फल खाता, कभी उसके फूलों का ताज बनाकर पहनता, वृक्ष उसे जंगल के सम्राट के रूप में देख कर खुश हो जाता।

 प्रेम के फूल जिसके पास भी बरसतें हैं, वही सम्राट हो जाता है, वृक्ष के प्राण आनंद से भर जाते, उसकी छूअन उसे अन्‍दर तक गुदगुदा जाती। हवा जब उसके पतो को छूती तो उससे मधुर गान निकलता। नये-नये गीत फूटते उस बच्‍चे के संग। 

वह लड़का कुछ और बड़ा हुआ। वह वृक्ष के उपर चढ़ने लगा। उसकी शाखाओं से झुलने लगा। वह उस की विशाल शाखाओं पर लेट कर विश्राम करता। वृक्ष आनंदित हो उठता। प्रेम आनंदित होता है जब प्रेम किसी के लिए छाया बन जाता है। अहंकार आनंदित होता है जब किसी की छाया छीन लेता है।

लड़का धीरे-धीरे बड़ा होता चला गया। दिन पर दिन बीतते ही चले गये, मानों समय को पंख लग गये। ऋतु पर ऋतु बदलती चली गयी। वृक्ष को पता ही नहीं चला उस समय का। जब हम आनंद में होते है तो समय की गति तेज हो जाती है। मानों उसके पंख लग गये हो। तब लड़का बड़ा हो गया तो उसे और दूसरे काम भी उसकी दुनियां में आ गये। महत्‍वकांक्षाएं आ गई। उसे परीक्षाए पास करनी थी। उसे मित्रों के साथ भी खेलना था। पढ़ाई में सब को पछाड़ कर अव्वल आना था। धीरे-धीरे उसका आना कम   होता चला गया। कभी आता कभी नहीं आता।

 लेकिन वृक्ष तो हमेशा उसकी राह ताकता रहता। कि वह कब आये और उसके उपर चढ़े उसकी टहनीयों से खेले, उसके फूल तोड़े। उसके फल खाये। लेकिन वह हफ्तों महीनों बाद कभी आता। वृक्ष उसकी प्रतीक्षा करता कि वह आये। वह आये।

उसके सारे प्राण पुकारते कि आओ-आओ। प्रेम निरंतर प्रतीक्षा करता है कि आओ-आओ। प्रेम एक प्रतीक्षा है। लेकिन वह कभी आता, कभी नहीं आता, तो वृक्ष उदास रहने लगा। प्रेम की एक ही उदासी है जब वह बांट नहीं सकता। तब वह उदास हो जाता है। जब वह दे नहीं पाता, तो उदास हो जाता है।और प्रेम की एक ही धन्‍यता है कि जब वह बांट देता है, लुटा देता है तो आनंदित हो जाता है। 

फिर लड़का ओर बड़ा होता चला गया। और वृक्ष के पास आने के दिन कम होते चले गये। जो आदमी जितना बड़ा होता चला जाता है महत्‍वाकांक्षा के जगत में, प्रेम के निकट आने की सुविधा उतनी ही कम होती चली जाती है। उस लड़के की महत्‍वाकांक्षा बढ़ रही थी।  

 फिर एक दिन वह वहां से  जा रहा था, तो उस वृक्ष ने उसे पुकारा, 'सुनो'। हवाओं ने पत्‍तों ने उसकी आवाज को गुंजायमान किया। तुम आते नहीं, मैं प्रतीक्षा करता हूं, मैं रोज तुम्‍हारी राह देखता हूं, कि तुम इधर आओ, मेरी आंखें थक जाती है। पर तुम अब इधर नहीं आते क्‍यों?

 उस लड़के ने एक बार घुर कर देखा उस वृक्ष को और कहा कि क्‍या है तुम्‍हारे पास। जो मैं आऊं,मुझे तो रूपये चाहिए।  

 हमेशा अहंकार पूछता है, कि क्‍या है तुम्‍हारे पास, जो मैं आऊं। अहंकार मांगता है कि कुछ हो तो मैं आऊं। न कुछ हो तो आने की जरूरत नहीं है। अहंकार एक प्रयोजन है। प्रयोजन पूरा होता है तो मैं आऊं। अगर कोई प्रयोजन न हो तो आने की जरूरत क्‍या है।

और प्रेम निष्‍प्रयोजन है। प्रेम का कोई प्रयोजन नहीं। प्रेम अपने में ही अपना प्रयोजन है। वृक्ष तो चौंक गया। उसने कहा, तुम तभी आओगे, जब मैं तुम्‍हें कुछ दूँ। मैं तुम्‍हें सब दे सकता हूं। क्‍योंकि प्रेम कुछ भी रोकना नहीं चाहता। जो रोक ले वह प्रेम नहीं है। अहंकार रोकता है। प्रेम तो बेशर्त देता है। लेकिन ये रूपये तो मेरे पास नहीं है। ये रूपये तो आदमी का अविष्कार है। उसी का रोग है अभी हमे नहीं लगा। हम बचे है अभी।

उस वृक्ष ने कहा, इस लिए तो देखो हम इतने आनंदित है। पर मनुष्‍य के संग साथ रह कर हम उसके रोग को पाल लेते है। वरना तो हमारे उत्‍सव को देखो इन खिलें फूलों को देखो, इतने विशाल तने, इनकी छाया। इनपर पक्षियों का चहकना। अपने घर बनाना। खेलना नाचना। कलरव करना। देखो हम कितने नाचते है आकाश में , कितने गीत गाते है। क्‍योंकि हमारे पास पैसा नहीं है। हम आदमी की तरह दीन-हीन मंदिरों में बैठ कर, शांति की कामना नहीं करते है।  सर टरकाते है उसके चरणों में कि हमें कुछ तो दो हम पड़े है तेरे द्वार...पर हमारे पास पैसा नहीं है।

 तो उसने कहा, फिर क्‍यों आऊं मैं तुम्‍हारे पास। जहां पर रूपये है मुझे तो वहीं जाना है। तुम समझते नहीं हमारी मजबूरी, क्‍योंकि तुम्‍हें पैसे की जरूरत नहीं है। पानी तुम्‍हें कुदरत से मिल जाता है, जिस मिट्टी पर तुम खड़े हो वह तुम्‍हें मुफ्त में मिल गई है। हवा, धूप जो तुम्हें पोषण देती है उसके लिए तुम्‍हें कुछ देना नहीं होता। पर हमें तो सब पैसे से ही लेना है, हमारा जीवन तो पैसे से ही चलता है.....अब ये बात तुम्‍हें कैसे समझाऊं।

अहंकार रूपये मांगता है। क्‍योंकि रूपया शक्‍ति है, सुरक्षा है। उस वृक्ष ने बहुत सोचा, फिर उसे ख्‍याल आया....तो तुम एक काम तो कर सकते हो, मेरे सारे फल तोड़ कर ले जाओ और बेच दो उसे बाजार में, फिर तुम्‍हें शायद पैसा मिल जाये।

 उस लड़के की आंखों में चमक आ गई। उसे तो ये ख्‍याल ही नहीं आया था। वह खुशी से राजा हो गया। वह चढ़ गया उस वृक्ष पर और तोड़ने लगा फल, पर आज उसके हाथों में क्रुरता थी, उसके चढ़ने से भी उस वृक्ष को कुछ भारी पन लग रहा था। उसने फलों के साथ तोड़ डालें हजारों पत्‍ते, टहनियां, वृक्ष को पीड़ा होती पर वह यह जान कर आनंदित होता कि ये पीड़ा उसके प्रेमी ने ही तो दी है। प्रेम पीड़ा में भी आनंद देख लेता है। और अहंकार उदारता में भी दु:ख। लेकिन फिर भी वह वृक्ष खुश था कि इस बहाने उसे उस का संग साथ तो मिला।

टूटकर भी प्रेम आनंदित हो जाता है। अहंकार पाकर भी आनंदित नहीं होता। पाकर भी दु:खी होता है। और उस लड़के ने तो धन्‍यवाद भी नहीं दिया और सारे फल ले कर चल दिया बाजार की ओर। वृक्ष उसे निहारता रहा। जाते हुए देखता रहा, अपने को तृप्‍त करता रहा पर उसने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

लेकिन उस वृक्ष को पता भी नहीं चला। उसे तो धन्‍यवाद मिल गया इसी में कि उस लड़के ने उसके प्रेम को स्‍वीकार किया। और उससे फल तोड़े और उन्‍हें बेचकर उसे धन मिल जायेगा। वह यह सोच सोच कर खुश हो रहा था।

लेकिन इसके बाद भी वह लड़का बहुत दिनों तक नहीं आया। उसके पास रूपये थे,वह रुपयों से और रूपये पैदा करने की  कोशिश में वह लग गया। वह भूल ही गया उस बात को कि वह पैसा उसे उसी वृक्ष के प्रेम की देन है। सालों गुजर गये।

और धीरे-धीरे वृक्ष की उदासी उसके पत्‍तों पर भी उभरने लगी। तेज हवाये उसे खड़खड़ाती जरूर पर अब उनमें वह लय नहीं थी। एक मुर्दे की सी खड़खड़ाहट थी। वह इस लिए जीवत था कि उसके प्राणों में रस का संचार हो रहा था। उसके प्राणों का रस बार-बार पुकारता उस लड़के को की तू मेरे पास आ मैं तुझे अपना रस दूँगा। जैसे किसी मां के स्तन में दूध भरा हो और उसका बेटा खो जाये। और उसके प्राण तड़प रहे है कि उसका बेटा कहां है जिसे वह खोजें, जो उसे हलका कर दे। निर्भार कर दे। ऐसा उस वृक्ष के प्राण पीड़ित होने लगे कि वह आये—आये,आये। उसके प्राणों की सारी आवाज में यही गुंज रहा था। आओ-आओ।

बहुत दिनों के बाद वह आया। वह लड़का प्रौढ़ हो गया था। वृक्ष ने उससे कहा आओ मेरे पास। मेरे आलिंगन में आओ। उसने कहा छोड़ो,यह बकवास। यह बचपन की बातें है। अब मैं बड़ा हो गया हूं ।मेरे कंधों पर घर गृहस्थी का बोझ आ गये है। ये सब तुम नहीं समझ सकते।

अहंकार प्रेम को पागलपन समझता है। बचपन की बातें समझता है। उस वृक्ष ने कहा, आओ मेरी डालियों से झूलों—नाचो, चढ़ो मुझ पर। दौड़ों भागों....

उसने कहा छोड़ो भी ये फजूल की सब बातें,क्‍या रखा इन सब में। समय खराब करना ही है। मुझे एक मकान बनाना है। तुम मुझे मकान दे सकते हो? वृक्ष ने कहा, मकान? वह क्‍या होता है, हम तो कोई मकान नहीं बनाते। क्‍यों बनाओगे तुम मकान। क्‍या काम आयेगा। और भी पशु पक्षी भी मकान, घोसला बनाते, है चींटियाँ, दीमक,पर वह तो आदमी की तरह दुःखी नहीं होती। वह तो बड़े आनंद उत्‍सव से उसके बनाने का आनंद लेती है। फिर तुम इतने उदास क्‍यों हो? लेकिन एक बात हो सकती है, मैं क्‍या सहायता कर सकता हूं तुम्‍हारे मकान बनाने के लिए.....कोई हो तो कहो।

वह आदमी थोड़ी देर के लिए तो चुप हो गया। उसके दिल की बात ज़ुंबाँ पर आते-आते रूक गई। पर वह साहस कर के कहने लगा। तुम अपनी शाखाएं मुझे दे दो तो मैं अपने मकान की छत आराम से डाल सकता हूं। वृक्ष मुस्‍कुराया और कहने लगा तो इसमें इतना सोचने की क्‍या बता है। तुम ले सकते हो मेरी शाखाएं। मैं तुम्हारे किसी भी काम आ सकूँ तो अपने को धन्‍य ही मानूँगा। और मुझे लगेगा की तुमने मुझे प्‍यार किया। और वह आदमी गया और कुल्‍हाड़ी लेकर आ गया और उसने उस वृक्ष की शाखाएं काट डाली। वृक्ष एक ठूंठ रह गया। एक दम मृत प्राय, नग्‍न, पर फिर भी वह वृक्ष आनंदित था। प्रेम सदा आनंदित रहता है। चाहे उसके अंग भी काटे जायें। लेकिन कोई ले जाये, कोई बांट ले, कोई सम्‍मिलित हो जाये, कोई साझीदार हो जाये।

और उस आदमी ने पीछे मुड़ कर इस बार भी नहीं देखा।

 और वक्‍त गुजरता गया। वह ठूंठ राह देखता रहा, वह चिल्‍लाना चाहता था। कहना चाहता था, अपने ह्रदय की पुकार, पर अब उसके पास पत्‍ते भी नहीं थे। शाखाएं भी नहीं थी। हवाएँ आती और वह उनसे बात भी नहीं कर पाता था। बुला भी नहीं पाता था अपने प्रेमी को। लेकिन प्राणों में अब भी एक गुंज थी आओ-आओ....एक बार फिर आओ।

 और बहुत दिन बीत गये। अब वह बच्‍चा  बूढा आदमी हो गया था। वह निकल रहा था उसके पास से। और वह वृक्ष के पास आकर खड़ा हो गया। बहुत दिनों बाद आये, पर तुम्‍हें भी मेरी याद सताती तो है। कहो सब ठीक है। कैसे उदास हो। कमर झुक गई है। बाल सफेद हो गये। आंखों पर चश्मा लग गया है। उसने कहा मैं प्रदेश जाना चाहता हूं। यहां इतनी मेहनत की, कुछ नहीं मिला। वहां जा कर खूब धन कमाऊगां। पर मैं नदी पार नहीं कर सकता। उसके लिए नाव चाहिए। तुम अपना तना मुझे दे दो तो मैं नाव बना सकता हूं। नाव तो तुम मेरी बना सकते हो, पर मुझे भूल मत जाना वहां जाकर। मुझे तुम्‍हारी बहुत याद आती है। तुम लौट कर जरूर इधर आना। मैं यहां तुम्‍हारी प्रतीक्षा करूंगा।

 और उसने उस वृक्ष के तने को काट कर नाव बना ली। वहां रह गया एक छोटा सा ठूंठ, और वह आदमी दूर यात्रा पर निकल गया। और वह ठूंठ उसकी प्रतीक्षा करता रहा कि अब आयेगा। अब आयेगा। लेकिन अब तो उसके पास कुछ भी नहीं था। उसे देने के लिए शायद वह कभी इधर नहीं आयेगा। क्‍योंकि अहंकार वहीं आता है। जहां कुछ पाने को है। अहंकार वहां नहीं जाता,जहां कुछ पाने को नहीं है।

 वह ठूंठ सोच रहा था कि वह मेरा मित्र अब तक नहीं आया। और मुझे बड़ी पीड़ा होती है। कि वह ठीक से तो है। वह मेरे तने की नाव बना कर परदेश गया था। कही मेरे तने में कोई छेद तो नहीं था। उसे रात दिन यही चिंता सताये जाती है। बस एक बार यह पता चल जाये की वह जहां भी है खुश है। तो मैं तृप्‍त हो जाऊँगा। एक खबर मुझे भर कोई ला दे। अब मैं मरने के करीब हूं। इतना पता चल जाये कि वह सकुशल है, फिर कोई बात नहीं। फिर सब ठीक है। अब तो मेरे पास देने को कुछ नहीं है। इसलिए बूलाऊं भी तो शायद वह नहीं आयेगा। क्‍योंकि वह केवल लेने की ही भाषा समझता है।

 अहंकार लेने की भाषा समझता है। प्रेम देने की भाषा है।

 जीवन एक ऐसा वृक्ष बन जाये और उस वृक्ष की शाखाएं अनंत तक फैल जायें। सब उसकी छाया में हों और सब तक उसकी बाँहें फैल जायें तो पता चल सकता है कि प्रेम क्‍या है।

प्रेम का कोई शास्‍त्र नहीं है। न कोई परिभाषा है। न  प्रेम का कोई सिद्धांत ही है।

यह बूढ़ा वृक्ष एक बाप है जो अपना सब कुछ अपने बच्चों की खुशी के उन्हें दे देता है और बदले में पाता है ........।

      

      

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

स्त्री पुरुष

आप किसी आदमी का नाम भूल सकते है, जाति भूल सकते है। चेहरा भूल सकते है? अगर मैं आप से मिलूं या मुझे आप मिलें तो मैं सब भूल सकता हूं कि आपका नाम क्‍या था,आपका चेहरा क्‍या था, आपकी जाति क्‍या थी, उम्र क्‍या थी आप किस पद पर थे,सब भूल सकते है।  कभी आप भूल सकते है इस बात को कि जिससे आप मिले थे, वह पुरूष है या स्‍त्री? नहीं यह बात आप कभी नहीं भूल सके होगें। जब सारी बातें भूल जाती है तो यह क्‍यों नहीं भूलता?

हमारे भीतर मन में कहीं सैक्‍स बहुत अतिशय हो बैठा है। वह चौबीस घंटे उबल रहा है। इसलिए सब बातें भूल जाती है। लेकिन यह बात नहीं भूलती है। हम सतत सचेष्‍ट है। यह पृथ्‍वी तब तक स्‍वस्‍थ नहीं हो सकेगी, जब तक आदमी और स्‍त्रियों के बीच यह दीवार और यह फासला खड़ा हुआ है। यह पृथ्‍वी तब तक कभी भी शांत नहीं हो सकेगी,जब तक भीतर उबलती हुई आग है और उसके ऊपर हम जबरदस्‍ती बैठे हुए है। उस आग को रोज दबाना पड़ता है। उस आग को प्रतिक्षण दबाये रखना पड़ता है। वह आग हमको भी जला डालती है। सारा जीवन राख कर देती है। लेकिन फिर भी हम विचार करने को राज़ी नहीं होते। 

अगर हम इस आग को समझ लें, तो यह आग दुश्‍मन नहीं दोस्‍त है। यह हमें जलायेगी नहीं, हमारी रोटियाँ  सेक सकती है।सर्दियों में हमारे घर को गर्म भी कर सकती है। और हमारी जिंदगी में सहयोगी और मित्र भी हो सकती है। 

मनुष्‍य के भीतर बिजली से भी अधिक ताकत है सैक्‍स की। मनुष्‍य के भीतर अणु की शक्‍ति से भी बड़ी शक्‍ति है सैक्‍स की। क्‍या आपने सोचा कि मनुष्‍य के काम की ऊर्जा का एक अणु एक नये व्‍यक्‍ति को जन्‍म देता है।  एक छोटा सा अणु एक मनुष्‍य की काम ऊर्जा का, एक महामानव को छिपाये हुए है। लेकिन हम सैक्‍स को समझने को राज़ी नहीं है। लेकिन हम सैक्‍स की ऊर्जा के संबंध में बात करने की हिम्‍मत जुटाने को राज़ी नहीं है। कौन सा भय हमें पकड़े हुए है कि जिससे सारे जीवन का जन्‍म होता है। उस शक्‍ति को हम समझना नहीं चाहते?कौन सा डर है कौन सी घबराहट है? जो लोग सैक्‍स के संबंध में बात करने की मनाही करते है, वे ही लोग पृथ्‍वी को सैक्‍स के गड्ढे में डाले हुए है।  जो लोग घबराते है और जो समझते है कि धर्म का सैक्‍स से कोई संबंध नहीं, वह खुद तो पागल है ही, वे सारी पृथ्‍वी को पागल बनाने में सहयोग कर रहे है। धर्म का संबंध मनुष्‍य की शक्‍ति को रूपांतरित करने से है। धर्म चाहता है कि मनुष्‍य के व्‍यक्‍तित्‍व में जो छिपा है, वह श्रेष्‍ठतम रूप से अभिव्‍यक्‍त हो जाये। धर्म चाहता है कि मनुष्‍य का जीवन निम्न से उच्‍च की एक यात्रा बने। पदार्थ से परमात्‍मा तक पहुंच जाये। हम जहां जाना चाहते है, उस स्‍थान को समझना उतना उपयोगी नहीं है। जितना उस स्‍थान को समझना उपयोगी है, जहां से यह यात्रा शुरू करनी है।

 सैक्‍स हमारे जीवन का तथ्‍य है। इस तथ्‍य को समझ कर हम परमात्‍मा की यात्रा कर सकते है। लेकिन इसे बिना समझे एक इंच आगे नहीं जा सकते।  हम जीवन की वास्‍तविकता को समझने की भी तैयारी नहीं दिखाते। तो फिर हम ओर क्‍या कर सकते है। और आगे क्‍या हो सकता है। फिर ईश्‍वर की परमात्‍मा की सारी बातें सान्‍त्‍वना ही, कोरी सान्‍त्‍वना की बातें है और झूठ है। क्‍योंकि जीवन के परम सत्‍य चाहे कितने ही नग्‍न क्‍यों न हो, उन्‍हें जानना ही पड़ेगा। समझना ही पड़ेगा।

 मनुष्‍य का जन्‍म सैक्‍स से होता है। मनुष्‍य का सारा जीवन व्‍यक्‍तित्‍व सैक्‍स के अणुओं से बना हुआ है। मनुष्‍य का सारा प्राण सैक्‍स की उर्जा से भरा हुआ है। जीवन की उर्जा अर्थात काम की उर्जा। यह जो काम की ऊर्जा है, वह क्‍या है? यह क्‍यों हमारे जीवन को इतने जोर से आंदोलित करती है? क्‍यों हमारे जीवन को इतना प्रभावित करती है? क्‍यों हम घूम घूम कर सैक्‍स के आसपास, उसके ईद-गिर्द ही चक्‍कर लगाते है। और समाप्‍त हो जाते है। कौन सा आकर्षण है इसका? 

हजारों साल से ऋषि,मुनि कह रहे है कि मुख मोड़ लो सैक्स से। दूर हट जाओ इससे। सैक्‍स की कल्‍पना और काम वासना छोड़ दो। चित से निकाल डालों ये सारे सपने।लेकिन आदमी के चित से यह सपने निकले ही नहीं। कभी निकल भी नहीं सकते है इस भांति।   

क्‍योंकि हमने उस समस्‍या को समझने की भी चेष्‍टा नहीं की है। हमने उस ऊर्जा के नियम भी जानने नहीं चाहे है। हमने कभी यह भी नहीं पूछा कि मनुष्‍य का इतना आकर्षण क्‍यों है। कौन सिखाता है, सैक्‍स आपको। सारी दूनिया तो सीखने के विरोध में सारे उपाय करती है। मॉं-बाप चेष्‍टा करते है कि बच्‍चे को पता न चल जाये। शिक्षक चेष्‍टा करता है। धर्म शास्‍त्र चेष्‍टा करते है कहीं स्‍कूल नहीं, कहीं कोई युनिवर्सिटी नहीं। लेकिन आदमी अचानक एक दिन पाता है कि सारे प्राण काम की आतुरता से भर गये है। 

सैक्‍स का आकर्षण इतना प्रबल है, इतना नैसर्गिक केंद्र क्‍या है, जरूर इसमें कोई रहस्‍य है और इसे समझना जरूरी है। तो शायद हम इससे मुक्‍त भी हो सकते है।

 मनुष्‍य के प्राणों में जो काम वासना है, वह वस्‍तुत: काम की वासना नहीं है। हर आदमी काम के कृत्‍य के बाद पछताता है, दुःखी होता है पीडित होता है। सोचता है कि इससे मुक्‍त हो जाऊँ। लेकिन एक अनुभव काम का, संभोग का, उसे गहरे ले जाता है। और उसकी गहराई में दो घटनायें घटती है, एक संभोग के अनुभव में अहंकार विसर्जित हो जाता है।  एक क्षण के लिए अहंकार नहीं रह जाता, एक क्षण को यह याद भी नहीं रह जाता कि मैं हूं।

धर्म में श्रेष्‍ठतम अनुभव में ‘मैं’ बिलकुल मिट जाता है। अहंकार बिलकुल शून्‍य हो जाता है। सेक्‍स के अनुभव में क्षण भर को अहंकार मिटता है। लगता है कि मै हूं या नहीं। एक क्षण को विलीन हो जाता है मेरा पन का भाव।

समाधि का जो अनुभव है वहां  समय नहीं रह जाता है। वह कालातीत है। समय बिलकुल विलीन हो जाता है। न कोई अतीत है, न कोई भविष्‍य,शुद्ध वर्तमान रह जाता है। सेक्‍स के अनुभव में यह दूसरी घटना घटती है। न कोई अतीत रह जाता है , न कोई भविष्‍य, एक क्षण के लिए समय विलीन हो जाता है।

दो तत्‍व है, जिसकी वजह से आदमी सैक्‍स की तरफ आतुर होता है और पागल होता है। वह आतुरता स्‍त्री के शरीर के लिए नहीं है। पुरूष के शरीर के लिए नहीं है। वह आतुरता शरीर के लिए बिलकुल भी नहीं है। वह आतुरता किसी और ही बात के लिए है। वह आतुरता है,अहंकार शून्‍यता का अनुभव, समय शून्‍यता का अनुभव।

 समय-शून्‍य और अहंकार शून्‍य होने के लिए आतुरता क्‍यों है? क्‍योंकि जैसे ही अहंकार मिटता है, आत्‍मा की झलक उपलब्‍ध होती है। जैसे ही समय मिटता है, परमात्‍मा की झलक मिलनी शुरू हो जाती है।

 एक क्षण की होती है यह घटना, लेकिन उस एक क्षण के लिए मनुष्‍य कितनी ही ऊर्जा, कितनी ही शक्‍ति खोने को तैयार है। शक्‍ति खोने के कारण पछतावा है बाद में कि शक्‍ति क्षीण हुई शक्‍ति का अपव्‍यय हुआ। और उसे पता है कि शक्‍ति जितनी क्षीण होती है मौत उतनी करीब आती है।

मनुष्‍य को यह अनुभव में आ गया बहुत पहले कि सैक्‍स का अनुभव शक्‍ति को क्षीण करता है। जीवन ऊर्जा कम होती है। और धीरे-धीरे मौत करीब आती है। पछतावा है आदमी के प्राणों में, पछताने के बाद फिर पाता है घड़ी भर बाद कि वही आतुरता है। निश्‍चित ही इस आतुरता में कुछ और अर्थ है, जो समझ लेना जरूरी है।

 सैक्‍स की आतुरता में आत्‍मिक अनुभव है। उस अनुभव को अगर हम देख पाये तो हम सैक्‍स के ऊपर उठ सकते है। अगर उस अनुभव को हम न देख पाये तो हम सैक्‍स में ही जियेंगे और मर जायेंगे। 

संभोग का इतना आकर्षण क्षणिक समाधि के लिए है। और संभोग से आप उस दिन मुक्त होंगे। जिस दिन आपको समाधि बिना संभोग के मिलना शुरू हो जायेगी। उसी दिन संभोग से आप मुक्‍त हो जायेंगे, सैक्‍स से मुक्‍त हो जायेंगे।

सैक्‍स जिस अनुभूति को लाता है। अगर वह अनुभूति किन्‍हीं और मार्गों से उपलब्‍ध हो सके, तो आदमी का चित सैक्‍स की तरफ बढ़ना, अपने आप बंद हो जाता है। उसका चित एक नयी दिशा लेनी शुरू कर देता है।

       

मनुष्य का जीवन

एक पौधा पूरी चेष्‍टा कर रहा है,नये बीज उत्पन्न करने की, एक पौधे के सारे प्राण,सारा रस, नये बीज इकट्ठे करने, जन्‍म लेनें की चेष्‍टा कर रहे है। एक पक्षी क्‍या कर रहा है। एक पशु क्‍या कर रहा है।

अगर हम सारी प्रकृति में खोजने जायें तो हम पायेंगे, सारी प्रकृति में एक ही क्रिया जोर से प्राणों को घेर कर चल रही है। और वह क्रिया है सतत-सृजन की क्रिया। वह क्रिया है जीवन को पुनर्जीवित, नये-नये रूपों में जीवन देने की क्रिया। फूल बीज को संभाल रहे है, फल बीज को संभाल रहे है। बीज क्‍या करेगा? बीज फिर पौधा बनेगा। फिर फल बनेगा।

अगर हम सारे जीवन को देखें, तो जीवन जन्म लेने की एक अनंत क्रिया का नाम है। जीवन एक ऊर्जा है, जो स्‍वयं को पैदा करने के लिए सतत संलग्न है और सतत चेष्‍टा शील है।

आदमी के भीतर भी वहीं है।मनुष्‍य के भीतर भी जीवन को जन्‍म देने की सतत चेष्‍टा चल रही है। आदमी के भीतर उस सतत सृजन की चेष्‍टा का नाम हमने सैक्‍स दे रखा है, काम दे रखा है। इस  नाम के कारण उस ऊर्जा को एक गाली मिल गयी है। एक  अपमान । इस नाम के कारण एक निंदा का भाव पैदा हो गया    है। 

 मनुष्‍य को जमीन पर आये बहुत दिन नहीं हुए है, कुछ लाख वर्ष हुए। उसके पहले मनुष्‍य नहीं था। लेकिन पशु थे। पशु को आये हुए भी बहुत ज्‍यादा समय नहीं हुआ। एक जमाना था कि पशु भी नहीं था। लेकिन पौधे थे। पौधों को भी आये बहुत समय नहीं हुआ। एक समय था जब पौधे भी नहीं थे। पहाड़ थे। नदियां थी, सागर थे। पत्‍थर थे। पत्‍थर, पहाड़ और नदियों की जो दुनिया थी वह किस बात के लिए पीड़ित थी?

वह पौधों को पैदा करना चाहती थी। पौधे धीरे-धीरे पैदा हुए। जीवन ने एक नया रूप लिया। पृथ्‍वी हरियाली से भर गयी।     फूल खिल गये। लेकिन पौधे भी अपने से तृप्‍त नहीं थे। वे सतत जीवन को जन्‍म देते है। उसकी भी कोई चेष्‍टा चल रही थी। वे पशुओं को पक्षियों को जन्‍म देना चाहते है। पशु, पक्षी पैदा हुए।

हजारों लाखों बरसों तक पशु, पक्षियों से भरा था यह जगत, लेकिन मनुष्‍य का कोई पता नहीं था। पशुओं और पक्षियों के  प्राणों के भीतर निरंतर मनुष्‍य भी निवास कर रहा था। पैदा होने की चेष्‍टा कर रहा था। फिर मनुष्‍य पैदा हुआ।

 मनुष्‍य भी निरंतर नये जीवन को पैदा करने के लिए आतुर है। उस क्रिया को हम  सैक्‍स कहते है, हम उस को काम  वासना कहते है। लेकिन उस वासना का मूल अर्थ क्‍या है? मूल अर्थ इतना है कि मनुष्‍य अपने पर समाप्‍त नहीं होना चाहता, आगे भी जीवन को पैदा करना चाहता है। लेकिन क्‍यों? क्‍या मनुष्‍य के प्राणों में, मनुष्‍य के ऊपर किसी महा मानव को पैदा करने की कोई चेष्‍टा नहीं चल रही है?

निश्‍चित ही चल रही है। निश्‍चित ही मनुष्‍य के प्राण इस चेष्‍टा में संलग्‍न है कि मनुष्‍य से श्रेष्‍ठतर जीवन जन्‍म पा सके। मनुष्‍य से श्रेष्‍ठतर प्राणी आविर्भूत हो सके। सारे मनुष्‍य के प्राणों में एक कल्‍पना, एक सपने की तरह बैठी रही कि मनुष्‍य से बड़ा प्राणी पैदा कैसे हो सके। लेकिन मनुष्‍य से बड़ा प्राणी पैदा कैसे होगा?

हमने तो हजारों वर्षों से इस के पैदा होने की कामना को ही निंदित कर रखा है। हमने तो सैक्‍स को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्‍मान नहीं दिया। हम तो बात करने मे भयभीत होते है। हमने तो सैक्‍स को इस भांति छिपा कर रख दिया है, जैसे वह है ही नहीं। जैसे उसका जीवन में कोई स्‍थान नहीं है। जब कि सच्‍चाई यह है कि उससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण मनुष्‍य के जीवन में  ओर कुछ भी नहीं है। लेकिन उसको छिपाया है, दबाया है।

दबाने और छिपाने से मनुष्‍य सैक्‍स से मुक्‍त नहीं हो गया, बल्‍कि और भी बुरी तरह से सैक्‍स से ग्रसित हो गया। दमन उलटे परिणाम लाता है। क्‍या कभी आपने वह सोचा है कि आप चित को जहां से बचाना चाहते है, चित वहीं आकर्षित हो जाता है। जिन लोगो ने मनुष्‍य को सैक्‍स के विरोध में समझाया, उन लोगों ने ही मनुष्‍य को कामुक बनाने का जिम्‍मा भी अपने ऊपर ले लिया है।मनुष्‍य की अति कामुकता गलत शिक्षाओं का परिणाम है।

आज भी हम भयभीत होते है कि सैक्‍स की बात न की जाये। क्‍यों भयभीत होते है? भयभीत इसलिए होते है कि हमें डर है कि सैक्‍स के संबंध में बात करने से लोग और कामुक हो जायेंगे। यह बिलकुल ही गलत भ्रम है। यह शत-प्रतिशत गलत है। पृथ्‍वी उसी दिन सैक्‍स से मुक्‍त होगी, जब हम सैक्‍स के संबंध, में सामान्‍य, स्‍वस्‍थ बातचीत करने में समर्थ हो जायेंगे। जब हम सैक्‍स को पूरी तरह से समझ सकेंगे, तो ही हम सैक्‍स को अपने जीवन  से दूर कर सकेंगे।

जगत में ब्रह्मचर्य का जन्‍म हो सकता है। मनुष्‍य सैक्‍स के ऊपर उठ सकता है। लेकिन सैक्‍स को समझकर, सैक्‍स को पूरी तरह पहचान कर, उस की ऊर्जा के पूरे अर्थ, मार्ग, व्‍यवस्‍था को जानकर, उस से मुक्‍त हो सकता है।

वह सोचता है, आँख बंद कर लो सैक्‍स के प्रति तो सैक्‍स मिट जायेगा। अगर आँख बंद कर लेने से चीजें मिटती तो बहुत आसान थी जिंदगी। बहुत आसान होती दुनिया। आँख बंद करने से कुछ मिटता नहीं है। बल्‍कि जिस चीज के संबंध में हम आँख बंद करते है। हम प्रमाण देते है कि हम उस से भयभीत है। हम डर गये है। वह हमसे ज्‍यादा मजबूत है। उससे हम जीत नहीं सकते है, इसलिए आँख बंद करते है। आँख बंद करना कमजोरी का लक्षण है।आदमी बातचीत करेगा आत्‍मा की, परमात्‍मा की, स्‍वर्ग की, मोक्ष की। परन्तु सैक्‍स की कभी कोई बात नहीं करेगा। और उसका सारा व्‍यक्‍तित्‍व चारों तरफ से सैक्‍स से भरा हुआ है। 

 ब्रह्मचर्य की बात हम करते है। लेकिन कभी इस बात की चेष्‍टा नहीं करते कि पहले मनुष्‍य की काम की ऊर्जा को समझा जाये, फिर उसे रूपान्‍तरित करने के प्रयोग भी किये जा सकते है। बिना उस ऊर्जा को समझे दमन की, संयम की सारी शिक्षा, मनुष्‍य को पागल, विक्षिप्‍त और रूग्ण करेगी। इस संबंध में हमें कोई भी ध्‍यान नहीं है। यह मनुष्‍य इतना रूग्‍ण, इतना दीन-हीन कभी भी न था । इतना दुःखी भी न था। 

 अगर हम आदमी की तरफ देखेगें तो दिखाई पड़ेगा,आदमी के भीतर बहुत जहर इकट्ठा हो गया है। और उस जहर के इकट्ठे हो जाने का कारण यह है कि हमने उसकी प्रकृति को स्‍वीकार नहीं किया है। उसकी प्रकृति को दबाने और जबरदस्‍ती तोड़ने की चेष्‍टा की है। मनुष्‍य के भीतर जो शक्‍ति है। उस शक्‍ति को रूपांतरित करने का, ऊंचा ले जाने का, आकाशगामी बनाने का हमने कोई प्रयास नहीं किया। उस शक्‍ति के ऊपर हम जबरदस्‍ती कब्‍जा करके बैठ गये है। वह शक्‍ति नीचे से ज्‍वालामुखी की तरह उबल रही है। और धक्‍के दे रही है। वह आदमी को किसी भी क्षण उलटा देने की चेष्‍टा कर रही है। 


“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...