सोमवार, 19 सितंबर 2022

प्रेम बन्धन

 सूरदासजी महाराज के जीवन में एक घटना घटी थी। वे जन्म से अन्धे नहीं थे। जब उन्होंने आँख से पाप होते देखा तब यह जानकर कि आँख भक्ति में विघ्न डालती है, उन्होंने उसे फोड़ डाला था कि मुझे अब जगत् को नहीं देखना है, बल्कि सतत श्रीकृष्ण का दर्शन करना है, सतत भक्ति करनी है। सूरदासजी वृन्दावन में रहते थे। उनके इष्टदेव बालकृष्णलाल थे। वे सारे दिन शुद्ध भाव से ध्यान करते थे, जप करते थे और कीर्तन करते थे। उनके चरित्र में लिखा है कि जब वे बड़े प्रेम से कृष्ण-कीर्तन करते, तब बालकृष्णलाल उनके सामने बैठकर कीर्तन सुना करते थे। उनके कीर्तन में भगवान् को बहुत आनन्द आता था। सूरदासजी का ऐसा नियम था कि किसी मनुष्य से भीख न माँगे। जब वे कहते कि लाला मुझे बहुत भूख लगी है। मैं किसी मनुष्य से नहीं माँगूँगा। वे बालकृष्णलाल को अपना मालिक मानकर कहते कि मेरा कपड़ा बहुत फट गया है। श्रीकृष्ण किसी न किसी को प्रेरणा प्रदान करते और किसी से सूरदास को वह वस्तु मिल जाती। एकबार सूरदासजी कहीं जा रहे थे। उनके रास्ते में एक बड़ा गड्ढा मिला। वे उसमें जा गिरे। गड्ढा बड़ा होने के कारण वे उससे बाहर न निकल सके। वे कुछ घबरा गये कि क्या करें? बालकृष्ण को दया आ गई। बालकृष्णलाल वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने सूरदासजी का हाथ पकड़ लिया। सूरदासजी को मालूम दिया कि किसी ने हाथ पकड़ा है। वे पूछ बैठे कि तुम कौन हो? बालकृष्णलाल ने कहा, 

"मैं नन्दबाबा के गाँव के एक ग्वाले का पुत्र हूँ। मैं गायों को लेकर इस ओर आया था। यहाँ आपको गड्ढे में पड़ा देखकर आपको निकालने के लिए चला आया।" 

सूरदासजी विचार में पड़ गए कि वह किस ग्वाले का लड़का है? किसे मेरी इतनी चिन्ता है? यह कोई दूसरा ग्वाला नहीं है। यह तो मेरा बालकृष्ण हैं वे उस लाला को पकड़ने के लिए आगे बढ़े। उनकी आँख से तो दिखाई नहीं देता था। बालकृष्णलाल आगे भाग गए। तब सूरदास ने कहा 

हाथ छुड़ाऐ जात हौ, निबल जानि के मोहि ।

हिरदय ते जो जाउ तौ, सबल कहौं मैं तोहि ॥

 तुम बलवान हो, मैं निर्बल हूँ, तुम सिन्धु हो, मैं बिन्दु हूँ। तुम अंशी हो मैं अंश हूँ। तुम सर्वज्ञ हो, मैं अल्पज्ञ हूँ, तुम ईश्वर हो, मैं जीव हूँ। तुमको सर्वशक्तिमान मानते हैं, किन्तु मैं तुमको सर्व शक्तिमान तब मानूँगा, जब तुम मेरे हृदय से बाहर निकल सको। सूरदासजी ने प्रभु को प्रेम से अपने हृदय में बाँध रखा है। परमात्मा प्रेम का बन्धन नहीं तोड़ सकते। सर्वतंत्र स्वतंत्र परमात्मा प्रेम-परतंत्र हैं। जहाँ अतिशय प्रेम, वहाँ परमात्मा अपनी हार मान लेते हैं।

भ्रमर को कमल से अतिशय प्रेम होता है। वह भ्रमर कमल के मकरन्द में लीन होता है। संध्याकाल सूर्य अस्त होने पर कमल मुँद जाता है। भ्रमरकाल की पंखुरियों में बन्द होकर सबेरा होने की प्रतीक्षा करता है। और अन्त में घुट कर मर जाता है। लकड़ी को छेदने वाला समर्थ भ्रमर कमल को तोड़ नहीं सकता। क्योंकि उसे कमल से प्रेम है। परमात्मा भी प्रेम-बन्धन नहीं तोड़ सकता। इसीलिए परमात्मा से प्रेम करो। यदि प्रभु प्रेम न हो सके, तो भगवान् का नाम-जप करो। जब पाप कम होता है, तब प्रभु में प्रेम जागृत होता है। जो श्रीकृष्ण के साथ प्रेम करता है, उसे श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण बना देते हैं। यदि तुम किसी धनवान की खुशामद करो, तो वह धनवान तुमको क्या देगा? यदि बहुत उदार होगा, तो तुम्हें दस हजार देगा, बीस हजार देगा। अति उदार होगा, तो तुम्हें अठन्नी का पचास प्रतिशत का हिस्सेदार बना देगा। क्या कोई तुम्हें अपना सोलहों आना भाग देगा? मानो कोई उदार हुआ, तो आधी सम्पत्ति देगा। उससे अधिक तो क्या देगा? कोई तुमको अपनी सोलहों आने सम्पत्ति देने को तैयार नहीं हो सकता। केवल श्रीकृष्ण ही सोलह आना दे सकते हैं।






परमप्रेम 1

 परमात्मा श्रीकृष्ण परम प्रेमस्वरूप हैं। प्रेम और परम प्रेम में अन्तर है। श्रीकृष्ण सभी जीवों से प्रेम करते हैं। जब परमात्मा प्रेम करते हैं, तब इस जीव की पात्रता का भी विचार नहीं करते। इस जगत् में अनेक जीव ऐसे हैं, जो परमात्मा का अनादर करते हैं कि ईश्वर कहाँ हैं? मैं ईश्वर को नहीं मानता। फिर भी परमात्मा सबको मानते हैं। यह पृथ्वी परमात्मा की है । मानव पृथ्वी के आधार पर स्थित है। परमात्मा पवन सभी को देते हैं। परमात्मा सभी को प्रकाश देते हैं। परमात्मा ही अन्न-जल देते हैं। फिर भी जीव अभिमान में आकर बोलता है कि मैं ईश्वर को नहीं मानता। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि मैं ईश्वर को मानता हूँ; किन्तु एक आसन पर तीन घण्टे बैठकर मुझे भगवान् की भक्ति करने की फुरसत नहीं है। जिसे चौबीस घण्टे में केवल तीन-चार घण्टे एक आसन बैठकर भगवान् की भक्ति करने की फुरसत नहीं है वह ईश्वर को माने या न माने दोनों समान ही हैं। "मैं ईश्वर को मानता हूँ।" यह कहने से कोई लाभ नहीं। तुम भगवान् के लिए कितना समय देते हो, उसी का महत्त्व है। जो भगवान् के लिए तीन-चार घण्टे का भी समय नहीं देता, वह भगवान् को ठीक तरह से मानने वाला नहीं कहा जा सकता।

प्रेम और परम प्रेम में दूसरा भी अन्तर है। जो प्रेम थोड़ा-सा भी स्वार्थ लेकर किया जाता है। वह साधारण प्रेम कहलाता है। जो प्रेम किसी बदले की भावना छोड़कर निःस्वार्थ भाव से किया जाता है, उसे परम प्रेम कहते हैं। परमात्मा बिना किसी स्वार्थ के जीव से प्रेम करता है। लक्ष्मीपति परमात्मा किसी से पैसा नहीं माँगते, वह केवल प्रेम चाहते हैं। यह जीव अनेक बार परमात्मा को पैसा देता है किन्तु प्रेम नहीं देता। मनुष्य स्त्री के साथ प्रेम करता है, किसी पुरुष के साथ प्रेम करता है, किसी कपड़े से प्रेम करता है। उसे परमात्मा को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने में संकोच होता है, लज्जा आती है। उसे कपड़ा गन्दा होने की चिन्ता होती है। मनुष्य जितनी सावधानी कपड़ा सम्हालने में करता है उतनी वह अपने दिल की नहीं करता। उसे कपड़े में दाग लगने की तो चिन्ता होती है, किन्तु अपने मन को दाग लगने की चिन्ता नहीं होती। थोड़ा-सा अपने अन्तर की ओर देखो, मन को बारंबार देखो तो पता लगे कि मन में कितने दाग लगे हुए हैं? यदि कपड़े में दाग लगेगा तो वह बाजार से दूसरा खरीदा जा सकता है; किन्तु यदि मन खराब हो जाएगा, तो वह बाजार से दूसरा नहीं मिलेगा।

शरीर एक दिन गलित हो जाएगा। इस संसार में जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका क्षय भी होता है। जिसका क्षय होता है, उसे शरीर कहते हैं। " शीर्यते इति शरीरम् " किसी के मरण से ईश्वर की सृष्टि में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मरने पर पंच महाभूत में मिल जाते हैं। जीवात्मा मरने के बाद केवल मन को साथ लेकर जाता है, शरीर छोड़ने पर मन ही साथ में आता है। हमारा यह तन पूर्व जन्म का मन लेकर आता है। जो मन मरने के बाद भी साथ जाने वाला है, उसे अधिक सावधानी से सम्हालना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि जगत् से घृणा करो; किन्तु यहाँ किसी जीव से अधिक प्रेम भी न करो। इस संसार में केवल परमात्मा ही प्रेम करने योग्य है। परमात्मा से प्रेम करो। कदाचित् आप यह शंका करेंगे कि महाराज आप प्रतिदिन परमात्मा से प्रेम करने को तो कहते हैं, किन्तु प्रभु में तो प्रेम होता ही नहीं। आप भगवान् में प्रेम होने का कोई उपाय बताइए। आप जरा विचार तो कीजिए कि अपने घर के लोगों से कैसे प्रेम करते हैं? पति ऐसा समझता है कि पत्नी मुझे सुख देती है और पत्नी ऐसी कल्पना करती है कि पति के कारण ही सुखी हूँ। घर के लोग मुझे सुख देते हैं, ऐसा समझने से प्रेम होता है। आज से आप ऐसा निश्चय कीजिए कि प्रभु ने ही मुझे सुख दिया है। न कोई स्त्री सुख देती है, न कोई पुरुष सुख देता है। यहाँ सब अपने किये गये कर्म का फल भोगने के लिए इकट्ठा हुए हैं। कर्म का सम्बन्ध पूरा होते ही सुख देने वाला ही दुःख का कारण बनता है।

व्यवहार में यह देखा गया है कि जिससे अधिक सुख मिलता है, वही रुलाता है। सुख तो परमात्मा देता है। आपको यदि थोड़ा ठंडा पानी मिले तो विचार करो कि यह किसने दिया है? किसी मनुष्य में पानी पैदा करने की शक्ति नहीं है। पानी तो परमात्मा देता है। यदि पानी मिले, तो भगवान् का एहसान मानना कि उसने पानी दिया। यदि आप बारंबार अपने मन में विचार करेंगे कि मैं परमात्मा की कृपा से सुखी हूँ, तो ही प्रभु में प्रेम उत्पन्न होगा। जो यह समझता है कि मैं अपने कर्म से सुखी हूँ, वह अभिमानी है। ऐसा विचार करो कि भगवान् मुझे सुख देते हैं; प्रभु की 'कृपा से मुझे धन मिला है और जो मान या धन आपको मिला है क्या वह किसी योग्यता से मिला है ? इसके लिए अपनी दृष्टि अन्दर की ओर मोड़ो और विचार करो कि क्या मैं इसके योग्य हूँ?

मैंने आज तक कितना पाप किया है? विचार करो कि मैंने मन से बहुत पाप किया है, आँख से बहुत पाप किया है। फिर भी प्रभु ने मुझे बहुत कम सजा दी है। प्रभु ने मुझे बहुत सुख दिया है। परमात्मा मनुष्य की योग्यता से अधिक मान या आदर देते हैं, सुख देते हैं। परमात्मा अत्यन्त उदार हैं। अहेतुकी प्रेम करना प्रभु का स्वभाव है। परमात्मा प्रेम किये बिना रह ही नहीं सकता। वह नास्तिकों से भी प्रेम करता है। वैष्णव जन अपने प्रेम द्वारा ही भगवान् को अपने वश में करते हैं। इसलिए प्रेम-बल ही सबसे श्रेष्ठ बल है। जब द्रव्य-बल, बुद्धि-बल, -बल, शरीर-ब ज्ञान-बल इन सबकी हार हो जाती है, तब प्रेम की जीत होती है। जहाँ अतिशय प्रेम है, वहाँ मनुष्य हार स्वीकार कर लेता है। प्रेम के सब नियम भिन्न हैं। प्रेम में अति मान मिलना अपमान जैसा लगता है। प्रेमी को अति मान नहीं सुहाता। इसीलिए वह कह पड़ता है कि मैं तो घर का हूँ। मैं क्या कोई पराया हूँ? मुझे इतना आदर क्यों देते हो? प्रेम में अति मान ही अपमान जैसा लगता है। इसीलिए वह कह पड़ता है कि मुझे अपना समझकर ही ऐसा कहा जाता है। प्रेम में अपमान भी मान है, आदर है। प्रेम के अनेक तत्त्व काफी भिन्न हैं।प्रेम में हार ही जीत है और जीत ही हार है। यानी मेरे प्रियतम की जीत ही मेरी जीत है और उसकी हार ही मेरी हार है। जहाँ अतिशय प्रेम है, वहाँ जीव भी हार पसन्द करता है। कल्पना करो कि कोई माता कथा सुनने के लिए जाने वाली है। उसके घर में तीन-चार वर्ष का बालक है। माता की ऐसी इच्छा है कि बालक घर में ही खेले उसे यहीं छोड़ मैं कथा सुनने जाऊँ। माता बालक को समझाती है, उसे खिलौना देती है, मिठाई देती है, पैसा देती है और कहती है कि बेटा ! तू घर में ही खेलना। लेकिन बालक पैसा फेंक देता है। उसे पैसा भी नहीं चाहिए, खिलौना भी नहीं चाहिए। उसे तो उसकी माता चाहिए। उसे माता को छोड़ कोई चीज पसन्द नहीं आती। बालक का सम्पूर्ण प्रेम माता में होता है। यदि बालक अपनी माता की साड़ी पकड़कर खूब रोने लगे तो क्या उसकी माता उसे रोता हुआ छोड़कर कथा में जाएगी। वास्तव में माता अपने बालक का प्रेम देखकर विह्वल हो जाएगी। यदि उससे कोई पूछे कि तुम कथा में क्यों नहीं आई? तो वह जवाब देगी कि बच्चे ने मुझे रोक लिया। क्या छोटा बालक माता को रोक सकता है? माता में तो बालक से अधिक शक्ति है; किन्तु बालक में प्रेम अधिक है। बालक का प्रेम देखकर माता दुर्बल बन जाती है कि बेटा! तेरी इच्छा नहीं है, तो मैं कथा में नहीं जाती ।

मान लो कि वह बालक अब बड़ा होकर चौबीस-पच्चीस वर्ष का जवान हो गया। उसकी शादी भी हो गई और उसकी पत्नी घर में आ गई। तब यदि माता कथा में जाने को तैयार हुई और वह विवाहित युवक उसे रोकना चाहता हो, तो क्या माता उसका कहना मानेगी? माता साफ शब्दों में कह देगी कि तू आज कथा में जाने से रोकेगा, तो भी मैं जाऊँगी। मुझे अपनी देह का, अपनी आत्मा का कल्याण करना है। विवाहित युवक माता को कथा में जाने से कितना ही रोके, किन्तु वह अवश्य जाएगी। अब यदि लड़का माता से कहे कि मैं छोटा था तो कथा में जाने से जब तुझे रोकता था, तब तू नहीं जाती थी। इस समय मैं पैसा कमाता हूँ और कथा में जाने से तुझे रोकता हूँ, फिर भी तू कथा में क्यों जाती है? माता बड़ी सरलता से उत्तर देगी कि जब तू छोटा था, तब तेरा सम्पूर्ण प्रेम मुझ में ही था। अब तेरी पत्नी आ गई है और तेरा पहले जैसा प्रेम मुझ में नहीं है।

आज लड़कों की शादी होती है। उसके बाद वे माता-पिता का प्रेम और उनका उपकार भूलने ही लगते हैं। बालक बाल्यावस्था में माता के आधीन था। इसलिए माता भी उसके आधीन रहती थी और बालक जो कहता था उसे वह करती थी। लड़के के बड़ा होने पर माता उसके अधीन नहीं रहती । पुत्र का प्रेम कम होते ही माता का प्रेम भी कम हो जाता है। जीव और ईश्वर का सम्बन्ध पिता-पुत्र जैसा है, माता-पुत्र जैसा है। परमात्मा सबकी माता है। वही सबका पिता है। उस परमात्मा से प्रेम करो, सतत प्रभु स्मरण की आदत डालो, भगवान् का नाम जप करो, प्रतिपल भगवान् के उपकारों का स्मरण करो कि उसकी मुझ पर बड़ी कृपा है। जो परमात्मा के उपकारों का स्मरण करता है, प्रतिपल भगवान् की मुझ पर कृपा है ऐसा सोचता रहता है वही भक्ति कर सकता है। उसे ही प्रभु के प्रति प्रेम जगता है। कोई भी जीव प्रेम किये बिना रह ही नहीं सकता। जीव प्रेम तो करता है किन्तु जगत् के साथ प्रेम करता है। वह परमात्मा से प्रेम नहीं करता। जीव पैसे से भी प्रेम करता है। कितने ऐसे सुधरे हुए लोग भी हैं, जो अपनी चप्पल से भी बहुत प्रेम करते हैं। वे चप्पल पहनकर घर में फिरते हैं और चप्पल पहनकर रसोई घर में भी जाते हैं। वे ऐसा समझते हैं कि हम सभ्य हैं। जो चमड़े से अधिक प्रेम करे, उसे सुधरा हुआ कहें या बिगड़ा हुआ कहें ? मन्दिर की तरह ही अपना रसोईघर पवित्र रखना चाहिए ।

सूतजी सावधान करते हुए कहते हैं, कोई भी जीव प्रेम किये बिना नहीं रह सकता। लेकिन मनुष्य भगवान् से प्रेम नहीं करता। यह जीव जगत् से प्रेम करके ही दुःखी हुआ है। जगत् के साथ वैर मत करो, परन्तु उससे अधिक प्रेम भी मत करो। यह जगत् अधिक प्रेम करने योग्य नहीं है। तुमसे जो मिले, उसे 'जय श्रीकृष्ण' कहो, हाथ जोड़ो, दो मधुर शब्द कहो, किन्तु यदि तुमसे कोई न मिले, तो ऐसा न सोचो कि वे भाई दो-तीन महीनों से क्यों नहीं मिले? कोई मिले तो अच्छा, न मिले तो अधिक अच्छा! यह सोचो कि मुझे परमात्मा से मिलना है, परमात्मा से एकाकार होना है; जगत् के साथ विवेक पूर्वक प्रेम करो। उससे अधिक प्रेम मत करो। जिसका संयोग तुम्हें अधिक सुख देता है, उसका वियोग बहुत रुलाएगा। संसार का संयोग वियोग के ही लिए होता है। संयोग में जितना सुख है, उससे हजार गुना दुःख वियोग में है। एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन तुम उसे छोड़ दोगे अथवा वह तुम्हें छोड़कर चला जाएगा। यह सोचकर कि एक दिन वियोग होने ही वाला है, यह याद रखते हुए विवेक पूर्वक प्रेम करो। यदि शरीर से प्रेम करो, तो उसे काम कहेंगे, धन से प्रेम करो, तो उसे लोभ कहेंगे। मनुष्य का प्रेम अनेक स्थानों पर बिखरा हुआ है। इस बिखरे हुए प्रेम को इधर-उधर से बटोर कर परमात्मा को अर्पित कर दो। सर्व शक्तिमान परमात्मा प्रेम-परतंत्र, प्रेमाधीन बन जाता है।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

 पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

जब तक ईश्वर के साथ पूर्ण प्रेम न करो, तो वह प्रेम अधूरा है, अपूर्ण है। जो परमात्मा से प्रेम करता है, उसे परमात्मा पूर्ण बनाता है। फिर भी भगवान् परिपूर्ण ही रहता है। परमात्मा की तरह प्रेम करने वाला संसार में कोई नहीं है, न कोई हो सकेगा। भगवान् गोप-बालकों का स्वरूप धारण करते हैं और गोपियों को आत्म-स्वरूप का दान करते हैं। वे अत्यन्त उदार हैं। जब तक जीव भगवान् से प्रेम न करे, तब तक वह माया के बन्धन में पड़ा रहता है। जब जीव परमात्मा को प्रेम-बन्धन से बाँधता है, तभी यह जीव माया के बन्धन से मुक्त होता है। जब गोपियों का प्रेम बढ़ने लगता है, तब वे बालकृष्णलाल का नाम माखनचोर रख देती हैं। उन्हें 'माखनचोर-माखनचोर' कहकर बुलाती हैं। यशोदामाता को ऐसा पुकारना अच्छा नहीं लगता। वे कहतीं हैं कि मेरे बालक का नाम चोर रखती हैं। कन्हैया अपने घर का माखन नहीं खाता, वे गोपियों के घर का मक्खन खाने जाता है। इसीलिए तो वे सब उन्हें माखन चोर कहती हैं। लाला मुझ से कहता है कि मुझे अपने घर का माखन पसन्द नहीं। लाला को घर का माखन पसन्द न होने का कारण क्या है? घर का काम नौकर करता है। इसलिए नौकर का काम नौकर जैसा ही होता है। माता प्रेम से रसोई बनाती है। इसलिए उसके स्वाद में बहुत फर्क पड़ जाता है। माता के परोसने और नौकर के परोसने में काफी फर्क पड़ जाता है। घर में नौकर काम करते हैं। इसलिए लाला को माखन नहीं भाता है इसलिए यशोदा माता ने आज यह निश्चय किया है कि आज मैं अपने हाथ से दधि-मन्थन करूँगी और अपने हाथ से स्वादिष्ट माखन निकालूँगी। उसे अपने लाला को मना-मनाकर खिलाऊँगी। जब वह पेट भरकर माखन खालेगा, तब उसे दूसरे के घर का माखन खाने की इच्छा नहीं होगी। यशोदा में शुद्ध भक्ति का स्वरूप है। शुद्ध भक्ति भगवान् को बाँध लेती है। वस्त्र वासना का प्रतीक है। सूत्री वस्त्र रेशमी वस्त्र की अपेक्षा अधिक मुलायम होता है। जीव वासना का बिल्कुल नाश नहीं कर सकता। वह पहले वासना को मुलायम बनाता है। इसलिए यदि तुम्हें भक्ति मार्ग में आगे बढ़ना हो तो सुख भोगने की वासना मत रखना। तुम दूसरे को सुखी करने और सुखी देखने की इच्छा करना, अपनी वासना को मुलायम बनाना। जिसे दूसरे को सुख देने की वासना होती हैं, वही भक्ति कर सकता है और वह कभी दुःखी नहीं हो सकता। यशोदा ने रेशमी साड़ी धारण की है। उनके कान में कुण्डल हैं। वह भक्ति का शृंगार है। यशोदा माता भक्ति- रूपिणी है। साँख्य और योग रूपी कुण्डल भक्ति का श्रृंगार है। ये दोनों भक्ति के साधक हैं। साँख्य शास्त्र जड़-चेतन का विभाग करता है। जो जड़-चेतन का विभाग करता है। जो जड़-चेतन का अच्छी तरह विभाग कर सकता है, वही भक्ति कर सकता है। मैं इस शरीर से पृथक् हूँ। मैं यह शरीर नहीं हूँ। यह शरीर पंच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) अथवा पाँच तत्त्वों से बना है। शरीर से आत्मा भिन्न है, पृथक है। आत्मा परमात्मा का अंश है। शरीर जड़ है, आत्मा चेतन है। यही समझना साँख्य शास्त्र है। योग शास्त्र का काम मन को एकाग्र करना है। जब भगवत के स्वरूप और उनके नाम में आँख और मन एकाग्र होंगे, तो भक्ति होगी। भक्ति करने का अर्थ है भगवान की मूर्ति में परमात्मा के मंत्र में मन को पिरो देना । तभी भक्ति सिद्ध होती है। यशोदामाता दधि-मंथन करते समय लाला को देखती हैं। माता की नजर श्रीकृष्ण में है।  हमें भी ऐसी आदत डालनी चाहिए। घर में चाहे जो भी काम करो अपनी नजर भगवान् में स्थिर करो। जो अपनी आँखें भगवान् में रखता है, उसे भगवान दिव्य भक्ति देते हैं। आँखें भगवद्-स्वरूप में स्थिर करो। यशोदा माता जो काम करती हैं, वह लाला के लिए करती हैं। घर का प्रत्येक काम भगवान् के लिए करना ही भक्ति है।

कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि मन्दिर में जाकर काम करना ही भक्ति है। वास्तव में तुम्हारे घर के मालिक परमात्मा हैं यदि घर में जो काम करो, वह भगवान् को ध्यान में रखकर करो और भगवान् के लिए करो, तो यह भी भक्ति है। जब बाजार में साग-सब्जी लेने जाओ, तो भगवान् को याद करना कि मैं यहाँ भगवान् के लिए आया हूँ। अपने घर में कोई काम करो तो उसे भगवान् के लिए करो। कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि स्नान तो शरीर को स्वच्छ करने के लिए किया जाता है। अरे, यह शरीर तो मल-मूत्र से भरा हुआ है। एक-दो बार क्या अनेक बार धोने या स्नान करने पर भी यह स्वच्छ नहीं हो सकता। अनेक लोग शरीर पर खूब साबुन घिसते हैं। क्या बहुत साबुन रगड़ने पर शरीर का रंग बदल जाएगा? एकाध बार साबुन लगाना तो ठीक है। स्नान सेवा करने के लिए है। ऐसा भाव रखो कि मुझे स्नान करके भगवान् की सेवा में जाना है। अधिक क्या कहें? कोई भी काम हो, वह भगवान् के लिए करो।

गोपियों का श्रृंगार करना भी भक्ति है। यदि शृंगार करने में कोई मानसिक विकार हो, वासना हो, तो वह आसक्ति कहा जाएगा। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने के विचार से श्रृंगार किया जाए तो वह भी भक्ति है। यह सोचना कि मुझे ठाकुरजी के सामने बैठना है। यदि मेरा कपड़ा गन्दा होगा तो मेरे भगवान् को पसन्द नहीं पड़ेगा। मैं भगवान् का हूँ। तुम्हें अच्छा और स्वच्छ कपड़ा पहिनकर भगवान् की सेवा करनी है, परमात्मा का ध्यान करो, प्रेम से कीर्तन करो। तुमको इस प्रकार देखकर भगवान् प्रसन्न होंगे।

मीराबाई के चरित्र में लिखा है कि वह सुन्दर श्रृंगार करती और गोपालजी के सम्मुख कीर्तन करती - 'गोपालजी की नजर मुझ पर पड़ने वाली है। इसलिए मैं श्रृंगार करती हूँ।' उनका भाव ऐसा था । यदि शृंगार के पीछे शुद्ध भाव हो तो श्रृंगार भी भक्ति है। प्रायः ऐसा होता है कि लोग जब बाहर निकलते हैं, तब अच्छा कपड़ा पहनते हैं, किन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं, कि जब घर के अन्दर ठाकुरजी की पूजा करने बैठते हैं, तब फटा कम्बल पहनकर बैठते हैं अथवा साधारण कपड़ा पहनते हैं और सोचते हैं कि यहाँ कौन देखने वाला है? तुम जगत् को अच्छा कपड़ा दिखाते हो और भगवान् को साधारण कपड़ा दिखाते हो। क्या यह भगवान् को पसन्द आएगा? तुम यदि भगवान् को अच्छा कपड़ा पहनकर प्रेम से पूजोगे, तो भगवान् की तुम पर नजर पड़ेगी। केवल तन को ही नहीं, अपने मन को भी सजाना है, मन को शुद्ध और सुन्दर बनाना है। कपड़े की अपेक्षा हृदय का शृंगार अधिक महत्वपूर्ण है। श्रृंगार में यदि कोई शुद्ध भाव है तो वह भक्ति ही है। व्यवहार और भक्ति दोनों भिन्न नहीं है। अपने व्यवहार को भक्तिमय बनाओ। यशोदा मैया दधि-मन्थन करते समय अपने लाला को निहार लिया करती हैं। इस पर थोड़ा विचार करें तो यह संसार भी एक मटकी (दुग्ध पात्र) जैसा ही है। इसमें माया ने विषय रूपी दही भरा है। जिस प्रकार दही में खट्टापन होता है, उसी प्रकार संसार के विषयों में अधिक खट्टापन होता है, अधिक कड़वाहट होती है, मीठापन बहुत ही कम होता है। दही का मन्थन करने से मक्खन निकलता है। दही में भले ही खट्टापन हो; वह मक्खन मधुर होता है। तुम विषयों का मन्थन विवेक पूर्वक करो और प्रेमरूपी मक्खन निकालकर परमात्मा को अर्पित करो। यशोदा श्री सम्पन्न हैं। उन्होंने कभी ऐसी मेहनत नहीं की थी, किन्तु आज अपने लाला के लिए वह मेहनत कर रही हैं। इसीलिए उसे  पसीना छूट रहा है । फिर भी उनके हृदय में श्रीकृष्ण प्रेम भरा पड़ा है। वह सोच रही हैं कि आज लाला के लिए मक्खन निकाल रही हूँ। आज मैं लाला को मना-मनाकर अपने हाथ से निकाला हुआ मक्खन खिलाऊँगी, जिससे वह फिर दूसरी जगह मक्खन खाने न जाए। माता यशोदा थक गई हैं, प्रेम में हृदय गद्गद हो गया है, द्रवीभूत हो उठा है। इसीलिए उसे अपनी थकावट का पता नहीं लगता। यदि तुम प्रेम से काम करो, परमात्मा प्रसन्न करने की भावना से काम करो, श्रीकृष्ण में नजर रखकर काम करो, थकावट होने पर भी उसकी खबर नहीं पड़ेगी, पता नहीं लगेगा। प्रेम एक ऐसी ही शक्ति है। प्रेम में भले ही थक जाए किन्तु उस थकावट का पता नहीं लगता। श्रीकृष्ण के प्रेम में माता यशोदा का हृदय पिघल गया है। धम-धम-धम की जो मधर ध्वनि होती हैं, वह दधि-मन्थन की धमधमाहट है। यशोदा मैया प्रेम से श्रीकृष्णलीला का वर्णन करती हैं कि मेरे लाला का जब से जन्म हुआ, तभी से इस गाँव की शोभा बढ़ी है। मेरा लाल सारे गाँव को प्राणों से भी प्यारा लगता है। श्रीकृष्ण की एक-एक लीला का स्मरण करते-करते माता के शरीर में रोमाँच हो उठता है, आँखें गीली हो जाती हैं। यशोदा माता दधि-मन्थन में तन्मय हो गई हैं। उनकी बहुत इच्छा है कि कन्हैया के जागने से पहले मक्खन निकाल लें। इसका कारण यह कि वह जागने के बाद काम नहीं करने देता। हर रोज का नियम तो यह था कि यशोदा माता के मंगल गीत गाने पर श्रीबालकृष्णलाल जागते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि कन्हैयालाल बिछौने पर जागते, किन्तु माता की गोद में फिर सो जाते। यशोदा मैया लाला को समझातीं कि बेटा ! अब सूर्योदय का समय हो गया है। तुझे तेरी गायें बुला रही हैं। इस प्रकार जब यशोदा माता बहुत प्रेम से जगातीं, तब कन्हैया जागता है। आज यशोदा माता की ऐसी इच्छा है कि जल्दी-जल्दी मन्थन करूँ, तो मक्खन निकले। उसे निकाल कर रख लूँ। इसके बाद लाला को जगाऊँगी, लेकिन आज लाला को जगाने की कोई जरूरत पड़ी नहीं। बालकृष्णलाल जाग उठे हैं और जगकर घुटनों से चलते हुए पीछे से माता की साड़ी खींचने लगे हैं। माता को आश्चर्य हुआ कि यह कौन आया ? माता ने मुड़कर देखा तो बालकृष्ण नजर आए। निद्रा से जागने के बाद तो कन्हैया की शोभा कुछ और ही होती है। बालकृष्णलाल के बाल रेशम की तरह नरम हैं बाल उनके गाल पर आ गए हैं। लाला की आँखों में केवल प्रेम भरा है। वे प्रेम से अपनी माता को देख रहे हैं कि वह मेरे लिये कितना दुःख सहन कर रही है। आज लाला से यह न देखा गया। वे बोले, माँ तू मेरे लिए कितना दुःख सहन करती है। लाला को आज सहन नहीं हुआ। वे बोल पड़ा, माँ, मुझे भूख लगी है! माता का हृदय प्रेम से पिघल उठा। इसीलिए लाला को आज भूख लगी है। माता ने मटकी में नजर दौड़ाई, तो थोड़ा मक्खन ऊपर आया देखा । माता को अब ऐसा लगा कि यदि दस-पन्द्रह मिनट और दधि-मन्थन करूँ तो अच्छी तरह मक्खन निकलेगा। माता ने लाला से कहा, बेटा, तू बैठ! मैं मक्खन निकाल लूँ तो तुझे खिलाऊँ। माता पुनः दधि-मन्थन आरम्भ कर देती है, किन्तु लाला को जरा भी भूख सहन नहीं होती। उसे खूब भूख लगी है। फिर तो कन्हैया वहाँ से उठा और मथानी पकड़ कर रोने लगा। माता को उस पर दया आ गई। माता ने दही मथना बन्द कर दिया है और बालकृष्णलाल को अपनी गोदी में उठा लिया है। माता अपने हृदय का प्रेम-रस अर्पित कर रही है।

माता जिस समय अपने बालक को दूध पिलाती है माता और पुत्र दोनों एक हो जाते हैं। यशोदा माता और बालकृष्णलाला दोनों एक हो गए हैं। यही यशोदाजी की ब्रह्म सम्बन्धी कथा है। माता बालकृष्णलाल को गोद में लेकर बैठी है। वह अपने लाला को हृदय का प्रेम रस अर्पित कर रही है, तन्मय बन गई है। उसी समय माता ने देखा कि चूल्हे पर रखा हुआ दूध उफन रहा है। जब जीव का ब्रह्म से सम्बन्ध होता है, तभी दूध में उफान आता हैं।

यदि शान्ति से विचार करें, तो ज्ञात होगा कि यह लीला हर घर में होती है। तुम सबेरे चार बजे उठे, स्नान किया, पवित्र आसन पर बैठे और ऐसा संकल्प किया कि ध्यान के साथ जप करते हुए मैं तन्मय हो जाऊँगा, मुझे भगवान् के दर्शन होंगे, मुझे परमात्मा से मन पूर्वक मिलना है। परमात्मा से मिलने की भावना रखते हुए ध्यान के साथ जप करने के कारण तुम्हारी तन्मयता थोड़ी बढ़ेगी, लेकिन जीव जब परमात्मा से मिलता है, तभी दूध में उफान आता है।

इसीलिए यशोदामाता ने लाला को धरती पर उतार दिया और दूध उतारने गईं। लाला को अभी तृप्ति नहीं हुई है। माता जल्दी से दूध उतारने जा रही है। लाला को यह बात पसन्द नहीं आई कि मेरी माता मुझे छोड़कर दूध उतारने जाए! उसने मेरे लिए अनेक वर्षों तक जंगल में रहकर, पेड़ों के पत्ते खाकर भक्ति की थी किन्तु अब? जीव का एक स्वभाव है कि उसे जो मिलता है, उसकी उपेक्षा करता है। माता ने भी यही सोचा कि कन्हैया कहाँ जाने वाला है? मैं उसे बाद में दूध पिलाऊँगी ! पहले इस दूध को अग्नि में गिरने से बचा लूँ। इसीलिए यशोदामाता लाला को धरती पर उतारकर दूध उतारने गईं। लाला से यह सहन नहीं हो सका। जो भगवत् सेवा और स्मरण छोड़कर लौकिक सुधारने जाता है, भगवान् उसका लौकिक अधिक बिगाड़ देते हैं।

आप सब वैष्णव हैं, प्रभु के प्यारे हैं। इसलिए भगवान् में अधिक विश्वास रखिए। भगवान् को आपके लौकिक-अलौकिक की अधिक चिन्ता है। जो परमात्मा से प्रेम करता है और परमात्मा के सेवा स्मरण में रहता है, उसके लौकिक की चिन्ता भगवान् को अधिक होती है। आप जिस देव की पूजा करते हैं और जिस देव का नाम-जप करते हैं, उस देव को आपकी सभी चिन्ता होती है। माता जब लाला को छोड़कर दूध उतारने गई तो इससे लाला को बहुत बुरा लगा। उनके मन में यह बात आई कि माता मेरी कीमत एक दो लीटर दूध से भी कम समझती है। वह उफनता दूध उतारने गई है। यशोदा ने एक-दो सेर दूध बचाया होगा; किन्तु लाला ने विचार किया आज मैं एक मन दही का नुकसान करूंगा। माता को भी यह याद रहेगा कि मैं लाला को छोड़ दूध उतारने गई तो उसने इतना बड़ा नुकसान कर दिया। उसी समय लाला को क्रोध आ गया। वहाँ एक चटनी पीसने वाला पत्थर पड़ा था। लाला ने उसे उठा लिया दही की मटकी पर दे मारा। उससे दही भरी मटकी फूट गई। संसार की आसक्ति ही मटकी है। जो भगवत् स्वरूप में आसक्ति होती हैं, उसे भक्ति कहते हैं। विषयासक्ति भक्ति का विनाश करती है। श्रीकृष्ण एक-एक घर में जाकर मटकी इसलिए फोड़ते थे कि मेरी शरण में आया हुआ जीव मेरी अपेक्षा दूसरे से अधिक प्रेम करे, तो वह मुझ से कैसे सहन होगा? भगवान् विषयासक्ति का विनाश करते हैं। प्रायः ऐसा देखा गया है कि यह जीव संसार को ठीक करने जाता है। वह यह भी समझता है कि संसार को ठीक करके भगवान् की भक्ति करूँगा। आश्चर्य है कि अब तक न किसी का संसार व्यवस्थित हुआ है न होगा। संसार तो क्षण - प्रति क्षण बदलता है, किन्तु परमात्मा का स्वरूप एक सा स्थिर रहता है। संसार को व्यवस्थित करने के बाद भक्ति करने की कल्पना ही गलत है। इसलिए भगवान् मटकी फोड़ देते हैं। संसार की आसक्ति तोड़ देते हैं।

उसी समय वहाँ ग्वाल-बाल मित्र आ जाते हैं। उन्होंने लाला से पूछा कि कन्हैया ! आज किसके घर चोरी करने जाना है? लाला को इस समय क्रोध चढ़ा है। उन्होंने क्रोध में ही कह दिया कि मुझे आज अपने ही घर में चोरी करनी है।

बालकृष्णलाल ग्वाल-बालों की पीठ पर चढ़कर मक्खन उतारते हैं और ग्वाल-बाल मित्रों को मक्खन देते हैं। श्रीकृष्ण जिस घर में चोरी करते हैं, उस घर के झरोखों के पास बन्दर एकत्र हो जाते हैं। उस समय भगवान् को यह बात याद आती है कि ये मेरे रामावतार के भक्त हैं। रामावतार में मैं तपस्वी था। उस समय मैं इन बन्दरों को कुछ खिला न सका। ये सब पेड़ के पत्ते खा-खाकर मेरे लिए युद्ध करते थे। इसलिए वे उन बन्दरों को कृष्णावतार में मक्खन खिलाते हैं। 


 

श्री डोंगरेजी महाराज

हरिओम सिगंल 





लक्ष्मी जी से भेंट

 बलिराजा पाताल में गये। तन, मन धन से सेवा स्मरण करते हुए जो तन्मय बनता है, भगवान् उसके घर पहरा देते हैं। इन्द्रियाँ शरीर रूपी घर के दरवाजे जैसी हैं। आँख में श्रीकृष्ण, कान में श्रीकृष्ण, मुख में श्रीकृष्ण मन में श्रीकृष्ण प्रत्येक इन्द्रिय में प्रभु को पधराइये। आप जिस  इन्द्रिय से प्रभु भक्ति नहीं करेंगे, उस इन्द्रिय से जाने-अनजाने पाप होता रहेगा।

वक्ता जब कथा करता है, तब श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए बोलता है। श्रोता जब कथा सुनते हैं तब भगवान् में दृष्टि रखकर, भगवान् में कान रखकर भगवान् में मन रखकर कथा श्रवण करते हैं। कथा में कई लोग कान से भक्ति करते हैं, पर आँख से नहीं करते। चारों ओर देखते हैं। आँखे भक्ति नहीं करेंगी तो चंचल होंगी, पाप करेंगी। प्रत्येक इन्द्रिय से भक्ति करने की आदत डालिये।

तन, मन और धन से जो सेवा-स्मरण करते हैं, तन्मय बनते हैं, उनकी एक-एक इन्द्रिय के द्वार पर भगवान् विराजमान रहते हैं जहाँ परमात्मा विराजमान हैं, वहाँ काम नहीं आता है। मानव जिस इन्द्रिय से भक्ति नहीं करता है, उस इन्द्रिय से काम भीतर प्रविष्ट हो जाता है और उस इन्द्रिय द्वारा पाप होता है। काम बहुत बलवान् है। काम जीव को ठगता है, मारता है, इससे उसे मार कहते हैं।

बलि महाराज एक-एक द्वार में प्रभु चतुर्भुज नारायण के दर्शन करते हैं। जहाँ वे दृष्टि डालते हैं, वहाँ भगवान् का स्वरूप देखते हैं। कान श्रीकृष्ण कथा सुनते हैं। मन में परमात्मा का स्वरूप स्थिर हुआ है। एक-एक इन्द्रिय के द्वार में प्रभु विराजमान हैं, बलिराजा को स्वर्ग से भी अधिक पाताल में आनंद आ रहा है। सब प्रसन्न हैं, देवों को स्वर्ग का राज्य मिला, इससे प्रसन्न हैं। पर एक माता महालक्ष्मीजी वहाँ नाराज हैं। बैकुण्ठ में माताजी अकेली विराजमान हैं। माता की प्रसन्नता नहीं हैं। उनका मन नहीं लग रहा है। एक दिन उन्होंने नारदजी से पूछा- नारद! तुम कुछ जानते हो । भगवान् कहाँ विराजमान हैं? नारदजी ने हाथ जोड़कर कर कहा- बलिराजा के घर दान लेने गये थे और बंधन में आ गये हैं। मैंने ऐसा सुना है कि बलिराजा के द्वार पर हाथ में लकड़ी लेकर सिपाही के समान खड़े रहते हैं और पहरा देते हैं। लक्ष्मीजी ने पूछा घर कब पधारेंगे? नारदजी ने कहा- बलिराजा जब अनुमति देंगे, तब ही प्रभु पधारेंगे। परमात्मा बलि राजा के अधीन हुए हैं।

माता महालक्ष्मीजी ने लीला की। ब्राह्मण पत्नी का रूप उन्होंने धारण किया। बहुत सादा श्रृंगार किया और बलिराजा के दरबार में आयीं। जहाँ नारायण विराजमान रहते हैं, वहाँ बिना निमंत्रण लक्ष्मीजी पधारती हैं।

आजकल बहुत से लोग धन के पीछे पागल हैं। लक्ष्मीजी महान् पतिव्रता हैं। अकेली किसी के घर नहीं जाती हैं और जाती भी हैं तो उल्लू पर बैठकर जाती हैं और रुलाती हैं। जिसके घर पर लक्ष्मीजी, नारायण के साथ पधारती हैं, उसे बहुत शांति देती हैं। माताजी से कहिये-माता! आप अकेली नहीं पर नारायण के साथ पधारिये। जो नारायण को पाते हैं, लक्ष्मीजी उनके घर गरुड़ पर बैठकर बिना निमंत्रण के पधारती हैं। लक्ष्मीजी जिसके घर गरुड़ पर बैठकर जाती हैं, उसे बहुत शांति मिलती है।

बलि महाराज लक्ष्मीजी को नहीं पहिचान सके परन्तु बलिराजा ने बहुत विनय से पूछा आप कौन हैं? क्यों आयी हैं? लक्ष्मीजी ने कहा-मैं ब्राह्मण की पत्नी हूँ। मेरे माता-पिता नहीं हैं, भाई भी नहीं है। पीहर में जाने की इच्छा होती है, तब कहाँ जाऊँ? मैंने सुना है कि बलि राजा की कोई बहिन नहीं है। मैं तुम्हारी धर्म की बहिन होने के लिए आयी हूँ। तुम मेरे धर्म के भाई जाओ न ! माताजी ने श्रृंगार नहीं किया था, पर उनका तेज कहाँ छिप सकता था? बलि राजा ने सोचा-ये लक्ष्मी जैसी दीख रही हैं। ये कौन होंगी? बलि राजा ने लक्ष्मीजी को प्रणाम किया और 'कहा—आज से मैं आपका छोटा भाई हुआ। आप मेरी बड़ी बहिन हैं। यह तुम्हारा पीहर हुआ। इस घर में जो कुछ है, तुम्हारा है। जरा भी संकोच न रखियेगा।

बलि महाराज के घर साक्षात् लक्ष्मीजी पधारी हैं। जब से लक्ष्मीजी पधारी हैं, सारा सुखी हो गया है। गाँव में कोई दीन-हीन नहीं रहा। कोई रोगी नहीं रहा। किसी ने झगड़ा नहीं। किया। बलि महाराज को आश्चर्य हुआ। सोचने लगे-ये बड़ी बहन जबसे आई हैं, तब से मैं सुखी हुआ। ये यहीं रह जायँ तो अच्छा है। सब सुख में हैं, आनन्द में हैं पर माताजी का मन नहीं लग रहा है। सोचती हैं कि स्वामी हाथ में लकड़ी लेकर सिपाही जैसे खड़े रहते हैं। यह माताजी से सहन नहीं होता। ये बन्धन में हैं। कोई अवसर आ जाय तो मैं इनको बन्धन से छुड़ा लूँ।


सावन की पूर्णिमा का दिन आ गया। लक्ष्मीजी ने बलि राजा से कहा- भाई! आज रक्षाबन्ध न है। मैं तुम्हारे लिये सुन्दर राखी लायी हूँ। बलि राजा बहुत भाग्यवान् हैं। जगन्माता महालक्ष्मी उनके हाथ में राखी बाँधती हैं। बलि राजा को आनन्द हुआ। अब तो मुझे काल का भी भय नहीं है। मैं निर्भय हूँ। बलि राजा ने लक्ष्मीजी के चरणों में बार-बार वंदन करके कहा- बड़ी बहिन ! आप जब से आयी हैं, सारा गाँव सुख में रहता है। आज आपने मेरे हाथ में राखी बाँधी है। मेरा धर्म है कि आपको कुछ देना चाहिये। आपके घर में क्या है, क्या नहीं है, मैं नहीं जानता पर मेरी बहुत इच्छा है कि जो आपके घर न हो वह माँग लीजिये ।

लक्ष्मीजी ने कहा- मेरे घर में सब कुछ है पर एक नहीं। बलि राजा ने कहा- जो नहीं है, वही माँग लीजिये। आज मुझे देना ही है। बहिन जब राखी बाँधती है, तब खाली हाथ नहीं लौटती है। लक्ष्मीजी ने कहा- भाई, तुम्हारे द्वार पर जो पहरा दे रहा है, उसे तुम सदैव के लिये स्वतन्त्र कर दो। बलि राजा ने पूछा- बहिन, मेरे द्वार पर पहरा देने वाले तुम्हारे कुछ लगते हैं क्या?


चतुर्भुज स्वरूप धारण करके लक्ष्मीनारायण साक्षात् प्रकट हुए। लक्ष्मीनारायण के दर्शन करते हुए बलि राजा को अत्यन्त आनन्द हुआ। उन्होंने लक्ष्मीनारायण की पूजा की। बलि के बंधन से छुड़ाकर परमात्मा के साथ लक्ष्मीजी बैकुण्ठ गयी।


क्रियमाणे कर्मणीदं दैवे पित्र्येऽथ मानुषे

पत्रपत्रानुत्तरात् तेषां सुकृतं विदुः॥


परम पवित्र वामन चरित्र की यह कथा वक्ता श्रोता के पापों को जलाने वाली है। पितृ तिथि के दिन वामन - चरित्र की कथा सुनने पर पितरों को सद्गति प्राप्त होती है। तेंतीसवें अध्याय में वामन चरित्र की समाप्ति की गई है। चौबीसवाँ अध्याय अष्टम स्कन्ध    का अन्तिम अध्याय है। इस अध्याय में मत्स्यनारायण की कथा कही है। दक्षिण भारत में कृतमाला नदी के तट पर सत्यव्रत मनु ध्यान कर रहे हैं। मानव सत्कर्म करता है तो लक्ष्मी प्राप्त होती है और लक्ष्मी पति भी आते हैं। एक सत्कर्म पूर्ण हो जाय तब दूसरा सत्कर्म कीजिये। दूसरा पूर्ण हो जाय तो तीसरा शुरू कीजिये। सत्कर्म में सन्तोष न मानिये। उसका निरन्तर लोभ ही रखिये। जो सत्कर्म के साथ स्नेह करता है, सारा दिन सत्कर्म करता है, उसके हाथ में भगवान् आते हैं। सत्यव्रत मनु के हाथ में मत्स्यनारायण पधारे हैं। मनु महाराज को मत्स्य संहिता का उन्होंने उपदेश दिया है। प्रलयकाल में सर्वत्र विनाश हुआ, तब भी मनु का विनाश नहीं हुआ । सत्य के साथ स्नेह करने वाले का विनाश नहीं होता। वह अमर बनता है। उसे काल नहीं मार सकता। संक्षेप में मत्स्यनारायण की कथा सुनाकर अष्टम स्कन्ध परिपूर्ण करते हैं


प्रलयपयसि धातुः सुप्तशक्तेर्मुखेभ्यः

 श्रुतिगणमपनीतं प्रत्युपादत्त हत्वा । 

दितिजमकथयद यो ब्रतानां 

समहमखिलहेतुं जिह्यामीगं गतोऽस्मि ।









रविवार, 18 सितंबर 2022

भगवान की विशिष्ट कृपा

 परमात्मा की साधारण कृपा सर्वजीवों पर है पर जिस जीव पर विशिष्ट कृपा भगवान् करें, तो उसे परमात्मा, परमात्मा बनाते हैं। भगवान् विशिष्ट कृपा कब करते हैं? जब यह जीव एकांत में बैठकर परमात्मा के लिये रोता है कि मेरा प्रभु से वियोग हुआ है। मुझे परमात्मा के चरणों में जाना है। तब प्रभु को दया आती है। यह जीव रोता हुआ माता के पेट से बाहर आता है और जब संसार छोड़ता है, तब हाय-हाय करके जाता है। पैसा नहीं रहता तो कई लोग बहुत रोते हैं। कई लोग ऐसे हैं कि अपमान होने पर बहुत रोते हैं। कई लोग संतान न होने के कारण रोते हैं जीव पुत्र के लिये पैसे के लिये, स्त्री के लिये रोता है पर कभी परमात्मा के लिये नहीं रोता है जो जीव एकांत में बैठकर परमात्मा के लिये रोता है, उस पर प्रभु को दया आती है जो बहुत हँसता है, उस पर परमात्मा की कृपा तुरन्त नहीं होती है। जो प्रभु के लिए रोता है उसके दुःख का अंत आता है। हर रोज एकांत में बैठकर परमात्मा के लिये रोइये। मैं प्रभु से बिछुड़ गया हूँ। मैं बड़ा हुआ अभी तक मुझे प्रभु के दर्शन नहीं हुए हैं। मैं प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ। मुझे प्रभु के चरणों में जाना है। ऐसा सोचते हुए श्रीकृष्ण-वियोग में जो व्याकुल होता है और जो व्याकुल होकर रोता है तथा जिसे श्रीकृष्ण-वियोग का दुःख होता है, वह भक्ति कर सकता है।

श्रीकृष्ण-वियोग में जिसका मन संसार में रमता है, प्रभु के वियोग में जिसे संसार सरस लगता है, वह भक्ति नहीं कर पाता है। भक्ति का प्रारंभ तब होता है, जब जीव को संसार नीरस लगता है तथा संसार का सुख, दुःख-रूप प्रतीत होता है। जब प्रभु के वियोग में दुःख लगता है और जब भक्ति परिपूर्ण होती है, तब परमात्मा उसे सद्यो मुक्ति देते हैं, समय से पहिले ही मुक्त कर देते हैं। असमय पर......' असमयेन वत्सान् जीवान मुञ्चन'.. समय नहीं हुआ है, पर बंधन से छुड़ाते हैं। यशोदाजी गोपियों को समझाती है-वृद्धावस्था में बालक का जन्म हुआ है। मैं तो माता हूँ, बालक को कैसे धमका सकूँगी? वह मुझे प्राण से भी प्रिय है। कन्हैया बालक है। तुम्हारा ही बालक है। तुम सबके आशीर्वाद से पुत्र मिला है। वह आपके घर आकर शैतानी करे, तो आप उसको धमकाना। एक गोपी ने कहा- माँ, आप किसे समझा रही हैं वह तो ऐसा धृष्ट हो गया है कि उसे कौन धमका सकेगा? वह तो मुझे ही धमकाने लगा है। कल मेरे घर शरारत करने आया। जब मैं उसे पकड़ने गयी तो वह हाथ ही नहीं आया। वह बहुत चंचल हो गया । वह तो दूर-दूर चला गया। माँ मैं तो दौड़ते-दौड़ते थक गयी। वह तो मुझे अगूंठा दिखाता रहा..... लो पकड़ लो !.. ...... लड़कों को सिखलाता है कि इसको चिड़ाओ फजीहत करो। लड़के सब मेरा नाम ले-लेकर मेरा मजाक करने लगे। माँ वह तो ऐसा ही करता रहता है। 

एक गोपी ने कहा- लाला को चोरी करने की आदत हो गयी है। कोई इसे बुलाकर माखन खिलाता है तो वह नहीं खाता है। कहता है कि मुझे माखन नहीं भाता है। पर जब कोई नहीं होता तो चोरी करके वह माखन खा जाता है। वही उसे भाता है। उसे ऐसी आदत पड़ गयी है। यह सब सुनकर माता को बहुत क्षोभ हुआ ।

 यशोदाजी ने कहा-अरी सखी! क्या आप लोगों को पता चल जाता है कि आज कन्हैया आने वाला है? गोपी ने कहा- माँ, पता तो चल जाता है।  जिस दिन वह आनेवाला होता है, उस दिन उसकी बहुत याद आती है। माँ! मैं आपको क्या बतलाऊँ। रात्रि में जब मैं शय्या पर सोती हूँ, तब कन्हैया बहुत याद आता है।

रात्रि में शय्या में सोने पर आपको क्या याद आता है, जरा विचार कीजिये। मन की परीक्षा दिन में ठीक से नहीं होती है। रात्रि के समय पर होती है देखिये कि निवृत्ति के समय पर मन कहाँ जाता है? निवृत्ति के समय पर मन जहाँ जाता है, वहाँ मन फँसा है, ऐसा समझ लीजिये। श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण नाम का जप करते हुए गोपी सो जाती है। रात्रि में शय्या में वह बहुत भक्ति करती है। शय्या में जो भक्ति नहीं करता है, उसे काम मारता है। जब तक निद्रा नहीं आती, तब तक प्रभु के नाम का जप करते रहिये । जाग्रत अवस्था की समाप्ति और निद्रा की प्रारंभ की अवस्था की संधि में श्रीकृष्ण को रखने वाले को निद्रा भी भक्ति ही है। गोपी ने यशोदाजी से कहा माँ कभी मुझे ऐसी अनुभूति होती है कि - श्रीकृष्ण मेरी शय्या में ही हैं। छोटे बालकृष्णलाल मुझे शय्या में ही दिखाई देते हैं। गोपी श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए श्रीकृष्ण के साथ ही सो जाती है जो परमात्मा के साथ सोता है, उसे कैसा आनंद मिलता होगा? गोपी को काम का स्पर्श नहीं है। जो प्रभु के साथ सोता है, उसे काम का स्पर्श नहीं होता है।

जीव जब ईश्वर से विमुख होता है, तब काम उसे मारता है। शय्या में बहुत भक्ति कीजिये। शय्या में भक्ति की जरूरत है। गोपी ने कहा कि आज मुझे स्वप्न में आपका कन्हैया दिखाई दिया। मैंने स्वप्न में देखा कि बालकृष्णलाल ग्वाल बाल मित्रों के साथ मेरे घर आये हैं। मेरे घर का माखन छींके से उतार लिया है। सुबह चार बजे मैंने स्वप्न देखा और फिर जाग गयी। मुझे बहुत आनंद आया। मैं जान रही हूँ कि सुबह का स्वप्न सत्य होता है, इससे मुझे विश्वास है कि आज कन्हैया मेरे घर आयेगा। 

माँ! मैं अपने घर का काम करती हूँ तो भी मुझे आपका कन्हैया ही दीख पड़ता है। कभी ऐसा आभास होता है कि कन्हैया दाँयें खड़ा है, बाँयें खड़ा है। गोपी को घर का काम करते हुए कन्हैया ही दीख पड़ता है। गोपी कहती है कि माँ! सुबह जब घर का काम करती हूँ, तो बहुत याद आता है। माँ! सुबह उठकर जब मैंने चूल्हा जलाया तो चूल्हे में लकड़ियों के साथ बेलन भी जला दिया मुझे कुछ होश ही नहीं रहा। तब मुझे कन्हैया ही दिखायी दे रहा था।

माँ कन्हैया जिस दिन आने वाला होता है, उस दिन हमें उसकी याद आती है। हमें होश ही नहीं रहता है। एक गोपी ने कहा कि माँ! मैं आपसे क्या कहूँ? लाला ने मेरी रक्षा जिस तरह से की है मैं कभी भी नहीं भूलूँगी ।माँ वह संकट के समय दौड़ता आ पहुँचा। हम तो क्या प्रेम करते हैं। हमारा प्रेम तो कुछ भी नहीं है। प्रेम तो कन्हैया करता है। वह हमारी रक्षा करता है। माँ! आज मुझे मार पड़ने वाली ही थी, पर लाला ने मुझे बचा लिया। यशोदामाता ने पूछा-अरी सखी, क्या हुआ? गोपी कहने लगी कि माँ! मैं आपसे क्या कहूँ? मेरे ससुरजी को क्रोध बहुत शीघ्र आ जाता है। वे बहुत क्रोध करते हैं। आज मेरे घर मेहमान आये थे। ससुरजी ने कहा कि हम खेत में जा रहे हैं, दो बजे वापस आ जायेंगे। आज खाना ठीक से बनाना । माँ! मैं रसोई में गलती कर बैठती हूँ। मुझे ऐसी आदत हो गयी है कि हरे कृष्ण हरे कृष्ण' बोलते बोलते मैं आटा तैयार करती हूँ। रोटी बनाती हूँ तो भी 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण' बोलती रहती हूँ। माँ! मैंने लाला से कहा कि तुम मेरे घर आना चाहो तो आ जाना, पर बेटा, जब मैं खाना बनाती हूँ, तब न आना। माँ! आपके लाला को देखने के बाद मुझे कुछ होश ही नहीं रहता है। कभी नमक डालना भूल जाती हूँ तो कभी छोंकना ही भूल जाती हूँ। यह गोपी जब खाना बनाती है, तब 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण' जप करती रहती है।रोटी बनाते हुए मैं जप करती रहती हूँ। मैं रोटियों को घी लगाते हुए भी जप करती रहती हूँ। कृष्ण कृष्ण बोले बिना मुझे चैन नहीं आता है और जब मैं कृष्ण बोलती हूँ तब कन्हैया ही दिखाई देता है। मुझे तब बहुत आनंद होता है। मुझे होश भी नहीं रहता है। आज मैंने निश्चय किया था कि मेहमान भोजन करने वाले हैं, इससे भोजन बनाते समय मैं लाला का स्मरण नहीं करूंगी। लाला को भूल जाऊँगी। बड़े-बड़े योगी जगत् को भूलने का यत्न करते हैं। जगत् भूलने के लिये वे आँखें बंद रखते हैं, नाक पकड़ते हैं, प्राणायाम करते हैं, फिर भी जगत् भुलाया नहीं जाता। आँखें बंद करने के बाद भी उन्हें जगत् दिखाई देता है। योगियों की ऐसी इच्छा होती है कि जगत् को भुलाया जाय और भगवान् के स्मरण में, दर्शन में तन्मयता आ जाय। धन्य हैं व्रज की गोपी, जो भगवान् को भूलने का प्रयत्न करती है पर श्रीकृष्ण उनसे भुलाये नहीं जाते। गोपी कहती है कि माँ! मैंने सब खाना बना लिया, पर अन्त में जब मोहन भोग बनाने लगी, तब कन्हैया बहुत याद आया । माँ! मैं जानती हैं कि कन्हैया को मोहन भोग बहुत भाता है। कहीं अच्छी मिठाई या अच्छा फल दिखाई देता है तो गोपी की इच्छा होती है लाला को अर्पण करने की लाला को अच्छी वस्तु खिलाने को उसकी बहुत इच्छा होती है। गोपी का भाव है कि कन्हैया आरोगे और हम दर्शन करें।

गोपी लाला को सब कुछ अर्पित करती है। गोपी कहती है कि माँ! मैं जानती हूँ कि लाला को मोहन भोग भाता है। मुझे लगता है कि कन्हैया आ जाय तो अच्छा है। ये मेहमान तो दो बजे के बाद आने वाले हैं। अभी कन्हैया आ जाय तो मैं उसे मोहन भोग खिलाऊँ। मेरा कन्हैया खुश हो जायगा। माँ! मैंने आज निश्चय किया था कि खाना बनाते समय कन्हैया का स्मरण नहीं करूँगी। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' नहीं बोलूँगी पर यह रहन कब शुरू हो गयी, पता ही न चला और उसके विचारों में मैं तन्मय हो गयी। माँ! फिर मुझे कुछ होश ही न रहा। मोहन भोग में शक्कर के स्थान पर मैंने नमक डाल दिया। माँ! आज आँगन में मैंने कन्हैया को दो बार देखा । मैं पागल की तरह रसोईघर से दौड़कर बाहर आयी पर कन्हैया हाथ नहीं आया। यशोदाजी पूछने लगीं कि अरी सखी! फिर क्या हुआ? गोपी कहने लगी कि माँ! मोहन भोग में नमक डालने के कारण आज मुझे मार ही पड़ने वाली थी, पर लाला ने मुझे बचा लिया। मुझे कुछ भी मालूम न था । दो बजे ससुरजी मेहमान के साथ घर आये। मैंने ठाकुरजी को भोग लगाया। सभी को भोजन परोस दिया। माँ! लाला ने मेरी इज्जत रख ली। मेहमान तो खुश-खुश हो गये। मेरी प्रशंसा करने लगे बोले कि ऐसा स्वादपूर्ण मोहन भोग तो हमने कभी नहीं खाया है, यह कैसे बनाया है?

मोहन भोग में गोपी ने भले ही नमक डाल दिया हो, पर एक एक कण गोपी के मन का श्रीकृष्णनामामृत में भीगा हुआ था श्रीकृष्ण का नाम अमृत से भी मधुर है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि मेरे नाम-स्मरण में यह तन्मय बन जाती है। इसकी बेइज्जती न होनी चाहिए। गोपी कहती है कि मेरे लाला ने तो ऐसी लीला रचायी कि किसी को पता तक न चला। ससुरजी कभी मेरे लिए अच्छे शब्द नहीं कहते थे, पर आज वे भी मेरी प्रशंसा करने लगे। बोले कि कितनी सुन्दर रसोई बनायी है। यह बहू क्या है, यह तो लक्ष्मी है। जब से इसका आगमन हुआ तब से मैं सुखी हुआ हूँ। माँ! मैंने सोचा कि मैंने खाना अच्छा बनाया है, इससे सब खुश हुए हैं। सब के भोजन कर लेने के बाद मैं जब भोजन करने बैठी तब मुझ अकेली को ही पता चला कि मैंने तो शक्कर के स्थान पर नमक डाल दिया है। माँ! आज लाला ने मेरी रक्षा की है।

 दूसरी गोपी ने कहा कि माँ! खाना बनाने वाला बहुत पवित्र होना चाहिये। खाना बनाने वाले का भाव सूक्ष्मरूप से अन्न में आता है और खानेवाले के भीतर जाता है। अन्न-दोष मन-बुद्धि को बिगाड़ता है। बहुत पवित्रता से, मन से प्रभु के नाम के जप करते हुए प्रेम से खाना बनाइये। भगवान् को भोग लगाइये। आजकल माताएँ भगवान् का नाम लेकर खाना नहीं बनाती हैं। कई तो ऐसी हैं कि सिनेमा के गीत गाते-गाते खाना बनाती हैं। रात्रि में सिनेमा देखकर आती हैं और सुबह बनाते-बनाते वही चित्र उन्हें याद आता है। 

रसोई बनाने वाले का मन बहुत पवित्र होना चाहिये। पति की बुद्धि को सुधारना पत्नी के हाथ में है। छह मास पवित्र अन्न पेट में जाता है तो धीरे-धीरे बुद्धि सुधरती है अन्न के तीन  भाग हैं - अन्न का स्थूल भाग, मल रूप से बाहर निकलता है। मध्य भाग लहू-मांस बनता है और सूक्ष्म भाग से मन-बुद्धि बनती है। गोपी कहती है कि माँ! मुझे ऐसी आदत हो गयी है कि रोटी बनाती  हूँ तो भी 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण' बोलती रहती हूँ। माँ! मैंने लाला से कहा कि तुम मेरे घर आना चाहो तो आ जाना, पर बेटा, जब मैं खाना बनाती हूँ, तब न आना। माँ! आपके लाला को देखने के बाद मुझे कुछ होश ही नहीं रहता है। कभी नमक डालना भूल जाती हूँ तो कभी छोंकना ही भूल जाती हूँ। यह गोपी जब खाना बनाती है, तब 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण' जप करती रहती है।


 मेरे जेठजी भोजन करने बैठे थे, तब उनके लिए मैंने मुरब्बा निकाला और उसी समय मुझे कन्हैया याद आ गया। मेरी सासजी कन्हैया को पटड़े पर बैठा देती है और मैं उसे खिलाती हूँ। हमारे घर में कन्हैया सबको बहुत प्यारा है। मेरे पतिदेव भी लाला के संग से बदल गये हैं। वे अब ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ध्यान करते हैं। मेरे पतिदेव तो भगवान का कीर्तन करते हुए कभी-कभी देहभान भी गंवा देते हैं। कन्हैया आये ऐसे विचार में में तन्मय हो गयी और काँच का मर्तबान छींके में रखने के बदले अपने लड़के को ही उसमें रख दिया। बालक जब रोने लगा तब मुझे पता चला। 

माँ! आज ऐसा हुआ। व्यास महर्षि ने गोपियों को 'प्रेम संन्यासिनी' की उपाधि दी है। गोपी परमहंस हैं। भागवत परमहंसों की संहिता है।


यशोदाजी ने फिर कहा कि सखी आप लोगों को पता तो चल जाता है न कि कन्हैया आने वाला है? गोपियाँ कहती हैं कि हाँ माँ! पता तो चल ही जाता है। यशोदाजी ने कहा- तो ऐसा कीजिए कि जिस दिन आपको पता चले कि आज कन्हैया आयेगा, उस दिन घर में कुछ खाने का सामान ही न रखना। सब पीहर रखकर आना। सखी के घर रख देना। बालक है। आपके घर अच्छा-अच्छा खाना मिलता है न, इससे आता है। दो-चार बार कुछ नहीं मिलेगा तो फिर नहीं आयेगा। एक गोपी ने कहा कि माँ! आप किसे सीख देती हैं? कल ही मुझे मालूम हो गया था। माँ! मैं आँगन में बैठी थी । कन्हैया गोपाल मंडली के साथ मेरे घर के पास से निकल गया। वह गोपालों के पीछे-पीछे चलता था। सब लोग आगे निकल गये। कन्हैया मेरे आँगन में खड़ा रह गया। मेरे सामने देखने लगा। लाला ने मुझ पर नजर डाली। माँ! लाला की आँखें बहुत सुन्दर हैं। लाला की आँखों में प्रेम भरा है। मुझे देखकर होठों में हँसने लगा। मैंने पूछा- कन्हैया ! क्यों हँस रहा है? तो कहने लगा कि कल तुम्हारी बारी है। मुझे तुम्हारे घर का माखन खाना है, मैं कल तुम्हारे घर आने वाला हूँ। मैं समझ गई। मैंने घर में कुछ न रखा। माँ! कन्हैया जब घर आया तो उसे कुछ न मिला। इससे रूठ गया। उसने मेरे बच्चे को जगाया। मेरा बच्चा पालने में सोया था। कहने लगा  कि मेरा ऐसा नियम है कि जिसके घर जाता हूँ घर के स्वामी का कल्याण करता हूँ और प्रसाद देकर घर छोड़ता हूँ। पर तेरी माँ ने कुछ रखा ही नहीं, मैं तुम्हें क्या प्रसाद दूँ? लो, मेरा प्रसाद ।ऐसा कहकर मेरे बच्चे को चुटकी काटने लगा। मेरा बच्चा रोने लगा। माँ! घर में कुछ नहीं रखते तो वह बच्चों को रुलाता है।

कन्हैया जब आपके घर आयेगा तब उसका सम्मान नहीं होगा तो वह रुलायेगा। प्रत्येक जीव से एकबार भगवान् मिलने जाते हैं, पर जीव भगवान् को पहिचान नहीं पाता। हमारे घर शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म लेकर प्रभु पधारेंगे तो उनका तेज हम सह नहीं सकेंगे। तब हम उलझन में पड़ जायेंगे। इससे हम देख सकें ऐसे ही स्वरूप में प्रभु पधारते हैं। कभी आपके घर भिखारी के रूप में आ जायँ या संभव है कि कभी वे साधु-संन्यासी के रूप में आ जायें। वेदान्त कहते हैं कि प्रभु अरूप हैं, रूप-रहित हैं। ईश्वर का कोई स्वरूप नहीं है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर का कोई एक रूप नहीं है। हाथ में शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म हो तो ही क्या ईश्वर होते हैं? क्या उनका दूसरा कोई स्वरूप नहीं है? वस्तुतः ईश्वर का कोई एक स्वरूप निश्चित नहीं है। अनेक रूपरूपाय विष्णवे प्रभुविष्णवे इस जगत् में जितने रूप दिखाई देते हैं, वे सभी तत्त्व से परमात्मा के ही हैं, ऐसा समझकर विवेक से व्यवहार कीजियेगा। किसी जीव का तिरस्कार न कीजियेगा। सभी को मान देना, सभी में सद्भाव रखना। अगर आपको तिरस्कार करने की आदत पड़ गयी तो जब कभी प्रभु आयेंगे, आपसे तिरस्कार हो जायेगा। सभी के समक्ष हाथ जोड़ने में क्या होता है? सभी को मान देने में क्या आपका कुछ कम हो जाता है? आपके घर प्रभु पधार रहे हैं और आप सोये हुए हैं, प्रभु का सम्मान नहीं कर पाते तो प्रभु आपको रुलायेंगे ही। बोलेंगे कि तुम्हारे घर आया था।

मेरे कारण ही तुम्हें सब कुछ प्राप्त होता है, पर जब मैं आया तुमने मेरी ओर देखा तक नहीं। तुमने मेरा तिरस्कार किया। तुम इस सबके लिए लायक नहीं हो!

यशोदा कहती हैं-अरी सखी! आप सब कहती हैं कि कन्हैया शरारत करता है पर जब मैं उससे पूछती हूँ, तब वह इन्कार कर देता है। ऐसा करो कि जब लाला तुम्हारे घर आ जाय, तब उसे पकड़कर मेरे घर ले आना। मैं उसे सजा दूँगी। 

प्रभावती ने लाला को पकड़ने का बीड़ा उठाया। प्रभावती से लाला ने कहा- कल मैं तुम्हारे घर आनेवाला हूँ। प्रभावती ने घर में दही, माखन सब कुछ रखा उसने सोचा कि लाला जब माखन खायेगा, तब ही उसे पकड़ लूँगी।

गोपाल - मंडली के साथ लाला आ पहुँचा। प्रभावती पलंग के नीचे छिप गई। लाला ने मटकी उतार ली और मित्रों को माखन देने लगा। प्रभावती को बहुत आनंद आया। वह धीरे धीरे बाहर निकली। लड़कों की दृष्टि गई। बोले-कन्हैया, कन्हैया, वह आयी बालक सब भाग गये पर कन्हैया खड़ा ही रहा। प्रभावती ने लाला की कलाई पकड़ ली। लाला ने कहा-तेरे पाँवों पइँ,' अब कभी तुम्हारे घर नहीं आऊंगा। आज के दिन मुझे छोड़ दे। प्रभावती लाला को नहीं छोड़ती है। उसका एक पुत्र था। लाला जैसा ही था। उसने देखा कि माँ तो लाला को पकड़कर यशोदाजी के पास ले जा रही है। वह अपनी माता से कहने लगा-माँ! मैंने ही कल लाला को अपने घर बुलाया था। यशोदा माँ मुझे हर रोज माखन देती हैं। इससे मैंने आज लाला को निमंत्रण दिया है। लाला ने चोरी नहीं की है। माँ! तुम लाला को छोड़ दो मुझे मारो, मुझे सजा दो । मंडली के बालक रोने लगे। यशोदामाता लाला को मारेंगी तो !

प्रभावती सोच रही है कि आज मैं लाला को पकड़कर ले जाऊँगी। यशोदामाता लाला को धमकायेंगी तो कुछ नहीं बोलूंगी, अगर वे लाला को मारने जायेंगी तो मैं उनका हाथ पकड़ लूंगी। कन्हैया बहुत कोमल है। उसे मार पड़े, ऐसा मैं नहीं चाहती हूँ।

वह लाला को पकड़कर ले जाने लगी। लाला ने बालकों से कहा- तुम लोग घबराना नहीं, मैं मजाक करने वाला हूँ। प्रभावती लाला को पकड़कर ले जाने लगी, तब वह लाला को भूल गयी। जीवन की अंतिम साँस तक भक्ति कीजिए। कई व्यक्ति भक्ति में आनन्द की अनुभूति करते हैं, पर इससे भक्ति परिपूर्ण नहीं होती है। परमात्मा हाथ में आ जायँ तो भी भक्ति नहीं छोड़नी है। जीव को भक्ति मिलती है, और जगत का मोह होता है तो भगवान् छिटक जाते हैं। भगवान् हाथ में आ जायें, तो भी भक्ति को नहीं भूलना चाहिए। प्रभावती के हाथ में श्रीकृष्ण के आ जाने के बाद वह श्रीकृष्ण का स्मरण नहीं कर रही है, पर अपना ही चिंतन करने लगी कि मैं कैसी हूँ....लाला को मैं पकड़ सकी हूँ। निष्काम बुद्धि प्रभावती है। निष्काम बुद्धि भगवान् को पकड़ सकती है पर ईश्वर हाथ में आ जायँ, तब अभिमान आ जाता है और अभिमान आ जाने से ईश्वर छिटक जाते हैं।

लाला ने मजाक किया। प्रभावती से कहा- मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूँ पर मेरी कलाई तुमने बहुत जोर से पकड़ ली है, यह दुःख रही है, इसे छोड़ दो, और मेरा दूसरा हाथ पकड़ लो।

प्रभावती ने लाला का दूसरा हाथ पकड़ लिया। रास्ते में वृद्ध लोग मिले तो प्रभावती ने घूँघट निकाला। लाला ने अपने तीव्र नाखूनों से चुटकी काटी। प्रभावती ने हाथ बदला। उसे बार-बार हाथ बदलना पड़ा। कन्हैया ने युक्ति करके उसके पुत्र का हाथ ही उसके हाथ में दे दिया और स्वयं दौड़ता हुआ अपने घर पहुँचा गया। प्रभावती के पाँवों में गति थी। घूँघट निकाला था, इसलिए उसे कुछ भी पता न चला। कन्हैया घर में पहुँच गया, और तब पीछे से वह आ पहुँची । प्रभावती ने कहा- माँ! देखिये! आपके कन्हैया को पकड़कर ले आयी हूँ।

यशोदाजी ने कहा-श्रीकृष्ण तो भीतर हैं। प्रभावती ने कहा- बाहर हैं। आनंद भीतर ही है, आनंद को जो बाहर ढूँढ़ने जाता है उसकी फजीहत होती है। आनंद चेतन परमात्मा का स्वरूप है। किसी जड़ वस्तु में आनंद नहीं हो सकता है। 

यशोदाजी हँसने लगीं। प्रभावती ने घूँघट हटाकर देखा तो.... अपना ही पुत्र । प्रभावती बालक को मारने लगी। बालक मार सहता है पर रोता नहीं है सोचता है कि आज मैं लाला के लिये मार खा रहा हूँ। मेरा कन्हैया बच गया। जो परमात्मा के लिये मार खाता है, जो परोपकार के लिये मार खाता है, उस मार में परमात्मा का प्यार होता है। प्रभावती को आश्चर्य हुआ। उसने यशोदामाता से कहा- माँ, रास्ते में कुछ गड़बड़ हो गयी। है । यशोदामाता ने उसकी बात को नहीं माना ।प्रभावती को बहुत दुःख हुआ। वह धीरे-धीरे घर की ओर चल पड़ी। लाला ने खेल किया।

एक स्वरूप यशोदाजी के पास रखा और दूसरा स्वरूप उसके पीछे चला । प्रभावती के ससुरजी की सी आवाज निकालकर लाला ने कहा-अरी प्रभावती ! प्रभावती ने मुड़कर देखा, तो कन्हैया खड़ा था। कन्हैया ने कहा-मैं तुम्हें विशेष रूप से कहने आया हूँ कि अगर तुम मेरे या मेरे मित्रों के पीछे पड़ोगी तो मैं तुम्हारी फजीहत करूँगा। आज तो तुम्हारे लड़के को ही पीछे लगा दिया, पर दूसरी बार मुझे पकड़ोगी तो तुम्हारे पति को ही तुम्हारे पीछे लगा दूँगा और फिर सारे गाँव में तुम्हारी फजीहत होगी। प्रभावती पूछने लगी लाला तुम्हें ऐसा कौन सिखाता है? लाला कहने लगा मुझे कौन सिखायेगा? मैं ही सभी को सिखाता हूँ

श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं। बाललीला एक दो नहीं, अनेक हैं। अनेक तरह की हैं। लाला ने ललिता गोपी के साथ खिलवाड किया है। चन्द्रावली की कथा आती है। दुर्वासा ऋषि के साथ भी खेल किया है। दुर्वासा ऋषि को शंका हुई कि क्या यह श्रीकृष्ण परमात्मा हैं? ना, ना, यह तो ग्वाले का बेटा है। दुर्वासा ऋषि परीक्षा करने लाला के पेट में गये। लाला ने ऋषि को पेट में ही ब्रह्मांड के दर्शन करवाये हैं। दुर्वासा ऋषि को विश्वास हो गया कि यह ही परमात्मा है। इसके बाद गणपति महाराज की कथा है। यशोदा माता ने गणपति महाराज की मनौती मानी है। गणपति महाराज लाला को लड्डू खिलाते।

श्री डोंगरेजी महाराज



गोपियों का कृष्ण प्रेम

 गर्गाचार्यजी ने कहा- यह बालक भगवान् नारायण जैसा होगा। श्रीधर स्वामी का अर्थ सरल है- नारायणेन सम श्रीकृष्णः श्रीकृष्ण नारायण के समान होंगे। वृन्दावन के साधुओं को श्रीधर स्वामी का अर्थ बहुत अच्छा लगा। इससे संत अर्थ को परिवर्तित करते हैं। नारायण के समान श्रीकृष्ण हैं, ऐसा नहीं हैं, पर नारायण श्रीकृष्ण के समान हैं। नारायणः समः येन श्रीकृष्णेन इति नारायणसम:- नारायण श्रीकृष्ण के समान हैं। पर जो संत ऐसा अर्थ करते हैं कि नारायण के समान श्रीकृष्ण हैं, उस अर्थ में नारायण प्रमुख होते हैं और श्रीकृष्ण भोग होते हैं। वृन्दावन के साधुओं की श्रीकृष्ण में आसक्ति है। तत्त्व से नारायण और श्रीकृष्ण एक ही हैं। नारायण और श्रीकृष्ण में जरा भी भेद नहीं है। एक होने पर भी भिन्न हैं। नारायण, चतुर्भुज है और श्रीकृष्ण द्विभुज मुरलीमनोहर हैं। यह तो प्रेम की कथा है। प्रेम में पक्षपात का गुण प्रमुख है। वृन्दावन के साधु नारायण और श्रीकृष्ण को एक ही मानते हैं। किन्तु एक होने पर भी वे भिन्न हैं। हमारा कन्हैया दो हाथों वाला है। वह हमारा मुरली मनोहर है। नारायण को मैं मानता हूँ, नारायण को मैं वंदन करता हूँ पर नारायण से भी अधिक अपना कन्हैया मुझे प्रिय है। नारायण श्रीकृष्ण समान हैं। मेरा कन्हैया तो नारायण से भी श्रेष्ठ है। गोपियों में अनेक बार चर्चा होती है-अरी सखी! मैं नारायण को वंदन करती हूँ पर मुझे ऐसा लगता है कि मेरा बालकृष्ण, नारायण से भी श्रेष्ठ है। मैं तुम्हें क्या कहूँ? नारायण शंख बजाते हैं, पर मेरा कन्हैया मधुरं बांसुरी बजाता है। शंख बजाने वाले देव बड़े हैं कि बाँसुरी बजाने वाले देव बड़े? इस जगत् में जितने भी देव हैं, वे सभी हाथ में शस्त्र लेकर बैठे हैं। कोई धनुष-बाण हाथ में रखते हैं तो कोई त्रिशूल हाथ में रखते हैं। कोई सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर बैठे हैं। ये सभी देव एक-एक को शस्त्र से घायल करते हैं। अरी सखी! मेरा कन्हैया तो बाँसुरी के स्वर से घायल करता है, प्रेम से घायल करता है। जब कन्हैया एक बार प्रेम से देखता है, तब वह चाहे राक्षस हो, या पशु, उसका दास बन जाता है। उसमें प्रभु का प्रेम जागता है। कृष्ण आँखों से घायल करता है। उसकी आँखों में प्रेम भरा रहता है। मेरा कन्हैया मुझे प्राणों से भी प्रिय है। नारायण में साठ गुण हैं, मेरे बालकृष्ण में चौंसठ गुण हैं।


श्रीकृष्ण में नारायण से भी चार गुण अधिक हैं। श्रीकृष्ण की वेणु-माधुरी, श्रीकृष्ण की रूप- माधुरी, श्रीकृष्ण की लीला-माधुरी-ये चार गुण नारायण से भी कन्हैया में अधिक हैं। कन्हैया जैसी बांसुरी बजाता है, वैसी बांसुरी कोई नहीं बजा सकता है। कन्हैया जैसी लीला करता है, वैसी लीला कोई नहीं कर सकता है। गोपी के घर कन्हैया जाता है और कहता है- तुम्हारा माखन मुझे बहुत भाता है। तुम्हारे घर की छाछ बहुत मधुर है। गोपी लाला से कहती है-लाला मेरे घर जैसी छाछ तुम्हें सारे गाँव में कहीं नहीं मिलेगी, क्योंकि मेरे अनेक जन्मों का प्रेम इस छाछ में है। प्रेम रस अति मधुर है। लाला! तुम्हें मेरे घर की छाछ पीनी है तो थोड़ा नाचो। तब मैं तुम्हें छाछ दूँगी । कन्हैया नाचता है। वैंकुण्ठ के नारायण से कोई कह सकता है कि आप थोड़ा नाचिये? अरी सखी! वैकुण्ठ के नारायण को मैं मानती हूँ। मैं उन्हें वंदन करती हूँ पर वे हमारे साथ बातें नहीं करते हैं। उन्हें अभिमान है क्या? हमारा कन्हैया सर्व-से श्रेष्ठ है, पर लाला को जरा भी अभिमान नहीं है। बिना बुलाये वह मेरे घर आता है। मेरे पीछे पीछे चलता है। मैं जब पूछती हूँ कि कन्हैया तुम मुझ में क्या देखते हो? तब कन्हैया कहता है कि तुम्हारे घर मुझे बहुत आनंद आता है। क्या मैं तुम्हारे घर आ जाऊँ? अरी सखी! कन्हैया जैसी लीला करता है, वैसी लीला वैंकुण्ठ के नारायण भी नहीं कर सकते हैं। श्रीकृष्ण की लीला माधुरी अलौकिक है एक गोपी छाछ व माखन बेचने जा रही थी। घर में उसने संकल्प किया कि आज रास्ते में अगर कन्हैया मिल जायेगा तो मैं उसे घर लाकर माखन आरोगने दूँगी। इस विचार में ही गोपी तन्मय हो गयी। उसकी आँखों में श्रीकृष्ण हैं, उसके मन में श्रीकृष्ण हैं, उसकी बुद्धि में श्रीकृष्ण हैं। इससे बाजार में जाकर माखन लो, माखन लो, कहने के स्थान पर भूल से कहने लगी- 'माधव लो, माधव लो-मैं तो बेचने निकली, व्रज की नारि..... माधव लो रे.... माधव लो...., लाला ने सोचा- यह तो आश्चर्य है। यह गोपी तो मुझे ही बेचने निकली है? इसका कितना प्रेम है। निरंतर स्मरण करते हुए चलती है। बालकृष्णलाल रास्ते में प्रकट हुए हैं। सुन सुन करते हुए गोपी के पीछे-पीछे चलते हैं। गोपी श्रीकृष्ण के स्मरण में ऐसी तन्मय हुई कि उसे मालूम ही नहीं हो रहा कि लाला उसकी साड़ी पकड़ रहा है और कह रहा है कि मुझे माखन दे। मैं गोकुल का राजा हूँ। मुझे दान दो। गोपी लाला को चिढ़ाती है - तू कैसा गोकुल का राजा? गोकुल के राजा तो दाऊजी भैया हैं। तुम्हें माखन नहीं दूँगी। मुझे छोड़ दे, पर कन्हैया छोड़ ही नहीं रहा है। किसी देव में है ऐसी ताकत कि रास्ते में जाती हुई किसी स्त्री की साड़ी पकड़ ले, उसका हाथ पकड़ ले। पर स्त्री से देवों को भी संकोच होता है। कदाचित् इस तरह करूँगा तो लोग मेरी पूजा नहीं करेंगे। पर स्त्री से सब घबराते हैं। कन्हैया के लिये कोई पर स्त्री नहीं है। कन्हैया कहता है कि मैं सबका हूँ, सब मेरे हैं। कन्हैया गोपी का हाथ पकड़ लेता है, गोपी की साड़ी पकड़ता है और कहता है कि मैं तुम्हें नहीं छोडूगा। गोपी कहती है-लाला मै बड़े घर की हूँ। तुम इस तरह व्यवहार कररहे हो, तो उचित नहीं है। मुझे घर जाना है। गोपी लाला को छोड़कर घर जाने लगी। वह जानती है कि लाला को मेरा माखन भाता है वह थोड़ा चलती है और पीछे देखती है कि कन्हैया आ रहा है या नहीं। उसे घर ले जाना है।

रास्ते में एक पत्थर पड़ा था। लाला ने वह उठा लिया और छिपा दिया। गोपी की आँखें श्रीकृष्ण के मुखारविंद में स्थिर हैं। लाला के हाथ में क्या है, इसका ध्यान उसे नहीं है। उसे कुछ नहीं दीख रहा है। गोपी ने लाला को रास्ते में माखन नहीं दिया और इससे लाला रूठ गया है। लाला ने मटकी पर पत्थर मारा। दही फैल गया। माखन लुढ़क गया। गोपी की साड़ी बिगड़ गयी। कन्हैया दौड़ते-दौड़ते घर पहुँच गया। घर आकर माता की गोद में बैठ गया। कहने लगा कि माँ, एक गोपी तो बाघिन जैसी है वह मेरे पीछे पड़ी है। यशोदा माता पूछ रही हैं कि बेटा तुमने तो कुछ नहीं किया है न? लाला कहता है कि ना! मैंने तो कुछ नहीं किया, मैं तो कुछ नहीं जानता। गोपी ने आकर यशोदा माता से कहा माँ देखिये, मेरी साड़ी लाला ने बिगाड़ दी, मेरी मटकी फोड़ डाली ऐसी-ऐसी शैतानी यह करता है। कन्हैया ने मटकी फोड़ दी, सो यशोदा माता को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने पूछा कि बेटा ! तुमने मटकी फोड़ डाली? लाला ने कहा कि 'माँ! तुम गोपी को उसके घर जाने को कह दो। मुझे उससे डर लगता है। उसके घर जाने पर मैं तुम्हें सब समझा दूँगा। यशोदा माता ने कहा- बेटा, तुम्हें कोई नहीं मारेगा, तुम्हें जो कुछ कहना है, कह दो। लाला ने कहा- माँ, यह गोपी कंजूस है। दो-तीन दिन का बासी दही बेचने जा रही थी। मैं तो सब की सँभाल रखता हूँ कि हमारे गांव में किसी को बुखार न आ जाय। ऐसा दही खाने से तो बुखार आयेगा ही न? तीन दिनों का रक्खा दही था, इससे मैंने मटकी फोड़ डाली। आरोग्य-प्रचारक मंडल का अध्यक्ष मैं हूँ। जगत् में जितनी संस्थाएँ हैं, सभाएँ हैं, उनके अध्यक्ष श्रीकृष्ण हैं। यशोदाजी ने तो गोपी को उलहाना दिया- हमारे गांव में दही -माखन की क्या कमी है? कन्हैया कहता है कि तीन दिन का बासी दही है। ऐसा बासी दही तुम बेचने ले जाती हो? यशोदामाता ने कहा- जो हुआ सो हुआ, पर हमारे गांव में ऐसा विज्ञापन हो जाय, तो इसे लड़की कौन देगा?

इसने मटकी फोड़ दी है, ऐसा किसी से न कहना मैं अपने घर की पाँच मटकियाँ देती हैं। मटकी फोड़ता है पर कन्हैया गोपियों को इतना ही प्रिय है, प्राणों से प्यारा है। लाला को देखे बिना उन्हें चैन नहीं है। उसके साथ बातें किये बिना गोपियों का मन ही नहीं मानता है। गोपी कहती है-माँ! आपका यह कन्हैया हमें प्राणों से भी प्यारा है मैं किसी से कहने वाली नहीं हूँ। श्रीकृष्ण की लीला अलौकिक है। इससे महापुरुषों की समाधि लग जाती है और वे कृष्णलीला में तन्मय हो जाते हैं।


श्री डोंगरेजी महाराज

हरिओम सिगंल 




शनिवार, 17 सितंबर 2022

भगवत सेवा

 प्रातः काल का समय बहुत पवित्र होता है। रात्रि में जल्दी सो जाइए। सुबह चार बजे उठ जाइए। सुबह जो शय्या में लेटता है, उसके पुण्य का नाश होता है। ब्राह्म मुहूर्त में प्रायः निद्रा नहीं आती है, तंद्रा रहती है। तंद्रा का त्याग कीजिए। किसी भी मानव का मुख देखने से पहिले भक्ति कीजिए। ध्यान से पहले ठाकुरजी की मानसी सेवा कीजिए। मानसी सेवा अतिशय श्रेष्ठ है। इसमें एक पैसे का भी खर्च नहीं है। इस में शरीर को भी कष्ट नहीं है।

एक कंजूस बनिया गुसाईजी के पास गया। उसने कहा एक पैसे का भी खर्च न हो, ऐसी सेवा बतलाइये। गुसाईजी ने कहा- तुम मन से सेवा करो अपने इष्टदेव बालकृष्ण की सेवा करो। पैसे का भी खर्च न करना। सुबह चार बजे उठ जाना । भावना करना-मैं गंगाजी - यमुनाजी में स्नान करता हूँ। मन से प्रणाम करके गंगा जल में स्नान करना । फिर ठाकुरजी के लिये पवित्र गंगाजल लेकर आना। फिर ऐसी भावना करना कि शय्या में बालकृष्णलाल सोये हैं, रेशमी, सुन्दर बाल कपोल पर हैं। कन्हैया बहुत सुन्दर दीख रहा है। मैं अपने लाला को जगा रहा हूँ। हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे प्रेम से ताली दे-देकर कीर्तन करना । कीर्तन करते हुए जब हृदय आर्द्र - होगा, तब ठाकुरजी जागेंगे। फिर सुवर्ण सिंहासन में मखमल की सुन्दर गद्दी पर उनको प्रतिष्ठित करना। मन से ही सेवा करनी है। इससे कंजूस क्यों बना जाय? इसके बाद मन से लाला को गाय का दूध अर्पण करना । लाला को भैंस का दूध-माखन पसंद नहीं है। भैंस के दूध माखन बुद्धि को जड़ बनाते हैं। मन से ही भाव करना कि चाँदी के कटोरे में माखन-मिसरी लाला को अर्पण करता हूँ। बालकृष्णलाल अपने सखाओं को इसमें से देते हैं। तुम हर रोज ऐसा भाव करोगे तो कभी तुम्हें ऐसी अनुभूति होगी कि परमात्मा तुम्हें भी माखन खाने के लिये बुला रहे हैं। मानसी सेवा करने वाले के मन में नये-नये भाव जाग्रत होते हैं। फिर मन से लाला के श्रीअंग पर तेल लगाकर गर्म जल से मांगलिक स्नान करवाना। धीरे-धीरे लाला के चरणों को पखारना । लाला का श्रीअंग बहुत कोमल हैं। लाला को जरा भी कष्ट न हो, यह देखना। बाद में पीतांबर पहिनाना, सुन्दर श्रृंगार करना, तिलक करना, चरणों में तुलसी जी अर्पण करना, भोग लगाना और आरती करना। दर्शन और मिलन के लिए जब हृदय आर्त होता है, तब उसे आरती कहते हैं। परमात्मा के वियोग का जिसके मन में दुःख है, वह ही भक्ति करता है। उसका ही हृदय आर्त बनता है। तीन बार चरण ऊपर से आरती उतारिये। तीन बार जंघा के पास आरती उतारिये। तीन बार वक्ष:स्थल पर से और तीन बार मुखारविंद पर से आरती उतारिये। सांत बार समग्र श्रीअंग पर से उतारिये। साष्टांग प्रणाम कजिए। मानसी सेवा में मन की धारा खंडित न होनी चाहिए। अन्य लौकिक विचार न आने चाहिए। नहीं तो सेवा का भंग होता है। मन को भगवद्-स्वरूप में लीन रखिये। सेवा में जितना समय लेते हैं, उतने समय तक आँखें और मन भगवान् में लीन रहे ऐसी - तन्मयता से मानसी सेवा हो तो बहुत आनंद आता है।

सेवा पूर्ण होने के बाद भगवान् को वंदन करके प्रार्थना कीजिए आप मेरे हृदय में विराजिये। मेरे हाथ से सत्कर्म करवाइए। कोई भी सत्कर्म बारह वर्ष तक करने से उसका फल मिलता है। भक्ति का नियम जीवन के अंतकाल तक रखिये। मन को बहुत स्वच्छन्द न बनने दीजिए। मन को नियम में रखिये।

बनिया हर रोज सुबह चार बजे उठकर, आज्ञा के अनुसार मानसी सेवा करने लगा। बनिये ने बारह वर्षों तक मानसी सेवा की प्रत्यक्ष ठाकुरजी आरोग रहे हैं ऐसे दर्शन होने लगे। उसे बहुत आनंद आने लगा। एक बार ठाकुरजी की सेवा करते हुए, मन से दूध ले आया, गर्म किया दूध में शक्कर डाली - वह अधिक पड़ गयी। उसकी प्रकृति कंजूसी की थी। सेवा में तन्मयता तो हुई पर दूध में अधिक शक्कर पड़ गयी है ऐसा सोचकर दूध में पड़ी हुई अधिक शक्कर निकाल लूँ, तो दूसरे दिन उपयोग में आ सकेगी वह शक्कर निकालने को तत्पर हुआ वहाँ दूध नहीं है, शक्कर नहीं है, कुछ नहीं है। पर मानसी सेवा में तन्मय होने से उसे सब कुछ दीख रहा था।गोपाल को मजाक करने का मन हुआ। लाला ने सोचा इस आदमी जैसा रत्न मैंने इस संसार में नहीं देखा। मानसी सेवा कर रहा है, एक पैसे का भी खर्च नहीं कर रहा है, फिर भी अधिक शक्कर पड़ी है, तो निकालने जा रहा है। बालकृष्णलाल घुटनों के बल चलकर आ पहुँचे और उसका हाथ पकड़ लिया। अरे! अधिक शक्कर पड़ गई तो इसमें तेरे बाप का क्या जाता है? तुम तो मानसी सेवा कर रहे हो। एक पैसे का भी खर्च नहीं है। श्रीकृष्ण का स्पर्श हुआ। वह सच्चा  वैष्णव बन गया। महान भगवद् भक्त हो गया।

मानव शरीर साधन करने के लिये है। छह मास नियम से ब्रह्म मूहूर्त में उठकर लाला की मानसी सेवा करने पर उसका फल अवश्य मिलता है। मन के संकल्प-विकल्प कम हो जाते हैं। जिस दिन आपकी अंतरात्मा कहने लगे कि तुम्हारा मन शुद्ध हुआ है, तब आप सच्चे वैष्णव होंगे।

बालकृष्णलाल की सेवा करते हुए, आँखों से प्रेमाश्रु निकलते हैं, तब मन शुद्ध होता है। प्रात:काल परमात्मा की ध्यान- सेवा में जो तन्मय होता है, उसे भक्ति रस का आनंद मिलता है। उसके मन पर संसार के सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रारब्ध के अनुसार सुख-दुःख आते ही हैं पर भक्त के मन पर इनका असर नहीं होता है हमारे जीवन में कोई विशेष दुःख नहीं आता है। संतों के जीवन में अनेक दुःख आते हैं। अनेक जन्म के पाप उनके एक ही जन्म में परमात्मा जला देते हैं। नरसिंह मेहता का युवक पुत्र मर गया पर वे 'राधे गोविंद' रटते रहते, मन को अशांत होने नहीं देते। एक दवा में ऐसी शक्ति है कि शरीर के अंग को सुन कर देती है, इससे शल्य क्रिया के समय पीड़ा नहीं होती है। जब एक दवा में ऐसी शक्ति है तो भक्ति रस में कितनी शक्ति होगी? उस रस में निमग्न होने पर संसार के दुःखों का असर मन पर नहीं होता । तुकारामजी के जीवन में दुःख के अनेक प्रसंग आये। कई दुष्ट दीपावली के दिन उनके पास गये और कहने लगे-आज तो गधे पर बैठाकर आपकी शोभा यात्रा निकालनी है। संत गधे पर बैठ गये। उन लोगों ने संत का बहुत अनादर किया, पर तुकारामजी की शांति का भंग नहीं हुआ। उनकी पत्नी को बहुत दुःख हुआ। वह रोने लगी। तुकाराम के चरित्र में बहुत चमत्कार हैं, पर वे तो परमात्मा ने दिखाये हैं। तुकाराम महाराज ने तो जीवन में एक ही बार चमत्कार दिखाया है। तुकारामजी ने पत्नी से कहा यह गधा नहीं है, मेरे प्रभु ने मुझे गरुड़ पर बैठाया है। सब को गधा दीख पड़ता है, पर उनकी पत्नी को गरुड़ दीख पड़ा। चाहे कैसा भी दुःखद प्रसंग क्यों न हो, भक्तों का मन शांत रहता है क्योंकि उनका मन भक्ति रस में निमग्न रहता है। सुख-दुःख मन के धर्म हैं, उनका स्पर्श आत्मा को नहीं होता है। आप तन नहीं है, आप मन भी नहीं हैं। आप तो मन के साक्षी हैं, चैतन्य आत्मा हैं। जिसे भक्ति का आनंद मिला है, उसे सुख मिलता है, तो उसे सुख तुच्छ लगता है, दुःख भी तुच्छ लगता है। मन पर सुख-दुःख का प्रभाव न हो ऐसी इच्छा है तो प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में नंदमहोत्सव कीजिए।

श्री डोंगरेजी महाराज

हरिओम सिगंल 







 हमारे सनातन धर्म में देव अनेक हैं, पर परमात्मा एक ही है। ईश्वर अनेक नहीं हैं। एक ही ईश्वर के अनेक स्वरूप हैं। वे अनेक रूप धारण करते हैं। हाथ में अगर धनुष-बाण है तो लोग कहते हैं कि ये श्रीरामजी हैं। वही परमात्मा हाथ में बाँसुरी धारण करते हैं तो लोग कहते हैं ये मुरलीमनोहर श्रीकृष्ण हैं। ठाकुरजी रोज पीताम्बर पहिन कर ऊब जाते हैं तो एक दिन वे यशोदा मैया से कहते हैं-

' माँ आज तो मैं बाघम्बर पहिन कर साधु बन कर बैठूंगा।' 

लाला को नवीन पसन्द है। कन्हैया पीताम्बर फेंक देता है और बाघम्बर धारण कर लेता है तब लोग कहने लगते हैं कि वे शंकर भगवान् हैं।


गर्म सहिता में एक कथा है। श्रीराधाजी व्रत कर रही थीं। श्रीकृष्ण के मिलन के लिए श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए राधाजी का यह व्रत था तुलसीजी में श्रीबालकृष्णलाल को विराजमान कर के श्रीराधाजी श्रीबालकृष्णलाल की सेवा करती थीं। परिक्रमा भी करती थीं। राधाजी के पिता वृषभानु ने ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि राधाजी के महल में किसी पुरुष का प्रवेश न हो सके।

कोई पुरुष राधाजी के महल में नहीं पहुँच पाता, न राधाजी से मुलाकात कर सकता था। राधाजी के महल में प्रहरी के रूप में भी सखियों को ही रखा गया था श्रीराधाजी की तीव्र उत्कण्ठा थी कि मुझे श्रीकृष्ण से मिलना है, श्रीकृष्ण के दर्शन करने हैं। इस और लाला की उत्कण्ठा भी जागी। लाला ने सोचा कि अगर मैं पीताम्बर पहिन कर जाऊँगा तो मुझे अन्दर नहीं जाने देंगे और मैं तो अन्दर जाना चाहता हूँ। प्रभु ने चन्द्रावली सखी से कहा कि आज अपने सम्पूर्ण श्रृंगार से मुझे सजा दो चन्द्रावली सखी ने लाला को सखी के रूप में सजा दिया। श्रीकृष्ण सखी का रूप धारण करके राधाजी के पास पहुँचे। वृषभानु वहाँ उपस्थित थे। उनको लगा कि राधा की कोई सखी राधा से मिलने आई है। श्रीकृष्ण भीतर गये और राधिकाजी से मिलन हुआ। भगवान् जब साड़ी पहनते हैं, तब लोग उन्हें माताजी कहते हैं। श्रीकृष्ण, श्रीराम अनेक स्वरूप धारण करते हैं पर ये स्वरूप एक ही तत्व से बने हैं, अतः वे एक ही हैं। सभी को समानता पसन्द नहीं है। सभी को एक ही में रुचि नहीं है।

प्रत्येक जीव की भिन्न-भिन्न रुचि को ध्यान में रखकर परमात्मा ने शिवजी, श्रीराम श्रीकृष्ण, श्रीमाताजी आदि अनेक स्वरूप प्रकट किये हैं, पर सरल या टेढ़ी-मेढ़ी प्रवहमान  नदियों का गम्य स्थान एक ही समुद्र है, उसी तरह सर्व जीवों का गम्य स्थान एक परमात्मा ही है प्रभु के किसी भी एक स्वरूप को मन से निश्चित कर लीजिए। समग्र देवों को वन्दन कीजिए पर ध्यान उस एक का ही कीजिए।

मंगलाचरण में प्रभु का ध्यान करने की आज्ञा दी है। संसार मंगलमय नहीं है, परमात्म मंगलमय है। काम जिसके मन में है, काम जिसकी आँखों में है, ऐसे सकाम का ध्यान करेंगे तो आपके मन में भी काम जागेगा। निष्काम' का ध्यान करेंगे तो काम नष्ट होगा। संसार सकाम है।

“तू करता वहीं है जो तू चाहता है। होता वहीं है जो मैं चाहता हूं। इसलिए तू वो कर जो मैं चाहता हूं। फिर होगा वहीं जो तू चाहता है।” मनुष्य की इच...