सोमवार, 9 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 11

 मांग और प्रार्थना


मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥49॥


संजय उवाच:


इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्ला स्वकं रूयं दर्शयामास भूय:।

आश्वासयामास व भीतमेनं भूत्वा पुन: सौम्यवगुर्महात्मा।। 50।।


अर्जुन उवाच:


दृष्ट्रवेदं मानुष रूपं तव सौम्य जनार्दन।

हदानीमस्थि संवृत: सचेता: प्रकृतिं गत:।। 51।।


इस प्रकार के मेरे इस विकराल रूप को देखकर तेरे को व्याकुलता न होवे और मूढभाव भी न होवे और भयरहित प्रीतियुक्त मन वाला तू उस ही मेरे इस शंख चक्र गदा पद्य सहित चतुर्भुज रूप को फिर देख।

उसके उपरांत संजय बोला हे राजन— वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भूज रूप को दिखाया और फिर महात्मा कृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर उस भयभीत हुए अर्जुन को धीरज दिया। उसके उपरांत अर्जुन बोला हे जनार्दन आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांतचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूं।


इस प्रकार के मेरे इस विकराल रूप को देखकर तेरे को व्याकुलता न होवे और मूढ्भाव भी न होवे और भयरहित, प्रीतियुक्त मन वाला तू उस ही मेरे इस शंख, चक्र, गदा, पद्य सहित चतुर्भुज रूप को फिर देख।

कृष्‍ण ने कहा, मैं लौट आता हूं वापस साकार में, सगुण में, ताकि तुझे भय न होवे, तेरे मन को राहत मिले, सांत्वना मिले। इसलिए मैं अपने उसी रूप में वापस लौट आता हूं जिसकी तू मांग कर रहा है।

यहां एक बात समझ लेने जैसी जरूरी है कि विराट का और व्यक्ति का संबंध मां और बेटे का संबंध है। कहता हूं मां और बेटे का; बाप और बेटे का नहीं—सोचकर। पीछे आपसे बात करूंगा। विराट और व्यक्ति के बीच जो संबंध है वह मां और बेटे का संबंध है। क्योंकि हम विराट से उत्पन्न होते हैं। उसकी ही लहरें, उसकी ही तरंगें हम हैं। वही हममें खिला। वही हममें फूल—पत्ता बना। वही हमारा व्यक्तित्व है।

तो हमारे और विराट के बीच जो संबंध है, वह वही होगा जो एक मां और बेटे के बीच है। क्योंकि मां के गर्भ में बेटा बड़ा होता है उसके अंग की भांति, उसके शरीर की भांति। कुछ भेद नहीं होता। मां मरेगी, तो उसका बेटा मर जाएगा। और बेटा भीतर मर जाए, तो मां की मौत घट सकती है। दोनों एक हैं। एक से ही जुड़े हैं। बेटा अपनी सांस भी नहीं लेता, मां से ही जीता है। मां का ही प्राण उसका प्राण है। मां के साथ एक साथ एक है। जैसे लहर सागर के साथ एक है।

फिर यह बेटा पैदा होता है। तो जैसे मां का ही एक हिस्सा बाहर गया, जैसे मां का ही एक अंग अनंत की यात्रा पर निकला। यह कहीं भी रहे, कितना ही दूर रहे, मां से बहुत सूक्ष्म तंतुओं से जुड़ा रहता है।




अगर सच में ही मां और बेटे की घटना घटी हो..। सच में इसलिए कहता हूं कि सभी के भीतर नहीं भी घटती। कुछ माताएं केवल जननी होती हैं, माताएं नहीं। कोई बहुत भाव से जन्म नहीं देतीं। एक जबरदस्ती थी, एक बोझ था, एक काम था, निपटा दिया। इन माताओं का बस चलेगा, तो आज नहीं कल, जैसा आज वे बच्चे के पैदा होने के बाद नर्स को पालने के लिए रख लेती हैं, आज नहीं कल वे किसी नर्स को गर्भ के लिए भी रख लेंगी! और पश्चिम में उपाय हो गए हैं अब कि आपका बेटा किसी दूसरे के गर्भ में बड़ा हो सकता है। तो जो सुविधा—संपन्न हैं, वे अपने गर्भ में बड़ा नहीं करेंगी, वे किसी और के गर्भ में बड़ा कर लेंगी।

मां का मतलब तो यह है कि इस बेटे में मैं जन्मी, इस बेटे में मेरा जीवन आगे फैला। जैसे वृक्ष की एक शाखा दूर आकाश में निकल जाए, बस ठीक मेरी एक शाखा आगे गई।

जीवन इतना इकट्ठा मालूम पड़े जिस मां को भी, उसके और उसके बेटे के बीच हजारों मील के बीच भी संबंध होता है। इस पर बड़ा काम हुआ है। और अगर बेटा बीमार पड़ जाए, तो मां बेचैन हो जाती है। हजारों मील के फासले पर! अगर बेटा मर जाए, तो मां को तत्‍क्षण आघात पहुंचता है।

अभी रूस के कुछ वैज्ञानिक पशुओं के साथ प्रयोग कर रहे थे, तो बहुत चकित हुए। और पता चला कि पशुओं में मातृत्व शायद ज्यादा है मनुष्यों की बजाय! खरगोश पर वे प्रयोग कर रहे थे। तो खरगोश के बच्चों को रखा गया ऊपर और उनकी मां को वे ले गए नीचे समुद्र में एक पनडुब्बी में। और उन्होंने बच्चों को ऊपर सताना शुरू किया, जब मां पनडुब्बी में नीचे थी। जैसे ही उन्होंने बच्चों को सताना शुरू किया, मां वहां बेचैन हो गई। उन्होंने सब यंत्र लगा रखे थे, ताकि उसकी बेचैनी नापी जा सके कि वह कितनी परेशान है। और जब उन्होंने बच्चों को मार डाला, तो उसकी परेशानी का कोई अंत नहीं था, वह बेहोश हो गई परेशानी में।

यह प्रयोग कोई सौ बार किया। और हर बार अनुभव हुआ कि वह खरगोश और उसकी मां के बीच समय और स्थान का कोई फासला नहीं है। उनके भीतर कुछ अंतरंग वार्ता चल रही है। निरंतर कोई अंतरंग संबंध चल रहा है। कोई ध्वनि—तरंगें उन दोनों को जोड़े हुए हैं।

तो मां और बेटे के बीच जैसा संबंध है, उससे भी गहन— उदाहरण के लिए कह रहा हूं मां और बेटे का— अस्तित्व और आपके बीच संबंध है। आप अस्तित्व के ही हिस्से हैं। अस्तित्व ही आपमें फैल गया है और दूर तक। आप अस्तित्व हैं।

इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि अस्तित्व आपको दुख नहीं देना चाहता। अस्तित्व आपको भयभीत भी नहीं करना चाहता। क्यों करना चाहेगा? मां बेटे को क्यों दुख देना चाहेगी? अस्तित्व आपको परेशान नहीं करना चाहता। और अगर आप परेशान हैं, तो वह आप अपने ही कारण होंगे। अगर भयभीत हैं, तो अपने ही कारण होंगे। अगर दुखी हैं, तो अपने ही कारण होंगे। अस्तित्व आपको दुखी नहीं करना चाहता।

जीवन तो आपको पूरे आनंद का मौका, सुविधा, अवसर, सामर्थ्य, सब देता है। आप ही कुछ गड़बड कर लेते हैं। आप ही बीच में खड़े हो जाते हैं और अस्तित्व और अपने बीच बाधा बन जाते हैं। यह जो कृष्‍ण का कहना है कि मैं वापस लौट आता हूं। यह इसका सूचक है कि अस्तित्व से आप जो भी गहन भाव से प्रार्थना करेंगे, अस्तित्व से जो भी गहन भाव से आप कहेंगे, प्रेमपूर्वक अस्तित्व से जो भी आप निवेदन करेंगे, अस्तित्व बहरा नहीं है, अस्तित्व हृदयहीन नहीं है।

यही विज्ञान और धर्म की समझ का भेद है। विज्ञान कहता है, अस्तित्व है हृदयहीन, हार्टलेस। कुछ भी करो, अस्तित्व तुम्हारी सुनने वाला नहीं है। कुछ भी करो, अस्तित्व के पास कान नहीं हैं कि तुम्हारी सुने। कुछ भी करो, अस्तित्व को पता भी नहीं चलेगा। यह विज्ञान की दृष्टि है। अस्तित्व है गहन उपेक्षा में। तुम क्या हो, हो या नहीं हो, कोई प्रयोजन नहीं है।

धर्म कहता है, यह असंभव है। अगर हम अस्तित्व के ही हिस्से हैं, तो यह असंभव है कि अस्तित्व हमारे प्रति इतना उपेक्षा से भरा हो। अस्तित्व हमारे प्रति किसी गहरे लगाव में न हो, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि हम अस्तित्व से पैदा हुए हैं। अगर हम अस्तित्व से ही पैदा हुए हैं और उसी में लीन हो जाएंगे, तो हम उसी का खेल हैं। तो अस्तित्व प्रतिपल हमारे प्रति सजग है, और अस्तित्व हृदयपूर्ण है।

बच्चा देखता है कि मां नहीं है पास, तो जोर से चिल्लाने लगता है, रोने लगता है। इसलिए नहीं कि मां बहरी है, बल्कि सिर्फ इसलिए कि बच्चा कमजोर है। उसकी आवाज का उसे खुद ही भरोसा नहीं है। इसलिए जोर से चिल्ला रहा है।

यह जो सूत्र है, कृष्ण कहते हैं, मैं वापस लौट आता हूं यह इस बात की खबर है कि अस्तित्व वैसा ही हो जाएगा, जैसी आपकी गहरी—गहरी मौन प्रार्थना होगी। जैसा गहरा भाव होगा, अस्तित्व वैसा ही राजी हो जाएगा।

इसके बड़े इंप्लीकेशंस हैं, इसकी बड़ी रहस्यपूर्ण उपपत्तिया हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आप जो भी कर रहे हैं, वह भी! अस्तित्व ने रूप ले लिया है आपकी वासनाओं के कारण। आपने मांगी थी एक सुंदर स्त्री, वह आपको मिल गई। आपने मांगा था एक मकान, वह घटित हो गया। आपने चाहा था एक सुंदर शरीर, स्वस्थ शरीर, वह हो गया।

आप कहेंगे, नहीं होता। मांगी थी सुंदर स्त्री, मिल गई कुरूप। मांगा था सुंदर—स्वस्थ शरीर, मिल गई बीमारियों वाली देह।

लेकिन उसमें भी आप खयाल करें कि उसमें भी आपकी ही मांग रही होगी। आपको जो भी मिल गया है, उसमें कहीं न कहीं आपकी मांग रही होगी। आपकी मांगें बड़ी कंट्राडिक्टरी हैं, विरोधाभासी हैं। इसलिए अस्तित्व भी बड़ी दिक्कत में होता है। क्योंकि आप एक तरफ से जो मांगते हैं, दूसरी तरफ से खुद ही गलत कर लेते हैं।

 एक लड़की भगवान के पास आई और उसने कहा कि मुझे पति ऐसा चाहिए, शेर जैसा। सिंह हो। दबंग हो। लेकिन सदा मेरी माने! अब मुश्किल हो गई। अब इनको एक ऐसा पति मिलेगा जो देखने में शेर हो और भीतर से बिलकुल भेड़—बकरी हो। तब इसको तकलीफ होगी। इसकी मांगें विरोधी हैं। जो दबंग होगा, वह तुझसे क्यों दबेगा? वह सबसे पहले तुझी को दबाएगा। सबसे निकट तेरे को ही पाएगा। अब इस स्त्री की जो मांग है, विरोधाभासी है, कट्राडिक्टरी है। हालांकि उसे खयाल भी नहीं है।

पुरुष ऐसी स्त्री चाहता है, जो बहुत सुंदर हो। ऐसी स्त्री जरूर चाहता है, जो बहुत सुंदर हो, लेकिन साथ में वह ऐसी स्त्री भी चाहता है, जो बिलकुल पक्की पतिव्रता हो। साथ में वह यह भी चाहता है कि किसी आदमी की नजर मेरी स्त्री की तरफ बुरी न पड़े। अब वह सब उपद्रव की बातें चाह रहा है। बहुत सुंदर स्त्री होगी, दूसरों की नजर भी पड़ेगी। और ध्यान रहे, बहुत सुंदर स्त्री भी बहुत सुंदर पुरुष की तलाश कर रही है, आपकी तलाश नहीं कर रही है।, तो पतिव्रता होना जरा मुश्किल है।

हमारी वासनाएं हैं विरोधी। हम जो मांग करते हैं, वे एक—दूसरे को काट देती हैं। अस्तित्व हमारी सब मांगें पूरी कर देता है, यह जानकर आप हैरान होंगे। लेकिन आपको पता ही नहीं, आप क्या मांगते हैं। कल जो मांगा था, आज इनकार कर देते हैं। आज जो मांगते हैं, सांझ इनकार कर देते हैं। आपको पता ही नहीं कि आपने इतनी मांगें अस्तित्व के सामने रख दी हैं कि अगर वह सब पूरी करे, तो आप पागल होंगे ही, कोई और उपाय नहीं है। और उसने सब पूरी कर दी हैं।

जिन्होंने धर्म में गहन प्रवेश किया है, वे जानते हैं कि आदमी की जो भी मांगें हैं, वे सब पूरी हो जाती हैं। यही आदमी की मुसीबत है।

ये कृष्‍ण राजी हो गए, यह इस बात की खबर है कि अस्तित्व राजी है, जरा सोच—समझकर उससे कुछ मांगना। बेहतर हो मत मांगना; उसी पर छोड़ देना कि जो तेरी मर्जी। तब आपकी जिंदगी में कष्ट नहीं होगा, क्योंकि तब उसकी मर्जी में कोई विरोध नहीं है। समर्पण का यही अर्थ है कि तू जो ठीक समझे, वह करना।

हम में से जो बड़े से बड़े लोग हैं, वे भी इतनी हिम्मत नहीं कर पाते।

कृष्‍ण ने कहा कि मैं पूरा किए देता हूं। तू जैसा चाहता है, वैसा मैं वापस हुआ जाता हूं।

वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया। और फिर महात्मा कृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत हुए अर्जुन को धीरज दिया।

फिर भगवान कृष्‍ण नहीं कहा संजय ने। क्योंकि जैसे ही वे सीमा में आ गए, वे जैसे ही रूप में बंध गए, जैसे ही उनकी चारों भुजाएं प्रकट हो गईं, और जैसे ही अर्जुन के मनोनुकूल वे खड़े हो गए, भगवान शब्द छोड़ दिया। तत्‍क्षण कहा, महात्मा कृष्‍ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत हुए अर्जुन को धीरज दिया।

महात्मा और परमात्मा में इतना ही फर्क है। परमात्मा आपकी मर्जी के अनुकूल नहीं चल सकता। आपको उसकी मर्जी के अनुकूल चलना होगा। महात्मा आपके धीरज और सांत्वना के लिए बहुत बार आपकी मर्जी के अनुकूल भी चलता है। वह दया से भरा है।

ईश्वर तो भूकंप है। इसलिए जो मरने को तैयार हैं, वही उसमें प्रवेश कर पाते हैं। लेकिन अगर हमारी मांग सीमा की है, तो महात्मा प्रकट होते हैं। महात्मा ईश्वर का वह रूप है, जो हमारे अनुकूल है। इसे थोड़ा ठीक से समझ लें। महात्मा परमात्मा का वह रूप है, जो हमारे अनुकूल है।

इसलिए कृष्‍ण को हमने पूर्ण अवतार कहा, क्योंकि बहुत जगह वह हमारे अनुकूल नहीं हैं। राम को हमने आंशिक अवतार कहा, क्योंकि वे बिलकुल हमारे अनुकूल हैं। राम में भूल—चूक खोजनी मुश्किल है। कृष्ण में भूल—चूक काफी हैं। भूल—चूक इसलिए नहीं कि उनमें भूल—चूक हैं। भूल—चूक इसलिए हैं कि हमारे साथ तालमेल नहीं खाता।

राम और सीता का संबंध समझ में आता है। कृष्‍ण और उनकी गोपियों का संबंध सज्जन से सज्जन आदमी को जरा चिंता में डाल देता है कि यह जरा ठीक नहीं है। जरा ऐसा लगता है कि यह बात न ही उठाओ। कृष्ण में कुछ है, जो हमें डराता भी है।

इसलिए हम उनको पूर्ण अवतार कहे हैं, क्योंकि हम उनसे पूरे राजी नहीं हो पाते। वे पूर्ण हैं। हम इतने अधूरे हैं कि हम उनके आधे हिस्से से ही राजी हो सकते हैं। राम को हमने अधूरा अवतार कहा है, क्योंकि हम उनसे पूरे राजी हो जाते हैं। हम पूरे राजी हो जाते हैं, वे हमारे इतने अनुकूल हैं कि पूरे नहीं हो सकते, बात जाहिर है। हमसे इतना उनका मेल है कि वे अधूरे ही होंगे। वे आंशिक अवतार होंगे।

इसलिए व्यास कहते हैं, महात्मा कृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया।

हे जनार्दन, आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांत—चित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूं।

अर्जुन ने कहा कि यह देखकर आपका सीमा में वापस लौट आना, मैं अपने स्वभाव को उपलब्ध हो गया हूं।

यह स्वभाव क्या है अर्जुन का?

मनुष्य का स्वभाव सशर्त है। वह कहता है, ऐसे होओ, ऐसे होओगे तो ही।

अर्जुन कह रहा है, अब मैं अपने स्वभाव में आ गया, तुम्हें वापस वही देखकर, जो तुम थे। अर्जुन अपने स्वभाव के बाहर चला गया था?

एक अर्थ में चला गया था। और एक अर्थ में अपने गहरे स्वभाव में चला गया था। इस अर्थ में बाहर चला गया था कि मनुष्य की बुद्धि के जो परे है, वह उसके दर्शन में आ गया और वह भयभीत हो गया। उसकी सारी की सारी मनुष्यता डांवाडोल हो गई। मनुष्य की पकड़ में न आ सके, ऐसा उसे दिख गया। और एक अर्थ में वह अपने गहरे स्वभाव में चला गया था। लेकिन वह स्वभाव कास्मिक है, वह स्वभाव जागतिक है; वह मनुष्य का नहीं है।

अर्जुन कह रहा है, मैं अपने स्वभाव में आ गया।

परमात्मा के साथ साधक और भक्त का यही फर्क है, यह खयाल आखिरी ले लें।

साधक कहता है, तुम जैसे हो, वैसा ही मैं तुम्हें देखने आऊंगा; अपने को बदलूंगा। यह संकल्प का रास्ता है। वह कहता है, मैं अपने को बदलूंगा। अगर तुम ऐसे हो, तो मैं अपने को बदलूंगा। अपनी नई आंख पैदा करूंगा। और तुम जैसे हो, वैसा ही तुम्हें देखूंगा।

कृष्णमूर्ति का सारा जोर यही है कि उस पर कोई धारणा लेकर मत जाना। अपनी सब धारणा छोड़ देना। सत्य जैसा है, उसे तुम वैसे ही देखने को राजी होना। उसके लिए खुद को जितना तपाना पड़े, गलाना पड़े, मिटाना पडे, खुद की मूर्च्छा जितनी तोड़नी पड़े, तोड़ना। लेकिन खुद को निखारना, उस पर कोई आग्रह मत करना कि तू ऐसा हो जा।

साधक संकल्प से अपने को बदलता है। और एक दिन, जिस दिन शून्य हो जाता है, शांत, शुद्ध, उस दिन सत्य को देख लेता है।

भक्त! भक्त कहता है कि मैं जैसा  हूं। मैं अपने को बदलने वाला नहीं, तुम्हीं मुझे बदलना। और जब तक मैं ऐसा हूं तब तक मेरी शर्त है कि तुम ऐसे प्रकट होना। भक्त यह कहता है कि मेरा आग्रह है कि जब तक मैं नहीं बदला हूं और मैं अपने को क्या बदल सकूंगा, तुम्हीं बदल सकोगे। और तुम भी मुझे तभी बदल सकोगे, जब मेरा तुमसे नाता, तालमेल बन जाए। अभी मैं जैसा हूं इससे ही संबंध बनाओ। तो तुम इस शक्ल में आ जाओ, इस रूप में खड़े हो जाओ। मैं तुम्हें कृष्ण की तरह, राम की तरह, क्राइस्ट की तरह चाहता हूं ताकि मेरा संबंध बन जाए। संबंध बन जाए, तो फिर तुम मुझे बदल लेना।

यह बड़ी मजेदार बात है। भक्त यह कह रहा है कि मैं अपने को क्या बदलूंगा? कैसे बदलूंगा? मुझे कुछ भी तो पता नहीं है। और मेरी सामर्थ्य, शक्ति कितनी है? कि कैसे अपने को शुद्ध करूंगा? मैं तो अशुद्ध, जैसा भी हूं, यह हूं। तुम ऐसे ही मुझे स्वीकार कर लो। लेकिन इस अशुद्ध आदमी की धारणा है। तो तुम इस शक्ल में आ जाओ, ताकि मेरा संबंध जुड़ जाए। एक दफा संबंध जुड़ जाए और मैं तुम्हारी नाव में सवार हो जाऊं, फिर तुम जहां मुझे ले जाओ, ले जाना। लेकिन अभी मेरी मर्जी की नाव बनकर आ जाओ।

दोनों ही तरह घटना घटती है। जो अपनी सब धारणाओं को गिरा देता है, उसके लिए कोई नाव की जरूरत नहीं रह जाती। उसे उस पार जाने की भी जरूरत नहीं रह जाती, वह इसी पार मुक्त हो जाता है।

लेकिन दुरूह है मार्ग। एक—एक इंच अपने को बदलना है। जिसको बदलना है, उसके ही द्वारा बदलाहट लानी है, इसलिए बड़ा कठिन है। जैसे बीमार अपना ही इलाज कर रहा है।

डाक्टर भी बीमार हो जाए, तो दूसरे डाक्टर के पास जाता है, क्योंकि खुद का इलाज करने में घबड़ाहट लगती है। दूसरे के इलाज में तो एक दूरी होती है, तटस्थता होती है, निरीक्षण, डायग्नोसिस आसान होती है। खुद का ही इलाज करना हो, तो बड़ा मुश्किल हो जाता है। कोई बड़े से बड़ा सर्जन भी खुद का आपरेशन न करेगा। हाथ कंप जाएंगे। खुद का तो दूर है, बड़ा सर्जन अपनी पत्नी का भी आपरेशन करने को राजी नहीं होता। अगर पत्नी से झगड़ा हो, तो बात दूसरी है। थोड़ा लगाव हो, तो राजी नहीं होगा। अगर मार ही डालना चाहता हो, तो बात अलग है। नहीं तो डरेगा, क्योंकि हाथ कंपने लगेगा। राग बीच में आ जाता है।

और अपने को ही बदलना है, तो अपने से तो बहुत राग है। इसलिए भक्त कहता है, यह अपने बस की बात नहीं कि हम अपने को बदल लें। हम तो जैसे हैं, वैसे हैं। हम अपने को छोड़ सकते हैं तेरे चरणों में, बुरे— भले, चोर—बेईमान, जैसे भी हैं, छोड़ सकते हैं। तू ही बदल लेना।

यह भी संभव होता है। और इन दो में साफ होना जरूरी है, नहीं तो आदमी दोनों में डोलता रहता है। दोनों के बीच कोई मार्ग नहीं है। या तो स्पष्ट समझ लेना कि मुझे खुद ही बदलना है, तब फिर किसी परमात्मा को, किसी गुरु को, किसी को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। फिर कितनी ही हो लंबी यात्रा और कितने ही अनंत युग लगें, लड़ते रहना। वह भी बुरा नहीं है। वह भी मनुष्य की गरिमा के अनुकूल है।

लेकिन अगर लगता हो कि यह हमसे न हो सकेगा, यह लड़ाई लंबी है, और हम चुक जाएंगे, टूट जाएंगे, तो फिर व्यर्थ लड़ना मत। फिर समर्पण कर देना। सीधा इसी क्षण छोड़ देना। यह भी मनुष्य की गरिमा के अनुकूल है। क्योंकि वही समर्पण भी कर पाता है, जो कम से कम इतना तो अपना मालिक है कि छोड़ सके। आप वही छोड़ सकते हैं, जिसके आप मालिक हैं।

ये दो हैं रास्ते, समझौता कोई भी नहीं है। इनमें से जो ठीक—ठीक चुन लेता है अपने अनुकूल रास्ता, वह पहुंच जाता है; व्यर्थ भटकाव से बच जाता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 10

 मनुष्‍य बीज है परमात्‍मा का 


  अदृष्‍टपूर्व हषितोउस्‍मि दष्टवा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।

तदेव मे दर्शय देवरूयं प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 45।।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रकुमहं तथैव।

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहसबाहो भव विश्वमूर्ते।। 46।।


श्रीभगवानुवाच:


मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।

तेजोमय विश्वमनन्तमाद्य यन्धे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।। 47।।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न न क्रियाभिर्न तयोभिरुग्रै।

एवंरूक शक्य अहं नृलोके द्रझुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।। 48।।


हे विश्वमूर्ते मैं पहले न देखे हुए आश्चर्यमय आपके इस रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूं और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए हे देव आप उस अपने चतुर्भुज रूप को ही मेरे लिए दिखाइए। हे देवेश हे जगन्निवास प्रसन्न होइए।

और हे विष्णो मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूं। इसलिए हे विश्वरूप हे सहस्त्रबाहो आप उस ही चतुर्भुज रूप से युक्त होइए।

इस प्रकार अर्जुन की प्रार्थना को सुनकर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन अनुग्रहपूर्वक मैने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तेरे को दिखाया है जो कि तेरे सिवाय दूसरे से पहले नहीं देखा गया।

हे अर्जुन मनुष्य— लोक में इस प्रकार विश्वरूप वाला मैं न वेद के अध्ययन से न यज्ञ से तथा न दान से और न क्रियाओं से और न उग्र तपो से ही तेरे सिवाय दूसरे से देखा जाने को शक्य है।



हे विश्वमूतें! मैं पहले न देखे हुए आश्चर्यमय आपके इस रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूं। और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए हे देव! आप उस अपने चतुर्भुज रूप को ही मेरे लिए दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

पहले न देखे हुए आश्चर्यमय आपके इस रूप को देखकर हर्षित भी हो रहा हूं। और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है। अर्जुन बड़ी दुविधा में है। दोहरी बातें एक साथ हो रही हैं।

हंसना और रोना एक साथ जब घटित हो, तो हम आदमी को पागल कहते हैं। क्योंकि सिर्फ पागल ही हंसते और रोते एक साथ हैं। क्योंकि हम तो बांट लेते हैं समय में चीजों को। जब हम रोते हैं, तो रोते हैं; जब हंसते हैं, तो हंसते हैं। दोनों साथ—साथ नहीं करते। लेकिन जब कोई बहुत परम अनुभव घटित होता है, जिससे जिंदगी दो हिस्सों में बंट जाती है; पिछली जिंदगी अलग हो जाती है और आने वाली जिंदगी अलग हो जाती है; हम एक चौराहे पर खडे हो जाते हैं। जहां पीछा भी दिखाई पड़ता है, आगा भी। और जहां दोनों बिलकुल भिन्न हो जाते हैं, और दोनों के बीच कोई संबंध भी नहीं रह जाता। वहा दोहरी बातें एक साथ घट जाती हैं।

तो अर्जुन को हर्षित होना भी हो रहा है, भयभीत होना भी हो रहा, है। वह प्रसन्न भी है, जो उसने देखा। अहोभाग्य उसका। और वह घबड़ा भी गया है, जो उसने देखा। इतना विराट है, जो उसने देखा, कि वह कांप रहा है।

अपनी क्षुद्रता का भी अनुभव तभी होता है, जब हम विराट के सामने होते हैं। नहीं तो अपनी क्षुद्रता का भी अनुभव कैसे हो? हमको किसी को भी अपनी क्षुद्रता का अनुभव नहीं होता, क्योंकि मापदंड कहां है जिससे हम तौलें कि हम क्षुद्र हैं?

जो मेंढक अपने कुएं के बाहर ही न गया हो, उसे कुआ सागर दिखाई पड़े तो कुछ गलत तो नहीं है, बिलकुल तर्कयुक्त है। तो मेंढक जब सागर के किनारे जाएगा, तभी अड़चन आएगी। कहते हैं न कि ऊंट जब तक पर्वत के पास न पहुंचे, तब तक अड़चन नहीं होती। क्योंकि तब तक वह खुद ही पर्वत होता है। पर्वत के करीब पहुंचकर पहली दफा तुलना पैदा होती है।

अर्जुन की घबड़ाहट तुलना की घबड़ाहट है। पहली दफा बूंद सागर के निकट है। पहली दफा ना—कुछ सब कुछ के सामने खड़ा है। पहली दफा सीमा असीम से मिल रही है। तो घबड़ाहट है। जैसे नदी सागर में गिरती है तो घबडाती होगी। अतीत में, अनजान में, अपरिचित में प्रवेश हो रहा है। और ओर—छोर मिट जाएंगे, नदी खो जाएगी!।

यह अर्जुन ऐसी ही हालत में खड़ा है, जहां मिट जाएगा पूरा। रत्ती भी नहीं बचेगी। और अब तक अपने को जो समझा था, वह कुछ भी नहीं साबित हुआ, क्षुद्र निकला। और विराट सामने खड़ा है। इसलिए भयभीत भी हो रहा है और हर्षित भी हो रहा है।

नदी जब सागर में गिरती है, तो अतीत खो रहा है, इससे भयभीत भी होती होगी; और अज्ञात मिल रहा है, इससे हर्षित भी होती होगी। तो नदी नाचती हुई गिरती है। उसके पैर में भय का कंपन भी होता होगा और आनंद की पुलक भी होती है, क्योंकि अब विराट से एक होने जा रही है।

अर्जुन कह रहा है, हर्षित भी हो रहा हूं और मेरा मन अति भय से व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए हे देव! आप अपने चतुर्भुज रूप को ही ले लें। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न हो जाएं, वापस लौट आएं। सीमा में खड़े हो जाएं। असीम को तिरोहित कर लें। इस असीम से मन कंपता है।

और हे विष्णो! मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूं। इसलिए हे विश्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से युक्त हो जाइए।

यहां मन की एक और गतिविधि समझ लेनी चाहिए।

जो न हो, मन उसकी मांग करता है। जो मिल जाए, तो जो नहीं हो जाता है, मन उसकी मांग करने लगता है।

अर्जुन खुद ही कहा था कि मुझे दिखाओ अपना विराट रूप, असीम हो जाओ। अब तो मैं देखना चाहता हूं; अनुभव करना चाहता हूं। अब सीमा से मेरी तृप्ति नहीं है। अब तो मैं पूरा का पूरा जैसे तुम हो अपने नग्न सत्य में, वैसे ही निर्वस्त्र, तुम्हें तुम्हारी पूरी नग्नता में, सत्यता में देख लेना चाहता हूं। यही अर्जुन की मांग थी, यह उसकी ही प्रार्थना थी। और अब देखकर वह कह रहा है,वापस लौट आओ; अपने पुराने रूप में खड़े हो जाओ। अब तो वही ठीक है। तुम्हारा चार हाथों वाला वह रूप, उसी में तुम वापस आ जाओ। प्रसन्न हो जाओ।

जो खो जाता है, हम उसकी मांग करने लगते हैं। जो मिल जाता है, वह हमें व्यर्थ दिखाई पड़ने लगता है। कुछ भी मिल जाए, तो हमें डर लगता है। पीछे लौटना चाहते हैं, आगे जाना चाहते हैं। मगर जो मिल जाए, उसके साथ राजी रहने की हमारी हिम्मत नहीं है।

अर्जुन की भी यही हालत है। वह दरवाजे के भीतर घुस गए; उन्होंने कुंडी बजा दी। अब परमात्मा मिल गया, अब वे कह रहे हैं कि नहीं, वापस! फिर मुझे खोजने दो। फिर तुम अपनी सीमा में खड़े हो जाओ, ताकि फिर मैं असीम को खोजूं। अब तुम फिर मुस्कुराओ। अब तुम फिर गदा हाथ में ले लो। अब तुम चतुर्भुज हो जाओ। तुम वही हो जाओ! क्योंकि तुम तो मुझे मिटाए दे रहे हो। अब मेरा कोई अर्थ ही नहीं रह जाता, कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।

ध्यान रहे, बोर्डम के लिए बुद्धि जरूरी है। बुद्धि के नीचे भी बोर्डम पैदा नहीं होती, बुद्धि के ऊपर भी बोर्डम पैदा नहीं होती। आपने किसी गाय— भैंस को बोर होते हुए देखा है? कि भैंस बैठी है, बोर हो गई! कि बहुत ऊब गई! वही घास रोज चर रही है। वही सब रोज चल रहा है। भैंस को कोई ऊब नहीं है। क्यों?

क्योंकि ऊब पैदा होती है बुद्धि के साथ। बुद्धि तुलना करने लगती है—जो था, जो है, जो होगा—इसमें। तौलने लगती है, तो फिर भेद अनुभव होने लगता है। फिर कल भी यही भोजन मिला, आज भी यही मिला, परसों भी यही मिला, तो ऊब पैदा होने लगती है। भैंस को पता ही नहीं कि कल भी यही भोजन किया था। कल समाप्त हो गया। कल तो बुद्धि संगृहीत करती है, बुद्धि स्मृति बनाती है। भैंस जो भोजन कर रही है, वह नया ही है। कल जो किया था, वह तो खो ही गया, उसका कोई स्मरण ही नहीं है। कल जो होगा, उसकी कोई खबर नहीं है; आज काफी है।

इसलिए बुद्धि के नीचे भी बोर्डम नहीं है। कोई जानवर ऊबा हुआ नहीं है। जानवर बड़े प्रसन्न हैं। कोई आदमी के पार गया आदमी, बुद्ध, महावीर, ऊबे हुए नहीं हैं। उनकी प्रसन्नता फिर प्रसन्नता है। क्योंकि जो बुद्धि हिसाब रखती थी, उसको वे पीछे छोड़ आए।

आदमी परेशान है, जो भैंस और भगवान के बीच में है। उसकी बड़ी तकलीफ है, वह ऊबा हुआ है। आदमी का अगर एकमात्र लक्षण, जो जानवर से उसे अलग करता है, कोई खोजा जाए, तो वह बोर्डम है, ऊब है। हर चीज से ऊब जाता है।

एक सुंदर स्त्री के पीछे दीवाना है, मिली नहीं, मिल  गई तो स्त्री से ऊब शुरू हो गई! दो—चार दिन में ऊब जाएगा। सब सौंदर्य बासा पड़ जाएगा, पुराना पड़ जाएगा। एक अच्छे मकान की तलाश है; मिला नहीं कि दो—चार—आठ दिन में सब बासा हो जाएगा। एक अच्छी कार चाहिए; वह मिल गई। दो—चार—आठ दिन में बासी हो जाएगी। दूसरी कार नजर को पकड़ने लगेगी।

बुद्धि तौलती है, ऊबती है। बुद्धि के नीचे भी ऊब नहीं, बुद्धि के पार भी नहीं।

यह अर्जुन ऐसी ही दिक्कत में पड़ा है। इसको दिखाई पड़ रहा है विराट। अब इसको याद आता है कृष्‍ण का वह प्यारा मुख, जिससे मित्रता हो सकती थी, जिसके कंधे पर हाथ रखा जा सकता था जिसे कहा जा सकता था, हे यादव, हे कृष्‍ण, अरे सखा! जिससे मजाक की जा सकती थी। उसको पकड़ने का मन होता है।

सारी दुनिया में यह बात विचारणीय बनी रही है कि आखिर भारत में हिंदुओं ने परमात्मा की इतनी साकार मूर्तियां क्यों निर्मित कीं? इतनी निराकार की बात करने के बाद इतनी साकार मूर्तियां क्यों निर्मित कीं? मुसलमानों को कभी समझ में नहीं आ सका कि उपनिषद की इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर भारत, जहां परम निराकार की बात है, फिर क्यों गांव—गांव, घर—घर में मूर्ति की पूजा कर रहा है?

इस मुल्क ने निराकार को देखा है। और जिन्होंने इस मुल्क में निराकार को देखा है, उन्होंने अपने पीछे आने वालों के लिए साकार मूर्तियां बना दीं। क्योंकि उन्हें पता है कि निराकार बहुत घबड़ा देता है, अगर बिना तैयारी के कोई वहां पहुंच जाए। उसमें मिटने की तैयारी चाहिए। उसके पहले साकार ही ठीक है। उसके कंधे पर हाथ रखा जा सकता है। उसका शादी—विवाह रचाया जा सकता है। उसको कपड़े—गहने पहनाए जा सकते हैं। वह कुछ गड़बड़ नहीं करता। उसके साथ तुम्हें जो करना हो, तुम कर सकते हो। भोजन करवाओ तो करवाओ! लिटाओ तो लिटाओ। सुला दो। उठा दो। द्वार बंद कर दो, खोल दो। जो करना हो!

परमात्मा को जिन्होंने विराट में झांका है, उन्होंने आदमी के लिए मूर्तियां निर्मित करवा दी हैं। क्योंकि उन्हें पता चल गया कि आदमी जैसा है, अगर ऐसा ही सीधा विराट में खड़ा हो जाए, तो या तो विक्षिप्त हो जाएगा, घबड़ा जाएगा, और या फिर खड़ा ही नहीं हो पाएगा; देख ही नहीं पाएगा; आंख ही नहीं खुलेगी।

इसलिए निराकार का इतना चिंतन करने वाले लोगों ने भी साकार को हटाया नहीं, साकार को बने रहने दिया।

कभी—कभी बहुत कंट्राडिक्टरी लगता है। शंकराचार्य जैसा व्यक्ति, जो शुद्ध निराकार की बात करता है, फिर वह भी मूर्ति के सामने नाचता है, कीर्तन करता है! वह भी गीत गाता है मूर्ति के सामने! बड़ी कठिन बात मालूम पड़ती है। क्योंकि पश्चिम में जो लोग वेदांत का अध्ययन करते हैं, वे कहते हैं, यह कंट्राडिक्टरी है।

यह शंकर के व्यक्तित्व में बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ तो वेदांत की इतनी ऊंची बात कि सब माया है। और फिर इसी माया, मिट्टी के बने हुए भगवान के सामने गीत गाना और नाचना और तल्लीन हो जाना!

शंकर को तो पता है, जो उन्हें दिखाई पड़ा है। लेकिन उनके पीछे जो लोग आ रहे हैं, अब वे उनके संबंध में भी समझ सकते हैं। कि जो शंकर को दिखाई पड़ा है, यह अगर किसी को आकस्मिक रूप से दिखाई पड़ जाए, कहीं कोने से टूट पड़े कोई धारा और इसका अनुभव हो जाए, तो झेलना मुश्किल हो जाएगा। वह इम्पैक्ट, वह आघात तोड़ जाएगा।

इसलिए मूर्ति को रहने दो, जब तक कि अमूर्ति के लिए तैयार न हो जाए व्यक्ति। तब तक चलने दो उसे अपने खेल—खिलौनों के साथ, जब तक कि वह इतना प्रौढ़ न हो जाए कि सब छोड़ दे।

यह अर्जुन यही मांग कर रहा है कि तुम मूर्त बन जाओ, अमूर्त नहीं। और तुम्हारी मूर्ति वापस ले आओ।

इस प्रकार अर्जुन की प्रार्थना को सुनकर, कृष्‍ण बोले, हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझे दिखाया, जो कि तेरे सिवाय दूसरे से पहले नहीं देखा गया।

यह बड़ा उपद्रव का वचन है। क्योंकि इसमें बड़ी उलझनें हैं। जो लोग गीता में गहन चिंतन करते हैं, मनन करते हैं, उनको बड़ी कठिनाई होती है। तेरे सिवाय दूसरे से पहले नहीं देखा गया, इसका क्या मतलब है? क्या अर्जुन पहला अनुभवी है, जिसने परमात्मा का विराट रूप देखा? यह बात तो उचित नहीं मालूम पड़ती। अनंत काल से आदमी है, अनंत सिद्धपुरुष हुए हैं, अनंत जाग्रत चेतनाएं हुई हैं। क्या अर्जुन पहला आदमी है?

यह अर्थ नहीं हो सकता इस वाक्य का। इस वाक्य का केवल एक ही अर्थ है और वह यह कि कृष्‍ण के द्वारा यह रूप अर्जुन को दिखाया गया, यह पहली घटना है कृष्ण के द्वारा।

मैंने पीछे कहा कि अगर कोई अर्जुन बनने को तैयार हो, तो यह विराट दिखाया जा सकता है। 

एक को ही दिखा पाए। और यही पहला भी था और यही आखिरी भी। क्‍योंकि अर्जुन जैसा समर्पण अति कठिन। उतना सहज— भाव से छोड़ देना गुरु के हाथों में अति कठिन है— उतना निस्संदेह, उतनी पूर्ण श्रद्धा से, उतने समग्र भाव से। यही अर्थ है इस सूत्र का कि तेरे सिवाय दूसरे से पहले नहीं देखा गया है।

कृष्‍ण के संबंध में यह बात सच है कि कृष्ण ने इस रूप में, कृष्ण के रूप में जिसे दिखाया, वह अकेला अर्जुन है। और यह पहला कहा है उन्होंने। लेकिन बाद में भी किसी दूसरे को नहीं दिखाया है। यह आखिरी भी है।

अर्जुन पाना अति कठिन है। इसे थोड़ा सोच लें।

कृष्‍ण हो जाना इतना कठिन नहीं है, जितना अर्जुन पाना कठिन है। जब मैं ऐसा कहूंगा, तो आपको थोड़ी अड़चन मालूम पड़ेगी। कृष्‍ण हो जाना इतना कठिन नहीं है, जितना अर्जुन होना कठिन है। बुद्ध कृष्‍ण हो जाते हैं, महावीर कृष्ण हो जाते हैं, लेकिन अर्जुन होना बड़ा कठिन है। क्योंकि कृष्‍ण होना तो स्वयं पर स्वयं की श्रद्धा से होता है। अर्जुन होना स्वयं की दूसरे पर श्रद्धा से होता है, जो बड़ी जटिल बात है।


स्वयं पर भरोसा रखना तो इतना कठिन नहीं है। क्योंकि हमारा भरोसा स्वयं पर होता ही है थोड़ा कम—ज्यादा। यह बढ़ जाए, जिस दिन आदमी अपने में पूरे भरोसे से भर जाता है, उस दिन कृष्ण की घटना घट जाती है। यह तो सहज है, क्योंकि एक ही आदमी की बात है, अपने पर ही भरोसा करना है। लेकिन अर्जुन होना अति कठिन है, क्योंकि दूसरे पर ऐसे भरोसा करना है कि जैसे वह मेरी आत्मा है और मैं उसकी परिधि हूं।

इसलिए अर्जुन को खोजना कृष्ण को भी मुश्किल पड़ा है। एक अर्जुन कृष्‍ण को उपलब्ध हुआ है। राम को कभी कोई ऐसा अर्जुन उपलब्ध हुआ, पता नहीं। बुद्ध को कभी कोई ऐसा अर्जुन उपलब्ध हुआ, पता नहीं। जीसस को कभी कोई ऐसा अर्जुन उपलब्ध हुआ, पता नहीं। उनके पास भी बहुत लोगों को घटनाएं घटी हैं, लेकिन अर्जुन जैसी विराट अनुभव की घटना नहीं घटी।

तो कृष्‍ण का यह कहना इस अर्थ में सार्थक है कि इस प्रकार का समर्पण मुश्किल है, अति दूभर है। और इस प्रकार का समर्पण हो, तो ही यह घटना घट सकती है।

हे अर्जुन! मनुष्य—लोक में इस प्रकार विश्वरूप वाला मैं न वेद के अध्ययन से, न यज्ञों के करने से, न दान से, न क्रियाओं से, न उग्र तपो से ही तेरे सिवाय दूसरे से देखे जाने योग्य शक्य हूं।

यह बड़ी गहरी और महत्वपूर्ण बात कही है।

कहा है कि वेद के अध्ययन से भी यह नहीं होगा। यज्ञों के करने से भी यह नहीं होगा। दान से भी नहीं होगा। क्रियाओं से योग की भी नहीं होगा। उग्र तपो से भी यह नहीं होगा। क्यों नहीं होगा? वेद के अध्ययन से क्यों नहीं होगा? क्यों, यज्ञ कोई साधेगा, तो नहीं होगा? क्यों नहीं योग की क्रियाएं इस स्थिति में ले जाएंगी?

यह नहीं होगा इसलिए कि वेद का अध्ययन हो, या यज्ञ हो, या योग की साधना हो, ये सारी की सारी प्रक्रियाएं स्वयं पर भरोसे से होती हैं। इनमें व्यक्ति अपना ही केंद्र होता है। ये समर्पण के प्रयोग नहीं हैं। ये सब संकल्प के प्रयोग हैं। और अर्जुन की घटना समर्पण से घटेगी, संकल्प से नहीं।

कोई कितना ही योग साधे, वह अर्जुन नहीं बन पाएगा, कृष्‍ण बन सकता है। इसे थोड़ा समझ लेना।

कितना ही योग साधे, कृष्‍ण बन सकता है। इसलिए हम कृष्ण को महायोगी कहते हैं। वह बुद्ध बन सकता है। क्योंकि संकल्प अगर इस जगह पहुंच जाए कि मैं अपने भीतर प्रवेश करता जाऊं अपनी ही शक्ति से, तो एक दिन उस बिंदु का अनावरण कर लूंगा, जो मुझमें छिपा है। लेकिन तब मैं अर्जुन नहीं रहूंगा, मैं कृष्ण हो जाऊंगा।

अर्जुन दूसरी ही प्रक्रिया है। वह संकल्प नहीं, समर्पण है। वहां स्वयं खोज नहीं करनी, जिसने खोज लिया है, उसके चरणों में अपने को छोड़ देना है। तो अर्जुन है, मीरा है, चैतन्य हैं, इनकी पकड़ दूसरी है; यह दूसरा उपाय है।

जगत में दो तरह के मन हैं। एक, जो संकल्प से पाएंगे परमात्मा को। दूसरे, जो समर्पण से पाएंगे परमात्मा को। समर्पण में अपने को बिलकुल छोड़ देना है।


कृष्‍ण की हवा है, अर्जुन ने तो सिर्फ नाव के पाल खोल दिए। अर्जुन खुद नहीं चला रहा है नाव को। हवा कृष्ण की है।

बुद्ध खुद चला रहे हैं। पाल वगैरह नहीं हैं उनकी नाव पर। और पाल वगैरह वे पसंद भी नहीं करते। मरते वक्त बुद्ध ने आनंद को कहा है, अपने पर ही भरोसा रखना, किसी और पर नहीं।

स्वभावत:, जिसने नदी को नाव को खेकर पार किया हो पतवारों से, वही कहेगा।

एक है समर्पण, कि छोड़ दो नाव उस पर, अनुकूल हवाओं के लिए। वह ले जाए पार या डुबा दे, तो भी समझना कि वही किनारा है। या खुद अपने ही बल से नदी को पार कर लेना।

इसलिए कृष्‍ण कहते हैं, न वेद के अध्ययन से, न यज्ञ के अनुष्ठान से, न योग की क्रिया से, न उग्र तपश्चर्या से यह होता है अर्जुन, जो तुझे हुआ है। यह समर्पण से होता है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 9

 चरण—स्‍पर्श का विज्ञान


    सखेति मत्वा प्रसभं क्ट्रूम्क्तंक हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्‍प्रणयेन वापि।। 41।।

यच्चावहासार्थमसरूतोउसि विहारशय्यासनभोजनेषु।

एकोउथवाध्यम्हत तत्समक्षं तकामये त्वामहमप्रमेयम्।। 42।

पितासि लोकस्य चराचरस्थ त्वमस्य यूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।

न त्वत्समोउस्लथ्यधिक: कुतोउन्यो लोकत्रयेउध्यप्रतिमप्रभाव।। 43।।

तस्माह्मणम्य प्रणिधाय काय प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।

पितेव युत्रस्य सखेव सखु: प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोहुम।। 44।।


हे परमेश्वर सखा ऐसे मानकर आपके इस प्रभाव को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रेम से अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ हठपूर्वक कहा गया है; और हे अच्‍युतू जो आप हंसी के लिए विहार शय्या आसन और भोजनादिको में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं, वे सब अपराध अप्रमेयस्वरूय अर्थात अचिंत्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा कराता हूं।


हे विश्वेश्वर आप इस चराचर जगत के पिता और गुरु से भी बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अतिशय प्रभाव वाले तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है फिर अधिक कैसे होवे।

इससे हे प्रभो मैं शरीर को अच्छी प्रकार चरणों में रखकर और प्रणाम करके स्तुति करने योग्य आप र्ड़श्वर को प्रसन्‍न होने के लिए प्रार्थना करता हूं। हे देव पिता जैसे पुत्र के और सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने के योग्य हैं।


हे परमेश्वर! सखा ऐसा मानकर, आपके इस प्रभाव को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रेम से अथवा प्रमाद से भी, हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, इस प्रकार जो कुछ हठपूर्वक कहा गया है और हे अच्‍युत, आप हंसी के लिए, विहार, शय्या, आसन और भोजनादिकों में अकेले अथवा सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं, वे सब अपराध, अप्रमेयस्वरूप, आपसे मैं क्षमा कराता हूं।

यह बड़ी मधुर बात है। बहुत मीठी, अत्यंत आंतरिक। जिस दिन अर्जुन को दिखाई पड़ा है कृष्‍ण का विराट होना, उनका परमात्मा होना, उस दिन स्वाभाविक है कि उसका मन अनेक— अनेक पीड़ाओं, अनेक—अनेक शरमों, अपराध के भाव से भर जाए। क्योंकि इन्हीं कृष्‍ण को अनेक बार कंधे पर हाथ रखकर उसने कहा है, हे यादव, हे मित्र, हे सखा! इस विराट को मित्र की तरह व्यवहार किया है। आज सोचकर भी भय लगता है। आज सोचकर भी उसे लगता है कि मैंने क्या किया! क्या समझा मैंने उन्हें अब तक! और मैंने कैसा व्यवहार किया! काश, मुझे पता होता कि क्या छिपा है उनके भीतर, तो ऐसा व्यवहार मैं कभी न करता।

लेकिन बड़े मजे की बात है कि यह अर्जुन को ही लगता हो, ऐसा नहीं है। अगर आप पत्नी हैं, या अगर आप पति हैं, या पिता हैं, या बेटा हैं, जिस दिन आपको परमात्म— अनुभव होगा, उस दिन आपको भी लगेगा कि पत्नी के साथ मैंने कल तक कैसा व्यवहार किया! क्योंकि तब आपको पत्नी में भी वही दिखाई पड़ जाएगा। तब आपको लगेगा, मैंने नौकर के साथ कैसा व्यवहार किया! क्योंकि तब आपको नौकर में भी वही दिखाई पड़ जाएगा। तब आपको लगेगा, अब तक जो भी मैंने किया, वह नासमझी थी। क्योंकि जिसको मैं जो समझ रहा था, वह वह है ही नहीं। यह तो प्रतीक है अर्जुन का यह कहना, यह सभी अनुभवियों को अनुभव होगा।

जिस दिन आपको भी थोड़ी—सी झलक मिलेगी, सिवाय क्षमा मांगने के और कोई उपाय नहीं रह जाएगा। क्योंकि चारों तरफ वही विराट मौजूद है, और हम उसके साथ जो व्यवहार कर रहे हैं, वह बड़ा ओछा है। पर होगा ही व्यवहार ओछा, क्योंकि दृष्टि ओछी है। क्योंकि वह विराट तो कहीं दिखता ही नहीं है।

अर्जुन यही कह रहा है कि हमने तुम्हें मित्र समझा, यही बड़ी भूल थी। और मित्र समझकर हमने वे बातें कही होंगी, जो मित्रता में कह दी जाती हैं।

और मित्र एक—दूसरे को गाली भी दे देते हैं। सच तो यह है कि जब तक गाली देने का संबंध न हो, लोग मित्रता ही नहीं समझते! जब तक एक—दूसरे को गाली न देने लगें, तब तक समझते हैं, अभी पराए हैं, अभी कोई अपनापन नहीं है।

तो मित्र समझा है। कभी कहा होगा, ऐ कृष्‍ण! कभी कहा होगा, ऐ यादव! कभी कहा होगा, ऐ मित्र! क्षमा कर देना। हठपूर्वक बहुत—सी बातें कही होंगी। हठपूर्वक अपनी बात मनवानी चाही होगी। तुम्हारी बात झुठलाई होगी। विवाद किया होगा। तुम गलत हो, ऐसा भी कहा होगा। तुम गलत हो, ऐसा सिद्ध भी किया होगा। अवमानना की होगी। ठुकराया होगा तुम्हारे विचार को।

और हे अच्युत, हंसी के लिए ही सही, तुमसे वे बातें कही होंगी, जो नहीं कहनी चाहिए थीं। विहार में, शय्या पर, आसन में, भोजन करते वक्त, मित्रों के साथ, भीड़ में, एकांत में, दूसरों के सामने, न मालूम क्या—क्या कहा होगा! न मालूम किस—किस भांति आपको अपमानित किया होगा! या दूसरे अपमानित कर रहे होंगे, तो सहमति भरी होगी, विरोध न किया होगा। ये सब अपराध, अप्रमेयस्वरूप, अचिंत्य प्रभाव वाले, आपसे मैं क्षमा कराता हूं।

आपको अब जैसा देख रहा हूं और अब तक जैसा आपको देखा, इन दोनों के बीच जमीन—आसमान का भेद पड़ गया है। तो जो व्यवहार मैंने आपसे किए थे अनजान में, न जानते हुए आपको, न पहचानते हुए आपको, उन सबके लिए मुझे माफ कर देना।

इस जगत से भी हम माफी मांगेंगे, क्योंकि जगत परमात्मा है। और हम जो व्यवहार उससे कर रहे हैं, वह परमात्मा के साथ किया गया व्यवहार नहीं है। अगर मानकर भी चलें आप— अभी आपको पता भी नहीं है, सिर्फ मानकर चलें— कि यह जगत परमात्मा है और चौबीस घंटे के लिए प्रत्येक व्यक्ति से ऐसा व्यवहार करने लगें, जैसे वह परमात्मा है, तो आप पाएंगे कि आप बदलने शुरू हो गए, आप दूसरे आदमी हो गए। आपके भीतर गुणधर्म बदल जाएगा।

सूफियों की एक परंपरा है, एक साधना की विधि है, कि जो भी दिखाई पड़े, उसे परमात्मा मानकर ही चलना। अनुभव न हो, तो भी। कल्पना करनी पड़े, तो भी। क्योंकि वह कल्पना एक न एक दिन सत्य सिद्ध होगी। और जिस दिन सत्य सिद्ध होगी, उस दिन किसी से क्षमा नहीं मांगनी पड़ेगी।

मंसूर ने कहा है कि अगर परमात्मा भी मुझे मिल जाए, तो मुझे क्षमा नहीं मांगनी पड़ेगी। क्योंकि मैंने उसके सिवाय किसी में और कुछ देखा ही नहीं है।

अर्जुन को मांगनी पड़ रही है, क्योंकि अब तक उसने परमात्मा में भी कृष्ण को देखा है, एक मित्र को देखा है, एक सखा को देखा है। फिर मित्र के साथ जो संबंध है...।

ध्यान रहे, मित्रता कितनी ही गहरी हो, उसमें शत्रुता मौजूद रहती है। और मित्रता चाहे कितनी ही निकट की हो, उसमें एक दूरी तो रहती ही है।

मन का जो द्वंद्व है, वह सब पहलुओं पर प्रवेश करता है। आप किसी को शत्रु नहीं बना सकते सीधा। शत्रु बनाना हो, तो पहले मित्र बनाना जरूरी है। या कि आप किसी को सीधा शत्रु बना सकते हैं? सीधा शत्रु बनाने का कोई उपाय नहीं है। शत्रुता भी आती है, तो मित्रता के द्वार से ही आती है। असल में शत्रुता मित्रता में ही छिपी रहती है।

इसलिए बुद्धिमानों ने कहा है कि जिनको शत्रु न बनाने हों, उनको मित्र बनाने से बचना चाहिए। अगर आप मित्र बनाएंगे, तो शत्रु भी बनेंगे ही। क्योंकि मित्र और शत्रु कोई दो चीजें नहीं हैं। शायद एक ही घटना के दो छोर हैं; दो सघनताएं हैं एक ही तरंग की।

तो अर्जुन यह कह रहा है कि मित्रता में बहुत बार शत्रुता भी की है। और मित्रता में बहुत समय ऐसे वचन भी कहे हैं, जो शत्रु से भी नहीं कहने चाहिए। उन सबकी मैं क्षमा चाहता हूं।

हे विश्वेश्वर! आप इस चराचर जगत के पिता और गुरु से भी बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अतिशय प्रभाव वाले, तीनों लोकों में आपके समान दूसरा कोई भी नहीं है। अधिक तो कैसे होवे? इससे हे प्रभो, मैं शरीर को अच्छी प्रकार चरणों में रखकर और प्रणाम करके स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूं। हे देव, पिता जैसे पुत्र के और सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के, वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने के लिए योग्य हैं।

मैं जानता हूं कि आप क्षमा कर देंगे। और मैं जानता हूं कि आप बुरा न लेंगे, अतीत में जो हुआ है। मैं जानता हूं कि आप महाक्षमावान हैं और जैसे प्रियजन को कोई क्षमा कर दे, आप मुझे कर देंगे। फिर भी मैं क्षमा मांगता हूं। शरीर को ठीक से चरणों में रखकर...।

इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

हमें खयाल में नहीं है कि शरीर की प्रत्येक अवस्था मन की अवस्था से जुड़ी है। शरीर और मन ऐसी दो चीजें नहीं हैं। इसलिए आज तो विज्ञान बाडी एंड माइंड, शरीर और मन, ऐसा न कहकर, साइकोसोमेटिक, मनोशरीर या शरीरमन, ऐसा एक ही शब्द का प्रयोग करने लगा है। और ठीक है, क्योंकि शरीर और मन एक साथ हैं। और प्रत्येक में कुछ भी घटित हो, दूसरे में प्रभावित होता है। जैसे कभी सोचें...।

यह बड़े मजे की बात है कि सारी दुनिया में अपमान करने के लिए सिर पर पैर रखने की भावना है, लेकिन सम्मान करने के लिए सिर्फ भारत में पैर पर सिर रखने की धारणा है। इस लिहाज से भारत की पकड़ गहरी है आदमी के मन के बाबत।

इसका यह मतलब हुआ कि सारी दुनिया में अपमान करने की व्यवस्था तो हमने खोज ली है, सम्मान करने की व्यवस्था नहीं खोज पाए। और अगर यह बात सच है कि हर मुल्क में हर आदमी को अपमान की हालत में ऐसा भाव उठता है, तो दूसरी बात भी सच होनी चाहिए कि श्रद्धा के क्षण में सिर को किसी के पैर में रख देने का भाव उठे। यह, भीतर जो घटना घटेगी, तभी!

इसका यह मतलब हुआ कि श्रद्धा को जितना हमने अनुभव किया है, संभवत: दुनिया में कोई मुल्क अनुभव नहीं किया। अगर अनुभव करता, तो यह प्रक्रिया घटित होती। क्योंकि अगर अनुभव करता, तो कोई उपाय खोजना पड़ता, जिससे श्रद्धा प्रकट हो सके। तो एक तो श्रद्धा की यह अभिव्यक्ति है क्षमा—याचना के लिए। अर्जुन कह रहा है कि सब भांति आपके चरणों में अपने शरीर को रखकर मांगता हूं माफी। मुझे माफ कर दें।

लेकिन इतनी ही बात नहीं है, थोड़ा भीतर प्रवेश करें। तो सिर जब किसी के चरणों में रखा जाता है......।

अभी जब बॉडी—इलेक्ट्रिसिटी पर काफी काम हो गया है, तो यह बात समझ में आ सकती है। आपको शायद अंदाज न हो, लेकिन उपयोगी होगा समझना। और इस संबंध में थोड़ी जानकारी लेनी आपके फायदे की होगी।

हर शरीर की गतिविधि विद्युत से चल रही है। आपका शरीर एक विद्युत—यंत्र है, उसमें विद्युत की तरंगें दौड़ रही हैं। आप एक बैटरी हैं, जिसमें विद्युत चल रही है, बहुत लो वोल्टेज की, बहुत कम शक्ति की। लेकिन बड़ा अदभुत यंत्र है कि उतने लो वोल्टेज से सारा काम चल रहा है।

आपको अपनी पत्नी या प्रेयसी के पास बैठकर जो शांति मिलती है, उसमें अध्यात्म बहुत कम, बिजली ज्यादा है। आपकी ऋण— धन विद्युत जुड़ जाती है। और अगर प्रेम गहरा हो तो ज्यादा जुड़ जाती है, क्योंकि आप एक—दूसरे को ज्यादा से ज्यादा निकट लेना चाहते हैं। अगर प्रेम ज्यादा न हो, तो आप भला निकट हों, अपने को दूर रखना चाहते हैं। एक तरह का बचाव बना रहता है, वह बाधा बन जाती है।





भारत इस रहस्य को किसी दूसरे कोने से सदा से जानता रहा है। गुरु के चरणों में सिर रखना, गुरु के साथ उसकी विद्युत का जोड़ है। उसके चरणों में सिर रखते ही गुरु की जो विद्युत धारा है, वह शिष्य में प्रवाहित होनी शुरू हो जाती है।

और ध्यान रहे, विद्युत के प्रवाहित होने के लिए दो ही जगहें हैं, या तो हाथ या पैर— अंगुलियां। नुकीला कोना चाहिए, जहां से विद्युत बाहर जा सके। और जहां से विद्युत भीतर लेनी हो, उसके लिए सिर से अच्छी कोई जगह नहीं है। उसके लिए गोल जगह चाहिए, जहां से विद्युत ग्रहण की जा सके। रिसेप्टिविटी के लिए सिर बहुत अच्छा है; दान के लिए अंगुलियां बहुत अच्छी हैं।

गुरु के चरणों में शिष्य सिर रख दे। सिर का मतलब है, रिसेप्टिव हिस्सा, ग्राहक हिस्सा। और चरणों का अर्थ है, दान देने वाला हिस्सा। और गुरु अपने हाथों को सिर के ऊपर रख दे, आशीर्वाद में। तो गुरु दोनों तरफ से, पैर की अंगुलियों से, हाथ की अंगुलियों से, दायक हो जाता है। और जो नीचे झुका है, उसकी तरफ आसानी से विद्युत बह पाती है। इसलिए शिष्य नीचे है, गुरु ऊपर है।

अगर आपको सच में श्रद्धा का भाव जन्मा है, तो आप फौरन अनुभव करेंगे कि आपके सिर में अलग तरह की तरंगें गुरु के चरणों से प्रवाहित होनी शुरू हो गईं। और आपका सिर शांत हुआ जा रहा है। कोई चीज उसमें बह रही है और शांत हो रही है।

मनुष्य का शरीर विद्युत—यंत्र है। अब तो विद्युत के छोटे यंत्र भी बनाए गए हैं, जो आपके मस्तिष्क में लगा दिए जाएं, तो वे धीमी गति से आपके मस्तिष्क में विद्युत की तरंगें फेंकेंगे। उन तरंगों से आप शांत होने लगेंगे।

अर्जुन कह रहा है कि चरणों में सिर रखकर आपसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूं मुझे क्षमा कर दें। और मैं जानता हूं कि आप तो क्षमा कर ही देंगे। लेकिन जो मैंने किया है अतीत में, वह मेरे ऊपर बोझ है। उस बोझ से मुझे मुक्त हो जाना जरूरी है। उसके लिए चरणों में सब छोड़ देता हूं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 8

 बेशर्त स्‍वीकार


 सजय उवाच:


एतच्‍छुत्वा वचनं केशवस्थ कृताज्जलिर्वेयमान किरीटी।

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीत प्रणम्य।। 35।।


अर्जुन उवाच:


स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्यहृष्यगुरज्यते च।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा।। 36।।

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोउध्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्यरं यत्।। 37।।

त्वमादिदेव: पुरूष पुराणस्‍त्‍वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

वेत्तामि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। 38।।

वायुर्यमोउग्निर्वरुण: शशाड्क: प्रजापतिस्व प्रपितामहश्च।

नमो नमस्तेस्‍तु सहस्रकृत्व: गुनश्च भूयोउपि नमो नमस्ते।। 39।।

नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोउख ते सर्वत एव सर्व।

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्वं सर्वं समाम्नोषि ततोउमि सर्व:।। 40।।


इसके उपरांत संजय बोला कि हे राजन— केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपता हुआ नमस्कार करके फिर भी भयभीत हुआ प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोला— हे अंतर्यामी यह योग्य ही है कि जो आपके नाम और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है तथा भयभीत हुए राक्षस लोग दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार करते हैं।

हे महात्मन— ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार नहीं करें क्योंकि हे अनंत हे देवेश हे जगन्निवास जो सत्र असत और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानंदघन ब्रह्म है वह आय ही हैं। और हे प्रभो आप आदिदेव और सनातन पुरूष हैं। आप इस जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनंतरूप, आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण है।

और आप वायु यमराज अग्नि वरुण चंद्रमा तथा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार— नमस्कार होवे। आपके लिए फिर भी बारंबार नमस्कार होवे!

और हे अनंत सामर्थ्य वाले आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार होवे। हे सर्वात्मनु आपके लिए सब ओर से नमस्कार होवे क्योंकि अनंत पराक्रमशाली आप सब संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।


इसके उपरांत संजय बोला कि हे राजन्! केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपता हुआ, नमस्कार करके, फिर भी भयभीत हुआ प्रणाम करके, भगवान कृष्‍ण के प्रति गदगद वाणी से बोला।

कांप रहा है अर्जुन। जो देखा है, उससे उसका रोआं—रोआं कांप गया है। भविष्य की झलक बड़ी खतरनाक हो सकती है। शायद इसीलिए प्रकृति हमें भविष्य के प्रति अंधा बनाती है। नहीं तो जीना बहुत मुश्किल हो जाए।

आप देखते हैं, तांगे में जुता हुआ घोडा चलता है, उसकी आंखों पर दोनों तरफ से पट्टी लगी होती है। अगर वह पट्टी न लगी हो, तो घोड़ा सीधा नहीं चल पाता। वह पट्टी खुली हो, तो दोनों तरफ उसे दिखाई पड़ता है। उसकी वजह से अड़चन खड़ी होती है। फिर वह सीधा नहीं चल पाता। तो दोनों तरफ से उसकी आंखें हम अंधी कर देते हैं। बस, सिर्फ वह आगे देख पाता है दो कदम। बस, एक सीधी रेखा में चलता रहता है।

ठीक हम भी अंधे आदमी हैं। हमें भविष्य दिखाई नहीं पड़ता। भविष्य दिखाई पड़े, तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएं। आप किसी स्त्री को प्रेम कर रहे हैं और उससे कह रहे हैं कि तेरे बिना मैं जी न सकूंगा। और आपको दिखाई भी पड़ रहा हो कि दो दिन बाद यह मर जाएगी—न केवल मैं जीऊंगा, दूसरी शादी भी करूंगा। अगर यह भी आपको दिखाई पड़ रहा हो, तो किस मुंह से कह सकिएगा कि तेरे बिना जी न सकूंगा? मुश्किल हो जाएगा। जब दिख रहा हो कि दो दिन बाद यह स्त्री मरेगी और मैं जीऊंगा। और न केवल जीऊंगा, कोई और स्त्री से शादी करूंगा। और उस स्त्री से भी मैं यही कहूंगा कि तेरे बिना कभी न जी सकूंगा।

आपको भविष्य दिखता नहीं है। बच्चा पैदा हो और उसको उसका पूरा भविष्य दिख जाए, कैसी मुश्किल हो जाए! जीना बिलकुल असंभव हो जाए। एक—एक कदम चलना मुश्किल हो जाए। आपको पता नहीं है, इसलिए अंधे की तरह शान से चले जाते हैं। क्या कर रहे हैं, कोई फिक्र नहीं है। क्या हो रहा है, कोई फिक्र नहीं है। क्या परिणाम होगा, कोई फिक्र नहीं है।

अतीत भूलता चला जाता है, भविष्य दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए आप जी पाते हैं। अतीत भूले न, भविष्य दिखाई पड़ने लगे, आप यहीं ठप्प हो जाएं। इंचभर हिलने का उपाय न रह जाए। आपको दिखाई पड़ जाए कि आप मरने वाले हैं, चाहे सत्तर साल बाद सही; साफ दिखाई पड़ जाए कि फलां तिथि को मरने वाले हैं, सत्तर साल बाद। लेकिन ये बीच के सत्तर साल बेकार हो गए। अब आप जी न सकेंगे। अब आप किस इरादे से मकान बनाएंगे? किसी और के रहने के लिए? किस इरादे से बैंक में धन इकट्ठा करेंगे? किसी और के भोग के लिए? किस इरादे से लड़ेंगे किसी से?

अब कोई इरादा नहीं रह जाएगा। मौत सारे इरादों को काट देगी। और जीना तो पड़ेगा। अगर आपको यह भी पता हो कि सत्तर साल जीना ही पड़ेगा। मौत इसी तरह होगी, जैसी होने वाली है। बीच में आत्महत्या भी करने का कोई उपाय नहीं है, भविष्य नहीं है; भविष्य तो मरने का है खाट पर। फिर हाथ—पैर कांपते रहेंगे। पूरे जीवन आप कांपते रहेंगे। जो बहुत विचारशील लोग हैं, उनके कंपन का कारण यही है।

भविष्य नहीं दिखाई पड़ता, इसलिए हम बड़े निश्चिंत हैं। दिखाई पड़े तो बड़ी अड़चन हो जाए। अर्जुन को दिखाई पड़ा है, अभी उसने देखा। एक झलक उसे मिली है। वह कांप रहा है, वह भयभीत हो रहा है।

संजय कहता है, कांपता हुआ, हाथ जोडे हुए, नमस्कार करता है, भयभीत हुआ प्रणाम करता है। गदगद भी हो रहा है।

उसकी स्थिति बड़ी दुविधा की है। जो दिखाई पड़ा है, वह उसकी विजय है। जो दिखाई पड़ा है, उसमें वह जीतेगा, इसलिए आनंदित भी हो रहा है। जो दिखाई पड़ा है, वह विराट की झलक है। यह सौभाग्य है। यह कृपा है। यह प्रसाद है। वह गदगद भी हो रहा है। और जो दिखाई पड़ा है, वह मृत्यु भी है। वह भयभीत भी हो रहा है।

और एक अर्थ से और भी भयभीत हो रहा है। क्योंकि जो विजय सुनिश्चित हो, उसमें भी मजा चला जाता है। अगर आप एक खेल खेल रहे हैं किसी के साथ, जिसमें आपकी जीत निश्चित है; खेल का मजा चला जाता है। खेल का तो मजा इसी में है कि जीत अनिश्चित है। आप जीत भी सकते हैं, हार भी सकते हैं। जिस खेल में आपको जीतना ही है, जिसमें कोई उपाय ही नहीं है हार का, वह खेल खतम हो गया। वह तो एक बंधन हो गया।

इसे थोड़ा समझ लें, थोड़ा बारीक है।


अगर आपको पक्का ही है और कोई उपाय जगत में नहीं है कि आप हार सकें, आप जीतेंगे ही, तो मजा ही जीत का चला गया। और जीत से भी भय पैदा होगा। यह जीत भी एक जबरदस्ती मालूम पड़ेगी। इसमें अहंकार को रस तो रह नहीं गया।

अर्जुन ने देखा है कि वह जीतेगा। उसके योद्धा विपरीत जो खड़े हैं, वे मृत्यु में विलीन हो रहे हैं। उसकी जीत सुनिश्चित है, नियति है, भाग्य है।

अगर जीत नियति है, तो फिर अहंकार को उससे कुछ भी रस नहीं मिलेगा। फिर मैं नहीं जीतता हूं। जीतना था, इसलिए जीतता हूं। फिर दुर्योधन नहीं हारता है। हारना था बेचारे को, इसलिए हारता है। तब न तो कोई रस है अपने अहंकार में और न दुर्योधन की हार में कोई रस है। तब तो हम पात्र हो गए, खिलौने हो गए। तब तो हम गुड़ियों की तरह नाच रहे हैं, कोई भीतर से तार खींच रहा है। किसी को जिताता है, वह जीत जाता है। किसी को हराता है, वह हार जाता है। किसका गौरव? किसका अपयश?

अगर यह सच है कि मेरी जीत निश्चित है, तो अर्जुन कांप गया होगा इससे भी। क्योंकि तब तो मजा ही चला गया। तब किस मुंह से वह कहेगा कि दुर्योधन को मैंने हराया; कि कौरव हारे पांडव से। तब इसका कोई अर्थ नहीं रह गया। कौरव हारे, क्योंकि नियति उनकी हारने की थी। पांडव जीते, क्योंकि नियति उन्हें जिता रही थी। और नियति दोनों के हाथ के बाहर है। यह भी बहुत भय देने वाली बात है। यह तो मजा ही चला गया!

एक तो मृत्यु को देखा, उससे वह कंपित हो रहा है। दूसरा, सुनिश्चित विजय को देखा। उससे भी, उससे भी वह भयभीत हो रहा है। अर्जुन योद्धा था। फेअर नहीं है अब लड़ाई। अब जो युद्ध है, वह न्याय—संगत नहीं है। अब तो हारने वाले हारेंगे, जीतने वाला जीतेगा। और कृष्‍ण कहते हैं, मैं पहले ही काट चुका हूं इनको, तू सिर्फ निमित्त है। यह भी कंपित कर देगा। क्षत्रिय का सारा मजा ही चला गया। अब यह युद्ध हो रहा है, जैसे हो या न हो बराबर है। एक झूठा युद्ध रह गया, एक सूडो, मिथ्या, भ्रामक। जिसमें सब बातें पहले से ही तय हों, उसमें क्या सार है?

एक अर्थ में गदगद है कि कृष्ण ने अनुभव का मौका दिया; एक द्वार खोला अनंत का। और एक लिहाज से भयभीत है। दोनों बातें एक साथ!

संजय कहता है, ऐसा भयभीत, साथ ही गदगद हुआ, प्रणाम करके, अर्जुन कहने लगा, हे अंतर्यामिन्! यह योग्य ही है कि जो आपके नाम और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है। तथा भयभीत हुए राक्षस लोग दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार करते हैं।

यह योग्य ही है। ये दोनों बातें ही योग्य हैं कि कोई आपके नाम से हर्षित होता है, और कोई आपके नाम से भयभीत होता है। ये दोनों बातें ठीक ही हैं। क्योंकि जो मिटने जा रहा है आपको देखकर, आप जिसके लिए विनाश बन जाते हैं, उसका भयभीत होना; और वह जो आपको देखकर आनंद को, परम अवस्था को उपलब्ध होने जा रहा है, जिसके भीतर नये का सृजन हो रहा है, उसका हर्षित होना, दोनों ही ठीक हैं।

लेकिन अर्जुन को दोनों हो रहे हैं। और आपको भी दोनों होंगे। क्योंकि इस जमीन पर देवता को अलग और राक्षस को अलग खोजना बहुत मुश्किल है। वे दोनों मिले—जुले हैं। वे हर आदमी में हैं। वे आदमी के दो पहलू हैं। मन दो के बिना होता ही नहीं।

इसलिए आप ऐसा देवता पुरुष भी नहीं खोज सकते, जिसका कोई हिस्सा राक्षसी न हो। और आप ऐसा कोई राक्षस भी नहीं खोज सकते, जिसका कोई हिस्सा देवता जैसा न हो। रावण के भीतर भी एक कोना राम का होगा, और राम के भीतर भी एक कोना रावण का होगा। अन्यथा उनका संसार में होने का कोई उपाय नहीं है। इस जगत में प्रकट होने का उपाय है मन। और मन है द्वंद्व। इसलिए अच्छे से अच्छे आदमी में थोड़ी—सी कालिख कहीं न कहीं लगी होती है। बुरे से बुरे आदमी में भी एक चमकदार रेखा होती है। वही उन दोनों को आदमी बनाती है। नहीं तो वे आदमी नहीं रह जाएंगे। नहीं तो उनके आदमी होने का कोई उपाय नहीं रह जाएगा। यहां तो हर आदमी दोनों है।

इसलिए जब परम अनुभव का द्वार खुलता है, तो दोनों बातें एक साथ घटती हैं। वह जो आपके भीतर राक्षस है, वह भयभीत होने लगता है। और वह जो आपके भीतर दिव्य है, वह आनंदित होने लगता है। परमात्मा के सामने दोनों बातें एक साथ घट जाती हैं। यह तो तोड़कर कहा है, ताकि समझ में आ सके।

अर्जुन कहता है, लोग अनुराग को उपलब्ध होते हैं, हर्षित होते हैं, आपके कीर्तन, आपके नाम को सुनकर। और ऐसे लोग भी हैं, जो भागते हैं दसों दिशाओं में। और देखता हूं सिद्धगणों को भी कि पैर झुकाए, घुटने टेके, आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह ठीक ही है अंतर्यामिन्!

आज अर्जुन को लगा कि ऐसा क्यों है। ऐसा क्यों है कि कोई भगवान का नाम सुनते ही पीड़ित और दुखी क्यों हो जाता है? और कोई भगवान का नाम सुनते ही आनंदित, प्रफुल्लित क्यों हो जाता है?

जब आप भगवान का नाम सुनकर दुःखी होते है, तो आप खबर दे रहे हैं कि भगवान आपके लिए कहीं न कहीं मृत्यु से जुड़ा हुआ है। कुछ आप कर रहे हैं, जो भगवान के सान्निध्य में टूटेगा और नष्ट होगा। कुछ आप कर रहे हैं, जो धारा के विपरीत है, जो निसर्ग के प्रतिकूल है। और जब भगवान का नाम सुनकर आप आनंदित होते हैं, तब उसका अर्थ है कि आपके भीतर कोई धारा है, जो भगवान के साथ बह रही है। तो नाम भी सुनकर आप प्रफुल्लित हो जाते हैं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

हरिओम सिगंल


गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 7

 साधना के चार चरण



श्रीभगवागुवाच:


कालोउस्थि लोकक्षयकृत्यवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।

ऋतेउयि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येउवस्थिता प्राचनीकेषु ।। 32।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुड्क्ष्‍व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।। 33।।

द्रोणं च भीष्म च जयद्रथ च कर्ण तथान्यानयि योधवीरान्।

मया हतांस्त्‍वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।। 34।।


इस प्रकार अर्जुन के पुछने पर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन मैं लोकों का नाश करने वाला बडा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने मे भी सबका नाश हो जाएगा।

इससे तू खड़ा हो और यश को प्राप्त कर तथा शत्रुओं को जीतकर धनधान्य से संपन्‍न राज्य को भोग। और ये सब शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन— तू तो केवल निमित्तमात्र ही हो जा।

तथा इन द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत— से मेरे द्वारा मारे हुए सूरवीर योद्धाओं को तू मार और भय मत कर निस्संदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा इसलिए युद्ध कर!


इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर कृष्‍ण बोले, हे अर्जुन! मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे। इससे तू खड़ा हो और यश को प्राप्त कर तथा शत्रुओं को जीत, धनधान्य से संपन्न हो। ये सब शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं।

हे सव्यसाचिन्। तू तो केवल निमित्त मात्र हो जा। तथा इन द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह, जयद्रथ और कर्ण और भी बहुत—से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार और भय मत कर, निस्संदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा, इसलिए युद्ध कर।

यह नियति की धारणा की पूरी व्याख्या इस सूत्र में है।

हे अर्जुन! इस क्षण तू जो मेरा भयंकर रूप देख रहा है, विकराल, इस क्षण तू जो देख रहा मेरे मुंह से मृत्यु, इस क्षण तू जो देख रहा है अग्नि की लपटें मेरे मुंह से निकलती हुई, योद्धाओं को दौड़ता हुआ मृत्यु में, मेरे मुंह में, उसका कारण है। मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूं। इस क्षण मैं एक महानाश के लिए उपस्थित हुआ हूं। इस क्षण एक विराट विनाश होने को है। और उस विराट विनाश के लिए मेरा मुंह मृत्यु बन गया है। मैं इस समय महाकाल हूं। यह मेरा एक पहलू है विध्वंस का। यह मेरा एक रूप है।

एक रूप है मेरे सृजन का, एक रूप है मेरे विध्वंस का। अभी मैं विध्वंस के लिए उपस्थित हूं। यह तेरे सामने जो युद्ध के लिए तत्पर शूरवीर खड़े हैं, मैं इन्हें लेने आया हूं। ये मेरी तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा ही नहीं। मैं इन्हें लेने आया हूं। ये पतंगों की तरह दौड़ते दीये की तरफ जो योद्धा हैं, ये अपने आप दौड़ रहे हैं, ऐसा नहीं। मैं इन्हें निमंत्रण दिया हूं। ये थोड़ी ही देर में मेरे मुंह में समा जाएंगे। तूने भविष्य में झांककर देख लिया है। मेरे मुंह में तू अभी जो देख रहा है, वह थोड़ी देर बाद हो जाने वाली घटना है।


इस संबंध में थोड़ी—सी समय की बात समझ लें।

भविष्य वही है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता, इसलिए हम सोचते हैं, नहीं है। क्योंकि जो हमें दिखाई पड़ता है, सोचते हैं, है। जो नहीं दिखाई पड़ता है, सोचते हैं, नहीं है। भविष्य हमें दिखाई नहीं पडता, इसलिए सोचते हैं, नहीं है।

लेकिन जो नहीं है, वह हो कैसे जाएगा? जो नहीं है, वह आ कैसे जाएगा? शून्य से तो कुछ आता नहीं। जो किसी गहरे अर्थ में आ ही न गया हो, वह आएगा भी कैसे?

भविष्य का अर्थ है कि हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है। ऐसा समझें कि मैं एक बहुत लंबे वृक्ष के नीचे बैठा हूं आप वृक्ष के ऊपर बैठे हैं। एक बैलगाड़ी रास्ते से आती है, मुझे दिखाई नहीं पड़ रही है। रास्ता लंबा है, मुझे दिखाई नहीं पड़ रही। मेरे लिए बैलगाड़ी अभी नहीं है; भविष्य में है। आप झाडू के ऊपर बैठे हैं, आपको बैलगाड़ी दिखाई पड़ती है। आप कहते हैं, एक बैलगाड़ी रास्ते पर आ रही है। मैं कहता हूं झूठ। बैलगाड़ी रास्ते पर नहीं है। आप कहते हैं, थोड़ी देर में दिखाई पड़ेगी। तुम्हारे लिए अभी भविष्य में है, मेरे लिए वर्तमान में है, क्योंकि मुझे दूर तक दिखाई पड़ रहा है।

फिर बैलगाड़ी आती है और मैं कहता हूं आपकी भविष्यवाणी सच थी। कोई भविष्यवाणी न थी, सिर्फ दूर तक दिखाई पड़ रहा था। फिर बैलगाड़ी चलती हुई आगे निकल जाती है। थोड़ी देर बाद मुझे दिखाई नहीं पड़ती। मैं कहता हूं बैलगाड़ी फिर खो गई। आप वृक्ष के ऊपर से कहते हैं, अभी भी नहीं खोई बैलगाड़ी। अभी भी रास्ते पर है, क्योंकि मुझे दिखाई पड़ रही है।

जैसे जमीन पर बैठकर अलग दिखाई पड़ता है, वृक्ष पर बैठकर ज्यादा दिखाई पड़ता है। ठीक चेतना की भी अवस्थाएं हैं। जहां हम खड़े हैं..।

जैसे मैंने चार अवस्थाएं कहीं आपसे। पहली, जहां मैं की भीड़ है। वहां से हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। जब तक ठीक हमारी आख के सामने न आ जाए, हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। फिर एक मैं रह जाए; हमारी दृष्टि बढ़ जाती है। हम ऊंचे तल पर आ गए; भीड़ से ऊपर उठ गए। एक बड़े वृक्ष पर बैठे हुए हैं। हमें दूर तक दिखाई पड़ने लगता है। कोई चीज आती है, उसके पहले दिखाई पड़ने लगती है। फिर तीसरा और ऊंचा तल है, जहां कि मुझे पता चल गया कि मैं नहीं हूं। यह बड़ी ऊंचाई आ गई। इस ऊंचाई से वे चीजें दिखाई पड़ने लगती है, जो बहुत दूर है; कभी होंगी। फिर एक और ऊंचाई है, जहां कि मैं नहीं हूं यह भी नहीं बचा। यह आखिरी ऊंचाई है। इससे ऊपर जाने का कोई उपाय नहीं है। यहां से सब दिखाई पड़ने लगता है। ऐसी अवस्था के व्यक्ति को हमने सर्वज्ञ कहा है। इसके लिए फिर कुछ भी भविष्य नहीं रह जाता है। इसके लिए सभी कुछ वर्तमान हो जाता है।

यह जो कृष्‍ण में अर्जुन को दिखाई पड़ा योद्धाओं का समा जाना और वह घबड़ाकर पूछने लगा। कृष्ण उससे कह रहे हैं कि तू भयभीत न हो अर्जुन। मैं इन युद्ध के लिए इकट्ठे हुए वीरों का अंत करने के लिए आया हूं। मैं इस समय महाकाल हूं। उसकी ही झलक तूने देख ली, जो थोड़ी देर बाद होने वाला है। उसका प्रि—व्‍यू उसकी पूर्व—झलक तुझे दिखाई पड़ गई है।

इससे तू खड़ा हो, यश को प्राप्त कर, शत्रुओं को जीत। ये शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। तू यह चिंता भी मत कर कि तू इन्हें मारेगा। तू यह ध्यान भी मत रख कि तू इनके मारने का कारण है। तू कारण नहीं है, तू निमित्त है।

निमित्त और कारण में थोड़ा फर्क हमें समझ लेना चाहिए। कारण का तो अर्थ होता है, जिसके बिना घटना न घट सकेगी। निमित्त का अर्थ होता है, जिसके बिना भी घटना घट सकेगी।

आप पानी गर्म करते हैं। गर्म करना, आग कारण है। अगर आग न हो, तो फिर पानी गर्म नहीं हो सकेगा। कोई उपाय नहीं है। लेकिन जिस बर्तन में रखकर आप गर्म कर रहे हैं, वह कारण नहीं है, वह निमित्त है। इस बर्तन के न होने पर कोई दूसरा बर्तन होगा, कोई तीसरा बर्तन होगा। बर्तन न होगा, तो कोई और उपाय भी हो सकता है। जिस चूल्हे पर आप गर्म कर रहे हैं, यह चूल्हा न होगा, तो कुछ और होगा। कोई सिगड़ी होगी। कोई स्टोव होगा। कोई बिजली का यंत्र होगा। कोई और उपाय हो सकता है। गर्मी तो कारण है। लेकिन ये सब निमित्त हैं।

आप गर्म कर रहे हैं, यह भी निमित्त है। कोई और गर्म कर सकता है—कोई पुरुष, कोई स्त्री, कोई बच्चा, कोई बुढा, कोई जवान। आप भी नहीं होंगे, तो कोई गर्म नहीं होगा पानी, ऐसा नहीं है। एक बात, आग चाहिए, वह कारण है। बाकी सब निमित्त है। निमित्त बदले जा सकते हैं, कारण नहीं बदला जा सकता।

कृष्ण यह कह रहे हैं, कारण तो मैं हूं तू निमित्त है। अगर तू नहीं मारेगा, कोई और मारेगा। इनकी मृत्यु होने वाली है। इनकी मृत्यु आ चुकी है। इनकी मृत्यु एक अर्थ में घटित हो चुकी है। मैं इन्हें मार ही चुका हू? अर्जुन अब तू तो सिर्फ मुर्दो को मारने का काम में लगाया जा रहा है।

यह कृष्ण अर्जुन से यही कह रहे हैं कि तू बहुत परेशान मत हो, जिनको तू मारने की सोच रहा है, उनको मैं पहले ही काट चुका हूं।  सिर कट चुके हैं।  अकारण ही तू यश को प्राप्त हो जाएगा, धन को, राज्य को। वह तेरी मुफ्त उपलब्धि होगी, सिर्फ निमित्त होने के कारण। जिन्हें तू सोचता है कि इन्हें मारने से हिंसा लगेगी, वे मर चुके हैं, वे मृत हैं। तू सिर्फ मुर्दों को आखिरी धक्का दे रहा है। जैसे ऊंट पर कोई आखिरी तिनका रखे और ऊंट बैठ जाए। बस, तू आखिरी तिनका रख रहा है। और ऊंट बैठने के ही करीब है। तू नहीं सहारा देगा, तो कोई और यह तिनका रख देगा। क्योंकि गर्दन काटने का असली काम हो चुका है। नियति उन्हें काट चुकी है।

इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि दुर्योधन जहां खड़ा है, उसके साथी जहां खड़े हैं, उसके मित्रों की फौज जहां खड़ी है, वे जो कुछ भी कर चुके हैं, घड़ा भर चुका है, फूटने के करीब है। तू मुफ्त ही यश का भागी हो जाएगा। तू यह मौका मत छोड़। और ध्यान रखना कि तू निमित्त ही था, इसलिए किसी अहंकार को बनाने की चेष्टा मत करना, कि मैं जीत गया, कि मैंने मार डाला।

इसमें दोहरी बातें हैं। एक तो कृष्ण यह कह रहे हैं, तू नियति को स्वीकार कर ले। जो हो रहा है, उसे हो जाने दे। और दूसरा, उससे भी महत्वपूर्ण जो बात है, वह यह कह रहे हैं कि अगर तू जीत जाएगा..। और जीत जाएगा, क्योंकि मैं तुझसे कहता हूं जीत निश्चित है। जीत हो ही गई है। तू जैसा है, उसके कारण तू जीत गया है। तू जो करेगा, उसके कारण नहीं। तू जैसा है, उसके कारण तू जीत गया है।

राम और रावण को युद्ध पर खड़े देखकर कहा जा सकता है कि राम जीत जाएंगे। जिसको जीवन की गहराइयों का पता है, जिसे सूत्र पढ़ने आते हैं, वह कह सकता है कि राम जीत जाएंगे। राम जीत ही गए हैं। क्योंकि रावण जो भी कर रहा है, वे हारने के ही उपाय हैं। बुराई हारने का उपाय है। राम कुछ भी बुरा नहीं कर रहे हैं। वे जीतते जा रहे हैं। वह जो अच्छा करना है, वह जीतने का उपाय है। तो हारने के पहले भी कहा जा सकता है कि रावण हार जाएगा।

हारने के पहले कहा जा सकता है कि दुर्योधन और उसके साथी हार जाएंगे। उन्होंने जो भी किया है, वह पाप पूर्ण है। उन्होंने जो भी किया है, वह बुरा है। सबसे बड़ी बुराई उन्होंने क्या की है? सबसे बड़ी बुराई उन्होंने यह की है कि जगत की सत्ता से अपने को तोडकर वे निरे अहंकारी हो गए हैं। उन्होंने प्रवाह से अपने को तोड़ लिया है।

ऐसा समझें। हमें दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए समझना मुश्किल होता है। एक नदी में हम दो लकडी के छोटे—छोटे टुकड़े डाल दें। और एक टुकड़ा चेष्टा करने लगे नदी के विपरीत धारा में बहने की। करेगा नहीं, क्योंकि लकड़ी के टुकड़े इतने नासमझ नहीं होते, जितने आदमी होते हैं! मगर मान लें कि आदमियों जैसे लकड़ी के टुकड़े हैं। आदमियों की बीमारी उनको लग गई। आदमियों के साथ रहने से इनफेक्यान हो गया। और एक टुकड़ा नदी की तरफ ऊपर बहने लगा।

क्योंकि आदमी को हमेशा धारा के विपरीत बहने में मजा आता है। धारा में बहने में क्या रखा है? कोई भी बह जाता है। कुछ उलटा करो। चौगड्डे पर आप शीर्षासन लगाकर खड़े हो जाएं, भीड़ लग जाएगी। पैर पर खड़े रहें, कोई देखने नहीं आएगा! क्या, मामला क्या है? सिर के बल जो आदमी खड़ा है, उलटा कुछ कर रहा है। यह आकर्षित करता है।

आदमी उलटा करने में उत्सुक है। क्यों? क्योंकि उलटे से अहंकार सिद्ध होता है। सीधे से कोई अहंकार सिद्ध होता नहीं। अगर आप किसी को रास्ते में से चलते में से गिर रहा हो कोई, सम्हाल लें; अखबार में कोई खबर नहीं छपेगी। रास्ते में कोई चल रहा हो, धक्का देकर गिरा दें, दूसरे दिन खबर छप जाएगी। कुछ अच्छा करिए, दुनिया में किसी को पता नहीं चलेगा। कुछ बुरा करिए, फौरन पता चल जाएगा।

अखबार उठाकर देखते हैं आप! पहली लकीर से लेकर आखिरी लकीर तक, सारी लकीर उन लोगों के बाबत है, जो कुछ उलटा कर रहे हैं। कहीं कोई दंगा—फसाद हो रहा हो, कहीं कोई हड़ताल हो रही हो, कहीं कोई चोरी, कहीं डाका, कहीं कोई ट्रेन उलटाई हो, कहीं कुछ उपद्रव हुआ हो, तो अखबार में खबर बनती है।

आदमी उलटे में उत्सुक है, तो हो सकता है, लकड़ी का टुकड़ा उलटा बहे। जो टुकड़ा उलटा बहेगा, हम पहले से ही कह सकते हैं किनारे खड़े हुए कि यह हारेगा। इसमें कोई बड़ी बुद्धिमत्ता की जरूरत नहीं है। क्योंकि धारा के विपरीत लकड़ी का टुकड़ा बहने की कोशिश कर रहा है। यह हारेगा, अर्जुन! कृष्ण कह सकते हैं कि यह हारेगा।

और जो नदी की धारा के साथ बह रहा है, हम कह सकते हैं, इसको हराने का कोई उपाय नहीं है। इसको हराइएगा कैसे? इसने कभी जीतने की कोई कोशिश ही नहीं की। इसको हराइएगा कैसे? यह तो नदी की धारा में पहले से ही बह रहा है, स्वीकार करके। यह तो कहता है, धारा ही मेरा जीवन है। जहां ले जाए, जाऊंगा। कहीं और मुझे जाना नहीं है।

राम नदी की धारा में बहते हुए हैं। इसलिए पहले से ही कहा जा सकता है, वे जीतेंगे। रावण हारेगा, वह धारा के विपरीत बह रहा है।

यह कृष्ण अर्जुन से जो कह रहे हैं, यह किसी पक्षपात के कारण नहीं कि मैं तेरे पक्ष में हूं तेरा मित्र हूं इसलिए तू जीतेगा। इसका गहन कारण यह है कि कृष्ण देख सकते हैं कि अर्जुन जिस पक्ष में खड़ा है, वह धारा के अनुकूल बहता रहा है। और अर्जुन के विपरीत जो लोग खड़े हैं, वे धारा के प्रतिकूल बहते रहे हैं। उनकी हार निश्चित है। वे हारेंगे, पराजित होंगे।

इसलिए तू नाहक ही अड़चन में पड़ रहा है। और तेरी अड़चन तुझे धारा के विपरीत बहने की संभावना जुटाए दे रही है। तू है क्षत्रिय। तेरी सहज धारा, तेरा स्वधर्म यही है कि तू लड़। और लड़ने में निमित्त मात्र हो जा। तू संन्यास की बातें कर रहा है, वे उलटी बातें हैं।

अर्जुन अगर संन्यासी हो जाए, तो प्रभावित बहुत लोगों को करेगा। प्रभावशाली व्यक्ति था। लेकिन हो नहीं पाएगा संन्यासी। और अगर संन्यास लेकर बैठ भी जाए कहीं जंगल में ध्यान वगैरह करने, तो ज्यादा देर नहीं चलेगा ध्यान वगैरह उसका! एक हरिण दिखाई पड़ जाएगा और उसके हाथ धनुष—बाण खोजने लगेंगे। और एक कौआ ऊपर से बीट कर देगा, तो पत्थर उठाकर उसका वह वहीं फैसला कर देगा। वह जो उसका होना है, जो स्वधर्म है उसका, वह योद्धा है। उसमें कहीं भी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे कि वह संन्यासी हो सके।

तो कृष्‍ण उससे कह रहे हैं कि तू नदी में उलटे बहने की कोशिश कर रहा है। अगर तू सोचता है कि मैं ऐसा करूं, वैसा करूं; यह ठीक नहीं है, वह ठीक है...। कृष्‍ण उससे कह रहे हैं, तू सिर्फ बह जा, नियति के हाथ में छोड़ दे। तू निमित्त हो जा। उनकी हार निश्चित है। और विपक्ष में खड़े योद्धा मेरे मुंह में जा रहे हैं, मृत्यु में, यह निश्चित है। वे पहले ही मारे जा चुके हैं। ये द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, ये जयद्रथ और कर्ण, जो महाप्रतापी हैं, महावीर हैं, इनसे भी तू भय मत कर। क्योंकि जिनके साथ ये खड़े हैं, वे गलत लोग हैं। उनके साथ ये पहले ही डूब चुके।

भीष्म पितामह भले आदमी हैं। लेकिन गलत लोगों के साथ खड़े हैं। अक्सर भले आदमी कमजोर होते हैं। और अक्सर भले आदमी कई दफा चुपचाप बुराई को सह लेते हैं और बुराई के साथ खड़े हो जाते हैं। ये जो खड़े हैं बुराई के साथ, ये कितने ही भले हों, और इनके पास कितनी ही शक्ति हो, तेरी शक्ति से ये नहीं कटेंगे, विराट की शक्ति के विपरीत होने से ये कट गए हैं।

इस अर्थ को ठीक से समझ लें।

तू इन्हें नहीं मार पाएगा। अर्जुन और कर्ण में सीधा मुकाबला हो सकता था। और कुछ तय करना मुश्किल है कि कौन जीतेगा। वे एक ही मां के बेटे हैं। और कर्ण रत्तीभर भी कम नहीं है। डर तो यह है कि वह ज्यादा भी साबित हो सकता है। लेकिन हारेगा। कोई ताकत के कारण ही नहीं, हारेगा इसलिए कि विराट की शक्ति के विपरीत खड़ा है। जो विराट चाहता है, उसके विपरीत खड़ा है। विराट के विपरीत खड़ा होना खतरनाक है। फिर कभी छोटा आदमी भी हरा सकता है।

और यह वैज्ञानिक है। इसको आप ऐसा भी देख सकते हैं कि एक बैलगाड़ी में आप बैठे हैं और एक शराबी बैठा है। बैलगाड़ी उलट जाए, आपको फ्रैक्यर हो जाएंगे, शराबी को बिलकुल नहीं होंगे। शराबी रोज गिर रहा है सड़क पर। कम से कम इतना तो सीखो उससे! कि चोट नहीं खाता। रोज सुबह देखो, फिर ताजे हैं!

नहा— धोकर फिर चले जा रहे हैं! और रोज गिर रहे हैं, इनको चोट क्यों नहीं लगती?

शराबी अपने को अलग नहीं रखता। जब शराब पी लेता है, तो बेहोश हो गया, वह प्रकृति का हिस्सा हो गया। अब उसको कोई होश नहीं कि मैं हूं। अब वह गिरता है, तो कड़ा नहीं हो पाता। बैलगाड़ी उलट रही है, आप भी उलट रहे हैं, वह भी उलट रहा है आपके साथ। आप सम्हल गए, बचने लगे। आपका अहंकार आ गया कि मैं बचूं। और शराबी का कोई अहंकार नहीं आया, वे लुढ़क गए। जैसे ही बैलगाड़ी लुढकी, उसी के साथ लुढ़क गए। उनका कोई विरोध नहीं है, कोई प्रतिरोध नहीं है; को—आपरेशन है, सहयोग है। उनको चोट नहीं लगेगी।

छोटे बच्चे गिरते हैं, उनको चोट नहीं लगती। जैसे—जैसे बड़े होने लगते हैं, चोट लगने लगती है। जिस दिन से आपके बच्चे को चोट लगने लगे, समझना कि अहंकार निर्मित हो गया। जब तक उसको चोट नहीं लग रही, तब तक अहंकार नहीं है। वह गिरता है, तो गिरने के साथ होता है। रोकता नहीं कि अरे, मैं गिर रहा हूं। अभी कोई है नहीं, जो गिरने से रोके अपने को। वह गिर जाता है। गिरकर वह उठ जाता है। कहीं कोई चोट घटती नहीं।

यह जो कृष्‍ण का कहना है कि तू जीता ही हुआ है, वह इसीलिए कि तू उस पक्ष में है, जो बुराई के साथ नहीं है। तू विपरीत नहीं बह रहा है, तू साथ बह रहा है। और ये हारे ही हुए हैं। ये विपरीत बह रहे हैं। यह नियति तय हो गई है अर्जुन, इसलिए तू व्यर्थ चिंतित न हो, निस्संदेह तू जीतेगा; युद्ध कर।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

रविवार, 8 नवंबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 11 भाग 6

 पूरब और पश्‍चिम: नियति और पुरूषार्थ


यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवायि वक्ताणि समृद्धवेगाः।। 29।।

लेलिह्यमे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान्त्रदनैर्ज्वलदभि:।

तेजोभिरायर्य जगत्ममग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतयन्ति विष्णो।। 3०।।

आख्याहि मे को भवागुग्ररूपो नमोउख ते देववर प्रसीद।

विज्ञखमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। 31।।


अथवा जैसे पतंगा मोह के वश होकर नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं।

और आप उन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रसन करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपायमान करता है।

हे भगवन— कृपा करके मेरे प्रति कहिए कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं! हे देवों में श्रेष्ठ आपको नमस्कार होवे। आप प्रसन्‍न होइए। आदिस्वरूप आपको मैं तत्व से जानना चाहता हूं क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं नहीं जानता।


अर्जुन कह रहा है, अथवा जैसे पतंग मोह के वश होकर नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश कर रहे हैं।

जैसे दीया जल रहा हो और पतंगा चक्कर लगाता है दीए के, और पास आता चला जाता है। उसके पंख भी जलने लगते हैं, तो भी हटता नहीं, और पास आता चला जाता है। लपट उसे छूने लगती है, तो भी पास आता चला जाता है। अंत में वह लपट में छलांग लगाकर जल जाता है। और ऐसा भी नहीं कि एक पतंगे को जलता देखकर दूसरे पतंगे कुछ समझ लें। वे भी चक्कर लगाते हैं, और निकट आते जाते हैं प्रकाश के। जहां भी प्रकाश हो, पतंगे प्रकाश को खोजते हैं।

अर्जुन कह रहा है, मैं ऐसे ही देख रहा हूं इन सारे लोगों को आपके इस मृत्यु रूपी मुंह में जाते हुए। वे सब भाग रहे हैं अति वेग से और एक—दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि कौन पहले पहुंच जाए। बड़ा वेग है। और जा कहां रहे हैं! आपके मुंह में जा रहे हैं, जहां मौत के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह क्या हो रहा है! ये सब महाशूरवीर, महायोद्धा, बुद्धिमान, पंडित, ज्ञानी, ये सब मृत्यु की तरफ जा रहे हैं। और इतनी साज—सजावट से जा रहे हैं कि ऐसा नहीं लगता कि इनको पता हो कि ये मृत्यु की तरफ जा रहे हैं। इतनी शान से जा रहे हैं। शोभायात्रा बना रखी है इन्होंने अपनी गति को। और जा रहे हैं, देखता हूं , आपके मुंह में, जहां मृत्यु घटित होगी।

और आप उन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रसन करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं।

और आप हैं एक कि आपकी अग्नि लपटें सब तरफ से छू रही हैं लोकों को और उनको लीले चली जा रही हैं।

हे विष्णु! आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपायमान कर रहा है।

सब तप रहे हैं, जल रहे हैं, भस्म हुए जा रहे हैं।

हे भगवन्! कृपा करके मेरे प्रति कहिए कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं?

मानने का मन नहीं होता उसका कि यह आप जो रूप दिखला रहे हैं, यह सच में आपका ही रूप है। सोचता है, कोई भ्रम पैदा कर रहे होंगे। सोचता है, कोई प्रतीक! सोचता है, मुझे कुछ धोखा दे रहे होंगे, डरवा रहे होंगे। सोचता है, मेरी परीक्षा ले रहे होंगे। यह मानने का मन नहीं करता है कि यह आप ही हैं। तो वह कहता है, यह उग्र रूप वाला कौन है? यह आप नहीं मालूम पड़ते!

हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार होवे, आप प्रसन्न होइए।

वह घबड़ा भी रहा है। बेचैन हो रहा है। और कह रहा है, आप प्रसन्न होइए।

आदिस्वरूप, आपको मैं तत्व से जानना चाहता हूं क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं नहीं जानता।

आप अपनी प्रवृत्तियां सिकोड़ लें। कि आप लोगों की मृत्यु बनते हैं, मुझे प्रयोजन नहीं। कि आप लोगों को लील जाते हैं, मुझे मतलब नहीं। कि आप लोगों को बनाते हैं, मुझे मतलब नहीं। आपकी प्रवृत्ति को हटा लें। आप क्या करते हैं, इससे मुझे प्रयोजन नहीं। आप क्या हैं, केंद्र में, इसेंस में, सार में, तत्व में, वही मैं जानना चाहता हूं। हम सब भी परमात्मा को जानना चाहते हैं, और उसकी प्रवृत्ति से बचना चाहते हैं। यह सारा संसार उसकी प्रवृत्ति है। यह सारा संसार उसका खेल है। हम इससे बचना चाहते हैं और उसे जानना चाहते हैं। वही अर्जुन कह रहा है। अर्जुन की आकांक्षा हमारी आकांक्षा है।

हम भी कहते हैं, संसार से छुडाओ प्रभु, अपने पास बुला लो। जैसे कि संसार में वह पास नहीं है! हम कहते हैं, हटाओ इस भवसागर से, इस बंधन से और अपने गले लगा लो। जैसे इस बंधन में उसी ने गले नहीं लगाया है! हम कहते हैं, कब छूटेगी यह पत्नी? कब छूटेगा यह पति? यह छुटकारा कब होगा? हे प्रभु! पास बुलाओ। जैसे कि इस पति में और पत्नी में वही मौजूद नहीं है!

अर्जुन यह कह रहा है, तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं, तुम्हारा तत्व। मैं तो तुम्हें सारभूत जानना चाहता हूं। तुम क्या करते हो, वह मुझे मतलब नहीं है। तुम क्या हो? तुम्हारा डूइंग नहीं, तुम्हारी बीइंग। मैं तुम्हारे उस केंद्र को जानना चाहता हूं जहां कोई गति नहीं है, जहां कोई कर्म नहीं है, जहां सब शांत और मौन है। प्रवृत्ति को हटा लो।

लेकिन वह कह जरूर रहा है, लेकिन उसे पता नहीं कि वह साथ ही अपना विरोध भी कर रहा है। एक तरफ वह कहता है, हटा लो यह उग्र रूप और प्रसन्न हो जाओ। प्रसन्नता भी प्रवृत्ति है। और दूसरी तरफ वह कह रहा है कि प्रवृत्ति का मुझे कुछ पता नहीं। जानना भी नहीं चाहता। तत्व जानना चाहता हूं। प्रसन्नता तत्व नहीं है। प्रसन्नता भी कर्म है। जैसे उग्रता कर्म है, वैसे प्रसन्नता कर्म है। जैसे मृत्यु कर्म है, वैसे जीवन भी कर्म है। लेकिन हम चुनाव करते ही चले जाते हैं। वह कहता है कि प्रसन्नता, आनंदित हो जाइए। वह भी मानेगा कि शायद आनंदित होना ही तत्व है। वह भी तत्व नहीं है।

तत्व तो शून्य है। और शून्य को देखने की क्षमता बड़ी मुश्किल है। हम प्रवृत्ति को ही देख पाते हैं। शून्य को हम कहां देख पाते हैं! शून्य जब प्रवृत्ति बनता है, तभी हमारी पकड़ में आता है। नहीं तो कहां पकड़ में आता है!

 मैं यहां चुप बैठ जाऊं, तो मेरा मौन आपको पकड़ में नही आएगा। जब मेरा मौन शब्द बनता है, तब आपको सुनाई पडता है। जो मैं कहना चाहता हूं वह तो मेरे मौन में है। जब मैं उसे शब्द का रूप देता हूं तब वह आप तक पहुंचता है।

अगर आप मुझसे कहें कि ऐसा कुछ करिए कि मैं आपका मौन सुन पाऊं, तो बड़ी कठिन होगी बात। क्योंकि उसके लिए फिर आपके कान काम नहीं दे सकेंगे, वे सिर्फ शब्द सुनने को बने हैं। और उसके लिए आपकी बुद्धि भी काम नहीं दे सकेगी, क्योंकि वह भी केवल शब्द पकड़ने को बनी है। फिर तो आपको भी शून्य में ही खड़ा होना पड़े, तो ही फिर मौन से सुना जा सकता है।




लेकिन अगर आप कहें, मौन में सुनना है, तो फिर मौन होने की कला सीखनी पड़े। वह अर्जुन कह रहा है कि मैं आपको देखना चाहता हूं आपके तत्व में। लेकिन तत्व में केवल वही देख सकता है, जो स्वयं तत्व होने को राजी हो, शून्य होने को राजी हो।

शून्य होने को जो राजी है, वह इस जगत के शून्य को देख लेगा। जब तक हम शून्य होने को राजी नहीं हैं, तब तक हमें प्रवृत्ति ही दिखाई पड़ेगी। और जब तक प्रवृत्ति है, तब तक चुनाव रहेगा। हम कहेंगे, उदासी हटाओ, रुद्रता हटाओ, यह कूरता हटाओ, यह मृत्यु का उग्र रूप बंद करो। मुस्कुराओ, प्रसन्न हो जाओ। हम चुनेंगे, हमारी पसंद की प्रवृत्ति!


ध्यान रहे, इस सूत्र में थोड़ी एक बात खयाल ले लेने जैसी है। संसार को अक्सर हम कहते हैं, प्रवृत्ति का जाल। और संन्यासी को हम कहते हैं निवृत्ति, प्रवृत्ति से हट जाना। लेकिन संसार प्रवृत्ति का जाल है, यह तो सच है। और कोई कितना ही संसार से भागे, संसार के बाहर नहीं जा सकता, यह भी ध्यान रखना। जहां भी जाएं, वहीं संसार है। कहीं भी जाएं, वहीं संसार है, क्योंकि सभी तरफ प्रवृत्ति है उसकी। कहीं बाजार की प्रवृत्ति है। कहीं वृक्षों में पक्षियों की कलकलाहट है। कहीं नदी में पानी का शोर है। कहीं पहाडों का सन्नाटा है। लेकिन सब उसकी ही प्रवृत्ति है। प्रवृत्ति के बाहर जाने का कोई उपाय नहीं।


प्रवृत्ति के बाहर जाने का एक ही उपाय है कि प्रवृत्ति में चुनना मत। यह मत कहना कि यह विकराल है, हटाओ, प्रसन्न को प्रकट करो। यह चुनाव बांधता है, प्रवृत्ति नहीं बांधती। और जो प्रवृत्ति में चुनाव नहीं करता, वह अचानक शून्य हो जाता है। क्योंकि चुनाव से ही भीतर का शून्य खंडित होता है। जो शून्य हो जाता है, वह उसे तत्व से जान लेता है।


अर्जुन कहता है, हे भगवन्, कृपा करके मेरे प्रति कहिए कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ, आपको नमस्कार होवे। आप प्रसन्न होइए। आदिस्वरूप, आपको मैं तत्व से जानना चाहता हूं। क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को न मैं जानता हूं न आपकी प्रवृत्ति से मुझे कोई बहुत प्रयोजन है। आप क्या हैं, वही मैं जानना चाहता हूं।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

गीता दर्शन अध्याय 11भाग 5

 अचुनाव अतिक्रमण है


      रूपंमहत्ते कवक्तनेत्रं महाबाहो बहुबाक्रयादम्।

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं हूड़वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्।। 23।।

नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्रवा हि त्वां प्रव्यखितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। 24।।

दंष्ट्राकरालानि व ते मुखानि दृष्ट्रवैव कालानलसब्रिभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 25।।

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्थ युत्रा: सर्वे सहैवावनियालसंघै:।

भीष्मो द्रोण: सूतमुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरयि योधमुख्यै।। 26।।

वक्वाणि ते स्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेपु संदृश्यन्ते चूर्णितेरुत्तमाङ्गै।। 27।।

यथा नदीनां बहवोउखुवेगा समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्ताण्यभिविज्वलन्ति।। 28।।


और हे महाबाहो आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले तथा कइ हाथ जंघा और पैरों वाले और बहुत उदरों वाले तथा बहुत— सी विकराल जाडों वाले महान रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूं।

क्योंकि हे विष्णो आकाश के साथ स्पर्श किए हुए, देदीप्यमान अनेक रूपों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अंत—करण वाला मैं धीरज और शांति को नहीं प्राप्त होता हूं।

और हे भगवन— आपके विकराल जाड़ों वाले और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर दिशाओं को नहीं जानता हूं और सुख को भी नहीं प्राप्त होता हूं। इसलिए हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होवे। और मैं देखता हूं कि वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्रु राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश करते हैं और भीष्म पितामह द्रोणाचार्य तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सब के सब वेगयुक्त हुए आपके विकराल जाड़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश करते हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दांतों के बीच में लगे हुए दिखते हैं।

और हे विश्वमूर्ति जैसे नदियों के बहुत— से जल के प्रवाह समुद्र के ही सम्‍मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं वैसे ही वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय भी आपके प्रज्वलित हुए मुखों में प्रवेश करते हैं।




और हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले तथा बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले और बहुत उदरों वाले तथा बहुत—सी विकराल जाड़ों वाले महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूं।

अर्जुन ने देखा, विकराल रूप! जहां परमात्मा मृत्यु का मुख बन गया है। वह कह रहा है कि हे महाबाहो! यह मैं देख रहा हूं इससे सारे लोक व्याकुल हो रहे हैं, मैं भी व्याकुल हो रहा हूं। मेरा हृदय धड़कता है और घबड़ाहट रोएं—रोएं में समा गई है। क्या यह भी आप हैं?

यह व्याकुलता स्वाभाविक है। क्योंकि हमने परमात्मा का एक ही रूप देखा। और हमने परमात्मा के एक ही रूप की पूजा की। और हमने परमात्मा के एक ही रूप को सराहा। और हमने यह माना कि वह एक इसी रूप से एक है; दूसरा रूप परमात्मा का नहीं है। तो जब हमें पूरा परमात्मा दिखाई पड़े, तो व्याकुलता बिलकुल स्वाभाविक है।

यह व्याकुलता परमात्मा के रूप के कारण नहीं है, हमारी बुद्धि के तादात्म्य के कारण है। हमने एक हिस्से के साथ तादात्म्य कर लिया है। हमने देखा कि परमात्मा होगा सौंदर्य। हमने परमात्मा की सारी प्रतिमाएं सुंदर बनाई हैं। कुछ हिम्मतवर तांत्रिकों ने कुरूप प्रतिमाएं भी बनाई हैं, लेकिन वे धीरे— धीरे खोती जा रही हैं। हमारे मन को उनकी अपील नहीं है।

अगर आप विकराल काली को देखते हैं, हाथ में खंजर लिए, कटा हुआ सिर लिए, गले में मुंडों की माला डाले हुए, पैरों के नीचे किसी की छाती पर सवार, लाल जीभ, खून टपकता हुआ, तो भला भय की वजह आप नमस्कार करते हों, लेकिन मन में यह भाव नहीं उठता कि यह परमात्मा का रूप है। भला मान्यता के कारण आप सोचते हों कि ठीक, लेकिन भीतर यह भाव नहीं उठता कि यह परमात्मा का रूप है।


और स्त्री, ममता, मां जिसको हमने कहा! और काली को हम मां कहते हैं! मां जो है, वह ऐसा विकराल रूप लिए खड़ी है, तो मन को बड़ी बेचैनी होती है कि क्या बात है! लेकिन जिन्होंने यह विकराल रूप खोजा था, उन्होंने एक द्वंद्व को इकट्ठा करने की कोशिश की थी।

मां से ज्यादा प्रेम से भरा हुआ हृदय पृथ्वी पर दूसरा नहीं है। इसलिए मां को खड़ा किया इतने विकराल रूप में, जो कि दूसरा छोर है। मां को ऐसे खड़ा किया, जैसे वह मृत्यु हो। मां तो जन्म है। मां को ऐसे खड़ा किया, जैसे वह मृत्यु हो। दो द्वंद्व, जन्म और मृत्यु,। दोनों को एक साथ काली में इकट्ठा किया। एक तरफ वह जन्मदात्री है, और दूसरी तरफ मृत्यु उसके हाथ से घटित हो रही है। और हड्डियों की, खोपड़ियों की माला उसने गले में डाल रखी है!

कभी आपने अपनी मां को इस भाव से देखा? बहुत घबड़ाहट होगी। और अगर आप अपनी मां को इस भाव से नहीं देख सकते, तो काली को आप मां कैसे कह सकते हैं! असंभव है।

लेकिन जिन्होंने, जिन तांत्रिकों ने यह द्वंद्व को जोड्ने का खयाल किया, बड़े अदभुत लोग थे। इसमें एक प्रतीक है। इसमें जन्म और मृत्यु एक साथ खड़े हैं। इसमें प्रेम और मृत्यु एक साथ खड़े हैं। इसमें मां का हृदय और मृत्यु के हाथ एक साथ खड़े हैं। मगर धीरे— धीरे यह रूप खोता चला गया। यह रूप आज अगर कभी आपको। दिखाई भी पड़ता है तो सिर्फ परंपरागत है। इसकी धारणा खो गई। इसके हृदय में संबंध हमारे खो गए।

हमने परमात्मा का तो सौम्य,  सुंदर रूप— कृष्ण बांसुरी बजाते। खड़े हैं, वे लगते हैं कि परमात्मा हैं। मोर—मुकुट बांधा हुआ है, उनके ओंठों पर मुस्कान है। वे लगते हैं कि परमात्मा हैं। उनसे हमें आश्वासन मिलता है, राहत मिलती है, सांत्वना मिलती है। हम वैसे ही बहुत दुखी हैं। काली को देखकर और उपद्रव क्यों खड़ा करना है!

कृष्‍ण को देखकर सांत्वना, कंसोलेशन मिलता है कि ठीक है।। इस जीवन में होगा दुख। इस जीवन में होगी मृत्यु। आज नहीं कल, वह मुकाम आ जाएगा, जहां बांसुरी ही बजती रहती है। जहां सुख ही सुख है। जहां शांति ही शांति है, जहां संगीत ही संगीत है। जहां फिर कुछ बुरा नहीं है। उसकी आशा बंधती है, उसका भरोसा बंधता है। मन को राहत मिलती है। तो जो हमारे पास नहीं है, जो जिंदगी में खोया हुआ है, जिसका अभाव है, उसे हमने कृष्ण में पूरा कर लिया।

आपने कभी खयाल किया कि हमने कृष्‍ण, राम, बुद्ध, महावीर, किसी के बुढ़ापे का चित्र नहीं बनाया है। कोई बुढ़ापे की मूर्ति नहीं बनाई है। ऐसा नहीं है कि ये लोग बूढ़े नहीं हुए। बूढ़े तो होना ही पड़ेगा। इस जमीन पर जो है, जमीन के नियम उस पर काम करेंगे। और ये जमीन के नियम किसी को भी छूट नहीं देते, यहां कोई छुट्टी नहीं है। और अगर इस जमीन के नियमों में छुट्टी हो, तो फिर जगत। बिलकुल एक बेईमान व्यवस्था हो जाए। यहां तो कृष्‍ण को भी बुढ़ा होना पड़ेगा, राम को भी होना पड़ेगा, बुद्ध को भी होना पड़ेगा, महावीर को भी होना पड़ेगा।

लेकिन हमने उनको बुढ़ा नहीं बनाया। उससे यह पता नहीं चलता कि वे बूढ़े नहीं हुए। उससे यही पता चलता है कि बुढ़ापे से हम कितने भयभीत हैं, कितने डरे हुए हैं। और अगर राम को भी हम देखें, टूटे हुए दांत, लकड़ी टेकते हुए, तो फिर भगवान मानना बहुत मुश्किल हो जाएगा। सुंदर, युवा! वे सदा ही युवा हैं। उनका युवापन ठहर गया है, वह आगे नहीं बढ़ता।

कृष्‍ण को बूढ़ा देखें। खंखारते हुए, खांसते हुए, खाट पर, किसी अस्पताल में भर्ती! बिलकुल यह हमारे भरोसे के, विश्वास के बाहर हो गया। हमारी सारी श्रद्धा नष्ट हो जाएगी। और हमें लगेगा, यह भी क्या बात हुई! कम से कम भगवान होकर तो ऐसा नहीं होना था।

तो भगवान हमारी कामनाओं से हम निर्मित करते हैं। उनकी मूर्ति हम अपनी वासना से निर्मित करते हैं। उसका तथ्य से कम संबंध है, हमारी भावना से ज्यादा संबंध है।

देखते हैं आप, न दाढ़ी उगती राम को, न कृष्ण को, न बुद्ध को, न महावीर को। न मूंछ निकलती, न दाढ़ी निकलती। जरा कठिन मामला है। कभी—कभी ऐसा होता है, कोई पुरुष मुखन्नस होता है। कभी—कभी किसी पुरुष को दाढ़ी—मूंछ नहीं उगती। क्योंकि उसमें कुछ हार्मोन की कमी होती है, वह पूरा पुरुष नहीं है। लेकिन यह कभी—कभी होता है। सब अवतार हमने मुखन्नस खोज लिए! जरा कठिन है। थोड़ा सोचने जैसा है!

जैनियों के चौबीस तीर्थंकर हैं। चौबीस तीर्थंकरों में किसी की दाढ़ी—मूंछ नहीं उगती। यह मानना मुश्किल है कि उन्होंने इतनी खोज कर ली हो। और हमेशा जब भी कोई तीर्थंकर हुआ, तो वह ऐसा आदमी हुआ जिसमें हार्मोन की कमी थी।

यह बात नहीं है। दाढ़ी—मूंछ उगी ही है। लेकिन हमारा मन नहीं कहता कि दाढ़ी—मूंछ उगे। क्यों? क्योंकि वह दाढ़ी—मूंछ जो उगे, तो फिर बुढ़ापा आएगा। वह जो दाढ़ी—मूंछ उगे, तो युवावस्था को ठहराना मुश्किल हो जाएगा। वह जो दाढ़ी—मूंछ उगे, तो वे फिर ठीक हम जैसे हो जाएंगे। और हमारा मन करता है कि वे हम जैसे न हों।

हम अपने से बहुत परेशान हैं। हम अपने से बहुत पीड़ित हैं। वे हम जैसे न हों।

इसलिए हमने अपने अवतारों, अपने तीर्थंकरों, अपने पैगंबरों में वे सब बातें जोड़ दी हैं, जो हम चाहते हैं, हममें होतीं, और नहीं हैं। हम सुबह—शाम लगे हैं दाढ़ी छोलने में! वह हम चाहते हैं कि न होती। वह हम चाहते हैं कि न होती। और आज नहीं कल विज्ञान व्यवस्था खोज लेगा कि पुरुष दाढ़ी—मूंछ से छुटकारा पा जाए।

इतनी उत्सुकता दाढ़ी—मूंछ से छुटकारा पाने की भी बड़ी अजीब है और बड़ी विचारणीय है और बड़ी मनोवैज्ञानिक है। थोड़ी पैथालाजिकल है, थोड़ी रुग्ण भी है।

पुरुष के मन में जो सौंदर्य की धारणा है, वह स्त्री की है। उसको स्त्री का चेहरा सुंदर मालूम पड़ता है। और स्त्री के चेहरे पर दाढ़ी— मूंछ नहीं है। वह सोचता है, सुंदर होने का लक्षण दाढ़ी—मूंछ का न होना है। मगर स्त्रियों से भी पूछो, कि दाढ़ी—मूंछ न हो, तो स्त्री को चेहरा सुंदर सच में लग सकता है?

लगना नहीं चाहिए। और अगर लगता है, तो उसका मतलब पुरुषों ने उनका दिमाग भी भ्रष्ट किया हुआ है। लगना नहीं चाहिए। प्राकृतिक रूप से स्त्री को दाढ़ी—मूंछ वाला चेहरा सुंदर लगना चाहिए, जैसा पुरुष को गैर दाढ़ी—मूंछ का चेहरा सुंदर लगता है। थोड़ा सोचें कि आपकी पत्नी दाढ़ी—मूंछ लगाए हुए खड़ी है! तो जब आप गैर दाढ़ी—मूंछ के खड़े हैं, तब वही हालत हो रही है।

लेकिन चूंकि पुरुष प्रभावी है और स्त्रियों के मन को उसने अपने ही सांचे में ढाल रखा है हजारों साल में...। स्त्रियां कह भी नहीं सकतीं कि तुम यह क्या कर रहे हो? क्यों स्त्री जैसे हुए जा रहे हो? स्त्रियां भी मानती हैं कि यह सुंदर है, क्योंकि उनकी अपनी सुंदर की व्याख्या भी हमने नष्ट कर दी है। स्त्री का हमने मंतव्य ही समाप्त कर दिया है। पुरुष की ही धारणा, उसकी भी धारणा है। जिसको पुरुष सुंदर मानता है, वह भी सुंदर मानती है।

तो सुंदर की जो हमारी धारणा थी, हमने राम पर, कृष्ण पर, बुद्ध पर थोप दी है। लेकिन वे हमारी कामनाएं हैं; वे तथ्य नहीं हैं। तथ्य तो, जीवन के साथ मृत्यु जुड़ी है, यह है। मृत्यु से हम भयभीत हैं। हम बचना चाहते हैं।

हम में से अधिक लोग आत्मा को अमर इसीलिए मानते हैं कि इसके सिवाय बचने का और कोई उपाय नहीं दिखता। उन्हें कुछ पता नहीं है कि आत्मा अमर है। उन्हें कुछ भी पता नहीं है कि आत्मा है भी। लेकिन फिर भी वे माने चले जाते हैं कि आत्मा अमर है। क्यों? भय है मृत्यु का।

शरीर तो जाएगा, यह पक्का है, कितना ही उपाय करो। तो बचने का अब एक ही उपाय है कि आत्मा अमर हो। इसलिए जैसे—जैसे आदमी बुढ़ा होता है, आत्मा में भरोसा करने लगता है। जवान आदमी कहता है, पता नहीं, है या नहीं। हो सकता है, न भी हो। यह आदमी अभी समझकर नहीं बोल रहा है। अभी जवानी का जोश बोल रहा है। थोड़ा हाथ—पैर ढीले पड़ने दें, भरोसा आने लगेगा। थोड़ी मौत करीब आने दें, दांत गिरने दें, भरोसा आने लगेगा। क्यों?  

इसलिए नहीं कि इसे कोई अनुभव हुआ जा रहा है। कोई बुजुर्ग होने से अनुभवी नहीं होता। अगर बुजुर्ग होने से दुनिया में अनुभव मिलता होता, तो सारे लोग कितनी दफे बुजुर्ग हो चुके हैं, अनुभव ही अनुभव होता। कोई अनुभव नहीं मिलता। लेकिन बूढ़े होने से भय बढ़ता है, मौत करीब मालूम पड़ने लगती है। अब इतना भरोसा नहीं मालूम पड़ता, पैरों में इतनी ताकत नहीं मालूम पड़ती। अब तर्क करने की सुविधा नहीं मालूम पड़ती। अब लगता है, अब तो ऐसा लगता है कि वह जो अंधविश्वासी कहते हैं, वही ठीक हो, तो अच्छा। आत्मा हो! यह हमारा विश फुलफिलमेंट है, आत्मा हो। तो हम मानने लगते हैं कि आत्मा है।

 

घबड़ाहट की वजह से, भय की वजह से आदमी मान लेता है, आत्मा अमर है, अनुभव की वजह से नहीं। क्योंकि अनुभव तो बड़ी और बात है। और अनुभव तो उसे उपलब्ध होता है, जो मृत्यु से भय छोड़ देता है और जीवन की वासना छोड़ देता है।

हम तो मृत्यु के भय से, आत्मा अमर है, मान लेते हैं। हमें कभी पता नहीं चलेगा कि आत्मा है भी। उसी को पता चलेगा, जो मृत्यु का भय नहीं करता और जीवन का मोह नहीं करता।

कौन है जो मृत्यु का भय नहीं करे और जीवन का मोह न करे? वही व्यक्ति, जो जीवन और मृत्यु को एक की तरह देख ले, अनुभव कर ले। और इसके लिए कहीं शास्त्र में जाने की जरूरत नहीं। और इसके लिए किसी महापुरुष, महाज्ञानी के चरणों में बैठने की जरूरत नहीं। जीवन काफी शिक्षा है।

जीवन और मृत्यु दो कहां हैं? वे एक ही हैं। हमने अपने मोह में बांटा है दो में। वे एक ही हैं। कभी आपको पता है किस दिन जन्म समाप्त होता है और मृत्यु शुरू होती है? और किस दिन, किस सीमा पर जीवन समाप्त होता है और मृत्यु का आगमन होता है? कहीं कोई विभाजन नहीं है। कोई वाटर—टाइट कंपार्टमेंट, कोई खंड—खंड बांटने का उपाय नहीं है। जीवन, मृत्यु एक ही चीज के दो नाम मालूम पड़ते हैं। एक ही घटना के लिए दो शब्द मालूम हैं। एक छोर जीवन, दूसरा छोर मृत्यु।

तो हम परमात्मा का रूप बनाते हैं, मोहक, सुंदर। हमने ना रखे हैं, वे सब ऐसे रखे हैं कि मन को लुभाएं। लेकिन जो हिस्सा है, वह हमने काट रखा है।

अर्जुन भी भयभीत हुआ। इसलिए नहीं कि परमात्मा का भयरूप है, बल्कि इसलिए कि आज तक उसने सोचा ही नहीं था कि यह कभी धारणा ही मन में न बनी थी कि यह भयंकर रूप परमात्मा का होगा। हम सोचते हैं यमराज को, भैंसे पर बैठे विकराल दांतों वाला, काला आदमी, सीगों वाला। लेकिन कभी यमराज को परमात्मा के साथ एक करके नहीं देखते। यमराज अलग ही मालूम पड़ता है। उसका डिपार्टमेंट, वह सब अलग विभाग है। परमात्मा से हम उसको नहीं जोड़ते हैं, कि मृत्यु परम् से आती है।

गीता के ये सूत्र बड़े कीमती हैं, इन्हें थोड़ा समझ लेना।

यमराज कहीं भी नहीं, परमात्मा के मुंह में ही है। और या कहीं किसी हाथी घोड़े पर बैठकर नहीं आने वाला है, किसी पर सवार होकर। परमात्मा के दांत, वे ही यमराज हैं।

यह देखकर अर्जुन घबड़ा गया है और वह कह रहा है कि लोक व्याकुल हो रहे हैं, मैं भी व्याकुल हो रहा हूं। क्योंकि हे विष्णो! आकाश के साथ स्पर्श किए हुए, देदीप्यमान, अनेक रूपों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से आपको देखकर भयभीत अंतःकरण वाला मैं धीरज और शांति नहीं प्राप्त होता हूं।

वह ठीक कह रहा है। वह कह रहा है, आपकी वजह, भयभीत हो रहा हूं ऐसा नहीं, भयभीत अंतःकरण वाला, मैं भयभीत अंतःकरण वाला हूं इसलिए भयभीत हो रहा हूं। अकारण भयभीत नहीं हो रहा हूं। आप तो विशाल हैं, महान हैं, हैं, महादेव हैं, आप तो परमेश्वर हैं। आपके कारण भयभीत नहीं हो रहा हूं, लेकिन मेरा अंतःकरण भय वाला है।

इसे हम थोड़ा समझ लें।

हम सबके पास अंतःकरण भय वाला है। यह थोड़ा गहन और आपको पता भी नहीं कि आपका अंतःकरण क्या कानशिएंस क्या है।

आप चोरी करने से डरते हैं। भीतर कोई कहता है, चोरी बुरी है।आप पडोसी की स्त्री को भगा ले जाने से बचते हैं। भीतर कोई कहता है, यह बात बुरी है। नहीं करना। उसे देखकर यह कांप रहा है। यह वास्तविक अंतःकरण नहीं है। यह सामाजिक व्यवस्था है।

इसलिए एक समाज में अगर चचेरी बहन से शादी होती है, तो कोई अड़चन नहीं है। चचेरी बहन से शादी हो जाती है। किसी को कोई तकलीफ नहीं होती। और दूसरे समाज में उसी के पड़ोस में चचेरी बहन से शादी करने की बात ही महापाप हो सकती है। कोई सोच भी नहीं सकता कि बहन से भी, और प्रेम कर सकते हैं! संभव ही नहीं है। और उसको पत्नी बना सकते हैं, यह तो बिलकुल ही कल्पना के बाहर है। यह अंतःकरण है।

यह जब तक दुनिया में बहुत समाज हैं, बहुत संप्रदाय हैं, तब तक बहुत अंतःकरण होंगे। और इन अंतःकरण के कारण बड़ा उपद्रव है। और दुनिया तब तक एक नहीं हो सकती, जब तक हम कोई एक युनिवर्सल कांशिएंस पैदा न कर लें। तब तक दुनिया एक नहीं हो सकती। लाख लोग सिर पटकें कि हिंदू मुसलमान भाई भाई। लाख लोग सिर पटकें कि हिंदी चीनी भाई  भाई। यह असंभव है। क्योंकि भाई भाई तब तक नहीं हो सकते, जब तक भीतर के अंतःकरण भिन्न—भिन्न हैं। तब तक सब ऊपरी होगा, थोथा, दिखावा। मौके पर सब कलई खुल जाएगी और दुश्मन बाहर निकल आएंगे। ऊपर से होगा, क्योंकि वह जो भीतर अंतःकरण क्‍या है। कानशिएंस क्‍या है।

आप चोरी करने से डरते है। भीतर कोई कहता है,चोरी बुरी है। आप पड़ोसी की स्‍त्री को भगा ले जाने से बचते है। भीतर कोई कहता है, यह बात बुरी है। किसी की हत्या करने से भय है, कांपता है मन। भीतर कोई कहता है, हत्या पाप है। हिंसा बुरी है। कौन कहता है आपके भीतर? जो आपके भीतर बोलता है, यह अंतःकरण है।

यह अंतःकरण वास्तविक नहीं है। क्योंकि वास्तविक अंतःकरण भय के कारण नहीं जीता। वास्तविक अंतःकरण तो ज्ञान के कारण जीता है। यह अंतःकरण सोशल प्रोडक्ट है, समाज के द्वारा पैदा किया गया है। यह समाज बच्चा पैदा होते  ही बच्चे में अंतःकरण पैदा करने में लग जाता है। क्योंकि समाज को भय है कि अगर बच्चे को ऐसे ही छोड़ दिया जाए, तो वह पशु जैसा हो जाएगा।

और इस भय में सचाई है। अगर बच्चे को कुछ भी न कहा जाए, तो वह पशु जैसा हो जाएगा। तो समाज उसे बताना शुरू करता है। वह कहता है, अगर तुम ऐसा करोगे, तो दंड पाओगे। अगर तुम ऐसा करोगे, तो पुरस्कार पाओगे। अगर तुम ऐसा करोगे, तो माता— पिता प्रसन्न होंगे। अगर तुम ऐसा करोगे, तो दुखी होंगे, नाराज होंगे, कष्ट पाएंगे।

धीरे धीरे हम बच्चे में भय और लोभ के आधार पर अंतःकरण पैदा करते हैं। हम कहते हैं, तुम ऐसा करो, मां प्रसन्न है, पिता प्रसन्न हैं, सब लोग प्रसन्न हैं तुमसे। तुम ऐसा करो, और सब लोग तुम्हारी निंदा करेंगे, और सब तुम्हें निंदित कर रहे हैं। तो बच्चे को धीरे धीरे समझ में आने लगता है, किस चीज से डरे। तो जिस जिस चीज से मां बाप डराते हैं, उस उस से वह डरने लगता है। भय गहरे में बैठ जाता है, अंतःकरण बन जाता है।

इसलिए हर समाज का अंतःकरण अलग अलग होता है। हिंदू का अलग, मुसलमान का अलग, ईसाई का अलग, जैन का अलग। आत्मा अलग अलग नहीं होती, अंतःकरण अलग अलग होता है।अब एक जैन है, वह मांसाहार नहीं कर सकता। क्योंकि बचपन से उसे कहा गया है कि यह महापाप है। तो अगर मांस सामने आ जाए, तो भीतर उसके हाथ पैर कांपने लगेंगे। इसलिए नहीं कि मांस को देखकर कांपते हैं। क्योंकि दूसरा मुसलमान बैठा है, उसके नहीं कांप रहे हैं। तो मांस में कंपाने वाली कोई बात नहीं है। कांप रहे हैं अंतःकरण के कारण।

और इसी बच्चे को अगर एक मांसाहारी घर में रखा जाता, तो इसके भी नहीं कंपते। और अगर एक मांसाहारी बच्चे को गैर— मांसाहारी घर में रखा जाता, तो उसके भी कंपते। वह जो अंतःकरण बचपन से पैदा किया गया है, वह जो भय, कि क्या गलत है, वह बैठा है, वह भेद निर्मित कर रहा है।

अर्जुन कहता है, मेरे अंतःकरण के कारण मैं भयभीत हो रहा हूं आपके कारण नहीं। और ठीक कह रहा है। यह उसका निरीक्षण बिलकुल उचित है। अंतःकरण ने आज तक उसके यही जाना है कि परमात्मा सौम्य है, सुंदर है, प्रीतिकर है, आनंदपूर्ण है, सच्चिदानंद है, आनंदघन है। अब तक उसने यही जाना है। मृत्यु भी परमात्मा है, यह उसने न सुना है, न जाना है।

इसलिए बचपन से बना हुआ अंतःकरण परमात्मा की एक प्रतिमा लिए है, वह प्रतिमा खंडित हो रही है। इसलिए वह व्यथित है। और न केवल वह कहता है, मैं व्यथित हूं सारे लोक व्यथित हैं। यह रूप बहुत घबड़ाने वाला है।

और हे भगवन्! आपके विकराल जाड़ों वाले और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर दिशाओं को नहीं जानता हूं और सुख को भी प्राप्त नहीं होता हूं।

दिशा भ्रांति हो गई है। अब मुझे पता नहीं कि उत्तर कहां है, दक्षिण कहां है, पूरब कहां है! वह यह कह रहा है कि अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है, मेरा सिर घूम रहा है। दिशाएं पहचान में नहीं आती कि क्या क्या है! यह तुम्हारा रूप देखकर दिशाएं भ्रांत हो गईं, मेरे पथ खो गए। मेरा मार्ग धुएं से भर गया। और जरा भी सुख को प्राप्त नहीं होता हूं। यह जो आपको देख रहा हूं— आप भगवान हैं! वह कह रहा है, आप भगवान हैं, आप परमेश्वर हैं, फिर भी आपका यह रूप देखकर जरा भी सुख को प्राप्त नहीं होता हूं। जरा भी मुझे, जरा भी सहारा सुख के लिए आपकी इस स्थिति को देखकर नहीं मिलता है।

इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होवे।

वह यह कह रहा है कि आप कृपा करें और यह रूप तिरोहित कर लें। और वह जो प्रसन्नवदन, वह जो मुस्कुराता हुआ आनंदित रूप था, आप उसमें वापस लौट आएं।

आदमी का मन आखिर तक, अंत तक भी परमात्मा पर अपने को थोपना चाहता है। अंत तक भी, परमात्मा जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार कर लेने की तैयारी नहीं होती। अंत तक!

साधक की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि वह परमात्मा पर भी अपने को थोपता है। और तब तक सिद्ध नहीं हो पाता, जब तक परमात्मा जैसा भी हो, उसको वैसा ही स्वीकार कर लेने की स्थिति न आ जाए।

अभी अर्जुन थोड़ा—सा विनम्र निवेदन कर रहा है कि प्रसन्न हो जाएं। यह हटा लें। यह प्रज्वलित, प्रलयंकारी रूप अलग कर लें। ओंठों पर थोड़ी मुस्कुराहट ले आएं। आपके चेहरे पर हंसी को  देखकर, आनंद को देखकर मुझे सुख होगा।। इसे खयाल में लें।

जब तक आप सोचते हैं कि परमात्मा ऐसा होना चाहिए, जब तक आपकी परमात्मा की कोई धारणा है, तब तक आप परमात्मा को नहीं जान पाएंगे। तब तक जो भी आप जानेंगे, वह परदा होगा। अगर आपको परमात्मा को ही जानना है, तो आपको अपनी सारी धारणा अलग कर देनी होगी; हिंदू मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध, सब हटा देने होंगे। आपको निपट परमात्मा को शून्य की तरह जानने के लिए खड़ा हो जाना पड़ेगा। अपना अंतःकरण, अपने भरोसे, विश्वास, अपनी दृष्टि, सब हटा देनी होगी। और जैसा भी हो—विकराल हो, मृत्यु हो, अमृत हो, जो भी हो— उसके लिए राजी हो जाना होगा।

जब भी कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में राजी हो जाता है, तो परमात्मा के दोनों रूप खो जाते हैं—विकराल भी, सौम्य भी। और जिस दिन  ये दोनों रूप खोते हैं, उस अनुभव को हमने ब्रह्म—अनुभव कहा है। जब तक ये रूप रहते हैं, तब तक हमने इसे ईश्वर अनुभव कहा है। इस फर्क को थोड़ा समझ लें।

यह ईश्वर का अनुभव है, जब तक ये दो रूप हमें दिखाई पड़ते हैं। जिस दिन ये दो रूप भी नहीं दिखाई पड़ते— दोनों में चुनाव नहीं रह जाता, उसी दिन दिखाई नहीं पड़ते— उस दिन जो रह जाता है, वह ब्रह्म है।

भारत ने बड़ी साहस की बात कही है। भारत ने ईश्वर को भी माया का हिस्सा कहा है। यह सुनकर आपको कठिनाई होगी। भारत कहता है, ईश्वर भी माया का हिस्सा है। ईश्वर—अनुभव भी माया का हिस्सा है। ब्रह्मानुभव! क्योंकि ईश्वर में भी रूप हैं। और ईश्वर के साथ भी हमारा लगाव है, अच्छा—बुरा; ऐसा हो, ऐसा न हो।

भक्त भगवान को निर्मित करते रहते हैं, सजाते रहते हैं। मंदिरों में ही नहीं; मंदिरों में तो वे सजाते ही हैं, क्योंकि भगवान बिलकुल अवश है, वह कुछ कर नहीं सकता, जो करना चाहो, करो। वहां.....। 

लेकिन यह अर्जुन ठेठ भगवान के सामने खड़े होकर भी कह रहा है। कि ऐसा अच्छा होगा, मुझे सुख मिलेगा। आप जरा प्रसन्न हो जाएं। यह रूप हटा लें, यह तिरोहित कर लें।

ये क्या कह रहा है? ये यह कह रहा है कि अभी भी केंद्र मैं हूं। मेरा सुख! आप ऐसे हों, जिसमें मुझे सुख मिले। मैं ऐसा हो जाऊं, जिसमें आप आनंदित हों, ऐसा नहीं। मैं आनंदित होऊं, ऐसे आप हो जाएं। यह आखिरी राग है। और तब तक शेष रहता है, जब तक  हम माया की आखिरी परिधि ईश्वर को पार नहीं कर लेते।

कहता है अर्जुन, हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होवे। और मैं देखता हूं कि वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं के समुदाय आपमें प्रवेश  करते हैं। और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब वेगयुक्त हुए आपके विकराल जाड़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश करते हैं और कई एक चूर्ण हुऐ सिरों सहित आपके दांतों के बीच में लगे हुए दिखते हैं।

और हे विश्वमूतें! जैसे नदियों के बहुत—से जल के प्रवाह समुद्र के ही सम्मुख दौडते हैं और समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय भी आपके प्रज्वलित हुए मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

वह कहता है कि आपके दांतों में दबे हैं। और न केवल दबे हैं, उनके सिर चूर्ण हो गए हैं। जैसे आपने उनका भोजन कर लिया हो और वे आपकी दाढ़ों में चिपककर रह गए हैं। और वे महाबलशाली लोग, जिनके लिए कल्पना भी नहीं कर सकता अर्जुन! भीष्म पितामह, इतना बलशाली व्यक्ति, वह भी जाकर चूर्ण हो जाएगा मृत्यु के मुख में पड़कर! द्रोणाचार्य, उसका गुरु, वह भी इस तरह असहाय होकर दांतों में चिपट जाएगा! कर्ण, उस विपरीत शत्रुओं के वर्ग का सबसे शूरवीर पुरुष, वह भी ऐसा दयनीय हो जाएगा! और न केवल धृतराष्ट्र के पुत्र, मेरे पक्ष के लोग भी आपके दांतों में दबे मर रहे हैं, चूर्ण हुए जा रहे हैं। न केवल इतना ही, बल्कि जो बाहर हैं, वे तेजी से दौड़ रहे हैं आपके मुंह की तरफ, जैसे नदियां सागर की तरफ दौड़ती हैं।

बहुत भय लगता है, अर्जुन कहता है, बहुत व्यथा होती है।  बंद कर लें यह मुंह।

हम सभी दौड रहे हैं मृत्यु की तरफ, जैसे नदियां दौड़ती हैं। और अगर यह सारा जगत, यह सारा जगत अगर शरीर है, तो निश्चित ही इस जगत के मुंह में कहीं दांतों के नीचे दबकर हम सब चूर्ण हो जाएंगे। और फिर कोई भी हो— भीष्म हों, कि द्रोणाचार्य, कि कर्ण, या कि अर्जुन—कोई भी हो, वे सभी चूर्ण हो जाएंगे। और जो नहीं चूर्ण हो रहे हैं, वे भी दौड़ रहे हैं। बड़ा श्रम उठा रहे हैं, भागे जा रहे हैं, कुछ उपलब्धि के लिए!

हम सबको यह खयाल है कि जिंदगी में कुछ पा लेंगे। और आखिर में सिवाय मौत के हम कुछ भी नहीं पाएंगे। लगता है, न मालूम क्या पा लेंगे। और पाते सिर्फ मौत हैं, और कुछ भी नहीं पाते। लाख करे उपाय आदमी, कब्र के सिवाय कहीं और पहुंचता नहीं। कोई और दूसरी मंजिल नहीं। और कितना ही इकट्ठा करे, कितनी ही उपलब्धियां, कितना ही सोचे, विचारे, योजना बनाए, आखिर में पहुंच जाता है मृत्यु के मुंह में—बिना योजना बनाए। बचता है, तो भी नहीं बच पाता। शायद बचने की कोशिश में भी वहीं पहुंच जाता है।

अर्जुन को इस जीवन की पूरी की पूरी मृत्यु में दौड़ती हुई धारा दिखाई पड़ रही है। वह भयभीत न होता, अगर उसे ऐसा दिखाई पड़ता कि मृत्यु कहीं और घटित हो रही है, परमात्मा के मुंह में नहीं, तो इतना भयभीत न होता। कम से कम परमात्मा से सहारा मिल सकता था, मृत्यु के विपरीत भी। अगर मृत्यु कहीं और घट रही थी, अगर कोई शैतान, कोई यमदूत मृत्यु को ला रहा था, तो परमात्मा बचाने वाला हो सकता था। अब तो बचने का भी कोई उपाय नहीं है। क्योंकि यह परमात्मा का ही मुंह है, जहां मृत्यु घटित हो रही है। इससे भयभीत हुआ है।

अगर आपको भी यह पता चल जाए कि आपके दुख का कारण परमात्मा ही है, आपकी मृत्यु का कारण परमात्मा ही है, तो भय और भी ज्यादा संतप्त कर देगा। हम कई तरकीबें निकालते हैं। हम कहते हैं कि दुख का कारण दुष्ट आत्माएं हैं। दुख का कारण शैतान, इबलीस, बीलझेबब— हमने शैतान के हजार नाम खोज रखे हैं— वह है दुख का कारण। दुख का कारण पिछले जन्मों के कर्म हैं। यह मृत्यु कोई परमात्मा के कारण नहीं हो रही, यह तो शरीर क्षणभंगुर है, इसके कारण हो रही है। हम हजार तरकीबें खोजते हैं। परमात्मा को बचाते हैं। उससे हमारे मन में एक तो राहत रहती है कि सब कुछ हो......।

सुना है मैंने, कबीर ने एक पद लिखा कि चलती चक्की देखकर मैं बहुत घबड़ा गया। क्योंकि उस चलती चक्की के बीच जो भी दाने दब गए, वे चूर्ण हो गए। और कबीर ने कहा है कि मुझे ऐसा लगा, यह सारा जगत एक चलती चक्की है, जिसके भीतर सब पिसे जा रहे हैं।

वह घबड़ाहट स्वाभाविक है। लेकिन स्वाभाविक इसलिए है कि हमने परमात्मा का जो रूप बनाया है, वह अपनी मनोनुकूल आकांक्षा से बनाया है। वह परमात्मा का रूप नहीं, हमारी वासनाओं का रूप है।

मृत्यु भी परमात्मा में ही घटित होती है और जीवन भी उसमें ही घटित होता है। वही मां भी है, वही मृत्यु भी। इसलिए काली की प्रतिमा बड़ी सार्थक है। उससे ही सब निकलता है और उसमें ही सब लीन होता है। सागर में सारी नदियां गिरती हैं और सारी नदियां सागर से ही पैदा होती हैं। सारी नदियां सागर से पैदा होती हैं। फिर चढ़ती हैं नदियां धूप की किरणों के सहारे बादलों में, फिर बादलों के सहारे पहाड़ों पर, फिर गंगोत्रियो में गिरती हैं और फिर सागर की तरफ दौड़ती हैं।

जो नदी सागर में अपने को गिरते देखती होगी, वह घबड़ा जाती होगी। मिट रही है, मौत है सागर। लेकिन उसे पता नहीं कि यह सागर मौत भी है, गर्भ भी। क्योंकि कल फिर उठेगी ताजी होकर,नई होकर, युवा होकर। बुढ़िया हो गई, बासी हो गई, जमीन ने गंदी कर दी। सब गंदगी सागर छांट देगा। फिर ताजा, फिर शुद्ध, फिर वाष्पीभूत होगी। फिर गंगोत्री, फिर यात्रा शुरू होगी। यह वर्तुल है। सागर नदी की मृत्यु भी है, जन्म भी। परमात्मा सृष्टि भी है, प्रलय भी वहां होना भी है और न होना भी।

इससे अर्जुन भयभीत हो गया है। और वह कहता है, वापस लौटा लो; इस रूप को मत दिखाओ। यह रूप प्रीतिकर नहीं है। इससे मुझे जरा भी सुख नहीं मिलता है। फिर भी वह कहे चला जा रहा है, भगवान, परमेश्वर, महादेव, देवों के देव!

थोड़ा हम उसका द्वंद्व, उसकी दुविधा समझें। वह अनुभव तो कर रहा है कि यह भी परमात्मा का ही रूप है, लेकिन मन मानना नहीं चाहता कि यह भी रूप है। वह कहता है, हटा लो, प्रसन्न हो जाओ। यह रूप नहीं देखा जाता है।

यह अर्जुन की ही दुविधा नहीं है, जो व्यक्ति भी परम अनुभव के निकट पहुंचते हैं और ईश्वर— अनुभूति को उपलब्ध होते हैं, उनकी यही दुविधा है।

अर्जुन की तकलीफ यही है कि वह द्वंद्व के पार होने के किनारे खड़ा है। वह कृष्ण से कहता है, लौटा लो। वापस हो जाओ। वही रूप ठीक था, तुम जैसे थे वही। हंसो, मुस्कुराओ। यह मृत्यु वाला रूप मुझे जरा भी सुख नहीं देता है। हालांकि उसे अनुभव हो रहा है कि यह भी उनका ही रूप है।

अगर वह आज राजी हो जाए इस रूप के लिए, तो द्वंद्व के इसी क्षण पार हो जाए। लेकिन अर्जुन इस क्षण तक राजी नहीं हो सका। और वापस द्वंद्व में गिरने के आग्रह कर रहा है।

(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)


हरिओम सिगंल

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...