सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

गीता दर्शन अध्याय 2 भाग 23

 

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।ततः स्वधर्मं कीघत च हित्वा पापमवाप्स्यसि।। ३३।।


अकीघत चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।। ३४।।


और यदि तू इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करेगा, तो स्वधर्म को और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।

और सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कथन करेंगे और वह अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिए मरण से भी अधिक बुरी होती है।


अभय क्षत्रिय की आत्मा है। कैसा भी भय न पकड़े उसके मन को, कैसे भी भय के झंझावात उसे कंपाएं न। कैसा भी भय हो, मृत्यु का ही सही, तो भी उसके भीतर हलन-चलन न हो। 

तो कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं, तू और भयभीत? तो कल जो तेरा सम्मान करते थे, कल जिनके बीच तेरे यश की चर्चा थी, कल जो तेरा गुणगान गाते थे, कल तक जो तेरी तरफ देखते थे कि तू एक जीवंत प्रतीक है क्षत्रिय का, वे सब हंसेंगे। अपयश की चर्चा हो जाएगी, कीर्ति को धब्बा लगेगा। तू यह क्या कर रहा है? तेरा निज-धर्म है जो, तेरी तैयारी है जिसके लिए, जिसके विपरीत होकर तू जी भी न सकेगा; कीर्ति के शिखर से गिरते ही, तू श्वास भी न ले सकेगा।

और ठीक कहते हैं कृष्ण। अर्जुन जी नहीं सकता। क्षत्रिय मर सकता है गौरव से, लेकिन पलायन करके गौरव से जी नहीं सकता। वह क्षत्रिय होने की संभावना में ही नहीं है। तो कृष्ण कहते हैं, जो तेरी संभावना है, उससे विपरीत जाकर तू पछताएगा, उससे विपरीत जाकर तू सब खो देगा।

 कृष्ण क्या युद्धखोर हैं! लग सकता है कि युद्ध की ऐसी उत्तेजना! युद्ध के लिए ऐसा प्रोत्साहन! तो भूल हो जाएगी, अगर आपने ऐसा सोचा।




कृष्ण सिर्फ एक मनस-शास्त्री हैं।  अर्जुन क्या हो सकता है, यह समझते हैं; और अर्जुन क्या होकर तृप्त हो सकता है, यह समझते हैं। और अर्जुन क्या होने से चूक जाए, तो सदा के लिए दुख और विषाद को उपलब्ध हो जाएगा और अपने ही हाथ नर्क में, आत्मघाती हो जाएगा, यह भी समझते हैं।

वह जो कृष्ण कह रहे हैं, वह युद्ध की बात नहीं कह रहे हैं, भूलकर भी मत समझ लेना यह। इससे बड़ी भ्रांति पैदा होती है। कृष्ण जब यह कह रहे हैं, तो यह बात  विशेष रूप से अर्जुन के टाइप के लिए निवेदित है। यह बात, अर्जुन की जो संभावना है, उस संभावना के लिए उत्प्रेरित है। यह बात हर किसी के लिए नहीं है। यह हर कोई के लिए नहीं है।

कृष्ण युद्धखोर नहीं हैं। कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं यह। और आप भूलकर भी यह मत समझ लेना कि सबके लिए, अर्जुन से कहा गया सत्य, सत्य है। ऐसा भूलकर मत समझ लेना।

हां, एक ही बात सत्य है उसमें, जो जनरलाइज की जा सकती है; और वह यह है कि प्रत्येक की संभावना ही उसका सत्य है। इससे अगर कोई भी बात निकालनी हो, तो इतनी ही निकलती है कि प्रत्येक की उसकी निज-संभावना ही उसके लिए सत्य है।
(भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन) 

हरिओम सिगंल

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